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मंगलवार, 2 अप्रैल 2024

अप्रैल २, युगतुलसी, व्यंग्य, सॉनेट, पवन, चित्रगुप्त, दुर्गा, हनुमान, दोहा, मात्रा, कत्अ

सलिल सृजन २ अप्रैल
*
स्मरण युगतुलसी
युगतुलसी में तुलसी युग था
राम नाम हर श्वास गुँजाया
हुलसी हुलसी तुलसी पाकर पुत्र रामबोला दे खोई
बोला राम राम आजीवन मानस रच नव आशा बोई
मर्यादा पुरुषोत्तम सर्वोत्तम जन जन हृदय के बसाया
युगतुलसी में तुलसी युग था राम नाम हर श्वास गुँजाया
नेह नर्मदा तट साक्षी तुलसी- युगतुलसी राम-लीन थे
सिया-राम-हनुमान नाम पल पल गुंजित कर रही बीन थे
राम भक्ति में लीन हुए वै, रिम नाम पर्याय बनाया
युगतुलसी में तुलसी युग था राम नाम हर श्वास गुँजाया
गए नर्मदा तट से गंगा सरयू तट पर राम रमाया
राम चरित मानस जन गण के मानस में रोपा विकसाया
राम-भक्ति सलिला प्रवहित कर भव को भव से पार कराया
युगतुलसी में तुलसी युग था राम नाम हर श्वास गुँजाया
२.४.२०२४
•••
व्यंग्य रचना 
छंद जाए भाड़ में
*
हो रही नीलाम कविता छंदमय बाज़ार में।  
जेब में नगदी नहीं तो लो खरीद उधार में।।

टके के हैं तीन छंदाचार्य इंटरनेट पर।
सिखाते आधा-अधूरा ज्ञान वे व्यवहार में।।

मूलत: है छंद वाचिक जो नहीं यह जानते
है नहीं लौकिक या वैदिक छंद छंदागार में।।

वर्ण-मात्रा से अधिक कुछ भी न जानें जो वही
ग्रंथ पिंगल के लिखें नित; शून्य जो उच्चार में।।

वास्ता लय; नाद या आलाप से किंचित नहीं
तानसेनी विरासत कहते मिली किरदार में।।

चेलियाँ भाती बहुत करते अलंकृत नित उन्हें।
छोड़ पति बच्चे गृहस्थी जो भ्रमित छनकार में।।

