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गुरुवार, 29 जून 2023

सोनार सोनेट

* अरविन्द श्रीवास्तव, दतिया  

* छाया सक्सेना, जबलपुर  

* देवकांत मिश्र,  

* नवीन चतुर्वेदी, मुंबई  

* निधि जैन, इंदौर  

* नीलम कुलश्रेष्ठ, गुना  

* मनोरमा जैन पाखी 'मिहिरा', भिंड 

* रेखा श्रीवास्तव, अमेठी 

* विनोद जैन वाग्वर, सागवाड़ा 

* विपिन श्रीवास्तव, दिल्ली 

* सुनीता परसाई, हैदराबाद 

***

अरविंद श्रीवास्तव 'असीम' डॉ.

जन्म -२९ जून १९५९ ।   
आत्मज - श्रीमती बृजकिशोरी - स्व.नाथूराम श्रीवास्तव। 
जीवन संगिनी - श्रीमती सुषमा कान्ती । 
शिक्षा - एम.ए.(हिंदी, अंग्रेजी, मनोविज्ञान, समाजशास्त्र, दर्शनशास्त्र), डी.आर.जे.एम.सी.(पत्रकारिता), जे.आई.आई.बी. (हिंदी),  पीएच-डी., डी.लिट. (साहित्य महोपाध्याय मानद)।  
प्रकाशित पुस्तकें-हिन्दी व अंग्रेजी में १०० से अधिक। 
संप्रति--अध्यापन, न्यूट्रिशन काउंसिलर।
संपर्क - १५० छोटा बाजार, माता मंदिर से आगे, दतिया ४७५६६१ मध्य प्रदेश। 
व्हाट्स एप - ९४२५७२६९०७, ६२६५८६२३०२ ।  
ईमेल--arvinda290659@gmail.com



गुरु महिमा
*
गुरु का सुमिरन जब करता हूँ,
युक्ति सदा ही मिल जाती है।
गुरु का वंदन जब करता हूँ,
जीवन कलिका खिल जाती है।

भव सागर में फँसा हुआ था,
दूर बहुत था; दूर किनारा।
कठिन डगर पर खड़ा हुआ था,
कोई नहीं उत्कृष्ट सहारा।

सद्गुरु जैसा परम हितैषी,
अन्य न कोई जग में पाया।
दुनिया में स्वार्थी विद्वेषी,
गुरु ने सत्य मार्ग दिखलाया।

गुरु को मेरा सतत नमन है।
और समर्पित यह तन-मन है।

***


राष्ट्र धर्म
*
एक नाव में सब सवार हैं,
सबको ही पार उतरना है।
नहीं एकजुट बड़ी हार है,
पर सबको आगे बढ़ना है।

अब तो ऐसा समय आ गया,
मेल-जोल से साथ चलें हम।
सबका साथ प्रयास भा गया,
आँख निबल की अब न रहे नम।

आओ! अब हम करें समन्वय,
श्रम कौशल तकनीक मिलाएँ।
नैतिक मूल्यों रहें सब अक्षय,
सुख-सुविधा विकास गह पाएँ।

नवयुग का नव दर्शन जानें।
राष्ट्र धर्म सर्वोपरि मानें।

***


श्रमिक
*
श्रमिक सदा अभाव में जीते,
जग को ऊँचे महल बनाते।
निष्ठुर भाग्य अँधेरा पीते,
जग में जगमग दीप जलाते।

जग को देते सुमन सुगंधित,
उनको बस काँटे ही मिलते ।
सदा-सदा करते वे जनहित,
आँगन सुमन कभी नहिं खिलते।

स्वयं वेदना ही सहते हैं,
पर जग को देते मुस्कानें।
सदा रुदन में वे रहते हैं,
जग को देते मधुर तराने।

श्रम का मूल्य जगत पहचाने।
श्रमिकों के महत्व को माने।

****


भावना
*
जिसकी नहीं साधना होती,
समझो वह कोरा पत्थर है।
जिसमें नहीं भावना होती,
वह तो पशु से भी बदतर है।

बिना भावना के क्या कोई,
सच्चा भक्त कभी बन सकता।
सहज भावना बिना न कोई,
शिष्य कभी ज्ञानी बन सकता।

इसी भावना के कारण ही,
माँ को सदा मान मिलता है।
इसी भावना के कारण ही,
गुरु से हमें ज्ञान मिलता है।

सरस भावना को स्वीकारें।
निज जीवन को और निखारें।

***


अभिलाषा
*
जाने कितनी अभिलाषाएँ,
उठती-गिरती मानव मन में।
जाग्रत होती नित आशाएँ,
नित नवीन सपने हर क्षण में।

अभिलाषाएँ अगर न होती,
जीवन जीना दुष्कर होता।
चारों ओर निराशा होती,
सारा जीवन बोझिल होता।

माली की अनुपम अभिलाषा,
गुलशन में तब सुमन विहँसता।
मिट जाती हर एक निराशा,
रंग-बिरंगा दृश्य उभरता।

अभिलाषा यह मन में रहती।
प्रदूषण से रहित हो धरती।

****

आँसू
*
टपक-टपक कर आँसू कहते,
किसको अपनी व्यथा सुनाऊँ।
बीत गए युग सहते-सहते,
कैसे अपनी बात बताऊँ।

कभी-कभी पिछली यादों में,
मन जब भी खो सा जाता है।
प्रेम भरे झूठे वादों में,
मन विरहाकुल हो जाता है।

आह और पीड़ा के तीखे,
घूँट सदा मैं पीता रहता।
तड़प भरे रसहीन व फीके,
जीवन को मैं जीता रहता।

मेरी अपनी अलग कहानी।
मेरी कीमत किसने जानी।

***


पहले का जीवन
*
बहुत सरल था पहले जीवन,
मंज़िल भी थी सीधी-सादी।
और कपट से दूर सदा मन,
शुभ कर्मों का था वह आदी।

अगर उसे पीड़ा मिलती थी,
मन ही मन वह रो लेता था।
अगर उसे खुशियाँ मिलती थी,
खुलकर के वह हँस लेता था।

सीमित सबकी रही जरूरत,
आपाधापी नहीं कहीं थी।
कठिन परिश्रम सबकी दौलत,
सुख-सुविधाएँ नहीं कहीं थी।

जिस क्रम से बढ़ रही सभ्यता।
मानव में बढ़ रही दुष्टता।
****

छाया सक्सेना 'प्रभु'

जन्म- १५ अगस्त १९७१, रीवा (म.प्र.)।
शिक्षा- बी.एससी., बी.एड., एम.ए. (राजनीति विज्ञान), एम.फिल.(नीति शोध)।
पुस्तकें- तुम कली सुंदर हमारी (काव्य संग्रह), धवल काव्य ,ड्योढ़ी के पार (लघुकथा संग्रह)।
संपर्क - माँ नर्मदे नगर १२ , बिलहरी, जबलपुर (म.प्र.)
चलभाष - ७०२४२८५७८८ ।
ईमेल - chhayasaxena2508@gmail.com

***




नर्मदा प्राकट्य

समुद्र मंथन हलाहल पाया,
गरल धारण नीलकंठेश्वर,
मैकल पर्वत ध्यान लगाया,
टपकता स्वेद शिव जगदीश्वर।

प्रकटी कन्या नेह जगाते,
नाम नर्मदा सभी पुकारें,
जिसको देख सभी सुख पाते,
जगदानंदी रूप निहारें।

कठिन तपस्या कर वर पाया,
प्रलय काल में भी रहतीं हैं,
ग्राम घाट तट तीर्थ बनाया,
जपें शांकरी शिव कहतीं हैं।

करें साधना तट पर आकर।
ॐकार प्रभु ध्यान लगाकर।।

***


माई की बगिया

आम्रकूट से बगिया महके,
साल सागवन गुलबकावली,
कोयल कूके पंछी चहके,
खेलें सखियों संग हँस लली।

ऊँचे घने घनेरे जंगल,
पाँच कुण्ड रेवाजल धारे,
साधु संत सत्संगति प्रतिपल,
बालरूप मैया के न्यारे।

ठंडी - ठंडी हवा बह रही,
प्रकृति सुनाती राग मल्हारी,
सामवेद के मंत्र गा रही,
जड़ी बूटियाँ औषधि सारी।

पुष्प चुन रहीं रेवा माई।
सखियों ने मिल माल बनाई।।

***


माई का मड़वा

पंचवटी की फैली छाया,
शोणभद्र संग रिश्ता जोड़ा,
मंडप हरे बाँस का भाया,
धोखा दे जुहिला ने तोड़ा।।

सोनभद्र को जुहिला भाई,
दोनों छलकर साथ चल दिए,
रूठ गई तब रेवा माई,
गठबंधन सारे तोड़ लिए।

बरतन अन्न बने सब पत्थर,
आभूषण रुद्राक्ष बन गए,
पश्चिम दिशा बह चलीं झर-झर,
छप्प छपाक प्रपात बन गए।

अमरकंट को छोड़ चली माँ।
धारा अपनी मोड़ चली माँ।।

***


कंकर-कंकर शंकर

त्याग तपोमय रेवा धारा,
कंकर-कंकर शंकर पाते,
नेह नर्मदा रूप निहारा,
दर्शन करते पाप मिटाते।

मन मंदिर में आप विराजे,
नित संजीवित प्राण सज रहे,
डमडम डिमडिम डमरू बाजे,
रेवाशंकर नाम भज रहे।

घाट जिलहरी शिव बन जाता,
नंदिकेsश्वर महिमा भारी,
गौरीघाट मुक्ति फल दाता,
सत-शिव-सुंदर जी त्रिपुरारी।


नर्मदेsश्वर पूजन करते।
सकल सिद्धियाँ झोली भरते ।

***


धुँआधार (जबलपुर)

चट्टानों ने खूब छकाया,
धुँआ उठे जल बिन जल जानें,
हरा-भरा परिदृश्य सुहाया
कलकल करती रेवा तानें ।

पंख बिना कैसे उड़ जाते,
दुग्ध सफेदी मन भरमाए,
जलप्रपात हमको सिखलाते,
बाधा से मन हार न जाए।

गहराई में जाकर देखा,
ऊपर उठना उठकर चलना,
भाग्य जगाने का है लेखा,
मैया जीवन रेखा ललना।

पूनम चंदा जल में नाचे।
लहरा प्रणय पत्रिका बांचे।।

***


बांद्रा भान संगम

तवा नर्मदा संगम धारा,
नाम बांद्राभान सुहाया,
हर्षित होता लख जग सारा,
हनुमत भानु गुरु मन भाया।

नदी मिल रही पाट बढ़ाते,
रेत सुनहरी यहाँ चमकती,
स्वर्ण आभूषण चलो गढ़ाते,
चमक सितारे भाग्य बलबती।

निर्मलता पावन सुखदाई,
त्याग तपो तेजस्वी रूपा,
सिद्धक्षेत्र दर्शन फलदाई,
दृश्य मनोरम शांत अनूपा।

तवा नर्मदा में सुख पाती।
बिछड़ी दो बहनें मिल जाती।।

***

नाभि केंद्र नर्मदा

नेमावर सिद्धेश्वर राजे,
नाभि उत्तरी केंद्र दिखाया,
हंडिया श्री रिद्धेश्वर साजे,
नाभि दक्षिणी केंद्र कहाया।

आधी दूरी नीर नर्मदा,
सागर संगम पूरी करतीं,
सच्चे मन से जपो सर्वदा,
मैया तन-मन-पीड़ा हरतीं।

नदी मध्य में कुण्ड बनाया,
पूजन करते विधि विधान से,
लमटेरा जब टेर सुनाया,
मैया ने हँस सुना ध्यान से।

आधा पाया आधा पाना।
पूरा करना प्रण जो ठाना।।

***


मांधाता पर्वत


पर्वत मांधाता ओंकाsर,
ओंकारेश्वर पावन धाम,
ममलेsश्वर पूजे संसार,
बनते सारे बिगड़े काम ।।


एक पुंज दो ज्योति समाए,
उत्तर दक्षिण तट पर सोहे,
कावेरी रेवा में आए,
संगम सबके दुःख मिटाए।

यहीं परिक्रमा पूरी होती,
गौमुख धारा पावन बहती,
भाव भक्ति के भाव सँजोती,
भक्त मंडली सुधियाँ तहती।

भोले शंकर के मन भाया।
क्षेत्र खण्डवा रूप सुहाया।।

***


शूलपाणि की झाड़ियाँ

सघन झाड़ियाँ; वृक्ष विराट,
शूल मिटे त्रय ताप कटेगा,
दिखे सतपुड़ा विंsध्या ठाठ,
भ्रम तज; मन का मैल हटेगा।

खड़ी चढ़ाई दुर्गम लगती,
सूर्य ताप की ज्वाला भारी,
श्रद्धा मैया के प्रति जगती,
तीन राज्य की सीमा वारी।।

शूलपाणि स्थान जहाँ पर,
अश्वत्थामा पूजन करते,
वापस तेज त्रिशूल यहाँ पर,
भक्तों की सब पीड़ा हरते।।

शुभाशीष मैया से पाए।
भक्तों के मामा कहलाए।।

***


सागर संगम

सागर उठती लहरें दिखतीं,
रेवा संगम प्रीत समाई,
कर्मों का माँ लेखा रखतीं,
परमानंद मिले सुखदाई।।

खारा जल मीठा हो जाता,
रामकुण्ड दर्शन सुख पाना,
विमलेश्वर बन भाग्य विधाता,
कोटेश्वर सौ तीर्थ समाना।।

नाव लहर या लहर नाव पर,
कोई भी सच समझ न पाता,
आसपास पक्षी जुड़ाव पर,
रेवा सागर संगम भाता।।

भक्तों की माँ सदा सहाई।
परकम्मा जनगण सुखदाई।।

***


रेवा स्तुति

नमो नमो रेवा जल धारा,
मातु शांकरी मक्रवाहिनी,
जल जीवन जन पालनहारा,
सुख देतीं सौभाग्यदायिनी।

मातु अमृता आप कहातीं,
विंध्य सतपुड़ा भ्राता जाना,
नेह नर्मदा बन बरसातीं,
मैकल पर्वत पुत्री माना।

सोया भाग्य जगाती मैया,
संगम तीर्थ सिद्धफल देते,
अविवाहित कन्या जग मैया,
रत्ना सागर का जल लेते।

हर हर हर नर्मदे कहेंगे।
रेवा तट पर सदा रहेंगे।।

***

निधि जैन 

जन्म - २४-२-७४, आलिराजपुर।  
आत्मजा - श्रीमती शकुन्तला जैन - श्री जयंतीलाल जैन।  
जीवनसाथी - श्री प्रीतेश जैन।  
शिक्षा - एम .ए . हिंदी साहित्य , प्राकृत भाषा में डिप्लोमा। 
प्रकाशित पुस्तकें - रेवा में बहते मयूर पंख, हौसले का हुनर, कई साझा संकलन। 
संपर्क - १३० बैकुंठ धाम कॉलोनी ,आनंद बाज़ार के पीछे इंदौर।  
चलभाष - ९३००४२२१११
ईमेल - nidhivartu@gmail.com





भुवन भास्कर
*
हे दिव्य दिनेश दिवाकर,   
लें अरुण आदिभूत नमन,  
अहा परम पूज्य प्रभाकर,   
वंदनीय वसुदेव नमन। 

तमनाशक तेजसदाता,
सर्व जगत तुमसे ऊर्जित,
आर्त विनाशक जगत्राता,
ब्रह्म कमल तुमको अर्पित। 

सप्तअश्व के धारक तुम,
नित तुममें ही ध्यान रहे,
तुम बिन हो नहिं जाएँ गुम,
हम अबोध प्रभु! ध्यान रहे। 

नमन त्रिभुवन नाथ भास्कर। 
जयति जय हे भुवन भास्कर।। 

***

प्रभात  
*
ले विश्राम रात भर का,  
सूर्य झट निकला काम पर,
देता ज्ञान नित नियम का,
छोड़ आया आलस्य घर। 

जागो भोर भई भाई,
पंछी नदी कंदरा भू,
पाप न कर हो रुसवाई,
प्रभु वंदन कर तर जा तू। 

स्वेद-गंग में नित्य नहा,
पेहरन श्रम की रह ओढ़े,
सत को शीतल छाह बना,
मुख से अमिय वचन बोले। 

तप ज्वाला में तपते चल। 
नित भास्कर सम चलते चल।। 

***

ऊषा 
*
नित नूतन नीली आभ लिए,   
हो उदित करें जग को जागृत,
ऊषा तम मिटा उजास लिए,
नीलाभित कर जीवन झंकृत। 

उठ जाता है प्रभु ओर शीश,
जब होता है जीवन निराश,
विश्वास-डोर दे रहा ईश,
कोशिश कर पा लो मन प्रकाश। 

मन पंछी नील गगन में उड़,
जाना है तुझको मेघ चीर,
तारों सह इंद्र भवन में जुड़,
मिल परियों से मत हो अधीर। 

नभ नींद मग्न चल रात हुई। 
चाँदनी चाँद में बात हुई।। 

***

कलाकार मन

ख़ाली समय है क्या करें हम,  
चलो करते हैं मिल कुछ काम,
पैसा न साधन क्या करें मन,
कलाकार से हो न विश्राम। 

छीना यंत्रों ने रोज़गार,
भरा माल बाज़ार विदेशी,
चीन के सम्मुख क्यों लाचार,
है मिटा बाजार स्वदेशी। 

करो कबाड़ से जल्द जुगाड़, 
हो साकार स्वप्न कौशल से, 
आओ जगत में झण्डा गाड़,  
रोक न पाए कोई छल से। 

कला कर्म श्रम व्यर्थ न जाए।  
रचना सुख निधि जैसे पाए।। 

***

पाती

पाती कहती बातें दिल की,
इसमें छुपे आँसू मुस्कान,
मिलन-विरह की बातें दिल की,
पढ़ें न समझते हैं नादान। 

मोल नहीं शब्दों की निधि का,
भाव छिपाए रहे अनमोल,
पालन हो नहीं ख़ास विधि का,
अपने मिलें, मिलती दिल खोल। 

लिख भेजूँ  मैं दिल से पाती,
प्रिय सुमिरें मेंहदीमय हाथ,
पढ़ूँ लिखी हर बात सुहाती,
प्रिय पढ़ चूम लें जैसे गात।  

बदला रूप आज पाती का।  
मैसेज-काल रूप पाती का।। 

***

तरुणाई

तरुणाई के अलग अंदाज, 
नदियाँ सागर पोखर झरने,
पानी के संग छई छपाक,
कर सुख पाया तन ने; मन ने। 

ज्ञानी भूले मन की करना,
रहे सोचते सही या ग़लत,
जाने उहापोह नहीं तजना,
पावस ठंडी ता तपन-अगन। 

सागर की उत्ताल तरंगें,
रोक नहीं सकती हैं इसको,
तल कितने ही गहरें लहरें 
जा पैठें ललकारें उसको। 

बेख़ौफ़ बिंदास रहे तरुण। 
इससे हारे मरुत अरु वरुण।। 

***

वर्षा मंगल  

घंटे बजे घड़ियाल बजे,  
मंत्रोsच्चार गुँजा चहुँ ओर,
कारे-कारे वारिधर बजे, 
लाए हम ये घटा घनघोर। 

आ तत् थैया ,ता तत् थैया,
पिहू-पिहू-पिहू करत शोर,
यह वर दे दे गौरी मैया,
हो नटराज सा साजन मोर। 

रिमझिम-रिमझिम की झड़ी लगी,
छाई हरितिमा  झूले डले,
ओढ़ लेरिया अली हँस चली,
संस्कृति गाँवों में फूले-फले। 

ऋतु सावन की नायकों गाओ। 
वर्षा मंगल विहँस मनाओ।। 

***

आँख का पानी   

रे मन! तू बन जा कबीर,   
झूम-नाच मन चंगा हो, 
रे मन! तू बन जा फ़क़ीर,
काम न कुछ बेढंगा हो। 

जी भर चले पवन अंधड़, 
तरु से सूखे पत्र झरे,
नाच मगन हो, मत बन जड़, 
बच्चे बूढ़े मन हैं हरे। 

ऋतु हेमंत पर्व लाए
खुशियाँ पाएँ मस्ती में
जनगण झूम गीत गाए,  
रामराज हो बस्ती में। 

इकतारा कहे कहानी। 
सूखे न आँख का पानी।। 

***

गीत प्रीत के 

निधि की प्रीत; प्रीत की निधि,   
समझदार देखे-भाले,
जान जाए प्रेम की विधि,
वह सारे ही सुख पा ले। 

प्रीत मूल निष्काम चाह,
देने का हो पाक भाव, 
गहराई उसमें अथाह,
किंचित भी कम हो न चाव।  

प्रीत-गीत सब ने गाया,
मीरा कबिरा दादू ने,
ढाई आखर समझाया,
रो रो प्रीत न जानू रे!

