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शुक्रवार, 30 मार्च 2018

ॐ doha shatak rita sivani

ॐ 
दोहा शतक 
रीता सिवानी
















जन्म: १  फरवरी १९८०, मकरियार, सिवान, बिहार। 
आत्मजा:: स्वर्गीय चंदा देवी-श्री रामाशीष यादव। 
        श्रीमती लालमुनि देवी
जीवन साथी:  श्री संजय कुमार यादव। 
शिक्षा: बी.ए. ऑनर्स।  
प्रकाशन : विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में।  
सम्मान: दोहा शिरोमणि( साहित्य शारदा मंच खटीमा, उत्तराखंड)।
संपर्क : ए ९५, द्वितीय तल, सेक्टर १९ नोएडा २०१३०१ उत्तर प्रदेश। 
चलभाष: ९६५०१५३८४७।  
*

पूजे जाते हैं जहाँ, गौरी पुत्र गणेश।
वास वहाँ आकर करें, ब्रम्हा, विष्णु, महेश।। 
*
करो कृपा माँ शारदे, दूर करो अज्ञान।
हाथ जोड़ विनती करूँ, दो विद्या वरदान।। 
*
प्रभु! मैं भी कुछ आपका, कर पाऊँ गुणगान।
मेरा मन भी हो सके, हरि-मंदिर हनुमान।।
*
हिंदी-बिंदी हिंद की, सजी हिंद के भाल ।
बैठी लेकिन ओढ़कर, अंग्रेज़ी की शाल।।
*
अंधभक्त बनना नहीं, कभी किसी का यार।
चल पड़ता इससे किसी, बाबा का व्यापार।। 
*
मिले जहाँ इज्ज़त नहीं, राह वहाँ की भूल।
अपने निज सम्मान को, अपना बना उसूल।।
*
धरा जगत की एक है, अंबर सबका एक।
मनुज एक मिट्टी बने, रंगत-रूप अनेक।।
*
चार कदम तुम प्यार के, बढ़ लो मेरी ओर।
फिर देखो मेरा ह्रदय, कैसा भाव-विभोर।। 
*
जिन्हें पता ही यह नहीं, लज्जा का क्या नूर।
ऐसों का छोड़ो नहीं, दंडित करो हुजूर।।
*
पापी को होता नहीं, तनिक कभी संताप।
तीर्थ नहाने से अगर, सर से हटता पाप।।
*
दहशतगर्दों के भरा, मन में अजब फ़ितूर।
निर्दोषों को मारना, बना लिया दस्तूर।। 
*
मिले जहाँ इज्ज़त नहीं, राह वहाँ की भूल।
स्वाभिमान को तू बना, अपना सदा उसूल।। 
*
सच्चाई की राह पर, जो चलता रख धीर।
सब बाधाएँ पारकर, बन जाता वह वीर।। 
*
रिश्ते में जब प्रीत हो, तभी बने वह ख़ास।
प्रीत बिना रिश्ते लगें, बोझिल मूक उदास।। 
*
आडंबर से धर्म के, फैले बहुत विकार।
ज्वाला नफ़रत की जली, झुलस रहा संसार।। 
*
धर्म सभी देते सदा, प्रेम भरे पैगाम।
आपस में लड़कर करें, मनुज इसे बदनाम।। 
*
बिन छेड़े डसते नहीं, कभी किसी को साँप।
मानव को मानव डसे, बिन छेड़े ही आप।।
*
पेड़ काट हमने सभी, जंगल दिए उजाड़ ।
हरियाली दिखती नहीं, बाकी बचे न झाड़।। 
*
साथी सुख में सौ मिले, दुख में मिला न एक।
साथ कष्ट में जो रहें, मित्र वही है नेक।।
*
छुपे हुए हैं योग में, सेहत के सब राज़।
बिना चूक हर रोग का, करता सदा इलाज।।   
*
मिट्टी के हम सब बनें, मिट्टी ही पहचान।
चार दिनों का खेल यह, खेल रहा इंसान।। 
*
मैं- मैं करते हैं सदा, गिरा नयन का नीर।
अपनों की समझें नहीं, अब अपने ही पीर।।
*
रखो नहीं दिल में कभी, मित्र किसी की बात। 
हर रिश्ते की एक दिन,खुलती है औक़ात।। 
*
सत्पथ पर चलना नहीं, कभी रहा आसान।
झूठ बिके झटपट यहाँ, सच की बंद दुकान।। 
*
कहने को पढ़ते रहे, हम सब प्रेम-किताब।
उमड़ रहे दिल में मगर, नफ़रत के सैलाब।। 
*
नफ़रत भरा ह्रदय रखे, बोलें मीठी बात ।
स्वार्थ साधने के लिए, कहते रहते तात।। 
*
गर्व नहीं करना कभी, धन पर ए इंसान!।
कर जाता पल में प्रलय, छोटा सा तूफान।। 
*
कपटी, दंभी, लालची, अपना करें बखान।
बातों से इनकी लगे, है ये बड़े महान।।  
*
जिस थाली खाया कभी, किया उसी में छेद।
मतलब की थी मित्रता, बिन मतलब मतभेद।। 
*
प्रेम और विश्वास पर, होते जो आबाद।
ऐसे रिश्तों से सदा, दूर रहे अवसाद।।   
*
नेकी करिए या बदी, रहिए सदा सचेत।
बदले में आना वही, 'रीता' सूद समेत।। 
*
भूख नहीं 'रीता' उन्हें, जिनके घर पकवान ।
जाने कितने भूख से, तड़प रहे  इंसान।।  
*
दूर रहें या पास हम, जुड़े रहे अहसास।
सच्चे रिश्तों की यही, लगती बातें खास।। 
*
'रीता' धरती ही नहीं, दूषित अब आकाश।
सभ्य आदमी सृष्टि का, करता स्वयं विनाश।।
*
अपनी निंदा से कभी, होना मत हैरान।
यह भी जीवन के लिए, शुभ है जैसे पान।। 
