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गुरुवार, 23 जुलाई 2026

अरुण अर्णव खरे, पुरोवाक, दोहा संग्रह

पुरोवाक्

दोहा दोहा नारियाँ, महक रहीं फुलवारियाँ

आचार्य संजीव वर्मा ''सलिल''

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छंद: उद्भव, वर्गीकरण, अंग

            सृष्टि का उद्भव नाद अथवा ध्वनि से हुआ है। ध्वनि जीव के कंठ से नि:सृत हुई तो उच्चार कहलाई। उच्चार-काल के आधार पर उच्चार दो प्रकार लघु व गुरु हुए। लघु-गुरु उच्चारों के विविध समयोजनों से गण, गणों के संयोजन से गति-यति व लय की विविधता के आधार पर छंद पहचाने और रचे गए। इस शिल्पगत परिधान के मूल में जो कथ्य कहा गया वह मनोभावों और विचारों से निर्गत हुआ। विचार प्रधान व्याकरण आधृत अभिव्यक्ति को गद्य तथा भाव प्रधान पिंगल आधृत अभिव्यक्ति को पद्य कहा गया। छंद एक ऐसी पद्य रचना को कहा जाता है जिसे निश्चित चरण, वर्ण, मात्रा, गति, यति, तुक, और गण आदि से संबंधित नियमों के अनुसार निबंधित किया जाता है। ‘छंद’ शब्द ‘चद्’ धातु से बना है और इसका अर्थ ‘आह्लादित करना’ या ‘खुश करना’ होता है। यह आह्लाद वर्ण या मात्राओं की नियमित संख्या के विन्यास से उत्पन्न होता है। साधारण शब्दों में, जब वर्णों या मात्राओं की नियमित संख्या के विन्यास से उत्पन्न चमत्कार से आह्लाद पैदा होता है, तब उसे ‘छंद’ कहा जाता है। ‘छंद’ का प्रथम उल्लेख ऋग्वेद में है।

            छंद के अंग पद / पाद (पंक्ति), चरण (पदांश), गति (प्रवाह), यति (विराम स्थल), तुक (समान उच्चारण युक्त शब्द), तुकांत (टूक का अंतिम वर्ण), पदांत (पद का अंतिम वर्ण), वर्ण (अक्षर संख्या), मात्रा (उच्चार गणना) तथा गण (३-३ उच्चारों के ८ समूह यगण, मगण, तगण, रगण, जगण, भगण, नगण, सगण, गण सूत्र- यमाताराजभान सलगा) आदि होते हैं।

            छंद का वर्गीकरण या जाति निर्धारण वर्ण संख्या, मात्रा संख्या, पदभार, गति, रस, वृत्त, अलंकार और भाषा रूप के आधार पर किया जा सकता है। अंग्रेजी में छंद को 'Meta' और कभी-कभी 'Verse' भी कहते हैं।‘गद्य’ का नियामक ‘व्याकरण’ तथा ‘पद्य’ का नियामक ‘छंद शास्त्र’ है। छंद प्रणेता आचार्य पिंगल के नाम पर छंद शास्त्र को ‘पिंगल’ कहा जाता है।

            वर्ण संख्या के आधार पर रचित छंदों को ''वार्णिक'' तथा मात्रा संख्या के आधार पर रचित छंदों को ''मात्रिक'' कहा जाता है। ३२ मात्राओं से अधिक पदभार के छंदों को ''दंडक'', ८-८-८-८ पर यतियुक्त छंदों को ''घनाक्षरी'' तथा २२ से २६ वर्णयुक्त छंदों को ''सवैया'' कहा जाता है।