गीत प्रीत के जो गाए। 
नारी के मन को भाए।। 

*** 

प्रीत  
 
चंदन प्रीत  शीश लागे  १४  
महक उठे दुनिया सारी
फूल-पखुरी नीक लागे
तन-मन की सुध ही नाहीं

कल तक थे जो बेगाने
मन को भाए आज वही
प्रीत को बंधन न माने
पिया जो कहे वही सही

प्रीत डगर राधा-मीरा
सती सिया निज ढंग चली
रघुवर जूठा बेर चखें
निज नहीं प्रिय रीत भली

प्रीत से चमके नभ तारा
प्रेम से महके जग सारा

*** 

परकम्मा  
*
गजमुख ने थी रीत चलाई, 16 
माँ के चारों और घूम के,
या कहिए यह सत्य बताया,
धरती ले फेरे सूरज के। 

हैं हमें बूझने गूढ़ कथन, 
हैं अकूत निधि ये कहानियाँ
कैसे चलते प्राचीन चलन,
कैसे बच सकती ये दुनियाँ। 

नियम क़ायदे; ढेर फ़ायदे,
परिक्रमा हो पेड़ नदी की,
कहें न जुमला; करें वायदे,
बने कहानी नई सदी की। 

केंद्र दूर फिर भी है साथ। 
परकम्मा जी रेवा मात।। 

***


नीलम कुलश्रेष्ठ 


जन्म तिथि - ०३ अगस्त १९७१, हाथरस, उ. प्र.।
शिक्षा - एम. ए. (संस्कृत व अंग्रेज़ी), बी.एड.।
प्रकाशित पुस्तकें - "बालगीत सोपान", "माँ के आँचल में" (गीत संग्रह) एवं "भोर सुहानी जाग उठी जब" (मुक्तक-मंजूषा)।
संपर्क - द्वारा- श्री मधुर कुलश्रेष्ठ, नीड़, गली नंबर - 1, आदर्श , गुना ४७३००१ मध्य प्रदेश।
मोबाइल नं. - 9407228314, ईमेल पता - kulsneelam@gmail.com ।

***



तिरंगा 

सजी हुई है तीन रंग से, 
धवल पताका यह खादी की,
बना चक्र जो नील रंग से, 
लाया आशा आज़ादी की।। 

रंग केसरी बलिदानों का, 
धवल सत्य के नाम हो गया। 
हरा रंग था धन-धान्यों का, 
सुंदर यह पैगाम हो गया।। 

यही तिरंगा साक्ष्य रहा है, 
संघर्षमयी कहानियों का। 
ज़ुल्म फिरंगी बहुत सहा है, 
रूप क्रांति की निशानियों का।। 

राष्ट्रोत्सव की शान तिरंगा। 
भारत का अभिमान तिरंगा।।

***

तपन

तपन ज़रूरी है जीवन में, 
तपकर सोना कुंदन बनता, 
बिना तपा घट हो आँगन में, 
बारिश में कीचड़ बन बहता।,

चाह ज्ञान की जो रखता है, 
वह भी खोज-तपस्या करता,
विहग गगन में जो उड़ता है, 
सूर्य तपन भी वह हँस सहता।,

कृषक-श्रमिक को हमने देखा, 
स्वेद-बूँद से भरा हुआ तन,
करतल में उद्यम की रेखा,
उदर-पूर्ति का श्रम ही साधन।,

बिना तपन के लक्ष्य नहीं है। 
कर्महीन को भक्ष्य नहीं है।। 

***

प्रीत 

प्रीत-डोर प्रभु की मानव तक, 
प्रीत बिना जीवन असार है, 
यह संदेश मनुज दानव तक, 
कहीं नहीं इस बिन बहार है।,

प्रीत छिपी है भक्ति-लगन में,
भक्ति राम में ज्यों कबिरा की,
प्रीत छिपी है सूक्ति वचन में। 
प्रीत कृष्ण-राधा-मीरा की।,

संतति-हित ईश्वर है माता, 
जहाँ वासना, प्रीत नहीं है,
शलभ-शिखा का अनुपम नाता, 
त्याग प्रीत की रीत रही है।

प्रीत-कोश में सुरभि भरी है। 
प्रकृति प्रीत की सुखद धरी है।।

***

श्रमिक 

जगती का सर्जक कहलाता, 
श्रम की चक्की में पिसता है,
स्वेद-स्नेह से दीप जलाता, 
सारा जग रोशन करता है। 

जीर्ण-शीर्ण कुटिया में रहकर, 
आँधी-झंझा से डरता है, 
क्षुधा-अग्नि-ऊष्मा को सहकर, 
निश-दिन जीता अरु मरता है। 

सबके सपने पूरे करने, 
निज इच्छाओं को तजता है। 
दूजों की झोली को भरने,
अपने सजल नयन  रखता है।। 

क्यों मजदूर अभागा सा है। 
श्रमिक रात्रि से जागा सा है।। 

***

वसुंधरा 

ज्येष्ठ मास में तप वसुंधरा, 
मेघों का आवाहन करती,
शुष्क आवरण, कभी था हरा, 
बेबस धरती आहें भरती। 

झंझा-आँधी तूफानों ने, 
भू को ऐसा बदहाल किया, 
धरतीवासी नादानों ने, 
जीवन सत्वों को छीन लिया। 

मानव गलती नहीं मानते, 
स्वार्थी मूरख अभिमानी हैं,
अमिय त्यागकर गरल जीमते, 
यह मनमानी नादानी है। 

धरा सजा दें मिलकर आओ। 
गीत सृजन के सब मिल गाओ।।

*** 

नीलांबर

दिनकर का प्रकाश ज्यों बिखरा, 
पूँछ दबाकर झट तम भागा। 
द्रुमदल जल-थल कण-कण निखरा, 
वसुधा का हर प्राणी जागा।। 

नीलांबर में आकर दिनकर, 
स्वर्णिम आभा हँस फैलाए। 
रक्तिम निज छवि ऊषा मनहर,
जल के दर्पण में छितराए।। 

पंख पसारे विहग टोलियाँ,
नीलांबर की ओर उड़ चलीं। 
वन-उपवन में रम्य तितलियाँ, 
कलियों-कुसुमों पर घुमड़ चलीं।। 

दृश्य सुहाने, मन हर्षाए। 
गीत प्रकृति के जन मन गाए।। 

***

पंचामृत 

पंचामृत में पाँच घटक, 
दूध-दही-मधु-शक्कर-घी,
पंचतत्व  के संयोजक, 
संग में गंगाजल-तुलसी।,

स्वास्थ्य-सुधारक मेवा लो,
मिश्रित कर पंचामृत में,
अर्पित कर हरि-हर-श्री को,
खुशी मिले चरणामृत से।   

ऊर्जा का संतुलन इसी से, 
हर्षोल्लास प्रदायक भी,
यदि प्रसाद मिले कहीं से, 
पीकर खुश हो जाए जी।,

जय बोलो शिव शंकर की।
जय बोलो पीतांबर की।।

***

पंचतत्व

हरी-भरी वसुधा तरुवर की, 
सभी प्राणियों का यह घर है,
सकल सृष्टि रचना-प्रभुवर की,
मानव-हित यह सुंदर वर है।  

भू-समीर-जल-नभ अरु पावक, 
जिनसे मिलकर सृष्टि बनी है,
कुंभकार-सम ब्रह्महिं सर्जक, 
जिनके कर से प्रकृति सजी है।,

पंचतत्व से प्राणी बनता, 
रहें संतुलित वह सुख-भोगी,
इस विघटन से प्राणी मरता,
असंतुलन से बनता रोगी।,

पंचतत्व यह प्रविधि चिकित्सा।
औषधि-बिन पा रही प्रशंसा।। 

***

परिक्रमा 

धरती माता अविरत गति से, 
सूर्य देव की करे परिक्रमा,
गणपति ने भी अपनी मति से, 
किया प्रमाणित, बुद्धि उत्तमा।।

लोक त्रय की परिक्रमा-हित,
लिया सुमति का आश्रय उनने, 
मात-पिता नित पूजित वंदित, 
विजयी करा दिया इस गुण ने।। 

नभ से उच्च पिता की पदवी,
माता भू से भी महती है, 
तपती-सहती ज्यों हो साध्वी, 
अपने कष्ट नहीं कहती है।। 

मात-पिता का त्याग-समर्पण। 
संतति कर न सके प्रत्यर्पण।। 

***

गिलहरी 

मेरे घर की छत पर जमघट, 
खूब लगाती हैं गिलहरियाँ,
रखा खाद्य खा जातीं झटपट, 
सरपट दौड़ लगाती गुइयाँ।,

गमलों के पीछे छिप जातीं, 
फिर पौधों पर चढ़ जातीं हैं,
चिहुँक-चिहुँक कर गीत सुनातीं,
कली-फूल-पत्ते खातीं हैं। 

पेय-पात्र से उचक-उचककर,
मीठा शरबत भी पी जातीं। 
दिन भर घर की रौनक बनकर, 
हर पल सबका मन हर्षातीं।। 

नीम-गिलोय व गैंदा-गुड़हल।
मन भाते करतीं चढ़ हलचल।। 

***

निर्भीक बचपन 

गरमी के मौसम में सबको, 
पानी का है स्पर्श सुहाता। 
सचमुच भारतीय बच्चों को, 
पानी में कूदना लुभाता।। 

कोई झिझक न डर ही लगता, 
गर्मी के दिन मौज-मस्तियाँ।
छप-छपाक-छप, छप-छप-रुचता,
बचपन तैरे बैठ कश्तियाँ।।

तरबूजे हैं पार उतरकर, 
बैठ उघाड़े धूप सेकते।
खरबूजे अरु ककड़ी खाकर, 
फिर से एक छलाँग लगाते।। 

बचपन के दिन नहीं भूलते। 
स्मृति पटलों पर सदा झूलते।। 

***


मनोरमा जैन पाखी 'मिहिरा' 

जन्म - ५ दिसंबर भिण्ड (मध्यप्रदेश)। 
शिक्षा- एम.ए. (हिंदी)। 
आत्मजा - स्मृतिशेष शाह श्रीमती सुखदेवी - स्मृतिशेष शाह रतनचंद्र जैन।   
जीवनसाथी- पांडे सुनील कुमार जैन। 
चलभाष - ८८३९९३४७४२ ।   
ईमेल - manoramajain43718@gmail.com








उषा

देख उषा की अरुणिम आभा,
रवि-किरणों को रंग बिखराते,
प्राची गोद अरुण अलसाया,
फूलों पर भँवरे मँडराते।

कानन में भी हुआ सबेरा,
चिड़िया चहक उठीं पेड़ों पर,
श्याम घटा ने डाला डेरा,
बहने लगी हवा अति सुंदर। 

शंखनाद ज्यों दिया सुनाई,
पूजा के सब थाल सजे हैं,
घंटनाद कर विनती  गाई,
ढोलक मंजीरे गरजे हैं। 

रवि का हाथ पकड़ कर आती
उषा नित नव स्वप्न दिखाती।

*** 

तुम-मैं 

घन सम यदि तुम साथ निभाते,
मैं शीतल जल चंचल होती,
तुम आकर जब अंग लगाते,
मैं संदल बन अंचल धोती।

तुम होते गर सुप्त सिंधु से,
मैं दरिया बन अंक समाती,
तुम होते जब मेघ इंदु से,
मिल तुम संग उत्पात मचाती।

विपरीतता अगर आ जाती,
हम दोनों के हृदय भुवन में,
मति फिर कैसे यूँ भरमाती,
जलती कैसे  प्रीत अगन ये।

हो जाता संपूर्ण निवारण। 
उठ जाता जब मोह आवरण।। 

*** 

इच्छा-जाल 

अभीप्सित इच्छाओं का जाल, 
चक्रव्यूह सा घेर रहा है,
बनकर यह मेरा क्रूर काल,
आज मुझे ही टेर रहा है।

शीतल निर्झर बुदबुद जीवन,
बूँद बूँद रिसता ज्यों मटका,
नभ आँचल की उधरी सीवन,
देखे ठिठका, क्षण में चटका।  

किस विधि पाऊँ तुमको प्रियतम!
दिन रात प्रश्न मथते मन को,
घेर रहा क्यों मुझे प्रबलतम,
बंधन डोर कसे क्यों तन को।

रही अबूझ कहानी मेरी
बना जीवन पहेली मेरी।

***

वंशी

यमुना तट पर बजती वंशी,
जुड़ जाते झट साथी संगी,
अश्रु भरी अँखियाँ यदुवंशी,
राह तकें उठ-बैठ उटंगी।

सप्त सुरों से निकले विराग,
हुए न दर्शन अब तक श्याम,
मन दहके, पलाश में आग,
दीठ बावरी, ले हुई शाम। 

आ भी जा वृषभान दुलारी,
टेरे तुमको वेणु सुनो धुन,
धेनु रँभाये दुम फटकारी,
नैन बरसते, सपने बन बुन। 

सौत बनी राधिका,बांसुरी। 
सूखी टहनी बाँस की अरी!।। 

*** 

बरखा 

प्रकृति चंचल सुहानी हो, लगाती आग पानी में,
धरा मचले रवानी में, विहँस मन झूमकर गाए, 
हुई जब गगन से बरखा, सुमन खिलते जवानी में, 
अमित हो सृष्टि में हलचल,नदी को उमड़ना भाए।

धरा पे ओस देखी तो, लगा मुक्ता लड़ी बिखरी,
कभी झूमे मचल फिर चुप, अजब सी यह पहेली है,
जतन करती चले हौले, समेटे सब कड़ी निखरी,
लगे जैसे कहे सबसे, सँकुच न्यारी सहेली है।

अभी तक खोजती हूँ मैं, पुराने खत किताबों में,
जहाँ तुमने पुलक छूकर, हमें उपहार सौंपा था, 
मिला अब तक नहीं उत्तर, छिपा था जो गुलाबों में
खिला था फूल इक कोई, हँसी सा ख्बाव सौंपा था। 

परी कोई जमीं उतरी, बड़ी आकुल बिचारी थी
लचीली टूट के डाली, पड़ी जैसे खुमारी थी।
(विधाता छंद १४-१४)
***

चाहत  

कभी भी घाव मत देना, हमारे छंद गीतों को,
करो ऐसा जतन पावन कि, पतझर ही मचल जाए,
सदा अनुबंध में रखना, हमारे उन अतीतों को,
सृजन ऐसा करो यारों, कि सीधा रूह तक जाए।

भुला कर नफरतें मन की, खुशी के गीत लिख दो तुम,
बहाओ तृप्ति की गंगा कि तप-बल ही बदल जाए,
बता दे वेदना मन की, लिखो कुछ शब्द ऐसे तुम,
चला दो तीर उर-तल पर छिपे अरमां मचल जाए।

शराफत ही डराएगी, न उल्फ़त ही सताएगी
बरसते मेघ सुधियों के, घटा बन कर बरस जाओ
हवाएँ  रुख बदल लेंगी, मुहब्बत जब बुलाएगी
मिटेगी पीर तब दिल की, अगर अनुबंध लिख जाओ।

मिली जब थी नज़र तुमसे, इजाजत भी मिली होती
मिली राहें कहाँ ऐसी कि दुनियाँ मिल गई होती।
(विधाता छंद 1222 1222, 1222 1222)

*** 

होली

धर शीश भार अपार मोहन, ग्वाल-गोपी संग में,
भर हाथ रंग अबीर फेंके, राधिका मन मोहिनी,
कर बंसरी, गल माल सोहे, डूबते जब रंग में,
झट हाथ थाम मरोड़ मोहन, मारते प्रभु कोहिनी।

मन मोहिनी कर थाम मोहन, रोकती बरजोरि से,
मत प्रीत रीत सिखा बजाकर, बाँसुरी अब श्याम रे!,
घनश्याम के नत नैन देखे, बोलती करजोरि के,
मुसका रही गुजरी कहे, कर छोड़ रे मम साँवरे!

तज के सभी अपघात कारण, लौ लगा भगवान से,
मन के घुमे कर में अभी तक, मान ही कब भूलता,
कर साधना मन-काय से,  बच के सभी अपमान से,
जब क्रोध शीश सवार देखे, भूल को कब भूलता। 

निज आत्मध्यान रहे सदा, नर श्रेष्ठ वो कहते वहाँ। 
निज आत्म गौरव भूलता वह श्रेष्ठता वरते कहाँ।

(मुनिशेखर छंद, 112 121 121 211, 212 112 12)

***

बाँस का झुरमुट

हरे बाँस का झुरमुट प्यारा,
हरित पर्ण स्पंदित झूल रहे,
तोता-मैना जोड़ा न्यारा,
लुका-छिपी जैसे खेल रहे।

युगों-युगों का साथ बना है,
कथा कहानियों में लिखा है,
टीं-टीं,पीं-पीं शोर घना है,
कौन लुका तो कौन दिखा है।

अद्भुत रंग छितराए यहाँ,
भावों को खूब उभारा है,
सुई-धागे ने मिलकर वहाँ,
परिदृश्य खूब निखारा है। 

चलो प्रेम संसार सजाएँ।  
हिलमिलकर रहना सिखलाएँ।।  

*** 

दिशा

करती हवाओं से बात,
दिशा सुगंधित हो जाती,
पुलकित हो मन और गात,
घटा कुंदनी हो जाती। 

प्रीत की.भाषा गढ़ रहे,
प्रणय रंग घुल जाते हैं,
अधरों को मिल गीत रहे,
वेद वंदना गाते हैं।

मेघ गगन मुख पर बिखरे,
श्यामल घन  ज्यों केश घने,
अंकुआते अंकुर निखरे,
तीर रश्मि के तीक्ष्ण तने। 

वाक् वंदना हो जाती। 
दिशा ऋचा मिलकर गाती।। 

***

कृषक

मरुधर में है बेबस बैठा, 
जल की फिर आस लगाए है,
सावन में भी बादल रूठा,
मधुरिम क्यों सपन सजाए है?

