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रविवार, 19 जनवरी 2020

दोहा गाथा सनातन : पाठ १४ - २५ / २९ अप्रैल २००९

Saturday, April 25, 2009

दोहा गाथा सनातन : पाठ 14 - दोहा की छवियाँ अमित


दोहा की छवियाँ अमित, सभी एक से एक.
निरख-परख रचिए इन्हें, दोहद सहित विवेक..

दोहा के तेईस हैं, ललित-ललाम प्रकार.
व्यक्त कर सकें भाव हर, कवी विधि के अनुसार..

भ्रमर-सुभ्रामर में रहें, गुरु बाइस-इक्कीस.
शरभ-श्येन में गुरु रहें, बीस और उन्नीस..

रखें चार-छ: लघु सदा, भ्रमर सुभ्रामर छाँट.
आठ और दस लघु सहित, शरभ-श्येन के ठाठ..


भ्रमर- २२ गुरु, ४ लघु=४८

बाइस गुरु, लघु चार ले, रचिए दोहा मीत.
भ्रमर सद्रश गुनगुन करे, बना प्रीत की रीत.

सांसें सांसों में समा, दो हो पूरा काज,
मेरी ही तो हो सखे, क्यों आती है लाज?


सुभ्रामर - २१ गुरु, ६ लघु=४८

इक्किस गुरु छ: लघु सहित, दोहा ले मन मोह.
कहें सुभ्रामर कवि इसे, सह ना सकें विछोह..

पाना-खोना दें भुला, देख रहा अज्ञेय.
हा-हा,ही-ही ही नहीं, है सांसों का ध्येय..


शरभ- २० गुरु, ८ लघु=४८

रहे बीस गुरु आठ लघु का उत्तम संयोग.
कहलाता दोहा शरभ, हरता है भव-रोग..

हँसे अंगिका-बज्जिका, बुन्देली के साथ.
मिले मराठी-मालवी, उर्दू दोहा-हाथ..


श्येन- १९ गुरु, १० लघु=४८

उन्निस गुरु दस लघु रहें, श्येन मिले शुभ नाम.
कभी भोर का गीत हो, कभी भजन की शाम..

ठोंका-पीटा-बजाया, साधा सधा न वाद्य.
बिना चबाये खा लिया, नहीं पचेगा खाद्य..


दोहा के २३ प्रकारों में से चार से परिचय प्राप्त करें और उन्हें मित्र बनाने का प्रयास करें.

मनु जी! आपने अंग्रेज दोहाकार स्व. श्री फ्रेडरिक पिंकोट द्वारा रचे गए दोहों का अर्थ जानना चाहा है. यह स्वागतेय है. आपने यह भी अनुभव किया कि अंग्रेज के लिए हिन्दी सीखना और उसमें दोहा को जानकार दोहा रचना कितना कठिन रहा होगा. श्री पिंकोट का निम्न सोरठा एवं दोहा यह भी तो कहता है कि जब एक विदेशी और हिन्दी न जाननेवाला इन छंदों को अपना सकता है तो हम भारतीय इन्हें सिद्ध क्यों नहीं कर सकते? पाशं केवा इच्छाशक्ति का है, छंद तो सभी को गले लगाने के लिए उत्सुक है.

बैस वंस अवतंस, श्री बाबू हरिचंद जू.
छीर-नीर कलहंस, टुक उत्तर लिख दे मोहि.


शब्दार्थ: बैस=वैश्य, वंस= वंश, अवतंस=अवतंश, जू=जी, छीर=क्षीर=दूध, नीर=पानी, कलहंस=राजहंस, तुक=तनिक, मोहि=मुझे.

भावार्थ: हे वैश्य कुल में अवतरित बाबू हरिश्चंद्र जी! आप राजहंस की तरह दूध-पानी के मिश्रण में से दूध को अलग कर पीने में समर्थ हैं. मुझे उत्तर देने की कृपा कीजिये.

श्रीयुत सकल कविंद, कुलनुत बाबू हरिचंद.
भारत हृदय सतार नभ, उदय रहो जनु चंद.


भावार्थ: हे सभी कवियों में सर्वाधिक श्री संपन्न, कवियों के कुल भूषण! आप भारत के हृदयरूपी आकाश में चंद्रमा की तरह उदित हुए हैं.

सुविख्यात सूफी संत अमीर खुसरो (संवत १३१२-१३८२) ने दोहा का दामन थामा तो दोहा ने उनकी प्यास मिटाने के साथ-साथ उन्हें जन-मन में प्रतिष्ठित कर अमर कर दिया-

गोरी सोयी सेज पर, मुख पर डारे केस.
चल खुसरो घर आपने, रैन भई चहुँ देस..

खुसरो रैन सुहाग की, जागी पी के संग.
तन मेरो मन पीउ को, दोउ भये इक रंग..

सजन सकारे जायेंगे, नैन मरेंगे रोय.
विधना ऐसी रैन कर, भोर कभी ना होय..


आज का गृहकार्य : जनाब खुसरो के कुछ दोहे लाइए ताकि उनका आनंद सभी ले सकें. उक्त दोहों की गुरु-लघु मात्रा दे आधार पर उनका प्रकार बताइए और ईनाम में दोहा पाइए.

दो जानकारियाँ :

मेकलसुता त्रैमासिक दोहा-पत्रिका है. जिसमें दोहा तथा दोहा-कुल के छंद ही प्रकाशित होते हैं. संपादक हैं श्री कृष्ण स्वरुप शर्मा 'मैथिलेन्द्र'. संपर्क: गीतांजलि भवन, ८ शिवाजी नगर उपनिवेश, नर्मदापुरम, होशंगाबाद ४६१००१, दूरभाष: ०७५७४ २५७७२९, चल्भ्श: ०९४२४४७१२४९, शुल्क: वार्षिक ६०/-. अब तक १८ अंक प्रकाशित हो चुके हैं.

श्री मैथिलेन्द्र शीघ्र ही दोहा सन्दर्भ-२, दोहा पर शोधपरक ग्रन्थ प्रकाशित करने जा रहे हैं. जिन दोहकारों का कम से कम एक दोहा संग्रह प्रकाशित हो चका है उनसे परिचय (नाम, माता-पिता-जीवनसाथी का नाम, जन्म स्थान, जन्म तिथि, शिक्षा, आजीविका, साहित्यिक योगदान, प्रकाशित कृतियाँ, पता, दूरभाष, चलभाष, श्वेत-श्याम छाया चित्र, पता लिखा पोस्ट कार्ड, तथा सहयोग निधि १५०/- ३१-१२-२००९ तक आमंत्रित है.

28 कविताप्रेमियों का कहना है :

neelam का कहना है कि -
खुसरो दरिया प्रेम का ,उलटी वा,की धार
जो उतरा सो डूब गया ,जो डूब गया सो पार

२)सेज वो सूनी देखके रोवु मै दिन रैन ,
पिया -पिया मै करत हूँ ,पहरों पल भर न चैन |

मात्राएँ तो आचार्य जी बताएँगे ही खुसरो के दोहे हमने लिख दिए हैं
अजित गुप्ता का कोना का कहना है कि -
आचार्य जी
नेट पर सब कुछ उपलब्‍ध है, वहीं से ही दोहे कट और पेस्‍ट करने का मन नहीं कर रहा है। दोहों के 23 प्रकार और गुरु, लघु समझ नहीं आ रहे। कृपया विस्‍तार से बताएं।
manu का कहना है कि -
डा, अजित जी से सहमत हूँ,,,
जो खुद से याद थे वो आपने और नीलम जी ने लिख दिए हैं,,,
बल्कि नीलम जी वाला नम्बर दो मेरे लिए नया है,,,,
अब किताब में से देखकर टीपना अजित जी की तरह से ही मुझे भी सही नहीं लगता,,,

दोहे का अर्थ समझाने का धन्यवाद,,,,,
एक बात और,,,,,
बहुत ही भला लगता है के जब खुसरो का ज़िक्र होते ही नीलम जी जरूर पहुँचती हैं,,,,,
सचमुच कोई प्रशंशक हो तो ऐसा,,,
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
आचार्य जी, प्रणाम

पिछली बार आपकी आँखों की तकलीफ के बारे में पढ़कर बड़ी तकलीफ महसूस हुई थी. आशा है कि अब दशा में सुधार होगा. कितनी मेहनत करते हैं आप हम सबके लिये.
आज जो मनु जी सोच रहे हैं बिलकुल वही मैं भी सोचे जा रही थी कि नीलम जी खुसरो जी के नाम पर झट से चहक पड़ती हैं. साफ़ दिख रहा है कि उनके दोहों से खास लगाव है. और बड़े मज़े वाले दोहे लाती हैं चुन कर ' जो उतरा वो डूब गया, जो डूबा वो पार'. वाह!
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
आचार्य जी,

दोहा का कुनबा बड़ा, बढ़कर हुआ विशाल
कठिन समस्या हो गयी, बिगड़ा मेरा हाल
बिगड़ा मेरा हाल, कि मीटर बंद हो गया
अकल हो गयी मंद,लिखा तो छंद हो गया
शन्नो है लाचार, न अब ले पाये लोहा
डग-मग करे नैया, हँसते मुझपर दोहा.
divya naramada का कहना है कि -
खुसरो के दोहे तो अंतर्जाल से मैं भी लगा सकता था. आपसे मँगाने के पीछे आशय यह था की आप इस बहाने उन्हें पढेंगे, उनका अर्थ समझेंगे और उनकी लय तथा धुन के अधिक निकट आयेंगे. हर महान दोहाकार की अपनी एक विशेषता होती है, आप उसे समझ सके तो अपने रंग में ढालकर आप कुछ ऐसा रच पाएंगे कि इस समय के सिद्ध दोहाकार कहलायें. किसी भी पुराने दोहाकार के दोहे स्मृति, पुस्तक या जाल से ही मिलेंगे. कम से कम एक दोहा हर एक लाये.

दोहा के पदों और चरणों में मात्र गणना का पर्याप्त अभ्यास आपको है ही. अब करना केवल यह है कि चारो चरणों या दोनों पदों या पूरे दोहे की गुरु और लघु मात्राएँ अलग-अलग गिनें, गुरु को २ से गुणा कर लघु जोडेंगे तो योग ४८ ही आएगा. दोहा में कुल ४८ लघु मात्राएँ होती हैं. हर गुरु मात्रा के लिए २ लघु मात्राएँ कम हो जाती हैं. दोहा के २३ प्रकार इन लघु-गुरु के विविध संयोजनों से ही बनते हैं. ग़ज़ल की बहर की तरह दोहे के प्रकार हैं. बहरों के नामों की तरह इन दोहों के नाम हैं.
divya naramada का कहना है कि -
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neelam का कहना है कि -
खुसरो की दीवानगी कम ही नहीं होती हमारी ,क्या गजब के थे वो,उस जनम में उनकी चची या भतीजी ही रहे होंगे हम उनके ,
फ़ारसी और अवधी में जो उन्होंने रचना की है ,
जिहाले मुश्किन व्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्लाह
तोत -ए-हिंद उनको कोई ऐसे ही थोड़े ही कहा गया है |
haan aachaary ji ne ek doha kaha tha to usme se koi ek doha manu ji ya shanno ji le sakti hai .
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
आचार्य जी,
इस बार कक्षा में लोग सही तरीके से हाजिरी लगा रहे हैं. हालाँकि मानसिक उलझनें बढ़ गयीं हैं दोहों के विषम रूप देखकर. मैं फिर आ गयी लेकिन बिना वजह नहीं, गुरु जी, कदापि नहीं. मैं तो आपको खुसरो साहब के दोहे दिखाने लायी हूँ जिन्हें मैंने अंतर्जाल में पाया. यहाँ मेरे पास कोई पुस्तक नहीं है किसी भी दोहा-रचयिता की.

'खुसरो बाजी प्रेम की, मैं खेलूँ पी के संग
जीत गयी तो पी मोरे, हारी पी के संग'.

'अपनी छव बनायिके, जो मैं पी के पास गयी
छव देखी जब पीयू की, सो अपनी भूल गयी'.

'एक गुनी ने यह गुन कीना
हरियल पिंजरे में दे दीना
देखो जादूगर का कमाल
डाले हरा निकाले लाल'.

एक सवाल आ रहा है दिमाग में जिसे पूछे बिना वह पच नहीं रहा है.....वह यह कि क्या खुसरो जी के जमाने में मात्रायों को गिनने की प्रथा थी या नहीं. क्योंकि मुझे काफी गड़बड़ दिखती है इधर-उधर कई जगह. इतने महान और ज्ञानी इंसान के बारे में ऐसा सवाल पूछते हुए संकोच बहुत हो रहा है लेकिन मुझे यह सवाल तंग बहुत कर रहा है, गुरु जी.
Neelam ji,
ho sakta hai ki aap ka kaha kisi had tak sahi ho aur ab kaliyug men reincarnation hua ho aapka aur us samay aap khusro ji kee chachi ya bhateeji rahi hon. main aapki vhavnaayon ko samajh sakti hoon.
अजित गुप्ता का कोना का कहना है कि -
आचार्य जी
दो दोहे खोजे हैं -
खुसरो रेन सुहाग की, जागी पी के संग
तन मेरो मन पिऊ को, दोउ भये एक रंग

खुसरो ऐसी प्रीत कर, जैसी हिन्‍दू जोय
पूत कराए कारने, जल,जल कोयला होय
अजित गुप्ता का कोना का कहना है कि -
आचार्य जी
दोहे के तीन प्रकार प्रस्‍तुत हैं -
हाथ पसारे मैं खड़ी, घर की चौखट पार
छाँव मिली ना ओट थी, बस थी केवल हार।
16 + 16 = करभ

रात चाँदनी खूब थी, तारे जगमग होय
पंछी बैठा एकला, भोर बता कब होय।
17+14= मर्कट

साँपों ने मुझको डसा, घुस बाँहों के माय
प्रेम सिमटकर रह गया, शक ही बढ़जा जाय।
14+20= हंस
अजित गुप्ता का कोना का कहना है कि -
तीसरे दोहे का अंतिम पद में शक ही बढ़ता जाय है।
Kavi Kulwant का कहना है कि -
रावण रावण जो दिखे, राम करे संहार ।
रावण घूमे राम बन, कलयुग बंटाधार ॥

कलयुग में मैं ढो़ रहा, लेकर अपनी लाश ।
सत्य रखूँ यां खुद रहूँ, खुद का किया विनाश ॥

