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सोमवार, 1 जुलाई 2019

राजर्षि टंडन

पुरूषोत्तम दास टंडन (१ अगस्त १८८२ इलाहाबाद - १ जुलाई, १९६२) भारत के स्वतन्त्रता सेनानी थे। हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा के पद पर प्रतिष्ठित करवाने में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान था। वे भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के अग्रणी पंक्ति के नेता, समर्पित राजनयिक, हिन्दी के अनन्य सेवक, कर्मठ पत्रकार, तेजस्वी वक्ता और समाज सुधारक भी थे। हिन्दी को भारत की राजभाषा का स्थान दिलवाने के लिए उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान किया। १९५० में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष बने। उन्हें भारत के राजनैतिक और सामाजिक जीवन में नयी चेतना, नयी लहर, नयी क्रान्ति पैदा करने वाला कर्मयोगी कहा गया। वे जन सामान्य में राजर्षि (संधि विच्छेदः राजा+ऋषि= राजर्षि अर्थात ऐसा प्रशासक जो ऋषि के समान सत्कार्य में लगा हुआ हो।) के नाम से प्रसिद्ध हुए। कुछ विचारकों के अनुसार स्वतंत्रता प्राप्त करना उनका पहला साध्य था। वे हिन्दी को देश की आजादी के पहले आजादी प्राप्त करने का साधन मानते रहे और आजादी मिलने के बाद आजादी को बनाये रखने का। टण्डन जी का राजनीति में प्रवेश हिन्दी प्रेम के कारण ही हुआ। १७ फ़रवरी १९५१ को मुजफ्फरनगर 'सुहृद संघ` के १७ वें वार्षिकोत्सव के अवसर पर उन्होंने अपने भाषण में इस बात को स्वीकार भी किया था।

पुरुषोत्तम दास टंडन की प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय सिटी एंग्लो वर्नाक्यूलर विद्यालय में हुई। १८९४ में उन्होंने इसी विद्यालय से मिडिल की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसी वर्ष उनकी बड़ी बहन तुलसा देवी का स्वर्गवास हो गया। १८९७ में हाई स्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उनका विवाह मुरादाबाद निवासी नरोत्तमदास खन्ना की पुत्री चन्द्रमुखी देवी के साथ हो गया। १८९९ कांग्रेस के स्वयं सेवक बने, १८९९ इण्टरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण की और १९०० में वे एक कन्या के पिता बने। इसी बीच वे स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के म्योर सेण्ट्रल कॉलेज में प्रवेश लिया किंतु अपने क्रांतिकारी कार्यकलापों के कारण उन्हें १९०१ में वहाँ से निष्कासित कर दिया गया। १९०३ में उनके पिता का निधन हो गया। इन सब कठिनाइयों को पार करते हुए उन्होंने १९०४ में बी०ए० कर लिया। १९०५ से उनके राजनीतिक जीवन का प्रारंभ हुआ। १९०५ में उन्होंने बंगभंग आन्दोलन से प्रभावित होकर स्वदेशी का व्रत धारण किया, विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के रूप में चीनी खाना छोड़ दिया और गोपाल कृष्ण गोखले के अंगरक्षक के रूप में कांग्रेस के अधिवेशन में भाग लिया। १९०६ में उन्हें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रतिनिधि चुना गया। इस बीच अनेक पत्र पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित होने लगी थी। उनकी प्रसिद्ध रचना 'बन्दर सभा महाकाव्य' 'हिन्दी प्रदीप' में प्रकाशित हुई। उन्होंने १९०६ में एलएल.बी की उपाधि प्राप्त कर वकालत प्रारंभ की। उन्होंने १९०७ में इतिहास में स्नात्कोत्तर उपाधि प्राप्त की और इलाहाबाद उच्च न्यायालय में उस समय के नामी वकील तेज बहादुर सप्रू के जूनियर बन गए। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में टण्डन जी ने एक योद्धा की भूमिका का निर्वाह किया। अपने विद्यार्थी जीवन में १८९९ से ही काँग्रेस पार्टी के सदस्य थे। १९०६ में वे इलाहाबाद से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रतिनिधि चुने गये। १९१९ में जलियांवाला बाग हत्याकाँड का अध्ययन करने वाली काँग्रेस पार्टी की समिति से भी वे संबद्ध थे। १९२० में असहयोग आन्दोलन प्रारम्भ हुआ। गाँधी जी के आह्वान पर वे वकालत के फलते-फूलते पेशे को छोड़कर सत्याग्रह में कूद पड़े। सन् १९३० में सविनय अवज्ञा आन्दोलन में बस्ती में गिरफ्तार हुए और कारावास का दण्ड मिला।

१९३१ में लंदन में आयोजित गोलमेज सम्मेलन से गांधी जी के वापस लौटने से पहले जिन स्वतंत्रता सेनानियों को गिरफ्तार किया गया था उनमें जवाहरलाल नेहरू के साथ पुरुषोत्तम दास टंडन भी थे। १९३४ में उन्होंने बिहार की प्रादेशिक किसान सभा के अध्यक्ष पद को सुशोभित किया और बिहार किसान आंदोलन के साथ सहानुभूति रखते हुए उनके विकास के अनेक कार्य किये। उन्होंने ३१ जुलाई १९३७ से १० अगस्त १९५० तक उत्तर प्रदेश की विधान सभा के प्रवक्ता के रूप में कार्य किया। सन् १९३७ में धारा सभाओं के चुनाव हुए। इन चुनावों में से ग्यारह प्रान्तों में से सात में कांग्रेस को बहुमत मिला। उत्तर प्रदेश में भी कांग्रेस को भारी सफलता मिली और इसका पूरा श्रेय टण्डन जी को था। श्री लाल बहादुर शास्त्री लिखते हैं- सन् १९३६-३७ में नयी प्रान्तीय धारा सभाओं के चुनाव हुए, जिसमें कांग्रेस ने पूरी शक्ति से भाग लिया। उत्तर प्रदेश में भी कांग्रेस को भारी सफलता मिली और इसका पूरा श्रेय टण्डन जी को जाता है। उन्होंने सारे प्रदेश में दौरा किया वे स्वयं प्रयाग नगर से विधान सभा के लिए खड़े हुए और निर्विरोध विजयी हुए। यह उनके अनुरूप ही था। कुछ समय बाद जब मन्त्रिमण्डल बना, वह धारा सभा के सर्वसम्मत से अध्यक्ष (स्पीकर) चुने गए। टण्डन जी लगातार देश के स्वतंत्रता संग्राम में रत रहे। इसी क्रम में १९४० में नजरबन्द कर लिए गए और एक वर्ष तक जेल में रहे। अगस्त १९४२ को इलाहाबाद में फिर गिरफ्तार हुए और १९४४ में जेल से मुक्त हुए। यह उनकी अन्तिम एवं सातवीं जेल यात्रा थी। उनके संघर्ष और त्याग को लक्षित करते हुए किशोरीदास वाजपेयी जी ने लिखा है- "जब जब राष्ट्रीय संघर्ष हुए, टण्डन जी सबसे आगे रहे। आप खाली बैठना तो जानते ही नहीं।" १९४२ में जब वे जेल से छूटे तो उन्हें दिखलाई पड़ा कि भारतीय समाज में निराशा छायी हुई है, सभी हताश पड़े हुए हैं। अत: उन्होंने 'कांग्रेस प्रतिनिधि असेम्बली' नामक संस्था की स्थापना कर पुन: नई चेतना का संचार किया और जब प्रान्तीय कमेटियाँ बनी तब 'प्रतिनिधि असेम्बली' भंग कर दी गई। टण्डन जी इलाहाबाद नगरपालिका के अध्यक्ष रहे और अनेक साहसी तथा ऐतिहासिक कार्य किये। वे १९४६ में भारत की संविधान सभा में भी चुने गए। १९५२ में लोकसभा के तथा १९५७ में राज्य सभा के सदस्य निर्वाचित हुए। इस प्रकार वे आजीवन भारतीय राजनीति में सक्रिय रहकर उसे दिशा प्रदान करते रहे।