सींच रहा भू , श्रम सीकर से,
फिर तू दोष किसे है देता?
प्रश्न पूछता उस ईश्वर से,
वो कैसे नैया को खेता?

अगर चलोगे सभी सुपथ पर,
महक उठेगा परिवार तभी,
व्यर्थ ही समय गँवाने पर,
खो देगा खुशियाँ स्वयं सभी

मन सावन तब हो जाएगा
हर पल सावन हो गाएगा।

*** 

प्रेम आकांक्षा

करो प्रेम स्वीकार बनूँ मैं देविका,
पथ पर प्रीत बिछाऊँ हृद मनभावनी,
तुम्हें दिखे तब ज्योति बनूँ जब होलिका,
किसी भाँति कहलाऊँ प्रिय पथ गामिनी। 

नयन-बाज जब छले इंदु मनछावनी,
तब होगी संतृप्त क्षुधा प्रिय देवता,
अभी निरुत्तर प्रश्न बने रति यामिनी,
अभी नहीं परिपक्व बुद्धि शुचि गेयता।

अगर गहो मम हस्त पूर्ण हो कामना,
गाए सुरभित गीत दूर हों आँधियाँ,
पूरित जीवन चक्र पूर्ण हो साधना,
फैले कर्म सुगंध खिले तन वादियाँ। 

जब होगा पथ सुलभ खिलेगी चाँदनी। 
फिर होगी नवसृष्टि बनूँ जब भामिनी।। 
 (21मात्रिक)
***

रेखा श्रीवास्तव डॉ.


जन्म - ११.०९.१९६०, सुल्तानपुर, उत्तर प्रदेश।
शिक्षा -एम.ए. (हिंदी), बी.एड., डी.फिल. इलाहाबाद विश्वविद्यालय।
संप्रति - पूर्व प्राचार्य इंदिरा गाँधी पी.जी.कालेज गौरीगंज, अमेठी।
प्रकाशित - दिनकर एवं माखनलाल चतुर्वेदी व्यक्तित्व एवं कृतित्व।
संपर्क - कटरा लालगंज थाने के सामने, वार्ड १, गौरीगंज, अमेठी २२९४०९।
चलभाष - ९४५०७७४२०२, ईमेल -igpgamethi9@gmailcom

***






गुरु
*
गुरु पद-रज कण भर मिल जाए,
मिट तम उर प्रकाश भर जाता,
भवसागर से मुक्ति दिलाए,
नव जीवन की राह दिखाता।।

गोताखोर बना देता है,
पनडुब्बा फिर मोती लाता,
मंजिल अपनी पा लेता है,
ज्ञान ज्योति से दीप जलाता।।

जड़ मति को सुजान है करता,
दूर तिमिर उर करे प्रकाशित,
सत चित आनंद मन में भरता।।,
शिव ही हों कण-कण आभासित ।।

गुरु पारस पग रज मिल जाए,
लोहा सोना हो हर्षाए।।

***


मंदिर दर्शन
*
मंदिर भीड़ बहुत है भारी,
जींस पैंट छोटे हैं कपड़े,
दर्शन को आए नर-नारी,
बने आधुनिक वो हैं अकड़े। 

तिलक लगा‌ हम पूजन करते,
देख सभी हैं आँखे मींचे,
कभी नहीं पट सिर पर धरते,
मंदिर में वो सेल्फी खींचे।।

सुंदर लगती नारी सारी,
भाव नहीं है उसमें दिखते,
सारी है पहचान हमारी,
कपड़े फटे हुए हैं लिखते। 

भक्ति-भाव से मंदिर जाएँ। 
नव पीढ़ी को सच बतलाएँ।।

***


योग
*
योग जोड़कर पूर्ण बनाता,
भारत की यह दिव्य धरोहर,
मन से हर अवसाद मिटाता,
ले अष्टांग सकल पीड़ा हर।।

खुद को खुद से जुड़ जाना है,
तन-मन मिल पुलकित हो जाता,
सांसें साध जाग जाना है,
सत्पथ चल पग मंजिल पाता।।

ताली बजा योग नित करना,
रक्त प्रवाह सही हो जाए,
हास्य योग कर मिल सब हँसना, 
ऊर्जा नव तन में भर पाए।।

योग साधना जो नित करता ।।
शांति-कांति तन-मन में भरता।।

***

सदाचार 

*
सुरभि सदाचार की फैली,
पुलकित‌ मन की बगिया सारी,
स्वच्छ हुई मन चादर मैली ।।
हुलसी रिश्तों की फुलवारी ।।

दस दिस में नव खुशियाँ छाईं,
मन का भेद दूर हो जाए,
पटें दरारें; मिटती खाई,
नेह प्रेम के बादल छाए।।

रिश्ते स्नेहिल गहरी पर्तें,
जिएँ स्वर्थ से ऊपर उठकर,
देना साथ रखे बिन शर्तें,
पाते हम सब कुछ झुककर।

रिश्तों में थोड़ा झुक जाएँ। 
अपने को मजबूत बनाएँ ।।

***


काशी

बाबा विश्वनाथ की नगरी,
ढोल नगाड़ा डमरू बाजे,
दर्शन करती दुनिया सगरी,
महाकाल अद्भुत छवि साजे। 

प्रवहित पतितपावनी गंगा,
रजत वसन पहने है लेटी,
स्नान करे मन होता चंगा।।
ताप मिटाती झट ऋषि-बेटी।।

चांद किरण जब जल पर पड़ती,
दुग्ध धवल पट जड़े सितारे,
तरुणी काया कंचन जड़ती।।
गंगा आरति सब दुख हारे ।।

तीन लोक में महिमा न्यारी।।
काशी नगरी लगती प्यारी ।।

***


पनहारिन
*
पनघट पर लगता है जमघट,
कथा-व्यथा‌ पनहारिन कहती,
गागर अपनी भरती है झट,
घूंघट पट डाले सब रहती। 

चूड़ी पायल खन-खन करती,
कठिन डगर सिर गागर भारी,
सँभल सँभल कोमल पग धरती,
मैली हो न भीगकर सारी। 

कुछ सुनती कुछ कह भी देती,
वारि बूंद अनमोल बड़ी है,
हँस मन को हलका कर लेती,
ले घट को बतियात खड़ी है ।।

श्रम से कभी नहीं घबराती।
जल-जीवन हर बूँद बचाती ।।

***

वरदान
*
हे हरि! तुम ऐसा वर देना,
मम तन-मन निर्मल हो जाएँ,
हमको नाथ! साथ ले लेना,
थामो हाथ सबल बन पाएँ ।

मैं तो हूँ मूरख खल कामी,
लोभ-मोह-मत्सर हैं घेरे,
प्रभु! चाहूँ  बनना अनुगामी,
माया के लगते‌ नित फेरे ।।

मन पर मेरा नहीं नियंत्रण,
अहंकार है शीश उठाए,
दुनियादारी दे आमंत्रण,
पथ से पग को दूर हटाए। 

थामो नाथ! हाथ अब मेरा। 
तुम बिन लगे नहीं मन‌ मेरा।।

***

झूला 

सावन में मिल झूला झूले,
पड़े फुहार मगन मन भाए,
बैर भाव सब मन से भूले।।
चहुँ दिश मेघा हैं घिर आए ।।

कंकड़ माटी पग में गड़ता,
धरती माँ  की गोदी खेले,
रक्त प्रवाह वेग से बढ़ता।।
झूलन को लगते हैं मेले ।।

साथ झूलकर कजरी गाओ,
प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाए,
प्रेम भाव से पेंग बढ़ाओ।।
तन-मन‌ में निखार नव लाए ।।

इक दूजे से मिलकर रहना।।
खेल-खेल में मन की कहना ।।

***

मौन
*
मौन हमेशा बहता रहता,
मौन प्रवाह बड़ा है भारी,
खुद ही खुद सब रहता सहता,
ऊर्जा निधि इसमें है सारी।

मौन अमित ऊर्जा भर जाए,
ऋषि-मुनि सतत मौन व्रत करते,
शक्ति लहर मन में लहराए,
हों अमौन तब सत ही वरते। 

मौन सकल तकरार मिटाए,
आपस में सद्भाव है बढ़ाता,
विपदा से वह हमें बचाए।
रिश्तों को मजबूत बनाता। 

सोच समझ मौन व्रत करना।
सही समय पर मौन न रहना ।।

***

सावन
*
काले बादल नभ में छाए,
मेघा गरजे बिजली कड़की,
बरस-बरस मन को हरषाए।।
तेज पवन ने खोली खिड़की ।।

सावन बरसे मनवा तरसे,
बिन साजन है पल-पल भारी,
जीव-जंतु सारे हैं सरसे ।।
नैना बरसे निशि हैं सारी।।

विटप-पात सब हैं फरचाए,
धरा ताप कुछ कम है लगता,
कोयल कूक-कूक कर गाए ।।
रोम-रोम को पुलकित करता ।।

सावन की बरसे बादरिया ।।
घर आ तू मेरे साँवरिया ।।

***


धरती 
*
हरित घास के बिछे गलीचे,
लाल कुसुम तन पर है साजे,
बरबस ध्यान हमारा खींचे,
छम-छम‌ करती पायल बाजे। 

लेट धरा की गोदी बाला,
निज अनुभव की पोथी पढ़ती,
रूप सलोना है मधुशाला,
सुंदरता के मानक गढ़ती ।।

जुड़कर अपनी सोंधी माटी,
नेह सुमन सारे खिल जाते,
महक रही है फूलों घाटी।।
दृश्य मनोरम सबको भाते।।

सहनशील है धरती माता।।
मत कर दोहन कहें विधाता ।।

***

विनोद जैन 'वाग्वर'

जन्म - १७ सितंबर १९८४, ठाकरवाड़ा, सागवाड़ा, राजस्थान। 
आत्मज- श्रीमती सावित्री जैन - स्मृतिशेष शांतिलाल जैन। 
जीवन संगिनी - श्रीमती माया वाग्वर। 
शिक्षा - एम.ए., बी.एड.।  
सहभागी - दोहा दोहा नर्मदा २०१८ । 
संप्रति - संस्थापक हम जैन, निदेशक वाग्वर कन्या महाविद्यालय, वाग्वर शिक्षा भारती। संयोजक विश्ववाणी हिंदी संस्थान सागवाड़ा।   
संपर्क - सागवाड़ा, डूंगरपुर, राजस्थान। 
चलभाष - ९६४९९७८९८१ । 
ईमेल - vinodkumar1976vinod@gamail. com । 







नारी
*
नारी-महिमा क्या कहूँ मैं,
नारी नर का आगाज है,
जीवन बसर कर पहलू में,
नारी नर की परवाज़ है।

सच्ची साधक बनी घर की,
धरा को वह स्वर्ग बनाए,
बयार चले जब उसके मन की,
सभी खुशियाँ गले लगाए।

वार कभी न जाए खाली,
करे नैन-शर जब संधान,
ताल से हँस ताल मिलाती,
तभी सरस होता है गान।

शारद रमा उमा का अंश।
नारी से ही चलता वंश।।

*


संस्कार
*
जीवन की रसधानी में,
भावों का रस घोल रहे,
हृदय खिले मृदु बानी में,
नर नारी नित बोल रहे।

सद् कर्म के बीज बोए,
आभा दिख रही देह में,
मन का आपा जब खोए,
तब साधते दिल.नेह में।

तन मन की लाज रखेंगे,
भावों की गरिमा रखकर,
खुशियों का राज करेंगे,
देह में नेह को भरकर।

हितकारी जब हो वाणी,
तब सफल सुखी हो प्राणी।।

*


आह्वान
*
रंग तरंग उमंग भरो,
होता है जग में प्रभात,
उठो जागो प्रयाण करो,
मत रखो मन जात कुजात।

अंधकार को दूर करो,
हो प्रकाश तभी हृदय में,
संदेह-भ्रम को मत धरो,
बने रहो सहृदय जग में।

मन को मन भावन करना,
तन मन तुम पावन रखना,
नेह सदा तुम दिल रखना,
पंचामृत का रस भरना । 

उदित हो चुकी है प्रभात ।
नेह की दिल में बरसात ।।

*


पिता
*
प्रेम पिता हम सबसे रखते,
हम सबके हैं पालनकर्ता,
रक्षण-पोषण सबका करते,
वे हम सबके कर्ता-धर्ता।

गलती पर वे क्रोध दिखाते,
सबको सच्चा पथ दिखलाएँ,
नीति नियम की बात बताते,
शुभाशीष हम हर पल पाएँ। 

फर्ज निभाते अपना श्रमकर,
पद-रज-कण है उनका चंदन,
राह बताते सबको हितकर,
करते नित हम उनका वंदन।

विनती मेरी सुनिए भगवन!
मंगलमय हो पितु का जीवन।।

*


बेटी 
*
मन को मनभावन करना,
यह बात सदा रख दिल में,
तुम जीवन पावन रखना,
तब खुशियाँ हों आँगन में। 

नेह सदा तुम दिल रखना,
फिर संग रहो कुटिया में,
पंचामृत का रस भरना,
खेल खिलाना बगिया में।

जीत हो या चाहे हार,
पीछे न कभी तुम हटना,
आपस में हो प्रेम अपार,
हर मुश्किल से डट लड़ना।

बेटी जैसा और नहीं।
उसका कोई छोर नहीं।।

*


नेह 
*
नेह पसर रहा है जग में,
मेघ बरस रहे हैं भू पर,
प्रीत चहक रही है सब में,
हरियाली छाई धरा पर। 

मैं और तुम मिल एक हुए,
महक फैल रही धरती पर,
बिखरे लोग सब नेक हुए,
पावन बूँदें पड़ीं धूलि पर। 

खिल रही है कलियाँ देखो,
हरे-भरे आँगन चहुँ ओर,
नभ में गीत गूँजते देखो,
मंत्र मुग्ध कर रहा चकोर। 

जब धरती पर बरसे नेह। 
तब बरसता है खूब मेह ।।

*

पावस 

पावस की बूँदे गिर रही,
काली घटा फैली नभ में,
हरियाली भू पर बस रही,
मयूर नाचते कृषिभूम में ।।

कृषक कर रहे नित जुताई,
हरे-भरे हैं सब खलिहान,
नद में खूब मौज मनाई,
गिरिधर का देखो परिधान ।।

गीत गुजँते सावन के अब,
चहुँ और कलरव है नभ में,
आनन्द में डूबे है सब
पुष्पित है कमल मन में ।।

झुम रहे सब छत आँगन में,
खिल रहे सब मन वर्षण में ।।

शुभाकांक्षा 
*
रहे खुशबू सदा जगत में
चंदन सा महका कीजिए,
रहिए नहीं गत-आगत में,
हर मन को चहका दीजिए। 

सावन से हरे स्वयं रहे,
सबको हरा-भरा कीजिए,
हरियाली घर-घर में करे,
धरती स्वर्ग बना दीजिए।

अंतस हर्षित औ तन मुदित,
आनन्द में है देखो सब,
मिटा अँधेरा जन-जन उदित,
अनाचार नही दिखता अब।

हृदय हृदय सभी एक हुए।
चहुँ ओर मनुष्य नेक हुए।।



कड़वा सच  
*
आशा के दीप जले,
नौकरी की आस से,
बिन पैसे घर न चले,
कुछ दिहाड़ी काज से।

बिखरे बिखरे सपने,
हाथ-पैर खयाल में,
हैं रहे मार अपने,
सभी लगे जुगाड़ में।

नौकरी है एक की,
बाकी सब नाकारा,
तूती बोले उसकी,
घर में है जयकारा। 

जब ठिकाने लग गए। 
मोह-नेह बिसर गए।।

*


जीवन 
*
उम्र भर भटकाते हैं,
चाहत के हजार रंग,
पीड़ा ही बाँटते हैं,
चले आँसुओं के संग।

ढूँढता रहता प्यार मन, 
करता क्या इजहार है,
देख रहे हैं मौन नयन,
क्या उसे एतबार है?

