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रविवार, 19 जनवरी 2020

दोहा गाथा सनातन : ९ २१ / २५ मार्च २००९

Saturday, March 21, 2009

दोहा गाथा सनातन : ९ दोहा लें दिल में बसा


दोहा लें दिल में बसा, लें दोहे को जान.
दोहा जिसको सिद्ध हो, वह होता रस-खान.

दोहा लेखन में द्विमात्रिक, दीर्घ या गुरु अक्षरों के रूपाकार और मात्रा गणना के लिए निम्न पर ध्यान दें-

अ. सभी दीर्घ स्वर: जैसे- आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ.
आ. दीर्घ स्वरों की ध्वनि (मात्रा) से संयुक्त सभी व्यंजन. यथा: का, की, कू, के, कै, को, कौ आदि.
इ. बिन्दीयुक्त (अनुस्वार सूचक) स्वर: उदाहरण: अंत में अं, चिंता में चिं, कुंठा में कुं, हंस में हं, गंगा में गं,
खंजर में खं, घंटा में घं, चन्दन में चं, छंद में छं, जिंदा में जिं, झुंड में झुं आदि.
ई. विसर्गयुक्त ऐसे वर्ण जिनमें हलंत ध्वनित होता है. जैसे: अतः में तः,प्रायः में यः, दु:ख में दु: आदि.
उ. ऐसा हृस्व वर्ण जिसके बाद के संयुक्त अक्षर का स्वराघात होता हो. यथा: भक्त में भ, मित्र में मि, पुष्ट में पु, सृष्टि में सृ, विद्या में वि, सख्य में स, विज्ञ में वि, विघ्न में वि, मुच्य में मु, त्रिज्या में त्रि, पथ्य में प, पद्म में प, गर्रा में र.

उक्त शब्दों में लिखते समय पहला अक्षर लघु है किन्तु बोलते समय पहले अक्षर के साथ उसके बाद का आधा अक्षर जोड़कर संयुक्त बिला जाता है तथा संयुक्त अक्षर के उच्चारण में एक एकल अक्षर के उच्चारण में लगे समय से अधिक लगता है. इस कारण पहला अक्षर लघु होते हुए भी बाद के आधे अक्षर को जोड़कर २ मात्राएँ गिनी जाती हैं.
ऊ. शब्द के अंत में हलंत हो तो उससे पूर्व का लघु अक्षर दीर्घ मानकर २ मात्राएँ गिनी जाती हैं. उदाहरण: स्वागतम् में त, राजन् में ज. सरित में रि, भगवन् में न्, धनुष में नु आदि.
ए. दो ऐसे निकटवर्ती लघु वर्ण जिनका स्वतंत्र उच्चारण अनिवार्य न हो और बाद के अकारांत लघु वर्ण का उच्चारण हलंत वर्ण के रूप में हो सकता हो तो दोनों वर्ण मिलाकर संयुक्त माने जा सकते हैं. जैसे: चमन् में मन्, दिल् , हम् दम् आदि में हलंतयुक्त अक्षर अपने पहले के अक्षर के साथ मिलाकर बोला जाता है. इसलिए दोनों को मिलाकर गुरु वर्ण हो जाता है.
मात्रा गणना हिन्दी ही नहीं उर्दू में भी जरूरी है. गजल में प्रयुक्त होनेवाली 'बहरों' ( छंदों) के मूल अवयव 'रुक्नों" (लयखंडों) का निर्मिति भी मात्राओं के आधार पर ही है. उर्दू छंद शास्त्र में भी अक्षरों के दो भेद 'मुतहर्रिक' (लघु) तथा 'साकिन' (हलंत) मान्य हैं. उर्दू में रुक्न का गठन अक्षर गणना के आधार पर होता है जबकि हिंदी में छंद का आधार मात्रा गणना है. उर्दू में अक्षर पतन का आधार यही है. वस्तुतः हिन्दी और उर्दू दोनों का उद्गम संस्कृत है, जिससे दोनों ने ध्वनि उच्चारण की नींव पर छंद शास्त्र गढ़ने की विरासत पाई और उसे दो भिन्न तरीकों से विकसित किया.

मात्रा गणना को सही न जाननेवाला न तो दोहा या गीत को सही लिख सकेगा न ही गजल को. आजकल लिखी जानेवाली अधिकाँश पद्य रचनायें निरस्त किये जाने योग्य हैं, चूंकि उनके रचनाकार परिश्रम करने से बचकर 'भाव' की दुहाई देते हुए 'शिल्प' की अवहेलना करते हैं. ऐसे रचनाकार एक-दूसरे की पीठ थपथपाकर स्वयं भले ही संतुष्ट हो लें किन्तु उनकी रचनायें स्तरीय साहित्य में कहीं स्थान नहीं बना सकेंगी. साहित्य आलोचना के नियम और सिद्दांत दूध का दूध और पानी का पानी करने नहीं चूकते. हिंदी रचनाकार उर्दू के मात्रा गणना नियम जाने और माने बिना गजल लिखकर तथा उर्दू शायर हिन्दी मात्रा गणना जाने बिना दोहे लिखकर दोषपूर्ण रचनाओं का ढेर लगा रहे हैं जो अंततः खारिज किया जा रहा है. अतः 'दोहा गाथा..' के पाठकों से अनुरोध है कि उच्चारण तथा मात्रा संबन्धी जान कारी को हृदयंगम कर लें ताकि वे जो भी लिखें वह समादृत हो.

गंभीर चर्चा को यहीं विराम देते हुए दोहा का एक और सच्चा किस्सा सुनाएँ..अमीर खुसरो का नाम तो आप सबने सुना ही है. वे हिन्दी और उर्दू दोनों के रचनाकार थे. वे अपने समय की मांग के अनुरूप संस्कृतनिष्ठ भाषा तथा अरबी-फारसी मिश्रित जुबान को छोड़कर आम लोगों की बोलचाल की बोली 'हिन्दवी' में लिखते थे बावजूद इसके कि वे दोनों भाषाओं, आध्यात्म तथा प्रशासन में निष्णात थे.
जनाब खुसरो एक दिन घूमने निकले. चलते-चलते दूर निकल गए, जोरों की प्यास लगी.. अब क्या करें? आस-पास देखा तो एक गाँव दिखा, सोचा चलकर किसी से पानी मांगकर प्यास बुझायें. गाँव के बाहर एक कुँए पर औरतों को पानी भरते देखकर खुसरो साहब ने उनसे पानी पिलाने की दरखास्त की. खुसरो चकराए कि सुनने के बाद भी उनमें से किसी ने तवज्जो नहीं दी. दोबारा पानी माँगा तो उनमें से एक ने कहा कि पानी एक शर्त पर पिलायेंगी कि खुसरो उन्हें उनके मन मुताबिक कविता सुनाएँ. खुसरो समझ गए कि जिन्हें वे भोली-भली देहातिनें समझ रहे थे वे ज़हीन-समझदार हैं और उन्हें पहचान चुकने पर उनकी झुंझलाहट का आनंद ले रही हैं. कोई और रास्ता भी न था, प्यास बढ़ती जा रही थी. खुसरो ने उनकी शर्त मानते हुए विषय पूछा तो बिना देर किये चारों ने एक-एक विषय दे दिया और सोचा कि आज किस्मत खुल गयी. महाकवि खुसरो के दर्शन तो हुए ही चार-चार कवितायें सुनाने का मौका भी मिल गया. विषय सुनकर खुसरो एक पल झुंझलाए..ये कैसे बेढब विषय हैं? इन पर क्या कविता करें? लेकिन प्यास... इन औरतों से हार मानना भी गवारा न था... राज हठ और बाल हठ के समान त्रिया हठ के भी किस्से तो खूब सुने थे पर आज उन्हें एक-दो नहीं चार-चार महिलाओं के त्रिया हठ का सामना करना था. खुसरो ने विषयों पर गौर किया...खीर...चरखा...कुत्ता...और ढोल... चार कवितायें तो सुना दें पर प्यास के मारे जान निकली जा रही थी.
इन विषयों पे ऐसी स्थति में आपको कविता करनी हो तो क्या करेंगे? चकरा गए न? ऐसे मौकों पर अच्छे-अच्छों की अक्ल काम नहीं करती पर खुसरो भी एक ही थे, अपनी मिसाल आप. उनहोंने सबसे छोटे छंद दोहा का दमन थामा और एक ही दोहे में चारों विषयों को समेटते हुए ताजा-ठंडा पानी पिया और चैन की सांस ली. खुसरो का वह दोहा आप में से जो भी बतायेगा पानी पिलाए बिना ही एक दोहा ईनाम में पायेगा...तो मत चुके चौहान... शेष फिर...

20 कविताप्रेमियों का कहना है :

neelam का कहना है कि -
खीर पकाई जतन से ,चरखा दिया चलाय|
आया कुत्ता खा गया ,तू बैठी ढोल बजा ||

aachaary ji sahi hai na ,
manu का कहना है कि -
जी,
नीलम जी,
यही कहा था खुसरो ने,,,,
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
आदरणीय आचार्य जी,
आज मैंने भी आप की कक्षा में झांक कर देखा और लगा कि मुझे भी कुछ रूचि होने लगी है दोहों में. मुझे नहीं पता कि खुसरो जी ने क्या लिखा था पर मैंने अभी-अभी यह दोहा उन चार शब्दों को धयान में रखते हुए लिखा है बड़े मन से. आपके बिचार जानने की प्रबल इच्छा है. धन्यवाद.

'अंगना में बहू ढोल बजावे
और सासू चरखा रही चलाइ
चुप्पे से कुत्ता गओ रसोई में
और खीर गओ सब खाइ.'
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
आचार्य जी,
मैंने एक और दोहा लिख लिया है. उत्सुकता है इसके बारे में भी जानने की कि कैसा लिखा है. कृपया बताइये.

'खीर देखि लार गिरावे
बैठो कुत्ता एक चटोर
घर्र-घर्र चरखा चले
ढोलक लुढ़की एक ओर.'
,
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
क्षमा करियेगा मुझे पर बस एक और दोहा आचार्य जी. उमंग सी हो रही है कुछ मुझको दोहा लिखने की अब:

'चरखा और ढोल धरे आँगन में
और खीर भरो कटोरा पास
एक कुत्ता घर में कूँ-कूँ करे
मन में लगी खीर की आस.'
अजित गुप्ता का कोना का कहना है कि -
ज्ञान बड़ा संसार में
21 12 221 2 = 13
शक्तिहीन धनवान
2121 1121 = 11
पुस्‍तक है प्रकाश पुंज
211 2 121 21 = 13
जीवन बने महान।
211 12 121= 11
अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -
सभी गलत हैं,
वह दोहा ऐसा है -

झटपट खा दौडा कुत्ता
११११ २ २२ १२ =13
चरखे पर का खीर
११२ 11 २ २१ = ११
ढोल बजाओ अब सभी,
२१ १२२ ११ १२ = १३
फूट गयी तकदीर
२१ १२ ११२१ = ११

:) हंसी कर रहा था |

लेख अच्छा है , एक नए किस्से और गृहकार्य के साथ |
आचार्यजी को धन्यवाद |

अवनीश तिवारी
Ria Sharma का कहना है कि -
नए पाठ के लिए बहुत धन्यवाद आचार्य जी !!!

सभी प्रतिक्रियाएँ बहुत शानदार रही
अलग अलग अंदाज में दोहे :))))))

सादर !!!!
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
आचार्य जी,
क्षमा चाहती हूँ कि मैंने ऊपर वाले दोहे बिना सोचे-समझे लिखे थे. उनमें तो बहुत त्रुटियाँ होंगी. अब यह वाला दोहा मैंने आपके पाठों से मात्रायों को पढ़ने के बाद लिखा है. आपकी इस पर प्रतिक्रिया जानने की प्रतीक्षा रहेगी. और भी अधिक दोहे के बारे में सीखना चाहती हूँ. कृपया इस दोहे को देखिये:
कुत्ता बैठा चौखट पे
1+२ २+२ २+१+१ २ = १३
चरखा घूमे जाय
१+१+२ २+२ २+१ = ११
खीर खाय कौवा उडा
२+१ २+१ २+२ १+२ =१३
बंदर ढोल बजाय
२+१+१ २+१ १+२+१ =११
Pooja Anil का कहना है कि -
प्रणाम आचार्य जी ,
आज का पाठ कुछ कठिन प्रतीत हुआ , शायद हिंदी भाषा से बहुत समय से दूर होने की वजह से, इन नियमों को याद रखने के लिए अभ्यास करना पढेगा , वैसे पिछले दो दिनों से पढ़ रही हूँ और याद रखने की कोशिश भी कर रही हूँ .

आचार्य जी ,स्वराघात क्या होता है?

आपकी दोहे की पहेली नहीं नहीं बूझ पाई :)
सादर
पूजा अनिल
divya naramada का कहना है कि -
पूजा जी!
आपका स्वागत... आपकी अनुपस्थिति खलती है... आप दूर हैं, यह दूरी लगातार साथ रहने से ही घटेगी... पाठों को और सरल बनाने की कोशिश करूंगा... आपकी रूचि बनी रहेगी तो धीरे-धीरे सभी कठिन बातें सरल लगने लगेंगी. आप भी सब कुछ भूलकर शन्नो जी की तरह दो पंक्तियों में अपने मन की बात उन शब्दों में कहें जो आप जानती हैं. कहने के पहले किसी दोहे को कई बार पढें या गुनगुनाएं...अपनी बात को उसी दोहे की लय में कहें...मात्रा सिर्फ दो हैं छोटी और बड़ी... जिस अक्षर को बोलने में कम समय लगे उसकी मात्रा एक... जिसको बोलने में अधिक समय लगे उसकी मात्रा २...
अ, इ, उ, ऋ, अँ, की मात्रा १, आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः की मात्राएँ २ हैं.

