दोहा गाथा सनातन: पाठ 10-मृदुल मधुर दोहा सरस
नव शक संवत- लें सखे! दोहा का उपहार.
आदि शक्ति के रूप नौ, नवधा भक्ति अपार.
नव गृह शुभ हों आपको, करते रहिये यत्न.
दोहा-पारंगत बनें, हिंद युग्म-नव-रत्न.
कथ्य, भाव, रस, बिम्ब, लय, अलंकार, लालित्य.
गति-यति नौ गुण नौलखा, दोहा हो आदित्य.
दोहा की सीमा नहीं, दोहाकार ससीम. .
स्वागत शन्नो-मृदुल जी!, पायें कीर्ति असीम.
पाठ-गोष्ठियाँ हुईं नौ, बिखरे हैं नौ रंग.
नव रंगों की छटा लख, छंद जगत है दंग.
दोहा रसिको,
नव दुर्गा शक्ति आराधना पर्व पर दोहा गाथा सनातन के नव पाठ तथा नव गोष्ठियों के सोपान से अगले सोपान की और इस दसवें पाठ की यात्रा का श्री गणेश होना शुभ संकेत है. इस सारस्वत अनुष्ठान में सम्मिलित शक्ति स्वरूपा मृदुल कीर्ति जी, शन्नो जी, पूजा जी, अजित जी, नीलम जी, सीमा जी, शोभा जी, रंजना जी, सुनीता जी, रश्मि जी, संगीता जी आप सभी का सादर अभिवादन...
दशम पाठ का विशेष उपहार दक्ष दोहाकार मृदुल कीर्ति जी, ( जिनका युग्म परिवार पोडकास्ट कवि सम्मलेन संचालिका के नाते प्रशंसक है ) के दोहे हैं. आइये! इन का रसास्वादन करने के साथ इनके वैशिष्ट्य को परखें.
कामधेनु दोहावली, दुहवत ज्ञानी वृन्द.
सरल, सरस, रुचिकर,गहन, कविवर को वर छंद.
तुलसी ने श्री राम को, नाम रूप रस गान.
दोहावलि के छंद में अद्भुत कियो बखान.
दोहे की महिमा महत, महत रूप लावण्य.
अणु अणियाम स्वरुप में, महि महिमामय छंद.
गागर में सागर भरो, ऐसो जाको रूप.
मोती जैसे सीप में, अंतस गूढ़ अनूप.
रामायण में जड़ित हैं, मणि सम दोहा छंद.
चौपाई के बीच में, चमकत हीरक वृन्द.
दोहा के बड़ भाग हैं, कहत राम गुण धाम,
वन्दनीय वर छंद में, प्रणवहूँ बहुल प्रणाम.
इन दोहों में शब्दों के चयन पर ध्यान दें- उनके उच्चारण में ध्वनि का आरोह-अवरोह या उतर-चढाव सलिल-तरंगों की तरह होने से गति (भाषिक प्रवाह) तथा यति (ठहराव) ने इन्हें पढने के साथ गायन करने योग्य बना दिया है. शब्दों का लालित्य मन मोहक है. दोहा का वैशिष्ट्य वर्णित करते हुए वे विशिष्ट रूप, लावण्य, गागर में सागर, सीप में मोती, सरल, सरस, रुचिकर,गहन, अणु अणियाम स्वरुप का संकेत करती हैं. आप सहमत होंगे कि मृदुल जी ने दोहा को कवियों के लिए वरदान तथा कामधेनु की तरह हर अपेक्षा पूरी करने में समर्थ कहकर दोहा के साथ न्याय ही किया है. दुहवत, कियो, भरो, ऐसो, जाको, चमकत, कहत, प्रणवहूँ आदि शब्द रूपों का प्रयोग बताता है कि ये दोहे खडी हिंदी में नहीं अवधी में कहे गए हैं. ये शब्द अशुद्ध नहीं है, अवधी में क्रिया के इन रूपों का प्रयोग पूरी तरह सही है किन्तु यही रूप खडी हिन्दी में करें तो वह अशुद्धि होगी. मृदुल जी ने दोहा को राम चरित मानस की चौपाइयों में जड़े हीरे की तरह कहा है. यह उपमा कितनी सटीक है. इन दोहों की अन्य विशेषताएँ इन्हें बार-बार पढ़ने पर सामने आयेंगी.
दिल्ली निवासी डॉ. श्यामानन्द सरस्वती 'रौशन' के दोहा संग्रह 'होते ही अंतर्मुखी' से उद्धृत निम्न पठनीय-मननीय दोहों के साथ कुछ समय बितायें तो आपकी कई कही-अनकही समयस्याओं का निदान हो जायेगा. ये दोहे खडी हिंदी में हैं
दोहे में अनिवार्य हैं, कथ्य-शिल्प-लय-छंद.
ज्यों गुलाब में रूप-रस. गंध और मकरंद.
चार चाँद देगा लगा दोहों में लालित्य.
जिसमें कुछ लालित्य है, अमर वही साहित्य.
दोहे में मात्रा गिरे, यह भारी अपराध.
यति-गति हो अपनी जगह, दोहा हो निर्बाध.
चलते-चलते ही मिला, मुझको यह गन्तव्य.
गन्ता भी हूँ मैं स्वयं, और स्वयं गंतव्य.
टूट रहे हैं आजकल, उसके बने मकान.
खंडित-खंडित हो गए, क्या दिल क्या इन्सान.
जितनी छोटी बात हो, उतना अधिक प्रभाव.
ले जाती उस पार है, ज्यों छोटी सी नाव.
कैसा है गणतंत्र यह, कैसा है संयोग?
हंस यहाँ भूखा मरे, काग उड़ावे भोग.
बहरों के इस गाँव में क्या चुप्पी, क्या शोर.
ज्यों अंधों के गाँव में, क्या रजनी, क्या भोर.
जीवन भर पड़ता रहा, वह औरों के माथ.
उसकी बेटी के मगर, हुए न पीले हाथ.
तेरे अलग विचार हैं, मेरे अलग विचार.
तू फैलता जा घृणा, मैं बाँटूंगा प्यार.
शुद्ध कहाँ परिणाम हो, साधन अगर अशुद्ध.
साधन रखते शुद्ध जो, जानो उन्हें प्रबुद्ध.
सावित्री शर्मा जी के दोहा संकलन पांच पोर की बाँसुरी से बृज भाषा के कुछ दोहों का रसपान करें. इन दोहों की भाषा उक्त दोनों से कुछ भिन्न है. ऐसी शब्दावली ब्रज भाषा के अनुकूल है पर खडी हिन्दी में उपयोग करने पर गलत मानी जायेगी.