राजर्षि पुरुषोत्तमदास टण्डन भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के अग्रणी पंक्ति के नेता थे। कुछ विचारकों के अनुसार स्वतंत्रता प्राप्त करना उनका पहला साध्य था। हिन्दी को वे साधन मानते थे- "यदि हिन्दी भारतीय स्वतंत्रता के आड़े आयेगी तो मैं स्वयं उसका गला घोंट दूँगा। वे हिन्दी को देश की आजादी के पहले आजादी प्राप्त करने का साधन मानते रहे और आजादी मिलने के बाद आजादी को बनाये रखने का।" यहाँ यह नहीं भूलना चाहिए कि टण्डन जी का राजनीति में प्रवेश हिन्दी प्रेम के कारण ही हुआ। टंडन जी ने ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज में हिंदी के लेक्चरर के रूप में कार्य किया उस समय अटल बिहारी वाजपेई विक्टोरिया कॉलेज के छात्र हुआ करते थे।१७ फ़रवरी १९५१ को मुजफ्फरनगर 'सुहृद संघ' के १७ वें वार्षिकोत्सव के अवसर पर टण्डन जी ने कहा था- "हिन्दी के पक्ष को सबल करने के उद्देश्य से ही मैंने कांग्रेस जैसी संस्था में प्रवेश किया, क्योंकि मेरे हृदय पर हिन्दी का ही प्रभाव सबसे अधिक था और मैंने उसे ही अपने जीवन का सबसे महान व्रत बनाया। हिन्दी साहित्य के प्रति मेरे (उसी) प्रेम ने उसके स्वार्थों की रक्षा और उसके विकास के पथ को स्पष्ट करने के लिए मुझे राजनीति में सम्मिलित होने को बाध्य किया।" टण्डन जी के साध्य स्वतंत्रता और हिन्दी दोनों ही थे।

राजर्षि में बाल्यकाल से ही हिन्दी के प्रति अनुराग था। इस प्रेम को बालकृष्ण भट्ट और मदन मोहन मालवीय जी ने प्रौढ़ता प्रदान करने की। १० अक्टूबर १९१० को काशी में हिन्दी साहित्य सम्मेलन का प्रथम अधिवेशन महामना मालवीय जी की अध्यक्षता में हुआ और टण्डन जी सम्मेलन के मंत्री नियुक्त हुए और हिन्दी की अत्यधिक सेवा की। टण्डन जी ने हिन्दी के प्रचार प्रसार के लिए हिन्दी विद्यापीठ प्रयाग की स्थापना की। इस पीठ की स्थापना का उद्देश्य हिन्दी शिक्षा का प्रसार और अंग्रेजी के वर्चस्व को समाप्त करना था। सम्मेलन हिन्दी की अनेक परीक्षाएँ सम्पन्न करता था। इन परीक्षाओं से दक्षिण में भी हिन्दी का प्रचार प्रसार हुआ। सम्मेलन के इस कार्य का प्रभाव महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में भी पड़ा, अनेक महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में हिन्दी के पाठ्यक्रम को मान्यता मिली। वे जानते थे कि सम्पूर्ण भारत में हिन्दी के प्रसार के लिए अहिन्दी भाषियों का सहयोग अपेक्षित है। शायद उनकी इसी सोच का परिणाम था सम्मेलन में गाँधी का लिया जाना। आगे चलकर 'हिन्दुस्तानी' के प्रश्न पर टण्डन जी और महात्मा गाँधी में मतभेद हुआ। टण्डन जी अपराजेय योद्धा थे। वे सत्य और न्याय के लिए किसी से भी लोहा ले सकते थे। अपने सिद्धान्तों पर चट्टान की तरह अडिग एवं स्थिर रहते थे। परिणामत: गाँधी जी को अपने को सम्मेलन से अलग करना पड़ा, टण्डन जी निरापद अपने मार्ग पर बढ़ते रहे।

सन् १९४९ में जब संविधान सभा में राजभाषा सम्बंधी प्रश्न उठाया गया तो उस समय एक विचित्र स्थिति थी। महात्मा गाँधी तो हिन्दुस्तानी के समर्थक थे ही, पं० नेहरू और डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद तथा अन्य अनेक नेता भी हिन्दुस्तानी के पक्षधर थे, पर टण्डन जी हारे नहीं, झुके नहीं। परिणामत: विजय भी उनकी हुई। ११, १२, १३, १४ दिसम्बर १९४९ को गरमागरम बहस के बाद हिन्दी और हिन्दुस्तानी को लेकर कांग्रेस में मतदान हुआ, हिन्दी को ६२ और हिन्दुस्तानी को ३२ मत मिले। अन्तत: हिन्दी राष्ट्रभाषा और देवनागरी राजलिपि घोषित हुई। हिन्दी को राष्ट्रभाषा और 'वन्देमातरम्' को राष्ट्रगीत स्वीकृत कराने के लिए टण्डन जी ने अपने सहयोगियों के साथ एक और अभियान चलाया था। उन्होंने करोड़ों लोगों के हस्ताक्षर और समर्थन पत्र भी एकत्र किए थे। यहाँ यह उल्लेख कर देना भी अपेक्षित है कि टण्डन जी ने नागरी अंकों को संविधान में मान्यता दिलाने के लिए भरसक कोशिश की इस हेतु उन्होंने उस संस्था को छोड़ा जिसकी सेवा लगभग पाँच दशक तक की। संविधान-सभा में राजर्षि ने अंग्रेजी अंकों का विरोध किया पर नेहरू जी की हिदायत के कारण कांग्रेसी सदस्य श्री कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी, श्री गोपाल स्वामी आयंगर के फार्मूले के पक्ष में रहे। टण्डन जी का विरोध प्रस्ताव गिर गया और नागरी अंक संविधान में मान्यता प्राप्त न कर सके।

हिन्दी को राष्ट्रभाषा और 'वन्देमातरम्' को राष्ट्रगीत स्वीकृत कराने के लिए टण्डन जी ने अपने सहयोगियों के साथ एक और अभियान चलाया था। उन्होंने करोड़ों लोगों के हस्ताक्षर और समर्थन पत्र भी एकत्र किए थे।

साहित्य रचना
राजर्षि के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का आकलन करते समय प्राय: उनके साहित्यकार रूप को अनदेखा कर दिया जाता है। वह एक उच्चकोटि के रचनाकार थे। उनकी रचनाओं में तत्कालीन इतिहास की खोज की जा सकती है। साहित्यकार के रूप में टण्डन जी निबंधकार, कवि और पत्रकार के रूप में दिखलाई पड़ते हैं। उनके निबंध हिन्दी भाषा और साहित्य, धर्म और संस्कृति तथा अन्य विविध क्षेत्रों से सम्बंधित हैं। भाषा और साहित्य सम्बंधी निबंधों में- कविता, दर्शन और साहित्य, हिन्दी साहित्य का कानन, हिन्दी राष्ट्रभाषा क्यों, मातृभाषा की महत्ता, भाषा का सवाल, गौरवशाली हिन्दी, हिन्दी की शक्ति, कवि और दार्शनिक आदि विशेष उल्लेखनीय हैं। धर्म और संस्कृति सम्बंधी निबंधों में- भारतीय संस्कृति और कुम्भमेला, भारतीय संस्कृति संदेश तथा अन्य निबंधों में लोककल्याणकारी राज्य, धन और उसका उपयोग, स्वामी विवेकानन्द और सरदार वल्लभ भाई पटेल आदि अति महत्वपूर्ण हैं।
काव्य
काव्य रचनाओं में 'बन्दर सभा महाकाव्य', 'कुटीर का पुष्प' और 'स्वतंत्रता' अपना ऐतिहासिक महत्व रखती हैं। इन कविताओं में राष्ट्रीयता और देशभक्ति की प्रमुखता है। उनकी रचनाओं में काव्यशास्त्र की बारीकी ढूँढ़ना छिद्रान्वेषण करना ही होगा, किन्तु युगीन यथार्थ की अभिव्यक्ति टण्डन जी ने जिस ढँग से की है, वह निश्चय ही श्लाघनीय है-

एक एक के गुण नहिं देखें, ज्ञानवान का नहिं आदर,
लड़ैं कटैं धन पृथ्वी छीनैं जीव सतावैं लेवैं कर।
भई दशा भारत की कैसी चहूँ ओर विपदा फैली,
तिमिर आन घोर है छाया स्वारथ साधन की शैली ॥
अपनी अपनी चाल ढाल को सब कोऊ धर-धर छप्पर पर,
चले लुढ़कते बुरी प्रथा पर जिसका कहीं पैर नहिं सिर।
धनी दीन को दुख अति देवैं, हमदर्दी का काम नहीं,
धन मदिरा गनिका में फूँकै करैं भला कुछ काम नहीं ॥३

