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बुधवार, 1 सितंबर 2021

पुरोवाक, मिथलेश बड़गैंया

पुरोवाक
नर्मदांचली गीत सलिला गई मथी : 'प्रेम की भागीरथी'
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
गीत का उद्भव
मानव ने अपने उद्भव काल से ही अपनी अनुभूतियों को अभिव्यक्त करने के लिए ध्वनि को अपनाया। पशुओं-पक्षियों की बोलिओं को सुनकर उनका अनुकरणकर मनुष्य ने ध्वनि और लय को मिलाना ही नहीं सीखा अपितु इस माध्यम से अपनी अनुभूतियों को सुदूर मानव समूहों तक पहुँचाने का माध्यम भी बनाया। शेर की दहाड़, सर्प की फुफकार, नदी और झरने की कलकल, पंछियों का कलरव आदि ध्वनियों के साथ मनुष्य की विविध अनुभूतियाँ जुड़ती गईं। क्रमश: ध्वनियों को जोड़ने और पुनरावृत्ति करने (दोहराने) से प्राप्त लयात्मक आनंद ने गुनगुनाने, गाने और सुनाने के युग को जन्म दिया। ध्वनियों के साथ अर्थ संयुक्त होने पर सार्थक गीत ने जन्म लिया। शिकार युग में पशुओं की उपस्थिति की सूचना अपने साथियों और अन्य मानव समूहों तक पहुँचाकर उन्हें सतर्क करने, पशुपालन काल में भय को भगाने तथा कृषि युग में पंनछी उड़ने और अकेलापन मिटाने के लिए निरर्थक और सार्थक ध्वनियों को मानव ने अपनाया। बढ़ते सार्थक शब्द भंडार ने खेतिहरों और मजदूरों के आदिम लोकगीतों को जन्म दिया जो परिष्कृत होकर 'बम्बुलिया, सरगोड़ासनी' आदि के रूप में आज भी ग्राम्यांचलों में गाए जाते हैं। ऋतु परिवर्तन ने कजरी, राई आदि और पर्व-त्योहारों ने दीवारी, जस, भगतें आदि लोकगीतों को लोक कंठ में बसा दिया। जन्म, विवाह, मरण आदि से सोहर,जच्चा गीत, बन्ना-बन्नी, विदाई गीत आदि का प्रचलन हुआ। धार्मिक क्रियाओं ने आरती, भजन, प्रार्थना आदि का विकास किया।

हिंदी गीत

प्राकृत और अपभृंश की पीठिका पर विकसित खड़ी बोली (आधुनिक हिंदी) ने लोक में व्याप्त वाचिक परंपरा के साथ-साथ प्राकृत, अपभृंश और संस्कृत के छंदों का प्रयोग कर गीत परंपरा को आगे बढ़ाया। वीरगाथा काल में पराक्रमी नायकों के अतिरेकी शौर्य-वर्णन से भरे गाथा काव्यों, रासो आदि में गीत का रूप 'आल्हा' आदि में सीमित था। भक्ति काल में गीत को विषय और कथ्य की दृष्टि से वैविध्यपूर्ण समृद्धता प्राप्त हुई। भक्त कवियों ने प्रार्थना, वंदना, भजन, स्तुति, जस, आरती, पद आदि की रचना की। ज्ञानाश्रयी और प्रेमाश्रयी भावधाराओं ने, निर्गुण-और सगुण पंथों ने, वैष्णव, शाक्त, गाणपत्य आदि उपासना पद्धतियों ने, बौद्ध, जैन, सिक्ख आदि पंथों ने अपने इष्ट और गुरुओं की प्रशंसा में गीत का बहुआयामी विकास किया। रीतिकाल में श्रृंगारपरक साहित्य को प्रधानता मिली और इस काल का गीत साहित्य भी लावण्यमयी नायिकाओं के नख-शिख वर्णन को अपना साध्य मान बैठा। लोकगीतों की धुनों और छंदों का विद्वानों ने अनुशीलन कर उनकी ध्वन्यात्मक आवृत्तियों और उच्चारों की गणना कर मात्रिक-वार्णिक छंदों में वर्गीकृत कर पिंगल (छंद शास्त्र) का विकास किया। गीत पहले या छंद? यह प्रश्न मुर्गी पहले या अंडा की तरह निरर्थक है। यह निर्विवाद है कि लयात्मक ध्वनियों की आवृत्ति पहले लोक में की गई। ध्वनियों के लघु-गुरु उच्चारों को 'मात्रा' और विशिष्ट मात्रा समूह को पिंगल में 'गण' कहा गया। 'मात्रा' और 'गण' की गणना ने छंद वर्गीकरण को जन्म दिया।

आधुनिक साहित्यिक गीत का विकास

आधुनिक काल में लोकभाषाओँ में व्याप्त गीतों के साथ-साथ शिक्षित साहित्यिक गीतकारों ने सामयिक परिस्थितियों, विडंबनाओं और विसंगतियों को भी गीत का कथ्य बनाना आरंभ किया। भाषा और शिक्षा का विकास होने पर अब रचनाकार पूर्व ध्वनियों का स्वानुकरण न कर किताबों में उन ध्वनियों के सूत्र देखकर रचने का प्रयास करता है। इस कारण 'आशुकवि' समाप्तप्राय हैं। अब गीत का रचनाकर्म 'स्वाभाविक' कम और 'गणितीय' या 'यांत्रिक' अधिक होने लगा है। इस कारण आनुभूतिक सघनता का ह्रास हो रहा है। आनुभूतिक सघनता कम होने से गीत में 'सरसता' कम और 'तार्किकता' अधिक होने लगी। 'भावना' को कम 'अनुभूति' को अधिक महत्व मिला। भावनात्मक उड़ान वायवी होने लगी तो 'दिल' की जगह 'दिमाग' ने ली और गीत के प्रति जनरुचि घटी। साहित्यिक मठाधीशी और अमरत्व की चाह ने गीत को 'आम' से काटकर 'ख़ास' से जोड़ने का कर गीत का अहित किया और तथाकथित प्रगतिवादियों ने गीत के मरने की घोषणा कर, गीतकारों को आत्मावलोकन, आत्मालोचन और आत्मोन्नयन के पथ पर चलने की प्रेरणा देकर गीत को पुनर्जीवन दे दिया। लक्ष्य पाठकों / श्रोताओं को चिह्नित कर गीत को लोक गीत, बाल गीत, ग्राम्य गीत आदि विशेषण मिले तो कथ्य देखते हुए पर्व गीत, ऋतु गीत (सावन गीत, चैती गीत आदि), मौसमी गीत, सांध्य गीत आदि नाम दिए गए। उद्देश्य की भिन्नता ने गीत को आह्वान गीत, प्रयाण गीत, जागरण गीत, क्रांति गीत शीर्षकों से अलंकृत किया। रीति-रिवाजों ने गीत को सोहर गीत, बन्ना गीत, विवाह गीत, ज्योनार गीत, विदाई गीत आदि के रूप में सजाया-सँवारा। आकारिक भिन्नता को लेकर लंबा गीत, लघु गीत आदि नाम दिए गए। गीत में कथ्य और शिल्प में नवता के आग्रह ने 'गीत' को नवगीत' के विशेषण से अलंकृत कर दिया।

संस्कारधानी में आधुनिक गीतधारा

सनातन सलिला नर्मदा के तट पर बसी संस्कारधानी जबलपुर से जुड़े गीतकारों की परंपरा में ठाकुर जगमोहन सिंह, माखनलाल चतुर्वेदी, ठाकुर लक्ष्मण सिंह चौहान, रामानुजलाल श्रीवास्तव 'ऊँट बिलहरीवी', महीयसी महादेवी वर्मा, सुभद्राकुमारी चौहान, केशवप्रसाद पाठक, ज्वालाप्रसाद ज्योतिषी, भवानीप्रसाद तिवारी, नर्मदाप्रसाद खरे, गोविंदप्रसाद तिवारी, माणिकलाल चौरसिया 'मुसाफिर', रामेश्वर शुक्ल 'अंचल', पन्नालाल श्रीवास्तव 'नूर', डॉ. चंद्रप्रकाश वर्मा, जवाहरलाल चौरसिया 'तरुण', श्रीबाल पाण्डे, इंद्रबहादुर खरे, रामकृष्ण श्रीवास्तव, सुमन कुमार नेमा 'राजीव', राजकुमार 'सुमित्र', राजेंद्र 'ऋषि', ब्रजेश माधव, मनोरमा तिवारी, श्याम श्रीवास्तव, कृष्णकुमार चौरसिया 'पथिक', धर्मदत्त शुक्ल व्यथित, आचार्य भागवत दुबे, जय प्रकाश श्रीवास्तव, सुरेश कुशवाहा 'तन्मय', गोपालकृष्ण चौरसिया मधुर', अंबर प्रियदर्शी, साधना उपाध्याय, डॉ. अनामिका तिवारी, उदयभानु तिवारी 'मधुकर', आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', मनोहर चौबे आकाश, अभय तिवारी, सोहन परोहा, आशुतोष 'असर', बसंत शर्मा, मिथलेश बड़गैया, अविनाश ब्यौहार, विनीता श्रीवास्तव, रानू राठौड़ 'रूही', छाया सक्सेना आदि उल्लेखनीय हैं।

गीत नर्मदा निनादित

नर्मदांचल में 'गीत' को 'गीत' मानकर ही रचा गया है। 'नवगीत' आंदोलन को इस अंचल ने नहीं अपनाया। शहडोल से लेकर खंडवा-खरगोन तक गीत में नर्मदा का कलकल निनाद ही निरंतर गुंजित होता रहा है। कटनी में राम सेंगर जी के मार्गदर्शन में आनंद तिवारी, राजा अवस्थी, रामकिशोर दाहिया तथा सतना में भोलानाथ ने नवगीत को पल्लवित करने का प्रयास किया पर वह सीमित दायरे में ही रहा। जबलपुर में विश्ववाणी हिंदी संस्थान अभियान के तत्वावधान में गीत-नवगीत के विवाद को दरकिनार कर समन्वय का प्रयास अपेक्षाकृत अधिक सफल रहा। संजीव वर्मा 'सलिल', जयप्रकाश श्रीवास्तव, सुरेश 'तन्मय', बसंत शर्मा, अविनाश ब्यौहार, विजय बागरी, मिथलेश बड़गैया, अखिलेश खरे, विनीता श्रीवास्तव, छाया सक्सेना, राजकुमार महोबिया, हरिसहाय पांडे  आदि ने गीत को गीतात्मकता के साथ स्वीकार करते हुए गीत में ही नवगीतीय तत्वों को अपनी शैली की तरह समाहित कर लिया। अविनाथ ब्योहार लघु गीतों की अपनी भिन्न शैली विकसित करने हेतु प्रयासरत हैं। संजीव वर्मा 'सलिल' ने नवगीतीय रचनाओं में बुंदेली शब्दावली, बुंदेली लोकगीतों (फाग, आल्हा, कजरी, राई आदि) का सम्मिश्रण करने के अनेक अभिनव प्रयोग किये जिनमें आगे कार्य करने की पर्याप्त सम्भावना है।

मिथलेश के लिए गीत साहित्य की विधा मात्र नहीं अपितु मनोभावों के प्रगटीकरण का माध्यम भी है। उन्हें गीतों के सान्निध्य में रक्त संचार बढ़ता सा लगता है जो ह्रदय गति तीव्र कर देता है-

मन के कोरे पृष्ठों पर गीतों की प्यास लिखें
शब्द-शब्द रस छंद भाव सुरभित अनुप्रास लिखें
जिन गीतों को पढ़कर दिल की धड़कन रोज बढ़ी
जिन गीतों को पढ़कर मन में मूरत एक गढ़ी
उन गीतों में गुँथे हुए पावन अनुप्रास लिखें

'प्रेम की भगीरथी'

'प्रेम की भगीरथी' अभियान जबलपुर की उपाध्यक्ष, कोकिलकंठी गीतकार, नवाचारी शिक्षिका मिथलेश बड़गैया का प्रथम गीत-नवगीत संग्रह है। मिथलेश को अन्य रसों की तुलना में श्रृंगार रस अधिक प्रिय है। इस संक्रमण काल में जब विघटनकारी और विनाशकारी शक्तियाँ सामाजिक और पारिवारिक ताने-बाने को तोड़ रही हैं, जब स्त्री विमर्श के नाम पर बदन दिखाऊ कपड़ों और एकाधिक अथवा विवाहपूर्व दैहिक संबंधों को तथाकथित प्रगतिशीलता का पर्याय समझकर गीत रचा जा रहा है, तब गीतों में पत्नी द्वारा पति को प्रेमी की तरह और पति द्वारा पत्नी को प्रेमिका की तरह चाहने की पावन भावना नव पीढ़ी को संयमित-संस्कारित करने में महती भूमिका का निर्वहन कर सकती है। इन गीतों में श्रृंगार के दोनों रूप मिलन और विरह का मर्यादित, शालीन और रुचिकर शब्दांकन कर सकना कवयित्री की सामर्थ्य का परिचायक है।

