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गुरुवार, 28 अप्रैल 2022

विमर्श, भोजन, दोहा, गीत गोविन्द, जयदेव, कोरोना, छंद चोका,मुक्तिका, चाँदनी, बात, नवगीत,

विमर्श : भोजन करिये बाँटकर
ऋग्वेद निम्नानुसार बाँटकर भोजन करने को कहता है-
१. जमीन से चार अंगुल भूमि का
२. गेहूँ के बाली के नीचे का पशुओं का
३. पहले पेड़ की पहली बाली अग्नि की
४. बाली से गेहूं अलग करने पर मूठ्ठी भर दाना पंछियो का
५. गेहूं का आटा बनाने पर मुट्ठी भर आटा चीटियो का
६. फिर आटा गूथने के बाद चुटकी भर गुथा आटा मछलियो का
७. फिर उस आटे की पहली रोटी गौमाता की
८. पहली थाली घर के बुज़ुर्ग़ो की और फिर हमारी
९. आखिरी रोटी कुत्ते की
***
दोहा अठपदी :
संजीव 'सलिल'
*
हिन्दी की जय बोलिए, हो हिन्दीमय आप.
हिन्दी में पढ़-लिख 'सलिल', सकें विश्व में व्याप ..
नेह नर्मदा में नहा, निर्भय होकर डोल.
दिग-दिगंत को गुँजाकर, जी भर हिन्दी बोल..
जन-गण की आवाज़ है, भारत माँ का ताज.
हिन्दी नित बोले 'सलिल', माँ को होता नाज़..
भारत माँ को सुहाती, लालित्यमय बिंदी
जनगण जिव्हा विराजती, विश्ववाणी हिंदी
२८-४-२०२१
***
गीत गोविंद : जयदेव
*
मेघैर्मेदुरमम्बरं वनभुव: श्यामास्तमालद्रुमैर्नक्तं भीरुरयं त्वमेव तदिमं राधे ग्रहं प्रापय।
इत्थं नंदनिदेशतश्चलितयो: प्रत्यध्वकुंजद्रुमं राधमाधवयोर्जयंति यमुनाकूले रह: केलय:।।
*
नील गगन पर श्यामल बादल, वन्य भूमि पर तिमिर घना है।
संध्या समय भीति भव; राधा एकाकी; घर दूर बना है।।
नंद कहें 'घर पहुँचाओ' सुन, राधा-माधव गये कुंज में-
यमुना तट पर केलि करें, जग माया-ब्रह्म सुस्नेह सना है।।
*
वाग्देवताचरितचित्रितचित्तसद्मापद्मावतीचरणचारण चक्रवर्ती।
श्रीवासुदेवरतिकेलिकथासमेतंमेतं करोति जयदेवकवि: प्रबंधम्।।
यदिहरिस्मरणे सरसं मनो यदि विलासकलासु कुतूहलम्।
मधुरकोमलकांतपदावलीं श्रणु तदा जयदेवसरस्वतीम्।।
*
वाग्देव चित्रित करें चित लगा, कमलावती पद-दास चक्रधारी।
श्री वासुदेव की सुरति केलि कथा, जयदेव कवि प्रबंध रच बखानी।।
यदि मन में हरि सुमिरन की है चाह, यदि कौतूहल जानें कला विलास।
सुनें सुमधुरा कोमलकांत पदावलि, जयदेव सरस्वती संग लिये हुलास।।
*
भावानुवाद : संजीव
***
कोरोना की जयकार करो
*
कोरोना की जयकार करो
तुम नहीं तनिक भी कभी डरो
*
घरवाले हो घर से बाहर
तुम रहे भटकते सदा सखे!
घरवाली का कब्ज़ा घर पर
तुम रहे अटकते सदा सखे!
