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गुरुवार, 21 मार्च 2024

मार्च २१, सॉनेट, मुक्तक, हाइकु गीत, कुण्डलिया, गीति-काव्य में छंद, त्रिभंगी

सलिल सृजन २१ मार्च 
सॉनेट
रंग
रंगरहित बेरंग न कोई।
श्याम जन्मता सदा श्वेत को।
प्रगटाए पाषाण रेत को।।
रंगों ने नव आशा बोई।।
रंगोत्सव सब झूम मनाते।
रंग लगाना बस अपनों को।
छोड़ न देते क्यों नपनों को?
राग-रागिनी, गीत गुँजाते।।
रंग बिखेरें सूरज-चंदा।
नहीं बटोरें घर-घर चंदा।
यश न कभी भी होता मंदा।।
रंगों को बदरंग मत करो।
श्वेत-श्याम को संग नित वरो।
नवरंगों को हृदय में धरो।।
२१-२-२०२२
•••
दोहा
हिंदू मरते हों मरें, नहीं कहीं भी जिक्र।
काँटा चुभे न अन्य को, नेताजी को फ़िक्र।।
***
मुक्तक कविता दिवस पर
कवि जी! मत बोलिये 'कविता से प्यार है'
भूले से भी मत कहें 'इस पे जां निसार है'
जिद्द अब न कीजिए मुश्किल में जान है
कविता का बाप बहुत सख्त थानेदार है
२१-३-२०२१
***
हाइकु गीत
*
आया वसंत
इन्द्रधनुषी हुए
दिशा-दिगंत..
शोभा अनंत
हुए मोहित,
सुर-मानव संत..
*
प्रीत के गीत
गुनगुनाती धूप
बनालो मीत.
जलाते दिए
एक-दूजे के लिए
कामिनी-कंत..
*
पीताभी पर्ण
संभावित जननी
जैसे विवर्ण..
हो हरियाली
मिलेगी खुशहाली
होगे श्रीमंत..
*
चूमता कली
मधुकर गुंजार
लजाती लली..
सूरज हुआ
उषा पर निसार
लाली अनंत..
*
प्रीत की रीत
जानकर न जाने
नीत-अनीत.
क्यों कन्यादान?
'सलिल' वरदान
दें एकदंत..
***
कुण्डलिया
*
कुंडल पहना कान में, कुंडलिनी ने आज
कान न देती, कान पर कुण्डलिनी लट साज
कुण्डलिनी लट साज, राज करती कुंडल पर
मौन कमंडल बैठ, भेजता हाथी को घर
पंजा-साइकिल सर धुनते, गिरते जा दलदल
खिला कमल हँस पड़ा, फन लो तीनों कुंडल
*
रूठी राधा से कहें, इठलाकर घनश्याम
मैंने अपना दिल किया, गोपी तेरे नाम
गोपी तेरे नाम, राधिका बोली जा-जा
काला दिल ले श्याम, निकट मेरे मत आ, जा
झूठा है तू ग्वाल, प्रीत भी तेरी झूठी
ठेंगा दिखा न भाग, खिजाती राधा रूठी
२१-३-२०१७
***
विमर्श : कुछ सवाल-
१. मिथुनरत नर क्रौंच के वध पश्चात क्रौंची के आर्तनाद को सुनकर विश्व की पहली कविता कही गयी। क्या कविता में केवल विलाप और कारुण्य हो, शेष रसों या अनुभूतियाँ के लिये कोई जगह न हो?
२. यदि विलाप से उत्पन्न कविता में आनंद का स्थान हो सकता है तो अभाव और विसंगति प्रधान नवगीत में पर्वजनित अनुभूतियाँ क्यों नहीं हो सकतीं?
३. यदि नवगीत केवल और केवल पीड़ा, दर्द, अभाव की अभिव्यक्ति हेतु है तो क्यों ने उसे शोक गीत कहा जाए?
४. क्या इसका अर्थ यह है कि नवगीत में दर्द के अलावा अन्य अनुभूतियों के लिये कोई स्थान नहीं और उन्हें केंद्र में रखकर रची गयी गीति रचनाओं के लिये कोई नया नाम खोज जाए?
५. यदि नवगीत सिर्फ और सिर्फ दलित और दरिद्र वर्ग की विधा है तो उसमें उस वर्ग में प्रचलित गीति विधाओं कबीरा, ढिमरयाई, आल्हा, बटोही, कजरी, फाग, रास आदि तथा उस वर्ग विशेष में प्रचलित शब्दावली का स्थान क्यों नहीं है?
६. क्या समीक्षा करने का एकाधिकार विचारधारा विशेष के समीक्षकों का है?
७. समीक्षा व्यक्तिगत विचारधारा और आग्रहों के अनुसार हो या रचना के गुण-धर्म पर? क्या समीक्षक अपनी व्यक्तिगत विचारधारा से विपरीत विचारधारा की श्रेष्ठ कृति को सराहे या उसकी निंदा करे?
८. रचनाकार समीक्षक और समीक्षक रचनाकार हो सकता है या नहीं?
९. साहित्य समग्र समाज के कल्याण हेतु है या केवल सर्वहारा वर्ग के अधिकारों का घोषणापत्र है?
***
आलेख:
गीति-काव्य में छंदों की उपयोगिता और प्रासंगिकता / गीत, नवगीत तथा नई कविता
*
[लेखक परिचय- आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' गत ३ दशकों से हिंदी साहित्य, भाषा के विकास के लिये सतत समर्पित और सक्रिय हैं। गद्य,-पद्य की लगभग सभी विधाओं, समीक्षा, तकनीकी लेखन, शोध लेख, संस्मरण, यात्रा वृत्त, साक्षात्कार आदि में आपने निरंतर सृजन कर अपनी पहचान स्थापित की है। १२ राज्यों की साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा शताधिक अलंकरणों, पुरस्कारों आदि से सम्मानित किये जा चुके सलिल जी के ४ पुस्तकें (१. कलम के देव भक्ति गीत संग्रह, २ लोकतंत्र का मक़बरा कविता संग्रह, ३. मीत मेरे कविता संग्रह, ४. भूकम्प के साथ जीना सीखें तकनीकी लोकोपयोगी) प्रकाशित हैं जबकि लघुकथा, दोहा, गीत, नवगीत, मुक्तक, मुक्तिका, लेख, आदि की १० पांडुलिपियाँ प्रकाशन की प्रतीक्षा में हैं। हिंदी भाषा के व्याकरण तथा पिंगल अधिकारी विद्वान सलिल जी ने सिविल अभियंता तथा अधिवक्ता होते हुए भी हिंदी के समांतर बुंदेली, ब्रज, भोजपुरी, अवधी, छत्तीसगढ़ी, मालवी, निमाड़ी, राजस्थानी, हरयाणवी, सिरायकी तथा अंग्रेजी में भी लेखन किया है। मेकलसुता पत्रिका तथा साइट हिन्दयुग्म व् साहित्य शिल्पी पर भाषा, छंद, अलंकार आदि पर आपकी धारावाहिक लेखमालाएँ बहुचर्चित रही हैं। अपनी बुआ श्री महीयसी महादेवी जी तथा माताजी कवयित्री शांति देवी को साहित्य व भाषा प्रेम की प्रेरणा माननेवाले सलिल जी प्रस्तुत लेख में गीत, नवगीत, ग़ज़ल और कविता के लेखन में छंद की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला है।]
*
भूमिका: ध्वनि और भाषा
अध्यात्म, धर्म और विज्ञान तीनों सृष्टि की उत्पत्ति नाद अथवा ध्वनि से मानते हैं। सदियों पूर्व वैदिक ऋषियों ने ॐ से सृष्टि की उत्पत्ति बताई, अब विज्ञान नवीनतम खोज के अनुसार सूर्य से नि:सृत ध्वनि तरंगों का रेखांकन कर उसे ॐ के आकार का पा रहे हैं। ऋषि परंपरा ने इस सत्य की प्रतीति कर सर्व सामने को बताया कि धार्मिक अनुष्ठानों में ध्वनि पर आधारित मंत्रपाठ या जप ॐ से आरम्भ करने पर ही फलता है। यह ॐ परब्रम्ह है, जिसका अंश हर जीव में जीवात्मा के रूप में है। नव जन्मे जातक की रुदन-ध्वनि बताती है कि नया प्राणी आ गया है जो आजीवन अपने सुख-दुःख की अभिव्यक्ति ध्वनि के माध्यम से करेगा। आदि मानव वर्तमान में प्रचलित भाषाओँ तथा लिपियों से अपरिचित था। प्राकृतिक घटनाओं तथा पशु-पक्षियों के माध्यम से सुनी ध्वनियों ने उसमें हर्ष, भय, शोक आदि भावों का संचार किया। शांत सलिल-प्रवाह की कलकल, कोयल की कूक, पंछियों की चहचहाहट, शांत समीरण, धीमी जलवृष्टि आदि ने सुख तथा मेघ व तङित्पात की गड़गड़ाहट, शेर आदि की गर्जना, तूफानी हवाओं व मूसलाधार वर्ष के स्वर ने उसमें भय का संचार किया। इन ध्वनियों को स्मृति में संचित कर, उनका दोहराव कर उसने अपने साथियों तक अपनीअनुभूतियाँ सम्प्रेषित कीं। यही आदिम भाषा का जन्म था। वर्षों पूर्व पकड़ा गया भेड़िया बालक भी ऐसी ही ध्वनियों से शांत, भयभीत, क्रोधित होता देखा गया था।
कालांतर में सभ्यता के बढ़ते चरणों के साथ करोड़ों वर्षों में ध्वनियों को सुनने-समझने, व्यक्त करने का कोष संपन्न होता गया। विविध भौगोलिक कारणों से मनुष्य समूह पृथ्वी के विभिन्न भागों में गये और उनमें अलग-अलग ध्वनि संकेत विकसित और प्रचलित हुए जिनसे विविध भाषाओँ तथा बोलिओं का विकास हुआ। सुनने-कहने की यह परंपरा ही श्रुति-स्मृति के रूप में सहस्त्रों वर्षों तक भारत में फली-फूली। भारत में मानव कंठ में ध्वनि के उच्चारण स्थानों की पहचान कर उनसे उच्चरित हो सकनेवाली ध्वनियों को वर्गीकृत कर शुद्ध ध्वनि पर विशेष ध्यान दिया गया। इन्हें हम स्वर के तीन वर्ग हृस्व, दीर्घ व् संयुक्त तथा व्यंजन के ६ वर्गों क वर्ग, च वर्ग, ट वर्ग, त वर्ग, प वर्ग, य वर्ग आदि के रूप में जानते हैं। अब समस्या इस मौखिक ज्ञान को सुरक्षित रखने की थी ताकि पीढ़ी दर पीढ़ी उसे सही तरीके से पढ़ा-सुना तथा सही अर्थों में समझा-समझाया जा सके। निराकार ध्वनियों का आकार या चित्र नहीं था, जिस शक्ति के माध्यम से इन ध्वनियों के लिये अलग-अलग संकेत मिले उसे आकार या चित्र से परे मानते हुए चित्रगुप्त संज्ञा दी जाकर ॐ से अभिव्यक्त कर ध्वन्यांकन के अपरिहार्य उपादानों असि-मसि तथा लिपि का अधिष्ठाता कहा गया। इसीलिए वैदिक काल से मुग़ल काल तक धर्म ग्रंथों में चित्रगुप्त का उल्लेख होने पर भी उनका कोई मंदिर, पुराण, उपनिषद, व्रत, कथा, चालीसा, त्यौहार आदि नहीं बनाये गये।
निराकार का साकार होना, अव्यक्त का व्यक्त होना, ध्वनि का लिपि, लेखनी, शिलापट के माध्यम से स्थयित्व पाना और सर्व साधारण तक पहुँचना मानव सभ्यता सर्वाधिक महत्वपूर्ण चरण है। किसी भी नयी पद्धति का परंपरावादियों द्वारा विरोध किया ही जाता है। लिपि द्वारा ज्ञान को संचित करने का विरोध हुआ ही होगा और तब ऐसी-मसि-लिपि के अधिष्ठाता को कर्म देवता कहकर विरोध का शमन किया गया। लिपि का विरोध अर्थात अंत समय में पाप-पुण्य का लेख रखनेवाले का विरोध कौन करता? आरम्भ में वनस्पतियों की टहनियों को पैना कर वनस्पतियों के रस में डुबाकर शिलाओं पर संकेत अंकित-चित्रित किये गये। ये शैल-चित्र तत्कालीन मनुष्य की शिकारादि क्रियाओं, पशु-पक्षी आदि सहचरों से संबंधित हैं। इनमें प्रयुक्त संकेत क्रमश: रुढ़, सर्वमान्य और सर्वज्ञात हुए। इस प्रकार भाषा के लिखित रूप लिपि (स्क्रिप्ट) का उद्भव हुआ। लिप्यांकन में प्रवीणता प्राप्त ब्राम्हण-कायस्थ वर्ग को समाज, शासन तथा प्रशासन में सर्वोच्च स्थान सहस्त्रों वर्षों तक प्राप्त हुआ। ध्वनि के उच्चारण तथा अंकन का विज्ञानं विकसित होने से शब्द-भंडार का समृद्ध होना, शब्दों से भावों की अभिव्यक्ति कर सकना तथा इसके समानांतर लिपि का विकास होने से ज्ञान का आदान-प्रदान, नव शोध और सकल मानव जीवन व संस्कृति का विकास संभव हो सका।
रोचक तथ्य यह भी है कि मौसम, पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों, तथा वनस्पति ने भी भाषा और लिपि के विकास में योगदान किया। जिस अंचल में पत्तों से भोजपत्र और टहनियों या पक्षियों के पंखों कलम बनायीं जा सकी वहाँ मुड्ढे (अक्षर पर आड़ी रेखा) युक्त लिपि विकसित हुई जबकि जहाँ ताड़पत्र पर लिखा जाता था वहाँ मुड्ढा खींचने पर उसके चिर जाने के कारण बिना मुड्ढे वाली लिपियाँ विकसित हुईं। क्रमश: उत्तर व दक्षिण भारत में इस तरह की लिपियों का अस्तित्व आज भी है। मुड्ढे हीन लिपियों के अनेक प्रकार कागज़ और कलम की किस्म तथा लिखनेवालों की अँगुलियों क्षमता के आधार पर बने। जिन क्षेत्रों के निवासी वृत्ताकार बनाने में निपुण थे वहाँ की लिपियाँ तेलुगु, कन्नड़ , बांग्ला, उड़िया आदि की तरह हैं जिनके अक्षर किसी बच्चे को जलेबी-इमरती की तरह लग सकते हैं। यहाँ बनायी जानेवाली अल्पना, रंगोली, चौक आदि में भी गोलाकृतियाँ अधिक हैं। यहाँ के बर्तन थाली, परात, कटोरी, तवा, बटलोई आदि और खाद्य रोटी, पूड़ी, डोसा, इडली, रसगुल्ला आदि भी वृत्त या गोल आकार के हैं।
रेगिस्तानों में पत्तों का उपचार कर उन पर लिखने की मजबूरी थी इसलिए छोटी-छोटी रेखाओं से निर्मित अरबी, फ़ारसी जैसी लिपियाँ विकसित हुईं। बर्फ, ठंड और नमी वाले क्षेत्रों में रोमन लिपि का विकास हुआ। चित्र अंकन करने की रूचि ने चीनी जैसी चित्रात्मक लिपि के विकास का पथ प्रशस्त किया। इसी तरह खान-पान के कारण विविध अंचल के निवासियों में विविध ध्वनियों के उच्चारण की क्षमता भी अलग-अलग होने से वहाँ विकसित भाषाओँ में वैसी ध्वनियुक्त शब्द बने। जिन अंचलों में जीवन संघर्ष कड़ा था वहाँ की भाषाओँ में कठोर ध्वनियाँ अधिक हैं, जबकि अपेक्षाकृत शांत और सरल जीवन वाले क्षेत्रों की भाषाओँ में कोमल ध्वनियाँ अधिक हैं। यह अंतर हरयाणवी, राजस्थानी, काठियावाड़ी और बांग्ला., बृज, अवधि भाषाओँ में अनुभव किया जा सकता है।
