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शनिवार, 3 मार्च 2018

samiksha


कृति चर्चा:

‘बाँसुरी विस्मित है’ हिंदी गज़ल की नई भंगिमा    
-    आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
[कृति विवरण: बाँसुरी विस्मित है, हिंदी ग़ज़ल / मुक्तिका संग्रह, डॉ. रोहिताश्व अस्थाना, द्वितीय संस्करण, २०११, पृष्ठ ७०, मूल्य १००/-, आवरण एकरंगी, पेपरबैक, सहयोगी साहित्यकार प्रकाशन, निकट बावन चुंगी चौराहा हरदोई २४१००१, रचनाकार संपर्क: चलभाष ०५८५२ २३२३९२]
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‘बाँसुरी विस्मित है’ हिंदी ग़ज़ल या मुक्तिका विधा के शिखर हस्ताक्षर डॉ. रोहिताश्व अस्थाना रचित ५४ मुक्तिकाओं का पठनीय संकलन है. अस्थाना जी हिंदी ग़ज़ल पर प्रथम शोधकार, हिंदी गजल के ७ सामूहिक संकलनों के संपादक तथा सुधी समीक्षक के रूप में बहुचर्चित तथा बहुप्रशंसित रहे हैं. साफ़-सुथरी, सहज-सरल भाषा शैली, मानवीय मनोभावनाओं का सटीक-सूक्ष्म विश्लेषण, लाक्षणिकता तथा व्यंजनात्मकता का सम्यक मिश्रण तथा आम आदमी के दर्द-हर्ष का संवेदनापूर्ण शब्दांकन inमुक्तिकाओं में है. ख्यात हिंदी गज़लकार डॉ. कुंवर बेचैन के शब्दों में- ‘साफ़-सथरी बहारों में कही/लिखी in ग़ज़लों ने भाषा का अपना एक अलग मुहावरा पकड़ा है. प्रतीक और बिम्बों की झलक में कवि का मंतव्य देखा जा सकता है. उनकी ग़ज़लों में अनुभवों का पक्कापन दिखाई देता है.
सनाकलं की पहली गजल हिंदी ग़ज़ल को परिभाषित करते हुए तमाम विवादों का पटाक्षेप कर स्वस्थ परिभाषा का संकेत करती है. १९ मात्रिक महापौराणिक जातीय छंद (बहर- ‘रमल मुसद्दस महफूज़’) में लिखी गई यह ग़ज़ल डॉ. अस्थाना के विश्वास की साक्षी है कि हिंदी ग़ज़ल का भविष्य उज्जवल है-
दर्द का इतिहास है हिंदी ग़ज़ल
एक शाश्वत प्यास ही हिंदी ग़ज़ल
प्रेम मदिरा रूप की बातों भरी
अब नहीं बकवास है हिंदी गजल
आदमी के साथ नंगे पाँव ही
ढो रही संत्रास है हिंदी ग़ज़ल
आदमी की जिंदगी का आइना
पेश करती ख़ास है हिंदी ग़ज़ल
२६ मात्रिक महाभागवत जातीय गीतिका छंद (बह्र- रमल महजूफ़ मुसम्मन) में रची गयी ग़ज़ल ज़िंदगी के दिन-ब-दिन मुश्किल होते जाते हालात बयान करती है-
प्यास का पर्याय बनकर रह गयी है ज़िन्दगी
कस कदर असहाय बनकर रह गयी है जिंदगी
दे न पायेगी तुम्हें सुविधाओं का ये दूध अब
एक बूढ़ी गाय बनकर गयी है जिंदगी
सभ्यता के नाम पर क्या गाँव से आए शहर
एक प्याला चाय बनकर रह गयी है ज़िन्दगी
धूम्र का अजगर निगलता जा रहा है बस्तियां
धुंध सीलन हाय बनकर रह गयी है जिंदगी
दर्द उत्पीडन रुदन जैसे पड़ावों से गुजर
काफोला निरुपाय बनकर रह गयी है जिंदगी
१९९७ में लिखी गई यह ग़ज़ल जिन पर्यावरणीय समस्याओं को सामने लाती हैं वे तब उतनी भीषण नहीं थीं किंतु कवि भविष्यदर्शी होता है. आज से लगभग २० पूर्व लिखी गई रचना अधिक प्रासंगिक और समीचीन है.
शहर और गाँव के बीच बढ़ती खाई और आम आदमी की अधिक से अधिक दुश्वार होती ज़िन्दगी की नब्ज़ पर गजलकार की नजर है-
इस कदर फैला हवाओं में ज़हर है
धुंध में डूबा हुआ सारा शहर है
हैं पडीं चुपचाप सड़कें वैश्या सी
कुंओं पर ढा रहा हर पल कहर है
