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मंगलवार, 12 मार्च 2024

मार्च १२, भव छंद, कुण्डलिया, नवगीत, सवैया, शिव, लीलावती, नीरा आर्य, युगतुलसी, सॉनेट

सलिल सृजन १२ मार्च
*
स्मरण युग तुलसी
मुक्तक 
युगतुलसी के ग्रंथ पढ़ें नित।  
रामभक्ति के सूत्र गुनें नित॥ 
भवसागर से मुक्ति मिलेगी-
रखें भरोसा स्वप्न बुनें नित॥ 
*
रामभक्ति मंदाकिनी पावन। 
रूप राम जी का मनभावन॥    
युगतुलसी का हाथ पकड़ बढ़-
राम नाम जप पाप नसावन॥ 
*
हनुमत कृपा मिलेगी उसको।
सिया-राम रुचते हैं जिसको॥ 
अगर न किंकर-धर्म सुहाता-
जन्म-जन्म भव सागर भटको॥ 
*
किंकर का किंकर बन जा मन। 
सिया-राम जी के गुन गा मन॥
हनुमत चरण न छोड़ रख हृदय-
भक्ति-भाव रस में सन जा मन॥ 
*
रामायणम् सुपावन आश्रम। 
राम-नाम गुंजित हो हर दम॥ 
मूर्ति मनोहर किंकर जी की- 
कार दर्शन मिट जाते दुख-गम॥     
***
सॉनेट
नटखट
*
नटखट चंचल पवन छेड़ता,
आँचल उड़ा-उड़ा मुस्काता,
भँवरा गुन-गुन गीत सुनाता,
ज़ुल्फ़ों से हँस खेल खेलता।
तिरस्कार रह मौन झेलता,
कली-कली पर जान लुटाता,
रंग देख जग दूर भगाता,
मन बेदाग न कोई देखता।
नटखट भ्रमर न धर्म छोड़ता,
सुंदरता की करता पूजा,
जिसको जो कहना हो कह ले।
नटखट पवन न हृदय तोड़ता,
मंदिर मन समान नहिं दूजा,
प्रेम भाव से इसमें रह ले।
१२.३.२०२४
***