'बन्दर सभा महाकाव्य` में आल्हा शैली में अंग्रेजों की नीतियों का भंडाफोड़ किया है। उन्होंने अंग्रेजों के प्रति जो चुटकियाँ ली हैं उनमें से एक-दो का आनन्द आप भी लीजिए-

कबहूँ आँख दाँत दिखलावैं, लें डराय बस काम निकाल।
कबहूँ नम होय सीख सुनावैं, रचैं बात कै जाल कराल ॥४४॥
ऐसे वैसे तो डर जावैं या फँस जावैं हमारे जाल।
जौने तनिक अकड़ने वाले तिनके लिए अनेकन चाल ॥४५॥

पत्रकारिता
पत्रकारिता के क्षेत्र में टण्डन जी अंग्रेजी के भी उद्भट विद्वान थे। श्री त्रिभुवन नारायण सिंह जी ने उल्लेख किया है कि सन् १९५० में जब वे कांग्रेस के सभापति चुने गए तो उन्होंने अपना अभिभाषण हिन्दी में लिखा और अंग्रेजी अनुवाद मैंने किया। श्री सम्पूर्णानन्द जी ने भी उस अंग्रेजी अनुवाद को देखा, लेकिन जब टण्डन जी ने उस अनुवाद को पढ़ा, तो उसमें कई पन्नों को फिर से लिखा। तब मुझे इस बात की अनुभूति हुई कि जहाँ वे हिन्दी के प्रकाण्ड विद्वान थे, वहीं अंग्रेजी साहित्य पर भी उनका बड़ा अधिकार था।

भारतीय संस्कृति से प्रेम
पुरुषोत्तमदास टण्डन के बहु आयामी और प्रतिभाशाली व्यक्तित्व को देखकर उन्हें 'राजर्षि` की उपाधि से विभूषित किया गया। १५ अप्रैल सन् १९४८ की संध्यावेला में सरयू तट पर वैदिक मंत्रोच्चार के साथ महन्त देवरहा बाबा ने आपको 'राजर्षि` की उपाधि से अलंकृत किया। कुछ लोगों ने इसे अनुचित ठहराया, पर ज्योतिर्मठ के श्री शंकराचार्य महाराज ने इसे शास्त्रसम्मत माना और काशी की पंडित सभा ने १९४८ के अखिल भारतीय सांस्कृतिक सम्मेलन के उपाधि वितरण समारोह में इसकी पुष्टि की। तब से यह उपाधि उनके नाम के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई स्वयं अलंकृत हो रही है।

भारतीय संस्कृति के परम हिमायती और पक्षधर होने पर भी राजर्षि रूढ़ियों और अंधविश्वासों के कट्टर विरोधी थे। उन्होंने भारतीय समाज में व्याप्त बुराइयों एवं कुप्रथाओं पर भी अपने दो टूक विचार व्यक्त किये। उनमें एक अद्भुत आत्मबल था, जिससे वे कठिन से कठिन कार्य को आसानी से सम्पन्न कर लेते थे। बालविवाह और विधवा विवाह के सम्बंध में उनका मानना था कि "विधवा विवाह का प्रचार हमारी सभ्यता, हमारे साहित्य और हमारे समाज संगठन के मुख्य आधार पतिव्रत धर्म के प्रतिकूल हैं" उन्होंने स्पष्ट किया कि विधवा-विवाह की माँग इसलिए जोर पकड़ रही है, क्योंकि हमारे समाज में बाल-विवाह की शास्त्र विरुद्ध प्रणाली चल पड़ी है और बाल विधवाओं का प्रश्न ही भारतीय समाज की मुख्य समस्या है। अत: "बाल-विवाह की प्रथा को रोकना ही विधवा विवाह करने की अपेक्षा अधिक महत्व का कर्तव्य सिद्ध होता है।" उनके व्यक्तित्व के इस पहलू के एक-दो उदाहरण पर्याप्त होंगे- प्राय: लोग समझते हैं कि पका हुआ भोजन सुपाच्य होता है, पर राजर्षि ने इसे एक रूढ़ि माना और उन्होंने वर्षों तक आग से पके हुए भोजन को नहीं ग्रहण किया। चीनी खाना एक बार छोड़ दिया। एक ओर उन्हें गाय के दूध से परहेज था तो दूसरी ओर चमड़े के जूते से। इस प्रकार वे एक अद्भुत व्यक्तित्व के धारक थे।

भारतवर्ष में स्वतंत्रता के पूर्व से ही साम्प्रदायिकता की समस्या अपने विकट रूप में विद्यमान रही। कुछ नेता टण्डन जी पर भी सांप्रदायिक होने का आरोप लगाते रहे हैं। यह सच है कि राजर्षि अपनी संस्कृति के परम भक्त और पोषक थे। वे यह कहने में भी हिचक का अनुभव नहीं करते थे कि भारत में दो संस्कृतियों को जीवित रखना देश के साथ विश्वासघात करना होगा, पर इसका मतलब यह नहीं था कि टण्डन जी साम्प्रदायिक थे, मुसलिम विरोधी थे। इस सम्बंध में कुलकुसुम के विचार कितने सार्थक हैं- यदि किसी धर्म या संस्कृति में कोई व्यक्ति विशेष आस्था रखता है, तो उसके विरोधी प्राय: यह समझने की भूल कर बैठते हैं कि वह आदमी अन्य धर्मों तथा संस्कृतियों का शत्रु है। यही बात राजर्षि टण्डन के साथ हुई। उनके अनन्य हिन्दी प्रेम, भारतीय संस्कृति एवं परम्पराओं की एकनिष्ठा, आस्था और साधुओं के से वेष-विन्यास को देखकर उनके विरोधियों ने जान बूझकर या अनजाने ही यह प्रचार करने की भूल कर दी कि टण्डन जी मुसलमानों के शत्रु हैं।

स्वयं टण्डन जी ने भी लिखा है- "मेरे हिन्दी के काम के कारण लोगों ने मुझे मुसलमान भाइयों का मुखालिफ समझ लिया। इन लोगों को यह नहीं मालूम कि बहुत से मुसलमान मेरे कितने अच्छे दोस्त हैं। मेरे सामने यदि कोई मुसलमान के साथ अन्याय करे, तो मैं उसके पक्ष में जान की बाजी लगा दूँगा। वास्तव में टण्डन जी का व्यक्तित्व मानववादी था। उनके घर पर जो बालक उनका सहयोग करता था, वह मुसलमान था, पर कैसी विडम्बना है कि लोग कहते हैं कि टण्डन जी साम्प्रदायिक थे।

मानवतावादी आचार-विचार
राजर्षि टण्डन जी के व्यक्तित्व के अन्य अनेक पहलू और भी हैं; जैसे वे गरीबों, पीड़ितों के सहायक थे, सही अर्थों में दीनबंधु थे, करुणा की मूर्ति थे और बाबू जी कितने नैतिक आचरण के व्यक्ति थे इसका अनुमान इस उदाहरण से लगाया जा सकता है- "सन् १९५० का महाकुम्भ था। बहुआ (टण्डन जी की धर्मपत्नी, जिन्हें घर में इसी नाम से जाना जाता है) ने गंगा स्नान के लिए गाड़ी से जाने की बात कही। बाबू जी ने उत्तर दिया कि गाड़ी 'स्पीकर` की है। तुम मेरे साथ तो जा सकती हो, किन्तु अकेले नहीं।"

राजर्षि का व्यक्तित्व बहुआयामी और राजर्षि के अनुरूप था। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। वे हिन्दी के अनन्य प्रेमी ही नहीं, बल्कि हिन्दी के पर्याय थे। हिन्दी साहित्य के इतिहास में उनका उल्लेख एक समर्थ कवि और निबंध लेखक के रूप में होता है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अमर संनानियों में उनकी गणना अग्रिम पंक्ति के सेनानियों में की जाती है और उनका नाम भारतीय स्वंतंत्रता संग्राम के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों से अंकित है। वे परम स्नेही, उदार और करुणा की मूर्ति होते हुए भी इस्पाती व्यक्तित्व के धारक थे। हिमालय की तरह अचल और अटल। परम हिन्दी सेवी, राष्ट्र-भक्त और भारतीय संस्कृति के इस उपासक को मेरा शत् शत् नमन।