राशियाँ ले; दे रहे सम्मान अनगिन रोज ही।
विश्व सम्मेलन हुआ धंधा नया आचार में।।

कर रहे प्रतिबद्ध लेखन नहीं सच से वास्ता।
पथ दिखाते दृष्टि खो; रह अकादमी सरकार में।।
२.४.२०२४
***
सॉनेट
पवन
झोंका बन पुलके झकझोर
अंतर्मन में उठा हिलोर
रवि-ऊषा बिन उज्जवल भोर
बन आलिंगन दे चितचोर
गाए मिलन-विरह के गीत
लूटे लुटा हमेशा प्रीत
हँसे हार ज्यों पाई जीत
तोड़-बनाए पल-पल रीत
कोई सकता कभी न रोक
कोई सके न किंचित टोक
होता विकल न करता शोक
पैना बहुत न लेकिन नोक
संगी भू नभ सलिल अगन
चिरजीवी हो पवन मगन
२-४-२०२२
•••
भजन
तुमखों सुमिरूँ चित्रगुप्त प्रभु, भव सागर सें पार करो।
डगमग डगमग नैया डोले, झटपट आ उद्धार करो।।
*
तुमईं बिरंचि सृष्टि रच दी, हरि हो खें पालन करते हो।
हर हो हर को चरन सरन दे, सबकी झोली भरते हो।।
ध्यान धरम कछू आउत नइयां, तुमई हमाओ ध्यान धरो।
तुमखों सुमिरूँ चित्रगुप्त प्रभु, भव सागर सें पार करो।।
*
जैंसी करनी तैंसी भरनी, न्याओ तुमाओ है सच्चो।
कैसें महिमा जानौं तुमरी, ज्ञान हमाओ है कच्चो।।
मैया नंदिनी-इरावती सें, बिनती सिर पर हाथ धरो।
तुमखों सुमिरूँ चित्रगुप्त प्रभु, भव सागर सें पार करो।।
*
सादर मैया किरपा करके, मोरी मत निरमल कर दें।
काम क्रोध मद मोह लोभ हर, भगति भाव जी भर, भर दें।
कान खैंच लो भले पर पिता, बाँहों में भर प्यार करो।
तुमखों सुमिरूँ चित्रगुप्त प्रभु, भव सागर सें पार करो।।
२-४-२०२१
***
कार्यशाला : कुण्डलिया
जाने कितनी हो रही अपने मन में हूक।
क्यों होती ही जारही अजब चूक पर चूक। - रामदेव लाल 'विभोर'
अजब चूक पर चूक, विधाता की क्या मर्जी?
फाड़ रहा है वस्त्र, भूलकर सिलना दर्जी
हठधर्मी या जिद्द, पड़ेगी मँहगी कितनी?
ले जाएगी जान, न जाने जानें कितनी - संजीव
चिंतन
दुर्गा पूजा
*
एक प्रश्न
बचपन में सुना था ईश्वर दीनबंधु है, माँ पतित पावनी हैं।
आजकल मंदिरों के राजप्रासादों की तरह वैभवशाली बनाने और सोने से मढ़ देने की होड़ है।
माँ दुर्गा को स्वर्ण समाधि देने का समाचार विचलित कर गया।
इतिहास साक्षी है देवस्थान अपनी अकूत संपत्ति के कारण ही लूट को शिकार हुए।
मंदिरों की जमीन-जायदाद पुजारियों ने ही खुर्द-बुर्द कर दी।
सनातन धर्म कंकर कंकर में शंकर देखता है।
वैष्णो देवी, विंध्यवासिनी, कामाख्या देवी अादि प्राचीन मंदिरों में पिंड या पिंडियाँ ही विराजमान हैं।
परम शक्ति अमूर्त ऊर्जा है किसी प्रसूतिका गृह में उसका जन्म नहीं होता, किसी श्मशान घाट में उसका दाह भी नहीं किया जा सकता।
थर्मोडायनामिक्स के अनुसार इनर्जी कैन नीदर बी क्रिएटेड नॉर बी डिस्ट्रायड, कैन ओनली बी ट्रांसफार्म्ड।
अर्थात ऊर्जा का निर्माण या विनाश नहीं केवल रूपांतरण संभव है।
ईश्वर तो परम ऊर्जा है, उसकी जयंती मनाएँ तो पुण्यतिथि भी मनानी होगी।
निराकार के साकार रूप की कल्पना अबोध बालकों को अनुभूति कराने हेतु उचित है किंतु मात्र वहीं तक सीमित रह जाना कितना उचित है?
माँ के करोड़ों बच्चे महामीरी में रोजगार गँवा चुके हैं, अर्थ व्यवस्था के असंतुलन से उत्पादन का संकट है, सरकारें जनता से सहायता हेतु अपीलें कर रही हैं और उन्हें चुननेवाली जनता का अरबों-खरबों रुपया प्रदर्शन के नाम पर स्वाहा किया जा रहा है।
एक समय प्रधान मंत्री को अनुरोध पर सोमवार अपराह्न भोजन छोड़कर जनता जनार्दन ने सहयोग किया था। आज अनावश्यक साज-सज्जा छोड़ने के लिए भी तैयार न होना कितना उचित है?
क्या सादगीपूर्ण सात्विक पूजन कर अपार राशि से असंख्य वंचितों को सहारा दिया जाना बेहतर न होगा?
संतानों का घर-गृहस्थी नष्ट होते देखकर माँ स्वर्णमंडित होकर प्रसन्न होंगी या रुष्ट?
दुर्गा सप्तशती में महामारी को भी भगवती कहा गया है। रक्तबीज की तरह कोरोना भी अपने अंश से ही बढ़ता है। रक्तबीज तभी मारा जा सका जब रक्त बिंदु का संपर्क समाप्त हो गया। रक्त बिंदु और भूमि (सतह) के बीच सोशल कॉन्टैक्ट तोड़ा था मैया ने। आज बेटों की बारी है। कोरोना वायरस और हवा, मानवांग या स्थान के बीच सोशल कॉन्टैक्ट तोड़कर कोरोना को मार दें। यह न कर कोरोना के प्रसार में सहायक जन देशद्रोही ही नहीं मानव द्रोही भी हैं। उनके साथ कानून वही करे जो माँ ने शुंभ-निशुंभ के साथ किया। कोरोना को मानव बम बनाने की सोच को जड़-मूल से ही मिटाना होगा।
२-४-२०२०
*
जप ले मम हनुमान: गौतम बुद्ध नगर निवासी हनुमद्भक्त रीता सिवानी द्वारा रचित ४० भक्ति प्रधान दोहों का नित्य पाठ करने योग्य संग्रह। आरंभ में शुभ कामना ९ दोहों के रूप में
जय गणेश विघ्नेश्वर, ऋद्धि-सिद्धि के नाथ।
कर्मदेव श्री चित्रगुप्त, रखिए सिर पर हाथ।।
सिया राम सह पवनसुत, वंदन कर स्वीकार।
करें कृपा संजीव हो, मम मन तव आगार।।
रीता मन-घट भर प्रभु, कृपा सलिल से नित्य।
विधि-हरि-हर हर विधि करें, हम पर कृपा अनित्य।।
प्रिय रीता दोहा रचे, प्रभु का कर गुणगान।
पवन-अंजनी सुत सहित, करें अभय मतिमान।।
सरस-सहज दोहे सभी, भक्ति-भाव भरपूर।
पढ़-सुन हर दिन गाइए, प्रभु हों सदय जरूर।।
हनुमतवत नि:स्वार्थ हों, काम करें निष्काम।
टेरें जब 'आ राम' हम, बैठें मन आ राम।।
प्रभु रीता-मनकामना, करिए पूर्ण तुरंत।
कीर्ति आपकी व्यापती, पल-पल दिशा-दिगंत।।
सफल साधना कर रहे, मन्वन्तर तक नाम।
तुहिना सम जीवन जिएँ, निर्मल अरु अभिराम।।
शब्द-शब्द 'जय हनु' कहे, दोहा-दोहा राम।
सीता सी लय साथ हो, जय प्रभु पूरनकाम।।
***
रीता उवाच:
निश्छल मन से जो जपे, जय जय जय हनुमान।
कृपा करें उन पर सदा, हनुमत कृपानिधान।।
लंकापति का तोड़कर, लंका में अभिमान।
सीता माता का पता, ले आए हनुमान।।
तोड़े रावण-भीम से, बलियों के अभिमान।
हनुमत जैसा कौन है, इस जग में बलवान।।
ग्यारहवें अवतार हैं, शंकर के हनुमान।
मद में रावण कह गया, उनको कपि नादान।।
कहे सुने हनुमत-कथा, मम से- जो इंसान।
उस पर करते हैं कृपा, जग के कृपानिधान।।
***
मुक्तक
*
सिर्फ पानी नहीं आँसू, हर्ष भी हैं दर्द भी।
बहाती नारी न केवल, हैं बनाते मर्द भी।।
गर प्रवाहित हों नहीं तो हृदय ही फट जाएगा-
हों गुलाबी-लाल तो होते कभी ये जर्द भी।।
***
मुक्तिका
*
अभावों का सूर्य, मौसम लापता बरसात का।
प्रभातों पर लगा पहरा अंधकारी रात का।।
वास्तव में श्री लिए जो वे न रह पाए सुबोध
समय जाने कब कहेगा दर्द इस संत्रास का।।
जिक्र नोटा का हुआ तो नोटवाले डर गए
संकुचित मजबूत सीने विषय है परिहास का।।
लोकतंत्री निजामत का राजसी देखो मिजाज
हार से डर कर बदलता हाय डेरा खास का।।
सांत्वना है 'सलिल' इतनी लोग सच सुन सनझते
मुखौटा हर एक नेता है चुनावी मास का।।
२-४-२०१९
***
दोहा लेखन विधान
१. दोहा द्विपदिक छंद है। दोहा में दो पंक्तियाँ (पद) होती हैं। हर पद में दो चरण होते हैं।
२. दोहा मुक्तक छंद है। कथ्य (जो बात कहना चाहें वह) एक दोहे में पूर्ण हो जाना चाहिए।
३. विषम (पहला, तीसरा) चरण में १३-१३ तथा सम (दूसरा, चौथा) चरण में ११-११ मात्राएँ होती हैं।
४. तेरह मात्रिक पहले तथा तीसरे चरण के आरंभ में एक शब्द में जगण (लघु गुरु लघु) वर्जित होता है।
६. सम चरणों के अंत में गुरु लघु मात्राएँ आवश्यक हैं।
५. विषम चरणों की ग्यारहवीं मात्रा लघु हो तो लय भंग होने की संभावना कम (समाप्त नहीं) हो जाती है।
८. हिंदी दोहाकार हिंदी व्याकरण नियमों का पालन करें। दोहा में वर्णिक छंद की तरह लघु को गुरु या गुरु को लघु पढ़ने की छूट नहीं होती।
७. हिंदी में खाय, मुस्काय, आत, भात, आब, जाब, डारि, मुस्कानि, हओ, भओ जैसे देशज शब्द-रूपों का उपयोग न करें। बोलियों में दोहा रचना करते समय उस बोली का शुद्ध रूप व्यवहार में लाएँ।
९. श्रेष्ठ दोहे में लाक्षणिकता, संक्षिप्तता, मार्मिकता (मर्मबेधकता), आलंकारिकता, स्पष्टता, पूर्णता तथा सरसता होना चाहिए।
१०. दोहे में संयोजक शब्दों और, तथा, एवं आदि का प्रयोग यथा संभव न करें। औ' वर्जित 'अरु' स्वीकार्य। 'न' सही, 'ना' गलत। 'इक' गलत।
११. दोहे में कोई भी शब्द अनावश्यक न हो। शब्द-चयन ऐसा हो जिसके निकालने या बदलने पर दोहा अधूरा सा लगे।
१३. दोहा में विराम चिन्हों का प्रयोग यथास्थान अवश्य करें।
१२. दोहे में कारक (ने, को, से, के लिए, का, के, की, में, पर आदि) का प्रयोग कम से कम हो।
१४. दोहा सम तुकान्ती छंद है। सम चरण के अंत में समान तुक आवश्यक है।
२. कम समय में बोले जानेवाले वर्ण या अक्षर की एक तथा अधिक समय में बोले जानेवाले वर्ण या अक्षर की दो मात्राएँ गिनी जाती हैंं।
१५. दोहा में लय का महत्वपूर्ण स्थान है। लय के बिना दोहा नहीं कहा जा सकता।
*
मात्रा गणना नियम
१. किसी ध्वनि-खंड को बोलने में लगनेवाले समय के आधार पर मात्रा गिनी जाती है।
४. शेष वर्णों की दो-दो मात्रा गिनें। जैसे- आम = २१ = ३, काकी = २२ = ४, फूले २२ = ४, कैकेई = २२२ = ६, कोकिला २१२ = ५, और २१ = ३आदि।
३. अ, इ, उ, ऋ तथा इन मात्राओं से युक्त वर्ण की एक मात्रा गिनें। उदाहरण- अब = ११ = २, इस = ११ = २, उधर = १११ = ३, ऋषि = ११= २, उऋण १११ = ३ आदि।
५. शब्द के आरंभ में आधा या संयुक्त अक्षर हो तो उसका कोई प्रभाव नहीं होगा। जैसे गृह = ११ = २, प्रिया = १२ =३ आदि।
६. शब्द के मध्य में आधा अक्षर हो तो उसे पहले के अक्षर के साथ गिनें। जैसे- क्षमा १+२, वक्ष २+१, विप्र २+१, उक्त २+१, प्रयुक्त = १२१ = ४ आदि।
७. रेफ को आधे अक्षर की तरह गिनें। बर्रैया २+२+२आदि।
९. अपवाद स्वरूप कुछ शब्दों के मध्य में आनेवाला आधा अक्षर बादवाले अक्षर के साथ गिना जाता है। जैसे- कन्हैया = क+न्है+या = १२२ = ५आदि।
१०. अनुस्वर (आधे म या आधे न के उच्चारण वाले शब्द) के पहले लघु वर्ण हो तो गुरु हो जाता है, पहले गुरु होता तो कोई अंतर नहीं होता। यथा- अंश = अन्श = अं+श = २१ = ३. कुंभ = कुम्भ = २१ = ३, झंडा = झन्डा = झण्डा = २२ = ४आदि।
११. अनुनासिक (चंद्र बिंदी) से मात्रा में कोई अंतर नहीं होता। धँस = ११ = २आदि। हँस = ११ =२, हंस = २१ = ३ आदि।
मात्रा गणना करते समय शब्द का उच्चारण करने से लघु-गुरु निर्धारण में सुविधा होती है। इस सारस्वत अनुष्ठान में आपका स्वागत है। कोई शंका होने पर संपर्क करें।
विमर्श,
'कत्अ'
*
'कत्अ' उर्दू काव्य का एक हिस्सा है। 'कत्अ' का शब्दकोशीय अर्थ 'टुकड़ा या भूखंड' है। 'उर्दू नज़्म की एक किस्म जिसमें गज़ल की तरह काफ़िए की पाबन्दी होती है और जिसमें कोई एक बात कही जाती है'१ कत्अ है। 'कत्अ' को सामान्यत: 'कता' कह या लिख लिया जाता है।
'प्राय: गज़लों में २-३ या इससे अधिक अशार ऐसे होते थे जो भाव की दृष्टि से एक सुगठित इकाई होते थे, इन्हीं को (गजल का) कता कहते थे।'... 'अब गजल से स्वतंत्र रूप से भी कते कहे जाते हैं। आजकल के कते चार मिसरों के होते हैं (वैसे यह अनिवार्य नहीं है) जिसमें दूसरे और चौथे मिसरे हमकाफिया - हमरदीफ़ होते हैं।२
'कत्अ' के अर्थ 'काटा हुआ' है। यह रूप की दृष्टि से गजल और कसीदे से मिलता-जुलता है। यह गजल या कसीदे से काटा हुआ प्रतीत होता है। इसमें काफिये (तुक) का क्रम वही होता है जो गजल का होता है। कम से कम दो शे'र होते हैं, ज्यादा पर कोइ प्रतिबन्ध नहीं है। इसमें प्रत्येक शे'र का दूसरा मिस्रा हम काफिया (समान तुक) होता है। विषय की दृष्टि से सभी शे'रों का एक दूसरे से संबंध होना जरूरी होता है। इसमें हर प्रकार के विषय प्रस्तुत किये जा सकते हैं।३
ग़ालिब की मशहूर गजल 'दिले नादां तुझे हुआ क्या है' के निम्न चार शे'र 'कता' का उदाहरण है-
जबकि तुम बिन नहीं कोई मौजूद
फिर ये हंगामा ऐ खुदा क्या है।
ये परि चेहरा लोग कैसे हैं
गम्ज़-ओ-इश्व-ओ-अदा क्या है।
शिकने-जुल्फ़े-अंबरी क्यों है
निग्हे-चश्मे-सुरमा सा क्या है।
सब्ज़-ओ-गुल कहाँ से आये है
अब्र क्या चीज़ है, हवा क्या है।
फैज़ का एक कता देखें-
हम खस्तातनों से मुहत्सिबो, क्या माल-मनाल की पूछते हो।
इक उम्र में जो कुछ भर पाया, सब सामने लाये देते हैं
दमन में है मुश्ते-खाके-जिगर, सागर एन है कहने-हसरते-मै
लो हमने दामन झाड़ दिया, लो जाम उलटाए देते हैं
यह बिलकुल स्पष्ट है कि कता और मुक्तक समानार्थी नहीं हैं।
***
सन्दर्भ- १. उर्दू हिंदी शब्दकोष, सं. मु. मुस्तफा खां 'मद्दाह', पृष्ठ ९५, २. उर्दू कविता और छन्दशास्त्र, नरेश नदीम पृष्ठ १६, ३.उर्दू काव्य शास्त्र में काव्य का स्वरुप, डॉ. रामदास 'नादार', पृष्ठ ८५-८६, ४.
***
मुक्तिका
*
कद छोटा परछाईं बड़ी है.
कैसी मुश्किल आई घड़ी है.
*
चोर कर रहे पहरेदारी
सच में सच रुसवाई बड़ी है..
*
बैठी कोष सम्हाले साली
खाली हाथों माई खड़ी है..
*
खुद पर खर्च रहे हैं लाखों
भिक्षुक हेतु न पाई पड़ी है..
*
'सलिल' सांस-सरहद पर चुप्पी
मौत शीश पर आई-अड़ी है..
२-४-२०१७
***
हाइकु के रंग भोजपुरी के संग '
*
आपन त्रुटि
दोसरा माथे मढ़
जीव ना छूटी..
*
बिना बात के
माथा गरमाइल
केतना फीका?.
*
फनफनात
मेहरारू, मरद
हिनहिनात..
*
बांझो स्त्री के
दिल में ममता के
अमृत-धार..
*
धूप-छाँव बा
नजर के असर
छाँव-धूप बा..
*
तन एहर
प्यार-तकरार में
मन ओहर..
*
झूठ न होला
कवनो अनुभव
बोल अबोला..
*
सबुर दाढे
मेवा फरेला पर
कउनो हद?.
*
घर फूँक के
तमाशा देखल
समझदार?.
२-४-२०१०

***




सोमवार, 1 अप्रैल 2024

अप्रैल १, सोरठा, यमक, श्लेष, भुजंगप्रयात, रामकिंकर, मुक्तिका, महाभुजंगप्रयात सवैया, गीत

सलिल सृजन १ अप्रैल
*
स्मरण युगतुलसी
युगतुलसी को नमन करो तो राम नमन हो जाता है।
युगतुलसी का भजन करो तो राम भजन हो जाता है।।
शिव जी भजते सदा राम को, राम भजें शिवशंकर को।
सत्-शिव-सुंदर राह चलो तो प्रभु-दर्शन हो जाता है।।
धनुष-बाण या चक्र सुदर्शन प्रभु को दोनों ही सोहें।
सरयू जी का जमुना जी से जन्म-जन्म का नाता है।।
हरि अनंत हरि कथा अनंता आदि-अंत है कहीं नहीं।
हनुमत पूजो, उर बैठे रघुवर पूजन हो जाता है।।
१.४.२०२४ 
•••
अप्रैल कब? क्या??
०१. मूर्ख (एप्रिल फूल) दिवस 