स्वराघात - जब दो अक्षरों या दो ध्वनियों को मिलकर बोला जाता है तो दोनों के मिलने से बनी ध्वनि या अक्षर संयुक्त अक्षर कहलाता है. उदाहरण- क + त = क्त, प + र = प्र, आदि...संयुक्त अक्षर दो तरह से बोला जाता है १. दो अक्षरों में से पहला अपने पूर्व अक्षर के साथ बोला जाता है... जैसे- उक्त में उक + त बोला जाता है तथा मात्राएँ २ + १ = ३ होंगी. इसे क का स्वराघात उ पर होना कहा जायेगा.
आप अभी जो सहज लगे बस वही कीजिए. कठिन बातों से भागिए मत, उन्हें समझे आपको पुनः बधाई. मैं आपके हौसले की तारीफ करता हूँ

Wednesday, March 25, 2009

दोहा गोष्ठी ९ -दोहा की सीमा नहीं


दोहा की सीमा नहीं, कहता है सच देव।
जो दोहा का मीत हो, टरै न उसकी टेव।

रीति-नीति, युगबोध नव, पूरा-पुरातन सत्य.
सत-शिव-सुन्दर कह रहा, दोहा छंद अनित्य।

दोहा के पद अंत में, होता अक्षर एक।
दीर्घ और लघु को रखें, कविजन सहित विवेक।

खीर पकाई जतन से, चरखा दिया चलाय।
आया कुत्ता खा गया, बैठी ढोल बजाय।

ला, पानी पिला।
अमीर खुसरो ने उक्त दोहा पढ़कर पानी माँगा. आजकल हास्य कवि दुमदार दोहे सुनते हैं. पहला दुमदार दोहा रचने का श्रेय खुसरो को है. नीलम जी! आपने दोहा ठीक बूझा पर जिस रूप में लिखा उसमें चौथे चरण में ११ के स्थान पर १२ मात्राएँ हैं. सम पदों के अंत में समानाक्षर जरूरी है. उक्त रूप इन दोषों से मुक्त है. मनु जी ने भी सही कहा है.

शत-शत वंदन आपका, दोहा बूझा ठीक.
नीलम-मनु चलती रहे, आगे भी यह लीक.
शन्नो जी! स्वागत करे, हँस दोहा-परिवार.
पूर्व पाठ पढ़, कीजिये, दोहा पर अधिकार.


दोहा में दो पद (पंक्ति), चार चरण, १३-११ पर यति (विराम) विषम पदों ( १, ३ ) के आरम्भ में एक शब्द में जगण ( लघु गुरु लघु = १ २ १ ) वर्जित तथा सम पदों के अंत में लघु गुरु (१ २) के साथ समान अक्षर होना जरूरी है. इन आधारों पर खरा ण होने के कारण निम्न पंक्तियाँ दोहा नहीं हैं, उन्हें द्विपदी (दोपदी) कह सकते है. कुछ परिवर्तन से उन्हें दोहा में ढाला जा सकता है.

'अंगना में बहू ढोल बजावे = १७ मात्राएँ, १३ होना जरूरी
और सासू चरखा रही चलाइ = १८ मात्राएँ, ११ होना जरूरी
चुप्पे से कुत्ता गओ रसोई में = २० मात्राएँ, १३ होना जरूरी
और खीर गओ सब खाइ.' = १४ मात्राएँ, ११ होना जरूरी

एक प्रयोग देखिये -

चरखा- ढोल चला-बजा, सास-बहू थीं लीन.
घुस रसोई में खीर खा, श्वान गया सुख छीन.


मैंने एक और दोहा लिख लिया है. उत्सुकता है इसके बारे में भी जानने की कि कैसा लिखा है. कृपया बताइये.

'खीर देखि लार गिरावे = १४ मात्राएँ, १३ होना जरूरी
बैठो कुत्ता एक चटोर = १५ मात्राएँ, ११ होना जरूरी
घर्र-घर्र चरखा चले = १३ मात्राएँ, सही
ढोलक लुढ़की एक ओर.' = १४ मात्राएँ, ११ होना जरूरी

लार गिरा चट खीरकर, भागा श्वान चटोर.
घर्र-घर्र चरखा चले, ढोल पडी इक ओर.
शन्नो जी के मन जगी, दोहा सृजन उमंग.
झट-पट कुछ दोहा रचें, हुलसित भाव-तरंग.


'चरखा और ढोल धरे आँगन में = १९ मात्राएँ, १३ होना जरूरी
और खीर भरो कटोरा पास = १७ मात्राएँ, ११ होना जरूरी
एक कुत्ता घर में कूँ-कूँ करे = १८ मात्राएँ, १३ होना जरूरी
मन में लगी खीर की आस.' = १५ मात्राएँ, १३ होना जरूरी

देख ढोल चरखा सहित, खीर-कटोरा पास.
आँगन में कूँ-कूँ करे, कुत्ता लेकर आस.


Dr. Smt. ajit gupta said...
ज्ञान बड़ा संसार में
21 12 221 2 = 13
शक्तिहीन धनवान
2121 1121 = 11
पुस्‍तक है प्रकाश पुंज
211 2 121 21 = 13
जीवन बने महान।
211 12 121= 11

अजित जी! बधाई, आपने मात्रा-संतुलन पूरी तरह साध लिया है किन्तु तीसरी पंक्ति में लय में कुछ दोष है. इसे पहली पंक्ति की तरह कीजिये....ज्ञान पुंज पुस्तक गहें,

अवनीश एस तिवारी
झटपट खा दौडा कुत्ता
११११ २ २२ १२ =13
चरखे पर का खीर
११२ 11 २ २१ = ११
ढोल बजाओ अब सभी,
२१ १२२ ११ १२ = १३
फूट गयी तकदीर
२१ १२ ११२१ = ११
अवनीश जी! एक अच्छी कोशिश के लिए शाबास. कुत्ता = कुत + ता = २ + २ = ४, पहली पंक्ति में मात्राएँ १४ हैं, १३ चाहिए. 'दौड़ा कुत्ता खा गया' या इसी तरह की पंक्ति रखें.


पूजा जी! ने कर दिया, सचमुच आज कमाल.
होली के रंग में लिखा, दोहा मचा धमाल.

होली के रंग में रंगी, दोहा गोष्ठी विशेष ,
२२ २ ११ २ १२ २२ २२ १२१
वीर गाथा कहें सलिल, सुनें सभी अनिमेष
२१ २२ १२ १११ 12 १२ ११२१ .

तीसरे चरण को 'कहें वीर-गाथा 'सलिल' करने से लय ठीक बन जाती है.
तपन जी! आप और अन्य सभी की भावनाओं का सम्मान करते हुए मैं आपके साथ हूँ जब तक आप चाहें... 'एक कहे दूजे ने मानी, कहे कबीरा दोनों ज्ञानी.'

टिप्प्णी नहीं कर पाते, पढ़ते तो हम रहते है,
आप जाने की कहते हैं, हम परिवार कहते हैं


इस तरह कहें तो दोहा हो जायेगा-

भले न करते टिप्पणी, पढ़ने को तैयार.
आप न जाने को कहें, बना रहे परिवार.


दोहा गाथा से जुड़े सभी साथियों के प्रति आभार कि वे सब दोहा को अंगीकार कर रहे हैं. कठिनाई और असफलता से न डरें, याद रखें - 'गिरते हैं शह सवार ही, मैदाने जंग में. वह तिफ्ल क्या गिरेगा जो घुटनों के बल चले.'

गोष्ठी के अंत में दोहा चौपाल में सुनिए एक सच्चा किस्सा-चित-पट दोनों सत्य हैं...
आपके प्रिय और अमर दोहाकार कबीर गृहस्थ संत थे. वे कहते थे 'यह दुनिया माया की गठरी', इस माया के मोह जाल से मुक्त रहकर ही वे कह सके- ' यह चादर सुर नर मुनि ओढी, ओढ़ के मैली कीनी चदरिया. दास कबीर जतन से ओढी, ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया.' कबीर जुलाहा थे, जो कपड़ा बुनते उसे बेचकर परिवार पलता पर कबीर वह धन साधुओं पर खर्च कर कहते ' आना खाली हाथ है, जाना खाली हाथ'. उनकी पत्नी लोई बहुत नाराज होती पर कबीर तो कबीर...लोई ने पुत्र कमाल को कपड़ा बेचने के लिए भेजना शुरू कर दिया. कमाल कपड़ा बेचकर साधुओं पर खर्च किये बिना पूरा धन घर ले आया, कबीर को पता चला तो खूब नाराज हुए. दोहा ही कबीर की नाराजगी का माध्यम बना-

'बूडा वंश कबीर का, उपजा पूत कमाल.
हरि का सुमिरन छोड़ के, घर लै आया माल.


कबीर ने कमाल को भले ही नालायक माना पर लोई प्रसन्न हुई. पुत्र को समझाते हुए कबीर ने कहा-

चलती चक्की देखकर, दिया कबीरा रोय.
दो पाटन के बीच में,. साबित बचा न कोय.


कमाल था तो कबीर का ही पुत्र, उसका अपना जीवन-दर्शन था. दो पीढियों में सोच का जो अंतर आज है वह तब भी था.कमाल ने कबीर को ऐसा उत्तर दिया कि कबीर भी निरुत्तर रह गए. यह उत्तर भी दोहे में हैं. सोचिये याद न आये तो खोजिये और बताइये वह दोहा. दोहा सही बतानेवाले को मिलेगा उपहार में एक दोहा....

14 कविताप्रेमियों का कहना है :

अजित गुप्ता का कोना का कहना है कि -
आचार्य जी इस दोहे पर आपकी कृपा दृष्टि चाहूँगी।
श्रेष्‍ठ वचन से ही नहीं
21 111 2 2 12 = 13
बनते कभी महान
112 12 121 = 11
कर्म करे तब हो बड़े
21 12 11 2 12= 13
बने तभी पहचान।
12 12 1121 = 11
अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -
मेरे मन का कमाल यह उत्तर सोच रहा है -

है सर रखा अपने भी,
२ ११ १२ ११२ २ = १३
कुटुंब का भार |
121 २२ २१ = ११
केवल साधु सेवा से ,
२११ 2 १ २२ २ = १३
नहीं चले संसार ||
१२ १२ २२१ = ११

लेख अच्छा है |
आचार्यजी ने सभी के दोहों को जाँचा है | उन्हें धन्यवाद |

अवनीश तिवारी
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
आचार्य जी,
देर हो गयी मुझे आने में, क्षमा करियेगा. दोहे लिखने के चक्कर में हूँ. कोशिश बहुत की है पर गलतियाँ तो जरूर होंगी. कृपा करके देखने व दोष बताने का कष्ट करें.

१. दोहों से खिल उठा है, हिंदयुग्म का संसार
गुरु जी के पाठों से, मिलता हर्ष अपार
२. मैं दोहा लिखि-लिखि थकी, फिर भी हुई फ़ेल
छोडूं न आसानी से, फिर से होगा खेल.
३. हुई फ़ेल तो मन टूटा, न होवे बात हजम
दोहे में मात्रा अधिक, नंबर हो गए कम.
४. चाव बड़ा था लिखने का, पर करी न कभी नक़ल
असली वजह बताय दी, मैं न हुई सफ़ल.
५. नक़ल करन की हो अकल, यदि उधार मिली जाय.
लिखन लगें दोहा सभी, फिर पंडित वही कहाय.
६. दोहा जाने बिना ही, ले ली उसकी जान
सर्वप्रथम गुरुदेव से, ले लेती कुछ ज्ञान.
७. मूरख थी भूलें हुईं, पछता रही अनंत
क्षमा आपसे मांगती, मैं ज्ञानी न संत.
८. भूलों को पहचान कर, दो बातें लीं सीख
मात्रायों पर ध्यान दें, अंत करे लघु ठीक.
९. अटकलबाजी से लिखा, अब लग गया विराम
शिक्षा बिन मैं हो गयी, लिखने में नाकाम.
१०. दोहों में भूलें देखि, मनु जी हुए निहाल
ही- ही- ही करने लगे, बुरा हुआ तब हाल.
११. मनु जी से अब डर लगे, ही- ही- हा- हा होय
झेंप बहुत ही लग रही, समझ न आये मोय.
१२. खुद तो दोहा ना लिखें, लगे हाजिरी रोज़
कहते दोहा लिखन से, पड़े अकल पे बोझ.
१३. ही, ही करत सब हंसें, सूखे जाएँ प्रान
नीलम जी, अब आइये, पड़ी मुसीबत आन.
१४. समझ न दोहे की इसे, कहन लगे सब छात्र.
दोहे लिखि-लिखि बनी, सबके हंसी का पात्र.
१५. सबके हास्य का पात्र, करेंगे ही- ही सब
कक्षा में पढेंगे पाठ, मसखरी होगी अब.
१६. कहें गुरु जी कक्षा में, तुम सब हो बेकार
फिर से दोहे तुम लिखो, या खाओ सब मार.
१७. गुल्ली-डंडा न है यह, दोहे का है पाठ
कहें गुरु जी बांध लो, इसको अपनी गांठ.
१८. गलती सभी सुधारि दें, कितने आप महान
सही मायनों में हुई, दोहों से पहचान.
१९. सोच समझकर ही लिखे, यह दोहे इस बार
कृपा करें पढ़न की, कहिए अपुन बिचार.