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सोरठा सलिला
*
मन के अंदर झाँक, सुन्दरतम है ह्रदय में।
नहीं रूप को ताक, मिट्टी मिट्टी में मिले।।
*
गेह गेह का नाथ, है केवल विश्वास तक।
देह देह के साथ, रहती केवल श्वास तक।।
*
करने रास का पान, भँवरा झूमे कली पर।
कली न छोड़े आन, नहीं शाख को छोड़ती।।
*
नहीं गुलामी नाम, अनुशासन को दीजिए।
आजादी का काम, उच्छंखलता करती नहीं।।
*
चरणबद्ध हो कार्य, हो विकास केवल तभी।
मनमानी स्वीकार्य, उन्नति को होती नहीं।।
*
ग्यारह होते रूद्र, त्रयोदिशी तिथि तेरहीं।
पीकर शोक समुद्र, शिव भज अमृत पाइए।।
*
नेह नर्मदा स्नान, सलिल पान कर मौन हो।
करिए तट पर ध्यान, नाद अनहद भी सुनें।।
१२-३-२०२३
***
अमर शहीद नीरा आर्य
एक थीं श्रीमती नीरा आर्य ( ०५-०३-१९०२ / २६-०७-१९९८) - नेताजी सुभाषचंद्र बोस की रक्षा के लिए इस बहादुर महिला का "स्तन" तक काट दिया गया। नीरा आर्य ने श्रीकांत जोइरोंजोन दास से शादी की, जो ब्रिटिश पुलिस में एक सीआईडी ​​इंस्पेक्टर थे।
नीरा आर्य एक सच्ची राष्ट्रवादी थीं, उनके पति एक सच्चे ब्रिटिश नौकर थे। देशभक्त होने के नाते नीरा सुभाषचंद्र बोस के नेतृत्व वाली भारतीय राष्ट्रीय सेना की झांसी रेजिमेंट में शामिल हुईं। नीरा आर्य के पति इंस्पेक्टर श्रीकांत जोइरोंजोन दास सुभाषचंद्र बोस की जासूसी कर रहे थे और जोइरोंजोन दास ने एक बार सुभाषचंद बोस पर गोलियाँ चला दीं लेकिन सौभाग्य से सुभाष चंद जी बाल-बाल बच गए। सुभाष चंद बोस को बचाने के लिए नीरा आर्य ने अपने पति की चाकू मार कर हत्या कर दी थी।
I.N.A के आत्म समर्पण के बाद लाल किले में फ़ौज के सैनिकों पर एक मुकदमा नवंबर-१९४५ से मई-१९४६ तक चला। नीरा आर्य को छोड़कर सभी कैदियों को रिहा कर दिया गया । वहीं उसे सेलूर जेल, अंडमान ले जाया गया, जहाँ उसे हर दिन प्रताड़ित किया जाता था। एक लोहार लोहे की जंजीरें और बेड़ियाँ हटाने आया। उसने जान बूझकर बेड़ियाँ हटाने के बहाने उनकी त्वचा का थोड़ा सा हिस्सा भी काट दिया और उनके पैरों को हथौड़े से कई बार जानबूझ चोट पहुँचाई। नीरा आर्य ने असहनीय दर्द को असाधारण धैर्य रखकर सहा। जेलर, जो इस पर पीड़ा का आनंद ले रहा था, जेलर ने नीरा को रिहा करने की पेशकश इस शर्त के साथ की कि वह सुभाष चंद बोस के ठिकाने का भेद बता दें। नीरा आर्य ने जवाब दिया कि बोस की मृत्यु एक विमान दुर्घटना में हुई थी और पूरी दुनिया इसके बारे में जानती है।
जेलर ने विश्वास करने से इनकार कर दिया और जवाब दिया, तुम झूठ बोल रही हो, सुभाष चंद बोस अभी भी जीवित हैं। तब नीरा आर्य ने कहा "हाँ, वो ज़िंदा हैं, वो मेरे दिल में रहते हैं ! जेलर ने गुस्से में आकर कहा, "फिर हम सुभाष चंद बोस को तुम्हारे दिल से निकाल देंगे" जेलर ने उनको गलत तरीके से छुआ और कपड़ों को फाड़ दिया। कपड़े अलग किए और लोहार को उनके स्तन काटने का आदेश दिया। लोहार ने तुरंत ब्रेस्ट रिपर लिया और उसके दाहिने शरीर को कुचलने लगा। बर्बरता यहीं नहीं रुकी, जेलर ने उनकी गर्दन पकड़ ली और कहा कि मैं आपके दोनों 'हिस्सों" को उनके स्थान से अलग कर दूँगा।
उन्होंने आगे बर्बर मुस्कान के साथ कहा गनीमत है "ये ब्रेस्ट रिपर गर्म नहीं हुआ है वरना आपके ब्रेस्ट पहले ही कट चुके होते"। नीरा आर्य ने अपने जीवन के अंतिम दिन फूल बेचने में बिताए और वह फलकनुमा, भाग्य नगरम में एक छोटी सी झोपड़ी में रहती थीं। सरकार ने उनकी झोपड़ी को सरकारी जमीन पर बनाने का आरोप लगाते हुए गिरा दिया।
नीरा आर्य की मृत्यु २६-०७- १९९८ को एक बेसहारा, लावारिस, अनजानी के रूप में हुई, जिसके लिए पूरी पृथ्वी पर कोई रोने वाला तक नहीं था।
***
लीलावती
गणितज्ञ लीलावती का नाम हममें से अधिकांश लोगों ने नहीं सुना है। उनके बारे में कहा जाता है कि वो पेड़ के पत्ते तक गिन लेती थी। आज यूरोप सहित विश्व के सैंकड़ो देश जिस गणित की पुस्तक से गणित को पढ़ा रहे हैं, उसकी रचयिता भारत की एक महान गणितज्ञ महर्षि भास्कराचार्य की पुत्री “लीलावती” है।
दसवीं सदी की बात है, दक्षिण भारत में भास्कराचार्य नामक गणित और ज्योतिष विद्या के एक बहुत बड़े पंडित थे। उनकी कन्या का नाम लीलावती था। वही उनकी एकमात्र संतान थी। उन्होंने ज्यो‍तिष की गणना से जान लिया कि वह विवाह के थोड़े दिनों के ही बाद विधवा हो जाएगी। उन्होंने बहुत कुछ सोचने के बाद ऐसा लग्न खोज निकाला, जिसमें विवाह होने पर कन्या विधवा न हो। विवाह की तिथि निश्चित हो गई। जलघड़ी से ही समय देखने का काम लिया जाता था।
एक बड़े कटोरे में छोटा-सा छेद कर पानी के घड़े में छोड़ दिया जाता था। सूराख के पानी से जब कटोरा भर जाता और पानी में डूब जाता था, तब एक घड़ी होती थी। कहते हैं अपने मन कुछ और है, कर्ता के कुछ और, होनी होकर ही रहती है। लीलावती सोलह श्रृंगार किए सजकर बैठी थी, सब लोग उस शुभ लग्न की प्रतीक्षा कर रहे थे कि एक मोती लीलावती के आभूषण से टूटकर कटोरे में गिर पड़ा और सूराख बंद हो गया; शुभ लग्न बीत गया और किसी को पता तक न चला।
विवाह दूसरे लग्न पर ही करना पड़ा। लीलावती विधवा हो गई, पिता और पुत्री के धैर्य का बांध टूट गया। लीलावती अपने पिता के घर में ही रहने लगी। पुत्री का वैधव्य-दु:ख दूर करने के लिए भास्कराचार्य ने उसे गणित पढ़ाना आरंभ किया। उसने भी गणित के अध्ययन में ही शेष जीवन की उपयोगिता समझी। थोड़े ही दिनों में वह उक्त विषय में पूर्ण पंडिता हो गई। पाटी-गणित, बीजगणित और ज्योतिष विषय का एक ग्रंथ ‘सिद्धांतशिरोमणि’ भास्कराचार्य ने बनाया है। इसमें गणित का अधिकांश भाग लीलावती की रचना है।
पाटीगणित के अंश का नाम ही भास्कराचार्य ने अपनी कन्या को अमर कर देने के लिए ‘लीलावती’ रखा है। भास्कराचार्य ने अपनी बेटी लीलावती को गणित सिखाने के लिए गणित के ऐसे सूत्र निकाले थे जो काव्य में होते थे। वे सूत्र कंठस्थ करना होते थे। उसके बाद उन सूत्रों का उपयोग करके गणित के प्रश्न हल करवाए जाते थे। कंठस्थ करने के पहले भास्कराचार्य लीलावती को सरल भाषा में, धीरे-धीरे समझा देते थे। वे बच्ची को प्यार से संबोधित करते चलते थे, “हिरन जैसे नयनों वाली प्यारी बिटिया लीलावती, ये जो सूत्र हैं…।” बेटी को पढ़ाने की इसी शैली का उपयोग करके भास्कराचार्य ने गणित का एक महान ग्रंथ लिखा, उस ग्रंथ का नाम ही उन्होंने “लीलावती” रख दिया।
आजकल गणित एक शुष्क विषय माना जाता है पर भास्कराचार्य का ग्रंथ ‘लीलावती‘ गणित को भी आनंद के साथ मनोरंजन, जिज्ञासा आदि का सम्मिश्रण करते हुए कैसे पढ़ाया जा सकता है। लीलावती का एक उदाहरण देखें- ‘निर्मल कमलों के एक समूह के तृतीयांश, पंचमांश तथा षष्ठमांश से क्रमश: शिव, विष्णु और सूर्य की पूजा की, चतुर्थांश से पार्वती की और शेष छ: कमलों से गुरु चरणों की पूजा की गई।
अये, बाले लीलावती, शीघ्र बता कि उस कमल समूह में कुल कितने फूल थे..?‘
उत्तर-कमल के १२० फूल।
वर्ग और घन को समझाते हुए भास्कराचार्य कहते हैं ‘अये बाले,लीलावती, वर्गाकार क्षेत्र और उसका क्षेत्रफल वर्ग कहलाता है। दो समान संख्याओं का गुणन भी वर्ग कहलाता है। इसी प्रकार तीन समान संख्याओं का गुणनफल घन है और बारह कोष्ठों और समान भुजाओं वाला ठोस भी घन है।‘