भगवन सुख से सो रहा, असुर धरा सब भेज ।
देवों की रक्षा हुई, फंसा मनुज निस्तेज ॥

मैं मैं मरता मर मिटा, मिट्टी मटियामेट ।
मिट्टी में मिट्टी मिली, मद माया मलमेट ॥

सच की अर्थी ढ़ो रहा, ले कांधे पर भार ।
पहुंचाने शमशान भी, मिला न कोई यार ॥

कवि कुलवंत सिंह
Pooja Anil का कहना है कि -
आचार्य जी,
अच्छा किया जो आपने खुसरो के दोहे लेकर आने को कहा, इस बहाने अमीर खुसरो की लिखी तमाम रचनाओं को पढने का सौभाग्य मिला, अब तक सब नहीं पढ़ पाई, इन्हें पढने का काम चल रहा है और अपनी दोहा यात्रा भी चल ही रही है :) , अमीर खुसरो के कुछ दोहे , चुन कर ले आई ---

अंगना तो परबत भयो, देहरी भई विदेस।
जा बाबुल घर आपने, मैं चली पिया के देस।।

खुसरो पाती प्रेम की बिरला बाँचे कोय।
वेद, कुरान, पोथी पढ़े, प्रेम बिना का होय।।

खुसरो मौला के रुठते, पीर के सरने जाय।
कहे खुसरो पीर के रुठते, मौला नहि होत सहाय।।

दोहों के प्रकार समझने में अब तक कठिनाई हो रही है, पर हार नहीं मानी है, कोशिश जारी है, जैसे ही समझ में आ जायेंगे, उदाहरण के साथ फिर हाजिर हो जाउंगी :).
अजित गुप्ता का कोना का कहना है कि -
आचार्य जी
तीन दोहे और प्रस्‍तुत हैं, 23 बनाने में अभी समय लगेगा। मुझे अंतिम दो प्रकार- उदर और सर्प समझ नहीं आए, क्‍योंकि बिना लघु के दोहा कैसे सम्‍भव है?
प्रेम और विश्‍वास से, जोड़ा था परिवार
नौकरियां ने चोट की, तोड़ा है घरबार
18+12 = मंडूक

चीयां मेरी बावरी, उल्‍टी उल्‍टी जाय
दिन में तो सोती रहे, पड़े रात जग जाय।
19 + 10 = श्‍येन

सारा आटा साँध के, रोटी बनती नाय
थोड़ा साटा राख के, लोई बिलती जाय
20 + 8 = शरभ
manu का कहना है कि -
नीलम जी,
आपने जैसे अपना नाता खुसरो से जोड़ा है,,,
पहले तो कुछ इर्ष्या सी हुयी ,,,
फिर लगा के वाह क्या बात कही है,,,,कुछ न कुछ तो हम भी लगते ही होंगे,,,, (दूर के ही सही,,)
शायद इसलिए खुसरो से लगाव तो पूरा है पर दोहा नहीं ला पा रहे हैं,,,,,
एक बात और भी साफ़ हो गयी,,,,,के जब कोई हिन्दी में या आम बोलचाल की भाषा में दरार पैदा करने की बात होती है तो हमसे भी पहले आगे बढ़कर कौन बोलता है ,,,,,,,
जी हां,,
ये खुसरो ही बोलता है नीलम जी के रूप में,,,,,
जो श्रद्धा खुसरो ने अपने उस्ताद के लिए उम्र भर रखी, वैसी ही उन्हें आज मिल रही है,,
Tapan Sharma का कहना है कि -
zihaal-e muskin, makan-baranjish, bahale-hijra bechaara dil hai...
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
सही कहा मनु जी आपने, क्यों नहीं? कोई जरूरी है कि खुसरो साहिब नीलम जी के ही कुछ लगते हों. यह तो इंसाफी नहीं होगी. अब तो मुझे ऐसा लगने लगा है कि तकदीर ने हम सबको इकट्ठा इस दोहे की कक्षा में ला पटका है तो शायद इसके पीछे जरूर उस ऊपर वाले की कुछ कहने की इक्षा होगी जो हम समझ नहीं पाए थे अब तक. लेकिन नीलम जी की बात से माथा ठनका कि शायद हम लोगों का भी उस समय किसी तरह की रिश्तेदारी का connection हो. सबूत तो नहीं दे सकते लेकिन केवल हवा में तीर जरूर फेंक सकते हैं अनुमान लगाने को.
manu का कहना है कि -
हूऊऊऊन
मैं भी यही सोच रहा हूँ के हमें यहाँ क्यूं लाकर पटका गया है,,,,,

तपन जी,
शायद ये शे'र है ....
और है भी फिल्म गुलामी का ......
जिहाले मिस्कीं मकुन तगाफुल , दुराये नैना, बनाए बतियाँ,
के ताबे-हिज्राँ न दारम ऐ जाँ, न लेहू काहे लगाए छतियाँ .....

साबरी brothers की सूफियानअ आवाज में ये गजल कवाल्ली के रंग में सुनिए,,,,तो एक नया ही संसार नजर आता है,,,,
और मजे की बात ये के इसकी शुरू की लाइने दाल कर फिल्म गुलामी के गीत में भी चार चाँद लग गए हैं,,,,,,,,
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
लगता है कि तपन जी confusion की अवस्था में होंगे और गलत दरवाज़े पर दस्तक दे गये. ऐसा भी हो जाता है कभी-कभी. अब दोहे और शेरों में मिलावट हो रही है और दोहों की कक्षा में शेर और शेरों की महफ़िल में दोहे सजने लगें हैं. किसकी गलती??
Tapan SHarma का कहना है कि -
main dohe ki post nahin padh paaya hun.. par comments padh liye isiliye post kar di..

manuji, ek aur gaana bhi hai:

zihaal-e muskin, makan-baranjish, bahale-hijra bechaara dil hai...

sunaayee deti hai jiski dhadkan humaara dil ya tumhaara dil hai

ab aap log kahenge ki "aawaaz" ko bhi tapan yahi le aaya... :-).. par chalega..
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
हाँ चलेगा बिलकुल चलेगा और आप भी चलेगा अगली बार हमरी बात मन कर पहेली की कक्षा (महफ़िल) में. वैसे आपने बरखुरदार अपना नाम तपन से गगन में बदलने की हुशिआरी क्यों की पिछली बार पहेलियों की कक्षा में???? और सुमीत जी को भी ढूंढ कर लाइएगा. Neelam ji ने उनकी खोज में पोस्टर चिपकवा दिए होंगे गली-कूंचों में शायद अब तक. अगर उन्हें कोई पहचान सके तो पहेलियों की कक्षा का रास्ता दिखाने का कष्ट जरूर कीजियेगा. मामला संगीन होता जा रहा है.

Wednesday, April 29, 2009

गोष्ठी 14 - दोहा के संग-साथ


दोहा के पदों और चरणों में मात्रा गणना का पर्याप्त अभ्यास आपको है। अब करना केवल यह है कि चारो चरणों या दोनों पदों या पूरे दोहे की गुरु और लघु मात्राएँ अलग-अलग गिनें, गुरु को २ से गुणा कर लघु जोड़ेंगे तो योग ४८ ही आएगा. दोहा में कुल ४८ लघु मात्राएँ होती हैं. हर गुरु मात्रा के लिए २ लघु मात्राएँ कम हो जाती हैं. दोहा के २३ प्रकार इन लघु-गुरु के विविध संयोजनों से ही बनते हैं. ग़ज़ल की बहर की तरह दोहे के प्रकार हैं. बहरों के नामों की तरह इन दोहों के नाम हैं. नीचे आपके ही दोहों में मात्रा गणना एवं दोहा का प्रकार प्रस्तुत है-

- अजित जी
लोकतन्‍त्र की गूँज है, लोक मिले ना खोज
२ १ २ १ २ २ १ २, २ १ १ २ २ २ १
गुरु ९ बार, लघु ६ बार= १८+६=२४ मात्रा
राजतन्‍त्र ही रह गया, वोट बिके हैं रोज
२ १ २ १ २ १ १ १ २,२ १ १ २ २ २ १
गुरु ८ बार, लघु ८ बार=१६+८=२४ मात्रा.
पूरे दोहे में जोडें तो गुरु ९+८=१७ बार अर्थात ३४ मात्रा,
लघु ६+८=१४ मात्रा, कुल ३४ + १४ = ४८ मात्रा
१७ गुरु तथा १४ लघु मात्राओं के दोहे का नाम 'मरकट' है.

-मनु जी
अब तो कक्षा नायिका, के भी पकडे कान
१ १ २ २ २ २ १ २ २ २ १ १ २ २ १
गुरु ९ बार, लघु ६ बार = १८+६=२४ मात्रा
फुटक रहे हैं छात्र सब , देती क्यूं ना ध्यान
१ १ १ १ २ २ २ १ १ १, २ २ २ २ २ १
गुरु ८ बार, लघु ८ बार =१६+८ =२४ मात्रा
पूरे दोहे में जोडें तो गुरु ९+८=१७ बार अर्थात ३४ मात्रा,
लघु ६+८=१४ मात्रा, कुल ३४ + १४ = ४८ मात्रा
१७ गुरु तथा १४ लघु मात्राओं के दोहे का नाम 'मरकट' है.

-पूजा जी
रचना रोला भूमिका, दोहे के संग साथ.
१ १ २ २ २ २ १ २, २ २ २ १ १ २ १
गुरु ९ बार + लघु ६ बार = १८+६=२४ मात्रा
बना रहे हैं कुण्डलिनी, लिये हाथ में हाथ.
१ २ १ २ २ २ १ २, १ २ २ १ २ २ १
गुरु ९ बार +लघु ६ बार = १८+६=२४ मात्रा
पूरे दोहे में जोडें तो गुरु ९+९=१८ बार अर्थात ३६ मात्रा,
लघु ६+६=१२ मात्रा, कुल ३६ + १२ = ४८ मात्रा
१८ गुरु तथा १२ लघु मात्राओं के दोहे का नाम 'मंडूक' है.

-अभिषेक जी
मैं अपने को जप रहा, चादर-बाहर पाँव।
२ १ १ २ २ १ १ १ २, २ १ १ २ १ १ २ १
गुरु ७ बार, लघु १० बार = १४+१०=२४
अभिमानी जन का नहीं, कहीं नाम या गाँव।
१ १ २ २ १ १ २ १ २, १ २ २ १ २ २ १
गुरु ८ बार, लघु ८ बार = १६+८=२४
पूरे दोहे में जोडें तो गुरु ७+८=१५ बार अर्थात ३० मात्रा,
लघु ६+६=१२ मात्रा, कुल ३० + १८ = ४८ मात्रा
१५ गुरु तथा १८ लघु मात्राओं के दोहे का नाम 'नर' है.

-तपन शर्मा
मात्रा का भय नहीं है, करूँ हमेशा जोड़.
२ २ २ १ १ १ २ २, १ २ १ २ २ २ १
गुरु ९ बार, लघु ६ बार = १८+६=२४
ज्ञान न शब्दों का मुझे, शिल्प न दूँ मैं तोड़.
२ १ १ २ २ २ १ २, २ १ १ २ २ २ १
गुरु ९ बार, लघु ६ बार, १८+६=२४
पूरे दोहे में जोडें तो गुरु ९+९=१८ बार अर्थात ३६ मात्रा,
लघु ६+६=१२ मात्रा, कुल ३६ + १२ = ४८ मात्रा
१८ गुरु तथा १२ लघु मात्राओं के दोहे का नाम 'मंडूक' है.

-शन्नो जी
'जहाँ पड़ें गुरु के चरण, चंदन बनती धूल.
१ २ १ २ १ १ २ १ १ १, २ १ १ १ १ २ २ १
गुरु ६ बार, लघु १२ बार = १२+१२=२४
पाकर चरणों में शरण, मिले शांति का कूल..
२ १ १ १ १ २ २ १ १ १,१ २ २ १ २ २ १
गुरु ७ बार, लघु १० बार = १४+१०=२४
पूरे दोहे में जोडें तो गुरु ६+७=१३ बार अर्थात २६ मात्रा,
लघु १२+१०= २२ मात्रा, कुल २६ + २२ = ४८ मात्रा
१३ गुरु तथा २२ लघु मात्राओं के दोहे का नाम 'गयंद या मदुकल' है.

- सलिल
दोहा गाथा से हुए, जितने श्रोता गोल.
२ २ २ २ २ १ २, १ १ २ २ २ २ १.
गुरु १० बार, लघु ४ बार=२०+४=२४
वापिस आ दोहा रचें, शब्द-शब्द को तोल..
२ १ १ २ २ २ १ २ २ १ २ १ २ २ १
गुरु ९ बार, लघु ६ बार=१८+६=२४
पूरे दोहे में जोडें तो गुरु १०+९=१९ बार अर्थात ३८ मात्रा,
लघु ४+६= १० मात्रा, कुल ३८ + १० = ४८ मात्रा
१९ गुरु तथा १० लघु मात्राओं के दोहे का नाम 'श्येन' है. .

गोरी सोयी सेज पर, मुख पर डारे केस.
चल खुसरो घर आपने, रैन भई चहुँ देस.. १४ गुरु, २० लघु - हंस
खुसरो रैन सुहाग की, जागी पी के संग.
तन मेरो मन पीउ को, दोउ भये इक रंग.. १६ गुरु, १६ लघु - करभ
सजन सकारे जायेंगे, नैन मरेंगे रोय.
विधना ऐसी रैन कर, भोर कभी ना होय.. १६ गुरु, १६ लघु- करभ

टिप्पणी: प्रथम चरण में १३ के स्थान पर १४ मात्राएँ हैं. यहाँ एक मात्रा गिराई गयी है. खुसरो हिन्दी-उर्दू दोनों में लिखते थे. यह असर होना स्वाभाविक है, पर हम ऐसा न करें.

नीलम जी ...
दोहा के परिवार में, जुडें-लिखें यदि आप.
तब खुसरो की विरासत, सके जगत में व्याप. १४-२० हंस
खुसरो दरिया प्रेम का ,उलटी वाकी धार
जो उतरा सो डूब गया ,जो डूब गया सो पार
तीसरे चरण में एक मात्रा गिरेगी, चौथे चरण में 'जो' नहीं है.
खुसरो दरिया प्रेम का, उलटी वाकी धार
जो उतरा सो डूब गया, डूब गया सो पार १७ - १४ मरकट


मैंने निम्न रूप भी सुना है-
खुसरो दरिया प्रेम का, उल्टी बाकी धार.
जो उतराया डूबता, जो डूबा हो पार.. १९ गुरु, १० लघु -श्येन

२)सेज वो सूनी देखके रोवु मै दिन रैन ,
पिया -पिया मै करत हूँ, पहरों पल भर न चैन |
सेज वो सूनी देखके, रोऊँ मैं दिन-रैन.
पिया-पिया मैं करत हूँ, पल भर पड़े न चैन.. १४ गुरु, २० लघु -हंस.
मात्राएँ आप गिन लातीं तो सबको प्रेरणा मिलती.

shanno said...
आचार्य जी,
दोहा का कुनबा बड़ा, बढ़कर हुआ विशाल
कठिन समस्या हो गयी, बिगड़ा मेरा हाल १५ - १८ नर
बिगड़ा मेरा हाल, कि मीटर बंद हो गया
अकल हो गयी मंद,लिखा तो छंद हो गया
शन्नो है लाचार, न अब ले पाये लोहा
डग-मग करे नैया, हँसते मुझपर दोहा.

