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रविवार, 23 अगस्त 2020

जनकछन्दी (त्रिपदिक) गीत

अभिनव प्रयोग
जनकछन्दी (त्रिपदिक) गीत
*
मेघ न बरसे राम रे!
जन-मन तरसे साँवरे!
कब आएँ घन श्याम रे!!
*
प्राण न ले ले घाम अब
झुलस रहा है चाम अब
जान बचाओ राम अब
.
मेघ हो गए बाँवरे
आये नगरी-गाँव रे!
कहीं न पायी ठाँव रे!!
*
गिरा दिया थक जल-कलश
स्वागत करते जन हरष
भीगे -डूबे भू-फ़रश
.
कहती उगती भोर रे
चल खेतों की ओर रे
संसद-मचे न शोर रे
*
काटे वन, हो भूस्खलन
मत कर प्रकृति का दमन
ले सुधार मानव चलन
.
सुने नहीं इंसान रे
भोगे दण्ड-विधान रे
कलपे कह 'भगवान रे!'
*
तोड़े मर्यादा मनुज
करे आचरण ज्यों दनुज
इससे अच्छे हैं वनज
.
लोभ-मोह के पाश रे
करते सत्यानाश रे
क्रुद्ध पवन-आकाश रे
*
तूफ़ां-बारिश-जल प्रलय
दोषी मानव का अनय
अकड़ नहीं, अपना विनय
.
अपने करम सुधार रे
लगा पौध-पतवार रे
कर धरती से प्यार रे
*****

समीक्षा : खेतों ने खत लिखा -कल्पना रामानी

पुस्तक सलिला
"खेतों ने खत लिखा" गीतिकाव्य के नाम
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
[पुस्तक विवरण- खेतों ने खत लिखा, गीत-नवगीत, कल्पना रामानी, वर्ष २०१६ ISBN ९७८-८१-७४०८-८६९-७, आवरण सजिल्द बहुरंगी जैकेट सहित, आकार डिमाई, पृष्ठ १०४, मूल्य २००/-, अयन प्रकाशन १/२० महरौली, नई दिल्ली ११००३०, लेखिका संपर्क ६०१/५ हेक्स ब्लॉक, सेक्टर १०, खारघर, नवी मुम्बई ४१०२१०, चलभाष ७४९८८४२०७२, ईमेल kalpanasramani@gmail.com]
*
गीत-नवगीत के मध्य भारत-पकिस्तान की तरह सरहद खींचने पर उतारू और एक को दूसरे से श्रेष्ठ सिद्ध करने के दुष्प्रयास में जुटे समीक्षक समूह की अनदेखी कर मौन भाव से सतत सृजन साधना में निमग्न रहकर अपनी रचनाओं के माध्यम से उत्तर देने में विश्वास रखनेवाली कल्पना रामानी का यह दूसरा गीत-नवगीत संग्रह आद्योपांत प्रकृति और पर्यावरण की व्यथा-कथा कहता है। आवरण पर अंकित धरती के तिमिर को चीरता-उजास बिखेरता आशा-सूर्य और झूमती हुई बालें आश्वस्त करती हैं कि नवगीत प्रकृति और प्रकृतिपुत्र के बीच संवाद स्थापितकर निराश में आशा का संचार कर सकने में समर्थ है। अपने नवगीत संग्रह 'काल है संक्रांति का' में सूर्य की विविध भाव-भंगिमाओं पर ८ तथा नए साल पर ६ रचनाएँ देने के बाद इस संकलन में सूर्य तथा नव वर्ष पर केंद्रित ३-३ रचनाएँ पाकर सुख हुआ। एक ही समय में समान अनुभूतियों से गुजरते दो रचनाकारों की भावसृष्टि में साम्य होते हुए भी अनुभति और अभिव्यक्ति में विविधता स्वाभाविक है। कल्पना जी ने 'शत-शत वंदन सूर्य तुम्हारा', 'सूरज संक्रांति क्रांति से' तथा 'भक्ति-भाव का सूर्य उगा' रचकर तिमिरांतक के प्रति आभार व्यक्त किया है। 'नव वर्ष आया', 'शुभारंभ है नए साल का' तथा 'नए साल की सुबह' में परिवर्तन की मांगल्यवाहकता तथा भविष्य के प्रति नवाशा का संकेत है।
सूरज की संक्रांति क्रांति से / जन-जन नीरज वदन हुआ
*
एक अंकुर प्रात फूटा / हर अँगन में प्रीत बनकर
नींद से बोला- 'उठो / नव वर्ष आया
कल्पना जी ने अपने प्रथम नवगीत संग्रह से अपने लेखन के प्रति आशा जगाई है।जंगल, हरियाली, बाग़-बगीचे, गुलमोहर, रातरानी, बेल, हरसिंगार, चंपा, बाँस, गुलकनेर, बसन्त, पंछी, कौआ, कोयल, सावन, फागुन, बरखा, मेघ, प्रात, दिन, सन्ध्या, धूप, शीत आदि के माध्यम से गीत-गीत में प्रकृति से साक्षात कराती यह कृति अधिक परिपक्व रचनाएँ समाहित किये है। मौसम के बदलते रंग जन-जीवन को प्रभावित करते हैं-
धड़क उठेंगी फिर से साँसें / ज्यों मौसम बदलेगा चोला
*
देखो उस टपरी में अम्मा / तन को तन से ताप रही है
आधी उधड़ी ओढ़ रजाई / खींच-खींचकर नाप रही है
जर्जर गात, कुहासा कथरी / वेध रहा बनकर हथगोला
*
'बेबस कमली' की व्यथा-कथा कल्पना जी की रचना सामर्थ्य की बानगी है। एक दिन बिना नहाये काम पर जाने का दंड उससे काम छुड़ाकर दिया जाता है-
रूठी किस्मत, टूटी हिम्मत / ध्वस्त हुए कमली के ख्वाब
काम गया क्या दे पायेगी / बच्चों को वो सही जवाब?
