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सोमवार, 17 अगस्त 2020

राखी गीत

राखी गीत
*
बंधनों से मुक्त हो जा
*
बंधनों से मुक्त हो जा
कह रही राखी मुखर हो
कभी अबला रही बहिना
बने सबला अब प्रखर हो
तोड़ देना वह कलाई
जो अचाहे राह रोके
काट लेना जुबां जो
फिकरे कसे या तुझे टोंके
सासरे जा, मायके से
टूट मत, संयुक्त हो जा
कह रही राखी मुखर हो
बंधनों से मुक्त हो जा
बलि न तेरे हौसलों को
रीति वामन कर सके अब
इरादों को बाँध राखी
तू सफलता वर सके अब
बाँध रक्षा सूत्र तू ही
ज़िंदगी को ज़िंदगी दे
हो समर्थ-सुयोग्य तब ही
समय तुझको बन्दगी दे
स्वप्न हर साकार करने
कोशिशों के बीज बो जा
नयी फसलें उगाना है
बंधनों से मुक्त हो जा
पूज्य बन जा राम राखी
तुझे बाँधेगा जमाना
सहायक हो बँधा लांबा
घरों में रिश्ते जिलाना
वस्त्र-श्रीफल कर समर्पित
उसे जो सब योग्य दिखता
अवनि की हर विपद हर ले
शक्ति-वंदन विश्व करता
कसर कोई हो न बाकी
दाग-धब्बे दिखे धो जा
शिथिल कर दे नेह-नाते
बंधनों से मुक्त हो जा
- संजीव सलिल
१५ अगस्त २०१६

लघुकथा- टूटती शाखें

लघुकथा-
टूटती शाखें
*
नुक्कड़ पर खड़े बरगद की तरह बब्बा भी साल-दर-साल होते बदलावों को देखकर मौन रह जाते थे। परिवार में खटकते चार बर्तन अब पहले की तरह एक नहीं रह पा रहे थे। कटोरियों को थाली से आज़ादी चाहिए थी तो लोटे को बाल्टी की बन्दिशें अस्वीकार्य थीं। फिर भी बरसों से होली-दिवाली मिल-जुलकर मनाई जा रही थी।
राजनीति के राजमार्ग के रास्ते गाँव में घुसपैठ कर चुका शहर ने टाट पट्टियों पर बैठकर पढ़ते बच्चे-बच्चियों को ऐसा लुभाया कि सुनहरे कल के सपनों को साकार करने के लिए अपनों को छोड़कर, शहर पहुँच कर छात्रावसों के पिंजरों में कैद हो गए।
कुछ साल बाद कुछ सफलता के मद में और शेष असफलता की शर्म से गाँव से मुँह छिपाकर जीने लगे। कभी कोई आता-जाता गाँववाला किसी से टकरा जाता तो राम राम दुआ सलाम करते हुए समाचार देता तो समाचार न मिलने को कुशल मानने के आदी हो चुके बब्बा घबरा जाते। ये समाचार नए फूल खिलने के कम हो होते थे जबकि चाहे जब खबरें बनती रहती थीं टूटती शाखें।
***

दोहे - मुक्तक

दोहा सलिला 
श्री-प्रकाश पाकर बने, तमस चन्द्र सा दिव्य.
नहीं खासियत तिमिर की, श्री-प्रकाश ही भव्य ..
*
आशा-आकांक्षा लिये, सबकी जीवन-डोर.
'सलिल' न अब तक पा सका, कहाँ ओर या छोर.
*
मुक्तक :
अधरों पर सोहे मुस्कान
नित गाओ कोयल सम गान
हर बाधा पर विजयी हो -
शीश उठा रह सीना तान
*
मन की पीड़ा को शब्दों ने जब-जब भी गाया है
नूर खुदाई उनमें बरबस उतर-उतर आया है
करा कीर्तन सलिल रूप का, लीन हुआ सुध खोकर
संगत-रंगत में सपना साकार हुआ पाया है
*

रविवार, 16 अगस्त 2020

नवगीत पीटो ढोल बजाओ मँजीरा

नवगीत 
संजीव
*
पीटो ढोल
बजाओ मँजीरा
*
भाग गया परदेशी शासन
गूँज रहे निज देशी भाषण
वीर शहीद स्वर्ग से हेरें
मँहगा होता जाता राशन
रँगे सियार शीर्ष पर बैठे
मालिक बेबस नौकर ऐंठे
कद बौने, लंबी परछाई
सूरज लज्जित, जुगनू ऐंठे
सेठों की बन आयी, भाई
मतदाता की शामत आई
प्रतिनिधि हैं कुबेर, मतदाता
हुआ सुदामा, प्रीत न भायी
मन ने चाही मन की बातें
मन आहत पा पल-पल घातें
तब-अब चुप्पी-बहस निरर्थक
तब भी, अब भी काली रातें
ढोंग कर रहे
संत फकीरा
पीटो ढोल
बजाओ मँजीरा
*
जनसेवा का व्रत लेते जो
धन-सुविधा पा क्षय होते वो
जनमत की करते अवहेला
जनहित बेच-खरीद गये सो
जनहित खातिर नित्य ग्रहण बन
जन संसद को चुभे दहन सम
बन दलाल दल करते दलदल
फैलाते केवल तम-मातम
सरहद पर उग आये कंटक
हर दल को पर दल है संकट
नाग, साँप, बिच्छू दल आये
किसको चुनें-तजें, है झंझट
क्यों कोई उम्मीदवार हो?
जन पर क्यों बंदिश-प्रहार हो?
हर जन जिसको चाहे चुन ले
इतना ही अब तो सुधार हो
मत मतदाता
बने जमूरा?
पीटो ढोल
बजाओ मँजीरा
*
चयनित प्रतिनिधि चुन लें मंत्री
शासक नहीं, देश के संत्री
नहीं विपक्षी, नहीं विरोधी
हटें दूर पाखंडी तंत्री
अधिकारी सेवक मनमानी
करें न, हों विषयों के ज्ञानी
पुलिस न नेता, जन-हित रक्षक
हो, तब ऊगे भोर सुहानी
पारदर्शितामय पंचायत
निर्माणों की रचकर आयत
कंकर से शंकर गढ़ पाये
सब समान की बिछा बिछायत
उच्छृंखलता तनिक नहीं हो
चित्र गुप्त अपना उज्जवल हो
गौरवमय कल कभी रहा जो
उससे ज्यादा उज्जवल कल हो
पूरा हो
हर स्वप्न अधूरा
पीटो ढोल
बजाओ मँजीरा
*
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विरासत देवराज दिनेश