*
रामायण-गीता पढ़ो, चाहे तुम क़ुरआन।
ध्यान रहे इंसानियत, दिल में हो इंसान।। 
*
बाल-दिवस समझे भला, क्या बच्चे मजबूर।
बचपन में जो हैं विवश, बनाने को मज़दूर।। 
*
अपने भी करने लगे, अब अपनों से बैर।
अपना समझूँ मैं किसे, कहो कौन है गैर।।
*
औरों के दुख से दुखी, होते जो इंसान।
अब शायद रचते नहीं, ऐसे जन भगवान।।
*
मरी हुई संवेदना, रहा न जीवित प्यार ।
हानि-लाभ का कर रहे, अपने भी व्यवहार।।  
*
श्रम करके पूरे करो, दिल के सब अरमान ।
मत बेचो इसके लिए, तुम अपना ईमान।। 
*
हाड़-माँस के है सभी, पुतले हम इंसान।
जाति-धर्म के नाम पर, क्यों लड़ते नादान।। 
*
बेटे -बेटी पर सभी, करते हैं अभिमान।
लोग बहू पर क्यों नहीं, करते भला गुमान।।
*
अपनी बेटी बावली, लगे गुणों की खान।
उसमें कमियाँ ही दिखे, बहू लाख गुणवान।।
*
मात-पिता के लाडले, नैनों के हैं नूर।
रोटी की ख़ातिर बसें, जाकर कोसों दूर।।
*
तड़प- तड़प तन्हा मरे, हुआ बुढापा शाप।
बेटे बसे विदेश में, क्या करते माँ- बाप।।
*
बनी नहीं जग में अभी, कोई कहीं किताब।
माँ की ममता का लगे, जिसके पढ़े हिसाब।। 
*
माँ से जीवन में महक, माँ से दुनिया फूल।
माँ बिन लगती जिंदगी, तपकर उड़ती धूल।। 
*
माँ के आँचल में मिली, जैसी हमको छाँव।
सारी दुनिया में नहीं, वैसी कोई ठाँव।।   
*
हवा बसंती गा रही, झूम-झूमकर फाग ।
झूल डाल पर मस्त हो, कोयल छेड़े राग।। 
*
अपना था समझा जिसे, किया उसी ने घात।
मन आहत-घायल हुआ, अपनों की सौग़ात।। 
*
चाहे जितना यत्न कर, रख कितना सामान ।
'रीता' रीता जाएगा', खुले हाथ शमशान।। 
*
रोग लगा 'मैं' का जिन्हें,  समझे किसकी बात।
औरों को निज बात से, पहुँचाते आघात।।
*
जिसकी ख़ातिर कर दिए, सारे सपने चूर।
स्वार्थ साध बस गया वह, जाकर कोसों दूर।।
*
भूली अपनी संस्कृति, बदल गया परिधान।
घूँघट में है अब कहाँ, दुल्हन की मुस्कान।।
*
राज़ कहो दिल का नहीं, उनसे कभी  हुज़ूर।
जो म्र्लब के यार हों, पर यारी से दूर।।
*
मन मेरा यह बावला, हो जाता है शाद।
ख़ुशहाली जब गाँव की, आती मुझको याद।।
*
हर रिश्ते की जान वह, उससे घर-परिवार।
नारी जीवनदायिनी, नारी से संसार।। 
*
पूजे जाने का नहीं, है उसका अरमान ।
नारी को भरपूर दें, स्नेह-प्रेम-सम्मान।। 
*
महिला को अबला कभी, समझ नहीं नादान ।
दुर्गा-लक्ष्मी-शारदा, नारी की पहचान।। 
*
जलन ईर्ष्या छोड़कर, जी से करना वाह।
पाना चाहो तुम अगर, सबका प्रेम अथाह।। 
*
छोड़ अभी आलस्य तू, पकड़ कर्म की राह।
धन-दौलत सम्मान की, मन में है यदि चाह।।
*
क्यों दुख में डूबा हुआ, पापी मन कुछ बोल।
स्वार्थ भुला सर्वार्थ-सुख, दे जीवन अनमोल।। 
*
कह दे कोई आपसे, मन का झंझावात।
कहें कभी मत और से, और किसी से बात।। 
*
श्वान अमीरों का पले, पा सुविधाएँ घोर।
भूखा पुत्र गरीब का, जग को लगता चोर।।
*
औरत का होता नहीं, जिस घर में सम्मान।
वह घर, घर होता कहाँ, रहता भवन-मकान।।
*
भूखे दुखी ग़रीब की, कभी न लेना आह।
अगर चाहता है मिले, भगवद्कृपा अथाह।।
*
टी.वी. घर-घर चल रहे, सूनी है चौपाल।
शहरों सा ही अब हुआ, गाँवों का भी हाल।। 
*
बसी खेत -खलिहान में, रहती पल-पल जान।
करता है श्रम जब कृषक, तब हो गेहूँ धान।। 
*
अभिलाषा शहरी हुई, रोकर बोला गाँव।
कूलर-पंखे कर रहे, सूनी पीपल छाँव।।
*
पानी सबकी ज़िंदगी, जाने सकल जहान।
फिर भी करते हैं सभी, पानी का नुक़सान।।
*
जीवन का सोचो ज़रा, क्या होगा तब अर्थ।
रोका जो हमने नहीं, नीर बहाना व्यर्थ।। 
*
किए बिना हनुमत भजन, मुझे न आए चैन ।
हनुमत-हनुमत ही रटे, यह जिह्वा दिन रैन।। 
*
जलती जब दिल में धधक, बैर घृणा की आग।
ऐसे में कैसे भला, हो फगुआ का राग।। 
*
देख देखकर जी रही, प्रियतम की तस्वीर।
विधना ने कैसी लिखी, नारी की तक़दीर।।
*
विरह वेदना से विकल,विरही के दिन-रैन।
हृदय घात पल पल करे, हरदम भीगे नैन।।
*
विरह व्यथा अपनी कहूँ, या आँखों का नीर।
सखी बताऊँ किस तरह, अपने उर की पीर।।
*
तेरी यादों में सजन, बुरा हुआ है हाल।