लातों से अब होगी खिदमत / मुआ मरद है क्रूर / कसाई
*
हिंदी, संस्कृत, अंग्रेजी, उर्दू के कटघरों से मुक्त कल्पना जी कथ्य की आवश्यकतानुसार शब्दों का प्रयोग करती हैं।इन नवगीतों में जलावतन, वृंत, जर्जर, सन्निकट, वृद्धाश्रम, वसन, कन्दरा, आम्र, पीतवर्णी, स्पंदित, उद्घोष, मृदु, श्वेताभ जैसे तत्सम शब्द आखर, बतरस, बतियाते, चौरा, बिसरा, हुरियारों, पैंजन, ठेस, मारग, चौबारे, पुरवाई, अगवानी, सुमरन, जोगन आदि तद्भव शब्दों के साथ गलबहियाँ डाले हैं तो खत, ज़िंदा, हलक, नज़ारा, आशियां, कारवां, खौफ, रहगुजर, क़ातिल, फ़क़ीर, इनायत, रसूल, खुशबू आदि उर्दू शब्द कोर्ट, डी जे, पास, इंजीनियर, डॉक्टर जैसे अंग्रेजी शब्दों के साथ आँख मिचौली खेल रहे हैं।
कल्पना जी परंपरा का अनुसरण करने के साथ-साथ नव भाषिक प्रयोग कर पाठकों-श्रोताओं का अभिव्यक्ति सामर्थ्य बढ़ाती हैं। सरसों की धड़कन, ओस चाटकर सोई बगिया, लातों से अब होगी खिदमत, मुआ मरद है क्रूर कसाई, ख़ौफ़ ही बेख़ौफ़ होकर अब विचरता जंगलों में, अंजुरी अनन्त की, देव! छोड़ दो अब तो होना / पल में माशा पल में तोला, उनके घर का नमक न खाना, लहरें आँख दिखाएँ तो भी / आँख मिला उन पर पग धरना, 'पल में माशा, पल में तोला' जैसे मुहावरे, 'घड़ा देखकर प्यासा कौआ / चला चोंच में पत्थर लेकर' जैसी बाल कथाएँ, गुणा-भाग, कर्म-कलम, छान-छप्पर, लेख-जोखा, बिगड़ते-बनते, जोड़-तोड़, रूखी-सूखी, हल-बैल-बक्खर, काया-कल्प, उमड़-घुमड़, गिल्ली-डंडा, सुख-दुःख, सूखे-भीगे, चाक-चौबंद, झील-ताल, तिल-गुड़, शिकवे-गिले, दान-पुण्य आदि शब्द युग्म तथा दिनकर दीदे फाड़ रहा, सून सकोरा, सूखी खुरचन, जूते चित्र बनाते आये, जोग न ले अमराई, घने पेड़ का छायाघर, सूरज ने अरजी लौटाई, अमराई को अमिय पिलाओ, घिरे अचानक श्याम घन घने, खोल गाँठें गुत्थियों की, तिल-तिल बढ़ता दिन बंजारा, खेतों ने खत लिखा, पालकी बसन्त की, दिन बसन्ती ख्वाब पाले, रात आई रातरानी ख्वाब पाले, गीत कोकिला गाती रहना, बेला महके कहाँ उगाऊँ हरसिंगार, गुलकनेर यादों में छाया, हमें बुलाते बाग़-बगीचे, धान की फसल पुकारे, कभी न होना धूमिल चंदा जैसे सरस प्रयोग मन में चाशनी सी घोल देते हैं।
'खेतों ने खत लिखा सूर्य को', 'नज़रें नूर बदन नूरानी', 'सर्प सारे सर उठा, अर्ध्य अर्पित अर्चना का', 'कन्दरा से कोकिला का मौन बोला', आदि में अनुप्रास की मोहक छटा यत्र-तत्र दर्शनीय है। 'देखो उस टपरी में अम्मा / तन को तन से ताप रही है' में पुनरावृत्ति अलंकार, 'चाट गया जल जलता तापक', 'रात आई रातरानी' आदि में यमक अलंकार, 'कर्म कलम', 'दिन भट्टी' आदि में रूपक अलंकार हैं।
'एक मन्त्र दें वृक्षारोपण' कहते समय यह तथ्य अनदेखा हुआ है कि वृक्ष नहीं, पौधा रोपा जाता है। 'साथ चमकता पथ जब चलता' में तथ्य दोष है क्योंकि पथ नहीं पथिक चलता है। 'उगी पुनः नयी प्रभात' के स्थान पर 'उगा पुनः नया प्रभात' होना था। 'माँ होती हैं जाँ बच्चों की' के सन्दर्भ में स्मरणीय है कि किसी शब्द के अंत में 'न' आने पर एक मात्रा कम करने के लिए उसे पूर्व के दीर्घाक्षर में समाहित कर दीर्घाक्षर पर बिंदी लगाई जाती है। 'जान' के स्थान पर 'जां' होगा 'जाँ' नहीं।
हिंदी के आदि कवि अमीर खुसरो को प्रिय किंतु आजकल अल्प प्रचलित 'मुकरी' विधा की रचनाओं का नवगीत में होना असामान्य है। बेहतर होता कि समतुकांती मुकरियों का प्रयोग अंतरे के रूप में करते हुए कुछ नवगीत रचे जाते। ऐसा प्रयोग रोचक और विचारणीय होता।
नवगीत को लेकर कल्पना जी की संवेदनशीलता कुछ पंक्तियों में व्यक्त हुई है- 'दिनचर्या के गुणा-भाग से / रधिया ने नवगीत रचा', 'रच लो जीवन-गीत, कर्म की / कलम गहो हलधर', 'भाव, भाषा, छंद, रस-लय / साथ सब ये गीत माँगें', 'गीत सलोने बिखरे चारों ओर', 'गर्दिशों के भूलकर शिकवे-गिले / फिर उमंगों के / चलो नवगीत गायें'। नवगीत को सामाजिक विसंगतियों, विडंबनाओं, त्रासदियों और टकरावों से उपजे दर्द, पीड़ा और हताश का पर्याय मानने-बतानेवाले साम्यवादी चिन्तन से जुड़े समीक्षकों को नवगीत के सम्बन्ध में कल्पना जी की सोच से असहमति और उनके नवगीतों को स्वीकारने में संकोच हो सकता है किन्तु इन्हीं तत्वों से सराबोर नयी कविता को जनगण द्वारा ठुकराया जाना और इन्हीं प्रगतिवादियों द्वारा गीत के मरण की घोषणा के बाद भी गीत की लोकप्रियता बढ़ती जाना सिद्ध करता है नवगीत के कथ्य और कहन के सम्बन्ध में पुनर्विचार कर उसे उद्भव कालीं दमघोंटू और सामाजिक बिखरावजनित मान्यताओं से मुक्त कर उत्सवधर्मी नवाशा से संयुक्त किया जाना समय की माँग है। इस संग्रह के गीत-नवगीत यह करने में समर्थ हैं।
'बाँस की कुर्सी', 'पालकी बसन्त की', दिन बसन्ती ख्वाबवाले', 'मन जोगी मत बन', 'कलम गहो हलधर' आदि गीत इस संग्रह की उपलब्धि हैं। सारत:, कल्पना जी के ये गीत अपनी मधुरता, सरसता, सामयिकता, सरलता और पर्यावरणीय चेतना के लिए पसंद किये जाएंगे। इन गीतों में स्थान-स्थान पर सटीक बिम्ब और प्रतीक अन्तर्निहित हैं। 'सर्प सारे सिर उठा चढ़ते गए / दबती रहीं ये सीढ़ियाँ', 'एक अंकुर प्रात फूटा / हर अँगन में प्रीत बनकर', घने पेड़ के छाया घर में / आये आज शरण में इसकी / ज़ख़्मी जूते भर दुपहर में', दाहक रहे दिन भाटी बन / भून रहे बेख़ता प्राण-मन', 'बनी रहें इनायतें रसूल दानवन्त की / जमीं पे आई व्योम वेध पालकी बसन्त की', 'क्रूर मौसम के किले को तोड़कर फिर / लौट आये दिन बसन्ती ख्वाबवाले' जैसी अभिव्यक्तियाँ पाठक के साथ रह जाती हैं। कल्पना जी के मधुर गीत-नवगीत फिर-फिर पढ़ने की इच्छा शेष रह जाना और अतृप्ति की अनुभूति होना ही इस संग्रह की सफलता है।
पुस्तक सलिला
"रिश्ते बने रहें" पाठक से नवगीत के
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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[पुस्तक विवरण- रिश्ते बने रहें, गीत-नवगीत, योगेंद्र वर्मा 'व्योम', वर्ष २०१६ ISBN ९७८-९३-८०७५३-३१-७, आवरण सजिल्द बहुरंगी जैकेट सहित, आकार डिमाई, पृष्ठ १०४, मूल्य २००/-, गुंजन प्रकाशन सी १३० हिमगिरि कॉलोनी, कांठ रोड, मुरादाबाद २४४००१ गीतकार संपर्क- ए एल ४९ सचिन स्वीट्स क्व पीछे, दीनदयाल नगर प्रथम, कांठ रोड मुरादाबाद २४४००१ चलभाष ९४१२८०५९८१ ईमेल vyom70 @gmail.com]
*
समय के साथ सतत होते परिवर्तनों को सामयिक विसंगतियों और सामाजिक विडंबनाओं मात्र तक सीमित न रख, उत्सवधर्मिता और सहकारिता तक विस्तारित कर ईमानदार संवेदनशीलता सहित गति-यतिमय लयात्मत्कता से सुसज्ज कर नवगीत का रूप देनेवाले समर्थ नव हस्ताक्षरों में श्री योगेंद्र वर्मा 'व्योम' भी हैं। उनके लिए नवगीत रचना घर-आँगन की मिट्टी में उगनेवाले रिश्तों की मिठास को पल्लवित-पोषित करने की तरह है। व्योम जी कागज़ पर नवगीत नहीं लिखते, वे देश-काल को महसूसते हुए मन में उठ रहे विचारों साथ यात्राएँ कर अनुभूतियों को शब्दावरण पहना देते हैं और नवगीत हो जाता है।
कुछ यात्राएँ /बाहर हैं /कुछ मन के भीतर हैं
यात्राएँ तो / सब अनंत हैं / बस पड़ाव ही हैं
राह सुगम हो / पथरीली हो / बस तनाव ही हैं
किन्तु नयी आशाओंवाले / ताज़े अवसर हैं
गत सात दशकों से विसंगति और वैषम्यप्रधान विधा मानने की संकीर्ण सोच से हटकर व्योम जी के गीत मन के द्वार पर स्वप्न सजाते हैं, नई बहू के गृहप्रवेश पर बन्दनवार लगाते हैं, आँगन में सूख रही तुलसी की चिंता करते हैं, बच्चे को भविष्य के बारे में बताते हैं, तन के भीतर मन का गाँव बसाते हैं, पुरखों को याद कर ताज़गी अनुभव करते हैं, यही नहीं मोबाइल के युग में खत भी लिखते हैं।
मोबाइल से / बातें तो काफ़ी / हो जाती हैं
लेकिन शब्दों की / खुशबुएँ / कहाँ मिल पाती हैं?