सपना है या जिन्दगी,
या फिर एक खयाल है?
कैसी है ये बन्दगी,
लगाव करे बवाल हैं। 

फिर भी सुकून ए इश्क। 
दिल में जुनून-ए-रश्क।।

*

नेता 

बुरे काम करता रहा,
भरता रहा अपना घर,
चोट सबको देता रहा,
ध्यान उसका दौलत पर। 

खाता नित झूठी कसम,
निभाता साथ वह नहीं,
याद नहीं आती सनम,
बहे गंगा और कहीं। 

हालात बिगड़ते गए,
सुधार के ही नाम पर।
वहाँ महल बनते गये,
गरीबी की गुहार पर।

पीर पराई न जाने।
साया भी न पहचाने।।

***


विपिन श्रीवास्तव, दिल्ली 

जन्म - २ सितंबर १९८०, जबलपुर। 
शिक्षा- बी.ई. (यांत्रिकी) । 
आत्मज - स्मृतिशेष शांति श्रीवास्तव - स्मृतिशेष नरेंद्र कुमार श्रीवास्तव। 
जीवन संगिनी- श्रीमती शिवांगी श्रीवास्तव। 
संप्रति - शासकीय सेवा (रक्षा मंत्रालय, नई दिल्ली)। 
संपर्क - सी.ओ.डी. कॉलोनी, निकट सरस्वती शिशु मंदिर, सुहागी, जबलपुर ४८२००४। 
वाट्स ऐप-९८२६२७६३६४ । 
ईमेल-nipivshrivastava@gmail.com । 








प्रभात  
*
कैनवास बनता है नभ जब,
नूतन चित्र उभर आते हैं,
सूरज आब बिखरती है जब,
भू  के भाव निखर आते हैं।  

निशा विदा; उग आया दिनकर,
नव प्रभात स्वागत वंदन कर,
कनक रश्मि परिलक्षित जल पर,
रूप दिखा जल के दर्पण पर। 

जागी भोर उठी नव आशा,
बिसरा दो जो बीत गया है,
तृप्त करो मिल ज्ञान पिपासा, 
कल का मटका रीत गया है।    

हर नव प्रभात कुछ कहता है।  
ये जीवन पल पल बहता है।। 

***

भाव सरिता 
*
शब्दों के कलकल रूप लिए, 
बहती है भावों की सरिता,
ओजस प्रभात की धूप लिए,
लेती है जनम नई  कविता। 

मंथन हो गहन विचारों का,
नव विषयों का अन्वेषण हो,
लय तालों का झंकारों का,
रस भावों का संप्रेषण हो। 

प्रेमी का विरह बता दे जो,
सजनी का दुख भी प्रकट करे,
आपस के भेद मिटा दे जो,
जनमानस मन को निकट करे।  

अंतस का गीत बना लो तुम।
जीवन संगीत बना लो तुम।।

***

मन 
*
मेरे अवचेतन मन में,
आते-छाते यदा-कदा,
सुधियों के सूने वन में,
बहती शीतल मंद हवा। 

कहते हो सुन लेते हो,
मन की बातें भूली सी, 
सपने  फिर बुन देते हो,
नमआँखें रेतीली सी।  

सुधि के गहरे सागर में, 
सीपी मोती मिलते हैं,
मन की उजड़ी बगिया में,
सुमन याद के खिलते हैं।  

अवचेतन चेतन मन में। 
खुशियों भर दो जीवन में।।

***

पलाश 
*
जीवन  के सूने आँगन में,
जब फूल पलाश दहकता है,
बिन साजन रंगीं फागुन में,
खालीपन बहुत खटकता है। 

जो हैं सरहद के रखवाले, 
कैसा उनको फागुन-सावन, 
जो शूरवीर हैं मतवाले,  
कर देते हँस तन-मन अर्पण। 

फागुन की हवा सँदेशा  सुन,
प्रियतम को झटपट  दे आना,
हँस खाके-वतन का टीका तुम,
मस्तक को चुम लगा गाना।

अगले फागुन हम साथ रहें। 
दिल ही दिल में ज़ज़्बात कहें।।

***

माँ 

सुधियों का संगीत मधुर तुम,
तुम हो तरुणाई की आशा,
दे सुकून जो छाँव घनी तुम,
तुम ही जीवन की परिभाषा।

तुम पालक हो, तुम ममता हो,
तुम ही जीवन आधारशिला,
मुझ निर्बल की तुम क्षमता हो,
तुमसे मुझको ये जनम मिला। 

माँके आँचल का मोल नहीं, 
हम क्या दें? वह देती दूना, 
जिव्हा यश सकती बोल नहीं,
माँ बिन जीवन सूना- सूना।

माँ ही  गीता-रामायण है।  
मानवी नहीं नारायण है।।

*** 

बेटी  

नाजुक नर्म मखमली सा है, 
तुझ संग होने का अहसास, 
फुलझड़िया दीवाली सा है, 
चहरे पर छाया मृदु उजास।

मैंने पकड़ा थामा तुमने,
सच तुम खुशियों का स्वागत हो, 
सुख-लाभ दिए नाना तुमने,
प्रभु पूजन का पंचामृत हो।  

रचना पावन बेटी जग में, 
तुमसे यह घर संसार भरा,
अँगुली थामे मेरी मग में, 
कर धन्य हमें स्वीकार करा। 

साकार हुआ अपना सपना। 
तुम हो अमोल जीवन-गहना।।

***

बँटवारा   

मेरी खिड़की तेरी खिड़की से रो पूछ रही है,
घर-आँगन में क्यों खड़ी हो गईं हैं दीवारें नव?
बंद किवाड़ सिसकते कोई युक्ति न सूझ रही है, 
बातों बातों में क्यों हो जाती हैं तकरारें अब। 

खिले-खिले चेहरों की आमद कम दुखियारे लोग, 
खालीपन गूँजता, सुनाई देता है सन्नाटा,
चुहलबाजियाँ खोई खोज आँखें नम करतीं सोग,
खिड़की से अपनापन झाँक लगाता है ज्यों चाँटा।

बँटवारा तो सब कुछ आधा-आधा कर जाता है, 
टुकड़े टुकड़े हो जाते हैं हम, सपने सारे तब,
घर में खुशियान बचें न, गम-दुःख ज्यादा कर जाता है, 
मासूम दिलों से छिन जाते हैं अपने प्यारे सब। 

क्या हिस्सों मेंबँटने से बेहतर जुड़ रहना था?
गलत रास्ता चुनने से बेहतर रुक रहना था??
*

गुलाब और धनिया 
*
जो गुलाब लाता था पहले,
वो धनिया लाया थैले में,
बलम बना, प्रियतम था पहले, 
टकराया आज अकेले में।  

मेला जानूं, मेला छोना,
जो रोज बुलाया करती थी,
नटखट बाबू, छैला छोना,
संसार लुटाया करती थी।  

प्यार काँच की दुनिया सा है,
जब सच ये दर्पण दिखलाए, 
स्वप्न परी, दुल्हनिया सा है,
ये कितने पापड़ बिलवाये। 

वादों की बौछार नहीं है।  
पूजा है व्यापार नहीं है।। 

***

सॉनेट लेखन  

सॉनेट लेखन कर रहा, 
संग गुरुजन का आशीष, 
गागर में अमृत भर रहा, 
रजकण बन गए रजनीश।  

'सलिल' हस्त आशीष संग,
गुणिजन राह दिखा जाते, 
भाव सृजन मथ एक रंग, 
नव आभा बिखरा जाते।  


शुरू हुआ लेखन विधिवत, 
तनिक तनिक अभ्यास करूँ, 
त्रुटियों से होता अवगत, 
फिर फिर नया प्रयास करूँ।  

कलम हाथ लेकर आया।  
सॉनेट लेखन मन भाया।।

***

बरसात 

वो मुझे मिले बरसातों में,
पेड़ों के झुरमुट के नीचे,
बेबस उलझा हालातों में,
सपनों को पलकों में भींचे।

हवा हिला दे उसके तन को, 
बिजली भी रूप दिखा जाए,
अंधकार से कंपित मन को,
अब रिमझिम भी कैसे भाए। 

हाथ थाम मैंने उसका फिर,
गिरते पानी में खीच लिया,
स्वागत मेघा करती घिर-घिर,
भय को साहस से सींच दिया। 

ए बरसात भिगा दे फिर से। 
मन उल्लास जगा दे फिर से।। 

***

पुरवाई
*
साँझ ढले चलती पुरवैया,
ग्वाल बाल की नटखट टोली,
हाँक लौटते बछड़े-गैया,
खेलें मिलकर आंख मिचौली। 

ताप हरण पुरवैया करती,
अँगना शीतलता से भरता,
आलिंगित वन श्री हँस पड़ती,
आसमान से पानी झरता। 

पुरवैया खुशियों की वाहक,  
मानव मन को हर्षाती है,
धरती हरियाली की चाहक,
भू को चूनर दे जाती हो। 

संस्कृति की संस्कारों की।
पुरवाई चले विचारों की।।

***
फूल 

बगिया में नव फूल खिला,
सँकुचाया-सहमाया सा,
हसीं कली का संग मिला,
अपने में भरमाया सा।  

प्रभु मूरत पर चढ़ जाऊँ,
या शहीद को नमन करूँ,
कोमल केश सजा पाऊँ, 
ना नेता के गले पडूँ।

सम्मान सहित मुरझाऊँ, 
धरती गोदी में ले ले,
हँस माटी में मिल पाऊँ,
पर दूर न कोई ठेले। 

हो जाए भान जरा सा। 
यह सुमन करे अभिलाषा।। 

***

सुनीता परसाई 


जन्म - २० मार्च १९५६, जबलपुर । 
आत्मज - स्मृतिशेष सुधा - स्मृतिशेष काशीनाथ अमलाथे। 
जीवनसाथी - श्री महेन्द्र कुमार परसाई। 
शिक्षा - स्नातकोत्तर (समाज शास्त्र, हिंदी) । 
संपर्क - द्वारा - श्री रोहित परसाई,  फ्लैट क्रमांक २७०९, ब्लॉक २, 
माई होम अवतार, नरसिंगी, राजेन्द्रनगर रेवेन्यू मण्डल, हैदराबाद 
रंग रेड्डी जिला ५०००७५ तेलंगाना । 
- १८६५,हृदय नगर, कोल माइंस आफिस के पास , गुप्तेश्वर, जबलपुर ४८२००१ ।  
चलभाष - ९६१९४५५६११ । 
ईमेल - Sunita persai @gmail.com



गुरु  


ज्ञान आपने है दिया,
मन से मानें आभार,
कच्ची मिट्टी का किया,
हर सपना सच साकार। 

छंद ज्ञान हमको मिला,
है मिली विधा रस-खान,
हृदय कमल मुकुलित खिला,
पाकर विधान का ज्ञान। 

जो गुरु पर सब वारते,
गुरु उन्हें बताते राह,
बाधाओं से तारते,
गुरु करें श्रेष्ठ की चाह। 

गुरु का महिमा जाप।
काटे शिष्यों के पाप।।
१३ 
***

गणेश
*
प्रथम देवता आप,
पूजें सभी गणेश,
हरते सबके पाप,
करते प्यार महेश।

लिखकर पंचमवेद
बाँटा सबको ज्ञान,
दिया शास्त्र का भेद,
करते सब सम्मान।

देना निर्मल बुद्धि,
हे जग के करतार,
संग रहे माँ रिद्धि,
सहित सिद्धि-भरतार।।

गणपति सुंदर रूप।
वर दें देव अनूप ।।
११
***

भारती वंदना
*
माँ भारती!
वरदायिनी,
भव तारती,
सुर वादिनी।।

प्रभु जानते,
भुवनेश्वरी,
सब मानते,
वागीश्वरी।

धुन रचातीं,
मति दे हमें,
पथ दिखातीं,
पग नहिं थमें।

माँ! हो सदय।
के दो अभय।।

*


पुरवैया
*
पुरवैया के नम झौंके,
उड़ते हैं पंछी डरकर,
ढूंँढ़े छुपने के मौके,
पाखी नव साहस भरकर। 

दिल खग का भय से धड़के,
उसकी गति ही खग डरता,
तरु झूमे डोले मटके,
कितने जीवन वह हरता। 

केवट तीर रखे नैया,
होता उसको अंदेशा,
चलती जब-जब पुरवैया,
अनहोनी का संदेशा।

रहें बड़ी द्रुत बलशाली।
लाती है प्रिय खुशहाली।।
१४-१४मात्रा, मापनी-22-22-22-2

***


चरणामृत
*
दूध शहद दधि मिश्री घृत,
मिला बनाएँ पंचामृत,
करें ईश को नित अर्पित,
तरें ग्रहण कर चरणामृत,

यह औषधि समान होता,
स्वाद सभी को है भाता,
पाप हमारे सब धोता,
भक्त शांति-सुख भी पाता।

प्रभु भोले! भोले-भाले,
सबको लगते हैं प्यारे,
हैं मनमौजी मतवाले,
भजें भक्त उनके सारे।

देव चढ़ाओ पंचामृत।
शीश लगाओ चरणामृत।।
१४-१४मात्रा

***


फागुन
*
आता है जब फागुन मास,
खेलें रास बिहारी झूम,
राधा बैठी लेकर आस,
श्याम कहाँ?, क्यों मची न धूम।

करे प्रकृति मनहर शृंगार,
खिले पुष्प शत पीले-लाल,
खोजे सज्जित राधा नार,
कहाँ छुपा जसुदा का लाल। 

छेड़े कान्हा मुरली तान,
बाँकी दृष्टि रहा है डाल,
रूठी राधा करती मान,
बिसर गगरिया देती ताल। 

राधा-कान्हा खेले रंग।
ग्वाल-बाल भी होते संग।।
१५-१५मात्रा

***


समीर
*
दिशा सुगंधित हो जाती,
जब समीर मलयज बहती,
पिया मिलन पल सँकुचाती,
शृंगारित सजनी सजती।

प्रियतम भेज रहे संदेश,
आकुल हैं प्रिया के नैन,
जा बैठे दूर परदेश,
हृदय रहे बहुत बेचैन।

बह मंद पवन का झोंका,
घायल करता मन प्रिय का,
आहट सुनकर मन चौंका, 
वह तो भ्रम निकला हिय का।।

जग पथ दिन रैन निहारे।
तक पथ 'पी कहाँ' पुकारे।।
१४-१४ मात्रा

***  


शिखर
*
शिखर उच्च बौना मनुज,
चढ़ तोड़े नाहक उसे,
वन काटे निर्दय दनुज,
राहु-केतु सम शशि ग्रसे।

महल अटारी तानता,
समझे बढ़ता मान है,
प्रकृति कुपित नहिं जानता,
वृथा अहं अभिमान है।

नद नाले क्यों सूखते,
समझें सब इस बात को,
बंधन सारे टूटते,
रोको मिल इस घात को।।

पर्वत की रक्षा करें।
रोग कष्ट सब गिरि हरें।।
13
**** 

माया नगरी
*
रिश्ते नाते झूठे जान,
करे दिखावा यह संसार,
हैं सुख के सब साथी मान,
कभी मानना मत तुम हार। 

माया नगरी का है खेल,
हमें नचाते हैं जगदीश,
रखें हमेशा सबसे मेल,
प्रभु के चरणों में रख शीश।

शबरी द्वारे आए राम,
किया उन्होंने था उद्धार,
जपा राम का उसने नाम,
श्राप मुक्त प्रभु की वह नार। 

ईश्वर ही हैं तारणहार।
वही लगाते नैया पार।।
15 
***


निहारो
*
नेक कर्म,
कर बंदे,
सत्य धर्म,
तज फंदे।

जी जीवन।
विधि सम्मत।
सब सीवन।।
उधेड़ मत।।

बन प्रवीर।
तज विकार।
मन अमीर।।
जग निखार।।

करें त्याग।
खुलें भाग।।

*


बेटी
*
बिटिया रानी प्यारी सी,
सबके मन को वह भाती,
मात- पिता की रानी सी,
खुशियों से घर महकाती।

सुंदर सा दूल्हा होगा,
घोड़ी पर वह आएगा,
पहने चमकीला चोगा,
संग पालकी लाएगा,

आ बरात नाचे द्वारे,
स्वागत करें घराती मिल,
बुन बन बेटी सपने प्यारे,
दूल्हा कूल कहे हो चिल।  

दे आशीष बिदा होती।
तब बचपन बेटी खोती।।
14 
***
नवीन चतुर्वेदी 


कृष्ण लीला १. 

साँकरी सी खोर गहवर वन की थी वो,
जिसमें सखियों संग राधा चल रही थी,
यूँ तो ना ना कर रही थी वह मिलन को,
किंतु मन में आस भी कुछ पल रही थी। 

नील अंबर पर घटाएँ छा रही थीं,
मेघ वर्षा करने को जुड़ने लगे थे,
कोयलें झुण्डों में कोरस ग़ा रही थीं,
काले काले केश भी उड़ने लगे थे। 

ऐसे में मुरली की धुन कानों तक आई,
जिसको सुनते ही सभी ने होश खोए,
एक सखी ने बात राधे को बताई,
कृष्ण बैठा है तेरे सपने सँजोए। 

इससे आगे प्रीत का पथ है सुहाना।
जिसको तुम दोनों को मिलकर है सजाना।।

***

कृष्ण लीला २. 

ओढ़कर धानी चुनर एक रोज राधा,
संग सखियों के कहीं पर जा रही थी,
था गगन में चाँद भी उस रोज आधा,
गीत खुशियों के हवा भी ग़ा रही थी। 

तीर पर यमुना के एक हंसों का जोड़ा,
प्रीत के संगीत का रस ले रहा था,
उस समय वातावरण भी थोड़ा थोड़ा,
संगमन में साथ उनका दे रहा था। 

दृश्य अनुपम हर किसी के मन को भाया,
बस तभी प्रारब्ध ने लीला दिखाई,
एक ग्वाला धीरे धीरे पास आया,
पास आते ही मधुर मुरली बजाई। 

ध्यान से देखा तो मुरलीधर खड़े थे।
देर तक फिर दोनों के नैना लड़े थे।। 

***

कृष्ण लीला ३ 

दिख रहा था सब मगर कुछ भी न देखा,
गोपियों की सुध कहीं पर खो गई थी,
केश, कपड़े, घर, नगर कुछ भी न देखा,
बाँसुरी की धुन बड़ी मोहक लगी थी। 

छँट रहा था युग युगान्तर का अँधेरा,
वे किसी बाती के जैसे जल पड़ी थीं,
नाम जिसका याद आया उसको टेरा,
और एक अल्हड़ नदी सी चल पड़ी थीं। 

थम गए आकाश में चंदा सितारे,
रास की अभिलाष थीं मन में सजाए,
कुंज गलियों से गुजरकर झुण्ड सारे,
राधिका और कृष्ण की महफिल में आए,

अप्रतिम आभास की लीला हुई थी।
छह महीने रास की लीला हुई थी।।

***

कृष्ण लीला ४ 


ज्ञान देने के लिए उद्धव गया जब,
गोपियों ने उसके मन की गाँठें खोलीं,
ज्ञान की बातें सुनाकर थक गया तब,
धैर्य से सब गोपियाँ एक साथ बोलीं। 

झूठी बातों से हमें भरमा न उद्धव,
कौन कहता है किशन मथुरा गया है,
देख तेरे पास ही बैठा है केशव,
हमको लगता है कि तू पगला गया है

एक दिन क्या छोड़ जाएगा मुरारी,
सोचकर जब दिल बहुत घबरा रहा था,
कृष्ण ने खुद भाँपकर हालत हमारी,
नंद बाबा की कसम खा कर कहा था। 

हर घड़ी हर पल बिताऊँगा यहीं मैं।
छोड़ कर ब्रज को न जाऊँगा कहीं मैं।

***

कृष्ण लीला ५ 

जानते थे इसको जाना होगा एक दिन,
इसलिये ही तो न अपनी तानते थे,
माँ यशोदा थी भले अनजान लेकिन,
नंद बाबा सब हकीकत जानते थे। 

देवकी वसुदेव के लल्ला को अपना,
मानते तो थे मगर संकोच भी था,
जानते थे कृष्ण है बस एक सपना,
साथ ही इस तथ्य पर संकोच भी था। 

सामना जब वास्तविकता से हुआ तो,
थे मुलायम किंतु पत्थर बन गए थे,
जब यशोदा का कलेजा फट पड़ा तो,
नंद बाबा खुद रफूगर बन गए थे। 

हूक जब जब भी उठी खुद को ही दाबा।
रो नहीं पाए कभी भी नंद बाबा।। 

***

कृष्ण लीला ६ 

कल्पना बिन गद्य क्या है; पद्य क्या है,
कल्पना ने पोत पानी पर चलाए, 
कल्पना ने ब्रह्म अक्षर को कहा है,
कल्पना ने ही गगन में यान उड़ाए, 

थोड़ा सा बढ़ चढ़ के लिखते ही हैं लेखक,
शोलों को शबनम कहा करते हैं शायर,
लिखनेवाले शाह हो कर भी हैं सेवक,
जो नहीं सुनते वे हो जाते हैं फायर। 

क्या पता दुनिया ही थी तब उस तरह की,
ये भी मुमकिन है कि बानक यों बने हो,
पाठकों को चाह जिस साहित्य की थी,
लेखकों ने लेख वैसे ही लिखे हों। 

पूर्वजों से जो मिला उसको कबूलें। 
फिर बना के झूले उन झूलों पै झूलें।।

***

कृष्ण लीला ७ 


दर्ज हैं इतिहास में बीसों फसाने,
ऐसे ऐसे जिनने दुनिया को सजाया,
जब भी अपनी पर उतर आए दीवाने,
एक रस्ता नया सबको है दिखाया। 

कंस की नजरों में था जो मात्र भोजन,
जीविका का वस्तुतः आधार था वह,
दूध को मथकर निकलता था जो माखन,
ब्रज-जनों के वास्ते व्यापार था वह। 

गोप बोले टैक्स की दर तुम करो तय,
हम करेंगे भाव तय निज वस्तुओं का,
कंस आखिर तक नहीं समझा ये आशय,
शत्रु बन बैठा वो जीव और जन्तुओं का

कंस ने ताकत दिखाना ठीक समझा,
कृष्ण ने माखन चुराना ठीक समझा। 

***

कृष्ण लीला ८. 