राधा ने मन के दर्पण पर राधेश्याम लिखा
फिर आँखों के काजल से उस पर घनश्याम लिखा
*
ओ मेरे परदेसी प्रियतम! तुम कब आओगे?
प्रेम सुधा बरसाकर तुम कब धीर बँधाओगे?
सूख गयी मेरे अन्तस् की रसवंती सरिता
फूलोंवाली क्यारी सूखी, रोती है कविता
उमड़-घुमड़ आकर कब मेरी प्यास बुझाओगे?
*
आते ही मधुमासी मौसम, सुरभित वसुंधरा नभ दिगंत
वासंती सुषमा की छवियाँ, अद्भुत आकर्षक कलावंत
कलियों को मधुकर चूम रहे, षोडशी धरा मुस्काती है
मधुप्रीत धरा छलकाती है
*
शब्द गुणों के फूल खिले हैं, अर्थों की क्यारी-क्यारी
संधि-समासों से अभिसिंचित कथ्य भाव की फुलवारी
शब्द आज माधुर्य बिखेरें काव्य धरा के सिंचन में
गीत सुंदरी धीरे-धीरे उतरी मन के आँगन में
*

प्रेम की भागीरथी में ऐसी अनेक प्रांजल अभिव्यक्तियाँ पाठक के मन को स्पर्श कर प्रफुल्लित करने में समर्थ हैं। समयाभाव और अर्थाभाव के कारण मुरझाए और तनावग्रस्त चेहरों से त्रस्त इस समय के अधरों पर ऐसे गीत, ग्रीष्म की लू के बीच शीतल मलयजी बयार के झोंके की तरह रसानंद की जयकार गुँजाते हुए पाठक / श्रोता के चेहरे पर सुख की प्रतीति अंकित करने में समर्थ हैं। इन गीतों को पढ़कर शालेय छात्र अपना शब्द भंडार और शब्द प्रयोग सामर्थ्य में अभिवृद्धि कर समृद्ध हो सकते हैं। 

विरह श्रृंगार के गीतों में अन्तर्निहित करुणा और पीड़ा का शब्द चित्रण किसी भी गीतकार की कसौटी है। मिथलेश के गीत इस कसौटी पर खरे उतरते हैं। इनमें 'मैं तो राम विरह की मारी / मेरी मुँदरी हो गई कंगना' जैसी नाटकीयता या अतिशयोक्ति न होकर स्वाभाविकता तथा यथार्थपरकता अधिक है-

चार दिनों का साथ हमारा राहें बदल गईं
चार दिनों में दिल की सारी हसरत निकल गई
साथ निभाने में मैं-तुम, दोनों नाकाम लिखें
विरह वेदना की पाती कब तक अविराम लिखें

देश के सीमा की रक्षा कर रहे सैनिक की अपनी पत्नी के नाम पाती में प्यार और त्याग के गंगो-जमुनी रंग इस तरह मिले हैं कि वाह और आह एक साथ ही निकाले बिना रहा नहीं जाता-

सुधियों के जंगल में खोकर, कभी न अश्रु बहाना तुम
नित मेरा प्रतिरूप देखकर, अपना मन बहलाना तुम

विश्ववाणी हिंदी संस्थान अभियान जबलपुर की कार्यशालाओं में निरंतर छंदों का अध्ययन, गीतों का सृजन व पाठनकर मिथलेश ने कथ्य की अभिव्यक्ति, शब्द के सम्यक प्रयोग और 'लय' को साधने का प्रयास किया है। सतत सीखने की प्रवृत्ति ने उनके लेखन को दिशा, गति और धार दी है। स्वास्थ्य प्रणीत बाधाओं के बाद भी वे निरंतर कुछ नया सीखने के लिए तत्पर रही हैं। वे सम-सामायिक वर्तमान को गतागत के मध्य सेतु स्थापना के लिए प्रयोग करती हैं। उनके गीतों में परंपरा के प्रति आग्रह तो है किंतु वह परिवर्तन की राह में बाधक नहीं, अपितु साधक होते हुए भी परिवर्तन को बेलगाम और दिशाहीन होने से बचाने के लिए सहायक है।

देवार्चन की सनातन परंपरा का निर्वहन विघ्नेश्वर गणेश, बुद्धिदात्री सरस्वती, भारत माता तथा मध्य प्रदेश की माटी की वंदना कर किया गया है। लोकगीत शैली में देवी गीत मन भाता है। स्पष्ट है कि गीतकार किसी एक इष्ट और वैचारिक प्रतिबद्धता की संकीर्ण विचारधारा में कैद न रहकर सर्व धर्म समभाव के औदार्य पथ का पथिक है।  

राष्ट्र के प्रति प्रेम, समर्पण और बलिदान की भावनाओं से पूरित प्रेरणा गीत, आह्वान गीत आदि इस संग्रह को बहुरंगी बनाते हैं। ऐसे गीतों में समसामयिक परिस्थजियों का चित्रण स्वाभाविक, सहज और संतुलित है।

मर्यादाएँ ध्वस्त हो रहीं, फिर धरती पर आओ राम!
मूल्यों का उत्थान करो फिर धर्मध्वजा फहराओ राम!

इस गीत में नारी के सम्मान , समाज में बढ़ती वासना वृत्ति, अहंकारी सत्ता, वृद्धों को आश्रम पहुँचाती पीढ़ी आदि पर चिंता व्यक्त करती कवयित्री शबरी की निष्काम भक्ति और मूल्यों के नवोत्थान हेतु प्रार्थना कर रचना को समाजोपयोगी बना देती है।

नवपीढ़ी का आह्वान करते हुए आघात सहने, सूर्य से अनुशासन का पाठ पढ़ने तथा दीपक की तरह जलने की सीख समाहित है-

हर पत्थर की अपनी किस्मत, हर प्रयत्न का अपना लेखा
शिल्पकार की छेनी ने तो सबको परखा, सबको देखा
मंदिर की मूरत बनने को, चोट हजारों सहना होगा।
*
कैसा भी हो गहन अँधेरा, रथ सूरज का रोक न पाता
दुश्मन हो मजबूत भले ही, दृढ़ता सम्मुख झुक जाता
कोरोना पर मानवता की होनेवाली जीत बड़ी है

इन गीतों में तत्सम (संस्कृत से ज्यों के त्यों लिए गए शब्द - स्वप्न, अमिय, नर्मदा, ध्वस्त, निष्प्राण, निष्काम, दर्प, कुंदन, उन्नत, श्रम सीकर, झंकृत, माधुर्य, दर्शन, दर्पण, निर्मल, शर्वाणी, उत्कर्ष, तव, दुर्बुद्धि, जिह्वा, चर्या, आदि), तद्भव (संस्कृत शब्दों से उत्पन्न शब्द - बिसरा, माटी, परस, सूखी, मूरत, मृत्यु, अगन, सनीचर, सपना, सावन, मूरत, आदि), देशज या ग्राम्य (खों, सेंदुर, कबहुँ, देवन, भक्तन, बिलानी आदि) ही नहीं हिन्दीतर विदेशी भाषाओँ फ़ारसी (कागज, खुशहाल, दस्तावेज, बुनियाद, मौत, रोशन आदि), अरबी (कदम, किस्मत, खंजर, तूफान, नजर, फ़ौज आदि), अंग्रेजी (मैडम, मम्मी, मोबाइल, पापा, विडिओ, टीचर, डिजिटल आदि) के शब्दों का भी प्रयोग यथास्थान किया गया है। विदेशी शब्दों का प्रयोग करते समय कहीं-कहीं हिंदी की आवश्यकतानुसार रूपांतरण भी किया गया है। यथा - अरबी - (कर्ज से कर्जा, मुआफ से माफ़, ), फ़ारसी (दरख्वास्त से दरखास्त)। हिन्दीतर भारतीय भाषा-बोलिओं के शब्दों की अनुपस्थिति खलती है। न जाने क्यों हिंदी साहित्यकार विदेशी शब्दों और काव्य-विधाओं (हाइकु, सॉनेटम आदि) को तो आत्मसात कर लेते हैं पर हिन्दीतर भारतीय भाषा-बोलिओं के शब्दों व काव्य-विधाओं से दूर रहे आते हैं? संभवत: इसका कारण शिक्षा प्रणाली व पाठ्यक्रम है।  

गीतों में आनुप्रासिक माधुर्य वृद्धि के लिए मिथलेश ने पारंपरिक शब्द युग्मों (चरण-शरण, रिद्धि-सिद्धि, पुरुष-प्रकृति, सांझ-सवेरे, लड्डू-पेड़ा, रस-छंद, मैं-तुम, आरोहों-अवरोहों, प्रीति-रीति, बुद्धि-बल, राम-नाम, जन-धन, मात-पिता, छल-छंदों, उमड़-घुमड़, तन-मन, यति-गति,चाँद-सितारे, चकवा-चकवी, रूखी-सुखी, श्रम-सीकर, यति-गति, माया-जाल, छल-छंदों, निश-दिन, पल-छिन, हरी-भरी, मेल-जोल आदि) का प्रयोग करने के साथ-साथ कुछ नए शब्द-युग्म (फागुन-मधुमास, हास-विहास, प्रणय-पीर, संधि-समासों, नीरस-नीरव, भाव-व्यंजना, सरल-सरस आदि) भी गढ़े हैं। इन शब्द युग्मों के अनेक प्रकार हैं। इनमें मानवीय रिश्ते-नाते, रीति-रिवाज, प्रकृति के घटनाक्रम, मौसम, पशु-पक्षी, काव्य शास्त्र के तत्व, प्रभु नाम आदि का प्रयोग होता है। कभी प्रथमार्ध अर्थमय है, कभी उत्तरार्ध और कभी दोनों। शब्द युग्म आनुप्रासिकता में वृद्धि करने के साथ-साथ भावार्थ से अनकहा भी कह जाते हैं और अभिव्यक्ति को अधिक प्रभावी बनाते हैं।

शब्दावृत्ति (नित-नित, बलि-बलि, शब्द-शब्द, डगमग-डगमग, गली-गली, रो-रो, कण-कण, गीला-गीला, नजर-नजर, दफ्तर-दफ्तर, देख-देख, धीरे-धीरे, क्यारी-क्यारी, रुनझुन-रुनझुन, श्वास-श्वास, राम-राम, मरी-मरी, खरी-खरी, डरी-डरी, भरी-भरी आदि) का प्रयोग किसी बात पर बल देने के साथ-साथ आलंकारिकता और गेयता की वृद्धि हेतु किया जाता है। जब काव्य पंक्ति में किसी शब्द की पुनः उक्ति (दोबारा कथन) समान अर्थ में हो तो वहाँ पुनरुक्ति अलंकार होता है। जैसे 'भाई-भाई को लड़वाकर / उनका अन्न पचे', 'कदम-कदम पर अँधियारे के / अजगर डेरा डाले', 'विरह अग्नि में तिल-तिल जलती / सीता की मृदु काया है' आदि।

अनुप्रास अलंकार मिथिलेश को विशेष प्रिय है। उन्होंने अनुप्रास अलंकार के सभी प्रकारों छेकानुप्रास, वृत्यानुप्रास, अन्त्यानुप्रास, श्रुत्यानुप्रास तथा लाटानुप्रास का प्रयोग सहजता के साथ किया है। एक-एक उदाहरण देखें-

छेकानुप्रास - क, म, स तथा अ की आवृत्ति
मन के मधुरिम गीत निहारें, ह्रदय-कंत का साँझ-सकारे।
आकुल कितनी अभिलाषाएँ, आज खड़ी हैं बाँह पसारे।।

वृत्यानुप्रास - न की आवृत्ति
नियति नटी नूतन श्रृंगारित

अन्त्यानुप्रास -
कुंदन बनने हेतु कनक को अंगारों पर तपना होगा
शिखर कलश बनने से पहले बुनियादों में खपना होगा

श्रुत्यानुप्रास - एक वर्ग के वर्णों की आवृत्ति
नित्य नदी की तरह जिंदगी / तूफानों से टकराती

लाटानुप्रास - शब्द / शब्द समूह की आवृत्ति
अग्नि परीक्षा देकर सीता / सीता मैया कहलाती है

गीत पंक्तियों में मुहावरों का सार्थक प्रयोग गीत के लालित्य और चारुत्व की वृद्धि करता है। मिथलेश ने मुहावरों का प्रयोग कुशलतापूर्वक किया है -

होंगे पीले हाथ / किस तरह / चिंता हुई सनीचर 
रूखी-सूखी / खाकर मुनिया / कंधों तक हो आई 
पति-पत्नी के बीच बनी जो, खाई कभी न पट पाई   
एक बार धुलते ही उतरी  / सारे रिश्तों की रंगत 
विपदाएँ ही आज मनुज के / सर पर चादर तान रही हैं 

सामाजिक विसंगतियाँ मिथलेश के गीतों के केंद्र में हैं। नवगीतीय शिल्प की सभी रचनाओं में विडंबनाओं, अन्यायो तथा कुरीतियों के प्रति उनका आक्रोश छलकता है- 

तन से तो उजले दिखते हैं 
लेकिन मन के काले। 
कदम-कदम पर अँधियारे के 
अजगर डेरा डाले।।
*
लच्छेदार भाषणों से अब 
जनता ऊब गई। 
जुमलेबाजी सच्चाई की 
इज्जत लूट गई।.  
पाँच वर्ष झूठे किस्सों की 
लंबी फसल पकी। 
मौलिक अधिकारों को मन की 
बातों की थपकी। 
रहत सामग्री की गाड़ी 
असमय छूट गई। 
*
बहती नदी 
योजनाओं की  
जाने कहाँ बिलानी?
कहाँ दबी है 
कर्जा माफी की  
दरखास्त पुरानी?
तीन पीढ़ियों 
का उधार है   
दुखीराम के सर पर 
*
पकी फसल कट जाने पर भी 
कृषक नहीं मुसकाता है 
साहूकारों की नजरों को 
देख-देख डर जाता है 
उसकी किस्मत घाम लिखे या
हाड़ कँपाता शीत लिखे 
*
चारों ओर बिछी है चौसर 
छल-स्वारथ के पाँसे 
अपनों से ही मिली यातना 
कदम-कदम पर झाँसे
लाश भरोसे की भारी है 
काँधा कौन लगाए?
*
कब तक भेदभाव की खाई 
खोदेगी धृतराष्ट्र व्यवस्था?
नहीं सुरक्षित आज द्रौपदी 
गली-गली में हैं दु:शासन। 
मासूमों को मिली यातना 
हिला नहीं है दिल्ली-आसन 
कब तक कुंभकरण की नींदें 
सोएगी धृतराष्ट्र व्यवस्था?