"देखने में एक अस्थिपंजर किन्तु आँखों में अनन्त ज्योतिराशि, मन में अजस्र आत्म शक्ति, माथे की चिन्तित रेखाओं में युग का संघर्ष, वाणी में निसंग निष्ठा, संकेतों में विश्वास और अस्त-व्यस्त केशों तथा रूखे सूखे कलेवर में अनन्त जीवन रस। छेड़िये तो तपस्वी की विभूति मिले, मौन रूप देखिये तो निर्विकल्प समाधि की परिधि तक चले जाइये। विरोध करिये तो फौलाद के स्पर्श का भान मिले। स्वीकृति दीजिए तो एक दिव्य आलोक की अनुभूति।"

"हिन्दी के पक्ष को सबल करने के उद्देश्य से ही मैंने कांग्रेस जैसी संस्था में प्रवेश किया, क्योंकि मेरे हृदय पर हिन्दी का ही प्रभाव सबसे अधिक था और मैंने उसे ही अपने जीवन का सबसे महान व्रत बनाया।...... हिन्दी साहित्य के प्रति मेरे (उसी) प्रेम ने उसके स्वार्थों की रक्षा और उसके विकास के पथ को स्पष्ट करने के लिए मुझे राजनीति में सम्मिलित होने को बाध्य किया।"

देश का सर्वोच्च सम्मान
में उन्हें भारतवर्ष का सर्वोच्च राजकीय सम्मान भारत रत्न प्रदान किया गया। राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन की स्मृति में राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय फाफामऊ इलाहबाद में है। इस विश्वविद्यालय की स्थापना उत्तर प्रदेश राजर्षि टण्डन मुक्त विश्वविद्यालय, अधिनियम १९९९ उत्तर प्रदेश के अन्तर्गत हुई।

पुरूषोत्तम दास टंडन

राजर्षि टंडन के प्रति काव्यांजलि
गजेंद्र सिंह सोलंकी
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संबंधित इमेजभारत के रतन त्याग तप मूरत वह, यशस्वी जीवनी जिलाकर चले गये।
दृढ़व्रती पुरुषोत्तम राजर्षि टंडन जी, निति और मर्यादा हिट काया को कसे गये।
हिंदी के प्राण संस्कृति की धरोहर महा, स्वातंत्र्य समर में कण-कण घिसे गये।
हिंदी की गाथा का पर्याय बना जीवन तप, भारत की गाथा नखत बन जड़े गये।
*
सृष्टि का नियम सच है सबको ही जाना है, किंतु कुछ गये ऐसे गये भी नहीं गये।
मौत कब मार सकी देह भले ले गयी वो, कृत्यों की कीर्ति तो किरीट पर जड़े गये।
रे पावन संस्कृति के पुनीत प्रवाह में काया का अर्ध्य चढ़ा नाता पथ गढ़े गये।
हैं कर गये प्रशस्त मानवी प्रशस्तियाँ वो अपनी प्रशस्तियाँ हेय मान छडे गये।
(छंदसि त्रिविधा)
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घनाक्षरी

कार्यशाला: रचना-प्रति रचना 
घनाक्षरी 
फेसबुक
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गुरु सक्सेना नरसिंहपुर मध्य प्रदेश
*
चमक-दमक साज-सज्जा मुख-मंडल पै
तड़क-भड़क भी विशेष होना चाहिए।
आत्म प्रचार की क्रिकेट का हो बल्लेबाज
लिस्ट कार्यक्रमों वाली पेश होना चाहिए।।
मछली फँसानेवाले काँटे जैसी शब्दावली
हीरो जैसा आकर्षक भेष होना चाहिए।
फेसबुक पर मित्र कैसे मैं बनाऊँ तुम्हे
फेसबुक जैसा भी तो फेस होना चाहिए।।
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फेस 'बुक' हो ना पाए, गुरु यही बेहतर है
फेस 'बुक' हुआ तो छुडाना मजबूरी है।
फेस की लिपाई या पुताई चाहे जितनी हो
फेस की असलियत जानना जरूरी है।।
फेस रेस करेगा तो पोल खुल जायेगी ही
फेस फेस ना करे तैयारी जो अधूरी है।
फ़ेस देख दे रहे हैं लाइक पे लाइक जो
हीरो जीरो, फ्रेंडशिप सिर्फ मगरूरी है।।
***
salil.sanjiv@gmail.com
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

मुक्तिका

मुक्तिका:
ज़ख्म कुरेदेंगे....
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ज़ख्म कुरेदोगे तो पीर सघन होगी.
शोले हैं तो उनके साथ अगन होगी..
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छिपे हुए को बाहर लाकर क्या होगा?
रहा छिपा तो पीछे कहीं लगन होगी..
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मत उधेड़-बुन को लादो, फुर्सत ओढ़ो.
होंगे बर्तन चार अगर खन-खन होगी..
*
फूलों के शूलों को हँसकर सहन करो.
वरना भ्रमरों के हाथों में गन होगी..
*
बीत गया जो रीत गया उसको भूलो.
कब्र न खोदो, कोई याद दफन होगी..
*
आज हमेशा कल को लेकर आता है.
स्वीकारो, वरना कल से अनबन होगी..
*
नेह नर्मदा 'सलिल' हमेशा बहने दो.
अगर रुकी तो मलिन और उन्मन होगी..
१-७-२०१०
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दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

घनाक्षरी

कल और आज: घनाक्षरी
कल :
कज्जल के कूट पर दीप शिखा सोती है कि,
श्याम घन मंडल मे दामिनी की धारा है ।
भामिनी के अंक में कलाधर की कोर है कि,
राहु के कबंध पै कराल केतु तारा है ।
शंकर कसौटी पर कंचन की लीक है कि,
तेज ने तिमिर के हिये मे तीर मारा है ।
काली पाटियों के बीच मोहनी की माँग है कि,
ढ़ाल पर खाँड़ा कामदेव का दुधारा है ।
काले केशों के बीच सुन्दरी की माँग की शोभा का वर्णन करते हुए कवि ने ८ उपमाएँ दी हैं.-
१. काजल के पर्वत पर दीपक की बाती.
२. काले मेघों में बिजली की चमक.
३. नारी की गोद में बाल-चन्द्र.
४. राहु के काँधे पर केतु तारा.
५. कसौटी के पत्थर पर सोने की रेखा.
६. काले बालों के बीच मन को मोहने वाली स्त्री की माँग.
७. अँधेरे के कलेजे में उजाले का तीर.
८. ढाल पर कामदेव की दो धारवाली तलवार.
कबंध=धड़. राहु काला है और केतु तारा स्वर्णिम, कसौटी के काले पत्थर पर रेखा खींचकर सोने को पहचाना जाता है. ढाल पर खाँडे की चमकती धार. यह सब केश-राशि के बीच माँग की दमकती रेखा का वर्णन है.
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आज : संजीव 'सलिल'
संसद के मंच पर, लोक-मत तोड़े दम,
राजनीति सत्ता-नीति, दल-नीति कारा है ।
नेताओं को निजी हित, साध्य- देश साधन है,
मतदाता घुटालों में, घिर बेसहारा है ।
'सलिल' कसौटी पर, कंचन की लीक है कि,
अन्ना-रामदेव युति, उगा ध्रुवतारा है।
स्विस बैंक में जमा जो, धन आये भारत में ,
देर न करो भारत, माता ने पुकारा है।
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घनाक्षरी: वर्णिक छंद, चतुष्पदी, हर पद- ३१ वर्ण, सोलह चरण-
हर पद के प्रथम ३ चरण ८ वर्ण, अंतिम ४ चरण ७ वर्ण.
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१-७-२०१२
Acharya Sanjiv verma 'Salil'
HINDIHINDI.IN.DIVYANARMADA
DIVYANARMADA.BLOGSPOT.
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अचल धृति छंद

