कुल पेज दृश्य

सोमवार, 17 सितंबर 2018

muktika

मुक्तिका * बाग़ क्यारी फूल है हिंदी ग़ज़ल या कहें जड़-मूल है हिंदी ग़ज़ल . बात कहती है सलीके से सदा- नहीं देती तूल है हिंदी ग़ज़ल . आँख में सुरमे सरीखी यह सजी दुश्मनों को शूल है हिंदी ग़ज़ल . जो सुधरकर खुद पहुँचती लक्ष्य पर सबसे पहले भूल है हिंदी ग़ज़ल . दबाता जब जमाना तो उड़ जमे कलश पर वह धूल है हिंदी ग़ज़ल . है गरम तासीर पर गरमी नहीं मिलो-देखो कूल है हिंदी ग़ज़ल . मुक्तिका है नाम इसका आजकल कायदा है, रूल है हिंदी ग़ज़ल ***
संजीव
१७.९.२०१८
नवगीत:

तलो पकौड़ा
बेचो चाय
*
हमने सबको साथ ले,
सबका किया विकास।
'बना देश में' का दिया,
नारा खासुलखास।
नव धंधा-आजीविका
रोजी का पर्याय
तलो पकौड़ा
बेचो चाय
*
सब मिल उत्पादन करो,
साधो लक्ष्य अचूक।
'भारत में ही बना है'
पीट ढिंढोरा मूक।।
हम कुर्सी तुम सड़क पर
बैठो यही उपाय
तलो पकौड़ा
बेचो चाय
*
लाइसेंस-जीएसटी,
बिना नोट व्यापार।
इनकम कम, कर दो अधिक,
बच्चे भूखे मार।।
तीन-पांच दो गुणित दो
देशभक्ति अध्याय
तलो पकौड़ा
बेचो चाय
***
७-२-२०१८
http://divyanarmada.blogspot.in/

doha muktak

दोहा मुक्तक 
कभी न लगने दीजिए, दुर्व्यसनों की चाट. 
बिन दुश्मन करते व्यसन, खादी हमारी खाट.
कदम-कदम रखकर बढ़ें, गिर-उठ लक्ष्य न भूल 
ईश्वर जब होते सदय, तब हों आप विराट.
*

दोहा

हर पल हिंदी को जिएँ, दिवस न केवल एक।
मानस मैया मानकर, पूजें सहित विवेक।।

karya shala: kundaliya

कार्यशाला: कुण्डलिया
कार्यशाला 
षट्पदी (कुण्डलिया )
*
आओ! सब मिलकर रचें, ऐसा सुंदर चित्र। 
हिंदी पर अभिमान हो, स्वाभिमान हो मित्र।। -विशम्भर शुक्ल 
स्वाभिमान हो मित्र, न टकरायें आपस में।
फूट पड़े तो शत्रु, जयी हो रहे न बस में।।
विश्वंभर हों सदय, काल को जूझ हराओ।
मोदक खाकर सलिल, गजानन के गुण गाओ।। -संजीव 'सलिल'