‘मूल” शब्द संस्कृत में पेड़ या पौधे की जड़ के अर्थ में या व्यापक रूप में किसी वस्तु के कारण, उद्गम अर्थ में प्रयुक्त होता है। इसलिए प्राचीन गणित में वर्ग मूल का अर्थ था ‘वर्ग का कारण या उद्गम अर्थात् वर्ग एक भुजा‘।
इसी प्रकार घनमूल का अर्थ भी समझा जा सकता है। वर्ग तथा घनमूल निकालने की अनेक विधियां प्रचलित थीं।
लीलावती के प्रश्नों का जबाब देने के क्रम में ही “सिद्धान्त शिरोमणि” नामक एक विशाल ग्रन्थ लिखा गया, जिसके चार भाग हैं- (१) लीलावती (२) बीजगणित (३) ग्रह गणिताध्याय और (४) गोलाध्याय।
‘लीलावती’ में बड़े ही सरल और काव्यात्मक तरीके से गणित और खगोल शास्त्र के सूत्रों को समझाया गया है।
बादशाह अकबर के दरबार के विद्वान फैजी ने सन् १५६७ में “लीलावती” का फारसी भाषा में अनुवाद किया। अंग्रेजी में “लीलावती” का पहला अनुवाद जे. वेलर ने सन् १७१६ में किया। कुछ समय पहले तक भी भारत में कई शिक्षक गणित को दोहों में पढ़ाते थे। जैसे कि पन्द्रह का पहाड़ा…तिया पैंतालीस, चौके साठ, छक्के नब्बे… अट्ठ बीसा, नौ पैंतीसा…।
इसी तरह कैलेंडर याद करवाने का तरीका भी पद्यमय सूत्र में था-
सित अप जू नव तीस के, बाकी के इकतीस।
अट्ठाइस की फरवरी चौथे सन उनतीस।।
गणित अपने पिता से सीखने के बाद लीलावती भी एक महान गणितज्ञ एवं खगोल शास्त्री के रूप में जानी गयी। मनुष्य के मरने पर उसकी कीर्ति ही रह जाती है। आज गणितज्ञो को गणित के प्रचार और प्रसार के क्षेत्र में "लीलावती पुरूस्कार" से सम्मानित किया जाता है।
***
शिव पूजन
शिवलिंग पर बेलपत्र, धतूरा, चंदन और अक्षत चढ़ाने से शंकर भगवान जल्दी प्रसन्न होते हैं।शिव पुराण के अनुसार किस द्रव्य से अभिषेक करने से क्या फल मिलता है? जानिए-
जल से रुद्राभिषेक करने पर वृष्टि होती है।
- कुशा जल से अभिषेक करने पर रोग व दु:ख से छुटकारा मिलता है।
- दही से अभिषेक करने पर पशु, भवन तथा वाहन की प्राप्ति होती है।
- गन्ने के रस से अभिषेक करने पर लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।
- मधुयुक्त जल से अभिषेक करने पर धनवृद्धि होती है।
- तीर्थ जल से अभिषेक करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है।
- इत्र मिले जल से अभिषेक करने से रोग नष्ट होते हैं।
- दूध से अभिषेक करने से पुत्र प्राप्ति होगी। प्रमेह रोग की शांति तथा मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
- गंगा जल से अभिषेक करने से ज्वर ठीक हो जाता है।
- दूध-शर्करा मिश्रित अभिषेक करने से सद्बुद्धि की प्राप्ति होती है।
- घी से अभिषेक करने से वंश विस्तार होता है।
१२-३-२०२२
***
मुक्तक
सूरज चमक रहा माथे पर, बिखरी धूप कपोलों पर
नव विचार कर रहे सवारी, बहते पवन-झकोरों पर
शांत सलिल में बिंबित रवि-छवि, लहर-लहर सिंदूरी कर
कांति नई पाकर कांता से, हो कविता दृग-कोरों पर
*
क्षणिका
*
जानेमन
अब तक रही
क्यों दुश्मने-जां हो गई?
चैन उसके बिन न था
बेचैनियाँ क्यों बो रही?
आस मेरी
प्यास मेरी
श्वास की दुश्मन बनी
हास को छोड़ा नहीं
संत्रास फिर-फिर बो गई।
*
अठ सलल सवैया
११२-११२-११२-११२-११२-११२-११२-११२-११
*
जय हिंद कहें, सब संग रहें, हँस हाथ गहें, मिल जीत वरें हम
अरि जूझ थकें, हथियार धरें, अरमान यही, कबहूँ न डरें हम
मत-भेद भले, मन-भेद नहीं, हम एक रहे, सच नेक रहें हम
अरि मार सकें, रण जीत तरें, हँस स्वर्ग वरें, मर के न मरें हम
१२-३-२०१९
***
नवगीत:
सरहद
*
तुम
स्वीकार सकीं मुझको
जब, सरहद पार
गया मैं लेने।
*
उठा हुआ सर
हद के पार
चला आया तब
अनजाने का
हाथ थाम कर।
मैं बहुतों के
साथ गया था
तुम आईं थीं
निपट अकेली।
किन्तु अकेली
कभी नहीं थीं,
सँग आईं
बचपन-यौवन की
यादें अनगिन।
तुम
स्वीकार सकीं मुझको
जब, पहुँच गया
मैं खुद को देने।
*
था दहेज भी
मैके की
शुभ परम्पराओं
शिक्षा, सद्गुण,
संस्कार का।
ले पतवारें
अपनेपन की
नाव हमें थी
मिलकर खेनी।
मतभेदों की
खाई, अंतरों के
पर्वत लँघ
मधुर मिलन के
सपने बुन-बुन।
तुम
स्वीकार सकीं मुझको
जब, संग हुए हम
अंतर खोने।
*
खुद को खोकर
खुद को पाकर
कही कहानी
मन से मन ने,
नित मन ही मन।
खन-खन कंगन
रुनझुन पायल
केश मोगरा
लटें चमेली।
शंख-प्रार्थना
दीप्ति-आरती
सांध्य-वंदना ,
भुवन भारती
हँसी कीर्ति बन।
तुम
स्वीकार सकीं मुझको
जब, मिली राजश्री
सार्थक होने।
*
भवसागर की
बाधाओं को
मिल-जुलकर
था हमने झेला
धैर्य धारकर।
सावन-फागुन
खुशियाँ लाये
सोहर गूँजे
बजी ढोलकी।
किलकारी
पट्टी पूजन कर,
धरा नापने
नभ को छूने
बढ़ी कदम बन।
तुम
स्वीकार सकीं मुझको
जब, अँगना खेले
मूर्त खिलौने।
*
देख आँख पर
चश्मे की
मोहिनी हँसे हम,
धवल केश की
आभा देखें।
नव पीढ़ी
दौड़े, हम थकते
शांति अंजुला
हुई सहेली।
अन्नपूर्णा
कम साधन से
अधिक लक्ष्य पा
अर्थशास्त्र को
करतीं सार्थक।
तुम
स्वीकार सकीं मुझको
जब, सपने देखे
संग सलोने।
१२-३-२०१६
***
छंद सलिला:
भव छंद
*
लक्षण: जाति रौद्र, पद २, चरण ४, प्रति चरण मात्रा ११, चरणान्त लघु गुरु गुरु या गुरु
लक्षण छंद:
एकादश पग रखो, भवसिंधु पार करो
चरण आदि मन चाहा, चरण अंत गुरु से हो
उदाहरण:
१. आशा का बीज बो, कोशिश से फसल लो
श्रम सीकर नर्मदा, भव तारें वर्मदा
२. सूर्य चन्द्र सितारा, सकल जगत निखारा
भव को जब निहारा, खुद को भी बिसारा
रूप-रंग सँवारा, असुंदर न गवारा
सच जिसने बिसारा, रण न लड़ रण हारा
३. समय शिला पर लिखो, सबसे आगे दिखो
शब्द नये उकेरो, नव उजास बिखेरो
४. नित्य हरि गुण गाओ, मन में शांति पाओ
छन्दों में मन रमा, कष्टों को दो भुला
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, ककुभ, कीर्ति, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, छवि, जाया, तांडव, तोमर, दीप, दोधक, नित, निधि, प्रदोष, प्रेमा, बाला, भव, मधुभार, मनहरण घनाक्षरी, माया, माला, ऋद्धि, रामा, लीला, वाणी, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शिव, शुभगति, सार, सिद्धि, सुगति, सुजान, हंसी)
१२-३-२०१४
***
नव गीत:
ऊषा को लिए बाँह में
*
ऊषा को लिए बाँह में,
संध्या को चाह में.
सूरज सुलग रहा है-
रजनी के दाह में...
*
पानी के बुलबुलों सी
आशाएँ पल रहीं.
इच्छाएँ हौसलों को
दिन-रात छल रहीं.
पग थक रहे, मंजिल
कहीं पाई न राह में.
सूरज सुलग रहा है-
रजनी के दाह में...
*
तृष्णाएँ खुद ही अपने
हैं हाथ मल रहीं.
छायाएँ तज आधार को
चुपचाप ढल रहीं.
मोती को रहे खोजते
पाया न थाह में.
सूरज सुलग रहा है-
रजनी के दाह में...
*
शिशु शशि शशीश शीश पर
शशिमुखी विलोकती.
रति-मति रतीश-नाश को
किस तरह रोकती?
महाकाल ही रक्षा करें
लेकर पनाह में.
सूरज सुलग रहा है-
रजनी के दाह में...
***
कुण्डलिया
*
हिंदी की जय बोलिए, हो हिंदीमय आप.
हिंदी में नित कार्य कर, सकें विश्व में व्याप..
सकें विश्व में व्याप, नाप लें सकल ज्ञान का.
नहीं व्यक्ति का, बिंदु 'सलिल' राष्ट्रीय आन का..
नेह-नरमदा नहा बोलिए होकर निर्भय.
दिग्दिगंत में गूँज उठे, फिर हिंदी की जय..
१२-३-२०१०
***

सोमवार, 11 मार्च 2024

११ मार्च, छंद त्रिभंगी, लघुकथा, दोहा, वर्ण पिरामिड, गीत, सॉनेट, सुजाता, युग तुलसी मुक्तक