रसानंद दे छंद नर्मदा ३६ : अचल धृति छंद
दोहा, सोरठा, रोला, आल्हा, सार, ताटंक, रूपमाला (मदन), चौपाई, हरिगीतिका, उल्लाला,गीतिका,घनाक्षरी, बरवै, त्रिभंगी, सरसी, छप्पय, भुजंगप्रयात, कुंडलिनी, सवैया, शोभन या सिंहिका, सुमित्र, सुगीतिका, शंकर, मनहरण (कवित्त/घनाक्षरी), उपेन्द्रवज्रा, इंद्रवज्रा, सखी तथा वासव छंदों से साक्षात के पश्चात् मिलिए अचल धृति छंद से
अचल धृति छंद
संजीव
*
छंद विधान: सूत्र: ५ न १ ल, ५ नगण १ लघु = ५ (१ + १ +१ )+१ = हर पद में १६ लघु मात्रा, १६ वर्ण
उदाहरण:
१. कदम / कदम / पर ठ/हर ठ/हर क/र
ठिठक / ठिठक / कर सि/हर सि/हर क/र
हुलस / हुलस / कर म/चल म/चल क/र
मनसि/ज सम / खिल स/लिल ल/हर क/र
२. सतत / अनव/रत प/थ पर / पग ध/र
अचल / फिसल / गर सँ/भल ठि/ठकक/र
रुक म/त झुक / मत चु/क मत / थक म/त
'सलिल' / विहँस/कर प्र/वह ह/हरक/र
३. खिल-खिल ख़िलक़र मुकुलित मनसिज
हिलमिल झटपट चटपट सरसिज
सचल-अचल सब जग कर सुरभित
दिन कर दिनकर सुर - नर प्रमुदित
***

पीयूषवर्ष छंद

एक बहर दो ग़ज़लें
बहर - २१२२ २१२२ २१२
छन्द- महापौराणिक जातीय, पीयूषवर्ष छंद
*
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
बस दिखावे की तुम्हारी प्रीत है
ये भला कोई वफ़ा की रीत है
साथ बस दो चार पल का है यहाँ
फिर जुदा हो जाए मन का मीत है
ज़िंदगी की असलियत है सिर्फ़ ये
चार दिन में जाए जीवन बीत है
फ़िक्र क्यों हो इश्क़ के अंजाम की
प्यार में क्या हार है क्या जीत है
कब ख़लिश चुक जाए ये किसको पता
ज़िंदगी का आखिरी ये गीत है.
*
संजीव
हारिए मत, कोशिशें कुछ और हों
कोशिशों पर कोशिशों के दौर हों
*
श्याम का तन श्याम है तो क्या हुआ?
श्याम मन में राधिका तो गौर हों
*
जेठ की गर्मी-तपिश सह आम में
पत्तियों संग झूमते हँस बौर हों
*
साँझ पर सूरज 'सलिल' है फिर फ़िदा
साँझ के अधरों न किरणें कौर हों
*
'हाय रे! इंसान की मजबूरियाँ / पास रहकर भी हैं कितनी दूरियाँ' गीत इसी बहर में है।

लघु कथा विजय दिवस

लघु कथा
विजय दिवस
*
करगिल विजय की वर्षगांठ को विजय दिवस के रूप में मनाये जाने की खबर पाकर एक मित्र बोले-
'क्या चोर या बदमाश को घर से निकाल बाहर करना विजय कहलाता है?'
''पड़ोसियों को अपने घर से निकल बाहर करने के लिए देश-हितों की उपेक्षा, सीमाओं की अनदेखी, राजनैतिक मतभेदों को राष्ट्रीयता पर वरीयता और पड़ोसियों की ज्यादतियों को सहन करने की बुरी आदत (कुटैव या लत) पर विजय पाने की वर्ष गांठ को विजय दिवस कहना ठीक ही तो है. '' मैंने कहा.
'इसमें गर्व करने जैसा क्या है? यह तो सैनिकों का फ़र्ज़ है, उन्हें इसकी तनखा मिलती है.' -मित्र बोले.
'''तनखा तो हर कर्मचारी को मिलती है लेकिन कितने हैं जो जान पर खेलकर भी फ़र्ज़ निभाते हैं. सैनिक सीमा से जान बचाकर भाग खड़े होते तो हम और आप कैसे बचते?''
'यह तो सेना में भरती होते समय उन्हें पता रहता है.'
पता तो नेताओं को भी रहता है कि उन्हें आम जनता-और देश के हित में काम करना है, वकील जानता है कि उसे मुवक्किल के हित को बचाना है, न्यायाधीश जनता है कि उसे निष्पक्ष रहना है, व्यापारी जनता है कि उसे शुद्ध माल कम से कम मुनाफे में बेचना है, अफसर जानता है कि उसे जनता कि सेवा करना है पर कोई करता है क्या? सेना ने अपने फ़र्ज़ को दिलो-जां से अंजाम दिया इसीलिये वे तारीफ और सलामी के हकदार हैं. विजय दिवस उनके बलिदानों की याद में हमारी श्रद्धांजलि है, इससे नयी पीढी को प्रेरणा मिलेगी.''
प्रगतिवादी मित्र भुनभुनाते हुए सर झुकाए आगे बढ़ गए..
जुलाई 29, 2009
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सवाई /समान छंद


छंद सलिला:
सवाई /समान छंद
संजीव
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छंद-लक्षण: जाति लाक्षणिक, प्रति चरण मात्रा ३२ मात्रा, यति १६-१६, पदांत गुरु लघु लघु ।
लक्षण छंद:
हर चरण समान रख सवाई / झूम झूमकर रहा मोह मन
गुरु लघु लघु ले पदांत, यति / सोलह सोलह रख, मस्त मगन
उदाहरण:
१. राय प्रवीण सुनारी विदुषी / चंपकवर्णी तन-मन भावन
वाक् कूक सी, केश मेघवत / नैना मानसरोवर पावन
सुता शारदा की अनुपम वह / नृत्य-गान, शत छंद विशारद
सदाचार की प्रतिमा नर्तन / करे लगे हर्षाया सावन
२. केशवदास काव्य गुरु पूजित,/ नीति धर्म व्यवहार कलानिधि
रामलला-नटराज पुजारी / लोकपूज्य नृप-मान्य सभी विधि
भाषा-पिंगल शास्त्र निपुण वे / इंद्रजीत नृप के उद्धारक
दिल्लीपति के कपटजाल के / भंजक- त्वरित बुद्धि के साधक
३. दिल्लीपति आदेश: 'प्रवीणा भेजो' नृप करते मन मंथन
प्रेयसि भेजें तो दिल टूटे / अगर न भेजें_ रण, सुख भंजन
देश बचाने गये प्रवीणा /-केशव संग करो प्रभु रक्षण
'बारी कुत्ता काग मात्र ही / करें और का जूठा भक्षण
कहा प्रवीणा ने लज्जा से / शीश झुका खिसयाया था नृप
छिपा रहे मुख हँस दरबारी / दे उपहार पठाया वापिस
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(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामिनीमोहन, काव्य, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिभंगी, त्रिलोकी, दण्डकला, दिक्पाल, दीप, दीपकी, दोधक, दृढ़पद, नित, निधि, निश्चल, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदन,मदनावतारी, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, मृदुगति, योग, ऋद्धि, रसामृत, रसाल, राजीव, राधिका, रामा, रूपमाला, लीला, वस्तुवदनक, वाणी, विरहणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुद्ध ध्वनि, शुभगति, शोभन, समान, सरस, सवाई, सार, सारस, सिद्धि, सिंहिका, सुखदा, सुगति, सुजान, सुमित्र, संपदा, हरि, हेमंत, हंसगति, हंसी)

त्रिभंगी छंद


छंद सलिला:
त्रिभंगी छंद
संजीव
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छंद-लक्षण: जाति लाक्षणिक, प्रति चरण मात्रा ३२ मात्रा, यति १०-८-८-६, पदांत गुरु, चौकल में पयोधर (लघु गुरु लघु / जगण) निषेध।
लक्षण छंद:
रच छंद त्रिभंगी / रस अनुषंगी / जन-मन संगी / कलम सदा
दस आठ आठ छह / यति गति मति सह / गुरु पदांत कह / सुकवि सदा
उदाहरण:
१. भारत माँ परायी / जग से न्यारी / सब संसारी नमन करें
सुंदर फुलवारी / महके क्यारी / सत आगारी / चमन करें
मत हों व्यापारी / नगद-उधारी / स्वार्थविहारी / तनिक डरें
हों सद आचारी / नीति पुजारी / भू सिंगारी / धर्म धरें
२. मिल कदम बढ़ायें / नग़मे गायें / मंज़िल पायें / बिना थके
'मिल सकें हम गले / नील नभ तले / ऊग रवि ढ़ले / बिना रुके
नित नमन सत्य को / नाद नृत्य को / सुकृत कृत्य को / बिना चुके
शत दीप जलाएं / तिमिर हटायें / भोर उगायें / बिना झुके
३. वैराग-राग जी / तुहिन-आग जी / भजन-फाग जी / अविचल हो
कर दे मन्वन्तर / दुःख छूमंतर / शुचि अभ्यंतर अविकल हो
बन दीप जलेंगे / स्वप्न पलेंगे / कर न मलेंगे / उन्मन हो
मिल स्वेद बहाने / लगन लगाने / अमिय बनाने / मंथन हो
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(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामिनीमोहन, काव्य, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिभंगी, त्रिलोकी, दण्डकला, दिक्पाल, दीप, दीपकी, दोधक, दृढ़पद, नित, निधि, निश्चल, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदन,मदनावतारी, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, मृदुगति, योग, ऋद्धि, रसामृत, रसाल, राजीव, राधिका, रामा, रूपमाला, लीला, वस्तुवदनक, वाणी, विरहणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुद्ध ध्वनि, शुभगति, शोभन, सरस, सार, सारस, सिद्धि, सिंहिका, सुखदा, सुगति, सुजान, सुमित्र, संपदा, हरि, हेमंत, हंसगति, हंसी)