विरासत
देवराज दिनेश
*
आह्वान
ध्यान से सुनें राष्ट्र-संतान, राष्ट्र का मंगलमय आह्वान.
राष्ट्र को आज चाहिए दान , दान में नवयुवकों के प्राण.
राष्ट्र पर घिरी आपदा डेक,सजग हों युग के भामाशाह
दान में दे अपना सर्वस्व और पूरी कर मन की चाह
राष्ट्र के रक्षा के हित आज,खोल दो अपना कोष कुबेर
नहीं तो पछताओगे मीत,हो गई अगर तनिक भी देर
समझकर हमें निहत्था,प्रबल शत्रु ने हम पर किया प्रहार
किन्तु अपना तो यह आदर्श,किसी का रखते नहीं उधार
हमें भी ब्याज सहित प्रतिउत्तर उनको देना है तत्काल
शीघ्र अपनानी होगी शिव को रिपु के नरमुंडों की माल
राष्ट्र को आज चाहिए वीर, वीर भी हठी हमीर समान .
राष्ट्र को आज चाहिए दान , दान में नवयुवकों के प्राण.
राष्ट्र के कण-कण में आज उठ रही गर्वीली आवाज़
वक्ष पर झेल प्रबल तूफान शत्रु पर हमें गिरानी गाज
देश की सीमाओं पर पागल कौवे मचा रहे हैं शोर
अभी देगा उनको झकझोर,बली गोविन्द सिंह का बाज
किया था हमने जिससे नेह,दिया था जिसको अपना प्यार
बना वह आस्तीन का सांप,हमीं पर आज कर रहा वार
समझ हमको उन्मत्त मयूर,मगन-मन देख नृत्य में लीन
किया आघात,न उसको ज्ञात,सांप है मोरों का आहार
राष्ट्र चाहेगा जैसा,वैसा हीं अब हम देंगे बलिदान .
राष्ट्र को आज चाहिए दान , दान में नवयुवकों के प्राण.
राष्ट्र को चाहिए देवी कैकेयी का अदम्य उत्साह
धूरी टूटे रण की,दे बाँह, पराजय को दे जय की राह
राष्ट्र को आज चाहिए गीता के नायक का वह उद्घोष
मोह ताज हर अर्जुन के मानस-पट पर लहराए आक्रोश
आधुनिक इन्द्र कर रहा आज राष्ट्र हित इंद्रधनुष निर्माण
यही है धर्म बनें हम इंद्रधनुष की प्रत्यंचा के बाण
इन्द्र-धनु रूपी प्रबल एकता की सतरंगी छवि को देख
शत्रु के माथे पर भी आज खिंच रही है चिंता की रेख
राष्ट्र को आज चाहिए एकलव्य से साधक निष्ठावान.
राष्ट्र को आज चाहिए दान , दान में नवयुवकों के प्राण.
राष्ट्र को आज चाहिए चंद्रगुप्त की प्रबल संगठन-शक्ति
राष्ट्र को आज चाहिए अपने प्रति राणाप्रताप की शक्ति
राष्ट्र को आज चाहिए रक्त, शत्रु का हो या अपना रक्त
राष्ट्र को आज चाहिएभक्त, भक्त भी भगतसिंह के भक्त
राष्ट्र को आज चाहिए फिर बादल जैसे बालक रणधीर
राष्ट्र की सुख-समृद्धि ले आयें,तोड़ रिपु कारा की प्राचीर
और बूढ़े सेनानी गोरा की वह गर्व भरी हुंकार
शत्रु के छूट जाये प्राण, अगर दे मस्ती से ललकार
राष्ट्र को आज चाहिए फिर अपना अल्हड़ टीपू सुल्तान
राष्ट्र को आज चाहिए दान , दान में नवयुवकों के प्राण.
आज अनजाने में ही प्रबल शत्रु ने करके वज्र प्रहार
हमारे जनमानस की चेतना के खोल दिये हैं द्वार
राष्ट्र-हित इससे पहले कभी न जागी थी ऐसी अनुरक्ति
संगठित होकर रिपु से आज बात कर रही हमारी शक्ति
प्रतापी शक्तिसिंह भी देश-द्रोह का जामा आज उतार
राष्ट्र की तूफानी लहरों में करता है गति का संचार
आज फिर नूतन हिंदुस्तान लिख रहा है अपना इतिहास.
राष्ट्र के पन्ने-पन्ने पर अंकित अपना अदम्य विश्वास .
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मत कहना
मैं तेरे पिंजरे का तोता
तू मेरे पिंजरे की मैना
यह बात किसी से मत कहना।
*
मैं तेरी आंखों में बंदी
तू मेरी आंखों में प्रतिक्षण
मैं चलता तेरी सांस–सांस
तू मेरे मानस की धड़कन
मैं तेरे तन का रत्नहार
तू मेरे जीवन का गहना!
यह बात किसी से मत कहना!!
*
हम युगल पखेरू हंस लेंगे
कुछ रो लेंगे कुछ गा लेंगे
हम बिना बात रूठेंगे भी
फिर हंस कर तभी मना लेंगे
अंतर में उगते भावों के
जलजात किसी से मत कहना!
यह बात किसी से मत कहना!!
*
क्या कहा! कि मैं तो कह दूंगी!
कह देगी तो पछताएगी
पगली इस सारी दुनियां में
बिन बात सताई जाएगी
पीकर प्रिये अपने नयनों की बरसात
विहंसती ही रहना!
यह बात किसी से मत कहना!!
*
हम युगों युगों के दो साथी
अब अलग अलग होने आए
कहना होगा तुम हो पत्थर
पर मेरे लोचन भर आए
पगली इस जग के अतल–सिंधु मे
अलग अलग हमको बहना!
यह बात किसी से मत कहना!!
***

गीत

गीत
*
किसके-किसके नाम करूँ मैं, अपने गीत बताओ रे!
किसके-किसके हाथ पिऊँ मैं, जीवन-जाम बताओ रे!!
*
चंद्रमुखी थी जो उसने हो, सूर्यमुखी धमकाया है
करी पंखुड़ी बंद भ्रमर को, निज पौरुष दिखलाया है
''माँगा है दहेज'' कह-कहकर, मिथ्या सत्य बनाया है
किसके-किसके कर जोड़ूँ, आ मेरी जान बचाओ रे!
किसके-किसके नाम करूँ मैं, अपनी पीर बताओ रे!!
*
''तुम पुरुषों ने की रंगरेली, अब नारी की बारी है
एक बाँह में, एक चाह में, एक राह में यारी है
नर निश-दिन पछतायेगा क्यों की उसने गद्दारी है?''
सत्यवान हूँ हरिश्चंद्र, कोई आकर समझाओ रे!
किसके-किसके नाम करूँ कवि की जागीर बताओ रे!!
*
महिलायें क्यों करें प्रशंसा?, पूछ-पूछ कर रूठ रही
खुद सवाल कर, खुद जवाब दे, विषम पहेली बूझ रही
द्रुपदसुता-सीता का बदला, लेने की क्यों सूझ रही?
झाड़ू, चिमटा, बेलन, सोंटा कोई दूर हटाओ रे!
किसके-किसके नाम करूँ अपनी तकदीर बताओ रे!!
*
देवदास पारो को समझ न पाया, तो क्यों प्यार किया?
'एक घाट-घर रहे न जो, दे दगा', कहे कर वार नया
'सलिल बहे पर रहता निर्मल', समझाकर मैं हार गया
पंचम सुर में 'आल्हा' गाए, 'कजरी' याद दिलाओ रे!
किसके-किसके नाम करूँ जिव्हा-शमशीर बताओ रे!!
*
मुकुल, सुमन, वीणा, सुषमा, संतोष, पुनीता आएँगी
'पत्नी को परमेश्वर मानो', पाखी पाठ पढ़ाएँगी
पत्नीव्रती न जो कवि होगा, उससे कलम छुड़ाएँगी
कोई भी मौसम हो तुम गुण पत्नी के ही गाओ रे!
किसके-किसके नाम करूँ कवि आहत वीर बताओ रे!!
***

मुक्तिका

मुक्तिका
*
रवि आ भा
छिप जाता
अनकहनी
कहवाता
माटी भी
है माता
जो खोता
वह पाता
मत तोड़ो
मन नाता
जो आता
वह जाता
पथ-भूला
समझाता
**
१७-८-२०२० 

मुक्तक सलिला

मुक्तक सलिला :
संजीव
*
नयन में शत सपने सुकुमार
अधर का गीत करे श्रृंगार
दंत शोभित ज्यों मुक्तामाल
केश नागिन नर्तित बलिहार
*
भौंह ज्यों प्रत्यंचा ली तान
दृष्टि पत्थर में फूंके जान
नासिका ऊँची रहे सदैव
भाल का किंचित घटे न मान
*
सुराही कंठ बोल अनमोल
कर्ण में मिसरी सी दे घोल
कपोलों पर गुलाब खिल लाल
रहे नपनों-सपनों को तोल
*

शनिवार, 15 अगस्त 2020

पति शिव सा ही क्यों ?

हिंदू मान्यताएं कहती हैं कि बेटा राम सा हो, प्रेमी कृष्ण सा, लेकिन पति शिव सा होना चाहिए..!
शिव का प्रेम सरल है, सहज है, उसमें समर्पण के साथ सम्मान भी है. शिव प्रथम पुरुष हैं, फिर भी उनके किसी स्वरूप में पुरुषोचित अहंकार यानी मेल ईगो नहीं झलकता. सती के पिता दक्ष से अपमानित होने के बाद भी उनका मेल ईगो उनके दाम्पत्य में कड़वाहट नहीं जगाता. अपने लिए न्‍योता नहीं आने पर भी सती के मायके जाने की जिद का शिव ने सहजता से सम्मान किया.
आज के समय में भी कितने ऐसे मर्द हैं, जो पत्नी के घरवालों के हाथों अपमानित होने के बाद उसका उनके पास वापस जाना सहन कर पाएंगे? शिव का पत्नी के लिए प्यार किसी तीसरे के सोचने-समझने की परवाह नहीं करता. लेकिन जब पत्नी को कोई चोट पहुंचती है, तब उनके क्रोध में सृष्टि को खत्म कर देने का ताप आ जाता है.
शक्ति के प्रति अपने प्रेम में शिव खुद को खाली कर देते हैं. कहते हैं, पार्वती का हाथ मांगने शिव, उनके पिता हिमालय के दरबार में सुनट नर्तक का रूप धरकर पहुंच गए थे. हाथों में डमरू लिए, अपने नृत्य से हिमालय को प्रसन्न कर जब शिव को कुछ मांगने को कहा गया, तब उन्होंने पार्वती का हाथ उनसे मांगा.