मात्रा गणना

            छंद रचना उच्चार के आधार पर की जाति है। उच्चार को लिपिबद्ध करने पर अल्प कालिक उच्चारवाही वर्ण को लघु अर्थात 1 तथा दीर्घकालिक उच्चारवाही वर्ण को गुरु या 2 गिना जाता है। अ, इ, उ, ऋ तथा चंद्र बिंदी वाले ह्रस्व वर्ण लघु तथा दीर्घ मात्राभर युक्त वर्ण, बिंदी युक्त वर्ण तथा अर्ध उच्चार युक्त लघु वर्ण गुरु होते हैं। उज्ज्वल जैसे शब्दों में दोनों अर्ध वर्ण लघु होंगे। संयुक्ताक्षर में आरंभ का अर्ध स्वर नहीं गिना जाता। हलंत लघु होते हैं। दो गुरु के मध्य में अर्ध वर्ण नहीं गिना जाता। दो लघु के बीच में अर्ध वर्ण सामान्यत: पूर्व वर्ण के साथ गिना तथा अपवादवत पश्चातवर्ती वर्ण के साथ गिना जाता है। यथा जन्तु २१, हंस २१ गिने जाएँगे जबकि कन्हैया १२२ गिना जाएगा।
दोहा रचना, प्रकार और शिल्प

            दोहा अर्ध सम मात्रिक छंद है जिसमें २ पद और ४ चरण होते हैं। २ विषम (पहला, तीसरा) चरण १३ मात्रिक तथा २ सम (दूसरा, चौथा) चरण ११ मात्रिक होते हैं। दोहे के पदादि में वाचिक दुहराव तथा पदांत में गुरु-लघु उच्चार (तगण या जगण) अनिवार्य है।

            दोहा हिन्दी साहित्य का सर्वकालिक सर्वाधिक लोकप्रिय छंद है। शृंगार (संयोग-वियोग), करुण, हास्य, वीर, रौद्र, भयानक, वीभत्स, अद्भुत, शांत, वात्सल्य तथा भक्ति सभी 11 रसों का परिपाक दोहा में भली प्रकार हो सका है। हिन्दी के सभी अलंकारों की शोभा दोहा पर खूब सजे हैं। अमिधा, लक्षणा तथा व्यंजना तीनों शब्द शक्तियाँ दोहा में प्राण फूँक सकी हैं। हिन्दी के तीनों शब्द गुण प्रयासद, माधुरी और ओज ने दोहा के रूप को निखारा-सँवारा है। दोहा में लघु-गुरु मात्राओं के विविध संयोजनों के आधार पर दोहा के 23 प्रकार (भ्रमर, सुभ्रमर, क्षरभ, श्येन, मंडूक, मर्कट, करभ, नर, हंस, गयंद, पयोधर, बल, पान, त्रिकल, कच्छप, मच्छ, शार्दूल, अहीवर, व्याल, विडाल, उदर, श्वान, सर्प) हैं। इस पृष्ठ भूमि में हिन्दी में बहु विधायी सृजनरत प्रतिष्ठित साहित्यकार इं. अरुण अर्णव खरे रचित इस दोहा संकलन का अध्ययन कर आनंद होता है।

    हिन्दी काव्य साहित्य में सर्वाधिक संग्रह दोहा के प्रकाशित होते हैं। सतसई (७०० दोहे) और सहस्त्रई (१००० दोहे) भी खूब लिखी गई हैं। एक लाख दोहे लिखने का दावा करने वाले भी हैं। दोहे का उपयोग महाकाव्य में अन्य छंदों के साथ पर्याय: किया जाता है लोक में उक्तियों और मुहावरों के रूप में भी दोहा खूब कहा जाता है। प्रचुर लेखन के बाद भी दोहा पुराना या बासी नहीं लगता। सामर्थ्यवान कलम मिलते ही दोहा पुनर्जीवित होकर नवानंद और रसानंद की जय-जयकार करने लगता है।