झोपडी-झुग्गी उजड़कर रह गयी
शहर में आई तरक्की की लहर है
(त्रैलोक जातीय छंद, बह्र रमल मुसद्दस सालिम)  
गज़ल-दर-ग़ज़ल उसकी बह्र का उल्लेख करनेवाले डॉ. अस्थाना ग़ज़लों के छंदों का भी उल्लेख कर देते तो सोने में सुहागा होगा किंतु उनहोंने यह कार्य शोधकारों पर छोड़ दिया है. बह्र के नाम देने से रचनाओं की ग़ज़लपरक शास्त्रीयता तो प्रमाणित होती है किंतु छंद का नाम छूट जाने से हिंदी छंद सम्मतता सिद्ध नहीं हो पाई है.
अस्थाना जी शिक्षा कर्म से जुड़े और सामाजिक जीवन की विसंगतियों से भली-भाँति परिचित हैं. सम्माज में व्याप्त दहेज़ की कुप्रथाजनित दुष्प्रभाव को वे बहुत कोमलता से सामने रखते हैं-
‘कम है दहेज’ सब की जुबान पर ये बात है
भोली बहू के हाथ का कंगन उदास है
शिक्षा के शेत्र में ज्ञान पर उपाधि को वरीयता देने के दुष्प्रभाव और दुरभिसंधि के वे आजीवन साक्षी रहे हैं और इसीलिए पूछते हैं-
ज्ञान का स्वागत करें ताम को मिटाएँ
इस जरूरी काम पर किसकी नजर है?
आम आदमी के मंगल को भूलकर मंगल की खोज करने के फलसफे से असहमत रोहिताश्व जी बहुत सादगी और संजीदगी से कहते हैं-
मरते हैं लोग भूख से, वो देखते नहीं
झन्डा विजय का चाँद पर जो गाड़ने लगे
‘दिल मिले या न मिले हाथ मिलाए रहिए’ की दिखावटी सामाजिकता अस्थाना जी को मंजूर नहीं है. वे ऐसी झूठी सदाशयता को आइना दिखाते हुए पूछते हैं-
दिल न मिल पाएँ तो हम सीना मिलाकर क्या करें?
अपने चहरे पर नया चेहरा लगाकर क्या करें??
क्या मिला था हमको पहले फूँक दी थी झोपड़ी
आज फिर महलों की खातिर, घर जलाकर क्या करें?
चाँद सुख-सुविधाओं के लिए अपने सिद्धांतों को तिलांजलि देनेवालों से मुक्तिकाकार पूछता है-
एक दिना जाना सभी को है सिकन्दर की तरह
क्यों भला फिर आदमी नाचे है बन्दर की तरह?
और फिर विसंगतियों का पटाक्षेप कर सर्व सहमति की दिशा इंगित करते हैं डॉ. अस्थाना
आपमें सबके विचारों की नदी मिल जाएँगी
दिल को अपने कीजिए पहले समंदर की तरह
जन सामान्य को सहज ग्राह्य शब्दावली में बड़ी से बड़ी बात रख पाना उन्हीं के वश की बात है-
कुछ खुदा से डरो तो अच्छा है
बोलना कम करो तो अच्छा है
धुन में अपनी लगे-लगे यूँ ही
पीर सबकी हरो तो अच्छा है
मौन से मूर्ख कालिदास हुआ
अनुकरण तुम करो तो अच्छा है
देश के बड़बोले नेताओं को इससे अधिक साफ़-साफ़ और कौन सलाह दे सकता है?
दुष्यंत कुमार ने लिखा था- ‘पीर पर्वत हो गयी है अब पिघलनी चाहिए’ और डॉ. अस्थाना लिखते हैं-
पीर का पर्वत खड़ा उर पर
मरसिए के गान के दिन हैं
हड्डियों तक भर गयी जड़ता
चेतना-प्रस्थान के दिन हैं.
मर्मबेधी व्यंजनात्मकता का कमाल देखें-
कारोबार बड़े लोगों का
है संसार बड़े लोगों का
चोर-उचक्का ही होता है
पहरेदार बड़े लोगों का
परिवर्तन क़ानून में कर दें
हर अधिकार बड़े लोगों का
शब्द-बिम्बों के माध्यम से समाज में व्याप्त विद्रूपताओं और विसंगतियों को सामने लाकर डॉ. अस्थाना हिंदी ग़ज़ल को समय-साक्षी दस्तावेज बना देते हैं-
रूपा का रूप ले गया ग्रसकर कोई ग्रहण
पर पेट के प्रसंग सवालात हैं वही
नाराज़ हो गए हैं सभी दोस्त ‘रोहिताश्व’
सच बोलने के अपने तो आदात हैं वही