इंतजार में लग रहे, दिवस  महीने-साल।। 
*
राम नाम जिह्वा रटे, जिसकी सुबहो-शाम।
अंतकाल पाता वही, हरि का प्यारा धाम।।
*
साईं का उपदेश है, बनो आदमी नेक।
जाति-धर्म कुछ भी नहीं, सबका मालिक एक।।
*
ग्यारहवें अवतार हैं, शंकर के हनुमान।
मद में रावण कह गया, उनको कपि नादान।।
*
वर माँगू माँ शारदे!, दे दो बुद्धि-विवेक।
'रीता'-मन रीता न हो, काज करूँ मैं नेक।। 
*
सच्चे मन से कीजिए, पवन पुत्र का ध्यान।
'रीता' डर किस बात का, जब रक्षक हनुमान।। 
*
जागेगा सोया हुआ, भाग्य आप ही आप।
सतत करें श्रम-साधना, तज आलस का शाप।। 
*
मिलते हैं जग में सभी, अब झूठे इंसान।
झूठों में कैसे करें, सच्चे की पहचान।। 
*
गोवर्धन पर्वत उठा, पूज बनाया पर्व।
तोड़ा यूँ श्री कृष्ण ने, इंद्र देव का गर्व।।
*
चाहे जितना कीजिए, अपने मन का काम।
ध्यान रहे इतना मगर, नाम न हो बदनाम।। 
*
ज्यों है माता शारदे, वीणा की झंकार।
त्यों ही मेरी लेखनी, मातु भरे हुंकार।। 
*
साईं सुनते हैं सभी, भक्तों की मनुहार।
चलो कभी हम भी चलें, शिर्डी के दरबार।। 
*
माँ के चरणों का सदा, जो करते हैं ध्यान ।
भक्ति -शक्ति करती उन्हें, माता सहज प्रदान।। 
*
बजरंगी हनुमान की, मुझ पर कृपा असीम।
मेरे हर दुख- दर्द के, बनते वही हक़ीम।। 
*
लाल बहादुर की तरह, कम ही माँ के लाल।
जिनके कर्मों से हुई, भारत भूमि निहाल।। 
*
सत्य- अहिंसा का दिया, गाँधी जी ने मंत्र।
राह धर्म की ही चुनें, रहना अगर स्वतंत्र।। 
*
हर दिन उसका व्यस्त है, संडे या त्यौहार।
छुट्टी नारी को नहीं, क्यों देता संसार।। 
*
होता है हर साल ही, रावण का संहार।
बच जाता जीवित मगर, अंतस में हर बार।।
*
जीवन के हर मोड़ पर, मिलते रावण-राम।
सिय-श्वासों मत भूलना, किसका है क्या काम।। 
*
अंतर्मन भारी हुआ, सुन बेटी की पीर।
जो दहेज माँगे उसे, सजा मिले गंभीर ।। 
*
हे भगवन! किससे कहें, अपने मन का हाल ।
शकुनि शरीख़ी आजकल, नेताओं की चाल।।
*
कर्म करो अपना तभी, पाओगे सम्मान ।
गीता में  देते यही, प्रभु अर्जुन को ज्ञान।। 
*
घबराना मत हार से, नींव जीत की हार।
बिना दूध मंथन किए, मक्खन बने न यार।। 
****
कुछ और दोहे
प्रियतम तेरी याद में, पढ़कर तेरे पत्र।
मन की पुस्तक में करूँ, प्रिय बातें एकत्र।। 
*
ठिठुर- ठिठुर कर ठंड में, काटे पथ पर रात ।
है 'निर्धन आवास' की, बस सरकारी बात।। 
*
आपस के होंगे स्वत:, सारे ख़त्म  विवाद।
ज़रा भूलकर देखिए, झगड़ामय संवाद।। 
*
दुख होता है देखकर, दुनिया के हालात।
बात-बात पर देखते, दिखा लोग औक़ात।।
*
आजादी के हो गये, पूरे सत्तर साल।
मगर गरीबी से अधिक, जनता है बेहाल।।
*
'रीता' मुक्ताहार- सा,घर का है संबंध।
नेह- डोर बाँधे रखें, आपस में अनुबंध।। 
*
द्वेष भाव मन के मिटा, रखना रिश्ते साफ।
अपने गलती गर करें, कर देना तुम माफ।। 
*
आजादी के हो गए, पूरे सत्तर साल।
मगर गरीबी से अभी, जनता है बेहाल।। 
*
सच्चे मन से जो जपे, एक बार हनुमान।
कष्ट सभी हरकर करें, प्रभु उनका कल्याण।।
*
डरता क्यों है तू भला, जप ले मन हनुमान।
पवनपुत्र हर कष्ट का, करते तुरत निदान।।
*
भजते जो हनुमान को, पाते प्रभु का धाम।
करते हैं उन पर कृपा,  जग के स्वामी राम।।
*
सागर को बौना किया, लाँघ सभी व्यवधान।
पता लगाकर आ गए, सीता का हनुमान।। 
*
करें सृष्टि का सृजन लय, विलय नाश-संहार ।
किंतु शिवा का है अमिट, शिवजी पर अधिकार।। 
*
गलती अपनी कब दिखे, जिनके सर अभिमान ।
सबकी करे बुराइयाँ, बस अपना गुणगान।। 
*
काम नहीं कुछ भी करें, बड़ी-बड़ी बस बात।
ऐसे लोगों की स्वयं, खुलती है औक़ात।। 
*
साईं सुनते हैं सभी, भक्तों की मनुहार।
चलो कभी हम भी चलें, शिर्डी के दरबार।।  
*
काँव- काँव क्यों कर रहे, लालच में ज्यों काग।
मिलना है सबको वही, लिखे ईश जो भाग।।   
*
पापी-झूठों से हुआ, कितना पतित समाज।
लोगों की करतूत भी, कहते आती लाज।।  
*
वर्तमान में याद क्यों, करता भला अतीत।
जि ले जो है ज़िंदगी, छोड़ गया जो बीत।।