    अरुण अर्णव जी अभियंता हैं। अभियांत्रिकी उनके व्यक्तित्व में रची-बसी है। किसी परियोजना को मूर्त करने के पूर्व चरणवार प्राक्कलन बनाना, रूपांकन-रेखांकन, स्थल चयन, विविध निर्माण सामग्री कब, कहाँ और कितनी चाहिए, उस निर्माण सामग्री का उपयोग करने के लिए कब कितनी तरह के कितने कारीगर और यंत्रोपकरण चाहिए, उन्हें कहाँ से कौन लाएगा, भंडारण कहाँ होगा, गुणवत्ता की जांच कैसे होगी, क्रियान्वयन कौन कराएगा-करेगा, भूमि पूजन, कार्य का माप और मूल्यांकन, उद्घाटन अर्थात शून्य में सृजन की कल्पना कर उसे साकार करना। यह समूची प्रक्रिया इस दोहा संकलन की पांडुलिपि पढ़कर उसमें समाहित मिली। सामान्य दोहा संग्रहों की घिसी-पिटी अनेक बार पूर्व में प्रयुक्त हो चुकी रूपरेखाओं से सर्वथा अलग इस संकलन में आदि से अंत तक मौलिकता है। यह संकलन अरुण अर्णव ने अपने को प्रभावित करने वाली नारी रत्नों को केंद्र में रखकर लिखा है। अम्मा, भगिनी, भाभी, संगिनी, बेटी, पुत्रवधू और नवासी शीर्षक ७ अध्यायों में वर्गीकृत इन दोहों में रिश्तों-नातों की सुगंध समाई हुई है। हर दोहे में भावनाओं की सघनता और संप्रेषणीयता में सहजता, अपनत्व का भाव मन में रस माधुरी घोल देता है। ऐसा प्रतीत होता है कि दोहा अरुण के जीवन की नहीं पाठक के जीवन की बानगी पेश कर रहा है।

    ''अम्मा'' शीर्षक अध्याय वंदनीय अम्मा, ममता, संस्कार, कर्तव्य, समभाव, रिश्तों की धुरी, बाबूजी और अम्मा, स्मृतियों में अम्मा, बदलता समय तथा प्रार्थना उपशीर्षकों में विभाजित किया गया है। हर शीर्षक अम्मा के व्यक्तित्व और कृतित्व की कीर्तिकथा कहकर धन्य होता है। अम्मा की कुछ विशिष्ट छवियों के दर्शन कर खुद को धन्य कीजिए-

आया जब मुश्किल समय, दस्तक देते द्वार।
चढ़ा चटकनी बन गईं, अम्मा पहरेदार।।

जादूगर उस्ताद थीं, या फिर सिद्ध फकीर।
कभी बिगड़ने दी नहीं, रिश्तों की तासीर।।

            सामान्यत: माता-पिता के दाम्पत्य में अनुराग के क्षण बच्चों की दृष्टि से ओझल और अचर्चित रहे आते हैं। अरुण ने बाबूजी की डायरी के माध्यम से उन्हें इस तरह उद्घाटित किया है कि साँप भी मार जाए और लाठी भी न टूटे-

पढ़ बाबू की डायरी, खुला राज ये आप।
अम्मा भी थी चटपटी, जैसे आलूचाप।।

पहले पन्ने पर लिखा, अम्मा हैं चितचोर।
प्रथम नजर में कर दिया, हमको भाव विभोर।।

प्रिये, सखे अरु प्रियतमा, रचा चिरंतन गान।
बाबू के हर शब्द में, अम्मा का सम्मान।।

            दूसरा अध्याय ''भगिनी'' बहना, विवाह, कर्तव्य, आशीर्वाद, तीज-त्यौहार, उदासी, आनंद, कामना तथा असुरक्षा के बिंदुओं से निर्मित है। भाई-बहिन का सावनी नाता रक्षाबंधन के धागों में गुँथकर जीवन में मधुर स्मृतियाँ घोलता रहता है। बेटी के बहू बन जाने पर मिले नए दायित्व और बहुओं के साथ होते अत्याचार के समाचार पढ़कर बेटी की फिक्र इन दोहों में जीवंत है-

सत्रह की बहना हुई, छूटा पावन साथ।
बाबू जी ने कर दिए, पीले उसके हाथ।।

क्या दिन भर निर्जल रहीं, पहला करवा चौथ।
भूख-प्यास होगी लगी, तुमको दीदी 'भौत'।।

अम्मा हो जाती दुखी, पढ़ करके अखबार।
तेल छिड़क कर बेटियाँ, जीवन जातीं हार।।

            ''भाभी'' एक ऐसा बहु आयामी संबंध है जिसमें माँ, बहिन और सखी तीनों का गंगो-जमुनी रंग घुल जाता है। आगमन। पारिवारिक प्रसंग, अपनापन, व्यवहार, व्यक्तित्व, उत्सव, परिवर्तन और अकेलापन के सोपानों पर बढ़ते हुए अरुण इस रिश्ते की पड़ताल कर सके हैं-

