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मंगलवार, 4 अगस्त 2020

कहानी मुठ्ठी में रेत से रिश्ते मनोरंजन सहाय सक्सेना

कहानी
मुठ्ठी में रेत से रिश्ते
मनोरंजन सहाय सक्सेना
*
अमेरिका के किसी बडे़ विश्वविद्यालय से व्यावसायिक प्रबन्धन में एक बड़ी डिग्री लेकर वहीे किसी बड़ी कम्पनी में कार्यरत अपने पुत्र की सलाह पर व्यवसाय के प्रशासनिक प्रबन्धन में सफलता के लिये एक उपाय के रूप मंे शिखरचन्द्र के परिवर्तित एवं लघु संस्करण-मि. शेखरन को इस बहु राष्ट्रीय कम्पनी में काम करते लगभग तीन दशक से अधिक हो गये। देश के कम से कम 10 महानगरों में रह चुके थे। इस लम्बे सेवाकाल में स्थानान्तरण की सतत् प्रक्रिया से गुजरते हुये सैकड़ो सहयोगियों और अधीनस्थों के सम्पर्क में आये, मगर यह अनुभव उनके लिये बिलकुल नया था।
इस बडे़ प्रदेश की राजधानी नगर में ज्वाइन करते ही उन्होंने अपनी आदत के मुताबिक अपने पी.ए. को निर्देश किया कि कोई भी उनकी अनुमति के बिना शिष्टाचार भेंट के लिये भी नही आवे। वे यह सब स्वयं तय करेंगे। दर असल शेखरन ने यह नया तरीका अपनाया था, जो उन्हें काफी मौलिक और युगान्तकारी लगा। इसके लिये उन्होंने नीति यह अपनाई कि जब भी वह नई जगह ज्वाइन करते, बजाय सबको अपने आफिस में शिष्टाचार भेंट के लिये आने देने के वह स्वयं अधिकारी वर्ग के केबिन और कर्मचारियों की सीट पर पहंुच जाते थे। इस तरह उनके अकस्मात पहुंच जाने से उन्हें उस व्यक्ति के काम करने का ढंग आदि का मूल्यांकन करने का सही अवसर मिल जाता था, जिससे उनसे काम लेने में आगे की रणनीति बनाने में उन्हें सहायता मिलती थी। वह इस कम्पनी में असिस्टेण्ट मैनेजर के पद पर भरती हुये थे और तीन दशको में अपनी कार्य शैली की बदौलत सफलता प्राप्त करते हुये चीफ जनरल मैनेजर के पर पर पहंुच गये थे. जबकि उनके कई साथी अभी तक जनरल मैनेजर भी नही बन पाये थे।
अपनी रणनीति के मुताबिक जब उस दिन दोपहर को वह लंच के बाद इस कम्पनी के मैनेजर परचेजिंग्स के कमरे में जा पहंुचे तो वह अपनी कुर्सी पर बैठा कम्प्यूटर पर कुछ काम कर रहा था। दरवाजे की और उसकी पीठ थी, इसलिये वह बिना कम्प्यूटर से नजर हटाये ही बोला- ‘‘प्लीज बि सीटेड एण्ड बेट फार फाइव मिनिट्स।’’ इसके बाद एक खामोशी छा गई कमरे में। केबल कभी कभी की बोर्ड के किसी ‘‘की’’ की खटरपटर से सन्नाटा भंग होता था। पंाच सात मिनिट बाद उसने अपना कम्प्यूटर टर्न आफ किया और फिर अपनी रिवाल्विग चेयर पर घूम कर आगन्तुक की तरफ उन्मुख होकर बोला-‘‘यस सर ? व्हाट आई केन डू फार यू ?’’
इस युवा मैनेजर परचेजिंग्स के व्यवहार से मिस्टर शेखरन काफी आहत हुये, मगर प्रकटतयः बोले-‘‘आई एम चीफ जनरल मैनेजर, एण्ड हेव ज्वाइण्ड डे विफोर यस्टर डे मिस्टर--
‘‘सुशान्त राय, सर आई एम सुशान्त राय, बट व्हाई डिड यू टेक ट्रवल टू कम टु माई रूम, यू कुड हेव काल्ड मी अपोन सर।’’ कहकर वह अपनी सीट से उठा और उन्हंे सम्मान देने के लिये अपनी सीट छोड़ कर शेखरन के पास आ खड़ा हुआ।
शेखरन उस सीट पर बैठ गये। एक बार उन्होंने उसकी टेबिल का आंखो ही आंखो में निरीक्षण कर लिया। कोई फाइल या पेपर मेज पर नही देख कर बोले-‘‘इज देयर नो फाइल पेण्डिग आन योर टेबिल एण्ड नो लेटर अण्डर कन्सीडरेशन टु वि रिप्लाइड मि. सेन ?’’
‘‘नो सर’’ सुशान्त राय ने संक्षिप्त सा जबाब दिया। मगर सर्वोडीनेट के उत्तर से सन्तुष्ट हो जाये तो अफसर कैेसा ? सो मि. शेखरन ने उससे पिछले तीन दिन में कम्पनी के कारपोरेट आफिस से दार्जिलिंग से आने वाले हर्बल प्राडक्टस में फंगस इन्फेक्शन की शिकायत के बारे में पूछ लिया। सुशान्त ने बेहद सौजन्यता से उनके पीछे रखे कम्प्यूटर तक जाने की इजाजत चाही और पांच मिनिट मे कम्पनी को भेजे गये अपने सुझावों का प्रिण्ट निकाल कर दे दिया तो अचानक मि. शेखरन के मंुह से निकल गया-‘‘वेरी गुड।’’
मि. शेखरन सुशान्त के काम करने के ढंग से ही नही उसके सुदर्शन व्यक्तित्व से भी बेहद प्रभावित हुए थे। लम्बा कद, एकदम सुडौल शरीर, चेहरे पर करीने से छंटी पूरी दाढी-मंूछे और बेहद प्रभावशाली डेªस सेन्स और बस काम से काम। उसने मि. शेखरन को काॅफी तक के लिये रिक्वेस्ट नही की।
मिस्टर शेखरन सुशान्त के बारे में सोच ही रहे थे कि अचानक उनके मोबाइल फोन की घण्टी बजी। कारपोरेट आफिस से काल था। सुनते ही मिस्टर शेखरन को तो पसीना आ गया। अगले सप्ताह ठीक आज के आठवें दिन सारे देश में फैले उनके बिक्री प्रतिनिधियों की काॅन्फ्रेन्स के बारे में तैयारी का विवरण मय उनके सुझाव के मांगा था सी.एम.डी. ने। मगर न तो उनके पूर्व वर्ती जनरल मैनेजर ने उन्हें कोई ब्रीफ किया था, इस बारे में और न स्टाफ में किसी ने कुछ कहा था। उन्होंने अपने पी.ए. को बुलाकर उसे डांटा तो उसने बड़ी विनम्रता से कहा-‘‘सारी सर ! बट आई थोट देट मैनेजर एच. आर. डी. बिल टेल यू सर, एण्ड ही शुड हेव टोल्ड यू आल एवाइट दिस इम्पोर्टेण्ट काॅन्फ्रेन्स । सारी सर! लेकिन अब चिन्ता करने से तो कुछ होगा नही, आप कहे तो एक सुझाव दे सकता हूं।’’ कह कर वह उन की अनुमति की प्रतीक्षा करने लगा।
‘‘हां बोलो!’’ शेखरन ने अब भी गुस्से से ही कहा तो पी.ए. बोला-‘‘सर काॅन्फ्रेन्स का सारा इन्तजाम आप सुशान्त सर को दे दे। सारा इन्तजाम हो जायेगा, मगर इसमें एक दिक्कत है थोड़ी सी, कहकर पी.ए. फिर थोड़ा रूका तो मिस्टर शेखरन उद्धिग्न होकर बोले-‘‘तुम सीधे से पूरी बात क्यों नही करते, बोलो जो भी बोलना है।’’
‘‘सर! सुशान्त सर काम अपने ढंग से करते है। वह पहले आपको अपना प्लान पूरी तरह समझा देगें, उसमें आप कोई भी सुझाव दे सकते है, मगर एक दफा फाइनल हो जाने पर वह उसमें कोई हस्तक्षेप बर्दाश्त नही करते। पिछली तीन काॅन्फ्रेन्स उन्होंने ही करबाई है और वह उसका कोई क्रेडिट भी नही चाहते।’’ पी.ए. की बात से मि. शेखरन को काफी सान्त्वना मिली और उन्हें लगा कि शायद उनके पूर्ववर्ती ने इसीलिये काॅन्फ्रेन्स की बात उन्हें नही बताई हो।
उन्होंने सुशान्त को बुलाया, उससे बात की तो उसने तो इस काम को ऐसे लिया मानो दो दिन चलने वाली दौ सौ ढ़ाई सौ आदमियों की काॅन्फ्रेन्स न होकर कोई मामूली डिनर का इन्तजाम करना हो।
कान्फ्रेन्स की तैयारी शुरू हुये दो ही दिन हुये थे कि उस दिन सुशान्त के कमरे से उसके जोर से बोलने की और एक महिला के रोने की आबाज आई तो मि. शेखरन कोतूहल वश उठकर उसके कमरे में जा पहुंचे। कमरे में एक महिला- ‘‘सर मैने आपको ऐसा क्या कह दिया,’’ कहते हुये रो रही थी। शेखरन के पहंुचते ही सुशान्त उन्हें सम्मान देने के लिये उठा और महिला की तरफ मुखातिब होकर बोला-‘‘आई टोल्ड यू टु गो टु योर सीट एण्ड माइण्ड योर जाॅब। डिडण्ट यू लिसन इट।’’
मि. शेखरन को पहंुचा देख कुछ महिलायें और कुछ नेता टाइप कर्मचारी भी आ गये। मि. शेखरन ने महिला से पूछा -‘‘ैक्या बात है, हुआ क्या है ?’’ तो वह बोली-‘‘सर मुझे सुशान्त सर की कोई शिकायत थोड़े ही करनी है।’’