मामा भांजा मंदिर

बस्तर में गंगयुगीन स्थापत्य की अनुपम विरासत – मामा भांजा मंदिर 
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बस्तर के इतिहास में सर्वाधिक उपेक्षा गंग शासकों को प्राप्त हुई है यद्यपि दो सौ वर्ष से कुछ अधिक समय तक (498 – 702 ई.) इस राजवंश का दण्डकारण्य वनांचल में आधिपत्य रहा है। सर्वप्रथम बस्तर की प्राचीनतम संदर्भ कृति बस्तर भूषण (1908) से उद्धरण लेते हैं जहाँ केदारनाथ ठाकुर गंग राजवंश के बारे में उल्लेख करते हैं - “लोगों का कथन है कि जगन्नाथ पुरी के राजा गंगवंशीय थे। उनके छ: औरस संताने थी तथा एक दासीपुत्र था। किसी कारणवश राजा ने औरस पुत्रों को राजगद्दी न दे कर दासीपुत्र को दे दिया। परिणामस्वरूप ये छहों राजकुमार इधर उधर विचरण करने लगे तथा उनमे से एक बस्तर में आ कर बारसूर में राज्य करने लगा। उनके साथ बहुत से विद्वान कारीगर तथा अन्य लोग आये। बारसूर आ कर वह मंदिर बनवाने लगा। उस समय बारसूर बहुत ही बड़ा शहर था; क्योंकि वर्तमान बारसूरगढ के आसपास पूर्व, दक्षिण और पश्चिम तीनो ओर चार चार कोस की दूरी पर अच्छे मंदिर और तालाब बने हुए हैं”। डॉ. हीरालाल शुक्ल (एतिहासिक समारम्भ और बस्तर के नल) मानते हैं कि गंगों ने पाँचवी शताब्दी के अंत में इस क्षेत्र में पदार्पण किया होगा; क्योंकि यही वह अवधि है जब कि स्कन्द वर्मा के पश्चात नल अत्यधिक दुर्बल हो जाते हैं और लगभग दो सौ वर्षों तक वे अंधकार में रहते है।
गंग राजाओं के सम्बन्ध में क्रमवार जानकारियाँ अब भी उपलब्ध नहीं हैं। प्राचीनतम ज्ञात गंग राजा हैं इन्द्रवर्मन प्रथम (537 ई.) जिन्होंने जिरजिंगी दानपत्र (537 ई.) जारी किया था तथा स्वयं वे त्रिकलिंगाधिपति की उपाधि धारण करते थे। उल्लेखनीय है कि त्रिकलिंग के अंतर्गत बस्तर का पर्वतीय क्षेत्र, कोरापुट तथा कालाहाण्डी के क्षेत्र प्रमुखता से आते थे। पोन्नुतुरु दानपत्र (562 ई.) के आधार पर अगले ज्ञात गंग शासक हैं सामंतवर्मन; इस काल का सर्वाधिक महत्वपूर्ण उल्लेख प्राप्त होता है कि इन्होंने दंतपुर को छोड कर सौम्यवन को राजधानी बनाया था। नरसिंहपल्ली ताम्रपत्र (577 ई.) तथा उरलाम दानपत्र (578 ई.) के आधार पर कहा जा सकता है कि अगले ज्ञात गंगवंशी राजा थे हस्तिवर्मन। उपलब्ध साक्ष्य यह संकेत देते हैं कि हस्तिवर्मन का काल युद्धों से भरा रहा तथा उन्हें किसी अरातिसंध के साथ निरंतर युद्धरत रहना पड़ा था। इसके पश्चात इन्द्रवर्मन द्वितीय की जानकारी अच्युतपुरम तथा पारलाखिमेण्डी दानपत्र के आधार पर ज्ञात होती है। अस्पष्ट और आधी अधूरी जानकारियों के बीच तेकाली पत्र (652 ई.) के आधार पर इन्द्रवर्मन तृतीय, चिकाकोल पत्र (681 ई.) के आधार पर देवेन्द्रवर्मन प्रथम तथा धर्मलिंगेश्वर दानपत्र (702 ई.) के आधार पर अनंतवर्मन की जानकारी प्राप्त होती है। इसके पश्चात लगभत 760 ई. तक का समय धीरे धीरे व्यवस्थापरिवर्तन का काल बन गया और दक्षिण से आ कर नागों ने बस्तर क्षेत्र पर अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया [एतिहासिक समारम्भ और बस्तर के नल]।
गंग राजाओं का बस्तर में कितना और किस तरह का प्रभाव रहा यह विषय अभी किसी इतिहासकार ने नहीं छुवा है। इतना अवश्य कहा जा सकता है कि नल राजाओं (ईसा पूर्व 600 से 760 ई. तक) की अशक्तता के कारण बिना किसी बड़े प्रतिरोध के गंग राजवंश जो कि जगन्नाथपुरी से अग्रसारित हुआ था ने दण्ड़क वन क्षेत्र में “बाल सूर्य” (वर्तमान बारसूर) नगर की स्थापना की। गंग-शासकों ने अनेकों मंदिर, तालाब बनवाये। आज का बारसूर ग्राम अपने खंड़हरों को सजोए अतीत की ओर झांकता प्रतीत होता है। जंगल और ग्रामीण बस्तियों में सिमट कर रह गयी अतीत की यह राजधानी उन शासकों को तलाशती है, जिन्हे सभ्यता की इबारत लिखनी थी वे अपने पीछे आदिमता का साम्राज्य कैसे छोड़ गये? इसी प्रश्न के साथ बारसूर की गंगवंशीय प्रमुख विरासत अर्थात मामा-भांजा मंदिर पर बात करते हैं। मामा-भांजा मंदिर; यह नाम सुनने वालों को विचित्र लगता है। वस्तुत: इस मंदिर का नाम इससे जुड़ी दंतकथा के कारण है। कहते हैं कि गंगवंशीय राजा का कोई भांजा उत्कल देश से कारीगरों को बुलवा कर इस मंदिर को बनवा रहा था। मंदिर की सुन्दरता ने राजा के मन में जलन की भावना भर दी। इस मंदिर के स्वामित्व को ले कर मामा-भांजा में युद्ध हुआ। मामा को जान से हाँथ धोना पड़ा। भाँजे ने पत्थर से मामा का सिर बनवा कर मंदिर में लगवा दिया फिर भीतर अपनी मूर्ति भी रखवा दी।
उपरोक्त कथा के आलोक में इस मंदिर का बारीकी से प्रेक्षण करते हैं। मंदिर के स्थापत्य पर बहुत विस्तार से डॉ. कामता प्रसाद वर्मा ने कार्य किया है। उनकी शोध कृति “बस्तर की स्थापत्य कला” से प्राप्त विवरणों को विवेचित किया जाये तो कह सकते हैं कि इस मंदिर के भूविन्यास में गर्भगृह तथा अर्ध मंडप निर्मित हैं। मामा-भांजा मंदिर पूर्वाभिमुख है। इसके मंदिर का गर्भगृह आयताकार है जो पूर्व-पश्चिम में 3.10 मीटर लम्बा और 2.80 मीटर चौडा है। गर्भमंदिर के चारो कोनों में एक एक भित्तिस्तम्भ स्थापित हैं जो वर्गाकार (40X40 सेंमी) है। मध्य के अर्ध-भित्ति स्तम्भ अलंकृत है। इस प्रकार गर्भगृह की एक भित्ति में दो भित्तिस्तम्भों के मध्य में एक अलंकृत अर्धभित्ति स्तम्भ तथा उसके दोनो तरफ सर्पयुग्म, कीर्तिमुख तथा जंजीर सहित घंटी का अलंकरण है। गर्भगृह के वितान में कमलपुष्प खिला हुआ तथा अलंकृत है जिसमे तीन परतों में पंखुडियाँ निर्मित हैं। मंदिर की पश्चिमी भित्ति के सहारे ललितासन में द्विभुजी गणेश प्रतिमा स्थापित है। इस प्रतिमा के बायी ओर चतुर्भुजी नरसिंह की प्रतिमा रखी हुई है। ये दोनो ही प्रतिमायें बाद में रखी हुई प्रतीत होती हैं। गर्भगृह की द्वार शाखा के ललाट बिम्ब में चतुर्भुजी गणेश बैठे हुए प्रदर्शित हैं। इस मंदिर का अंतराल आयताकार है, इसके चारो कोनों मे एक एक अलंकृत भित्तिस्तम्भ हैं। मंदिर के शिखर में मध्यरथ, अनुरथ तथा कोणरथ स्पष्ट रूप से विभाजित हैं। इन तीनो रथो में उपर से नीचे तक जालिकावत अलंकरण हैं। शिखर के पूर्वीभाग में अर्धकमलपुष्प आकृति के मध्य एक मानवमुख निर्मित है। संभवत: इसी मुखाकृति के कारण ही वह दंतकथा प्रचलित है जिसके कारण इस मंदिर का नाम मामाभांजा मंदिर पडा। शिखर के उपरी भाग में चारो दिशाओं में एक एक योगी की चतुर्भुजी प्रतिमा स्थापित है जिसके उपरी दायें हाथ में त्रिशूल दिखाई पडता है तो दायाँ हाथ वरद मुद्रा में है। योगी के सिर पर पगडी बंधी हुई है। मंदिर के सामने बायें कोने में एक तेलुगू भाषा में लिखा प्रस्तर स्तम्भ जमीन में गडा हुआ है।
पुरातत्व विभाग ने इस स्थल को घेर कर संतोषजनक पुनरुद्धार कार्य किये हैं। तथापि इस मंदिर के विषय में विशेषज्ञों से बहुत कुछ कहा-सुना जाना अभी शेष है। मंदिर से तेलुगुलिपि में लिखे गये प्रस्तर स्तम्भ का क्या सम्बन्ध है इस पर सभी विवरण और विद्वान मौन हैं। यह मंदिर नागों की स्थापत्यकला के भी बहुत करीब है तथा चन्द्रादित्य मंदिर की संरचना से बहुत साम्यता रखता है। तो क्या नागों ने गंगों की विरासत को ही आगे बढाया अथवा मामा-भांगा मंदिर का कोई सम्बन्ध नागों से भी है? संरचात्मक समकालीनता को आधार बना कर डॉ. कामता प्रसाद वर्मा इस मंदिर का निर्माणकाल 1060 ई. के लगभग मानते हैं। यह कालखण्ड तो बस्तर में नाग सत्ता का ही था। बहुत से सवाल उठते हैं जिसके उत्तर बस्तर के अतीत को समझने की दृष्टि से बहुत आवश्यक हैं।