शब्द ब्रम्ह जाना जबहिं, कियो उच्चरित ॐ.
होने लगे विकार सब, ज्ञान यज्ञ में होम.
मुख कारो विधिना कियो, सुन्दर रूप ललाम.
जनु घुंघुची कीन्हेंसि कबहुं, अति अनुचित कछु काम.
तन-मन बासंती भयो, साँस-साँस मधु गंध.
रोम-रोम तृस्ना जगी, तज्यो तृप्ति अनुबंध.
कितनउ बाँधो मन मिरिग, फिरि-फिरि भरे कुलांच.
सहज नहीं है बरजना, संगी-साथी पॉँच.
चित चंचल अति बावरो, धरे न नेकहूँ धीर.
छीन जमुना लहरें लखें, छीन मरुथल की पीर.
मन हिरना भरमत फिरत, थिर न रहै छिन एक.
अनुचित-उचित बिसारि कै, राखै अंपनी टेक.
तिय-बेंदी झिलमिल दिपै, दर्पण बारहि-बार.
दरकि हिया कहूँजाय नहि, करि कामिनि श्रृंगार.
होत दिनै-दिन दूबरो, देखि पूनमी चंद.
माथ बड़ेरी बींदिया, परै न नेकहूँ मंद.
झलमल-झलमल व्है रही, मुंदरी अंगुरी माहि.
नेह-नगीने नयन बिच, वेसेहि तिरि-तिरि जात.
अब देखिये बांदा के अल्पज्ञात कवि राम नारायण उर्फ़ नारायण दास 'बौखल' (जिन्होंने ५००० से अधिक बुन्देली दोहे लिखे हैं) की कृतियों नारायण अंजलि भाग १-२ से कुछ बुन्देली दोहे--
गुरु ने दीन्ही चीनगी, शिष्य लेहु सुलगाय.
चित चकमक लागे नहीं, याते बुझ-बुझ जाय.
वाणी वीणा विश्व वदि, विजय वाद विख्यात.
लोक-लोक गाथा गढी, ज्योति नवल निर्वात.
आध्यात्मिक तौली तुला, रस-रंग-छवि-गुण एक.
चतुर कवी कोविद कही, सुरसति रूप अनेक.
अलि गुलाब गंधी बिपिन,उडी स्मृति गति पौन.
रूप-रंग-परिचय-परस, उमगि पियत रज मौन.
पंच व्यसन प्राणी सनो, तरुण वृद्ध अरु बाल.
'बौखल' घिसि गोलक तनु, तृष्णा तानति जाल.
बैरिन कांजी योग सो, दूध दही हो जाय.
माखन आवै आन्गुरी, निर्भय माट मथाय.
बहु भाषा आशा अमित, समुझि मूढ़ मन सार.
मरत काह जग साडिया, चढिं-चढिं ऊंच कगार.
चातक वाणी पीव की, निर्गुण-सगुण समान.
बरसे-अन्बरसे जलद, बिना बोध अनुमान.
मरै न मन संगै रहै, मलकिन बारह बाट.
भवनै राखि मसोसि नित, खोलत नहीं कपाट.
दोहा लेखन करते समय यह ध्यान रखें कि लय (मात्रा) के साथ-साथ शब्द चयन और विन्यास भाषा की पृवृत्ति के अनुकूल हो. दोहा की मारक शक्ति का प्रमाण यह है कि उसे ललित काव्य के साथ-साथ पत्राचार, टिप्पणी, समीक्षा आदि में भी प्रयोग किया जा सकता है. उक्त दोहों के दोहाकारों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए इस अनुष्ठान के प्रति मृदुल जी की प्रतिक्रिया, उसके उत्तर में दोहा पत्र प्रस्तुत है. दोहा का टिप्पणी रूप में प्रयोग आप युग्म में प्रकाशित रचनाओं के नीचे देख ही रहे हैं.
Saumya Salil ji,
You are a great scholar, accept my Naman. Your doha classes are wonderful and amazing too. So many lessons I am grasping.
Kabeer , Meera, Soor, Raskhan, Tulsee never been to vyakaran process but they are so perfect as ever been. So real poems come from the realm of Reality and automatically they are perfect because HE is perfect.
आत्मीय! हूँ धन्य मैं, पा स्नेहिल उपहार.
शक्ति-साधना पर्व पर, मुदित ह्रदय-आभार.
दोहा गाथा में इन्हें, पढ़ सीखेंगे छात्र.
दोहा का वैशिष्ट्य क्या, नहीं दोपदी मात्र.
दोहा-चौपाई ललित, छंद रचे अभिराम.
जिव्हा पर हैं शारदा, शत-शत नम्र प्रणाम.
दोहा कक्षा को दिए, दोहा-रत्न अमोल.
आभारी हम आपके, पा अमृतमय बोल.
सचमुच शिक्षित नहीं थे, मीरा सूर कबीर.
तुलसी और रहीम थे, शिक्षित गुरु गंभीर.
दोहा रचता कवि नहीं, रचवाता परमात्म.
शब्द-ब्रम्ह ही प्रतिष्ठित, होता बनकर आत्म.
अवनीश जी ! आपने स्वयं को कमाल के स्थान पर रखकर दोहा कहा. है लेकिन पहेली तो वह दोहा बताने की थी जो कमाँल ने कहा था. इस कसौटी पर पूजा जी खरी उतरी हैं उन्हें बधाई और आपको शाबाशी कोशिश करने के लिए. अब चर्चा इस से जुड़े दोहों पर-
है सर रखा अपने भी, कुटुंब का भार |
२ ११ १२ ११२ २ = १३ 121 २२ २१ = ११
केवल साधु सेवा से , नहीं चले संसार ||
२११ 2 १ २२ २ = १३ १२ १२ २२१ = ११
आप सराहना के पात्र हैं चूंकि आप दोहा लेखन एवं मात्र गिनने दोनों दिशा में प्रगति कर रहे हैं. उक्त दोहे की दूसरी पंक्ति में शब्दों के आधार पर मात्राएँ ९ होती है पर गिनती ११ की गए है. शायद एक शब्द टंकित होने से रह गया. पहली पंक्ति को 'अपने भी सिर है रखा' करे पर लय सहज होगी तथा मात्राएँ वही रहेंगी.
बूझ पहेली आज की , दोहा लाई खोज ,
21 122 21 2 22 22 21
कमाल वाचे पिता से , अपने मन की मौज .