पिछली बार से सम्बंधित एक दोहा:

आँचल से ढंके अवगुन, मातृ-नेह अटूट
पित्र-सीख ठुकराय के, होवे पूत कपूत.

और भी कुछ:

१. कुतवा खीर खा लेटा, लेकर बड़ी डकार
चरखा बोला ढोल से, अब खायेगा मार.

२. बंदर भागा जल्दी से, कुतवा की दुम काट
ढोलक चरखे पे गिरी, खीर बनाये सास.
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
आचार्य जी,
सादर नमन
मैंने अभी ही एक अपनी टिप्पणी दोहों के साथ भेजी थी, तो उसके तुंरत बाद देखा कि नंबर ५ के दोहे में 'मिली' की जगह 'मिलि' होना चाहिए. और नंबर १९ में 'पढ़न' नहीं मेरा मतलब था 'पढ़ने'. वरना शायद मात्रा की गड़बडी हो जाती. बाकी सब आपकी दया दृष्टि पर निर्भर है.
Pooja Anil का कहना है कि -
आचार्य जी,

बूझ पहेली आज की , दोहा लाइ खोज ,
21 122 21 2 22 22 21
कमाल वाचे पिता से , अपने मन की मौज .
121 22 12 2 112 11 2 21
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"चलती चक्की देखकर दिया कमाल ठठाय
जो कीली से लग गया वो साबुत रह जाय "

"कबीर ने इस पर कहा कि यूँ तो वह कहने को कह गया लेकिन कितनी बड़ी बात कह गया उसे खुद नहीं पता।"


आचार्य जी,
वैसे तो साधारण भाषा में यह दोहा कहा गया है, क्या आप इसका गूढ़ अर्थ भी समझायेंगे?

आपने सभी दोहों को परखा उसके लिए धन्यवाद. बहुत कुछ सीखने को मिल रहा है, अच्छा लग रहा है .

सादर
पूजा अनिल
manu का कहना है कि -
प्रणाम आचार्या,,
होनहार छात्रा के लेखन की बधाई,,,,(हम तो खैर सदा ही,,भागे हुए निक्कमे छात्र रहे हैं,,)
भागे हुए भी नहीं ,,,,फुटके हुए,,,,:::::::::)))))))))))०
अगला पाठ ज़रा रूक कर दें,,,,,
या तो आपको ही पढें या,,,,,,,,,,,,,!!!!!!!!!!!!!!!१
शन्नो जी के काम से आपको शायद लग गया होगा के आपका लिखा यहाँ पर बेकार नहीं जाता,,,,,अतः दोबारा अपना काम बंद ना करने की बात ना करें,,,,
यदि संभव हो तो कहीं से,,,चरखे,,,ढोल ,,आदि का जुगाड़ कर के,,,,

खीर जरूर पका दें,,या पकवा दें,,,,,,,,,,,
देखा ,,,, इतने दोहे लिखने के बाद भी शन्नो जी ,,,, खीर के कटोरे परे ही ठहरी हुई
hain,

::::::::::::::)))))))))))))
bahut hi achhaa lagaaa,,,,,
shanno ji,
agar waakai ye shuruaat hai aapki to,,,
kamaaaaaal hai,,,,,,,,,,,
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
आचार्य जी, आप नाराज तो नहीं हैं? मनु जी की बातों से ऐसा महसूस हुआ कि जैसे मैंने दोहे लिखने का home-work कुछ अधिक ही कर लिया हो, और वह भी ऐसा जो गलतियों से भरा हो. भेजने के बाद पढ़कर देखा और लगने लगा कि नियमों के अनुसार करीब-करीब सभी में गलतियाँ भरी हुई हैं. अब क्या करूं? आपका भी home-work बढा दिया (मेरी गलतियाँ सुधारने के). आगे से ध्यान रखूँगी कि आप झल्लाएँ ना. अच्छा हुआ कि मनु जी ने संकेत दे दिया. आपको तो और छात्रों पर भी ध्यान रखना होता है. आप हम सबको मार्ग-दर्शन कराते रहें और दोहे की भाषा बताते रहें तो मैं तो आपकी बहुत आभारी रहूंगी. दोहा लिखने पर विराम नहीं लगाना चाहती हूँ. लेकिन मेरे दोहों की वजह से यदि आपको कोई तकलीफ हुई हो तो माफ़ी मांगती हूँ. आपके आदर में:

'ज्ञान-सलिल में डूब के, रखिए ज्ञान सहेज
जीवन-पथ कंटक भरा, ना फूलन की सेज.'

कैसा है? जानने की इच्छुक हूँ.

और मनु जी, आपसे मैं क्या कहूं?....ही-ही-ही
आपकी टिप्पणी पढ़ के बोलती बंद हो गयी है मेरी. आपने जो ज्ञान की बातें कही है उन पर बिचार करूंगी, और आगे से सतर्क रहूंगी. धन्यबाद.

'आपकी बात पर गया, मेरा भी कुछ ध्यान
मिले अगर संकेत भी, सीखें उससे ज्ञान.'
manu का कहना है कि -
शन्नो जी,
आप एक दम गलत समझी हैं,,,आपको मालूम नहीं के एक बार आचार्य ने कहा था के लगता है मैं व्यर्थ ही क्लास ले रहा हूँ,,,,कोई शायद दोहा में रुचि लेता भी या नहीं,,
इस बात पर मैंने लिखा है,,( मेरे कहने का अर्थ है के शन्नो जी के कम को देखते हुए आप ये ना सोचें ) आप प्लीज ऐसे ही लिखें,,,;; अब एक शानदार होमवर्क देख कर ( थोडी सी इर्ष्या ) होनी तो स्वाभाविक है,,, ही,,ही,,,ही,,,ही,,,,

स्क्रीन पर ज्यादा देर देखा नहीं जाता मगर आपके दोहे मुझे बेहद पसंद आये,,,
यदि आपका प्रथम प्रयास है,,,तो आपकी समझ और बुद्धि को नमन करता हूँ,,,,,
एकदम सीरियसली ,,,,,,,,,,,,
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
मनु जी,
मेरे दोहे पढ़ने के लिए आपको भी नमन. हर बार पूरी श्रद्धा और उम्मीद के साथ लिखती हूँ फिर भी बाद में अपने आप ही कुछ गलतियाँ दिखने लगती हैं. आप दोहों में मात्रायों की मात्र भर भी चिंता न करें, दिमाग पर जोर पड़ेगा. बस छात्र लोगों पर ही आँखें रखें. सभी की उपस्थिति अनिवार्य है. किसी की उपस्थिति में विराम ना लगे, ऐसी प्रार्थना है. कहीं ऐसा न हो कि सलिल जी फिर इस्तीफा की बात करनें लगें. आप मात्रा और टंकण गिनने का प्रयास ना करें, please. गुरु जी का कहा सर आँखों पर. वैसे गुरु जी हैं कहाँ? कहीं छुट्टी पर गए हुए हैं क्या? कोई खबर है किसी को?
divya naramada का कहना है कि -
सही-सही दोहा कहा, मात्रा गणना ठीक.
साधुवाद लें अजित जी, पकडी दोहा-लीक.

शन्नो जी! शुभ आगमन, इसी तरह लिख आप.
दोहा के आकाश को, कलम पकड़ लें नाप.

१. दोहों से खिल उठा है (सही), हिंदयुग्म का संसार(१३ मात्रा, ११ चाहिए, 'का' निकल दें)
गुरु जी के पाठों से(१२ मात्रा, १३ चाहिए) , मिलता हर्ष अपार (सही)

दोहों से खिल उठा है, हिंद युग्म संसार.
गुरु जी के हर पाठ से, मिलता हर्ष अपार.

२. मैं दोहा लिखि-लिखि थकी (सही) , फिर भी हुई फ़ेल (१०/११)
छोडूं न आसानी से (मात्रा सही, लय या गण देखें) , फिर से होगा खेल (सही)

मैं दोहा लिख-लिख थकी, किन्तु न होऊँ fel.
सफल हुए बिन न तजूं, फिर-फिर खेलूँ khel.

३. हुई फ़ेल तो मन टूटा (१४/१३), न होवे बात हजम ( लय?)
दोहे में मात्रा अधिक, नंबर हो गए कम.

हुई फ़ेल मन टूटता, हजम न होती बात.
मात्रा ज्यादा अंक कम, करुँ न ऐसा तात.

४. चाव बड़ा था लिखने का (१४/१३), पर करी न कभी नक़ल (१२/११)
असली वजह बताय दी ( बताय शब्द अशुद्ध) , मैं न हुई सफ़ल. (९/११)

लिखने का है चाव पर, नकल नहीं है राह .
असली वजह बता रही, मिले सफलता चाह.

५. नक़ल करन की हो अकल (सही), यदि उधार मिली जाय.(१२/११)
लिखन लगें दोहा सभी (सही), फिर पंडित वही कहाय.(१३/११, फिर हटा दें)

अकल नकल-हित यदि मिले, जाएँ सभी बाज़ार.
पंडित बन दोहा लिखें, लेकर अकल उधार.

६. दोहा जाने बिना ही, ले ली उसकी जान
सर्वप्रथम गुरुदेव से, ले लेती कुछ ज्ञान. -बधाई. पूरी तरह सही दोहा.

७. मूरख थी भूलें हुईं, पछता रही अनंत
क्षमा आपसे माँगती, मैं ज्ञानी न संत. (१०/११) - ना ज्ञानी ना संत. शेष ठीक

८. भूलों को पहचान कर, दो बातें लीं सीख
मात्रायों पर ध्यान दें, अंत करे लघु ठीक. - बिलकुल सही

९. अटकलबाजी से लिखा, अब लग गया विराम
शिक्षा बिन मैं हो गयी, लिखने में नाकाम. -सही

१०. दोहों में भूलें देखि, मनु जी हुए निहाल - पहला चरण, लय दोष -दोहों में त्रुटि देखकर, शेष ठीक.
ही- ही- ही करने लगे, बुरा हुआ तब हाल.

११. मनु जी से अब डर लगे, ही- ही- हा- हा होय
झेंप बहुत ही लग रही, समझ न आये मोय. -सही ( होय, मोय आदि के प्रयोग से बचें)

१२. खुद तो दोहा ना लिखें, लगे हाजिरी रोज़
कहते दोहा लिखन से, पड़े अकल पे बोझ. - 'पे' को 'पर' कीजिये, शेष सही.

१३. ही, ही करत (करके) सब हंसें, सूखे जाएँ प्रान
नीलम जी, अब आइये, पड़ी मुसीबत आन. - सही

१४. समझ न दोहे की इसे, कहन लगे सब छात्र.
दोहे लिखि-लिखि बनी (११/१३), सबके हंसी का पात्र.(१२/११)

समझ न दोहे की इसे, कहते हैं सब छात्र,
दोहे लिख-लिखकर बनी, स्वयं हँसी का पात्र.

१५. सबके हास्य का पात्र (१२/१३), करेंगे ही- ही सब
कक्षा में पढेंगे पाठ (१४/१३), मसखरी होगी अब.

स्वयं हँसी का पात्र, करेंगे ही ही ही सब.
खाक पढेंगे पाठ, मसखरी ही होगी अब. - (यह दोहा नहीं है. मात्राएँ ११-१३ हैं.)

१६. कहें गुरु जी कक्षा में, तुम सब हो बेकार
फिर से दोहे तुम लिखो, या खाओ सब मार. - शिल्प की दृष्टि से ठीक. .

मेरी छवि इतनी ख़राब...सुधारनी पड़ेगी. - संव्स्

१७. गुल्ली-डंडा न है यह, दोहे का है पाठ
कहें गुरु जी बांध लो, इसको अपनी गांठ. - सही

१८. गलती सभी सुधारि दें, कितने aap महान ( सुधारि गलत, सुधार सही)
सही मायनों में हुई, दोहों से पहचान. - सही

१९. सोच समझकर ही लिखे, यह दोहे इस बार
कृपा करें पढ़न की, कहिए अपुन बिचार.

दूसरी पंक्ति- पढने की करिए कृपा, कहिये सोच- विचार.

पिछली बार से सम्बंधित एक दोहा:

आँचल से ढंके अवगुन, मातृ-नेह अटूट
पित्र-सीख ठुकराय के, होवे पूत कपूत.

आँचल से अब्गुन ढंके, मान का नेह अटूट.
सीख पिता की दे भुला, तो हो पूत कपूत.

और भी कुछ:

१. कुतवा खीर खा लेटा, लेकर बड़ी डकार - लेटा कुत्ता खीर खा, शेष सही.
चरखा बोला ढोल से, अब खायेगा मार.

२. बंदर भागा जल्दी से, कुतवा की दुम काट
ढोलक चरखे पे गिरी, खीर बनाये सास.