०२. १७८३ अमेरिकी लेखक वाशिंगटन इरविंग (निधन १८५९) जन्म न्यूयॉर्क, १७९२ पहली अमरीकी टकसाल फिलाडेल्फिया, १८६३ वर्जीनिया ब्रेड दंगा, १८०५ परी कथा लेखक हंस क्रिश्चियन एंडरसन (निधन १८७५) का जन्म ओडेंस डेनमार्क, १८४० एमिल ज़ोला फ्रांसीसी लेखिका (निधन १९०२), १९८२ फाकलैंड द्वीप युद्ध अर्जेन्टीना-इंग्लैंड आरंभ

०३. १९४४ अफ्रीकी अमरीकियों को मताधिकार टेक्सास, १९४८ साम्यवाद को रोकने व यूरोपीय देशों की अर्थ व्यवस्था सुधारने हेतु मार्शल योजना अमरीकी राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमैन द्वारा हस्ताक्षरित, १९९५ न्यायाधीश सैंड्रा डे ओ'कॉनर अमरीकी सुप्रीम कोर्ट की प्रथम अध्यक्ष      

०४. १८०२ अमेरिकी समाज सुधारक डोरोथिया डिक्स (निधन १८८७) जन्म हैम्पडेन, मेन, १८८७ अमेरिका में पहली महिला मेयर सुज़ाना एम. साल्टर अरगोनिया, कंसास, १९४९ उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (नाटो गठित), १९६८ डॉ. मार्टिन लूथर किंग (१९६४ नोबल पुरस्कार) मेम्फिस, टेनेसी में हत्या, 

०६. १४८३ पुनर्जागरण कलाकार राफेल (निधन १५२०) का जन्म उरबिनो इटली, १८९६ वर्ष बाद पहला ओलंपिक एथेंस ग्रीस, १९१७ अमेरिका  प्रथम विश्व युद्ध में शामिल, १९९४ रवांडा नरसंहार हुतु- तुत्सी जनजातीय संघर्ष आरंभ ५ लाख मारे, २० लाख देश छोड़ भागे  

०७. १७१२ काले गुलाम विद्रोह न्यूयार्क 

०८. ५६३ ई.पू. बुद्ध (निधन ४८३ ई.पू.) जयंती, १९१३ अमेरिका १७ वाँ संविधान संशोधन अमरीकी सेनेटरों राज्य विधान सभाओं के स्थान पर का चुनाव जनता द्वारा, 

०९. १८६५ अमरीकी गृह युद्ध समाप्त ५ लाख से अधिक मौतें  जनरल रॉबर्ट ई. ली ने एपोमैटॉक्स कोर्ट हाउस के गांव में विल्मर मैकलीन के घर में जनरल यूलिसिस एस. ग्रांट के सामने आत्मसमर्पण किया, १८६६ राष्ट्रपति एंड्रयू जॉनसन के वीटो के बावजूद नागरिक अधिकार विधेयक कांग्रेस द्वारा पारित श्वेतों को अमेरिकी नागरिकता के अधिकार, १८९८ अफ्रीकी अमेरिकी अभिनेता-गायक पॉल रॉबसन (निधन १९७६) जन्म प्रिंसटन न्यू जर्सी 

१०. १८४७ प्रकाशक जोसेफ पुलिट्ज़र जन्म १९४२ (निधन १९११) बुडापेस्ट हंगरी, द्वितीय विश्व युद्ध प्रशांत क्षेत्र बाटन डेथ मार्च ७६ हजार युद्धबंदी बेटन-कैबानाटुआन ६० किलोमीटर  ६ दिन बिना भोजन-पानी ५००० मरे, १९४५ नाजी एकाग्रता शिविर बुचेनवाल्ड अमरीकी सैनिक मुक्त। १९९८ उत्तरी आयरलैंड हिंसा निषेध समझौता 

११. १९६८ अमरीका नागरिक अधिकार अधिनियम राष्ट्रपति लिंडन बी. जानसन द्वारा हस्ताक्षरित, १९७० अपोलो १३ प्रक्षेपित केपकेनेडी, 

१२. १८६१ अमरीकी गृह युद्ध आरंभ, १९४५  अमरीकी राष्ट्रपति फ्रेंकलीन डी. रुजवेल्ट मृत्यु वॉर्म स्प्रिंग जॉर्जिया, १९६१ यूरी गगरीन प्रथम अंतरिक्ष यात्री वोस्टोक १ यान 

१३. १७४३ अमरीकी राष्ट्रपति थॉमस जेफर्सन जन्म (निधन ४.७.१८२६) अल्बर्टमारले वर्जीनिया, 

१४.  १८२८ अमेरिकन डिक्शनरी ऑफ द इंग्लिश लैंग्वेज  प्रकाशित, १८६५ अमरीकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन की हत्या 

१५.  १८१७ प्रथम बधिर विद्यालय हार्डफोर्ड कनेक्टिकट थॉमस एच. गैलॉडेट और लॉरेंट क्लर्क द्वारा, १९१२ टाईटेनिक जलयान डूबा न्यूफाउंडलैंड 

१६.१८६२ कोलंबिया दासता समाप्त, १८६७ अमरीकी विमानक विलबर राइट जन्म (निधन मई १९१२, टाइफाइड) इंडियाना, १८८९ हास्य अभिनेता चार्ली चैपलिन जन्म लंदन (निधन १९७७), 

17 अप्रैल, 1961 - क्यूबा के प्रधान मंत्री फिदेल कास्त्रो को उखाड़ फेंकने का अमेरिका समर्थित प्रयास विनाशकारी रूप से विफल रहा, जिसे बे ऑफ पिग्स असफलता के रूप में जाना जाता है। लगभग 1,400 कास्त्रो-विरोधी निर्वासितों ने पिग्स की खाड़ी के साथ द्वीप के दक्षिणी तट पर आक्रमण किया, लेकिन 20,000 क्यूबाई सैनिकों ने उन पर कब्ज़ा कर लिया और उन्हें जेल में डाल दिया गया। अमेरिका द्वारा प्रशिक्षित और निर्देशित, निर्वासितों को अमेरिकी सैन्य विमानों से समर्थन और द्वीप पर कास्त्रो विरोधी विद्रोहियों से मदद की उम्मीद थी। इसके बजाय, दुर्घटनाओं की एक श्रृंखला के कारण, उन्होंने बिना किसी सहारे के अपना बचाव किया। असफल आक्रमण ने क्यूबा के राजनीतिक सहयोगी, सोवियत रूस और राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी के नवोदित प्रशासन के बीच शीत युद्ध के तनाव को बढ़ा दिया। अगले वर्ष, रूसियों ने खुलेआम क्यूबा में परमाणु मिसाइलें स्थापित कीं, जिसके परिणामस्वरूप क्यूबा मिसाइल संकट पैदा हुआ।

17 अप्रैल, 1989 - लगभग एक दशक के संघर्ष के बाद पोलिश श्रमिक संघ सॉलिडेरिटी को कानूनी दर्जा दिया गया, जिससे पोलिश कम्युनिस्ट पार्टी के पतन का मार्ग प्रशस्त हुआ। इसके बाद हुए चुनावों में, सॉलिडैरिटी उम्मीदवारों ने 100 संसदीय सीटों में से 99 सीटें जीतीं और अंततः लेक वालेसा के नेतृत्व वाली सॉलिडेरिटी सरकार को स्वीकार करने के लिए मजबूर होना पड़ा।

जन्मदिन - अमेरिकी फाइनेंसर जॉन पियरपोंट (जेपी) मॉर्गन (1837-1913) का जन्म हार्टफोर्ड, कनेक्टिकट में हुआ था। उन्होंने असाधारण प्रबंधन कौशल का प्रदर्शन किया, कई असफल कंपनियों को पुनर्गठित और समेकित करके उन्हें लाभदायक बनाया। उनकी व्यापक रुचियों में बैंकिंग, इस्पात, रेलमार्ग और कला संग्रह शामिल थे। 1895 में, उन्होंने खजाने को फिर से भरने के लिए साथी फाइनेंसरों के बीच एक निजी बांड बिक्री करके असफल अमेरिकी खजाने की सहायता की।

18 अप्रैल, 1775 - पॉल रेवरे और विलियम डावेस की आधी रात की सवारी तब हुई जब दो व्यक्ति लेक्सिंगटन और कॉनकॉर्ड में देशभक्तों को ब्रिटिशों के बारे में चेतावनी देने के लिए रात 10 बजे के आसपास बोस्टन से बाहर निकले।

18 अप्रैल, 1906 - सैन फ्रांसिस्को में सुबह 5:13 बजे भूकंप आया, जिसके बाद लकड़ी के पलटे हुए स्टोव और टूटे हुए गैस पाइपों से भीषण आग लग गई। आग तीन दिनों तक बेकाबू रही, जिसके परिणामस्वरूप 10,000 एकड़ से अधिक संपत्ति नष्ट हो गई और 4,000 लोगों की जान चली गई।

18 अप्रैल, 1942 - द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान मुख्य भूमि जापान पर पहला हवाई हमला तब हुआ जब जनरल जेम्स डूलिटल ने वाहक हॉर्नेट से टोक्यो और तीन अन्य शहरों पर बमबारी करने के लिए बी -25 बमवर्षकों के एक स्क्वाड्रन का नेतृत्व किया। क्षति न्यूनतम थी, लेकिन वर्षों की अनियंत्रित जापानी सैन्य प्रगति के बाद छापे ने मित्र देशों का मनोबल बढ़ा दिया।

18 अप्रैल, 1982 - इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय ने 1867 के ब्रिटिश उत्तरी अमेरिका अधिनियम की जगह कनाडा संविधान अधिनियम 1982 पर हस्ताक्षर किए, जिससे कनाडा को मौलिक कानूनों और नागरिक अधिकारों का एक नया सेट प्रदान किया गया।

जन्मदिन - अमेरिकी वकील क्लेरेंस डैरो (1857-1938) का जन्म किंसमैन, ओहियो में हुआ था। उन्होंने अलोकप्रिय मुद्दों का समर्थन किया और उन्हें स्कोप्स 'मंकी ट्रायल' के लिए जाना जाता है जिसमें उन्होंने एक शिक्षक का बचाव किया था जिसने विकासवाद का सिद्धांत पढ़ाया था।

19 अप्रैल, 1775 - मैसाचुसेट्स में भोर में, लगभग 70 सशस्त्र मिलिशिया ब्रिटिश अग्रिम गार्ड इकाई के साथ लेक्सिंगटन ग्रीन पर आमने-सामने खड़े थे। एक अव्यवस्थित 'दुनिया भर में सुनी गई गोली' ने अमेरिकी क्रांति की शुरुआत की । ब्रिटिश राइफल की गोलीबारी के बाद संगीनों से हमला किया गया, जिसमें आठ अमेरिकी मारे गए और दस घायल हो गए।

19 अप्रैल, 1943 - वारसॉ यहूदी बस्ती में यहूदियों ने नाजी एसएस सैनिकों के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह किया, जो उन्हें जबरन मौत के शिविरों में भेजने का प्रयास कर रहे थे।

19 अप्रैल, 1989 - प्यूर्टो रिको के पानी में तोप अभ्यास के दौरान यूएसएस आयोवा पर एक बंदूक बुर्ज में विस्फोट से सैंतालीस अमेरिकी नाविक मारे गए ।

19 अप्रैल, 1993 - वाको, टेक्सास में, शाखा डेविडियन धार्मिक पंथ का परिसर जलकर खाक हो गया, जिसमें 17 बच्चों सहित 82 लोग शामिल थे। 51 दिनों के गतिरोध के बाद संघीय एजेंटों द्वारा बख्तरबंद वाहनों के साथ परिसर में इमारतों पर हमला करने के बाद आग भड़क उठी।