121 22 12 2 112 11 2 21
"चलती चक्की देखकर दिया कमाल ठठाय
जो कीली से लग गया वो साबुत रह जाय "
कबीर ने इस पर कहा कि यूँ तो वह कहने को कह गया लेकिन कितनी बड़ी बात कह गया उसे खुद नहीं पता।"
आचार्य जी,
वैसे तो साधारण भाषा में यह दोहा कहा गया है, क्या आप इसका गूढ़ अर्थ भी समझायेंगे?
आपने सभी दोहों को परखा उसके लिए धन्यवाद. बहुत कुछ सीखने को मिल रहा है, अच्छा लग रहा है
पूजा जी! आपने कमाल के दोहे को खोजकर कमाल कर दिया. बधाई, उक्त दोहे के तीसरे चरण को 'कहे कमाल कबीर से' करें तो लय सहज रहेगी. दोहा तथा मात्राएँ सही हैं. आपने दोहा लिखा है-
कबीर ने कहा था -
बूडा वंश कबीर का, उपजा पूत कमाल.
हरि का सुमिरन छाँड़ि कै, भरि लै आया माल.
चलती चक्की देख कर दिया कबीरा रोय.
दो पाटन के बीच में साबित बचा न कोय.
कबीर जुलाहा थे. वे जितना सूत कातते, कपडा बुनते उसे बेचकर परिवार पलते लेकिन माल बिकने पर मिले पैसे में से साधु सेवा करने दो बाद बचे पैसों से सामान घर लाते. वह कम होने से गृहस्थी चलाने में माँ लोई को परेशान होते देखकर कमाल को कष्ट होता. लोई के मना करने पर भी कबीर 'यह दुनिया माया की गठरी' मान कर 'आया खाली हाथ तू, जाना खाली हाथ' के पथ पर चलते रहे. 'ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया' कहने से बच्चों की थाली में रोटी तो नहीं आती. अंतत लोई ने कमाल को कपडा लेकर बाज़ार भेजा. कमाल ने कबीर के कहने के बाद भी साधूओं को दान नहीं दिया तथा पूरे पैसों से घर का सामान खरीद लिया. तब कमाल की भर्त्सना करते हुए कबीर ने उक्त दोहा कहा. उत्तर में कमाल ने कहा-
चलती चक्की देखकर , दिया कमाल ठिठोंय.
जो कीली से लग रहा, मार सका नहीं कोय
कबीर-कमाल के इन दोहों के दो अर्थ हैं. एक सामान्य- कबीर ने कहा कि चलती हुई चक्की को देखकर उन्हें रोना आता है कि दो पाटों के घूमते रहने से उनके बीच सब दाने पिस गए कोई साबित नहीं बच. कमाल ने उत्तर दिया कि चलती हुई चक्की देखकर उसे हँसी आ रही है क्योंकि जो दाना बीच की कीली से चिपक गया उसे पाट चलते रहने पर भी कोई हानि नहीं पहुँच सके. वे दाने बच गए.
इन दोहों का गूढ़ अर्थ समझने योग्य है- कबीर ने दूसरे दोहे में कहा ' इस संसार रूपी चक्की को चलता देखकर कबीर रो रहा है क्योंकि स्वार्थ और परमार्थ के दो पाटों के बीच में सब जीव नष्ट हो रहे हैं. कोई भी बच नहीं पा रहा.
कमाल ने उत्तर में कहा- ससार रूपी चक्की को चलता देखकर कमाल हँस रहा है क्योंकि जो जीव ब्रम्ह रूपी कीली से से लग गया उसका सांसारिक भव-बाधा कुछ नहीं बिगाड़ सकी. उसकी आत्मा पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त होकर ब्रम्ह में लीन हो गयी.
इस सत्र के अंत में दोहा के सूफियाना मिजाज़ की झलक देखें. खुसरो (संवत १३१२-१३८२) से पहले दोहा को सूफियाना रंग में रंगा बाबा शेख फरीद शकरगंज (११७३-१२६५) ने. गुरु ग्रन्थ साहिब में राहासा और राग सूही के ४ पदों और ३० सलोकों में बाबा की रचनायें हैं किन्तु इनके उनके पश्चातवर्ती शेख अब्र्हीम फरीद (१४५०-१५५४) की रचनाएँ भी मिल गयी हैं. आध्यात्म की पराकाष्ठा पर पहुँचे बाबा का निम्न दोहा उनके समर्पण की बानगी है. इस दोहे में बाबा कौए से कहते हैं कि वह नश्वर र्शरीर से खोज-खोज कर मांस खाले पर दो नेत्रों को छोड़ दे क्योंकि उन नेत्रों से ही प्रियतम (परमेश्वर) झलक देख पाने की आशा है.
कागा करंग ढढोलिया, सगल खाइया मासु.
ए दुई नैना मत छुहऊ, पिऊ देखन कि आसु.
पाठांतर:
कागा सब तन खाइयो, चुन-चुन खइयो मास.
दो नैना मत खाइयो, पिया मिलन की आस.
इस दोहे के भी सामान्य और गूढ़ आध्यात्मिक दो अर्थ हैं जिन्हें आप समझ ही लेंगे. कठिनाई होने पर गोष्ठी में चर्चा होगी.
18 कविताप्रेमियों का कहना है :
जो उतरा सो डूब गया ,जो डूब गया सो पार
२)सेज वो सूनी देखके रोवु मै दिन रैन ,
पिया -पिया मै करत हूँ ,पहरों पल भर न चैन |
मात्राएँ तो आचार्य जी बताएँगे ही खुसरो के दोहे हमने लिख दिए हैं
नेट पर सब कुछ उपलब्ध है, वहीं से ही दोहे कट और पेस्ट करने का मन नहीं कर रहा है। दोहों के 23 प्रकार और गुरु, लघु समझ नहीं आ रहे। कृपया विस्तार से बताएं।
जो खुद से याद थे वो आपने और नीलम जी ने लिख दिए हैं,,,
बल्कि नीलम जी वाला नम्बर दो मेरे लिए नया है,,,,
अब किताब में से देखकर टीपना अजित जी की तरह से ही मुझे भी सही नहीं लगता,,,
दोहे का अर्थ समझाने का धन्यवाद,,,,,
एक बात और,,,,,
बहुत ही भला लगता है के जब खुसरो का ज़िक्र होते ही नीलम जी जरूर पहुँचती हैं,,,,,
सचमुच कोई प्रशंशक हो तो ऐसा,,,
पिछली बार आपकी आँखों की तकलीफ के बारे में पढ़कर बड़ी तकलीफ महसूस हुई थी. आशा है कि अब दशा में सुधार होगा. कितनी मेहनत करते हैं आप हम सबके लिये.