doha bahubhashi

बहुभाषी दोहा  
संस्कृत दोहा: शास्त्री नित्य गोपाल कटारे
वृक्ष-कर्तनं करिष्यति, भूत्वांधस्तु भवान्। / पदे स्वकीये कुठारं, रक्षकस्तु भगवान्।। 
मैथली दोहा: ब्रम्हदेव शास्त्री
की हो रहल समाज में?, की करैत समुदाय? / किछु न करैत समाज अछि, अपनहिं सैं भरिपाय।।
अवधी दोहा: डॉ. गणेशदत्त सारस्वत
राम रंग महँ जो रँगे, तिन्हहिं न औरु सुहात। / दुनिया महँ तिनकी रहनि, जिमी पुरइन के पात।।
बृज दोहा: महाकवि बिहारी
जु ज्यों उझकी झंपति वदन, झुकति विहँसि सतरात। / तुल्यो गुलाल झुठी-मुठी, झझकावत पिय जात।।
कवि वृंद:
भले-बुरे सब एक सौं, जौ लौं बोलत नांहिं। / जान पडत है काग-पिक, ऋतु वसंत के मांहि।।
बुंदेली दोहा: रामेश्वर प्रसाद गुप्ता 'इंदु'
कीसें कै डारें विथा, को है अपनी मीत? इतै सबइ हैं स्वारथी, स्वारथ करतइ प्रीत।।
पं. रामसेवक पाठक 'हरिकिंकर': नौनी बुंदेली लगत, सुनकें मौं मिठियात। बोलत में गुर सी लगत, फर-फर बोलत जात।।
बघेली दोहा: गंगा कुमार 'विकल'
मूडे माँ कलशा धरे, चुअत प्यार की बूँद। / अँगिया इमरत झर रओ, लीनिस दीदा मूँद।।
पंजाबी दोहा: निर्मल जी
हर टीटली नूं सदा तो, उस रुत दी पहचाण। / जिस रुत महकां बाग़ विच, आके रंग बिछाण।।
-डॉ. हरनेक सिंह 'कोमल'
हलां बरगा ना रिहा, लोकां दा किरदार।/ मतलब दी है दोस्ती, मतलब दे ने यार।।
गुरुमुखी: गुरु नानक
पहले मरण कुबूल कर, जीवन दी छंड आस। / हो सबनां दी रेनकां, आओ हमरे पास।।
भोजपुरी दोहा: संजीव 'सलिल'-
चिउड़ा-लिट्ठी ना रुचे, बिरयानी की चाह।/ नवहा मलिकाइन चली, घर फूँके की राह।।
मालवी दोहा: संजीव 'सलिल'-
भणि ले म्हारा देस की, सबसे राम-रहीम। /जल ढारे पीपल तले, अँगना चावे नीम।।
निमाड़ी दोहा: संजीव 'सलिल'-
रयणो खाणों नाचणो, हँसणो वार-तिवार। / गीत निमाड़ी गावणो, चूड़ी री झंकार।।
छत्तीसगढ़ी दोहा: संजीव 'सलिल'-
जाँघर तोड़त सेठ बर, चिथरा झूलत भेस । / मुटियारी माथा पटक, चेलिक रथे बिदेस ।।
राजस्थानी दोहा:
पुरस बिचारा क्या करै, जो घर नार कुनार। /ओ सींवै दो आंगळा, वा फाडै गज च्यार।।
अंगिका दोहा: सुधीर कुमार
ऐलै सावन हपसलो', लेनें नया सनेस । / आबो' जल्दी बालमां, छोड़ी के परदेश।।
बज्जिका दोहा: सुधीर गंडोत्रा
चाहू जीवन में रही, अपने सदा अटूट। / भुलिओ के न परे दू, अपना घर में फूट।।
हरयाणवी दोहा: श्याम सखा 'श्याम'
मनै बावली मनचली, कहवैं सारे लोग। / प्रेम-प्रीत का लग गया, जिब तै मन म्हं रोग।।
मगही दोहा :
रउआ नामी-गिरामी, मिलल-जुलल घर फोर। / खम्हा-खुट्टा लै चली,
राजस्थानी दोहा:
पुरस बिचारा क्या करै, जो घर नार कुनार। / ओ सींवै दो आंगळा, वा फाडै गज च्यार।।
कन्नौजी दोहा:
ननदी भैया तुम्हारे, सइ उफनाने ताल। / बिन साजन छाजन छवइ, आगे कउन हवाल।।
सिंधी दोहा: चंद्रसिंह बिरकाली
ग्रीखम-रुत दाझी धरा कळप रही दिन रात। / मेह मिलावण बादळी बरस बरस बरसात ।।
दग्ध धरा ऋतु ग्रीष्म से, कल्प रही रही दिन-रात। / मिलन मेह से करा दे, बरस-बरस बरसात।।
गढ़वाली दोहा: कृष्ण कुमार ममगांई
धार अड़ाली धार माँ, गादम जैली त गाड़। / जख जैली तस्ख भुगत ली, किट ईजा तू बाठ।।
सराइकी दोहा: संजीव 'सलिल'
शर्त मुहाणां जीत ग्या, नदी-किनारा हार। / लेणें कू धिक्कार हे, देणे कूँ जैकार।।
मराठी दोहा: वा. न. सरदेसाई
माती धरते तापता, पर्जन्यची आस। / फुकट न तृष्णा भागवी, देई गंध जगास।।
गुजराती दोहा: श्रीमद योगिंदु देव
अप्पा अप्पई जो मुणइ जो परभाउ चएइ। / सो पावइ सिवपुरि-गमणु जिणवरु एम भणेइ।।
दोहा दिव्य दिनेश से साभार

doha yamak

:दोहा सलिला :
गले मिले दोहा-यमक
संजीव
*
चंद चंद तारों सहित, करे मौन गुणगान
रजनी के सौंदर्य का, जब तक हो न विहान
*
जहाँ पनाह मिले वहीं, बस बन जहाँपनाह
स्नेह-सलिल का आचमन, देता शांति अथाह
*
स्वर मधु बाला चन्द्र सा, नेह नर्मदा-हास
मधुबाला बिन चित्रपट, है श्रीहीन उदास
*
स्वर-सरगम की लता का,प्रमुदित कुसुम अमोल
खान मधुरता की लता, कौन सके यश तौल
*
भेज-पाया, खा-हँसा, है प्रियतम सन्देश
सफलकाम प्रियतमा ने, हुलस गहा सन्देश
*
गुमसुम थे परदेश में, चहक रहे आ देश
अब तक पाते ही रहे, अब देते आदेश
*
पीर पीर सह कर रहा, धीरज का विनिवेश
घटे न पूँजी क्षमा की, रखता ध्यान विशेष
*
माया-ममता रूप धर, मोह मोहता खूब
माया-ममता सियासत, करे स्वार्थ में डूब
*
जी वन में जाने तभी, तू जीवन का मोल
घर में जी लेते सभी, बोल न ऊँचे बोल
*
विक्रम जब गाने लगा, बिसरा लय बेताल
काँधे से उतरा तुरत, भाग गया बेताल
*

muktika: mataji

मुक्तिका:
माताजी  
संजीव 'सलिल"
*



















मोटा कांच सुनहरा चश्मा, मानस-पोथी माता जी। 
पीत शिखा सी रहीं दमकती, जगती-सोतीं माताजी।।
*
पापा जी की याद दिलाता, है अखबार बिना नागा।
चश्मा लेकर रोज बाँचना, ख़बरें सुनतीं माताजी।।
*
बूढ़ा तन लेकिन जवान मन, नयी उमंगें ले हँसना।
नाती-पोतों संग हुलसते, थम-चल पापा-माताजी।।
*
इनकी दम से उनमें दम थी, उनकी दम से इनमें दम।
काया-छाया एक-दूजे की, थे-पापाजी-माताजी।।
*
माँ का जाना- मूक देखते, टूट गए थे पापाजी।
कहते: 'मुझे न ले जाती क्यों, संग तुम्हारी माताजी।।'
*
चित्र देखते रोज एकटक, बिना कहे क्या-क्या कहते।
रहकर साथ न संग थे पापा, बिछुड़ साथ थीं माताजी।।
*
यादों की दे गए धरोहर, सांस-सांस में है जिंदा।
हम भाई-बहनों में जिंदा, हैं पापाजी-माताजी।।
*
Acharya Sanjiv verma 'Salil'
94251 83244 / 0761 2411131

bhojpuri

भोजपुरी भाषा की विशेषता
एक शब्द सारे मायने बदल देता है-
के मारी?
केके मारी?
के केके मारी?
केके केके मारी?
के केके केके मारी?
केके केके के के मारी?