'खुसरो बाजी प्रेम की, मैं खेलूँ पी के संग
जीत गयी तो पी मोरे, हारी पी के संग'.
दूसरे चरण से 'मैं' हटा दें. तीसरे चरनमें एक मात्रा गिरेगी. २० - ८ शरभ

'अपनी छव बनायिके, जो मैं पी के पास गयी
छव देखी जब पीयू की, सो अपनी भूल गयी'. -यह दोहा नहीं है.

'एक गुनी ने यह गुन कीना
हरियल पिंजरे में दे दीना
देखो जादूगर का कमाल
डाले हरा निकाले लाल'. - यह पहेली है...बूझिये.
एक सवाल आ रहा है दिमाग में जिसे पूछे बिना वह पच नहीं रहा है.....वह यह कि क्या खुसरो जी के जमाने में मात्रायों को गिनने की प्रथा थी या नहीं. क्योंकि मुझे काफी गड़बड़ दिखती है इधर-उधर कई जगह. इतने महान और ज्ञानी इंसान के बारे में ऐसा सवाल पूछते हुए संकोच बहुत हो रहा है

संकोच न करें...खुसरो के समय में आज की तरह विद्यालय या किताबें सर्व सुलभ नहीं. थे. शिक्षा गुरुओं या उस्तादों से ली जाती थी. खुसरो बहुभाषी विद्वान् थे. संस्कृत, अरबी-फारसी-उर्दू तथा अपभ्रंश जानते थे. आम बोल-चाल की भाषा में, जिसे वे 'हिन्दवी' कहते थे रचनाएँ करते थे. इसलिए उनके कलाम में कई जगहों पर उर्दू की तरह मात्राएँ गिराई जाना जरूरी हो जाता है. दूसरे इतना समय बीत गया है कि अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग पाठ-भेद प्रचलित हैं.

Dr. Smt. ajit gupta said...
आचार्य जी
दो दोहे खोजे हैं -
खुसरो रेन सुहाग की, जागी पी के संग
तन मेरो मन पिऊ को, दोउ भये एक रंग
खुसरो ऐसी प्रीत कर, जैसी हिन्‍दू जोय
पूत कराए कारने, जल,जल कोयला होय
दोहे के तीन प्रकार प्रस्‍तुत हैं -
हाथ पसारे मैं खड़ी, घर की चौखट पार
छाँव मिली ना ओट थी, बस थी केवल हार।
१६ + १६ = करभ
रात चाँदनी खूब थी, तारे जगमग होय
पंछी बैठा एकला, भोर बता कब होय।
१७+१४= मर्कट
साँपों ने मुझको डसा, घुस बाँहों के माय
प्रेम सिमटकर रह गया, शक ही बढ़जा जाय।
१४+२०= हंस
तीन दोहे और प्रस्‍तुत हैं, २३ बनाने में अभी समय लगेगा। मुझे अंतिम दो प्रकार- उदर और सर्प समझ नहीं आए, क्‍योंकि बिना लघु के दोहा कैसे सम्‍भव है?

उदर में १ गुरु तथा ४६ लघु हैं जबकि सर्प में गुरु नहीं है, ४८ लघु हैं.

प्रेम और विश्‍वास से, जोड़ा था परिवार
नौकरियां ने चोट की, तोड़ा है घरबार
१८+१२ = मंडूक
चीयां मेरी बावरी, उल्‍टी उल्‍टी जाय
दिन में तो सोती रहे, पड़े रात जग जाय।
१९ + १० = श्‍येन
सारा आटा साँध के, रोटी बनती नाय
थोड़ा साटा राख के, लोई बिलती जाय
२० + ८ = शरभ

वाह! वाह!! आपने कमाल कर दिया. आज की दोहा ध्वजवाहिका आप ही हैं.

Kavi Kulwant said...
रावण रावण जो दिखे, राम करे संहार ।
रावण घूमे राम बन, कलयुग बंटाधार ॥
कलयुग में मैं ढो़ रहा, लेकर अपनी लाश ।
सत्य रखूँ यां खुद रहूँ, खुद का किया विनाश ॥
भगवन सुख से सो रहा, असुर धरा सब भेज ।
देवों की रक्षा हुई, फंसा मनुज निस्तेज ॥
मैं मैं मरता मर मिटा, मिट्टी मटियामेट ।
मिट्टी में मिट्टी मिली, मद माया मलमेट ॥
सच की अर्थी ढ़ो रहा, ले कांधे पर भार ।
पहुंचाने शमशान भी, मिला न कोई यार ॥

स्वागत कवि कुलवंत जी!, हम दर्शन कर धन्य.
दोहों का उपहार है, सचमुच मीत अनन्य.

pooja said...
आचार्य जी,
अच्छा किया जो आपने खुसरो के दोहे लेकर आने को कहा, इस बहाने अमीर खुसरो की लिखी तमाम रचनाओं को पढने का सौभाग्य मिला, अब तक सब नहीं पढ़ पाई, इन्हें पढने का काम चल रहा है और अपनी दोहा यात्रा भी चल ही रही है :) , अमीर खुसरो के कुछ दोहे , चुन कर ले आई ---
अंगना तो परबत भयो, देहरी भई विदेस।
जा बाबुल घर आपने, मैं चली पिया के देस।।

अँगना तो परबत भयो, दहरी भई बिदेस.
जा बाबुल घर आपने, चली पिया के देस..

खुसरो पाती प्रेम की बिरला बाँचे कोय।
वेद, कुरान, पोथी पढ़े, प्रेम बिना का होय।।
तीसरे चरण में एक मात्रा गिरेगी.

खुसरो मौला के रुठते, पीर के सरने जाय।
कहे खुसरो पीर के रुठते, मौला नहि होत सहाय।।

दोहों के प्रकार समझने में अब तक कठिनाई हो रही है, पर हार नहीं मानी है, कोशिश जारी है, जैसे ही समझ में आ जायेंगे, उदाहरण के साथ फिर हाजिर हो जाउंगी.

पूजा जी! आपका परिश्रम और लग्न सराहनीय है। आपका प्रयास अन्यों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगा. पुराने दोहाकारों के दोहों की मात्रा गणना (तकतीअ) करते हुए प्रक्षिप्त शब्दों को खोज कर अलग कर दें। शीघ्रता न करें। दोहा पढ़ती-लिखती रहें...अपने-आप उनकी लय का अंतर समझने लगेंगी. अस्तु...

19 कविताप्रेमियों का कहना है :

manu का कहना है कि -
क्या बात है आचार्य,,,,,,,,,,,

सभी को नाप दिया है आपने तो ,,,,,
और मुझे तो बड़ा ही मजा आया जब पता लगा के नाम चाहे जो भी हो ,,पर मेरा दोहा सही है,,,,
अपना तो तुक्का फिट ,,,,,
Vivek का कहना है कि -
http://vivj2000.blogspot.com/

nice analysis
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
आचार्य जी प्रणाम,
बोलूंगी तो सब बोलेंगे बोलती है.....लेकिन बोलना तो पड़ेगा ही, है ना?
आपने कहा है कि संकोच ना करुँ तो ठीक है फिर से आ गयी हूँ हिम्मत करके. लेकिन अपना हिसाब dodgy ही रहेगा मनु जी की तरह जो आज खूब फुदक रहे हैं. समझ रहे हैं कि उनका तुक्का फिट हो गया है. आप कितना tolerate करते हैं हम सबको और फिर कितने धैर्य से हम सबको समझाते हैं, की हुई भूलों को सुधारते हैं, यह सब हमें अनदेखा नहीं करना चाहिये. आपके उत्साह का 'सलिल' प्रवाह अत्यंत प्रशंशनीय है. इसके बारे में जितना कहो कम है.
आपने मेरे भी दोहों को देखा, सुधारा, कभी सराहा भी और उनकी कमियों को भी बताकर प्रेरणा देने का प्रयास किया बिना डांटे-फटकारे उसके लिए आभारी हूँ. आज यह कुछ दोहे आपकी सेवा में लायी हूँ. इन्हें चाहें आप या चाहें तो मनु जी बतायें कि किस category में रखा जाये. या नीलम जी, अजित जी, पूजा जी और तपन जी भी सुलझाने की कोशिश करें तो और भी अच्छा होगा.

चुप बैठी कब से यहाँ, चित्त यहाँ न लागे
पिंजरे के पंछी सा, मन उड़न को भागे.

अब एक कुंडलिनी:

खुद का लिखा जो समझे, जीत सके मैदान
जो बस उलझा ही रहे, खिंचते उसके कान.
खिंचते उसके कान, फुदकता रहता फिर भी
नक़ल करे कक्षा में, ताकता इधर-उधर भी
पूछ ले अब शन्नो, जो भी सकें राह दिखा
समझ ढंग से यहाँ, तू अपने खुद का लिखा.

कुछ और आ गया दिमाग में तो अब मैं क्या करुँ? चलो बोल देती हूँ:

फुदक रहा कोई यहाँ, तुक्के से दी मात
मेहनत रोज़ जो करें, पीस रहे वह दांत.
अजित गुप्ता का कोना का कहना है कि -
आचार्य जी
आपने लिखा कि सर्प में 48 लघु हैं तब दोहे के अन्‍त में गुरु लघु कैसे होगा?
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
Help! गुरु जी,
दोहे के दूसरे व चौथे चरण की यति guru होने से गलती हो गई है. स्वयं-सुधार का एक सफल या असफल प्रयत्न कर रही हूँ:

चुप बैठी कब से यहाँ, चित्त रहा ना लाग
पिंजरे के पंछी सा, मन कहता है भाग.
अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -
आचार्यजी ,

आपके बताये दोहा के नियमों को दोहरा , कुछ दोहे लिखें हैं | यदि आपको समय मिले तो इन्हें जांच दीजिये |

नियमों का पालन -
१. १३-११ मात्रायों के पद
२. सम पदों के अंत में गुरु - लघु |
३. गण का मैं अनुमान नहीं लगा पा रहा हूँ ?
४. तुकांत शब्दों से सम पदों का अंत , लयात्मक रखने की कोशिश |
५. पदों में गहरे अर्थ रखने का प्रयास |

दोहे के पद -

रूप - रंग न धन गौरव , आये अंत में काम |

२१ २१ १ ११ २११ = १३, २२ २१ २ २१ = ११

है चरित्र ही स्थायी धन , कर नव चरित्र निर्माण ||

२ १११ २ २२ ११ = १३, ११ ११ १११ 121 = ११


काम मित्रों शत्रु बलवान , करे सभी का नाश |

२१ 1२ ११ ११२१ = १३, १२ १२ २ २१ = ११

रहे सतर्क इससे हम , शमन से हो प्रयास ||

१२ ११२ ११२ ११ =13 १११ २ २ १२१ =11

मृत्यु समय जो करता , मन में हरी का ध्यान |

२२ १११ २ ११२ , ११ २ १२ २ २१ =११

वह जीवन सफल रहे , जाये सीधे धाम ||

११ २१२ १११ 1२ = १३, २२ २२ २१ =११

सब कला - विद्या में नीति , जब जाये है जोड़ |

११ १२ १२ २ २१ =१३, ११ २२ २ २१ =११


पूर्ण हो जाये हर गुण , स्वार्थ का यही तोड़ ||

२१ २ २२ ११ ११ =१३ २१ २ १२ २१ = ११


आपका,
अवनीश तिवारी
divya naramada का कहना है कि -
दोहा की ध्वज वाहिका अजित जी! आपके लिए विशेष दायित्व का कार्य... प्रिय अवनीश जी की इस कोशिश को सुधारना का तरीका बताइए तथा उस तरीके से इन्हें दोहे के सही रंग में लाइए. मैं जानता हूँ कि आप यह कर सकेंगी. मेरी अनुपस्थिति में कक्षा आपके हवाले... मनु जी! पूर्व सूचना... अगली बार दोहों में सुधार कार्य में आपकी सहायता ली जायेगी...तैयार रहें.
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
Very sensible,indeed!

अजित जी ही ठीक लगें, इस नेकी के हेतु
बाकी के वानर यहाँ, बाँध न सकें सेतु.

शुभ-रात्रि!
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
Very sensible,indeed!

With slight correction:

अजित जी ही ठीक लगें, इस नेकी के हेतु
बाकी के वानर यहाँ, बाँध सकें न सेतु.