सार यह कि भाषा और लिपि के विकास में ध्वनि का योगदान सर्वाधिक है। भावनाओं और अनुभूतियों को व्यक्त करने में सक्षम मानव ने गद्य और पद्य दो शैलियों का विकास किया। इसका उत्स पशु-पक्षियों और प्रकृति से प्राप्त ध्वनियाँ ही बनीं। अलग-अलग रुक-रुक कर हुई ध्वनियों ने गद्य विधा को जन्म दिया जबकि नदी के कलकल प्रवाह या निरंतर कूकती कोयल की सी ध्वनियों से पद्य का जन्म हुआ। पद्य के सतत विकास ने गीति काव्य का रूप लिया जिसे गाया जा सके। गीतिकाव्य के मूल तत्व ध्वनियों का नियमित अंतराल पर दुहराव, बीच-बीच में ठहराव और किसी अन्य ध्वनि खंड के प्रवेश से हुआ। किसी नदी तट के किनारे कलकल प्रवाह के साथ निरंतर कूकती कोयल को सुनें तो एक ध्वनि आदि से अंत तक, दूसरी के बीच-बीच में प्रवेश से गीत के मुखड़े और अँतरे की प्रतीति होगी। मैथुनरत क्रौंच युगल में से नर का व्याध द्वारा वध, मादा का आर्तनाद और आदिकवि वाल्मिकी के मुख से प्रथम कविता का प्रागट्य इसी सत्य की पुष्टि करता है। हिरण शावक के वध के पश्चात अश्रुपात करती हिरणी के रोदन से ग़ज़ल की उत्पत्ति की मान्यताएँ गीति काव्य की उत्पत्ति में प्रकृति और पर्यावरण का योगदान ही इंगित करते हैं।
व्याकरण और पिंगल का विकास-
भारत में गुरुकुल परम्परा में साहित्य की सारस्वत आराधना का जैसा वातावरण रहा वैसा अन्यत्र कहीं नहीं रह सका, इसलिये भारत में कविता का जन्म ही नहीं हुआ पाणिनि व पिंगल ने विश्व के सर्वाधिक व्यवस्थित, विस्तृत और समृद्ध व्याकरण और पिंगल शास्त्रों का सृजन किया जिनका कमोबेश अनुकरण और प्रयोग विश्व की अधिकांश भाषाओँ में हुआ। जिस तरह व्याकरण के अंतर्गत स्वर-व्यंजन का अध्ययन ध्वनि विज्ञानं के आधारभूत तत्वों के आधार पर हुआ वैसे ही पिंगल के अंतर्गत छंदों का निर्माण ध्वनि खण्डों की आवृत्तिकाल के आधार पर हुआ। पिंगल ने लय या गीतात्मकता के दो मूल तत्वों गति-यति को पहचान कर उनके मध्य प्रयुक्त की जा रही लघु-दीर्घ ध्वनियों को वर्ण या अक्षर के माध्यम से पहचाना तथा उन्हें क्रमश: १-२ मात्रा भार देकर उनके उच्चारण काल की गणना बिना किसी यंत्र या विधि न विशेष का प्रयोग किये संभव बना दी। ध्वनि खंड विशेष के प्रयोग और आवृत्ति के आधार पर छंद पहचाने गये। छंद में प्रयुक्त वर्ण तथा मात्रा के आधार पर छंद के दो वर्ग वर्णिक तथा मात्रिक बनाये गये। मात्रिक छंदों के अध्ययन को सरल करने के लिये ८ लयखंड (गण) प्रयोग में लाये गये सहज बनाने के लिए एक सूत्र 'यमाताराजभानसलगा' बनाया गया।
गीति काव्य में छंद-
गणित के समुच्चय सिद्धांत (सेट थ्योरी) तथा क्रमचय और समुच्चय (परमुटेशन-कॉम्बिनेशन) का प्रयोग कर दोनों वर्गों में छंदों की संख्या का निर्धारण किया गया। वर्ण तथा मात्रा संख्या के आधार पर छंदों का नामकरण गणितीय आधार पर किया गया। मात्रिक छंद के लगभग एक करोड़ तथा वर्णिक छंदों के लगभग डेढ़ करोड़ प्रकार गणितीय आधार पर ही बताये गये हैं। इसका परोक्षार्थ यह है कि वर्णों या मात्राओं का उपयोग कर जब भी कुछ कहा जाता है वह किसी न किसी ज्ञात या अज्ञात छंद का छोटा-बड़ा अंश होता है।इसे इस तरह समझें कि जब भी कुछ कहा जाता है वह अक्षर होता है। संस्कृत के अतिरिक्त विश्व की किसी अन्य भाषा में गीति काव्य का इतना विशद और व्यवस्थित अध्ययन नहीं हो सका। संस्कृत से यह विरासत हिंदी को प्राप्त हुई तथा संस्कृत से कुछ अंश अरबी, फ़ारसी, अंग्रेजी , चीनी, जापानी आदि तक भी गयी। यह अलग बात है कि व्यावहारिक दृष्टि से हिंदी में भी वर्णिक और मात्रिक दोनों वर्गों के लगभग पचास छंद ही मुख्यतः: प्रयोग हो रहे हैं। रचनाओं के गेय और अगेय वर्गों का अंतर लय होने और न होने पर ही है। गद्य गीत और अगीत ऐसे वर्ग हैं जो दोनों वर्गों की सीमा रेखा पर हैं अर्थात जिनमें भाषिक प्रवाह यत्किंचित गेयता की प्रतीति कराता है। यह निर्विवाद है कि समस्त गीति काव्य ऋचा, मन्त्र, श्लोक, लोक गीत, भजन, आरती आदि किसी भी देश रची गयी हों छंदाधारित है। यह हो सकता है कि उस छंद से अपरिचय, छंद के आंशिक प्रयोग अथवा एकाधिक छंदों के मिश्रण के कारण छंद की पहचान न की जा सके।
वैदिक साहित्य में ऋग्वेद एवं सामवेद की ऋचाएँ गीत का आदि रूप हैं। गीत की दो अनिवार्य शर्तें विशिष्ट सांगीतिक लय तथा आरोह-अवरोह अथवा गायन शैली हैं। कालांतर में 'लय' के निर्वहन हेतु छंद विधान और अंत्यानुप्रास (तुकांत-पदांत) का अनुपालन संस्कृत काव्य की वार्णिक छंद परंपरा तक किया जाता रहा। संस्कृत काव्य के समान्तर प्राकृत, अपभ्रंश आदि में भी 'लय' का महत्व यथावत रहा। सधुक्कड़ी में शब्दों के सामान्य रूप का विरूपण सहज स्वीकार्य हुआ किन्तु 'लय' का नहीं। शब्दों के रूप विरूपण और प्रचलित से हटकर भिन्नार्थ में प्रयोग करने पर कबीर को आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने 'भाषा का डिक्टेटर' कहा।
अंग्रेजों और अंगरेजी के आगमन और प्रभुत्व-स्थापन की प्रतिक्रिया स्वरूप सामान्य जन अंग्रेजी साहित्य से जुड़ नहीं सका और स्थानीय देशज साहित्य की सृजन धारा क्रमशः खड़ी हिंदी का बाना धारण करती गयी जिसकी शैलियाँ उससे अधिक पुरानी होते हुए भी उससे जुड़ती गयीं। छंद, तुकांत और लय आधृत काव्य रचनाएँ और महाकाव्य लोक में प्रतिष्ठित और लोकप्रिय हुए। आल्हा, रासो, राई, कजरी, होरी, कबीर आदि गीत रूपों में लय तथा तुकांत-पदांत सहज साध्य रहे। यह अवश्य हुआ कि सीमित शिक्षा तथा शब्द-भण्डार के कारण शब्दों के संकुचन या दीर्घता से लय बनाये रखा गया या शब्दों के देशज भदेसी रूप का व्यवहार किया गया। विविध छंद प्रकारों यथा छप्पय, घनाक्षरी, सवैया आदि में यह समन्वय सहज दृष्टव्य है।खड़ी हिंदी जैसे-जैसे वर्तमान रूप में आती गयी शिक्षा के प्रचार-प्रसार के साथ कवियों में छंद-शुद्धता के समर्थन या विरोध की प्रवृत्ति बढ़ी जो पारम्परिक और प्रगतिवादी दो खेमों में बँट गयी।
छंदमुक्तता और छंद हीनता-
लम्बे काल खंड के पश्चात हिंदी पिंगल को महाप्राण निराला ने कालजयी अवदान छंदमुक्त गीति रचनाओं के रूप में दिया। उत्तर भारत के लोककाव्य व संगीत तथा रवींद्र संगीत में असाधारण पैठ के कारण निराला की छंद पर पकड़ समय से आगे की थी। उनकी प्रयोगधर्मिता ने पारम्परिक छंदों के स्थान पर सांगीतिक राग-ताल को वरीयता देते हुए जो रचनाएँ उन्हें प्रस्तुत कीं उन्हें भ्रम-वश छंद विहीन समझ लिया गया, जबकि उनकी गेयता ही इस बात का प्रमाण है कि उनमें लय अर्थात छंद अन्तर्निहित है। निराला की रचनाओं और तथाकथित प्रगतिशील कवियों की रचनाओं के सस्वर पाठ से छंदमुक्तता और छंदहीनता के अंतर को सहज ही समझा जा सकता है।
दूसरी ओर पारम्परिक काव्यधारा के पक्षधर रचनाकार छंदविधान की पूर्ण जानकारी और उस पर अधिकार न होने के कारण उर्दू काव्यरूपों के प्रति आकृष्ट हुए अथवा मात्रिक-वार्णिक छंद के रूढ़ रूपों को साधने के प्रयास में लालित्य, चारुत्व आदि काव्य गुणों को नहीं साध सके। इस खींच-तान और ऊहापोह के वातावरण में हिंदी काव्य विशेषकर गीत 'रस' तथा 'लय' से दूर होकर जिन्दा तो रहा किन्तु जीवनशक्ति गँवा बैठा। निराला के बाद प्रगतिवादी धारा के कवि छंद को कथ्य की सटीक अभिव्यक्ति में बाधक मानते हुए छंदहीनता के पक्षधर हो गये। इनमें से कुछ समर्थ कवि छंद के पारम्परिक ढाँचे को परिवर्तित कर या छोड़कर 'लय' तथा 'रस' आधारित रचनाओं से सार्थक रचना कर्मकार सके किन्तु अधिकांश कविगण नीरस-क्लिष्ट प्रयोगवादी कवितायेँ रचकर जनमानस में काव्य के प्रति वितृष्णा उत्पन्न करने का कारण बने। विश्वविद्यालयों में हिंदी को शोधोपाधियां प्राप्त किन्तु छंद रचना हेतु आवश्यक प्रतिभा से हीं प्राध्यापकों का एक नया वर्ग पैदा हो गया जिसने अमरता की चाह ने अगीत, प्रगीत, गद्यगीत, अनुगीत, प्रलंब गीत जैसे न जाने कितने प्रयोग किये पर बात नहीं बनी। प्रारंभिक आकर्षण, सत्तासीन राजनेताओं और शिक्षा संस्थानों, पत्रिकाओं और समीक्षकों के समर्थन के बाद भी नयी कविता अपनी नीरसता और जटिलता के कारण जन-मन से दूर होती गयी। गीत के मरने की घोषणा करनेवाले प्रगतिवादी कवि और समीक्षक स्वयं काल के गाल में समा गये पर गीत लोक मानस में जीवित रहा। हिंदी छंदों को कालातीत अथवा अप्रासंगिक मानने की मिथ्या अवधारणा पाल रहे रचनाकार जाने-अनजाने में उन्हीं छंदों का प्रयोग बहर में करते हैं।
उर्दू काव्य विधाओं में छंद-
भारत के विविध भागों में विविध भाषाएँ तथा हिंदी के विविध रूप (शैलियाँ) प्रचलित हैं। उर्दू हिंदी का वह भाषिक रूप है जिसमें अरबी-फ़ारसी शब्दों के साथ-साथ मात्र गणना की पद्धति (तक़्ती) का प्रयोग किया जाता है जो अरबी लोगों द्वारा शब्द उच्चारण के समय पर आधारित हैं। पंक्ति भार गणना की भिन्न पद्धतियाँ, नुक्ते का प्रयोग, काफ़िया-रदीफ़ संबंधी नियम आदि ही हिंदी-उर्दू रचनाओं को वर्गीकृत करते हैं। हिंदी में मात्रिक छंद-लेखन को व्यवस्थित करने के लिये प्रयुक्त गण के समान, उर्दू बहर में रुक्न का प्रयोग किया जाता है। उर्दू गीतिकाव्य की विधा ग़ज़ल की ७ मुफ़र्रद (शुद्ध) तथा १२ मुरक्कब (मिश्रित) कुल १९ बहरें मूलत: २ पंच हर्फ़ी (फ़ऊलुन = यगण यमाता तथा फ़ाइलुन = रगण राजभा ) + ५ सात हर्फ़ी (मुस्तफ़इलुन = भगणनगण = भानसनसल, मफ़ाईलुन = जगणनगण = जभानसलगा, फ़ाइलातुन = भगणनगण = भानसनसल, मुतफ़ाइलुन = सगणनगण = सलगानसल तथा मफऊलात = नगणजगण = नसलजभान) कुल ७ रुक्न (बहुवचन इरकॉन) पर ही आधारित हैं जो गण का ही भिन्न रूप है। दृष्टव्य है कि हिंदी के गण त्रिअक्षरी होने के कारण उनका अधिकतम मात्र भार ६ है जबकि सप्तमात्रिक रुक्न दो गानों का योग कर बनाये गये हैं। संधिस्थल के दो लघु मिलाकर दीर्घ अक्षर लिखा जाता है। इसे गण का विकास कहा जा सकता है।
वर्णिक छंद मुनिशेखर - २० वर्ण = सगण जगण जगण भगण रगण सगण लघु गुरु
चल आज हम करते सुलह मिल बैर भाव भुला सकें
बहरे कामिल - मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन
पसे मर्ग मेरे मज़ार परजो दिया किसी ने जला दिया
उसे आह दामने-बाद ने सरे-शाम से ही बुझा दिया
उक्त वर्णित मुनिशेखर वर्णिक छंद और बहरे कामिल वस्तुत: एक ही हैं।
अट्ठाईस मात्रिक यौगिक जातीय विधाता (शुद्धगा) छंद में पहली, आठवीं और पंद्रहवीं मात्रा लघु तथा पंक्त्यांत में गुरु रखने का विधान है।
कहें हिंदी, लिखें हिंदी, पढ़ें हिंदी, गुनें हिंदी
न भूले थे, न भूलें हैं, न भूलेंगे, कभी हिंदी
हमारी थी, हमारी है, हमारी हो, सदा हिंदी
कभी सोहर, कभी गारी, बहुत प्यारी, लगे हिंदी - सलिल
*
हमें अपने वतन में आजकल अच्छा नहीं लगता
हमारा देश जैसा था हमें वैसा नहीं लगता
दिया विश्वास ने धोखा, भरोसा घात कर बैठा
हमारा खून भी 'सागर', हमने अपना नहीं लगता -रसूल अहमद 'सागर'
अरकान मफाईलुन मफाईलुन मफाईलुन मफाईलुन से बनी उर्दू बहर हज़ज मुसम्मन सालिम, विधाता छंद ही है। इसी तरह अन्य बहरें भी मूलत: छंद पर ही आधारित हैं।
रुबाई के २४ औज़ान जिन ४ मूल औज़ानों (१. मफ़ऊलु मफ़ाईलु मफ़ाईलु फ़अल, २. मफ़ऊलु मफ़ाइलुन् मफ़ाईलु फ़अल, ३. मफ़ऊलु मफ़ाईलु मफ़ाईलु फ़ऊल तथा ४. मफ़ऊलु मफ़ाइलुन् मफ़ाईलु फ़ऊल) से बने हैं उनमें ५ लय खण्डों (मफ़ऊलु, मफ़ाईलु, मफ़ाइलुन् , फ़अल तथा फ़ऊल) के विविध समायोजन हैं जो क्रमश: सगण लघु, यगण लघु, जगण २ लघु / जगण गुरु, नगण तथा जगण ही हैं। रुक्न और औज़ान का मूल आधार गण हैं जिनसे मात्रिक छंद बने हैं तो इनमें यत्किंचित परिवर्तन कर बनाये गये (रुक्नों) अरकान से निर्मित बहर और औज़ान छंदहीन कैसे हो सकती हैं?
औज़ान- मफ़ऊलु मफ़ाईलुन् मफ़ऊलु फ़अल
सगण लघु जगण २ लघु सगण लघु नगण
सलगा ल जभान ल ल सलगा ल नसल
इंसान बने मनुज भगवान नहीं
भगवान बने मनुज शैवान नहीं
धरती न करे मना, पाले सबको-
दूषित न करो बनो हैवान नहीं -सलिल
गीत / नवगीत का शिल्प, कथ्य और छंद-