19 अप्रैल, 1995 - सुबह 9:02 बजे, एक बड़े कार-बम विस्फोट ने ओक्लाहोमा सिटी में एक नौ मंजिला संघीय इमारत के पूरे हिस्से को नष्ट कर दिया, एक डे केयर सेंटर के अंदर 19 बच्चों सहित 168 लोगों की मौत हो गई। खाड़ी युद्ध के एक सम्मानित अनुभवी को बाद में हमले के लिए दोषी ठहराया गया था।

20 अप्रैल, 1914 - कोलोराडो के लुडलो में खनन कंपनी द्वारा भुगतान किए गए नेशनल गार्डमैन द्वारा खनिकों पर हमला किया गया। खनिक अपने यूनाइटेड माइन वर्कर्स यूनियन की मान्यता की मांग कर रहे थे। मशीन गन की आग से पांच पुरुषों और एक लड़के की मौत हो गई, जबकि खनिकों की टेंट कॉलोनी नष्ट हो जाने से 11 बच्चे और दो महिलाएं जलकर मर गईं।

20 अप्रैल, 1999 - अमेरिका के इतिहास में सबसे घातक स्कूल गोलीबारी लिटलटन, कोलोराडो में हुई, जब दोपहर के भोजन के समय बंदूकों और विस्फोटकों से लैस दो छात्रों ने कोलंबिन हाई स्कूल में धावा बोल दिया, फिर 12 सहपाठियों और एक शिक्षक की हत्या कर दी और हत्या से पहले 20 से अधिक अन्य लोगों को घायल कर दिया। खुद।

जन्मदिन - एडॉल्फ हिटलर (1889-1945) का जन्म ब्रौनौ एम इन, ऑस्ट्रिया में हुआ था। 1933 से 1945 तक नाजी जर्मनी के नेता के रूप में, उन्होंने यूरोप में विस्तार के लिए युद्ध छेड़ा, जिसमें सैन्य संघर्ष और नरसंहार के माध्यम से अनुमानित 50 मिलियन लोगों की मौत हुई, जिसमें नाजियों ने यूरोप की पूरी यहूदी आबादी को खत्म करने का प्रयास किया।

21 अप्रैल, 1836 - सैम ह्यूस्टन के नेतृत्व वाले टेक्सस और सांता अन्ना के नेतृत्व वाली मैक्सिकन सेना के बीच सैन जैसिंटो की लड़ाई वर्तमान ह्यूस्टन के पास हुई। टेक्सस ने निर्णायक रूप से मैक्सिकन सेनाओं को हराया जिससे स्वतंत्रता प्राप्त हुई।

21 अप्रैल, 1918 - प्रथम विश्व युद्ध के दौरान , सोम्मे की लड़ाई के दौरान रेड बैरन (मैनफ़्रेड वॉन रिचटोफ़ेन) की गोली मारकर हत्या कर दी गई। उन्हें लाल फोककर ट्राइप्लेन उड़ाकर दो साल से भी कम समय में 80 लोगों को मारने का श्रेय दिया गया। ब्रिटिश पायलटों ने उनका शव बरामद किया और उन्हें पूरे सैन्य सम्मान के साथ दफनाया।

22 अप्रैल, 1864 - कांग्रेस के एक अधिनियम द्वारा सभी नवनिर्मित अमेरिकी सिक्कों पर "इन गॉड वी ट्रस्ट" को शामिल किया गया।

22 अप्रैल, 1889 - ओक्लाहोमा भूमि पर भीड़ दोपहर में एक ही बंदूक की गोली के साथ शुरू हुई, जो हजारों बाशिंदों के उन्मादी हमले की शुरुआत का संकेत देती है। वे संघीय सरकार द्वारा उपलब्ध कराए गए लगभग दो मिलियन एकड़ के हिस्से पर दावा करना चाह रहे थे। भूमि मूल रूप से क्रीक और सेमिनोले भारतीय जनजातियों की थी।

जन्मदिन - व्लादिमीर लेनिन (1870-1924) का जन्म रूस के सिम्बीर्स्क में हुआ था। उन्होंने अक्टूबर 1917 की रूसी क्रांति का नेतृत्व किया जिसने ज़ार निकोलस को अपदस्थ कर दिया और एक कठोर कम्युनिस्ट शासन का मार्ग प्रशस्त किया। 1924 में उनकी मृत्यु के बाद, उनके शरीर को लेपित किया गया और मॉस्को के रेड स्क्वायर में प्रदर्शन के लिए रखा गया, जो एक तीर्थस्थल बन गया, जहां सोवियत संघ के वर्षों के दौरान लाखों लोग आते थे।

23 अप्रैल - नाज़ियों द्वारा मारे गए अनुमानित छह मिलियन यहूदियों की याद में इज़राइल के नेसेट द्वारा होलोकॉस्ट दिवस के रूप में स्थापित किया गया।

जन्मदिन - विलियम शेक्सपियर (1564-1616) का जन्म इंग्लैंड के स्ट्रैटफ़ोर्ड-ऑन-एवन में हुआ था। अंग्रेजी भाषा के सबसे प्रभावशाली लेखक के रूप में प्रसिद्ध, उन्होंने 36 नाटक और 154 सॉनेट बनाए, जिनमें रोमियो एंड जूलियट , हैमलेट और द मर्चेंट ऑफ वेनिस शामिल हैं।

जन्मदिन - 15वें अमेरिकी राष्ट्रपति जेम्स बुकानन (1791-1868) का जन्म कोव गैप, पेंसिल्वेनिया में हुआ था। वह 1857 से 1861 तक केवल एक कार्यकाल के लिए व्हाइट हाउस पर कब्जा करने वाले एकमात्र आजीवन कुंवारे थे

24 अप्रैल, 1800 - वाशिंगटन, डीसी में कांग्रेस लाइब्रेरी की स्थापना की गई, यह अमेरिका की सबसे पुरानी संघीय सांस्कृतिक संस्था और दुनिया की सबसे बड़ी लाइब्रेरी है। इसके संग्रह में 145 मिलियन वस्तुओं में 33 मिलियन से अधिक किताबें, 3 मिलियन रिकॉर्डिंग, 12.5 मिलियन तस्वीरें, 5.3 मिलियन मानचित्र, शीट संगीत के 6 मिलियन टुकड़े और 63 मिलियन पांडुलिपियां हैं। प्रत्येक दिन लगभग 10,000 नए आइटम जोड़े जाते हैं।

24 अप्रैल, 1915 - प्रथम विश्व युद्ध के दौरान एशिया माइनर में , कॉन्स्टेंटिनोपल से अर्मेनियाई नेताओं के निर्वासन और उसके बाद यंग तुर्कों द्वारा नरसंहार के साथ आधुनिक युग का पहला नरसंहार शुरू हुआ। मई में, सभी अर्मेनियाई लोगों का निर्वासन और तुर्कों द्वारा सामूहिक हत्या शुरू हुई, जिसके परिणामस्वरूप ओटोमन साम्राज्य और सभी ऐतिहासिक अर्मेनियाई मातृभूमि से अर्मेनियाई लोगों का पूर्ण सफाया हो गया। अनुमान है कि 800,000 से लेकर 2,000,000 से अधिक अर्मेनियाई लोगों की हत्या की गई।

25 अप्रैल, 1967 - कोलोराडो के गवर्नर जॉन लव द्वारा गर्भपात को वैध बनाने वाले पहले कानून पर हस्ताक्षर किए गए, जिसमें उन मामलों में गर्भपात की अनुमति दी गई, जिनमें तीन डॉक्टरों का एक पैनल सर्वसम्मति से सहमत था।

जन्मदिन - रेडियो आविष्कारक गुग्लिल्मो मार्कोनी (1874-1937) का जन्म इटली के बोलोग्ना में हुआ था। उन्होंने 1890 के दशक में वायरलेस टेलीग्राफी के उपयोग की शुरुआत की। 1921 तक, मार्कोनी का आविष्कार वायरलेस टेलीफोनी (वॉयस रेडियो) के रूप में विकसित हो गया था।

26 अप्रैल, 1937 - स्पेनिश गृहयुद्ध के दौरान, प्राचीन शहर ग्वेर्निका पर जर्मन युद्धक विमानों द्वारा हमला किया गया था। तीन घंटे की बमबारी में शहर को नष्ट करने के बाद, विमानों ने भाग रहे नागरिकों पर मशीनगन से गोलीबारी की।

26 अप्रैल, 1944 - सीआईओ यूनियन को मान्यता देने के राष्ट्रपति रूजवेल्ट के आदेश को मानने से इनकार करने के बाद संघीय सैनिकों ने मॉन्टगोमरी वार्ड के शिकागो कार्यालयों को जब्त कर लिया और इसके अध्यक्ष को हटा दिया। जब्ती तब समाप्त हुई जब यूनियनों ने कंपनी के श्रमिकों का प्रतिनिधित्व करने के लिए चुनाव जीता।

26 अप्रैल, 1986 - यूक्रेन में चेरनोबिल परमाणु ऊर्जा संयंत्र में, एक विस्फोट के कारण परमाणु ईंधन पिघल गया और वायुमंडल में एक रेडियोधर्मी बादल फैल गया, जिसने अंततः यूरोप के अधिकांश हिस्से को कवर कर लिया। संयंत्र के आसपास का 300 वर्ग मील का क्षेत्र खाली करा लिया गया। बताया गया कि इकतीस लोगों की मौत हो गई, जबकि विकिरण से कैंसर के एक हजार अतिरिक्त मामले सामने आने की आशंका थी। इसके बाद आगे विकिरण को फैलने से रोकने के लिए संयंत्र को एक ठोस कंक्रीट कब्र में बंद कर दिया गया।

26 अप्रैल, 1994 - दक्षिण अफ़्रीका के इतिहास में पहली बार बहुजातीय चुनाव हुए। लगभग 18 मिलियन अश्वेतों के मतदान के साथ, नेल्सन मंडेला राष्ट्रपति और एफडब्ल्यू डी क्लार्क उपाध्यक्ष चुने गए।

जन्मदिन - अमेरिकी कलाकार और प्रकृतिवादी जॉन जे. ऑडबोन (1785-1851) का जन्म हैती में हुआ था। उन्होंने उत्तरी अमेरिका के पक्षियों के सजीव चित्र बनाए।

जन्मदिन - लैंडस्केप वास्तुकार फ्रेडरिक लॉ ओल्मस्टेड (1822-1903) का जन्म हर्टफोर्स, कनेक्टिकट में हुआ था। उन्होंने अमेरिका के कुछ सबसे प्रसिद्ध पार्कों को डिजाइन करने में मदद की, जिनमें न्यूयॉर्क में सेंट्रल पार्क, बोस्टन में कनेक्टिंग पार्कों की एमराल्ड नेकलेस श्रृंखला और योसेमाइट नेशनल पार्क शामिल हैं।