मिथलेश देख पाती हैं कि 'राजनीति जननीति नहीं है / कूटनीति है, घोटाला है।' उन्हें विदित है कि 'दीवारों में चुना गया है / बूँद-बूँद श्रम-सीकर।' वे कल से आज तक का अवलोकन कर कहती हैं - 'देवों को हमने मरने की / निष्ठुर सजा सुना दी।' 

नवगीत के तथाकथित मठाधीशी गीतधारा से नर्मदांचल के नवगीतकारों की गीतधारा में भिन्नता कथ्य को लेकर है। नर्मदांचली नवगीतकार कथ्य में सकारात्मकता को महत्व देता है, पारंपरिक नवगीतकार नहीं केवल नकारात्मकता का चित्रण करता है। वह सामाजिक विसंगतियों, पारिवारिक त्रासदियों और व्यक्तिगत कडुवाहट के पिंजरे में नवगीत को कैद रखता है। विश्ववाणी हिंदी संस्थान से जुड़े सभी गीतकार साहित्य में सबका हित समाहित मानते हुए समाज और व्यक्ति में सकारात्मकता की स्थापना को आवश्यक मानते हैं। मिथलेश के गीतों-नवगीतों में राष्ट्रीयता, मानवता, सामाजिक-पारिवारिक मूल्यों के प्रति सजगता बरती गई है। वे विसंगति का संकेत संगति की महत्ता बताने के लिए करती हैं। वे पूछती हैं 'विरह वेदना की पाती कब तक अविराम लिखें?' यह प्रश्न व्यक्तिगत नहीं समष्टिगत है। 

द्वापर की घटनाओं को वर्तमान प्रसंगों से जोड़ते हुए वे विवशतावश अन्यायकर्ताओं की जयकार बोलनेवालों की आँखों में भी आँसू पाती हैं- 'दुर्योधन-दु:शासन की है  / जग में जय जयकार / और द्रौपदी के हिस्से में / लाज और प्रतिकार / राजसभा की झुकी हुई हैं / आँखें भरी-भरी।' मिथलेश के लिए गीत मनोरंजन का माध्यम नहीं, सृजन की साधना है - 'साधना के पंथ में, हर गीत है हमराह मेरा।' उनकी  गीत साधना का लक्ष्य 'वेदों की वाणी उच्चारें, अंतर्मन को संत करें' है, आगे वे कहती हैं- 

'अगर लेखनी थमी है तो, उसका कर्ज चुकाएँ हम 
व्यथा-कथा उद्घाटित करने, कवि का धर्म निभाएँ हम' 

क्या कवि का धर्म केवल व्यथा-कथा का उद्घाटन है? मिथलेश ऐसा नहीं मानतीं। उनके अनुसार -

'अपने हाथों / अपनी किस्मत / गढ़ना सीख / रही हूँ मैं। 
धीरे-धीरे / बिना सहारे / चलना सीख।  रही हूँ मैं।' 

क्या इसका आशय यह है कि कविकर्म का उद्देश्य केवल अपना विकास करना है?  इस प्रश्न का उत्तर है -

'जिंदगी से अब मुखर संवाद होना चाहिए 
प्रेम का पर्यावरण आबाद होना चाहिए'

बात को अधिक स्पष्ट करती हैं निम्न पंक्तियाँ -

सूर्य नहीं तो दीपक बनकर / जग में उजियारा भरना है' 

यह होगा कैसे? इस प्रश्न का उत्तर मिथलेश स्वयं ही अन्यत्र देती हैं-  

'मन का पंछी माँग रहा है / पिंजरे से आजादी' 

प्रतिबंधों के पक्षधरों से मिथलेश का सवाल है - 

'पंछी नदिया और हवा को / सीमाएँ कब टोका करतीं?  
दुनिया  भर की रस्में-कसमें / पथिकों को क्यों रोका करतीं?'

गीतकार के लिए प्रश्न ही उत्तर पाने माध्यम हैं -

'कब तक भेदभाव की खाई / खोदेगी धृतराष्ट्र व्यवस्था?' 

तथा 'कर्तव्यों की सही राह अब / कौन इन्हें दिखलाए?'

गीत रचना का उद्देश्य 'करें पराजित अवसादों को / जीवन गीत सुनाएँ हम' है। यहीं मिथलेश की विचार सरणि तथाकथित नवगीतीय नकारात्मकता को नकार कर सकारात्मकता का वरण कर परिवर्तन हेतु आह्वान करती है -

'दौर अब भी है / अनय की आँधियों का 
साथ मिलकर /  न्याय का डंका बजाओ ....
....कुंडली अपनी / लिखो पुरुषार्थ श्रम से....
....हौसलों की थामकर / पतवार कर में 
आज हर तूफ़ान से आँखें मिलाओ' 

यह तेवर विसंगतिवादी नवगीतकारों में खोजे से भी नहीं मिलता। इस तेवर के बिना नवगीत आंदोलन ही लक्ष्यविहीन हो जाता है। गीत-आंदोलन को उद्देश्यपरकता से जोड़ते हुए मिथलेश ने राष्ट्रीय भावधारापरक गीतों को भी संग्रह में प्रतिष्ठित किया है। देश के प्रति त्याग-बलिदान और समर्पण करनेवाली विभूतियों और शहीदों  गीतों की रचना कर मिथलेश ने नई पीढ़ी के लिए प्रकाश स्तंभ खड़े किए हैं। उनका लक्ष्य बिलकुल स्पष्ट है - 

धाराएँ विपरीत समय की / फिर भी धरा संग बहना है 
अपना देश बचाना हमको / अपने ही घर में रहना है 

वे जानती हैं कि सारस्वत अनुष्ठाओं से शिक्षित-दीक्षित भावी पीढ़ी, राजनैतिक कलुष को धोकर राष्ट्रीयता को मानवता का पर्याय बनते हुए वैश्विकता का भला कर सकेगी। इसीलिए पूरे आत्मविश्वास के साथ मिथलेश का गीतकार घोषणा करता है - 'भारत के उन्नत ललाट पर विजय तिलक लगने वाला है।'

मुझे विश्वास है कि नर्मदा के कलकल निनाद की तरह लयात्मकता और निष्कलुषता से सपन्न इन गीतों-नवगीतों को पाठक न केवल पढ़ेंगे अपितु उनके कथ्य को ग्रहणकर बेहतर भारत और मानव समाज बनाने की दिशा में सक्रिय होंगे। मैं मिथलेश के उज्जवल भविष्य के प्रति आश्वस्त हूँ। 
२०-८-२०२१ 
जबलपुर 
***
संपर्क : विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१
चलभाष ९४२५१८३२४४, ईमेल salil.sanjiv@gmail.com
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मंगलवार, 31 अगस्त 2021

निमाड़ी दोहे

निमाड़ी दोहे
*
सिंदूरी सुभ भोर छे, चटक दुफेरी धूप।
संझा सरस सुहावणी,रात रूपहलो रूप।।
*
खेती बाड़ी बावड़ी, अमरित पाणी सीच।
ठुमका प$ ओरावणी, नाच सयाणी मीच।।
*
सूनी गोद भरावणी, संजा चारइ पूज
बरसूद् या खs लावणी, हिवड़ा कहीं न दूज
*
दाणी मइया नरबदा, पाणी अमरित धार
माणी घऊँ जुआर दs, धाणी जीवन सार।।
*
सांस-सांस मं$ हर घड़ी,अमर प्यार का बोल
परकम्मा कर पुन्न लइ, चल्या टोळ का टोळ।।
३१-८-२०२० 
*

बुन्देली दोहे

बुन्देली दोहे
महुआ फूरन सों चढ़ो, गौर धना पे रंग।
भाग सराहें पवन के, चूम रहो अँग-अंग।।
मादल-थापों सॅंग परे, जब गैला में पैर।
धड़कन बाॅंकों की बढ़े, राम राखियो खैर।।
हमें सुमिर तुम हो रईं, गोरी लाल गुलाल।
तुमें देख हम हो रए, कैसें कएॅं निहाल।।
मन म्रिदंग सम झूम रौ, सुन पायल झंकार।
रूप छटा नें छेड़ दै, दिल सितार कें तार।।
नेह नरमदा में परे, कंकर घाईं बोल।
चाह पखेरू कूक दौ, बानी-मिसरी घोल।।
सैन धनुस लै बेधते, लच्छ नैन बन बान।
निकरन चाहें पै नईं, निकर पा रए प्रान।।
तड़प रई मन मछरिया, नेह-नरमदा चाह।
तन भरमाना घाट पे, जल जल दे रौ दाह।।
अंग-अंग अलसा रओ, पोर-पोर में पीर।
बैरन ननदी बलम सें, चिपटी छूटत धीर।।
कोयल कूके चैत मा, देख बरे बैसाख।
जेठ जिठानी बिन तपे, सूरज फेंके आग।।
३१-८-२०१९ 

आनुप्रासिक द्विपदी

आनुप्रासिक द्विपदी
*
भूल भुलाई, भूल न भूली, भूलभुलैयां भूली भूल.
भुला न भूले भूली भूलें, भूल न भूली भाती भूल.
३१-८-२०१७ 
*

एकाक्षरी दोहा

एकाक्षरी दोहा
*
न नोननुन्नो नुन्नोनो नाना नानानना ननु|
नुन्नोअ्नुन्नो ननुन्नेनो नानेना नुन्ननुन्ननुत||
अर्थ बताएँ.
महर्षि भारवि, किरातार्जुनीयम में.
*

माहिया, हाइकु

माहिया
फागों की तानों से
मन से मन मिलते
मधुरिम मुस्कानों से
*
ककुप
मिल पौधे लगाइए
वसुंधरा हरी-भरी बनाइये
विनाश को भगाइए
*
हाइकु
गाओ कबीर
बुरा न माने कोई
लगा अबीर
.

दोहा, द्विपदी

दोहा 
वीणा की झंकार में, सच है अन्तर्व्याप्त
बहरों के संसार में, व्यर्थ वचन हैं आप्त
*
द्विपदियों में कल्पना
*
कल्पना की विरासत जिसको मिली
उस सरीखा धनी दूजा है नहीं
*
कल्पना की अल्पना गृह-द्वार पर
डाल देखो सुखों का हो सम्मिलन
*
कल्पना की तूलिका, रंग शब्द के
भाव चित्रों में झलकती ज़िन्दगी
*
कल्पना उड़ चली फैला पंख जब
सच कहूँ?, आकाश छोटा पड़ गया
*
कल्पना कंकर को शंकर कर सके
चाह ले तो कर सके विपरीत भी
*
कल्पना से प्यार करना है अगर
आप अवसर को कभी मत चूकिए
*
कल्पना की कल्पना कैसे करे?
प्रश्न का उत्तर न खोजे भी मिला
*
कल्पना सरिता बदलती रूप नित
कभी मन्थर, चपल जल प्लावित कभी
*
कल्पना साकार होकर भी विनत
'सलिल' भट नागर यही है, मान लो
*
कल्पना की शरण जा कवि धन्य है
गीत दोहे ग़ज़ल रचकर गा सका
*
कल्पना मेरी हक़ीक़त हो गयी
नर्मदा अवगाह कर सुख पा लिया
*
कल्पना को बाँह में भर, चूमकर
कोशिशों ने मंज़िलें पायीं विहँस
*
कल्पना नाचीज़ है यह सत्य है
चीज़ तो बेजान होती है 'सलिल'
*
३१-८-२०१६

मुक्तिका

मुक्तिका:
संजीव 'सलिल'
*
ये शायरी जबां है किसी बेजुबान की.
ज्यों महकती क्यारी हो किसी बागबान की..