थके-थके से / खट्टे-मीठे / बीते सत्र लिखूँ
कई दिनों से / सोच रहा हूँ , तुमको पत्र लिखूँ
निराशा और हताशा पर नवाशा को वरीयता देते ये नवगीत घुप्प अँधेरे में आशा- किरण जगाते हैं।
इस बच्चे को देखो / यह ही / नवयुग लाएगा
संबंधों में मौन / शिखर पर / बंद हुए संवाद
मौलिकता गुम हुई / कहीं, अब / हावी हैं अनुवाद
घुप्प अँधेरे में / आशा की / किरण जगाएगा
व्योम जी का कवि ज़िंदगी की धूप-छाँव, सुख-दुःख समभाव से देखता है। वे गली में पानी भरने से परेशान नहीं होते, उसका भी आनंद लेते हैं। उन्हें फिसलना-गिरना भी मन भाता है यूँ कहें कि उन्हें जीना आता है।
गली-मुहल्लों की / सड़कों पर / भरा हुआ पानी
चोक नालियों के / संग मिलकर / करता शैतानी
ऐसे में तो / वाहन भी / इतराकर चलते हैं...
... कभी फिसलना / कभी सँभलना / और कभी गिरना
पर कुछ को / अच्छा लगता है / बन जाना हिरना
उतार-चढ़ाव के बावज़ूद जीवन के प्रति यह सकारात्मक दृष्टि नवगीतों का वैशिष्ट्य है।व्योम जी का कवि अंधानुकरण में नहीं परिवर्तन हेतु प्रयासों में विश्वास करता है।
संबंधों सपनों / की सब /परिभाषाएँ बदलीं
तकनीकी युग में / सबकी / अभिलाषाएँ बदलीं
संस्कृति की मीनार / यहाँ पर / अनगिन बार ढही
विवेच्य संकलन के नवगीत विसंगतियों, त्रासदियों और विडंबनाओं की मिट्टी, खाद, पानी से परिवर्तन की उपज उगाते हैं। ये नवगीत काल्पनिक या अतिरेकी अभाव, दर्द, टकराव, शोषण, व्यथा, अश्रु और कराह के लिजलिजेपन से दूर रहकर शांत, सौम्य, मृदुभाषी हैं। वे हलाहल-पान कर अमृत लुटाने की विरासत के राजदूत हैं। उनके नवगीत गगनविहारी नहीं, धरती पर चलते-पलते, बोलते-मुस्काते हैं।
गीतों को / सशरीर बोलते-मुस्काते / देखा है मैंने / तुमने भी देखा?
साधक है वह / सिर्फ न कवि है / एक तपस्वी जैसी छवि है
शांत स्वभाव, / सौम्य मृदुभाषी / मुख पर प्रतिबिंबित ज्यों रवि है
सदा सादगी / संग ताज़गी को / गाते देखा है मैंने / तुमने भी देखा?
राजनैतिक स्वार्थ और वैयक्तिक अहं जनित सामाजिक टकरावों के होते हुए भी ये नवगीत स्नेह-सरसिज उगाने का दुस्साहस कर आर्तनादवादियों को चुनौती देते हैं।
इन विषमता के पलों में / स्वार्थ के इन मरुथलों में
नेह के सरसिज उगायें / हों सुगंधित सब दिशाएँ
भूमिका में श्री माहेश्वर तिवारी ठीक लिखते हैं कि इन नवगीतों की भाषा अपनी वस्तु-चेतना के अनुरूप सहज, सरल और बोधगम्य है। ये नवगीत बतियाहट से भरे हैं। मेरी दृष्टि में व्योम जी रचित ये नवगीत 'मुनिया ने / पीहर में / आना-जाना छोड़ दिया', ' दहशत है अजब सी / आज अपने गाँव में', 'अपठनीय हस्ताक्षर जैसे / कॉलोनी / के लोग', 'जीवन में हम / ग़ज़लों जैसा / होना भूल गए', 'उलझी / वर्ग पहेली जैसा / जीवन का हर पल', 'जीन्स-टॉप में / नई बहू ने / सबको चकित किया', 'संबंधों में मौन / शिखर पर / बंद हुए संवाद', 'गौरैया / अब नहीं दीखती / छतों-मुँडेरों पर', 'सुना आपने? / राजाजी दौरे पर आयेंगे / सुनहरे स्वप्न दिखायेंगे' जैसी विसंगतियों में जीने के बाद भी आम आदमी की आशा-विश्वास के साक्षी बने रह सके हैं। ये गीत नेता, पत्रकार, अधिकारी, मठाधीश या साहित्यकार नहीं माँ और पिता बने रह सके हैं। 'माँ का होना / मतलब दुनिया / भर का होना है' तथा 'याद पिता की / जगा रही है / सपनों में विश्वास'। नवगीत भली भाँति जानते, मानते और बताते हैं 'माँ को खोना / मतलब दुनिया / भर को खोना है' तथा 'जब तक पिता रहे / तब तक ही / घर में रही मिठास'।
अपनी थाती और विरासत के प्रति बढ़ते अविश्वास, सामाजिक टकराव राजनैतिक संकीर्णताओं के वर्तमान संक्रमण काल में व्योम जी के नवगीत सूर्य तरह प्रकाश और चंद्रमा की तरह उजास बिखरते रहें। उनके नवगीतों की आगामी मंजूषा से निकलने वाले नवगीत रत्नों की प्रतीक्षा होना स्वाभाविक है।
***
समीक्षक संपर्क- समन्वयम, २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, सुभद्रा वार्ड, जबलपुर ४८२००१, salil.sanjiv@gmail.com, ९४२५१८३२४४।
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विमर्श : वरमाल क्यों?

विमर्श :
अनावश्यक कुप्रथा: वरमाल या जयमाल???