जन्मदिन - नाजी रुडोल्फ हेस (1894-1987) का जन्म अलेक्जेंड्रिया, मिस्र में हुआ था। वह नाज़ी जर्मनी के डिप्टी फ्यूहरर और हिटलर के आंतरिक घेरे के सदस्य थे। 10 मई, 1941 को, उन्होंने एक आश्चर्यजनक एकल उड़ान भरी और ब्रिटिशों के साथ शांति वार्ता करने के इरादे से स्कॉटलैंड में पैराशूट से उतरे। हालाँकि, अंग्रेजों ने तुरंत उन्हें गिरफ्तार कर लिया और कुछ समय के लिए जेल में डाल दिया। युद्ध के बाद, उन्हें नूर्नबर्ग ले जाया गया और अन्य शीर्ष नाज़ियों के साथ उन पर मुकदमा चलाया गया। 1987 में कैद में उनकी मृत्यु हो गई, वह प्रमुख नूर्नबर्ग युद्ध अपराधियों में से अंतिम थे 

27 अप्रैल, 1865 - मिसिसिपी नदी पर, अमेरिकी इतिहास की सबसे भयानक स्टीमशिप दुर्घटना हुई, जब सुल्ताना में विस्फोट से लगभग 2,000 यात्रियों की मौत हो गई, जिनमें ज्यादातर यूनियन सैनिक थे जो युद्धबंदी थे और घर लौट रहे थे।

जन्मदिन - टेलीग्राफ के आविष्कारक सैमुअल एफबी मोर्स (1791-1872) का जन्म चार्ल्सटाउन, मैसाचुसेट्स में हुआ था। उन्होंने 1830 के दशक में एक विद्युत चुम्बकीय टेलीग्राफ का विचार विकसित किया और अपना पहला संदेश "भगवान ने क्या बनाया?" 1844 में वाशिंगटन, डीसी से बाल्टीमोर तक चलने वाली पहली टेलीग्राफ लाइन पर। मोर्स द्वारा कोई अन्य वित्तीय सहायता प्राप्त करने में विफल रहने के बाद पहली टेलीग्राफ लाइन के निर्माण को कांग्रेस ($30,000) द्वारा वित्त पोषित किया गया था। 1856 में वेस्टर्न यूनियन की स्थापना के बाद, अमेरिका में टेलीग्राफ लाइनें तेजी से एक तट से दूसरे तट तक फैल गईं।

जन्मदिन - गृहयुद्ध के जनरल और 18वें अमेरिकी राष्ट्रपति यूलिसिस एस. ग्रांट (1822-1885) का जन्म प्वाइंट प्लेजेंट, ओहियो में हुआ था। युद्ध के दौरान, उन्हें "बिना शर्त समर्पण" ग्रांट उपनाम मिला और उन्हें संघ सेनाओं की कमान सौंपी गई। उन्होंने घोटालों से ग्रस्त प्रशासन में 1869 से 1877 तक राष्ट्रपति के रूप में कार्य किया। इसके बाद उन्होंने अपने संस्मरण लिखना शुरू किया और इसके पूरा होने के कुछ ही दिनों बाद 1885 में उनकी मृत्यु हो गई।

28 अप्रैल, 1789 - ब्रिटिश जहाज बाउंटी पर फ्लेचर क्रिश्चियन ने कैप्टन विलियम ब्लाइग के खिलाफ विद्रोह का नेतृत्व किया, जिससे उन्हें और 18 वफादार चालक दल के सदस्यों को 23 फुट खुली नाव में भटकना पड़ा। एक छोटे से द्वीप पर उतरने से पहले ब्लीग 3,600 मील से अधिक की 47-दिवसीय यात्रा में जीवित बच गया। क्रिश्चियन ने बाउंटी को वापस ताहिती के लिए रवाना किया, अंततः पिटकेर्न द्वीप पर बस गए और जहाज को जला दिया।

28 अप्रैल, 1945 - इटली में तेईस साल का फासीवादी शासन अचानक समाप्त हो गया क्योंकि इतालवी पक्षपातियों ने पूर्व तानाशाह बेनिटो मुसोलिनी को गोली मार दी। फ़ासिस्ट पार्टी के अन्य नेता और मुसोलिनी के मित्र भी उसकी मालकिन क्लारा पेटाची के साथ मारे गए। फिर उनके शवों को उल्टा लटका दिया गया और मिलान में उपहास करने वाली भीड़ द्वारा उन पर पथराव किया गया।

जन्मदिन - 5वें अमेरिकी राष्ट्रपति जेम्स मोनरो (1758-1831) का जन्म वर्जीनिया के वेस्टमोरलैंड काउंटी में हुआ था। उन्होंने 1817 से 1825 तक दो कार्यकाल तक सेवा की और उन्हें मोनरो सिद्धांत के लिए जाना जाता है, जिसमें घोषणा की गई थी कि अमेरिका किसी भी यूरोपीय राष्ट्र को उत्तर या दक्षिण अमेरिका में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने या सशस्त्र बल का उपयोग करने की अनुमति नहीं देगा।

29 अप्रैल, 1992 - इस घोषणा के बाद लॉस एंजिल्स में दंगे भड़क उठे कि कैलिफोर्निया के सिमी वैली में एक जूरी, एक अफ्रीकी अमेरिकी व्यक्ति की वीडियोटेप में पिटाई के आरोपी चार लॉस एंजिल्स पुलिस अधिकारियों को दोषी ठहराने में विफल रही थी।

जन्मदिन - अमेरिकी प्रकाशक विलियम रैंडोल्फ हर्स्ट (1863-1951) का जन्म सैन फ्रांसिस्को में हुआ था। एक सोने की खदान करने वाले के बेटे, 1887 में असफल सैन फ्रांसिस्को एग्जामिनर का नियंत्रण लेने के लिए उसने हार्वर्ड छोड़ दिया, जिसे उसके पिता ने खरीदा था। उन्होंने एग्जामिनर को बचाया , फिर न्यूयॉर्क गए और जोसेफ पुलित्जर से प्रतिस्पर्धा करने के लिए न्यूयॉर्क मॉर्निंग जर्नल खरीदा। हर्स्ट की "पीली" पत्रकारिता की सनसनीखेज शैली ने अभूतपूर्व संख्या में समाचार पत्र बेचे और इसमें 1897-98 में क्यूबा के साथ युद्ध को बढ़ावा देना भी शामिल था। उन्होंने अन्य शहरों और पत्रिका प्रकाशन, पुस्तकों और फिल्मों में विस्तार किया। उन्होंने कांग्रेस में भी काम किया और लगभग न्यूयॉर्क शहर के मेयर बन गये।

जन्मदिन - जापान के सम्राट हिरोहितो (1901-1989) का जन्म टोक्यो में हुआ था। 1926 में, वह सम्राटों की लंबी कतार में 124वें बन गए और फिर युद्धकालीन जापान की अध्यक्षता की, जिसका नेतृत्व सैन्यवादी प्रधान मंत्री हिदेकी तोजो ने किया था। अमेरिका द्वारा दो परमाणु बम गिराए जाने के बाद, उन्होंने एक रेडियो संबोधन में अपने लोगों से लड़ाई बंद करने का आग्रह किया। युद्ध के बाद, वह जापान की नई संसदीय सरकार में प्रतीकात्मक राज्य प्रमुख बने रहे। 1946 में, उन्होंने अपनी दिव्यता को त्याग दिया और फिर समुद्री जीव विज्ञान में अपनी रुचि को आगे बढ़ाया, और इस विषय में एक मान्यता प्राप्त प्राधिकारी बन गए।

30 अप्रैल, 1789 - जॉर्ज वॉशिंगटन पहले अमेरिकी राष्ट्रपति बने, जब उन्हें न्यूयॉर्क शहर में वॉल और ब्रॉड स्ट्रीट के कोने पर स्थित फेडरल हॉल की बालकनी में पद की शपथ दिलाई गई।

30 अप्रैल, 1948 - फ़िलिस्तीनी यहूदियों ने ब्रिटिश शासन से अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की और इज़राइल के नए राज्य की स्थापना की। देश जल्द ही हज़ारों नाजी नरसंहार से बचे लोगों और एक मजबूत अमेरिकी सहयोगी के लिए एक गंतव्य बन गया।

30 अप्रैल, 1967 - अमेरिकी सेना में शामिल होने से इनकार करने के बाद बॉक्सर मुहम्मद अली से उनकी विश्व हैवीवेट बॉक्सिंग चैंपियनशिप छीन ली गई। उन्होंने धार्मिक छूट का दावा किया था.

छंद सोरठा
अलंकार यमक
*
आ समान जयघोष, आसमान तक गुँजाया
आस मान संतोष, आ समा न कह कराया
अलंकार श्लेष
सूरज-नेता रोज, ऊँचाई पा तपाते
झुलस रहे हैं लोग, कर पूजा सर झुकाते
१.४.२०१९
***
रसानंद दे छंद नर्मदा २३: ०२-०४-२०१६
दोहा, सोरठा, रोला, आल्हा, सार, ताटंक, रूपमाला (मदन), चौपाई, हरिगीतिका, उल्लाला,गीतिका,घनाक्षरी, बरवै, त्रिभंगी, सरसी, तथा छप्पय छंदों से साक्षात के पश्चात् अब मिलिए भुजंगप्रयात छन्द से.
चार यगण आवृत्ति ही है छंद भुजंगप्रयात
*
'चतुर्भिमकारे भुजंगप्रयाति' अर्थात भुजंगप्रयात छंद की हर पंक्ति यगण की चार आवृत्तियों से बनती है।
यमाता X ४ या ४ (लघु गुरु गुरु) अथवा निहारा निहारा निहारा निहारा के समभारीय पंक्तियों से भुजंगप्रयात छंद का पद बनता है।
मापनी- १२२ १२२ १२२ १२२
उदाहरण-
०१. कहूं किन्नरी किन्नरी लै बजावैं ।
सुरी आसुरी बाँसुरी गीत गावैं।।
कहूँ जक्षिनी पक्षिनी लै पढ़ावैं।
नगी कन्यका पन्नगी को नचावैं।।
०२. न आँसू, न आहें, न कोई गिला है।
वही जी रहा हूँ, मुझे जो मिला है।।
कुआँ खोद मैं रोज पानी निकालूँ
जला आग चूल्हे, दिला से उबालूँ ।।
मुक्तक -
०३. कहो आज काहे पुकारा मुझे है?
छिपी हो कहाँ, क्यों गुहारा मुझे है?
पड़ा था अकेला, सहारा दिया क्यों -
न बोला-बताया, निहारा मुझे है।
मुक्तिका-
०४. न छूटा तुम्हारा बहाना बनाना
न छूटा हमारा तुम्हें यूँ बुलाना
न भूली तुम्हारी निगाहें, न आहें
न भूला फसाना, न भूला तराना
नहीं रोक पाया, नहीं टोंक पाया
न भा ही सका हूँ, नहीं याद जाना
न देखो हमें तो न फेरो निगाहें
न आ ही सको तो नहीं याद आना
न 'संजीव' की हो, नहीं हो परायी
न वादा भुलाना, न वादा निभाना
महाभुजंगप्रयात सवैया- ८ यगण प्रति पंक्ति
०५. तुम्हें देखिबे की महाचाह बाढ़ी मिलापै विचारे सराहै स्मरै जू
रहे बैठि न्यारी घटा देखि कारी बिहारी बिहारी बिहारी ररै जू -भिखारीदास
०६. जपो राम-सीता, भजो श्याम-राधा, करो आरती भी, सुने भारती भी
रचो झूम दोहा, सवैया विमोहा, कहो कुंडली भी, सुने मंडली भी
न जोड़ो न तोड़ो, न मोड़ो न छोड़ो, न फाड़ो न फोड़ो, न मूँछें मरोड़ो
बना ना बहाना, रचा जो सुनाना, गले से लगाना, सगा भी बताना
वागाक्षरी सवैया- उक्त महाभुजङ्गप्रयात की हर पंक्ति में से अंत का एक गुरु कम कर,
०७. सदा सत्य बोलौ, हिये गाँठ खोलौ, यही मानवी गात को
करौ भक्ति साँची, महा प्रेमराची, बिसारो न त्रैलोक्य के तात को - भानु
०८. न आतंक जीते, न पाखण्ड जीते, जयी भारती माँ, हमेशा रहें
न रूठें न खीझें, न छोड़ें न भागें, कहानी सदा सत्य ही जो कहें
न भूलें-भुलायें, न भागें-भगायें, न लूटें-लुटायें, नदी सा बहें
न रोना न सोना, न जादू न टोना, न जोड़ा गँवायें,न त्यागा गहें
उर्दू रुक्न 'फ़ऊलुन' के चार बार दोहराव से भुजंगप्रयात छन्द बन सकता है यदि 'लुन' को 'लुं' की तरह प्रयोग किया जाए तथा 'ऊ' को दो लघु न किया जाए।
०९. शिकारी न जाने निशाना लगाना
न छोड़े मियाँ वो बहाने बनाना
कहे जो न थोड़ा, करे जो न थोड़ा
न कोई भरोसा, न कोई ठिकाना
१-४-२०१६
***
दो दोहे
बौरा-गौरा को नमन, करता बौरा आम.
खास बन सके, आम हर, हे हरि-उमा प्रणाम..
देख रहा चलभाष पर, कल की झलकी आज.
नन्हा पग सपने बड़े, कल हो इसका राज..
***
गीत
मीत  
*
मीत तुम्हारी राह हेरता...
*
सुधियों के उपवन में तुमने
वासंती शत सुमन खिलाये.
विकल अकेले प्राण देखकर-
भ्रमर बने तुम, गीत सुनाये.
चाह जगा कर आह हुए गुम
मूँदे नयन दरश करते हम-
आँख खुली तो तुम्हें न पाकर
मन बौराये, तन भरमाये..
मुखर रहूँ या मौन रहूँ पर
मन ही मन में तुम्हें टेरता.
मीत तुम्हारी राह हेरता...
*
मन्दिर मस्जिद गिरिजाघर में
तुम्हें खोजकर हार गया हूँ.
बाहर खोजा, भीतर पाया-
खुद को तुम पर वार गया हूँ..
नेह नर्मदा के निनाद सा
अनहद नाद सुनाते हो तुम-
ओ रस-रसिया!, ओ मन बसिया!
पार न पाकर पार गया हूँ.
ताना-बाना बुने बुने कबीरा
किन्तु न घिरता, नहीं घेरता.
मीत तुम्हारी राह हेरता...
१-४-२०१०
***