बंदर भागा उछलकर, कुत्ते की दुम काट.
ढोलक चरखे पर गिरी, खीर बनाये सास.

'ज्ञान-सलिल में डूब के (कर), रखिए ज्ञान सहेज
जीवन-पथ कंटक भरा, ना फूलन (फूलों) की सेज.'

'आपकी बात पर गया, मेरा भी कुछ ध्यान -पहला चरण : गया आपकी बात पर, शेष ठीक.
मिले अगर संकेत भी, सीखें उससे ज्ञान.'

शन्नो जी! पूजा अजित, करता सलिल प्रणाम.
दोहों के दरबार में, खूब कमाया नाम.

इसी तरह लिखती रहें, रखकर लय का ध्यान.
भाव-शिल्प-रस कथ्य संग, बिम्ब-प्रतीक विधान.

दोहा गौ-भाषा दुहे, अर्थ अधिक कम शब्द.
सिन्धु-बिंदु सम्बन्ध रच, 'सलिल' करे निःशब्द.

बिना किसी संकोच के, दोहे रचिए खूब.
सफल साधना कीजिये, भाव सलिल में डूब.

दोहा साधा आपने, किया सत्य शुभ काज.
'सलिल' आपके शीश पर, रखे सफलता ताज.

दोहा गाथा सनातनः ८ १५ / १८ मार्च २००९

Sunday, March 15, 2009

दोहा गाथा सनातनः ८- दोहा साक्षी समय का


दोहा साक्षी समय का, कहता है युग सत्य।
ध्यान समय का जो रखे, उसको मिलता गत्य॥


दोहा रचना मेँ समय की महत्वपूर्ण भूमिका है। दोहा के चारों चरण निर्धारित समयावधि में बोले जा सकें, तभी उन्हें विविध रागों में संगीतबद्ध कर गाया जा सकेगा। इसलिए सम तथा विषम चरणों में क्रमशः १३ व ११ मात्रा होना अनिवार्य है।

दोहा ही नहीं हर पद्य रचना में उत्तमता हेतु छांदस मर्यादा का पालन किया जाना अनिवार्य है। हिंदी काव्य लेखन में दोहा प्लावन के वर्तमान काल में मात्राओं का ध्यान रखे बिना जो दोहे रचे जा रहे हैं, उन्हें कोई महत्व नहीं मिल सकता। मानक मापदन्डों की अनदेखी कर मनमाने तरीके को अपनी शैली माने या बताने से अशुद्ध रचना शुद्ध नहीं हो जाती. किसी रचना की परख भाव तथा शैली के निकष पर की जाती है। अपने भावों को निर्धारित छंद विधान में न ढाल पाना रचनाकार की शब्द सामर्थ्य की कमी है।

किसी भाव की अभिव्यक्ति के तरीके हो सकते हैं। कवि को ऐसे शब्द का चयन करना होता है जो भाव को अभिव्यक्त करने के साथ निर्धारित मात्रा के अनुकूल हो। यह तभी संभव है जब मात्रा गिनना आता हो. मात्रा गणना के प्रकरण पर पूर्व में चर्चा हो चुकने पर भी पुनः कुछ विस्तार से लेने का आशय यही है कि शंकाओं का समाधान हो सके.

"मात्रा" शब्द अक्षरों की उच्चरित ध्वनि में लगनेवाली समयावधि की ईकाई का द्योतक है। तद्‌नुसार हिंदी में अक्षरों के केवल दो भेद १. लघु या ह्रस्व तथा २. गुरु या दीर्घ हैं। इन्हें आम बोलचाल की भाषा में छोटा तथा बडा भी कहा जाता है। इनका भार क्रमशः १ तथा २ गिना जाता है। अक्षरों को लघु या गुरु गिनने के नियम निर्धारित हैं। इनका आधार उच्चारण के समय हो रहा बलाघात तथा लगनेवाला समय है।

१. एकमात्रिक या लघु रूपाकारः
अ.सभी ह्रस्व स्वर, यथाः अ, इ, उ, ॠ।
ॠषि अगस्त्य उठ इधर ॰ उधर, लगे देखने कौन?
१+१ १+२+१ १+१ १+१+१ १+१+१
आ. ह्रस्व स्वरों की ध्वनि या मात्रा से संयुक्त सभी व्यंजन, यथाः क,कि,कु, कृ आदि।
किशन कृपा कर कुछ कहो, राधावल्लभ मौन ।
१+१+१ १+२ १+१ १+१ १+२
इ. शब्द के आरंभ में आनेवाले ह्रस्व स्वर युक्त संयुक्त अक्षर, यथाः त्रय में त्र, प्रकार में प्र, त्रिशूल में त्रि, ध्रुव में ध्रु, क्रम में क्र, ख्रिस्ती में ख्रि, ग्रह में ग्र, ट्रक में ट्र, ड्रम में ड्र, भ्रम में भ्र, मृत में मृ, घृत में घृ, श्रम में श्र आदि।
त्रसित त्रिनयनी से हुए, रति ॰ ग्रहपति मृत भाँति ।
१+१+१ १+१+१+२ २ १+२ १‌+१ १+१+१+१ १+१ २+१
ई. चंद्र बिंदु युक्त सानुनासिक ह्रस्व वर्णः हँसना में हँ, अँगना में अँ, खिँचाई में खिँ, मुँह में मुँ आदि।
अँगना में हँस मुँह छिपा, लिये अंक में हंस ।
१+१+२ २ १+१ १+१ १+२, १‌+२ २‌+१ २ २+१
उ. ऐसा ह्रस्व वर्ण जिसके बाद के संयुक्त अक्षर का स्वराघात उस पर न होता हो या जिसके बाद के संयुक्त अक्षर की दोनों ध्वनियाँ एक साथ बोली जाती हैं। जैसेः मल्हार में म, तुम्हारा में तु, उन्हें में उ आदि।
उन्हें तुम्हारा कन्हैया, भाया सुने मल्हार ।
१+२ १+२+२ १+२+२ २+२ १+२ १+२+१
ऊ. ऐसे दीर्घ अक्षर जिनके लघु उच्चारण को मान्यता मिल चुकी है। जैसेः बारात ॰ बरात, दीवाली ॰ दिवाली, दीया ॰ दिया आदि। ऐसे शब्दों का वही रूप प्रयोग में लायें जिसकी मात्रा उपयुक्त हों।
दीवाली पर बालकर दिया, करो तम दूर ।
२+२+२ १+१ २+१+१+१ १+२ १+२ १ =१ २+१
ए. ऐसे हलंत वर्ण जो स्वतंत्र रूप से लघु बोले जाते हैं। यथाः आस्मां ॰ आसमां आदि। शब्दों का वह रूप प्रयोग में लायें जिसकी मात्रा उपयुक्त हों।
आस्मां से आसमानों को छुएँ ।
२+२ २ २+१+२+२ २ १+२
ऐ. संयुक्त शब्द के पहले पद का अंतिम अक्षर लघु तथा दूसरे पद का पहला अक्षर संयुक्त हो तो लघु अक्षर लघु ही रहेगा। यथाः पद॰ध्वनि में द, सुख॰स्वप्न में ख, चिर॰प्रतीक्षा में र आदि।
पद॰ ध्वनि सुन सुख ॰ स्वप्न सब, टूटे देकर पीर।
१+१ १+१ १+१ १+१ २+१ १+१

द्विमात्रिक, दीर्घ या गुरु के रूपाकारों पर चर्चा अगले पाठ में होगी। आप गीत, गजल, दोहा कुछ भी पढें, उसकी मात्रा गिनकर अभ्यास करें। धीरे॰धीरे समझने लगेंगे कि किस कवि ने कहाँ और क्या चूक की ? स्वयं आपकी रचनाएँ इन दोषों से मुक्त होने लगेंगी।
कक्षा के अंत में एक किस्सा, झूठा नहीं॰ सच्चा... फागुन का मौसम और होली की मस्ती में किस्सा भी चटपटा ही होना चाहिए न... महाप्राण निराला जी को कौन नहीं जानता? वे महाकवि ही नहीं महामानव भी थे। उन्हें असत्य सहन नहीं होता था। भय या संकोच उनसे कोसों दूर थे। बिना किसी लाग॰लपेट के सच बोलने में वे विश्वास करते थे। उनकी किताबों के प्रकाशक श्री दुलारे लाल भार्गव के दोहा संकलन का विमोचन समारोह आयोजित था। बड़े-बड़े दौनों में शुद्ध घी का हलुआ खाते॰खाते उपस्थित कविजनों में भार्गव जी की प्रशस्ति-गायन की होड़ लग गयी। एक कवि ने दुलारे लाल जी के दोहा संग्रह को महाकवि बिहारी के कालजयी दोहा संग्रह "बिहारी सतसई" से श्रेष्ठ कह दिया तो निराला जी यह चाटुकारिता सहन नहीं कर सके, किन्तु मौन रहे। तभी उन्हें संबोधन हेतु आमंत्रित किया गया। निराला जी ने दौने में बचा हलुआ एक साथ समेटकर खाया, कुर्ते की बाँह से मुँह पोंछा और शेर की तरह खडे होकर बडी॰बडी आँखों से चारों ओर देखते हुए एक दोहा कहा। उस दिन निराला जी ने अपने जीवन का पहला और अंतिम दोहा कहा, जिसे सुनते ही चारों तरफ सन्नाटा छा गया, दुलारे लाल जी की प्रशस्ति कर रहे कवियों ने अपना चेहरा छिपाते हुए सरकना शुरू कर दिया। खुद दुलारे लाल जी भी नहीं रुक सके। सारा कार्यक्रम चंद पलों में समाप्त हो गया।
महाप्राण निराला रचित वह दोहा बतानेवाले को एक दोहा उपहार में देने का विचार अच्छा तो है पर शेष सभी को प्रतीक्षा करना रुचिकर नहीं प्रतीत होगा। इसलिये इस बार यह दोहा मैं ही बता देता हूँ।

आप इस दोहे और निराला जी की कवित्व शक्ति का आनंद लीजिए और अपनी प्रतिक्रिया दीजिए।

वह दोहा जिसने बीच महफिल में दुलारे लाल जी की फजीहत कर दी थी, इस प्रकार है॰

कहाँ बिहारी लाल हैं, कहाँ दुलारे लाल?
कहाँ मूँछ के बाल हैं, कहाँ पूँछ के बाल?

15 कविताप्रेमियों का कहना है :

manu का कहना है कि -
बहुत जानदार दोहा आचार्या,
एकाध दुलारे लाल को तो हम भी जानते हैं,,,,,,
पर अफ़सोस के ऐसी बाते उनके ऊपर से होकर गुजर जाती हैं,,,,,
ये सही है के मैं आपके किसी दोहे वाली पहेली का उत्तर नहीं दे पाता, ये भी सही है के अगली पोस्ट तक जानने का इन्तजार मुश्किल होता है,,,,,पर अच्छा लगता है के जब कोई बताता है ,,,कृपया उत्तर अगले अंक में ही दें,,,
अजित गुप्ता का कोना का कहना है कि -
आचार्य जी को प्रणाम करने का मन हो रहा है, प्रणाम स्‍वीकारें। आपकी कक्षा से बहुत ही महत्‍वपूर्ण जानकारियां और अपनी कमियां समझ आने लगी हैं। आज का पाठ तो बहुत ही उपयोगी है। रही बात दुलारे लाल जी की, आज तो दुलारे लाल भरे पड़े हैं और ऐसे ही उनके प्रशंसक भी है परन्‍तु निराला जी नहीं रहे। बहुत ही श्रेष्‍ठ दोहा सुनाया निराला जी ने।
अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -
आचार्यजी ,
जानकारी के लिए धन्यवाद |

इस बार के दोहा लेख में
११ २१ 1 22 11 1
खूब बन पड़ी बात
२१ ११ १२ २१
सुना किस्सा निराला की ,
१२ १२ १२२ २
तबीयत खुश कर दी आज
१२११ ११ ११ १ २१


अवनीश तिवारी
Vinaykant Joshi का कहना है कि -
माननीय
आपका पाठ सारगर्भित रहा, दोहा लेखानोत्सुक लेखको हेतु बहुत उपयोगी सिद्ध होगा
आशा है भविष्य के पाठो में १३, ११ में बंधे भावहीन निरर्थक शब्द समूहों पर भी प्रकाश डालेंगे
सादर,
Pooja Anil का कहना है कि -
आचार्य जी,

आपने बहुत ही ज्ञानवर्धक जानकारी दी है . मात्राएँ गिनने का प्रयास जारी है.
होली पर सुनाया सच्चा किस्सा भी बहुत रोचक है .

आभार
पूजा अनिल
manu का कहना है कि -
tiwari ji,

naa,,,,,,,,,,

apne bheje se baaher rahi hai,,,,,
ginti ki koshish naaa karo,,,
yoon hi likho,,,
divya naramada का कहना है कि -
विनय जी, अवनीश जी आप दोनों की टिप्पणी के पहले गोष्ठी की सामग्री भेज चुका था. आगामी पाठ या गोष्ठी में आपके द्वारा उठाये बिन्दुओं पर चर्चा होगी. अजित जी पूजा जी आपको कुछ उपयोगी और रुचिकर लगा तो मेरा प्रयास सार्थक हो गया. संभवतः दोहा पर पहली बार इतने विस्तार और मूल बातों के साथ लेख माला का काम हो रहा है. ग़ज़ल पर तो बहुत से लोगों ने बहुत बार तरह-तरह से लिखा है किन्तु दोहा पर... मेरी कठिनाई का आप अनुमान कर सकटी हैं . आपसे मिला प्रोत्साहन ही आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है. मनु जी! आप कबीर की तरह उलटबांसी से मेरा तथा पाठकों का उत्साह इसी तरह बढाते रहिये. सभी का आभार.