शिव न अपने प्रेम का हर्ष छिपाना जानते हैं, न अपने विरह का शोक. उनका प्रेम निर्बाध और नि:संकोच है, वह मर्यादा और अमर्यादा की सामयिक और सामाजिक परिभाषा की कोई परवाह नहीं करता. अपने ही विवाह भोज में जब शिव को खाना परोसा गया, तो श्वसुर हिमालय का सारा भंडार खाली करवा देने के बाद भी उनका पेट नहीं भरा. आखिरकार उनकी क्षुधा शांत करने पार्वती को ही संकोच त्याग उन्हें अपने हाथों से खिलाने बाहर आना पड़ता है. फिर पार्वती के हाथों से तीन कौर खाने के बाद ही शिव को संतुष्टि मिल गई.
यूं व्यावहारिकता के मानकों पर देखा जाए, तो शिव के पास ऐसा कुछ भी नहीं, जिसे देख-सुनकर ब्याह पक्का कराने वाले मां-बाप अपने बेटी के लिए ढूंढते हैं. औघड़, फक्कड़, शिव, कैलाश पर पत्नी की इच्छा पूरी करने के लिए एक घर तक नहीं बनवा पाए, तप के लिए परिवार छोड़ वर्षों दूर रहने वाले शिव. साथ के जो सेवक वो भी मित्रवत, जिनके भरण की सारी जिम्मेदारी माता पार्वती पर. पार्वती के पास अपनी भाभी, लक्ष्मी की तरह एश्वर्य और समृद्धि का भी कोई अंश नहीं.

फिर भी शिव के संसर्ग में पार्वती के पास कुछ ऐसा है, जिसे हासिल कर पाना आधुनिक समाज की औरतों के लिए आज भी बड़ी चुनौती है. पार्वती के पास अपने फैसले स्वयं लेने की आजादी है. वो अधिकार, जिसके सामने दुनिया की तमाम दौलत फीकी पड़ जाए.
पार्वती के हर निर्णय में शिव उनके साथ है. पुत्र के रूप में गणेश के सृजन का फैसला पार्वती के अकेले का था, वो भी तब, जब शिव तपस्या में लीन थे. लेकिन घर लौटने पर गणेश को स्वीकार कर पाना शिव के लिए उतना ही सहज रहा, बिना कोई प्रश्न किए, बिना किसी संदेह के. पार्वती का हर निश्चय शिव को मान्य है.
शिव अपनी पत्नी के संरक्षक नहीं, पूरक हैं. वह अपना स्वरूप पत्नी की तत्कालिक जरूरतों के हिसाब से निर्धारित करते हैं. पार्वती के मातृत्व रूप को शिव के पौरुष का संरक्षण है, तो रौद्र रूप धर विनाश के पथ पर चली काली के चरणों तले लेट जाने में भी शिव को कोई संकोच नहीं.

शिव के पौरुष में अहंकार की ज्वाला नहीं, क्षमा की शीतलता है. किसी पर विजय पाने के लिए शिव ने कभी अपने पौरुष को हथियार नहीं बनाया, कभी किसी के स्त्रीत्व का फायदा उठाकर उसका शोषण नहीं किया. शिव ने छल से कोई जीत हासिल नहीं की. शिव का जो भी निर्णय है, प्रत्यक्ष है.
वहीं दूसरी ओर शक्ति अपने आप में संपूर्ण है, अपने साथ पूरे संसार की सुरक्षा कर सकने में सक्षम. उन्हें पति का साथ अपने सम्मान और रक्षा के लिए नहीं चाहिए, प्रेम और साहचर्य के लिए चाहिए. इसलिए शिव और शक्ति का साथ बराबरी का है. पार्वती, शिव की अनुगामिनी नहीं, अर्धांगिनी हैं.
कथाओं की मानें, तो चौसर खेलने की शुरुआत शिव और पार्वती ने ही की. इससे इस बात की पुष्टि होती है कि गृहस्थ जीवन में केवल कर्तव्य ही नहीं होते, स्वस्थ रिश्ते के लिए साथ बैठकर मनोरंजन और आराम के पल बिताना भी उतना ही जरूरी है. शिव और पार्वती का साथ सुखद गृहस्थ जीवन का अप्रतिम उदाहरण है.

दोहा पचेली

दोहा पचेली में
*
ठाँड़ी खेती खेत में, जब लौं अपनी नांय।
गाभिन गैया ताकियो, जब लौं नई बिआय।।
*
नीलकंठ कीरा भखैं, हमें दरस से काम।
कथरिन खों फेंकें नई, चिलरन भले तमाम।।
*
बाप न मारी लोखरी, बीटा तीरंदाज।
बात मम्योरे की करें, मामा से तज लाज।।
*
पानी में रै कहें करें, बे मगरा सें बैर।
बैठो मगरा-पीठ पे, बानर करबे सैर।।
*
घर खों बैरी ढा रओ, लंका कैसो पाप।
कूकुर धोए बच्छ हो, कबऊँ न बचियो आप।।
*
६.८.२०१८

व्यंग्य कविता: मौसमी बुखार

सामयिक व्यंग्य कविता:
मौसमी बुखार
संजीव 'सलिल'
**
अमरीकनों ने डटकर खाए
सूअर मांस के व्यंजन
और सारी दुनिया को निर्यात किया
शूकर ज्वर अर्थात स्वाइन फ़्लू
ग्लोबलाइजेशन अर्थात
वैश्वीकरण का सुदृढ़ क्लू..
*'
वसुधैव कुटुम्बकम'
भारत की सभ्यता का अंग है
हमारी संवेदना और सहानुभूति से
सारी दुनिया दंग है.
हमने पश्चिम की अन्य अनेक बुराइयों की तरह
स्वाइन फ़्लू को भी
गले से लगा लिया.
और फिर शिकार हुए मरीजों को
कुत्तों की मौत मरने से बचा लिया
अर्थात डॉक्टरों की देख-रेख में
मौत के मुँह में जाने का सौभाग्य (?) दिलाकर
विकसित होने का तमगा पा लिया.
*
प्रभु ने शूकर ज्वर का
भारतीयकरण कर दिया
उससे भी अधिक खतरनाक
मौसमी ज्वर ने
नेताओं और कवियों की
खाल में घर कर लिया.
स्वाधीनता दिवस निकट आते ही
घडियाली देश-प्रेम का कीटाणु,
पर्यवरण दिवस निकट आते ही
प्रकृति-प्रेम का विषाणु,
हिन्दी दिवस निकट आते ही
हिन्दी प्रेम का रोगाणु,
मित्रता दिवस निकट आते ही
भाई-चारे का बैक्टीरिया और
वैलेंटाइन दिवस निकट आते ही
प्रेम-प्रदर्शन का लवेरिया
हमारी रगों में दौड़ने लगता है.
*
'एकोहम बहुस्याम' और'
विश्वैकनीडं' के सिद्धांत के अनुसार
विदेशों की 'डे' परंपरा के
समर्थन और विरोध में
सड़कों पर हुल्लड़कामी हुड़दंगों में
आशातीत वृद्धि हो जाती है.
लाखों टन कागज़ पर
विज्ञप्तियाँ छपाकर
वक्तव्यवीरों की आत्मा
गदगदायमान होकर
अगले अवसर की तलाश में जुट जाती है.
मौसमी बुखार की हर फसल
दूरदर्शनी कार्यक्रमों,संसद व् विधायिका के सत्रों का
कत्ले-आम कर देती है
और जनता जाने-अनजाने
अपने खून-पसीने की कमाई का
खून होते देख आँसू बहाती है.
*******