दिन निकलता है तो कुछ कारण है उसका,
शाम भी कारण बिना ढलती नहीं है,
बिन वजह तिनका नहीं उड़ता है कुश का,
बिन वजह तो आग भी जलती नहीं है। 

सृष्टि के आरम्भ में थे व्यक्ति दो ही,
मध्य उनके रस्म थी; ना रीति कोई,
जो मिले खा लेते थे दौनों बटोही,
फिर उगाया अन्न अपनाई रसोई। 

रूप जीवन को मिला है ऐसे ही तो,
सभ्यताएँ विश्व में यों ही बढ़ी थीं,
सब नहीं कुछ गोपियाँ मासूम थीं जो,
स्नान के बारे में कुछ अनभिज्ञ सी थीं। 

शुभ्र, नैतिक सभ्यता के वास्ते थी। 
चीर लीला शिष्टता के वास्ते थी।। 

***

कृष्ण लीला ९ 

क्यों भला रणछोड़ का तमगा पहनते,
क्यों भला निज नाम पर धब्बा लगाते,
चाहते यदि कृष्ण तो पीछे न हटते,
युद्ध में कसकर कमर फिर कूद जाते। 

किंतु करुणाकर ने सोचा जन्म से ही,
मैं तो अपने युद्ध को लड़ ही रहा हूँ,
और निश्चित रूप से है सत्य यह भी,
शत्रु पर इक्कीस भी पड़ ही रहा हूँ। 

किंतु मेरे साथ जो इंसान हैं वे,
वे हमेशा दहशतों में जी रहे हैं,
हर घड़ी के कष्ट से हलकान हैं वे,
घूँट भर भर आँसुओं को पी रहे हैं

सोच यह करुणेश ने करुणा दिखाई। 
सिंधु में जा कर नई दुनिया बसाई ।। 

***

कृष्ण लीला १० 

कृष्ण जैसा कौन होगा पूर्णकामा,
मुँह किसी से भी कभी मोड़ा नहीं है,
हाथ जिसका भी दयासागर ने थामा,
अंत तक थामे रखा छोड़ा नहीं है। 

एक मधुर मुस्कान से जीता जगत को,
प्रेम प्रेम और प्रेम ही उसने किया बस,
हारकर खुद को भी जीता है भगत को,
जो शरण में आ गया अपना लिया बस। 

ऐसा होगा तो नहीं होगा वो वैसा,
है कठिन तुलना करो तो कर दिखाना,
मित्रता के मामले में कृष्ण जैसा,
मित्र यदि कोई हुआ हो तो बताना। 

जिस सुदामा के कभी तंदुल थे खाए। 
धोने को उसके चरण आँसू बहाए।। 

***

कृष्ण लीला ११ 

कृष्ण का जीवन समुंदर की तरह था,
वे सतत टकरा रहे थे साहिलों से, 
उनके जीवन में बहुत कुछ बेवजह था, 
फिर भी हँसकर लड़ रहे थे मुश्किलों से। 

लाख बहलाने से भी जब दिल न बहले,
क्या दशा हो जाती है सच सच बताना,
माधवन पर टिप्पणी करने से पहले,
आईने के सामने कुछ पल बिताना। 

सच तो ये ही है भटक-भटका के मैं भी,
थक गया तो मित्र मोहन को बनाया,
नैन मूँदे लब सिले तब जा के मैं भी,
कृष्ण मिश्री की डली हैं जान पाया। 


शब्द की सीमाओं को जो जानते हैं। 
खामुशी को बस वही पहचानते हैं।। 

***

विश्ववाणी हिंदी संस्थान अभियान जबलपुर

समन्वय प्रकाशन जबलपुर
प्रथम साॅनेट साझा संकलन
जबलपुर, २९-६-२०२३।
हिंदी का प्रथम साॅनेट साझा संकलन हेतु मिल रहा सहयोग अभूतपूर्व है। समूह में साॅनेट सीखनेवाले ११-११ सोनेटकारों के दस-दस सोनेट, चित्र, संक्षिप्त परिचय तथा उनके सोनेटों पर संपादकीय टिप्पणी सहभागिता आधारित सामूहिक संकलन में प्रकाशित कर संकलन की १० प्रतियां (पैकिंग-पोस्टेज निशुल्क) भेजी जाएंगी। मात्र २१००/- सहभागिता निधि ९४२५१८३२४४ पर पे टी एम कार स्नैपशॉट भेजिए।

अब तक निम्न सॉनेटकार * २१००/- भेजकर सहभागी हो चुके हैं।

* ०१ - सुनीता परसाई, हैदराबाद ९६१९४ ५५६११
* ०२ - विनोद वाग्वर, सागवाड़ा राजस्थान ९६४९९ ७८९८१
* ०३ - इं. विपिन श्रीवास्तव, दिल्ली ९८२६२ ७६३६४
* ०४ - नीलम कुलश्रेष्ठ ,गुना ९४०७२ २८३१४
* ०५ -डा. रेखा श्रीवास्तव,अमेठी ९४५०७ ७४२०२
* ०६ देवकांत मिश्र 'दिव्य', भागलपुर ८२९८७ २०२५४
* ०७ - निधि जैन, इंदौर ९३००४ २२१११
* ०८ - छाया सक्सेना, जबलपुर
* ०९ - भारती नरेश पाराशर, जबलपुर
* १० - इं. अवधेश सक्सेना, शिवपुरी
* ११ - मनोरमा जैन पाखी, भिंड
सामग्री अप्राप्त
* - डॉ. संतोष शुक्ला, ग्वालियर
* - हरिसहाय पाण्डेय 'हरि', जबलपुर ९७५२४ १३०९६
* - रश्मि मोयदे 'दीप्ति', उज्जैन
* - कृष्ण कुमार परोहा, जबलपुर
* - तृप्ति मिश्रा, हैदराबाद
* - विभा भटोरे, जबलपुर
* - शोभित गुप्ता
राशि व सामग्री अप्राप्त
- अनुराधा पांडे, दिल्ली
- नवीन चतुर्वेदी, मुंबई
- चौधरी आशा जैन सिहोरा
- सुभाष सिंह, कटनी
- मनीषा सहाय, जबलपुर
- गीता चौबे 'गूँज', रांची
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 मुक्तिका

हिंदी ग़ज़ल
*
बाग़ क्यारी फूल है हिंदी ग़ज़ल
या कहें जड़-मूल है हिंदी ग़ज़ल
.
बात कहती है सलीके से सदा-
नहीं देती तूल है हिंदी ग़ज़ल
.
आँख में सुरमे सरीखी यह सजी
दुश्मनों को शूल है हिंदी ग़ज़ल
.
जो सुधरकर खुद पहुँचती लक्ष्य पर
सबसे पहले भूल है हिंदी ग़ज़ल
.
दबाता जब जमाना तो उड़ जमे
कलश पर वह धूल है हिंदी ग़ज़ल
.
है गरम तासीर पर गरमी नहीं
मिलो-देखो कूल है हिंदी ग़ज़ल
.
मुक्तिका है नाम इसका आजकल
कायदा है, रूल है हिंदी ग़ज़ल
१७.९.२०१८
***

बुधवार, 28 जून 2023

सोनेट, साँझ

सोनेट
साँझ
*
साँझ सपने सजा निहाल हुई,
देख छैला करे मधुर बतियाँ,
आँख रतनार हो सवाल हुई,
दूर रहना, न हम कुम्हड़बतियाँ।

काम दिन भर करे न रुकती है,
रात भर जाग बाँचती पुस्तक,
कोशिशें कर कभी न थकती है, 
भाग्य के द्वार दे रही दस्तक। 

आप अपनी कही कहानी है, 
मुश्किलों से तनिक नहीं डरती,
न, किसी की न निगहबानी है, 
तारती है, न आप ही तरती। 

बात सच्ची कहूँ कमाल हुई,
साँझ सबके लिए मिसाल हुई। 

(महासंस्कारी जातीय, चंद्र छंद) 
२८-६-२०२३ 
***

कायस्थ, चित्रगुप्त, नाग, दोहा, मुक्तिका, गीत, तुम, लघुकथा, हास्य, हाइकु, भगवत दुबे, काल है संक्रांति का