सलिल सृजन ११ मार्च
*
स्मरण युग तुलसी 
मुक्तक
भज मन राम सिया निश-दिन हो भवसागर से पार।
बन जा किंकर हनुमत का तब ही होगा उद्धार।।
रिश्ते-नाते मोह न माया हो सकते निष्काम-
करना है तो कर गुरुवर के श्री चरणों से प्यार।।
श्री रामकिंकर को सुमिर हनुमत कृपा हो जाएगी।
हनुमत कृपा ही जानकी- रघुवर कृपा दिलवाएगी।।
भव ताप सारे पाप क्षण में आप ही जल जाएँगे।
सब जीव हो संजीव भव से आप ही तर जाएँगे।।
दोहा सलिला

सूर्य बिंदु संघर्ष का, बढ़े हताशा-व्यास।
कम न पड़े संभावना-परिधि बँधाए आस।।

द्वेष-ईर्ष्या मुक्त मति, ले अंतर्मन जीत।
सूर्य सांख्य योगी तपे, सबसे कर सम प्रीत।।

सूर्य बिंदु रेखा किरण, आभा वर्तुल वृत्त।
ठोस वायु द्रव पिंड है, गोल न अस्थिर चित्त।।

काया की छाया नहीं, माया सके न व्याप।
सूर्य तूर्य दस दिशा में, व्याप रहा चुपचाप।।
११.३.२०२४
•••
गीत

श्रद्धा के टुकड़े-टुकड़े कर
ठठा रहे लिव इन की जय जय।
धन्य-धन्य नारी विमर्श यह
रहे निर्भया जहाँ न निर्भय।।

पोथी पढ़, बढ़-चढ़ बातें कर
कमा रुपैया मनमानी कर।
तज संयम की लछमन रेखा
सिर्फ देह को रजधानी कर।
कन्यादान न करने देना
बाबुल को ठेंगा दिखला दो-
वरो शाप वरदान समझकर
ढक्कन धरो समझदानी पर।
बनना बोल्ड, बोल्ड हो चाहे
मर्यादा कुचलो हो निर्दय
ठठा रहे लिव इन की जय जय।

परंपरा पिछड़ापन बोलो
निष्ठा को सिक्कों से तोलो।
आजादी को उच्छृंखलता
मानो अमृत में विष घोलो।
देह दान को युवा क्रांति कह
गैरों की बाँहों में झूलो।
ढाँको कम तन अधिक दिखा
हो प्रगतिशील मन ही मन फूलो।
बिन ब्याहे पर्यंकशायिनी
हो सतीत्व का कर डालो क्षय
ठठा रहे लिव इन की जय जय।

अवसरवादी की लफ्फाजी
सुनो मान लो वादा सच्चा।
मात-पिता रोकें, कह दुश्मन
भागो घर से देकर गच्चा।
हवस कुंड को खुद दहकाओ
साथी अदल-बदल मुस्काओ।
अपनी गलती कभी न मानो-
दुनिया को दोषी बतलाओ।
बिना नींव की बने इमारत
जो उसका गिरना ही है तय।
ठठा रहे लिव इन की जय जय
११.३.२०२३
•••
सॉनेट
बुंदेली शारद वंदना

बन्दौं सारद मैहरवारी!
किरपा कर मों पै महतारी!
मैंने सबरी बात बिगारी।।
मैया! काय नें तुरत सँवारी।।

थक आओ मैं सरन तिहारी।
पाछूँ पर गए जे संसारी।
कैत बनो रय तैं पंसारी।।
मोखों भा रय प्रभु त्रिपुरारी।।

राजहंस की किए सवारी।
बिनती सुन माँ!, मत ठुकरा री!
मोरी पीरा मत बिसरा री!

जबसें मोहक छबि निहारी।
कर जोरे मैं बनो भिखारी।
भव से तारो बीनाबारी!
•••
सॉनेट
चिंता-चिंतन

चिंतन कर ले, चिंता तज दे
चिंता तुझको सतत जलाती
जीते जी मरघट पहुँचाती
चिंतन अमृत घट हरि भज ले
अधरों पर मुस्कान सजा ले
गा ले गीत, मीत! निज स्वर में
रह पगले! खुशियों के घर में
होनी होती देख मजा ले
छोड़ बड़प्पन, बच्चा बन जा
सपने देख न कर कंजूसी
कुछ झूठा कुछ सच्चा बन जा
धरती बिछा, ओढ़ नीला नभ
ओढ़ दिशाएँ सुन कर कलरव
उड़े पखेरू पल में संभव
११-३-२०२३
•••
सुजाता

सुजाता कठोर तप कार चुके मरणासन्न बुद्ध को खीर खिलाकर नया जीवन और जीवन के प्रति संतुलित दृष्टि पाने में सहायक हुई थी। वह बोधगया के पास सेनानी ग्राम के एक धनी व्यक्ति अनाथपिण्डिका की 
अहंकारी, वाचाल और उद्दंड पुत्रवधू थी। उसने मनौती माँगी थी कि पुत्रवती होने पर वह वह वृक्ष-देव को पायस (खीर) का भीग लगाएगी। उसने अपनी दासी पूर्णा को वृक्ष और उसके आसपास सफाई के लिए भेजा ताकि वृक्ष को खीर अर्पित कर मनौती पूर्ण कर सके। पूर्णा ने वृक्ष नीचे बैठे कृशकाय बुद्ध को देखा और उन्हें वृक्ष का देवता समझ बैठी।  वह भागती हुई अपनी स्वामिनी को बुला लाई। सुजाता ने तत्काल वहाँ पहुँचकर सोने की कटोरी में बुद्ध को खीर और शहद अर्पण करते हुए कहा- ‘जैसे मेरी पूरी हुई, आपकी भी मनोकामना पूरी हो।'
उसी दिन कृशकाय बुद्ध को बोध हुआ 'तत्तु समन्वयात्' अर्थात जीवन के विविध तत्वों में समन्वय रखना ही श्रेष्ठ है। अति किसी भी वस्तु की ठीक नहीं - न भोग की, न योग की। यह बोध होने पर  मरणासन्न बुद्ध ने नदी में स्नान कर सुजाता द्वारा दी गई खीर खाई। अगले दिन आभार प्रकट करने बुद्ध सुजाता के घर गए। वहाँ घर में लड़ाई-झगड़े का शोर था। पूछने पर अनाथपिण्डिका ने बताया कि उनकी बहू सुजाता अत्यंत अभिमानी और झगड़ालू स्त्री है जो घर में सास-ससुर-पति किसी की एक नहीं सुनती।
बुद्ध ने सुजाता को बुलाकर उसे सात प्रकार की पत्नियों के किस्से बताकर उसकी भूल का बोध कराया और सफल गृहस्थ जीवन के कई सूत्र दिए। सुजाता ने सबसे क्षमा माँगी और उसी दिन से सास-ससुर के साथ पुत्री और पति के साथ मित्र रूप से रहने की सौगंध खाई।
अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में सुजाता बुद्ध के प्रभामंडल से प्रभावित होकर साकेत के पास एक मठ में बौद्ध भिक्षुणी बनी थी और बुद्ध की उपस्थिति में ही वैशाली के पास स्थित किसी आश्रम में उसने अंतिम सांस ली थी। बौद्ध ग्रंथ 'थेरीगाथा' में दूसरी कई प्रख्यात बौद्ध-भिक्षुणियों के साथ भिक्षुणी सुजाता की भी एक पाली कविता संकलित है, जिसका ध्रुव गुप्ताद्वारा अंग्रेजी से किया भावानुवाद प्रस्तुत है-
गीत
कहे सुजाता

पवन सुगंधित सुंदर झीने मंहगे परदे 
गहने पहने बेशकीमती सुमन हार भी। 
भोग रही सुख दास-दसियों से सेवा ले, 
 
दुर्लभ खाद्य-पेय,
जीवन की सुख-सुविधाएँ,
देखे सब ऐश्वर्य और
क्रीड़ाएँ मैंने।
जिस दिन देखा दिव्य
प्रकाश बुद्ध का अनुपम
जा समीप चरणों में
झुक मैं हुई समर्पित।
परिवर्तित हो गया
पलों में मेरा जीवन।
उपदेशों से जाना मैंने
धर्म-मर्म क्या?
बिना वासना के रहना
कैसा होता है?
इच्छाओं से परे रहो तो
कैसा-क्या सुख?
जान लिया मैंने सचमुच
अमरत्व-सत्य को।
और उसी दिन पाया
मैंने ऐसा जीवन
जो है दुःख के परे
न जिसमें होता है घर।
•••
सॉनेट
चाह

अंतर्मन में ज्योति जला प्रभु!
कलुष न किंचित कहीं शेष हो।
तिमिर न बाकी कहीं लेश हो।।
अंधकार में राह दिखा विभु!
काट सकें कर्मों की कारा।
राग-द्वेष से मुक्त हो सकें।
प्रभु! तुमसे संयुक्त हो सकें।।
जग जग को बाँटें उजियारा।।
कोई न हमको लगे पराया।
सबमें देखें खुद की छाया।
व्याप न पाए मिथ्या माया।।
अहंकार दे विहँस मिटा प्रभु!
काम-क्रोध, मद-लोभ हटा विभु!
नामामृत की चाट चटा प्रभु!
११-३-२०२२
•••
गीत
*
समय न उगता खेत में
समय न बिके बजार
कद्र न जिनको समय की
वही हुए लाचार
नाथ समय के नमन लें
दें मुझको वरदान
असमय करूँ न काम मैं
बनूँ नहीं अनजान
खाली हाथ न फिरे जो
याचक आए द्वार
सीमित घड़ियाँ करी हैं
हर प्राणी के नाम
उसने जो सकता बना
सबके बिगड़े काम
सौ सुनार पर रहा है
भारी एक लुहार
श्वास खेत में बोइए
कर्म फसल बिन देर
ईश्वर के दरबार में
हो न कभी अंधेर
सौदा करिए नगद पर
रखिए नहीं उधार
११-३-२०२०
***
वर्ण पिरामिड
१.
'रे
नर!'
वानर
बोल पड़ा :
अभिनंदन
कर, मैं हूँ तेरा
पुरखा सचमुच।'
*
२.
है
छाया
काया से
ज्यादा लंबी,
मत समझो
महत्वपूर्ण है
केवल लंबाई ही।
११-३-२०१९
***
दोहा दुनिया
*
मन की मन में क्यों रहे, कर मनमानी खूब।
मन उन्मन क्यों हो रहा? बेमन पूछ, न ऊब।।
*
भाई-भतीजावाद के, हारे ठेकेदार
चचा-भतीजे ने किया, घर का बंटाढार
*
दुर्योधन-धृतराष्ट्र का, हुआ नया अवतार
नाव डुबाकर रो रहे, तोड़-फेंक पतवार
*
माया महाठगिनी पर, ठगी गयी इस बार
जातिवाद के दनुज सँग, मिली पटकनी यार
*
लग्न-परिश्रम की विजय, स्वार्थ-मोह की हार
अवसरवादी सियासत, डूब मरे मक्कार
*
बादल गरजे पर नहीं, बरस सके धिक्कार
जो बोया काटा वही, कौन बचावनहार?
*
नर-नरेंद्र मिल हो सके, जन से एकाकार
सर-आँखों बैठा किया, जन-जन ने सत्कार
*
जन-गण को समझें नहीं, नेतागण लाचार
सौ सुनार पर पड़ गया,भारी एक लुहार
*
गलती से सीखें सबक, बाँटें-पाएँ प्यार
देश-दीन का द्वेष तज, करें तनिक उपकार
*
दल का दलदल भुलाकर, असरदार सरदार
जनसेवा का लक्ष्य ले, बढ़े बना सरकार
***
लघुकथा
कन्हैया
*
नामकरण संस्कार को इतना महत्त्व क्यों दिया जाता है? यह तो व्यक्ति के जीवन का एक पल मात्र है, उसे किस नाम से पुकारा जाता है इससे औरों को क्या फर्क पड़ता है? मित्र ने पूछा।
नामकरण किसी को पुकारना मात्र नहीं है। नाम रखना, नाम धरना, नाम थुकाना, नाम करना और नाम होना सबका अलग-अलग बहुत महत्त्व है। किसी जातक के संभावित गुणों का पूर्वानुमान कर तदनुसार पुकारना नामकरण करना है- जनक वह जो पिता की तरह प्रजा का पालन करे, शंकर वह जो शंका का अरि हो अर्थात शंका का अंत कर विश्वास का सृजन करे, श्याम अँधेरे का अंत कर सके, भारत जो प्रकाश फ़ैलाने में रत हो। नाम देते समय औचित्य का विचार अपरिहार्य है। किसी का नाम रखना या नाम धरना एक मुहावरा है जिसका अर्थ किसी त्रुटी के लिए दोषी ठहराना है। 'नाम थुकाना' अर्थात बदनामी कराना। नाम करना या नामवर होना का आशय यश पाना है। नाम होना का मतलब कीर्ति फैलाना है।
जन मानस गुण-धर्म को स्मरण रखता है। भाई से द्रोह करने वाले विभीषण, सबको रुलानेवाले रावण, शासक की पीठ में छुरा भोंकनेवाले मीरजाफर, स्वामिनी को गलत सलाह देनेवाली मंथरा, शिशु वध का प्रयास करनेवाली पूतना, अत्याचारी कंस, अहंकारी दुर्योधन आदि के नाम आज तक कोई अपनी सन्तान क्या पशुओं तक को नहीं देता।
तब तो भविष्य में 'कन्हैया' नाम भी इसी श्रेणी में सम्मिलित हो जाएगा, मित्र ने कहा।
***
***
रसानंद दे छंद नर्मदा २० :
दोहा, सोरठा, रोला, आल्हा, सार, ताटंक, रूपमाला (मदन), चौपाई, हरिगीतिका, उल्लाला,गीतिका,घनाक्षरी तथा बरवैछंदों से साक्षात के पश्चात् अब मिलिए त्रिभंगी से।

