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सोमवार, 19 सितंबर 2022

आचार्य धर्मेंद्र, बाल गीत, नव गीत, निशा तिवारी, साधना वर्मा

महाप्रस्थान : आचार्य धर्मेंद्र

विश्व हिन्दू परिषद के केंद्रीय मार्गदर्शक मंडल में शामिल रहे, राम मंदिर आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभानेवाले हिंदू नेता व संत आचार्य धर्मेंद्र का आज निधन हो गया है। उन्होंने जयपुर के एसएमएस हॉस्पिटल के आईसीयू में इलाज के दौरान अंतिम सांस ली। गौरतलब है कि बीते एक माह से खराब स्वास्थ्य के कारण जयपुर के इस अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था। आचार्य धर्मंद्र आंत की बीमारी से पीड़ित थे।
श्रीपंचखण्ड पीठाधीश्वर आचार्य स्वामी धर्मेंद्र महाराज सनातन धर्म के अद्वितीय व्याख्याकार, प्रखर वक्ता और ओजस्वी वाणी के रामानंदी संत थे। हुतात्मा रामचन्द्र शर्मा 'वीर' महाराज के पुत्र आचार्य धर्मेंद्र ने राम मंदिर आंदोलन में भी सक्रिय भूमिका निभाई थी। आचार्य के पिता महात्मा रामचन्द्र वीर ने लगातार अनशन करके स्वयं को नरकंकाल जैसा बनाकर अनशनों के सारे कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए। उन्होंने शपथ ली थी की जब तक लाहौर से ढाका तक अखंड हिन्दू राष्ट्र स्थापित नहीं होगा वे अन्न और लवण (नमक) का सेवन नहीं करेंगे और इस शपथ का आजीवन पालन किया। हिन्दू मंदिरों में गौ हत्या और पशुबलि बंद करने के लिए महात्मा वीर ने पूरे भारत में अनशन किए। वे पशुओं के स्थान पर खुद को बलि हेतु प्रस्तुत कर कहते थे कि माँ (काली) यदि संतान की बलि से प्रसन्न होती है तो पशु क्यों मेंरी बलि दो। आचार्य धर्मेंद्र अपने पिता के साथ बचपन से ऐसे आंदोलनों का हिस्सा रहे। आचार्य धर्मेंद्र ने अपनी कैशोर्यावस्था में ही वज्रांग वंदना और गौशाला जैसी उत्कृष्ट कृतियों की रचना की थी। १९५८-५९ में मेरे पिताश्री राजबहादुर वर्मा जी छिंदवाड़ा में जेलर थे। तब हुतात्मा स्वामी रामचंद्र शर्मा 'वीर' ने गौ हत्या के विरुद्ध अनशन किया था और उन्हें गिरफ्तार कर जेल में रखा गया था। उनके साथ किशोर धर्मेंद्र भी थे। स्वामी जी नैष्ठिक और दृश्य संकल्पित संत थे। उनका आहार आदि पूरी तरह सात्विक था। जेल में उन्हें पूजन सामग्री और आहार सुलभ करने का पिताश्री पूरी तरह ध्यान रखते थे। कभी-कभी घर से भी भिजवा दिया करते थे। स्वामी जी ने उन्हें अपनी पुस्तकें विकट यात्रा, विजय पताका, हिन्दू नारी तथा धर्मेंद्र जी रचित गोशाला भेंट की थी, जो मेरे पास अब तक सुरक्षित है। वज्रांग वंदना कहीं खो गई।

आचार्य धर्मेन्द्र का पहली धर्म संसद अप्रैल १९८४ में विश्व हिन्दू परिषद् की ओर से धर्म संसद में राम जन्मभूमि के द्वार से ताला खुलवाने के लिए जनजागरण यात्राएँ करने का प्रस्ताव पारित करने और राम जानकी रथ यात्रा और विश्व हिन्दू परिषद की ओर से अक्तूबर १९८४ में जनजागरण के लिए की गई सीतामढ़ी से दिल्ली तक राम जानकी रथ यात्रा में अहम योगदान रहा। आचार्य धर्मेंद्र ने जयपुर के तीर्थ विराट नगर के पार्श्व पवित्र वाणगंगा के तट पर मैड गाँव में अपना जीवन व्यतीत किया। गृहस्थ होते हुए भी उन्हें साधु-संतों के समान आदर और सम्मान प्राप्त था। जगद्गुरु शंकराचार्य निरंजनदेव तीर्थ ने ७२ दिन,संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी ने ६५ दिन आचार्य धर्मेन्द्र ने ५२ दिन और जैन मुनि सुशील कुमार ने ४ दिन अनशन किया। आन्दोलन में पहली महिला सत्याग्रह का नेतृत्व प्रतिभा धर्मेन्द्र ने किया और अपने तीन शिशुओ के साथ जेल गई। साथ ही विश्व हिंदू परिषद से लंबे समय तक जुड़े रहने के दौरान चर्चा में रहे थे। वे राममंदिर मुद्दे पर बड़ी ही बेबाकी से बोलते थे। बाबरी विध्वंस मामले में जब फैसला आने वाला था तब आचार्य धर्मेंद्र ने कहा था कि मैं आरोपी नंबर वन हूं। सजा से डरना क्या? जो किया सबके सामने किया। आचार्य का जन्म ९ जनवरी १९४२ को गुजरात के मालवाडा में हुआ। बाबरी विध्वंस मामले में लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, कल्याण सिंह, उमा भारती सहित आचार्य धर्मेंद्र को भी आरोपी माना गया था।
आचार्य धर्मेंद्र के परिवार में दो पुत्र सोमेन्द्र शर्मा और प्रणवेन्द्र शर्मा है। सोमेन्द्र की पत्नी और आचार्य की पुत्रवधू अर्चना शर्मा वर्तमान में गहलोत सरकार में समाज कल्याण बोर्ड की अध्यक्ष हैं। राजस्थान के विराटनगर में उनका मठ और पावनधाम आश्रम है, जहां उनका विधी-विधान पूर्वक उनके शिष्यों और अनुयायियों के बीच अंतिम संस्कार किया जाएगा।
बाल गीत
🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃
पानी दो, अब पानी दो
मौला धरती धानी दो, पानी दो...
*
तप-तप धरती सूख गयी
बहा पसीना, भूख गई.
बहुत सयानी है दुनिया
प्रभु! थोड़ी नादानी दो, पानी दो...
*
टप-टप-टप बूँदें बरसें
छप-छपाक-छप मन हरषे
टर्र-टर्र बोले दादुर
मेघा-बिजुरी दानी दो, पानी दो...
*
रोको कारें, आ नीचे
नहा-नाच हम-तुम भीगे
ता-ता-थैया खेलेंगे
सखी एक भूटानी दो, पानी दो...
*
सड़कों पर बहता पानी
याद आ रही क्या नानी?
जहाँ-तहाँ लुक-छिपते क्यों?
कर थोड़ी मनमानी लो, पानी दो... *
छलकी बादल की गागर
नचे झाड़ ज्यों नटनागर
हर पत्ती गोपी-ग्वालन
करें रास रसखानी दो, पानी दो...
१९-९-२०१७ *
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***