संजीव
*
आजकल विवाह के पूर्व वर-वधु बड़ा हार पहनाते हैं। क्यों? इस समय वर के मिटे हुल्लड़ कर उसे उठा लेते हैं ताकि वधु माला न पहना सके। प्रत्युत्तर में वधु पक्ष भी यही प्रक्रिया दोहराता है।
दुष्परिणाम:
वहाँ उपस्थित सज्जन विवाह के समर्थक होते हैं और विवाह की साक्षी देने पधारते हैं तो वे बाधा क्यों उपस्थित करते हैं? इस कुप्रथा के दुपरिणाम देखने में आये हैं, वर या वधु आपाधापी में गिरकर घायल हुए तो रंग में भंग हो गया और चिकित्सा की व्यवस्था करनी पडी। सारा कार्यक्रम गड़बड़ा गया. इस प्रसंग में वधु को उठाते समय उसकी साज-सज्जा और वस्त्र अस्त-व्यस्त हो जाते हैं. कोई असामाजिक या दुष्ट प्रकृति का व्यक्ति हो तो उसे छेड़-छाड़ का अवसर मिलता है. यह प्रक्रिया धार्मिक, सामाजिक या विधिक (कानूनी) किसी भी दृष्टि से अनिवार्य नहीं है.
औचित्य:
यदि जयमाल के तत्काल बाद वर-वधु में से किसी एक का निधन हो जाए या या किसी विवाद के कारण विवाह न हो सके तो क्या स्थिति होगी? सप्तपदी, सिंदूर दान या वचनों का आदान-प्रदान न हुआ तो क्या केवल माला को अदला-बदली को विवाह माना जायेगा?हिन्दू विवाह अधिनियम ऐसा नहीं मानता।ऐसी स्थिति में वधु को वर की पत्नी के अधिकार और कर्तव्य (चल-अचल संपत्ति पर अधिकार, अनुकम्पा नियुक्ति या पेंशन, वर का दूसरा विवाह हो तो उसकी संतान के पालन-पोषण का अधिकार) नहीं मिलते।सामाजिक रूप से भी उसे अविवाहित माना जाता है, विवाहित नहीं। धार्मिक दृष्टि से भी वरमाल को विवाह की पूर्ति अन्यथा बाद की प्रक्रियाओं का महत्त्व ही नहीं रहता।
कारण:
धर्म, समाज तथा विधि तीनों दृष्टियों से अनावश्यक इस प्रक्रिया का प्रचलन क्यों, कब और कैसे हुआ?
सर्वाधिक लोकप्रिय राम-सीता जयमाल प्रसंग का उल्लेख राम-सीता के जीवनकाल में रचित वाल्मीकि रामायण में नहीं है. रामचरित मानस में तुलसीदास प्रसंग का मनोहारी चित्रण किया है। तभी श्री राम के ३ भाइयों के विवाह सीता जी की ३ बहनों के साथ संपन्न हुए किन्तु उनकी जयमाल का वर्णन नही है।
श्री कृष्ण के काल में द्रौपदी स्वयंवर में ब्राम्हण वेषधारी अर्जुन ने मत्स्य वेध किया। जिसके बाद द्रौपदी ने उन्हें जयमाल पहनायी किन्तु वह ५ पांडवों की पत्नी हुईं अर्थात जयमाल न पहननेवाले अर्जुन के ४ भाई भी द्रौपदी के पति हुए। स्पष्ट है कि जयमाल और विवाह का कोई सम्बन्ध नहीं है। रुक्मिणी का श्रीकृष्ण ने और सुभद्रा का अर्जुन के पूर्व अपहरण कर लिया था। जायमाला कैसी होती?
ऐतिहासिक प्रसंगों में पृथ्वीराज चौहा और संयोगिता का प्रसंग उल्लेखनीय है। पृथ्वीराज चौहान और जयचंद रिश्तेदार होते हुए भी एक दूसरे के शत्रु थे। जयचंद की पुत्री संयोगिता के स्वयंवर के समय पृथ्वीराज द्वारपाल का वेश बनाकर खड़े हो गये। संयोगिता जयमाल लेकर आयी तो आमंत्रित राजाओं को छोड़कर पृथ्वीराज के गले में माल पहना दी और पृथ्वीराज चौहान संयोगिता को लेकर भाग गये। इस प्रसंग से बढ़ी शत्रुता ने जयचंद के हाथों गजनी के मो. गोरी को भारत आक्रमण के लिए प्रेरित कराया, पृथ्वीराज चौहान पराजितकर बंदी बनाये गये, देश गुलाम हुआ।
स्पष्ट है कि जब विवाहेच्छुक राजाओं में से कोई एक अन्य को हराकर अथवा निर्धारित शर्त पूरी कर वधु को जीतता था तभी जयमाल होता था अन्यथा नहीं।
मनमानी व्याख्या:
तुलसी ने राम को मर्यादपुषोत्तम मुग़लों द्वारा उत्साह जगाने के लिए कई प्रसंगों की रचना की। प्रवचन कारों ने प्रमाणिकता का विचार किये बिना उनकी चमत्कारपूर्ण सरस व्याख्याएँ चढ़ोत्री बढ़े। वरमाल तब भी विवाह का अनिवार्य अंग नहीं थी। तब भी केवल वधु ही वर को माला पहनाती थी, वर द्वारा वधु को माला नहीं पहनायी जाती थी। यह प्रचलन रामलीलाओं से प्रारम्भ हुआ। वहां भी सीता की वरमाला को स्वीकारने के लिये उनसे लम्बे राम अपना मस्तक शालीनता के साथ नीचे करते हैं। कोई उन्हें ऊपर नहीं उठाता, न ही वे सर ऊँचा रखकर सीता को उचकाने के लिए विवश करते हैं।
कुप्रथा बंद हो:
जयमाला वधु द्वारा वर डाली जाने के कारण वरमाला कही जाने लगी। रामलीलाओं में जान-मन-रंजन के लिये और सीता को जगजननी बताने के लिये उनके गले में राम द्वारा माला पहनवा दी गयी किन्तु यह धार्मिक रीति न थी, न है। आज के प्रसंग में विचार करें तो विवाह अत्यधिक अपव्ययी और दिखावे के आयोजन हो गए हैं। दोनों पक्ष वर्षों की बचत खर्च कर अथवा क़र्ज़ लेकर यह तड़क-भड़क करते हैं। हार भी कई सौ से कई हजार रुपयों के आते हैं। मंच, उजाला, ध्वनिविस्तारक सैकड़ों कुसियों और शामियाना तथा सैकड़ों चित्र खींचना, वीडियो बनाना आदि पर बड़ी राशि खर्चकर एक माला पहनाई जाना हास्यास्पद नहीं तो और क्या है?