आकाश की औकात क्या जो नाप ले कभी.
पाई खुशी परिंदे ने पहली उड़ान की..

हमको न देखा देखकर तुमने तो क्या हुआ?
दिल ले गया निशानी प्यार के निशान की..

जौहर किया या भेज दी राखी अतीत ने.
हर बार रही बात सिर्फ आन-बान की.

उससे छिपा न कुछ भी रहा कह रहे सभी.
किसने कभी करतूत कहो खुद बयान की..

रहमो-करम का आपके सौ बार शुक्रिया.
पीछे पड़े हैं आप, करूँ फ़िक्र जान की..

हम जानते हैं और कोई कुछ न जानता.
यह बात है केवल 'सलिल' वहमो-गुमान की..
३१-८-२०११  

गीत: आपकी सद्भावना में

गीत:
आपकी सद्भावना में...
संजीव 'सलिल'
*
आपकी सद्भावना में कमल की परिमल मिली.
हृदय-कलिका नवल ऊष्मा पा पुलककर फिर खिली.....
*
उषा की ले लालिमा रवि-किरण आई है अनूप.
चीर मेघों को गगन पर है प्रतिष्टित दैव भूप..
दुपहरी के प्रयासों का करे वन्दन स्वेद-बूँद-
साँझ की झिलमिल लरजती, रूप धरता जब अरूप..
ज्योत्सना की रश्मियों पर मुग्ध रजनी मनचली.
हृदय-कलिका नवल आशा पा पुलककर फिर खिली.....
*
है अमित विस्तार श्री का, अजित है शुभकामना.
अपरिमित है स्नेह की पुष्पा-परिष्कृत भावना..
परे तन के अरे! मन ने विजन में रचना रची-
है विदेहित देह विस्मित अक्षरी कर साधना.
अर्चना भी, वंदना भी, प्रार्थना सोनल फली.
हृदय-कलिका नवल ऊष्मा पा पुलककर फिर खिली.....
*
मौन मन्वन्तर हुआ है, मुखरता तुहिना हुई.
निखरता है शौर्य-अर्णव, प्रखरता पद्मा कुई..
बिखरता है 'सलिल' पग धो मलिनता को विमल कर-
शिखरता का बन गयी आधार सुषमा अनछुई..
भारती की आरती करनी हुई सार्थक भली.
हृदय-कलिका नवल ऊष्मा पा पुलककर फिर खिली.....
३१-८-२०१० 
***

गीत: है हवन-प्राण का

गीत:
है हवन-प्राण का.........
संजीव 'सलिल'
*
है हवन-प्राण का, तज दूरियाँ, वह एक है .
सनातन सम्बन्ध जन्मों का, सुपावन नेक है.....
*
दीप-बाती के मिलन से, जगत में मनती दिवाली.
सुबह-किरणें आ मिटातीं, अमावस की निशा काली..
पूर्णिमा सोनल परी सी, इन्द्रधनुषी रंग बिखेरे.
आस का उद्यान पुष्पा, ॐ अभिमंत्रित सवेरे..
कामना रथ, भावना है अश्व, रास विवेक है.
है हवन-प्राण का..........
*
सुमन की मनहर सुरभि दे, जिन्दगी हो अर्थ प्यारे.
लक्ष्मण-रेखा गृहस्थी, परिश्रम सौरभ सँवारे..
शांति की सुषमा सुपावन, स्वर्ग ले आती धरा पर.
आशुतोष निहारिका से, नित प्रगट करता दिवाकर..
स्नेह तुहिना सा विमल, आशा अमर प्रत्येक है..
है हवन-प्राण का..........
*
नित्य मन्वंतर लिखेगा, समर्पण-अर्पण की भाषा.
साधन-आराधना से, पूर्ण होती सलिल-आशा..
गमकती पूनम शरद की, चकित नेह मयंक है.
प्रयासों की नर्मदा में, लहर-लहर प्रियंक है..
चपल पथ-पाथेय, अंश्चेतना ही टेक है.
है हवन-प्राण का..........
*
बाँसुरी की रागिनी, अभिषेक सरगम का करेगी.
स्वरों की गंगा सुपावन, भाव का वैभव भरेगी..
प्रकृति में अनुकृति है, नियंता की निधि सुपावन.
विधि प्रणय की अशोका है, ऋतु वसंती-शरद-सावन..
प्रतीक्षा प्रिय से मिलन की, पल कठिन प्रत्येक है.
है हवन-प्राण का..........
*
श्वास-सर में प्यास लहरें, तृप्ति है राजीव शतदल.
कृष्णमोहन-राधिका शुभ साधिका निशिता अचंचल..
आन है हनुमान की, प्रतिमान निष्ठा के रचेंगे.
वेदना के, प्रार्थना के, अर्चन के स्वर सजेंगे..
गँवाने-पाने में गुंजित भाव का उन्मेष है.
है हवन-प्राण का..........
३१-८-२०१० 
***

गीत : स्वागत है

गीत :
स्वागत है...
संजीव 'सलिल'
*
पीर-दर्द-दुःख-कष्ट हमारे द्वार पधारो स्वागत है.
हम बिगड़े हैं जनम-जनम के, हमें सुधारो स्वागत है......
*
दिव्य विरासत भूल गए हम, दीनबंधु बन जाने की.
रूखी-सूखी जो मिल जाए, साथ बाँटकर खाने की..
मुट्ठी भर तंदुल खाकर, त्रैलोक्य दान कर देते थे.
भार भाई, माँ-बाप हुए, क्यों सोचें गले लगाने की?..
संबंधों के अनुबंधों-प्रतिबंधों तुम पर लानत है.
हम बिगड़े हैं जनम-जनम के, हमें सुधारो स्वागत है......
*
सात जन्म तक साथ निभाते, सप्त-पदी सोपान अमर.
ले तलाक क्यों हार रहे हैं, श्वास-आस निज स्नेह-समर?
मुँह बोले रिश्तों की महिमा 'सलिल' हो रही अनजानी-
मनमानी कलियों सँग करते, माली-काँटे, फूल-भ्रमर.
सत्य-शांति, सौन्दर्य-शील की, आयी सचमुच शामत है.
हम बिगड़े हैं जनम-जनम के, हमें सुधारो स्वागत है......
*
वसुधा सकल कुटुंब हमारा, विश्व नीड़वत माना था.
सबके सुख, कल्याण, सुरक्षा में निज सुख अनुमाना था..
सत-शिव-सुन्दर रूप स्वयं का, आज हो रहा अनजाना-
आत्म-दीप बिन त्याग-तेल, तम निश्चय हम पर छाना था.
चेत न पाया है तन-मन, दर पर विनाश ही आगत है.
हम बिगड़े हैं जनम-जनम के, हमें सुधारो स्वागत है......
*
पंचतत्व के देवों को हम दानव बनकर मार रहे.
प्रकृति मातु को भोग्या कहकर, अपनी लाज उघार रहे.
धैर्य टूटता काल-चक्र का, असगुन और अमंगल नित-
पर्यावरण प्रदूषण की हर चेतावनी बिसार रहे.
दोष किसी को दें, विनाश में अपने स्वयं 'सलिल' रत हैं.
हम बिगड़े हैं जनम-जनम के, हमें सुधारो स्वागत है......
३१-८-२०१० 
***

गीत पुकार

गीत
पुकार
संजीव 'सलिल'
*
आजा, जल्दी से घर आजा, भटक बाँवरे कहाँ रहा?
तुझसे ज्यादा विकल रही माँ, मुझे बता तू कहाँ रहा?...
जहाँ रहा तू वहाँ सफल था, सुन मैं गर्वित होती थी.
सबसे मिलकर मुस्काती थी, हो एकाकी रोती थी..
आज नहीं तो कल आएगा कैयां तुझे सुलाऊँगी-
मौन-शांत थी मन की दुनिया में सपने बोती थी.
कान्हा सम तू गया किन्तु मेरी यादों में यहाँ रहा.
आजा, जल्दी से घर आजा, भटक बाँवरे कहाँ रहा?
तुझसे ज्यादा विकल रही माँ, मुझे बता तू कहाँ रहा?...
*
दुनिया कहती बड़ा हुआ तू, नन्हा ही लगता मुझको .
नटखट बाल किशन में मैंने पाया है हरदम तुझको..
दुनिया कहती अचल मुझे तू चंचल-चपल सुहाता है-
आँचल-लुकते, दूर भागते, आते दिखता तू मुझको.
आ भी जा ओ! छैल-छबीले, ना होकर भी यहाँ रहा.
आजा, जल्दी से घर आजा, भटक बाँवरे कहाँ रहा?
तुझसे ज्यादा विकल रही माँ, मुझे बता तू कहाँ रहा?...
*
भारत मैया-हिन्दी मैया, दोनों रस्ता हेर रहीं.
अब पुकार सुन पाया है तू, कब से तुझको टेर रहीं.
कभी नहीं से देर भली है, बना रहे आना-जाना
सारी धरती तेरी माँ है, ममता-माया घेर रहीं?
मेरे दिल में सदा रहा तू, निकट दूर तू जहाँ रहा.
आजा, जल्दी से घर आजा, भटक बाँवरे कहाँ रहा?
तुझसे ज्यादा विकल रही मैं, मुझे बता तू कहाँ रहा?...
३१-८-२०१० 
*

गीत मंज़िल मिलने तक

गीत:
मंजिल मिलने तक चल अविचल.....
संजीव 'सलिल'
*
लिखें गीत हम नित्य न भूलें, है कोई लिखवानेवाला.
कौन मौन रह मुखर हो रहा?, वह मन्वन्तर और वही पल.....
*
दुविधाओं से दूर रही है, प्रणय कथा कलियों-गंधों की.
भँवरों की गुन-गुन पर हँसतीं, प्रतिबंधों की व्यथा-कथाएँ.
सत्य-तथ्य से नहीं कथ्य ने तनिक निभाया रिश्ता-नाता
पुजे सत्य नारायण लेकिन, सत्भाषी सीता वन जाएँ.
धोबी ने ही निर्मलता को लांछित किया, पंक को पाला
तब भी, अब भी सच-साँचे में असच न जाने क्यों पाया ढल.....
*
रीत-नीत को बिना प्रीत के, निभते देख हुआ उन्मन जो
वही गीत मनमीत-जीतकर, हार गया ज्यों साँझ हो ढली.
रजनी के आँसू समेटकर, तुहिन-कणों की भेंट उषा को-
दे मुस्का श्रम करे दिवस भर, संध्या हँसती पुलक मनचली.
मेघदूत के पूत पूछते, मोबाइल क्यों नहीं कर दिया?
यक्ष-यक्षिणी बैकवर्ड थे, चैट न क्यों करते थे पल-पल?.....
*
कविता-गीत पराये लगते, पोयम-राइम जिनको भाते.
ब्रेक डांस के उन दीवानों को अनजानी लचक नृत्य की.
सिक्कों की खन-खन में खोये, नहीं मंजीरे सुने-बजाये
वे क्या जानें कल से कल तक चले श्रंखला आज-कृत्य की.
मानक अगर अमानक हैं तो, चालक अगर कुचालक हैं तो
मति-गति, देश-दिशा को साधे, मंजिल मिलने तक चल अविचल.....
३१-८-२०१० 
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सोमवार, 30 अगस्त 2021

निमाड़ी दोहा सलिला

निमाड़ी दोहा सलिला
दोहे
*
सिंदूरी सुभ भोर छे, चटक दुपैरी धूप।
रंगीली संझा सरस, रातs सुहाणो रूप।।
*
खेती बाड़ी बावड़ी, अमरित पाणी सीच
ठुमके पर ओरावणी, नाच सयाणी मीच
*
सूनी गोद भरावणी, संजा चारइ पूज
बरसूद् या खs लावणी, हिवड़ा कहीं न दूज
*
दाणी मइया नरबदा, पाणी अमरित धार
धाणी गऊँ जुआर दs, माणी जीवन सार
*
घड़ी-घड़ी खम्माघणी, अमर प्यार के बोल
परिकम्मा कर पुन्न ले, चलाया टोल का टोल