पुस्तक चर्चा -
वर्तमान युग का नया चेहरा: 'काल है संक्रांति का'
समीक्षक: डॉ. निशा तिवारी
*
[पुस्तक विवरण- काल है संक्रांति का, गीत-नवगीत संग्रह, आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', वर्ष २०१६, आवरण बहुरँगी, आकार डिमाई, पृष्ठ १२८, मूल्य सजिल्द ३००/-, पेपरबैक २००/-, समन्वय प्रकाशन, २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, ०७६१२४१११३१, गीतकार संपर्क- ९४२५१८३२४४, salil.sanjiv@gmail.com
*
'काल है संक्रांति का' संजीव वर्मा 'सलिल' का २०१६ में प्रकाशित नवीन काव्य संग्रह है। वे पेशे से अभियंता रहे हैं। किन्तु उनकी सर्जक प्रतिभा उर्वर रही है। सर्जना कभी किसी अनुशासन में आबद्ध नहीं रह सकती। सर्जक की अंत:प्रज्ञा (भारतीय काव्य शास्त्र में 'प्रतिभा' काव्य शास्त्र हेतु), संवेदनशीलता, भावाकुलता और कल्पना किसी विशिष्ट अनुशासन में बद्ध न होकर उन्मुक्त उड़ान भरती हुई कविता में निःसृत होती है। यही 'सलिल जी' की सर्जन-धर्मिता है। यद्यपि उनके मूल अनुशासन का प्रतिबिम्ब भी कहीं-कहीं झलककर कविता को एक नया ही रूप प्रदान करता है। भौतिकी की 'नैनो-पीको' सिद्धांतिकी जिस सूक्ष्मता से समूह-क्रिया को संपादित करती है, वह सलिल जी के गीतों में दिखाई देती है। उत्तर आधुनिक वैचारिकी के अन्तर्गत जिस झंडी-खण्ड चेतना का रूपायन सम-सामयिक साहित्य में हो रहा है वही चिन्तना सलिल जी के गीतों में सांस्कृतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, राजनीतिक, साहित्यिक विसंगतियों के रूप में ढलकर आई है- रचनाकार की दृष्टि में यही संक्रांति का काल है। संप्रति नवलेखन में 'काल' नहीं वरन 'स्पेस' को प्रमुखता मिली है।
शब्दों की परंपरा अथवा उसके इतिहास के बदले व्यंजकों के स्थगन की परिपाटी चल पड़ी है। सलिल जी भी कतिपय गीतों में पुराने व्यंजकों को विखण्डित कर नए व्यंजकों की तलाश करते हैं। उनका सबसे प्रिय 'व्यंजक' सूर्य है। उनहोंने सूर्य के 'आलोक' के परंपरागत अर्थ 'जागरण' को ग्रहण करते हुए भी उसे नए व्यंजक का रूप प्रदान किया है। 'उठो सूरज' गीत में उसे साँझ के लौटने के संदर्भ में 'झुको सूरज! विदा देकर / हम करें स्वागत तुम्हारा' तथा 'हँसों सूर्य भाता है / खेकर अच्छे दिन', 'आओ भी सूरज! / छँट गए हैं फुट के बदल / पतंगें एकता की मिल उड़ाओ। / गाओ भी सूरज!', 'सूरज बबुआ! / चल स्कूल। ', 'हनु हुआ घायल मगर / वरदान तुमने दिए सूरज!', 'खों-खों करते / बादल बब्बा / तापें सूरज सिगड़ी' इत्यादि व्यंजक सूरज को नव्यता प्रदान करते हैं, यद्यपि कवि का परंपरागत मन सूरज को 'तिमिर-विनाशक' के रूप में ही ग्रहण करता है।
कवि का परंपरागत मन अपने गीतों में शास्त्रीय लक्षण ग्रन्थों के मंगलाचरण के अभियोजन को भी विस्मृत नहीं कर पाता। मंगलाचरण के रूप में वह सर्वप्रथम हिंदी जाति की उपजाति 'कायसिहों' के आराध्य 'चित्रगुप्त जी' की वंदना करता है। यों भी चित्रगुप्त जी मनुष्य जाति के कर्मों का लेखा-जोखा रखनेवाले देवता हैं। ऐसा माना जाता है कि उत्तर आधुनिक युग में धर्मनिरपेक्षता का तत्व प्रबल है- कवि की इस वन्दना में चित्रगुप्त जी को शिव, ब्रम्हा, कृष्ण, पैग़ंबर, ईसा, गुरु नानक इत्यादि विभिन्न धर्मों के ईश्वर का रूप देकर सर्वधर्म समभाव का परिचय दिया गया है। चित्रगुप्त जी की वन्दना में भी कवि का प्रिय व्यंजक सूर्य उभरकर आया है - 'तिमिर मिटाने / अरुणागत हम / द्वार तिहरे आए।'
कला-साहित्य की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती की अभ्यर्थना में कवि ने एक नवीन व्यंजना करते हुए ज्ञान-विज्ञान-संगीत के अतिरिक्त काव्यशास्त्र के समस्त उपादानों की याचना की है और सरस्वती माँ की कृपा प्राप्त प्राप्त करने हेतु एक नए और प्रासंगिक व्यंजक की कल्पना की है- 'हिंदी हो भावी जगवाणी / जय-जय वीणापाणी।' विश्वभाषा के रूप में हिंदी भाषा की यह कल्पना हिंदी भाषा के प्रति अपूर्व सम्मान की द्योतक है।
हिन्दू धर्म में प्रत्येक मांगलिक कार्य के पूर्व अपने पुरखों का आशिर्वाद लिया जाता है। पितृ पक्ष में तो पितरों के तर्पण द्वारा उनके प्रति श्रद्धा प्रगट की जाती है। गीत-सृजन को अत्यंत शुभ एवं मांगलिक कर्म मानते हुए कवि ने पुरखों के प्रति यही श्रद्धा व्यक्त की है। इस श्रद्धा भाव में भी एक नवीन संयोजन है- 'गीत, अगीत, प्रगीत न जानें / अशुभ भुला, शुभ को पहचानें / मिटा दूरियाँ, गले लगाना / नव रचनाकारों को ठानें कलश नहीं, आधार बन सकें / भू हो हिंदी-धाम। / सुमिर लें पुरखों को हम / आओ! करें प्रणाम।' कवि अपनी सीमाओं को पहचानता है, सर्जना का दंभ उसमें नहीं है और न ही कोई दैन्य है। वह तो पुरखों का आशीर्वाद प्राप्त कर केवल हिंदी को विश्व भाषा बनाने का स्वप्न पूरा करना चाहता है। यदि चित्रगुप्त भगवान की, देवी सरस्वती की और पुरखों की कृपा रही तो हिंदी राष्ट्रभाषा तो क्या, विश्व भाषा बनकर रहेगी। सलिल जी के निज भाषा-प्रेम उनके मंगलाचरण अथवा अभ्यर्थना का चरम परिपाक है।
उनकी समर्पण कविता इस दृष्टि से उल्लेखनीय है कि उनहोंने उसमें रक्षाबन्धन पर्व की एक सामान्यीकृत अभिव्यंजना की है। बहिनों के प्रत्येक नाम संज्ञा से विशेषण में परिवर्तित हो गए हैं और रक्षासूत्र बाँधने की प्रत्येक प्रक्रिया, आशाओं का मधुवन बन गयी है। मनुष्य और प्रकृति का यह एकीकरण पर्यावरणीय सौंदर्य को इंगित करता है। 'उठो पाखी' कविता में भी राखी बाँधने की प्रक्रिया प्रकृति से तदाकार हो गयी है।