‘प्रेम मदिरा रूप की बातें भरी / अब नहीं बकवास है हिंदी ग़ज़ल’ कहने के बाद भी रोहिताश्व जी सात्विक श्रृंगार से हिंदी ग़ज़ल / मुक्तिका को सज्जित कर आल्हादित होते हैं-
फूलों का उपहार तुम्हारा
सबसे सुन्दर प्यार तुम्हारा
मुझे बहुत अच्छा लगत अहै
यह सोलह श्रृंगार तुम्हारा
मेरी ग़ज़लों पर जाने-मन
पहला है अधिकार तुम्हारा
मेरे जीवन में आ जाओ
मानूँगा आभार तुम्हारा
एक और बानगी देखें –
बैठकर मुस्का रही हो तुम
सच बहुत ही भा रही हो तुम
बाँसुरी विस्मित समर्पित सी
गीत मेरा गा रही हो तुम
एक अभिनव प्रेम का दर्शन
आँख से समझा रही हो तुम
एक अनबुझ आग पानी में
प्रिय! लगाए जा रही हो तुम
चाहते हैं भूलना जितना
याद उतना आ रही हो तुम
डॉ, अस्थाना शब्दों की सांझा विरासत में यकीन करते हैं. वे हिंदी-उर्दू ग़ज़ल को भिन्न तो मानते हैं किंतु इसका आधार ‘शब्द’ नहीं शिल्प को स्वीकारते हैं. उर्दू तक्तीअ के अनुसार वज़न देखें को वे उर्दू ग़ज़ल के लिए जरूरी मानते हैं तो हिंदी मात्रा गणना को हिंदी ग़ज़ल का आधार मानते हैं. हिंदी छंदों का प्रयोगकर हिंदी ग़ज़ल को नव आयाम दिए जाने का समर्थन करते हैं डॉ. अस्थाना किंतु स्वयं हिंदी पिंगल पर अधिकार न होने का हवाला देकर हिंदी बह्र के साथ छंद का उल्ल्लेख न करने का बचाव करते हैं.
डॉ. अस्थाना की कहाँ अपने आपमें एक मिसाल है. वे बहुत सादगी और सरलता से बात इस तरह कहते हैं जिसे समझने की कोशिश न करनी पड़े, पढ़ते या सुनते ही अपने आप समझ आ जाए.
बाँट दिया नाकाम प्यार मासूम खिलौनों में
उन हंसमुख चेहरों का तुम्हें सलाम लिख रहा हूँ 
पीड़ा का इतिहास पढ़ा तो जान लिया मैंने
कोई मीरा पा न सकी घनश्याम लिख रहा हूँ.
*
चन्द्रमा की चांदनी हो तुम
पूर्णिमा की यामिनी हो तुम
पास मेरे इस तरह बैठो-
मेघ में ज्यों दामिनी हो तुम
*
दर्द का दरिया समन्दर हो गया
जब से कोइ दिल के अन्दर हो गया
गजल का वर्चस्व हिंदी में बढ़ा
क्योंकि उसका तल्ख़ तेवर हो गया
हिंदी ग़ज़ल के वर्चस्व का आधार ‘तल्ख़ तेवर’ को माननेवाल्व डॉ. रोहिताश्व अस्थाना उम्र के सात दशक पार करने, कई बीमारियों और पारिवारिक समस्याओं से दो-चार होने के बाद भी हिंदी ग़ज़ल, बाल साहित्य और समीक्षा के सरह नव रचनाकारों को संरक्षण देने के उपक्रम में जुटे हुए हैं. उनके पास महत्वपूर्ण पुस्तकों का संकलन है जिसे वे किसी शोधगार को सौपना कहते हैं ताकि उसका समुषित उपयोग और सुरक्षा हो सके. उनके महत्वपूर्ण कार्य का सम्यक मूल्यांकन अब तक नहीं हो सका है. जिस हिंदी ग़ज़ल की आधार शिला पर शोध की इमारत उन्होंने खादी की, उसी के नए दावेदार उनके अवदान का उल्लेख तक करने में संकुचाते हैं. शासन और समीक्षकों को अपनी वैचारिक संकीर्णता और बौनेपन से बाहर आकर उन्हें और उनके काम को सम्दृत कर अपने दायित्व का निर्वहन करना चाहिए, अन्यथा समय उन्हें कटघरे में खड़ा करेगा है. डॉ. अस्थाना रहिंदी ग़ज़ल को मुक्तिका कहा जाना ‘गीतिका’ या अन्य नामों की तुलना में अधिक तार्किक मानते हैं.
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संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,
चलभाष ७९९९५५९६१८, ईमेल salil.sanjiv@gmail.com , web www.divyanarmada.in