Wednesday, March 18, 2009

दोहा गाथा सनातन गोष्ठी ८ दोहा है रस-खान

होली रस का पर्व है, दोहा है रस-खान.
भाव-शिल्प को घोंट कर, कर दोहा-पय-पान.
भाव रंग अद्भुत छटा, ज्यों गोरी का रूप.
पिचकारी ले शिल्प की, निखरे रूप अनूप.

प्रतिस्पर्धी हैं नहीं, भिन्न न इनको मान.
पूरक और अभिन्न हैं, भाव-शिल्प गुण-गान.

रवि-शशि अगर न संग हों, कैसे हों दिन-रैन?
भाव-शिल्प को जानिए, काव्य-पुरुष के नैन.

पुरुष-प्रकृति हों अलग तो, मिट जाता उल्लास.
भाव-शिल्प हों साथ तो, हर पल हो मधु मास.

मन मेंरा झकझोरकर, छेड़े कोई राग.
अल्हड लाया रंग रे!, गाये मनहर फाग

महकी-महकी हवा है, बहकी-बहकी ढोल.
चहके जी बस में नहीं, खोल न दे, यह पोल.

कहे बिन कहे अनकहा, दोहा मनु का पत्र.
कई दुलारे लाल हैं, यत्र-तत्र-सर्वत्र.

सुनिये श्रोता मगन हो, दोहा सम्मुख आज।
चतुरा रायप्रवीन की, रख ली जिसने लाज॥

बिनटी रायप्रवीन की, सुनिये शाह सुजान।
जूठी पातर भखत हैं, बारी बायस स्वान॥

रसगुल्‍ले जैसा लगा, दोहे का यह पाठ ।
सटसट उतरा मगज में, हुए धन्य, हैं ठाठ ॥


दोहा के दोनों पदों के अंत में एक ही अक्षर तथा दीर्घ-लघु मात्रा अनिवार्य है.

उत्तम है इस बार का,
२ १ १ २ १ १ २ १ २ = १३
दोहा गाथा सात |
२ २ २ २ २ १ = ११
आस यही आचार्य से
२ १ २ १ २ २ १ २ = १३
रहें बताते बात |
१ २ १ २ २ २ १ = ११

सीमा मनु पूजा सुलभ, अजित तपन अवनीश.
रवि को रंग-अबीर से, 'सलिल' रंगे जगदीश.


चलते-चलते फिर एक सच्चा किस्सा-

अंग्रेजी में एक कहावत है 'power corrupts, absolute power corrupts absolutely' अर्थात सत्ता भ्रष्ट करती है तो निरंकुश सत्ता पूर्णतः भ्रष्ट करती है, भावार्थ- 'प्रभुता पाहि काहि मद नाहीं' .
घटना तब की है जब मुग़ल सम्राट अकबर का सितारा बुलंदी पर था. भारत का एकछत्र सम्राट बनाने की महत्वाकांक्षा तथा हर बेशकीमती-लाजवाब चीज़ को अपने पास रखने की उसकी हवस हर सुन्दर स्त्री को अपने हरम में लाने का नशा बनकर उसके सिर पर स्वर थी. दरबारी उसे निरंतर उकसाते रहते और वह अपने सैन्य बल से मनमानी करता रहता.
गोंडवाना पर उन दिनों महारानी दुर्गावती अपने अल्प वयस्क पुत्र की अभिभावक बनकर शासन कर रही थीं. उनकी सुन्दरता, वीरता, लोकप्रियता, शासन कुशलता तथा सम्पन्नता की चर्चा चतुर्दिक थी. महारानी का चतुर दीवान अधार सिंह कायस्थ तथा सफ़ेद हाथी 'एरावत' अकबर की आँख में कांटे की तरह गड रहे थे क्योंकि अधार सिंग के कारण राज्य में शासन व्यवस्था व सम्रद्धता थी और यह लोक मान्यता थी की जहाँ सफ़ेद हाथी होता है वहाँ लक्ष्मी वास करती है. अकबर ने रानी के पास सन्देश भेजा-

अपनी सीमाँ राज की, अमल करो फरमान.
भेजो नाग सुवेत सो, अरु अधार दीवान.


मरता क्या न करता... रानी ने अधार सिंह को दिल्ली भेजा. अधार सिंह की बुद्धि की परख करने के लिए अकबर ने एक चाल चली. मुग़ल दरबार में जाने पर अधार सिंह ने देखा कि सिंहासन खाली था. दरबार में कोर्निश (झुककर सलाम) न करना बेअदबी होती जिसे गुस्ताखी मानकर उन्हें सजा दी जाती. खाली सिंहासन को कोर्निश करते तो हँसी के पात्र बनाते कि इतनी भी अक्ल नहीं है कि सलाम बादशाह सलामत को किया जाता है गद्दी को नहीं. अधार सिंह धर्म संकट में फँस गये, उन्होंने अपने कुलदेव चित्रगुप्त जी का स्मरण कर इस संकट से उबारने की प्रार्थना करते हुए चारों और देखा. अकस्मात् उनके मन में बिजली सी कौंधी और उन्होंने दरबारियों के बीच छिपकर बैठे बादशाह अकबर को कोर्निश की. सारे दरबारी और खुद अकबर आश्चर्य में थे कि वेश बदले हुए अकबर की पहचान कैसे हुई? झेंपते हुए बादशाह खडा होकर अपनी गद्दी पर आसीन हुआ और अधार से पूछा कि उसने बादशाह को कैसे पहचाना?

अधार सिंह ने विनम्रता से उत्तर दिया कि जंगल में जिस तरह शेर के न दिखने पर अन्य जानवरों के हाव-भाव से उसका पता लगाया जाता है क्योंकि हर जानवर शेर से सतर्क होकर बचने के लिए उस पर निगाह रखता है. इसी आधार पर उन्होंने बादशाह को पहचान लिया चूकि हर दरबारी उन पर नज़र रखे था कि वे कब क्या करते हैं? अधार सिंह की बुद्धिमानी के कारण अकबर ने नकली उदारता दिखाते हुए कुछ माँगने और अपने दरबार में रहने को कहा. अधार सिंह अपने देश और महारानी दुर्गावती पर प्राण निछावर करते थे. वे अकबर के दरबार में रहते तो जीवन का अर्थ न रहता, मनाकरते तो बादशाह रुष्ट होकर दंड देता. उन्होंने पुनः चतुराई से बादशाह द्वारा कुछ माँगने के हुक्म की तामील करते हुए अपने देश लौट जाने की अनुमति माँग ली. अकबर रोकता तो वह अपने कॉल से फिरने के कारण निंदा का पात्र बनता. अतः, उसने अधार सिंह को जाने तो दिया किन्तु बाद में अपने सिपहसालार को गोंडवाना पर हमला करने का हुक्म दे दिया. दोहा बादशाह के सैन्य बल का वर्णन करते हुए कहता है-

कै लख रन मां मुग़लवा, कै लख वीर पठान?
कै लख साजे पारधी, रे दिल्ली सुलतान?

इक लख रन मां मुगलवा, दुई लख वीर पठान.
तिन लख साजे पारधी, रे दिल्ली सुलतान.


असाधारण बहादुरी से लम्बे समय तक लड़ने के बाद भी अपने देवर की गद्दारी का कारण अंततः महारानी दुर्गावती, अधार सिंह तथा अन्य वीर अपने देश और आजादी पर शहीद हो गये. मुग़ल सेना ने राज्य को लूट लिया. भागते हुए लोगों और औरतों तक को नहीं बख्शा. महारानी का नाम लेना भी गुनाह हो गया. जनगण ने अपनी लोकमाता को श्रद्धांजलि देने का एक अनूठा उपाय निकाल लिया. दुर्गावती की समाधि के रूप में सफ़ेद पत्थर एकत्र कर ढेर लगा दिया गया, जो भी वहाँ से गुजरता वह आस-पास से एक सफ़ेद कंकर उठाकर समाधि पर चढा देता. स्वतंत्रता सत्याग्रह के समय भी इस परंपरा का पालन कर आजादी के लिए संग्घर्ष करने का संकल्प किया जाता रहा. दोहा आज भी दुर्गावती, अधार सिंह और आजादी के दीवानों की याद दिल में बसाये है-

ठाँव बरेला आइये, जित रानी की ठौर.
हाथ जोर ठंडे रहें, फरकन लगे बखौर.


अर्थात यदि आप बरेला गाँव में रानी की समाधि पर हाथ जोड़कर श्रद्धाभाव से खड़े हों तो उनकी वीर गाथा सुनकर आपकी भुजाएं फड़कने लगती हैं. अस्तु... वीरांगना को महिला दिवस पर याद न किये जाने की कमी पूरी करते हुए आज दोहा-गाथा उन्हें प्रणाम कर धन्य है.

11 कविताप्रेमियों का कहना है :

Harihar का कहना है कि -
बहुत ही सुन्दर दोहे
अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -
आचार्यजी ,
लेख के लिए धन्यवाद |

दोहा के दोनों पदों के अंत में एक ही अक्षर तथा दीर्घ-लघु मात्रा अनिवार्य है.
कुछ भ्रम है इस सन्दर्भ में |
नीचे के दोहा में -

कै लख रन मां मुग़लवा, कै लख वीर पठान?
कै लख साजे पारधी, रे दिल्ली सुलतान?

एक ही अक्षर का नियम नहीं है ( ? ) जबकी दीर्घ-लघु है |
कृपया स्पष्ट करिएगा |

अवनीश ने आचार्य से ,
११२१ 2 २२१ 2
कर दिया प्रश्न आज |
11 १२ १२ २१,
दूर करें दोहा शंका
२१ १२ २२ १२ ,
बन जाए मोरे काज ||
११ २१ २१ २१

आपका,
अवनीश तिवारी
divya naramada का कहना है कि -
दोहा के दोनों पदों के अंत में एक ही अक्षर तथा दीर्घ-लघु मात्रा अनिवार्य है.
कुछ भ्रम है इस सन्दर्भ में | नीचे के दोहा में -

कै लख रन मां मुग़लवा, कै लख वीर पठान?
कै लख साजे पारधी, रे दिल्ली सुलतान?

एक ही अक्षर का नियम नहीं है ( ? ) जबकी दीर्घ-लघु है | कृपया स्पष्ट करिएगा |

अवनीश जी! उक्त दोहा में दोनों पदों के अंत में 'न' अक्षर है. पठान ( १+२+१) तथा सुलतान (१+१+२+१) में अंत में गुरु - लघु तथा अंतिम अक्षर समान "न" दोनों नियमों का पालन हुआ है.

अवनीश ने आचार्य से ,
११२१ 2 २२१ २ = १४
कर दिया प्रश्न आज |
11 १२ १२ २१, = ११ -- प्रश्न के उच्चारण में "प्रश्" एक साथ तथा 'न' अलग बोला जाता है अतः, २+१=३ मात्राएँ होंगीं.
दूर करें दोहा शंका
२१ १२ २२ १२ = १३ -- शंका में मात्राएँ २+२ =४ हैं. पूर्व पाठ ३ में उच्चारण नियम ३ देखिये. आपकी पंक्ति में मात्राएँ १३ नहीं १४ हैं जबकि १३ होनी चाहिए.
बन जाए मोरे काज ||
११ २१ २१ २१ = ११ -- जाए = २+२ तथा मोरे = २+ २ . पंक्ति में कुल मात्राएँ १३ हैं जबकि ११ होनी चाहिए.