शुभ-रात्रि!
अजित गुप्ता का कोना का कहना है कि -
अविनाश जी
मुझे आचार्य जी ने गुरूतर कार्य दे दिया है अभी तो मैं स्‍वयं ही विद्यार्थी हूँ, लेकिन फिर भी प्रयास करती हूँ। आप द्वारा रचित दोह‍ों की मात्राएं इस प्रकार होनी चाहिए, यदि कहीं गल्‍ती हो तो आचार्य जी सुधारेंगे।
रूप - रंग न धन गौरव , आये अंत में काम |
21 11 1 11 211 = 12, 22 21 2 21=12


है चरित्र ही स्थायी धन , कर नव चरित्र निर्माण ||

२ १११ २ २२ ११ = १३, ११ ११ १११ 221 = 12


काम मित्रों शत्रु बलवान , करे सभी का नाश |

२१ 1२ ११ ११२१ = १३, १२ १२ २ २१ = ११

रहे सतर्क इससे हम , शमन से हो प्रयास ||

१२ ११1 ११२ ११ =12 १११ २ २ १२१ =11

मृत्यु समय जो करता , मन में हरी का ध्यान |

1२ १११ २ ११२ , ११ २ १२ २ २१ =११

वह जीवन सफल रहे , जाये सीधे धाम ||

११ २१२ १११ 1२ = १३, २२ २२ २१ =११

सब कला - विद्या में नीति , जब जाये है जोड़ |

११ १२ १२ २ २१ =१३, ११ २२ २ २१ =११


पूर्ण हो जाये हर गुण , स्वार्थ का यही तोड़ ||

२१ २ २२ ११ ११ =१३ २१ २ १२ २१ = ११

साथ ही दो‍हे के द्वितीय और चतुर्थ चरण का अन्तिम अक्षर समान होना चाहिए। पहले दोहे में काम/निर्माण, दूसरे में नाश/प्रयास, तीसरे में ध्‍यान/धाम सही नहीं है जबकि चौथे में जोड़/तोड़ सही है। यदि मात्राएं सही होंगी तो स्‍वत: ही लय भी बनेगी। इसी के साथ दोहे के प्रथम शब्‍द में जगण अर्थात 121 मात्राओं का प्रयोग वर्जित है। आपके लिखने के क्रम से अर्थ में भी बदलाव दिखायी देता है। जैसे आए अन्‍त में काम। फिर भी आपका प्रयास और आपके विचार स्‍वागत योग्‍य हैं, हम भी ऐसे ही सीख रहे हैं, आप भी शीघ्र ही समाधान पा जाएंगे।
divya naramada का कहना है कि -
अजित जी!
आपने बहुत अच्छा कार्य किया है, कसौटी पर खरी उतरीं हैं, आपको बधाई.
संशोधन के कार्य में संकोच न करें. अवनीश जी के दोहों में अभी भी लय-दोष है. आप चाहें तो कुछ शब्द बदल सकती हैं,
अगली गोष्ठी में अब तक के पाठों का संक्षिप्त सार दोहराने की दृष्टि से प्रस्तुत कीजिये ताकि विलंब से आनेवाले छात्र अब तक की पढ़ाई से परिचत हो ले..
अजित गुप्ता का कोना का कहना है कि -
अवनीश जी
आचार्य जी ने मुझे आपके दोहों को सही करने का गृहकार्य दिया है। आपके तीन दोहों को आपकी भावना के अनुरूप लिखने का प्रयास कर रही हूँ, आशा है आचार्य जी इन्‍हें पास कर देंगे।
1 रूप रंग न धन दौलत, आये अंत न काम
बस चरित्र हॅ स्‍थायी धन, बन जाएगा राम।
2 मन में हरि का ध्‍यान धरे, मरण समय जो लोग
जीवन उनका सफल है, स्‍वर्ग लोक का जोग।
3 कला औ विद्या में नीति, का लगता है जोड़
तब सारे गुण पूर्ण हो, यही स्‍वार्थ का तोड़।

दोहा गाथा सनातन : पाठ १३ १८ / २२ अप्रैल २००९

Saturday, April 18, 2009


दोहा गाथा सनातन : पाठ 13 बहुरूपी दोहा अमर


बहुरूपी दोहा अमर, सिन्धु बिंदु में लीन.
सागर गागर में भरे, बांचे कथा प्रवीण.

दोहा मात्रिक छंद है, तेईस विविध प्रकार.
तेरह-ग्यारह दोपदी, चरण समाहित चार.

विषम चरण के अंत में, 'सनर' सुशोभित खूब.
सम चरणान्त 'जतन' रहे, पाठक जाये डूब.

विषम चरण के आदि में, 'जगण' विवर्जित मीत.
दो शब्दों में मान्य है, यह दोहा की रीत.

छप्पय रोला सोरठा, कुंडलिनी चौपाइ.
उल्लाला हरिगीतिका, दोहा के कुनबाइ.

सुख-दुःख दो पद रात-दिन, चरण चतुर्युग चार.
तेरह-ग्यारह विषम-सम, दोहा विधि अनुसार.

द्रोह, मोह, आक्रोश या, योग, भोग, संयोग.
दोहा वह उपचार जो, हरता हर मन-रोग.


दोहा-यात्रा का अगला पड़ाव दोहा के २३ प्रकारों से परिचित होना का है। जो दोहा प्रेमी यात्रा के बीच में कहीं छूट गए वे फिर जुड़ सकते हैं। नए यात्रियों को पिछले पड़ावों की जानकारी ले लेना सुविधाजनक होगा। चलिए आने-जानेवालों के स्थान रखते हुए हम लगातार चलनेवालों को कुछ नया बताते रहें ताकि उनका रस-भंग न हो।

दोहा के २३ प्रकार लघु-गुरु मात्राओं के संयोजन पर निर्भर हैं। सम चरण में ११-११, विषम चरण में १३-१३ तथा दो पदों में २४-२४ मात्राओं के बंधन को मानते हुए २३ प्रकार के दोहे होना पिंगालाचार्यों की अद्‍भुत कल्पना शक्ति तथा गणितीय मेधा का जीवंत प्रमाण है. विश्व की किसी अन्य भाषा के पास ऐसी सम्पदा नहीं है।
छंद गगन के सूर्या दोहा की रचना के मानक समय-समय पर बदलते गए, भाषा का रूप, शब्द-भंडार, शब्द-ध्वनियाँ जुड़ते-घटते रहने के बाद भी दोहा प्रासंगिक रहा उसी तरह जैसे पाकशाला में पानी। दोहा की सरलता-तरलता ही उसकी प्राणशक्ति है. दोहा की संजीवनी पाकर अन्य छंद भी प्राणवंत हो जाते हैं। इसलिये दोहा का उपयोग अन्य छंदों के बीच में रस परिवर्तन, भाव परिवर्तन या प्रसंग परिवर्तन के लिए किया जाता रहा है। कबीर और तुलसी ने दोहा में शब्दों को उनके प्रचलित असमान्य अर्थों से हटकर भिन्नार्थों में सफलतापूर्वक प्रयोग किया है पर वह फिर कभी, अभी तो प्रकारों की बात करें। निम्न सारणी देखिये-
क्रमांक नाम गुरु लघु कुल कलाएं कुल मात्राएँ

- - २४ ० २४ ४८

- - २३ २ २५ ४८

१. भ्रामर २२ ४ २६ ४८

२. सुभ्रामर २१ ६ २७ ४८
३. शरभ २० ८ २८ ४८
४. श्येन १९ १० २९ ४८
५. मंडूक १८ १२ ३० ४८
६. मर्कट १७ १४ ३१ ४८
७. करभ १६ १६ ३२ ४८
८. नर १५ १८ ३३ ४८
९. हंस १४ २० ३४ ४८
१०. गयंद १३ २२ ३५ ४८
११. पयोधर १२ २४ ३६ ४८
१२. बल ११ २६ ३८ ४८
१३. पान १० २८ ३८ ४८
१४. त्रिकल ९ ३० ३९ ४८
१५. कच्छप ८ ३२ ४० ४८
१६. मच्छ ७ ३४ ४२ ४८
१७. शार्दूल ६ ३६ ४४ ४८
१८. अहिवर ५ ३८ ४३ ४८
१९. व्याल ४ ४० ४४ ४८
२०. विडाल ३ ४२ ४५ ४८
२१. श्वान २ ४४ ४६ ४८
२२. उदर १ ४६ ४७ ४८
२३. सर्प ० ४८ ४८ ४८

इस लम्बी सूची को देखकर घबराइये मत। यह देखिये कि आचार्यों ने कसी गणितज्ञ की तरन समस्त संभावनायें तलाश कर दोहे के २३ प्रकार बताये। दोहे के दो पदों में २४ गुरु होने पर लघु के लिए स्थान ही नहीं बचता। सम चरणों के अंत में लघु हुए बिना दोहा नहीं कहा जा सकता।
२३ गुरु होने पर हर पद में केवल एक लघु होगा जो सम चरण में रहेगा। तब विषम चरण में लघु मात्र न होने से दोहा कहना संभव न होगा। आप ने जो दोहे कहे हैं या जो दोहे आपको याद हैं वे इनमें से किस प्रकार के हैं, रूचि हो तो देख सकते हैं। क्या आप इन २३ प्रकारों के दोहे कह सकते हैं? कोशिश करें...कठिन लगे तो न करें...मन की मौज में दोहे कहते जाएँ...धीरे-धीरे अपने आप ही ये दोहे आपको माध्यम बनाकर बिना बताये, बिना पूछे आपकी कलम से उतर आयेंगे। क्या आप इन दोहों से मिलाना चाहते हैं? यदि हाँ तो झटपट दो-दो दोहे लिख लाइए और उनके प्रकार भी बताइये। हम चटपट सभी २३ प्रकार के दोहों से आपकी भेंट कराएँगे।
बिदा होने के पूर्व दोहा का एक और किस्सा सुन लीजिये।

साखी से सिख्खी हुआ...

कबीर ने दोहा को शिक्षा देने का अचूक अस्त्र बना लिया. शिक्षा सम्बन्धी दोहे साखी कहलाये. गुरु नानकदेव ने दोहे को अपने रंग में रंग कर माया में भरमाई दुनिया को मायापति से मिलाने का साधन बना दिया. साखी से सिख्खी हुए दोहे की छटा देखिये।

पहले मरण कुबूल कर, जीवन दी छंड आस.
हो सबनां दी रेनकां, आओ हमरे पास..
सोचै सोच न होवई, जे सोची लखवार.
चुप्पै चुप्प न होवई, जे लाई लिवतार..
इक दू जीभौ लख होहि, लाख होवहि लख वीस.
लखु लखु गेडा आखिअहि, एकु नामु जगदीस..


आप में से जो भी इन सिख्खियों को खडी बोली के दोहे में कहेगा उसे उपहार में दोहा मिलेगा। तब तक के लिए नमन..

7 कविताप्रेमियों का कहना है :

रश्मि प्रभा... का कहना है कि -
द्रोह, मोह, आक्रोश या, योग, भोग, संयोग.
दोहा वह उपचार जो, हरता हर मन-रोग.
.........
waah
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
आचार्य जी,
प्रणाम
आज मैंने लपक कर बहुत ही उत्सुकता से इस बार आपकी दोहो के रूपों की सूची देखी और सांस थम गयी कुछ देर के लिये. डर लगने लगा और असहाय समझने लगी अपने आप को.
दोहों में इतनी varieties! इस बार जरूर सबके दिमाग का कचूमर निकल जायेगा या फिर हम सब इधर-उधर ताकने लगेंगे. अपुन तो कुछ शब्दों का अर्थ ही नहीं समझ रहे हैं तो फिर इन सीखों को खड़ी बोली में कैसे लिख पाऊंगी. जैसे कि:
सवनं, रेनका, लखवार,लिवतार, जीभौ, लखु-लखु, गेडा और आखिआई.
इनका अर्थ जानना जरूरी है मेरे लिये. वर्ना मैं असमर्थ महसूस कर रही हूँ.
manu का कहना है कि -
शन्नो जी की ही तरह हमारी भी हालत हो गयीई है,,,
पहले इन्हें समझना ,,,,फिर खड़े बोली के शब्द ढूँढने दोनों ही काम मुश्किल हैं.....
नीलम जी कर सकती हैं,,,
उन्हें कई तरह की बोलियों में लिखते देखा है,,,इस मामले में उस्ताद हैं वे ,,,,,
पर उनसे शायद दोहा ना लिखा जाए
SURINDER RATTI का कहना है कि -
संजीव जी, नमस्कार
धन्यवाद आपका आपने इतनी महत्वपूर्ण जानकारी दी दोहों के बारे में. ,
सुरिन्दर रत्ती
अजित गुप्ता का कोना का कहना है कि -
achrya ji
i am in bhopal till 22nd. after reaching udaipur i will do homework.
Pooja Anil का कहना है कि -
आचार्य जी ,

दो दोहे लिख रही हूँ, दोहे के २३ प्रकार तो देख लिए किन्तु समझ नहीं आया कि इनका वर्गीकरण किस आधार पर किया गया है? इस लिए इन दोहों का प्रकार नहीं बता सकती... :(

१) दोहा सत्य के करीब है, छिपा ह्रदय में सत्य
मिथ्या जग संसार यह , अजब कराये नृत्य .
२) देख ता-थैया जग की, फिर भी समझ ना आई,
लालच की लौ ना बुझे, हो चाहे रुसवाई.

आपके दिये हुए दोहों को खड़ी बोली में लिखने की कोशिश की है.....

एक जीभ से लाख बनें , लाख से लाख बीस,
उन लाखों से उच्चारिये , एक नाम जगदीस.

सोचा सत्य नहीं होता , जो सोचो लाखों बार,
शान्ति नहीं देती चुप्पी, चाहे हो समाहार .
(समाहार - एकाग्रता )

तीसरे को अनुवादित नहीं कर पाई....
पूजा अनिल
divya naramada का कहना है कि -
दोहा के उक्त वर्णित प्रकारों में टंकण त्रुटि का संशोधन निम्न है-
१२. बल ११ - २६ - ३७ - ४८
१६. मच्छ ७ - ३४ - ४१ - ४८
१७. शार्दूल ६ - ३६ - ४२ - ४८

दोहा गाथा सनातन: पाठ १२ (११ नहीं है) ११ / १५ .४.२००९

Saturday, April 11, 2009

दोहा गाथा सनातन: पाठ 12 दोहा उल्टे सोरठा


दोहा दरबार में आज उपस्थित है उसका सहोदर सोरठा।

दोहा और सोरठा:

दोहा की अधिकांश विशेषताएँ उसके भाई में हों और कुछ भिन्नता भी हो, यह स्वाभाविक है. दोहा की तरह सोरठा भी अर्ध सम मात्रिक छंद है. इसमें भी चार चरण होते हैं. प्रथम व तृतीय चरण विषम तथा द्वितीय व चतुर्थ चरण सम कहे जाते हैं. सोरठा में दोहा की तरह दो पद (पंक्तियाँ) होती हैं. प्रत्येक पद में २४ मात्राएँ होती हैं.

दोहा और सोरठा में मुख्य अंतर गति तथा यति में है. दोहा में १३-११ पर यति होती है जबकि सोरठा में ११ - १३ पर यति होती है. यति में अंतर के कारण गति में भिन्नता होगी ही.

दोहा के सम चरणों में गुरु-लघु पदांत होता है, सोरठा में यह पदांत बंधन विषम चरण में होता है. दोहा में विषम चरण के आरम्भ में 'जगण' वर्जित होता है जबकि सोरठा में सम चरणों में. इसलिए कहा जाता है-

दोहा उल्टे सोरठा, बन जाता - रच मीत.
दोनों मिलकर बनाते, काव्य-सृजन की रीत.


रोला और सोरठा

सोरठा में दो पद, चार चरण, प्रत्येक पद-भार २४ मात्रा तथा ११ - १३ पर यति रोला की ही तरह होती है किन्तु रोला में विषम चरणों में लघु - गुरु चरणान्त बंधन नहीं होता जबकि सोरठा में होता है.