हास्य हाइकु
*
वह पहने
मिलती पेटीकोट
पेटी न कोट
*
कभी न मिली
किसी से छिप कली
रे छिपकली!
*
किया कलेजा
चाल, लेट न हुई
दे चाकलेट
*
कैसा अंधेर
न दाल है, न चीनी
है दालचीनी
*
न तो गुलाब
है गुलाबजामुन
न हीं जामुन
*
कभी न सका
चैन से आम लेट
खा आमलेट
२८-६-२०२३
***
दोहा दोहा चिकित्सा
*
गर्म दूध-गुड़ नित पिएँ, त्वचा नर्म हो आप
हर विकार मिट वजन घट, रोग न पाए व्याप
गुड़ अदरक नित चबाएँ, जोड़ दर्द हो दूर
मासिक समय न दर्द हो, केश बढ़ें भरपूर
श्वास फूलती है अगर, दवा श्रेष्ठ अंजीर
कफ-बलगम कर दूर यह, शीघ्र मिटाए पीर
रात फुला अंजीर त्रय, पानी में खा भोर
पानी पी लें माह भर, करें न नाहक शोर
काढ़ा तुलसी सौंठ का, श्वसन तंत्र का मीत
श्वास फूलने दमा में, सेवन उत्तम रीत
सोंठ चूर्ण चुटकी, नमक काला, काली मिर्च
तुलसी पत्ते पाँच सँग, काला नमक उबाल
काली मिर्ची सौंठ सँग, सेवन करे कमाल
अजवाइन को पीसकर, पानी संग उबाल
पिएँ भाप लें यदि दमा, मिटे न करे निढाल
तिल का तेल गरम मलें, छाती पर लें सेक
दमा श्वास पीड़ा मिटे, है सलाह यह नेक
श्वास दमा पीड़ा घटे, खाएँ फल अंगूर
अंगूरी से दूर हों, लाभ मिले भरपूर
चौलाई रस-शहद पी, नित्य खाइए साग
कष्ट न दे हो दूर झट, श्वास रोग खटराग
तीन कली लहसुन डला, दूध उबालें मीत
शयन पूर्व पी लीजिए, श्वास रोग लें जीत
काढ़ा सेवन सौंफ का, बलगम करता दूर
श्वसन रोग से मुक्ति पा, बजे श्वास संतूर
लौंग-शहद काढ़ा बना, पीते रहें हुजूर
श्वसन तंत्र मजबूत हो, श्वास मिले भरपूर
शहद-दालचीनी मिला, पिएँ गुनगुना नीर
या पी लें गोमूत्र तो, घटे श्वास की पीर
हींग-शहद चुप चाटिए, चार बार रह शांत
साँस फूलने से मिले, मुक्ति न रहें अशांत
नीबू रस पानी गरम, पिएँ मिले आराम
केला सेवन मत करें, लेती श्वास विराम
गुड़-सरसों के तेल में, डाल मिला लें मौन
नित करिए सेवन मलें, रोग न जाने कौन
ताजे फल सब्जी हरी, चने अंकुरित श्रेष्ठ
चिकनाई एसिड तजें, कार्बोहाइड्रेट नेष्ठ
२८-६-२०२३
***
पुस्तक चर्चा-
संक्रांतिकाल की साक्षी कवितायें
आचार्य भगवत दुबे
*
[पुस्तक विवरण- काल है संक्रांति का, गीत-नवगीत संग्रह, आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', प्रथम संस्करण २०१६, आकार २२ से.मी. x १३.५ से.मी., आवरण बहुरंगी, पेपरबैक जैकेट सहित, पृष्ठ १२८, मूल्य जन संस्करण २००/-, पुस्तकालय संस्करण ३००/-, समन्वय प्रकाशन, २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१]
कविता को परखने की कोई सर्वमान्य कसौटी तो है नहीं जिस पर कविता को परखा जा सके। कविता के सही मूल्याङ्कन की सबसे बड़ी बाधा यह है कि लोग अपने पूर्वाग्रहों और तैयार पैमानों को लेकर किसी कृति में प्रवेश करते हैं और अपने पूर्वाग्रही झुकाव के अनुरूप अपना निर्णय दे देते हैं। अतः, ऐसे भ्रामक नतीजे हमें कृतिकार की भावना से सामंजस्य स्थापित नहीं करने देते। कविता को कविता की तरह ही पढ़ना अभी अधिकांश पाठकों को नहीं आता है। इसलिए श्री दिनकर सोनवलकर ने कहा था कि 'कविता निश्चय ही किसी कवि के सम्पूर्ण व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति है। किसी व्यक्ति का चेहरा किसी दूसरे व्यक्ति से नहीं मिलता, इसलिए प्रत्येक कवी की कविता से हमें कवी की आत्मा को तलाशने का यथासम्भव यत्न करना चाहिए, तभी हम कृति के साथ न्याय कर सकेंगे।' शायद इसीलिए हिंदी के उद्भट विद्वान डॉ. रामप्रसाद मिश्र जब अपनी पुस्तक किसी को समीक्षार्थ भेंट करते थे तो वे 'समीक्षार्थ' न लिखकर 'न्यायार्थ' लिखा करते थे।
रचनाकार का मस्तिष्क और ह्रदय, अपने आसपास फैले सृष्टि-विस्तार और उसके क्रिया-व्यापारों को अपने सोच एवं दृष्टिकोण से ग्रहण करता है। बाह्य वातावरण का मन पर सुखात्मक अथवा पीड़ात्मक प्रभाव पड़ता है। उससे कभी संवेद नात्मक शिराएँ पुलकित हो उठती हैं अथवा तड़प उठती हैं। स्थूल सृष्टि और मानवीय भाव-जगत तथा उसकी अनुभूति एक नये चेतन संसार की सृष्टि कर उसके साथ संलाप का सेतु निर्मित कर, कल्पना लोक में विचरण करते हुए कभी लयबद्ध निनाद करता है तो कभी शुष्क, नीरस खुरदुरेपन की प्रतीति से तिलमिला उठता है।
गीत-नवगीत संग्रह 'काल है संक्रांति का' के रचनाकार आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' श्रेष्ठ साहित्यिक पत्रिका 'दिव्य नर्मदा' के यशस्वी संपादक रहे हैं जिसमें वे समय के साथ चलते हुए १९९४ से अंतरजाल पर अपने चिट्ठे (ब्लॉग) के रूप में निरन्तर प्रकाशित करते हुए अब तक ४००० से अधिक रचनाएँ प्रकाशित कर चुके हैं। अन्य अंतर्जालीय मंचों (वेब साइटों) पर भी उनकी लगभग इतनी ही रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। वे देश के विविध प्रांतों में भव्य कार्यक्रम आयोजित कर 'अखिल भारतीय दिव्य नर्मदा अलंकरण' के माध्यम से हिंदी के श्रेष्ठ रचनाकारों के उत्तम कृतित्व को वर्षों तक विविध अलंकरणों से अलंकृत करने, सत्साहित्य प्रकाशित करने तथा पर्यावरण सुधर, आपदा निवारण व् शिक्षा प्रसार के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने का श्रेय प्राप्त अभियान संस्था के संस्थापक-अध्यक्ष हैं। इंजीनियर्स फॉर्म (भारत) के महामंत्री के अभियंता वर्ग को राष्ट्रीय-सामाजिक दायित्वों के प्रति सचेत कर उनकी पीड़ा को समाज के सम्मुख उद्घाटित कर सलिल जी ने सथक संवाद-सेतु बनाया है। वे विश्व हिंदी परिषद जबलपुर के संयोजक भी हैं। अभिव्यक्ति विश्वम दुबई द्वारा आपके प्रथम नवगीत संग्रह 'सड़क पर...' की पाण्डुलिपि को 'नवांकुर अलंकरण २०१६' (१२०००/- नगद) से अलङ्कृत किया गया है। अब तक आपकी चार कृतियाँ कलम के देव (भक्तिगीत), लोकतंत्र का मक़बरा तथा मीत मेरे (काव्य संग्रह) तथा भूकम्प ले साथ जीना सीखें (लोकोपयोगी) प्रकाशित हो चुकी हैं।
सलिल जी छन्द शास्त्र के ज्ञाता हैं। दोहा छन्द, अलंकार, लघुकथा, नवगीत तथा अन्य साहित्यिक विषयों के साथ अभियांत्रिकी-तकनीकी विषयों पर आपने अनेक शोधपूर्ण आलेख लिखे हैं। आपको अनेक सहयोगी संकलनों, स्मारिकाओं तथा पत्रिकाओं के संपादन हेतु साहित्य मंडल श्रीनाथद्वारा ने 'संपादक रत्न' अलंकरण से सम्मानित किया है। हिंदी साहित्य सम्मलेन प्रयाग ने संस्कृत स्त्रोतों के सारगर्भित हिंदी काव्यानुवाद पर 'वाग्विदाम्बर सम्मान' से सलिल जी को सम्मानित किया है। कहने का तात्पर्य यह है कि सलिल जी साहित्य के सुचर्चित हस्ताक्षर हैं। 'काल है संक्रांति का' आपकी पाँचवी प्रकाशित कृति है जिसमें आपने दोहा, सोरठा, मुक्तक, चौकड़िया, हरिगीतिका, आल्हा अदि छन्दों का आश्रय लेकर गीति रचनाओं का सृजन किया है।
भगवन चित्रगुप्त, वाग्देवी माँ सरस्वती तथा पुरखों के स्तवन एवं अपनी बहनों (रक्त संबंधी व् मुँहबोली) के रपति गीतात्मक समर्पण से प्रारम्भ इस कृति में संक्रांतिकाल जनित अराजकताओं से सजग करते हुए चेतावनी व् सावधानियों के सन्देश अन्तर्निहित है।
'सूरज को ढाँके बादल
सीमा पर सैनिक घायल
नाग-सांप फिर साथ हुए
गुँजा रहे वंशी मादल
लूट-छिप माल दो
जगो, उठो।'
उठो सूरज, जागो सूर्य आता है, उगना नित, आओ भी सूरज, उग रहे या ढल रहे?, छुएँ सूरज, हे साल नये आदि शीर्षक नवगीतों में जागरण का सन्देश मुखर है। 'सूरज बबुआ' नामक बाल-नवगीत में प्रकृति उपादानों से तादात्म्य स्थापित करते हुए गीतकार सलिल जी ने पारिवारिक रिश्तों के अच्छे रूपक बाँधे हैं-
'सूरज बबुआ!
चल स्कूल।
धरती माँ की मीठी लोरी
सुनकर मस्ती खूब करी।
बहिम उषा को गिर दिया
तो पिता गगन से डाँट पड़ीं।
धूप बुआ ने लपक उठाया
पछुआ लायी
बस्ते फूल।'
गत वर्ष के अनुभवों के आधार पर 'में हिचक' नामक नवगीत में देश की सियासी गतिविधियों को देखते हुए कवी ने आशा-प्रत्याशा, शंका-कुशंका को भी रेखांकित किया है।
'नये साल
मत हिचक
बता दे क्या होगा?
सियासती गुटबाजी
क्या रंग लाएगी?
'देश एक' की नीति
कभी फल पाएगी?
धारा तीन सौ सत्तर
बनी रहेगी क्या?
गयी हटाई
तो क्या
घटनाक्रम होगा?'
पाठक-मन को रिझाते ये गीत-नवगीत देश में व्याप्त गंभीर समस्याओं, बेईमानी, दोगलापन, गरीबी, भुखमरी, शोषण, भ्रष्टाचार, उग्रवाद एवं आतंक जैसी विकराल विद्रूपताओं को बहुत शिद्दत के साथ उजागर करते हुए गम्भीरता की ओर अग्रसर होते हैं।
बुंदेली लोकशैली का पुट देते हुए कवि ने देश में व्याप्त सामाजिक, आर्थिक, विषमताओं एवं अन्याय को व्यंग्यात्मक शैली में उजागर किया है।
मिलती काय ने ऊँचीबारी
कुर्सी हमखों गुईंया
पैला लेऊँ कमिसन भारी
बेंच खदानें सारी
पाँछू घपले-घोटालों सों
रकम बिदेस भिजा री
समीक्ष्य कृति में 'अच्छे दिन आने वाले' नारे एवं स्वच्छता अभियान को सटीक काव्यात्मक अभिव्यक्ति दी गयी है। 'दरक न पायेन दीवारें नामक नवगीत में सत्ता एवं विपक्ष के साथ-साथ आम नागरिकों को भी अपनी ज़िम्मेदारियों के प्रति सचेष्ट करते हुए कवि ने मनुष्यता को बचाये रखने की आशावादी अपील की है।
कवी आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ने वर्तमान के युगबोधी यथार्थ को ही उजागर नहीं किया है अपितु अपनी सांस्कृतिक अस्मिता के प्रति सुदृढ़ आस्था का परिचय भी दिया है। अतः, यह विश्वास किया जा सकता है कि कविवर सलिल जी की यह कृति 'काल है संक्रांति का' सारस्वत सराहना प्राप्त करेगी।
आचार्य भगवत दुबे
महामंत्री कादंबरी
***
दोहा मुक्तिका:
*
काम न आता प्यार यदि, क्यों करता करतार।।
जो दिल बस; ले दिल बसा, वह सच्चा दिलदार।।
*
जां की बाजी लगे तो, काम न आता प्यार।
सरहद पर अरि शीश ले, पहले 'सलिल' उतार।।
*
तूफानों में थाम लो, दृढ़ता से पतवार।
काम न आता प्यार गर, घिरे हुए मझधार।।
*
गैरों को अपना बना, दूर करें तकरार।
कभी न घर में रह कहें, काम न आता प्यार।।
*
बिना बोले ही बोलना, अगर हुआ स्वीकार।
'सलिल' नहीं कह सकोगे, काम न आता प्यार।।
*
मिले नहीं बाज़ार में, दो कौड़ी भी दाम।
काम न आता प्यार जब, रहे विधाता वाम।।
*
राजनीति में कभी भी, काम न आता प्यार।
दाँव-पेंच; छल-कपट से, जीवन हो निस्सार।।
*
काम न आता प्यार कह, करें नहीं तकरार।
कहीं काम मनुहार दे, कहीं काम इसरार।।
***
दोहा संवाद:
बिना कहे कहना 'सलिल', सिखला देता वक्त।
सुन औरों की बात पर, कर मन की कमबख्त।।
*
आवन जावन जगत में,सब कुछ स्वप्न समान।
मैं गिरधर के रंग रंगी, मान सके तो मान।। - लता यादव
*
लता न गिरि को धर सके, गिरि पर लता अनेक।
दोहा पढ़कर हँस रहे, गिरिधर गिरि वर एक।। -संजीव
*
मैं मोहन की राधिका, नित उठ करूँ गुहार।
चरण शरण रख लो मुझे, सुनकर नाथ पुकार।। - लता यादव
*
मोहन मोह न अब मुझे, कर माया से मुक्त।
कहे राधिका साधिका, कर मत मुझे वियुक्त।। -संजीव
*
ना मैं जानूँ साधना, ना जानूँ कुछ रीत।
मन ही मन मनका फिरे,कैसी है ये प्रीत।। - लता यादव
*
करे साधना साधना, मिट जाती हर व्याध।
करे काम ना कामना, स्वार्थ रही आराध।। -संजीव
*
सोच सोच हारी सखी, सूझे तनिक न युक्ति ।
जन्म-मरण के फेर से, दिलवा दे जो मुक्ति।। -लता यादव
*
नित्य भोर हो जन फिर, नित्य रात हो मौत।
तन सो-जगता मन मगर, मौन हो रहा फौत।। -संजीव
*
वाणी पर संयम रखूँ, मुझको दो आशीष।
दोहे उत्तम रच सकूँ, कृपा करो जगदीश।। -लता यादव
*
हरि न मौन होते कभी, शब्द-शब्द में व्याप्त।
गीता-वचन उचारते, विश्व सुने चुप आप्त।। -संजीव
*
२८-६-२०१८
***
दोहा सलिला:
*
हर्ष; खुशी; उल्लास; सुख, या आनंद-प्रमोद।
हैं आकाश-कुसुम 'सलिल', अब आल्हाद विनोद।।
*
कहीं न हैपीनेस है, हुआ लापता जॉय।
हाथों में हालात के, ह्युमन बीइंग टॉय।।
*
एक दूसरे से मिलें, जब मन जाए झूम।
तब जीवन का अर्थ हो, सही हमें मालूम।।
*
मेरे अधरों पर खिले, तुझे देख मुस्कान।
तेरे लब यदि हँस पड़ें, पड़े जान में जान।।
*
तू-तू मैं-मैं भुलकर, मैं तू हम हों मीत।
तो हर मुश्किल जीत लें, यह जीवन की रीत।।
*
श्वास-आस संबंध बो, हरिया जीवन-खेत।
राग-द्वेष कंटक हटा, मतभेदों की रेत।।
*
२८.६.२०१८
***
लघु कथा:
बाँस
.
गेंड़ी पर नाचते नर्तक की गति और कौशल से मुग्ध जनसमूह ने करतल ध्वनि की. नर्तक ने मस्तक झुकाया और तेजी से एक गली में खो गया.
आश्चर्य हुआ प्रशंसा पाने के लिये लोग क्या-क्या नहीं करते? चंद करतल ध्वनियों के लिये रैली, भाषण, सभा, समारोह, यहाँ ताक की खुद प्रायोजित भी कराते हैं. यह अनाम नर्तक इसकी उपेक्षा कर चला गया जबकि विरागी-संत भी तालियों के मोह से मुक्त नहीं हो पाते. मंदिर से संसद तक और कोठों से अमरोहों तक तालियों और गालियों का ही राज्य है.
संयोगवश अगले ही दिन वह नर्तक फिर मिला गया. आज वह पीठ पर एक शिशु को बाँधे हाथ में लंबा बाँस लिये रस्से पर चल रहा था और बज रही थीं तालियाँ लेकिन वह फिर गायब हो गया.
कुछ दिन बाद नुक्कड़ पर फिर दिख गया वह... इस बार कंधे पर रखे बाँस के दोनों ओर जलावन के गट्ठर टँगे थे जिन्हें वह बेचने जा रहा था..
मैंने पुकारा तो वह रुक गया. मैंने उसके नृत्य और रस्से पर चलने की कला की प्रशंसा कर पूछा कि इतना अच्छा कलाकार होने के बाद भी वह अपनी प्रशंसा से दूर क्यों चला जाता है? कला साधना के स्थान पर अन्य कार्यों को समय क्यों देता है?
कुछ पल वह मुझे देखता रहा फिर लम्बी साँस भरकर बोला : 'क्या कहूँ? कला साधना और प्रशंसा तो मुझे भी मन भाती है पर पेट की आग न तो कला से, न प्रशंसा से बुझती है. तालियों की आवाज़ में रमा रहूँ तो बच्चे भूखे रह जायेंगे.' मैंने जरूरत न होते हुए भी जलावन ले ली... उसे परछी में बैठाकर पानी पिलाया और रुपये दिए तो वह बोल पड़ा: 'सब किस्मत का खेल है. अच्छा-खासा व्यापार करता था. पिता को किसी से टक्कर मार दी. उनके इलाज में हुए खर्च में लिये कर्ज को चुकाने में पूँजी ख़त्म हो गयी. बचपन का साथी बाँस और उस पर सीखे खेल ही पेट पालने का जरिया बन गये.' इससे पहले कि मैं उसे हिम्मत देता वह फिर बोला:'फ़िक्र न करें, वे दिन न रहे तो ये भी न रहेंगे. अभी तो मुझे कहीं झुककर, कहीं तनकर बाँस की तरह परिस्थितियों से जूझना ही नहीं उन्हें जीतना भी है.' और वह तेजी से आगे बढ़ गया. मैं देखता रह गया उसके हाथ में झूलता बाँस
२८-६-२०१७
***
मीरां - तुलसी संवाद
कृष्ण-भक्त मीरां बाई और राम-भक्त तुलसीदास के मध्य हुआ निम्न पत्राचार शंका-समाधान के साथ पारस्परिक विश्वास और औदार्य का भी परिचायक है। इष्ट अलग-अलग होने और पूर्व परिचय न होने पर भी दोनों में एक दूसरे के प्रति सहज सम्मान का भाव उल्लेखनीय है। काश. हम सब इनसे प्रेरणा लेकर पारस्परिक विचार-विनिमय से शंकाओं का समाधान कर सकें-
राजपरिवार ने राजवधु मीरां को कृष्ण भक्ति छोड़कर सांसारिक जीवन यापन हेतु बाध्य करना चाहा। पति भोजराज द्वारा प्रत्यक्ष विरोध न करने पर भी ननद ऊदा ने मीरां को कष्ट देने में कोई कसर न छोड़ी। प्रताड़ना असह्य होने पर मीरां ने तुलसी को पत्र भेजा-
स्वस्ति श्री तुलसी कुलभूषण, दूषन हरन गोसाई।
बारहिं बार प्रनाम करहूँ अब, हरहूँ सोक समुदाई।।
घर के स्वजन हमारे जेते, सबन्ह उपाधि बढ़ाई।
मेरे माता-पिता के समहौ, हरिभक्तन्ह सुखदाई।
साधु-संग अरु भजन करत माहिं, देत कलेस महाई।।
हमको कहा उचित करिबो है, सो लिखिए समझाई।।
हे कुलभूषण! दूषण को मिटानेवाले, गोस्वामी तुलसीदास जी सादर प्रणाम। आपको बार-बार प्रणाम करते हुए निवेदन है कि मेरे अनगिन शोकों को हरने की कृपा करें। हमारे घर के जितने स्वजन (परिवारजन) हैं वे हमारी पीड़ा बढ़ा रहे हैं। यहाँ 'उपाधि' शब्द का प्रयोग व्यंगार्थ में है, व्यंग्य करते हुए सम्मानजनक शब्द इस तरह कहना कि उसका विपरीत अर्थ सुननेवाले को अपमानजनक लगकर चुभे और दर्द दे। साधु-संतों के साथ बैठकर भजन करने पर वे मुझे अत्यधिक क्लेश देते हैं। आप मेरे माता-पिता के समकक्ष तथा ईश्वर के भक्तों को सुख देनेवाले हैं। मुझे समझाकर लिखिए कि मेरे लिए क्या करना उचित है?
मीराबाई के पत्र का जबाव तुलसीदास ने इस प्रकार दिया:-
जाके प्रिय न राम बैदेही।
सो नर तजिए कोटि बैरी सम जद्यपि परम सनेही।।
नाते सबै राम के मनियत सुह्मद सुसंख्य जहाँ लौ।
अंजन कहा आँखि जो फूटे, बहुतक कहो कहाँ लौ।।
तुलसी के समक्ष धर्म संकट यह था कि उनसे एक भक्त और राजरानी मार्गदर्शन चाह रही थी जिसके इष्ट भिन्न थे। वे मना भी कर सकते थे, मौन भी रह सकते थे। मीरा से राजपरिवार के विपरीत जाने को कहते तो मीरा को राज परिवार की और अधिक नाराजी झेलनी पड़ती,जो मीरां के कष्ट भी बढ़ाती। राज परिवार की बात मानने को कहते तो मीरां को ईश्वर भक्ति छोड़नी पड़ती जो स्वयं ईश्वर भक्त होने के नाते तुलसी कर नहीं सकते थे। तुलसी ने आदर्श और व्यवहार में समन्वय बैठाते हुए उत्तर में बिना संबोधन किये मीरां को मार्गदर्शन दिया ताकि मीरा पर परपुरुष का पत्र मिलने का आरोप न लगाया जा सके। तुलसी ने लिखा: 'जिसको भगवान राम और भगवती सीता अर्थात अपना इष्ट प्रिय न हो उसे परम प्रिय होने भी करोड़ों शत्रुओं के समान घातक समझते हुए त्याग देना चाहिए। (यहाँ मीरां को संकेत है कि वे राजपरिवार और राजमहल त्याग दें, जिसका मीरां ने पालन भी किया और कृष्ण मंदिर को निवास बना लिया)। जीवन में जितने भी संबंध हैं वे सब वहीँ तक मान्य हैं जहाँ तक भगवान् की उपासना में बाधक न हों। ऐसा अंजन किस काम का जो आँख ही फोड़ दे अर्थात वह नाता पालने योग्य नहीं है जिसके कारण अपना इष्ट भगवद्भक्ति छोड़ना पड़े। इससे अधिक और क्या कहूँ?
***
शृंगार गीत :
तुम
*
तुम मुस्काईं
तो ऊषा के
हुए गुलाबी गाल।
*
सूरज करता ताका-झाँकी
मन में आँकें सूरत बाँकी
नाच रहे बरगद बब्बा भी
झूम दे रहे ताल।
तुम इठलाईं
तो पनघट पे
कूकी मौन रसाल।
तुम मुस्काईं
तो ऊषा के
हुए गुलाबी गाल।
*
सद्यस्नाता बूँदें बरसें
देख बदरिया हरषे-तरसे
पवन छेड़ता श्यामल कुंतल
उलझें-सुलझे बाल।
तुम खिसियाईं
पल्लू थामे
झिझक न करो मलाल।
तुम मुस्काईं
तो ऊषा के
हुए गुलाबी गाल।
*
बजी घंटियाँ मन मंदिर में
करी अर्चना कोकिल स्वर में
रीझ रहे नटराज उमा पर
पहना, पहनी माल।
तुम भरमाईं
तो राधा लख
नटवर हुए निहाल।
तुम मुस्काईं
तो ऊषा के
हुए गुलाबी गाल।
*
करछुल-चम्मच बाजी छुनछन
बटलोई करती है भुनभुन
लौकी हाथ लगाए हल्दी
मुकुट टमाटर लाल।
तुम पछताईं
नमक अधिक चख
स्वेद सुशोभित भाल।
तुम मुस्काईं
तो ऊषा के
हुए गुलाबी गाल।
*
पूर्वा सँकुची कली नवेली
हुई दुपहरी प्रखर हठीली
संध्या सुंदर, कलरव सस्वर
निशा नशीली चाल।
तुम हुलसाईं
अपने सपने
पूरे किये कमाल।
तुम मुस्काईं
तो ऊषा के
हुए गुलाबी गाल।
२८-६-२०१७

***

नवगीत
खिला मोगरा
*
खिला मोगरा
जब-जब, तब-तब
याद किसी की आई।
महक उठा मन
श्वास-श्वास में
गूँज उठी शहनाई।
*
हरी-भरी कोमल पंखुड़ियाँ
आशा-डाल लचीली।
मादक चितवन कली-कली की
ज्यों घर आई नवेली।
माँ के आँचल सी सुगंध ने
दी ममता-परछाई।
खिला मोगरा
जब-जब, तब-तब
याद किसी की आई।
*
ननदी तितली ताने मारे
छेड़ें भँवरे देवर।
भौजी के अधरों पर सोहें
मुस्कानों के जेवर।
ससुर गगन ने
विहँस बहू की
की है मुँह दिखलाई।
खिला मोगरा
जब-जब, तब-तब
याद किसी की आई।
*
सजन पवन जब अंग लगा तो
बिसरा मैका-अँगना।
द्वैत मिटा, अद्वैत वर लिया
खनके पायल-कँगना।
घर-उपवन में
स्वर्ग बसाकर
कली न फूल समाई।
खिला मोगरा
जब-जब, मुझको
याद किसी की आई।
***

गीत-
*
भूल नहीं पल भर को भी यह चेतन का संक्रान्तिकाल है
राकेशी ज्योत्सना न शीतल, लिये क्रांति की नव मशाल है
*
अचल रहे संकल्प, विकल्पों पर विचार का समय नहीं है
हुई व्यवस्था ही प्रधान, जो करे व्यवस्था अभय नहीं है
*
कल तक रही विदेशी सत्ता, क्षति पहुँचाना लगा सार्थक
आज स्वदेशी चुने हुए से टकराने का दृश्य मार्मिक
कुरुक्षेत्र की सीख यही है, दु:शासन से लड़ना होगा
धृतराष्ट्री है न्याय व्यवस्था मिलकर इसे बदलना होगा
वादों के अम्बार लगे हैं, गांधारी है न्यायपीठ पर
दुर्योधन देते दलील, चुक गये भीष्म, पर चलना होगा
आप बढ़ा जी टकराने अब उसका तिलकित नहीं भाल है
भूल नहीं पल भर को भी यह चेतन का संक्रान्तिकाल है
*
हाथ हथौड़ा तिनका हाथी लालटेन साइकिल पथ भूले
कमल मध्य को कुचल, उच्च का हाथ थाम सपनों में झूले
निम्न कटोरा लिये हाथ में, अनुचित-उचित न देख पा रहा
मूल्य समर्थन में, फंदा बन कसा गले में कहर ढा रहा
दाल टमाटर प्याज रुलाये, खाकर हवा न जी सकता जन
पानी-पानी स्वाभिमान है, चारण सत्ता-गान गा रहा
छाते राहत-मेघ न बरसें, टैक्स-सूर्य का व्याल-जाल है
भूल नहीं पल भर को भी यह चेतन का संक्रान्तिकाल है
*
महाकाल जा कुंभ करायें, क्षिप्रा में नर्मदा बहायें
उमा बिना शिव-राज अधूरा, नंदी चैन किस तरह पायें
सिर्फ कुबेरों की चाँदी है, श्रम का कोई मोल नहीं है
टके-तीन अभियंता बिकते, कहे व्यवस्था झोल नहीं है
छले जा रहे अपनों से ही, सपनों- नपनों से दुःख पाया
शानदार हैं मकां, न रिश्ते जानदार कुछ तोल नहीं है
जल पलाश सम 'सलिल', बदल दे अब न सहन के योग्य हाल है
भूल नहीं पल भर को भी यह चेतन का संक्रान्तिकाल है
***