कविता मात्र वैयक्तिक भावोद्गार नहीं है, उसका सामाजिक सरोकार भी होता है। कभी-कभी कवि की चेतना सामाजिक विसंगति से पीड़ित और क्षुब्ध होकर सामाजिक हस्तक्षेपभी करती है। श्री कान्त वर्मा ने आलोचना को 'सामाजिक हस्तक्षेप' कहा है। मेरी दृष्टि में कविता भी यदा-कदा सामाजिक हस्तक्षेप हुआ करती है। प्रतिबद्ध कवि में तो यह हस्तक्षेप निरन्तर बना रहता है। कवि सलिल ने राजनैतिक गुटबाजी, नेताओं अफसरों की अर्थ-लोलुपता, पेशावर के न्र पिशाचों की दहशतगर्दी, आतंकवाद का घिनौना कृत्य, पाक की नापाकी, लोकतंत्र का स्वार्थतंत्र में परिवर्तन, अत्याचार और अनाचार के प्रति जनता का मौन,नेताओं की गैर जिम्मेदारी, स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद भी राजनीतिक कुतंत्र में वास्तविक आज़ादी प्राप्त न कर पाना इत्यादि कुचक्रों पर गीत लिखकर अपनी कृति को 'काल है संक्रांति का' नाम दिया है। वास्तव में देश की ये विसंगतियाँ संक्रमण को सार्थक बनाती हैं किन्तु उनके गीत 'संक्रांति काल है' -में संक्रांति का संकेत भर है तथा उससे निबटने के लिए कवी ने प्रेरित भी किया है। यों भी छोटे से गीत के लघु कलेवर में विसंगति के विस्तार को वाणी नहीं दी जा सकती। कवि तो विशालता में से एक चरम और मार्मिक क्षण को ही चुनता है। सलिल ने भी इस कविता में एक प्रभावी क्षण को चुना है। वह क्षण प्रभावोत्पादक है या नहीं, उसकी चिंता वे नहीं करते। वे प्रतिबद्ध कवु न होकर भी एक सजग औए सचेत कवि हैं।
सलिल जी ने काव्य की अपनी इस विधा को गीत-नवगीत कहा है। एक समय निराला ने छंदात्मक रचना के प्रति विद्रोह करते हुए मुक्त छंद की वकालत की थी लेकिन उनका मुक्त छंद लय और प्रवाह से एक मनोरम गीत-सृष्टि करता था। संप्रति कविताएँ मुक्त छंद में लिखी जा रही हैं किन्तु उनमें वह लयात्मकता नहीं है जो जो उसे संगीतात्मक बना सके। ऐसी कवितायेँ बमुश्किल कण्ठस्थ होती हैं। सलिल जी ने वर्तमान लीक से हटकर छंदात्मक गीत लिखे हैं तथा सुविधा के लिए टीप में उन छंदों के नाम भी बताए हैं। यह टीप रचनाकार की दृष्टि से भले ही औचित्यपूर्ण न हो किन्तु पाठक-समीक्षक के लिए सुगम अवश्य है। 'हरिगीतिका' उनका प्रिय छंद है।
सलिल जी ने कतिपय अभिनव प्रयोग भी किये हैं। कुछ गीत उनहोंने बुन्देली भाषा में लिखे हैं। जैसे- 'जब लौं आग' (ईसुरी की चौकड़िया फाग की तर्ज पर), मिलती कांय नें (ईसुरी की चौकड़िया फाग पर आधारित) इत्यादि तथा पंजाबी एवं सोहर लोकगीत की तर्ज पर गीत लिखकर नवीन प्रयोग किये हैं।
कवि संक्रांति-काल से भयभीत नहीं है। वह नया इतिहास लिखना चाहता है- 'कठिनाई में / संकल्पों का / नव है लिखें हम / आज नया इतिहास लिखें हम।'' साथ ही संघर्षों से घबराकर वह पलायन नहीं करता वरन संघर्ष के लिए प्रेरित करता है- 'पेशावर में जब एक विद्यालय के विद्यार्थियों को आतंकवादियों ने गोलियों से भून दिया था तो उसकी मर्मान्तक पीड़ा कवि को अंतस तक मठ गई थी किंतु इस पीड़ा से कवि जड़ीभूत नहीं हुआ। उसमें एक अद्भुत शक्ति जाग्रत हुई और कवि हुंकार उठा-
आसमां गर स्याह है
तो क्या हुआ?
हवा बनकर मैं बहूँगा।
दहशतों के
बादलों को उदा दूँगा।
मैं बनूँगा सूर्य
तुम रण हार रोओ
वक़्त लिक्खेगा कहानी
फाड़ पत्थर मैं उगूँगा।
मैं लिखूँगा।
मैं लड़ूँगा।।
*
संपर्क समीक्षा: डॉ. निशा तिवारी, ६५० नेपियर टाउन, भंवरताल पानी की टँकी के सामने, जबलपुर ४८२००१
चलभाष; ९४२५३८६२३४, दूरलेख: pawanknisha@gmail.com
***
नव गीत 
बम भोले! मत बोलो भाई
मत कहना जय राम जी!!
*
लोकतंत्र का अजब तकाज़ा
दुनिया देखे ठठा तमाशा
अपना हाथ
गाल भी अपना
जमकर मारें खुदी तमाचा
आज़ादी कुछ भी कहने की?
हुए विधाता वाम जी!
बम भोले! मत बोलो भाई
मत कहना जय राम जी!!
*
जन का निर्णय पचा न पाते
संसद में बैठे गुर्राते
न्यायालय का
कहा न मानें
झूठे, प्रगतिशील कहलाते
'ख़ास' बुद्धिजीवी पथ भूले
इन्हें न कहना 'आम' जी
बम भोले! मत बोलो भाई
मत कहना जय राम जी!!
*
कहाँ मानते हैं बातों से
कहो, देवता जो लातों के?
जैसे प्रभु
वैसी हो पूजा
उत्तर दो सब आघातों के
अवसर एक न पाएं वे
जो करें देश बदनाम जी
बम भोले! मत बोलो भाई
मत कहना जय राम जी!!
***
गीत -
हम
*
हम वही हैं,
यह न भूलो
झट उठो आकाश छू लो।
बता दो सारे जगत को
यह न भूलो
हम वही है।
*
हमारे दिल में पली थी
सरफरोशी की तमन्ना।
हमारी गर्दन कटी थी
किंतु
किंचित भी झुकी ना।
काँपते थे शत्रु सुनकर
नाम जिनका
हम वही हैं।
कारगिल देता गवाही
मर अमर
होते हमीं हैं।
*
इंकलाबों की करी जयकार
हमने फेंककर बम।
झूल फाँसी पर गये
लेकिन
न झुकने दिया परचम।
नाम कह 'आज़ाद', कोड़े
खाये हँसकर
हर कहीं हैं।
नहीं धरती मात्र
देवोपरि हमें
मातामही हैं।
*
पैर में बंदूक बाँधे,
डाल घूँघट चल पड़ी जो।
भवानी साकार दुर्गा
भगत के
के संग थी खड़ी वो।
विश्व में ऐसी मिसालें
सत्य कहता हूँ
नहीं हैं।
ज़िन्दगी थीं या मशालें
अँधेरा पीती रही
रही हैं।
*
'नहीं दूँगी कभी झाँसी'
सुनो, मैंने ही कहा था।
लहू मेरा
शिवा, राणा, हेमू की
रग में बहा था।
पराजित कर हूण-शक को
मर, जनम लेते
यहीं हैं।
युद्ध करते, बुद्ध बनते
हमीं विक्रम, 'जिन'
हमीं हैं।
*
विश्व मित्र, वशिष्ठ, कुंभज
लोपामुद्रा, कैकयी, मय ।
ऋषभ, वानर, शेष, तक्षक
गार्गी-मैत्रेयी
निर्भय?
नाग पिंगल, पतंजलि,
नारद, चरक, सुश्रुत
हमीं हैं।
ओढ़ चादर रखी ज्यों की त्यों
अमल हमने
तही हैं।
*
देवव्रत, कौंतेय, राघव
परशु, शंकर अगम लाघव।
शक्ति पूजित, शक्ति पूजी
सिय-सती बन
जय किया भव।
शून्य से गुंजित हुए स्वर
जो सनातन
हम सभी हैं।
नाद अनहद हम पुरातन
लय-धुनें हम
नित नयी हैं।
*
हमीं भगवा, हम तिरंगा
जगत-जीवन रंग-बिरंगा।
द्वैत भी, अद्वैत भी हम
हमीं सागर,
शिखर, गंगा।
ध्यान-धारी, धर्म-धर्ता
कम-कर्ता
हम गुणी हैं।
वृत्ति सत-रज-तम न बाहर
कहीं खोजो,
त्रय हमीं हैं।
*
भूलकर मत हमें घेरो
काल को नाहक न टेरो।
अपावन आक्रांताओं
कदम पीछे
हटा फेरो।
बर्फ पर जब-जब
लहू की धार
सरहद पर बही हैं।
कहानी तब शौर्य की
अगणित, समय ने
खुद कहीं हैं।
*
हम वही हैं,
यह न भूलो
झट उठो आकाश छू लो।
बता दो सारे जगत को
यह न भूलो
हम वही है।
*
जय हिंद
जय भारत
वन्दे मातरम्
भारत माता की जय
१९-९-२०१६