सोरठा तथा रोला में दूसरा अंतर पदान्ता का है. रोला के पदांत या सम चरणान्त में दो गुरु होते हैं जबकि सोरठा में ऐसा होना अनिवार्य नहीं है.

सोरठा विश्मान्त्य छंद है, रोला नहीं अर्थात सोरठा में पहले - तीसरे चरण के अंत में तुक साम्य अनिवार्य है, रोला में नहीं.

इन तीनों छंदों के साथ गीति काव्य सलिला में अवगाहन का सुख अपूर्व है.

दोहा के पहले-दूसरे और तीसरे-चौथे चरणों का स्थान परस्पर बदल दें अर्थात दूसरे को पहले की जगह तथा पहले को दूसरे की जगह रखें. इसी तरह चौथे को तीसरे की जाह तथा तीसरे को चौथे की जगह रखें तो रोला बन जायेगा. सोरठा में इसके विपरीत करें तो दोहा बन जायेगा. दोहा और सोरठा के रूप परिवर्तन से अर्थ बाधित न हो यह अवश्य ध्यान रखें

दोहा: काल ग्रन्थ का पृष्ठ नव, दे सुख-यश-उत्कर्ष.
करनी के हस्ताक्षर, अंकित करें सहर्ष.

सोरठा- दे सुख-यश-उत्कर्ष, काल-ग्रन्थ का पृष्ठ नव.
अंकित करे सहर्ष, करनी के हस्ताक्षर.

सोरठा- जो काबिल फनकार, जो अच्छे इन्सान.
है उनकी दरकार, ऊपरवाले तुझे क्यों?

दोहा- जो अच्छे इन्सान है, जो काबिल फनकार.
ऊपरवाले तुझे क्यों, है उनकी दरकार?

दोहा तथा रोला के योग से कुण्डलिनी या कुण्डली छंद बनता है.

दोहा कक्षा-नायिका, सहित शेष सब छात्र.
छंद-सलिल-अवगाह लें पुलकित हो मन-गात्र


*********************************************
सीमा सचदेव- मुझे एक बात जानने की बडी उत्सुकता है और आपने भी कहा है न कि कुण्डली की पाँचवीं पंक्ति मे कवि का नाम लिखने का नियम है , अगर नाम नही लिखा जाता है तो क्या वह नियम का उल्लंघन होगा ?
दूसरी बात कि जैसे एक दोहा और रोला कुण्डली मे आता है और दोहे के अंतिम चरण की दोहराई ( का दोहराव) रोला के प्रथम चरण मे होती है तो एक प्रवाह बनता है या कहें कि कुण्डली बनती है |
आपने रोला का उदाहरण देकर बताया कि इसके ऊपर दोहा लगा दें तो कुण्डली बन आएगी जैसे:-

नीलाम्बर परिधान हरित पट पर सुन्दर है.
सूर्य-चन्द्र युग-मुकुट, मेखला- रत्नाकर है.
नदियाँ प्रेम-प्रवाह, फूल-तारे मंडल हैं
बंदी जन खग-वृन्द शेष फन सिहासन है.

ऊपरोक्त पंक्तियों का अपना अर्थ है ,इसमे कवि का नाम भी नही है और दोहा भी लगाएं तो कैसे ? मतलब भाव और शब्दों में बंधकर कि उसका अंतिम चरण "नीलाम्बर परिधान " पर ही खत्म हो |
मुझे इतना जानने की उत्सुक्ता है कि अगर रोला की शुरुआत दोहा के अंतिम चरण से नहीं होती तो क्या वह भी नियम का उलंघन होगा |

सीमा जी! कुण्डली की पांचवी पंक्ति के प्रथमार्ध में कुण्डली सम्राट गिरिधर ने 'कह गिरिधर कविराय' के रूप में कुण्डलीकार का नाम बहुधा दिया है. उनके पूर्ववर्ती और पश्चात्वर्ती कुण्डलीकारों ने प्रायः इसी के अनुकूल कुण्डली रचीं किन्तु अपवाद तब भी थे और अब तो बहुत हैं. अतः, इस नियम को कुण्डलीकार की सुविधानुसार प्रयोग किया जाता रहा है. कई जगह नाम छोड़ ही दिया गया है तथा कई जगह अन्य स्थान पर भी रखा गया है. नाम होने या न होने से कुण्डली के कथ्य और शिल्प की गुणवत्ता पर कोइ प्रभाव नहीं पड़ता, रचनाकार के नाम की सूचना मात्र मिलाती है, इसलिए इसे अपरिहार्य नहीं मानना चाहिए, ऐसा मेरा मत है. कथ्य कहने पर छंद पूर्ण हो जाये तो नाम को ठूँसने से असौंदर्य होगा, यदि बात कहने पर स्थान शेष रह जाये तो अनावश्यक सयोजक शब्दों के स्थान पर नाम का प्रयोग उपयुक्त होगा.

दोहा के अंतिम या चतुर्थ चरण का रोला के प्रथम चरण के रूप में होना पिंगल-ग्रंथों में अनिवार्य बताया गया है. काका हाथरसी जैसे समर्थ कवि ने भी कहीं-कहीं इस नियम की अनदेखी की है किन्तु यह नियम कुण्डली के शिल्प का अभिन्न अंग है इसलिए इसकी अनदेखी करने पर कुण्डली अशुद्ध ही कही जायेगी. अर्धाली का दोहराव ही दोहा और रोला के बीच सम्पर्क-सेतु होता है, अन्यथा स्वतंत्र दोहा - रोला और कुण्डली में दोहा - रोला में कोई अंतर या पहचान शेष नहीं रहेगी.

किसी एक छंद को अन्य छंद में परिवर्तित करने में दोनों छंदों पर अधिकार होना जरूरी है, अन्यथा दोनों छंद अशुद्ध हो सकते हैं. रोला को कुण्डली में बदलते समय सभी नियमों का अनुपालन करना होगा. यथा- रोला का प्रथम चरण दोहा का अंतिम चरण हो. रोला में प्रयुक्त अंतिम चरण, चरणांश या शब्द से दोहा प्रारंभ हो. रोला के भाव तथा कथ्य के पहले उपयुक्त प्रतीत होनेवाली भावभूमि दोहा की हो ताकि दोहा के बाद रोला की संगति बैठ सके तथा वह एक रचना प्रतीत हो.

उक्त सन्दर्भ में रोला के साथ दोहा जोड़कर कुण्डली रचने का एक प्रयास देखिये-

सिंहासन है शेष फन, करें दिशायें गान.
विजन डुलता है पवन, नीलाम्बर परिधान
नीलाम्बर परिधान हरित पट पर सुन्दर है.
सूर्य-चन्द्र युग-मुकुट, मेखला- रत्नाकर है.
नदियाँ प्रेम-प्रवाह, फूल-तारे मंडल हैं
बंदी जन खग-वृन्द शेष फन सिहासन है.

डॉ. अजित गुप्ता...

रोला को लें जान, छंद यह- छंद-प्रभाकर.
करिए हँसकर गान, छंद दोहा- गुण-आगर.
करें आरती काव्य-देवता की- हिल-मिलकर.
माँ सरस्वती हँसें, सीखिए छंद हुलसकर.

आचार्य जी
इनमें अन्तिम चरण में दीर्घ मात्रा कहाँ है? कृपया स्‍पष्‍ट करें।

अजित जी! आपका विशेष आभार कि आप पाठ का गंभीरता से अध्ययन कर रही हैं, तभी आपने यह बिंदु उठाया है...पिंगल की पुस्तकों में रोला के पदांत में दीर्घ मात्रा-बंधन का प्रावधान है तथा अधिकांश रोला छंदों में इसका पालन भी हुआ है किन्तु कहीं-कहीं नहीं भी हुआ है एक उदाहरण देखिये-

माहि-वाभिन उर भरति, भूरि आनंद नाद-नारे.
दुःख दरिद्र द्रुम डरती, विदारती कलुष करारे.
वसुधहि देत सुहाग, मांग मोती सौं पूरति .
भरति गोद आमोद, करति वन मोहन मूरति.

उठो, उठो हे वीर! आज तुम निद्रा त्यागो.
करो महासंग्राम नहीं कायर हो भागो.
तुम्हें वरेगी विजय, अरे यह निश्चय जानो.
भारत के दिन लौट आयेंगे मेरी मानो. .

मैंने एक तथ्य और देखा है कि पदांत में जहाँ दीर्घ नहीं है, वहाँ दो लघु हैं जिनकी मात्रा दीर्घ के बराबर होती है किन्तु एक दीर्घ के स्थान पर दो लघु रखे जा सकते हैं ऐसा स्पष्ट मेरे देखने में नहीं आया।

इस कक्षा को विराम देने के पहले गृह-कार्य: अब तक हुई चर्चा को दोबारा पढ़कर दोहा, सोरठा, रोला तथा कुण्डली हर छात्र रचे। तभी उनसे जुड़ी अन्य विशेषताओं की चर्चा हो सकेगी।

18 कविताप्रेमियों का कहना है :

अजित गुप्ता का कोना का कहना है कि -
चहल-पहल अब हो रही, देखो घर में खूब
प्‍यारी बिटिया गोद में, भाग गयी है ऊब
भाग गयी है ऊब, न आती मन में सुस्‍ती
घोड़े जैसी दौड़, देख नानी की मस्‍ती
कह अजित कैसे दिन, अब रात भइ है सस्‍ती
बाँह बनी है झूला, लोरी सुन चियाँ हँसती।

आचार्य जी
एक प्रयास किया है, कुछ त्रुटियां भी होंगी ही। लेकिन होम वर्क तो करना ही था।
अजित गुप्ता का कोना का कहना है कि -
आचार्य जी
क्‍या यह सोरठा सही है -
देखो घर में खूब, चहल-पहल अब हो रही
भाग गयी है ऊब, प्‍यारी बिटिया गोद में।
अजित गुप्ता का कोना का कहना है कि -
आचार्य जी
दोहे और रोला के योग से कुण्‍डली बनती है और कुण्‍डली में दोहे के प्रथम शब्‍द अन्‍त में आते हैं इस नियम का पालन मैंने नहीं किया अत: अब परिस्‍कृत कुण्‍डली प्रस्‍तुत है -
हो रही है चहल-पहल, देखो घर में खूब
प्‍यारी बिटिया गोद में, भाग गयी है ऊब
भाग गयी है ऊब, न आती मन में सुस्‍ती
घोड़े जैसी दौड़, देख नानी की मस्‍ती
कह अजित कैसे दिन, रातें सस्‍ती हो रहीं
यह रहे न गोद बिन, बात हँसी की हो रही।
अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -
इन सब जानकारियों के लिए धन्यवाद |


अवनीश तिवारी
Pooja Anil का कहना है कि -
प्रणाम आचार्य जी ,

दोहे के परिवार के साथ परिचय कराने के लिए आपका आभार .

एक कुंडली लिखने की कोशिश की है, कृपया देखियेगा.

रचना रोला भूमिका, दोहे के संग साथ ,
बना रहे हैं कुण्डलिनी, लिये हाथ में हाथ ,
लिये हाथ में हाथ , ज्यों सूरज चंदा तारे,
जग उजियारा करें, मन उत्साह भरें सारे,
गति जानकर पूजा , हमराही इनको बना ,
मिला कदम से कदम , रोला भूमिका रचना .

पुनः धन्यवाद.
पूजा अनिल
manu का कहना है कि -
puja ji,
aapkaa sortha achchha lagaa,,,
do. ajit ji,
aapki shabdon ne ek pyaraa sa maasoom natkhat chitra kheench diyaa hai...
aap dono ko badhaai...

aur aachaarya sahit sabhi ko vaishaakhi ki badhaaiyaan,,,
Anonymous का कहना है कि -
sortha mai .last mai sambodhan ka koi niyam hai kya...sortha mai khud ka nam use kiya ja sakta hai kya...pranam sahit...

gajab machi ghanghor, abhe chamaki beejlyan,
nachya hivade mor, marudhar bhije chhailsa...

Wednesday, April 15, 2009

गोष्ठी 12 - दोहा दे शुभकामना


दोहा दे शुभकामना, रहिये सदा प्रसन्न.
कीर्ति सफलता लाई है, बैसाखी आसन्न.

आभारी हैं हम सभी, हुए उपस्थित श्याम.
शोभा कक्षा की बड़ी, है सुझाव अभिराम.

छंदत्रयी से दिल लगा, जिसका वह है धन्य.
ध्वज फहरातीं अजित जी, प्रतिभापुंज अनन्य.


अजित जी! 'दयी' का उपयोग करना अपरिहार्य तो नहीं है...शेष सही, बधाई. कुंडली लेखन का अच्छा प्रयास... लय क्रमशः सधेगी. सोरठा है तो सही पर अजित जैसी प्रतिभावान रचनाकार के प्रयास में कथ्य का दोहराव क्यों? आपके पास तो विषयों और शब्दों का भंडार है.

विदुषी कक्षा-नायिका, शन्नो जिसका नाम.
उत्साहित सबको करें, करें निरंतर काम.


शन्नो जी! दोहा बिलकुल सही है...शत-प्रतिशत अंक. 'मनन चिंतन जतन करके' मात्रा १४, लय भंग...मनु जी का संशोधन सही... किन्तु तीसरी पंक्ति का उत्तरार्ध आपका सही है...कुल मिलकर आप और मनु जी बहुत शीघ्रता न कर एक बार दोहरा लें तो छंद की त्रुटियां समाप्त हो जायेंगी.

पूजा-मनु भी छंद को, रहे निरंतर साध.
कोशिश जारी रखें तो, पायें कीर्ति अबाध.

तपन न मात्रा से डरें, लय का रखिये ध्यान.
छंद स्वयं सध जायेगा, करें निरंतर गान.

शोभा सीमा दिवाकर, रश्मि निखिल देवेन्द्र.
संगीता साहिल तपन, तनहा औ' भूपेन्द्र.
तनहा औ' भूपेंद्र, रंजना अरुण न दिखते.
किसलय विनय सुलभ शैलेश अर्श क्यों छिपते?
मानोशी अवनीश सहर हरिहर-मन को भा.
आजायें रविकांत सुनीता को ले शोभा.


दोहा, सोरठा, रोला और कुण्डली के अभ्यास के इन पलों में अनुपस्थित सहभागी उपस्थित होकर साथ चलें तो आनंद शतगुना बढ़ जायेगा... आगामी कक्षा से दोहा के २३ प्रकारों की चर्चा के साथ-साथ दोहा के वैशिष्ट्य और योगदान पर बातें होंगी. आप उक्त चरों छंदों में स्वरचित या आपको पसंद रचनाएं लाइए ताकि हम सभी उनका आनंद ले सकें.