समीक्षा : काल है संक्रांति का - रामदेव लाल 'विभोर'

पुस्तक चर्चा-
नवगीत के निकष पर "काल है संक्रांति का"
रामदेव लाल 'विभोर'
*
[पुस्तक परिचय - काल है संक्रांति का, गीत-नवगीत संग्रह, कवि आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', प्रकाशक- समन्वय प्रकाशन अभियान, २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१ म. प्र. दूरभाष ०७६१ २४१११३१, प्रकाशन वर्ष २०१६, मूल्य सजिल्द ३००/-, पेपरबैंक २००/-, कवि संपर्क चलभाष ९४२५१८३२४४, दूरलेख salil.sanjiv@gmail.com ]
*
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' विरचित गीत-कृति "काल है संक्रांति का" पैंसठ गीतों से सुसज्जित एक उत्तम एवं उपयोगी सर्जना है। इसे कृतिकार ने गीत व नवगीत संग्रह स्वयं घोषित किया है। वास्तव में नवगीत, गीत से इतर नहीं है किन्तु अग्रसर अवश्य है। अब गीत की अजस्र धारा वैयक्तिकता व अध्यात्म वृत्ति के तटबन्ध पर कर युगबोध का दामन पकड़कर चलने लगी है। गीतों में व्याप्त कलात्मकता व भावात्मकता में नवता के स्वरूप ने उसे 'नवगीत' नामित किया है। युगानुकूल परिवर्तन हर क्षेत्र में होता आ रहा है। अत:, गीतों में भी हुआ है। नवगीत में गीत के कलेवर में नयी कविता के भाव-रंग दिखते हैं। नए बिंब, नए उपमान, नए विचार, नयी कहन, वैशिष्ट्य व देश-काल से जुडी तमाम नयी बातों ने नवगीत में भरपूर योगदान दिया है। नवगीत प्रियतम व परमात्मा की जगह दीन-दुखियों की आत्मा को निहारता है जिसे दीनबन्धु परमात्मा भी उपयुक्त समझता होगा।

स्वर-देव चित्रगुप्त तथा वीणापाणी वंदना से प्रारंभ प्रस्तुत कृति के गीतों का अधिकांश कथ्य नव्यता का पक्षधर है। अपने गीतों के माध्यम से कृतिकार कहता है कि 'नव्यता संप्रेषणों में जान भरती' है और 'गेयता संवेदनों का गान करती' है। नवगीत को एक प्रकार से परिभाषित करनेवाली कृतिकार की इन गीत-पंक्तियों की छटा सटीक ही नहीं मनोहारी भी है। निम्न पंक्तियाँ विशेष रूप से दृष्टव्य हैं-
''नव्यता संप्रेषणों में जान भरती / गेयता संवेदनों का गान करती''
''सरलता-संक्षिप्तता से बात बनती / मर्मबेधकता न हो तो रार ठनती''
''लाक्षणिकता, भाव, रस, रूपक सलोने, बिम्ब टटकापन मिले बारात सजती''
''नाचता नवगीत के संग लोक का मन / ताल-लय बिन बेतुकी क्यों रहे कथनी?''
''छंद से अनुबंध दिखता या न दिखता / किंतु बन आरोह या अवरोह पलता'' -पृष्ठ १३-१४
इस कृति में 'काल है संक्रांति का' नाम से एक बेजोड़ शीर्षक-गीत भी है। इस गीत में सूरज को प्रतीक रूप में रख दक्षिणायन की सूर्य-दशा की दुर्दशा को एक नायाब तरीके से बिम्बित करना गीतकार की अद्भुत क्षमता का परिचायक है। गीत में आज की दशा और कतिपय उद्घोष भरी पंक्तियों में अभिव्यक्ति की जीवंतता दर्शनीय है-
''दक्षिणायन की हवाएँ कँपाती हैं हाड़
जड़ गँवा, जड़ युवा पीढ़ी काटती है झाड़'' -पृष्ठ १५

"जनविरोधी सियासत को कब्र में दो गाड़
झोंक दो आतंक-दहशत, तुम जलाकर भाड़" -पृष्ठ १६

कृति के गीतों में राजनीति की दुर्गति, विसंगतियों की बाढ़, हताशा, नैराश्य, वेदना, संत्रास, आतंक, आक्रोश के तेवर आदि नाना भाँति के मंज़र हैं जो प्रभावी ही नहीं, प्रेरक भी हैं। कृति से कुछ पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं-
"प्रतिनिधि होकर जन से दूर / आँखें रहते भी हो सूर" -पृष्ठ २०
"दोनों हाथ लिए लड्डू / रेवड़ी छिपा रहा नेता
मुँह में लैया-गजक भरे / जन-गण को ठेंगा देता" - पृष्ठ २१

"वह खासों में खास है / रुपया जिसके पास है....
.... असहनीय संत्रास है / वह मालिक जग दास है" - पृष्ठ ६८

"वृद्धाश्रम, बालश्रम और / अनाथालय कुछ तो कहते है
महिलाश्रम की सुनो सिसकियाँ / आँसू क्यों बहते रहते हैं?" - पृष्ठ ९४

"करो नमस्ते या मुँह फेरो / सुख में भूलो, दुःख में हेरो" - पृष्ठ ४७
ध्यान आकर्षण करने योग्य बात कि कृति में नवगीतकार ने गीतों को नव्यता का जामा पहनाते समय भारतीय वांग्मय व् परंपरा को दृष्टि में रखा है। उसे सूरज प्रतीक पसन्द है। कृति के कई गीतों में उसका प्रयोग है। चन्द पंक्तियाँ उद्धरण स्वरूप प्रस्तुत हैं -
"चंद्र-मंगल नापकर हम चाहते हैं छुएँ सूरज"
"हनु हुआ घायल मगर वरदान तुमने दिए सूरज" -पृष्ठ ३७
"कैद करने छवि तुम्हारी कैमरे हम भेजते हैं"
"प्रतीक्षा है उन पलों की गले तुमसे मिलें सूरज" - पृष्ठ ३८
कृति के गीतों में लक्षणा व व्यंजना शब्द-शक्तियों का वैभव भरा है। यद्यपि कतिपय यथार्थबोधक बिम्ब सरल व स्पष्ट शब्दों में बिना किसी लाग-लपेट के विद्यमान हैं किन्तु बहुत से गीत नए लहजे में नव्य दृष्टि के पोषक हैं। निम्न पंक्तियाँ देखें-
"टाँक रही है अपने सपने / नए वर्ष में धूप सुबह की" - पृष्ठ ४२
"वक़्त लिक्खेगा कहानी / फाड़ पत्थर मैं उगूँगा" - पृष्ठ ७५
कई गीतों में मुहावरों का का पुट भरा है। कतिपय पंक्तियाँ मुहावरों व लोकोक्तियों में अद्भुत ढंग से लपेटी गई हैं जिनकी चारुता श्लाघनीय हैं। एक नमूना प्रस्तुत है-
"केर-बेर सा संग है / जिसने देखा दंग है
गिरगिट भी शरमा रहे / बदला ऐसा रंग है" -पृष्ठ ११५

कृति में नवगीत से कुछ इतर जो गीत हैं उनका काव्य-लालित्य किंचित भी कम नहीं है। उनमें भी कटाक्ष का बाँकपन है, आस व विश्वास का पिटारा है, श्रम की गरिमा है, अध्यात्म की छटा है और अनेक स्थलों पर घोर विसंगति, दशा-दुर्दशा, सन्देश व कटु-नग्न यथार्थ के सटीक बिम्ब हैं। एक-आध नमूने दृष्टव्य हैं -
"पैला लेऊँ कमिसन भारी / बेंच खदानें सारी
पाछूँ घपले-घोटालों सौं / रकम बिदेस भिजा री!" - पृष्ठ ५१