रविवार, 31 मार्च 2024

मार्च ३१, रामकिंकर, सॉनेट, भवानी, लघुकथा, बुंदेली, हास्य, सतचरणी दोहा, लघुकथा, नव गीत, अरिहंत,

सलिल सृजन ३१ मार्च
*
स्मरण राम किंकर
*
सहज-सरल जीवन जिया, रहे राम में लीन।
प्रभु गुण वर्णन मगन हो, स्व को करें विलीन।।
*
सात्विक वृत्ति सदा रही, आडंबर से मुक्त।
राम नाम महिमा अगम, सुगम भक्ति से युक्त।।
*
वाक् विमल नर्मदा सी, बहा भक्ति रस धार।
श्रोताओं को मुग्ध कर, व्यक्त किए उद्गार।।
*
धोती-कुर्ता धवल शुचि, शाल-अंगरखा धार।
खादी-रेशम-ऊन प्रिय, करें सरल व्यवहार।।
*
तुलसी माला हाथ में, जप अनवरत अखंड।
पाप-ताप के शाप पर, वाक्-प्रहार प्रचंड।।
*
शैली शुचि संवाद मय, प्रश्नोत्तरी मन पैठ।
शंकाओं का शमन नित, करें संतजन बैठ।।
*
राम कथा संवाद सुन, शिव से शिवा प्रसन्न।
मानस में हो कथा शुभ, रहें राम आसन्न।।
*
मोती मिले न सतह पर, पाने गहरे डूब।
मानस मानस में बसे, रसानन्द दे खूब॥
*
शब्द-विधान न आप तक, सीमित रहता आप।
एक-दूसरे से जुड़े, व्याख्या, सत में व्याप।।
*
सिया-राम सर्वत्र हैं, लीन उन्हीं में सृष्टि।
करे विवेचन राम मय, निरासक्त हो दृष्टि।।
*
सी सत ईश्वर जानिए, ता तप आगम युक्त।
रा रम आत्म मधुर मृदुल, म मंथन उन्मुक्त।।
*
स्मरण युग तुलसी
रामकिंकर चरण वंदन नित करो मन।
बनो किंकर राम किंकर के तरो तन।।