शब्द समूह - पर्यायवाची

क्रमांक वाक्यांश या शब्द-समूह = पर्यायवाची शब्द
१. जिसका जन्म नहीं होता = अजन्मा
२. जिसका आदि या आरंभ नहीं होता अनादि
३. जिसका क्षरण नहीं होता = अक्षर 
४. जिसका क्षय नहें होता = अक्षय
५. जो बूढ़ा नहीं होता = अजर
६. जिसका मरण नहीं होता = अमर
७. जो मरण तक हो = आमरण
८. पुस्तकों की समीक्षा करने वाला = समीक्षक, आलोचक
९. जिसे गिना न जा सके = अगिन, अनगिनत
१०. जो कुछ भी नहीं जाने = अज्ञ
११. जो बहुत थोड़ा जाने = अल्पज्ञ
१२. जो बहुत जाने = विज्ञ
१३. जो सब कुछ जाने = सर्वज्ञ
१४. जिसकी आशा न हो = अप्रत्याशित, अचानक, एकाएक
१५. जो इन्द्रियों से परे हो = अतीन्द्रिय
१६. जो आँख से न दिखे = अगोचर, अदृश्य
१७. जो विधान के विपरीत हो = अवैधानिक
१८. जो संविधान के प्रतिकूल हो = असंवैधानिक
१९. जिसे भले -बुरे का ज्ञान न हो = नादान, अविवेकी
२०. जिसके समान कोई दूसरा न हो = अद्वितीय
२१. जिसे वाणी व्यक्त न कर सके अनिर्वचनीय
२२. जैसा पहले कभी न हुआ हो = अभूतपूर्व
२३. जो व्यर्थ का व्यय करता हो = अपव्ययी
२४. बहुत कम खर्च करने वाला = मितव्ययी
२५. सरकारी गजट में छपी सूचना = अधिसूचना
...................
salil.sanjiv@gmail.com
http://divyanarmada.blogspot.com
#hindi_blogger

सामयिक नवगीत

नवगीत 
*
सरहद से 
संसद तक 
घमासान जारी है 
*
सरहद पर आँखों में 
गुस्सा है, ज्वाला है.
संसद में पग-पग पर 
घपला-घोटाला है.
जनगण ने भेजे हैं 
हँस बेटे सरहद पर.
संसद में.सुत भेजें 
नेता जी या अफसर.
सरहद पर 
आहुति है 
संसद में यारी है.
सरहद से 
संसद तक 
घमासान जारी है 
*
सरहद पर धांय-धांय 
जान है हथेली पर.
संसद में कांव-कांव 
स्वार्थ-सुख गदेली पर. 
सरहद से देश को
मिल रही सुरक्षा है.
संसद को देश-प्रेम 
की न मिली शिक्षा है.
सरहद है 
जांबाजी 
संसद ऐयारी है 
सरहद से 
संसद तक 
घमासान जारी है 
*
सरहद पर ध्वज फहरे 
हौसले बुलंद रहें.
संसद में सत्ता हित 
नित्य दंद-फंद रहें.
सरहद ने दुश्मन को 
दी कड़ी चुनौती है.
संसद को मिली 
झूठ-दगा की बपौती है.
सरहद है 
बलिदानी 
संसद-जां प्यारी है. 
सरहद से 
संसद तक 
घमासान जारी है 
***
२७-२-२०१८

रविवार, 16 सितंबर 2018

समीक्षा मौन की झंकार, गीत संग्रह, संध्या सिंह

कोई भी स्वचालित वैकल्पिक पाठ उपलब्ध नहीं है.कृति चर्चा:
"मौन की झंकार" गीत में नवगीत का संस्कार 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 
*
[कृति विवरण: मौन की झंकार, गीत संग्रह, संध्या सिंह, प्रथम संस्करण २०१७, आई. एस. बी. एन. ९७८-९३-८४७७३-४१-०, पृष्ठ ८८, आवरण  बहुरंगी सजिल्द जैकेट सहित, मूल्य १५०/-, अनुभव प्रकाशन ई २८ लाजपत नगर, साहिबाबाद, गाज़ियाबाद ५, चलभाष ०९९१११७९३६८, ०९८११२७९३६८, रचनाकार संपर्क: डी १२२५ इंदिरा नगर, लखनऊ २२६०१६, चलभाष: ७३८८१७८४५९, ७३७६०६१०५६। ]
*