गोष्ठी के समापन से पूर्व एक रोचक प्रसंग

एक बार सद्‍गुरु रामानंद के शिष्य कबीर दास सत्संग की चाह में अपने ज्येष्ठ गुरुभाई रैदास के पास पहुंचे. रैदास अपनी कुटिया के बहार पेड़ की छाँह में चमडा पका रहे थे. उनहोंने कबीर के लिए निकट ही पीढा बिछा दिया और चमडा पकाने का कार्य करते-करते बातचीत प्रारंभ कर दी. कुछ देर बाद कबीर को प्यास लगी. उनहोंने रैदास से पानी माँगा. रैदास उठकर जाते तो चमडा खराब हो जाता, न जाते तो कबीर प्यासे रह जाते...उन्होंने आव देखा न ताव समीप रखा लोटा उठाया और चमड़ा पकाने की हंडी में भरे पानी में डुबाया, भरा और पीने के लिए कबीर को दे दिया. कबीर यह देखकर भौंचक्के रह गए किन्तु रैदास के प्रति आदर और संकोच के कारण कुछ कह नहीं सके. उन्हें चमड़े का पनी पीने में हिचक हुई, न पीते तो रैदास के नाराज होने का भय... कबीर ने हाथों की अंजुरी बनाकर होठों के नीचे न लगाकर ठुड्डी के नीचे लगाली तथा पानी को मुँह में न जाने दिया. पानी अंगरखे की बांह में समा गया, बांह लाल हो गयी. कुछ देर बाद रैदास से बिदा लेके कबीर घर वापिस लौट गए और अंगरखे को उतारकर अपनी पत्नी लोई को दे दिया. लोई भोजन पकाने में व्यस्त थी, उसने अपनी पुत्री कमाली को वह अंगरखा धोने के लिए कहा. अंगरखा दोहे समय कमाली ने देख की उसकी बाँह लाल थी... उसने देख की लाल रंग छूट नहीं रहा तो उसने मुँह से चूस-चूस कर सारा लाल रंग निकाल दिया...इससे उसका गला लाल हो गया. कुछ दिनों बाद कमाली मायके से बिदा होकर अपनी ससुराल चली गयी.

कुछ दिनों के बाद गुरु रामानंद तथा कबीर का काबुल-पेशावर जाने का कार्यकरण बना. दोनों परा विद्या (उड़ने की कला) में निष्णात थे. मार्ग में कबीर-पुत्री कमाली की ससुराल थी. कबीर के अनुरोध पर गुरु ने कमाली के घर रुकने की सहमति दे दी. वे जब कमाली के घर पहुंचे तो उन्हें घर के आगन में दो खाटों पर स्वच्छ गद्दे-तकिये तथा दो बाजोट-गद्दी लगे मिले. समीप ही हाथ-मुंह धोने के लिए बाल्टी में ताज़ा-ठंडा पानी रखा था. यही नहीं उनहोंने कमाली को हाथ में लोटा लिए हाथ-मुंह धुलाने के लिए तत्पर पाया. कबीर यह देखकर अचंभित रह गए की हाथ-मुंह धुलाने के तुंरत बाद कमाली गरमागरम खाना परोसकर ले आयी.

भोजन कर गुरु आराम फरमाने लगे तो मौका देखकर कबीर ने कमाली अब पूछ की उसे कैसे पता चला कि वे दोनों आने वाले हैं? वह बिना किसी सूचना के उनके स्वागत के लिए तैयार कैसे थी? कमाली ने बताया कि रंगा लगा कुरता चूस-चूसकर साफ़ करने के बाद अब उसे भावी घटनाओं का आभास हो जाता है. तब कबीर समझ सके कि उस दिन गुरुभाई रैदास उन्हें कितनी बड़ी सिद्धि बिना बताये दे रहे थे तथा वे नादानी में वंचित रह गए.

कमाली के घर अब वापिस लौटने के कुछ दिन बाद कबीर पुनः रैदास के पास गए...प्यास लगी तो पानी माँगा...इस बार रैदास ने कुटिया में जाकर स्वच्छ लोटे में पानी लाके दिया तो कबीर बोल पड़े कि पानी तो यहाँ कूदी में ही भरा था, वही दे देते. तब रैदास ने एक दोहा कहा-

जब पाया पीया नहीं, था मन में अभिमान.
अब पछताए होत क्या नीर गया मुल्तान.


कबीर ने इस घटना अब सबक सीखकर अपने अहम् को तिलांजलि दे दी तथा मन में अन्तर्निहित प्रेम-कस्तूरी की गंध पाकर ढाई आखर की दुनिया में मस्त हो गए और दोहा को साखी का रूप देकर भव-मुक्ति की राह बताई -

कस्तूरी कुंडल बसै, मृग ढूंढें बन मांहि.
ऐसे घट-घट राम है, दुनिया देखे नांहि.

26 कविताप्रेमियों का कहना है :

अजित गुप्ता का कोना का कहना है कि -
आचार्य जी
नमन। मैंने उदाहरण के रूप में दोहे का उल्‍टा सोरठा लिखा था, अब आपका सान्न्ध्यि मिला है तो नवीन भी लिखना आ ही जाएगा। एक कुण्‍डली लिखी है कृपया देखें -
लोकतन्‍त्र की गूँज है, लोक मिले ना खोज
राजतन्‍त्र ही रह गया, वोट बिके हैं रोज
वोट बिके हैं रोज, देश की चिन्‍ता किसको
भाषण पढ़ते आज, बोलते नेता इनको
हाथ हिलाते देख, यह मनसा राजतंत्र की
लोक कहाँ है सोच, हार है लोकतन्‍त्र की।
Abhishek tamrakar का कहना है कि -
सभी वरिष्ठ जानो को प्रणाम ,
दोहे और उसके भाई सोरठा के बारे में पढ़कर बहुत कुछ सीखने को मिला | आपके चरणों में अपने लिखे 2 दोहे पेश कर रहा हूँ ..

मैं अपने को जप रहा चादर से निकले पॉंव |
अभिमानी जन के होवे नहीं कोई नाम और गाँव ||

झूठ झूठ में जग रमा सांचा न दिखया कोई |
सच जो बोलन मैं चला सब जग बैरी होई ||
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
आचार्य जी, प्रणाम
दोहे लिखने का कोई भी ज्ञान न होने पर भी लिखने में क्यों रूचि हो गयी मुझे अब तक समझ नहीं पायी हूँ अपने को. अनेकों त्रुटियों को आपने ठीक किया है, और मेरा हौसला भी बढ़ाते रहे कभी प्रोत्साहन देकर तो कभी प्रशंशा कर के जिसके काबिल मैं हूँ कि नहीं, सोचकर संकोच लगता है. लेकिन मन को बहुत अच्छा लगा और तभी मैं साहस करती रही हर बार कुछ लिखने का. यह आपकी महानता है कि आपके शब्द मुझे प्रेरणा देते रहे और तभी मैं कुछ न कुछ लिखने का प्रयास करती रही और आपकी सलाह पाकर मैं सम्मानित हुई. इस विषय में आरम्भ में डर सा लगा क्योंकि कोई नियम नहीं पता थे. अब भी किसी नयी चीज़ को पढ़कर वही डर सताने लगता है लेकिन थोड़ा सा आत्मविश्वास आ जाता है कुछ जानकर तो फिर मन में उमंग आ जाती है. अजीब सा हाल है मेरा. पर फिर भी मैदान में डटी हुई हूँ. आज एक कुंडली लिखी है और इस पर भी आपके बिचार जानना बहुत आवश्यक है.

जहाँ हों गुरु के चरन, चंदन बनती धूल
पाकर चरनो में सरन, मिले शांति का कूल
मिले शांति का कूल, सफल उसका जीवन हो
किंचित करे न सोच, तभी मन भी पावन हो
मिले सीख की लीक, मान 'शन्नो' का कहना
भूल-भाल अभिमान, दया का पहनो गहना.

आपकी विनीत शिष्या ~
शन्नो
manu का कहना है कि -
क्या बात है,
आज तो आचार्य ने सारे के सारे लापता विद्यार्थियों की हाजिरी तलब की है,,,

अब तो कक्षा नायिका , के भी पकडे कान

फुटक रहे हैं छात्र सब , देती क्यूं ना ध्यान

:::::)))
divya naramada का कहना है कि -
अभिनंदन है अजित जी!, रची कुण्डली खूब।

लोकतंत्र की नाव सच, लगता जाए न डूब।।

लगता जाए न डूब, बचाता हरदम विधना

शायद ऐसे ही पूरा हो अपना सपना।

रहें अजित यह देश 'सलिल' करता है वन्दन।

रची कुण्डली खूब अजित जी है अभिनन्दन ।

अभिषेक जी! दोहा-दरबार में आपका हार्दिक स्वागत। दावेदारी को मजबूत करने के लिए पिछले पाठ समझ लीजिये। आपका प्रयास अच्छा है पर इसे बहुत अच्छा बनने के लिए कुछ परिवर्तन करें। एक उदाहरण देखें-

मैं अपने को जप रहा चादर से निकले पॉंव | चरण २ -लय दोष।

अभिमानी जन के होवे नहीं कोई नाम और गाँव || चरण ३-४ मात्राधिक्य।

मैं अपने को जप रहा, चादर-बाहर पाँव।

अभिमानी जन का नहीं, कहीं नाम या गाँव।

झूठ झूठ में जग रमा सांचा न दिखया कोई |

सच जो बोलन मैं चला सब जग बैरी होई ||

मित्र यह भाषा सदियों पहले की लगती है, आजकल होई, बोलन, दिखया जैसे प्रयोग अशुद्धि कहे जाते हैं, इनसे बचना बेहतर है। दोहा के पदांत में दीर्घ मात्रा वर्जित है।

झूठ-झूठ में जग रमा इसका आशय यह हुआ की वह झूठ जो झूठा है अर्थात सत्य...अंगरेजी में भी दो नेगेटिव मिलकर अफर्मेटिव होते हैं... जबकि आपका आशय यह नहीं है। अतः, झूठ का दो बार प्रयोग यहाँ न करें। इन दोहों को दुबारा लिखें. आपमें क्षमता है...सफलता हेतु शुभकामना...
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
आचार्य जी,
आप नाराज़ नहीं होंगें ऐसी आशा करती हूँ क्योंकि कल एक कुंडली लिख कर भेजी थी, उसमे कुछ गड़बडी हो गयी है. उसे सुधारकर भेज रही हूँ. वह पहले वाली भूल जाइये. गलती करने की क्षमा मांगती हूँ. इसके बारे में भी पक्का नहीं कह सकती कि ठीक लिखी है कि नहीं. फिर भी प्रस्तुत है:

जहाँ पड़ते गुरु-चरन, चंदन बनती धूल
पाकर चरनों में सरन, मिले शांति का कूल
मिले शांति का कूल, सफल उसका जीवन हो
किंचित करे न सोच, साथ में मन पावन हो
मिले सीख की लीक, कहे बात 'शन्नो' यहाँ
मन को अपने लगा, सच्चा नेह मिले जहाँ.
divya naramada का कहना है कि -
शन्नो जी!

कुण्डली की संसद में दमदारी से प्रवेश मरने के लिए बधाई. 'जहाँ पड़ते गुरु-चरन' मात्रा१२, १३ चाहिए, 'जहाँ पड़ें गुरु के चरण' करने में आपत्ति न हो तो मात्रा १३ होंगी, अर्थ भी नहीं बदलेगा. शेष कुण्डली सही है.

'जहाँ पड़ें गुरु के चरण, चंदन बनती धूल
पाकर चरणों में शरण, मिले शांति का कूल
मिले शांति का कूल, सफल उसका जीवन हो
किंचित करे न सोच, साथ में मन पावन हो
मिले सीख की लीक, कहे बात 'शन्नो' यहाँ
मन को अपने लगा, सच्चा नेह मिले जहाँ.
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
आचार्य जी,
आपका बहुत धन्यबाद कि आपने मेरी लिखी कुंडली को पढ़ा और उसे सही किया. लेकिन जो दोहा का प्रथम चरण जिसे आपने सही किया है वहाँ मैंने भी बिलकुल यही शब्द लिखे थे आप विश्वाश कीजिये. पर मुझे लगा उसमें १४ मात्राएँ हैं. इसीलिये मैंने बदलाव किया. आप कृपा करके explain करें कि मैं कहाँ पर मात्रा में धोखा खा गयी.
जहाँ पड़ें गुरु के चरण
१ २ १ २ १ २ २ १ १ १ = १४
अब आप बताइये कि गुरु में रु में एक मात्रा है या दो? मैंने दो count करीं थीं.
divya naramada का कहना है कि -
पूजा जी!
कुण्डलीकार के रूप में आपको बधाई...मुझे निम्न रूप अधिक भाया,शेष आप देख लें

रचना रोला भूमिका, दोहे के संग साथ ,
बना रहे हैं कुण्डलिनी, लिये हाथ में हाथ ,
लिये हाथ में हाथ, सूर्य चंदा नभ तारे,
जग उजियारा करें, उल्लसित मन हों सारे,
पूजा गति-यति जानकर, हमराही इनको बना ,
मिला कदम से कदम, भूमिका रोला रचना .
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
मनु जी,
मेरे तो कान खिंच गए आपके दोहे में लेकिन आप कहाँ फुदक रहें हैं? पहेली की कक्षा में मिलते हैं फिर जल्दी ही.
divya naramada का कहना है कि -
शन्नो जी!

वन्दे मातरम.

'गुरु' में १+१ =२ मात्राएँ है. 'गुरू' १ + २ + ३ का आशय गुरु घंटालों से है. शिक्षक का समानार्थी गुरु का 'रु' लघु है. व्यंगार्थ में 'रू' करना आंचलिक प्रभाव है. कहो गुरू, वो तो गुरू है, गुरू से दूर रहना, गुरू ने किसी को नहीं छोडा.. आदि प्रयोग द्रष्टव्य हैं. एक दोहा देखिये

प्रभुता से लघुता भली, प्रभुता से प्रभु दूर.
चीटी ले शक्कर चली, हाथी के सर धूर.

शायद इसीलिये गुरु जी भी लघु 'रु' से संतुष्ट हैं, दीर्घ 'रू' के चक्कर में नहीं पड़े. अस्तु...
shyam gupta का कहना है कि -
goshthee 12 -ke pahale hee dohe ke teesare charan main 14 maatraayen hain.
hind yugm se kaise jud sakate hain?
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
आचार्य जी,
शत-शत प्रणाम
आपने शीघ्र ही कृपा की और मेरी समस्या का उपचार किया जिसका बहुत धन्यबाद. आगे भी आपकी सहायता से सीखती रहूंगी.