*

हिंदी ग़ज़ल सुनीता सिंह

-: विश्व वाणी हिंदी संस्थान - समन्वय प्रकाशन अभियान जबलपुर :-
ll हिंदी आटा माढ़िए, उर्दू मोयन डाल l 'सलिल' संस्कृत सान दे, पूड़ी बने कमाल ll
ll जन्म ब्याह राखी तिलक, गृह प्रवेश त्यौहार l 'सलिल' बचा पौधे लगा, दें पुस्तक उपहार ll
*
पुरोवाक
: हिंदी ग़ज़ल की विकास यात्रा और चंद्र कलश :
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
अक्षर, अनादि, अनंत और असीम शब्द ब्रम्ह में अद्भुत सामर्थ्य होती है। रचनाकार शब्द ब्रम्ह के प्रागट्य का माध्यम मात्र होता है।इसीलिए सनातन प्राच्य परंपरा में प्रतिलिपि के अधिकार (कोपी राइट) की अवधारणा ही नहीं है। श्रुति-स्मृति, वेदादि के रचयिता ​मंत्र दृष्टा हैं, ​मंत्र सृष्टा नहीं। दृष्टा उतना ही देख और देखे को बता सकेगा ​जितना बताने की सामर्थ्य या क्षमता ब्रम्ह से प्राप्त होगी। तदनुसार रचनाकार ब्रह्म का उपकरण मात्र है।
रचना कर्म अपने आपमें जटिल मानसिक प्रक्रिया है।कभी दृश्य, ​कभी अदृश्य, कभी भाव​, कभी कथ्य​ रचनाकार को प्रेरित करते हैं कि वह '​स्वानुभूति' को '​सर्वानुभूति' ​बनाने हेतु ​रचना करे। रचना कभी दिल​ ​से होती है​,​ कभी दिमाग से​ और कभी-कभी अजाने भी​। रचना की विधा का चयन कभी रचनाकार अपने मन से करता है​,​ कभी किसी की माँग पर​ और कभी कभी कथ्य इतनी प्रबलता से प्रगट होता है कि विधा चयन भी अनायास ही हो जाता है​। शिल्प व विषय का चुनाव भी परिस्थिति पर निर्भर होता है। किसी चलचित्र के लिए परिस्थिति के अनुरूप संवाद या पद्य रचना ही होगी, लघुकथा, हाइकु या अन्य विधा सामान्यतः उपयुक्त नहीं होगी।
​ग़ज़ल : एक विशिष्ट काव्य विधा
संस्कृत काव्य में द्विपदिक श्लोकों की रचना आदि काल से की जाती रही है। ​संस्कृत की श्लोक रचना में समान तथा असमान पदांत-तुकांत दोनों का प्रयोग किया गया। भारत से ईरान होते हुए पाश्चात्य देशों तक शब्दों, भाषा और काव्य की यात्रा असंदिग्ध है। १० वीं सदी में ईरान के फारस प्रान्त में सम पदांती श्लोकों की लय को आधार बनाकर कुछ छंदों के लय खण्डों का फ़ारसीकरण नेत्रांध कवि रौदकी ने किया। इन लय खण्डों के समतुकांती दुहराव से काव्य रचना सरल हो गयी। इन लयखण्डों को रुक्न (बहुवचन अरकान) तथा उनके संयोजन से बने छंदों को बह्र कहा गया। फारस में सामंती काल में '​तश्बीब' (​बादशाहों के मनोरंजन हेतु ​संक्षिप्त प्रेम गीत) या 'कसीदे' (रूप/रूपसी ​या बादशाहों की ​की प्रशंसा) से ​ग़ज़ल का विकास हुआ। ​'गजाला चश्म​'​ (मृगनयनी, महबूबा, माशूका) से वार्तालाप ​के रूप में ​ग़ज़ल लोकप्रिय होती गई​। फारसी में दक़ीक़ी, वाहिदी, कमाल, बेदिल, फ़ैज़ी, शेख सादी, खुसरो, हाफ़िज़, शिराजी आदि ने ग़ज़ल साहित्य को समृद्ध किया। मुहम्मद गोरी ने सन ११९९ में दिल्ली जीत कर कुतुबुद्दीन ऐबक शासन सौंपा। तब फारसी तथा सीमान्त प्रदेशों की भारतीय भाषाओँ पंजाबी, सिरायकी, राजस्थानी, हरयाणवीबृज, बैंसवाड़ी आदि के शब्दों को मिलाकर सैनिक शिविरों में देहलवी या हिंदवी बोली का विकास हुआ। मुग़ल शासन काल तक यह विकसित होकर रेख़्ता कहलाई। रेख़्ता और हिंदवी से खड़ी हिंदी का विकास हुआ। खुसरो जैसे अनेक क​वि फ़ारसी और हिंदवी दोनों में काव्य रचना करते थे। कबीर जैसे अशिक्षित लोककवि भी फारसी के शब्दों से परिचित और काव्य रचना में उनका प्रयोग करते थे। हिंदी ग़ज़ल का उद्भव काल यही है।​ खुसरो और कबीर जैसे कवियों ने हिंदी ग़ज़ल को आध्यात्मिकता (इश्के हकीकी) की जमीन दी। ​अमीर खुसरो ने गजल को आम आदमी और आम ज़िंदगी से बावस्ता किया।
जब यार देखा नैन भर दिल की गई चिंता उतर
ऐसा नहीं कोई अजब राखे उसे समझाए कर ।
जब आँख से ओझल भया, तड़पन लगा मेरा जिया
हक्का इलाही क्या किया, आँसू चले भर लाय कर । -खुसरो (१२५३-१३२५)
​हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या?
रहे आज़ाद या जग में, हमन दुनिया से यारी क्या?
जो बिछड़े हैं पियारे से, भटकते दर-ब-दर फिरते
हमारा यार है हममें, हमन को इंतजारी क्या? - कबीर ​(१३९८-१५१८)
स्वातंत्र्य संघर्ष कला में हिंदी ग़ज़ल ने क्रांति की पक्षधरता की-
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है जोर कितना बाजू-ए-कातिल में है -रामप्रसाद बिस्मिल
मुग़ल सत्ता के स्थाई हो जाने पर बाजार और लोक जीवन में ​ रेख़्ता ने जो रूप ग्रहण किया थाउसे उर्दू (फारसी शब्द अर्थ बाजार) कहा गया। स्पष्ट है कि उर्दू रोजमर्रा की बाजारू बोली थी। इसीलिये ग़ालिब जैसे रचनाकार अपनी फारसी रचनाओं को श्रेष्ठ और उर्दू रचनाओं को कमतर मानते थे। मुगल शासन दक्षिण तक फैलने के बाद हैदराबाद में उर्दू का विकास हुआ।​ दिल्ली, लखनऊ तथा हैदराबाद में उर्दू की भिन्न-भिन्न शैलियाँ विकसित हुईं। उर्दू ग़ज़ल के जनक वली दखनी (१६६७-१७०७)​ औरंगाबाद में जन्मे तथा अहमदाबाद में जीवन लीला पूरी की। उर्दू में ​सांसारिक प्रेम (इश्क मिजाजी), ​नाज़ुक खयाली​ ही​ गजल का लक्षण ​हो गया।​​
सजन तुम सुख सेती खोलो नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता।
कि ज्यों गुल से निकसता है गुलाब आहिस्ता आहिस्ता।। -वली दखनी
हिंदी ग़ज़ल - उर्दू ग़ज़ल
​गजल का अपना छांदस अनुशासन है। प्रथम द्विपदी में समान पदांत-तुकांत, तत्पश्चात एक-एक पंक्ति छोड़कर पदांत-तुकांत, सभी पंक्तियों में समान पदभार, कथ्य की दृष्टि से स्वतंत्र द्विपदियाँ और १२ लयखंडों के समायोजन से बनी द्विपदियाँ गजल की विशेषता है। गजल के पदों का भार (वज्न) उर्दू में तख्ती के नियमों के अनुसार किया जाता है जो कहीं-कहीं हिन्दी की मात्रा गणना से साम्यता रखता है कहीं-कहीं भिन्नता। गजल को हिन्दी का कवि हिन्दी की काव्य परंपरा और पिंगल-व्याकरण के अनुरूप लिखता है तो उसे उर्दू के दाना खारिज कर देते हैं। गजल को ग़ालिब ने 'तंग गली' और आफताब हुसैन अली ने 'कोल्हू का बैल' इसीलिए कहा कि वे इस विधा को बचकाना लेखन समझते थे जिसे सरल होने के कारण सब समझ लेते हैं। विडम्बना यह कि ग़ालिब ने अपनी जिन रचनाओं को सर्वोत्तम मानकर फारसी में लिखा वे आज बहुत कम तथा जिन्हें कमजोर मानकर उर्दू में लिखा वे आज बहुत अधिक चर्चित हैं। हिन्दी में ग़ज़ल को उर्दू से भिन्न भाव भूमि तथा व्याकरण-पिंगल के नियम मिले। यह अपवाद स्वरूप हो सकता है कि कोई ग़ज़ल हिन्दी और उर्दू दोनों के मानदंडों पर खरी हो किन्तु सामान्यतः ऐसा संभव नहीं। हिन्दी ग़ज़ल और उर्दू ग़ज़ल में अधिकांश शब्द-भण्डार सामान्य होने के बावजूद पदभार-गणना के नियम भिन्न हैं। समान पदांत-तुकांत के नियम दोनों में मान्य हैं। उर्दू ग़ज़ल १२ बहरों के आधार पर कही जाती है जबकि हिन्दी गजल हिन्दी-छंदों के आधार पर रची जाती हैं। दोहा गजल में दोहा तथा ग़ज़ल, हाइकु ग़ज़ल में हाइकु और ग़ज़ल, माहिया ग़ज़ल में माहिया और ग़ज़ल दोनों के नियमों का पालन होना अनिवार्य है। एक बात और अंगरेजी, जापानी, चीनी यहाँ तक कि बांगला, मराठी, या तेलुगु ग़ज़ल पर फ़ारसी-उर्दू के नियम लागू नहीं किए जाते किन्तु हिंदी ग़ज़ल के साथ जबरदस्ती की जाती है। इसका कारण केवल यह है कि उर्दू गज़लकार हिंदी जानता है जबकि अन्य भाषाएँ नहीं जानता। अंग्रेजी की ग़ज़लों में पद के अंत में उच्चारण मात्र मिलते हैं हिज्जे (स्पेलिंग) नहीं मिलते। अंगरेजी ग़ज़ल में pension और attention की तुक पर कोई आपत्ति नहीं होती. डॉ. अनिल जैन के अंग्रेजी ग़ज़ल सन्ग्रह 'ऑफ़ एंड ओन' की रचनाओं में पदांत तो समान है पर लयखंड समान नहीं हैं हैं।
हिंदी वर्णमाला के पंचम वर्ण तथा संयुक्त अक्षर उर्दू में नहीं हैं। प्राण, वाङ्ग्मय, सनाढ्य जैसे शब्द उर्दू में नहीं लिखे जा सकते। 'ब्राम्हण' को 'बिरहमन' लिखना होता है। उर्दू में 'हे' और 'हम्ज़ा' की दो ध्वनियाँ हैं। पदांत के शब्द में किसी एक ध्वनि का ही प्रयोग हो सकता है। हिंदी में दोनों के लिए केवल एक ध्वनि 'ह' है। इसलिए जो ग़ज़ल हिंदी में सही है वह उर्दू के नज़रिये से गलत और जो उर्दू में सही है वह हिंदी की दृष्टि से गलत होगी। दोनों भाषाओँ में मात्रा गणना के नियम भी अलग-अलग हैं। अत: हिंदी ग़ज़ल को उर्दू ग़ज़ल से भिन्न मानना चाहिए। उर्दू में 'इस्लाह' की परंपरा ने बचकाना रचनाओं को सीमित कर दिया तथा उस्ताद द्वारा संशोधित करने पर ही प्रकाशित करने के अनुशासन ने सृजन को सही दिशा दी जबकि हिन्दी में कमजोर रचनाओं की बाढ़ आ गयी।
ग़ज़ल का शिल्प और नाम वैविध्य
समान पदांत-तुकांत की हर रचना को गजल नहीं कहा जा सकता। गजल वही रचना है जो गजल के अनुरूप हो। हिन्दी में सम पदांत-तुकांत की रचनाओं को मुक्तक कहा जाता है। ग़ज़ल में हर द्विपदी अन्य द्विपदियों से स्वतंत्र (मुक्त) होती है इसलिए डॉ. मीरज़ापुरी इन्हें प्रच्छन्न हिन्दी गजल कहते हैं। कुछ मुखपोथीय समूह हिंदी ग़ज़ल को गीतिका कह रहे हैं जबकि गीतिका एक मात्रिक छंद है।विडम्बनाओं को उद्घाटित कर परिवर्तन और विद्रोह की भाव भूमि पर रची गयी गजलों को 'तेवरी' नाम दिया गया है। मुक्तक का विस्तार होने के कारण हिंदी ग़ज़ल को मुक्तिका कहा ही जा रहा है। चानन गोरखपुरी के अनुसार 'ग़ज़ल का दायरा अत्यधिक विस्तृत है। इसके अतिरिक्त अलग-अलग शेर अलग-अलग भावभूमि पर हो सकते हैं। जां निसार अख्तर के अनुसार-