              गीति काव्य और मानव सभ्यता का साथ चोली-दामन का सा है। आदिकाल से कलकल-कलरव, गर्जन-तर्जन, रुदन-हास के साथ पलता-बढ़ता मानव अन्य प्राणियों की तुलना में 'नाद' को अधिक सघनता से ग्रहण कर अभिव्यक्त कर सका। अंतर्नाद तथ बहिर्नाद का सम्यक संतुलन विविध ध्वनियों को सुन, ग्रहण, स्मरण तथा अभिव्यक्त कर क्रमश: एकालाप व वार्तालाप का विकास कर वाचिक परंपरा का वाहक बना। श्रुति-स्मृति  की परंपरा विद्वद्वर्ग में विकसित हुई तो लोक में लोकगीत (लोरी, जस, देवी गीत, मिलन गीत, विरह गीत, आल्हा, बम्बुलिया, राई, बटोही, कजरी, फाग, कबीर आदि) और लोककथाओं का प्रचलन हुआ। विविध शैलियों और शिल्पों का समन्वय कर गीति काव्य 'स्व'  को 'सर्व' से सम्बद्ध करने का सेतु बना। समय तथा स्थितियों से साक्षात् करते स्वर, ताल से संयुक्त होकर गति-यति-लय का सहयोग पाकर सत्-शिव-सुंदर के वाहक बने। सतत परिवर्तित होते देश-काल-परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में गीत की वाचिक परंपरा लोकगीत, जनगीत, आव्हान गीत, विरुदावली, भक्ति गीत, प्रणय गीत आदि पड़ावों से होते हुए जन-जीवन के खुरदुरे यथार्थ को संवेदनशीलता  से स्पर्श करते हुए 'नवगीत' की संज्ञा से अभिषिक्त कर दी गई। विडंबना यह कि दीर्घकालिक पराधीनता तथा सद्य प्राप्त स्वाधीनता के संधि काल में पारंपरिक परंपराओं पर नवीन मूल्यों की चाहत हावी होती गई। राजनैतिक वैचारिक प्रतिबद्धताओं ने साहित्य में भी गुटबंदी को जन्म दिया। फलत:, प्रगतिवाद के नाम पर सामाजिक वैषम्य-विडंबना, टकराव-बिखराव, दर्द-पीड़ा की अभिव्यक्ति को ही प्रगतिवाद कह दिया गया। उत्सव, आल्हाद, सुख, हर्ष, मिलन, सहयोग, साहचर्य, सद्भाव आदि भावनाओं को परित्यक्त मानने के दुराग्रह को लोक ने अस्वीकार कर दिया।  लोक-जीवन के प्राणतत्व  उत्सवधर्मिता का वास्तविक आकलन न कर प्रगतिवादी कविता के प्रति लोक की उदासीनता को गीत का कारण मान लिया गया। विधि का विधान यह कि 'गीत' के मरण की घोषणा करनेवाले मर गए पर गीत छंद की विरासत के साथ न केवल जिंदा रहा आया, अपितु उसकी वंश परंपरा लोक से जीवन-सत्व पाकर पहले की तुलना में दिन-ब-दिन अधिकाधिक परिपुष्ट होती रही।

              नवगीत ने इन परिस्थितियों का सामना करते हुए अपनी जड़ों को मजबूत करने के साथ-साथ नव शाखों और नव पल्लवों के रूप में जीवन के सभी अंगों को अंगीकार किया। अपने उद्भव काल में निर्धारित की गई परिभाषा और मानकों को मार्गदर्शक मानते हुए भी नवगीत ने उन्हें पिंजरे की तरह नहीं माना और मुक्ताकाश में उड़ान भरते हुए मानव-मन और जीवन की विविध अनुभूतियों को अभिव्यक्त कर खुद को सार्थक सिद्ध किया। नवगीत को नव भाव-मुद्रा के साथ बिना कोई दावा किए पूरी शिद्दत के साथ अंगीकार करनेवाली कलमों में लखनऊ की सरजमीं पर रचनारत संध्या सिंह का भी शुमार है। संध्या जी की कृति 'मौन की झंकार' में वरिष्ठ नवगीतकार श्री माहेश्वर तिवारी ने ठीक ही लिखा है कि संध्या जी उन कुछ में हैं जो शब्द की लय और अर्थ की लय को इस तरह अपने से जोड़े हुए हैं कि गद्य रचते हुए भी कथ्य की आधुनिकता, समकालीनता के बावजूद छांदस बनेनी रहे। नवगीत की पाठशाला के मंच पर विदुषी शारद सुता पूर्णिमा बर्मन के सत्संग में नवगीत का ककहरा पढ़कर अभिव्यक्ति विश्वम् का प्रतिष्ठित पुरस्कार पाकर अपने लेखन की प्रामाणिकता सिद्ध करनेवाली संध्या जी आत्मलीन रचनाकार तो हैं किन्तु आत्मीमुग्ध रचनाकार नहीं हैं। वे अग-जग की खोज-खबर रखकर भी 'पर' की अनुभूति को 'स्व' की तरह अनुभव कर अभिव्यक्त कर पाती हैं-
'सहेजो जरा
प्रेम की मछलियों को
कि तट पर खड़ा है अभी तक मछेरा'

              निजता और सार्वजनिकता को 'दो में एक' की तरह देखती संध्या जी जानती हैं कि 'घर-घर में मिट्टी के चूल्हें हैं' किंतु वे ही घर को घर बनाये रखते हैं -
'भीतर पानी में कंपन है
भले जमी हो काई
पिंजरे की चिड़िया सपने में
अंबर तक हो आई
मन की अपनी मुक्त उड़ानें
तन के सख्त नियम'

              सामयिक समस्याओं और पारिस्थितिक विडंबनाओं को देखती-स्वीकारती, उनसे जूझने का दर्द झेलने के बाद भी जिजीविषा अपने सपने नहीं छोड़ती-
'जीवन का अब गद्य जरा सा
गीतों में ढलने दो ...
.... कंटक पथ और घना अँधेरा
मंथन में बस मिला हलाहल
पाँव छिले हैं कल देखेंगे
बंजर जैसा ठोस धरातल
अभी मुलायम नरम गुदगुदे
सपने पर चलने दो।'

              इन नवगीतों में किताबी आलंकारिक तथा क्लिष्ट प्राध्यापकीय भाषा से बचते हुए परिमार्जित रूप में अपनी बात कही गई है जो आम आदमी के मन तक पहुँचती है-
'छाया छत
विश्राम ठिकाने
बने रहे पथ में अनजाने
झोंके बादल
और फुहारें
आए केवल रस्म निभाने
बीज लिए मुट्ठी में फिरते बंजर-बंजर'