गीत और नवगीत शैल्पिक संरचना की दृष्टि से समगोत्रीय है। अन्य अनेक उपविधाओं की तरह यह दोनों भी कुछ समानता और कुछ असमानता रखते हैं। नवगीत नामकरण के पहले भी गीत और दोनों नवगीत रचे जाते रहे आज भी रहे जा रहे हैं और भविष्य में भी रचे जाते रहेंगे। अनेक गीति रचनाओं में गीत और नवगीत दोनों के तत्व देखे जा सकते हैं। इन्हें किसी वर्ग विशेष में रखे जाने या न रखे जाने संबंधी समीक्षकीय विवेचना बेसिर पैर की कवायद कही जा सकती है। इससे पाचनकाए या समीक्षक विशेष के अहं की तुष्टि भले हो विधा या भाषा का भला नहीं होता।
गीत - नवगीत दोनों में मुखड़े (स्थाई) और अंतरे का समायोजन होता है, दोनों को पढ़ा, गुनगुनाया और गाया जा सकता है। मुखड़ा अंतरा मुखड़ा अंतरा यह क्रम सामान्यत: चलता है। गीत में अंतरों की संख्या प्राय: विषम यदा-कदा सम भी होती है । अँतरे में पंक्ति संख्या तथा पंक्ति में शब्द संख्या आवश्यकतानुसार घटाई - बढ़ाई जा सकती है। नवगीत में सामान्यतः २-३ अँतरे तथा अंतरों में ४-६ पंक्ति होती हैं। बहुधा मुखड़ा दोहराने के पूर्व अंतरे के अंत में मुखड़े के समतुल्य मात्रिक / वर्णिक भार की पंक्ति, पंक्तियाँ या पंक्त्यांश रखा जाता है। अंतरा और मुखड़ा में प्रयुक्त छंद समान भी हो सकते हैं और भिन्न भी। गीत के प्रासाद में छंद विधान और अंतरे का आकार व संख्या उसका विस्तार करते हैं। नवगीत के भवन में स्थाई और अंतरों की सीमित संख्या और अपेक्षाकृत लघ्वाकार व्यवस्थित गृह का सा आभास कराते हैं। प्रयोगधर्मी रचनाकार इनमें एकाधिक छंदों, मुक्तक छंदों अथवा हिंदीतर भाषाओँ के छंदों का प्रयोग करते रहे हैं।गीत में पारम्परिक छंद चयन के कारण छंद विधान पूर्वनिर्धारित गति-यति को नियंत्रित करता है। नवगीत में छान्दस स्वतंत्रता होती है अर्थात मात्रा सन्तुलनजनित गेयता और लयबद्धता पर्याप्त है। दोहा, सोरठा, रोला, उल्लाला, त्रिभंगी, आल्हा, सखी, मानव, नरेंद्र छंद (फाग), जनक छंद, लावणी, हाइकु आदि का प्रयोग गीत-नवगीत में किया जाता रहा है।
गीत - नवगीत दोनों में कथ्य के अनुसार रस, प्रतीक और बिम्ब चुने जाते हैं। गेयता या लयबद्धता दोनों में होती है। गीत में शिल्प को वरीयता प्राप्त होती है जबकि नवगीत में कथ्य प्रधान होता है। गीत में कथ्य वर्णन के लिये प्रचुर मात्र में बिम्बों, प्रतीकों और उपमाओं के उपयोग का अवकाश होता है जबकि नवगीत में गागर में सागर, बिंदु में सिंधु की तरह इंगितों में बात कही जाती है। 'कम बोले से अधिक समझना' की उक्ति नवगीत पर पूरी तरह लागू होती है। नवगीत की विषय वस्तु सामायिक और प्रासंगिक होती है। तात्कालिकता नवगीत का प्रमुख लक्षण है जबकि सनातनता, निरंतरता गीत का। गीत रचना का उद्देश्य सत्य-शिव-सुंदर की प्रतीति तथा सत-चित-आनंद की प्राप्ति कही जा सकती है जबकि नवगीत रचना का उद्देश्य इसमें बाधक कारकों और स्थितियों का इंगित कर उन्हें परिवर्तित करने की सरचनात्मक प्रयास कहा जा सकता है। गीत महाकाल का विस्तार है तो नवगीत काल की सापेक्षता। गीत का कथ्य व्यक्ति को समष्टि से जोड़कर उदात्तता के पथ पर बढ़ाता है तो नवगीत कथ्य समष्टि की विरूपता पर व्यक्ति को केंद्रित कर परिष्कार की राह सुझाता है।
नवगीत का विशिष्ट लक्षण नवता बताया जाता है किन्तु यह तत्व गीत में भी हो सकता है और किसी नवगीत में अल्प या नहीं भी हो सकता है। जो विचार एक नवगीतकार के लिए पूर्व ज्ञात हो वह अन्य के लिये नया हो सकता है। अत:, नवता अनुल्लंघनीय मानक नहीं हो सकता। पारम्परिक तुलनाओं, उपमाओं, बिम्बों तथा कथ्यों को नवगीत में वर्ज्य कहनेवालों को उसके लोकस्वीकार्यता को भी ध्यान में रखना होगा। सामान्य पाठक या श्रोता को सामान्यत: पुस्तकीय मानकों से अधिक रास रंजकता आकर्षित करती है। अत: कथ्य की माँग पर मिथकों एवं पारम्परिक तत्वों के प्रयोग के संबंध में लचीला दृष्टिकोण आवश्यक है।
नवगीत में पारिस्थितिक शब्द चित्रण (विशेषकर वैषम्य और विडम्बना) मय कथ्य की अनिवार्यता, काल्पनिक रूमानियत और लिजलिजेपन से परहेज, यथार्थ की धरती पर 'है' और 'होना चाहिए' के ताने-बाने से विषमता के बेल-बूटे सामने लाना, आम आदमी के दर्द-पीड़ा, चीत्कार, असंतोष के वर्णन को साध्य मानने के पक्षधर नवगीत में प्रगतिवादी कवित्त के तत्वों का पिछले दरवाज़े से प्रवेश कराने का प्रयास करते है। यदि यह कुचेष्टा सफल हुई तो नवगीत भी शीघ्र ही प्रगतिशील कविता की सी मरणासन्न स्थिति में होगा। सौभाग्य से नवगीत रचना के क्षेत्र में प्रविष्ट नयी पीढ़ी एकांगी चिंतन को अमान्य कर, मानकों से हटकर सामायिक विषयों, घटनाओं, व्यक्तित्वों, जीवनमूल्यों, टकरावों, स्खलनों के समान्तर आदर्शों, उपलब्धियों, आकांक्षाओं, को नवगीत का विषय बना रही है।
फिर मुँडेरों पर सजे / कचनार के दिन
बैंगनी से श्वेत तक / खिलती हुई मोहक अदाएँ
शाम लेकर उड़ चलीं / रंगीन ध्वज सी ये छटाएँ
फूल गिन-गिन / मुदित भिन-भिन
फिर हवाओं में / बजे कचनार के दिन
खिड़कियाँ, खपरैल, घर, छत / डाल, पत्ते आँख मीचे
आरती सी दीप्त पँखुरी / उतरती है शांत नीचे
रूप झिलमिल / चाल स्वप्निल
फिर दिशाओं ने / भजे कचनार के दिन -पूर्णिमा बर्मन
नवगीत लिखते समय इन बातों का ध्यान रखें-१. संस्कृति व लोकतत्त्व का समावेश हो। २. तुकान्तता पर लयात्मकता को वरीयता दें। ३. नये प्रतीक व बिम्बों का प्रयोग करें। ४. दृष्टिकोण वैज्ञानिकतामय अथवा यथार्थपरक हो। ५. सकारात्मक सोच हो। ६. बात कहने का ढंग नया हो और प्रभावशाली ढंग हो। ७. प्रचुर शब्द-भंडार सम्यक शब्द-चयन में सहायक होता है। ८. नवगीत छन्द के रूढ़ बंधन से मुक्त किन्तु लय परक गति-यति से सज्जित होता है। ९. प्रकृति का सूक्ष्मता के साथ निरीक्षण, कथ्य की जानकारी, मौलिक विश्लेषण और लीक से हटकर अभिव्यक्ति नवगीत लेखन हेतु रचना सामग्री है। भाषा के स्तर पर गीत में संकेतन का महत्वपूर्ण स्थान होता है जबकि नवगीत में स्पष्टता आवश्यक है। गीत पारम्परिकता का पोषक होता है तो नवगीत नव्यता को महत्व देता है। गीत में छंद योजना को वरीयता होती है तो नवगीत में गेयता अथवा लयात्मकता को महत्व मिलता है।
हिंदी छंद और भाषा का वैशिष्ट्य-
हिंदी भाषा का वैशिष्ट्य संस्कृत से अन्य भाषाओँ की तुलना में अधिक प्रभावी तथा ध्वनि विज्ञानं सम्मत उच्चारण प्रणाली ग्रहण करना, सरल अक्षराकृतियाँ, स्वर-व्यंजन,उपयुक्त संयुक्ताक्षर, शब्द-भेद, सटीक संधि नियम, भाषिक शक्तियाँ (अमिधा, व्यंजना, लक्षणा), शताधिक अलंकार, करोड़ों छंद, अगणित मुहावरे तथा लोकोक्तियाँ, तत्सम-तद्भव शब्द, उपसर्ग-प्रत्यय, ५० से अधिक आंचलिक भाषा-रूप, विशव में किसी भी एनी भाषा की तुलना में अधिक समझने-बोलने-लिखनेवाला जनगण आदि के साथ महासागर की तरह निरंतर कुछ नया ग्रहण करने की प्रवृत्ति है। इस कारण हिंदी ने संस्कृत, पाली, प्राकृत, अपभ्रंश, ब्राम्ही की विरासत के साथ २० से अधिक भारतीय भाषाओँ के अरबी, फ़ारसी, अंग्रेजी, जापानी आदि से प्राप्त शब्दों, साहित्य की रचना विधाओं आदि को ग्रहण मात्र नहीं किया अपितु उनके मूल रूप को अपने भाषिक-देशिक संस्कार के अनुरूप परिवर्तित कर उनमें प्रचुर साहित्य रचना कर उसे अपना बना लिया। हिंदी ने मराठी के लावणी, अभंग आदि छंद, पंजाबी के माहिया छंद, अंग्रेजी के सोनेट, कप्लेट, बैलेड आदि छंद, जापानी के हाइकु, स्नैर्यु, ताँका, वांका आदि छंदों सहजता से अपना ही नहीं लिये अपितु उन्हें भारतीय संस्कृति, जनमानस, लोकप्रवृत्ति के नुरूप ढालकर उनका भारतीयकरण भी किया है। विश्व में सर्वाधिक बोली जा रही हिंदी ने भारत में राजनैतिक और आंचलिक विरोध द्वारा विकास-पथ रोकने की कोशिश के बावजूद विश्ववाणी का स्तर पाया है। हिंदी के छंद विश्व की कई भाषाओँ में अनूदित किये और रचे जा रहे हैं। सारत: यह निष्कर्ष निस्संकोच व्यक्त किया जा सकता है कि गीति रचनाओं का अस्तित्व ही छंद पर निर्भर है। छंदों के व्यापक, गहन और उच्च प्रभाव की अभिवृद्धि के लिये उन्हें सरलतम रूप में, स्पष्ट किन्तु लचीले रचना नियमों, मात्रा बाँट निर्धारण आदि सहित प्रस्तुत कृते रहा जाना चाहिए ताकि नयी पीढ़ी उन्हें ग्रहण कर सके और उनके विकास में अपना योगदान कर हिंदी को विश्ववाणी के पद पर आसीन करा सके।
संदर्भ ग्रन्थ-
१. छंद प्रभाकर, जगन्नाथ प्रसाद 'भानु'
२. छंद क्षीरधि राम देव लाल 'विभोर'
३. छ्न्दोलक्षण, नारायणदास
४. छंद मंजरी, सौरभ पाण्डेय
५. काव्य मनीषा, डॉ. भागीरथ मिश्र
६. उर्दू कविता और छंद शास्त्र, नरेश नदीम
७. गजल छंद चेतना, महावीर प्रसाद मूकेश
८. गजल सृजन रामप्रसाद शर्मा 'महर्षि'
९. गजल ज्ञान, राम देव लाल 'विभोर'
१०. नव गजलपुर, सागर मीरज़ापुरी
११. गीतिकायनम, सागर मीरज़ापुरी
१२. सत्यं शिवं सुन्दरं, स्वामी श्यामानंद सरस्वती
१३. संवेदनाओं के क्षितिज, रसूल अहमद सागर
१४. चोंच में आकाश, पूर्णिमा बर्मन
१५. भारतीय काव्य शास्त्र, डॉ. कृष्णदेव शर्मा
१६. उर्दू साहित्य का इतिहास, डॉ. सभापति मिश्र
१७. हिंदी का सरल भाषा विज्ञान, गोपाल लाल खन्ना
१८. समकालीन नवगीत की अवधारणा और जीवन मूल्य, डॉ. उर्वशी सिंह
१९. नवगीत के नये प्रतिमान, राधेश्याम 'बंधु'
२०. आलोचना शास्त्र, मोहनवल्लभ पन्त है.।
२१-३-२०१६
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त्रिभंगी छंद:
*
ऋतु फागुन आये, मस्ती लाये, हर मन भाये, यह मौसम।
अमुआ बौराये, महुआ भाये, टेसू गाये, को मो सम।।
होलिका जलायें, फागें गायें, विधि-हर शारद-रमा मगन-
बौरा सँग गौरा, भूँजें होरा, डमरू बाजे, डिम डिम डम।।
२१-३-२०१३
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मुक्तिका:
हुई होली, हो रही, होगी हमेशा प्राण-मन की
*
भाल पर सूरज चमकता, नयन आशा से भरे हैं.
मौन अधरों का कहे, हम प्रणयधर्मी पर खरे हैं..
श्वास ने की रास, अनकहनी कहे नथ कुछ कहे बिन.
लालिमा गालों की दहती, फागुनी किंशुक झरे हैं..
चिबुक पर तिल, दिल किसी दिलजले का कुर्बां हुआ है.
भौंह-धनु के नयन-बाणों से न हम आशिक डरे हैं?.
बाजुओं के बंधनों में कसो, जीवन दान दे दो.
केश वल्लरियों में गूथें कुसुम, भँवरे बावरे हैं..
सुर्ख लाल गाल, कुंतल श्याम, चितवन है गुलाबी.
नयन में डोरे नशीले, नयन-बाँके साँवरे हैं..
हुआ इंगित कुछ कहीं से, वर्जना तुमने करी है.
वह न माने लाज-बादल सिंदूरी फिर-फिर घिरे हैं..
पीत होती देह कम्पित, द्वैत पर अद्वैत की जय.
काम था निष्काम, रति की सुरती के पल माहुरे हैं..
हुई होली, हो रही, होगी हमेशा प्राण-मन की.
विदेहित हो देह ने, रंग-बिरंगे सपने करे हैं..
समर्पण की साधना दुष्कर, 'सलिल' होती सहज भी-
अबीरी-अँजुरी करे अर्पण बिना, हम कब टरे हैं..
२१-३२०११
***
हाइकु मुक्तिका
*
आया वसंत, / इन्द्रधनुषी हुए / दिशा-दिगंत..
शोभा अनंत / हुए मोहित, सुर / मानव संत..
*
प्रीत के गीत / गुनगुनाती धूप / बनालो मीत.
जलाते दिए / एक-दूजे के लिए / कामिनी-कंत..
*
पीताभी पर्ण / संभावित जननी / जैसे विवर्ण..
हो हरियाली / मिलेगी खुशहाली / होगे श्रीमंत..
*
चूमता कली / मधुकर गुंजार / लजाती लली..
सूरज हुआ / उषा पर निसार / लाली अनंत..
*
प्रीत की रीत / जानकार न जाने / नीत-अनीत.
क्यों कन्यादान? / 'सलिल' वरदान / दें एकदंत..
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मुक्तिका
*
खर्चे अधिक आय है कम.
दिल रोता आँखें हैं नम..
पाला शौक तमाखू का.
बना मौत का फंदा यम्..
जो करता जग उजियारा
उस दीपक के नीचे तम..
सीमाओं की फ़िक्र नहीं.
ठोंक रहे संसद में ख़म..
जब पाया तो खुश न हुए.
खोया तो करते क्यों गम?
टन-टन रुचे न मन्दिर की.
रुचती कोठे की छम-छम..
वीर भोग्या वसुंधरा
'सलिल' रखो हाथों में दम..
***
मुक्तक
मौन वह कहता जिसे आवाज कह पाती नहीं.
क्या क्षितिज से उषा-संध्या मौन हो गाती नहीं.
शोरगुल से शीघ्र ही मन ऊब जाता है 'सलिल'-
निशा जो स्तब्ध हो तो क्या तुम्हें भाती नहीं?
२१-३-२०१०
*