गृह प्रवेश पर ससुर ने, किया अनूठा काम।
नेमप्लेट पर था लिखा, भाभी जी का नाम।।

देवर जब गलती करे, भाभी बनती ढाल।
संकट कितना भी बड़ा, लेती उसे सँभाल।।

अंकगणित से कठिन है, रिश्ते रखना जोड़।
पर भाभी के पास है, हर उलझन का तोड़।।

पोला, कजरी, नोरता, और भुजरिया ज्वार।
भाभी सँग घर आ गए, दर्जन भर त्यौहार।।

            इस अध्याय का सर्वाधिक मार्मिक पक्ष कोरोना में भाई के दिवंगत हो जाने के बाद भाभी की पीड़ा का चित्रण है-

चश्मा, कागज़, डायरी, यादों के कुछ द्वार।
इनमें ही अब बस गया, भाभी का संसार।।

            जिससे जुड़कर अपूर्ण जीवन पूर्ण होता है उस अर्धांगिनी को समर्पित ''संगिनी'' शीर्षक अध्याय आनंद, उमंग, मस्ती, आह्लाद, उल्लास, मनुहार, लज्जा, मिलन, सान्निध्य, समर्पण, संगिनी, कर्तव्य, संस्कार, विरह,जीवन मन्त्र और प्रेम की पूर्णता की झलक दिखाकर पाठक को अपने साथ जोड़ सका है-

उपवन, मौसम, चाँदनी, तुमसे मेरे छंद।
तुमसे अधरों पर हँसी, तुमसे सब आनंद।।

जवाकुसुम सा रूप पा, वाणी घुली मिठास।
तन चंदन-सा हो गया, मन हो गया उजास।।

तन-मन वृंदावन हुआ, साँसों भरी सुवास।
जीवन में तुम आ गए, जबसे इतने पास।।

विपदा को करके ड्रिबल, करी सुरक्षित राह।
तुम जैसे भार्या मिले, जन्म-जन्म है चाह।।

            ग्रहस्थ जीवन की पूर्णता संतान प्राप्त कर ही होती है। बेटे की अपेक्षा बेटी पर लाड़-प्यार अधिक होता है। अरुण ने बेटी से लाड़ लड़ाते हुए मंगलाचरण, जन्मोत्सव, बालपन, गुड़ियों का संसार, संवेदना, धींगा-मस्ती, सपनों की उड़ान, विवाह, आशीष, सात समंदर पार, मातृत्व, अलविदा तथा बेटी होना गर्व है उप शीर्षकों में दोहों के स्मृति सुमन समर्पित किए हैं-

बेटी घर की जिंदगी, खुशियों का परिवेश।
घर की हर दीवार में, उसका मौन निवेश।।

बेटी ने कविता रची, सच को दिया उघार।
मम्मा आँख दिखाएँ जब, लगतीं थानेदार।।

गुड्डे, गुड़ियाँ, पालकी, बैठे सभी उदास।
बेटी होकर जब विदा, चली पिया के पास।।

नन्हे हाथों ने दिया, जीवन को विस्तार।
बेटी से माँ बन गई, ईश्वर का उपहार।।

सपनों पर ताले लगे, आधी रही उड़ान।
बाज दबा कर ले गया, गौरैया की जान।।

            इस संकलन की नवता पुत्रवधू को समर्पित आगमन, गृहलक्ष्मी, संस्कार, ठिठोली, आत्मीयता, आशीष, अन्नपूर्णा, कर्तव्य, सामंजस्य, मातृत्व, जननी, आभासी-संसार तथा स्वाभिमान शीर्षक दोहे हैं। संभवत: पहली बार किसी ससुर ने बहू को यह मान दिया है कि उसे अपने रचना संसार का केंद्र बनाया है। इस पवित्र तथा कोमल संबंध में दूरी और निकटता एक साथ पलती है। अरुण नी इस संबंध को दोहों में जीवंत करने में सफलता पाई है-