आपको बधाई. आप मात्राओं को ८० प्रतिशत सही गिन रहे हैं. प्रारंभिक पाठों को दुहरा लें तो १०० प्रतिशत सही गिन सकेंगे. आपका उक्त दोहा भी बहुत हद तक ठीक है. दोहों को बार-बार बोलें तो देखेंगे की उनमें खास 'लय' है. वह खासियत धीरे-धीरे अभ्यास से आयेगी. उक्त दोहे के शब्दों को कुछ आगे-पीछे कर या बदलकर १३-११, १३-११ में रख पायेंगे. एक कोशिश और करें. आपमें सीखने की जो ललक है वही आपको सफल दोहाकार बना रही है.
अजित गुप्ता का कोना का कहना है कि -
आचार्य जी
बहुत आभार। आपके कारण दोहे पर पकड़ बनने की सम्‍भावना दिखायी दे रही है।
divya naramada का कहना है कि -
अजित जी!
मैं आपका विशेष रूप से आभारी हूँ. आपकी टिप्पणियों ने मुझे यह श्रंखला बढ़ने के लिए प्रेरित किया अन्यथा मैं इसे छोड़ने का मन बना चुका था. इंदौर में श्री चन्द्र सेन 'विराट' ने लेखमाला को बहुत पसंद किया. वे गत २ वर्ष से मुझे इसके लिए कह रहे थे. होशंगाबाद से प्रकाशित ]मेकलसुता' में गत २ सल् से लगातार दोहा पर धारावाहिक श्रृंखला छप रही है. क्या आपने देखी? साहित्य शिल्पी पर तो आप आयी ही हैं.अस्तु...आप जैसे विज्ञजनों की सांगत में मुझे भी बहुत लाभ हो रहा है. धन्यवाद देकर अंतरंगता को औपचारिकता में नहीं बदलना चाहता.
manu का कहना है कि -
नहीं आचार्य,
छोड़ने की ना कहें,,,,ना ही सोचें,,,,,,
आपका स्नेह ही ऐसा है के कोई भी आपका यूँ जाना सहन नहीं करेगा,,,

आप की राह एकदम सही है ,,,इसे न छोडें,,,,

kyaa avneesh ko avnish padh sakte hain,,,??
अजित गुप्ता का कोना का कहना है कि -
तिलक कलेवा हाथ में, लेकर करूँ प्रणाम
बहुत आस से मिले गुरु, नहीं बिगारूँ नाम।
आचार्य जी आपकी आभारी हूँ। मेकलसुता मैंने नहीं पढ़ी, लेकिन आपकी कक्षाएँ बहुत ही प्रासंगिक हैं। भारत की दोहा परम्‍परा का कोई भी सानी नहीं है, अत: आज कुछ लोग भी इस विधा में लिखना प्रारम्‍भ करें तो पुरातन परम्‍परा न केवल जीवित होगी अपितु चिंतन प्रक्रिया में भी विस्‍तार होगा। क्‍योंकि दोहे के माध्‍यम से संक्षिप्‍त में बहुत कुछ कह दिया जाता है।
Pooja Anil का कहना है कि -
होली के रंग में रंगी, दोहा गोष्ठी विशेष ,
२२ २ ११ २ १२ २२ २२ १२१
वीर गाथा कहें सलिल, सुनें सभी अनिमेष
२१ २२ १२ १११ 12 १२ ११२१ .


आचार्य जी,

यह गोष्ठी भी बेहद जानकारी लिए हुये है . आप छोड़ कर जाने की बात ना करें, कोई भी नयी चीज़ सीखने में समय अवश्य लगता है, हम सब की गति धीमी जरूर है, पर सभी अपनी अपनी तरफ से कोशिश कर रहे हैं. आपका साथ बना रहे, इसी उम्मीद के साथ
पूजा अनिल
तपन शर्मा Tapan Sharma का कहना है कि -
आचार्य प्रणाम,
यदि व्यस्तता के कारण हम टिप्पणी नहीं कर पाते तो इसका मतलब आप कतई ना निकालें कि हम पढ़ते नहीं.. आपकी सौ बातों में से ५० बातें भी हमारे समझ में आ सकें तो भी बहुत है!! जाने की बात न करें..
टिप्प्णी नहीं कर पाते, पढ़ते तो हम रहते है,
आप जाने की कहते हैं, हम परिवार कहते हैं

दोहा गाथा सनातन पाठ ७ - ७ मार्च २००९

Saturday, March 07, 2009


दोहा गाथा सनातन पाठ ७ दोहा शिव-आराधना


दोहा 'सत्' की साधना, करें शब्द-सुत नित्य.
दोहा 'शिव' आराधना, 'सुंदर' सतत अनित्य.


अरुण जी, मनु जी एवं पूजा जी ने दोहा के साथ कुछ यात्रा की, इसलिए दोहा उनके साथ रहे यह स्वाभाविक है. संगत का लाभ 'तन्हा' जी को भी मिला है.

अद्भुत पूजा अरुण की, कर मनु तन्हा धन्य.
'सलिल' विश्व दीपक जला, दीपित दिशा अनन्य.

कविता से छल कवि करे, क्षम्य नहीं अपराध.
ख़ुद को ख़ुद ही मारता, जैसे कोई व्याध.


पूजा जी पहले और तीसरे चरण में क्रमशः 'कान्हा' को 'कान्ह' तथा 'हर्षित माता देखकर' परिवर्तन करने से दोष दूर हो जाता है.

गोष्ठी ६ के आरम्भ में दिए दोहों के भाव तथा अर्थ संभवतः सभी समझ गए हैं इसलिए कोई प्रश्न नहीं है. अस्तु...

तप न करे जो वह तपन, कैसे पाये सिद्धि?
तप न सके यदि सूर्ये तो, कैसे होगी वृद्धि?


उक्त दोहा में 'तप' शब्द के दो भिन्न अर्थ तथा उसमें निहित अलंकार का नाम बतानेवालों को दोहा का उपहार मिलेगा. तपन जी! आपके दोहे में मात्राएँ अधिक हैं. आपत्ति न हो तो इस तरह कर लें-

नमन करुँ आचार्य को, पकडूं अपने कान.
सदा चाहता सीखना, देते रहिये ज्ञान.


हिन्दी दोहा में ३ मात्राएँ प्रयोग में नहीं लाई जातीं. आधे अक्षर को उसके पहलेवाले अक्षर के साथ संयुक्त कर मात्रा गिनी जाती है. एक बार प्रयास और करें ग़लत हुआ तो सुधारकर दिखाऊँगा.

अजित अमित औत्सुक्य ही, -- पहला चरण, १३ मात्राएँ
१ १ १ १ १ १ २ २ १ २ = १३
भरे ज्ञान - भंडार. -- दूसरा चरण, ११ मात्राएँ
१ २ २ १ २ २ १ = ११
मधु-मति की रस सिक्तता, -- तीसरा चरण, १३ मात्राएँ
१ १ १ १ २ १ १ २ १ २ = १३
दे आनंद अपार. -- चौथा चरण, ११ मात्राएँ
२ २ २ १ १ २ १ = ११ मात्राएँ.

दो पंक्तियाँ (पद) तथा चार चरण सभी को ज्ञात हैं. पहली तथा तीसरी आधी पंक्ति (चरण) दूसरी तथा चौथी आधी पंक्ति (चरण) से अधिक लम्बी हैं क्योकि पहले एवं तीसरे चरण में १३-१३ मात्राएँ हैं जबकि दूसरे एवं चौथे चरण में ११-११ मात्राएँ हैं. मात्रा से दूर रहनेवाले विविध चरणों को बोलने में लगने वाले समय, उतर-चढाव तथा लय का ध्यान रखें.

दूसरे एवं चौथे चरण के अंत पर ध्यान दें. किसी भी दोहे की पंक्ति के अंत में दीर्घ, गुरु या बड़ी मात्रा नहीं है. दोहे की पंक्तियों का अंत सम (दूसरे, चौथे) चरण से होता है. इनके अंत में लघु या छोटी मात्रा तथा उसके पहले गुरु या बड़ी मात्रा होती ही है. अन्तिम शब्द क्रमशः भंडार तथा अपार हैं. ध्यान दें की ये दोनों शब्द गजल के पहले शे'र की तरह सम तुकांत हैं दोहे के दोनों पदों की सम तुकांतता अनिवार्य है. भंडार तथा अपार का अन्तिम अक्षर 'र'
लघु है जबकि उससे ठीक पहले 'डा' एवं 'पा' हैं जो गुरु हैं. अन्य दोहो में इसकी जांच करिए तो अभ्यास हो जाएगा.
पाठ ६ में बताया गया अगला नियम -- (' पहले तथा तीसरे चरण के आरम्भ में जगण = जभान = १२१ का प्रयोग एक शब्द में वर्जित है किंतु दो शब्दों में जगण हो तो वर्जित नहीं है.') की भी इसी प्रकार जांच कीजिये. इस नियम के अनुसार पहले तथा तीसरे चरण के प्रारम्भ में पहले शब्द में लघु गुरु लघु (१+२+१+४) मात्राएँ नहीं होना चाहिए. उक्त दोहों में इस नियम को भी परखें. किसी दोहे में दोहाकार की भूल से ऐसा हो तो वह दोहा पढ़ते समय लय भंग होती है. दो शब्दों के बीच का विराम इन्हें संतुलित करता है. अस नियम पर विस्तार से चर्चा बाद में होगी.
पाठ ६ में बताया गया अन्तिम नियम दूसरे तथा चौथे चरण के अंत में तगण = ताराज = २२१, जगण = जभान = १२१ या नगण = नसल = १११ होना चाहिए. शेष गणों के अंत में गुरु या दीर्घ मात्रा = २ होने के कारण दूसरे व चौथे चरण के अंत में प्रयोग नहीं होते.
एक बार फ़िर गण-सूत्र देखें- 'य मा ता रा ज भा न स ल गा'

गण का नाम विस्तार
यगण यमाता १+२+२
मगण मातारा २+२+२
तगण ताराज २+२+१
रगण राजभा २+१+२
जगण जभान १+२+१
भगण भानस २+१+१
नगण नसल १+१+१
सगण सलगा १+१+२

उक्त गण तालिका में केवल तगण व जगण के अंत में गुरु+लघु है. नगण में तीनों लघु है. इसका प्रयोग कम ही किया जाता hai. नगण = न स ल में न+स को मिलकर गुरु मात्रा मानने पर सम पदों के अंत में गुरु लघु की शर्त पूरी होती hai.

सारतः यह याद रखें कि दोहा ध्वनि पर आधारित सबसे अधिक पुराना छंद है. ध्वनि के ही आधार पर हिन्दी-उर्दू के अन्य छंद कालांतर में विकसित हुए. ग़ज़ल की बहर भी लय-खंड ही है. लय या मात्रा का अभ्यास हो तो किसी भी विधा के किसी भी छंद में रचना निर्दोष होगी. अजित जी एवं मनु जी क्या इतना पर्याप्त है या और विस्तार?

चलिए, इस चर्चा से आप को हो रही ऊब को यहीं समाप्त कर के रोचक किस्सा कहें और गोष्ठी समाप्त करें.

किस्सा आलम-शेख का...

सिद्धहस्त दोहाकार आलम जन्म से ब्राम्हण थे लेकिन एक बार एक दोहे का पहला पद लिखने के बाद अटक गए. बहुत कोशिश की पर दूसरा पद नहीं बन पाया, पहला पद भूल न जाएँ यह सोचकर उनहोंने कागज़ की एक पर्ची पर पहला पद लिखकर पगडी में खोंस लिया. घर आकर पगडी उतारी और सो गए. कुछ देर बाद शेख नामक रंगरेजिन आयी तो परिवारजनों ने आलम की पगडी मैली देख कर उसे धोने के लिए दे दी.

शेख ने कपड़े धोते समय पगडी में रखी पर्ची देखी, अधूरा दोहा पढ़ा और मुस्कुराई. उसने धुले हुए कपड़े आलम के घर वापिस पहुंचाने के पहले अधूरे दोहे को पूरा किया और पर्ची पहले की तरह पगडी में रख दी. कुछ दिन बाद आलम को अधूरे दोहे की याद आयी. पगडी धुली देखी तो सिर पीट लिया कि दोहा तो गया मगर खोजा तो न केवल पर्ची मिल गयी बल्कि दोहा भी पूरा हो गया था. आलम दोहा पूरा देख के खुश तो हुए पर यह चिंता भी हुई कि दोहा पूरा किसने किया? अपने कॉल के अनुसार उन्हें दोहा पूरा करनेवाले की एक इच्छा पूरी करना थी. परिवारजनों में से कोई दोहा रचना जानता नहीं था. इससे अनुमान लगाया कि दोहा रंगरेज के घर में किसी ने पूरा किया है, किसने किया?, कैसे पता चले?. उन्हें परेशां देखकर दोस्तों ने पतासाजी का जिम्मा लिया और कुछ दिन बाद भेद दिया कि रंगरेजिन शेख शेरो-सुखन का शौक रखती है, हो न हो यह कारनामा उसी का है.

आलम ने अपनी छोटी बहिन और भौजाई का सहारा लिया ताकि सच्चाई मालूम कर अपना वचन पूरा कर सकें. आखिरकार सच सामने आ ही गया मगर परेशानी और बढ़ गयी. बार-बार पूछने पर शेख ने दोहा पूरा करने की बात तो कुबूल कर ली पर अपनी इच्छा बताने को तैयार न हो. आलम की भाभी ने देखा कि आलम का ज़िक्र होते ही शेख संकुचा जाती थी. उन्होंने अंदाज़ लगाया कि कुछ न कुछ रहस्य ज़ुरूर है. ही कोशिश रंग लाई. भाभी ने शेख से कबुलवा लिया कि वह आलम को चाहती है. मुश्किल यह कि आलम ब्राम्हण और शेख मुसलमान... सबने शेख से कोई दूसरी इच्छा बताने को कहा, पर वह राजी न हुई. आलम भी अपनी बात से पीछे हटाने को तैयार न था. यह पेचीदा गुत्थी सुलझती ही ने थी. तब आलम ने एक बड़ा फैसला लिया और मजहब बदल कर शेख से शादी कर ली. दो दिलों को जोड़ने वाला वह अमर दोहा जो पाठक बताएगा उसे ईनाम के तौर पर एक दोहा संग्रह भेट किया जाएगा अन्यथा अगली गोष्ठी में वह दोहा आपको बताया जाएगा.