ऐतरेयोपनिषद

ॐ 
ऐतरेयोपनिषद
हिंदी पद्यानुवाद
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
शांति पाठ
वाणी मन में; मन वाणी में, वास करें प्रभु! वे अभिन्न हो।
हो प्रकाश-रूप प्रगटो प्रभु!, वेद-ज्ञान मन-वाणी ला दो।।
सुना ज्ञान जो; मुझे न भूले, निश-दिन चिंतन-पठन कर सकूँ-
सत्य-श्रेष्ठ-शुभ ही बोलूँ मैं, रक्षा करिए मेरी; गुरु की।
मुझको-गुरुको प्रभु! बचाइए, विघ्न अध्ययन में न तनिक हो।।
।। ॐ शांति: शांति: शांति: ।।
।। अध्याय १, खंड १।।
ॐ जगत प्रगटन के पहले, एकमात्र परमात्मा ही था।
अन्य न चेष्टा करनेवाला, लोक रचूँ उसने यह सोचा।१।
उसने लोकों की रचना की, अंभ-मरीचि-मृत्यु-जल सृजकर।
मह-जन-तप-सत्; अंभ-मरिचि-भव, नर-भू-जल-पाताल बनाए।२।
उसने सोचा- लोक रचे; अब, लोकपाल भी रचना होंगे।
सलिल-पद्मनाल से उसने, पुरुष हिरण्यमयी प्रगटाया।३।
तपकर मुख-वागाग्नि-नासिका, प्राण-वायु फिर चक्षु बनाए।
तब रवि कान दिशा व त्वचा रच, लोम दवा तरु पौध उगाए।
हृद मन शशि फिर अपानवायु, मृत्यु लिंग रेतस जल आए।४।
।। अध्याय १, खंड २।।
इस विधि उपजे सब देवों को, भूख-प्यास भी दे दी प्रभु ने।
सृष्टि-सिंधु पड़ प्रभु से बोले, 'जहाँ मिले आहार-जगह दें'।१।
गौ-तन बना दिया तब प्रभु ने, 'यह पर्याप्त नहीं' सुर बोले।
अश्व शरीर रचा तब प्रभु ने, 'है पर्याप्त न' कहा सुरों ने।२।
तब प्रभु ने नर-देह बनाई, 'अति सुंदर है' सुर बोले झट।
कहा ईश ने 'उचित लगे जो, जगह वहीं हो प्रविष्ट जाओ'।३।
अग्नि वाक् बन बैठे मुख में, वायु प्राण बन गए नाक में।
सूर्य दृष्टि बन नयन में बसे, दिशा देव हो श्रवण कान में।
देव दवा के लोम-त्वचा में, चंद्र हुआ मन पैठा हृद में।
यम अपान बन नाभि बस गया, वरुण वीर्य बन लिंग में बसे।४।
भूख-प्यास तब बोलीं प्रभु से, 'जगह हमें भी कहीं दीजिए'।
प्रभु बोले इन देवों का ही, भागीदार बनाता तुमको'।
लें हवि देवों-हित इंद्रिय जब, भूख-प्यास भी हिस्सा पाएँ।५।
।। अध्याय १, खंड ३।।
उस प्रभु ने फिर सोचा 'ये सब, लोकपाल लोकों के हैं जो।
इनके लिए बनाना है अब, अन्न- तृप्ति ये पाएँ जिससे।१।
उसने पंच महाभूतों को, तपा तुरत आकार दे दिया।
हो साकार सूक्ष्म भूतों से, अन्न; भोग्य जो है देवों का।२।
'भक्षक मेरा नाश करेगा', सोच अन्न भागा; मुँह फेरा।
जीवात्मा ने वाणी द्वारा, चाहा पकड़ूँ; पकड़ न पाया।३।
(वाक् पकड़ पाता यदि उसको, बोले 'अन्न' तृप्ति हो जाती।)
तब प्राणों ने चाहा पकड़े, हाथ न अन्न प्राण के आया।
सकता पकड़ अन्न तो उसको, सूँघ अन्न मन सुतृप्ति पाता।४।
अब आँखों ने चाहा पकड़े, लेकिन अन्न न हाथ लग सका।
अगर पातीं आँखें तो, अन्न देखकर मन भर जाता।५।
कोशिश कानों ने की पकड़ें, अन्न; न लेकिन पकड़ सके वे।
अगर पकड़ लेते तो सुनकर, अन्न तृप्ति मन को मिल सकती।६।
अन्न पकड़ लूँ चाह चर्म ने, कोशिश की पर पकड़ न पाया।
होता सफल अगर तो छूकर, अन्न तृप्ति मनु को मिल पाती।७।
मन ने चाहा; पकड़ न पाया, अगर पकड़ लेता तो नर को।
मात्र सोचकर भूख-प्यास से, अन्न ग्रहण सम तृप्ति सुहाती।८।
अन्न पकड़ लूँ सोच पुरुष ने, शिश्न माध्यम से कोशिश की।
विफल हुआ; यदि गह सकता तो, तजकर अन्न तृप्त हो पाता।९।
ग्रहण अपानवायु के द्वारा, मुख में अन्न कर सका जब नर।
जीवन-रक्षा करे अन्न के द्वारा, मात्र अपान वायु ही।१०।
परमपिता ने सोचा 'मुझ बिन, कैसे जीव रह सकेगा यह?
बोल वाक् से; सूँघ नाक से, श्वसन प्राण से; देख नेत्र से।
सुन कानों से; स्पर्श त्वचा से, मन से सोचे; खा अपान से।
वीर्य शिश्न से तजे; खुदी तो, मेरा क्या उपयोग रह गया?
मुझ बिन रह न सके; पद-मस्तक, किस पथ से मैं इसमें जाऊँ?११।
चीर जीव तन; विदृति द्वार से, तन में किया प्रवेश ईश ने।
तीन स्वप्न त्रै धाम ईश के, हृदय-गगन-ब्रह्माण्ड समूचा।१२।
(तीन अवस्था तीन स्वप्न हैं, स्थूल-सूक्ष्म अरु कारण रूपी।)
मनुज देह में प्रगट पुरुष ने, पंच भूत को सब दिश देखा।
कौन दूसरा व्याप्त?; देख प्रभु, हर्षा 'मैंने प्रभु को देखा।'१३।
नाम 'इदन्द्र' 'इसे देखा' है, लोग 'इंद्र' कहकर पुकारते।
उसको प्रिय है छिपकर रहना, ईश न सम्मुख रहें चाहते।१४।
***
।। अध्याय २।।
जीव प्रथमत: पुरुष देह में, वीर्य बने होता सुपुष्ट भी।
सिंचन नारी गर्भाशय में, करता पुरुष जन्म यह पहला।१।
नारी गहती आत्मभाव से, अपने अंग सदृश ही उसको।
पीर न होती; भार न लगता, आत्मावत करती पालन वह।२।
पालन-पोषण कर जन्मे माँ, संस्कार दे पिता ज्ञान भी।
संतति में खुद उन्नत होता, यह जातक का जन्म दूसरा।३।
वह आत्मा है इस आत्मा का, प्रतिनिधि; यह कर्तव्य पूर्ण कर।
आयु पूर्ण कर; पुन: जन्म ले, यह जातक का जन्म तीसरा।४।
विस्मय सत्य गर्भ में जाना, देवों के अनेक जन्मों को।
लौह आवरण तोड़ बाज सम, वामदेव ने कहा गर्भ में।५।
जन्म रहस्य जान, उठ ऋषि वह, तन मिटने पर स्वर्ग को गया।
सर्व कामनामुक्त आप्त हो, जन्म-मृत्यु से मुक्त हो गया। ६।
***
।। अध्याय २।।
किस आत्मा को हम उपासते, देख सुनें सूँघें चख बोलें।
जिससे वह या जिसने इनको, प्रगटाया है पुरुष देह में।१।
हृद ही मन; संज्ञान ले सके, दे आज्ञा; विज्ञान है यही।
प्रज्ञा; मेधा; दृष्टि; धैर्य; मति, मनन शक्ति; गति-स्मृति भी यह।
संकल्प; मनोरथ; प्राण शक्ति, कामादि उसी के सत्ता-बोधक।
इनसे हो प्रतीति उस प्रभु की, जिसने इनको रचा-बनाया।२।
ब्रह्मा इंद्र प्रजापति सब सुर, धरा गगन नभ सलिल तेज भी।
पंच भूत; लघु प्राणी; अंडज, जेरज; स्वेदज; उद्भिज; घोड़े।
गौ; गज; मनुज; परिंदे; जंगम, अचल जीव सब उससे पाते।
प्रज्ञा-प्रज्ञानेत्र; ज्ञान भी, वह प्रज्ञानी परम् ब्रह्म है।३।
जो जाने उठ धरा लोक से, स्वर्गलोक में ब्रह्म के सहित।
सब भोगों को भोग अमर हो, जन्म-मृत्यु से मुक्त हुआ वह।४।
*
शांति पाठ
वाणी मन में; मन वाणी में, वास करें प्रभु! वे अभिन्न हो।
हो प्रकाश-रूप प्रगटो प्रभु!, वेद-ज्ञान मन-वाणी ला दो।।
सुना ज्ञान जो; मुझे न भूले, निश-दिन चिंतन-पठन कर सकूँ-
सत्य-श्रेष्ठ-शुभ ही बोलूँ मैं, रक्षा करिए मेरी; गुरु की।
मुझको-गुरुको प्रभु! बचाइए, विघ्न अध्ययन में न तनिक हो।।
।। ॐ शांति: शांति: शांति: ।।
२१.३.२०२२
***

बुधवार, 20 मार्च 2024

मार्च २०, गौरैया, खुशहाली, बालगीत, सरस्वती, रमण, जनक छंद, सॉनेट, युगतुलसी, चिरैया

सलिल सृजन २० मार्च
*
स्मरण युगतुलसी 
सॉनेट 
• 
युगतुलसी का चारण हो जा, 
खो जा सौम्य सुदर्शन छवि में, 
कर वंदन यश-कीर्ति सतत गा, 
देख विराजे वे ही सवि में। 
धूप चाँदनी तम प्रकाश में, 
दिग्दिगंत तारों में गुरुवर, 
अनल अनिल नभ सलिल पाश में, 
देख देखकर झूमें तरुवर। 
नव्य नर्मदा पुरा पुरातन, 
व्याप्त सतपुड़ा विंध्य शिखर में, 
राम नाम पर्याय सनातन, 
ध्यान लगा लख मनस गह्वर में। 
जीवन सुमिरन का क्षण हो जा, 
राम भक्ति में जग तज खो जा। 
२०.३.२०२४ 
•••
सॉनेट
स्वस्ति
स्वस्ति होना अस्ति का परिणाम।
नास्ति हो तो मत करें स्वीकार।
स्वस्ति नहिं हो तो विधाता वाम।।
नास्ति सत् से भी करे इंकार।।
अस्ति से आस्तिक बने संसार।
दे सके, पा भी सके मन प्यार।
नास्तिक हो तो न बेड़ा पार।।
ऊर्जा हो व्यर्थ सत्य नकार।।
अस्ति खुश अस्तित्व की जय बोल।
नास्ति नाखुश बाल अपने नोच।
स्वस्ति नीरस में सके रस घोल।।
स्वस्ति सबका शुभ सके सच सोच।।
स्वार्थ का सर्वार्थ में बदलाव।
तभी जब हो स्वस्ति सबका चाव।।
२०-३-२०२३
२० मार्च
*
विश्व गौरैया दिवस २० मार्च को गौरैया के संरक्षण और उनके सामने आने वाली चुनौतियों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से हर साल मनाया जाता है। भारत व अन्य देशों में पक्षी गौरैया की संख्या लगातार घट रही है। वर्ष २००९ में भारत के संरक्षणवादी डॉ. मोहम्मद दिलावर ने कल्पना की और फिर २०१० में फ्रांस में इको-सिस एक्शन फाउंडेशन के सहयोग से २० मार्च को पहला विश्व गौरैया दिवस आयोजित कर हर साल यह दिवस मनाया जा रहा है।

२० मार्च को अंतर्राष्ट्रीय हैप्पीनेस डे मनाने का उद्देश्य हर हाल खुश रहना, और जीवन में खुशी के महत्व को स्वीकार करना है। यह दिन खुशी के महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाकर दुनिया के लोगों को खुश बनाए रखने में मदद करता है। पहली बार यह दिवस २०१३ में संयुक्त राष्ट्र द्वारा मनाया गया था। तब से हर साल यह दिवस मनाया जाता है।