‘‘तो फिर यह तमाशा क्यों कर रखा है ?’’ शेखरन ने महिला से कडे़ स्वर में कहा तो महिला ने बताया कि कुछ महीने पहले ही उसकी नियुक्ति इस कम्पनी में पति की मृत्यु के कारण अनुकम्पा नियुक्ति के आधार पर हुई है। पिछले चार दिन में उधर तो कारपोरेट आफिस से कोई सूचना मांगी गई थी, उधर सर्दी शुरू होते ही सास का अस्थमा उखड़ आया और बच्चे का साधारण सा बुखार निमोनिया बन गया तो कम्पनी के डाक्टर ने बच्चे को अस्पताल में भर्ती कर लिया। अब रात को बच्चे के पास कौन रहे, या तो घर पर सास को अकेला छोडू़ या अस्पताल में बच्चे को जबकि सास को रात को ही बार बार मेरी जरूरत होती है, - तो यह प्राब्लम बताकर मैने सेक्शन आफीसर से छुट्टी मांगी। उन्होंने छुट्टी के लिये साफ इन्कार कर दिया और बोले-‘‘कारपोरेट आफिस को अगर यह स्टेटमेण्ट दो दिन में नही गया तो फिर बच्चे और सास को ही संभालना’’ तो मैं बेबसी के कारण रो पड़ी थी। उस दिन सुशान्त सर ने सेक्शन आफीसर को यह कहकर मुझे छुट्टी दिला दी कि-‘‘स्टेटमेण्ट की सूचना के लिये तो सारे डेटाज कम्प्यूटर में स्टोर है इसलिये कम्प्यूटर से प्रिन्ट आउट लेकर स्टेटमेण्ट भिजवा दिया जावे उसके लिये मुझे रौकने की जरूरत नही है।’’ फिर उसी शाम को हास्पीटल पहंुचकर बोले-‘‘तुम रात को अपनी सास का ख्याल रखो, बच्चे के पास मैं हूं।’’ तीन रात इन्होंने जागते हुए मेरे बच्चे की देखभाल की, और दिन के लिये केण्टीन वाले से कहकर एक नौकरानी मेरी सास के लिये घर पर रखवा दी। इन तीन रातो में इन्हांेने कुछ आवश्यक दवाइयों के पैसे भी जेब से खर्च कर दिये, तो मैं आज इनका आभार प्रदर्शन करने आई-मैने इनके पैर छूकर सिर्फ इतना कहा- ‘‘सर आपने इस भाग्य की सताई औरत के लिये तीन दिन में जो किया वह आजकल एक बड़ा भाई अपनी बहिन के लिये भी शायद ही करता ’’---- मैने बस इतना ही कहा था कि पता नही इन्हें क्या हो गया जो एक दम बोले- ‘‘इटस आल राइट, बट इट इज नथिंग मोर देन ए सिम्पल ह्यूमन कर्टसी। यू टेक केयर आफ योर सन एण्ड मदर इन ला।’’
मैने फिर दुबारा कहा-‘‘सर आज से मैं आपको बड़ा भाई मनती हूं’’- इतना सुनते ही इन्होंने मुझे जोर से डांट दिया ‘‘लिसन! दिस इज आफिस, एण्ड वी आर हियर आन द सर्विस आफ कम्पनी, नाट टु क्रियेट सोशल रिलेशन्स, यू गो टु योर सीट एण्ड माइण्ड योर जाॅव। अब बताइये सर मैने ऐसा गलत क्या कह दिया, जो इतना नाराज हो गये। अब तो मेरी हिम्मत इनको दवाइयों के पैसे देने की भी नही हो रही है।’’
मि. शेखरन ने अब सुशान्त की तरफ देखा। वह अब तक शान्त हो चुका था, इसलिये उन्होंने महिला कर्मचारी को ही कहा- ‘‘यू गो टु योर सीट एण्ड लुक फार योर जाॅव।’’
मि. शेखरन के कहने पर वह महिला कमरे के बाहर निकली और इकट्ठी हो गई महिला कर्मचारियों की और नफरत से देखती हुई बोली-‘‘आज सुशान्त सर के कमरे से मेरे रोने की आवाज आई तो स्टोरी गढ़ने के लिये और मजे लेने के लिये सब आ गई, उस दिन सेक्शन आफीसर के सामने जब मैं रो रही थी तब कोई नही आयी।’’
मि. शेखरन ने सुशान्त को अपने कमरे में आने को कहा, तो वह उनके साथ आकर चुपचाप सामने की सीट पर बैठ गया। सुशान्त को नार्मल करने के लिये और बातचीत का सिलसिला जमाने के लिये मि. शेखरन काॅफी का आर्डर देकर सुशान्त के चेहरे को पढ़ने की कोशिश करते रहे। काॅफी पीकर सुशान्त बोला-‘‘सर मैेनी मैनी थेक्स फार योर काइण्ड कर्ट्सी, बट नाउ आई बिल बेग योर लीव’’ और चला गया। मगर मि. शेखरन को चिन्ता हो गई कि इस घटनाक्रम का प्रभाव कान्फ्रेन्स की तैयारियों पर नही पडे़। वह जीवन में पहली बार स्वतंत्र रूप से इतनी बड़ी काॅन्फ्रेन्स का आयोजन करवा रहे थे। मगर सुशान्त तो बिलकुल वेफिक्र था, वह नियमित रूप से आफिस आता था।
काॅन्फ्रेन्स के एक दिन पहले उसने जब इण्टरकाम पर पूछा कि वह उनका भाषण खुद तैयार करेंगे या उनके पी.ए. को डिक्टेट करा दिया जाय तो उन्होंने सुशान्त को एक बार काॅन्फ्रेन्स की तैयारी का विवरण देने के लिये प्रार्थना जैसे स्वर में अनुरोध किया। सुशान्त ने उनके सामने बैठकर अपना लेपटाप खोलकर जिस तरह सुनियोजित तरीके से तैयारी का विवरण पेश किया तो उन्हांेने उठकर उसे गले से लगाना चाहा, मगर फिर यह सोच कर कि इस आदमी का कोई भरोसा नही कि वह इसे किस तरह रिएक्ट करेगा, सो वह ‘‘वेरीगुड’’ कहकर चुप हो गये, तो सुशान्त बोला- ‘‘सर आपका एडेªस डिक्टेट कराने के लिये इसलिये कहा है कि इस तरह के सेरीमोनियल एडेªस में सिर्फ कम्पनी के उत्पाद, बिक्री के विवरण के आंकडे ही महत्वपूर्ण होते है और हम अपने डीलर्स को क्या इन्सेण्टिव्ज देते रहे है और अब क्या प्लान कर रहे है यही सब कुछ होता है तो वह राइटिंग में आपके सामने होना चाहिये।’’
‘‘सुशान्त आइ हेव टोटली हेण्डेड आवर द अरेंजमेण्ट आफ दिस कान्फ्रेन्स टु यू, डू व्हाट एवर यू थिंक वेटर।’’ कहकर वह वास्तव में बिलकुल आश्वस्त हो गये।
काॅन्फ्रेन्स बेहद सफल रही। हर पार्टी्रसिपेण्ट ठहरने आदि की व्यवस्था से और चाही गई हर सूचना का समाधान पाने से बेहद सन्तुष्ट था। सब लोग इस सफल आयोजन की तारीफ कर रहे थे, तो मि. शेखरन ने उन सबसे कहा-‘‘जेण्टिलमेन द क्रेडिट फार द सक्सेज आफ दिस कान्फ्रेन्स गोज टु अवर मैनेजर परचेजिग्स मि. सुशान्त राय’’ कहते हुये शेखरन उसे दुबारा डायस पर बुलाया तो वह विनम्रता पूर्वक बोला-‘‘सर मैनी मैनी थेंक्स फार योर काइण्ड काम्प्लीमेण्टस! बट दिस वाज जस्ट ए पार्ट आफ माइ जाॅव। एण्ड मैनी थेक्स टू आल अवर आनरेवल डीलर्स फोर देयर को-आपरेशन डयूरिंग देयर स्टे विद अस।’’
मीटिंग के दो दिन बाद रक्षा बन्धन था। उस दिन आफिस पहंुचते ही सुशान्त की छुट्टी की एप्लीकेशन आई तो मि. शेखरन को लगा कि यह तो सुशान्त का अधिकार है। उसने पिछले आठ दिनों में कान्फ्रेन्स के इतने बढि़या प्रबन्ध के लिये न तो आफिस से छृट्टी मारी, न कोई एडवान्स! बस यह कहा था-‘‘सर अकाउण्टस डिपार्टमेण्ट को यह कह दे कि सारे बिल्स का टाइमली पेमेण्ट कर दे। जबकि दूसरी जगह ऐसी कान्फ्रेन्स को लेकर हंगामा मच जाता था। जिन लोगो को जिम्मेदारी दी जाती थी उनके सात आठ दिन आफिस में तो दर्शन होते ही नही थे और कुछ आवश्यक मिससीलीनियस खर्चो के नाम पर हजारों रूपये का एडवान्स और स्वीकृत करना पड़ता था, जिसका हिसाब लेने में एकाउण्ट्स सेक्शन को पसीने आ जाते थे। अबकी बार तो ऐसा कुछ नही हुआ।
दूसरे दिन राखी का त्योहार था। शेखरन घर पर अकेले थे। पत्नी राखी के त्योहार पर पिछले कई सालो की तरह अपने भाई के घर गई हुई थी। आफिस के एक सजातीय ने जो पद श्रेणी के लिहाज से उनसे काफी जूनियर मगर उम्र के लिहाज से सीनियर थे, उन्हें त्यौहार के दिन अकेला होने और इसी बहाने उनसे आत्मीयता बढ़ाकर आफिस में अपनी स्थिति कुछ प्रभावशाली बनाने के लिये दोपहर के भोजन पर आमंत्रित किया था। पत्नी थी नही, त्यौहार पर घर में भूत की तरह अकेले पडे़ रहने का भी मन नही था, इसलिये उन्होंने निमंत्रण स्वीकार कर लिया था। मगर भोजन के पूर्व जब मेजबान की बहिन ने अपने भाई के राखी बांधने के पहले उन्हें राखी बांधने की पेशकश की तो वह मना तो नही कर सके और उन्होंने राखी बांधने घर पर उनकी बहिन को नेग के पांच सौ रूपये भी दे दिये जिसे उन्होने-‘‘अरे मैने इसके लिये राखी थोडे़ ही बांधी थी। राखी के दिन हर भाई को अपनी कलाई सूनी देखकर अपनी बहिन की याद आती है इसलिये---- कहते हुये एक दो बार मना करने पर रूपये चुपचाप रख लिये तो मि. शेखरन को यह सब कुछ एक पूर्व नियोजित व्यावसायिक कार्यक्रम सा लगा।
खाना खाकर वह पैदल ही अपने आवास पर लौट रहे थे तो उन्हें अचानक सुशान्त का ध्यान आ गया और वह उसके घर की और चल दिये।
सुशान्त घर पर ही था मगर वह बेहद उदास था। लगता था, न तो उसने स्नान किया है, ना ही कल के कपडे़ बदले है। उसकी आंखे देखकर लगता था कि वह रात को सोया भी नही है। यह हालत देखकर दुःखी हो गये मि. शेखरन। फिर एक सहज अपनेपन से बोले-‘‘तुम्हारी तबियत तो ठीक नही लग रही सुशान्त! मैं डाक्टर को बुलाता हूं, कहकर उन्होने अपना मोबाइल फोन निकाल लिया, तो उसने उन्हें एकदक रोका- ‘‘नहीं सर! ऐसा कुछ नही है, मैं ठीक हूं मगर आप आप--- कहकर वह थोड़ा रूक गया, मानो बात करने के लिये शब्द ढूंढ रहा हो।
‘‘मुझे मि. चक्रवर्ती ने दोपहर को खाने पर बुलाया था, वही से लौट रहा था’’---
‘‘और उनकी पत्नी ने आपको राखी बांधकर अपना भाई बना लिया।’’ सुशान्त ने उनकी बात को काटकर उनके हाथ में बंधी राखी को देखकर तिक्त स्वर में उपहास किया।
‘‘नही, राखी उनकी पत्नी ने नही उनकी बहिन ने बांधी है,’’ मि. शेखरन ने सफाई देने जैसे स्वर में कहा।