हमसे पूछो ग़ज़ल क्या है, ग़ज़ल का फन क्या?
चंद लफ़्ज़ों में कोई आग छुपा दी जाए।
डॉ. श्यामानन्द सरस्वती 'रोशन' के लफ़्ज़ों में -
जो ग़ज़ल के तक़ाज़ों पे उतरे खरी
आज हिंदी में ऐसी ग़ज़ल चाहिए
हिंदी ग़ज़ल के सम्बन्ध में मेरा मत है-
ब्रम्ह से ब्रम्हांश का संवाद है हिंदी ग़ज़ल
आत्म की परमात्म से फ़रियाद है हिंदी ग़ज़ल
मत गज़ाला चश्म कहन यह कसीदा भी नहीं
जनक जननी छंद-गण औलाद है हिंदी ग़ज़ल
जड़ जमी गहरी न खारिज समय कर सकता इसे
सिया-सत सी सियासत, मर्याद है हिंदी ग़ज़ल
भर-पद गणना, पदान्तक, अलंकारी योजना
दो पदी मणि माल, वैदिक पाद है हिंदी ग़ज़ल
सत्य-शिव-सुंदर मिले जब, सत-चित-आनंद हो
आत्मिक अनुभूति शाश्वत, नाद है हिंदी ग़ज़ल
हिंदी ग़ज़ल प्रवाह में दुष्यंत कुमार, शमशेर बहादुर सिंह नीरज आदि के रूप में एक ओर लोकभाषा भावधारा है तो डॉ. रोहिताश्व अस्थाना, चंद्रसेन विराट, डॉ. अनंत राम मिश्र 'अनंत', शिव ॐ अंबर, डॉ. यायावर आदि के रूप में संस्कारी भाषा परक दूसरी भावधारा स्पष्टत: देखी जा सकती है। ईद दो किनारों के बीच मुझ समेत अनेक रचनाकर हैं जो दोनों भाषा रूपों का प्रयोग करते रहे हैं। सुनीता सिंह की ग़ज़लें इसी मध्य मार्ग पर पहलकदमी करती हैं।
सुनीता सिंह की ग़ज़लें
हिंदी और अंगरेजी में साहित्य सृजन की निरंतरता बनाये रखकर विविध विधाओं में हाथ आजमानेवाली युवा कलमों में से एक सुनीता सिंह गोरखपुर और लखनऊ के भाषिक संस्कार से जुडी हों यह स्वाभाविक है। शैक्षणिक पृष्ठभूमि ने उन्हें अंगरेजी भाषा और साहित्य से जुड़ने में सहायता की है।सुनीता जी उच्च प्रशासनिक पद पर विराजमान हैं। सामान्यत: इस पृष्ठभूमि में अंग्रेजी परस्त मानसिकता का बोलबाला देखा जाता है किन्तु सुनीता जी हिंदी-उर्दू से लगाव रखती हैं और इसे बेझिझक प्रगट करती हैं। हिंदी, उर्दू और अंगरेजी तीनों भाषाएँ उनकी हमजोली हैं। एक और बात जो उन्हें आम अफसरों की भीड़ से जुड़ा करते है वह है उनकी लगातार सीखने की इच्छा। चंद्र कलश सुनीता जी की ग़ज़लनुमा रचनाओं का संग्रह है। ग़ज़लनुमा इसलिए कह रहा हूँ कि उन्होंने अपनी बात कहने के लिए आज़ादी ली है। वे कथ्य को सर्वाधिक महत्व देती हैं। कोई बात कहने के लिए जिस शब्द को उपयुक्त समझती हैं, बिना हिचक प्रयोग करते हैं, भले ही इससे छंद या बह्र का पालन कुछ कम हो। चंद्र कलश की कुछ ग़ज़लों में फ़ारसी अलफ़ाज़ की बहुतायत है तो अन्य कुछ ग़ज़लों में शुद्ध हिंदी का प्रयोग भी हुआ है। मुझे शुद्ध हिंदीपरक ग़ज़लें उर्दू परक ग़ज़लों से अधिक प्रभावी लगीं। सुनीता जी का वैशिष्ट्य यह है की अंगरेजी शब्द लगभग नहीं के बराबर हैं। शिल्प पर कथ्य को प्रमुखता देती हुई ये गज़लें अपने विषय वैविध्य से जीवन के विविध रंगों को समेटती चलती हैं। साहित्य में सरकार और प्रशासनिक विसंगतियों का शब्दांकन बहुत सामान्य है किन्तु सुनीता जी ऐसे विषयों से सर्वथा दूर रहकर साहित्य सृजन करती हैं।
'थोथा चना बाजे घना' की कहावत को सामाजिक जीवन में चरितार्थ होते देख सुनीता कहती हैं-
उसको वाइज़ कहें या कि रहबर कहें।
खुद गुना जो न हमको सिखाता रहा॥
'कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाज़े-बयां और' शायरी में अंदाज़े-बयां ही शायर की पहचान स्थापित करता है। यह जानते हुए सुनीता अपनी बात अपने ही अंदाज़ में इस तरह कहती हैं कि साधारण में असाधारणत्व का दीदार हो-
खाली रहा दिल का मकां वो जब तलक आए न थे।
आबाद उनसे जब हुआ वो खालीपन खोता गया॥
राधा हो या मीरा प्रिय को ह्रदय में बसाकर अभिन्न हे इन्हीं अमर भी हो जाती है। यह थाती सुनीता की शायरी में बदस्तूर मौज़ूद है-
दिल में धड़कन की तरह तुझको बसा रखते हैं।
तेरी तस्वीर क्या देखेंगे जमानेवाले।।
मैं तेरे गम को ही सौगात बना जी लूँगी।
मेरी आँखों को हँसी ख्वाब दिखानेवाले।।
आधुनिक जीवन की जटिलता हम सबके सामने चुनौतियाँ उपस्थित करती है। शायर चुनौतियों से घबराता नहीं उन्हें चुनौती देता है-
हमने जो खुद को थामा, उसका दिखा असर है।
कब हौसलों से सजता, उजड़ा किला नहीं है।।
सचाई की बड़ाई करने के बाद भी आचरण में न अपनाना आदमी की फितरत क्यों है? यह सवाल चिरकाल से पूछा जाता रहा है। बकौल शायर- 'दिल की बात बता देता है, असली नकली चेहरा।' अपनी शक्ल को जैसे का तैसा न रखकर सजावट करने की प्रवृत्ति से सुनीता महिला होने के बाद भी सहमत नहीं हैं-
चेहरे पर चेहरा क्यों लोग रखते हैं लगाकर।
जो दिया रब ने बनावट से छुपा जाते ही क्यों हैं।।
'समय होत बलवान' का सच बयां करती सुनीता कहती हैं कि मिन्नतों से कोई फर्क नहीं पड़ता। जब जो होना है, समय वही करता है।
मिन्नतें लाख हों चाहे करेगा वक्त अपनी ही।
जिसे चाहे बना तूफ़ान का देता निवाला है।।
मुश्किल समय में अपने को अपने आप तक सीमित कर लेना सही रास्ता नहीं है। सुनीता कहती हैं-
तन्हाइयों में ग़म को दुलारा न कीजिए।
रुसवाइयों को अपनी सँवारा न कीजिए।।
अनिश्चितता की स्थिति में मनुष्य के लिए तिनके का सहारा भी बहुत होता है। सीता जी को अशोक वन में रावण के सामने दते रहने के लिए यह तिनका ही सहारा बनता है। 'तृण धर ओट कहत वैदेही, सुमिर अवधपति परम सनेही।' सुनीता उस स्थिति में ईश्वर से दुआ माँगने के लिए हाथ उठाना उचित समझती हैं जब यह न ज्ञात हो कि उजाला कब मिलेगा-
जब नजर कोई नहीं आये कहीं।
तब दुआ में हाथ उठता है वहीं।।
राह में कोई कहाँ ये जानता?
कब मिलेगी धूप कब छाया नहीं?
दुनिया में विरोधाभास सर्वत्र व्याप्त है। एक और मुश्किल में सहारा देनेवाले नहीं मिलते, दूसरी और किसी को संकट से निकलने के लिए हाथ बढ़ाएँ तो वह भरोसा नहीं करता अपितु हानि पहुँचाता है। साधु और बिच्छू की कहानी हम सब जानते ही हैं। ऐसी स्थिति केन मिस्से कब क्या शिकायत की जाए-
किसे अब कौन समझाये, किधर जाकर जिया जाये?
हर तरफ रीत है ऐसी, शिकायत क्या किया जाये?
मनुष्य की प्रवृत्ति तनिक संकट होते ही सहारा लेने की होती है। तब उसकी पूर्ण क्षमता का विकास नहीं हो पाता किन्तु कोई सहारा न होने पर मनुष्य पूर्ण शक्ति के साथ संघर्ष कर अपनी राह खोज लेता है। रहीम कहते हैं-
रहिमन विपदा सो भली, जो थोड़े दिन होय।
हित-अनहित या जगत में जान पड़त सब कोय।।
सुनीता इस स्थिति को हितकारी की पहचान ही नहीं, अपनी क्षमता के विकास का भी अवसर मानती हैं-
कुछ अजब सा मेल पीड़ा और राहत का रहा।
बन्द आँखों से जहाँ सारा मुझे दिखला दिया।।
राह मिल जाती है पाने के सिवा चारा नहीं जब।
पंख खुल जाते हैं उड़ने के सिवा चारा नहीं जब।।
ख्वाबों को पूरा करने की, राह सदा मिल जाती है।
हम पहले अपनाते खुद को, तब दुनिया अपनाती है।।
कुदरत उजड़ने के बाद अपने आप बस भी जाती है। बहार को आना ही होता है-
अब्र का भीना सौंधापन, बाद-ए-सबां की तरुणाई।।
सिम्त शफ़क़ से रौशन हैं, ली है गुलों ने अंगड़ाई।।
सामान्यत: हम सब सुख, केवल सुख चाहते हैं जबकि सृष्टि में सुख बिना दुःख के नहीं मिलता चूंकि दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। शायरा तीखा-मीठा दोनों रस पीना चाहती है-
देख क्षितिज पर खिलती आशा, मैं भी थोड़ा जी जाऊँ।
तीखा-म़ीठा सब जीवन-रस, धीर-धीरे पी जाऊँ।।
कवयित्री जानती है कि दुनिया में कोई किसी का साथ कठिनाई में नहीं देता। 'मरते दम आँख को देखा है की फिर जाती है' का सत्य उससे अनजाना नहीं है। अँधेरे में परछाईं भी साथ छोड़ देती है, यह जानकर भी कवयित्री निराश नहीं होती। उसका दृष्टिकोण यह है कि ऐसी विषम परिस्थिति में औरों से सहारा पाने की की कामना करने के स्थान पर अपना सहारा आप ही बन जाना चाहिए।
भीगे सूने नयनों में, श्रद्धा के दीप जला लेना।
दर्द बढ़े तो अपने मन को, अपना मीत बना लेना।।
समझौतों की वेदी पर, जीवन की भेंट न चढ़ जाये।
बगिया अपनी स्वयं सजा, सतरंगी पुष्प खिला लेना।।
संकल्पों से भार हटाकर खाली अपना मन कर लो।
सरल सहज उन्मुक्त लहर सा अपना यह जीवन कर लो॥
हिंदी ग़ज़ल की विकास यात्रा में चंद्र्कलश न तो मील का पत्थर है, न प्रकाश स्तम्भ किन्तु यह हिंदी गजलोद्यान में चकमनेवाला जुगनू अवश्य है जो ग़ज़ल-पुष्पों के सुरभि के चाहकों को राह दिखा सकता है और जगमगा कर आनंदित कर सकता है। चंद्रकलश की ग़ज़लें सुनीता की यात्रा का समापन नहीं आरम्भ हैं। उनमें प्रतिभा है, सतत अभ्यास करने की ललक है, और मौलिक सोचने-कहने का माद्दा है। वे किसी की नकल नहीं करतीं अपितु अपनी राह आप खोजती हैं। राह खोजने पर ठोकरें लग्न, कंटक चुभना और लोगों का हंसना स्वाभाविक है लेकिन जो इनकी परवाह नहीं करता वही मंज़िल पर पहुँचता है। सुनीता को स्नेहाशीष उनकी कलम का जोर लगातार बढ़ता रहे, वे हिंदी ग़ज़ल के मिज़ाज़ और संस्कारों को समझते हुए अपना मुकाम ही न बनायें अपितु औरों को मुकाम बनाने में मददगार भी हों। वे जिस पद पर हैं वहां से हिंदी के लिए बहुत कुछ कर सकती हैं, करेंगी यह विश्वास है। उनका अधिकारी उनके कवि पर कभी हावी न हो पाए। वे दोनों में समन्वय स्थापित कर हिंदी ग़ज़ल के आसमान में चमककर आसमान को अधिक प्रकाशित करें।