वर्ल्ड ओरल हेल्थ डे २० मार्च को मनाया जाता है। इस वैश्विक स्वास्थ्य का उद्देश्य लोगों को ओरल हेल्थ (मुँह, दाँतों और ओरोफेशियल संरचना जो व्यक्ति को बोलने, श्वास लेने और खाने में सक्षम बनाती है) के प्रति सजग करना है।
*
महत्त्वपूर्ण घटनाएँ
१७३९ - नादिरशाह ने दिल्ली सल्तनत पर कब्ज़ा कर दिल्ली में २ माह तक लूटमार की, मयूर सिंहासन, बेशुमाररत्न, सोना, चाँदी, गहने लूटे।
१९९० - अर्धरात्रि में नामीबिया की स्वतंत्रता की घोषणा।
१९९१ - बेगम ख़ालिदा जिया बांग्लादेश की राष्ट्रपति निर्वाचित।
१९९९- प्रख्यात ब्रिटिश अमूर्त चित्रकार पैट्रिक हेरोन का निधन।
२००२ - नेपाल के प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा ६ दिवसीय यात्रा पर भारत पहुँचे, जिम्बाब्वे राष्ट्रमंडल से निलम्बित।
२००३ - इराक पर अमेरिकी हमला शुरू।
२००६ - अफ़ग़ानिस्तान के विदेश मंत्री ने दावा किया कि ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान में है।
२००९ - न्यायमूर्ति चन्द्रमौली कुमार प्रसाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मूख्य न्यायधीश नियुक्त हुए।
२० मार्च को जन्मे व्यक्ति
१८९२ - कर्नल टॉड - अंग्रेज़ अधिकारी एवं इतिहासकार, जिसे राजस्थान के इतिहास का मार्ग सर्वप्रथम प्रशस्त करने का श्रेय दिया जाता है।
१९६६ - अलका याग्निक - ख्यातिप्राप्त भारतीय पार्श्वगायिका हैं।
१९७३ - अर्जुन अटवाल - भारतीय पहले गोल्फ खिलाड़ी।
१९८२ - निशा मिलेट - भारतीय की जानी-मानी तैराक हैं।
१९८७ - कंगना राणावत, भारतीय अभिनेत्री।
१६१५ - दारा शिकोह - मुग़ल बादशाह शाहजहाँ और मुमताज़ महल का सबसे बड़ा पुत्र था।
१९२२ - कार्ल रीनर, अमेरिकी फिल्म निर्देशक, निर्माता, अभिनेता और हास्य अभिनेता, (योर शो ऑफ शोज़)
२० मार्च को दिवंगत
१७२७ - आइज़ैक न्यूटन - महान् गणितज्ञ, भौतिक वैज्ञानिक, ज्योतिर्विद एवं दार्शनिक थे।
१९४३ - एस. सत्यमूर्ति - भारत के क्रांतिकारी नेता, शशिभूषण रथ - 'उड़िया पत्रकारिता के जनक, स्वतंत्रता सैनानी थे।
१९७० - जयपाल सिंह - भारतीय हॉकी के प्रसिद्ध खिलाड़ियों में से एक।
१९७२- प्रेमनाथ डोगरा - जम्मू-कश्मीर के एक नेता थे।
१९९५ - रोहित मेहता - प्रसिद्ध साहित्यकार, विचारक, लेखक‍, दार्शनिक, भाष्यकार और स्वतंत्रता सेनानी थे।
२००८ - सोभन बाबू, भारतीय अभिनेता।
२०११ - बोब क्रिस्टो -भारतीय फ़िल्म अभिनेत्री।
२०१४ - खुशवंत सिंह - भारत के प्रसिद्ध पत्रकार, लेखक, उपन्यासकार और इतिहासकार।
२०१५ - मैल्कम फ्रेजर - ऑस्ट्रेलिया के पूर्व प्रधानमंत्री।
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जनक छंद
*
रमण आप में आप कर।
मौन; आप का जाप कर।
आप आप में व्याप कर।।
मौन बोलता है, सुनो।
कहने के पहले गुनो।
व्यर्थ न अपना सर धुनो।।
अति सीमित आहार कर।
विषयों का परिहार कर।
मन मत अधिक विचार कर।।
नाहक सपने मत बुनो।
तन बनकर क्यों तुम घुनो।
दो न, एक को चुप चुनो।।
मन-विचार दो नहीं हैं।
दूर नहीं प्रभु यहीं हैं।
गए नहीं वे कहीं हैं।।
बनो यंत्र भगवान का।
यही लक्ष्य इंसान का।
पुण्य अमित है दान का।।
जीवन पंकिल नहीं है।
जो कुछ उज्ज्वल; यहीं है।
हमने कमियाँ गहीं हैं।।
है महत्त्व अति ध्यान का।
परमपिता के भान का।
उस सत्ता के गान का।।
कर नियमन आहार का।
नित अपने आचार का।
मन में उठे विचार का।।
राही मंज़िल राह भी।
हैं मानव तू आप ही।
आह न केवल वाह भी।।
कोष न नफरत-प्यार का।
बोझ न भव-व्यापार का।
माध्यम पर उपकार का।।
जन्म लिया; भर आह भी।
प्रभु की कर परवाह भी।
है फ़क़ीर तू शाह भी।।
भीतर-बाहर है वही।
कथा न निज जिसने कही।
जिसकी महिमा सब कहीं।।
***
रमण महर्षि
भारत के तामिलनाडू प्रान्त में मदुरै से ३० मील दक्षिण तिरुचुली नामक एक गाँव है जहाँ एक प्राचीन शिव मंदिर है जिसकी अभ्यर्थना, महान तमिल संत एंव कवि सुन्दरमूर्ति एवं माणिक्क वाचकर ने अपने गीतों में की | उन्नीसवीं सदी के अन्त मे इस पवित्र गांव में सुन्दर अय्यर नामक वकील एवं उनकी पत्नी अलगम्माल रहते थे| ये आदर्श दम्पति भक्ति, उदारशीलता एवं दानशीलता से युक्त थे| सुन्दर अय्यर बहुत ही उदार थे जबकि अलगम्माल एक आदर्श हिन्दू पत्नी थीं| वेंकटरामन, उनसे द्वितीय पुत्र के रूप में पैदा हुए जो बाद में समस्त विश्व में भगवान श्री रमण महर्षि के रूप में जाने गये| हिन्दुओं के पावन दिन आरुद्रा-दर्शन, ३० दिसम्बर १८७९ को उनका जन्म हुआ| प्रत्येक वर्ष इस पावन दिन को नटराज शिव की मूर्ति को जनसामान्य के दर्शन हेतु एक समारोह के रूप में निकाला जाता है ताकि लोग शिव के अनुग्रह को अनुभव एवं प्राप्त कर सकें| आरुद्रा (१८७९) के दिन नटराज की मूर्ति तिरुचुली के मंदिर से विभिन्न समारोह के साथ नगर में निकली थी तथा पुनः मंदिर में प्रवेश करने वालि थी, उसी क्षण वेंकटरामन का जन्म हुआ|
जीवन के आरम्भिक वर्षो में वेंकटरामन में कुछ भी उल्लेखनीय नहीं था| वे एक सामान्य बालक के रुप में विकसित हुए| उन्हें तिरुचुली के एक प्राइमरी स्कूल में तथा बाद में दिण्डुक्कल के एक स्कूल में भेजा गया| जब वे बारह वर्ष के थे तो उनके पिता का देहावसान हो गया| ऐसी स्थिति में उन्हें परिवार के साथ, अपने चाचा सुब्ब अय्यर के साथ मदुरै में रहने की आवश्यकता पड़ी| मदुरै में उन्हें पहले स्काट मीडिल स्कूल तथा बाद में अमेरिकन मिशन हाईस्कूल में भेजा गया| यद्यपि वह तीव्र बुद्धि एवं तीव्र स्मरण शक्ति सम्पन्न थे किन्तु अपनी पढ़ाई के प्रति गंभीर नहीं थे। वह स्वस्थ एवं शक्तिशाली शरीर युक्त थे तथा उनके साथी उनकी ताकत से डरते थे| उनसे से यदि कभी किसी को नाराजगी रहती तो वे उनकी गहरी निद्रावस्था में बदला लेते थे| उन्हें सोया जानकर कहीं दूर जाकर पीटते थे तो भी उनकी नींद नहीं रवुलती थी| रमण महर्षि (1879-1950) अद्यतन काल के महान ऋषि और संत थे। उन्होंने आत्म विचार पर बहुत बल दिया। उनका आधुनिक काल में भारत और विदेश में बहुत प्रभाव रहा है।
मुदुरै में भी ऐसी घटनाएं अक्सर ही घटती थी, वहां रमण स्कूल में पढ़ते थे जब किसी लड़के से उनकी खटपट हो जाती, तब दिन में जागते हुए तो वह उनसे कुछ कह न पाता, क्योंकि रमण का स्वास्थ्य अच्छा था, पर उनके सो जाने पर वह अपने मन की मुराद पूरी कर लेता। वह अपने साथियों की मदद से सोए हुए रमण को उठाकर कहीं ले जाता और मन भर पीटने के बाद फिर वहीं सुला जाता। बालक रमण में इस तरह की गहरी नींद के साथ-साथ अर्द्ध निद्रा में रहने की भी आदत थी। ये दोनों ही बातें उनकी धार्मिक वृत्तियों की परिचायक है। गहरी नींद एक ओर तो अच्छे स्वास्थ्य की निशानी है और दूसरी ओर इस बात का संदेश देती है कि यदि कोई व्यक्ति ध्यान में लीन हो जाए, तो पूरी तरह निमग्न रह सकता है - अर्द्धनिद्रावस्था यह दर्शाती है कि व्यक्ति आंखें खुली रहने पर भी, संसार के काम करते हुए भी, आत्मा अथवा परमात्मा में लीन हो सकता है।
रमण महर्षि ने अद्वैतवाद पर जोर दिया। उन्होंने उपदेश दिया कि परमानंद की प्राप्ति 'अहम्‌' को मिटाने तथा अंत:साधना से होती है। रमण ने संस्कृत, मलयालम, एवं तेलुगु भाषाओं में लिखा। बाद में आश्रम ने उनकी रचनाओं का अनुवाद पाश्चात्य भाषाओं में किया।
वकील सुंदरम्‌ अय्यर और अलगम्मल को 30 दिसम्बर 1879 को तिरुचुली, मद्रास में जब द्वितीय पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई तो उसका नाम वेंकटरमन रखा गया। रमण की प्रारंभिक शिक्षा तिरुचुली और दिंदिगुल में हुई। उनकी रुचि शिक्षा की अपेक्षा मुष्टियुद्ध व मल्लयुद्ध जैसे खेलों में अधिक थी तथापि धर्म की ओर भी उनका विशेष झुकाव था।
दक्षिण के शैव लोग “अरुदर्शन” (अर्थात् जब शिव ने अपने भक्तों को नटराज के रूप में दर्शन दिए) का त्यौहार बड़े जोर-शोर और श्रद्धा-भक्ति से मनाते हैं। ३० दिसंबर १८७९ को इसी पवित्र त्यौहार के दिन तमिलनाडु के तिरुचुली नामक छोटे से कस्बे में श्री सुंदरम् अय्यर के घर एक बालक का जन्म हुआ, जो आगे चलकर महर्षि रमण के रूप में विख्यात हुआ। कुछ लोग महर्षि रमण को भगवान शिव का अवतार मानते हैं। बचपन से ही वह संन्यासियों जैसा आचरण करते थे। समाधिस्थ होना उनका सहज स्वभाव था। बचपन में वे अपने चाचा के घर किण्डीगुल में थे। घर में कोई समारोह था, सब लोग समारोह के बाद मंदिर चले गए। रमण उनके साथ नहीं गये। वह चुपचाप बैठे पढ़ते रहे। फिर जब नींद आने लगी तो कुंडे-दरवाजे बंद कर सो गए। घर के लोग जब वापस लोटे, तो उन्होंने बहुतेरा खटखटाया और शोर मचाया, पर रमण की नींद न टुटी| आखिर वे लोग किसी दूसरे के घर से होकर अपने घर में आए और रमण को जगाने के लिए पीटने लगे| घर के सब बच्चों ने उन्हें पीटा, चाचा ने भी पीटा, पर उनकी आंखे न खुली| वह पूर्ववत सोए रहे। रमण को उस मार-पीट का कुछ भी पता नहीं लगा। वह तो सुबह घर के लोगो ने उन्हे बतलाया, तो उन्हें पता चला कि रात को उनकी पिटाई भी हुई था।
तपस्या
१८९५ ई. में अरुचल (तिरुवन्नमलै) की प्रशंसा सुनकर रामन अरुंचल के प्रति बहुत ही आकृष्ट हुए। वे मानवसमुदाय से कतराकर एकांत में प्रार्थना किया करते। जब उनकी इच्छा अति तीव्र हो गई तो वे तिरुवन्नमलै के लिए रवाना हो गए ओर वहाँ पहुँचने पर शिखासूत्र त्याग कौपीन धारण कर सहस्रस्तंभ कक्ष में तपनिरत हुए। उसी दौरान वे तप करने पठाल लिंग गुफा गए जो चींटियों, छिपकलियों तथा अन्य कीटों से भरी हुई थी। २५ वर्षों तक उन्होंने तप किया। इस बीच दूर और पास के कई भक्त उन्हें घेरे रहते थे। उनकी माता और भाई उनके साथ रहने को आए और पलनीस्वामी, शिवप्रकाश पिल्लै तथा वेंकटरमीर जैसे मित्रों ने उनसे आध्यात्मिक विषयों पर वार्ता की। संस्कृत के महान्‌ विद्वान्‌ गणपति शास्त्री ने उन्हें 'रामनन्‌' और 'महर्षि' की उपाधियों से विभूषित किया।
महर्षि रमण का बचपन का नाम वेंकटरमण था, पर साधारणतः लोग उन्हें रमण के नाम से ही पुकारते थे | अपने नाम के अनुरूप ही वह अध्यात्म की दुनिया में रमण भी करते थे | उस समय उनकी उम्र १७ वर्ष की रही होगी। वह अपने चाचा के घर आए हुए थे। वहां एक विचित्र घटना घटी। वह घटना स्वयं उन्हीं के शब्दों में इस प्रकार है :
“मैं कभी बीमार नहीं हुआ था। स्वास्थ्य ठीक था। पर एक दिन एकाएक मैंने महसूस किया कि मैं मर रहा हूं। मौत के भय ने मुझे बुरी तरह जकड़ लिया। पर उस समय यह नहीं सूझा कि किसी डाक्टर के पास जाऊं, अथवा किसी मित्र को बुलाऊं। मैं अपने आप में ही उलझ गया, मौत के भय ने एकाएक मुझे सोचने पर मजबूर किया कि मैं मर रहा हूँ। पर तभी दिमाग में एक बिजली कौंधी - मैं कहां मर रहा हूं, मर तो शरीर रहा है। और मैं मौत का नाटक करने लगा। मैं लेट गया - सांस रोक ली और सब हरकतें भी बंद कर दी। तब मैंने अपने से कहा - यह शरीर तो मर गया। इसके मरने में और कसर ही क्या है? इसे जला दिया जाएगा, पर इस शरीर के मरने से मैं मर गया क्या? यदि मैं मर गया, तो शक्ति कैसे अनुभव करता हूं? मेरा व्यक्तित्व तो इससे अलग है। मैं इस शरीर की आत्मा हूं। शरीर मर जाएगा - पर मेरी आत्मा नहीं मरेगी। मैं तो कभी मरूंगा ही नहीं। और, इसके साथ ही, मौत का भय एकदम चला गया | मैं पुनःसशक्त हो गया। तब से मैंने शरीर में विशेष दिलचस्पी लेनी छोड़ दी।“
१९२२ में जब रमण की माता का देहांत हो गया तब आश्रम उनकी समाधि के पास ले जाया गया। १९४६ में रमण महर्षि की स्वर्ण जयंती मनाई गई। यहाँ महान्‌ विभूतियों का जमघट लगा रहता था। असीसी के संत फ्रांसिस की भाँति रामन सभी प्राणियों से - गाय, कुत्ता, हिरन, गिलहरी, आदि - से प्रेम करते थे।
१४ अप्रैल १९५० की रात्रि को आठ बजकर सैंतालिस मिनट पर जब महर्षि रमण महाप्रयाण को प्राप्त हुए, उस समय आकाश में एक तीव्र ज्योति का तारा उदय हुआ एवं अरुणाचल की दिशा में अदृश्य हो गया।
एक ऋषि द्वारा अपनाये गये पथ को मालूम करना उसी प्रकार कठिन है जिस प्रकार से अपने पंखों से उड़‌कर आकाश में पहुँची एक चिड़िया का पथ रेखांकित करना । अधिकांश व्यक्तियों को लक्ष्य की ओर धीमी एवं श्रमसाध्य यात्रा करनी पड़‌ती है किन्तु कुछ व्यक्ति, समस्त अस्तित्वों के स्रोत – सर्वोच्च आत्मा में निर्विघ्न उड़ने के लिए जन्मजात प्रतिभा लिए पैदा होते हैं । जब कभी ऎसा कोई ऋषि प्रकट होता है तो सामान्यतया मानवजाति उसे अपने हृदय में स्थान देती है। यद्यपि उनके साथ गति रखना संभव नहीं होता किन्तु उनकी उपस्थिति एवं सान्निध्य में उस आन्नद की अनुभूति होती है जिसके समक्ष सांसारिक सुख नहीं के बराबर होते हैं । महर्षि श्री रमण के जीवनकाल में तिरुवण्णामलै पहुँचने वाले असंख्य व्यक्तियों का यह अनुभव है। उन्होंने उनमें, संसार से पूर्ण विरक्त ऋषि, अतुल्य पावन संत तथा वेदान्त के शाश्वत सत का एक साक्षी देखा। किन्तु जब कभी ऐसी घटना घटित होती है तो उससे समस्त मानव जाति लाभान्वित होती तथा उसके समक्ष आशा का एक नया आयाम खुल जाता है ।
वेंकटरामन ने वचपन से ही अपनी अन्त: स्फुर्णा से अनुभव किया कि अरुणाचल कुछ महान, रहस्यमय एवं पहुँच से बाहर है | उनकी आयु के सोलहवें वर्ष में एक वृद्ध रिश्तेदार उनके घर मदुरै पहुँचे| लड़के ने उनसे पूछा कि वे कहाँ से आये हैं । ‘अरुणाचल से’, रिश्तेदार का उत्तर था| अरुणाचल के नाम मात्र से वेंकटरामन रोमांचित हो गये तथा अपनी उत्तेजना में उन्होंने कहा “क्या? अरुणाचल से! यह कहाँ हैं?” उनको उत्तर मिला कि तिरुवण्णामलै ही अरुणाचल है | उस घटना को संबोधित करते हुए बाद में ऋषि अपनी रचना अरुणाचल स्तुति में कहते है ।
‘ओ महान आश्चर्य! एक अचल पर्वत के रुप में यह खड़ा है किन्तु इसके क्रियाकलाप को समझना हर किसी के लिए कठिन है| बचपन से ही मेरी स्मृति में था की अरुणाचल कोई बहुत महान सत्ता है किन्तु जब मैने किसी से जाना कि यह तिरुवण्णामलै मे है तो इसका अर्थ नहीं समझ सका । मेरे मन को स्थिर कर जब इसने मुझे अपनी ओर आकार्षित किया और मैं निकट आया तो पाया कि यह अचल था’|
वेंकटरामन के ध्यान को अरुणाचल पर आकर्षित करने की इस घटना के शीघ्र वाद एक दूसरी घटना घटी जिसने उनकी आध्यात्मिक उत्कंठा को तीव्र किया| उन्हें पेरिय पुराण की तमिल पुस्तक देखने को मिली जो प्रसिद्ध ६३ शैव संतों के जीवन का वर्णन करती है| पुस्तक पढ़‌ते ही वह रोमांचित हो उठे | धार्मिक साहित्य की यह प्रथम पुस्तक थी जो उन्होंने पढ़ी | संतो के उदाहरण ने उन्हें रोमांचित किया तथा उनके हृदय को स्पर्श किया | संतों के भगवान के प्रति प्रेम एवं वैराग्ययुक्त जीवन अपनाने की इच्छा उनके भीतर प्रबल हुई:
उन्होंने साधारण जनों को रास्ता बताया कि मानव को उसके दैनिक कार्यों को करते हुए किस प्रकार उस परम तत्त्व की वंदना करनी है, कैसे आत्मा की शुद्धि करके जन्म-मरण के चक्करों से पार पाना है। यदि हम अपने दायित्वों का निर्वाह ही नहीं कर सकते तो हमें इस पृथ्वी पर मानव बनकर रहने का क्या अधिकार है! इस जगत् में ज्ञान की वास्तविक परिभाषा, जीवन की गहराइयाँ महर्षि रमण जैसे ज्ञानी पुरुषों ने ही हमें समझाई है।
ध्यान विधि
उसके बाद यदि कोई उनसे कुछ कहता-झगड़ता, तो वह जवाब नहीं देते। जो कुछ भी खाने को मिलता, खा लेते। धीरे-धीरे स्कूल में भी उनकी दिलचस्पी समाप्त हो गई। खेल-कुद से तो मन हट ही गया। एक संन्यासी सा जीवन बन गया | फिर एक दिन चरम स्थिति भी आ पहुंची। स्कूल में काम नहीं किया था - इसलिए अंग्रेजी व्याकरण के एक अभ्यास को तीन बार नकल करने की सजा मिली। दो बार तो उन्होंने नकल कर ली, पर उसके बाद न जाने मन में क्या उमंग उठी कि सभी किताबें एक ओर फेंक दीं और समाधि लगाकर ध्यान करने बैठ गए। फिर, कुछ देर बाद, उन्होंने स्कूल जाने का बहाना किया, कहा कि वहां स्पेशल क्लास लगेगी। चलने लगे, तो बड़े भाई ने पांच रुपये दिए, कालेज में अपनी फीस जमा करवाने को।