***

डॉ. साधना वर्मा की जन्म तिथि १२ सितंबर पर :

वर्षगाँठ यह मंगलमय हो...

*

जो भी चाहे अंतर्मन,

पाने का नित करो जतन.

विनय दैव से है इतनी-

मिलें सफलताएँ अनगिन..

जीवन-पथ पर पग निर्भय हो,

वर्षगाँठ यह मंगलमय हो...

*

अधरों पर सोहे मुस्कान.

पाओ सब जग से सम्मान.

शतजीवी हो, स्वस्थ्य रहो-

पूरा हो मन का अरमान..

श्वास-श्वास सरगम सुरमय हो

वर्षगाँठ यह मंगलमय हो...

*

मिले कीर्ति, यश, अभिनन्दन,

मस्तक पर रोली-चन्दन.

घर-आँगन में खुशियाँ हों-

स्नेहिल नातों का वन्दन..

आस-हास की निधि अक्षय हो,

वर्षगाँठ यह मंगलमय हो...

***

नवगीत:

मेघ बजे

*

नभ ठाकुर की ड्योढ़ी पर फिर मेघ बजे.

ठुमुक बेड़नी नचे, बिजुरिया बिना लजे...

*

दादुर देते ताल,

पपीहा-प्यास बुझी.

मिले मयूर-मयूरी

मन में छाई खुशी...

तोड़ कूल-मरजाद नदी उफनाई तो-

बाबुल पर्वत रूठे, तनया तुरत तजे...

*

पल्लव की करताल,

बजाती नीम मुई.

खेत कजलियाँ लिये,

मेड़ छुईमुई हुई..

जन्मे माखनचोर, हरीरा भक्त पिए

गणपति बप्पा, लाये मोदक हुए मजे...

*

टप-टप टपके टीन,

चू गयी है बाखर.

डूबी शाला हाय!,

पढ़ाये को आखर?

डूबी गैल, बके गाली अभियंता को.

डुकरो काँपें, 'सलिल' जोड़ कर राम भजे...

*

नभ ठाकुर की ड्योढ़ी पर फिर मेघ बजे.

ठुमुक बेड़नी नचे बिजुरिया, बिना लजे...

***

बाल गीत:             

 लंगडी खेलें.....         


**                                                                                              

आओ! हम मिल
लंगडी खेलें.....
*
एक पैर लें
जमा जमीं पर।
रखें दूसरा
थोडा ऊपर।
बना संतुलन
निज शरीर का-
आउट कर दें
तुमको छूकर।
एक दिशा में
तुम्हें धकेलें।
आओ! हम मिल
लंगडी खेलें.....
*
आगे जो भी
दौड़ लगाये।
कोशिश यही
हाथ वह आये।
बचकर दूर न
जाने पाए-
चाहे कितना
भी भरमाये।
हम भी चुप रह
करें झमेले।
आओ! हम मिल
लंगडी खेलें.....*
हा-हा-हैया,
ता-ता-थैया।
छू राधा को
किशन कन्हैया।
गिरें धूल में,
रो-उठ-हँसकर,
भूलें- झींकेगी
फिर मैया।
हर पल 'सलिल'
ख़ुशी के मेले।
आओ! हम मिल
लंगडी खेलें.....

***

गीत:
मनुज से...

*

न आये यहाँ हम बुलाये गये हैं.
तुम्हारे ही हाथों बनाये गये हैं.
ये सच है कि निर्मम हैं, बेजान हैं हम,
कलेजे से तुमको लगाये गये हैं.

नहीं हमने काटा कभी कोई जंगल
तुम्हीं कर रहे थे धरा का अमंगल.
तुमने ही खोदे थे पर्वत और टीले-
तुम्हीं ने किया पाट तालाब दंगल..

तुम्हीं ने बनाये ये कल-कारखाने.
तुम्हीं जुट गये थे भवन निज बनाने.
तुम्हारी हवस का न है अंत लोगों-
छोड़ा न अवसर लगे जब भुनाने..

कोयल की छोड़ो, न कागा को छोड़ा.
कलियों के संग फूल कांटा भी तोड़ा.
तुलसी को तज, कैक्टस शत उगाये-
चुभे आज काँटे हुआ दर्द थोड़ा..

मलिन नेह की नर्मदा तुमने की है.
अहम् के वहम की सुरा तुमने पी है.
न सम्हले अगर तो मिटोगे ये सुन लो-
घुटन, फ़िक्र खुद को तुम्हीं ने तो दी है..

हूँ रचना तुम्हारी, तुम्हें जानती हूँ.
बचाऊँगी तुमको ये हाथ ठानती हूँ.
हो जैसे भी मेरे हो, मेरे रहोगे-
इरादे तुम्हारे मैं पहचानती हूँ..

नियति का इशारा समझना ही होगा.
प्रकृति के मुताबिक ही चलना भी होगा.
मुझे दोष देते हो नादां हो तुम-
गिरे हो तो उठकर सम्हलना भी होगा..

ये कोंक्रीटी जंगल न ज्यादा उगाओ.
धरा-पुत्र थे, फिर धरा-सुत कहाओ..
धरती को सींचो, पुनः वन उगाओ-
'सलिल'-धार संग फिर हँसो-मुस्कुराओ..

नहीं है पराया कोई, सब हैं अपने.
अगर मान पाये, हों साकार सपने.
बिना स्वर्गवासी हुए स्वर्ग पाओ-
न मंगल पे जा, भू का मंगल मनाओ..