‘‘और आपने बंधवा ली। यों बाजार से कुछ रूपयों में खरीदी गई राखी आपके हाथ में बांधकर कोई भी स्त्री आपकी बहिन बन जाती है आप उसमें अपनी बहिन पा लेते है? समाचार पत्रों में पढ़ा है कि हमारे देश में ही एक राज्य में जातीय पंचायते शादी के सात आठ साल बाद दो दो बच्चो की मां बन चुकी स्त्री को उन बच्चों के पिता को राखी बांध कर कोई रूपिया लेने जैसी प्रथा का पालन करके भाई बहिन की तरह रहने का आदेश देकर उसकी पालना करवाते है, तो वह स्त्री उसके बच्चों के बाप की बहिन बन जाती है क्या ?’’ सुशान्त ने तीव्र स्वर में प्रतिवाद किया। वह इस समय इतना उत्तेजित था कि बोलते बोलते उसकी सांस फूल गई थी, इसलिये वह उठा, फ्रिज से पानी की बोतल निकाल कर शेखरन को पानी के लिये पूछा, उनके मना करने पर उसने पानी पिया और उनसे मुखातिब होकर बोला-‘‘सर काॅफी मंगाऊ आपके लिये ? मैं तो अकेला रहता हूं, इसलिये आपकी मेहमानबाजी कैसे करूं, समझ में नही आ रहा ? कहकर वह शेखरन को प्रश्न वाचक नजरों से घूरने लगा,उसके हाव भाव से लग रहा था कि उसे शेखरन का आना और रूकना अच्छा नही लग रहा था।
‘‘नही-नही सुशान्त मैं दोपहर के खाने के बाद वैसे ही काफी नही लेता। मैं पैदल ही अपने बगले की तरफ जा रहा था तो सोचा तुम्हें मिलकर देखता चलूं और थैक्स भी कहता चलूं।’’ मि. शेखरन ने उसकी मनःस्थिति भांपते हुए नर्मी से कहा।
सुशान्त थोड़ी देर चुप रहा फिर बोला-‘‘सर! मैने उस दिन ही कह दिया था कि ‘‘देट बाज ए पार्ट आफ माई जाव एनी वे आई एम ग्रेट फुल टु यू फोर योअर काइण्ड काॅम्प्लीमेण्ट्स सर।’’ कहकर वह फिर चुप हो गया।
शेखरन अपने को अजीब उलझन पूर्ण स्थिति में महसूस कर रहे थे। मगर उन्होंने यथा संभव स्वर को कोमल बनाकर कहा-‘‘सुशान्त मेरी तुम्हारी उमर में जेनरेशनगेप है, तुम्हारी उम्र का मेरा लड़का यू.एस.ए. में है, तो मेरे अन्दर एक सहज अभिभावक भाव है। मैं कोई रिश्ता कायम नही कर रहा, मगर हम दोस्त तो हो सकते है, एक दूसरे के हमदर्द तो हो सकते है,इसलिये मैं चाहता हूं कि तुम मुझसे बात करो, अपने एकान्त को बांटो, अपने अकेलेपन को बांटो। हो सकता है मैं तुम्हारी कुछ मदद करने लायक साबित हो सकूं’’। कहते कहते शेखरन ने धीरे से उसके कन्धे पर हाथ रखा और सुशान्त ने कोई नकारात्मक प्रतिक्रिया नही दी तो उन्हें ऐसा लगा माना किसी बिगडे़ घोडे़ ने उनकी थपकी को स्वीेकार कर लिया हो।
थोड़ी देर सुशान्त बिलकुल खामोश रहा, फिर धीरे धीरे बोलने लगा ‘‘नही सर! मेरी अब कोई मदद नही कर सकता। कोई मेरी मिन्नी को वापिस नही लाकर दे सकता।’’
‘‘मिन्नी तुम्हारी बहिन थी ?’’ शेखरन ने बड़ी सावधानी से पूछा।
‘‘हां मिन्नी मेरी छोटी बहिन थी। दो साल छोटी थी मुझसे, जान छिड़कती थी मुझ पर, मगर दस साल पहले राखी के दिन ही मुझे छोड़कर चली गई।’’
‘‘क्या हुआ था मिन्नी को ?’’ शेखरन ने फिर बड़ी सावधानी से प्रश्न किया। वह अब भी एक आत्मीयता बनाये रखने के लिये सुशान्त के कन्धे पर हाथ रखे हुये थे।
‘‘लम्बी कहानी है सर! मगर मिन्नी के मुझे छोड़कर चले जाने के लम्बे अरसे के बाद आज आपने एक हमदर्द की तरह मिन्नी को याद करके उसके बारे में पूछा है, इसलिये आपको बता देता हूँ- कोई पन्द्रह साल पुरानी बात है, मैं उस समय बी.एससी. के पहले साल में था। केमिस्ट्री मेरा प्रिय विषय था। अब तक मिन्नी भी कालेज में आ गई। सब कुछ सामान्य चल रहा था। तभी उस साल एक और लड़की हमारे कालेज में आई। उसके पिता पुलिस में अफसर श्रेणी में थे और ट्रांसफर पर आये थे। वह सरकारी जीप में कालेज आती थी। कालेज में अन्य लड़के लड़कियां उससे कुछ घबराये से रहते थे मगर वह मिन्नी की पक्की सहेली बन गई। इसके पीछे कारण था- मिन्नी की केमिस्ट्री में विशेष योग्यता, जो उसकी कुशाग्रता और मेरे मार्ग दर्शन के कारण थी। सत्र बीतते बीतते तो वह मिन्नी से इतनी घुल मिल गई कि चाहे जब हमारे घर आ जाती थी और अब वह मिन्नी के साथ न होने पर भी कालेज में मुझ से अपनी केमिस्ट्री की प्राब्लम्स डिस्कस करने लगी थी। हमारे छोटे से शहर के सह शिक्षा के कालेज में उन दिनो उसका इस तरह मुझसे खुलकर मिलना जुलना बात करना, कालेज के लड़के लड़कियों में चर्चा का विषय बन गया था मगर उनके पिता के पुलिस अधिकारी होने के कारण सब दबे दबे ही चलता था।
अगले सत्र के शुरूआत की बात है। हमारे कालेज का भवन किसी राजा का पुराना महल था। कुछ असफल छात्रों द्वारा आत्म हत्या करने के बाद कुछ आकस्मिक घटनाओं के क्रम से ऊपर की मंजिल की छत को भुतहा घोषित कर दिया गया था और वहां कोई नही जाता था। यह मेरे लिये बरदान था क्योंकि मैं लायब्रेरी से किताब लेकर इसी छत पर बैठकर नोटस लेता था। उस दिन किसी राजनैतिक शख्सियत की मृत्यु हो जाने से कालेज में आधे दिन बाद ही छुट्टी हो गई, मगर मुझे पता ही नही चला। मैं नियमित समय पर नीचे उतरा तो सीढियों का दरवाजा बाहर से बन्द था। मैने आवाज लगाई तो चैकीदार ने दरवाजा खोला। मगर घोर आश्चर्य! पता नही कब और कहां से पुलिस अफसर की बेटी मेरे पीछे एक सीढ़ी ऊपर हाथ में किताब लिये खड़ी हो गई थी। उन्हें देखकर पहले तो चैकीदार हडबड़ा गया फिर न जाने क्यों उत्तेजित होकर ऊल जलूल बकने लगा। मैने उसे बहुत समझाने की बहुत कोशिश की मगर वह दूसरे दिन प्रिसीपल से शिकायत करने पर अड़ा रहा।
दूसरे दिन प्रिसीपल ने मुझे अपने आफिस में तलब किया, तो लड़की के बाप भी बैठे थे, मगर जब लड़की के बाप ने प्रिसीपल को कहा कि उनकी लड़की ने तो कोई शिकायत की नही है, तो प्रिसीपल भी बोल उठे -‘‘सर यह हमारे कालेज के जेम्स मंे से है। बात आई गई हो गई, मगर कालेज के लड़को की चमगोइयां चलती रही और पता नही क्यों मिन्नी ने मुझसे बोलना एकदम कम कर दिया।
इस घटना के दो सप्ताह बाद की बात है। कालेज में उस लड़की को अचानक उल्टी हो गई, और वह मूच्र्छित सी हो गई, बस उस दिन से कालेज में मुझे उस लड़की के कभी पैदा न हुये बच्चे का नाजायज बाप घोषित कर दिया गया, तो घर में मिन्नी ने मुझसे बोलना पूरी तरह बन्द ही कर दिया। कुछ दिन बाद उस लड़की का कालेज आना बन्द हो गया, तो पता चला कि उसे उसके बाप ने किसी दूसरे शहर भेज दिया है।
दिन बीत रहे थे। एक अजब मनहूसियत, अकेलापन सा छा गया था जीवन में। घर में रहते हर समय चहकती रहने वाली, मुझे बेबात तंग करने वाली मिन्नी एकदकम खामोश हो गई थी, उसने मुझसे बोलना तो बन्द कर ही दिया था, अब मेरे सामने पड़ने से भी कतराने लगी थी।
हर साल की तरह उस साल भी राखी का त्योहार आया। मैने अपने जेब खर्च में से पैसे बचाकर मिन्नी के लिये उसकी मनपसंद हाथ की घड़ी खरीद ली, मगर राखी के दिन भी मिन्नी न तो मुझसे बोली, न कोई उत्साह दिखाया, तो मां ने उसे डांटा-‘‘मिन्नी कम से कम त्योहार के दिन तो भाई से इस तरह का अबोला मत कर, चल पूजा करके राखी बांध’’ तो मिन्नी ने धीमे मगर दृढ़ स्वर में कहा- ‘‘मम्मी मैं दादा की बहुत इज्जत करती हूं, मगर वह उसे (पुलिस अधिकारी की बेटी) मेरी भाभी बनाकर ले आवे, मैं तभी उन्हें राखी बांधूगी।’’
मां भी भरी बैठी थी, इसलिये उन्होंने भी कहा-‘‘जब उसने इसकी कोई शिकायत नहीं तो तू क्यो ----
मां की बात को बीच में ही काट कर मिन्नी बोली-‘‘मां अगर यही सब मेरे साथ हुआ होता तो --- और आगे के शब्द उसकी सिसकियों में दब गये। वह अपने कमरे में चली गई। मैने मां को उसके लिये राखी पर लाई घड़ी उसे दे देने के लिये दे दी, मगर दूसरे दिन जब उसने घड़ी नही बांधी तो मुझे बहुत दुःख हुआ। कालेज का वह सत्र भी इसी तरह बीत गया।
अगला शैक्षणिक सत्र शुरू हो गया। मैने एम.एससी. करने के लिये हमारे शहर से दूर एक महानगर के कालेज में एडमीशन ले लिया और हाॅस्टल में रहने लगा।