दुखी बहुत ही मन हुआ, समझ ना कुछ आया
जब मिला आपका साथ, तब जरा लिख पाया
आदत गिनती की पड़ी, मनु का कहना मान
बूँद-बूँद पी ज्ञान की, अब आई मुसकान.
रश्मि प्रभा... का कहना है कि -
hum aapke saath hain.....
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
आचार्य जी,
सुबह फिर जल्दी में गलती की. कान पकड़ कर क्षमा मांगती हूँ. नाराज़ नहीं होना, please. इस बिचारी कुंडली को भी देख लीजिये, यह दया की आँखों से आपको देख रही है.

पाया मैंने बस तनिक, मुझे बहुत ना ज्ञान
मैं छोटी सी कंकरी, आप ज्ञान की खान
आप ज्ञान की खान, चमकते हीरे जिसमे
तुलना कोई करे, हो सके साहस किसमें
रहे सभी के साथ, 'शन्नो' को भी बताया
साथ आपका मिला, हमने बहुत ही पाया.
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
आचार्य जी,
आपने 'आवाज़' पर जो कहा उसका पालन करते हुए एक कुंडली और एक दोहा लिखने की हिम्मत की है. इन दोनों का जायका लेकर बताने की कृपा करें.
कुंडली:
खड़ी हुई रसोई में, मैं करती थी कुछ काम
उसी समय याद आया, एक गाने का नाम
एक गाने का नाम, जिसमे आँसू भरे तराने
मूड में कुछ आकर, लगी मैं उसको गाने
मनु की बातें पढीं, 'शन्नो' बहुत हँस पड़ी
आज्ञा पा 'सलिल'की, मैं कुंडली लिखूं खड़ी.

रोला:
किया किचन में काम, लगी मैं गाने गाना
मनु ने जान तुंरत, शुरू कर दिया खिझाना
हंसी में फंसकर, फिर गयी किचन को भूल
ही, ही, ही मैं हंसी, मैं भी कैसी हूँ फूल.
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
आचार्य जी,
वह कुंडली जिसमे मैंने कान पकड़ कर क्षमा मांगी है उसमें कुंडली के छठे चरण में 'शन्नो को भी बताया' की जगह 'शन्नो को भी पढ़ाया' होना चाहिए, ऐसा मेरा बिचार है. टाइप करते समय उंगली फिसल गयी थी गुरु जी. आगे से अपनी तरफ से पूरी कोशिश करने का प्रयत्न करूंगी कि आपको इतनी बार तकलीफ ना दूं.
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
आचार्य जी,
Good morning
देर-अबेर ही सही पर नंबर मिलने के पहले गलती का अहसास होने पर भूल-सुधार का प्रयत्न:
१.
दोहे का दूसरा चरण में:
मैं करती थी कुछ काम - १३ मात्राएँ होने से गलत है
करती थी कुछ काम - ११ मात्राएँ हैं, अब सही है ना?

और रोला में अंत के चार चरणों में:
किया किचन में काम, लगी मैं गाने गाना
मनु ने जान तुरंत, शुरू कर दिया खिझाना
हंसी में फंसकर, किचन को भी मैं भूली
ही,ही,ही हंसकर, फूल बनकर खुश हो ली.

बहुत धन्यवाद.
तपन शर्मा Tapan Sharma का कहना है कि -
मात्रा का नहीं है भय, करूँ हमेशा जोड़
शब्दों का न ज्ञान मुझे, मैं शिल्प न दूँ तोड़..

रामचरित लो खोल, सोरठा देखने के लिये
जी भर कर लो बोल, हैं अनेकों उदाहरण

शब्दों के अभाव में बड़ी मुश्किल होती है लिखने में... वैसे मैं पढ़ता रहता हूँ आपकी कक्षायें.. बस आता देर से हूँ.. :-)
Pooja Anil का कहना है कि -
धन्यवाद आचार्य जी, मैं भी "उल्लासित" शब्द ही ढूँढ रही थी, किन्तु मुझे याद ही नहीं आ रहा था :( , आपने जो परिवर्तन किये हैं, वो भी अच्छे लग रहे हैं. आपका बहुत बहुत आभार .

"गुरु" में, मैं भी तीन मात्राएँ गिन रही थी, भ्रम दूर करने के लिए पुनः आभार .

इस बार का प्रसंग भी बहुत प्रेरणादायक है.

पूजा अनिल

दोहा गाथा सनातन: पाठ १० २८ मार्च २००९

Saturday, March 28, 2009


दोहा गाथा सनातन: पाठ 10-मृदुल मधुर दोहा सरस


नव शक संवत- लें सखे! दोहा का उपहार.
आदि शक्ति के रूप नौ, नवधा भक्ति अपार.

नव गृह शुभ हों आपको, करते रहिये यत्न.
दोहा-पारंगत बनें, हिंद युग्म-नव-रत्न.

कथ्य, भाव, रस, बिम्ब, लय, अलंकार, लालित्य.
गति-यति नौ गुण नौलखा, दोहा हो आदित्य.

दोहा की सीमा नहीं, दोहाकार ससीम. .
स्वागत शन्नो-मृदुल जी!, पायें कीर्ति असीम.

पाठ-गोष्ठियाँ हुईं नौ, बिखरे हैं नौ रंग.
नव रंगों की छटा लख, छंद जगत है दंग.


दोहा रसिको,

नव दुर्गा शक्ति आराधना पर्व पर दोहा गाथा सनातन के नव पाठ तथा नव गोष्ठियों के सोपान से अगले सोपान की और इस दसवें पाठ की यात्रा का श्री गणेश होना शुभ संकेत है. इस सारस्वत अनुष्ठान में सम्मिलित शक्ति स्वरूपा मृदुल कीर्ति जी, शन्नो जी, पूजा जी, अजित जी, नीलम जी, सीमा जी, शोभा जी, रंजना जी, सुनीता जी, रश्मि जी, संगीता जी आप सभी का सादर अभिवादन...

दशम पाठ का विशेष उपहार दक्ष दोहाकार मृदुल कीर्ति जी, ( जिनका युग्म परिवार पोडकास्ट कवि सम्मलेन संचालिका के नाते प्रशंसक है ) के दोहे हैं. आइये! इन का रसास्वादन करने के साथ इनके वैशिष्ट्य को परखें.


कामधेनु दोहावली, दुहवत ज्ञानी वृन्द.
सरल, सरस, रुचिकर,गहन, कविवर को वर छंद.

तुलसी ने श्री राम को, नाम रूप रस गान.
दोहावलि के छंद में अद्‍भुत कियो बखान.

दोहे की महिमा महत, महत रूप लावण्य.
अणु अणियाम स्वरुप में, महि महिमामय छंद.

गागर में सागर भरो, ऐसो जाको रूप.
मोती जैसे सीप में, अंतस गूढ़ अनूप.

रामायण में जड़ित हैं, मणि सम दोहा छंद.
चौपाई के बीच में, चमकत हीरक वृन्द.

दोहा के बड़ भाग हैं, कहत राम गुण धाम,
वन्दनीय वर छंद में, प्रणवहूँ बहुल प्रणाम.


इन दोहों में शब्दों के चयन पर ध्यान दें- उनके उच्चारण में ध्वनि का आरोह-अवरोह या उतर-चढाव सलिल-तरंगों की तरह होने से गति (भाषिक प्रवाह) तथा यति (ठहराव) ने इन्हें पढने के साथ गायन करने योग्य बना दिया है. शब्दों का लालित्य मन मोहक है. दोहा का वैशिष्ट्य वर्णित करते हुए वे विशिष्ट रूप, लावण्य, गागर में सागर, सीप में मोती, सरल, सरस, रुचिकर,गहन, अणु अणियाम स्वरुप का संकेत करती हैं. आप सहमत होंगे कि मृदुल जी ने दोहा को कवियों के लिए वरदान तथा कामधेनु की तरह हर अपेक्षा पूरी करने में समर्थ कहकर दोहा के साथ न्याय ही किया है. दुहवत, कियो, भरो, ऐसो, जाको, चमकत, कहत, प्रणवहूँ आदि शब्द रूपों का प्रयोग बताता है कि ये दोहे खडी हिंदी में नहीं अवधी में कहे गए हैं. ये शब्द अशुद्ध नहीं है, अवधी में क्रिया के इन रूपों का प्रयोग पूरी तरह सही है किन्तु यही रूप खडी हिन्दी में करें तो वह अशुद्धि होगी. मृदुल जी ने दोहा को राम चरित मानस की चौपाइयों में जड़े हीरे की तरह कहा है. यह उपमा कितनी सटीक है. इन दोहों की अन्य विशेषताएँ इन्हें बार-बार पढ़ने पर सामने आयेंगी.

दिल्ली निवासी डॉ. श्यामानन्द सरस्वती 'रौशन' के दोहा संग्रह 'होते ही अंतर्मुखी' से उद्धृत निम्न पठनीय-मननीय दोहों के साथ कुछ समय बितायें तो आपकी कई कही-अनकही समयस्याओं का निदान हो जायेगा. ये दोहे खडी हिंदी में हैं

दोहे में अनिवार्य हैं, कथ्य-शिल्प-लय-छंद.
ज्यों गुलाब में रूप-रस. गंध और मकरंद.

चार चाँद देगा लगा दोहों में लालित्य.
जिसमें कुछ लालित्य है, अमर वही साहित्य.

दोहे में मात्रा गिरे, यह भारी अपराध.
यति-गति हो अपनी जगह, दोहा हो निर्बाध.

चलते-चलते ही मिला, मुझको यह गन्तव्य.
गन्ता भी हूँ मैं स्वयं, और स्वयं गंतव्य.

टूट रहे हैं आजकल, उसके बने मकान.
खंडित-खंडित हो गए, क्या दिल क्या इन्सान.

जितनी छोटी बात हो, उतना अधिक प्रभाव.
ले जाती उस पार है, ज्यों छोटी सी नाव.

कैसा है गणतंत्र यह, कैसा है संयोग?
हंस यहाँ भूखा मरे, काग उड़ावे भोग.

बहरों के इस गाँव में क्या चुप्पी, क्या शोर.
ज्यों अंधों के गाँव में, क्या रजनी, क्या भोर.

जीवन भर पड़ता रहा, वह औरों के माथ.
उसकी बेटी के मगर, हुए न पीले हाथ.

तेरे अलग विचार हैं, मेरे अलग विचार.
तू फैलता जा घृणा, मैं बाँटूंगा प्यार.

शुद्ध कहाँ परिणाम हो, साधन अगर अशुद्ध.
साधन रखते शुद्ध जो, जानो उन्हें प्रबुद्ध.


सावित्री शर्मा जी के दोहा संकलन पांच पोर की बाँसुरी से बृज भाषा के कुछ दोहों का रसपान करें. इन दोहों की भाषा उक्त दोनों से कुछ भिन्न है. ऐसी शब्दावली ब्रज भाषा के अनुकूल है पर खडी हिन्दी में उपयोग करने पर गलत मानी जायेगी.

शब्द ब्रम्ह जाना जबहिं, कियो उच्चरित ॐ.
होने लगे विकार सब, ज्ञान यज्ञ में होम.

मुख कारो विधिना कियो, सुन्दर रूप ललाम.
जनु घुंघुची कीन्हेंसि कबहुं, अति अनुचित कछु काम.

तन-मन बासंती भयो, साँस-साँस मधु गंध.
रोम-रोम तृस्ना जगी, तज्यो तृप्ति अनुबंध.

कितनउ बाँधो मन मिरिग, फिरि-फिरि भरे कुलांच.
सहज नहीं है बरजना, संगी-साथी पॉँच.

चित चंचल अति बावरो, धरे न नेकहूँ धीर.
छीन जमुना लहरें लखें, छीन मरुथल की पीर.

मन हिरना भरमत फिरत, थिर न रहै छिन एक.
अनुचित-उचित बिसारि कै, राखै अंपनी टेक.

तिय-बेंदी झिलमिल दिपै, दर्पण बारहि-बार.
दरकि हिया कहूँजाय नहि, करि कामिनि श्रृंगार.

होत दिनै-दिन दूबरो, देखि पूनमी चंद.
माथ बड़ेरी बींदिया, परै न नेकहूँ मंद.

झलमल-झलमल व्है रही, मुंदरी अंगुरी माहि.
नेह-नगीने नयन बिच, वेसेहि तिरि-तिरि जात.


अब देखिये बांदा के अल्पज्ञात कवि राम नारायण उर्फ़ नारायण दास 'बौखल' (जिन्होंने ५००० से अधिक बुन्देली दोहे लिखे हैं) की कृतियों नारायण अंजलि भाग १-२ से कुछ बुन्देली दोहे--

गुरु ने दीन्ही चीनगी, शिष्य लेहु सुलगाय.
चित चकमक लागे नहीं, याते बुझ-बुझ जाय.

वाणी वीणा विश्व वदि, विजय वाद विख्यात.
लोक-लोक गाथा गढी, ज्योति नवल निर्वात.

आध्यात्मिक तौली तुला, रस-रंग-छवि-गुण एक.
चतुर कवी कोविद कही, सुरसति रूप अनेक.

अलि गुलाब गंधी बिपिन,उडी स्मृति गति पौन.
रूप-रंग-परिचय-परस, उमगि पियत रज मौन.

पंच व्यसन प्राणी सनो, तरुण वृद्ध अरु बाल.
'बौखल' घिसि गोलक तनु, तृष्णा तानति जाल.

बैरिन कांजी योग सो, दूध दही हो जाय.
माखन आवै आन्गुरी, निर्भय माट मथाय.

बहु भाषा आशा अमित, समुझि मूढ़ मन सार.
मरत काह जग साडिया, चढिं-चढिं ऊंच कगार.

चातक वाणी पीव की, निर्गुण-सगुण समान.
बरसे-अन्बरसे जलद, बिना बोध अनुमान.

मरै न मन संगै रहै, मलकिन बारह बाट.
भवनै राखि मसोसि नित, खोलत नहीं कपाट.


दोहा लेखन करते समय यह ध्यान रखें कि लय (मात्रा) के साथ-साथ शब्द चयन और विन्यास भाषा की पृवृत्ति के अनुकूल हो. दोहा की मारक शक्ति का प्रमाण यह है कि उसे ललित काव्य के साथ-साथ पत्राचार, टिप्पणी, समीक्षा आदि में भी प्रयोग किया जा सकता है. उक्त दोहों के दोहाकारों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए इस अनुष्ठान के प्रति मृदुल जी की प्रतिक्रिया, उसके उत्तर में दोहा पत्र प्रस्तुत है. दोहा का टिप्पणी रूप में प्रयोग आप युग्म में प्रकाशित रचनाओं के नीचे देख ही रहे हैं.