***
नव गीत:
क्या?, कैसा है?...
*
*क्या?, कैसा है?
कम लिखता हूँ,
अधिक समझना...
*
पोखर सूखे,
पानी प्यासा.
देती पुलिस
चोर को झाँसा.
सड़ता-फिंकता
अन्न देखकर
खेत, कृषक,
खलिहान रुआँसा.
है गरीब की
किस्मत, बेबस
भूखा मरना.
क्या?, कैसा है?
कम लिखता हूँ,
अधिक समझना...
*
चूहा खोजे
मिले न दाना.
सूखी चमड़ी
तन पर बाना.
कहता: 'भूख
नहीं बीमारी'.
अफसर-मंत्री
सेठ मुटाना.
न्यायालय भी
छलिया लगता.
माला जपना.
क्या?, कैसा है?
कम लिखता हूँ,
अधिक समझना...
*
काटे जंगल,
भू की बंजर.
पर्वत खोदे,
पूरे सरवर.
नदियों में भी
शेष न पानी.
न्यौता मरुथल
हाथ रहे मल.
जो जैसा है
जब लिखता हूँ
देख-समझना.
क्या?, कैसा है?
कम लिखता हूँ,
अधिक समझना...

***
नवगीत:
अपना हर पल
है हिन्दीमय
*
अपना हर पल
है हिन्दीमय
एक दिवस
क्या खाक मनाएँ?
बोलें-लिखें
नित्य अंग्रेजी
जो वे
एक दिवस जय गाएँ...
*
निज भाषा को
कहते पिछडी.
पर भाषा
उन्नत बतलाते.
घरवाली से
आँख फेरकर
देख पडोसन को
ललचाते.
ऐसों की
जमात में बोलो,
हम कैसे
शामिल हो जाएँ?...
*
हिंदी है
दासों की बोली,
अंग्रेजी शासक
की भाषा.
जिसकी ऐसी
गलत सोच है,
उससे क्या
पालें हम आशा?
इन जयचंदों
की खातिर
हिंदीसुत
पृथ्वीराज बन जाएँ...
*
ध्वनिविज्ञान-
नियम हिंदी के
शब्द-शब्द में
माने जाते.
कुछ लिख,
कुछ का कुछ पढने की
रीत न हम
हिंदी में पाते.
वैज्ञानिक लिपि,
उच्चारण भी
शब्द-अर्थ में
साम्य बताएँ...
*
अलंकार,
रस, छंद बिम्ब,
शक्तियाँ शब्द की
बिम्ब अनूठे.
नहीं किसी
भाषा में मिलते,
दावे करलें
चाहे झूठे.
देश-विदेशों में
हिन्दीभाषी
दिन-प्रतिदिन
बढ़ते जाएँ...
*
अन्तरिक्ष में
संप्रेषण की
भाषा हिंदी
सबसे उत्तम.
सूक्ष्म और
विस्तृत वर्णन में
हिंदी है
सर्वाधिक
सक्षम.
हिंदी भावी
जग-वाणी है
निज आत्मा में
'सलिल' बसाएँ...
१९-९-२०१० 
***

ईशावास्योपनिषद



ईशावास्योपनिषद सानुवाद टीका

उपनिषद का शब्दकोषीय अर्थ है समीप बैठना, गुरु के समीप बैठकर ज्ञान प्राप्त करना, भिन्नार्थ ईश्वर के समीप होकर सत्य और ब्रह्म की प्रतीति करना। उपनिषद वेदांत का सार (निचोड़) है। उपनिषद बताता है कि प्रभु को कैसे पाया जाए, आप अपने लिए उसके प्रेम को कैसे अनुभव कर सकते हैं। इसका अर्थ यही है कि परब्रह्म सूर्यमण्डल के मध्य स्थित है, किन्तु उसकी अत्यन्त प्रखर किरणों के तेज से हमारी ये भौतिक आँखेंं उसे नहीं देख पातीं। जो परमात्मा वहाँ स्थित है, वही मेरे भीतर विद्यमान है। मैं ध्यान द्वारा ही उसे देख पाता हूँ। हे अग्ने! हे विश्व के अधिष्ठाता! आप कर्म-मार्गों के श्रेष्ठ ज्ञाता हैं। आप हमें पाप कर्मों से बचायें और हमें दिव्य दृष्टि प्रदान करें। यही हम बार-बार नमन करते हैं। ईशावास्य उपनिषद में संभूति तथा असंभूति, विद्या तथा अविद्या के परस्पर भेद का ही स्पष्ट निदर्शन है। अंत में आदित्यजगत पुरुष के साथ आत्मा की एकता प्रतिपादित कर कर्मी और उपासक को संसार के दु:खों से कैसे मोक्ष प्राप्त होता है, इसका निर्देश किया गया है। लघुकाय होने पर भी यह उपनिषद अपनी नवीन दृष्टि के कारण उपनिषदों में नितांत महनीय माना गया है।

गुरु समीप बैठें-करें, प्राप्त सनातन ज्ञान 
अर्थ यही उपनिषद का, सकें ब्रह्म को जान 

प्रभु-प्रतीति हो किस तरह, पथ उपनिषद न भूल 
पथिक जीव पग-पग बढ़े, पथ न तजे लख शूल   

ईशावास्योपनिषद

उपनिषद श्रृंखला में प्रथम स्थान प्राप्त 'ईशावास्योपनिषद' शुक्ल यजुर्वेद का चालीसवाँ अध्याय है। इसमें केवल १८ मंत्रों में ईश्वर के गुणों का वर्णन तथा अधर्म त्याग का उपदेश है। इस उपनिषद का प्रयोजन ज्ञान द्वारा मोक्ष प्राप्ति है। इसमें सभी कालों में सत्कर्म करने पर बल दिया गया है। परमेश्वर के अतिसूक्ष्म स्वरूप का वर्णन इस उपनिषद में है। सभी प्राणियों में आत्मा को परमात्मा का अंश जानकर अहिंसा की शिक्षा दी गयी है। 'कण-कण में भगवान' अथवा 'कंकर कंकर में शंकर' का लोक-सत्य इस उपनिषद में अन्तर्निहित है। समाधि द्वारा परमेश्वर को अपने अन्त:करण में जानने और शरीर की नश्वरता का उल्लेख ईशावास्योपनिषद में है। इस उपनिषद के आरंभ में प्रयुक्त 'ईशावास्यमिदं सर्वम्‌' पद के कारण यह 'ईशोपनिषद' अथवा 'ईशावास्योपनिषद' के नाम से विख्यात है।  

ईश उपनिषद मंत्र अठारह, मोक्ष ज्ञान से प्राप्त कराते 
तज अधर्म; सत्कर्म-अहिंसा, वरे जीव तो ब्रह्म पा सके 

शांतिपाठ

ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।

ॐ पूर्ण है वह; पूर्ण है यह, पूर्ण से उत्पन्न पूर्ण।
पूर्ण में से पूर्ण को यदि निकालें, पूर्ण तब भी शेष रहता।।

प्रथम मन्त्र में ही जीवन और जगत् को ईश्वर का आवास कहा गया है। 'यह किसका धन है?' प्रश्न द्वारा ऋषि ने मनुष्य को सभी संपदाओं का अहंकार त्यागने का सूत्र दिया है। इससे आगे लंबी आयु, बंधनमुक्त कर्म, अनुशासन और शरीर के नश्वर होने का बोध कराया गया है। यहाँ जो कुछ है, परमात्मा का है, यहाँ जो कुछ भी है, सब ईश्वर का है। हमारा यहाँ कुछ नहीं है-

ॐ ईशावास्यमिदम् सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत।
तेनत्येक्तेन भुञ्जीथा मा गृध: कस्य स्विद्धनम्॥१॥

ईश समझना हमें चाहिए, उसे दिखे जो कुछ इस जग में।
नाम रूप तज दें प्रपंच सब, मत चाहें; किसका होता धन॥१॥
*
यहाँ इस जगत् में सौ वर्ष तक कर्म करते हुए जीने की इच्छा करनी चाहिए-