दिन बीत रहे थे। राखी का त्योहार नजदीक आ रहा था और मिन्नी का मौन याद करते हुये मैं दुःखी था। राखी पर घर जाऊ या नही इसी उहापोह में था तभी उस दिन हाॅस्टल के चैकीदार ने बताया कि रिसेप्शन पर मेरा फोन आया है।
मैने रिसेप्शन पर जाकर फोन उठाया तो मेरी खुशी का ठिकाना नही रहा- फोन पर मिन्नी थी। वह हमेशा की तरह चहक कर बोली-‘‘दादा! मैं -- अरे तुम्हारी मिन्नी, मगर आगे उसकी आवाज कांपने लगी तो मुझंे लगा कि मिन्नी रो रही है, तो मैने उसे यूं ही गुदगुदाने के लिये कहा- ‘‘सुसराल जा रही है क्या ? जो रो रही है, बोल!
‘‘तुम्हारे बिना कैसे चली जाऊगी, डोली में कौन बिठायेगा मुझे, कहते हुये वह चहकने लगी, फिर बोली-‘‘घर आ रहे हो या नही राखी पर, जब से आगरा गये हो घर को भूल ही गये हो’’।
‘‘तूने अगर माफ कर दिया तो जरूर आऊंगा’’ कहते कहते खुशी के अतिरेक में मेरी आवाज रूंध सी गई।
‘‘दादा माफी तो मैं मांगती हूं, आप हमेशा की तरह अपनी छोटी बहिन को माफ कर देना।’’ मिन्नी ने भावुक स्वर में कहा।
‘‘अब तू मुझे रूलायेगी क्या ?’’ मैने भी भावुक स्वर में कहा तो वह चहकी-‘‘बहिन तो होती ही भाइयों को रूलाने के लिये है।’’
‘‘अरे शुभ शुभ बोल और यह बता तेरे लिये क्या लाऊ।’’मैने लाड़ से पूछा तो वह बोली - ‘‘बस तुम आ जाओ। सब ले लूंगी यही पर’’ और फोन कट गया।
मैं घर जाने की तैयारी में लग गया। इस बडे़ शहर के बडे़ बाजार से मिन्नी के लिये राखी पर देने के लिये अच्छा सा उपहार खरीदने गया था मगर काफी घूमने के बाद भी कोई उपयुक्त उपहार समझ में नही आ रहा था, तभी मेरे हास्टल का रूममेट बहदबास सा मुझे ढूंढता हुआ मिल गया। उसने बड़ी घबराहट में मुझे बताया कि पिछले तीन घण्टो में मेरे घर से 4-5 फोन आ चुके है किसी मिन्नी नाम की लड़की की साइकिल का एक्सीडेण्ट हो गया है सो मुझे फौरन घर पहंुचने को कहा गया है। वो मिन्नी अस्पताल में है कहकर वह चुप हो गया।
मुझे तो जैसे काठ मार गया। मेरी हालत देखकर मेरे रूममेट ने पास के पी.सी.ओ. से घर पर फोन मिलाया। पड़ौस की मौसी ने फोन उठाया तो उन्होंने बताया कि मिन्नी राखी के लिये बाजार से कुछ खरीददारी करने साइकिल से गई थी, लौटते समय उसकी साइकिल को किसी तेज रफतार बाली कार ने टक्कर मार दी, इसलिये अस्पताल में है, बेहोशी की हालत में है, मगर जब भी होश आता है, मुझे ही याद करती है।,
मौके की नजाकत देखकर मेरा रूममेट अपने किसी परिचित की मोटर साइकिल मांग लाया और हम फोरन अपने शहर के लिये रबाना हो गये। आज इस महानगर से मेरे घर की दो घण्टे की दूरी दो युगो के समान लग रही थी। रास्ते में जो भी मन्दिर, मस्जिद, पीर की मजार पडे़ मैं सब पर हाथ जोड़कर अपनी मिन्नी की नन्ही सी जान बख्श्ने की प्रार्थना करता आया। अपने शहर पहंुचते ही हम सीधे अस्पताल पहंुचे। मिन्नी का पूरा शरीर पट्टियों से ढंका था और वह बेहोश पड़ी हुई थी। मैने सिरहाने बैठकर उसका सिर अपनी गोदी में ले लिया। सारी रात यो ही मिन्नी का सिर गोद में रखकर बैठे देवी देवताओं की प्रार्थना करते बीत गया।
अगले दिन राखी का त्यौहार था। सुबह करीब नौ बजे मिन्नी ने मेरी गोद में अपना सिर उठाया और बुदबुदाते हुये स्वर में बोली- दा-दा तो मैं खुशी से उछल पड़ा। मगर वह पल मेरी खुशियों का अन्तिम पल था। मिन्नी ने धीरे से अपनी आंखे खोली और बडे कष्ट से बोली- ‘‘दा दा मुझे मा फ कर दे-ना, उसने बडे़ प्रयत्न से अपने हाथ प्रणाम की मुद्रा में जोडे़ और मेरी गोद में ही अन्तिम हिचकी के साथ सदा के लिये सो गई मेरी छोटी सी मिन्नी।’’ कहते हुए सुशान्त बेहद भावुक हो गया था, आंसू उसकी आंखो में छलक आये थे, आवाज कांपने लगी जिसे छपाने के लिये वह ‘‘एक्सक्यूज मी’’ कहकर उठा और थोड़ी देर बाद शायद अपना मंुह धोकर और थोड़ा पानी पीकर थोड़ा स्वस्थ होकर लौट आया।
सुशान्त थोड़ी देर चुप रहा फिर बोला -कुछ दिन बाद मेरे एक अन्य दोस्त की बहिन ने बताया कि मिन्नी की एक खास सहेली से पुलिस अफसर की बेटी को जब मिन्नी की मेरे से नाराजगी का पता चला तो वह स्वस्थ होते ही मिन्नी से मिलने आई और उसने बताया कि वास्तव में मुझे उसके ऊपरी मंजिल की छत पर होने का पता तक नही था। कालेज में उल्टी उसके पेट में किसी खास तरह के अल्सर की प्रारम्भिक स्टेज की बजह से हुई थी, जिसके इलाज के लिये ही उसके पिता ने उसकी बुआ के पास भेजा था।
मगर मेरे लिये अब इस स्पष्टीकरण का कोई अर्थ नही था।
मिन्नी की मृत्यु के दुःख से मैं मानसिक अवसाद की स्थिति में आ गया था। तब एक दिन मेरे सपने में मिन्नी आई और बोली-‘‘दादा आपको इस तरह देखकर मुझे बहुत तकलीफ होती है अगर आप चाहते हो मैं खुश रहूं तो आप मुझे खुश होकर याद किया करो। आप खुश रहा करो’’।
मिन्नी की खुशी के लिये मैने अपने को पढ़ाई में झौक दिया पूरी ताकत से। उस साल बायोकेमिस्ट्री में मैने टाप किया था एम.एससी. में, इसलिये पी.एचडी. के लिये भी रजिस्टेªशन आसानी से हो गया। मैं हर्बल उत्पाद में फंगस रोगों से रोकथाम संबंधित विषय पर पी.एचडी. कर रहा था इसलिये थीसिस सम्मिट होते होते आपकी कम्पनी में चुन लिया गया।
अब मां मुझे विवाह कर लेने पर जोर देने लगी थी। मगर मुझे लगता था कि एक अजनबी लड़की के एक दिन अचानक जीवन में आ जाने से जीवन में ऐसी उथल पुथल मच गई तो जिस अजनबी लड़की से मैं विवाह करूंगा, वह तो जीवन भर के लिये जीवन में आवेगी तब जीवन में कैसी उथल पुथल मचेगी.... सोचते सोचते मुझे विवाह के नाम से ही डर लगने लगा।
इस तरह चार पांच साल बीत गये। मां बीच बीच में मेरे पास आकर कुछ दिनों रह जाती थी। कुछ साल पहले मेरी पोस्टिंग जिस जगह हुई वहां कम्पनी के आवासों में हमारे एक सजातीय रहते थे। परिवार बड़ा था उनका। अबकी बार मां जब यहां आई तो मेरे आफिस चले आने के बाद वह दोपहर को हमारे सजातीय के परिवार में समय बिताने के लिये नियमित रूप से जाने लगी, जिससे इस सजातीय परिवार को हमारी सारी पारिवारिक बाते विस्तार से पता चल गई। और मां से उनकी इस कदर सहानुभूतिपूर्ण घनिष्ठता हो गई कि मां को चलते समय उन्होंने पूरी तरह आश्वस्त कर दिया कि वह मुझे मिन्नी जैसी एक बहिन देकर मेरी जीवन धारा को पूरी तरह बदल देगी।
मेरे ह्दय परिवर्तन अभियान के शुभारम्भ के रूप में उस परिवार की एक युवती ने अचानक मेरे फ्लेट में आना जाना और दादा दादा बोलना शुरू कर दिया। शुरू में मैने न तो उसके आने जाने में दिलचस्पी ली, न उसके सम्बोधन का प्रतिउत्तर किया, तो तीन चार दिन बाद मां का फोन आया और उन्होंने मुझे उस परिवार की तारीफ करते हुये उनके सहानुभूति पूर्ण व्यवहार का आधार बताकर शालीनता से रिस्पान्स करने का आदेश दे दिया तो मुझे मजबूर होकर उसके सम्बोधन और बातचीत को रेस्पान्स करना पड़ने लगा।
वह तो जैसे इसी फिराक मे थी। कुछ दिनो में ही जैसे ही मैं शाम को आफिस से लौटता, उन्हें किसी आवश्यक चीज की खरीददारी के लिये बाजार जाना होता था और वह अकेली नही जाना चाहती थी इसलिये उनकी मां बडे़ लाड से कह देती-‘‘अरे अपने सुशान्त दादा के साथ चली जाओ।’’खरीददारी करते करते उन्हें भूख लगने लगती थी और उन्हें किसी चाट की दुकान या रेस्टोरेन्ट बगैरह में ले जाकर भर पेट ठुंसाना पड़ता था। खरीददारी का बिल हमेशा मुझे ही देना होता था। घर लौटकर वह अपनी खरीददारी अपने मां बाप को दिखाती और ऐसा प्रदर्शित करती- मानो वह कीमती चीजे मैने उन्हें जबर्दस्ती दिला दी है। उन्हें देखते हुये उनकी मां कहती- ‘‘सुशान्त! इतना लाड़ मत लडाया करो अपनी बहन पर, इसकी आदते खराब हो जावेगी।’’ मगर खरीददारी और घूमने का कार्यक्रम बन्द नही होता था। मुझे इस सबसे बड़ी कोफ्त होती थी। क्योंकि मिन्नी का बाहर जाना हफ्ते दस दिन में उसकी किसी खास सहेली के घर होता था और तब उसे जाते समय छोड़ना और नियत समय पर ले आना ही होता था। अगर जेबखर्च हाल ही में मिला होता था तो उसे ज्यादे से ज्यादा मशहूर चाट वाले की चाट खिला देता था। उस पर भी वह थोडे़ से ही सन्तुष्ट हो जाती थी, मैं कुछ और लेने को कहता तो-‘‘अरे दादा बहुत हो गया, मां ने खाना बना लिया होगा’’, कहकर दुकान से हटकर प्यार से झिडकती-‘‘दादा पूरा महीना चलाना है तुम्हें इसी जेबखर्च से।’’