15 कविताप्रेमियों का कहना है :

रविकांत पाण्डेय का कहना है कि -
आलम ने जो पद लिखा सुनिये चतुर सुजान
इसे सुनकर निश्चित ही सुख पावेंगे कान

"कनक छडी सी कामिनी कटि काहे अतिछीन"

अर्ज करूँ पद दूसरा शेख जिसे लिख दीन
अजब अनूठा काम ये पलभर में ही कीन

"कटि को कंचन काढ़ विधि कुचन माँहि धरि दीन"
तपन शर्मा Tapan Sharma का कहना है कि -
दोहे में जो निहित है, कहते अलंकार यमक
एक तप का अर्थ है तपस्या, दूजा गर्मी से भभक...
Manoshi Chatterjee मानोशी चटर्जी का कहना है कि -
बात ठीक से समझ नहीं पाई।

हिन्दी दोहा में ३ मात्राएँ प्रयोग में नहीं लाई जातीं. आधे अक्षर को उसके पहलेवाले अक्षर के साथ संयुक्त कर मात्रा गिनी जाती है.

नमन करुँ आचार्य को, पकडूं अपने कान.
सदा चाहता सीखना, देते रहिये ज्ञान.

सदा ३ मात्रायं हुईं। चाहता में भी चा=२ हता=३

कृपया सोदाहरण समझायें। पोस्ट बहुत अच्छे, मगर उदाहरणों की कमी दिखाई देती है।
सीमा सचदेव का कहना है कि -
tapan j ne alankaar AUR ARATH to pahle hi bataa diya YAMAK ALANKAAR , vahi ham bhi kahenge .

March 11, 2009


दोहा गाथा सनातन - गोष्ठी : ७ दोहा दिल में ले बसा


दोहा दिल में ले बसा, कर तू सबसे प्यार.
चेहरे पर तब आएगा, तेरे 'सलिल' निखार.

सरस्वती को नमन कर, हुई लेखनी धन्य.
शब्द साधना से नहीं, श्रेष्ट साधना अन्य.

रमा रहा जो रमा में, उससे रुष्ट रमेश.
भक्ति-शक्ति से दूर वह, कैसे लखे दिनेश.

स्वागत में ऋतुराज के, दोहा कहिये मीत.
निज मन में उल्लास भर, नित्य लुटाएं प्रीत.

मन मथ मन्मथ जीत ले, सत-शिव-सुंदर देख.
सत-चित-आनंद को 'सलिल', श्वास-श्वास अवरेख


पाठ ४ के प्रकाशन के समय शहर से बाहर भ्रमण पर होने का कारण उसे पढ़कर तुंरत संशोधन नहीं करा सका. गण संबंधी चर्चा में मात्राये गलत छप गयी हैं. डॉ. श्याम सखा 'श्याम' ने सही इंगित किया है. उन्हें बहुत-बहुत धन्यवाद.
गण का सूत्र ''यमाताराजभानसलगा' है. हर अक्षर से एक गण बनता है, जो बाद के दो अक्षरों के साथ जुड़कर अपनी मात्राएँ बताता है.

य = यगण = यमाता = लघु+गुरु+गुरु = १+२+२ = ५
म = मगण = मातारा = गुरु+गुरु+गुरु = २+२+२ = ६
त = तगण = ताराज = गुरु+गुरु+लघु = २+२+१ = ५
र = रगण = राजभा = गुरु+लघु+गुरु = २+१+२ = ५
ज = जगण = जभान = लघु+गुरु+लघु = १+२+१ = ४
भ = भगण = भानस = गुरु+लघु+लघु = २+१+१ = ४
न = नगण = नसल = लघु+लघु+लघु = १+१+१ = ३
स = सगण = सलगा = लघु+लघु+गुरु = १+१+२ = ४


पाठ में टंकन की त्रुटि होने के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ. मैं अच्छा टंकक नहीं हूँ, युग्म के लिए पहली बार यूनिकोड में प्रयास किया है. अस्तु...

हिन्दी को पिंगल तथा व्याकरण संस्कृत से ही मिला है. इसलिए प्रारम्भ में उदाहरण संस्कृत से लिए हैं. पाठों की पुनरावृत्ति करते समय हिन्दी के उदाहरण लिए जाएँगे.

पाठ छोटे रखने का प्रयास किया जा रहा है. अजीत जी का अनुरोध शिरोधार्य. मनु जी अभी तो मैं स्वयं ही दोहा सागर के किनारे खडा, अन्दर उतरने का साहस जुटा रहा हूँ. दोहा सागर की गहराई तो बिरले ही जान पाए हैं.

पूजा जी! आपने दोहा को गंभीरता से लिया, आभार. आधे अक्षर का उच्चारण उससे पहलेवाले अक्षर के साथ जोडकर किया जाता है. संयुक्त (दो अक्षरों से मिलकर बनी) ध्वनि का उच्चारण दीर्घ या गुरु होता है, जिसकी मात्राएँ २ होती हैं. 'ज्यों' में आधे ज = 'ज्' तथा 'यों' का उच्चारण अलग-अलग नहीं किया जाता. एक साथ बोले जाने के कारण 'ज्' 'यों' के साथ जुड़ता है जिससे उसका उच्चारण समय 'यों' में मिल जाता है. एक प्रयोग करें- 'ज्यों', 'त्यों' तथा 'यों' को १०-१० बार अलग-अलग बोलें और बोलने में लगा समय जांचें. आप देखेंगी की तीनों को बोलने में सामान समय लगा. इसलिए 'यों' की तरह 'ज्यों', 'त्यों' की मात्रा २ होगी.

'ज्यों जीवन-नादान' की मात्राएँ २+२+१+१+२+२+१=११' हैं.

तप न करे जो वह तपन, कैसे पाये सिद्धि?
तप न सके यदि सूर्ये तो, कैसे होगी वृद्धि?

दोहे में जो निहित है, कहते अलंकार यमक
एक तप का अर्थ है तपस्या, दूजा गर्मी से भभक...


तपन जी! शाबास. आपने 'तप' शब्द के दोनों अर्थ सही बताये हैं. अलंकार भी सही बताया जबकि अभी कक्षा में अलंकार की चर्चा हुई ही नहीं है. आपके दोहे काप्रथम चरण सही है. दूसरे चरण में १३ मात्राएँ हैं जबकि ११ होनी चाहिए. तीसरे चरण में १७ मात्राओं के स्थान पर १३ तथा चौथे चरण में १३ मात्राओं के स्थान पर ११ मात्राएँ होना चाहिए. इसे कुछ बदलकर इस तरह लिखा जा सकता है-

तप का आशय तपस्या,
१ १ २ २ १ १ १ २ १ = १३
या गर्मी की भभक.
२ २ २ २ १ १ १ = ११
शब्द एक दो अर्थ हैं,
१ १ १ २ १ २ २ १ २ = १३
अलंकार है यमक.
१ २ २ १ २ १ १ १ = ११

रविकांत पाण्डेय जी आपको भी बधाई. आपने बिलकुल सही बूझा है.

आलम ने जो पद लिखा सुनिये चतुर सुजान
इसे सुनकर निश्चित ही सुख पावेंगे कान

"कनक छडी सी कामिनी कटि काहे अतिछीन"
अर्ज करूँ पद दूसरा शेख जिसे लिख दीन
अजब अनूठा काम ये पलभर में ही कीन
"कटि को कंचन काढ़ विधि कुचन माँहि धरि दीन"
आपके उक्त दोनों दोहे बिलकुल ठीक हैं.


आलम की पंक्ति -- "कनक छडी सी कामिनी, कटि काहे अति छीन"

शेख की पंक्ति -- "कटि को कंचन काट विधि, कुचन माँहि धरि दीन"


हिन्दी दोहा में ३ मात्राएँ प्रयोग में नहीं लाई जातीं. आधे अक्षर को उसके पहलेवाले अक्षर के साथ संयुक्त कर मात्रा गिनी जाती है.

नमन करुँ आचार्य को, पकडूं अपने कान.
सदा चाहता सीखना, देते रहिये ज्ञान.
सदा ३ मात्रायं हुईं। चाहता में भी चा=२ हता=३

मानसी जी! मात्राएँ अक्षर की गिनिए, शब्द की नहीं, सदा की मात्राएँ स = १ + दा = २ कुल ३ हैं, इसी तरह चाहता की मात्राएँ चा= २ + ह = १ + ता = २ कुल ५ हैं. अपवाद को छोड़कर हिन्दी दोहे में एक अक्षर में ३ मात्राएँ नहीं होतीं.
रविकांत जी तथा तपन जी को दोहे का उपहार होली के अवसर पर देते हुए प्रसन्नता है-

तपन युक्त रविकांत यों, ज्यों मल दिया गुलाल.
पिचकारी ले मानसी, करती भिगा धमाल.


गप्प गोष्ठी में सुनिए एक सच्चा किस्सा.. बुंदेलखंड में एक विदुषी-सुन्दरी हुई है राय प्रवीण. वे महाकवि केशवदास की शिष्या थीं. नृत्य, गायन, काव्य लेखन तथा वाक् चातुर्य में उन जैसा कोई अन्य नहीं था. दिल्लीपति मुग़ल सम्राट अकबर से दरबारियों ने राय प्रवीण के गुणों की चर्चा की तथा उकसाया कि ऐसे नारी रत्न को बादशाह के दामन में होना चाहिए. अकबर ने ओरछा नरेश को संदेश भेजा कि राय प्रवीण को दरबार में हाज़िर किया जाए. ओरछा नरेश धर्म संकट में पड़े. अपनी प्रेयसी को भेजें तो राजसी आन तथा राजपूती मान नष्ट होने के साथ राय प्रवीण की प्रतिष्ठा तथा सतीत्व खतरे में पड़ता है, बादशाह का आदेश न मानें तो शक्तिशाली मुग़ल सेना के आक्रमण का खतरा.

राज्य बचाएँ या प्रतिष्ठा? उन्हें धर्म संकट में देखकर राय प्रवीण ने गुरुवर महाकवि केशवदास की शरण गही. महाकवि ने ओरछा नरेश को राजधर्म का पालन करने की राय दी तथा राय प्रवीण को सम्मान सहित सकुशल वापिस लाने का वचन दिया.

अकबर के दरबार में महाकवि तथा राय प्रवीण उपस्थित हुए. अकबर ने महाकवि का सम्मान करने के बाद राय प्रवीण को तलब किया. राय प्रवीण को ऐसे कठिन समय में भरोसा था अपनी त्वरित बुद्धि और कमर में खुंसी कटार का. लेकिन एन वक्त पर दोहा उनका रक्षक बनकर उनके काम आया. राय प्रवीण ने बादशाह को सलाम करते हुए एक दोहा कहा. दोहा सुनते ही दरबार में सन्नाटा छा गया.
बादशाह ने ओरछा नरेश के पास ऐसा नारी रत्न होने पर मुबारकबाद दी तथा राय प्रवीण को न केवल सम्मान सहित वापिस जाने दिया अपितु कई बेशकीमती नजराने भी दिए. क्या आप वह दोहा सुनना चाहते हैं जिसने राय प्रवीण लाज रख ली? वह अमर दोहा बताने वाले पाठक को उपहार में मिलेगा एक दोहा.

34 कविताप्रेमियों का कहना है :

Anonymous का कहना है कि -
होली की रंगकामनायें स्‍वीकारें।
Sulabh Jaiswal "सुलभ" का कहना है कि -
मन को मोरा झकझोरे छेड़े है कोई राग
रंग अल्हड़ लेकर आयो रे फिर से फाग
आयो रे फिर से फाग हवा महके महके
जियरा नहीं बस में बोले बहके बहके...

आदरणीय हिंदी ब्लोगेर्स को होली की शुभकामनाएं और साथ में होली और हास्य
धन्यवाद.
manu का कहना है कि -
आचार्या को प्रणाम,,,,होली की शुभकामनायें.....
दोहा मैं लिखने ही जा रहा था,, एक दोहा मिलने के लालच में ,,,
पर आपसे ही लिया ज्ञान ,,आपके ही सम्मुख बखानने का मन नहीं हुआ,,,,,,
कुछ बेईमानी सी लगी,,,,,अतः किसी और को ही try करने दिया जाय,,,
रविकांत पाण्डेय का कहना है कि -
श्रोता मगन हो सुनिये दोहा सन्मुख आज।
चतुर रायप्रवीन की रख ली जिसने लाज॥

बिनति रायप्रवीन की सुनिये शाह सुजान।
जूठी पातर खात हैं बारी बायस स्वान॥
तपन शर्मा Tapan Sharma का कहना है कि -
प्रणाम आचार्य...
समयाभाव के कारण यह पाठ नहीं पढ़ पाया हूँ। जल्द ही पढूँगा...
अलंकार तो बचपन में पढे़ थे.. अब तो भूलभाल गया हूँ। आशा है आप याद दिला देंगे अपने पाठों में..
होली की बधाई...
manu का कहना है कि -
ekdam sahi,,,,,,,,,,,,
अजित गुप्ता का कोना का कहना है कि -
रसगुल्‍ले जैसे लगा, यह दोहे का पाठ
सटसट उतरा मगज में, धन्‍य हुए पा ज्ञान।
एक स्वतन्त्र नागरिक का कहना है कि -
वो दोहा है

विनती राय प्रवीन की सुनिए शाह सुजान
जूठी पातर खात है बारी बायस स्वान
Pooja Anil का कहना है कि -
बहुत बहुत धन्यवाद आचार्य जी, आपने मेरी दुविधा दूर कर दी है.

राय प्रवीण का दोहा तो पता नहीं है, पर कहानी बहुत ही रुचिकर है , हमारे साथ बांटने के लिए आभार.