है न आत्मा राम जिसमें कौन ऐसा?
सभी में वह, मत किसी से करो अनबन।।

नहीं छोटे-बड़े सम हैं प्राण सबके।
राख मुट्ठी भर न हम भू भवन कंचन।।

मत अकड़, कर प्रार्थना, वंदना चुप रह।
सत्य-शिव-सुंदर चयन कर आत्म साधन।।

राम ही हैं कृष्ण, शिव भी, ब्रह्म भी हैं।
नर्मदा बन करें मंदाकिनी दर्शन।।
३१.३.२०२४
•••
सॉनेट
भवानी
भोर भई आईं किरनें
मूँद न नैना जाग उठो।
टेर चिरैया मौन भई
धो मुँह मैया रे सपरो।।
आ पटियाँ दूँ पार जरा
लो गुड़ रोटी भोग लगा
छाछ पिओ जीरा बघरा
गौ बछड़े को रोट खिला।।
झाँक चिरैया टेर रही
जा कुछ दाने तो बिखरा
दे हमको छैंया अपनी
मातु भवानी आ अँगना।।
माँ न बिसारो, हो बिटिया
वास करो मोरे मन मां।।
३१-३-२०२२
•••
सॉनेट
(लय सूत्र : जभभ गल)
जगा दिया तुमने झकझोर।
कहाँ चले सजना मुँह मोड़।
चुरा लिया चित ही चितचोर।।
फिरा रहे अँखियाँ दिल तोड़।।
सुनो हुआ मन भाव विभोर।
गले मिलो, कर दो मत छोड़।
छिपा रखी छवि श्याम अँजोर।।
नहीं किसी सँग है कुछ होड़।।
लुको-छिपो मत, छोड़ न डोर।
छलो नहीं, छलिया रणछोड़।
हरो सभी तम, दो कर भोर।।
सदा रहे तुमसे गठजोड़।।
रहें बसी मन साथ किशोर।
लली न भूल, न हीं मुँह मोड़।।
३१-३-२०२२
•••
बुंदेली हास्य रचना:
उल्लू उवाच
*
मुतके दिन मा जब दिखो, हमखों उल्लू एक.
हमने पूछी: "कित हते बिलमे? बोलो नेंक"
बा बोलो: "मुतके इते करते रैत पढ़ाई.
दो रोटी दे नई सके, बो सिच्छा मन भाई.
बिन्सें ज्यादा बड़े हैं उल्लू जो लें क्लास.
इनसें सोई ज्यादा बड़े, धरें परिच्छा खास.
इनसें बड़े निकालते पेपर करते लीक.
औरई बड़े खरीदते कैते धंधा ठीक.
करें परीच्छा कैंसिल बिन्सें बड़े तपाक.
टीवी पे इनसें बड़े, बैठ भौंकते आप.
बिन्सें बड़े करा रए लीक काण्ड की जाँच.
फिर से लेंगे परिच्छा, और बड़े रए बाँच
इतने उल्लुन बीच में अपनी का औकात?
एई काजे लुके रए, जान बचाखें भ्रात.
***
हास्य रचना
भोर भई शुभ, पड़ोसन हिला रही थी हाथ
देख मुदित मन हो गया, तना गर्व से माथ
तना गर्व से माथ, हिलाते हाथ रहे हम
घरवाली ने होली पर, था फोड़ दिया बम
निर्ममता से तोड़ दिल, बोल रही थी साँच
'तुम्हें नहीं वह हेरती, पोंछे खिड़की- काँच'
*
दोहा सलिला
(अभिनव प्रयोग - सतचरणी दोहा)
छाया की काया नहीं, पर माया बेजोड़
हटे शीश से तब लगे, पाने खातिर होड़
किसी के हाथ न आती
उजाला सखा सँगाती
तिमिर को धता बताती
*
गुझिया खा मीना कहें, मी ना कोई और
सीख यही इतिहास की, तन्नक करिए गौर
परीक्षार्थी हों गुरु जब
परीक्षाफल नकली तब
देखते भौंचक हो सब
*
करता शोक अशोक नित, तमचर है आलोक
लछमीपति दर दर फिरे, जनपथ पर है रोक
विपक्षी मुक्त देश हो
तर्क कुछ नहीं शेष हो
प्रैस चारण विशेष हो
*
रंग उड़ गया देखकर, बीबी का मुख लाल
रंग जम गया जब मिली, साली लिए गुलाल
रँगे सरहज मूँ कारा
भई बिनकी पौ बारा
कि बोलो सा रा रा रा
*
उषा दुपहरी साँझ सँग, सूरज करता डेट
थक वसुधा को सुमिरता, रजनी शैया लेट
कहो रवि फिर क्यों जलता? 
नमन क्यों सब जग करता?
न लिव इन वरता-तजता 
३१-३-२०२१
***
लघुकथा
सन्नाटा
*
घन् घन्, टन् टन्, ठक् ठक्, पों पों... सुबह से शाम तक आवाजें ही आवाजें।
चौराहे के केंद्र में खड़ी वह पूरी ताकत के साथ सीटी बजाती पर शोरगुल में सीटी की आवाज दबकर रह जाती।
बचपन से बाँसुरी की धुन उसे बहुत पसंद थी। श्रीकृष्ण जी के बाँसुरीवादन के प्रभाव के बारे में पढ़ा था। हरिप्रसाद चौरसिया जी का बाँसुरी वादन सुनती तो मन शांति अनुभव करता।
यातायात पुलिस में शहर के व्यस्ततम चौराहे पर घंटों रुकने-बढ़ने का संकेत देने से हुई थकान वह सहज ही सह लेती पर असहनीय हो जाता था सैंकड़ों वाहनों के रुकने-चलने, हॉर्न देने का शोर सहन कर पाना। बहुधा कानों में रुई लगा लेती पर वह भी बेमानी हो जाती।
अकस्मात कोरोना महामारी का प्रकोप हुआ। माननीय प्रधानमंत्री जी के चाहे अनुसार शहरवासी घरों में बंद हो गए। वह चौराहे के आसपास के इलाके में कानून-व्यवस्था का पालन करा रही है कि कोई अकारण बाहर न घूमे। अब तक शोर से परेशान उसे याद आ रहे हैं पिछले दिन और असहनीय प्रतीत हो रहा है सन्नाटा।
३१-३-२०२०
***
सामयिक रचना
भक्तों से सावधान
*
जो दुश्मन देश के, निश्चय ही हारेंगे
दिख रहे विरोधी जो वे भी ना मारेंगे
जो तटस्थ-गुरुजन हैं, वे ही तो तारेंगे
मुट्ठी में कब किसके, बँधता है आसमान
भक्तों से सावधान
*
देशभक्ति नारा है, आडंबर प्यारा है
सेना का शौर्य भी स्वार्थों पर वारा है
मनमानी व्याख्या कर सत्य को बुहारा है
जो सहमत केवल वे, हैं इनको मानदान
भक्तों से सावधान
*
अनुशासन तुम चाहो, ये पल-पल तोड़ेंगे
शासन की वल्गाएँ स्वार्थ हेतु मोड़ेंगे
गाली गुस्सा नफरत, हिंसा नहिं छोड़ेंगे
कंधे पर विक्रम के लदे लगें भासमान
भक्तों से सावधान
३१.३.२०१९
***
नव गीत 
*
अरिहंत
करते अंत
किसका?
अरि कौन?
अपना अहं?
संचय वृत्ति?
मोह-माया?
स्वार्थ?
इन्द्रियाँ?
जिन्होंने नहीं जीता
एक भी अरि,
वह कैसे अनुयायी हुआ
महावीर का?
सिर्फ इसलिए
कि उसने
जैन नामधारी
परिवार में जन्म लिया.
इन्द्रियों को
जीतकर भी,
अरिओं का
अंत करने के बाद भी
दूसरा नहीं हो सका जैन
क्योंकि उसके जनक
नहीं थे जैन.
कितना उचित
कौन करे परिभाषित?
३१-३-२०१८
***
समीक्षा
यह ‘काल है संक्रांति का’
- राजेंद्र वर्मा
गद्य-पद्य की विभिन्न विधाओं में निरंतर सृजनरत और हिंदी भाषा के व्याकरण तथा पिंगल के अधिकारी विद्वान आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ने खड़ी हिंदी के समांतर बुंदेली, ब्रज, भोजपुरी, अवधी, छत्तीसगढ़ी, मालवी, निमाड़ी, राजस्थानी, हरियाणवी, सिरायकी तथा अंग्रेजी में भी लेखन किया है। अपनी बुआश्री महीयसी महादेवी जी तथा माताजी कवयित्री शांति देवी को साहित्य व भाषा-प्रेम की प्रेरणा माननेवाले ‘सलिल’ जी आभासी दुनिया में भी वे अपनी सतत और गंभीर उपस्थिति से हिंदी के साहित्यिक पाठकों को लाभान्वित करते रहे हैं। गीत, नवगीत, ग़ज़ल और कविता के लेखन में छंद की प्रासंगिकता और उसके व्याकरण पर भी उन्होंने अपेक्षित प्रकाश डाला है। रस-छंद- अलंकारों पर उनका विशद ज्ञान लेखों के माध्यम से हिंदी संसार को लाभान्वित करता रहा है। वस्तु की दृष्टि से शायद ही कोई ऐसा विषय हो जो उनकी लेखनी से अछूता रहा हो- भले ही वह गीत हो, कविता हो अथवा लेख! नवीन विषयों पर पकड़ के साथ-साथ उनकी रचनाओं में विशद जीवनानुभव बोलता-बतियाता है और पाठकों-श्रोताओं में संजीवनी भरता है।
‘काल है संक्रांति का’ संजीव जी का नवीनतम गीत-संग्रह है जिसमें ६५ गीत-नवगीत हैं। जनवरी २०१४ से मार्च २०१६ के मध्य रचे गये ये गीत शिल्प और विषय, दोनों में बेजोड़ हैं। संग्रह में लोकगीत, सोहर, हरगीतिका, आल्हा, दोहा, दोहा-सोरठा मिश्रित, सार आदि नए-पुराने छंदों में सुगठित ये गीति-रचनाएँ कलात्मक अभिव्यक्ति में सामयिक विसंगतियों और विद्रूपताओं की ख़बर लेते हुए आम आदमी की पीड़ा और उसके संघर्ष-संकल्प को जगर-मगर करती चलती हैं। नवगीत की शक्ति को पहचानकर शिल्प और वास्तु में अधिकाधिक सामंजस्य बिठाकर यथार्थवादी भूमि पर रचनाकार ने आस-पास घटित हो रहे अघट को कभी सपाट, तो कभी प्रतीकों और मिथकों के माध्यम से उद्घाटित किया है। विसंगतियों के विश्लेषण और वर्णित समस्या का समाधान प्रस्तुत करते अधिकांश गीत टटकी भाव-भंगिमा दर्शाते हैं। बिम्ब-प्रतीक, भाषा और टेक्नीक के स्तरों पर नवता का संचार करते हैं। इनमें ऐंद्रिक भाव भी हैं, पर रचनाकार तटस्थ भाव से चराचर जगत को सत्यम्-शिवम्- सुन्दरम् के वैचारिक पुष्पों से सजाता है।
शीर्षक गीत, ‘काल है संक्रांति का’ में मानवीय मूल्यों और प्राची के परिवेश से च्युत हो रहे समाज को सही दिशा देने के उद्देश्य से नवगीतकार, सूरज के माध्यम से उद्बोधन देता है। यह सूरज आसमान में निकलने वाला सूरज ही नहीं, वह शिक्षा, साहित्य, विज्ञान आदि क्षेत्रों के पुरोधा भी हो सकते हैं जिन पर दिग्दर्शन का उत्तरदायित्व है—
काल है संक्रांति का / तुम मत थको सूरज!
दक्षिणायन की हवाएँ / कँपाती हैं हाड़
जड़ गँवा, जड़ युवा पीढ़ी / काटती है झाड़
प्रथा की चूनर न भाती / फेंकती है फाड़
स्वभाषा को भूल, इंग्लिश / से लड़ाती लाड़
टाल दो दिग्भ्रांति को / तुम मत रुको सूरज!
.......
प्राच्य पर पाश्चात्य का / अब चढ़ गया है रंग
कौन, किसको सम्हाले / पी रखी मद की भंग
शराफत को शरारत / नित कर रही है तंग
मनुज-करनी देखकर है / ख़ुद नियति भी दंग
तिमिर को लड़, जीतना / तुम मत चुको सूरज! (पृ.१६)
एक अन्य गीत, ‘संक्रांति काल है’ में रचनाकार व्यंग्य को हथियार बनाता है। सत्ता व्यवस्था में बैठे लोगों से अब किसी भले काम की आशा ही नहीं रही, अतः गीतकार वक्रोक्ति का सहारा लेता है-
प्रतिनिधि होकर जन से दूर / आँखे रहते भी हो सूर
संसद हो चौपालों पर / राजनीति तज दे तंदूर
अब भ्रान्ति टाल दो / जगो, उठो!
अथवा,
सूरज को ढाँके बादल / सीमा पर सैनिक घायल
नाग-साँप फिर साथ हुए / गुँजा रहे बंसी-मादल
झट छिपा माल दो / जगो, उठो!
गीतकार सत्ताधीशों की ही खबर नहीं लेता, वह हममें-आपमें बैठे चिन्तक-सर्जक पर भी व्यंग्य करता है; क्योंकि आज सत्ता और सर्जना में दुरभिसंधि की उपस्थिति किसी से छिपी नहीं हैं--
नवता भरकर गीतों में / जन-आक्रोश पलीतों में
हाथ सेंक ले कवि, तू भी / जी ले आज अतीतों में
मत खींच खाल दो / जगो, उठो! (पृ.२०)
शिक्षा जीवन की रीढ़ है। इसके बिना आदमी पंगु है, दुर्बल है और आसानी से ठगा जाता है। गीतकार ने सूरज (जो प्रकाश देने का कार्य करता है) को पढने का आह्वान किया है, क्योंकि जब तक ज्ञान का प्रकाश नहीं फैलता है, तब तक किसी भी प्रकार के विकास या उन्नयन की बात निरर्थक है। सन्देश रचने और अभिव्यक्त करने में रचनाकार का प्रयोग अद्भुत है—
सूरज बबुआ! / चल स्कूल।
धरती माँ की मीठी लोरी / सुनकर मस्ती ख़ूब करी।
बहिन उषा को गिरा दिया / तो पिता गगन से डाँट पड़ी।
धूप बुआ ने लपक चुपाया
पछुआ लायी बस्ता-फूल।
......
चिड़िया साथ फुदकती जाती / कोयल से शिशु गीत सुनो।
‘इकनी एक’ सिखाता तोता / ’अ’ अनार का याद रखो।
संध्या पतंग उड़ा, तिल-लडुआ