कुछ दिन बाद इस परिवार में इस लडकी के पढ़ने के लिये अलग कमरे की कमी खलने लगी तो एक दिन उसने मेरी मौजूदगी में अपनी मां से कहा-‘‘मां दादा तो दिन भर आफिस में रहते है, इनका इतना बड़ा घर खाली ही पड़ा रहता है मैं इनके एक कमरे में पढ़ लिया करूंगी और इनका घर भी ठीक ठाक कर दिया करूंगी’’।
पुत्री के सुझाव पर मां ने मुस्कराते हुए कहा-‘‘तुम भाई बहिन के बीच की बात है मै क्या कहंू।’’ फिर मेरी ओर देखकर बोली-‘‘सुशान्त तुम अपना कमरा लॅाक करके दरवाजे की चाबी मुझे दे जाया करो।’’
इस तरह उन्होंने अपना प्रस्ताव स्वयं पारित करके मेरे घर पर अधिकार कर लिया। मैं इसलिये भी मना नही कर सका कि दो एक दिन में मां का सिफारशी फोन आ जायेगा।
कई माह बीत गये और राखी का त्यौहार नजदीक आ गया तो उस युवती ने बडे़ नाटकीय अन्दाज से एक सिल्क की साड़ी, और टाइटन लेडी रिस्टवाच की फरमाइश कर दी तो मुझे बड़ा अजीब लगा। मैने राखी के दो दिन पहले ही कम्पनी के काम से देहली का टूर बनाकर वहां से निकल आया और अपने घर आ गया। मगर हर समय मुझे अपने घर और घर वालो को भूल जाने का उपालम्भ देने वाली मां ने जब मुझे कहा कि इस राखी पर तो मुझे उन लोगों के साथ होना चाहिये था, तो मुझे आश्चर्य हुआ और गुस्सा आ गया और मैने मां से सीधे कह दिया कि अगर उन्हें मेरा अच्छा नही लगता तो मैं लौट जाता हूं। तब मां ने कहा कि उनकी मां ने अबकी बार राखी पर मुझे वहां ही रहने को कहा था तो मेरे मुंह से निकल गया-‘‘क्यों क्या उनके भाई नही है, उसे बांधे राखी’’। बात यहां खत्म हो गई।
मैं लौटकर आया तो उनकी मां ने मुझे बताया कि मेरे राखी पर नही होने के कारण यहां त्यौहार नही मनाने जैसा ही मना है। यह सुनकर साथ आई मां ने जब यह कहा कि मैं अब सोनू को ही मिन्नी मान लूं तो मुझे बहुत दुःख हुआ।
कहानी बहुत लम्बी हो रही है। इसलिये सीधे अन्त पर आता हूं। कुछ महीने बीते थे। एक दिन मैं शाम को घर लौटा तो उनके घर के सभी लोग मेरे घर में डेरा जमाये हुये थे। आज उनकी आंखो में मेरे प्रति स्नेह का सागर नही नफरत का लावा उफन रहा था। उनका भाई तो मुझे खा जाने वाली नजरो से देख रहा था। सबसे बड़ा आश्चर्य यह था कि मेरी मां जाने कैसे चार सौ किलोमीटर दूर हमारे गृह नगर से आ गई थी। एक दम सन्नाटा पसरा हुआ था। आखिर मैने ही सन्नाटे को तोड़ा- अरे मां तुम कब आई, मुझे खबर भी नही दी। और आज सब ऐसे चुपचाप क्यो है ?’’
‘‘तुमने कुछ बोलने लायक छोड़ा है क्या ?’’ उनकी मां ने मानो आग उगली और मुझे खा जाने वाली नजरो से घूरा।
काफी हील हुज्जत के बाद पता चला कि उनकी पुत्री को दो माह का गर्भ है और वह इसके लिये मुझे दोष दे रही है।
पता नही क्यों एकाएक मुझे लगा कि मिन्नी मुझे कह रही है-‘‘दादा आप एक बार झूठे दोषारोपण को चुपचाप सह लेने के कारण आप मुझे खो चुके हो अब इस बार कमजोर मत पड़ो आप विरोध करो भले ही सामने मां है।
इस अन्र्तप्रेरणा ने मुझे विरोध की शक्ति प्रदान की तो मैं बोला- ‘‘मां मुझे दुःख इस बात का है आप मेरे ऊपर लगे झूठे घिनौने आरोप को सच मान रही है, मगर आज यो किसी के कह देने से कोई किसी के बच्चे का बाप नही हो जाता। मेडीकल साइन्स बहुत तरक्की कर गई है, इन्हें कहांे जो आरोप मुझ पर लगा रही है उसे मेडीकल टेस्ट कराने साबित करे और पुलिस में रिपोर्ट करे। अगर यह पुलिस में रिपोर्ट नही करेगी तो मैं इनके खिलाफ अभी पुलिस में ब्लेकमेलिंग की रिपोर्ट दर्ज कराता हूं।’’ कहकर मैं टेलीफोन की तरफ बढ़ा। पहले तो उनके भाई ने मुझसे हाथापाई की कोशिश की, मगर दो चार हाथ खाकर उसकी हिम्मत पस्त हो गई, तो बोला-‘‘चलो मां, मैं देख लूंगा साले को। मुझे तो इस पर पहले ही शक होने लगा था, जब यह सोनू को घुमाने ले जाता था, महंगी चीजे दिलाता था। फिर जब तुमने इस रक्षा बन्धन पर सोने से राखी बन्धवाने के लिये कह दिया तो यह उसके पहले ही कम्पनी के काम का बहाने से खिसक गया था यहां से’’।
धीरे धीरे परिवार के सदस्य आग्नेय नेत्रो से मुझे घूरते हुये चले गये।
कुछ दिन यू ही बीते थे कि मां ने एक दिन मुझ से दस हजार रूपये मांग लिये। मां ने आज जीवन में पहली बार मुझसे रूपये मांग थे, सो मना तो कैसे करता इसलिय पहले मैने रूपये मां के हाथ में रख दिये फिर कहा- मां मुझे कोई हक नही है कि आपसे इन रूपयों की जरूरत के बारे में पूंछूं मगर अगर यह रूपये आपने उन लोगो को देने के लिये लिये है तो आप मेरे और मिन्नी के साथ अन्याय कर रही हो।’’
मिन्नी का नाम आते ही मां भावुक हो गई। रोते रोते बोली-‘‘कल उस लड़की की मां मेरे पास आई थी। मेरे पैर पकड़ कर बोली- बहन जी मैं यह नही कह रही कि इसमें सुशान्त का दोष है, मगर हमारी लड़की दिन रात इसी घर में रहती थी और हम सुशान्त की तरफ पूूरी तरह निश्चिन्त थे इसलिये कैसे क्या और कब ये सब घट गया? हमें पता ही नही चला। अब हमारे सामने दो ही रास्ते है या तो लड़की का एवार्शन करा दे या उसे जहर देकर मार दे। जहर तो दे दे, मगर उसके बाद जो कुछ होगा उसे बर्दाश्त करना मुश्किल होगा। लड़की तो मर जायेगी पर सुशान्त पर कई तरह के आरोप लगेंगे और एवार्शन कराते है तो एक लेडी डाक्टर तैयार तो है मगर वह दस हजार रूपये मांगती है अब हम दस हजार कहां से लाये। अब अगर आप थोडी मदद कर सके तो ठीक है नही तो जो कुछ भाग में बदा होगा - कह कर रोने लगी थी। सुशान्त मैं मिन्नी को खो चुकी हूं और पता नही कैसे मैं इस लड़की को मिन्नी की तरह समझने लगी थी’’- कहकर मां सुबकने लगी। तो मैने मां को सान्त्वना देते हुये कहा-‘‘मां आप यह रूपये उन्हे दे दे, मगर उन्हें यह कह दे कि आइन्दा कभी मेरी मिन्नी का पवित्र नाम अपनी गन्दी जबान पर नही लाये और आपके सामने यह स्वीकार करे कि वह मेरा नाम झूठा ले रही है आपसे रूपये लेने के लिये।’’
मां ने उन्हें रूपये कब दे दिये पता नही पर मां की सहानुभूति भी शीघ्र ही भंग हो गई। हुआ यह कि मां रूपये देने के दो दिन बाद उनके घर लडकी का हाल चाल जानने के लिये गई तो उनकी मां ने पहले की तरह आदर सत्कार करने की बजाय सीधे कह दिया-‘‘बहिन जी जो कुछ भी हुआ, उससे बच्चे बहुत नाराज है। हम आपकी इज्जत करते है मगर बच्चो को तो रोक नहीं सकते, अगर किसी ने आपसे कुछ उल्टा सीधा बोल दिया तो हमें भी बुरा लगेगा, इसलिये आप हमारे घर नही आये तो अच्छा है। वैसे ही हमारे तो हवन करते हाथ जले है।’’
मां को अब असलियत समझ में आ गई और वह बेहर दुःखी मन से घर लौट आई।
उसके तीन चार माह बाद मेरा ट्रांसफर इस आफिस में हो गया। उस घटना के बाद जब भी कभी कोई स्त्री मुझ से कोई संबंध खास तौर पर बहिन-भाई का संबंध बना कर कोई सहानुभूति पाना चाहती है या जताती है तो मैं एकदम आक्रोश में आ जाता हूं और मुझे अपने पर काबू नही रहता। यह रिश्ते मुझे मुट्टी में रेत की तरह लगते है जो जरा सी मुट्टी ढीली होते ही खिसक जाते है और मुट्ठी खाली रह जाती है और खाली मुट्ठी देखकर बहुत दुःख होता है मगर इसे आप नहीं समझ सकेंगे सर! कहकर सुशान्त फिर उठकर बाथ रूम की तरफ बढ़ गया। वह फिर से मिन्नी की याद में भर आई आंखो को मिस्टर शेखरन के सामने छलकने नही देना चाहता था।
मि. शेखरन चुपचाप सिर झुकाये बैठे थे। उनकी समझ में नही आ रहा था कि सुशान्त को किस तरह सांत्वना दे। वह खुद अपनी छलछलाती आॅखो को सुशान्त के सामने छलक जाने से रोकने की कोशिश कर रहे थे।