पग धरते ही घर हुआ, खुशियों से गुलज़ार।
पुत्रवधू के रूप में, मिला हमें उपहार।।

निकली दो ही साड़ियाँ, पर दर्जन भर जीन।
भौजी की फूटी हँसी, सासू जी ग़मगीन।।

कभी बने अभिभाविका, कभी सखी मुँहजोर।
जोड़ी भाभी-ननद की, कोमल और कठोर।।

पढ़ी-लिखी आई बहू, लेकर नए विचार।
उड़ने को दो नभ उसे, करो नहीं इंकार।।

मुखड़े पर घूँघट लिए, अधरों पर मुस्कान।
भीतर कितने प्रश्न हैं, घरवाले अनजान।।

दादी ने ताड़ा तुरत, चाल-ढाल, व्यवहार।
जब छुपकर खाने लगी, इमली और अचार।।

नव जीवन का आगमन, दिया श्रेष्ठ उपहार।
कुल-दीपक की ज्योति से, रोशन घर-परिवार।।

लड़की हो या हो बहू, बदल गई तस्वीर।
आँचल में है दूध पर, नहीं नयन में नीर।।

            इस संकलन की पूर्णता होती है ''नवासी'' नामित अध्याय से जिसमें समाहित हैं आगमन, एहसास, शरारतें, बचपन, संस्कार, आशीष, सीख, उड़ान, परंपरा और माँ के न रहने पर उपशीर्षक। जीवन की सर्वाधिक बड़ी त्रासदी शैशव में माँ को खोना ही है। अरुण ने कलेजे पर पत्थर रखकर बेटी का महाप्रस्थान देखा और नातिन को सम्हालते हुए उसकी अकथनीय पीड़ा को शब्द दिए- 

सात समुंदर पार से, आया सुख-संदेश।
लाडो के घर लाड़ली, धन्य हुआ परिवेश।।

नातिन की बोली मधुर, बेटी की पहचान।
तुतला कर "नानू" कहे, पुलकित हो मन-प्राण।।

नानी की साड़ी पहन, इतराती हर ओर।
नातिन की शैतानियाँ, करतीं भाव विभोर।।

सात साल की उमर में, तज गुड़ियों का खेल।
जिम्मेदारी ओढ़ ली, कर पीड़ा से मेल।।

सर पर जबसे पड़ गई, जिम्मेदारी आन।
भैया का रखने लगी, मम्मा जैसा ध्यान।।

            जीवन में धूप-छाँव की तरह सुख-दुख का आते-जाते रहते हैं। अरुण अर्णव ने दोहों के माध्यम से साँसों की कथा और मन की व्यथा नातों का ताना-बयान बुनते हुए कही और खूब कहीं है। ऐसे आत्म कथात्मक दोहों की सरस, सहज अभिव्यक्ति पाठक को आनंद और करुणा की लहरों पर नौकायन करती हुई जियावन के अंतिम सत्य से साक्षात करती हैं। इन दोहों में अनेक समाज सुधार और परिवार संभार के कई संदेश बिन कहे कह दिए गए हैं। घर पर बहू का नाम लिखाना, बहू को घर की चाबी सौंपना, पढ़ी-लिखी बहू को उसके अनुसार वातावरण देना, बेटी और बहू द्वारा ससुराल के रिश्तों को सम्मान देते हुए आत्मीयता का विस्तार करना, भाई के देहावसान के बाद भाभी का दर्द बाँटना, बेटी के न रहने पर नातिन-नाती का ध्यान रखना, यही तो परिवार की शक्ति है जिसके सहारे हर ऊँच-नीच को जीतने की जिजीविषा बची रहती है। इस सार्थक दोहा संकलन की रचना हेतु अरुण अर्णव को बधाई। हिन्दी के हर सजग पाठक को इसे पढ़ना और परिवारजनों को पढ़ाना चाहिए। 
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संपर्क- विश्ववाणी हिन्दी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१ 
चलभाष: ९४२५१८३२४४ ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

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