सवैया सलिला 1: वागीश्वरी सवैया

गले आ लगो या गले से लगाओ, तिरंगी पताका उड़ाओ।
कहो भी, सुनो भी,  न बातें बनाओ,  भुला भेद सारे न जाओ।।
जरा पंछियों को निहारो, न जूझें, रहें साथ ही ये हमेशा
न जोड़ें, न तोड़ें, न फूँकें, न फोड़ें, उड़ें साथ ही ये हमेशा।।
विधान: सात यगण प्रति पंक्ति ।
***

गुरुवार, 29 मार्च 2018

chitra alankar

चित्र अलंकार:
समकोण त्रिभुज
(वार्णिक छंद, सात पंक्ति, वर्ण १,२,३,४,५,६,७)
*
हूँ
भीरु,
डरता
हूँ पाप से. .
न हो सकता
भारत का नेता
डरता हूँ आप से.
*
है
कौन
जो रोके,
मेरा मन
मुझको टोंके,
गलती सुधार.
भयभीत मत हो.
*
जो
करे
फायर
दनादन
बेबस पर.
बहादुर नहीं
आतंकी है कायर.
*
हूँ
नहीं
सुरेश,
न नरेश,
आम आदमी.
थोडा डरपोंक
कुछ बहादुर भी.
*
मैं
देखूँ
सपने.
असाहसी
कतई नहीं.
बनाता उनको
हकीकत हमेशा.
*
२९.३.२०१८

दोहा सलिला

दोहा सलिला:
*
मले उषा के गाल पर, सूरज छेड़ गुलाल
बादल पिचकारी लिए, फगुआ हुआ कमाल.
*
नीता कहती नैन से, कहे सुनीता-सैन.
विनत विनीता चुप नहीं, बोले मीठे बैन.
*
दोहा ने मोहा दिखा, भाव-भंगिमा खूब.
गति-यति-लय को रिझा कर, गया रास में डूब.
*
रोगी सिय द्वारे खड़ा, है लंकेश बुखार.
भिक्षा सुई-दवाई पा, झट से हुआ फरार.
*
शैया पर ही हो रहे, सारे तीरथ-धाम.
नर्स उमा शिव डॉक्टर, दर्द हरें निष्काम
*
बीमा? री! क्यों कराऊँ?, बीमारी है दूर.
झट बीमारी आ कहे:, 'नैनोंवाले सूर.'
*
लाली पकड़े पेट तो, लालू पूछें हाल.
'हैडेक' होता पेट में, सुन हँस सब बेहाल.
*
'फ्रीडमता' 'लेडियों' को, काए न देते लोग?
देख विश्व हैरान है, यह अंगरेजी रोग.
*
२९.३.२०१८