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ए-25, इन्द्रपुरी लाल कोठी, टोंक रोड़, जयपुर-302015

दोहा - मुकतक

दोहा सलिला 
*
मेघदूत संदेश ले, आये भू के द्वार
स्नेह-रश्मि पा सुमन हँस, उमड़े बन जल-धार
*
पल्लव झूमे गले मिल, कभी करें तकरार
कभी गले मिलकर 'सलिल', करें मान मनुहार
*
आदम दुबका नीड़ में, हुआ प्रकृति से दूर
वर्षा-मंगल भूलकर, कोसे प्रभु को सूर
*

मुक्तक
किस तरह मोती मिले बिन सीपिका
किस तरह तम से लड़ें बिन दीपिका
हो न शशि त्यागी, गुमेगी चाँदनी
अमावस में दिखे कैसे वीथिका

*
हिंदी कहो, हिंदी पढ़ो, हिंदी लिखो, नित जाल पर
हिंदी- तिलक हँसकर लगाओ, भारती के भाल पर
विश्व वाणी है यही, कल सब कहेंगे सत्य यह
मीडिया-मित्रों कहो 'जय हिन्द-हिंदी' जाल पर
*
हिंदी में हिंदी नहीं तो, सब दुखी हो जाएँगे
बधावा या मर्सिया इंग्लिश में रटकर गाएँगे?
आरती या भजन समझेंगे नहीं जब देवता-
कहो कोंवेंट-प्रेमियों वरदान कैसे पाएँगे?
*
गले मिल, झगड़ा करो स्वीकार है
अधर पर रख अधर सिल, स्वीकार है
छोड़ दें हिंदी किसी भी शर्त पर
है असंभव यही अस्वीकार है

४-८-२०१४ 

सोमवार, 3 अगस्त 2020

विमर्श ; अल्फ़ाज़ या अल्फ़ाज़ों ?

विमर्श ; अल्फ़ाज़ या अल्फ़ाज़ों ?

A. In colloquial, spoken Urdu?

Yes, Alfazon could be used, albeit I’ve never really heard it being used that way.

In the literary, formal Urdu used in law books/biographies, etc, Alfaaz is the plural for Lafz.

ألفاظ is plural for لفظ.

As evinced from the last letter in the word (Zoay exists only in words of Arabic/Semitic origin), this is an Arabic word, and Arabic has a very irregular method of turning words to plural. This is unlike Farsi, or Urdu, where a -An/-Ha or -on pluralizes a word (respectively).

A common error made is the word “Zan”. This is the Farsi word for “Woman”.

Its plural is Zanan- Women (-An used as it is a human).

In Hindi/Urdu, “Women” are sometimes called ZananiyaaN/JananiyaaN*, which is a double plural.