आज जो मनु जी सोच रहे हैं बिलकुल वही मैं भी सोचे जा रही थी कि नीलम जी खुसरो जी के नाम पर झट से चहक पड़ती हैं. साफ़ दिख रहा है कि उनके दोहों से खास लगाव है. और बड़े मज़े वाले दोहे लाती हैं चुन कर ' जो उतरा वो डूब गया, जो डूबा वो पार'. वाह!
दोहा का कुनबा बड़ा, बढ़कर हुआ विशाल
कठिन समस्या हो गयी, बिगड़ा मेरा हाल
बिगड़ा मेरा हाल, कि मीटर बंद हो गया
अकल हो गयी मंद,लिखा तो छंद हो गया
शन्नो है लाचार, न अब ले पाये लोहा
डग-मग करे नैया, हँसते मुझपर दोहा.
दोहा के पदों और चरणों में मात्र गणना का पर्याप्त अभ्यास आपको है ही. अब करना केवल यह है कि चारो चरणों या दोनों पदों या पूरे दोहे की गुरु और लघु मात्राएँ अलग-अलग गिनें, गुरु को २ से गुणा कर लघु जोडेंगे तो योग ४८ ही आएगा. दोहा में कुल ४८ लघु मात्राएँ होती हैं. हर गुरु मात्रा के लिए २ लघु मात्राएँ कम हो जाती हैं. दोहा के २३ प्रकार इन लघु-गुरु के विविध संयोजनों से ही बनते हैं. ग़ज़ल की बहर की तरह दोहे के प्रकार हैं. बहरों के नामों की तरह इन दोहों के नाम हैं.
फ़ारसी और अवधी में जो उन्होंने रचना की है ,
जिहाले मुश्किन व्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्लाह
तोत -ए-हिंद उनको कोई ऐसे ही थोड़े ही कहा गया है |
haan aachaary ji ne ek doha kaha tha to usme se koi ek doha manu ji ya shanno ji le sakti hai .
इस बार कक्षा में लोग सही तरीके से हाजिरी लगा रहे हैं. हालाँकि मानसिक उलझनें बढ़ गयीं हैं दोहों के विषम रूप देखकर. मैं फिर आ गयी लेकिन बिना वजह नहीं, गुरु जी, कदापि नहीं. मैं तो आपको खुसरो साहब के दोहे दिखाने लायी हूँ जिन्हें मैंने अंतर्जाल में पाया. यहाँ मेरे पास कोई पुस्तक नहीं है किसी भी दोहा-रचयिता की.
'खुसरो बाजी प्रेम की, मैं खेलूँ पी के संग
जीत गयी तो पी मोरे, हारी पी के संग'.
'अपनी छव बनायिके, जो मैं पी के पास गयी
छव देखी जब पीयू की, सो अपनी भूल गयी'.
'एक गुनी ने यह गुन कीना
हरियल पिंजरे में दे दीना
देखो जादूगर का कमाल
डाले हरा निकाले लाल'.
एक सवाल आ रहा है दिमाग में जिसे पूछे बिना वह पच नहीं रहा है.....वह यह कि क्या खुसरो जी के जमाने में मात्रायों को गिनने की प्रथा थी या नहीं. क्योंकि मुझे काफी गड़बड़ दिखती है इधर-उधर कई जगह. इतने महान और ज्ञानी इंसान के बारे में ऐसा सवाल पूछते हुए संकोच बहुत हो रहा है लेकिन मुझे यह सवाल तंग बहुत कर रहा है, गुरु जी.
Neelam ji,
ho sakta hai ki aap ka kaha kisi had tak sahi ho aur ab kaliyug men reincarnation hua ho aapka aur us samay aap khusro ji kee chachi ya bhateeji rahi hon. main aapki vhavnaayon ko samajh sakti hoon.
दो दोहे खोजे हैं -
खुसरो रेन सुहाग की, जागी पी के संग
तन मेरो मन पिऊ को, दोउ भये एक रंग
खुसरो ऐसी प्रीत कर, जैसी हिन्दू जोय
पूत कराए कारने, जल,जल कोयला होय
दोहे के तीन प्रकार प्रस्तुत हैं -
हाथ पसारे मैं खड़ी, घर की चौखट पार
छाँव मिली ना ओट थी, बस थी केवल हार।
16 + 16 = करभ
रात चाँदनी खूब थी, तारे जगमग होय
पंछी बैठा एकला, भोर बता कब होय।
17+14= मर्कट
साँपों ने मुझको डसा, घुस बाँहों के माय
प्रेम सिमटकर रह गया, शक ही बढ़जा जाय।
14+20= हंस
रावण घूमे राम बन, कलयुग बंटाधार ॥
कलयुग में मैं ढो़ रहा, लेकर अपनी लाश ।
सत्य रखूँ यां खुद रहूँ, खुद का किया विनाश ॥
भगवन सुख से सो रहा, असुर धरा सब भेज ।
देवों की रक्षा हुई, फंसा मनुज निस्तेज ॥
मैं मैं मरता मर मिटा, मिट्टी मटियामेट ।
मिट्टी में मिट्टी मिली, मद माया मलमेट ॥
सच की अर्थी ढ़ो रहा, ले कांधे पर भार ।
पहुंचाने शमशान भी, मिला न कोई यार ॥
कवि कुलवंत सिंह
अच्छा किया जो आपने खुसरो के दोहे लेकर आने को कहा, इस बहाने अमीर खुसरो की लिखी तमाम रचनाओं को पढने का सौभाग्य मिला, अब तक सब नहीं पढ़ पाई, इन्हें पढने का काम चल रहा है और अपनी दोहा यात्रा भी चल ही रही है :) , अमीर खुसरो के कुछ दोहे , चुन कर ले आई ---
अंगना तो परबत भयो, देहरी भई विदेस।
जा बाबुल घर आपने, मैं चली पिया के देस।।
खुसरो पाती प्रेम की बिरला बाँचे कोय।
वेद, कुरान, पोथी पढ़े, प्रेम बिना का होय।।
खुसरो मौला के रुठते, पीर के सरने जाय।
कहे खुसरो पीर के रुठते, मौला नहि होत सहाय।।
दोहों के प्रकार समझने में अब तक कठिनाई हो रही है, पर हार नहीं मानी है, कोशिश जारी है, जैसे ही समझ में आ जायेंगे, उदाहरण के साथ फिर हाजिर हो जाउंगी :).
तीन दोहे और प्रस्तुत हैं, 23 बनाने में अभी समय लगेगा। मुझे अंतिम दो प्रकार- उदर और सर्प समझ नहीं आए, क्योंकि बिना लघु के दोहा कैसे सम्भव है?