holi geet

आइए छंद खोजें:
होली गीत-- "ब्रज की होली" सुनीता सिंह
* फाग राग में डूब के मनवा राधे-राधे बोल रहा है। ३३
बाँसुरिया की तान पे मौसम शरबत मीठा घोल रहा है।। ३३ ब्रज की गली में घूम रही ग्वाल-बाल की टोलियाँ। २८ रंग-बिरंगे जल से भरी लहराती पिचकारियाँ।। टेसू के फूलों के रंग से मन के पट भी खोल रहा है। ३३
बाँसुरिया की तान पे मौसम शरबत मीठा घोल रहा है।। चुपके-चुपके चारों ओर ढूँढ रहे नंदलाला। २८ छुप कर बैठी कहाँ राधिका पूछे मुरली वाला।। बरसाने के कुंज-कुंज में कान्हा जा कर डोल रहा है। ३२ बांसुरिया की तान पे मौसम शरबत मीठा घोल रहा है।। हवा ने छेड़ दिया आखिर फागुन का संगीत जब। २८
गोपियों संग निकली राधे प्रीत की ही रीत सब।। वृंदावन संग ब्रज पूरा भांग बिना ही कलोल रहा है। ३४
बाँसुरिया की तान पे मौसम शरबत मीठा घोल रहा है।। फाग राग में डूब के मनवा राधे-राधे बोल रहा है।
बाँसुरिया की तान पे मौसम शरबत मीठा घोल रहा है।।
***
इस होली गीत में मुखड़ा ३३ मात्राओं तथा अन्तरा २८ मात्राओं का है।
मुखड़े में पदांत यगण १२२ है जबकि अंतरे में पदांत क्रमश: रगण २१२,
१२२-२२२ तथा नगण १११ है अर्थात किसी नियम का पालन नहीं है।
मुखड़े में २०-२२ वर्णों की पंक्तियाँ है, जबकि अंतरों में क्रमश: १८-१९,
१८-१८, १९-१८ वर्ण हैं. तदनुसार -
मात्रिक छंद: मुखड़ा देवता जातीय छंद है जबकि अंतरा यौगिक जातीय छंद है.
वर्णिक छंद: वर्ण संख्या भिन्नता के कारण कोई एक छंद नहीं, छंदों का मिश्रण है।