"कर्म-योग तेरी किस्मत में / भोग-रोग उनकी किस्मत में" - पृष्ठ ८०
वेश संत का मन शैतान / खुद को बता रहे भगवान" - पृष्ठ ८७
वही सत्य जो निज हित साधे / जन को भुला तन्त्र आराधें" - पृष्ठ ११८
कृति की भाषा अधिकांशत: खड़ी बोली हिंदी है। उसमें कहीं-कहीं आंचलिक शब्दों से गुरेज नहीं है। कतिपय स्थलों पर लोकगीतों की सुहानी गंध है। गीतों में सम्प्रेषणीयता गतिमान है। माधुर्य व प्रसाद गुण संपन्न गीतों में शांत रस आप्लावित है। कतिपय गीतों में श्रृंगार का प्रवेश नेताओं व धनाढ्यों पर ली गयी चुटकी के रूप में है। एक उदाहरण दृष्टव्य है -
इस करवट में पड़े दिखाई / कमसिन बर्तनवाली बाई
देह साँवरी नयन कँटीले / अभी न हो पाई कुड़माई
मलते-मलते बर्तन खनके चूड़ी / जाने क्या गाती है?
मुझ जैसे लक्ष्मीपुत्र को / बना भिखारी वह जाती है - पृष्ठ ८३

पूरे तौर पर यह नवगीत कृति मनोरम बन पड़ी है। आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' को इस उत्तम कृति के प्रणयन के लिए हार्दिक साधुवाद।
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समीक्षक संपर्क- ५६५ के / १४१ गिरिजा सदन,
अमरूदही बाग़, आलमबाग, लखनऊ २२६००५, चलभाष- ९३३५७५११८८
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राष्ट्रगीत

!! हमारा राष्ट्रगीत !!
[ इसका प्रथम पद ही हम गाते हैं ]
जन-गण-मन अधिनायक जय हे
भारत-भाग्य-विधाता
पंजाब-सिन्ध-गुजरात-मराठा
द्राविड़-उत्कल-बंग
विन्ध्य-हिमाचल, यमुना-गंगा
उच्छल जलधि तरंग
तव शुभ नामे जागे
तव शुभ आशिष मांगे
गाहे तव जय गाथा
जन-गण-मंगलदायक जय हे
भारत-भाग्य-विधाता
जय हे, जय हे, जय हे
जय-जय-जय, जय हे !
पतन-अभ्युदय-वन्धुर-पंथा
युग-युग धावित यात्री
हे चिर-सारथी
तव रथचक्रे मुखरित पथ दिन-रात्रि
दारुण विप्लव-माँझे
तव शंखध्वनि बाजे
संकट-दुख-श्राता
जन-गण-पथ-परिचायक जय हे
भारत-भाग्य-विधाता
जय हे, जय हे, जय हे
जय-जय-जय, जय हे !
घोर-तिमिर-घन-निविड़-निशीथ
पीड़ित मूर्च्छित-देशे
जागृत दिल तव अविचल मंगल
नत-नत-नयन अनिमेष
दुस्वप्ने आतंके
रक्षा करिजे अंके
स्नेहमयी तुमि माता
जन-गण-मन-दुखत्रायक जय हे
भारत-भाग्य-विधाता
जय हे, जय हे, जय हे !
जय-जय-जय, जय हे
रात्रि प्रभातिल उदिल रविच्छवि
पूरब-उदय-गिरि-भाले
साहे विहंगम, पूर्ण समीरण
नव-जीवन-रस ढाले
तव करुणारुण-रागे
निद्रित भारत जागे
तव चरणे नत माथा
जय-जय-जय हे, जय राजेश्वर
भारत-भाग्य-विधाता
जय हे, जय हे, जय हे
जय-जय-जय, जय हे !
- रवीन्द्रनाथ टैगोर

सामयिक दोहागीत: क्या सचमुच?

सामयिक दोहागीत:
क्या सचमुच?
संजीव
*
क्या सचमुच स्वाधीन हम?
गहन अंधविश्वास सँग
पाखंडों की रीत
शासन की मनमानियाँ
सहें झुका सर मीत
स्वार्थ भरी नजदीकियाँ
सर्वार्थों की मौत
होते हैं परमार्थ नित
नेता हाथों फ़ौत
संसद में भी कर रहे
जुर्म विहँस संगीन हम
क्या सचमुच स्वाधीन हम?
*
तंत्र लाठियाँ घुमाता
जन खाता है मार
उजियारे की हो रही
अन्धकार से हार
सरहद पर बम फट रहे
सैनिक हैं निरुपाय
रण जीतें तो सियासत
हारे, भूल भुलाय
बाँट रहें हैं रेवड़ी
अंधे तनिक न गम
क्या सचमुच स्वाधीन हम?
*
दूषित पर्यावरण कर
मना रहे आनंद
अनुशासन की चिता पर
गिद्ध-भोज सानंद
दहशतगर्दी देखकर
नतमस्तक कानून
बाज अल्पसंख्यक करें
बहुल हंस का खून
सत्ता की ऑंखें 'सलिल'
स्वार्थों खातिर नम
क्या सचमुच स्वाधीन हम?
*
१५-८-२०१४
salil.sanjiv@gmail.com
9425183244

नवगीत - हम वही हैं

नवगीत -
हम वही हैं
*
हम वही हैं,
यह न भूलो
झट उठो आकाश छू लो।
बता दो सारे जगत को
यह न भूलो
हम वही है।
*
हमारे दिल में पली थी
सरफरोशी की तमन्ना।
हमारी गर्दन कटी थी
किंतु
किंचित भी झुकी ना।
काँपते थे शत्रु सुनकर
नाम जिनका
हम वही हैं।
कारगिल देता गवाही
मर अमर
होते हमीं हैं।
*
इंकलाबों की करी जयकार
हमने फेंककर बम।
झूल फाँसी पर गये
लेकिन
न झुकने दिया परचम।
नाम कह 'आज़ाद', कोड़े
खाये हँसकर
हर कहीं हैं।
नहीं धरती मात्र
देवोपरि हमें
मातामही हैं।
*
पैर में बंदूक बाँधे,
डाल घूँघट चल पड़ी जो।
भवानी साकार दुर्गा
भगत के
के संग थी खड़ी वो।
विश्व में ऐसी मिसालें
सत्य कहता हूँ
नहीं हैं।
ज़िन्दगी थीं या मशालें
अँधेरा पीती रही
रही हैं।
*
'नहीं दूँगी कभी झाँसी'
सुनो, मैंने ही कहा था।
लहू मेरा
शिवा, राणा, हेमू की
रग में बहा था।
पराजित कर हूण-शक को
मर, जनम लेते
यहीं हैं।
युद्ध करते, बुद्ध बनते
हमीं विक्रम, 'जिन'
हमीं हैं।
*
विश्व मित्र, वशिष्ठ, कुंभज
लोपामुद्रा, कैकयी, मय ।
ऋषभ, वानर, शेष, तक्षक
गार्गी-मैत्रेयी
निर्भय?
नाग पिंगल, पतंजलि,
नारद, चरक, सुश्रुत
हमीं हैं।
ओढ़ चादर रखी ज्यों की त्यों
अमल हमने
तही हैं।
*
देवव्रत, कौंतेय, राघव
परशु, शंकर अगम लाघव।
शक्ति पूजित, शक्ति पूजी
सिय-सती बन
जय किया भव।
शून्य से गुंजित हुए स्वर
जो सनातन
हम सभी हैं।
नाद अनहद हम पुरातन
लय-धुनें हम
नित नयी हैं।
*
हमीं भगवा, हम तिरंगा
जगत-जीवन रंग-बिरंगा।
द्वैत भी, अद्वैत भी हम
हमीं सागर,
शिखर, गंगा।
ध्यान-धारी, धर्म-धर्ता
कम-कर्ता
हम गुणी हैं।
वृत्ति सत-रज-तम न बाहर
कहीं खोजो,
त्रय हमीं हैं।
*
भूलकर मत हमें घेरो
काल को नाहक न टेरो।
अपावन आक्रांताओं
कदम पीछे
हटा फेरो।
बर्फ पर जब-जब
लहू की धार
सरहद पर बही हैं।
कहानी तब शौर्य की
अगणित, समय ने
खुद कहीं हैं।
*
हम वही हैं,
यह न भूलो
झट उठो आकाश छू लो।
बता दो सारे जगत को
यह न भूलो
हम वही है।
*
salil.sanjiv@gmail.com, ९४२५१८३२४४
#दिव्यनर्मदा
#हिंदी_ब्लॉगर