प्रेम और विश्वास से, जोड़ा था परिवार
नौकरियां ने चोट की, तोड़ा है घरबार
18+12 = मंडूक
चीयां मेरी बावरी, उल्टी उल्टी जाय
दिन में तो सोती रहे, पड़े रात जग जाय।
19 + 10 = श्येन
सारा आटा साँध के, रोटी बनती नाय
थोड़ा साटा राख के, लोई बिलती जाय
20 + 8 = शरभ
आपने जैसे अपना नाता खुसरो से जोड़ा है,,,
पहले तो कुछ इर्ष्या सी हुयी ,,,
फिर लगा के वाह क्या बात कही है,,,,कुछ न कुछ तो हम भी लगते ही होंगे,,,, (दूर के ही सही,,)
शायद इसलिए खुसरो से लगाव तो पूरा है पर दोहा नहीं ला पा रहे हैं,,,,,
एक बात और भी साफ़ हो गयी,,,,,के जब कोई हिन्दी में या आम बोलचाल की भाषा में दरार पैदा करने की बात होती है तो हमसे भी पहले आगे बढ़कर कौन बोलता है ,,,,,,,
जी हां,,
ये खुसरो ही बोलता है नीलम जी के रूप में,,,,,
जो श्रद्धा खुसरो ने अपने उस्ताद के लिए उम्र भर रखी, वैसी ही उन्हें आज मिल रही है,,
मैं भी यही सोच रहा हूँ के हमें यहाँ क्यूं लाकर पटका गया है,,,,,
तपन जी,
शायद ये शे'र है ....
और है भी फिल्म गुलामी का ......
जिहाले मिस्कीं मकुन तगाफुल , दुराये नैना, बनाए बतियाँ,
के ताबे-हिज्राँ न दारम ऐ जाँ, न लेहू काहे लगाए छतियाँ .....
साबरी brothers की सूफियानअ आवाज में ये गजल कवाल्ली के रंग में सुनिए,,,,तो एक नया ही संसार नजर आता है,,,,
और मजे की बात ये के इसकी शुरू की लाइने दाल कर फिल्म गुलामी के गीत में भी चार चाँद लग गए हैं,,,,,,,,
manuji, ek aur gaana bhi hai:
zihaal-e muskin, makan-baranjish, bahale-hijra bechaara dil hai...
sunaayee deti hai jiski dhadkan humaara dil ya tumhaara dil hai
ab aap log kahenge ki "aawaaz" ko bhi tapan yahi le aaya... :-).. par chalega..
Wednesday, April 29, 2009
गोष्ठी 14 - दोहा के संग-साथ
दोहा के पदों और चरणों में मात्रा गणना का पर्याप्त अभ्यास आपको है। अब करना केवल यह है कि चारो चरणों या दोनों पदों या पूरे दोहे की गुरु और लघु मात्राएँ अलग-अलग गिनें, गुरु को २ से गुणा कर लघु जोड़ेंगे तो योग ४८ ही आएगा. दोहा में कुल ४८ लघु मात्राएँ होती हैं. हर गुरु मात्रा के लिए २ लघु मात्राएँ कम हो जाती हैं. दोहा के २३ प्रकार इन लघु-गुरु के विविध संयोजनों से ही बनते हैं. ग़ज़ल की बहर की तरह दोहे के प्रकार हैं. बहरों के नामों की तरह इन दोहों के नाम हैं. नीचे आपके ही दोहों में मात्रा गणना एवं दोहा का प्रकार प्रस्तुत है-
- अजित जी
लोकतन्त्र की गूँज है, लोक मिले ना खोज
२ १ २ १ २ २ १ २, २ १ १ २ २ २ १
गुरु ९ बार, लघु ६ बार= १८+६=२४ मात्रा
राजतन्त्र ही रह गया, वोट बिके हैं रोज
२ १ २ १ २ १ १ १ २,२ १ १ २ २ २ १
गुरु ८ बार, लघु ८ बार=१६+८=२४ मात्रा.
पूरे दोहे में जोडें तो गुरु ९+८=१७ बार अर्थात ३४ मात्रा,
लघु ६+८=१४ मात्रा, कुल ३४ + १४ = ४८ मात्रा
१७ गुरु तथा १४ लघु मात्राओं के दोहे का नाम 'मरकट' है.
-मनु जी
अब तो कक्षा नायिका, के भी पकडे कान
१ १ २ २ २ २ १ २ २ २ १ १ २ २ १
गुरु ९ बार, लघु ६ बार = १८+६=२४ मात्रा
फुटक रहे हैं छात्र सब , देती क्यूं ना ध्यान
१ १ १ १ २ २ २ १ १ १, २ २ २ २ २ १
गुरु ८ बार, लघु ८ बार =१६+८ =२४ मात्रा
पूरे दोहे में जोडें तो गुरु ९+८=१७ बार अर्थात ३४ मात्रा,
लघु ६+८=१४ मात्रा, कुल ३४ + १४ = ४८ मात्रा
१७ गुरु तथा १४ लघु मात्राओं के दोहे का नाम 'मरकट' है.
-पूजा जी
रचना रोला भूमिका, दोहे के संग साथ.
१ १ २ २ २ २ १ २, २ २ २ १ १ २ १
गुरु ९ बार + लघु ६ बार = १८+६=२४ मात्रा
बना रहे हैं कुण्डलिनी, लिये हाथ में हाथ.
१ २ १ २ २ २ १ २, १ २ २ १ २ २ १
गुरु ९ बार +लघु ६ बार = १८+६=२४ मात्रा
पूरे दोहे में जोडें तो गुरु ९+९=१८ बार अर्थात ३६ मात्रा,
लघु ६+६=१२ मात्रा, कुल ३६ + १२ = ४८ मात्रा
१८ गुरु तथा १२ लघु मात्राओं के दोहे का नाम 'मंडूक' है.
-अभिषेक जी
मैं अपने को जप रहा, चादर-बाहर पाँव।
२ १ १ २ २ १ १ १ २, २ १ १ २ १ १ २ १
गुरु ७ बार, लघु १० बार = १४+१०=२४
अभिमानी जन का नहीं, कहीं नाम या गाँव।
१ १ २ २ १ १ २ १ २, १ २ २ १ २ २ १
गुरु ८ बार, लघु ८ बार = १६+८=२४
पूरे दोहे में जोडें तो गुरु ७+८=१५ बार अर्थात ३० मात्रा,
लघु ६+६=१२ मात्रा, कुल ३० + १८ = ४८ मात्रा
१५ गुरु तथा १८ लघु मात्राओं के दोहे का नाम 'नर' है.
-तपन शर्मा
मात्रा का भय नहीं है, करूँ हमेशा जोड़.