***

मुक्तिका:
*
पढ़ेंगे खुदका लिखा खुद निहाल होना है
पढ़े जो और तो उसको निढाल होना है
*
हुई है बात सलीके की कुछ सियासत में
तभी से तय है कि जमकर बबाल होना है
*
कहा जो हमने वही सबको मानना होगा
यही जम्हूरियत की अब मिसाल होना है
*
दियों से दुश्मनी, बाती से अदावत जिनको
उन्हीं के हाथों में जलती मशाल होना है
*
कहाँ से आये मियाँ और कहाँ जाते हो?
न इससे ज्यादा कठिन कुछ सवाल होना है
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दोहा मुक्तिका:
*
उगते सूरज की करे, जगत वंदना जाग
जाग न सकता जो रहा, उसका सोया भाग
*
दिन कर दिनकर ने कहा, वरो कर्म-अनुराग
संध्या हो निर्लिप्त सच, बोला: 'माया त्याग'
*
तपे दुपहरी में सतत, नित्य उगलता आग
कहे: 'न श्रम से भागकर, बाँधो सर पर पाग
*
उषा दुपहरी साँझ के, संग खेलता फाग
दामन पर लेकिन लगा, कभी न किंचित दाग
*
निशा-गोद में सर छिपा, करता अचल सुहाग
चंद्र-चंद्रिका को मिला, हँसे- पूर्ण शुभ याग
*
भू भगिनी को भेंट दे, मार तिमिर का नाग
बैठ मुँड़ेरे भोर में, बोले आकर काग
*
'सलिल'-धार में नहाये, बहा थकन की झाग
जग-बगिया महका रहा, जैसे माली बाग़
२८-६-२०१५
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विमर्श
कायस्थ सिर्फ जाति नहीं,पांचवा वर्ण
*
कायस्थ समाज की जाति व्यवस्था पर शिव आसरे अस्थाना लिखते हैं- “स्मरण करो एक समय था जब आधे से अधिक भारत पर कायस्थों का शासन था। कश्मीर में दुर्लभबर्धन कायस्थ वंश, काबुल और पंजाब में जयपाल कायस्थ वंश, गुजरात में बल्लभी कायस्थ राजवंश, दक्षिण में चालुक्य कायस्थ राजवंश, उत्तर भारत में देवपाल गौड़ कायस्थ राजवंश तथा मध्य भारत में सतवाहन और परिहार कायस्थ राजवंश सत्ता में रहे हैं। हम उन राजवंशों की संतानें हैं, हम पिछलग्गू या बाबू बनने के लिए नहीं, हिन्दुस्तान पर प्रेम, ज्ञान और शौर्य से परिपूर्ण उस हिन्दू संस्कृति की स्थापना के लिए पैदा हुए हैं जिन्होंने हमें जन्म दिया है।”

एक बार स्वामी विवेकानन्द से भी एक सभा में उनसे उनकी जाति पूछी गई थी। अपनी जाति अथवा वर्ण के बारे में बोलते हुए विवेकानंद ने कहा था “मैं उस महापुरुष का वंशधर हूँ, जिनके चरण कमलों पर प्रत्येक ब्राह्मण ‘‘यमाय धर्मराजाय चित्रगुप्ताय वै नमः’’ का उच्चारण करते हुए पुष्पांजलि प्रदान करता है और जिनके वंशज विशुद्ध रूप से क्षत्रिय हैं। यदि अपनें पुराणों पर विश्वास हो तो, इन समाज सुधारको को जान लेना चाहिए कि मेरी जाति ने पुराने जमानें में अन्य सेवाओं के अतिरिक्त कई शताब्दियों तक आधे भारत पर शासन किया था। यदि मेरी जाति की गणना छोड़ दी जाये, तो भारत की वर्तमान सभ्यता का शेष क्या रहेगा ? अकेले बंगाल में ही मेरी जाति में सबसे बड़े कवि, सबसे बड़े इतिहास वेत्ता, सबसे बड़े दार्शनिक, सबसे बड़े लेखक और सबसे बड़े धर्म प्रचारक हुए हैं। मेरी ही जाति ने वर्तमान समय के सबसे बड़े वैज्ञानिक से भारत वर्ष को विभूषित किया है।’’

“अक्सर यह प्रश्न उठता रहता है कि चार वर्णों में क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र में कायस्थ किस वर्ण से संबंधित है। स्पष्ट है कि उपरोक्त चारों वर्णों के खाँचे में, कायस्थ कहीं भी फिट नहीं बैठता है। इस पर तरह-तरह की किंवदंतियां उछलती चली आ रही है। उपरोक्त यक्ष प्रश्न “किस वर्ण के कायस्थ” का माकूल जबाब देने का आज समय आ गया है कि सभी चित्रांश बन्धुओं को अपने समाज के बारे में सोचने का अपनी वास्तविक पहचान का ज्ञान होना परम आवश्यक है।”

अहिल्या कामधेनु संहिता और पद्मपुराण पाताल खण्ड के श्लोकों और साक्ष्यों से वे साबित करते हैं कि कायस्थ सिर्फ जाति नहीं बल्कि पांचवा वर्ण है. नीचे दिये गये उदाहरण देखिए-

ब्राह्मणोस्य मुखमासीद बाहु राजन्यः कृतः।
उरूतदस्य यदवश्य, पदाभ्याम् शूद्रो अजायतः।। - ऋग्वेद पुरुष सूक्त

समाज की सुव्यवस्था के लिए श्री ब्रह्मा जी ने अपने मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, उदर से वैश्य तथा चरणों से शूद्र उत्पन्न कर वर्ण ‘‘चतुष्टय’’ (चार वर्णों) की स्थापना की। सम्पूर्ण प्राणियों के शुभ-अशुभ कार्यों का लेखा-जोखा रखने व पाप-पुण्य के अनुसार उनके लिये दण्ड या पुरस्कार निश्चित करने का दायित्व श्री ब्रह्मा जी ने श्री धर्मराज को सौंपा। कुछ समय उपरान्त श्री धर्मराज जी ने देखा कि प्रजापति के द्वारा निर्मित विश्व के समस्त प्राणियों का लेखा-जोखा रखना अकेले उनके द्वारा सम्भव नहीं है। अतः धर्मराज जी ने श्री ब्रह्मा जी से निवेदन किया कि ‘हे देव! आपके द्वारा उत्पन्न प्राणियों का विस्तार दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। अतः मुझे एक सहायक की आवश्यकता है। जिसे प्रदान करनें की कृपा करें।

‘‘अधिकारेषु लोकानां, नियुक्तोहत्व प्रभो।
सहयेन बिना तंत्र स्याम, शक्तः कथत्वहम्।।’’ -अहिल्या कामधेनु संहिता

श्री धर्मराज जी के निवेदन पर ब्रह्मा जी एक कल्प तक ध्यान मुद्रा में रहे, योगनिद्रा के अवसान पर कार्तिक शुल्क द्वितीया के शुभ क्षणों में श्री ब्रह्मा जी ने अपने सन्मुख एक श्याम वर्ण, कमल नयन एक पुरूष को देखा, जिसके दाहिने हाथ में लेखनी व पट्टिका तथा बायें हाथ में दवात थी। यही था श्री चित्रगुप्त जी का अवतरण।

‘‘सन्निधौ पुरुषं दृष्टवा, श्याम कमल लोचनम्।
लेखनी पट्टिका हस्त, मसी भाजन संयुक्तम्।।’’ -पद्मपुराण-पाताल खण्ड

इस दिव्य पुरूष की श्याम वर्णी काया, रत्न जटित मुकुटधारी, चमकीले कमल नयन, तीखी भृकुटी, सिर के पीछे तेजोमय प्रभामंडल, घुघराले बाल, प्रशस्त भाल, चन्द्रमा सदृश्य आभा, शंखाकार ग्रीवा, विशाल भुजाएं व उभरी जांघे तथा व्यक्तित्व में अदम्य साहस व पौरुष झलक रहा था। इस तेजस्वी पुरूष को सम्मुख देख ब्रह्मा जी ने पूछा कि आप कौन है? दिव्य पुरुष ने विनम्रतापूर्वक प्रणाम कर कहा कि आपने समाधि में ध्यानस्त होकर मेरा आह्नवान चिन्तन किया। अतः, मैं प्रकट हो गया हूँ। मैं आपका ही मानस पुत्र हूँ। आप स्वयं ही बताये कि मैं कौन हूँ ? कृपया मेरा वर्ण- निरूपण करें तथा स्पष्ट करें कि किस कार्य हेतु आपने मेरा स्मरण किया। इस प्रकार ब्रह्माजी अपने मानस पुत्र को देख कर बहुत हर्षित हुये और कहा कि हे तात! मानव समाज के चारों वर्णों की उत्पत्ति मेरे शरीर के पृथक-पृथक भागों से हुई है, परन्तु तुम्हारी उत्पत्ति मेरी समस्त काया से हुई है इस कारण तुम्हारी जाति ‘‘कायस्थ’’ होगी।
मम् कायात्स मुत्पन्न, स्थितौ कायोऽभवत्त।
कायस्थ इति तस्याथ, नाम चक्रे पितामहा।। -पद्म पुराण पाताल खण्ड
काया से प्रकट होने का तात्पर्य यह है कि समस्त ब्रह्म-सृष्टि में श्री चित्रगुप्त जी की अभिव्यक्ति। अपने कुशल दिव्य कर्मों से तुम ‘‘कायस्थ वंश’’ के संस्थापक होगे। तुम्हें समस्त प्राणि मात्र की देह में अर्न्तयामी रूप से स्थित रहना होगा। जिससे उनकी आंतरिक मनोभावनाएँ, विचार व कर्म को समझने में सुविधा हो।

‘‘कायेषु तिष्ठतति-कायेषु सर्वभूत शरीरेषु।
अन्तर्यामी यथा निष्ठतीत।।’’ - पद्य पुराण पाताल खण्ड
ब्रह्माजी ने नवजात पुत्र को यह भी स्पष्ट किया कि ‘‘आप की उत्पत्ति हेतु मैने अपने चित्त को एकाग्र कर पूर्ण ध्यान में गुप्त किया था अतः आपका नाम ‘‘चित्रगुप्त’’ ही उपयुक्त होगा। आपका वास नगर कोट में रहेगा और आप चण्डी के उपासक होंगे।

‘‘चित्रं वचो मायागत्यं, चित्रगुप्त स्मृतो गुरुवेः।
सगत्वा कोट नगर, चण्डी भजन तत्परः।।’’ - पद्य पुराण पाताल खण्ड

स्पष्ट है कि कायस्थ पांचवा वर्ण है। कायस्थ वर्ण का अस्तित्व हजारों साल पुराना है। उत्तर प्रदेश, बंगाल, बिहार से लेकर कश्मीर में चिरकाल तक कायस्थ राजा रहे हैं। अयोध्या में रघुवंश से पहले कायस्थों का ही शासन था। पुरातन भारत में इस जाति/वर्ण का स्वर्णिम इतिहास रहा है तो आधुनिक भारत में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, लाल बहादुर शास्त्री, सुभाष चंद्र बोस, विवेकानंद, महर्षि महेश योगी, शकुंतला देवी आदि इसी वर्ण या जाति व्यवस्था से आते हैं।
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विमर्श
प्रिय नरेंद्र जी, उमा जी
सादर वन्दे मातरम
मुझे आपका ध्यान नदी घाटियों के दोषपूर्ण विकास की ओर आकृष्ट करना है.
मूलतः नदियां गहरी तथा किनारे ऊँचे पहाड़ियों की तरह और वनों से आच्छादित थे. कालिदास का नर्मदा तट वर्णन देखें। मानव ने जंगल काटकर किनारों की चट्टानें, पत्थर और रेत खोद लिये तो नदी का तक और किनारों का अंतर बहुत कम बचा. इससे भरनेवाले पानी की मात्रा और बहाव घाट गया, नदी में कचरा बहाने की क्षमता न रही, प्रदूषण फैलने लगा, जरा से बरसात में बाढ़ आने लगी, उपजाऊ मिट्टी बाह जाने से खेत में फसल घट गयी, गाँव तबाह हुए.
इस विभीषिका से निबटने हेतु कृपया, निम्न सुझावों पर विचार कर विकास कार्यक्रम में यथोचित परिवर्तन करने हेतु विचार करें:
१. नदी के तल को लगभग १० - १२ मीटर गहरा, बहाव की दिशा में ढाल देते हुए, ऊपर अधिक चौड़ा तथा नीचे तल में कम चौड़ा खोदा जाए.
२. खुदाई में निकली सामग्री से नदी तट से १-२ किलोमीटर दूर संपर्क मार्ग तथा किनारों को पक्का बनाया जाए ताकि वर्षा और बाढ़ में किनारे न बहें।
३. घाट तक आने के लिये सड़क की चौड़ाई छोड़कर शेष किनारों पर घने जंगल लगाए जाएँ जिन्हें घेरकर प्राकृतिक वातावरण में पशु-पक्षी रहें मनुष्य दूर से देख आनंदित हो सके।
४. गहरी हुई बड़ी नदियों में बड़ी नावों और छोटे जलयानों से यात्री और छोटी नदियों में नावों से यातायात और परिवहन बहुत सस्ता और सुलभ हो सकेगा। बहाव की दिशा में तो नदी ही अल्प ईंधन में पहुंचा देगी। सौर ऊर्जा चलित नावों से वर्ष में ८-९ माह पेट्रोल -डीज़ल की तुलना में लगभग एक बटे दस धुलाई व्यय होगा। प्राचीन भारत में जल संसाधन का प्रचुर प्रयोग होता था।
५. घाटों पर नदी धार से ३००-५०० मीटर दूर स्नानागार-स्नान कुण्ड तथा पूजनस्थल हों जहाँ जलपात्र या नल से नदी उपलब्ध हो। नदी के दर्शन करते हुए पूजन-तर्पण हो। प्रयुक्त दूषित जल व् अन्य सामग्री घाट पर बने लघु शोधन संयंत्र में उपचारित का शुद्ध जल में परिवर्तित की जाने के बाद नदी के तल में छोड़ा जाए। तथा नदी का प्रदुषण समाप्त होगा तथा जान सामान्य की आस्था भी बनी सकेगी। इस परिवर्तन के लिये संतों-पंडों तथा स्थानी जनों को पूर्व सहमत करने से जन विरोध नहीं होगा।
६. नदी के समीप हर शहर, गाँव, कस्बे, कारखाने, शिक्षा संस्थान, अस्पताल आदि में लघु जल-मल निस्तारण केंद्र हो। पूरे शहर के लिए एक वृहद जल-नल केंद्र मँहगा, जटिल तथा अव्यवहार्य है जबकि लघु ईकाइयां कम देखरेख में सुविधा से संचालित होने के साथ स्थानीय रोजगार भी सृजित करेंगी। इनके द्वारा उपचारित जल नदियों में छोड़ना सुरक्षित होगा।
७. एक राज्यों में बहने वाली नदियों पर विकास योजना केंद्र सरकार की देख-रेख और बजट से हो जबकि एक राज्य की सीमा में बह रही नदियों की योजनों की देखरेख और बजट राज्य सरकारें देखें।जिन स्थानों पर निवासी २५ प्रतिशत जन सहयोग दान करें उन्हें प्राथमिकता दी जाए। हिस्सों में स्थानीय जनों ने बाँध बनाकर या पहाड़ खोदकर बिना सरकारी सहायता के अपनी समस्या का निदान खोज लिया है और इनसे लगाव के कारण वे इनकी रक्षा व मरम्मत भी खुद करते है जबकि सरकारी मदद से बनी योजनाओं को आम जन ही लगाव न होने से हानि पहुंचाते हैं। इसलिए श्रमदान अवश्य हो। ७० के दशक में सरकारी विकास योजनाओं पर ५० प्रतिशत श्रमदान की शर्त थी, जो क्रमशः काम कर शून्य कर दी गयी तो आमजन लगाव ख़त्म हो जाने के कारण सामग्री की चोरी करने लगे और कमीशन माँगा जाने लगा।श्रमदान करनेवालों को रोजगार मिलेगा।
८. नर्मदा में गुजरात से जबलपुर तक, गंगा में बंगाल से हरिद्वार तक तथा राजस्थान, महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखण्ड में छोटी नदियों से जल यातायात होने पर इन पिछड़े क्षेत्रों का कायाकल्प हो जाएगा।
९. इससे भूजल स्तर बढ़ेगा और सदियों के लिए पेय जल की समस्या हल हो जाएगी।भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ेगी।
कृपया, इन बिन्दुओं पर गंभीरतापूर्वक विचारण कर, क्रियान्वयन की दिशा में कदम उठाये जाने हेतु निवेदन है।
संजीव वर्मा
एक नागरिक
२८-६-२०१४

सती सुलोचना


सती सुलोचना 

सुलोचना वासुकी नाग की पुत्री और लंका के राजा रावण के पुत्र मेघनाद की पत्नी थी।
कायस्थों के मूल श्री चित्रगुप्त जी के १२ पुत्रों के विवाह नागराज वासुकि की १२ कन्याओं ही हुए थे। इस नाते मेघनाद कायस्थों का साढ़ू होता था। मेघनाद द्वारा लक्ष्मण पर शक्ति प्रहार के बाद कायस्थ वैद्य सुषेण ने ही लक्ष्मण की प्राण रक्षा की थी। अयोध्या में चारों भाइयों की श्रेष्ठ शिक्षा-दीक्षा करनेवाली राजमाता कैकेई भी कायस्थ थीं। कायस्थों को अपनी कन्याओं के नाम कैकेई और सुलोचना के नाम पर रकहन चाहिए और इन नारी रत्नों की जयंतियाँ मनानी चाहिए, उनके नाम पर अलंकरण देने चाहिए।   