इस कुप्रथा का दूसरा पहलू यह है की लाघग सभी स्थानीयजन तुरंत बाद भोजन कर चले जाते हैं जिससे वे न तो विवाह सम्बन्ध के साक्षी बन पते हैं, न वर-वधु को आशीष दे हैं, न व्धु को मिला स्त्रीधन पाते हैं। उन्हें के २ कारण विवाह का साक्षी बनना तथा विवाह पश्चात नव दम्पति को आशीष देना ही होते हैं। जयमाला के तुरंत बाद चलेजाने पर ये उद्देश्य पूर्ण नहीं हो पाते। अतः, विवेकशीलता की मांग है की जयमाला की कुप्रथा का त्याग किया जाए। नारी समानता के पक्षधर वर द्वारा वधु को जीतने के चिन्ह रूप में जयमाला को कैसे स्वीकार सकते हैं? इसी कारण विवाह पश्चात वार वधु से समानता का व्यवहार न कर उसे अपनी अर्धांगिनी नहीं अनुगामिनी और आज्ञानुवर्ती मानता है। यह प्रथा नारी समानता और नारी सम्मान के विपरीत और अपव्यय है। इसे तत्काल बंद किया जाना उचित होगा।
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Sanjiv verma 'Salil'
salil.sanjiv@gmail.com
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शनिवार, 22 अगस्त 2020

पुरोवाक : सीप के मोती - सुनीता सिंह

पुरोवाक : 
दोहा दुनिया सँजोती 'सीप के मोती' 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 
*
सकल सुरासुर सामिनी, सुण माता सरसत्ति
विनय करीं इ वीनवुं, मुझ तउ अविरल मत्ति
सुरसुरों की स्वामिनी, सुनिए शारद मात
विनय करूँ सिर नवा- दो, निर्मल मति सौगात 
संवत १६७७ में रचित 'ढोला मारू दा  दूहा' से अपभृंश का यह दोहा, दोहा की दो हजार वर्ष से अधिक की रचना यात्रा का साक्षी है।
छंद का उद्गम और महत्त्व : 
नाद, ध्वनि, उच्चार का प्रयोग कर लोक 'वर्ण' और 'शब्द' को जन्म देता है। स्मृति -सुरक्षित शब्द विन्यास का समुच्चय, संकेतों का आश्रय पाकर 'लिपि' बनते हैं। पटल, कलम और स्याही का उपयोग कर लोक अपनी अनुभूतियोंको अभिव्यक्त कर 'भाषा' को जन्म देता है। लोक भाषा, लय और गति-यति में रच-पग कर समतुकांत पंक्तियों को जोड़कर 'छंद' का रूप दे देती है। 'छन्दासि छाद्नात्' अर्थात छंद वह है जो 'छा' जाता है। जिस तरह अलस्सुबह बालारुण की किरणें वसुधा  पर छा जाती हैं, कूकती हुई कोयल या चहकती हुई चिड़िया का कलरव वातावरण को रस सिक्त कर देता है वैसे ही छंद भी कहे जाने पर वातावरण में रस घोल देता है। इसकी प्रतीति ग्राम्यांचल में सहज ही की जा सकती है। बीज बुआई, खेत तकाई, फसल कटाई अथवा पर्व-त्योहारों में गीत गाते ग्राम्य स्त्री-पुरुषों के कंठों से गीत पंक्तियाँ निर्झर से गिरते-बहते सलिल-प्रवाह से उपजे कलकल नाद की तरह मन-प्राण पर छा कर आनंदित करती है।
छंद की अलौकिकता तथा महत्व पर छांदग्योपनिषद प्रपाठक १, अध्याय १,, खंड ४, प्रवाक् २ से  ५ तथा प्रपाठक १ खंड ७ में विस्तृत चर्चा हुई है। ऐतरेय ब्राह्मण अध्याय १, खंड ५, अध्यय २-खंड ३ तथा शतपथ ब्राह्मण के १३/४/१/१३२ व १३/५/४/२८ में छंद का माहात्म्य वर्णित है। वैदिक कथा है की एक बार देवताओं पर मृत्यु ने आक्रमण कर दिया, बचन ेके लिए देवताओं ने स्वयं को छंदों (मंत्रों) से आवृत्त कर लिया। तब से आच्छादन का साधन बने मंत्रों की संज्ञा छंद हो गयी -
"देवा वै मृतयोर्विभ्यतस्त्रयीं विद्यां प्राविन्स्ते, 
छंदेभिरच्छादयन्यदेभिच्छदयंस्तच्छन्दसा छंदस्त्वं।" -छांदग्योपनिषद प्रपाठक , खन्ड , प्रवाक् २, पृष्ठ ३५।
छंदाश्रय पाकर देवों के अमर होने और स्वर्गलोक पाने की कथा ऐतरेय ब्राह्मण में भी वर्णित है -
सर्वे वाई छन्दोभिरिष्ट्वा देवा: स्वर्गलोकं श्रयति" - ऐतरेय ब्राह्मण अध्याय २, खंड ३, पृष्ठ ६७। 
पौर्वात्य वांग्मय में कविता का आदि रूप वेद हैं। किसी से मिलने, उसका परिचय पाने के लिए पैरों पर चलकर जाना होता है। वेदों के दिव्य ज्ञान से अभिन्न होना है तो छंद ही एक मात्र माध्यम है, इस अर्थ में छंद को वेदों का पैर कहा गया है - "छंद: पादौ तु वेदस्य" - पाणिनीय शिक्षा श्लोक ४। 
वृहत हिंदी कोश पृष्ठ ३९० के अनुसार पुल्लिंग संज्ञा 'छंद' का अर्थ अभिलाष, नियंत्रण, वश्यता, रूचि, अभिप्राय, विष, शकल-सूरत,प्रसन्नता, कलाई पर पहनने का एक गहना, स्वेच्छाचार, धोखा, छल, वेद, मात्रा, वर्ण-मात्रा यदि आदि के नियमों से युक्त वाक्य या पद्मात्मक रचना है। नालंदा विशाल शब्द सागर पृष्ठ ३१६ में छंद का अर्थ इच्छा या अभिलाषा है। महाकवि सुमित्रनंदन पंत के अनुसार "कविता तथा छंद के बीच बड़ा घनिष्ठ संबंध है, कविता हमारे प्राणों का संगीत है, छंद हृतकंपन, कविता का स्वभाव ही छंद में लयमान होना है।" (उद्धरण कोष पृष्ठ २३०)। 
पौर्वात्य ही नहीं पाश्चात्य कवि समीक्षकों ने भी छंद को कविता का अनिवार्य गुण स्वीकार किया है। हर्ड के मत में "काव्य के संपूर्ण आनंद के लिए छंद आवश्यक है। बिना इस तत्व के काव्य को सुनने का आनंद जाता रहता है।" (उद्धरण कोष पृष्ठ २२१)। प्रख्यात कवि कॉलरिज के शब्दों में "मैं छंद का प्रयोग इसलिए करता हूँ कि  गद्य न लिखकर काव्य की रचना कर रहा हूँ। बिना छंद के काव्य असंपूर्ण रहता है। यही धरना संसार के महान से महान  कवियों की रही है।"(उद्धरण कोष पृष्ठ २२१)।
लघु-गुरु उच्चार (सिलेबल्स) जिन्हें लिपिबद्ध होने पर 'मात्रा' के रूप में पहचाना जाता है, का समुच्चय 'ध्वनि खंड' (रुक्न) को जन्म देता है। एक या अधिक ध्वनि खण्डों का संयोजन अथवा आवृत्ति 'छंद' (बह्र) कही जाती है। वस्तुत: छंद वाक् से निःसृत होने के कारण वाचिक तथा लोक में विकसित होने के कारण 'लौकिक' होता है। वेदों के सृजन में प्रयुक्त छंदों को 'वैदिक' छंद कहा गया है। 
छंद रचना में वर्ण या अक्षर (ध्वनि का लिपिबद्ध रूप) का प्रयोग किया जाता है। ३-३ वर्णों के ८ समुच्चय गण (मूलत: ध्वनि खंड) कहे गए हैं। वर्ण संख्या के आधार पर निर्मित ध्वनि खण्डों का प्रयोग कर रचे गए छंद 'वार्णिक छंद' कहे जाते हैं। वर्णों के लघु-दीर्घ (गुरु) उच्चार में लगा समय को 'मात्रा' है। मात्रा गणना के आधार पर रचित छंद 'मात्रिक छंद' कहे जाते हैं। एक श्वास में पढ़ी जा सकनेवाली काव्य पंक्तियों से निर्मित छंदों की वर्ण संख्या या मात्रा संख्या के आधार पर उनकी 'जाति' का निर्धारण किया गया है। एक ही जाति के छंदों में गति-यति व तुकांत के आधार पर विविध छंदों को अलग-अलग नाम दिए गए हैं। 