२ २ २ १ १ १ २ २, १ २ १ २ २ २ १
गुरु ९ बार, लघु ६ बार = १८+६=२४
ज्ञान न शब्दों का मुझे, शिल्प न दूँ मैं तोड़.
२ १ १ २ २ २ १ २, २ १ १ २ २ २ १
गुरु ९ बार, लघु ६ बार, १८+६=२४
पूरे दोहे में जोडें तो गुरु ९+९=१८ बार अर्थात ३६ मात्रा,
लघु ६+६=१२ मात्रा, कुल ३६ + १२ = ४८ मात्रा
१८ गुरु तथा १२ लघु मात्राओं के दोहे का नाम 'मंडूक' है.
-शन्नो जी
'जहाँ पड़ें गुरु के चरण, चंदन बनती धूल.
१ २ १ २ १ १ २ १ १ १, २ १ १ १ १ २ २ १
गुरु ६ बार, लघु १२ बार = १२+१२=२४
पाकर चरणों में शरण, मिले शांति का कूल..
२ १ १ १ १ २ २ १ १ १,१ २ २ १ २ २ १
गुरु ७ बार, लघु १० बार = १४+१०=२४
पूरे दोहे में जोडें तो गुरु ६+७=१३ बार अर्थात २६ मात्रा,
लघु १२+१०= २२ मात्रा, कुल २६ + २२ = ४८ मात्रा
१३ गुरु तथा २२ लघु मात्राओं के दोहे का नाम 'गयंद या मदुकल' है.
- सलिल
दोहा गाथा से हुए, जितने श्रोता गोल.
२ २ २ २ २ १ २, १ १ २ २ २ २ १.
गुरु १० बार, लघु ४ बार=२०+४=२४
वापिस आ दोहा रचें, शब्द-शब्द को तोल..
२ १ १ २ २ २ १ २ २ १ २ १ २ २ १
गुरु ९ बार, लघु ६ बार=१८+६=२४
पूरे दोहे में जोडें तो गुरु १०+९=१९ बार अर्थात ३८ मात्रा,
लघु ४+६= १० मात्रा, कुल ३८ + १० = ४८ मात्रा
१९ गुरु तथा १० लघु मात्राओं के दोहे का नाम 'श्येन' है. .
गोरी सोयी सेज पर, मुख पर डारे केस.
चल खुसरो घर आपने, रैन भई चहुँ देस.. १४ गुरु, २० लघु - हंस
खुसरो रैन सुहाग की, जागी पी के संग.
तन मेरो मन पीउ को, दोउ भये इक रंग.. १६ गुरु, १६ लघु - करभ
सजन सकारे जायेंगे, नैन मरेंगे रोय.
विधना ऐसी रैन कर, भोर कभी ना होय.. १६ गुरु, १६ लघु- करभ
टिप्पणी: प्रथम चरण में १३ के स्थान पर १४ मात्राएँ हैं. यहाँ एक मात्रा गिराई गयी है. खुसरो हिन्दी-उर्दू दोनों में लिखते थे. यह असर होना स्वाभाविक है, पर हम ऐसा न करें.
नीलम जी ...
दोहा के परिवार में, जुडें-लिखें यदि आप.
तब खुसरो की विरासत, सके जगत में व्याप. १४-२० हंस
खुसरो दरिया प्रेम का ,उलटी वाकी धार
जो उतरा सो डूब गया ,जो डूब गया सो पार
तीसरे चरण में एक मात्रा गिरेगी, चौथे चरण में 'जो' नहीं है.
खुसरो दरिया प्रेम का, उलटी वाकी धार
जो उतरा सो डूब गया, डूब गया सो पार १७ - १४ मरकट
मैंने निम्न रूप भी सुना है-
खुसरो दरिया प्रेम का, उल्टी बाकी धार.
जो उतराया डूबता, जो डूबा हो पार.. १९ गुरु, १० लघु -श्येन
२)सेज वो सूनी देखके रोवु मै दिन रैन ,
पिया -पिया मै करत हूँ, पहरों पल भर न चैन |
सेज वो सूनी देखके, रोऊँ मैं दिन-रैन.
पिया-पिया मैं करत हूँ, पल भर पड़े न चैन.. १४ गुरु, २० लघु -हंस.
मात्राएँ आप गिन लातीं तो सबको प्रेरणा मिलती.
shanno said...
आचार्य जी,
दोहा का कुनबा बड़ा, बढ़कर हुआ विशाल
कठिन समस्या हो गयी, बिगड़ा मेरा हाल १५ - १८ नर
बिगड़ा मेरा हाल, कि मीटर बंद हो गया
अकल हो गयी मंद,लिखा तो छंद हो गया
शन्नो है लाचार, न अब ले पाये लोहा
डग-मग करे नैया, हँसते मुझपर दोहा.
'खुसरो बाजी प्रेम की, मैं खेलूँ पी के संग
जीत गयी तो पी मोरे, हारी पी के संग'.
दूसरे चरण से 'मैं' हटा दें. तीसरे चरनमें एक मात्रा गिरेगी. २० - ८ शरभ
'अपनी छव बनायिके, जो मैं पी के पास गयी
छव देखी जब पीयू की, सो अपनी भूल गयी'. -यह दोहा नहीं है.
'एक गुनी ने यह गुन कीना
हरियल पिंजरे में दे दीना
देखो जादूगर का कमाल
डाले हरा निकाले लाल'. - यह पहेली है...बूझिये.
एक सवाल आ रहा है दिमाग में जिसे पूछे बिना वह पच नहीं रहा है.....वह यह कि क्या खुसरो जी के जमाने में मात्रायों को गिनने की प्रथा थी या नहीं. क्योंकि मुझे काफी गड़बड़ दिखती है इधर-उधर कई जगह. इतने महान और ज्ञानी इंसान के बारे में ऐसा सवाल पूछते हुए संकोच बहुत हो रहा है
संकोच न करें...खुसरो के समय में आज की तरह विद्यालय या किताबें सर्व सुलभ नहीं. थे. शिक्षा गुरुओं या उस्तादों से ली जाती थी. खुसरो बहुभाषी विद्वान् थे. संस्कृत, अरबी-फारसी-उर्दू तथा अपभ्रंश जानते थे. आम बोल-चाल की भाषा में, जिसे वे 'हिन्दवी' कहते थे रचनाएँ करते थे. इसलिए उनके कलाम में कई जगहों पर उर्दू की तरह मात्राएँ गिराई जाना जरूरी हो जाता है. दूसरे इतना समय बीत गया है कि अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग पाठ-भेद प्रचलित हैं.
Dr. Smt. ajit gupta said...