विमर्श: साईं और स्वरूपानंद जी

विमर्श: 
साईं और स्वरूपानंद जी 
संजीव
*
स्वामी स्वरूपानंद द्वारा उठायी गयी साईं संबंधी आपत्ति मुझे बिलकुल ठीक प्रतीत होती है। एक सामान्य व्यक्ति के नाते मेरी जानकारी और चिंतन के आधार पर मेरा मत निम्न है:

१. सनातन: वह जिसका आदि अंत नहीं है अर्थात जो देश, काल, परिस्थिति का नियंत्रण-मार्गदर्शन करने के साथ-साथ खुद को भी चेतन होने के नाते परिवर्तित करता रहता है, जड़ नहीं होता इसी लोए सनातन धर्म में समय-समय पर देवी-देवता , पूजा-पद्धतियाँ, गुरु, स्वामी ही नहीं दार्शनिक विचार धाराएं और संप्रदाय भी पनपते और मान्य होते रहे हैं।
२. देवता: वेदों में ३३ प्रकार के देवता (१२ आदित्य, १८ रूद्र, ८ वसु, १ इंद्र, और प्रजापति) ही नहीं श्री देवी, उषा, गायत्री आदि अन्य अनेक और भी वर्णित हैं। आत्मा सो परमात्मा, अयमात्मा ब्रम्ह, कंकर सो शंकर, कंकर-कंकर में शंकर, शिवोहं, अहम ब्रम्हास्मि जैसी उक्तियाँ तो हर कण को ईश्वर कहती हैं। आचार्य रजनीश ने खुद को ओशो कहा और आपत्तिकर्ताओं को उत्तर दिया कि तुम भी ओशो हो अंतर यह है की मैं जानता हूँ कि मैं ओशो हूँ, तुम नहीं जानते। अतः साईं को कोई साईं भक्त भगवान माँने और पूजे इसमें किसी सनातन धर्मी को आपत्ति नहीं हो सकती।
३. रामायण महाभारत ही नहीं अन्य वेद, पुराण, उपनिषद, आगम, निगम, ब्राम्हण ग्रन्थ आदि भी न केवल इतिहास हैं न आख्यान या गल्प। भारत में सृजन दार्शनिक चिंतन पर आधारित रहा है। ग्रंथों में पश्चिम की तरह व्यक्तिपरकता नहीं है, यहाँ मूल्यात्मक चिंतन प्रमुख है। दृष्टान्तों या कथाओं का प्रयोग किसी चिंतनधारा को आम लोगों तक प्रत्यक्ष या परोक्षतः पहुँचाने के लिए किया गया है। अतः सभी ग्रंथों में इतिहास, आख्यान, दर्शन और अन्य शाखाओं का मिश्रण है। 
देवताओं को विविध आधारों पर वर्गीकृत किया जा सकता है। यथा: जन्मा - अजन्मा, आर्य - अनार्य, वैदिक, पौराणिक, औपनिषदिक, सतयुगीन - त्रेतायुगीन - द्वापरयुगीन कलियुगीन, पुरुष देवता - स्त्री देवता आदि।