JananiyaaN is pronounced with a “J” sound, as pure Hindi lacks a “Z” sound.
*
प्लैट्स शब्दकोश

الفاظ alfāẕ
A الفاظ alfāẕ s.m. pl. (of لفظ lafẕ), Words, articulate sounds, terms; technical terms.
*
https://www.bsarkari.com
अल्फाज- संज्ञा पुलिंग [अरबी लफ्ज का बहुव०] वाक्य । शब्द समूह ।
*
YourQuote

सही शब्दों का वाक्य-प्रयोग-

'हालातों' गलत, सही है 'हालात' (हालत का बहुवचन)

'जज़्बातों' गलत, सही है 'जज़्बात' (जज़्बा या भावना का बहुवचन)

'अल्फ़ाजों' गलत, सही है जगह 'अलफ़ाज़' (लफ्ज़ या शब्द का बहुवचन)
*

संकलित काव्य पंक्तियाँ :

"खुशियाँ बढ़ाने आये हैं तो अपने अच्छे हालात ही बताना,
अपने अच्छे जज़्बात को अच्छे अल्फ़ाज़ से भी फैलाना!"
*
शायद इश्क़ अब उतरा रहा है सर से
मुझे अल्फ़ाज़ नहीं मिलते शायरी के लिए
*
कागज़ पर गम को उतारने के अंदाज़ ना होते
मर ही गए होते अगर शायरी के अल्फ़ाज़ ना होते
*
अब ये न पूछना कि ये अल्फ़ाज़ कहाँ से लाता हूँ
कुछ सुनता हूँ दर्द दूसरों के कुछ अपना हाल सुनाता हूँ
*
आँसू मेरे देख के क्यों परेशान है ऐ दोस्त!
ये तो वो अल्फ़ाज़ हैं जो जुबां तक न आ सके
*
मैं उन पन्नों में अहसास लिखते रहा
वो उन पन्नों में अल्फ़ाज़ पढ़ते रहे
*
मेरी शायरी का असर उन पर हो भी तो कैसे हो
के मैं अहसास लिखता हूँ वो अल्फ़ाज़ पढ़ते हैं
*
जब अलफ़ाज़ पन्नो पर शोर करने लगे
समझ लेना सन्नाटे बढ़ गए हैं।
*
सभी तारीफ करते हैं मेरे तहरीर की लेकिन
कभी कोई नहीं सुनता मेरे अल्फ़ाज़ की सिसकियाँ
*
तुम्हे सोचा तो हर सोच से खुशबू आयी
तुम्हे लिखा तो हर अल्फ़ाज़ महकता पाया
*
अल्फ़ाज़ गिरा देते हैं जज्बात की कीमत
हर बात को अल्फ़ाज़ में तोला न करो
*
रुकते नहीं हैं मेरी आँखों से आंसू
मैं जब भी उसकी याद में अल्फ़ाज़ लिखता हूँ
*
मैं अल्फ़ाज़ हूँ तेरी हर बात समझता हूँ
मैं एहसास हूँ तेरे जज़्बात समझता हूँ
*
खता कुछ नहीं, बस प्यार किया है
उनका प्यार याद आता है, हर अल्फ़ाज़ के साथ
*
दिल चीर जाते हैं… ये अल्फ़ाज़ उनके
वो जब कहते हैं हम कभी एक नहीं हो सकते
*
बिखरे पड़े हैं हर्फ कई तू समेट कर इन्हे अल्फ़ाज़ कर दे
जोड़ दे बिखरे पन्ने को मेरी जिंदगी को तू किताब कर दे
*
मैं ख़ामोशी तेरे मन की, तू अनकहा अल्फ़ाज़ मेरा
मैं एक उलझा लम्हा, तू रूठा हुआ हालात मेरा
*
यहाँ अल्फ़ाज़ की तलाश में न आया करो यारो
हम तो बस एहसास लिखते हैं, महसूस किया कीजिये
*
खत्म हो गयी कहानी बस कुछ अलफाज बाकी हैं
एक अधूरे इश्क की एक मुक़्क़मल सी याद बाकी है
*
हां… याद आया उसका आखरी अलफ़ाज़ यही था
जी सको तो जी लेना, लेकिन मर जाओ तो बेहतर है
*
रुतबा तो खामोशियों का होता है मेरे दोस्त
अलफ़ाज़ तो बदल जाते है लोगों को देखकर
*
और यह भी
हम अल्फाजो से खेलते रह गए
और वो दिल से खेल के चली गयी।
*
सिमट गई मेरी गजल भी चंद अल्फ़ाज़ों में
जब उसने कहा मोहब्बत तो है पर तुमसे नहीं
*
निवेदन : विमर्श केवल शब्द पर है, किसी रचनाकार पर नहीं। स्वतंत्र देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सबको है। अंतरजाल पर सही-गलत सब तरह की जानकारी है। कौन किस पर भरोसा करे यह उस पर निर्भर है। मुझे ऐसा लगता है कि परंपरा से बहुवचन 'अल्फ़ाज़' ही है, अपनी सुविधा के लिए कुछ रचनाकार 'अल्फ़ाज़ों' का प्रयोग कर रहे हैं जो भाषा शास्त्र की दृष्टि से सही नहीं है तथापि रचनाकार अपनी सृष्टि का ब्रह्मा है, मन की मौज में लीक और नियमों को तोड़ता-छोड़ता है उसे पाठक और समीक्षक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देनी होगी। साहित्यिक चर्चाओं को व्यक्तिगत आक्षेप नहीं समझा जाना चाहिए। जिन्हें ऐसे लगता हो कि उनका लिखा 'अंतिम सत्य' है वे रचना के आरम्भ में ही लिख दें 'विमर्श हेतु नहीं' ताकि पाठक उनके चाहे अनुसार केवल प्रशंसा की टीप अंकित करें।

***

दोहा सलिला

दोहा सलिला
*
लिखा बिन लिखे आज कुछ, पढ़ा बिन पढ़े आज
केर-बेर के संग से, सधे न साधे काज
*
अर्थ न रहे अनर्थ में, अर्थ बिना सब व्यर्थ
समझ न पाया किस तरह, समझा सकता अर्थ.
*
सजे अधर पर जब हँसी, धन्य हो गयी आप
पैमाना कोई नहीं, जो खुशियाँ ले नाप
*
सही करो तो गलत क्यों, समझें-मानें लोग?
गलत करो तो सही, कह; बढ़ा रहे हैं रोग.
*
दिल के दिल में क्या छिपा, बेदिल से मत बोल
संग न सँगदिल का करो, रह जाएगी झोल
*
प्राण गए तो देह के, अंग दीजिए दान.
जो मरते जी सकेंगे, ऐसे कुछ इंसान.
*
कंकर भी शंकर बने, कर विराट का संग
रंग नहीं बदरंग हो, अगर करो सत्संग
*
कृष्णा-कृष्णा सब करें, कृष्ण हँस रहे देख
द्रुपदसुता का नाम ले, क्यों मेरा उल्लेख?
*
मटक-मटक जो फिर रहे, अटक रहे हर ठौर।
सटके; फटक न सफलता, अटकें; करिए गौर।।
*
३-८-२०१८

नवगीत बारिश

नवगीत 
बारिश 
*
बारिश तो अब भी होती है
लेकिन बच्चे नहीं खेलते.
*
नाव बनाना
कौन सिखाये?
बहे जा रहे समय नदी में.
समय न मिलता रिक्त सदी में.
काम न कोई
किसी के आये.
अपना संकट आप झेलते
बारिश तो अब भी होती है
लेकिन बच्चे नहीं खेलते.
*
डेंगू से भय-
भीत सभी हैं.
नहीं भरोसा शेष रहा है.
कोइ न अपना सगा रहा है.
चेहरे सबके
पीत अभी हैं.
कितने पापड विवश बेलते
बारिश तो अब भी होती है
लेकिन बच्चे नहीं खेलते.
*
उतर गया
चेहरे का पानी
दो से दो न सम्हाले जाते
कुत्ते-गाय न रोटी पाते
कहीं न बाकी
दादी-नानी.
चूहे भूखे दंड पेलते
बारिश तो अब भी होती है
लेकिन बच्चे नहीं खेलते.
*
salil.sanjiv@gmail.com
#दिव्यनर्मदा
divyanarmada.blogspot.com
#हिंदी_ब्लॉगर