छंद सलिला : छंद त्रिभंगी 
तीन बार हो भंग त्रिभंगी, तीन भंगिमा दर्शाये
*
त्रिभंगी ३२ मात्राओं का छंद है जिसके हर पद की गति तीन बार भंग होकर चार चरणों (भागों) में विभाजित हो जाती है। प्राकृत पैन्गलम के अनुसार:
पढमं दह रहणं, अट्ठ विरहणं, पुणु वसु रहणं, रस रहणं।
अन्ते गुरु सोहइ, महिअल मोहइ, सिद्ध सराहइ, वर तरुणं।
जइ पलइ पओहर, किमइ मणोहर, हरइ कलेवर, तासु कई।
तिब्भन्गी छंदं, सुक्खाणंदं, भणइ फणिन्दो, विमल मई।
(संकेत: अष्ट वसु = ८, रस = ६)
संकेत : प्रथम यति १० मात्रा पर, दूसरी ८ मात्रा पर, तीसरी ८ मात्रा पर तथा चौथी ६ मात्रा पर हो। हर पदांत में गुरु हो तथा जगण (ISI लघु गुरु लघु ) कहीं न हो।
केशवदास की छंद माला में वर्णित लक्षण:
विरमहु दस पर, आठ पर, वसु पर, पुनि रस रेख।
करहु त्रिभंगी छंद कहँ, जगन हीन इहि वेष।।
(संकेत: अष्ट वसु = ८, रस = ६)
भानुकवि के छंद-प्रभाकर के अनुसार:
दस बसु बसु संगी, जन रसरंगी, छंद त्रिभंगी, गंत भलो।
सब संत सुजाना, जाहि बखाना, सोइ पुराना, पन्थ चलो।
मोहन बनवारी, गिरवरधारी, कुञ्जबिहारी, पग परिये।
सब घट घट वासी मंगल रासी, रासविलासी उर धरिये।
(संकेत: बसु = ८, जन = जगण नहीं, गंत = गुरु से अंत)
सुर काज सँवारन, अधम उघारन, दैत्य विदारन, टेक धरे।
प्रगटे गोकुल में, हरि छिन छिन में, नन्द हिये में, मोद भरे।
त्रिभंगी का मात्रिक सूत्र निम्नलिखित है
"बत्तिस कल संगी, बने त्रिभंगी, दश-अष्ट अष्ट षट गा-अन्ता"
लय सूत्र: धिन ताक धिना धिन, ताक धिना धिन, ताक धिना धिन, ताक धिना।
नाचत जसुदा को, लखिमनि छाको, तजत न ताको, एक छिना।
उक्त में आभ्यंतर यतियों पर अन्त्यानुप्रास इंगित नहीं है किन्तु जैन कवि राजमल्ल ने ८ चौकल, अंत गुरु, १०-८-८-६ पर विरति, चरण में ३ यमक (तुक) तथा जगण निषेध इंगित कर पूर्ण परिभाषा दी है।
गुजराती छंद शास्त्री दलपत शास्त्री कृत दलपत पिंगल में १०-८-८-६ पर यति, अंत में गुरु, तथा यति पर तुक (जति पर अनुप्रासा, धरिए खासा) का निर्देश दिया है।
सारतः: त्रिभंगी छंद के लक्षण निम्न हैं:
१. त्रिभंगी ३२ मात्राओं का (मात्रिक) छंद है।
२. त्रिभंगी समपाद छंद है।
३. त्रिभंगी के हर चरणान्त (चौथे चरण के अंत) में गुरु आवश्यक है। इसे २ लघु से बदलना नहीं चाहिए।
४. त्रिभंगी के प्रत्येक चरण में १०-८-६-६ पर यति (विराम) आवश्यक है। मात्रा बाँट ८ चौकल अर्थात ८ बार चार-चार मात्रा के शब्द प्रावधानित हैं जिन्हें २+४+४, ४+४, ४+४, ४+२ के अनुसार विभाजित किया जाता है। इस तरह २ + (७x ४) + २ = ३२ मात्राएँ हर एक पंक्ति में होती है।
५. त्रिभंगी के चौकल ७ मानें या ८ जगण का प्रयोग सभी में वर्जित है।
६. त्रिभंगी के हर पद में पहले दो चरणों के अंत में समान तुक हो किन्तु यह बंधन विविध पदों पर नहीं है।
७. त्रिभंगी के तीसरे चरण के अंत में लघु या गुरु कोई भी मात्रा हो सकती है किन्तु कुशल कवियों ने सभी पदों के तीसरे चरण की मात्रा एक सी रखी है।
८. त्रिभंगी के किसी भी मात्रिक गण में विषमकला नहीं है। सम कला के मात्रिक गण होने से मात्रिक मैत्री का नियम पालनीय है।
९. त्रिभंगी के प्रथम दो पदों के चौथे चरणों के अंत में समान तुक हो। इसी तरह अंतिम दो पदों के चौथे चरणों के अंत में समान तुक हो। चारों पदों के अंत में समान तुक होने या न होने का उल्लेख कहीं नहीं मिला।
उदाहरण:
१. महाकवि तुलसीदास रचित निम्न पंक्तियों में तीसरे चरण की ८ मात्राएँ अगले शब्द के प्रथम अक्षर पर पूर्ण होती हैं, यह आदर्श स्थिति नहीं है, किन्तु मान्य है।
धीरज मन कीन्हा, प्रभु मन चीन्हा, रघुपति कृपा भगति पाई।
पदकमल परागा, रस अनुरागा, मम मन मधुप करै पाना।
सोई पद पंकज, जेहि पूजत अज, मम सिर धरेउ कृपाल हरी।
जो अति मन भावा, सो बरु पावा, गै पतिलोक अनन्द भरी।
२. तुलसी की ही निम्न पंक्तियों में हर पद का हर चरण आपने में पूर्ण है।
परसत पद पावन, सोक नसावन, प्रगट भई तप, पुंज सही।
देखत रघुनायक, जन सुख दायक, सनमुख हुइ कर, जोरि रही।
अति प्रेम अधीरा, पुलक सरीरा, मुख नहिं आवै, वचन कही।
अतिशय बड़भागी, चरनन लागी, जुगल नयन जल, धार बही।
यहाँ पहले २ पदों में तीसरे चरण के अंत में 'प' तथा 'र' लघु (समान) हैं किन्तु अंतिम २ पदों में तीसरे चरण के अंत में क्रमशः 'वै' गुरु तथा 'ल' लघु हैं।
३.महाकवि केशवदास की राम चन्द्रिका से एक त्रिभंगी छंद का आनंद लें:
सम सब घर सोभैं, मुनिमन लोभैं, रिपुगण छोभैं, देखि सबै।
बहु दुंदुभि बाजैं, जनु घन गाजैं, दिग्गज लाजैं, सुनत जबैं।
जहँ तहँ श्रुति पढ़हीं, बिघन न बढ़हीं, जै जस मढ़हीं, सकल दिसा।
सबही सब विधि छम, बसत यथाक्रम, देव पुरी सम, दिवस निसा।
यहाँ पहले २ पदों में तीसरे चरण के अंत में 'भैं' तथा 'जैं' गुरु (समान) हैं किन्तु अंतिम २ पदों में तीसरे चरण के अंत में क्रमशः 'हीं' गुरु तथा 'म' लघु हैं।
४. श्री गंगाप्रसाद बरसैंया कृत छंद क्षीरधि से तुलसी रचित त्रिभंगी छंद उद्धृत है:
रसराज रसायन, तुलसी गायन, श्री रामायण, मंजु लसी।
शारद शुचि सेवक, हंस बने बक, जन कर मन हुलसी हुलसी।
रघुवर रस सागर, भर लघु गागर, पाप सनी मति, गइ धुल सी।
कुंजी रामायण, के पारायण, से गइ मुक्ति राह खुल सी।
टीप: चौथे पद में तीसरे-चौथे चरण की मात्राएँ १४ हैं किन्तु उन्हें पृथक नहीं किया जा सकता चूंकि 'राह' को 'र'+'आह' नहीं लिखा जा सकता। यह आदर्श स्थिति नहीं है। इससे बचा जाना चाहिए। इसी तरह 'गई' को 'गइ' लिखना अवधी में सही है किन्तु हिंदी में दोष माना जाएगा।
***
त्रिभंगी छंद के कुछ अन्य उदाहरण निम्नलिखित हैं
०१. री शान्ति जिनेशं, नुतशक्रेशं, वृषचक्रेशं चक्रेशं।
हनि अरिचक्रेशं, हे गुनधेशं, दयाऽमृतेशं, मक्रेशं ।।।
मंदार सरोजं, कदली जोजं, पुंज भरोजं, मलयभरं।
भरि कंचनथारी, तुमढिग धारी, मदनविदारी, धीरधरं।। --रचनाकार : ज्ञात नहीं
संजीव 'सलिल'
०२. रस-सागर पाकर, कवि ने आकर, अंजलि भर रस-पान किया।
ज्यों-ज्यों रस पाया, मन भरमाया, तन हर्षाया, मस्त हिया।।
कविता सविता सी, ले नवता सी, प्रगटी जैसे जला दिया।
सारस्वत पूजा, करे न दूजा, करे 'सलिल' ज्यों अमिय पिया।।
०३. ऋतुराज मनोहर, प्रीत धरोहर, प्रकृति हँसी, बहु पुष्प खिले।
पंछी मिल झूमे, नभ को चूमे, कलरव कर भुज भेंट मिले।।
लहरों से लहरें, मिलकर सिहरें, बिसरा शिकवे भुला गिले।
पंकज लख भँवरे, सजकर सँवरे, संयम के दृढ़ किले हिले।।
०४. ऋतुराज मनोहर, स्नेह सरोवर, कुसुम कली मकरंदमयी।
बौराये बौरा, निरखें गौरा, सर्प-सर्पिणी, प्रीत नयी।।
सुरसरि सम पावन, जन मन भावन, बासंती नव कथा जयी।
दस दिशा तरंगित, भू-नभ कंपित, प्रणय प्रतीति न 'सलिल' गयी।।
०५. ऋतु फागुन आये, मस्ती लाये, हर मन भाये, यह मौसम।
अमुआ बौराये, महुआ भाये, टेसू गाये, को मो सम।।
होलिका जलायें, फागें गायें, विधि-हर शारद-रमा मगन।
बौरा सँग गौरा, भूँजें होरा, डमरू बाजे, डिम डिम डम।।
०६. ऋतुराज मनोहर, सुनकर सोहर, झूम-झूम हँस नाच रहा।
बौराया अमुआ, आया महुआ, राई-कबीरा बाँच रहा।।
पनघट-अमराई, नैन मिलाई के मंचन के मंच बने।
कजरी-बम्बुलिया आरोही-अवरोही स्वर हृद-सेतु तने।।
शम्भुदान चारण
०७. साजै मन सूरा, निरगुन नूरा, जोग जरूरा, भरपूरा।
दीसे नहि दूरा, हरी हजूरा, परख्या पूरा, घट मूरा।।
जो मिले मजूरा, एष्ट सबूरा, दुःख हो दूरा, मोजीशा।
आतम तत आशा, जोग जुलासा, श्वांस ऊसासा, सुखवासा।।
डॉ. प्राची.सिंह
०८.मन निर्मल निर्झर, शीतल जलधर, लहर लहर बन, झूमे रे।
मन बनकर रसधर, पंख प्रखर धर, विस्तृत अम्बर, चूमे रे।।
ये मन सतरंगी, रंग बिरंगी, तितली जैसे, इठलाये।
जब प्रियतम आकर, हृदय द्वार पर, दस्तक देता, मुस्काये।।
स्व. सत्यनारायण शर्मा 'कमल'
०९ छंद त्रिभंगी षट -रस रंगी अमिय सुधा-रस पान करे।
छवि का बंदी कवि-मन आनंदी स्वतः त्रिभंगी-छंद झरे।।
दृश्यावलि सुन्दर लोल-लहर पर अलकावलि अतिशय सोहे।
पृथ्वी-तल पर सरिता-जल पर पसरी कामिनि मन को मोहे।।
१०. उषाकाल नव-किरण जाल जल का उछाल चुप रह लख रे
रति सद्यस्नाता कंचन गाता रूप लजाता दृश्य अरे
मुद सस्मित निरखत रूप-सुधा घट चितवत नेह-पगा छिप रे
हँस गगन मुदित रवि नैसर्गिक छवि विस्मित मौन ठगा कित रे
११. नम श्यामल केश कमल-मुख श्वेत रुचिर परिवेश प्रदान करे।
नत नयन खुले से निमिष-तजे से अधर मंद मुस्कान भरे।।
उभरे वक्षस्थल जल क्रीडास्थल लहर उछल मन प्राण हरे।
सोई सुषमा सी विधु ज्योत्स्ना सी शरद पूर्णिमा नृत्य करे।।
१२. था तन रोमांचित मन आलोड़ित सिकता-कण शत-शत बिखरे।
सस्मित आकृति अनमोल कलाकृति मुग्ध प्रकृति भी इस पल रे।।
उतरीं जल-परियाँ सिन्धु-लहर सी प्रात प्रहर सुर-धन्या सी।
नव दीप-शिखा सी नव-कलिका सी इठलाती हिम-कन्या सी।।
संजीव 'सलिल'
१३. हम हैं अभियंता नीति नियंता, अपना देश सँवारेंगे।
हर संकट हर हर मंज़िल वरकर, सबका भाग्य निखारेंगे।।
पथ की बाधाएँ दूर हटाएँ, खुद को सब पर वारेंगे।
भारत माँ पावन जन मन भावन, सीकर चरण पखारेंगे।।
१४. अभियंता मिलकर आगे चलकर, पथ दिखलायें जग देखे।
कंकर को शंकर कर दें हँसकर मंज़िल पाएं कर लेखे।।
शशि-मंगल छूलें, धरा न भूलें, दर्द दीन का हरना है।
आँसू न बहायें , जन-गण गाये, पंथ वही तो वरना है।।
१५. श्रम-स्वेद बहाकर, लगन लगाकर, स्वप्न सभी साकार करें।
गणना कर परखें, पुनि-पुनि निरखें, त्रुटि न तनिक भी कहीं वरें।।
उपकरण जुटायें, यंत्र बनायें, नव तकनीक चुनें न रुकें।
आधुनिक प्रविधियाँ, मनहर छवियाँ, उन्नत देश करें न चुकें।।
१६. नव कथा लिखेंगे, पग न थकेंगे, हाथ करेंगे काम काम सदा।
किस्मत बदलेंगे, नभ छू लेंगे, पर न कहेंगे 'यही बदा'।।
प्रभु भू पर आयें, हाथ बटायें, अभियंता संग-साथ रहें।।
श्रम की जयगाथा, उन्नत माथा, सत नारायण कथा कहें।।
जनश्रुति / क्षेपक- रामचरितमानस में बालकाण्ड में अहल्योद्धार के प्रकरण में चार (४) त्रिभङ्गी छंद प्रयुक्त हुए हैं. कहा जाता है कि इसका कारण यह है कि अपने चरण से अहल्या माता को छूकर प्रभु श्रीराम ने अहल्या के पाप, ताप और शाप को भङ्ग (समाप्त) किया था, अतः गोस्वामी जी की वाणी से सरस्वतीजी ने त्रिभङ्गी छन्द को प्रकट किया.
११-३-२०१६
***
हाइकु  
*
धरने पर
बैठा मुख्यमंत्री
आँखें चुराए
*
रंग-बिरंगे
नमो गुजरात को
रोज भुनाएं
*
ममो का मौन
अनकहनी कह
होली मनाए
*
झोपड़ी में जा
शहजादा लालू को
गले लगाए
*
नारी बेचारी
ममता की मारी है
ख्वाब सजाए
*
अन्ना हजारे
मुसीबत के मारे
खोजें सहारे
*
माया की काया
दे न किसी को कभी
थोड़ी भी छाया
*
बाल्टी का रंग
अम्मा को पड़े कम
करुणा दंग
***
मुक्तिका:
खुली आँख सपने…
*
खुली आँख सपने बुने जा रहे हैं
कहते खुदी खुद सुने जा रहे हैं
वतन की जिन्हें फ़िक्र बिलकुल नहीं है
संसद में वे ही चुने जा रहे हैं
दलतंत्र मलतंत्र है आजकल क्यों?
जनता को दल ही धुने जा रहे हैं
बजा बीन भैसों के सम्मुख मगन हो
खुश है कि कुछ तो सुने जा रहे हैं
निजी स्वार्थ ही साध्य सबका हुआ है
कमाने के गुर मिल गुने जा रहे हैं
११-३-२०१४
***
नव गीत:
ऊषा को लिए बाँह में,
संध्या को चाह में.
सूरज सुलग रहा है-
रजनी के दाह में...
*
पानी के बुलबुलों सी
आशाएँ पल रहीं.
इच्छाएँ हौसलों को
दिन-रात छल रहीं.
पग थक रहे, मंजिल कहीं
पाई न राह में.
सूरज सुलग रहा है-
रजनी के दाह में...
*
तृष्णाएँ खुद ही अपने
हैं हाथ मल रहीं.
छायाएँ तज आधार को
चुपचाप ढल रहीं.
मोती को रहे खोजते
पाया न थाह में.
सूरज सुलग रहा है-
रजनी के दाह में...
*
मुक्तक:
समय बदला तो समय के साथ ही प्रतिमान बदले.
प्रीत तो बदली नहीं पर प्रीत के अनुगान बदले.
हैं वही अरमान मन में, है वही मुस्कान लब पर-
वही सुर हैं वही सरगम 'सलिल' लेकिन गान बदले..
*
रूप हो तुम रंग हो तुम सच कहूँ रस धार हो तुम.
आरसी तुम हो नियति की प्रकृति का श्रृंगार हो तुम..
भूल जाऊँ क्यों न खुद को जब तेरा दीदार पाऊँ-
'सलिल' लहरों में समाहित प्रिये कलकल-धार हो तुम.
*
नारी ही नारी को रोके इस दुनिया में आने से.
क्या होगा कानून बनाकर खुद को ही भरमाने से?.
दिल-दिमाग बदल सकें गर, मान्यताएँ भी हम बदलें-
'सलिल' ज़िंदगी तभी हँसेगी, क्या होगा पछताने से?
*
ममता को समता के पलड़े में कैसे हम तौल सकेंगे.
मासूमों से कानूनों की परिभाषा क्या बोल सकेंगे?
जिन्हें चाहिए लाड़-प्यार की सरस हवा के शीतल झोंके-
'सलिल' सिर्फ सुविधा देकर साँसों में मिसरी घोल सकेंगे?
*
११-३-२०१०
***