बुधवार, 28 मार्च 2018

वंदे मातरम गायिका अनवरी बहनें

वंदे मातरम की स्वर लहरियाँ बिखेरतीं ६ सगी मुस्लिम बहनें


(वन्देमातरम गायन करती ६  सगी मुस्लिम अनवरी बहनें)
कानपुर में अनवरी बहनों का सम्मान
पिछले दिनों मुस्लिमों द्वारा वन्देमातरम् न गाने के दारूउलम के फतवे पर निगाह गई तो उसी के साथ ऐसे लोगों पर भी समाज में निगाह गई जो इस वन्देमातरम् को धर्म से परे देखते और सोचते हैं। मशहूर शायर मुनव्वर राना ने तो ऐसे फतवों की प्रासंगिकता पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए यहाँ तक कह दिया कि वन्देमातरम् गीत गाने से अगर इस्लाम खतरे में पड़ सकता है तो इसका मतलब हुआ कि इस्लाम बहुत कमजोर मजहब है। प्रसिद्ध शायर अंसार कंबरी तो अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हैं-मस्जिद में पुजारी हो और मंदिर में नमाजी/हो किस तरह यह फेरबदल, सोच रहा हूँ। ए.आर. रहमान तक ने वन्देमातरम् गीत गाकर देश की शान में इजाफा किया है। ऐसे में स्वयं मुस्लिम बुद्धिजीवी ही ऐसे फतवे की व्यवहारिकता पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता ए.जेड. कलीम जायसी कहते है कि इस्लाम में सिर्फ अल्लाह की इबादत का हुक्म है, मगर यह भी कहा गया है कि माँ के पैरों के नीचे जन्नत होती है। चूंकि कुरान में मातृभूमि को माँ के तुल्य कहा गया है, इसलिये हम उसकी महानता को नकार नहीं सकते और न ही उसके प्रति मोहब्बत में कमी कर सकते हैं। भारत हमारा मादरेवतन है, इसलिये हर मुसलमान को इसका पूरा सम्मान करना चाहिये।

वन्देमातरम् से एक संदर्भ याद आया। हाल ही में युवा प्रशासक-साहित्यकार कृष्ण कुमार यादव के जीवन पर जारी पुस्तक ‘‘बढ़ते चरण शिखर की ओर‘‘ के पद्मश्री गिरिराज किशोर द्वारा लोकार्पण अवसर पर छः सगी मुस्लिम बहनों ने वंदेमातरम्, सरफरोशी की तमन्ना जैसे राष्ट्रभक्ति गीतों का शमां बाँध दिया। कानपुर की इन छः सगी मुस्लिम बहनों ने वन्देमातरम् एवं तमाम राष्ट्रभक्ति गीतों द्वारा क्रान्ति की इस ज्वाला को सदैव प्रज्जवलित किये रहने की कसम उठाई है। राष्ट्रीय एकता, अखण्डता, बन्धुत्व एवं सामाजिक-साम्प्रदायिक सद्भाव से ओत-प्रोत ये लड़कियाँ तमाम कार्यक्रमों में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराती हैं। वह 1857 की 150वीं वर्षगांठ पर नानाराव पार्क में शहीदों की याद में दीप प्रज्जवलित कर वंदेमातरम् का उद्घोष हो, गणेश शंकर विद्यार्थी व अब्दुल हमीद खांन की जयंती हो, वीरांगना लक्ष्मीबाई का बलिदान दिवस हो, माधवराव सिन्धिया मेमोरियल अवार्ड समारोह हो या राष्ट्रीय एकता से जुड़ा अन्य कोई अनुष्ठान हो। इनके नाम नाज मदनी, मुमताज अनवरी, फिरोज अनवरी, अफरोज अनवरी, मैहरोज अनवरी व शैहरोज अनवरी हैं। इनमें से तीन बहनें- नाज मदनी, मुमताज अनवरी व फिरोज अनवरी वकालत पेशे से जुड़ी हैं। एडवोकेट पिता गजनफरी अली सैफी की ये बेटियाँ अपने इस कार्य को खुदा की इबादत के रूप में ही देखती हैं। १७  सितम्बर २००६  को कानपुर बार एसोसिएशन द्वारा आयोजित हिन्दी सप्ताह समारोह में प्रथम बार वंदेमातरम का उद्घोष करने वाली इन बहनों ने २४ दिसम्बर २००६  को मानस संगम के समारोह में पं0 बद्री नारायण तिवारी की प्रेरणा से पहली बार भव्य रूप में वंदेमातरम गायन प्रस्तुत कर लोगों का ध्यान आकर्षित किया। मानस संगम के कार्यक्रम में जहाँ तमाम राजनेता, अधिकारीगण, न्यायाधीश, साहित्यकार, कलाकार उपस्थित होते हैं, वहीं तमाम विदेशी विद्वान भी इस गरिमामयी कार्यक्रम में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं।


तिरंगे कपड़ों में लिपटी ये बहनें जब ओज के साथ एक स्वर में राष्ट्रभक्ति गीतों की स्वर लहरियाँ बिखेरती हैं, तो लोग सम्मान में स्वतः अपनी जगह पर खड़े हो जाते हैं। श्रीप्रकाश जायसवाल, डा0 गिरिजा व्यास, रेणुका चैधरी, राजबब्बर जैसे नेताओं के अलावा इन बहनों ने राहुल गाँधी के समक्ष भी वंदेमातरम् गायन कर प्रशंसा बटोरी। १३ जनवरी २००७ को जब एक कार्यक्रम में इन बहनों ने राष्ट्रभक्ति गीतों की फिजा बिखेरी तो राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्षा डाॅ0 गिरिजा व्यास ने भारत की इन बेटियों को गले लगा लिया। २५ नवम्बर २००७ को कानुपर में आयोजित राष्ट्रीय एकता सम्मेलन में इन्हें ‘‘संस्कृति गौरव‘‘ सम्मान से विभूषित किया गया। १९  अक्टूबर २००८ को ‘‘सामाजिक समरसता महासंगमन‘‘ में कांग्रेस के महासचिव एवं यूथ आईकान राहुल गाँधी के समक्ष जब इन बहनों ने अपनी अनुपम प्रस्तुति दी तो वे भी इनकी प्रशंसा करने से अपने को रोक न सके। वन्देमातरम् जैसे गीत का उद्घोष कुछ लोग भले ही इस्लाम धर्म के सिद्वान्तों के विपरीत बतायें पर इन बहनों का कहना है कि हमारा उद्देश्य भारत की एकता, अखण्डता एवं सामाजिक सद्भाव की परम्परा को कायम रखने का संदेश देना है। वे बेबाकी के साथ कहती हैं कि देश को आजादी दिलाने के लिए हिन्दू-मुस्लिम क्रान्तिकारियों ने एक स्वर में वंदेमातरम् का उद्घोष कर अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया तो हम भला इन गीतों द्वारा उस सूत्र को जोड़ने का प्रयास क्यों नहीं कर सकते हैं। राष्ट्रीय एकता एवं समरसता की भावना से परिपूर्ण ये बहनें वंदेमातरम् एवं अन्य राष्ट्रभक्ति गीतों द्वारा लोगों को एक सूत्र में जोड़ने की जो कोशिश कर रही हैं, वह प्रशंसनीय व अतुलनीय है। क्या ऐसे मुद्दों को फतवों से जोड़ना उचित है, आप भी सोचें-विचारें !!