खा, पर सबक़ न भूल। (पृ.३५)
परिवर्तन प्रकृति का नियम है। नव वर्ष का आगमन हर्षोल्लास लाता है और मानव को मानवता के पक्ष में कुछ संकल्प लेने का अवसर भी, पर हममें से अधिकांश की अन्यमनस्कता इस अवसर का लाभ नहीं उठा पाती। ‘सलिल’ जी दार्शनिक भाव से रचना प्रस्तुत करते हैं जो पाठक पर अन्दर-ही- अन्दर आंदोलित करती चलती है—
नये साल को/आना है तो आएगा ही।
करो नमस्ते या मुँह फेरो।
सुख में भूलो, दुख में टेरो।
अपने सुर में गायेगा ही/नये साल...।
एक-दूसरे को ही मारो।
या फिर, गले लगा मुस्काओ।
दर्पण छवि दिखलायेगा ही/नये साल...।
चाह, न मिटना, तो ख़ुद सुधरो।
या कोसो जिस-तिस को ससुरो!
अपना राग सुनायेगा ही/नये साल...। (पृ.४७)
विषयवस्तु में विविधता और उसकी प्रस्तुति में नवीनता तो है ही, उनके शिल्प में, विशेषतः छंदों को लेकर रचनाकार ने अनेक अभिनव प्रयोग किये हैं, जो रेखांकित किये जाने योग्य हैं। कुछ उद्धरण देखिए—
सुन्दरिये मुन्दरिये, होय!
सब मिल कविता करिये होय!
कौन किसी का प्यारा होय!
स्वार्थ सभी का न्यारा होय!
जनता का रखवाला होय!
नेता तभी दुलारा होय!
झूठी लड़ै लड़ाई होय!
भीतर करें मिताई होय!
.....
हिंदी मैया निरभै होय!
भारत माता की जै होय! (पृ.४९)
उपर्युक्त रचना पंजाब में लोहड़ी पर्व पर राय अब्दुल्ला खान भट्टी उर्फ़ दुल्ला भट्टी को याद कर गाये जानेवाले लोकगीत की तर्ज़ पर है। इसी प्रकार निम्नलिखित रचना बुन्देली लोककवि ईसुरी की चौकड़िया फागों (पद भार१६/१२) पर आधारित है। दोनों ही गीतों की वस्तु में युगबोध उमगता हुआ दिखता है—
मिलती काय नें ऊँचीवारी / कुर्सी हमको गुइयाँ!
हमखों बिसरत नहीं बिसारे / अपनी मन्नत प्यारी
जुलुस, विसाल भीर जयकारा / सुविधा संसद न्यारी
मिल जाती, मन की कै लेते / रिश्वत ले-दे भइया!
......
कौनउ सगो हमारो नैयाँ / का काऊ से काने?
अपने दस पीढ़ी खें लाने / हमें जोड़ रख जानें।
बना लई सोने की लंका / ठेंगे पे राम-रमैया! (पृ.५१)
इसी छंद में एक गीत है, ‘जब लौं आग’, जिसमें कवि ने लोक की भाषा में सुन्दर उद्बोधन दिया है। कुछ पंक्तियाँ देखें—
जब लौं आग न बरिहै, तब लौं / ना मिटिहै अन्धेरा!
सबऊ करो कोसिस मिर-जुर खें / बन सूरज पगफेरा।
......
गोड़-तोड़ हम फ़सल उगा रए / लूट रए व्यापारी।
जन के धन से तनखा पा खें / रौंद रए अधिकारी।
जागो, बनो मसाल / नई तो / घेरे तुमै / अँधेरा! (पृ.६४)
गीत ‘सच की अरथी’ (पृ.55) दोहा छंद में है, तो अगले गीत, ‘दर्पण का दिल’ का मुखड़ा दोहे छंद में है और उसके अंतरे सोरठे में हैं, तथापि गीत के ठाठ में कोई कमी नहीं आयी है। कुछ अंश देखिए—
दर्पण का दिल देखता, कहिए, जब में कौन?
आप न कहता हाल, भले रहे दिल सिसकता।
करता नहीं ख़याल, नयन कौन-सा फड़कता!
सबकी नज़र उतारता, लेकर राई-नौन! (पृ.५७)
छंद-प्रयोग की दृष्टि से पृष्ठ ५९, ६१ और ६२ पर छोटे-छोटे अंतरों के गीत ‘हरगीतिका’ में होने के कारण पाठक का ध्यान खींचते हैं। एक रचनांश का आनंद लीजिए—
करना सदा, वह जो सही।
........
हर शूल ले, हँस फूल दे
यदि भूल हो, मत तूल दे
नद-कूल को पग-धूल दे
कस चूल दे, मत मूल दे
रहना सदा, वह जो सही। (पृ.६२)
सत्ता में बैठे छद्म समाजवादी और घोटालेबाजों की कमी नहीं है। गीतकार ने ऐसे लोगों पर प्रहार करने में कसर नहीं छोड़ी है—
बग्घी बैठा / बन सामंती समाजवादी।
हिन्दू-मुस्लिम की लड़वाये
अस्मत की धज्जियाँ उड़ाये
आँसू, सिसकी, चीखें, नारे
आश्वासन कथरी लाशों पर
सत्ता पाकर / उढ़ा रहा है समाजवादी! (पृ.७६)
देश में तमाम तरक्क़ी के बावजूद दिहाड़ी मज़दूरों की हालत ज्यों-की- त्यों है। यह ऐसा क्षेत्र है जिसके संगठितहोने की चर्चा भी नहीं होती, परिणाम यह कि मजदूर को जब शाम को दिहाड़ी मिलती है, वह खाने-पीने के सामान और जीवन के राग को संभालने-सहेजने के उपक्रमों को को जुटाने बाज़ार दौड़ता है। ‘सलिल’ जी ने इस क्षण को बखूबी पकड़ा है और उसे नवगीत में सफलतापूर्वक ढाल दिया है—
मिली दिहाड़ी / चल बाज़ार।
चावल-दाल किलो-भर ले ले / दस रुपये की भाजी
घासलेट का तेल लिटर-भर / धनिया- मिर्चा ताज़ी
तेल पाव-भर फल्ली का / सिन्दूर एक पुड़िया दे-
दे अमरूद पाँच का / बेटी की न सहूँ नाराजी
ख़ाली ज़ेब, पसीना चूता / अब मत रुक रे! / मन बेज़ार! (पृ.८१)
आर्थिक विकास, सामाजिक विसंगतियों का जन्मदाता है। समस्या यह भी है कि हमारे अपनों ने अपने चरित्र में भी संकीर्णता भर ली है। ऐसे हम चाहते भी कुछ नहीं कर पाते और उच्छवास ले-ले रह जाते हैं। ऐसी ही व्यथा का चित्रांकन एक गीत, ‘राम बचाये’ में द्रष्टव्य है। इसके दो बंद देखें—
अपनी-अपनी मर्यादा कर तार-तार / होते प्रसन्न हम,
राम बचाये!
वृद्धाश्रम-बालाश्रम और अनाथालय / कुछ तो कहते हैं!
महिलाश्रम की सुनो सिसकियाँ / आँसू क्यों बहते रहते हैं?
राम-रहीम बीनते कूड़ा / रजिया-रधिया झाडू थामे
सड़क किनारे, बैठे लोटे बतलाते / कितने विपन्न हम,
राम बचाये!
अमराई पर चौपालों ने / फेंका क्यों तेज़ाब, पूछिए!
पनघट ने खलिहानों को क्यों / नाहक़ भेजा जेल बूझिए।
सास-बहू, भौजाई-ननदी / क्यों माँ-बेटी सखी न होती?
बेटी-बेटे में अंतर कर / मन से रहते सदा खिन्न हम,
राम बचाये! (पृ.९४)
इसी क्रम में एक गीत, ख़ुशियों की मछली’ उल्लेखनीय है जिसमें समाज और सत्ता का गँठजोड़ आम आदमी को जीने नहीं दे रहा है। गीत की बुनावट में युगीन यथार्थ के साथ दार्शनिकता का पुट भी है—
ख़ुशियों की मछली को / चिंता का बगुला/खा जाता है।
श्वासों की नदिया में / आसों की लहरें
कूद रही हिरनी-सी / पल भर ना ठहरें
आँख मूँद मगन / उपवासी साधक / ठग जाता है।
....
श्वेत वसन नेता है / लेकिन मन काला
अंधे न्यायालय ने / सच झुठला डाला
निरपराध फँस जाता / अपराधी शातिर बच जाता है।। (पृ.९८)
गीत, ‘लोकतंत्र’ का पंछी’ में भी आम आदमी की व्यथा का यथार्थ चित्रांकन है। सत्ता-व्यवस्था के दो प्रमुख अंग- विधायिका और न्यायपालिका अपने उत्तरदायित्व से विमुख होते जा रहे हैं और जनमत की भूमिका भी संदिग्ध होती जा रही है। लोकतांत्रिक व्यवस्था ही ध्वस्त होती जा रही है—
लोकतंत्र का पंछी बेबस!
नेता पहले डालें दाना / फिर लेते पर नोच
अफ़सर रिश्वत-गोली मारें / करें न किंचित सोच
व्यापारी दे नाश रहा डँस!
.......
राजनीति नफ़रत की मारी / लिए नींव में पोच
जनमत बहरा-गूंगा खो दी / निज निर्णय की लोच
एकलव्य का कहीं न वारिस! (पृ.१००)
प्रकृति के उपादानों को लेकर मानवीय कार्य-व्यापार की रचना विश्वव्यापक होती है, विशेषतः जब उसमें चित्रण-भर न हो, बल्कि उसमें मार्मिकता, और संवेदनापूरित जीवन्तता हो। ‘खों-खों करते’ ऐसा ही गीत है जिसमें शीत ऋतु में एक परिवार की दिनचर्या का जीवन्त चित्र है—
खों-खों करते बादल बब्बा / तापें सूरज सिगड़ी।
आसमान का आँगन चौड़ा / चंदा नापे दौड़ा-दौड़ा
ऊधम करते नटखट तारे / बदरी दादी, ‘रुको’ पुकारे
पछुआ अम्मा बड़-बड़ करती / डाँट लगाती तगड़ी!
धरती बहिना राह हेरती / दिशा सहेली चाह घेरती
ऊषा-संध्या बहुएँ गुमसुम / रात और दिन बेटे अनुपम
पाला-शीत / न आये घर में / खोल न खिड़की अगड़ी!
सूर बनाता सबको कोहरा / ओस बढ़ाती संकट दोहरा
कोस न मौसम को नाहक़ ही / फ़सल लायगी राहत को ही
हँसकर खेलें / चुन्ना-मुन्ना / मिल चीटी-ढप- लँगड़ी! (पृ.१०३)
इन विषमताओं और विसंगतियों के बाबजूद गीतकार अपना कवि-धर्म नहीं भूलता। नकारात्मकता को विस्मृत कर वह आशा की फ़सल बोने और नये इतिहास लिखने का पक्षधर है—
आज नया इतिहास लिखें हम।
अब तक जो बीता, सो बीता
अब न आस-घट होगा रीता
अब न साध्य हो स्वार्थ सुभीता,
अब न कभी लांछित हो सीता
भोग-विलास न लक्ष्य रहे अब
हया, लाज, परिहास लिखें हम।
आज नया इतिहास लिखें हम।।
रहें न हमको कलश साध्य अब
कर न सकेगी नियति बाध्य अब
स्नेह-स्वेद- श्रम हों अराध्य अब
कोशिश होगी महज माध्य अब
श्रम-पूँजी का भक्ष्य न हो अब
शोषक हित खग्रास लिखें हम।। (पृ.१२२)
रचनाकार को अपने लक्ष्य में अपेक्षित सफलता मिली है, पर उसने शिल्प में थोड़ी छूट ली है, यथा तुकांत के मामले में, अकारांत शब्दों का तुक इकारांत या उकारांत शब्दों से (उलट स्थिति भी)। इसी प्रकार, उसने अनुस्वार वाले शब्दों को भी तुक के रूप में प्रयुक्त कर लिया है, जैसे- गुइयाँ / भइया (पृ.५१), प्रसन्न / खिन्न (पृ.९४) सिगड़ी / तगड़ी / लंगड़ी (पृ.१०३)। एकाध स्थलों पर भाषा की त्रुटि भी दिखायी पड़ी है, जैसे- पृष्ठ १२७ पर एक गीत में‘दम’ शब्द को स्त्रीलिंग मानकर ‘अपनी’ विशेषण प्रयुक्त हुआ है। तथापि, इन छोटी-मोटी बातों से संग्रह का मूल्य कम नहीं हो जाता।
गीतकार ने गीतों की भाषा में अपेक्षित लय सुनिश्चित करने के लिए हिंदी-उर्दू के बोलचाल शब्दों को प्राथमिकता दी है; कहीं-कहीं भावानुसार तत्सम शब्दावली का चयन किया है। अधिकांश गीतों में लोक का पुट दिखलायी देता है जिससे पाठक को अपनापन महसूस होता है। आज हम गद्य की औपचारिक शब्दावली से गीतों की सर्जना करने में अधिक लगे हैं, जिसका परिणाम यह हो रहा है कि उनमें मार्मिकता और अपेक्षित संवेदना का स्तर नहीं आ पाता है। भोथरी संवेदनावाली कविता से हमें रोमावलि नहीं हो सकती, जबकि आज उसकी आवश्यकता है। ‘सलिल’ जी ने इसकी भरपाई की पुरज़ोर कोशिश की है जिसका हिंदी नवगीत संसार द्वारा स्वागत किया जाना चाहिए।
वर्तमान संग्रह निःसंदेह नवगीत के प्रसार में अपनी सशक्त भूमिका निभा रहा है और आने वाले समय में उसका स्थान इतिहास में अवश्य लिया जाएगा, यह मेरा विश्वास है।... लोक की शक्ति को सोद्देश्य नवगीतों में ढालने हेतु ‘सलिल’ जी साधुवाद के पात्र है।
- 3/29, विकास नगर, लखनऊ-226 022 (मो.80096 60096)
*
[कृति विवरण- पुस्तक का नाम- काल है संक्रांति का (नवगीत-संग्रह); नवगीतकार- आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’, प्रकाशक- समन्वय प्रकाशन अभियान, २०४ विजय अपार्टमेन्ट, सुभद्रा वार्ड, नेपियर टाउन, जबलपुर- ४८२००१ संस्करण- प्रथम, २०१६; पृष्ठ संख्या- १२८, मूल्य- पुस्तकालय संस्करण: तीन सौ रुपये; जनसंस्करण: दो सौ रुपये।]
४-६-२०१६
***