आचार्य जी
दो दोहे खोजे हैं -
खुसरो रेन सुहाग की, जागी पी के संग
तन मेरो मन पिऊ को, दोउ भये एक रंग
खुसरो ऐसी प्रीत कर, जैसी हिन्दू जोय
पूत कराए कारने, जल,जल कोयला होय
दोहे के तीन प्रकार प्रस्तुत हैं -
हाथ पसारे मैं खड़ी, घर की चौखट पार
छाँव मिली ना ओट थी, बस थी केवल हार।
१६ + १६ = करभ
रात चाँदनी खूब थी, तारे जगमग होय
पंछी बैठा एकला, भोर बता कब होय।
१७+१४= मर्कट
साँपों ने मुझको डसा, घुस बाँहों के माय
प्रेम सिमटकर रह गया, शक ही बढ़जा जाय।
१४+२०= हंस
तीन दोहे और प्रस्तुत हैं, २३ बनाने में अभी समय लगेगा। मुझे अंतिम दो प्रकार- उदर और सर्प समझ नहीं आए, क्योंकि बिना लघु के दोहा कैसे सम्भव है?
उदर में १ गुरु तथा ४६ लघु हैं जबकि सर्प में गुरु नहीं है, ४८ लघु हैं.
प्रेम और विश्वास से, जोड़ा था परिवार
नौकरियां ने चोट की, तोड़ा है घरबार
१८+१२ = मंडूक
चीयां मेरी बावरी, उल्टी उल्टी जाय
दिन में तो सोती रहे, पड़े रात जग जाय।
१९ + १० = श्येन
सारा आटा साँध के, रोटी बनती नाय
थोड़ा साटा राख के, लोई बिलती जाय
२० + ८ = शरभ
वाह! वाह!! आपने कमाल कर दिया. आज की दोहा ध्वजवाहिका आप ही हैं.
Kavi Kulwant said...
रावण रावण जो दिखे, राम करे संहार ।
रावण घूमे राम बन, कलयुग बंटाधार ॥
कलयुग में मैं ढो़ रहा, लेकर अपनी लाश ।
सत्य रखूँ यां खुद रहूँ, खुद का किया विनाश ॥
भगवन सुख से सो रहा, असुर धरा सब भेज ।
देवों की रक्षा हुई, फंसा मनुज निस्तेज ॥
मैं मैं मरता मर मिटा, मिट्टी मटियामेट ।
मिट्टी में मिट्टी मिली, मद माया मलमेट ॥
सच की अर्थी ढ़ो रहा, ले कांधे पर भार ।
पहुंचाने शमशान भी, मिला न कोई यार ॥
स्वागत कवि कुलवंत जी!, हम दर्शन कर धन्य.
दोहों का उपहार है, सचमुच मीत अनन्य.
pooja said...
आचार्य जी,
अच्छा किया जो आपने खुसरो के दोहे लेकर आने को कहा, इस बहाने अमीर खुसरो की लिखी तमाम रचनाओं को पढने का सौभाग्य मिला, अब तक सब नहीं पढ़ पाई, इन्हें पढने का काम चल रहा है और अपनी दोहा यात्रा भी चल ही रही है :) , अमीर खुसरो के कुछ दोहे , चुन कर ले आई ---
अंगना तो परबत भयो, देहरी भई विदेस।
जा बाबुल घर आपने, मैं चली पिया के देस।।
अँगना तो परबत भयो, दहरी भई बिदेस.
जा बाबुल घर आपने, चली पिया के देस..
खुसरो पाती प्रेम की बिरला बाँचे कोय।
वेद, कुरान, पोथी पढ़े, प्रेम बिना का होय।।
तीसरे चरण में एक मात्रा गिरेगी.
खुसरो मौला के रुठते, पीर के सरने जाय।
कहे खुसरो पीर के रुठते, मौला नहि होत सहाय।।
दोहों के प्रकार समझने में अब तक कठिनाई हो रही है, पर हार नहीं मानी है, कोशिश जारी है, जैसे ही समझ में आ जायेंगे, उदाहरण के साथ फिर हाजिर हो जाउंगी.
पूजा जी! आपका परिश्रम और लग्न सराहनीय है। आपका प्रयास अन्यों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगा. पुराने दोहाकारों के दोहों की मात्रा गणना (तकतीअ) करते हुए प्रक्षिप्त शब्दों को खोज कर अलग कर दें। शीघ्रता न करें। दोहा पढ़ती-लिखती रहें...अपने-आप उनकी लय का अंतर समझने लगेंगी. अस्तु...
19 कविताप्रेमियों का कहना है :
सभी को नाप दिया है आपने तो ,,,,,
और मुझे तो बड़ा ही मजा आया जब पता लगा के नाम चाहे जो भी हो ,,पर मेरा दोहा सही है,,,,
अपना तो तुक्का फिट ,,,,,
nice analysis
बोलूंगी तो सब बोलेंगे बोलती है.....लेकिन बोलना तो पड़ेगा ही, है ना?
आपने कहा है कि संकोच ना करुँ तो ठीक है फिर से आ गयी हूँ हिम्मत करके. लेकिन अपना हिसाब dodgy ही रहेगा मनु जी की तरह जो आज खूब फुदक रहे हैं. समझ रहे हैं कि उनका तुक्का फिट हो गया है. आप कितना tolerate करते हैं हम सबको और फिर कितने धैर्य से हम सबको समझाते हैं, की हुई भूलों को सुधारते हैं, यह सब हमें अनदेखा नहीं करना चाहिये. आपके उत्साह का 'सलिल' प्रवाह अत्यंत प्रशंशनीय है. इसके बारे में जितना कहो कम है.
आपने मेरे भी दोहों को देखा, सुधारा, कभी सराहा भी और उनकी कमियों को भी बताकर प्रेरणा देने का प्रयास किया बिना डांटे-फटकारे उसके लिए आभारी हूँ. आज यह कुछ दोहे आपकी सेवा में लायी हूँ. इन्हें चाहें आप या चाहें तो मनु जी बतायें कि किस category में रखा जाये. या नीलम जी, अजित जी, पूजा जी और तपन जी भी सुलझाने की कोशिश करें तो और भी अच्छा होगा.
चुप बैठी कब से यहाँ, चित्त यहाँ न लागे
पिंजरे के पंछी सा, मन उड़न को भागे.
अब एक कुंडलिनी:
खुद का लिखा जो समझे, जीत सके मैदान
जो बस उलझा ही रहे, खिंचते उसके कान.