रमण ने सोचा कि अरुणाचलम् पहुंचने में तीन रुपये लगेंगे। सो, उन्होंने तीन रुपये तो अपने पास रखे और एक चिट लिख दी – “मैं अपने परम पिता की तलाश में, उसी की आज्ञा से, जा रहा हूँ। यह एक महान कार्य है - इसके लिए दुख करने और खोज में रुपया खर्च करने की आवश्यकता नहीं। तुम्हारी कालेज की फीस जमा नहीं करवा रहा। दो रुपये इसके साथ नत्थी हैं।“ इसके बाद वह घर से निकले, स्टेशन पर आए, टिकट लिया और गाड़ी में बैठ गए। राह में दो दिन भटके भी, परंतु आखिर में अपने आराध्य भगवान शिव के स्थान अरुणाचलम् पहुंच ही गए। जब वह अपने घर से चले थे, तो कानों में सोने की बालियां थी। राह में भटक जाने पर उन्होंने वे बालियां एक गृहस्थ को चार रुपये में दे दी। अरुणाचलम् पहुंचने पर एक आदमी ने उनसे पूछा - "चुटिया मुंड़वाओगे?"
उन्होंने कहा-"हां।"
फलतः वह उन्हें एक जगह ले गया, जहां अनेक नाई बैठे यही काम कर रहे थे। चोटी मुड़वाकर उन्होंने अपनी जनेऊ भी अपने आप उतार दी। धोती फाड़कर फेंक दी और उसमें से कोपीन या लंगोटी के लायक कपड़ा रख लिया। बाल कटवाने के बाद हिंदू रीति के अनुसार स्नान करना चाहिए, पर रमण तो शरीर की सेवा के पक्ष में थे ही नहीं, सो मंदिर की ओर चल पड़े। परंतु मंदिर के द्वार में घुसने से पहले ही जोरों की बूंदें पड़ी और उनका स्नान हो गया।
इस प्रकार, दुनिया से मुंह मोड़कर, और सारी इच्छाओं को त्यागकर, महर्षि रमण भगवान शिव के चरणों में साधनालीन हो गए। मंदिर के बड़े दालान में एक ओर उन्होंने आसन जमा दिया। कई सप्ताह तक वह बिना हिले-डुले, बोले-चाले, वहीं बैठे रहे। संसार से उनका नाता टूट चुका था। वह आत्मा की खोज में लीन थे। शीघ्र ही, लोग उन्हें “ब्राह्मणस्वामी” कहने लगे और शेषाद्रिस्वामी नाम के एक सज्जन ने, जो कुछ साल से वहां आए हुए थे, उनकी देखभाल का काम अपने जिम्मे ले लिया। लोग रमण महर्षि को “छोटा शेषाद्वि” भी कहने लगे। उनके घर से गायब होने के बाद स्वभावतः ही लोग उनकी खोज में लग गए और एक दिन उनकी माता उनके पास आ पहुंची। पर वह चुप रहे, कुछ नहीं बोले। अंततः एक व्यक्ति के कहने पर उन्होंने लिखा – “नियंता की आज्ञा और प्रारब्ध कर्मों के अनुसार जो कुछ नहीं होगा, वह कभी नहीं होगा इसलिए अच्छा है कि जो होता है, उसे होने दो।“
लगभग तीन वर्ष तक रमण ने कठोर तपस्या की। इन दिनों कोई व्यक्ति जो कुछ मुंह में डाल देता, वही खा लेते, पर दिन में केवल एक बार, और वह भी उतना ही, जिससे शरीर का आधार बना रहे। कुछ दिनों तक तो जिस पानी मिले दूध से मंदिर का फर्श धुलता था, वही उन्हें पिलाया गया। अरुणाचलम् की पहाड़ी के चारों ओर बहुत रूखा-सा वातावरण है। इस चोटी के दक्षिण में, नीचे की ओर, महर्षि रमण का आश्रम है। इस आश्रम की भी एक कथा है| महर्षि रमण की माता ने जब और कोई चारा न देखा, तो वह उन्हीं के पास रहने लगी और उनके भक्तों-शिष्यों की सेवा करने लगी। धीरे-धीरे उन्हें भान होता गया कि रमण अद्भुत शक्ति संपन्न दैवी पुरुष हैं। एक बार तो रमण के रूप में साक्षात भगवान ने उन्हें दर्शन दिए और वह चिल्ला पड़ी -"बेटा, इन सांपों को दूर करो। ये तुम्हें काट खाएंगे।"
जब माता की मृत्यु हुई, तो उनकी समाधि आज के आश्रम के स्थान पर बना दी गई। उन दिनों महर्षि रमण अरुणाचलम् की एक गुफा में रहते थे और माता की समाधि पर प्रतिदिन घूमने जाते थे। एक दिन वहां गए, तो वहीं ठहर गए। उनके शिष्यों को चिंता हुई कि वह कही चले गए। सो, वे उन्हें खोजने लगे। अंत में, उन्होंने उन्हें अपनी माता की समाधि पर बैठे पाया। पूछने पर वह बोले, "भगवान् का यही आदेश है।" फलतः वहां आश्रम बना दिया गया। अब तो आश्रम एक पूरी बस्ती ही बन गया है, पर पहले-पहल महर्षि के रहने के लिए वहां केवल घांस-फूंस की एक झोपड़ी डाली गई थी।
चिंतन
महर्षि रमण की आध्यात्मिक उन्नति की बात शीघ्र ही सारे संसार में फेल गई । विभिन्न देशों के लोग उनके दर्शन के लिए आने लगे | अच्छे प्रतिष्ठित और विचारवान व्यक्ति उनके पास आते और उनके सत्संग का लाभ उठाकर अपना जीवन सफल मानते। उनका कहना था कि सारे प्राणी, सारी आत्माएं, एक हैं। सभी आत्माओं को सुखी बनाने के लिए प्रयत्नशील होना ही ईश-भक्ति है। इसीलिए वह दुखियों, रोगियों, आदि की भरपूर सेवा करते थे कहते हैं कि कुछ ईसाई पादरी एक बार उनकी परीक्षा के लिए आए। वे महर्षि को पाखंडी मानते थे। पर जब उन्होंने उन्हें एक कोढ़ी दंपति की सेवा में लीन देखा, तो उनकी आंखें खुल गई और उन्होंने कहा, "आज हमने साक्षात् यीशू मसीह के दर्शन किए हैं।"
आज हमारे बीच महर्षि रमण तो नहीं हैं, पर उनकी शिक्षाएं उनके उपदेश और उनके सिद्धांत आज भी हमें प्रेरणा दे रहे हैं। वह कहते थे – “भगवान, गुरु और आत्मा एक समान हैं।“
गुरु की परिभाषा वह इस तरह करते थे – “गुरु वह है जो हर समय आत्मा की गहराई में निवास करता है। उसे गलतफहमियों और भेद-भावों से दूर रहना चाहिए। वह स्वतंत्र और बंधनमुक्त होना चाहिए। उसे कभी चिंतित नहीं होना चाहिए।“
वह यह भी कहते थे कि – “जो व्यक्ति अपने को नहीं जानता, वह दूसरे को क्या ज्ञान दे सकता है? वह अद्वैत सिद्धांत को मानने वाले थे। वह अधिक बोलते नहीं थे, परंतु लोगों को उनके दर्शन मात्र से शांति प्राप्त होती थी | बात यह थी कि वह स्वयं ज्ञानपूर्ण थे और सदा दूसरों के कष्ट दूर करने अथवा अपने ऊपर रखने की भावना रखते थे।
महर्षि रमण अपने शरीर की बिल्कुल परवाह नहीं करते थे। इसी वजह से वह असमय में ही बुढ़े हो गए |१९४७ के बाद तो वह बहुत ही कमजोर हो थे। फिर,१९५० में उनकी आंख में एक भयंकर फोड़ा निकला। इस फोड़े का कई बार आपरेशन हुआ, परंतु वह ठीक न हुआ और अंत में उसी की वजह से वह महासमाधि में लीन हो गए।
“ हालांकि दुष्ट-बुद्धि (या मक्कार) लोगों से भी तुम्हारा सामना हो सकता है, किन्तु उनसे नफरत या घृणा करना तुम्हारे लिए उचित नहीं है। पसंद और नापसंद, प्यार और नफरत भी समान रूप से त्याज्य हैं। मन के लिये यह उचित नहीं है, कि उसको हमेशा भौतिक पदार्थों या सांसारिक विषयों के चिन्तन में लगाये रखा जाये। जहां तक ​​संभव हो, दूसरों के मामलों में हमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।"
“ यह प्रतीयमान जगत,विचार के सिवा अन्य कुछ भी नहीं है। जब मन सभी प्रकार के विचारों से मुक्त हो जाता है, उस समय व्यक्ति की दृष्टि से यह जगत-प्रपंच भी ओझल हो जाता है, और मन - निजानन्द या स्वयं के आनंद का भोग करता है। इसके विपरीत, जब जगत दिखाई देता है, अर्थात जब विचार प्रकट होने लगते हैं, उस समय मन दर्द और पीड़ा का अनुभव करता है। “
“ जिस प्रकार मकड़ी अपने ही भीतर से जाला के धागे को बाहर निकालती है, और फिर अपने भीतर खींच लेती है, ठीक उसी तरह से मन अपने भीतर के जगत को बाहर प्रक्षिप्त करता है, और स्वयं ही उसको अपने भीतर समाहित कर लेता है।”
“ किसी मनुष्य को अपने उन व्यक्तिगत स्वार्थों (कामिनी-कांचन में आसक्ति ) को त्याग देना चाहिये जो उसे इस नश्वर जगत से बाँध देता है। मिथ्या अहंकार (मैं -पन ) को त्याग देना ही सच्चा त्याग है। “
“ प्रत्येक मनुष्य स्वभावतः दिव्य और ओजस्वी है। जो कुछ दुर्बल और अशुभ दिख रहे हैं, वे उसकी आदतें, वासनायें और विचार हैं, किन्तु वह स्वयं वैसा नहीं है।”
“ वे जो अपना जन्मदिन मनाना चाहते हों,-सुने ! तुम पहले यह खोजो कि तुम्हारा जन्म कब हुआ था ? किसी व्यक्ति का वास्तविक जन्मदिन वह है, जिस दिन (१४-४-१९९२) वह अपने को एक अजन्मा, अविनाशी, अमृत-सन्तान के रूप में पहचान लेता है !
" किसी व्यक्ति को कम से कम, अपने जन्मदिन के अवसर पर, इस संसार (जन्म-मृत्यु के चक्र) में प्रविष्ट होने की मूर्खता के लिये अफ़सोस प्रकट करना चाहिये। क्योंकि शरीर-यौवन पर गौरवान्वित होना और जश्न मनाना तो किसी लाश को अलंकृत करने, या शव का श्रृंगार करने जैसा है। अपनी आत्मा की खोज करना, और स्वयं में विलीन हो जाना -- इसीको ज्ञान या अपने सत्य-स्वरुप की पहचान कहते हैं।”
“ एकाकी आत्मा या ‘स्व’ ही जगत् है, 'मैं' और भगवान (ब्रह्म) है! यह सारी कायनात, या जिस वस्तु का भी अस्तित्व है, वह सब किन्तु, उसी ब्रह्म (Supreme-परम) की अभिव्यक्ति है ! "“The Self alone is the world, the ‘I’ and God. All that exists is but the manifestation of the Supreme.”
“ (3H-) वह चेतना…. जो इस भौतिक शरीर में ‘मैं' के रूप में पैदा होती है, ‘मन’ (mind या Head) है। यदि कोई व्यक्ति यह पता लगाने की चेष्टा करे, कि शरीर (body या Hand) के किस स्थान से ‘मैं’-पन का विचार उठता है--तो उसे पहला दृष्टान्त यही मिलेगा कि वह विचार सर्वप्रथम ‘हृदयम्’ या ‘Heart’ से उतपन्न होता है।” 3H - That which arises in the physical body as ’I′ is the mind..(Head) If one enquires whence the ’I′ thought in the body (Hand) arises in the first instance, it will be found that it is from ‘hrdayam’ or the (Heart).”
" जो कुछ भी हम दूसरों को अर्पित करते हैं, वह सब कुछ वास्तव में अपने आप को ही अर्पित करना है; और जिसे केवल इसी सच्चाई का एहसास हो गया हो, वह भला दूसरों को कुछ भी देने से कैसे मना कर सकता है?”
"कर्म-मय जीवन का परित्याग करने की आवश्यकता नही है। यदि आप हर दिन एक या दो घंटे के लिए ध्यान करें तो आप अपने जीवन के कर्तव्यों को आसानी से जारी रख सकते हैं।” “The life of action need not be renounced. If you meditate for an hour or two every day, you can then carry on with your duties.”
“ कोई एक सत्ता अवश्य है, जो इस जगत् को नियंत्रित (governs) करती है, और यह उसकी चौकसी या निगेहबानी है कि वह दुनिया की रखवाली कैसे करती है, या इसे कैसे सँभालती है ? वही सत्ता (माँ जगद्धात्री) इस दुनिया का बोझ उठाती है, न कि तुम उठाते हो ! "
" मन के सात्विक गुणों को विकसित करने का सबसे अनुकूल तरीका, सर्वोत्कृष्ट आचार-नीति है - आहार का नियमन; अर्थात केवल सात्विक आहार- ग्रहण करना, वह भी परिमित मात्रा में।“
“ प्रश्न : मैं जगत् की सहायता करना चाहता हूँ, क्या मैं संसार का मददगार या उपकारी नहीं बन सकता? उत्तर : हाँ ! स्वयं की सहायता करके, आप जगत् की सहायता करते हैं। आपकी स्थिति जगत में इस प्रकार है ---कि आप ही जगत हैं। आप जगत से भिन्न नहीं हैं, और न यह जगत ही आपसे अलग है। “
“ जब आप लक्ष्य तक पहुँच जाते हैं, अर्थात आप ज्ञाता को भी जान लेते हैं, उसके बाद यदि आप लंदन में एक घर में रहते हैं, या आप किसी जंगल के एकांत में रहते हैं, --दोनों के बीच आपको कोई अंतर महसूस नहीं होता। " “When the goal is reached, when you know the knower, there is no difference between living in a house in London and living in the solitude of a jungle.”
“ मानव-जाति का मार्ग-दर्शक नेता, वह है जिसने पूरी तरह से केवल भगवान पर ध्यान किया, और अपने सम्पूर्ण व्यक्तित्व को ब्रह्म-समुद्र में डूबो दिया, तथा उसे तब तक भुलाये रखा है जब तक वह केवल भगवान का एक यंत्र नहीं बन जाता। और अब जब उसका मुंह खुलता है, तो वह बिना अग्रचिंता किये ही भगवान के शब्द बोलता है, और जब वह अपना हाथ उठाता है, तब पुनः भगवान की कृपा ही कोई चमत्कार करने के लिए, उस के माध्यम से बहती है। "
"महर्षि रमण की एक और विशेषता यह है, कि वे जब खाने के लिए बैठते हैं, तो अपना भोजन ग्रहण करने के पूर्व वे दूसरों के बारे में पूछते हैं, और यह देखते हैं, कि वहाँ उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति की सेवा निष्पक्ष होकर की जा रही है, या नहीं ? यदि कोई चावल नहीं लेता हो, तो उसके लिये फल या जो कुछ भी वह पसन्द करता हो, उसे परोसने की व्यवस्था रहती है।”
" आत्मा में एक अद्वितीय शक्ति है - मन, जिसके द्वारा किसी व्यक्ति में विचार प्रकट होते हैं। यदि इस बात का सूक्ष्म परिक्षण किया जाय, कि सभी विचारों के समाप्त हो जाने के बाद क्या बच जाता है ? तो यही पाया जायेगा कि विचार से अलग मन नामक कोई वस्तु है ही नहीं। तोफिर, इससे यही सिद्ध होता है कि विचार खुद ही के मन का निर्माण करता है।"
" मन के स्वभाव के बारे में एक नियमित और निरन्तर अन्वेषण करने से, मन उस वस्तु में रूपान्तरित हो जाता है, जिसे हमलोग ‘मैं’ कहकर उद्धृत करते है, और जो वास्तव में आत्मा ही है।”
" हमारा मन में असंख्य विषय-वासनायें ( इन्द्रिय-भोगों की परितुष्टि देने वाली वस्तुओं के संबंध में मन की सूक्ष्म प्रवृत्तियों), सागर की लहरों की तरह एक के बाद एक करके उठती-गिरती रहती हैं, जिसके कारण मन हमेशा चंचल बना रहता है। तथापि अपने आत्मस्वरूप पर ध्यान करने से या आत्मा पर ध्यान करने से, वे विचार कम होते जाते हैं, और प्रगतिशील अभ्यास के साथ अंत में बिल्कुल नष्ट हो जाते हैं. "
२०-३-२०२३
***
नवगीत
चिरैया!
*
चिरैया!
आ, चहचहा
*
द्वार सूना
टेरता है।
राह तोता
हेरता है।
बाज कपटी
ताक नभ से-
डाल फंदा
घेरता है।
सँभलकर चल
लगा पाए,
ना जमाना
कहकहा।
चिरैया!
आ, चहचहा
*
चिरैया
माँ की निशानी
चिरैया
माँ की कहानी
कह रही
बदले समय में
चिरैया
कर निगहबानी
मनो रमा है
मन हमेशा
याद सिरहाने
तहा
चिरैया!
आ चहचहा
*
तौल री पर
हारना मत।
हौसलों को
मारना मत।
मत ठिठकना,
मत बहकना-
ख्वाब अपने
गाड़ना मत।
ज्योत्सना
सँग महमहा
चिरैया!
आ, चहचहा
***
शारद! अमृत रस बरसा दे।
हैं स्वतंत्र अनुभूति करा दे।।
*
मैं-तू में बँट हम करें, तू तू मैं मैं रोज।
सद्भावों की लाश पर, फूट गिद्ध का भोज।।
है पर-तंत्र स्व-तंत्र बना दे।
शारद! अमृत रस बरसा दे।।
*
अमर शहीदों को भूले हम, कर आपस में जंग।
बिस्मिल-भगत-दत्त आहत हैं, दुर्गा भाभी दंग।।
हैं आजाद प्रतीति करा दे।
शारद! अमृत रस बरसा दे।।
*
प्रजातंत्र में प्रजा पर, हावी होकर तंत्र।
छीन रहा अधिकार नित, भुला फर्ज का मंत्र।।
दीन-हीन को सुखी बना दे।
शारद! अमृत रस बरसा दे।।
*
ज॔गल-पर्वत-सरोवर, पल पल करते नष्ट।
कहते हुआ विकास है, जन प्रतिनिधि हो भ्रष्ट।।
जन गण मन को इष्ट बना दे।
शारद! अमृत रस बरसा दे।।
*
शोक लोक का बढ़ रहा, लोकतंत्र है मूक।
सारमेय दलतंत्र के, रहे लोक पर भूँक।।
दलदल दल का मातु मिटा दे।
शारद! अमृत रस बरसा दे।।
*
'गण' पर 'गन' का निशाना, साधे सत्ता हाय।
जन भाषा है उपेक्षित, पर-भाषा मन भाय।।
मैया! हिंदी हृदय बसा दे।
शारद! अमृत रस बरसा दे।।
*
जन की रोटी छिन रही, तन से घटते वस्त्र।
मन आहत है राम का, सीता है संत्रस्त।।
अस्त नवाशा सूर्य उगा दे।
शारद! अमृत रस बरसा दे।।
*
रोजी-रोटी छीनकर, कोठी तानें सेठ।
अफसर-नेता घूस लें, नित न भर रहा पेट।।
माँ! मँहगाई-टैक्स घटा दे।
शारद! अमृत रस बरसा दे।।
*
जिए आखिरी आदमी, श्रम का पाए दाम।
ऊषा गाए प्रभाती, संध्या लगे ललाम।।
रात दिखाकर स्वप्न सुला दे।
शारद! अमृत रस बरसा दे।।
२०-३-२०२१
***
साथ मोदी के
*
कर्ता करता है सही, मानव जाने सत्य
कोरोना का काय को रोना कर निज कृत्य
कोरो ना मोशाय जी, गुपचुप अपना काम
जो डरता मरता वही, काम छोड़ नाकाम
भीत न किंचित् हों रहें, घर के अंदर शांत
मदद करें सरकार की, तनिक नहीं हों भ्रांत
बिना जरूरत क्रय करें, नहीं अधिक सामान
पढ़ें न भेजें सँदेशे, निराधार नादान
सोमवार को किया था, हम सबने उपवास
शास्त्री जी को मिली थी, उससे ताकत खास
जनता कर्फ्यू लगेगा, शत प्रतिशत इस बार
कोरोना को पराजित, कर देगा यह वार
नमन चिकित्सा जगत को, करें झुकाकर शीश
जान हथेली पर लिए, बचा रहे बन ईश
देश पूरा साथ मिलकर, लड़ रहा है जंग
साथ मोदी के खड़ा है, देश जय बजरंग
१९-३-२०२०
***
बाल कविता:
जल्दी आना ...
*
मैं घर में सब बाहर जाते,
लेकिन जल्दी आना…
*
भैया! शाला में पढ़-लिखना
करना नहीं बहाना.
सीखो नई कहानी जब भी
आकर मुझे सुनाना.
*
दीदी! दे दे पेन-पेन्सिल,
कॉपी वचन निभाना.
सिखला नच्चू , सीखूँगी मैं-
तुझ जैसा है ठाना.
*
पापा! अपनी बाँहों में ले,
झूला तनिक झुलाना.
चुम्मी लूँगी खुश हो, हँसकर-
कंधे बिठा घुमाना.
*
माँ! तेरी गोदी आये बिन,
मुझे न पीना-खाना.
कैयां में ले गा दे लोरी-
निन्नी आज कराना.
*
दादी-दादा हम-तुम साथी,
खेल करेंगे नाना.
नटखट हूँ मैं, देख शरारत-
मंद-मंद मुस्काना.
२०-३-२०१३
***