              अभिव्यक्ति का सबल वाहक बनकर गीत मानव मात्र ही नहीं सकल सृष्टि (प्रकृति, पर्यावरण, जीवन मूल्य आदि) के कुशल-क्षेम की कामना करता हुआ रूढ़ियों-आडंबरों से संघर्ष कर सामाजिक सरोकारों से हाथ मिलाते हुए नर-नारी, शासक-शासित के मध्य समन्वय और समझ की नव संस्कृति को सबल बना रहा है। 'मौन की झनकार' के नवगीतों में अन्तर्निहित पंच तत्वों सटीकता, सरलता, सरसता, संक्षिप्तता तथा मौलिकता के शब्द सुमनों को संवेदना के सूत्र (धागे) में पिरोकर प्रस्तुत किया गया है। दिन भर जीवन संघर्षों से जूझने के बाद गीत थकता-चुकता नहीं, प्रकृति और समाज के सानिन्ध्य में अंतर्मन की अनुभूतियों को सम्यक बिंबों, प्रतीकों, उपमानों, रूपकों आदि के माध्यम से अभिव्यक्त कर आनुप्रसिक सौंदर्य की छटा बिखेरता है- 'रस्ता रोक रही चट्टानें / पत्थर से सब बंद मुहाने / पर्वत की पूरी साजिश है / उठती लहर दबाने की' और यह भी कि 'देह सहेजी बड़े जतन से  / लेकिन रही निरंतर ढलती / बहुत कसी मुट्ठी में लेकिन / उम्र रेत सी रही निकलती' पर गीत यह भी जानता है कि 'मगर नदी ने जिद ठानी है / सागर तक बह जाने की।', 'मछली को फरमान दे दिया / आसमान में उड़ना सीखे', सर्प सरीखे दिन जहरीले /नागिन जैसी रात विषैली', आज घटा ने पानी फेरा / मेहनत के अरमानों पर' आदि ही अंतिम सत्य नहीं है। संध्या जी का नवगीतकार वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध नवगीतकारों की तुलना में भिन्न और बेहतर इसलिए है कि जीवन को समग्रता में देखकर उसका आकलन करता है। 'करो आज जगमग दसों ही दिशाएँ / दिए के तले भी न छूटे अँधेरा', 'तुम भले पतवार तोड़ो / नाव को मँझधार मोड़ो / हम भँवर / से पार होकर / ढूँढ लेंगे खुद किनारे', लहरों की पाजेब पहनकर / जल के ऊपर थिरक रही है / ये उत्सव की शाम।' जैसी गीति रचनाओं में नवगीत को घिसे-पिटे कलेवर से निकालकर वैसी ही  उत्सवधर्मी भाव मुद्रा दी गयी है जैसी 'काल है संक्रांति का' के कुछ नवगीतों में है किंतु अपनी मौलिकता को बनाये रखकर। नवगीत की पिछली अर्ध सदी में नकारात्मता के स्वर प्रधान रहे हैं किन्तु संध्या जी के नवगीत नव रचनाधर्मियों को दिशा दिखाते हैं कि नवगीत में हर्ष, उमंग, उल्लास, आल्हाद वर्जित नहीं है, उसकी अभिव्यक्ति का तरीका पारंपरिक तरीके से यत्किंचित भिन्न अवश्य है।

              नवगीतों की भाषा को प्रवाहमयी बनाये रखने के लिए कवयित्री ने अपने उपकरण खुद ईजाद किये हैं। ''शब्दावृत्ति'' एक ऐसा ही उपकरण है। इन गीतों में शब्दों के दुहराव से उत्पन्न आनुप्रसिकता ने सरसता का संचार करने के साथ-साथ कथ्य पर बल भी दिया है। जनम-जनम, ऊपर-ऊपर, भरी-भरी, ऊबी-ऊबी, जहाँ-जहाँ, वहाँ-वहाँ, भीतर-भीतर, नस-नस, बूँद-बूँद, कब-कब, बुला-बुला, मना-मना, कदम-कदम, परत-परत, खंड-खंड, रौंद-रौंद, रेंग-रेंग, टिक-टिक, सदियों-सदियों, जन्मों-जन्मों, बहक-बहक, छम-छम, भीग-भीग, घूँट-घूँट, रह-रह, तिल-तिल, बदल-बदल, सहमी-सहमी, भुला-भुला, कंकर-कंकर, किरन-किरन, सोना-सोना, सिक्का-सिक्का, लहर-लहर, हटा-हटा, पात-पात, टहनी-टहनी, बीत-बीत, गली-गली, पंखुरी-पंखुरी, अक्षर-अक्षर, उपवन-उपवन, फूल-फूल, उजड़ा-उजड़ा, सहमे-सहमे, सँभल-सँभल, फिसल-फिसल, थल-थल, पिघल-पिघल, फूल-फूल, घूम-घूम, गलियों-गलियों, वहीं-वहीं, डब-डब, छिप-छिप, धीमे-धीमे, पत्ता-पत्ता आदि शब्द-युग्मों के माध्यम से भाव अथवा क्रिया का सघनीकरण अभिव्यक्त किया गया है।

              नवगीत भली-भाँति जानता है विसंगतियों से दो-चार होता हुआ आम आदमी ही नहीं, गरीब और कमजोर मनुष्य भी उत्सवधर्मी रसात्मकता के सहारे अभावजयी हो जाता है-
खिड़की-खिड़की हवा बाँटती
चिट्ठी फूलों की
पंखुड़ियों का बिछा गलीचा
खुशबू का पंडाल
पवन बसंती मादक धुन पर
गढ़े तिलस्मी जाल
इस उत्सव ने सहला दी है
चुभन बबूलों की