रावण के महापराक्रमी पुत्र इन्द्रजीत (मेघनाद) का वध करने की प्रतिज्ञा लेकर लक्ष्मण जिस समय युद्ध भूमि में जाने के लिये प्रस्तुत हुए, तब राम उनसे कहते हैं- "लक्ष्मण, रण में जाकर तुम अपनी वीरता और रणकौशल से रावण-पुत्र मेघनाद का वध कर दोगे, इसमें मुझे कोई संदेह नहीं है परंतु एक बात का विशेष ध्यान रखना कि मेघनाद का मस्तक भूमि पर किसी भी प्रकार न गिरे। क्योंकि मेघनाद एकनारी-व्रत का पालक है और उसकी पत्नी परम पतिव्रता है। ऐसी साध्वी के पति का मस्तक अगर पृथ्वी पर गिर पड़ा तो हमारी सारी सेना का ध्वंस हो जाएगा और युद्ध में विजय की आशा त्याग देनी पड़ेगी। लक्ष्मण अपनी सैना लेकर चल पड़े। युद्ध में अपने बाणों से उन्होंने मेघनाद का मस्तक उतार लिया, पर उसे पृथ्वी पर नहीं गिरने दिया। हनुमान उस मस्तक को राम के पास ले आए।

मेघनाद की दाहिनी भुजा आकाश में उड़ती हुई उसकी पत्नी सुलोचना के पास जाकर गिरी। सुलोचना चकित हो गयी। दूसरे ही क्षण अन्यंत दु:ख से कातर होकर विलाप करने लगी पर उसने भुजा को स्पर्श नहीं किया। उसने सोचा, सम्भव है यह भुजा किसी अन्य व्यक्ति की हो। ऐसी दशा में पर-पुरुष के स्पर्श का दोष मुझे लगेगा। निर्णय करने के लिये उसने भुजा से कहा- "यदि तू मेरे स्वामी की भुजा है, तो मेरे पतिव्रत की शक्ति से युद्ध का सारा वृत्तांत लिख दे। भुजा में दासी ने लेखनी पकड़ा दी। लेखिनी ने लिख दिया- "प्राणप्रिये, यह भुजा मेरी ही है। युद्ध भूमि में श्रीराम के भाई लक्ष्मण से मेरा युद्ध हुआ। लक्ष्मण ने कयी वर्षों से पत्नी, अन्न और निद्रा छोड़ रखी है। वे तेजस्वी तथा समस्त दैवी गुणों से सम्पन्न है। संग्राम में उनके साथ मेरी एक नहीं चली। अन्त में उन्हीं के बाणों से विद्ध होने से मेरा प्राणान्त हो गया। मेरा शीश श्रीराम के पास है।

पति की भुजा-लिखित पंकितयां पढ़ते ही सुलोचना व्याकुल हो गयी। पुत्र-वधु के विलाप को सुनकर लंकापति रावणने आकर कहा- 'शोक न कर पुत्री। प्रात: होते ही सहस्त्रों मस्तक मेरे बाणों से कट-कट कर पृथ्वी पर लोट जाऐंगे। मैं रक्त की नदियां बहा दूंगा। करुण चीत्कार करती हुई सुलोचना बोली- "पर इससे मेरा क्या लाभ होगा,। सहस्त्रों नहीं करोड़ों शीश भी मेरे स्वामी के शीश के अभाव की पूर्ति नहीं कर सकेंगे। सुलोचना ने निश्चय किया कि 'उसे सती हो जाना चाहिए किंतु पति का शव तो राम-दल में पड़ा हुआ था। फिर वह कैसे सती होती? जब अपने ससुर रावण से उसने अपना अभिप्राय कहकर अपने पति का शव मँगवाने के लिए कहा, तब रावण ने उत्तर दिया- "देवी ! तुम स्वयं ही राम-दल में जाकर अपने पति का शव प्राप्त करो।

जिस समाज में बालब्रह्मचारी हनुमान, परम जितेन्द्रिय लक्ष्मण तथा एकपत्नीव्रती भगवान श्रीराम विद्यमान हैं, उस समाज में तुम्हें जाने से डरना नहीं चाहिए। मुझे विश्वास है कि इन स्तुत्य महापुरुषों के द्वारा तुम निराश नहीं लौटाई जाओगी।"

सुलोचना के आने का समाचार सुनते ही श्रीराम खड़े हो गए और स्वयं चलकर सुलोचना के पास आए और बोले- "देवी! तुम्हारे पति विश्व के अन्यतम योद्धा और पराक्रमी थे। उनमें बहुत-से सदगुण थे; किंतु विधि की लिखी को कौन बदल सकता है। आज तुम्हें इस तरह देखकर मेरे मन में पीड़ा हो रही है। सुलोचना भगवान की स्तुति करने लगी।

श्रीराम ने उसे बीच में ही टोकते हुए कहा- "देवी, मुझे लज्जित न करो। पतिव्रता की महिमा अपार है, उसकी शक्ति की तुलना नहीं है। मैं जानता हूँ कि तुम परम सती हो। तुम्हारे सतीत्व से तो विश्व भी थर्राता है। बताओ कि मैं तुम्हारी किस प्रकार सहायता कर सकता हूँ?

सुलोचना ने अश्रुपूरित नयनों से प्रभु की ओर देखा और बोली- "राघवेन्द्र, मैं सती होने के लिये अपने पति का मस्तक लेने के लिये यहाँ पर आई हूँ। श्रीराम ने शीघ्र ही ससम्मान मेघनाद का शीश मँगवाया और सुलोचना को दे दिया।

पति का छिन्न शीश देखते ही सुलोचना का हृदय अत्यधिक द्रवित हो गया। उसकी आँखें जोरों से बरसने लगीं। रोते-रोते उसने पास खड़े लक्ष्मण की ओर देखा और कहा- "सुमित्रानन्दन, तुम भूलकर भी गर्व मत करना कि इनका वध तुमने किया है। मेरे स्वामी को धराशायी करने की शक्ति विश्व में किसी के पास नहीं थी। यह तो दो पतिव्रता नारियों का भाग्य था। आपकी पत्नी भी पतिव्रता हैं और मैं भी पति चरणों में अनुरक्ती रखनेवाली उनकी अनन्य उपसिका हूँ। दुर्भाग्य से मेरे पति पतिव्रता नारी का अपहरण करने वाले पिता का अन्न खाते थे और उन्हीं के लिये युद्ध में उतरे थे, इसी कारण मेरे जीवनधन परलोक सिधारे।

सभी योद्धा सुलोचना को राम शिविर में देखकर चकित थे। वे यह नहीं समझ पा रहे थे कि सुलोचना को यह कैसे पता चला कि उसके पति का शीश भगवान राम के पास है। जिज्ञासा शान्त करने के लिये सुग्रीव ने पूछ ही लिया कि यह बात उन्हें कैसे ज्ञात हुई कि मेघनाद का शीश श्रीराम के शिविर में है। सुलोचना ने स्पष्टता से बता दिया- "मेरे पति की भुजा युद्ध भूमि से उड़ती हुई मेरे पास चली गई थी। उसी ने लिखकर मुझे बता दिया।

व्यंग्य भरे शब्दों में सुग्रीव बोल उठे- "निष्प्राण भुजा यदि लिख सकती है फिर तो यह कटा हुआ सिर भी हंस सकता है।''

श्रीराम ने कहा- "व्यर्थ बातें मन करो मित्र! पतिव्रता के माहात्म्य को तुम नहीं जानते।''

सुग्रीव की मुखाकृति देखकर सुलोचना उनके भावों को समझ गई की सुग्रीव को तब भी भारिस नहीं हुआ था।। उसने कहा- "यदि मैं मन, वचन और कर्म से पति को देवता मानती हूँ, तो मेरे पति का यह निर्जीव मस्तक हंस उठे। सुलोचना की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि कटा हुआ मस्तक जोरों से हँसने लगा।

यह देखकर सभी दंग रह गये। सभी ने पतिव्रता सुलोचना को प्रणाम किया। सभी पतिव्रता की महिमा से परिचित हो गये थे। चलते समय सुलोचना ने श्रीराम से प्रार्थना की- "भगवन, आज मेरे पति की अन्त्येष्टि क्रिया है और मैं उनकी सहचरी उनसे मिलने जा रही हूँ। आज युद्ध बंद रहे। श्रीराम ने सुलोचना की प्रार्थना स्वीकार कर ली। सुलोचना पति का सिर लेकर वापस लंका आ गई। लंका में समुद्र के तट पर एक चंदन की चिता तैयार की गयी। पति का शीश गोद में लेकर सुलोचना चिता पर बैठी और धधकती हुई अग्नि में कुछ ही क्षणों में सती हो गई।
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त्यागमूर्ति कैकेई

श्री राम विग्रह स्थापना और कैकेई 

२२ जनवरी २०२४ राम भक्तों के लिए अभूतपूर्व आनद और सौभाग्य का दिन है जब मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का नयनाभिराम विग्रह दिव्य-भव्य रामलय में स्तापित किया जाकर उसकी प्राण प्रतिष्ठा जन नायक श्री नरेंद्र मोदी जी के कर कमलों से संपन्न होने जा रही है। विडंबना है की इस अवसर पर राजकुमार राम को मर्यादा पुरुष्टतां राम बनाने में महती भूमिका निभानेवाली राममाता कैकेयी, उनके पितृपक्ष के इशदेव श्री चित्रगुप्त भगवान, उनके मायके पक्ष के वंशज कायस्थों को पूरी तरह विस्मृत किया जा रहा है। अखिल भारतीय हिन्दू महासभा, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, जनसंघ तथा भारतीय जनता पार्टी क उद्भव और विकास में महती भूमिका निभाकर सतत योगदान देनेवाले कायस्थ अकारण ही उपेक्षित हैं। श्री राम के वंशजों को खोज-खोज कार आमंत्रित किया गया है किंतु राम-माताओं विशेषकर कैकेयी मैया के वंशज भुला दिए गए हैं। राजमाता कैकेयी को उनका योगदान भुलाकर भ्रमवश कलंकिनी तक कह दिया गया। तब ही से कायस्थ भी भुला दिए गए। आयी, मैया कैकेयी की वास्तविकता जानें।     

देव संस्कृति के समक्ष शिव भक्त रक्षेन्द्र रावण के पराक्रम ने संकट उपस्थिति किया तो उनसे युद्ध करने हेतु देवों तथा आर्यों में कोई नायक योद्धा नहीं था। कुछ नरूप जनक जी की तरह वीतरागी हो गए थे, कुछ देवराज इन्द्र की तरह विलासी थे, अवध नरेश दशरथ वार्धक्य की कगार पर थे। 

त्रिकालदर्शी ऋषियों ने विचार किया कि किसी वीरांगना और किसी वीर राज पुरुष के गर्भ से दर्शन उत्पन्न पुत्र को वीरोंचित शिक्षा देकर रावण वध कराया जाए। ऋषियों की दृष्टि कैकेय देश की राजकुमारी वीरांगना, विदुषी और रूपसी कैकेयी पर गई, जो वीरमाता बनने हेतु सर्वथा उपयुक्त थीं किंतु उनकी उम्र का कोई राजकुमार नहीं था। अवधपति पराक्रमी दशरथ विवाहित और वार्धक्य की कगार पर थे, वे कैकेय  (पाक अधिकृत कश्मीर) नरेश के मित्र थे। कैकेयी-दशरथ के विवाह के प्रस्ताव से कैकेय नरेश सहमत न थे किंतु देव संस्कृति की रक्षा के लिए राजकुमारी कैकेयी आत्मोत्सर्ग हेतु सहमत हो गयीं। इस अवसर पर महाराज कैके को सहमत कराने के लिए दशरथ जी ने वचन दिया की कैकेयी की संतान ही अवध की गद्दी पर बैठेगी। 

विवाह पश्चात कैकेयी जी ने अपनी पूर्ण योग्यता से दशरथ का साथ दिया। अपनी दो सौतों के साथ सौहार्द्र स्थापित करने के साथ साथ वे महाराज दशरथ को भोग से विमुखकर युद्ध हेतु ले गयीं। दशरथ के साथ युद्ध किया, दशरथ के घायल होने पर उनकी रक्षा और चिकित्सा की, रथ का पहिया निकलने पर धुरी की जगह अपनी अंगुली लगाकर दशरथ को विजय दिलायी। दशरथ जी द्वारा दो वरदान दिए जाने पर भी उन्होंने कुछ नहीं माँगा।  

पुत्रेष्टि यज्ञ के बाद भी कैकेयी ने प्राप्त पायस में से आधा भाग सुमित्रा जी को दिया। चारों पुत्रों का जन्म होने पर उन्होंने चारों को समान स्नेह दिया, चारों की शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था की, उन्हें शस्त्र संचालन सिखाकर निर्भीक बनाया। राम को कौशल्या मैया से अधिक स्नेह कैकेयी मैया से मिला। राम के बाद होने पर दशरथ में उनके प्रति मोह जाग गया। विश्वामित्र जी के द्वारा यज्ञ रक्षा हेतु श्री राम की याचना करने पर दशरथ जी ने मना कर दिया किंतु मैया कैकेयी ने आग्रह कर दशरथ जी को सहमत करा कर श्री राम को विश्वामित्र जी के साथ भिजवाया। फलत:, पूर्व योजनानुसार ताड़का-वाढ और श्री राम विवाह संपन्न हुआ। राम विवाह के पश्चात कैकेयी मैया ने अपना महल कनक भवन ही नव विवाहित राम-सीता के निवास हेतु दे दिया था। 

आयु बढ़ने के साथ-साथ दशरथ जी का राम-मोह भी बढ़ा। श्री राम अवध नरेश बनते तो वे तब तक रावण वध नहीं कर पाते जब तक कि रावण अयोध्या पर आक्रमण न करता। रावण अयोध्या राज्य को छोड़कर अत्याचार करता रहता। रावण को शिव जी से प्राप्त वरदानों के कारण वह श्री राम के अलावा अन्य किसी के द्वारा मारा नहीं जा सकता था। ऐसी परिस्थिति में ऋषियों के अनुरोध और दस्वपन में देवताओं द्वारा प्रार्थना किए जाने पर  कैकेयी मैया एक बार फिर आत्मोत्सर्ग कर, कलंक का विष पीकर राम जी के वन गमन का पथ प्रशस्त करने के लिए दो वरदानों का उपयोग कर राम का वनवास और भारत का राज्याभिषेक माँगती हैं। यदि उनके लक्ष्य भरत जी का राज्याभिषेक मात्र होता तो वह श्री राम से कह सकती थीं। राम-भरत का प्रगाढ़ प्रेम सभी जानते हैं। क्या श्री राम जी को भरत जी को गद्दी देने में तनिक भी आपत्ति होती?

विधि की विडंबना कि पुत्र-मोह की अधिकता के कारण दशरथ जी का देहावसन हो गया। लोक ने उन्हें लांछित किया। वे श्री राम के हाथों देव कार्य करने के लिए मौन रहीं, यहाँ तक कि पुत्र भरत को भी सत्य न बताकर भर्त्सना की पात्र बनीं। चित्रकूट में श्री राम ने मैया कौशल्या से पहले मैया कैकेयी के चरण-स्पर्श कर तथा भरत जी को कैकेयी मैया का अपमान न करने की सलाह देकर इंगित किया कि वे दोषी नहीं थीं। भरत जी ने नंदी ग्राम में तापस जीवन बिताया तो कैकेयी मैया ने भी तपस्विनी की तरह जीवन जिया। अयोध्या लौटने पर श्री राम ने फिर कौशल्या मैया से पहले कैकेयी मैया के चरण छुए पर लोकापवाद मिटा नहीं।

श्री राम मंदिर स्थापना के कालजयी अनुष्ठान में माता कैकेयी के साथ न्याय किया जाए। उनके चित्र व विग्रह यथास्थान हों, उनके पितृ पक्ष के आवंशज कायस्थों को भी आमन्त्रित किया जाए। मैया कौशल्या के पितृ पक्ष से वर्तमान छतीसगढ़ के प्रतिनिधि तथा मैया सुमित्रा के पितृ पक्ष से भी प्रतिनिधि सम्मिलित किए जाएँ, तबही यह अनुष्ठान परिपूर्ण होगा।  

त्यागमूर्ति कैकेई 
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कैकेई कश्मीर के पूर्व में स्थित कैकय देश की कायस्थ राजकुमारी थी। अध्यात्म रामायण कहती है कि एक रात जब माता कैकेयी सोती हैं तो उनके स्वप्न में विप्र, धेनु, सुर, संत सब एक साथ हाथ जोड़कर दर्शन देते हैं और उनसे कहते हैं कि 'हे माता कैकेयी!, हम सब आपकी शरण में हैं। महाराजा दशरथ की बुद्धि जड़ हो गयी है, तभी वो राम को राजा का पद दे रहे हैं। अगर प्रभु अयोध्या की राजगद्दी पर बैठ गए तब उनके अवतार लेने का मूल कारण ही नष्ट हो जायेगा। माता, सम्पूर्ण पृथ्वी पर सिर्फ आपमें ही ये साहस है कि आप राम से जुड़े अपयश का विष पी सकती हैं। कृपया, प्रभु को जंगल भेज कर राक्षसों का वध, जटायु तथा शबरी का कल्याण आदि  कार्य संपन्न कराइए।  युगों-युगों से कई लोग उद्धार होने की प्रतीक्षा में हैं। त्रिलोकस्वामी का उद्देश्य भूलोक का राजा बनना नहीं है। वनवास न हुआ तो राम इस लोक के 'प्रभु' ना हो पाएंगे माता।' 

माता कैकेयी के आँखों से आँसू बहने लगे। माता बोलीं - 'आने वाले युगों में लोग कहेंगे कि मैंने भरत के लिए राम को छोड़ दिया लेकिन असल में मैं राम के लिए आज भरत का त्याग कर रही हूँ। मुझे मालूम है इस निर्णय के बाद भरत और भारत मुझे कभी स्वीकार नहीं करेगा।'

रामचरित मानस में भी कई जगहों पर इसका संकेत मिलता है जब गुरु वशिष्ठ दुःखी भरत से कहते हैं -

सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलखि कहेउ मुनिनाथ।
हानि-लाभु जीवनु-मरनु, जसु अपजसु बिधि हाथ।। 

हे भरत ! सुनो भविष्य बड़ा बलवान् है। हानि-लाभ, जीवन-मरण और यश-अपयश, ये सब विधाता के ही हाथ में है, बीच में केवल माध्यम आते हैं।

प्रभु श्रीराम इस रहस्य को जानते थे इसीलिए चित्रकूट में तीनों माताओं के आने पर प्रभु सबसे पहले माता कैकेयी के पास पहुँच कर उन्हें प्रणाम करते हैं और भरत जी को भी कैकेयी मैया का अनादर और अवज्ञा करने से रोकते हैं। प्रभु श्री राम को पैदा करने वाली भले ही कौशल्या जी थीं लेकिन उन्हें ही नहीं चारों भाइयों को राजकुमारों के विलास से दूर रखकर कड़ी शिक्षा दिलवाकर कर्मयोगी और जनसेवी बनानेवाली मैया कैकेयी ही थीं। लंका से लौटने और राज्याभिषेक होने के बाद भी श्री राम ने कैकेयी मैया को सर्वाधिक सम्मान दिया। उनको 'मर्यादा पुरुषोत्तम' बनाने वाली माता कैकेयी ही थीं।
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प्रेषक 
संजीव वर्मा 'सलिल', संयोजक विश्व कायस्थ समाज जबलपुर 
संपर्क- ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१ 
चलभाष ९४२५१८३२४४, ईमेल salil.sanjiv@gmail.com