व्यंग्य लेखांश : ‘भगत की गत’ हरिशंकर परसाई जी


व्यंग्य लेखांश :
‘भगत की गत’
हरिशंकर परसाई जी
*
...एक भगत ने मरने के बाद भगवान के पास जाकर स्वर्ग की डिमांड की, फिर क्या हुआ ......
प्रभु ने कहा- तुमने ऐसा क्या किया है, जो तुम्हें स्वर्ग मिले?
भगतजी को इस प्रश्न से चोट लगी। जिसके लिए इतना किया, वही पूछता है कि तुमने ऐसा क्या किया! भगवान पर क्रोध करने से क्या फायदा- यह सोचकर भगतजी गुस्सा पी गये। दीनभव से बोले- मैं रोज आपका भजन करता रहा।
भगवान ने पूछा- लेकिन लाउड-स्पीकर क्यों लगाते थे?
भगतजी सहज भव से बोले- उधर सभी लाउड-स्पीकर लगाते हैं। सिनेमावाले, मिठाईवाले, काजल बेचने वाले- सभी उसका उपयोग करते हैं, तो मैंने भी कर लिया।
भगवान ने कहा- वे तो अपनी चीज का विज्ञापन करते हैं। तुम क्या मेरा विज्ञापन करते थे? मैं क्या कोई बिकाऊ माल हूं।
भगतजी सन्न रह गये। सोचा, भगवान होकर कैसी बातें करते हैं।
भगवान ने पूछा- मुझे तुम अन्तर्यामी मानते हो न?
भगतजी बोले- जी हां!
भगवान ने कहा- फिर अन्तर्यामी को सुनाने के लिए लाउड-स्पीकर क्यों लगाते थे? क्या मैं बहरा हूं? यहां सब देवता मेरी हंसी उड़ाते हैं। मेरी पत्नी मजाक करती है कि यह भगत तुम्हें बहरा समझता है।
भगतजी जवाब नहीं दे सके।
भगवान को और गुस्सा आया। वे कहने लगे- तुमने कई साल तक सारे मुहल्ले के लोगों को तंग किया। तुम्हारे कोलाहल के मारे वे न काम कर सकते थे, न चैन से बैठ सकते थे और न सो सकते थे। उनमें से आधे तो मुझसे घृणा करने लगे हैं। सोचते हैं, अगर भगवान न होता तो यह भगत इतना हल्ला न मचाता। तुमने मुझे कितना बदनाम किया है!
भगत ने साहस बटोरकर कहा- भगवान आपका नाम लोंगों के कानों में जाता था, यह तो उनके लिए अच्छा ही था। उन्हें अनायास पुण्य मिल जाता था।
भगवान को भगत की मूर्खता पर तरस आया। बोले- पता नहीं यह परंपरा कैसे चली कि भक्त का मूर्ख होना जरूरी है। और किसने तुमसे कहा कि मैं चापलूसी पसंद करता हूं? तुम क्या यह समझते हो कि तुम मेरी स्तुति करोगे तो मैं किसी बेवकूफ अफसर की तरह खुश हो जाऊंगा? मैं इतना बेवकूफ नहीं हूं भगतजी कि तुम जैसे मूर्ख मुझे चला लें। मैं चापलूसी से खुश नहीं होता कर्म देखता हूं।
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टीप: वे भगवान् अवश्य कर्मदेव चित्रगुप्त रहे होंगे.

लघुकथा बीज का अंकुर


लघुकथा
बीज का अंकुर
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चौकीदार के बेटे ने सिविल सर्विस परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। समाचार पाकर कमिश्नर साहब रुआंसे हो आये। मन की बात छिपा न सके और पत्नी से बोले बीज का अंकुर बीज जैसा क्यों नहीं होता?
अंकुर तो बीज जैसा ही होता है पर जरूरत से ज्यादा खाद-पानी रोज दिया जाए तो सड़ जाता है बीज का अंकुर।
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लघुकथा : सोई आत्मा

लघुकथा :
सोई आत्मा
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मदरसे जाने से मना करने पर उसे रोज डाँट पड़ती। एक दिन डरते-डरते उसने पिता को हक़ीक़त बता ही दी कि उस्ताद अकेले में.....

वालिद गुस्से में जाने को हुए तो वालिदा ने टोंका गुस्से में कुछ ऐसा-वैसा क़दम न उठा लेना उसकी पहुँच ऊपर तक है।
फ़िक्र न करो, मैं नज़दीक छिपा रहूँगा और आज जैसे ही उस्ताद किसी बच्चे के साथ गलत हरकत करेगा उसकी वीडियो फिल्म बनाकर पुलिस ठाणे और अखबार नवीस के साथ उस्ताद की बीबी और बेटी को भी भेज दूँगा।
सब मिलकर उस्ताद की खाट खड़ी करेंगे तो जाग जायेगी उसकी सोई आत्मा।
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३-८-२०१६ 

मुक्तक

मुक्तक
बह्रर 2122-2122-2122-212
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हो गए हैं धन्य हम तो आपका दीदार कर
थे अधूरे आपके बिन पूर्ण हैं दिल हार कर
दे दिया दिल आपको, दिल आपसे है ले लिया
जी गए हैं आप पर खुद को 'सलिल' हम वार कर
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बोलिये भी, मौन रहकर दूर कब शिकवे हुए
तोलिये भी, बात कह-सुन आप-मैं अपने हुए
मैं सही हूँ, तू गलत है, यह नज़रिया ही गलत
जो दिलों को जोड़ दें, वो ही सही नपने हुए
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३-८-२०१६ 

लेख : - : नागको नमन : -

लेख :
- : नागको नमन : -
संजीव
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नागपंचमी आयी और गयी... वन विभागकर्मियों और पुलिसवालोंने वन्य जीव रक्षाके नामपर सपेरों को पकड़ा, आजीविका कमानेसे वंचित किया और वसूले बिना तो छोड़ा नहीं होगा। उनकी चांदी हो गयी.

पारम्परिक पेशेसे वंचित किये गए ये सपेरे अब आजीविका कहाँसे कमाएंगे? वे शिक्षित-प्रशिक्षित तो हैं नहीं, खेती या उद्योग भी नहीं हैं. अतः, उन्हें अपराध करनेकी राह पर ला खड़ा करनेका कार्य शासन-प्रशासन और तथाकथित जीवरक्षणके पक्षधरताओंने किया है.
जिस देशमें पूज्य गाय, उपयोगी बैल, भैंस, बकरी आदिका निर्दयतापूर्वक कत्ल कर उनका मांस लटकाने, बेचने और खाने पर प्रतिबंध नहीं है वहाँ जहरीले और प्रतिवर्ष लगभग ५०,००० मृत्युओंका कारण बननेवाले साँपोंको मात्र एक दिन पूजनेपर दुग्धपानसे उनकी मृत्युकी बात तिलको ताड़ बनाकर कही गयी. दूरदर्शनी चैनलों पर विशेषज्ञ और पत्रकार टी.आर.पी. के चक्करमें तथाकथित विशेषज्ञों और पंडितों के साथ बैठकर घंटों निरर्थक बहसें करते रहे. इस चर्चाओंमें सर्प पूजाके मूल आर्य और नाग सभ्यताओंके सम्मिलनकी कोई बात नहीं की गयी. आदिवासियों और शहरवासियों के बीच सांस्कृतिक सेतुके रूपमें नाग की भूमिका, चूहोंके विनाश में नागके उपयोगिता, जन-मन से नागके प्रति भय कम कर नागको बचाने में नागपंचमी जैसे पर्वोंकी उपयोगिता को एकतरफा नकार दिया गया.
संयोगवश इसी समय दूरदर्शन पर महाभारत श्रृंखला में पांडवों द्वारा नागों की भूमि छीनने, फलतः नागों द्वारा विद्रोह, नागराजा द्वारा दुर्योधन का साथ देने जैसे प्रसंग दर्शाये गये किन्तु इन तथाकथित विद्वानों और पत्रकारों ने नागपंचमी, नागप्रजाजनों (सपेरों - आदिवासियों) के साथ विकास के नाम पर अब तक हुए अत्याचार की और नहीं गया तो उसके प्रतिकार की बात कैसे करते?
इस प्रसंग में एक दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष यह भी है कि इस देशमें बुद्धिजीवी माने जानेवाले कायस्थ समाज ने भी यह भुला दिया कि नागराजा वासुकि की कन्या उनके मूलपुरुष चित्रगुप्त जी की पत्नी हैं तथा चित्रगुप्त जी के १२ पुत्रों के विवाह भी नाग कन्याओं से ही हुए हैं जिनसे कायस्थों की उत्पत्ति हुई. इस पौराणिक कथा का वर्ष में कई बार पाठ करने के बाद भी कायस्थ आदिवासी समाज से अपने ननिहाल होने के संबंध को याद नहीं रख सके. फलतः। खुद राजसत्ता गंवाकर आमजन हो गए और आदिवासी भी शिक्षित हुआ. इस दृष्टि से देखें तो नागपंचमी कायस्थ समाज का भी महापर्व है और नाग पूजन उनकी अपनी परमरा है जहां विष को भी अमृत में बदलकर उपयोगी बनाने की सामर्थ्य पैदा की जाती है.
शिवभक्तों और शैव संतों को भी नागपंचमी पर्व की कोई उपयोगिता नज़र नहीं आयी.
यह पर्व मल्ल विद्या साधकों का महापर्व है लेकिन तमाम अखाड़े मौन हैं बावजूद इस सत्य के कि विश्व स्तरीय क्रीड़ा प्रतियोगिताएं में मल्लों की दम पर ही भारत सर उठाकर खड़ा हो पाता है. वैलेंटाइन जैसे विदेशी पर्व के समर्थक इससे दूर हैं यह तो समझा जा सकता है किन्तु वेलेंटाइन का विरोध करनेवाले समूह कहाँ हैं? वे नागपंचमी को यवा शौर्य-पराक्रम का महापर्व क्यों नहीं बना देते जबकि उन्हीं के समर्थक राजनैतिक दल राज्यों और केंद्र में सत्ता पर काबिज हैं?
महाराष्ट्र से अन्य राज्यवासियों को बाहर करनेके प्रति उत्सुक नेता और दल नागपंचमई को महाराष्ट्र की मल्लखम्ब विधा का महापर्व क्यों कहीं बनाते? क्यों नहीं यह खेल भी विश्व प्रतियोगिताओं में शामिल कराया जाए और भारत के खाते में कुछ और पदक आएं?
अंत में सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह कि जिन सपेरों को अनावश्यक और अपराधी कहा जा रहा है, उनके नागरिक अधिकार की रक्षा कर उन्हें पारम्परिक पेशे से वंचित करने के स्थान पर उनके ज्ञान और सामर्थ्य का उपयोग कर हर शहर में सर्प संरक्षण केंद्र खोले जाए जहाँ सर्प पालन कर औषधि निर्माण हेतु सर्प विष का व्यावसायिक उत्पादन हो. सपेरों को यहाँ रोजगार मिले, वे दर-दर भटकने के बजाय सम्मनित नागरिक का जीवन जियें। सर्प विष से बचाव के उनके पारम्परिक ज्ञान मन्त्रों और जड़ी-बूटियों पर शोध हो.
क्या माननीय नरेंद्र मोदी जी इस और ध्यान देंगे?
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