कार्यशाला: चर्चा डॉ. शिवानी सिंह

कार्यशाला:
चर्चा डॉ. शिवानी सिंह के दोहों पर
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गागर मे सागर भरें भरें नयन मे नीर|
पिया गए परदेश तो कासे कह दे पीर||
तो अनावश्यक, प्रिय के जाने के बाद प्रिया पीर कहना चाहेगी या मन में छिपाना? प्रेम की विरह भावना को गुप्त रखना जाना करुणा को जन्म देता है.
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गागर मे सागर भरें, भरें नयन मे नीर|
पिया गए परदेश मन, चुप रह, मत कह पीर||
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सावन भादव तो गया गई सुहानी तीज|
कौनो जतन बताइए साजन जाए पसीज||
साजन जाए पसीज = १२
सावन-भादों तो गया, गई सुहानी तीज|
कुछ तो जतन बताइए, साजन सके पसीज||
*
प्रेम विरह की आग मे झुलस गई ये गात|
मिलन भई ना सांवरे उमर चली बलखात||
गात पुल्लिंग है., सांवरा पुल्लिंग, नारी देह की विशेषता उसकी कोमलता है, 'ये' तो कठोर भी हो सकता है.
प्रेम-विरह की आग में, झुलस गया मृदु गात|
किंतु न आया सांवरा, उमर चली बलखात||
*
प्रियतम तेरी याद में झुलस गई ये नार|
नयन बहे जो रात दिन भया समुन्दर खार||
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प्रियतम! तेरी याद में, मुरझी मैं कचनार|
अश्रु बहे जो रात-दिन, हुआ समुन्दर खार||
कचनार में श्लेष एक पुष्प, कच्ची उम्र की नारी,
नयन नहीं अश्रु बहते हैं, जलना विरह की अंतिम अवस्था है, मुरझाना से सदी विरह की प्रतीति होती है.
*
अब तो दरस दिखाइए, क्यों है इतनी देर?
दर्पण देखूं रूप भी ढले साँझ की बेर|
क्यों है इतनी देर में दोषारोपण कर कारण पूछता है. दर्पण देखना सामान्य क्रिया है, इसमें उत्कंठा, ऊब, खीझ किसी भाव की अभिव्यक्ति नहीं है. रूप भी अर्थात रूप के साथ कुछ और भी ढल रहा है, वह क्या है?
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अब तो दरस दिखाइए, सही न जाए देर.
रूप देख दर्पण थका, ढली साँझ की बेर
सही न जार देर - बेकली का भाव, रूप देख दर्पण थका श्लेष- रूप को बार-बार देखकर दर्पण थका, दर्पण में खुद को बार-बार देखकर रूप थका
*
टिप्पणी- १३-११ मात्रावृत्त, पदादि-चरणान्त व पदांत का लघु गुरु विधान-पालन या लय मात्र ही दोहा नहीं है. इन विधानों से दोहा की देह निर्मित होती है. उसमें प्राण संक्षिप्तता, सारगर्भितता, लाक्षणिकता, मर्मबेधकता तथा चारुता के पञ्च तत्वों से पड़ते हैं. इसलिए दोहा लिखकर तत्क्षण प्रकाशन न करें, उसका शिल्प और कथ्य दोनों जाँचें, तराशें, संवारें तब प्रस्तुत करें.
***

नवगीत

नवगीत -

*
पहले मन-दर्पण तोड़ दिया
फिर जोड़ रहे हो
ठोंक कील।
*
कैसा निजाम जिसमें
दो दूनी
तीन-पाँच ही होता है।
जो काट रहा है पौधों को
वह हँसिया
फसलें बोता है।
कीचड़ धोता है दाग
रगड़कर
कालिख गोर चेहरे पर।
अंधे बैठे हैं देख
सुनयना राहें रोके पहरे पर।
ठुमकी दे उठा, गिराते हो
खुद ही पतंग
दे रहे ढील।
पहले मन-दर्पण तोड़ दिया
फिर जोड़ रहे हो
ठोंक कील।
*
कैसा मजहब जिसमें
भक्तों की
जेब देख प्रभु वर देता?
कैसा मलहम जो घायल के
ज़ख्मों पर
नमक छिड़क देता।
अधनँगी देहें कहती हैं
हम सुरुचि
पूर्ण, कपड़े पहने।
ज्यों काँटे चुभा बबूल कहे
धारण कर
लो प्रेमिल गहने।
गौरैया निकट बुलाते हो
फिर छोड़ रहे हो
कैद चील।
पहले मन-दर्पण तोड़ दिया
फिर जोड़ रहे हो
ठोंक कील।
****
३०-८-२०१६

प्रथम विश्व युद्ध के मोर्चे से आखिरी खत

प्रथम विश्व युद्ध के मोर्चे से आखिरी खत
धरती मरे लोगों से भर गई 
*
 





रेहान फ़ज़ल प्रथम विश्व युद्ध में भाग लेने वाले भारतीय सैनिक
"इन बमों को झेल पाना बहुत मुश्किल है पिताजी... गोलियाँ और तोप के गोले इस तरह बरसते हैं जैसे बर्फ़! हमारा आधा जिस्म कीचड़ में होता है. हमारे और दुश्मन के बीच 50 गज़ की दूरी है... मारे गए लोगों की गिनती नहीं की जा सकती है..."
ये अंश है एक पत्र का, जो एक क्लिक करें भारतीय सैनिक ने 1915 में फ़्रांस के मोर्चे से अपने पिता को लिखा था.
भुला दिए गए सैनिक
भारतीय सैनिकों को सम्मान
पुरानी तस्वीर का जादू
भारत
ब्रितानी लायब्रेरी ने हाल ही में तत्कालीन ब्रितानी सैनिक सैंसर द्वारा कॉपी किए गए भारतीय सैनिकों के उन हज़ारों पत्रों को सार्वजनिक किया है, जिसमें उन्होंने युद्ध के मोर्चे के अपने ज़बरदस्त अनुभवों को साझा किया है.
रेहान फ़ज़ल की विवेचना
इन पत्रों में भारतीय सैनिक क्लिक करें ब्रितानी सरकार की ओर से उन्हें दिए जा रहे भोजन और कपड़ों के लिए आभार प्रकट करते हैं.
1914 में एक धर्मार्थ संस्था इंडियन सोल्जर्स कंफ़र्ट फंड (आईसीएस) बनाई गई थी और उसे अस्पतालों में रह रहे घायल भारतीय सैनिकों की देखभाल की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी. प्रथम विश्व युद्ध में भाग लेने वाले भारतीय सैनिक
एक सिपाही अपने घर भेजे गए ख़त में लिखता है, "मेरे बारे में चिंता मत करिए. मैं जन्नत में हूँ... पिछले हफ़्ते राजा यहाँ आए थे. उन्होंने मुझसे हाथ मिलाया और हम में से हर एक से हमारी चोट और तकलीफ़ के बारे में पूछा और हमारा हौसला बढ़ाया."
"आज मैं एक क्लिक करें अजायबघर देखने गया, जहाँ दुनिया की सारी मछलियों को ज़िंदा पानी के बक्से में रखा गया है. हमने एक राजमहल भी देखा, जिसकी क़ीमत करोड़ों पाउंड है."
बेमिसाल पेरिस!
प्रथम विश्व युद्ध में भाग लेने वाले भारतीय सैनिक
घायल भारतीय सैनिकों के लिए एक राजमहल ब्राइटन पेवेलियन को अस्पताल में बदल दिया गया था.
ग्रामीण क्षेत्र से आने वाले इन सैनिकों के लिए क्लिक करें यूरोपीय शहरों जैसे लंदन, ब्राइटन और पेरिस के दृश्य किसी आश्चर्य से कम नहीं थे.
एक सैनिक ने लिखा, "क्या ख़ूबसूरत शहर है! बेहतरीन बगीचे, नदियाँ, तालाब, घर, दुकानें, सड़कें, गाड़ियां, गाय, घोड़े और बत्तख़ें... आचरण, तहज़ीब, अनुशासन और तेज़ी.... सब कुछ बेमिसाल है."
प्रथम विश्व युद्ध में भाग लेने वाले भारतीय सैनिक
पेरिस से एक सैनिक ने लिखा, "पेरिस क्या है? ये स्वर्ग है!"
कहीं-कहीं शिकायतों के स्वर भी मिलते हैं, "जहाँ तक रोटियों की बात है, नानबाई इसके किनारों को ज़रूरत से ज़्यादा जला देते हैं और कभी कभी ये अंदर से कच्ची रह जाती हैं."
उस ज़माने में सर छोटू राम, क्लिक करें जाट गज़ेट निकाला करते थे, जिनमें इन सैनिकों की चिट्ठियाँ छपा करती थीं.
प्रथम विश्व युद्ध में भाग लेने वाले भारतीय सैनिक
मशहूर सैन्य इतिहासकार राणा छीना कहते हैं, "एक रिसालदार टेकचंद थे, उन्होंने लिखा है कि हम दुआ कर रहे हैं कि हम जिस मुसीबत में फंसे हैं उसमें ताउम्र फंसे रहें ताकि जिन सैनिकों को बाहर जा कर दुनिया देखने का मौक़ा मिल रहा है, वो उनको मिलता रहे और उनकी आँखें खुलें."
"जब ये लोग बाहर गए तो उन्होंने देखा कि फ़्रांस में किस तरह औरत मर्दों के साथ कंधे से कंधा मिला कर काम करती हैं, स्वास्थ्य का किस तरह से ध्यान रखा जाता है. जब वो लौट कर आए तो ये सब चीज़ें सीख कर आए."
वो बताते हैं, "उन चिट्ठियों में ज़िक्र होता है कि हमें अपनी बेटियों को पढ़ाना चाहिए. वो लिखते हैं कि हम सब एक ही मेज़ पर बैठ कर खाना खा रहे हैं. ये उस ज़माने के लिए बड़ी बात थी, जहाँ हिंदू पानी और मुस्लिम पानी अलग-अलग होता था."
प्रथम विश्व युद्ध में भाग लेने वाले भारतीय सैनिक
हरियाणा संस्कृति और इतिहास अकादमी के निदेशक केसी यादव कहते हैं कि जाट गज़ेट में इन सैनिकों के पत्र छपा करते थे. वहाँ इन्होंने चकाचौंध देखी, अमीरी देखी और समझने की कोशिश की कि वो क्यों अमीर हैं और हम ग़रीब क्यों हैं.
यादव बताते हैं, "उन्होंने रोहतक में बनने वाले बोर्डिंग हाउस के लिए पैसे जमा किए हैं. दूसरी चिट्ठी में ज़िक्र है कि हमने हर सिपाही की तन्ख़्वाह से हर रुपए पर एक आना लेकर इस काम के लिए चार सौ रुपए जमा किए हैं. ये उस ज़माने में बहुत बड़ी रकम हुआ करती थी.
सेंसर की ज़रूरत
डेविड ओमेसी की किताब
डेविड ओमेसी अपनी किताब 'इंडियन वॉयसेज़ ऑफ़ द ग्रेट वॉर' में लिखते हैं कि इन पत्रों को दो स्तरों पर सेंसर किया जाता था.
एक तो रेजिमेंट के स्तर पर जहाँ या तो ब्रितानी अफ़सर स्वयं इन पत्रों को पढ़ते थे या इन्हें वफ़ादार भारतीय अफ़सरों से ज़ोर-ज़ोर से पढ़वाते थे. ऐसा इसलिए किया जाता था कि इन ख़तों में सैनिक महत्व की कोई सामरिक सूचना न चली जाए.
इसके बाद बोलोन में सेंसर टीम का प्रमुख दोबारा इन पत्रों को पढ़ कर ये तय करता था कि इन पत्रों को उसी हालत में आगे भेजा जाए या नहीं. अवांछित हिस्सों पर काली स्याही फेर दी जाती थी, ताकि कोई इन्हें पढ़ न सके.
दिलचस्प बात ये है कि भारतीय सैनिकों को भी पता होता था कि उनके पत्रों को सेंसर किया जा रहा है. कई बार तो वो सेंसर को ही संबोधित करत हुए लिखते थे, "उम्मीद है, सेंसर चचा इस पत्र को सुरक्षित आगे बढ़ाएंगे."
तीस मन के गोले
प्रथम विश्व युद्ध में भाग लेने वाले भारतीय सैनिक
ये पत्र ज़्यादातर उर्दू में लिखे गए हैं. वैसे गुरमुखी, हिंदी, मराठी और गढ़वाली भाषा में भी लिखे हुए पत्र भी मिलते हैं.
इन पत्रों में सैनिक अक्सर युद्ध की विभीषिका का ब्योरेवार वर्णन करते हैं. एक सैनिक लिखता है, "ज़हरीली गैसें, बम, मशीन गन जो प्रति मिनट 700 गोलियाँ दाग सकती है... छोटी और बड़ी तोपें जो 30 मन के गोले दागतीं हैं.. उड़ने वाली मशीनें जो हवा से बम गिराती हैं."
एक और सैनिक अपने घर लिखता है, "यहाँ से कोई साबुत पंजाब नहीं लौट सकता. सिर्फ़ हाथ-पैर तुड़वा कर ही लोग वापस लौट सकते हैं."
राइफ़ल मैन अमर सिंह रावत अपने दोस्त को लिखते हैं, "धरती मरे हुए लोगों से भर गई है. कोई भी जगह ख़ाली नहीं बची है. आगे बढ़ने के लिए लाशों के ऊपर से होकर जाना होता है...यहाँ तक कि उनके ऊपर सोना भी होता है... क्योंकि कोई ख़ाली जगह बची ही नहीं है."
प्रथम विश्व युद्ध में भाग लेने वाले भारतीय सैनिक
'द वीक' पत्रिका की संवाददाता मंदिरा नैयर ने भी इन पत्रों पर ख़ासा शोध किया है. मंदिरा कहती हैं कि ये पत्र सही मायनों में युद्ध पत्रकारिता का बेहतरीन उदाहरण हैं.
मंदिरा कहती हैं, "भारतीय सैनिकों के भेजे गए विवरण वास्तविक और काव्यात्मक हैं. बहुत दर्द भरे भी हैं. एक 18 साल का लड़का लिखता है कि उसने इतनी लाशें देखीं हैं कि अगर वो ज़िंदा भी वापस आ जाए तब भी ये नज़ारा कभी नहीं भूलेगा."
"कुछ पत्र ऐसे हैं जिन्हें ब्रिटिश सरकार चाहती थी कि वो भारत पहुंचें... जैसे कि किंग जॉर्ज हमें कितना चाहते हैं. हम उनके राजमहल में ठहरे हुए हैं जिसे उन्होंने हमारे लिए ख़ाली कर दिया है."
प्रथम विश्व युद्ध में भाग लेने वाले भारतीय सैनिक
"हम आजकल युद्ध साहित्य या पत्रकारिता के बारे में बहुत बात करते हैं, लेकिन असली युद्ध पत्रकारिता तो इन सैनिकों ने दिखाई थी..."
कई पत्रों में अवसाद की झलक साफ़ दिखती है, "पता नहीं ये लड़ाई दो साल चलेगी या तीन साल. यहाँ एक घंटे में 10,000 लोग मारे जा रहे हैं. इस से ज़्यादा मैं और क्या लिख सकता हूँ..."
जर्मन विमान गरुड़ जैसे
प्रथम विश्व युद्ध में भाग लेने वाले भारतीय सैनिक
कई पत्रों में जर्मन लड़ाकू विमानों की तुलना विष्णु के गरुड़ से की गई है.
बंकर का वर्णन करते हुए एक सैनिक लिखता है, "यहाँ कीचड़ आदमी के घुटनों तक है और गड्ढों में जहाँ हम खड़े होकर लड़ रहे हैं दो फ़ुट तक पानी भरा हुआ है."
"जिस तरह खजूर के पेड़ को हिलाने से सारे खजूर ज़मीन पर गिर जाते हैं, उसी तरह लोगों की लाशों का अंबार यहाँ लग गया है."
पश्चिमी देशों के सामाजिक परिवेश पर भी इन सैनिकों की नज़र गई है. स्त्री पुरुष संबंधों को लेकर उनकी सांस्कृतिक ऊहापोह को आसानी से समझा जा सकता है.
प्रथम विश्व युद्ध में भाग लेने वाले भारतीय सैनिक
छठी केवेलरी के तारा सिंह, सरदार करबर सिंह को लिखते हैं, "यहाँ भाई और बहन के बीच कुछ भी छिपा नहीं है. अगर भाई की महिला दोस्त घर आती है तो बहन और माँ ख़ुश होती हैं."
"अगर माँ या बहन का पुरुष मित्र घर आता है तो बेटा ख़ुश होता है. यहाँ लोग वही करते हैं जो उनका दिल चाहता है... कोई रोक-टोक नहीं. लोग हर चीज़ खाते हैं..."
"गधा, कुत्ता, घोड़ा, सुअर, गाय... किसी के भी खाने पर रोक नहीं है. वो अपना हर काम ख़ुद करते हैं... यहाँ तक कि अपने कमोड की सफ़ाई भी!"
प्रथम विश्व युद्ध में भाग लेने वाले भारतीय सैनिक
एक सिख सैनिक चाय पीने की तुलना अमृत पीने से करता है.
इन पत्रों की भावनात्मक ताक़त इस लिहाज़ से बढ़ जाती है क्योंकि उनमें उन घटनाओं का ज़िक्र है जो वास्तव में घटी हैं और जिनके चश्मदीद गवाह ये पत्र लिख रहे हैं.
उनको इसका अंदाज़ा है, तभी तो एक घायल सैनिक अपने भाई को पत्र लिख रहा है, "मेरे भाई पत्र समाप्त करता हूँ. कुछ दिनों में मैं फिर मोर्चे पर चला जाउंगा... अगर जिंदगी रही... तो फिर लिखूंगा!"