दोहा :
दोहा का परिचय देते हुए डॉ. अनंतराम मिश्र 'अनंत' लिखते हैं- "मैं दोहा हूँ। भाषा मेरा शरीर, लय मेरे प्राण और रस मेरी आत्मा है। कवित्व मेरा मुख, कल्पना मेरी आँख, व्याकरण मेरी नाक, भावुकता मेरा ह्रदय तथा चिंतन मेरा मस्तिष्क है। प्रथम-तृतीय चरण मेरी भुजाएँ एवं द्वितीय-चतुर्थ चरण मेरे चरण हैं।"  - नावक के तीर 
दोहा सूक्ष्म-विराट का, सरस लोकप्रिय मेल 
भाव बिंब लय अर्थमय, गति यति मति का खेल 
दोहा मोती सीप में, सिंधु बिंदु में जान 
गागर में सागर भरे, पढ़कर बन रसखान 
'सीप के मोती' के तरह दोहा भी प्रथम दृष्टया बहुत सहज, सरल, सामान्य दिखता है पर जैसे-जैसे दोहा में डूबें और उसका रसपान करें वैसे-वैसे दोहा साधारणता में असाधारणता की प्रतीति कराता है। 'गूँगे के गुण' की तरह दोहा रसानंद ही नहीं, घनानंद भी लुटाता है। दोहा आप तो रस-निधि है ही, पाठक-श्रोता को भी रस-लीन कर रस-खान बना देता है।
जिन छंदों के सब चरण (पंक्ति या पद का अंश) समान मात्रा भार के हों उन्हें सम मात्रिक छंद कहा जाता है। जिन छंदों में विविध चरणों का मात्रा भर भिन्न-भिन्न हो उन्हें विषम मात्रिक छंद कहा जाता है। जिन छंदों के विषम चरण समान मात्रा भार के हों तथा सम चरण भिन्न समान मात्रा भार के हों उन्हें अर्ध सम मात्रिक छंद कहा जाता है। दोहा में दो पद (पंक्तियाँ) होती हैं, प्रत्येक में दो चरण (सम-विषम) होते हैं। इसलिये दोहा आरंभ में दोपदी भी कहा गया है।
दोहा दूहा दोहड़ा, द्विपदिक दोग्धक नाम
साखी बानी बन अमर, दोहा छंद ललाम  
दोहा अर्ध सम मात्रिक छंद है। इसके विषम चरणों में १३-१३ तथा सम चरणों में ११-११ मात्राएँ होती हैं। दोहा का पदांत गुरु लघु होना अनिवार्य है।
दो पद सुख-दुःख रात-दिन, चरण चतुर्युग चार
तेरह-ग्यारह विषम सम दोहा विधि अनुसार
विषम चरण के आदि में,  जगण विवर्जित मीत
दो शब्दों में मान्य है, दोहा की शुभ रीत
विषम चरण के अंत में, सनर सके रस घोल
समचरणांत जतन रहे, दोहा हो अनमोल
दोहा अमिधा, व्यंजना तथा लक्षणा का उपयोग कर 'सार-सार को गहि रहे, थोथा देय उड़ाय' के आदर्श का पालन करता है। दोहा लय प्रधान छंद है। अशिक्षित कबीरदास हों या सुशिक्षित तुलसीदास  दोहा दोनों के सृजन की जान है। दोहा की लय साधने का सरल सूत्र है -
त्रिकल त्रिकल के बाद हो, चौकल चौकल बाद
रस-लय बिम्ब प्रतीक युत, दोहा है नाबाद
दोहा के प्रकार
दो पदों के अंत में गुरु लघु अनिवार्य होने के कारण ४८ मात्रिक दोहा की शेष ४२ मात्राओं में एक से २१ गुरु वर्ण का उपयोग करने पर २१ प्रकार के दोहा छंद बनते हैं।
दोहा के इक्कीस हैं, ललित-ललाम प्रकार
लघु-गुरु की घट-बढ़ करे, दोहा का श्रृंगार
रखें चार-छः लघु सदा, भ्रमर-सुभ्रामर छाँट
आठ और दस लघु सहित, शरभ-श्येन के ठाठ
बारह लघु मंडूक में, चौदह मरकत हर
सोलह लघु हैं करभ में, लिये अठारह नर
हंस बीस लघु से बने, बाइस लिए गयंद
लघु चौबिस ले पयोधर, बल छब्बीस अमंद
वानर अट्ठाइस लघु, तीस त्रिकल के साथ
बत्तिस कच्छप संग हैं, चौंतिस मच्छ सनाथ
छत्तिस लघु शार्दूल में, अड़तिस शर वाचाल
चालिस लघु हैं व्याल में, ब्यालिस लिए विडाल
श्वान चवालिस लघु लिए, दो गुरु रखता लीक 
उदर छियालिस एक गुरु, गुरु बिन सर्प न ठीक
तेईस-चौबिस गुरु नहीं, दोहा को स्वीकार्य
लघुता बिन प्रभुता कहाँ, बंधन है अनिवार्य
लगभग दो सहस्त्र वर्ष की रचना यात्रा में दोहे ने अनेक पड़ाव तय किये हैं। सरह, देवसेन, हेमचंद्र, चंद बरदाई, बाबा फरीद शकरगंज, सोमप्रभ सूरि, खुसरो, कबीर, तुलसी, रत्नावली, रहीम, रसखान, बिहारी, रसनिधि, मतिराम, वृन्द, रसलीन, हीरालाल राय, विक्रम, राम, हरिऔध, वियोगी हरि, दुलारेलाल भार्गव, नवीन, राजाराम शुक्ल, राधावल्लभ पांडेय, दीनानाथ 'अशंक', बौखल, दिनेश, दिव्य, करुण,  'अनंत', इंद्र, विराट, अंजुम, आदि असंख्य दोहाकार अपनी समिधा दोहा दरबार में प्रस्तुत कर चुके हैं। अनेक दोहा संकलन भी प्रकाशित हुए हैं जिनमें सप्तपदी संपादक डॉ. देवेंद्र शर्मा 'इंद्र' , नई सदी के प्रतिनिधि दोहाकार संपादक अशोक अंजुम, दोहा शतक मंजूषा संपादक आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', समकालीन दोहा कोष संपादक हरेराम 'समीप', दोहा संदर्भ संपादक कृष्णस्वरूप शर्मा 'मैथिलेन्द्र' व डॉ. महेश दिवाकर आदि महत्वपूर्ण हैं। कई पत्रिकाओं ने दोहा विशेषांक प्रकाशित किये हैं। अंतरजाल ने दोहा सृजन माल में अनेक पुष्प जोड़े हैं। हिन्द युग्म, साहित्य शिल्पी, दिव्य नर्मदा आदि ब्लॉग, दोहा सलिला, दोहा दर्पण, दोहा प्रसंग आदि फेसबुक पृष्ठ, वॉट्सऐप पर कई समूह दोहा को केंद्र में रखकर सक्रिय हैं। 
दोहा की विविधता पहेली दोहा, प्रश्नोत्तरी दोहा, एकाक्षरी दोहा, दोअक्षरी दोहा, चित्र दोहा, नीति दोहा, आदि में भी दृष्टव्य है। इन सभी प्रकार के दोहे मैंने रचे हैं। दोहा केवल छंद रूप में उपयोगी नहीं हैं। मैंने लगभग ३ दशक  पूर्व दोहा गीत, दोहा मुक्तक, दोहा ग़ज़ल आदि की रचना कर अभिनव प्रयोग प्रथमत: किये जिन्हें बाद में कई दोहाकारों ने अपनाया। दोहा की सर्वप्रियता का आलम यह है कि संस्कृत, अपभृंश, प्राकृत, अंगिका, अंग्रेजी, अवधी, कन्नौजी, गढ़वाली, गुजराती, छत्तीसगढ़ी, निमाड़ी, पंजाबी, पछेली, बघेली, बज्जिका, बृज, बुंदेली, भोजपुरी, मगही, मराठी, मालवी, मैथली, राजस्थानी, सरायकी, सिंधी, हरयाणवी आदि भाषा-बोलियों में भी दोहा रचा गया है। दोहा हिंदी के दस रसों और ८० अलंकारों पर भी अपनी सत्ता स्थापित कर चुका है। साहित्यिक समस्या पूर्ति और चित्र पर रचना करने के लिए भी दोहे का उपयोग किया गया है।
साहित्य ही नहीं अभियांत्रिकी, वास्तु, आयुर्वेद, पर्यटन, पुरातत्व, वानिकी, सहकारिता, दर्शन शास्त्र, समाज शास्त्र आदि विविध साहित्येतर विषयों में भी दोहा पैठ गया है। दोहा लोकोक्तियों और कहावतों का भी हिस्सा है। चलचित्र जगत में भी दोहा-पताका खूब फहराई गयी है।  'अँखियों के झरोखे से' में सचिन-रंजीता की दोहा गायन प्रतियोगिता कौन भूल सकता है?