शुक्रवार, 14 अगस्त 2020

शिकार संस्मरण चहला का आदम खोर

शिकार संस्मरण
चहला का आदम खोर
(आगस्टस समरविले की पुस्तक' एट  मिड नाइट कम्स द किलर' से साभार)
अनुवादक - आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
              यह वर्ष १९५६ था, माह मई हुए स्थान अब लगभग विस्मृत किया जा चुका मयूरभंज जिले में चहला विश्राम गृह... जब मुझे दक्षिण पूर्व रेलवे बेटनोटी में पी.डब्ल्यू.आई. श्री जॉन अपशॉन का एक पत्र मिला जिसमें मुझे एक आदमखोर की गतिविधियों की सूचना दी गयी थी।  मैं दुविधा में था किन्तु अपशॉन ने अपने पत्र के साथ उड़ीसा सरकार  की घोषणा जिसमें बाघ को आदमखोर तथा उसका शिकार करने पर पुरस्कार देने की घोषणा की गयी थी, की प्रतिलिपि संलग्न की थी। तदनुसार मैंने अपशॉन को तार से सूचित किया कि मैं आ रहा हूँ और उसी रात रुपसा के लिए रवाना होकर अगली सुबह ७ बजे पहुँच गया जहाँ अपशॉन प्लेटफॉर्म पर मेरी प्रतीक्षा करते मिले।               
              अपशॉन १९३० में बनी एक पुरानी फोर्ड कार के भाग्यशाली मालिक हैं। भले ही ऐसा न दिखता हो पर मैं मानता हूँ कि यह शक्तिशाली कर माउंट एवरेस्ट की चीटियों पर भी चढ़ सकती है। बहरहाल हम लगभग एक घंटे में बेटनोटी पहुँच गए जहाँ उनकी खुशमिजाज पत्नी सब कुछ तैयार कर चुकी थीं। एक महत्वपूर्ण छोटी हाजरी (मुलाकात) के बाद हम चहला के पहले पड़ाव बारीपद के लिए रवाना हुए। किसी भीतरी क्षेत्र में जाने के लिए पेट्रोल अपरिहार्य है। हमने जितना संभव था, भरा लिया तथा ४ गैलन अलग से रख लिया। फिर हमने चहला में १४ दिन प्रवास के लिए आवश्यक  सामान लिया और चहला के दूसरे पड़ाव जसईपुर की ओर बढ़ गए। जसईपुर पहुँचते पहुँचते शाम हो गयी, यात्रा और गर्मी के कारण बुरी तरह थक चुके हम चहला के लिए आगे बढ़ने से पहले उस रात डाक बंगले में रुके। बारीपद में वन विभाग ने पुष्टि की कि बाघ ने तीन दिन पहले शिकार किया है और वह चहला डाक बंगले से २० मील की परिधि में शिकार करता है। यह महत्वपूर्ण सूचना थी, अपने पूर्व अनुभवों से मुझे ज्ञात था कि अब वह एक सप्ताह में मारा जानेवाला है। जसईपुर में हमारे पहुँचने की खबर फैलते देर न लगी, अपशॉन सुपरिचित स्थानीय खिलाड़ी था, अत; हमसे मिलने और मदद के प्रस्ताव आने लगे जिन्हें अपशॉन ने विन्रमता किन्तु दृढ़ता से ठुकरा दिया। उसने बताया कि चहला डाक बंगले में कई लोगों के जाने से जानवर शंकित होकर उस क्षेत्र को छोड़कर अन्यत्र जा सकता था। 
              चहला की ओर बढ़ते हुए हम गुड़गुड़िया के खूबसूरत फारेस्ट बंगले में रुके। यहाँ वन विभाग की अधिकांश सालाना बैठकेँ होती हैं, इसलिए कर्मचारी तथा देखरेख बढ़िया है। विश्राम के लिए सुविधाजनक होने के बावजूद हमने चहला जाना तय किया। मुख्य कठिनाई सड़क की स्थिति, पशुओं के आने-जाने से बने निशान, उतार-चढ़ाव, पेड़ों से गिरी शाखाएँ थीं। किसी तरह हम गुड़गुड़िया से ६ मील दूर दोराहे पर पहुँचे जहाँ से बाईं शाखा चहला की ओर थी। हम डाक बंगले पहुँच कर सामान उतार ही रहे थे कि एक गठीले झुर्रीदार इंसान दण्डु ने मुखिया और स्थानीय शिकारी के रूप में अपना परिचय दिया  है। उससे नयी विस्तृत जानकारी मिली। तीन दिन पहले पड़ोस के गाँव का एक लकड़हारा  आदमखोर का शिकार बना था पर उसकी लाश नहीं मिली थी। इसका अर्थ था बाघ ने पूरा शरीर खा लिया या ग्रामीणों ने खोजने का प्रयास ही नहीं किया। 
               हम बहुत थके थे और देर भी हो गयी थी, इसलिए तुरंत कुछ करना संभव न था। विचार विमर्श के बाद हमने वृद्ध ग्रामीण को तीन भैंसे देने के लिए मनाया जिन्हें वह उन स्थानों पर बाँधने के लिए सहमत हो गया जहाँ बाघ आया था। हमें उस पर भरोसा नहीं था इसलिए हमने कालिआ जिसे उपशॉन अपने साथ लाये थे को आदेश पालन करने के लिए साथ भेजा। हमें जैसी शंका थी, वृद्ध ने गाँव पहुँचते ही अपना वायदा भुला दिया और कालिया से कहा कि रात हो जाने के कारण भैंसे बँधवाना संभव नहीं है और अपने झोपड़े में चला गया। व्यक्तिगत प्रयास के बिना कुछ न होते देख हम सवेरा होते ही गाँव पहुँच गए, देखा कि वृद्ध ने आधे मन से कोशिश की और दो मरियल भैंसे बँधवा रखे थे। अपशॉन जो स्थानीय बोली अच्छे से बोलते थे ने कहा 'बाघ हड्डियों के इस ढेर में क्या खाने आएगा?' दण्डु मुस्कुराया और बोला 'साहब आप ठीक कह रहे हैं, बाघ इन बेचारे पानियों को खाने क्यों आएगा जब उसे मोती-ताजी लड़कियाँ खाने को मिल रही हैं। लोग हँस पड़े, मैं भी, पर अपशॉन ने नाराजी से कहा 'दण्डु तुम ठीक कह रहे हो, मुखिया होने के नाते तुम चार मोटी ताजी लड़कियाँ जंगल में बँधवा दो, तुम्हें चार अच्छे भैंसों की कीमत मिल जाएगी।'
               कुछ ग्रामीणों ने दान निपोरे पर डाँट का असर यह हुआ बाघ के शिकार हेतु ४ अच्छे भैंसे मिल गए।   कालिआ ने कुछ ग्रामीणों की सहायता से भैंसों को उन जगहों पर बँधवा दिया जहाँ से रात में बाघ से गुजरने की सूचना मिली थी। हम चुपचाप राह देखने लगे कुछ घटने की। हर सुबह हम भैंसों को दाना-पानी देने जाते और आसपास बाघ के पैर के निशान खोजते। केवल एक जगह बाघ भैंसे के निकट आया, शेष से उसने कुछ दूरी बनाये रखी। ऐसा केवल एक बहुत सजग और अनुभवी बाघ ही करता है। मैंने और उपशॉन ने आसपास के गाँवोंमें जाकर घोषणा की कि बाघ की सुचना देनेवाले को १० रु. ईनाम दिया जायेगा पर कोइ परिणाम न मिला। उपशॉन की छुट्टियाँ समाप्त हो रही थीं और हम निराश हो रहे थे, तभी एक सुबह एक वृद्ध कंकरीली सड़क से होते हुए डाक बंगले के बरामदे में आया, उसके चेहरे पर विस्मय और उत्तेजना के चिन्ह देखकर मैंने अनुमान लगा लिया कि कुछ असामान्य घटा है। उपशॉन ने उत्सुकता से पूछा 'दंडु क्या खबर है?'
               वृद्ध ने साथी की ओर देखकर अपना महत्व जताया और कहा 'साहब! हमने बाघ को पकड़ लिया है।'
               कुछ पल की स्तब्धता के बाद उपशॉन ने पूछा 'कब, कहाँ कैसे?' दंडु ने कुछ न बताते हुए कहा 'आइये और देखिये। "
               तेजी से वृद्ध के पीछे-पीछे जाते हुए मैं निराश था। बाघ भले ही आदमखोर था पर कोई शिकारी पिंजरे में बंद या गड्ढे में पड़े बाघ को मारना नहीं चाहता। इस बीच पहाड़ी पर चढ़ते हुए मुझे पग चिन्ह कुछ कहते लगे। मैं रुकने का आदेश देता तभी दंडु धीरे और चुपचाप बढ़ने का इशारा किया। हम पहाड़ी की चोटी की ओर रेंगते हुए बढ़ने लगे, मैंने देखा कि जंगल घना और पेड़ मोटे होते जा रहे हैं, तब तक हम लगभग ५० गज के समतल में पहुँच गए थे जिसके बीच में तालाब था। मैं आगे बढ़ा ही था कि दंडु कोहनी मारते हुए उल्टी तरफ इशारा करते हुए फुसफुसाया "साहब वहाँ है,  जल्दी मारिये। '