रविवार, 29 अगस्त 2021

कृष्ण जन्माष्टमी

कृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष:
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
कृष्ण भारतीय इतिहास का वह पात्र है जिसे संत और गृहस्थ, राजा और रंक, बालक और वृद्ध, स्त्री और पुरुष हिंदू और मुसलमान सभी निरंतर स्मरण करते हैं। 

हो चुका अवतार, 
अब हम 
याद करते हैं मगर 
अनुकरण करते नहीं, 
क्यों यह विरोधाभास है?

इस विरोधाभास का मूल कारण यह है कि कृष्ण जो हैं, वह नहीं हैं और जो नहीं हैं वही हैं। इसमें अतिशयोक्ति नहीं है, यह सत्य है। कृष्ण नंद यशोदा के पुत्र होकर भी नहीं हैं और न होकर भी हैं। वे नटखट, चोर, छलिया, रणछोड़, पराक्रमी, कुटिल, सरल, नटवर, वाग्मी, धूर्त, दुखहर्ता, सुखदाता, परम मित्र आदि आदि हैं भी और नहीं भी। वे सज्जनों और भक्तों के लिए इष्ट हैं तो आततायी और अनाचारी के लिए अनिष्ट  हैं।

कृष्ण लोकदेवता भी हैं और राजाओं के आराध्य भी हैं। रासलीला के माध्यम से जनगण के मन पर शासन करनेवाले कृष्ण के मन पर उनके भक्तों का शासन रहता है।

कृष्ण के जन्म से लेकर देहावसान तक हर घटना विवाद का कारण बनी।  कृष्ण को छोड़कर हर व्यक्ति का हाल बेहाल हुआ पर वे पूरी तरह शांत और निर्लिप्त रहे।

कृष्ण के जीवन से जुड़े प्रसंगों में सत्य और कल्पना का ऐसा और इतना अधिक मिश्रण कर दिया गया है कि सत्य का अनुमान ही संभव नहीं है। इसके बाद भी कृष्ण के प्रति प्रेम और समर्पण करनेवालों की कभी कमी नहीं हुई।

कल्पना इतनी मिला दी, 
सत्य ही दिखता नहीं
पंडितों ने धर्म का, 
हर दिन किया उपहास है

कृष्ण के पश्चात उन पर रचित प्रथम महत्वपूर्ण ग्रंथ हरिवंशपुराण में राधा नामक पात्र का उल्लेख ही नहीं है। आधुनिक काल में कृष्ण पर सात कालजयी उपन्यास लिखनेवाले स्वनामधन्य कन्हैयालाल माणिकराव मुंशी भूमिका में यह स्वीकारने के बाद  भी कि राधा काल्पनिक चरित्र है, लोकमान्यता की दुहाई देकर राधा का चित्रण करते हैं।

गढ़ दिया राधा-चरित, 
शत मूर्तियाँ कर दीं खड़ी
हिल गयी जड़ सत्य की, 
क्या तनिक भी अहसास है?

सर्वोच्च न्यायालय में कृष्ण-राधा का विवाह हुए बिना, उनकी युगलमूर्ति को  लिव इन के रूप में बताने के प्रयास किए  जा चुके हैं।

शत विभाजन मिटा,
ताकतवर बनाया देश को
कृष्ण ने पर 
भक्त तोड़ें, 
रो रहा इतिहास है

कृष्ण ने धार्मिक, राजनैतिक और सामाजिक रूप में खंड-खंड हो चुके देश को अखंड बनाकर ही दम लिया पर उनके वंशज और भक्त होने का दावा करनेवाले अपने स्वार्थ  और हितसाधन में इतने व्यस्त हैं कि धर्म,  देश और समाज के विघटन की चिंता ही नहीं है उन्हें।

कृष्ण ने कंस  जरासंध आदि दुराचारी शासकों की मिट्टी प्लीज कर दी पर कब्जा, सुदामा, नरसी मेहता जैसे दीनों-हीनों के लिए सर्वस्व निछावर करने में पीछे न रहे जबकि उनके अनुयायियों का आचरण सर्वथा विपरीत है।

रूढ़ियों से जूझ
गढ़ दें कुछ प्रथाएँ 
स्वस्थ्य हम
देश हो मजबूत, 
कहते कृष्ण- 
'हर जन खास है'

कृष्ण ने राजतंत्र के रहते हुए भी, लोक के अधिकारों को वरीयता देकर उनकी रक्षा की। आज लोकतंत्र में अपराधी नेता, लोक के अधिकारों पर डाका डाल रहे हैं तथापि तंत्र के कानों पर जूं नहीं रेंग रही।

भ्रष्ट शासक 
आज भी हैं, 
करें उनका अंत मिल
सत्य जीतेगा 
न जन को हो रहा
आभास है।

कृष्ण ने 'कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन' के सिद्धांत को मूर्त किया, जबकि आज फल के लोभ में उचित-अनुचित साधनों को अपनाने में किसी को किंचित्मात्र भी संकोच नहीं है। 

फ़र्ज़ पहले 
बाद में हक़, 
फल न अपना 
साध्य हो
चित्र जिसका गुप्त 
उसका देह यह 
आवास है।

कृष्ण जन्माष्टमी के पर्व पर विविध आयोजन अवश्य करें पर कृष्ण के उपदेशों, नीतियों व आदर्शों का यथाशक्ति अनुकरण अवश्य करें।
***
संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान अभियान जबलपुर , ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, चलभाष ९४२५१८३२४४

ताँका

ताँका
*
ताँका (短歌) जापानी काव्य की कई सौ साल पुरानी काव्य विधा है। ताँका पाँच पंक्तियों और ५+७+५+७+७=३१ वर्णों के लघु कलेवर में भावों को गुम्फित करना सतत अभ्यास और सजग शब्द साधना से ही सम्भव है। ... इसमें यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि इसकी पहली तीन पंक्तियाँ कोई स्वतन्त्र हाइकु है।
*
स्नेह सलिल 
लहरें अनगिन 
चुल्लू भर पी 
अब तक न जिया 
अब जिंदगी को जी।  
*
आदमी को भी 
मयस्सर नहीं है 
इंसान होना 
बन प्रकृति मित्र 
ज्यों गुलाब का इत्र। 
*
बिना आहट
सांझ हो या सवेरे
लिये चाहत
ओस बूँद बिखेरे
दूब पर मौसम। 
*
मंजिल मिली
हमसफर बिछड़े
सपने टूटे
गिला मत करना
फिर चल पड़ना। 
*
तितली उड़ी
फूल की ओर मुड़ी
मुस्काई कली
हवा गुनगुनाई
झूम फागें सुनाईं। 
*
घमंड थामे
हाथ में तलवार
लड़ने लगा
अपने ही साये से
उलटे मुँह गिरा। 
*
सियासत है 
तीन-पाँच का खेल
किंतु बेमेल.
जनता मजबूर
मरी जा रही झेल। 
*
बाप ना बेटा
सिर्फ सत्ता है प्यारी। 
टकराते हैं
अपने स्वार्थ हित
जनता से गद्दारी। 
*
खाते हैं मेवा
कहते जनसेवा। 
देवा रे देवा!
लगा दे पटकनी
बना भी दे चटनी। 
*
क्यों करेगी
किसी से छेड़छाड़
कोई लड़की?
अगर है कड़की
करेगी डेटिंग। 
*
कुछ गलत
बदनाम हैं सभी। 
कुछ हैं सही
नेकनाम न सब। 
किसका करतब?
*
जी भर जियो
ख़ुशी का घूँट पियो
खूब मुस्काओ
लक्ष्य निकट पाओ
ख़ुशी के गीत गाओ
*
सूरज बाँका 
झुरमुट से झाँका 
उषा ने आँका
लख रूप सलोना
लिख दिया है ताँका। 

खोज जारी है 
कौन-कहाँ से आया? 
किसने भेजा? 
किस कारण भेजा?
कुछ नहीं बताया।  
*
कैसे बताऊँ
अपना परिचय?
नहीं मालूम
कहाँ से आ गया हूँ?
और कहाँ है जाना?
*