पत्रिका सूची १


पत्रिका सूची १
१ . हंस, संजय सहाय (संपादक), editorhans@gmail.com
२ . पाखी, प्रेम भारद्वाज (संपादक), premeditor@gmail.com, pakhimagazine@gmail.com
३ . बया, गौरीनाथ (संपादक), rachna4baya@gmail.com
४ . पहल, ज्ञानरंजन (संपादक), edpahaljbp@yahoo.co.in, editorpahal@gmail.com 
५ . अंतिम जन- दीपक श्री ज्ञान (संपादक)- antimjangsds@gmail.com, 2010gsds@gmail.com
६ . समयांतर- पंकज बिष्ट (संपादक)- samayantar.monthly@gmail.com, samayantar@yahoo.com
७ . लमही- विजय राय (संपादक)- vijayrai.lamahi@gmail.com
८ . पक्षधर- विनोद तिवारी (संपादक)- pakshdharwarta@gmail.com
९ . अनहद- संतोष कुमार चतुर्वेदी (संपादक)- anahadpatrika@gmail.com
१० . नया ज्ञानोदय- लीलाधर मंडलोई (संपादक)- nayagyanoday@gmail.com, bjnanpith@gmail.com
११ . स्त्रीकाल, संजीव चन्दन (संपादक), themarginalized@gmail.com, 
१२ . बहुवचन- अशोक मिश्रा (संपादक)- bahuvachan.wardha@gmail.com
१३ . अलाव- रामकुमार कृषक (संपादक)- alavpatrika@gmail.com
१४ . बनासजन- पल्लव (संपादक)- banaasjan@gmail.com
१५ . व्यंग्य यात्रा, प्रेम जनमेजय (संपादक), vyangya@yahoo.com, premjanmejai@gmail.com
१६ . अट्टहास (हास्य व्यंग्य मासिक), अनूप श्रीवास्तव (संपादक), anupsrivastavalko@gmail.com
१७ . उद्भावना- अजेय कुमार (संपादक)- udbhavana.ajay@yahoo.com
१८ . समकालीन रंगमंच- राजेश चन्द्र (सम्पादक)- samkaleenrangmanch@gmail.com
१९ . वीणा-राकेश शर्मा,veenapatrika@gmail.com
२० . मुक्तांचल-डॉ मीरा सिन्हा,muktanchalquaterly2014@gmail.com,
२१ . शब्द सरोकार-डॉ हुकुमचन्द राजपाल,sanjyotima@gmail.com,
२२ . लहक-निर्भय देवयांश,lahakmonthly@gmail.com
२३ . पुस्तक संस्कृति। संपादक पंकज चतुर्वेदी।editorpustaksanskriti@gmail.com
२४ . प्रणाम पर्यटन हिंदी त्रैमासिक संपादक प्रदीप श्रीवास्तव लखनऊ उत्तर प्रदेश
२५ . PRANAMPARYATAN@YAHOO.COM
२६ . समालोचन वेब पत्रिका, अरुण देव (सम्पादक), www.samalochan.com, devarun72@gmail.com
२७ . वांग्मय पत्रिका, डॉ. एम. फ़िरोज़. एहमद, (सम्पादक), vangmaya@gmail.com
२८ . साहित्य समीर दस्तक (मासिक), कीर्ति श्रीवास्तव (संपादक), राजकुमार जैन राजन (प्रधान सम्पादक), licranjan2003@gmail.com
२९ . कथा समवेत (ष्टमासिक), डॉ. शोभनाथ शुक्ल (सम्पादक), kathasamavet.sln@gmail.com
३० . अनुगुंजन (त्रैमासिक), डॉ. लवलेश दत्त (सम्पादक), sampadakanugunjan@gmail.com
३१ . सीमांत, डॉ. रतन कुमार (प्रधान संपादक), seemantmizoram@gmail.com
३२ . शोध-ऋतु, सुनील जाधव (संपादक), shodhrityu78@yahoo.com
३३ . विभोम स्वर, पंकज सुबीर (संपादक), vibhomswar@gmail.com, shivna.prakashan@gmail.com
३४ . सप्तपर्णी, अर्चना सिंह (संपादक), saptparni2014@gmail.com
३५ . परिकथा, parikatha.hindi@gmail.com
३६ . लोकचेतना वार्ता, रवि रंजन (संपादक), lokchetnawarta@gmail.com
३७ . युगवाणी, संजय कोथियल (संपादक), Yugwani@gmail.com
३८ . गगनांचल,डॉक्टर हरीश नवल (सम्पादक), sampadak.gagnanchal@gmail.com
३९ . अक्षर वार्ता, प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा (प्रधान संपादक), डॉ मोहन बैरागी (संपादक) aksharwartajournal@gmail.com
४० . कविकुंभ, रंजीता सिंह (संपादक), kavikumbh@gmail.com
४१ . मनमीत, अरविंद कुमार सिंह(संपादक), manmeetazm@gmail.com