मंगलवार, 19 मार्च 2024

राष्ट्रीय दिवस, विश्व दिवस

राष्ट्रीय दिवस - विश्व दिवस
जनवरी
०१. नव वर्ष दिवस (१६२२ कैथोलिक चर्च ने २५ मार्च की जगह नया साल १ जनवरी से माना, वैश्विक परिवार दिवस (ग्लोबल फैमिली डे)०३. अंग्रेजी खोजकर्ता हॉवर्ड कार्टर ने किंग्स घाटी, लक्सर, मिस्र में तूतनखामुन की कब्र खोजी।
०४. विश्व ब्रेल दिवस
०९. प्रवासी भारतीय दिवस
१०. विश्व हिन्दी दिवस
११. राष्ट्रीय मानव तस्करी जागरूकता दिवस
१२. जनवरी युवा दिवस
१४. विश्व तर्क दिवस
१५. भारतीय राष्ट्रीय सेना (इंडियन नेशनल आर्मी) दिवस
१७. विश्व धर्म दिवस
२४. राष्ट्रीय बालिका दिवस (गर, चाइल्ड डे), उत्तर प्रदेश दिवस, विंस्टन चर्चिल ब्रिटिश प्रधान मंत्री दिवंगत १९६५, अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा दिवस अफ़्रीकी संस्कृति विश्व दिवस
२५. राष्ट्रीय पर्यटन दिवस, राष्ट्रीय मतदाता दिवस
२६. गणतंत्र दिवस भारत
२७. अंतर्राष्ट्रीय प्रलय दिवस
३०. सर्वोदय दिवस, म. गाँधी शहीद १९४८, विश्व कुष्ठ उन्मूलन दिवस


फ़रवरी
०१. विश्व अंतर्धार्मिक सद्भाव सप्ताह
०२. विश्व आर्द्र भूमि दिवस
०४. विश्व कैंसर जागृति दिवस , फेसबुक दिवस, विश्व कैंसर दिवस, अंतर्राष्ट्रीय मानव बंधुत्व दिवस
०६. अंतर्राष्ट्रीय महिला जननांग विकृति शून्य सहनशक्ति दिवस
१०. विश्व दलहन दिवस
११. अंतर्राष्ट्रीय दिवस (विज्ञान में महिलाओं और लड़कियों के लिए)
१३. फरवरी राष्ट्रीय महिला दिवस, विश्व रेडियो दिवस
१४ वैलेंटाइन डे
२०. सामाजिक न्याय का विश्व दिवस
२१. अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस
२३. विश्व शांति और समझ दिवस
२४. सेंट्रल एक्साइज़ डे
२८. राष्ट्रीय विज्ञान दिवस


मार्च
०१. शून्य भेदभाव दिवस
०३. राष्ट्रीय रक्षा दिवस, विश्व वन्यजीव दिवस
०४. राष्ट्रीय सुरक्षा दिवस, यौन शोषण निषेध विश्व दिवस, विश्व इंजीनियरिंग विकास दिवस
०८. अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस
दूसरा सोमवार राष्ट्रमंडल दिवस,
१०. अंतर्राष्ट्रीय महिला न्यायाधीश दिवस
१४. अंतर्राष्ट्रीय गणित दिवस, अंतर्राष्ट्रीय नदी कार्यवाही दिवस
१५. विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस
१६. राष्ट्रीय टीकाकरण दिवस
१७. संत पैट्रिक दिवस
१८. राष्ट्रीय आयुध कारखाना दिवस, विश्व पुन: उपयोग (रिसायकलिंग) दिवस
२०. अंतर्राष्ट्रीय प्रसन्नता दिवस, अंतर्राष्ट्रीय फ़्रैंकोफ़ोनी दिवस, फ्रेंच भाषा दिवस, विश्व गौरैया दिवस
२१. अंतर्राष्ट्रीय नस्लीय भेदभाव उन्मूलन दिवस, विश्व कविता दिवस, विश्व नवरोज (Nowruz) दिवस, विश्व डाउन सिंड्रोम (Down Syndrome) दिवस, अंतर्राष्ट्रीय vn दिवस
२२. विश्व जल दिवस
२३. विश्व मौसम विज्ञान दिवस
२४. विश्व क्षय रोग दिवस, अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकार दिवस
२५. अंतर्राष्ट्रीय दासता और ट्रान्साटलांटिक (Transatlantic) दास व्यापार पीड़ित के स्मरण दिवस, अंतर्राष्ट्रीय हिरासती व लापता स्टाफ एकजुटता दिवस


अप्रैल
०१. मूर्ख बनाओ (अप्रैल फूल दिवस), उड़ीसा दिवस
०२. विश्व आत्मकेंद्रित जागरूकता दिवस
०४. अंतर्राष्ट्रीय खान जागरूकता सहायता दिवस
०५. राष्ट्रीय समुद्री दिवस, अंतर्राष्‍ट्रीय अंतरात्मा दिवस
०६. अंतर्राष्ट्रीय विकास और शांति के लिए खेल दिवस
०७. विश्व स्वास्थ्य दिवस, अंतर्राष्ट्रीय तुत्सी नरसंहार (रवांडा १९९४) विरोध दिवस
१२. अंतर्राष्ट्रीय मानव अंतरिक्ष उड़ान दिवस
१३. नरसंहार दिवस
१४. स्मरण दिवस, विश्व चगास रोग दिवस
१५. विश्व कला दिवस
१७. विश्व हीमोफीलिया दिवस
१८. विश्व विरासत दिवस
२०. चीनी भाषा दिवस
२१. विश्व रचनात्मकता और नवाचार दिवस, राष्ट्रीय सिक्योरिटीज दिवस, राष्ट्रीय सिविल सेवा दिवस
२२. अंतर्राष्ट्रीय मातृ दिवस, पृथ्वी दिवस
२३. विश्व पुस्तक-कॉपीराइट दिवस, अंग्रेजी भाषा दिवस, स्पेनिश भाषा दिवस, अंतर्राष्ट्रीय कन्या आईसीटी दिवस
२४. अंतर्राष्ट्रीय शांति हेतु बहुपक्षवाद और कूटनीति दिवस
२५. अंतर्राष्ट्रीय प्रतिनिधि दिवस, विश्व मलेरिया दिवस
२६. अंतर्राष्ट्रीय चेरनोबिल (Chernobyl) आपदा स्मरण दिवस, विश्व बौद्धिक संपदा दिवस
२८. विश्व कार्यस्थल सुरक्षा- स्वास्थ्य दिवस
३०. अप्रैल अंतर्राष्ट्रीय जैज़ (Jazz) दिवस, राष्ट्रीय माहजोंग (चीनी खेल) दिवस


मई
०१. श्रमिक दिवस, महाराष्ट्र स्थापना दिवस
०२. विश्व टूना (Tuna) दिवस
०३. विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस
०५. विश्व अस्थमा दिवस,अफ्रीकी विश्व विरासत दिवस, विश्व पुर्तगाली भाषा दिवस
०८. विश्व रेड क्रॉस दिवस, विश्व प्रवासी पक्षी दिवस, द्वितीय विश्व युद्ध शहीद दिवस
१०. अंतर्राष्ट्रीय अरगनिया दिवस
११. राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस
दूसरा रविवार मातृ दिवस
१५.अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस, अंतर्राष्ट्रीय खगोल विज्ञान दिवस
१६. अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस, अंतर्राष्ट्रीय प्रकाश दिवस
१७. विश्व दूरसंचार और सूचना समाज दिवस
१८. अंतर्राष्ट्रीय संग्रहालय दिवस
२०. विश्व मधुमक्खी दिवस, विश्व मेट्रोलॉजी दिवस
२१. अंतर्राष्ट्रीय चाय दिवस, आतंकवाद निषेध दिवस, राष्ट्रीय सांस्कृतिक विकास दिवस, विश्व सांस्कृतिक विविधता संवाद विकास दिवस
२२. अंतर्राष्ट्रीय जैविक विविधता दिवस
२३. अंतर्राष्ट्रीय ऑब्सटेट्रिक फिस्ट्यूला (Obstetric Fistula) मुक्ति दिवस
२४. राष्ट्रमंडल दिवस
२८. अंतर्राष्ट्रीय महिला स्वास्थ्य दिवस
२९. अंतर्राष्ट्रीय संयुक्त राष्ट्र शांतिकर्ता दिवस
३१. विश्व तंबाकू निषेध दिवस