              नचिकेता जिस प्रयोगधर्मी नव्यता के दुराग्रह से दूर रहने की सलाह देते हैं, संध्या जी के नवगीतों में उसकी झलक दूर-दूर तक नहीं है। मौन की झंकार की कवयित्री गीत-नवगीत के विभाजन को गीत के लिए हानिप्रद मानकर कथ्य को 'स्व' से 'सर्व' तक पहुँचाने की प्रक्रिया के रूप में छंद को अंगीकार करती है और शब्दों का चयन अनुभूतियों को अभिव्यक्त करने के लिए करते समय हिंदी, उर्दू, संस्कृत, अंग्रेजी या बोली के आधार पर नहीं करती। परिणामत: गीत-पंक्तियाँ वह कह पाती हैं जिसे कहने के लिए उन्हें रचा गया है।

              समय और परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में सवाल उठाए बिना समाधान नहीं मिल सकता, इसलिए किसी को कटघरे में खड़े किए बिना, आरोप-प्रत्यारोप किए बिना सत्य की अदालत में संध्या जी पूछती हैं-
'ऊबे दिन बासी रातों से
कैसे नयी कहानी लिख दें....
... उधर झोल है संबंधों में
इधर अहं के तार कसे हैं
यहाँ सिर्फ उपदेश नसीहत
सपने तो उस पार बसे हैं
आन-बान की संगीनों में
कैसे साफ़ बयानी लिख दें।

              सम्पन्नता को सुखदाई मानकर किसी भी कीमत पर पाने के लिए लडती-मरती जीवन शैली से असहमत संध्या जी कहती हैं-
'यश वैभव के हिम पर्वत पर
रिश्तों की गर्माहट खोती'
और
'तमगे और तालियाँ अकसर
तन्हाई का जंगल बोतीं'
प्यार बंधन बनकर क्यों आता है-
प्यार तुम्हारा इसी शर्त पर
हुनर हदों से बाहर दीखे
मछली को फरमान दे दिया
आसमान से उड़ना सीखे'
और इसका दुष्परिणाम
'दिए हारकर जो सपनों को
त्यागपत्र मंजूर हो गए'

              अंधियारों के हाथों पराजित होना सपनों को मंजूर नहीं है। यह जिजीविषा का नया स्वर इस सदी के नवगीतकारों ने नवगीत को दिया है और इसी के बल पर नवगीत भावी को सपने देते हुए कहेगा-
जब सपनों पर लगे फफूंदी
जीवन में चौमासा आये
जब पीड़ा के अंकुर पनपें
उत्सव पर सीलन छा जाए
तब सूर्योदय के पहले ही
तन के श्याम पट्ट पर लिख दूँ
उजियारे के अक्षर'

              'मौन की झंकार' से जिस यात्रा का आगाज़ हुआ है, उसका अंजाम अच्छा ही नहीं, बहुत अच्छा होगा, यह भरोसे के साथ कहा जा सकता है और इसी भरोसे के सहारे संध्या जी के आगामी नवगीत संकलन की प्रतीक्षा की जा सकती है।
[चर्चाकार संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१, ईमेल: salilsanjiv@gmail.com, चलभाष: ७९९९५५९६१८, ९४२५१८३२४४]
***

शनिवार, 15 सितंबर 2018

समीक्षा:


कृति चर्चा:
"शब्द वर्तमान" भाव विद्यमान
- आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
कृति विवरण: शब्द वर्तमान, नवगीत संग्रह, जयप्रकाश श्रीवास्तव, प्रथम संस्करण २०१८, आकार २०.५ से. x १४ से., आवरण पेपरबैक बहुरंगी, पृष्ठ १२८, मूल्य १२०/- , बोधि प्रकाशन, सी ७६ सुदर्शनपुरा औद्योगिक क्षेत्र विस्तार, नाला रोड, २२ गोदाम, जयपुर ३०२००६, चलभाष ९८२९०१८०८७, bodhiprakashan@gmail.com, रचनाकार संपर्क आई.सी.५ सैनिक सोसायटी, शक्ति नगर, जबलपुर ४८२००१, चलभाष ९१ ७८६९१९३९२७, ९७१३५४४६४२, समीक्षक संपर्क: विश्व वाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, salil.sanjiv@gmail.com, चलभाष: ७९९९५५९६१८ ]
*

विश्ववाणी हिंदी ने वाचिक परंपरा से विरासत में प्राप्त जिन रचना विधाओं मे सर्वाधिक लाड़ जिस रचना विधा को दिया है, वह गीति विधा है। देश-काल-परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में गीत विधा सतत परिवर्तित होती रही है। गीत का कथ्य, भाव, भंगिमाएँ, शब्दावली, शैली आदि हे इन्हीं बिंब, प्रतीक और अलंकार भी परिवार्तित होते रहे हैं. यह परिवर्तन इतनी तीव्र गति से हुआ है कि गीत कविता और गद्य की तरह होकर अगीत और गद्यगीत की संज्ञा से भी अभिषिक्त किया गया। विविध बदलावों के बाद भी गीत की लय या गेयता बरक़रार रही किंतु अगीत और गद्य गीत ने इससे भी मुक्त होने का प्रयास किया और तथाकथित प्रगतिवादी कविता ने गीत-किले में सेंध लगाकर उसे समाप्त करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। यह गीत की जिजीविषा ही है कि सकल उठा-पाठक के बाद भी गीत अमरबेल की तरह फिर-फिर उठ खड़ा हुआ और पूर्वपेक्षा अधिकाधिक आगे बढ़ता गया।