४२ . पू्र्वोत्तर साहित्य विमर्श (त्रैमासिक), डॉ. हरेराम पाठक (संपादक), hrpathak9@gmail.com
४३ . लोक विमर्श, उमाशंकर सिंह परमार (संपादक), umashankarsinghparmar@gmail.com
४४ . लोकोदय, बृजेश नीरज (संपादक), lokodaymagazine@gmail.com
४५ . माटी, नरेन्द्र पुण्डरीक (संपादक), Pundriknarendr549k@gmail.com
४६ . मंतव्य, हरे प्रकाश उपाध्याय (संपादक), mantavyapatrika@gmail.com
४७ . सबके दावेदार, पंकज गौतम (संपादक), pankajgautam806@gmail.com
४८ . जनभाषा, श्री ब्रजेश तिवारी (संपादक), mumbaiprantiya1935@gmail.com, drpramod519@gmail.com
४९ . सृजनसरिता (हिंदी त्रैमासिक), विजय कुमार पुरी (संपादक), srijansarita17@gmail.com
५० . नवरंग (वार्षिकी), रामजी प्रसाद ‘भैरव’ (संपादक), navrangpatrika@gmail.com
५१ . किस्सा कोताह (त्रैमासिक हिंदी), ए. असफल (संपादक), a.asphal@gmail.com, Kotahkissa@gmail.com
५२ . सृजन सरोकार (हिंदी त्रैमासिक पत्रिका), गोपाल रंजन (संपादक), srijansarokar@gmail.com, granjan234@gmail.com 
५३ . उर्वशी, डा राजेश श्रीवास्तव (संपादक), urvashipatrika@gmail.com 
५४ . साखी (त्रैमासिक), सदानंद शाही (संपादक), Shakhee@gmail.com
५५ . गतिमान, डॉ. मनोहर अभय (संपादक), manohar.abhay03@gmail.com
५६ . साहित्य यात्रा, डॉ कलानाथ मिश्र (संपादक), sahityayatra@gmail.com
५७ . भिंसर, विजय यादव (संपादक), vijayyadav81287@gmail.com
५८ . सद्भावना दर्पण, गिरीश पंकज (संपादक), girishpankaj1@gmail.com
५९ . सृजनलोक, संतोष श्रेयांस (संपादक), srijanlok@gmail.com
६० . समय मीमांसा, अभिनव प्रकाश (संपादक), editor.samaymimansa@gmail.com
६१ . प्रवासी जगत, डॉ. गंगाधर वानोडे (संपादक), gwanode@gmail.com pravasijagat.khsagra17@gmail.com
६२ . शैक्षिक उन्मेष, प्रो. बीना शर्मा (संपादक), dr.beenasharma@gmail.com
६३ . पल प्रतिपल, देश निर्मोही (संपादक), editorpalpratipal@gmail.com
६४ . समय के साखी, आरती (संपादक), samaysakhi@hmail.in
६५ . समकालीन भारतीय साहित्य, ब्रजेन्द्र कुमार त्रिपाठी (संपादक), secretary@sahitya-akademi.gov.in
६६ . शोध दिशा, डॉ गिरिराजशरण अग्रवाल (संपादक), shodhdisha@gmail.com
६७ . अनभै सांचा, द्वारिका प्रसाद चारुमित्र (संपादक), anbhaya.sancha@yahoo.co.in
६८ . आह्वान, ahwan@ahwanmag.com, ahwan.editor@gmail.com
६९ . राष्ट्रकिंकर, विनोद बब्बर (संपादक), rashtrakinkar@gmail.com
७० . साहित्य त्रिवेणी, कुँवर वीरसिंह मार्तण्ड (संपादक), sahityatriveni@gmail.com
७१ . व्यंजना, डॉ रामकृष्ण शर्मा (संपादक), shivkushwaha16@gmail.com
७२ . एक नयी सुबह (हिंदी त्रैमासिक), डॉ. दशरथ प्रजापति (संपादक), dasharathprajapati4@gmail.com
७३ . समकालीन स्पंदन, धर्मेन्द्र गुप्त 'साहिल' (संपादक), samkaleen.spandan@gmail.com
७४ . साहित्य संवाद , संपादक - डॉ. वेदप्रकाश, sahityasamvad1@gmail.com
७५ . भाषा विमर्श ( अपनी भाषा की पत्रिका), अमरनाथ (प्रधान संपादक), अरुण होता (संपादक), amarnath.cu@gmail.com
७६ . विश्व गाथा, पंकज त्रिवेदी (संपादक), vishwagatha@gmail.com 
७७ . भाषिकी अंतरराष्ट्रीय रिसर्च जर्नल, प्रो. रामलखन मीना (संपादक), prof.ramlakhan@gmail.com
७८ . समवेत, संपादक-डॉ.नवीन नंदवाना, editordeskudr@gmail.com
७९ . तदभव, संपादक: अखिलेश, Akhilesh_tadbhav@yahoo.com
८० . रचना संसार, भारत कात्यायन (संपादक), Rachanasansar@gmail.com