               पेड़ों से छनकर आती हुई मद्धिम रौशनी में मुझे बाघ या भैंसा कुछ नहीं दिखा। उपशॉन भी कुछ नहीं देख पाया जब तक कि हमारे साथ आए एक ग्रामीण ने झुककर एक बड़ा पत्थर पत्तियों के एक गुच्छे की ओर फेंका और समूचे पत्तियों में हलचल मच गयी। मुझे आग लगने से भी इतना विस्मय न होता जितना पत्तियों में अपने पूरे शरीर को छिपाये, भ्रमित करते, गुर्राते  बाघ को घूमकर पेड़ों और झाड़ियों में  गुम होते देखकर हुआ।
               डाक बंगले में लौटने के बाद दंडु ही बातचीत के केंद्र में था। अपने हाथ में चाय का एक प्याला थामे उसने कहा 'साहब, आप मुझे बूढ़ा आदमी समझते हैं पर मेरे पिता और दादा बरसों से इस गाँव में रहे हैं। जब मैं बच्चा था तब मेरे पिता ने बताया था कि जब वह जवान था एक आदमखोर बाघ ने गाँव में तहलका मचा रखा था।  उसने बाघ से पीछा छुड़ाने का जो तरीका अपनाया मैंने उसी को आजमाया। मैंने गांव के बच्चों से साल पेड़ की हजारों पत्तियां इकट्ठी कराईं, उनका बंडल बनाया और लकड़हारों की मदद से पीपल के पेड़ से निकलने वाला द्रव इकठ्ठा कर पानी में उबाल कर चिपचिपा 'लस्सा' बनाया, आम तौर पर हम चिड़िया पकड़ने के लिए इसका उपयोग करते हैं। मैंने तालाब के आस पास के झाड़ों में दो-दो पत्तों में लस्सा लगा कर उन्हें चिपका दिया ताकि लस्सा सूख न सके। फिर मैं उस तालाब तक गया, जहाँ आप को ले गया था। यह कई मीलों के जंगल में एकमात्र जगह है जहाँ पानी है। एक सुबह मैं कुछ साथियों के साथ वहाँ गया।  मुझे भरोसा था कि जल्दी या देर से बाघ पानी पीने वहाँ आएगा ही। हमने तालाब के आसपास पड़ी पत्तियाँ बटोरीं और उनकी जगह तालाब के चरों ओर लगभग ३० फुट की चौड़ाई में तैयार की गयी पत्तियाँ लगा दीं। दो रात मैं पेड़ पर छिपा रहा। तीसरी रात बाघ आया और पानी की और जाने लगा। पहले उसे पता नहीं चला कि पत्तियाँ उसके पंजों से चिपक रही हैं लेकिन जैसे-जैसे वह पानी के निकट आया पत्तियों के कारण उसे गुस्सा आने लगा और वह पत्तियों को छुड़ाने की कोशिश करने लगा। असफल होने पर वह बैठ गया और दाँतों से उन्हें खींचने लगा, पत्तियाँ उसके होंठों और मुँह से चिपकने लगीं और जब वह उठा तो उसका शरीर पत्तियों का ढेर बन गया था। अंत में पत्तियाँ छुड़ाने के लिए थककर वह जमीन पर लोटने लगा। तुरंत ही वह पत्तियों का ढेर बन गया, जैसे जैसे वह लोटता गया, पत्तियाँ अधिक से अधिक चिपकती गयीं। आखिर में शेर दिखना ही बंद हो गया। तब मैं पेड़ से उतरा और सीधे डाक बंगले की ओर दौड़ लगा दी पर आप लोगों ने देर कर दी और मेरी हिकमत और मेहनत पर पानी फिर गया।
                हमने उसे सांत्वना दी कि अब बाघ उसके गाँव की ओर मुँह भी नहीं करेगा और उस शाम हम बेतनोती लौट आये। पूरा घटनाक्रम परिणामहीन था और हम अपनी भूमिका से बहुत असंतुष्ट थे। जब तक उपशॉन पत्तियों का नया ढेर लेकर नहीं आ गए, मैं चैन से नहीं बैठ सका और तब हम चहला आ गए। दस दिन हो चुके थे और अब पूर्णिमा की चाँदनी रात थी। उस क्षेत्र में दूर दूर तक पानी का अन्य स्रोत न होने को ध्यान में रखकर मचान बनाया गया जहाँ से पूरा तालाब साफ़-साफ़ दिखता रहे। हमने हर रात वहाँ बैठने का फैसला किया ताकि ग्रामीणों का खोया आत्मविश्वास वापस आ सके। एक सप्ताह तक हम असफल रहे।  एक शाम हम बहार बैठे थे, तभी एक ग्रामीण दौड़ता हुआ डाक बँगले में आया और बताया कि शाम को एक लकड़हारे को बाघ ने हमला कर मार डाला है। एक पल की भी देरी किये बिना हम ग्रामीण द्वारा बताई दिशा में रवाना हो गए। गाँव पहुँचने पर पता चला कि लकड़हारे की अधखाई लाश का स्वजनों ने दाह संस्कार कर दिया था। हमारे करने के लिए कुछ नहीं बचा था, हम लौट आये और उस रात तालाब के पास मचान पर बैठे, हम सुनिश्चित थे कि बाघ इसी क्षेत्र में है। मैं उस रात को अब भी याद कर सकता हूँ, चरों और अच्छे से दिखाई दे रहा था, गर्मी चरम पर थी, हमारे नीचे जलाये गए जंगल से आती गर्म हवा और मच्छर हमारा बैठना मुश्किल बना रहे थे। आधी रात के करीब जब चन्द्रमा हमारे सर पर रौशणि बिखेर रहा था, मुझे बाघ की उपस्थ्ति की अनुभूति हुई। मैं उसे आते हुए देख या सुन नहीं सका, पेड़ों की पत्तियों के चरमराने की आवाज तेज थी, मुझे लगा कोई जानवर मेरे निकट आने का प्रयास कर रहा है। मैं अपनी बंदूक थामे बिना हिले-डुले तालाब को देखता रहा। उपशॉन और मैं दो विरुद्ध दिशों में बैठे थे और हमने तय किया था कि बाघ जिस भी दिशा से आये, उसके समीप वाली बंदूक से गोली दागी जाए। अब मैं आपको जो दृश्य बताने जा रहा हूँ उससे आपके श्वास रुकने की सी हालत हो जाएगी। क्षणिक प्रतिक्रिया से स्पष्ट था कि बाघ का उत्सुकतापूर्ण व्यवहार सतर्कता और अनुभव का परिणाम था। मेरी सोच सही थी। कुछ सेकेण्ड बाद रोशनी की लकीर में बाघ और तालाब दिखा और उपशॉन ने गोली दाग दी। शेर गुर्राया गोली की आवाज़ के साथ ही और उसने मेरे मचान की और दौड़ा। मैं तैयार था, जैसे ही वह मेरी बंदूक की पहुँच में आया, मैंने बंदूक से गोली दागी और संतुष्टि के साथ उसे पुट्ठों के बल गिरते देखा। एक क्षण बाद उसने अपने पैरों पर उठने और आश्रय के लिए जंगल की ओर जाने की जद्दोजहद की और शांत हो गया।  उपशॉन ने आवाज़ लगाकर पूछा कि क्या हम बाघ का पीछा करें? मैंने उसे सवेरा होने तक रुकने को कहा। बाद में मैंने कई सहकारियों के संस्मरण पढ़े जिनमें उन्होंने गोली चलने के तुरंत बाद खून  के सहारे टोर्च लेकर जानवर का पीछा कर उसकी आँखों में बुझती ज्योति देखने और खोपड़ी में गोली मारने का उल्लेख किया है पर मैं इस मामले में बहुत सुरक्षावादी हूँ। उपशॉन को पौ फटने तक राह देखनी पड़ी और सवेरा होने पर मैंने उपशॉन को आवाज़ दी। हमारी तलाश छोटी थी। जंगल में कुछ फुट घुसने पर ही बाघ की लाश पड़ी थी। दोनों गोलियाँ कारगर थीं। उपशॉन की गोली बाएं कंधे के नीचे लगी थी जो फेफड़ा छेड़ते हुए बहार निकल गयी थी। मेरी गोली बिलकुल सही निशाने पर लगी जो किडनी में घुस गयी थी जिसके कारन बाघ तुरंत ही गिर गया था जिसके कारण हमें खोजने में श्रम नहीं करना पड़ा।
यह एक शानदार ९ फुट ३ इंच लंबा नर बाघ था, जिसे कोइ चोट या घाव नहीं लगा था। मेरा मत है कि उसकी आदमखोर वृत्ति मनुष्य का शिकार सहज होने और जंगल कटने के कारण प्राकृतिक पशु शिकार उपलब्ध न हो पाने से उपजी थी।
*** 