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेत् शतं समां:।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥२॥

करते हुए कर्म इस जग में, जीना चाहो सौ वर्षों तक।
जिओ कर्म करते इस जग में, किंतु न होना लिप्त कर्म में॥२॥
*
असूर्या नाम के लोक अज्ञान से अंधा बना देनेवाले तिमिर से आवृत्त हैं। अपने यथार्थ रूप को न जाननेवाले मरणोपरांत उन लोकों में जाते हैं।
आत्महत्या करनेवाले लोग अज्ञान और भयंकर क्लेश से युक्त असुरों के नरक को प्राप्त होते हैं।
असूर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृता:।
तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्मनो जना:।।३।।

हैं जो लोक असूर्य नाम के, घिरे हुए हैं अंधक तम से।
मरकर जाते प्रेत वहीं जो, निज स्वरूप को जान न पाते।।३।।
*
जीव मन से अच्युत स्वरूप (स्थिर); एक और अगम्य है। इसे चक्षु आदि इन्द्रियाँ नहीं पा सकतीं चूँकि यह मन से भी अधिक गतिशील है। आप निष्क्रिय रहते हुए भी अन्य का अतिक्रमण कर पाता है। वह नित्य चैतन्य आत्मतत्व ही वायु आदि देवों को जीवों की क्रियाशीलता हेतु प्रवृत्त करता है।

अनेजदेकं मनसो जैवीयो नैनद्देवा आप्नुवन पूर्वमर्षत।
तद्धावतोSन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति।।४।।

आत्म तत्व अच्युत अगम्य है, परे इंद्रियों से; मन से भी।
दौड़े आगे अन्य सभी के, अचल वायु को गति-प्रवृत्त कर।।४।।
*
वह आत्मा ही सोपधिक अवस्था में सक्रिय और निरुपाधिक अवस्था में निष्क्रिय होता है। वह दूर भी है और निकट भी वही है। वह अंदर भी है और बाहर भी वही है।

तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्विंतके।
तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यत:।।५।।

वह सक्रिय; निष्क्रिय भी है वह, दूर निकट जो भी है वह है।
वह ही अन्दर जो कुछ भी है, और वही जो कुछ बाहर है।।५।।
*
जो सब भूतों को अपने में ही देखता है और अपने आपको सब भूतों में देखता है, उसके अंतर्मन में किसी के प्रति घृणा उत्पन्न नहीं होती।

यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानु पश्यति।
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजिगुप्सते।।६।।

देख रहा जो सब भूतों को, खुद के अंदर; भिन्न न जाने।
देखे खुद को सब भूतों में, कभी किसी से घृणा न करता।।६।।
*
जब सभी भूत तत्वज्ञ की दृष्टि में आत्मवत हो गए तब एकत्व अनुभव करनेवाले के लिए कौन सा मोह; कौन सा शोक रह गया?

यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानत:।
तत्र को मोह: क: शोक: एकत्वमनुपश्यते।।७।।

जो समस्त भूतों को जाने, आत्मरूप; हो गैर न कोई।
उसे मोह क्या?; उसे शोक क्या?, वह एकत्व देखता सबमें।।७।।
*
वह आत्मतत्व आकाश के समान व्यापी, शुक्र व कायारहित, अक्षत, स्थूल शरीररहित शुद्ध तथा पापहीन है। वह क्रांतदर्शी मनीषी सर्वनियन्ता स्वयं उत्पन्न होनेवाला है। उसी ने यथोचित कार्यों के लिए सब पदार्थों का निर्माण किया है।

स पर्यागाच्छुक्रमकायमव्रणस्नाविरं शुद्धपापविद्धम्।
कविर्मनीषी परिभू: स्वयंभूर्याथातथ्यतोsर्थान्य व्यदधाच्छाश्वतीभ्य: समाभ्य:।।८।।

नभ सम व्याप्त, न शुक्र-लिंग-व्रण, तन बिन शुद्ध अपापी है वह।
कवि मनीषि वह सर्वनियंता, प्रगटे आप रचे सबको वह।।८।।
*
अविद्या की उपासना करनेवाले घोर तम में घिर जाते हैं और उससे भी अधिक घने अँधेरे में वे घिरते हैं जो कर्म तजकर केवल विद्या की उपासना में रत रहते हैं।

अन्धं तम: प्रविशंति, येsविद्यामुपासते।
ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायां रता:।।९।।

अंधा करते तम में घिरते, करें अविद्याजनित कर्म जो।
और अधिक तम में घिरते वे, जो बिन कर्म लीन विद्या में।।९।।
*
अविद्यात्मक कर्मों के अनुष्ठान से दूसरा ही फल मिलता है, ऐसा धीर जनों से हमने सुना है जिन्होंने कर्म और ज्ञान का व्याख्यान किया है।

अन्यदेवाहुर्विद्ययान्यदाहुरविद्यया।
इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे।।१०।।

कर्म अविद्या-विद्या मय जो, उनका फल कुछ अन्य बताया।
सुना धीर पुरुषों से हमने, जिनने वह व्याख्यान किया है।।१०।।
*
विद्या और अविद्या दोनों को जो एक ही पुरुष द्वारा अनुष्ठेय समझता है, वह अविद्या के अनुष्ठान से मृत्यु का अतिक्रमण कर बाद में विद्या के प्रभाव से अमर हो जाता है।

विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह।
अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते।।११।।

विद्या और अविद्या दोनों, एक पुरुष कृत जो समझे वह।
जीते मृत्यु अविद्या से फिर, होता अमर आत्म विद्या से।।११।।
*
अँधा बना देनेवाले सघन तम में प्रवेश कर जड़ हो जाते हैं वे जो सर्वव्यापी एकात्मभाव को भूलकर जो प्रकृति की उपासना करते हैं और उससे भी अधिक तम से घिर जाते हैं वे जो हिरण्यगर्भ नामक कार्यब्रह्म में ही रहते हैं।

अन्धं तम: प्रविशंति येsसंभूतिमुपासते।
ततो भूय इव ते तमो य उ संभूत्यांरता:।।१२।।

अंधक तम घुस जड़ होते वे, जो प्रकृति को उपासते हैं।
और सघन तम घिर जड़ होते, वे जो कार्य ब्रह्म में रहते।।१२।।
*
संभव (कार्यब्रह्म) और असंभव (अव्याकृत प्रकृति) की अलग-अलग उपासना का फल, दोनों के समुच्चयित पूजन के फल से भिन्न है, ऐसा हमने धीर पुरुषों से सुना है जिन्होंने इस तत्व का साक्षात्कार किया है।

अन्य देवाहु: सम्भवादन्यदाहुरसंभवात्।
इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे।।१३।।

संभव और असंभव पूजन, अलग करें फल अलग मिलें तब।
ब्रह्म-प्रकृति सह पूजन का फल, भिन्न सुना है धीर जनों से।।१३।।
*
जो यह समझता है कि संभूति और विनाश इन दोनों का साथ ही साथ एक ही व्यक्ति के द्वारा अनुष्ठान होना चाहिए, वह विनाश से मृत्यु को पार कर, असंभूति से अमृतत्व पाता है।

संभूतिं च विनाशं च यस्तद्वेदोभयं सह।
विनाशेन मृत्युं तीर्वा संभूत्यामृतमश्नुते।।१४।। 