दोहा की प्रगल्भता, लाक्षणिकता, मार्मिकता और लोक प्रियता उसे उर्दू शेर के आगे ले जाती है। शेर की पहुँच अल्पशिक्षित श्रमिक वर्ग में कम है पर दोहा खास से लेकर आम तक सहजता से पहुँच सका है।
दोहा की उर्वर पृष्ठभूमि ने हर देश-काल में युवाओं को आकर्षित किया है। शाने-अवध लखनऊ में रचनाकर्म में निमग्न सुनीता सिंह उच्च पदस्थ शासकीय अधिकारी होते हुए भी गुरुतर दायित्व का यथाविधि निर्वहन करते हुए भी हिंदी साहित्य की विविध विधाओं में अकुंठ सृजन-सलिला प्रवाहित कर रही हैं। गोमती-सरयू के तटों पर भारतीय सभ्यता, संस्कृति और साहित्य की अविकल प्रवाहित हो रही त्रिवेणी में अनगिन लहरें और अनेक पद्म पुष्प होना स्वाभाविक है। ऐसा ही एक कमल कुसुम हैं सुनीता। सुनीता की सृजन-सुरभि क्रमश: फ़ैल रही है।सीप के मोती में सुनीता का दोहाकार साहित्य सरोवर के रसिक भ्रमरों के समक्ष प्रस्तुत हो रहा है। इसके पूर्व ३ काव्य संग्रह सूर्य मंजरी , काल चक्र को चलने दो व् नवजीवन, बाल कविता संग्रह हम बच्चे नन्हें-मुन्ने। लघुकथा संग्रह अविरल तथा अंग्रेजी कविता संग्रह मिस्टिका के सृजन हेतु चर्चित रह चुकी सुनीता नवगीत तथा ऐतिहासिक कहानी के क्षेत्र में भी हाथ आजमा रही हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा 'सीप के मोती' शीर्षक से अपनी दोहा दुनिया में पाठकों को प्रवेश दे रही है। 
आस्थावादी दोहाकार ने सनातन परंपरा का अनुपालन करते हुए धार्मिक दोहे शीर्षक के अंतर्गत ईश वंदना के दोहे प्रस्तुत किये हैं। सुनीता परम शक्ति के प्रति शृद्ध रखती हैं, अंध श्रद्धा नहीं। वे परमशक्ति के साकार और निराकार दोनों रूपों की उपासक हैं। निर्गुण-सगुण के समन्वय की झलक आरंभिक दो दोहों में दृष्टव्य है- 
जिसको होकर मौन मन, देता है आवाज। 
सुन न रहा वह क्यों भला, उलझा है किस काज।।
दोहाकार ईश्वर का नाम न लेकर भी यह प्रतीति करा सकी है की वह किससे संबोधित है। परमपिता से संबोधित होती सुनीता का स्वर सूरदासी दीनता, या मीराई प्रार्थना का नहीं है। यह स्वर एक सुशिक्षित, आत्मनिर्भर, आत्म विश्वासी नारी का है। इसमें परमप्रभु से भी प्रश्न करने का साहस है। यह साहस कहाँ से उपजता है? इसका उत्तर देता है अगला दोहा- 
गौरा गणपति पूजिए, मन से निकले गीत। 
बल जब मिलता भक्ति का, तब जाता तम बीत।। 
भक्ति का बल भक्त को आराध्य से पूछने की शक्ति देता है। तुलसी कहते हैं 'राम ते अधिक राम कर दासा' यह भक्त की नहीं भक्ति की शक्ति है जो तुलसी से कहलवाती है 'तुलसी मस्तक तब नवै, जब धनुष-बाण लो हाथ'। भक्ति की शक्ति का स्रोत वह प्रभु ही है- 
मन में पावन भाव से, होता बल संचार। 
शुभाशीष तब मातु का, बरसे बारंबार।। 
शिवा का आशीष साथ हो तो शिव को सदय होना ही होगा। प्रभु के धाम की राज मस्तक पर लगाकर भक्त धन्य हो जाता है- 
मंदिर अद्भुत प्रेम का, संग राधिका-श्याम। 
वृन्दावन-रज माथ रख, ह्रदय हुआ प्रभुधाम।। 
सुनीता का शब्द भंडार समृद्ध है। वे अल्पप्रचलित शब्दों को सही अर्थ में इस तरह प्रयोग करती हैं कि पाठक उसका अर्थ शब्दकोष में देखे बिना अनुमान लगा ले- 
गिरिधन्वा गिरिप्रिय करो, शूल समूल विनाश। 
भुजंगभूषण सर्व हरि, काटो माया-पाश।।
चंचल चितवन चाँदनी, चुलबुल चंद्र चकोर।  
चुन-चुन चीनी चाशनी, चहके चित-चितचोर।।
मधुर-मधुर मधुमालती, मंद-मंद मकरंद। 
मूक मौन मन मोहते, गुल गुलाब गुलकंद।।   
यहाँ अनुप्रास अलंकार और श्रृंगार रस का सौंदर्य भी दर्शनीय है। 
सुनीता शब्दों का नवप्रयोग भी कर सकी हैं। 'कवच' सर्वश्रुत शब्द है, वे कवचधारी के स्थान पर 'कवची' का प्रयोग करती हैं -
सुरसूदन कवची कहो, कहाँ तुम्हारा धाम। 
बहुत दूर कैलाश प्रभु, मुश्किल राह तमाम।। 
लोकोक्तियाँ और मुहावरे चिरकाल से प्रचलित साहित्यिक-सामाजिक विरासत है। जहाँ नई पीढ़ी इनसे दूर जा रही हैं, वहीं सुनीता अपनी लीक आप बनाते हुए मुअहवरों को गले लगा रही हैं। मुहावरों को उनकी अर्थवत्ता बनाये रखते हुए दोहे में प्रयोग करना आसान नहीं है। सुनीता एक नहीं दो-दो मुहावरों को एक ही दोहे में खूबसूरती से प्रयोग कर सकी हैं- 
इक अनार बीमार सौ, एक पंथ दो काज। 
एक सहारा ईश का, रख दे कब सर ताज।।
प्रेरणात्मक दोहे अध्याय में नीति परक दोहे अपनी सुषमा बिखेर रहे हैं। एक दोहा देखें- 
लीक तोड़ तीनों चलें, शायर सिंह सपूत। 
लीक लीक तीनों चलें, कायर स्यार कपूत।। 
सुनीता अपनी राह आप बनाने का संकल्प व्यक्त करती हैं-
मन लेता संकल्प यह, देख जगत-व्यवहार। 
गढ़ना निज पथ आप ही, चाहे जो प्रतिकार।। 
शैली की काव्य पंक्ति है- ''अवर स्वीटेस्ट सांग्स आर डोज विच टैल ऑफ़ सैडेस्ट थॉट.'' शैलेन्द्र इसी भाव को अपने तरीके से कहते हैं- ''हैं सबसे मधुर वे गीत जिन्हें हम दर्द के स्वर में गाते हैं''। सुनीता पीड़ा को वीणा बनाकर दर्द के गीत छेड़ने हेतु तत्पर हैं- 
पीड़ा को वीणा बना, छेड़ दर्द के गीत। 
कर आँसू की बारिशें, मन रच दे संगीत।।