भारत के ह्रदय प्रदेश नर्मदांचल में आधुनिक हिंदी (खड़ी बोली) अपने शुद्धतम रूप में बोली-लिखी जाती है। इस अंचल के रचनाकार प्रचार-प्रसार को महत्व न दे, रचनाकर्म को स्वांत: सुखाय अपनाते रहे हैं। फलत:, वे चर्चा में भले ही न बने रहते हों किंतु रचनाधर्मिता में हमेशा आगे रहे हैं। जयप्रकाश श्रीवास्तव इसी परंपरा के रचनाकार हैं जो कहने से अधिक करने में विश्वास करते हैं। मन का साकेत गीत संग्रह (२०१२) तथा परिंदे संवेदना के गीत-नवगीत संग्रह (२०१५) के बाद अब जयप्रकाश जी शब्द वर्तमान नवगीत संग्रह के साथ गीत संसद में दमदार उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। वे नरसिंहपुर जिले की लोक परंपरा और शिक्षकीय भाषिक संस्कार की नीव पर आम आदमी की व्यथ-कथा की ईटों में आशा निराशा का सीमेंट-पानी मिश्रित मसाला मिलते हुए जिजीविषा की कन्नी से नवगीत की इमारत खड़ी करते हैं। जय प्रकश जी के नवगीतों में समसामयिक समस्याओं से आँखें चार करते हुए दर्द से जूझने, विसंगतियों ले लड़ने और अभाव रहते हुए भी हार न मानने की प्रवृत्ति दिखाई पड़ती है। इन नवगीतों में मानव मन की जटिलता है, संबंधों में उपजता-पलता परायापन है, स्मृतियों में जीता गाँव, स्वार्थ के काँटों से घायल होता समरसता का पाँव, गाँव की भौजाई बनने को विवश गरीब की आकांक्षा है, विश्वासों को नीलम कर सत्ता का समीकरण साधती राजनीति है, गाँवों को मुग्ध कर उनकी आत्मनिर्भरता को मिटाकर आतंकियों की तरह घुसपैठ करता शहर है। जयप्रकाश जी शब्दों को शब्दकोशीय अर्थों से मिली सीमा की कैद में रखकर प्रयोग नहीं करते, वे शब्दों को वृहत्तर भंगोमाओं का पर्याय बना पाते हैं। उनके गीत आत्मलीनता के दस्तावेज नहीं, सार्वजनीन चेतना की प्रतीति के कथोकथन हैं। इनकी भाषा लाक्षणिकता, व्यंजनात्मकता तथा उक्ति वैचित्र्य से समृद्ध है।

''कल मिला था
शहर में इक गाँव
सपनों की लिए गठरी''
सपनों को खुला आकाश न मिलकर गठरी मिलना ही इंगित करता है कि सपनों को देखनेवाले गाँव हालत चिंतनीय ही हो सकती है-
"आँखों में नमी ठहरी.....
सत्ता हो गई बहरी.....
और अंतत: लांघता झूठ की देहरी।"
बुभुक्षति किं न करोति पापं.... विडम्बना यह कि शहर के हाल भी बेहाल हैं-
"तुम्हीं बताओ
शहर कहाँ है?
अभी यही था
गया कहाँ है?
घर सारे बन गए दुकानें......
कुछ तो बोलो
आम आदमी
आखिर क्यों
लाचार यहाँ है?....
चौपट सारी हुई व्यवस्था
मूक-बधिर
कानून जहाँ है।"
इतना ही होता तो गनीमत होती।
हद तो यह कि जंगल की भी खैर नहीं है-
"लिख रहा मौसम कहानी
दहकते अंगार वन की
धरा बेबस
जन्मती हर और बंजर
हवाओं के
हाथ में बुझे खंजर"
और अंतत:
"यह चराचर जगत फानी
बन गया समिधा हवन की।"

जय प्रकाश जी के नवगीतों का मुखड़ा और सम वजनी पंक्तियाँ सार कह देती हैं, अंतरा तो उनका विस्तार जैसा होता है-
"उड़ मत पंछी
कटे परों से
बड़े बेरहम गिद्ध यहाँ के
(अंतरा)
तन से उजले
मन के काले
बन बैठे हैं सिद्ध यहाँ के
(अंतरा) सत्ता के
हाथों बिकते हैं
धर्मभ्रष्ट हो बुद्ध यहाँ के
(अंतरा)
खींच विभाजन
रेखा करते
मार्ग सभी अवरुद्ध यहाँ के।
अब अंतरे देखें तो बात स्पष्ट हो जायेगी।
१. नोंच-नोंच कर
खा जायेंगे
सारी बगिया
पानी तक को
तरस जायेगी
उम्र गुजरिया,
२. हकदारी का
बैठा पहरा
साँस-साँस पर
करुणा रोती
कटता जीवन
बस उसाँस पर,
३. तकदीरों के
अजब-गजब से
खेल निराले
तदबीरों पर
डाल रहे हैं
हक के ताले।
नवगीत लेखन में पदार्पण कर रही कलमों के लिए मुखड़े अंतरे तथा स्थाई पंक्तियों का अंतर्संबंध समझना जरूरी है।

विदेश प्रवास के बीच बोस्टन में लिखा गया नवगीत परिवेश के प्रति जयप्रकाश जी की सजगता की बानगी देता है-
तड़क-भक है
खुली सड़क है
मीलों लंबी खामोशी है।

जंगल सारा
ऊँघ रहा है
चिड़िया गाती नहीं सवेरे
नभ के नीचे
मेघ उदासी
पहने बैठे घोर अँधेरे
हवा बाँटती
घूम रही है
ठिठुरन वाली मदहोशी है।