४. बाली, शंबूक, बर्बरीक, अश्वत्थामा, दुर्योधन जैसे अन्य भी अनेक प्रसंग हैं किन्तु इनका साईं से कुछ लेना-देना नहीं है। इनपर अलग-अलग चर्चा हो सकती है। राम और कृष्ण का देवत्व इन पर निर्भर नहीं है।
५. बुद्ध और महावीर का सनातन धर्म से विरोध और नव पंथों की स्थापना लगभग समकालिक होते हुए भी बुद्ध को अवतार मानना और महावीर को अवतार न मानना अर्थात बौद्धों को सनातनधर्मी माना जाना और जैनियों को सनातन धर्मी न माना जाना भी साईं से जुड़ा विषय नहीं है और पृथक विवेचन चाहता है।
६. अवतारवाद के अनुसार देवी - देवता कारण विशेष से प्रगट होते हैं फिर अदृश्य हो जाते हैं, इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि वे नष्ट हो जाते हैं। वे किसी वाहन से नहीं आते - जाते, वे शक्तियां रूपांतरित या स्थानांतरित होकर भी पुनः प्रगट होती हैं, एक साथ अनेक स्थानों पर भी प्रगट हो सकती हैं। यह केवल सनातन धर्म नहीं इस्लाम, ईसाई आय अन्य धर्मों में भी वर्णित है। हरि अनंत हरि कथा अनंता, उनके रूप भी अनंत हैं, प्रभु एक हैं वे भक्त की भावनानुसार प्रगट होते हैं, इसीलिए एक ईश्वर के भी अनेक रूप हैं गोपाल, मधुसूदन, श्याम, कान्हा, मुरारी आदि। इनके मन्त्र, पूजन विधि, साहित्य, कथाएं, माहात्म्य भी अलग हैं पर इनमें अंतर्विरोध नहीं है। सत्यनारायण, शालिग्राम, नृसिंह और अन्य विष्णु के ही अवतार कहे गये हैं।
७. गौतमी, सरस्वती और ऐसे ही अनेक अन्य प्रकरण यही स्थापित करते हैं की सर्व शक्तिमान होने के बाद भी देवता आम जनों से ऊपर विशेषधिकार प्राप्त नहीं हैं, जब वे देह धारण करते हैं तो उनसे भी सामान्य मनुष्यों की तरह गलतियां होती हैं और उन्हें भी इसका दंड भोगना होता है। 'to err is human' का सिद्धांत ही यहाँ बिम्बित है। कर्मफलवाद गीता में भी वर्णित है।
८. रामानंद, नानक, कबीर, चैतन्य, तुलसी, सूर, कबीर, नानक, मीरा या अन्य सूफी फकीर सभी अपने इष्ट के उपासक हैं। 'राम ते अधिक राम के दासा'… सनातन धर्मी किसी देव के भाकर से द्वेष नहीं करता। सिख का अस्तित्व ही सनातन की रक्षा के लिए है, उसे धर्म, पंथ, सम्प्रदाय कुछ भी कहें वह "ॐ" ओंकार का ही पूजक है। एक अकाल पुरुख परमब्रम्ह ही है। सनातन धर्मी गुरुद्वारों को पूजास्थली ही मानता है। गुरुओं ने भी राम,कृष्णादि को देवता मन कर वंदना की है और उनपर साहित्य रचा है।
९. वाल्मीकि को रामभक्त और आदिकवि के नाते हर सनातनधर्मी पूज्य मानता है। कोई उनका मंदिर बनाकर पूजे तो किसी को क्या आपत्ति? कबीर, तुलसी, मीरा की मूर्तियां भी पूजा ग्रहों और मंदिरों में मिल जायेंगी।
१०. साईं ईश्वरतत्व के प्रति नहीं साईं को अन्य धर्मावलम्बियों के मंदिरों, पूजाविधियों और मन्त्रों में घुसेड़े जाने का विरोध है। नमाज की आयात में, ग्रंथसाहब के सबद में, बाइबल के किसी अंश में साईं नाम रखकर देखें आपको उनकी प्रतिक्रिया मिल जाएगी। सनातन धर्मी ही सर्वाधिक सहिष्णु है इसलिए इतने दिनों तक झेलता रहा किन्तु कमशः साईं के नाम पर अन्य देवी-देवताओं के स्थानों पर बेजा कब्ज़ा तथा मूल स्थान पर अति व्यावसायिकता के कारन यह स्वर उठा है।
अंत में एक सत्य और स्वरूपानंद जी के प्रति उनके कांग्रेस मोह और दिग्विजय सिंग जैसे भ्रष्ट नेताओं के प्रति स्नेह भाव के कारण सनातनधर्मियों की बहुत श्रद्धा नहीं रही। मैं जबलपुर में रहते हुए भी आज तक उन तक नहीं गया। किन्तु एक प्रसंग में असहमति से व्यक्ति हमेशा के लिए और पूरी तरह गलत नहीं होता। साईं प्रसंग में स्वरूपानंद जी ने सनातनधर्मियों के मन में छिपे आक्रोश, क्षोभ और असंतोष को वाणी देकर उनका सम्मान पाया है। यह दायित्व साइभक्तों का है की वे अपने स्थानों से अन्य देवी-देवताओं के नाम हटाकर उन्हें साईं को इष्ट सादगी, सरलता और शुचितापरक कार्यपद्धति अपनाकर अन्यों का विश्वास जीतें। चढोत्री में आये धन का उपयोग स्थान को स्वर्ण से मरहने के स्थान पर उन दरिद्रों के कल्याण के लिए हो जिनकी सेवा करने का साईं ने उपदेश दिया। अनेक इत्रों के बयां पढ़े हैं की वे स्वरूपानंद जी के बीसियों वर्षों से भक्त हैं पर साईं सम्बन्धी वक्तव्य से उनकी श्रद्धा नष्ट हो गयी। ये कैसा शिष्यत्व है जो दोहरी निष्ठां ही नहीं रखता गुरु की कोई बात समझ न आने पर गुरु से मार्गदर्शन नहीं लेता, सत्य नहीं समझता और उसकी बरसों की श्रद्धा पल में नष्ट हो जाती है?
अस्तु साईं प्रसंग में स्वरूपानंद जी द्वारा उठाई गयी आपत्ति से सहमत हूँ। 

दोहा सलिला

दोहा सलिला
*
नहीं कार्य का अंत है, नहीं कार्य में तंत। माया है सारा जगत, कहते ज्ञानी संत।।
*
आता-जाता कब समय, आते-जाते लोग। जो चाहें वह कार्य कर, नहीं मनाएँ सोग।।
*
अपनी-पानी चाह है, अपनी-पानी राह। करें वही जो मन रुचे, पाएँ उसकी थाह।।
*
एक वही है चौधरी, जग जिसकी चौपाल। विनय उसी से सब करें, सुन कर करे निहाल।।
*
जीव न जग में उलझकर, देखे उसकी ओर। हो संजीव न चाहता, हटे कृपा की कोर।।
*
मंजुल मूरत श्याम की, कण-कण में अभिराम। देख सके तो देख ले, करले विनत प्रणाम।।
*
कृष्णा से कब रह सके, कृष्ण कभी भी दूर।
उनके कर में बाँसुरी, इनका मन संतूर।।
*
अपनी करनी कर सदा, कथनी कर ले मौन। किस पल उससे भेंट हो, कह पाया कब-कौन??
*
करता वह, कर्ता वही, मानव मात्र निमित्त। निर्णायक खुद को समझ, भरमाता है चित्त।।
*
चित्रकार वह; दृश्य वह, वही चित्र है मित्र।
जीव समझता स्वयं को, माया यही विचित्र।।
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बिंब प्रदीपा ज्योति का, सलिल-धार में देख।
निज प्रकाश मत समझ रे!, चित्त तनिक सच लेख।।
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३०.६.२०१८, ७९९९५५९६१८, ९४२५१८३२४४

शनिवार, 29 जून 2019

पद

पद 
छंद: दोहा.
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मन मंदिर में बैठे श्याम।।
नटखट-चंचल सुकोमल, भावन छवि अभिराम।
देख लाज से गड़ रहे, नभ सज्जित घनश्याम।।
मेघ मृदंग बजा रहे, पवन जप रहा नाम।
मंजु राधिका मुग्ध मन, छेड़ रहीं अविराम।।
छीन बंसरी अधर धर, कहें न करती काम।
कहें श्याम दो फूँक तब, जब मन हो निष्काम।।
चाह न तजना है मुझे, रहें विधाता वाम।
ये लो अपनी बंसरी, दे दो अपना नाम।।
तुम हो जाओ राधिका, मुझे बना दो श्याम।
श्याम थाम कर हँस रहे, मैं गुलाम बेदाम।।
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२९.६.२०१२, ७९९९५५९६१८ / ९४२५१८३२४४

सड़गोड़ासनी

सड़गोड़ासनी: 
जनम भओ किस बिरिया
बुंदेली छंद, विधान: मुखड़ा १५-१६, ४ मात्रा पश्चात् गुरु लघु अनिवार्य,
अंतरा १६-१२, मुखड़ा-अन्तरा सम तुकांत . 

जनम भओ किस बिरिया? सोचो 
मरण हुआ कब जानो? 

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जब-जब सत्य प्रतीति हुई तब
कह-कह नित्य बखानो.
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जब-जब सच ओझल हो प्यारे!
निज करनी अनुमानो.
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चलो सत्य की डगर पकड़ तो
मीत न अरि कुछ मानो.
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देख तिमिर मत मूँदो नयना
अंतर-दीप जलानो.
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तन-मन-देश न मलिन रहे मिल
स्वच्छ करेंगे ठानो.
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ज्यों की त्यों चादर तब जब
जग सपना विहँस भुलानो.
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२९.६.२०१८, ७९९९५५९६१८
salil.sanjiv@gmail.com

मुक्तिका

समस्यापूर्ति 
प्रदत्त पंक्ति- मैं जग को दिल के दाग दिखा दूँ कैसे - बलबीर सिंह।
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मुक्तिका:
(२२ मात्रिक महारौद्र जातीय राधिका छंद) 
मैं जग को दिल के दाग, दिखा दूँ कैसे?
अपने ही घर में आग, लगा दूँ कैसे?
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औरों को हँसकर सजा सुना सकता हूँ
अपनों को खुद दे सजा, सजा दूँ कैसे?
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सेना को गाली बकूँ, सियासत कहकर
निज सुत सेना में कहो, भिजा दूँ कैसे?
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तेरी खिड़की में ताक-झाँक कर खुश हूँ
अपनी खिड़की मैं तुझे दिखा दूँ कैसे?
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'लाइक' कर दूँ सब लिखा, जहाँ जो जिसने
क्या-कैसे लिखना, कहाँ सिखा दूँ कैसे?
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