रविवार, 10 मार्च 2024

मार्च १०, दोहा, गीत, घनाक्षरी, होली, लोककथा, कहावत, कहमुकरी, हास्य, कुण्डलिया

सलिल सृजन मार्च १०
*
अनुरोध:
भोजन-स्थान पर निम्न सन्देश लिखवायें / घोषणा करवायें :
१. अन्न देवता का अपमान मत करें
२. भोजन फेंकना पाप है.
३. देवता भोग ग्रहण करते हैं, मनुष्य भोजन खाते हैं, राक्षस फेंकते हैं.
४. भोजन की बर्बादी,भूखे की मौत.
५. जितनी भूख उतना लें, जितना लें, उतना खाएं.
६. इस जन्म में भोजन फेंकें, अगले जन्म में भूखे मरें.
७. खाना खा. फेंक मत.
८. खाने से प्यार, बर्बादी से इंकार
९. खाना बचे, भूखे को दें.
१० जितना खा सकें उससे कुछ कम लें.
११. दाने-दाने पर खानेवाले का नाम
जो दाना फेंका उस पर था आपका नाम
अगले जनम में दाने पर नहीं होगा आपका नाम
तब क्या करेंगे?
१२. जीवनाधार
भोजन का सामान
बर्बादी रोकें.
१३. जितना खाना
परोसें उतना ही
फेकें न दाना
१४. भूखे-मुँह में देना दाना
एक यज्ञ का पुण्य कमाना.
१५. पशु-पक्षी को जूठन डालें
प्रभु से गलती क्षमा करा लें.
१६. कम खाना, कम बीमारी
ज्यादा खाना, मुश्किल भारी.
१७. खाना गैर का, पेट आपका.
१८. खाना सस्ता, इलाज मंहगा.
१९. सरल खाना / कठिन पचाना.
२०. भूख से कम खायें, सेहत बनायें.
२१. बचा हुआ शुद्ध ताजा भोजन अनाथालय, वृद्धाश्रम, महिलाश्रम अथवा मंदिर के बाहर
भिक्षुकों को वितरित करा दें. जूठा भोजन / जूठन पशुओं को खाने के लिये दें.
***
कहमुकरी
मन की बात अनकही कहती
मधुर सरस सुधियाँ हँस तहती
प्यास बुझाती जैसे सरिता
क्या सखि वनिता?
ना सखि कविता।
लहर-लहर पर लहराती है।
कलकल सुनकर सुख पाती है।।
मनभाती सुंदर मन हरती
क्या सखि सजनी?
ना सखि नलिनी।
नाप न कोई पा रहा।
सके न कोई माप।।
श्वास-श्वास में रमे यह
बढ़ा रहा है ताप।।
क्या प्रिय बीमा?
नहिं प्रिये, सीमा।
१०-३-२०२२
लोककथा कहावत की
ये मुँह और मसूर की दाल
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
एक राजा था, अन्य राजाओं की तरह गुस्से का तेज हुए खाने का शौक़ीन। रसोइया बाँकेलाल उसके चटोरेपन से परेशान था। राजा को हर दिन कुछ नया खाने की लत और कोढ़ में खाज यह कि मसूर मसालेदार दाल की दाल राजा को विशेष पसंद थी। मसूर की दाल बाँकेलाल के अलावा और कोई बनाना नहीं जानता था। इसलिए बांके लाल राजा की मूँछ का बाल बन गया।
एक दिन बाँकेलाल की साली, अपने जीजा के घर आई। उसकी खातिरदारी में कोई कमी न रह जाए इसलिए बाँकेलाल ने राजा से कुछ दिनों के लिए छुट्टी माँगी।
राजा के पास उसके मित्र पड़ोसी देश के राजा के आगमन का संदेश आ चुका था।
हुआ यह कि राजा ने अपने मित्र राजा से बाँकेलाल की बनाई मसूर की दाल की खूब तारीफ की थी। मित्र राजा अपनी रानी सहित आया, ताकि मसूर की दाल का स्वाद ले सके। इसलिए राजा ने बाँकेलाल की छुट्टी मंजूर नहीं की। बाँकेलाल की साली ने उसका खूब मजाक उड़ाया कि जीजाजी साली से ज्यादा राजा का ख्याल रखते हैं। घरवाली का मुँह गोलगप्पे की तरह फूल गया कि उसकी बहिन के कहने पर भी बाँकेलाल ने उसके साथ समय नहीं बिताया। बाँकेलाल मन मसोसकर काम पर चला गया।
खीझ के कारण उसका मन खाना बनाने में कम था। उस दिन दाल में नमक कुछ ज्यादा पड़ गया और दाल कुछ कम गली। मेहमान राजा को भोजन में आनंद नहीं आया। नाराज राजा से बाँकेलाल को नौकरी से निकाल दिया। बेरोजगारी ने बाँकेलाल के सामने समस्या खड़ी कर दी। राजा एक रसोइया रह चुका था इसलिए किसी आम आदमी के घर काम करने में उसे अपमान अनुभव होता। घर में रहता तो घरवाली जली-कटी सुनाती।
कहते हैं सब दिन जात न एक समान, बिल्ली के भाग से छींका टूटा, नगर सेठ मन ही मन राजा से ईर्ष्या करता था। उसे घमंड था कि राजा उससे धन उधार लेकर झूठी शान-शौकत दिखाता था। उसे बाँकेलाल के निकले जाने की खबर मिली तो उसने बाँकेलाल को बुलाकर अपन रसोइया बना लिया और सबसे कहने लगा कि राजा क्या जाने गुणीजनों की कदर करना?
अँधा क्या चाहे दो आँखें, बाँकेलाल ने जी-जान से काम करना आरंभ कर दिया। सेठ को राजसी स्वाद मिला तो वह झूम उठा।
सेठ की शादी की सालगिरह का दिन आया। अधेड़ सेठ युवा रानी को किसी भी कीमत पर प्रसन्न देखना चाहता था। उसने बाँकेलाल से कुछ ऐसा बनाने की फरमाइश की जिसे खाकर सेठानी खुश हो जाए। बाँकेलाल ने शाही मसालेदार मसूर की दाल पकाई। सेठ के घर में इसके पहले मसूर की दाल कभी नहीं बनी थी। सेठ-सेठानी और सभी मेहमानों ने जी भरकर मसूर की दाल खाई। सेठ ने बाँकेलाल को ईनाम दिया। यह देखकर उसका मुनीम कुढ़ गया।
अब सेठ अपना वैभव प्रदर्शित करने के लिए जब-तब मित्रों को दावत देकर वाहवाही पाने लगा।
बाँकेलाल खुद जाकर रसोई का सामान खरीद लाता था इस कारण मुनीम को पहले की तरह गोलमाल करने का अवसर नहीं मिल पा रहा था। मुनीम बाँकेलाल से बदला लेने का मौका खोजने लगा। बही में देखने पर मुनीम ने पाया की जब से बाँकेलाल आया था रसोई का खर्च लगातार बढ़ था। उसे मौका मिल गया। उसने सेठानी के कान भरे कि बाँकेलाल बेईमानी करता है। सेठानी ने सेठ से कहा। सेठ पहले तो अनसुनी करता रहा पर सेठानी ने दबाव डाला तो उसकी नाराजगी से डरकर सेठ ने बाँकेलाल को बुलाकर डाँट लगाई और जवाब-तलब किया कि वह रसोई का सामान लाने में गड़बड़ी कर रहा है।
बाँकेलाल को काटो तो खून नहीं, वह मेहनती और ईमानदार था। उसने सेठ को मेहमानों और दावतों की बढ़ती संख्या और मसलों के लगातार लगातार बढ़ते बाजार भाव का सच बताया और मसूर की दाल में गरम मसाले और मखाने आदि डलने की जानकारी दी। सेठ की आँखें फ़टी की फ़टी रह गईं। उसने नौकर को भेजकर किरानेवाले को बुलवाया और पूछताछ की। किरानेवाले ने बताया कि बाँकेलाल हमेशा उत्तम किस्म के मसाले पूरी तादाद में लता था और भाव भी काम करते था। बाँकेलाल बेईमानी के झूठे इल्जाम से बहुत दुखी हुआ और सेठ की नौकरी छोड़ने का निश्चय कर अपना सामान उठाने चला गया।
वह जा ही रहा था कि उसके कानों में आवाज पड़ी सेठानी नौकर से कह रही थी कि शाम को भोजन में मसूर की दाल बनाई जाए। स्वाभिमानी बाँकेलाल ने यह सुनकर कमरे में प्रवेश कर कहा 'ये मुँह और मसूर की दाल'। मैं काम छोड़कर जा रहा हूँ।
सेठ-सेठानी मनाते रह गए पाए वन नहीं माना। तब से किसी को सामर्थ्य से अधिक पाने की चाह रखते देख कहा जाने लगा 'ये मुँह और मसूर की दाल'।
••
कुण्डलिया 
*
दर्शन के दर्शन बिना, रहता मन बेज़ार
तेवर वाली तेवरी, करे निरंतर वार
करे निरंतर वार, केंद्र में रखे विसंगति
करे कौन मनुहार, बढ़े हर समय सुसंगति
मत करिए वन काम, करे मन जिसका वर्जन 
अंतर्मन में झांक, कीजिए प्रभु का दर्शन 
देवर आए खेलने, भौजी से रंग आज
भाई ने दे वर रंगा, भागे बिगड़ा काज
भागे बिगड़ा काज, न गुझिया पपड़ी पाई 
भौजी की बहिना, न सामने पड़ी दिखाई 
रंगों का पहन न सके, मनचाहा जेवर 
फीकी होली हुई, गए मन मारे देवर 
***
घनाक्षरी
होली पर चढ़ाए भाँग, लबों से चुआए पान, झूम-झूम लूट रहे रोज ही मुशायरा
शायरी हसीन करें, तालियाँ बटोर चलें, हाय-हाय करती जलें-भुनेंगी शायरा
फख्र इरफान पै है, फन उन्वान पै है, बढ़ता ही जाए रोज आशिकों का दायरा
कत्ल मुस्कान करे, कैंची सी जुबान चले, माइक से यारी है प्यारा जैसे मायरा
१०-३-२०२०
*
नैन पिचकारी तान-तान बान मार रही, देख पिचकारी ​मोहे ​बरजो न राधिका
​आस-प्यास रास की न फागुन में पूरी हो तो, मुँह ही न फेर ले साँसों की साधिका
गोरी-गोरी देह लाल-लाल हो गुलाल सी, बाँवरे से ​साँवरे की कामना भी बाँवरी-
बैन​ से मना करे, सैन से न ना कहे, नायक के आस-पास घूम-घूम नायिका ​
१०-३-२०१७
***
गीत:
ओ! मेरे प्यारे अरमानों,
आओ, तुम पर जान लुटाऊँ.
ओ! मेरे सपनों अनजानों-
तुमको मैं साकार बनाऊँ...
मैं हूँ पंख उड़ान तुम्हीं हो,
मैं हूँ खेत, मचान तुम्हीं हो.
मैं हूँ स्वर, सरगम हो तुम ही-
मैं अक्षर हूँ गान तुम्हीं हो.
ओ मेरी निश्छल मुस्कानों
आओ, लब पर तुम्हें सजाऊँ..
मैं हूँ मधु, मधु गान तुम्हीं हो.
मैं हूँ शर संधान तुम्हीं हो.
जनम-जनम का अपना नाता-
मैं हूँ रस रसखान तुम्हीं हो.
ओ! मेरे निर्धन धनवानों
आओ! श्रम का पाठ पढाऊँ...
मैं हूँ तुच्छ, महान तुम्हीं हो.
मैं हूँ धरा, वितान तुम्हीं हो.
मैं हूँ षडरसमधुमय व्यंजन.
'सलिल' मान का पान तुम्हीं हो.
ओ! मेरी रचना संतानों
आओ! दस दिश तुम्हें गुंजाऊँ...
***
गीत,
मैं हूँ मधु, मधु गान तुम्हीं हो.
मैं हूँ शर संधान तुम्हीं हो.
जनम-जनम का अपना नाता-
मैं हूँ रस रसखान तुम्हीं हो.
ओ! मेरे निर्धन धनवानों
आओ! श्रम का पाठ पढाऊँ...
मैं हूँ तुच्छ, महान तुम्हीं हो.
मैं हूँ धरा, वितान तुम्हीं हो.
मैं हूँ षडरसमधुमय व्यंजन.
'सलिल' मान का पान तुम्हीं हो.
ओ! मेरी रचना संतानों
आओ, दस दिश तुम्हें गुंजाऊँ...
***
दोहा
आँखमिचौली खेलते, बादल सूरज संग.
यह भागा वह पकड़ता, देखे धरती दंग..
*
पवन सबल निर्बल लता, वह चलता है दाँव .
यह थर-थर-थर काँपती, रहे डगमगा पाँव ..
१०-३-२०१०
***

शनिवार, 9 मार्च 2024

मार्च ९, सॉनेट, नारी, भारत, माँ, सोरठा, लघुकथा, माली छंद, मुक्तक, होली, आलोक वर्मा, महिला दिवस , दोहा लेखन, मात्र विधान,