बरवै-दोहा गीत

बरवै-दोहा गीत:
*
मेघा गरजे बरसे,
है आतंक
*
कल तक आए नहीं तो,
रहे जोड़ते हाथ.
आज आ गए बरसने,
जोड़ रहा जग हाथ.
करें भरोसा किसका
हो निश्शंक?
मेघा गरजे बरसे,
है आतंक
*
अनावृष्टि से काँपती,
कहीं मनुज की जान.
अधिक वृष्टि ले रही है,
कहीं निकाले जान.
निष्ठुर नियति चुभाती
जैसे डंक
मेघा गरजे बरसे,
है आतंक
*
बादल-सांसद गरजते,
एक साथ मिल आज.
बंटाढार हुआ 'सलिल'
बिगड़े सबके काज.
घर का भेदी ढाता
जैसे लंक
मेघा गरजे बरसे,
है आतंक
****

गले मिले दोहा यमक

गले मिले दोहा यमक
*
अजब गजब दुनिया सलिल, दिखा रही है रंग.
रंग बदलती है कभी, कभी कर रही जंग.
*
जंग करे बेबात ही, नापाकी है पाक 
जंग लगी है अक्ल में, तनिक न बाकी धाक 
*
तंग कर रहे और को, जो उनका दिल तंग 
भंग हुआ सपना तुरत, जैसे उत्तरी भंग 
*
संगदिलों को मत रखें, सलिल कभी भी संग 
गंग नहाएँ दूर हो, नहीं लगाएँ अंग  
*


नवगीत - हम वही हैं

नवगीत -
हम वही हैं
*
हम वही हैं,
यह न भूलो
झट उठो आकाश छू लो।
बता दो सारे जगत को
यह न भूलो
हम वही है।
*
हमारे दिल में पली थी
सरफरोशी की तमन्ना।
हमारी गर्दन कटी थी
किंतु
किंचित भी झुकी ना।
काँपते थे शत्रु सुनकर
नाम जिनका
हम वही हैं।
कारगिल देता गवाही
मर अमर
होते हमीं हैं।
*
इंकलाबों की करी जयकार
हमने फेंककर बम।
झूल फाँसी पर गये
लेकिन
न झुकने दिया परचम।
नाम कह 'आज़ाद', कोड़े
खाये हँसकर
हर कहीं हैं।
नहीं धरती मात्र
देवोपरि हमें
मातामही हैं।
*
पैर में बंदूक बाँधे,
डाल घूँघट चल पड़ी जो।
भवानी साकार दुर्गा
भगत के
के संग थी खड़ी वो।
विश्व में ऐसी मिसालें
सत्य कहता हूँ
नहीं हैं।
ज़िन्दगी थीं या मशालें
अँधेरा पीती रही
रही हैं।
*
'नहीं दूँगी कभी झाँसी'
सुनो, मैंने ही कहा था।
लहू मेरा
शिवा, राणा, हेमू की
रग में बहा था।
पराजित कर हूण-शक को
मर, जनम लेते
यहीं हैं।
युद्ध करते, बुद्ध बनते
हमीं विक्रम, 'जिन'
हमीं हैं।
*
विश्व मित्र, वशिष्ठ, कुंभज
लोपामुद्रा, कैकयी, मय ।
ऋषभ, वानर, शेष, तक्षक
गार्गी-मैत्रेयी
निर्भय?
नाग पिंगल, पतंजलि,
नारद, चरक, सुश्रुत
हमीं हैं।
ओढ़ चादर रखी ज्यों की त्यों
अमल हमने
तही हैं।
*
देवव्रत, कौंतेय, राघव
परशु, शंकर अगम लाघव।
शक्ति पूजित, शक्ति पूजी
सिय-सती बन
जय किया भव।
शून्य से गुंजित हुए स्वर
जो सनातन
हम सभी हैं।
नाद अनहद हम पुरातन
लय-धुनें हम
नित नयी हैं।
*
हमीं भगवा, हम तिरंगा
जगत-जीवन रंग-बिरंगा।
द्वैत भी, अद्वैत भी हम
हमीं सागर,
शिखर, गंगा।
ध्यान-धारी, धर्म-धर्ता
कम-कर्ता
हम गुणी हैं।
वृत्ति सत-रज-तम न बाहर
कहीं खोजो,
त्रय हमीं हैं।
*
भूलकर मत हमें घेरो
काल को नाहक न टेरो।
अपावन आक्रांताओं
कदम पीछे
हटा फेरो।
बर्फ पर जब-जब
लहू की धार
सरहद पर बही हैं।
कहानी तब शौर्य की
अगणित, समय ने
खुद कहीं हैं।
*
हम वही हैं,
यह न भूलो
झट उठो आकाश छू लो।
बता दो सारे जगत को
यह न भूलो
हम वही है।
*
salil.sanjiv@gmail.com, ९४२५१८३२४४
#दिव्यनर्मदा
#हिंदी_ब्लॉगर

गीत: कब होंगे आजाद

गीत:
कब होंगे आजाद
इं. संजीव वर्मा 'सलिल'
*
कब होंगे आजाद?
कहो हम
कब होंगे आजाद?....
*
गए विदेशी पर देशी अंग्रेज कर रहे शासन.
भाषण देतीं सरकारें पर दे न सकीं हैं राशन..
मंत्री से संतरी तक कुटिल कुतंत्री बनकर गिद्ध-
नोच-खा रहे
भारत माँ को
ले चटखारे स्वाद.
कब होंगे आजाद?
कहो हम
कब होंगे आजाद?....
*
नेता-अफसर दुर्योधन हैं, जज-वकील धृतराष्ट्र.
धमकी देता सकल राष्ट्र को खुले आम महाराष्ट्र..
आँख दिखाते सभी पड़ोसी, देख हमारी फूट-
अपने ही हाथों
अपना घर
करते हम बर्बाद.
कब होंगे आजाद?
कहो हम
कब होंगे आजाद?....
*
खाप और फतवे हैं अपने मेल-जोल में रोड़ा.
भष्टाचारी चौराहे पर खाए न जब तक कोड़ा.
तब तक वीर शहीदों के हम बन न सकेंगे वारिस-
श्रम की पूजा हो
समाज में
ध्वस्त न हो मर्याद.
कब होंगे आजाद?
कहो हम
कब होंगे आजाद?....
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पनघट फिर आबाद हो सकें, चौपालें जीवंत.
अमराई में कोयल कूके, काग न हो श्रीमंत.
बौरा-गौरा साथ कर सकें नवभारत निर्माण-
जन न्यायालय पहुँच
गाँव में
विनत सुनें फ़रियाद-
कब होंगे आजाद?
कहो हम
कब होंगे आजाद?....
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रीति-नीति, आचार-विचारों भाषा का हो ज्ञान.
समझ बढ़े तो सीखें रुचिकर धर्म प्रीति विज्ञान.
सुर न असुर, हम आदम यदि बन पायेंगे इंसान-
स्वर्ग तभी तो
हो पायेगा
धरती पर आबाद.
कब होंगे आजाद?
कहो हम
कब होंगे आजाद?....
*