ब्रह्म-प्रकृति की सह उपासना, अनुष्ठेय होता जिसको वह।
करता पार विनाश-मृत्यु को, और अमृत को पा लेता है।।१४।।
*
अविचल परमात्मा एक ही है। वह मन से भी अधिक वेगवान है। वह दूर भी है और निकट भी है। वह जड़-चेतन सभी में सूक्ष्म रूप में स्थित है। जो ऐसा मानता है, वह कभी भ्रमित नहीं होता। वह शोक-मोह से दूर हो जाता है। परमात्मा सर्वव्यापी है। वह परमात्मा देह-रहित, स्नायु-रहित और छिद्र-रहित है। वह शुद्ध और निष्पाप है। वह सर्वजयी है और स्वयं ही अपने आपको विविध रूपों में अभिव्यक्त करता है। ज्ञान के द्वारा ही उसे जाना जा सकता है। मृत्यु-भय से मुक्ति पाकर उपयुक्त निर्माण कला से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है। उस परमात्मा का मुख सोने के चमकदार पात्र से ढका हुआ है-

हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।
तत्त्वं पूषन्नपातृणु सत्यधर्माय दृष्टये॥१५॥

कनक पात्र से ढका सत्य-मुख, तुम दो हटा आवरण उसका।
सब का पालन करनेवाले, हे प्रभु! सत्य-धर्म पालूँ मैं॥१५॥
*
सकल जगत का पोषण करने और अकेले चलनेवाले हे पूषा!, यम!, सूर्य! तथा प्रजापति पुत्र! तुम अपने किरण जाल को दूर करो ताकि मैं तुम्हारा सर्व कल्याणकारी देख सकूँ, जो हर प्राणी में तथा मुझमें भी भासमान है।

पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मिन्समूह।
तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि योsसावसौ पुरुष: सोsहमस्मि॥१६॥

जगपोषक पूषा एकाकी, यम रवि प्रजापति सुत किरणें।
लो समेट, छवि कल्याणी मैं, देख सकूँ जो सबमें-मुझमें॥१६॥
*
प्राण वायु, सकल सृष्टि में व्याप्त वायु में विलीन हो जाए, अंत में शरीर भस्म हो जाए, जीवन में जो कुछ किया उसे स्मरण कर, स्मरण करने योग्य परम ब्रह्म को स्मरण करे।

वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तं शरीरं।
ॐ क्रतो स्मर कृतं स्मर क्रतो स्मर कृतं स्मर॥१७॥

प्राण वायु सर्वात्म वायु में, हो विलीन; हो भस्म देह यह।
याद ब्रह्म को; निज कर्मों को, करो याद जो याद-योग्य हो॥१७॥
*
हे अग्नि देव! अच्छी राह से हमें ले चलो। तुम सब कर्मों को जानते हो। हमसे पाप कर्मों को दूर करो। हम तुम्हें बार बार नमन करते हैं।

अग्ने नय सुपथा राये असमान्, विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्।
युयोध्यस्मज्जहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेम॥१८॥

अग्नि! ले चलो सुपथ पर मुझे, कर्म-ज्ञान-फल ज्ञाता हो तुम।
दूर करो मुझसे पापों को, बार-बार मैं नमन कर रहा॥१८॥

।। इति श्री भगवत्पूज्यपाद के शिष्य परमहंस परिव्राजकाचार्य श्री शंकर भगवत रचित वाजपेव संहिता उपनिषद काव्यानुवाद-टीका पूर्ण।।
***
 

रविवार, 18 सितंबर 2022

ऊँट

रामानुजलाल श्रीवास्तव के गीतों में छंद
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
विश्ववाणी हिंदी के भव्य और दिव्य मंदिर की नींव में अपने कालजयी सृजन के प्रस्तर खंड समर्पित करनेवाले साहित्यकारों में बाबू रामानुजलाल श्रीवास्तव उर्फ़ ऊँट बिलहरीवी अपनी मिसाल आप हैं। यह प्रस्तर खंड गीत, कविता, लेख, टीकाओं और संपादन-प्रकाशन के पंच तत्वों से निर्मित है। बाबू  रामानुजलाल के गीतकार की तुलना में उनका टीकाकार-संपादक-समीक्षक अधिक चर्चित हुआ। फलत:, शानदार और जानदार होते हुए भी उनके गीत कम सुने गए और उनका हास्य-व्यंग्यकार का रूप अधिक लोकप्रिय हुआ। एक अन्य कारण यह भी है कि रामानुजलाल जी के गीत न तो पूरी तरह छायावादी हैं न पूरी तरह छायावाद से मुक्त हैं। वे छायावाद और प्रगतिवाद के मध्य काल में प्रवहित गीत  गंगा की ऐसी लहरें हैं जो पंक से मिलकर पंकज तो खिलाती हैं किन्तु स्वयं देव-शीश  या देव-पगों में स्थान नहीं पातीं। उन्हें प्रसाद के साथ आचमन की तरह ग्रहण कर विस्मृत कर दिया जाता है। कहते हैं कि प्रकृति चक्र सतत गतिमान रहता है। 

रामानुजलाल जी अपने गीत संग्रह 'उनींदी रातें' की भूमिका में लिखते हैं- ''तुकबंदी करते हुए बहुत दिन हुए। लिखता था, पढ़ता था, धरोहर की तरह सँभालकर रखता था .... पहले होता तो लिखता कि विद्वान चाहे मेरी तुकबंदी का आदर न करें परन्तु इसकी बदौलत जो मैंने, राम-नाम का भजन कर लिया, वह तो कोई मुझसे छीन नहीं लेगा। अब लिखता हूँ कि इसकी बदौलत जो बड़े-बड़े विद्वानों-कवियों, साहित्यकारों के चरणों के पास इतने वर्षों बैठ लिया, उस सुख को तो कोई मुझसे छीन नहीं लेगा ... क्या लिखा है, क्या पढ़ा है, क्या देखा है, क्या समझा है? बहुत पढ़ा है, बहुत सुना है, बहुत गुना है। समझ में एक ही बात आई .... बस एक ही बात 'मनुष्य'। बड़ी-बड़ी सुंदरताओं के बीच, आकाश के तारे समुद्र की हिलोर, गगनचुंबी अट्टालिकाएँ कश्मीर के 'वन सुमन उपवन सुमन घन' इन सबके बीच सबसे सुंदर लगा मनुष्य, सबसे पास जान पड़ा मनुष्य।''

मनुष्य को तलाशते, मनुष्य को पाते, मनुष्य को गाते, मनुष्य को सुनते, मनुष्य को सुनाते और मनुष्य के मन में घर बनाते रामानुज बाबू की 'उनींदी रातों' के गीत मनुष्य पहचानते हुए, बखानते हुए मनुष्य से कहते हैं- 'तुम मुझे पहचान लेना' और आज मनुष्य उन  गीतों के माध्यम से रामानुज बाबू को पहचानने की सुचेष्टा कर रहा है। 

रामानुजलाल जी के गीतों में छायावाद का प्रभाव सहज और स्वाभाविक है। प्राण न रहने पर प्राणों का विकल होना अनूठी और द्विअर्थी अभिव्यक्ति है। सतही तौर पर यह असंभव प्रतीत होता है। यमकीय दृष्टि से प्राण (प्रेमी/प्रेमिका में से एक) के न रहने पर दूसरे का विकल होना स्वाभाविक है। श्लेषीय दृष्टि औपनिषदिक चिंतन-धारा परब्रह्म को पिता  और जीव को संतति मानती है तदनुसार प्राण अर्थात परमपिता की निकटता न रहने पर जीव की विकलता अर्थ सहज ग्राह्य है। 