जून
०१. वैश्विक माता-पिता दिवस
०३. विश्व साइकिल दिवस
०४. अंतर्राष्ट्रीय आक्रामकता-पीड़ित बाल दिवस
०५. विश्व पर्यावरण दिवस, अंतर्राष्ट्रीय मत्स्य सुरक्षा दिवस
५-१६ विश्व पर्यावरण दिवस
०६. रूसी भाषा दिवस
०७. विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस
०८. विश्व महासागर दिवस
१२. विश्व बालश्रम निषेध दिवस
१३. अंतर्राष्ट्रीय जागरूकता (albinism) दिवस
१४. विश्व रक्तदाता दिवस
तीसरा रविवार पिता दिवस
१५. विश्व दुर्व्यवहार निषेध जागरूकता दिवस
१६. अंतर्राष्ट्रीय पारिवारिक प्रेषण दिवस
१७. विश्व मरुस्थलीकरण-सुख निवारण दिवस
१८. गैस्ट्रोनोमी दिवस
१९. अंतर्राष्ट्रीय यौन हिंसा समापन दिवस, विश्व सिकल सेल डे
२०. विश्व शरणार्थी दिवस
२१. अंतराष्ट्रीय योग दिवस, विश्व संगीत दिवस, अंतर्राष्ट्रीय उच्चतम शिखर दिवस
२२. राष्ट्रीय चुंबन दिवस
२३. अंतराष्ट्रीय ओलंपिक दिवस, संयुक्त राष्ट्र लोक सेवा दिवस, अंतर्राष्ट्रीय विधवा दिवस,
२५. सीफ़र दिवस
२६. अंतर्राष्ट्रीय नशीली दवा दुरुपयोग-तस्करी निवारण दिवस, अंतर्राष्ट्रीय अत्याचार पीड़ित समर्थन दिवस
२७. लघु-मध्यम उद्यम दिवस
२९. अंतर्राष्ट्रीय ट्रोपिक्स दिवस
३० अंतर्राष्ट्रीय क्षुद्रग्रह दिवस, अंतर्राष्ट्रीय संसदीय दिवस




जुलाई
०१. राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस, कनाडा दिवस
०२. विश्व खेल पत्रकार दिवस, विश्व यूएफओ दिवस, राष्ट्रीय एनीसेट (सौंफ स्वाद वाली सुरा) दिवस
०३. अंतर्राष्ट्रीय सहकारी समिति दिवस, अंतरराष्ट्रीय प्लास्टिक थैले मुक्ति दिवस
०४. संयुक्त राज्य अमेरिका स्वतंत्रता दिवस
०६. विश्व ज़ूनोस (पशु जन्य रोग) दिवस, अंतर्राष्ट्रीय चुंबन दिवस
०७. विश्व चॉकलेट दिवस, विश्व क्षमा दिवस
१०. राष्ट्रीय मछली किसान दिवस
११. विश्व जनसंख्या दिवस
१२. पेपर बैग डे
१४. बैस्टिल दिवस, फ्रांस दिवस
१५. विश्व युवा कौशल दिवस
१७. विश्व न्याय दिवस, विश्व इमोजी (Emoji/लघु डिजिटल छवि) दिवस
१८. नेल्सन मंडेला दिवस
२०. विश्व शतरंज दिवस
२३. राष्ट्रीय प्रसारण दिवस
२४. राष्ट्रीय थर्मल इंजीनियर दिवस
२५. राष्ट्रीय अभिभावक दिवस, विश्व डूबने से बचाव दिवस
२६. कारगिल विजय दिवस, विश्व मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र संरक्षण दिवस
२८. विश्व हेपेटाइटिस दिवस, विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस
२९. अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस
३०. अंतर्राष्ट्रीय मित्रता दिवस, विश्व मानव तस्करी के विरोध दिवस
३१. विश्व रेंजर दिवस, ३१. प्रेमचंद जयंती १८८०. कार्टूनिस्ट के. शंकर पिल्लई जन्म १९०२, अलेन ऑकटोविअन ह्यूम निधन १९१२, मो. रफी निधन १९८०


अगस्त
०१. राष्ट्रीय पर्वतारोहण दिवस, विश्व माहजोंग दिवस, वर्ल्ड वाइड वेब दिवस, विश्व फेफड़े का कैंसर दिवस, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक दाता जागरूकता दिवस
पहला रविवार मित्रता दिवस (फ्रेंडशिप डे)
०१-०७. विश्व स्तनपान सप्ताह
०३. नाइजर स्वतंत्रता दिवस
०४. तटरक्षक दिवस
०६. हिरोशिमा दिवस, परमाणु दिवस, अंतर्राष्ट्रीय बीयर दिवस
०७. राष्ट्रीय हथकरघा दिवस
०८. भारत छोड़ो आंदोलन दिवस, अंतर्राष्ट्रीय अनंत दिवस (Infinity Day), अंतर्राष्ट्रीय बिल्ली दिवस
०९. विश्व आदिवासी दिवस, अंतर्राष्ट्रीय सहकर्मी दिवस
१०. विश्व शेर दिवस
११. राष्ट्रीय पुत्र और पुत्री दिवस
१२. अंतराष्ट्रीय युवा दिवस, विश्व हाथी दिवस
१३. अंतर्राष्ट्रीय लेफ्ट हैंडर्स दिवस, विश्व अंगदान दिवस
१४. पाकिस्तान दिवस
१५. भारत स्वतंत्रता दिवस
१६. बेनिंगटन युद्ध दिवस
१७. इंडोनेशियाई स्वतंत्रता दिवस
१८. कभी हार न मानने का दिन
१९. विश्व मानवतावादी दिवस, विश्व फोटोग्राफी दिवस,अंतर्राष्ट्रीय ओरंगुटान दिवस, अंतर्राष्ट्रीय धनुष दिवस
२०. सद्भावना दिवस, अक्षय ऊर्जा दिवस, विश्व मच्छर दिवस
२१. अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद-पीड़ित स्मरण दिवस, विश्व वरिष्ठ नागरिक दिवस
२२. अंतर्राष्ट्रीय धर्म हिंसा पीड़ित स्मृति दिवस
२३. अंतर्राष्ट्रीय दास व्यापार उन्मूलन दिवस, Black Ribbon Day
२४. अंतर्राष्ट्रीय अजीब संगीत दिवस
२६. संस्कृत दिवस, महिला समानता दिवस, अंतर्राष्ट्रीय श्वान दिवस
२९. राष्ट्रीय खेल दिवस, अंतर्राष्ट्रीय परमाणु परीक्षण विरोध दिवस
३०. लघु उद्योग दिवस, अंतर्राष्ट्रीय लापता व्यक्ति दिवस, अंतर्राष्ट्रीय व्हेल शार्क दिवस
३१. मलेशिया राष्ट्रीय दिवस, अंतर्राष्ट्रीय अफ्रीकी दिवस, अंतर्राष्ट्रीय ओवरडोज जागरूकता दिवस

सितम्बर
१. - ७. राष्ट्रीय पोषण सप्ताह
०२. विश्व नारियल दिवस
०३. राष्ट्रीय गगनचुंबी इमारत दिवस
०४. विश्व दाढ़ी दिवस
०५. शिक्षक दिवस, अंतर्राष्ट्रीय कल्याण निधि (चैरिटी) दिवस
०७. ब्राजीलियाई स्वतंत्रता दिवस, अंतर्राष्ट्रीय स्वच्छ हवा दिवस
०८. अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस, विश्व भौतिक चिकित्सा दिवस
०९. अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा संरक्षण दिवस
१०. विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस
११. राष्ट्रीय वन शहीद दिवस,विश्व प्राथमिक चिकित्सा दिवस
१२. दक्षिण-दक्षिण सहयोग संयुक्त राष्ट्र दिवस
१४. हिंदी दिवस
१५. इंजीनियर दिवस, विश्व लिंफोमा जागरूकता दिवस
१६. अंतर्राष्ट्रीय ओजोन परत संरक्षण दिवस, मलेशिया दिवस
१७. सेवा दिवस, विश्व रोगी सुरक्षा दिवस
१८. अंतर्राष्ट्रीय समान वेतन दिवस, विश्व बांस दिवस, अंतर्राष्ट्रीय लाल पांडा दिवस
१९. अंतर्राष्ट्रीय समुद्री डाकू समापन वार्ता दिवस
२०. अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय खेल दिवस
२१. अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस,विश्व अल्जाइमर दिवस, विश्व जीवमंडल दिवस
२२. विश्व गैंडा (Rhino) दिवस, विश्व गुलाब दिवस, कर-मुक्त दिन
२३. अंतर्राष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस
२५. राष्ट्रीय बेटी दिवस, विश्व फार्मासिस्ट दिवस, अंतर्राष्ट्रीय परमाणु हथियार उन्मूलन दिवस, यूरोपीय भाषा दिवस, विश्व गर्भनिरोधक दिवस, विश्व पर्यावरण स्वास्थ्य दिवस
२६. वैज्ञानिक-औद्योगिक अनुसंधान परिषद दिवस
२७. विश्व पर्यटन दिवस
२८. गनर्स डे, विश्व रेबीज दिवस, अंतर्राष्ट्रीय सार्वभौमिक सूचना पहुँच दिवस, अंतर्राष्ट्रीय पोक (Poke) दिवस
२९. विश्व हृदय दिवस, अंतर्राष्ट्रीय खाद्य हानि-अपव्यय जागरूकता दिवस
३०. विश्व समुद्री दिवस, अंतर्राष्ट्रीय अनुवाद दिवस, अंतर्राष्ट्रीय ईश-निंदा(Blasphemy) अधिकार दिवस


अक्टूबर
०१. अंतराष्ट्रीय वृद्ध दिवस, विश्व मुस्कान दिवस, विश्व पोस्टकार्ड दिवस, अंतर्राष्ट्रीय कॉफी दिवस, विश्व शाकाहारी दिवस
०२. अन्तराष्ट्रीय शांति दिवस, अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस, गांधी जयंती, विश्व कृषि-पशु दिवस
०३. जर्मन एकता दिवस
०४. विश्व वास्तुकला दिवस, विश्व पशु दिवस, विश्व पर्यावास दिवस
०४-१० विश्व अंतरिक्ष सप्ताह
०५. विश्व शिक्षक दिवस, गंगा नदी डॉल्फिन दिवस
०६. जर्मन-अमेरिकी दिवस
०७. विश्व कपास दिवस
०८. भारतीय वायु सेना दिवस, विश्व अंडा दिवस
०९. भारतीय विदेश सेवा दिवस, विश्व डाक दिवस, विश्व प्रवासी पक्षी दिवस
१०. विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस, विश्व मरत्यु दंड विरोध दिवस
११. विश्व बालिका दिवस
१२. विश्व गठिया दिवस
१३. अंतर्राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण दिवस
१४. विश्व दृष्टि दिवस, विश्व मानक दिवस
१५. अंतर्राष्ट्रीय ग्रामीण महिला दिवस, विश्व गर्भावस्था-शिशु हानि दिवस, विश्व हस्त प्रक्षालन दिवस, सफेद बेंत सुरक्षा दिवस, विश्व विद्यार्थी दिवस
१६. विश्व खाद्य दिवस, विश्व संज्ञाहरण दिवस, विश्व रीढ़ दिवस
१७. अंतर्राष्ट्रीय गरीबी उन्मूलन दिवस
२०. राष्ट्रीय एकता दिवस, विश्व सांख्यिकी दिवस,विश्व ऑस्टियोपोरोसिस (Osteoporosis) दिवस, अंतर्राष्ट्रीय हवाई यातायात नियंत्रक दिवस, अंतर्राष्ट्रीय रसोइया दिवस
२१. पुलिस स्मृति दिवस
२२. अंतर्राष्ट्रीय हकलाना जागरूकता दिवस
२३. तिल दिवस, अंतर्राष्ट्रीय हिम तेंदुआ दिवस
२४. भारत-तिब्बत सीमा पुलिस स्थापना दिवस, संयुक्त राष्ट्र दिवस, विश्व सूचना विकास दिवस,विश्व पोलियो दिवस
२५. विश्व सास (Mother-in-Law) दिवस
२७. पैदल सेना दिवस, श्रव्य-दृश्य विरासत के लिए विश्व दिवस
२८. अंतर्राष्ट्रीय एनिमेशन दिवस
२९. अंतर्राष्ट्रीय इंटरनेट दिवस
३०. विश्व बचत दिवस
३१. राष्ट्रीय एकता दिवस, हेलोवीन दिवस, विश्व शहर दिवस


नवम्बर
०२. राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस, अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार दण्ड-मुक्ति दिवस
०५. विश्व सुनामी जागरूकता दिवस, विश्व रोमानी भाषा दिवस
०६. अंतर्राष्ट्रीय युद्ध में पर्यावरण शोषण निषेध दिवस
१०. राष्ट्रीय टीकाकरण दिवस, विश्व शांति-विकास-विज्ञान दिवस, विश्व टीकाकरण दिवस
१३. विश्व दया (Kindness) दिवस
१४. बाल दिवस (जवाहर लाल नेहरू दिवस १८८९), अंतरराष्ट्रीय मधुमेह दिवस, अंतर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक संपत्ति तस्करी विरोधी दिवस
१५. विश्व सड़क यातायात दिवंगत स्मरण दिवस
१६. अंतरराष्ट्रीय सहिष्णुता दिवस
१७. अंतर्राष्ट्रीय छात्र दिवस, राष्ट्रीय मिर्गी दिवस
१८. इस्लामी कला का अंतर्राष्ट्रीय दिवस
१९. विश्व शौचालय दिवस, विश्व दर्शन दिवस, अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस
२०. अफ्रीका औद्योगीकरण दिवस, विश्व बाल दिवस, ट्रांसजेंडर स्मरण दिवस, विश्व मत्स्य दिवस
२१. विश्व टेलीविजन दिवस
२५. राष्ट्रीय शोक दिवस, अंतर्राष्ट्रीय महिला-हिंसा उन्मूलन दिवस
२६. विश्व जैतून पेड़ दिवस
२९. अंतर्राष्ट्रीय फ़िलिस्तीनी एकजुटता दिवस
३०. राष्ट्रीय ध्वज दिवस, रासायनिक युद्ध के सभी पीड़ितों के लिए स्मरण दिवस


दिसम्बर
०१. विश्व एड्स दिवस
०२. अंतर्राष्ट्रीय दासता उन्मूलन दिवस
०३. अंतर्राष्ट्रीय विकलांग दिवस
०४. अंतर्राष्ट्रीय बैंक दिवस
०५. अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक-सामाजिक विकास स्वयंसेवी दिवस, विश्व मृदा (Soil) दिवस
०७. अंतर्राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन दिवस
०९. अंतरराष्ट्रीय भ्रष्टाचार विरोधी दिवस, अंतर्राष्ट्रीय नरसंहार रोकथाम दिवस
१०. विश्व मानव अधिकार दिवस, अंतर्राष्ट्रीय पशु अधिकार दिवस
११. अंतर्राष्ट्रीय पर्वत दिवस
११. यूनिसेफ़ डे, अंतर्राष्ट्रीय तटस्थता दिवस,अंतर्राष्ट्रीय सार्वभौमिक स्वास्थ्य दिवस
१६. विजय दिवस
१८. राष्ट्रीय अल्पसंख्यक अधिकार दिवस, अंतर्राष्ट्रीय प्रवासी दिवस, विश्व अरबी भाषा दिवस
१९. गोवा मुक्ति दिवस
२०. अंतर्राष्ट्रीय मानव एकता दिवस
२३. भारतीय किसान दिवस
२५. सुशासन दिवस, सामाजिक न्याय दिवस, क्रिसमस डे
२७. अंतर्राष्ट्रीय महामारी निवारण दिवस
३१. राष्ट्रीय एकता दिवस


टीप- छूटे हुए दिवसों की जानकारी दीजिए।