शिव दोहावली

दोहा में शिव तत्व
*
दोहा में शिव-तत्व है, दोहा भी शिव-तत्व।
'सलिल' न भ्रम यह पालना, दोहा ही शिव-तत्व।।
*
अजड़ जीव, जड़ प्रकृति सह, सृष्टि-नियंता मौन।
दिखते हैं पशु-पाश पर, दिखें न पशुपति, कौन?
*
अक्षर पशु ही जीव है, क्षर प्रकृति है पाश।
क्षर-अक्षर से परे हैं, पशुपति दिखते काश।।
*
पशुपति की ही कृपा से, पशु को होता ज्ञान।
जान पाश वह मुक्त हो, कर पशुपति का ध्यान।।
*
पुरुषोत्तम पशुपति करें, निज माया से मुक्त।
माया-मोहित जीव पशु, प्रकृति मायायुक्त।।
*
क्षर प्रकृति अक्षर पुरुष, दोनों का जो नाथ।
पुरुषोत्तम शिव तत्व वह, जान झुकाकर माथ।।
*
है अनादि बिन अंत का, क्षर-अक्षर संबंध।
कर्मजनित अज्ञान ही, सृजे जन्म अनुबंध।।
*
माया शिव की शक्ति है, प्रकृति कहते ग्रंथ।
आच्छादित 'चिद्' जीव है, कर्म मुक्ति का पंथ।।
*
आच्छादक तम-तोम है, निज कल्पित लें मान।
शुद्ध परम शिव तम भरें, जीव करे सत्-भान।।
*
काल-राग-विद्या-नियति, कला भोगता जीव।‌
पुण्य-पाप सुख-दुख जनित, फल दें करुणासींव।।
*
मोह वासना अविद्या, जीव कर्म का मैल।
आत्मा का आश्रय गहे, ज्यों  पानी पर तैल।।
*
कर्म-नाश हित भोग है, मात्र भोग है रोग।
जीव-भोग्या है प्रकृति, हो न भोग का भोग।।
*
शिव-अर्पित कर कर्म हर, शिव ही पल युग काल।
दशा, दिशा, गति, पंथ-पग, शिव के शिव दिग्पाल।।
***
३.३.२०१८

शुक्रवार, 2 मार्च 2018

holi ke dohe

दोहा की होली
*
दीवाली में दीप हो, होली रंग-गुलाल
दोहा है बहुरूपिया, शब्दों की जयमाल
*
जड़ को हँस चेतन करे, चेतन को संजीव
जिसको दोहा रंग दे, वह न रहे निर्जीव
*
दोहा की महिमा बड़ी, कीर्ति निरुपमा जान
दोहा कांतावत लगे, होली पर रसखान
*
प्रथम चरण होली जले, दूजे पूजें लोग
रँग-गुलाल है तीसरा, चौथा गुझिया-भोग
*
दोहा होली खेलता, ले पिचकारी शिल्प
बरसाता रस-रंग हँस, साक्षी है युग-कल्प
*
दोहा गुझिया, पपडिया, रास कबीरा फाग
दोहा ढोलक-मँजीरा, यारों का अनुराग
*
दोहा रच-गा, झूम सुन, होला-होली धन्य
दोहा सम दूजा नहीं. यह है छंद अनन्य
***


होलिकोत्सव २-३-२०१८

गुरुवार, 1 मार्च 2018

samiksha


कृति चर्चा:


‘दृगों में इक समंदर है’ समाहित गीतिकाव्य का निनादित प्रवाह  
-    आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
[कृति विवरण: दृगों में इक समंदर है, हिंदी गीतिका / मुक्तिका संग्रह, प्रो. विश्वंभर शुक्ल, प्रथम संस्करण, २०१७, ISBN ९७८-९३-८५४२८-३७-१, पृष्ठ ११६, मूल्य १२५/-, आवरण बहुरंगी, सजिल्द जैकेट सहित, उद्भावना प्रकाशन, एच ५५ सेक्टर २३, राज नगर गाज़ियाबाद, रचनाकार संपर्क ८४ ट्रांस गोमती, त्रिवेणी नगर–प्रथम, डालीगंज रेलवे क्रोसिंग, लखनऊ २२६०२०, चलभाष ९४१५३२५२४६, ईमेल vdshukla01@gmail.com]
*
हिंदी गीति काव्य के जैसी  सरस, सहज, सरल काव्य माधुरी विश्व की अन्य किसी भी भाषा में नहीं है. संस्कृत से विरासत में प्राप्त हिंदी पिंगल शास्त्र में हरि अनंत हरि कथा अनंता की तरह अगणनीय छंद वैविध्य, अनगिनत शिल्प प्रकार तथा अकल्पनीय भाव भंगिमाएँ हैं. गीति-काव्य की चार पंक्तियों से अधिक लम्बी ऐसी काव्य रचनाएँ जिनमें तुकांत-पदांत प्रमुख लक्षण हो, मुक्तिका या गीतिका कही जा रही हैं. हिंदी के गढ़ लखनऊ के श्रेष्ठ-ज्येष्ठ साहित्यविद प्रो. विशम्भर शुक्ल रचित दृगों में इक समंदर को पढ़ना सम-सामयिक और आधुनिक गीति-काव्य की नवीन्तन और अद्यतन भावमुद्राओं से साक्षात करने की तरह है. प्रो. शुक्ल हिंदी काव्य ही नहीं अर्थशास्त्र के भी विद्वान हैं. अर्थशास्त्र में उन्होंने अधिकतम उपयोगिता, उपयोगिता ह्रास और मितव्ययिता छात्रों को तो पढ़ाया ही काव्यशास्त्र के क्षेत्र में उसका भरपूर उपयोग भी किया है. फलत: उनकी गीति रचनाओं में शब्दों का अपव्यय देखने नहीं मिलाता. वे उतना ही लिखते हैं जिससे पाठक में और पढ़ने की प्यास शेष रह जाए. उनकी रचनाएँ नपी-तुली, संतुलित अभिव्यक्ति की जीवंत बानगी प्रस्तुत करती हैं. 