सलिल सृजन मार्च ९
*
सॉनेट
नारी
*
नारी! तूने साबित कर दिखलाया है,
जीत नहीं सकता है तुझको छल या बल,
कल से कल तक कल की कल तेरी कलकल,
वन अशोक में रहकर अडिग दिखाया है।  
नारी! तूने नर को पूर्ण बनाया है,
जननी, भगिनी, भाभी, अर्धांगिनी संबल,
रुष्ट रहे जीना मुश्किल कर दे किलकिल,
छाया-माया-काया शुभ सरमाया है। 
नारी! नर से दो मात्राएँ है भारी,
गलती से भी मत कहना इसको अबला, 
तबला बना बजाएगी यह तब तुमको। 
नारी! से ही विद्या-शक्ति मिले सारी, 
सबल तभी नर जब नारी होगी सबला,
प्रबला होकर प्रबल बनाएगी नर को। 
***
सॉनेट
सजग भारत
*
है सजग भारत मिलाकर आँख बातें कर रहा है,
ना झुकाता, ना चुराता आँख संकट देखकर यह,
चुनौती को दे चुनौती, जीतता नित लक्ष्य नव यह,
डराता है यह नहीं पर अब नहीं यह डर रहा है।
है सजग भारत जगत को छोड़ पीछे बढ़ रहा है,
कर रहा व्यवहार अपने हित हमेशा साधकर यह,
सुरक्षा-सुख-शांति सबकी सृष्टि हित आराधकर यह,
नए मानक आप अपने नित्य प्रति यह गढ़ रहा है।
सजग भारत दीन जन की गरीबी मिल मिटाता है,
मिटाता मतभेद, होकर एक, हरता है अँधेरा,
कर विकास प्रयास जन का बढ़ता है हौसला भी।
उद्यमी हो अधिक सक्षम, स्वप्न सुंदर दिखाता है,
दीप उन्नति के जलाकर उगाता है नव सवेरा,
कह रहा परिवार जग को और जग को घोंसला भी।
९.३.२०२४
***
सॉनेट
यूक्रेन
सत्य लिखेगा यह इतिहास।
हारा तिनके से तूफान।
धीरज इसका संबल खास।।
हर तिनका करता बलिदान।।
वह करता सब सत्यानाश।
धरती को करता शमशान।
अपराधी का करें विनाश।।
एक साथ मिल सब इंसान।।
भागें मत, संबल दें काश।
एक यही है शेष निदान।
गिरे पुतिन पर ही आकाश।।
यूक्रेनी हैं वीर महान।।
करते हैं हम उन्हें सलाम।
उनकी विपदा अपनी मान।।
९-३-२०२२
•••
आत्मकथ्य
मैं विवाह के पश्चात् प्राध्यापिका पत्नि को रोज कोलेज ले जाता-लाता था. फिर उन्हें लूना और स्कूटर चलाना सिखाया. बाद में जिद कर कार खरीदी तो खुद न चला कर उन्हें ही सिखवाई.शोध कार्य हेतु खूब प्रोत्साहित किया. सडक दुर्घटना के बाद मेरे ओपरेशन में उनहोंने और उन्हें कैंसर होने पर मैंने उनकी जी-जान से सेवा की. हर दंपति को अपने परिवेश और जरूरत के अनुसार एक-दुसरे से तालमेल बैठाना होता है. महिला दिवस मनानेवाली महिलायें घर पर बच्चों और बूढ़ों को नौकरानी के भरोसे कर जाती हैं तो देखकर बहुत बुरा लगता है.
***
कार्यशाला
राजीव गण / माली छंद
*
छंद-लक्षण: जाति मानव, प्रति चरण मात्रा १८ मात्रा, यति ९ - ९
लक्षण छंद:
प्रति चरण मात्रा, अठारह रख लें
नौ-नौ पर रहे, यति यह परख लें
राजीव महके, परिंदा चहके
माली-भ्रमर सँग, तितली निरख लें
उदाहरण:
१. आ गयी होली, खेल हमजोली
भिगा दूँ चोली, लजा मत भोली
भरी पिचकारी, यूँ न दे गारी,
फ़िज़ा है न्यारी, मान जा प्यारी
खा रही टोली, भाँग की गोली
मार मत बोली,व्यंग्य में घोली
तू नहीं हारी, बिरज की नारी
हुलस मतवारी, डरे बनवारी
पोल क्यों खोली?, लगा ले रोली
प्रीती कब तोली, लग गले भोली
२. कर नमन हर को, वर उमा वर को
जीतकर डर को, ले उठा सर को
साध ले सुर को, छिपा ले गुर को
बचा ले घर को, दरीचे-दर को
३. सच को न तजिए, श्री राम भजिए
सदग्रन्थ पढ़िए, मत पंथ तजिए
पग को निरखिए, पथ भी परखिए
कोशिशें करिए, मंज़िलें वरिये
९-३-२०२०
***
होली के दोहे
*
होली हो ली हो रही, होली हो ली हर्ष
हा हा ही ही में सलिल, है सबका उत्कर्ष
होली = पर्व, हो चुकी, पवित्र, लिए हो
*
रंग रंग के रंग का, भले उतरता रंग
प्रेम रंग यदि चढ़ गया कभी न उतरे रंग
*
पड़ा भंग में रंग जब, हुआ रंग में भंग
रंग बदलते देखता, रंग रंग को दंग
*
शब्द-शब्द पर मल रहा, अर्थ अबीर गुलाल
अर्थ-अनर्थ न हो कहीं, मन में करे ख़याल
*
पिच् कारी दीवार पर, पिचकारी दी मार
जीत गई झट गंदगी, गई सफाई हार
*
दिखा सफाई हाथ की, कहें उठाकर माथ
देश साफ़ कर रहे हैं, बँटा रहे चुप हाथ
*
अनुशासन जन में रहे, शासन हो उद्दंड
दु:शासन तोड़े नियम, बना न मिलता दंड
*
अलंकार चर्चा न कर, रह जाते नर मौन
नारी सुन माँगे अगर, जान बचाए कौन?
*
गोरस मधुरस काव्य रस, नीरस नहीं सराह
करतल ध्वनि कर सरस की, करें सभी जन वाह
*
जला गंदगी स्वच्छ रख, मनु तन-मन-संसार
मत तन मन रख स्वच्छ तू, हो आसार में सार
*
आराधे राधे; कहे आ राधे! घनश्याम
वाम न होकर वाम हो, क्यों मुझसे हो श्याम
होली २०१८
***
दोहा लेखन विधान
१. दोहा द्विपदिक छंद है। दोहा में दो पंक्तियाँ (पद) होती हैं।
२. हर पद में दो चरण होते हैं।
३. विषम (पहला, तीसरा) चरण में १३-१३ तथा सम (दूसरा, चौथा) चरण में ११-११ मात्राएँ होती हैं।
४. तेरह मात्रिक पहले तथा तीसरे चरण के आरंभ में एक शब्द में जगण (लघु गुरु लघु) वर्जित होता है।
५. विषम चरणों की ग्यारहवीं मात्रा लघु हो तो लय भंग होने की संभावना कम हो जाती है।
६. सम चरणों के अंत में गुरु लघु मात्राएँ आवश्यक हैं।
७. हिंदी में खाय, मुस्काय, आत, भात, डारि, मुस्कानि जैसे देशज क्रिया-रूपों का उपयोग न करें।
८. दोहा मुक्तक छंद है। कथ्य (जो बात कहना चाहें वह) एक दोहे में पूर्ण हो जाना चाहिए।
९. श्रेष्ठ दोहे में लाक्षणिकता, संक्षिप्तता, मार्मिकता (मर्मबेधकता), आलंकारिकता, स्पष्टता, पूर्णता तथा सरसता होना चाहिए।
१०. दोहे में संयोजक शब्दों और, तथा, एवं आदि का प्रयोग यथा संभव न करें। औ' वर्जित 'अरु' स्वीकार्य।
११. दोहे में कोई भी शब्द अनावश्यक न हो। हर शब्द ऐसा हो जिसके निकालने या बदलने पर दोहा न कहा जा सके।
१२. दोहे में कारक (ने, को, से, के लिए, का, के, की, में, पर आदि)का प्रयोग कम से कम हो।
१३. दोहा में विराम चिन्हों का प्रयोग यथास्थान अवश्य करें।
१४. दोहा सम तुकान्ती छंद है। सम चरण के अंत में समान तुक आवश्यक है।
१५. दोहा में लय का महत्वपूर्ण स्थान है। लय के बिना दोहा नहीं कहा जा सकता।
*
मात्रा गणना नियम
१. किसी ध्वनि-खंड को बोलने में लगनेवाले समय के आधार पर मात्रा गिनी जाती है।
२. कम समय में बोले जानेवाले वर्ण या अक्षर की एक तथा अधिक समय में बोले जानेवाले वर्ण या अक्षर की दो मात्राएँ गिनी जाती हैंं।
३. अ, इ, उ, ऋ तथा इन मात्राओं से युक्त वर्ण की एक मात्रा गिनें। उदाहरण- अब = ११ = २, इस = ११ = २, उधर = १११ = ३, ऋषि = ११= २, उऋण १११ = ३ आदि।
४. शेष वर्णों की दो-दो मात्रा गिनें। जैसे- आम = २१ = ३, काकी = २२ = ४, फूले २२ = ४, कैकेई = २२२ = ६, कोकिला २१२ = ५, और २१ = ३आदि।
५. शब्द के आरंभ में आधा या संयुक्त अक्षर हो तो उसका कोई प्रभाव नहीं होगा। जैसे गृह = ११ = २, प्रिया = १२ =३ आदि।
६. शब्द के मध्य में आधा अक्षर हो तो उसे पहले के अक्षर के साथ गिनें। जैसे- क्षमा १+२, वक्ष २+१, विप्र २+१, उक्त २+१, प्रयुक्त = १२१ = ४ आदि।
७. रेफ को आधे अक्षर की तरह गिनें। बर्रैया २+२+२आदि।
८. हिंदी दोहाकार हिंदी व्याकरण नियमों का पालन करें। दोहा में वर्णिक छंद की तरह लघु को गुरु या गुरु को लघु पढ़ने की छूट नहीं होती।
९. अपवाद स्वरूप कुछ शब्दों के मध्य में आनेवाला आधा अक्षर बादवाले अक्षर के साथ गिना जाता है। जैसे- कन्हैया = क+न्है+या = १२२ = ५आदि।
१०. अनुस्वर (आधे म या आधे न के उच्चारण वाले शब्द) के पहले लघु वर्ण हो तो गुरु हो जाता है, पहले गुरु होता तो कोई अंतर नहीं होता। यथा- अंश = अन्श = अं+श = २१ = ३. कुंभ = कुम्भ = २१ = ३, झंडा = झन्डा = झण्डा = २२ = ४आदि।
११. अनुनासिक (चंद्र बिंदी) से मात्रा में कोई अंतर नहीं होता। धँस = ११ = २आदि। हँस = ११ =२, हंस = २१ = ३ आदि।
मात्रा गणना करते समय शब्द का उच्चारण करने से लघु-गुरु निर्धारण में सुविधा होती है।
***
गीत
महिला दिवस
*
एक दिवस क्या
माँ ने हर पल, हर दिन
महिला दिवस मनाया।
*
अलस सवेरे उठी पिता सँग
स्नान-ध्यान कर भोग लगाया।
खुश लड्डू गोपाल हुए तो
चाय बनाकर, हमें उठाया।
चूड़ी खनकी, पायल बाजी
गरमागरम रोटियाँ फूली
खिला, आप खा, कंडे थापे
पड़ोसिनों में रंग जमाया।
विद्यालय से हम,
कार्यालय से
जब वापिस हुए पिताजी
माँ ने भोजन गरम कराया।
*
ज्वार-बाजरा-बिर्रा, मक्का
चाहे जो रोटी बनवा लो।
पापड़, बड़ी, अचार, मुरब्बा
माँ से जो चाहे डलवा लो।
कपड़े सिल दे, करे कढ़ाई,
बाटी-भर्ता, गुझिया, लड्डू
माँ के हाथों में अमृत था
पचता सब, जितना जी खा लो।
माथे पर
नित सूर्य सजाकर
अधरों पर
मृदु हास रचाया।
*
क्रोध पिता का, जिद बच्चों की