खिंचते उसके कान, फुदकता रहता फिर भी
नक़ल करे कक्षा में, ताकता इधर-उधर भी
पूछ ले अब शन्नो, जो भी सकें राह दिखा
समझ ढंग से यहाँ, तू अपने खुद का लिखा.
कुछ और आ गया दिमाग में तो अब मैं क्या करुँ? चलो बोल देती हूँ:
फुदक रहा कोई यहाँ, तुक्के से दी मात
मेहनत रोज़ जो करें, पीस रहे वह दांत.
आपने लिखा कि सर्प में 48 लघु हैं तब दोहे के अन्त में गुरु लघु कैसे होगा?
दोहे के दूसरे व चौथे चरण की यति guru होने से गलती हो गई है. स्वयं-सुधार का एक सफल या असफल प्रयत्न कर रही हूँ:
चुप बैठी कब से यहाँ, चित्त रहा ना लाग
पिंजरे के पंछी सा, मन कहता है भाग.
आपके बताये दोहा के नियमों को दोहरा , कुछ दोहे लिखें हैं | यदि आपको समय मिले तो इन्हें जांच दीजिये |
नियमों का पालन -
१. १३-११ मात्रायों के पद
२. सम पदों के अंत में गुरु - लघु |
३. गण का मैं अनुमान नहीं लगा पा रहा हूँ ?
४. तुकांत शब्दों से सम पदों का अंत , लयात्मक रखने की कोशिश |
५. पदों में गहरे अर्थ रखने का प्रयास |
दोहे के पद -
रूप - रंग न धन गौरव , आये अंत में काम |
२१ २१ १ ११ २११ = १३, २२ २१ २ २१ = ११
है चरित्र ही स्थायी धन , कर नव चरित्र निर्माण ||
२ १११ २ २२ ११ = १३, ११ ११ १११ 121 = ११
काम मित्रों शत्रु बलवान , करे सभी का नाश |
२१ 1२ ११ ११२१ = १३, १२ १२ २ २१ = ११
रहे सतर्क इससे हम , शमन से हो प्रयास ||
१२ ११२ ११२ ११ =13 १११ २ २ १२१ =11
मृत्यु समय जो करता , मन में हरी का ध्यान |
२२ १११ २ ११२ , ११ २ १२ २ २१ =११
वह जीवन सफल रहे , जाये सीधे धाम ||
११ २१२ १११ 1२ = १३, २२ २२ २१ =११
सब कला - विद्या में नीति , जब जाये है जोड़ |
११ १२ १२ २ २१ =१३, ११ २२ २ २१ =११
पूर्ण हो जाये हर गुण , स्वार्थ का यही तोड़ ||
२१ २ २२ ११ ११ =१३ २१ २ १२ २१ = ११
आपका,
अवनीश तिवारी
अजित जी ही ठीक लगें, इस नेकी के हेतु
बाकी के वानर यहाँ, बाँध न सकें सेतु.
शुभ-रात्रि!
With slight correction:
अजित जी ही ठीक लगें, इस नेकी के हेतु
बाकी के वानर यहाँ, बाँध सकें न सेतु.
शुभ-रात्रि!
मुझे आचार्य जी ने गुरूतर कार्य दे दिया है अभी तो मैं स्वयं ही विद्यार्थी हूँ, लेकिन फिर भी प्रयास करती हूँ। आप द्वारा रचित दोहों की मात्राएं इस प्रकार होनी चाहिए, यदि कहीं गल्ती हो तो आचार्य जी सुधारेंगे।
रूप - रंग न धन गौरव , आये अंत में काम |
21 11 1 11 211 = 12, 22 21 2 21=12
है चरित्र ही स्थायी धन , कर नव चरित्र निर्माण ||
२ १११ २ २२ ११ = १३, ११ ११ १११ 221 = 12
काम मित्रों शत्रु बलवान , करे सभी का नाश |
२१ 1२ ११ ११२१ = १३, १२ १२ २ २१ = ११
रहे सतर्क इससे हम , शमन से हो प्रयास ||
१२ ११1 ११२ ११ =12 १११ २ २ १२१ =11
मृत्यु समय जो करता , मन में हरी का ध्यान |
1२ १११ २ ११२ , ११ २ १२ २ २१ =११
वह जीवन सफल रहे , जाये सीधे धाम ||
११ २१२ १११ 1२ = १३, २२ २२ २१ =११
सब कला - विद्या में नीति , जब जाये है जोड़ |
११ १२ १२ २ २१ =१३, ११ २२ २ २१ =११
पूर्ण हो जाये हर गुण , स्वार्थ का यही तोड़ ||
२१ २ २२ ११ ११ =१३ २१ २ १२ २१ = ११
साथ ही दोहे के द्वितीय और चतुर्थ चरण का अन्तिम अक्षर समान होना चाहिए। पहले दोहे में काम/निर्माण, दूसरे में नाश/प्रयास, तीसरे में ध्यान/धाम सही नहीं है जबकि चौथे में जोड़/तोड़ सही है। यदि मात्राएं सही होंगी तो स्वत: ही लय भी बनेगी। इसी के साथ दोहे के प्रथम शब्द में जगण अर्थात 121 मात्राओं का प्रयोग वर्जित है। आपके लिखने के क्रम से अर्थ में भी बदलाव दिखायी देता है। जैसे आए अन्त में काम। फिर भी आपका प्रयास और आपके विचार स्वागत योग्य हैं, हम भी ऐसे ही सीख रहे हैं, आप भी शीघ्र ही समाधान पा जाएंगे।
आपने बहुत अच्छा कार्य किया है, कसौटी पर खरी उतरीं हैं, आपको बधाई.
संशोधन के कार्य में संकोच न करें. अवनीश जी के दोहों में अभी भी लय-दोष है. आप चाहें तो कुछ शब्द बदल सकती हैं,
अगली गोष्ठी में अब तक के पाठों का संक्षिप्त सार दोहराने की दृष्टि से प्रस्तुत कीजिये ताकि विलंब से आनेवाले छात्र अब तक की पढ़ाई से परिचत हो ले..
आचार्य जी ने मुझे आपके दोहों को सही करने का गृहकार्य दिया है। आपके तीन दोहों को आपकी भावना के अनुरूप लिखने का प्रयास कर रही हूँ, आशा है आचार्य जी इन्हें पास कर देंगे।
1 रूप रंग न धन दौलत, आये अंत न काम
बस चरित्र हॅ स्थायी धन, बन जाएगा राम।
2 मन में हरि का ध्यान धरे, मरण समय जो लोग
जीवन उनका सफल है, स्वर्ग लोक का जोग।
3 कला औ विद्या में नीति, का लगता है जोड़
तब सारे गुण पूर्ण हो, यही स्वार्थ का तोड़।