अधुनातन दृष्टिकोण के साथ पारंपरिक सनातनता का सम्मिश्रण करने का नैपुण्य उनके शिक्षक ने उनके जीवन का अंग बना दिया है. अत: ‘दृगों में इक समंदर है’ का श्री गणेश माँ वाणी को नमन से होना स्वाभाविक है. इकतीस वर्णिक सरस्वती वंदना में मनहरण घनाक्षरी कवित्त का प्रयोगकर रचनाकार अपनी छांदस परिपक्वता का आभास करा देता है. इस छंद के विधान ८-८-८-७ पर लय को वरीयता देता कवि माँ शारदा आँगन की तुलसी से घर को महकाने की प्रार्थना करता है-
भोर मुसकाती आई संग  मुसकाइये                                                   
मातु वीणावादिनी की वीथिका सजाइए
खोलते प्रसून कहें जीवन में रंग भरें
लेखनी की तूलिका से चित्र तो बनाइये
आ गए मुंडेर पर विहाग विहान लिए
सूर्य को प्रणाम कर सृजन जगाइए
तन-मन शुद्ध है तो सारे सुख जगती के
आँगन की तुलसी से घर महकाइए
बेला है सृजन की तो भाव अलबेले हों
वाणी को नमन कर लेखनी उठाइये

रचना में पदांत में व्यवहृत क्रिया पद के अंत में ‘ए’ और ‘ये’ दोनों का प्रयोग चौंकाता है. केन्द्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा जारी ‘देवनागरी लिपि तथा हिंदी वर्तनी का मानकीकरण’ के अनुसार जिन शब्दों में मूल रूप से ‘य’ और ‘व’ शब्द के अंग हों उनके साथ ‘ये’ का उपयोग आवश्यक है, शेष के साथ ‘ए’ का.

मानव जातीय हाकली छंद से सादृश्य रखता यौगिक जातीय विधाता छंद में रचित ‘आखर शब्द पराग लिखो’ में कवि ने अपेक्षाकृत छोटे छंद का सफलतापूर्वक प्रयोग किया है-
जीवन में अनुराग लिखो
प्रतिदिन प्रखर विहाग लिखो
सुमन सुहाने मुस्काएं
आखर, शब्द, पराग लिखो
प्रकृति नटी के रँग निरखो
पर्वत, बादल, आग लिखो
धीर समंदर लहरें भी
नदिया, कूप, तड़ाग लिखो
मन में जो भी भाव जगें
उन सबको बेलाग लिखो
गहन तिमिर में चमके जो
धवल मनुज का भाग लिखो

राष्ट्रीय भावधारा के प्रबल समर्थक विशम्भर जी ‘मातु भारती अभिनन्दन’ शीर्षक रचना में माँ भारती का वंदन करते हैं. इस रचना में विधाता छंद का प्रयोग करते समय शुक्ल जी पदांत के ‘गुरु गुरु’ को ‘गुरु लघु लघु’ कर प्रयोग करते हैं. इस परिवर्तन से यह छंद यौगिक जातीय  होते हुए भी विधाता नहीं रह जाता. मैंने ऐसे लगभग ४०० छंदों का अन्वेषण कर लेखानाधीन ‘छ्न्द कोष’ में उन्हें स्थान दिया है किंतु इस कृति के प्रकाशन तक इस छंद का भिन्न नाम न होने से इसे संकर विधाता ही कहना होगा.