जयप्रकाश जी ने मुहावरों, लोकोक्तियों का प्रयोग कम किंतु कुशलता से किया है-
"मन का क्या है
रमता जोगी, बहता पानी
कभी हिरण सा भरें कुलाँचें
कभी मचलता निर्मल झरना",
या "मुर्दों की बस्ती में
जाग रहे मरघट हैं",
"सुविधा के खाली
पीट रहे ढोल हैं
मंदी में प्रजातंत्र
बिकता बिन मोल है",
"अंधों के हाथ
लग गई बटेर
देर कहें या इसको
कह दें अंधेर" आदि

उक्ति वैचित्र्य के माध्यम से इंगितों में बिन कहे कह जाने की कला इन नवगीतों में सहज दृष्टव्य है- सपनों की गठरी, झूठ की देहरी, अक्षर की पगथली, शब्दों के जंगल, अर्थों के बियाबान, यग का संत्रास, सभ्यता के दोराहे, संस्कार मीठे से, अंधेरों की लम्बी उम्र, सूर्य के वंशज, हौसलों के सहारे, चल की महफिल, मँहगाई की मार, संबंधों का बौनापन, अपनेपन के वातायन, हरकतों का खामियाजा, साँसों का व्यापार, चाँद की हँसुली, देह के आल्हाद, शब्द के शहतीर, वन के कारोबार, मस्तियों की गुलाल, चाँदनी के गाँव आदि दृष्टव्य हैं।

भूमिका में ख्यात नवगीतकार और समीक्षक डॉ. रामसनेही लाल शर्मा 'यायावर' ने ठीक ही आकलन किया है- "यहाँ समूचा युग प्रतिबिंबित है।" नवगीत का कथ्य समसामयिक आदमी के दर्द और पीड़ा, समाज में व्याप्त विसंगतियों और पारिस्थितिक विडंबनाओं, न जीने न मरने देने वाली मारक परिस्थितियों आदि के बीच से उठाया जाता है। जीवन संघर्ष, आशा-निराशा, भटकाव-अटकाव आदि नवगीत को सचाई का आईना बना देती हैं।

नवगीत आधुनिक युग बोध और पारंपरिक लोक चेतना के सम्मिलन से उपजे क्रिया व्यापार और उसके परिणाम पर संवेदनशील मन की प्रतिक्रिया है। नवगीत व्यक्ति में उपजा समष्टि बोध है, जय प्रकाश जी के नवगीत इसकी पुष्टि करते हैं-
"उठ रहा है
धुआँ चारों ओर से
आग ये कैसी लगी है?"

नवगीत वैयक्तिक पीड़ा का सामान्यीकरण है-
"रात चटकी
चूड़ियों सी
धुला काजल
नहीं लौटा
गया जबसे /
दूत बादल
पिया के
जाने कहाँ है ठाँव
बेबस मन हुए हैं।

साधारण दृश्य को असाधारण संवेदना के साथ अभिव्यक्त करने में जय्प्रक्ष जी का सानी नहीं है। डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार "अनुभव का अनुभव होना अनुभूति है।" लघुकाय, खंडित, अमूर्त और देखकर अदेखे किये गए बिंब के माध्यम से संवेदना को अधिक मार्मिक और तीक्ष्ण बनाते हैं ये नवगीत-
"सर्द तन्हाई
बुझाने बर्फ कूदी
धूप पोखर में
लिपटकर सपने
आँखों से झरे
पात पीपल के
खदकने से डरे
देख धुंधलापन
सड़क ने आँख मूँदी
शहर ठोकर में।"

नवगीतों में अल्प विराम, अर्ध विराम, विस्मय बोधक चिन्ह आदि की अपनी उपादेयता होती है किन्तु जयप्रकाश जी पदांत में पूर्णविराम के अतिरिक्त अन्य किसी विराम चिन्ह का प्रयोग नहीं करते। भँवरे के स्थान पर भंवरे का प्रयोग त्रुटि पूर्ण है।

प्राकृतिक आपदाओं के समय से गगन विहारियों द्वारा आसमान से जन-विपदा का जायजा लेना जले पर नमक छिड़कने की तरह प्रतीत होता है-
"दुखती रग पर
हाथ धरकर
पूछते हैं हाल
पीठ पर चढ़
हँस रहा है
आज भी बैताल
आँसुओं से
लड़ रहे हैं जंग
सपने आँख में ठहरे।

'शब्द वर्तमान" के नवगीत केवल व्यथा-कथा नहीं है, उनमें लोक मंगल भी परिव्याप्त है। इस दृष्टि से ये गीत अधिक पूर्ण हैं-
अनगिनत किरणें सजा
थाल में लाई उषा
धरा का मंगल हुई।
लिपे आँगन धूप से
पक्षियों के मधुर गान
हो गया तम निर्वासन
दिशाएँ सब दीप्तिमान
अर्ध्य सूरज को चढ़ा
प्रकृति उज्जवल हुई।

तुम कहाँ हो शीर्षक गीत श्रृंगार समेटे हैं-
गीत मन के द्वार
देने लगे दस्तक
तुम कहाँ हो?
शब्द आँखों से
चुराकर ले गये सपने
अक्षरों की अँगुलियाँ
मंगल लगी लिखने
उचारे हैं साँसों ने
स्वस्तिक के अष्टक
तुम कहाँ हो?

संकीर्णतावादी समीक्षक ऐसे प्रयोगों को नवगीत न माने तो भी कोई अंतर नहीं होता। नवगीत सतत नयी भाव-भंगिमाओं को आत्मसात करता रहेगा। जय प्रकाश जी के ये नवगीत परिवर्तन की आहट सुना रहे हैं। 
***