८१ . शब्द सुमन मासिक पत्रिका, सम्पादक-डॉ रामकृष्ण लाल ' जगमग', 2015shabdsuman@gmail.com
८२ . अनुराग लक्ष्य, संपादक- विनोद कुमार, vinodmedia100@gmail.com
८३ . सरस्वती सुमन (मासिक), संपादक- आनन्दसुमन सिंह, saraswatisuman@rediffmail.com
८४ . आधारशिला (मासिक), संपादक- दिवाकर भट्ट, adharshila.prakashan@gmail.com, editor.adharshila@gmail.com
८५ . प्रेरणा-अंशु (राष्ट्रीय मासिक), संपादक- प्रताप सिंह, prernaanshu@gmail.com
८६ . युवादृष्टि (मासिक), संपादक- बी सी जैन, suggestion.abtyp@gmail.com, abtypyd@gmail.com
८७ . संवदिया(सर्जनात्मक साहित्यिक त्रैमासिकी), संपादक- अनीता पंडित, प्रधान संपादक- मांगन मिश्र'मार्तण्ड', Samvadiapatrika@yahoo.com
८८ . सोच विचार, संपादक-डॉ. जितेन्द्र नाथ मिश्र, sochvicharpatrika@gmail.com
८९ . त्रैमासिक आदिज्ञान, संपादक-जीतसिंह चौहान, Adigyaan@gmail.com
९० . पतहर तिमाही, संपादक-विभूति नारायण ओझा, hindipatahar@gmail.com
९१ . चौराहा (अर्द्धवार्षिक), संपादक - अंजना वर्मा, anjanaverma03@gmail.com
९२ . निराला निकेतन पत्रिका बेला, संपादक -संजय पंकज, dr.sanjaypankaj@gmail.com
९३ . इंदु संचेतना(साहित्य परिक्रमा), गंगा प्रसाद शर्मा'गुण शेखर'(प्रधान संपादक),थिएन कपिंग(कार्यकारी संपादक,चीन),बिनय कुमार शुक्ल(संपादक), indusanchetana@gmail.com, indusanchetana.blogspot.in
९४ . समय सुरभि अनंत (त्रैमासिक ), सम्पादक- नरेन्द्र कुमार सिंह, samaysurabhianant@gmail.com
९५ . "औरत " मासिक पत्रिका, संपादक डॉ विधुल्लता ,भोपाल (मध्यप्रदेश), Aurat.vidhu@gmail.com
९६ . वार्ता वाहक-श्रीवत्स करशर्मा(संपादक), vartavahak@gmail.com, 
९७ . नागरी संगम-डॉ हरिपाल सिंह(प्रधान संपादक), nagrilipiparishad1975@gmail.com
९८ . सेतु (पिट्सबर्ग से प्रकाशित), अनुराग शर्मा, setuhindi@gmail.co, http://www.setumag.com
९९ . स्त्री, प्रो. कुसुम कुमारी (संपादक), chitra.anshu4@gmail.com
१०० . चिंतन दिशा, संपादक-हृदयेश मयंक, Chintandisha@gmail.com 
१०१ . आधुनिक साहित्य, संपादक डॉ. आशीष कंधवे, aadhuniksahitya@gmail.com
१०२ . अनभै, संपादक- डॉ.रतनकुमार पाण्डेय, anbhai@gmail.com
१०३ . कथाबिंब - सं.डॉ.माधव सक्सेना अरविंद, kathabimb@gmail.com
१०४ . संयोग साहित्य- सं.मुरलीधर पाण्डेय, Lordsgraphic@gmail.com
१०५ . नई धारा – संपादक- शिवनारायण, editor@nayidhara.com
१०६ . नया पथ- संपादक- मुरली मनोहर प्रसाद सिंह/चंचल चौहान, jlsind@gmail.com
१०७ . जनपथ-सं. अनंत कुमार सिंह, janpathpatrika@gmail.com
१०८ . समन्वय पूर्वोत्तर, संपादक – डॉ. ब्रिजेंद्र सिंह, samanvayapoorvoter@gmail.com
१०९ . समन्वय दक्षिण, संपादक – डॉ. अनीता गांगुली, khshyderabad@yahoo.com
११० . देशज, संपादक-अरुण शीतांश, arunsheetansh@gmail.com

मंगलवार, 27 मार्च 2018

दोहा गीत:

दोहा गीत 
*
जो अव्यक्त हो, 
व्यक्त है 
कण-कण में साकार 
काश! 
कभी हम पा सकें, 
उसके भी दीदार

कंकर-कंकर में वही 
शंकर कहते लोग 
संग हुआ है किस तरह 
मक्का में? संजोग 
जगत्पिता जो दयामय 
महाकाल शशिनाथ 
भूतनाथ कामारि वह 
भस्म लगाए माथ 
भोगी-योगी 
सनातन 
नाद वही ओंकार 
काश! 
कभी हम पा सकें, 
उसके भी दीदार

है अगम्य वह सुगम भी 
अवढरदानी ईश 
गरल गहे, अमृत लुटा 
भोला है जगदीश 
पुत्र न जो, उनका पिता 
उमानाथ गिरिजेश 
नगर न उसको सोहते 
रुचे वन्य परिवेश 
नीलकंठ 
नागेश हे! 
बसो ह्रदय-आगार 
काश! 
कभी हम पा सकें, 
उसके भी दीदार
***