अलंकार के बारे में जानने की उत्सुकता है.
पूजा अनिल
अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -
आचार्यजी ,
वास्तव में कक्षा में रह अभ्यास करना एक सुखद अनुभव लग रहा है |
आपको इस सब के लिए पुन: धन्यवाद |

यदि नीचे के दोहा में गलती हो तो संकेत दीजियेगा -

उत्तम है इस बार का
१२१ २ ११ २१ 2
दोहा गाथा सात |
22 22 21
आस है आचार्य से
21 2 222 2
करत रहे ऐसी बात |
111 12 22 २१


अवनीश तिवारी
Anonymous का कहना है कि -
avnish ji
aakhiri part mein 13 maatraayein ho gayee hain... change karna hoga...11 kijiye
manu का कहना है कि -
tiwari ji ,doosri laain mein gad bad lag rahi hai,,,,
baaki aachaaryaa ji hi bataa paayenge,,,

yaa agar aapne gin kar kahaa ho to shaayad sahi ho,,,mujhe to ginti aati nahi
rahulusha का कहना है कि -
good

दोहा गाथा सनातन :पाठ ६ ११ / २१ फरवरी २००९

Saturday, February 21, 2009

दोहा गाथा सनातन :पाठ ६ - दोहा दिल में झांकता


दोहा गाथा सनातन :
पाठ ६ - दोहा दिल में झांकता...

दोहा दिल में झांकता, कहता दिल की बात.
बेदिल को दिलवर बना, जगा रहा ज़ज्बात.
अरुण उषा के गाल पर, मलता रहा गुलाल.
बदल अवसर चूक कर, करता रहा मलाल.

मनु तनहा पूजा करे, सरस्वती की नित्य.
रंग रूप रस शब्द का, है संसार अनित्य.

कवि कविता से खेलता, ले कविता की आड़.
जैसे माली तोड़ दे, ख़ुद बगिया की बाड.

छंद भाव रस लय रहित, दोहा हो बेजान.
अपने सपने बिन जिए, ज्यों जीवन नादान.

अमां मियां! दी टिप्पणी, दोहे में ही आज.
दोहा-संसद के बनो, जल्दी ही सरताज.

अद्भुत है शैलेश का, दोहा के प्रति नेह.
अनिल अनल भू नभ सलिल, बिन हो देह विदेह.

निरख-निरख छवि कान्ह की, उमडे स्नेह-ममत्व.
हर्ष सहित सब सुर लखें, मानव में देवत्व.

पाठ ६ में अद्भुत रस के दोहे के चौथे चरण में 'विविथ' को सुधार कर 'विविध' कर लें. भक्ति रस के दोहे में दोहा संग्रह का नाम 'गोहा कुञ्ज' नहीं 'दोहा कुञ्ज' है.


गोष्ठी ६ में निम्न संशोधन कर लीजिये.
दोहा क्र. १ चरण ३ 'बन' के स्थान पर 'बने', दोहा क्र. ४ चरण २ 'धरे' के स्थान पर 'धारे' . आपकी बात आपके साथ में दोहा क्र. १ चरण २ 'बन' के स्थान पर 'बने' दोहा क्र. ५ चरण २ व् ४ में 'बतलाएं' व समझाएं' के स्थान पर क्रमशः 'बतलांय' व 'समjhaanय, दोहा क्र. ७ चरण ४ में 'ह्रियादा' के स्थान पर 'हृदय' . टंकन त्रुटि से हुई असुविधा हेतु खेद है.

नमन करुँ आचार्य को; पकडूं अपने कान.
'तपन' सीखना चाहता' देते रहिये ज्ञान.

करत-करत अभ्यास के, जडमति होत सुजान.

१११ १११ २२१ २, ११११ २१ १२१.

रसरी आवत-जात ते, सिल पर पडत निसान.

११२ २११ २१ २, ११ ११ १११ १२१.

याद रखिये :

दोहा में अनिवार्य है:

१. दो पंक्तियाँ, २. चार चरण .

३. पहले एवं तीसरे चरण में १३-१३ मात्राएँ.

४. दूसरे एवं चौथे चरण में ११-११ मात्राएँ.

५. दूसरे एवं चौथे चरण के अंत में लघु गुरु होना अनिवार्य.

६. पहले तथा तीसरे चरण के आरम्भ में जगण = जभान = १२१ का प्रयोग एक शब्द में वर्जित है किंतु दो शब्दों में जगण हो तो वर्जित नहीं है.

७. दूसरे तथा चौथे चरण के अंत में तगण = ताराज = २२१, जगण = जभान = १२१ या नगण = नसल = १११ होना चाहिए. शेष गण अंत में गुरु
या दीर्घ मात्रा = २ होने के कारण दूसरे व चौथे चरण के अंत में प्रयोग नहीं होते.

उक्त तथा अपनी पसंद के अन्य दोहों में इन नियमों के पालन की जांच करिए, शंका होने पर हम आपस में चर्चा करेंगे ही. अंत में

दोहा-चर्चा का करें, चलिए यहीं विराम.
दोहे लिखिए-लाइए, खूब पाइए नाम.

19 कविताप्रेमियों का कहना है :

Vinay का कहना है कि -
फ़ालो करें और नयी सरकारी नौकरियों की जानकारी प्राप्त करें:
सरकारी नौकरियाँ
अजित गुप्ता का कोना का कहना है कि -
सलिल जी
कृपया क्रमांक 5,6 और 7 को उदाहरण देकर समझाएं तो एकदम से विषय स्‍पष्‍ट हो जाएगा। आपका द्वारा दी जा रही जानकारी से हम सब लाभान्वित हो रहे हैं। आपका बहुत आभार।
manu का कहना है कि -
प्रणाम आचार्य.,
डॉ. अजीत जी की बात मैं भी कहना चाहूंगा ..
manu का कहना है कि -
और आचार्य ये भी कहें के ...इतनी गहराई में जाए बिना भी क्या दोहा कहा जा सकता है...??
यदि ऐसा संभव हो तो क्या कहने,,,??
Pooja Anil का कहना है कि -
आचार्य जी,
ऊपर दिए गए दोहों में से एक को , आपके द्वारा दिए गए ७ नियम जांचने के लिए , उदाहरण के तौर पर ले रही हूँ.


छंद भाव रस लय रहित, दोहा हो बेजान.
अपने सपने बिन जिए, ज्यों जीवन नादान.
१११ २१ ११ ११ १११, २२ २ २२१ .
११२ ११२ ११ १२ , १२ २११ २२१.

१. इस दोहे में दो पंक्तियाँ हैं .

२. चार चरण भी हैं .
३. पहले एवं तीसरे चरण में १३-१३ मात्राएँ हैं .

४. दूसरे चरण में 11 मात्राएँ हैं एवं चौथे चरण में १२ मात्राएँ मिली, कृपया इसे स्पष्ट करें एवं हमारी त्रुटि सुधारें .


५. दूसरे एवं चौथे चरण के अंत में लघु गुरु है, २२१ , २२१ .

६.पहले तथा तीसरे चरण के आरम्भ में १११ नगण नसल ‌ ‌ ‌ = ३
एवं ११२ , सगण सलगा ‌ ऽ = ४ ‌है , अतः जगण = जभान = १२१ का प्रयोग नहीं किया गया है.


७. दूसरे तथा चौथे चरण के अंत में तगण = ताराज = २२१ है.

आपसे एक और निवेदन है, हम सब जो भी दोहे लिखते हैं, आप उन्हें परिष्कृत करके अथवा थोडी फेर बदल करके हमें फिर से बताते हैं, इस से हम अपनी गलतियों को नहीं जान पाते, क्या आप हमारे द्वारा की हुई गलती को भी बताने का कष्ट करेंगे?

बहुत बहुत आभार सहित
पूजा अनिल
manu का कहना है कि -
aachaarya ji,
kyaa poojaa ji,.....""jyoon"" ahabd ko theek se pakad paa rahi hain..???
divya naramada का कहना है कि -
पाठ ६ : त्रुटि सुधार
दोहा क्र. २- बदल नहीं बादल
पाठ ६ नहीं पाठ ५

Wednesday, February 11, 2009

दोहा गाथा सनातन - दोहा गोष्ठी : ६ दोहा दीप जलाइए

दोहा दीप जलाइए, मन में भरे उजास.
मावस भी पूनम बन, फागुन भी मधुमास.

बौर आम के देखकर, बौराया है आम.
बौरा गौरा ने वरा, खास- बताओ नाम?

लाल न लेकिन लाल है, ताल बिना दे ताल.
जलता है या फूलता, बूझे कौन सवाल?

लाल हरे पीले वसन, धरे धरा हसीन.
नील गगन हँसता, लगे- पवन वसन बिन दीन.

सरसों के पीले किए, जब से भू ने हाथ.
हँसते-रोते हैं नयन, उठता-झुकता माथ.

उक्त दोहों के भाव एवं अर्थ समझिये. दोहा कैसे कम शब्दों में अधिक कहता है- इसे समझिये. अब आप की बात, आप के साथ

सपन चाँद का दिखाते, बन हुए हैं सूर.
दीप बुझाते देश का, क्यों कर आप हुजूर?

बिसर गया था भूत में, आया दोहा याद.
छोटा पाठ पढाइये, है गुरु से फरियाद.

गुरु ने पकड़े कान तो, हुआ अकल पर वार.
बिना मोल गुरु दे रहे, ज्ञान बड़ा उपकार..

हल्का होने के लिए, सब कुछ छोड़ा यार.
देशी बीडी छोड़ कर, थामा हाथ सिगार.

कृपया, शंका का हमें, समाधान बतलाएं.
छंद श्लोक दोहा नहीं, एक- फर्क समझाएं.

पढने पिछले पाठ हैं, बात रखेंगे ध्यान.
अगले पाठों में तपन, साथ रहे श्रीमान.

नम्र निवेदन शिष्य का, गुरु दें दोहा-ज्ञान.
बनें रहें पथ प्रदर्शक, गुरु का हृयदा महान.

'बुरा न मिलिया कोय' तथा 'मुझसा बुरा न होय' में क्रमशः १+२+१+१+१+२+२+१ = ११ तथा १+१+२+१+२+१+२+१=११ मात्राएँ हैं. पूजा जी ने 'न' के स्थान पर 'ना' लिख कर मात्रा गिनी इसलिए १ मात्रा बढ़ गयी.

चलते-चलते एक वादा और पूरा करुँ-

'बेतखल्लुस' नये रंग का, नया हो यह साल.
नफरतों की जंग न हो, सब रहें खुशहाल.

अपने-अपनी पंक्तियाँ तो आप पहचान ही लेंगे. परिवर्तन पर ध्यान दें. आप हर शब्द जानते हैं, आवश्यकता केवल यह है कि उन्हें पदभार (मात्रा) तथा लय के अनुरूप आगे-पीछे चुन कर रखना है. यह कला आते आते आयेगी. कलम मंजने तक लगातार दोहा लिखें...लिखते रहें...ग़लत होते-होते धीरे-धीरे दोहा सही होने लगेगा.

सरसुति के भंडार की, बड़ी अपूरब बात.
ज्यों खर्चो त्यों-त्यों बढे, बिन खर्चे घट जात.

करत-करत अभ्यास के, जडमति होत सुजान.
रसरी आवत-जात ते, सिल पर पडत निसान.

6 कविताप्रेमियों का कहना है :

manu का कहना है कि -
आचार्य को प्रणाम,
मैंने पिछली बार दो दोहे कहे थे.....कविता के गिरते स्वरुप से व्यथित होकर...
या तो आपसे उनका उत्तर रह गया.....या मैं ही ना देख पाया.........
हर कोई तो नही ,,,पर आप तो मुझे अपना उत्तर दे ही सकते है आचार्य...???कहाँ जायेगी कविता...???
Anonymous का कहना है कि -
acharya ji ,
aap baal udyaan par aayiye paheliyaan intjaar kar rahin hain
तपन शर्मा Tapan Sharma का कहना है कि -
आचार्य नमन करूँ आपको, पकड़ूँ मैं अपने कान
इच्छा सीखने की रहती सदैव, देते रहें आप ज्ञान

करत-करत अभ्यास के, जडमति होत सुजान.
रसरी आवत-जात ते, सिल पर पडत निसान.

१+१+१+१+१+१ १+३+१ १, १+१+१+१ २+१ १+२+१.=१२,११
१+१+२ २+१+१-२+१ १,१+१ १+१ १+१+१ १+२+१=१२,११

आचार्य मात्रायें देखिये,क्या मैंने लिखी हैं ठीक
नहीं लिखी तो सही बतायें, ताकि तपन जाये सीख...
manu का कहना है कि -
तपन जी,,,,,,,ये ३ क्या लिख दिया,,,??मुझे तो गिनती आती नही पर ये तीन कैसा है,,,??

कैसा ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्हे ,,,,,,,,,,
अहसान कुरैशी वाला है,,,,,,
divya naramada का कहना है कि -
गोष्ठी ६ में त्रुटि सुधार-
दोहा क्र. ४ - धरे नहीं धारे
दोहा क्र. ६ - बन नहीं बने
दोहा क्र.१० - ए नहीं य
दोहा क्र.१२- हृयदा नहीं हृदय
कृपया, सुधार कर पढिये.