गटक हलाहल, देती अमृत।
विपदाओं में राहत होती
बीमारी में माँ थी राहत।
अन्नपूर्णा कम साधन में
ज्यादा काम साध लेती थी
चाहे जितने अतिथि पधारें
सबका स्वागत करती झटपट।
नर क्या,
ईश्वर को भी
माँ ने
सोंठ-हरीरा भोग लगाया।
*
आँचल-पल्लू कभी न ढलका
मेंहदी और महावर के सँग।
माँ के अधरों पर फबता था
बंगला पानों का कत्था रँग।
गली-मोहल्ले के हर घर में
बहुओं को मिलती थी शिक्षा
मैंनपुरी वाली से सीखो
तनक गिरस्थी के कुछ रँग-ढंग।
कर्तव्यों की
चिता जलाकर
अधिकारों को
नहीं भुनाया।
***
पुस्तक सलिला:
कोई रोता है मेरे भीतर : तब कहता कविता व्याकुल होकर
*
[पुस्तक विवरण- कोई रोता है मेरे भीतर, कविता संग्रह, आलोक वर्मा, वर्ष २०१५, ISBN ९७८-९३-८५९४२-०७-५ आकार डिमाई, आवरण, बहुरंगी, पेपरबैक, पृष्ठ १२०, मूल्य १००/-, बोधि प्रकाशन ऍफ़ ७७ सेक्टर ९, पथ ११, करतारपुरा औद्योगिक क्षेत्र, बाईस गोदाम जयपुर ३०२००६, ०१४१ २५०३९८९, bodhiprakashan@gmail.com, कवि संपर्क ७१ विवेकानंद नगर, रायपुर ४९२००१, ९८२६६ ७४६१४, lokdhvani@gmail.com]
*
कविता और ज़िन्दगी का नाता सूरज और धूप का सा है। सूरज ऊगे या डूबे, धूप साथ होती है। इसी तरह मनुष्य का मन सुख अनुभव करे या दुख अभिव्यक्ति कविता के माध्यम से हो होती है। मनुष्येतर पशु-पक्षी भी अपनी अनुभूतियों को ध्वनि के माध्यम से व्यक्त करते हैं। ऐसी ही एक ध्वनि आदिकवि वाल्मीकि की प्रथम काव्याभिव्यक्ति का कारण बनी। कहा जाता हैं ग़ज़ल की उत्पत्ति भी हिरणी के आर्तनाद से हुई। आलोक जी के मन का क्रौंच पक्षी या हिरण जब-जब आदमी को त्रस्त होते देखता है, जब-जब विसंगतियों से दो-चार होता है, विडम्बनाओं को पुरअसर होते देखता तब-तब अपनी संवेदना को शब्द में ढाल कर प्रस्तुत कर देता है।
कोई रोता है मेरे भीतर ५८ वर्षीय कवि आलोक वर्मा की ६१ यथार्थपरक कविताओं का पठनीय संग्रह है। इन कविताओं का वैशिष्ट्य परिवेश को मूर्तित कर पाना है। पाठक जैसे-जैसे कविता पढ़ता जाता है उसके मानस में संबंधित व्यक्ति, परिस्थिति और परिवेश अंकित होता जाता है। पाठक कवि की अभिव्यक्ति से जुड़ पाता है। 'लोग देखेंगे' शीर्षक कविता में कवि परोक्षत: इंगित करता है की वह कविता को कहाँ से ग्रहण करता है-
शायद कभी कविता आएगी / हमारे पास
जब हम भाग रहे होंगे सड़कों पर / और लिखी नहीं जाएगी
शायद कभी कविता आएगी / हमारे पास
जब हमारे हाथों में / दोस्त का हाथ होगा
या हम अकेले / तेज बुखार में तप रहे होंगे / और लिखी नहीं जाएगी
दैनंदिन जीवन की सामान्य सी प्रतीत होती परिस्थितियाँ, घटनाएँ और व्यक्ति ही आलोक जी की कविताओं का उत्स हैं। इसलिए इन कविताओं में आम आदमी का जीवन स्पंदित होता है। अनवर मियाँ, बस्तर २०१०, फुटपाथ पर, हम साधारण, यह इस पृथ्वी का नन्हा है आदि कविताओं में यह आदमी विविध स्थितियों से दो-चार होता पर अपनी आशा नहीं छोड़ता। यह आशा उसे मौत के मुँह में भी जिन्दा रहने, लड़ने और जितने का हौसला देती है। 'सब ठीक हो जायेगा' शीर्षक कविता आम भारतीय को शब्दित करती है -
सुदूर अबूझमाड़ का / अनपढ़ गरीब बूढ़ा
बैठा अकेला महुआ के घने पेड़ के नीचे
बुदबुदाता है धीरे-धीरे / सब ठीक हो जायेगा एक दिन
यह आशा काम ढूंढने शहर के अँधेरे फुथपाथ पर भटके, अस्पताल में कराहे या झुग्गी में पिटे, कैसा भी भयावह समय हो कभी नहीं मरती।
समाज में जो घटता है उस देखता-भोगता तो हर शख्स है पर हर शख्स कवि नहीं हो सकता। कवि होने के लिए आँख और कान होना मात्र पर्याप्त नहीं। उनका खुला होना जरूरी है-
जिनके पास खुली आँखें हैं / और जो वाकई देखते हैं....
... जिनके पास कान हैं / और जो वाकई सुनते हैं
सिर्फ वे ही सुन सकते हैं / इस अथाह घुप्प अँधेरे में
अनवरत उभरती-डूबती / यह रोने की आर्त पुकार।
'एक कप चाय' को हर आदमी जीता है पर कविता में ढाल नहीं पाता-
अक्सर सुबह तुम नींद में डूबी होगी / और मैं बनाऊंगा चाय
सुनते ही मेरी आवाज़ / उठोगी तुम मुस्कुराते हुए
देखते ही चाय कहोगी / 'फिर बना दी चाय'
करते कुछ बातें / हम लेंगे धीरे-धीरे / चाय की चुस्कियाँ
घुला रहेगा प्रेम सदा / इस जीवन में इसी तरह
दूध में शक्कर सा / और छिपा रहेगा
फिर झलकेगा अनायास कभी भी
धूमकेतु सा चमकते और मुझे जिलाते
कि तुम्हें देखने मुस्कुराते / मैं बनाना चाहूँगा / ज़िंदगी भर यह चाय
यूं देखे तो / कुछ भी नहीं है
पर सोचें तो / बहुत कुछ है / यह एक कप चाय
अनुभूति को पकड़ने और अभिव्यक्त करने की यह सादगी, सरलता, अकृत्रिमता और अपनापन आलोक जी की कविताओं की पहचान हैं। इन्हें पढ़ना मात्र पर्याप्त नहीं है। इनमें डूबना पाठक को जिए क्षणों को जीना सिखाता है। जीकर भी न जिए गए क्षणों को उद्घाटित कर फिर जीने की लालसा उत्पन्न करती ये कवितायें संवेदनशील मनुष्य की प्रतीति करती है जो आज के अस्त-वस्त-संत्रस्त यांत्रिक-भौतिक युग की पहली जरूरत है।
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मुक्तिका:
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कर्तव्यों की बात न करिए, नारी को अधिकार चाहिए
वहम अहम् का हावी उस पर, आज न घर-परिवार चाहिए
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मेरी देह सिर्फ मेरी है, जब जिसको चाहूँ दिखलाऊँ
मर्यादा की बात न करना, अब मुझको बाज़ार चाहिए
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आदि शक्ति-शारदा-रमा हूँ, शिक्षित खूब कमाती भी हूँ
नित्य नये साथी चुन सकती, बाँहें बन्दनवार चाहिए
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बच्चे कर क्यों फिगर बिगाडूँ?, मार्किट में वैल्यू कम होती
गोद लिये आया पालेगी, पति ही जिम्मेदार चाहिए
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घोषित एक अघोषित बाकी,सारे दिवस सिर्फ नारी के
सब कानून उसी के रक्षक, नर बस चौकीदार चाहिए
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नर बिन रह सकती है दावा, नर चाकर है करे चाकरी
नाचे नाच अँगुलियों पर नित, वह पति औ' परिवार चाहिए
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किसका बीज न पूछे कोई, फसल सिर्फ धरती की मानो
हो किसान तो पालो-पोसो, बस इतना स्वीकार चाहिए
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मुक्तक:
मुक्त देश, मुक्त पवन
मुक्त धरा, मुक्त गगन
मुक्त बने मानव मन
द्वेष- भाव करे दहन
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होली तो होली है, होनी को होना है
शंका-अरि बनना ही शंकर सम होना है
श्रद्धा-विश्वास ही गौरी सह गौरा है
चेत न मन, अब तुझको चेतन ही होना है
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मुक्त कथ्य, भाव,बिम्ब,रस प्रतीक चुन ले रे!
शब्दों के धागे से कबिरा सम बुन ले रे!
अक्षर भी क्षर से ही व्यक्त सदा होता है
देना ही पाना है, 'सलिल' सत्य गुण ले रे!!
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लघुकथा:
गरम आँसू
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टप टप टप
चेहरे पर गिरती अश्रु-बूँदों से उसकी नीद खुल गयी, सास को चुपाते हुए कारण पूछा तो उसने कहा- 'बहुरिया! मोय लला से माफी दिला दे रे!मैंने बापे सक करो. परोस का चुन्ना कहत हतो कि लला की आँखें कौनौ से लर गयीं, तुम नें मानीं मने मोरे मन में संका को बीज पर गओ. सिव जी के दरसन खों गई रई तो पंडत जी कैत रए बिस्वास ही फल देत है, संका के दुसमन हैं संकर जी. मोरी सगरी पूजा अकारत भई'
''नई मइया! ऐसो नें कर, असगुन होत है. तैं अपने मोंडा खों समझत है. मन में फिकर हती सो संका बन खें सामने आ गई. भली भई, मो खों असीस दे सुहाग सलामत रहे.''
एक दूसरे की बाँहों में लिपटी सास-बहू में माँ-बेटी को पाकर मुस्कुरा रहे थे गरम आँसू।
९-३-२०१६
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सोरठा सलिला
भजन-कीर्तन नित्य, करिए वंदना-प्रार्थना।
रीझे ईश अनित्य, सफल साधना हो 'सलिल'।
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हों कृपालु जगदीश , शांति-राज सुख-चैन हो।
अंतर्मन पृथ्वीश, सत्य सहाय सदा रहे।।
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ऐसे ही हों कर्म, गुप्त चित्र निर्मल रहे।
निभा 'सलिल' निज धर्म, ज्यों की त्यों चादर रखे।।
९-३-२०१०
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