लोकोक्ति है 'जैसी करनी, वैसी भरनी', जैसा बोया, वैसा काटो' इसी को अंग्रेजी में 'As you sowso shall you reap' कह कर व्यक्त किया गया है। सुनीता ने 'साधना' और 'प्रारब्ध' के साथ सम्बद्ध कर इस भाव को अधिक उदात्त बनाया है -
जैसी होती साधना, वैसा ही प्रारब्ध। 
शुभ मिलता शुभ कर्म से, विपरीत करे स्तब्ध।। 
एक पारम्परिक दोहा देखिए-
होनी तो होकर रहें अनहोनी ना होय। 
जाको राखे साइयाँ, मार सके नहिं कोय।। 
इस भाव को सुनीता ने वर्तमान के साथ जोड़ते हुए 'माँगन मरन समान है, मत माँगों कोइ भीख' के भाव के साथ सफलतापूर्वक संबद्ध किया है- 
जो होना होकर रहे, उदय या कि अवसान। 
मिलता माँगे से नहीं, सदा रहे यह ध्यान।। 
भारतीय संविधान नागरिक अधिकार के रूप में  विधि के समक्ष सबको समान मानता है। उच्च संवैधानिक पद पर कार्यरत सुनीता की इन मूल्यों में अगाध आस्था होना स्वाभाविक है -
धर्म-कर्म के नाम पर, नफरत को मत तोल।
रचा ईश ने सब जगत, हर मानव अनमोल।।
हर मानव अनमोल है, ऊँच न कोई नीच। 
चाह कमल को तू अगर, भूल न उद्गम कीच।।
मैथिलीशरण गुप्त पंचवटी में लिखते हैं- 
जितने कष्ट-कंटकों में है जिसका जीवन सुमन खिला।  
गौरव गंध उन्हें उतना ही, यत्र-तत्र-सर्वत्र मिला।।
सुनीता की अनुभूति है-
जब घेरे तम तब जला, दैविक अंतर-दीप। 
मिल जाएगी राह मन, बन जायेगा सीप।। 
बढ़ते पग यदि धुंध में, मिल जाती है राह। 
बाधा मुश्किल आपदा, लें हिम्मत की थाह।। 
तुलसी कहते हैं - 'कर्म प्रधान बिस्व करि रखा, जो जस करहि सो तस फल चाखा'। कृष्ण गीता में 'कर्मण्येवाधिकारस्ते माँ फलेषु कदाचन' का मर उपदेश देते हैं। सुनीता की रग-रग में कर्म के प्रति अगाध श्रद्धा है।'सीख तैरना यत्न कर' -१८६,  'कर्म करें रह मौन' -२१७, 'बन निज जीवन सारथी'- २२१ आदि में सुनीता कर्मयोग की महत्ता प्रतिपादित करती हैं। 
'एकहि साधे सब सधे, सब साधे सब जाय' की विरासत को सुनीता ने बखूबी गहा और कहा है - 'मन साधे सब सध चले' - २१८, 'होनी तो होकर रहे, अनहोनी ना होय' की अनुभूति की सुनीता के अंदाज में अदायगी देखें - 'अनहोनी कब हो भला, बस होनी हो मीत' - १७४। 
'सत्यं ब्रूयात प्रियं ब्रूयात /  मा ब्रूयात सत्यं अप्रियं' सुभाषित को सुनीता ने आत्मसात कर बयां किया है-
कब कैसे क्या बोलना?, रहे कला यह पास। 
मीठी वाणी से मिले पतझड़ में मधुमास।। 
'धीरज धरम मित्र अरु नारी, आपत काल परिखहहिं चारी' तुलसीदास की इस पंक्ति में छिपा अर्थ सुनीता ने आत्मसात किया है। वह कहती हैं- 'धीरज से ही पार हो कठिन काल का चक्र।'
'रहिमन बिपदा हूँ भली, जो थोड़े दिन होय' से भिन्न प्रतीति है सुनीता की -
मुश्किल जितनी अधिक हो, उतना निखरे आज। 
सुनीता के दोहों में यत्र-तत्र दामिनी सी चमकती है जो उनके उज्जवल भविष्य का संकेत करती है- 
जीवन मूरत गढ़ रही, कुदरत संगतराश। 
टूटन-फूटन पीर से, होना नहीं निराश।।'
तबला ढोलक बाँसुरी, वीणा झांझ सितार। 
सारंगी या शंख सब, भर दें हिय झंकार।।
प्रकृति पर दोहे शीर्षक के अंतर्गत सुनीता का दोहाकार अपनी कुशलता की छाप छोड़ता है। प्रकृति को भारतीय दर्शन माता कहकर पूजता है, उसका शोषण नहीं करता। 
हारा मन जा बैठता, जब कुदरत के पास। 
पता वापस जोश फिर, भर लाता है आस।।
मंद-मंद मकरंद की, मोहक मधुर मिठास।                 
श्रृंगारिक मधुमास में, घोल रही उल्लास।।
पर्यावरण प्रदूषण की विकराल समस्या से चेताती हैं सुनीता- 
चेत अभी भी जाइये, बचा रहे संसार। 
भावी पीढ़ी को मिले संसाधन अभिसार।। 
'सीप के मोती' के दोहे अनेकता में एकता के प्रतीक हैं। इनमें अतीत से मिली साझा विरासत, संविधान प्रदत्त कर्त्व्याधिकार, मानव मन की विडंबना, श्रमिकों के प्रति सद्भाव, शृंगार और करुणा सभी कुछ है। इन दोहों में शल्प पर कथ्य को वरीयता दी गयी है। दोहों की भाषा कथ्यानुरूप अमिधा, व्यंजना व लक्षणा से युक्त है। शब्द -चयन कथ्यानुरूप है। यदा-कदा लोक रंग बिखरे हैं।  पाठकों को ये दोहे पसद आएंगे और सुधिजनों द्वारा भी सराहे जायेंगे। सुनीता की सृजन साधना भविष्य में कई पड़ाव पार करने की सामर्थ्य रखती है। 
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संपर्क- आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', संचालक विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, चलभाष ९४२५१८३२४४, ईमेल salil.sanjiv@gmail.com   

   

  

  
   
 
  

नवगीत चिरैया!

नवगीत
चिरैया!
*
चिरैया!
आ, चहचहा
*
द्वार सूना
टेरता है।
राह तोता
हेरता है।
बाज कपटी
ताक नभ से-
डाल फंदा
घेरता है।
सँभलकर चल
लगा पाए,
ना जमाना
कहकहा।
चिरैया!
आ, चहचहा
*
चिरैया
माँ की निशानी
चिरैया
माँ की कहानी
कह रही
बदले समय में
चिरैया
कर निगहबानी
मनो रमा है
मन हमेशा
याद सिरहाने
तहा
चिरैया!
आ चहचहा
*
तौल री पर
हारना मत।
हौसलों को
मारना मत।
मत ठिठकना,
मत बहकना-
ख्वाब अपने
गाड़ना मत।
ज्योत्सना
सँग महमहा
चिरैया!
आ, चहचहा
*
२१-८-२०१९
७९९९५५९६१८
*