Saumya Salil ji,
You are a great scholar, accept my Naman. Your doha classes are wonderful and amazing too. So many lessons I am grasping.
Kabeer , Meera, Soor, Raskhan, Tulsee never been to vyakaran process but they are so perfect as ever been. So real poems come from the realm of Reality and automatically they are perfect because HE is perfect.


आत्मीय! हूँ धन्य मैं, पा स्नेहिल उपहार.
शक्ति-साधना पर्व पर, मुदित ह्रदय-आभार.

दोहा गाथा में इन्हें, पढ़ सीखेंगे छात्र.
दोहा का वैशिष्ट्य क्या, नहीं दोपदी मात्र.

दोहा-चौपाई ललित, छंद रचे अभिराम.
जिव्हा पर हैं शारदा, शत-शत नम्र प्रणाम.

दोहा कक्षा को दिए, दोहा-रत्न अमोल.
आभारी हम आपके, पा अमृतमय बोल.

सचमुच शिक्षित नहीं थे, मीरा सूर कबीर.
तुलसी और रहीम थे, शिक्षित गुरु गंभीर.

दोहा रचता कवि नहीं, रचवाता परमात्म.
शब्द-ब्रम्ह ही प्रतिष्ठित, होता बनकर आत्म.


अवनीश जी ! आपने स्वयं को कमाल के स्थान पर रखकर दोहा कहा. है लेकिन पहेली तो वह दोहा बताने की थी जो कमाँल ने कहा था. इस कसौटी पर पूजा जी खरी उतरी हैं उन्हें बधाई और आपको शाबाशी कोशिश करने के लिए. अब चर्चा इस से जुड़े दोहों पर-

है सर रखा अपने भी,     कुटुंब का भार |
२ ११ १२ ११२ २ = १३    121 २२ २१ = ११
केवल साधु सेवा से ,      नहीं चले संसार ||
२११ 2 १ २२ २ = १३     १२ १२ २२१ = ११
आप सराहना के पात्र हैं चूंकि आप दोहा लेखन एवं मात्र गिनने दोनों दिशा में प्रगति कर रहे हैं. उक्त दोहे की दूसरी पंक्ति में शब्दों के आधार पर मात्राएँ ९ होती है पर गिनती ११ की गए है. शायद एक शब्द टंकित होने से रह गया. पहली पंक्ति को 'अपने भी सिर है रखा' करे पर लय सहज होगी तथा मात्राएँ वही रहेंगी.

बूझ पहेली आज की , दोहा लाई खोज ,
21 122 21 2 22 22 21
कमाल वाचे पिता से , अपने मन की मौज .
121 22 12 2 112 11 2 21

"चलती चक्की देखकर दिया कमाल ठठाय
जो कीली से लग गया वो साबुत रह जाय "


कबीर ने इस पर कहा कि यूँ तो वह कहने को कह गया लेकिन कितनी बड़ी बात कह गया उसे खुद नहीं पता।"


आचार्य जी,
वैसे तो साधारण भाषा में यह दोहा कहा गया है, क्या आप इसका गूढ़ अर्थ भी समझायेंगे?

आपने सभी दोहों को परखा उसके लिए धन्यवाद. बहुत कुछ सीखने को मिल रहा है, अच्छा लग रहा है

पूजा जी! आपने कमाल के दोहे को खोजकर कमाल कर दिया. बधाई, उक्त दोहे के तीसरे चरण को 'कहे कमाल कबीर से' करें तो लय सहज रहेगी. दोहा तथा मात्राएँ सही हैं. आपने दोहा लिखा है-

कबीर ने कहा था -

बूडा वंश कबीर का, उपजा पूत कमाल.
हरि का सुमिरन छाँड़ि कै, भरि लै आया माल.

चलती चक्की देख कर दिया कबीरा रोय.
दो पाटन के बीच में साबित बचा न कोय.

कबीर जुलाहा थे. वे जितना सूत कातते, कपडा बुनते उसे बेचकर परिवार पलते लेकिन माल बिकने पर मिले पैसे में से साधु सेवा करने दो बाद बचे पैसों से सामान घर लाते. वह कम होने से गृहस्थी चलाने में माँ लोई को परेशान होते देखकर कमाल को कष्ट होता. लोई के मना करने पर भी कबीर 'यह दुनिया माया की गठरी' मान कर 'आया खाली हाथ तू, जाना खाली हाथ' के पथ पर चलते रहे. 'ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया' कहने से बच्चों की थाली में रोटी तो नहीं आती. अंतत लोई ने कमाल को कपडा लेकर बाज़ार भेजा. कमाल ने कबीर के कहने के बाद भी साधूओं को दान नहीं दिया तथा पूरे पैसों से घर का सामान खरीद लिया. तब कमाल की भर्त्सना करते हुए कबीर ने उक्त दोहा कहा. उत्तर में कमाल ने कहा-

चलती चक्की देखकर , दिया कमाल ठिठोंय.
जो कीली से लग रहा, मार सका नहीं कोय


कबीर-कमाल के इन दोहों के दो अर्थ हैं. एक सामान्य- कबीर ने कहा कि चलती हुई चक्की को देखकर उन्हें रोना आता है कि दो पाटों के घूमते रहने से उनके बीच सब दाने पिस गए कोई साबित नहीं बच. कमाल ने उत्तर दिया कि चलती हुई चक्की देखकर उसे हँसी आ रही है क्योंकि जो दाना बीच की कीली से चिपक गया उसे पाट चलते रहने पर भी कोई हानि नहीं पहुँच सके. वे दाने बच गए.

इन दोहों का गूढ़ अर्थ समझने योग्य है- कबीर ने दूसरे दोहे में कहा ' इस संसार रूपी चक्की को चलता देखकर कबीर रो रहा है क्योंकि स्वार्थ और परमार्थ के दो पाटों के बीच में सब जीव नष्ट हो रहे हैं. कोई भी बच नहीं पा रहा.
कमाल ने उत्तर में कहा- ससार रूपी चक्की को चलता देखकर कमाल हँस रहा है क्योंकि जो जीव ब्रम्ह रूपी कीली से से लग गया उसका सांसारिक भव-बाधा कुछ नहीं बिगाड़ सकी. उसकी आत्मा पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त होकर ब्रम्ह में लीन हो गयी.

इस सत्र के अंत में दोहा के सूफियाना मिजाज़ की झलक देखें. खुसरो (संवत १३१२-१३८२) से पहले दोहा को सूफियाना रंग में रंगा बाबा शेख फरीद शकरगंज (११७३-१२६५) ने. गुरु ग्रन्थ साहिब में राहासा और राग सूही के ४ पदों और ३० सलोकों में बाबा की रचनायें हैं किन्तु इनके उनके पश्चातवर्ती शेख अब्र्हीम फरीद (१४५०-१५५४) की रचनाएँ भी मिल गयी हैं. आध्यात्म की पराकाष्ठा पर पहुँचे बाबा का निम्न दोहा उनके समर्पण की बानगी है. इस दोहे में बाबा कौए से कहते हैं कि वह नश्वर र्शरीर से खोज-खोज कर मांस खाले पर दो नेत्रों को छोड़ दे क्योंकि उन नेत्रों से ही प्रियतम (परमेश्वर) झलक देख पाने की आशा है.

कागा करंग ढढोलिया, सगल खाइया मासु.
ए दुई नैना मत छुहऊ, पिऊ देखन कि आसु.


पाठांतर:

कागा सब तन खाइयो, चुन-चुन खइयो मास.
दो नैना मत खाइयो, पिया मिलन की आस.

इस दोहे के भी सामान्य और गूढ़ आध्यात्मिक दो अर्थ हैं जिन्हें आप समझ ही लेंगे. कठिनाई होने पर गोष्ठी में चर्चा होगी.

18 कविताप्रेमियों का कहना है :

neelam का कहना है कि -
जीवन भर पड़ता रहा, वह औरों के माथ.
उसकी बेटी के मगर, हुए न पीले हाथ.

तेरे अलग विचार हैं, मेरे अलग विचार.
तू फैलता जा घृणा, मैं बाँटूंगा प्यार.
behatareen aacharya ji ,

कागा सब तन खाइयो, चुन-चुन खइयो मास.
दो नैना मत खाइयो, पिया मिलन की आस.

bahut dinon ke baad is bismrit dohe ko yaad dilwaane ka bahut bahut shukriya .
hum bhi dohoon se parhej karte karte aa hi gaye aap ki class me .
achchi jaankaari
neelam का कहना है कि -
avneesh ji ka yah doha bhi dil ko bahut bhaaya .

दोहा रचता कवि नहीं, रचवाता परमात्म.
शब्द-ब्रम्ह ही प्रतिष्ठित, होता बनकर आत्म
neelam का कहना है कि -
So real poems come from the realm of Reality and automatically they are perfect because HE is perfect.

by avneesh
sabhi kaviyon v paathkon ke liye bhasa chaahe jo ho ,matlab to ek hi hai .
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
आचार्यजी,
दोहों के भूले-बिसरे संसार को हिंद-युग्म के परिवार से अवगत कराने का धन्यबाद. मैं अपना आभार प्रकट करती हूँ. लिख नहीं पाती ऐसे दोहे पर दोहा-रस पान तो कर सकती हूँ. दोहे कितने प्रभावशाली होते हैं, कम शब्दों में ही कितना कुछ कह देतें हैं. बचपन में स्कूल में कबीर के कुछ दोहे पढ़े थे किताबों में. और घर पर दादा-दादी और माता-पिता सीख और उपदेश देने के बिचार से अक्सर ही दोहों में कुछ न कुछ कह जाते थे. पर 'दोहों की तो कोई सीमा ही नहीं' इस बार के पाठ में सभी दोहे इतने सुंदर हैं कि क्या कहूं.
अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -
नीलम जी,
जाँचिये दुबारा | जो आपने कहा है वह मेरे वचन नहीं है |
मृदुल जी के हैं |

अवनीश तिवारी
अजित गुप्ता का कोना का कहना है कि -
इस माह का पोडकास्‍ट कवि सम्‍मेलन में आपके बारे में जानकारी प्राप्‍त हुई। मन गदगद हो गया। एक दोहा प्रस्‍तुत है मैंने कुलज्‍य शब्‍द का प्रयोग किया है वैसे शब्‍द कुलज है, क्‍या यह प्रयोग सही है?
सलिल नमन है आपको
111 111 2 2 12 = 13
आज हुए हम धन्‍य
21 12 11 21 = 11
बिरल रक्‍त है आपका
111 21 2 212 = 13
महादेवी कुलज्‍य।
1222 121 = 11
manu का कहना है कि -
प्रणाम आचार्य,
पिछली बार जो शन्नो जी ने इतनी मेहनत की थी,,,क्या उसका परिणाम अगले अंक में जान ने को मिलेगा,,??
आज के दोहे भी बहुत ही अच्छे लगे,,,,
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
गुरु जी प्रणाम,
आपके दोहे जैसी भाषा और लहजा कितना भी कोशिश करूँ पर सीख नहीं पा रही हूँ. लेकिन बहुत शौक लगता है लिखने का. मेरा अपना अलग स्टाइल है. फिर भी रोक नहीं पा रहीं हूँ भेजने से. क्षमा चाहती हूँ इसके लिए:

'आप 'सलिल' ज्ञान-सागर, हैं हम सब मति-मूढ़
छुएँ पांव सब आपके, लेन को शिक्षा गूढ़.'

'चाह कर भी लिख ना सकी, मैं दोहा या छंद
कोशिश कर हारी मगर, मैं बुद्धि की मंद.'

'ना मात्रा, टंकड़ ठीक, ना थे सही विराम
बिन दोहा के ज्ञान के, मन को ना आराम.'

'लिखने दोहे मैं चली, बिन दोहे को ध्याय
तैराकी जानूं नहीं, गोते रही लगाय.'
manu का कहना है कि -
मुझे तो लगता है के
अगले आचार्या आप ही होने वाले हैं शन्नो जी,,,,, इतनी मामूली सी कमी तो आप आचार्य की मदद से चुटकियों में दूर कर सकती हैं,,,,
वाकई में मुझे इतना अच्छा लग रहा है आपको यूं सरपट दोहे कहते देख कर,,,
मैं तो पाठ से ज्यादा दोहे आपके पढता हूँ,,,,,,और सीखता हूँ,,,,,जितना आचार्य से उस से कहीं ज्यादा आपसे,,,,,
आचार्य को एक बार फिर बधाई,,,,
Shanno Aggarwal का कहना है कि -
मनु जी,
जानकर बहुत हर्ष हुआ और गुदगुदी हुई कि आपको मेरे यह 'फ्री-स्टाइल',(यह नामकरण मैंने ही किया है अपने लिखे दोहों का, क्यों कि समझ में नहीं आ रहा था कि मैं इन दोहों को क्या कहूँ), दोहे अच्छे लगे. असली प्रेरणा तो आचार्य जी से ही मिली है. वही हमारी आधार-शिला हैं. एक दिन ऐसे ही कक्षा में झाँका और मुझे भी चस्का लग गया दोहे लिखने का. बस डर लगा रहता है कि किसी दिन कोई कान खींच कर कक्षा से न निकाल दे मुझे, क्योंकि मेरे दोहों का style पहले पुराने type के दोहों से match नहीं करता है. शायद कभी काबिल बन ही न पाऊं उस तरह से लिखने की. फिर भी आपने मुझे हिम्मत बंधाई और तारीफ की, जिस के लिए मैं बहुत शुक्रगुजार हूँ.
divya naramada का कहना है कि -
सलिल नमन है आपको
111 111 2 2 12 = 13
आज हुए हम धन्‍य
21 12 11 21 = 11
बिरल रक्‍त है आपका
111 21 2 212 = 13
महादेवी कुलज्‍य।
1222 121 = 11
अजित जी!
धन्य के साथ अन्य, अनन्य जैसी तुक ठीक होगी. कुलज्य का साथ ऐसी तुक रखें जिसमें 'ज्य' हो. उक्त का चतुर्थ चरण कुछ परिवर्तन चाहता है. आप तेजी से सही दिशा में बढ़ रही हैं. बधाई.
Dr. Gopal Rajgopal का कहना है कि -
"मिर्जा गालिब कह गये,कह कर गये कबीर ।
दो मिसरों में दर्द को , दो पंक्ति में पीर ।।"
(दोहा संग्रह -'सभी लाइनें व्यस्त' से)
सादर !