कृति के अभिकथन में भोपाल निवासिनी कवयित्री कांति शुक्ल जी ने विशम्भर की के काव्य लेखन में कथ्य की संक्षिप्तता, शिल्प की सांगीतिकता, छंदानुशासन के साथ भाव प्रवणता तथा सहज सम्प्रेषणीयता को उनका वैशिष्ट्य उचित ही बताया है. कांति जी ने इन रचनाओं में समाज के मर्म को समझने की सामर्थ्य, विद्रूपताओं और विसंगतियों को इंगित कर दिशा-दर्शन, अर्थ गाम्भीर्य, भाव सूक्ष्मता, रसोद्रेक, पारदर्शिता, सामयिकता आदि का सम्यक संकेत किया है.

हिंदी साहित्य के प्रखर अध्येता और विद्वान् डॉ. उमाशंकर शुक्ल ‘शितिकंठ’ ने इन रचनाओं को ‘’भावों और विचारों की सहज प्रवाही और बहुरंगी दीप्ति से उद्भासित’’ ठीक ही कहा है.

व्यंग्यकार-दोहाकार अरुण अर्णव खरे शुक्ल जी के सृजन में अन्तर्निहित जीवन-दृष्टि, गहन-समझ और सशक्त अभिव्यक्ति को सहज सोकोमल भावनाओं, मानवीय संवेदनाओं से संगुम्फित पाते हैं.

शुक्ल जी समाज की नब्ज़ पर अँगुली रखकर काव्य साधना करते हैं. वे भारतीयों द्वारा खुद के कर्तव्य की अवहेलना कर अन्यों को सुझाव देने की दुष्प्रवृत्ति से सुपरिचित हैं. पर्यावरण प्रदूषण, सामाजिक बिखराव तथा कर्तव्य बोध की कमी को एक ही रचना में गूंथकर वे परिवर्तन का आव्हान करते हैं-
आओ कुछ बात करें गति के ठहराव की
उफनाई नदी और बंधी हुई नाव की
अलग-अलग आँगन हैं, व्योम पृथक सबके
दंगों की क्यारी में फसलें सद्भाव की
दीवारें कब विवस्त्र हो जाएं क्या पता
बंद अभी रहने दो पुस्तिका सुझाब की.

शुक्ल जी भारतीय वांग्मय के मिथकों का वर्तमान सन्दर्भों में कुशलता से उपयोग कर पाते हैं-

हमने उंगली पे उठाये पर्वत / कृष्ण देखे हैं, पुरंदर देखे
*
जन्मता नहीं न होता नष्ट / त्यागकर वसन, गहे आकार
कृष्ण ने दिया यहे संदेश / कर्म ही श्रेष्ठ, शेष निस्सार
*
विष ही नहीं, अमिय पा जाते / करते कुछ दिन मंथन लोग
*
बीस मात्रिक महादैशिक जातीय अरुण छंद में ‘छंद हैं प्यास के’ शीर्षक रचना कम शब्दों में अधिक बात कह सकने की सामर्थ्य की बानगी है-
छंद हैं प्यास के / मूक विश्वास के
रश्मियों ने लिखे / गीत मधुमास के
दिन सहेजे गए / हास-परिहास के
उम्र ने पल जिए / सिर्फ उल्लास के
व्यर्थ अनुबंध ये / दूर हैं पास के
शेष हैं कोष में / फल ये संत्रास के

सामान्यत: हिंदी छंदों से अनभिग्य युवा पीढ़ी और नव रचनाकारों के लिए शुक्ल जी का लेखन उन्हें उनकी जमीन से जोड़ने का सशक्त माध्यम हो सकता है. यदि रचनाओं के साथ पाद टिप्पणी में छंद का नाम और विधान इंगित हो तो अनुकरण आसन हो सकता है. प्रसाद गुण सम्पन्न भाषा सहज बोधगम्य है. शुक्ल जी शब्दों की सांझा विरासत के हिमायती हैं और अभिव्यक्ति की आवश्यकतानुसार शब्दों का प्रयोग करते हैं. ‘दृगों में इक समंदर है’ का स्वागत न केवल नवोदितों अपितु विद्वज्जनों द्वारा भी होगा. यह दरीचे से आटे ताज़ा हवा के झोंके की तरह है.

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, चलभाष ७९९९५५९६१८, ईमेल salil.sanjiv@gmail.com , web www.divyanarmada.in