तुम मुझे पहचान लेना
वेश से, कुछ भाव से, कुछ / आर्त स्वर से जान लेना 
भाव केवल रह गया है, कामना मन में नहीं है / 
अब विकल हैं प्राण मेरे / प्राण जब तन में नहीं है 
तनिक तीर-कमान / या टुक मुरलिया की तान लेना  (मानवजातीय सखी/ आँसू छंद, १४-१४, iss)

पहचान का मजा तब ही है जब वह इकतरफा न हो, 'दोनों तरफ हो आग बराबर लगी हुई', ऊँट साहब भरोसा दिलाते हैं-

मैं तुम्हें पहचान लूँगा 
ध्यान है इतना किया पद का / कि पग-ध्वनि जान लूँगा 
अब न रूठो, खोल दो पट, / अब न अस्थिर हो पुजारी 
यहाँ भी सखी छंद का सुंदर प्रयोग किया गया है।

सोलह मात्रिक संस्कारी जातीय पादाकुलक छंद में चार चौकलों का प्रयोग करते हुए अपनी बात कहना ऊँट साहब की छंद-रचना में महारत का प्रत्यक्ष प्रमाण है- 

यह तो अंतर की भाषा है 
इसके न नियम-बंधन कोई / इसकी न कोई परिभाषा है 
हो दूर बहुत कुछ और पास / हाँ और पास, कुछ और पास 
सच कहूँ ह्रदय में आ बैठा / यदि सुनने की अभिलाषा है 

पादाकुलक छंद में ही एक और गीत का आनंद लें-

कोई अंतर में बोल रहा 
चुप तो पागल, सुन तो मूरख, / कैसा अमृत सा घोल रहा? 
यह समय नहीं आँसू मत भर / यह समय नहीं मैं-तू मत कर 
तन्मयता के चंदन पथ में / किस मंथर गति से डोल रहा 

ऊँट साहब ने अपेक्षाकृत कम प्रचलित नाक्षत्रिक जातीय सरसी छंद (१६-११, SI) का प्रयोग पूरी स्वाभाविकता के साथ किया है। यहाँ 'स्नेह' के देशज रूप 'सनेह' का प्रयोग सहज व माधुर्यवर्धक है, कसक और कँप की पुनरावृत्ति आनुप्रासिक लालित्य लिए है।

कसक-कसक उठा है उर / कँप-कँप उठता है गात 
शिथिल सनेह सनी आँखें हैं / मना रहीं बरसात
आज कुछ हो तो है उत्पात 

तनिक परिवर्तन के साथ यौगिक जातीय छंद (१७-११) में ऊँट जी ने नया प्रयोग किया है। इस छंद का वर्णन जगन्नाथप्रसाद 'भानु' कृत छंद प्रभाकर में नहीं है। भानु जी ने यौगिक जातीय छंदों का वर्णन करते समय १६-१२ तथा १४-१४ मात्राओं के दो-दो छंद दिए हैं जबकि ऊँट जी ने १७-११ पर यति का प्रयोग किया है। 

आज यदि कर लूँ तनिक उत्पात / तो तुम क्या करो? प्रिय!
आज कह दूँ भेद की कुछ बात / तो तुम क्या करो प्रिय!

विद्या छंद (यति १४-१४, पदांत ISS) का सटीक-सार्थक प्रयोग देखिए-

भूलने के यत्न ने ही / है मुझे यह दिन दिखाया।
लाख की तदबीर, पर क्या / भूल कर भी भूल पाया?
आज अंतिम रात या चिर प्रात का संवाद लाई
फिर किसी की याद आई 

यहाँ भी यमक अलंकार का उत्तम प्रयोग है। 'आग फिर किसने लगा दी' शीर्षक गीत में भी विद्या छंद का प्रयोग हुआ है।

'चलो सो रहें' शीर्षक गीत में कुंडल छंद (१२-१०, SS) का प्रयोग कर अंतरे में पूर्व गीतों से भिन्न ६ पंक्तियों का अंतरा रखा गया है-

बहुत रोते हुए आए / पे हँसते चले हम
बिछे जाल थे, पर / न फँसते चले हम
सदा राहे-मस्ती में/ धँसते चले हम
मुहब्बत में दुनिया को / गँसते चले हम
चलो सो रहे अब / तो नींद आ रही है

 ऊँट जी के गीतों का वैशिष्ट्य सामान्य अर्थ  के समांतर निहितार्थ या विशिष्टार्थ से संपन्न होना है। निम्न लाक्षणिक जातीय छंद एक भिन्न भावभूमि में ले जाता है-

पिछले पहर की नींद की बेला, तुम आ पहुँची नेह जगाने
प्रेम नगर में आग लगाकर, रूप नगर की रीति निभाने

१९५० में लिखे गए इस गीत की संरचना (यति १६-१६, पदांत यगण) जैसा कोई छंद छंद प्रभाकर में नहीं है। 

ऊँट जी के गीतों में परिष्कृत संस्कृतनिष्ठ हिंदी के साथ देशज शब्दों और अरबी-फारसी शब्दों का मिश्रण सहज दृष्टव्य है किंतु अंग्रेजी शब्द लगभग नहीं हैं। इस भाषिक औदार्यता ने गीतों को सहज ग्राह्य बनाया है। ऊँट जी ने स्वयं अपने विषय में कहा है कि मैं हिंदी से हिंदू, उर्दू से मुसलमान तथा अंग्रेजी से ईसाई हूँ। भाषिक ही नहीं जातीय समभाव 
भी ऊँट जी ने जिया। उन्होंने अपनी पुत्रियों के अंतर्जातीय विवाह सहर्ष किए।

ऊँट जी के गीत छायावादी अमूर्तता को यथार्थोन्मुख करते हुए सांसारिकता को वर्ण्य बनाते हैं पर अंचलीय मांसलता से परहेज करते हैं। 

ऊँट जी का एकमात्र पुत्र पर कम, सात बेटियों पर अधिक  मोह था। 'आपन मुँह' शीर्षक भूमिका में चच्चा ( ऊँटजी के लिए स्नेही-स्वजनों का संबोधन) लिखते हैं- "बेटियाँ हैं, बेटियाँ। कुछ हैं, कुछ नहीं रहीं। हिलराया-दुलराया, मारा-पीटा, जब तक घर थीं, अपनी थीं। अंत में बिदा करना ही पड़ा। हे भगवान! क्या होगा? कैसे जिएँगी? कैसे रहेंगी?"

ऊँट जी की फिक्र का वायस रहीं बेटियाँ सिर्फ जी नहीं रहीं, वे ऊँट जी के सकल साहित्य का पुनर्प्रकाशन और पुनर्मूल्यांकन कराकर उनका साहित्यिक तर्पण भी कर-करा रही हैं। वे बेटियाँ काल-क्रम से बहू से सास और नानी-दादी भी हो गई हैं। वे खुद और उनके स्वजन-परिजन ऊँट जी के सृजन का अध्ययन-मनन कर अगली पीढ़ी को संस्कारित कर रहे हैं। ऊँट जी के गीतों, ग़जलों, समीक्षा कृतियों (टीकाओं) आदि की विरासत सहेजने के लिए ऊँट समग्र की योजना बनाई जानी चाहिए
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संपर्क- सभापति विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन  जबलपुर ४८२००१, चलभाष ९४२५१ ८३२४४, ईमेल salil.sanjiv@gmail.com