जीवन में पहली बार मिला
अवसर घर में तुम रह पाओ
घरवाली की तारीफ़ करो
अवसर पाकर सत्कार करो
तुम नहीं तनिक भी कभी डरो
कोरोना की जयकार करो
*
जैसी है अपनी किस्मत है
गुणगान करो यह मान सदा
झगड़े झंझट बहसें छोडो
पाई जो उस पर रहो फ़िदा
हीरोइन से ज्यादा दिलकश
बोलो उसकी हर एक अदा
हँस नखरे नाज़ उठाओ तुक
चरणों कर झुककर शीश धरो
तुम नहीं तनिक भी कभी डरो
कोरोना की जयकार करो
*
झाड़ू मारो, बर्तन धोलो
फिर चाय-नाश्ता दे बोलो
'भोजन में क्या तैयार करूँ'
जो कहें बना षडरस घोलो
भोग लगाकर ग्रहण करो
परसाद' दया निश्चय होगी
झट दबा कमर पग-सेवा कर
उनके मन की हर पीर हरो
तुम नहीं तनिक भी कभी डरो
कोरोना की जयकार करो
२८-४-२०२०
***
छंद सलिला
जापानी वार्णिक छंद चोका :
*
चोका एक अपेक्षाकृत लम्बा जापानी छंद है।
जापान में पहली से तेरहवीं सदी में महाकाव्य की कथा-कथन की शैली को चोका कहा जाता था।
जापान के सबसे पहले कविता-संकलन 'मान्योशू' में २६२ चोका कविताएँ संकलित हैं, जिनमें सबसे छोटी कविता ९ पंक्तियों की है। चोका कविताओं में ५ और ७ वर्णों की आवृत्ति मिलती है। अन्तिम पंक्तियों में प्रायः ५, ७, ५, ७, ७ वर्ण होते हैं
बुन्देलखण्ड के 'आल्हा' की तरह चोका का गायन या वाचन उच्च स्वर में किया जाता रहा है। यह वर्णन प्रधान छंद है।
जापानी महाकवियों ने चोका का बहुत प्रयोग किया है।
हाइकु की तरह चोका भी वार्णिक छंद है।
चोका में वर्ण (अक्षर) गिने जाते हैं, मात्राएँ नहीं।
आधे वर्ण को नहीं गिना जाता।
चोका में कुल पंक्तियों का योग सदा विषम संख्या में होता है ।
रस लीजिए कुछ चोका कविताओं का-
*
उर्वी का छौना
डॉ. सुधा गुप्ता
*
चाँद सलोना
रुपहला खिलौना
माखन लोना
माँ का बड़ा लाडला
सब का प्यारा
गोरा-गोरा मुखड़ा
बड़ा सजीला
किसी की न माने वो
पूरा हठीला
‘बुरी नज़र दूर’
करने हेतु
ममता से लगाया
काला ‘दिठौना’
माँ सँग खेल रहा
खेल पुराना
पेड़ों छिप जाता
निकल आता
किलकता, हँसता
माँ से करे ‘झा’
रूप देख परियाँ
हुईं दीवानी
आगे-पीछे डोलतीं
करे शैतानी
चाँदनी का दरिया
बहा के लाता
सबको डुबा जाता
गोल-मटोल
उजला, गदबदा
रूप सलोना
नभ का शहज़ादा
वह उर्वी का छौना
***
ये दु:ख की फ़सलें
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
*
खुद ही काटें
ये दु:ख की फ़सलें
सुख ही बाँटें
है व्याकुल धरती
बोझ बहुत
सबके सन्तापों का
सब पापों का
दिन -रात रौंदते
इसका सीना
कर दिया दूभर
इसका जीना
शोषण ठोंके रोज़
कील नुकीली
आहत पोर-पोर
आँखें हैं गीली
मद में ऐंठे बैठे
सत्ता के हाथी
हैं पैरों तले रौंदे
सच के साथी
राहें हैं जितनी भी
सब में बिछे काँटे ।
***
पड़ोसी मोना
मनोज सोनकर
*
आँखें तो बड़ी
रंग बहुत गोरा
विदेशी घड़ी
कुत्ते बहुत पाले
पड़ोसी मोना
खुराक अच्छी डालें
आजादी प्यारी
शादी तो बंधन
कहें कुंवारी
अंग्रेज़ी फ़िल्में लाएं
हिन्दी कचरा
खूब भुनभुनाएं
ब्रिटेन भाए
बातचीत उनकी
घसीट उसे लाए
***
पेड़ निपाती
सरस्वती माथुर
*
पतझर में
उदास पुरवाई
पेड़ निपाती
उदास अकेला -सा ।
सूखे पत्ते भी
सरसराते उड़े
बिना परिन्दे
ठूँठ -सा पेड़ खड़ा
धूप छानता
किरणों से नहाता
भीगी शाम में
चाँदनी ओढ़कर
चाँद देखता
सन्नाटे से खेलता
विश्वास लिये-
हरियाली के संग
पतझर में
उदास पुरवाई
पेड़ निपाती
उदास अकेला -सा ।
सूखे पत्ते भी
सरसराते उड़े
बिना परिन्दे
ठूँठ -सा पेड़ खड़ा
धूप छानता
किरणों से नहाता
भीगी शाम में
चाँदनी ओढ़कर
चाँद देखता
सन्नाटे से खेलता
विश्वास लिये-
हरियाली के संग
पत्ते फिर फूटेंगे ।
***
विछोह घडी
भावना कुँवर
*
बिछोह -घड़ी
सँजोती जाऊँ आँसू
मन भीतर
भरी मन -गागर।
प्रतीक्षारत
निहारती हूँ पथ
सँभालूँ कैसे
उमड़ता सागर।
मिलन -घड़ी
रोके न रुक पाए
कँपकपाती
सुबकियों की छड़ी।
छलक उठा
छल-छल करके
बिन बोले ही
सदियों से जमा वो
अँखियों का सागर।
-0-
***
मुक्तिका
चाँदनी फसल..'
*
इस पूर्णिमा को आसमान में खिला कमल.
संभावना की ला रही है चाँदनी फसल..
*
वो ब्यूटी पार्लर से आयी है, मैं क्या कहूँ?
है रूप छटा रूपसी की असल या नक़ल?
*
दिल में न दी जगह तो कोई बात नहीं है.
मिलने दो गले, लोगी खुदी फैसला बदल..
*
तुम 'ना' कहो मैं 'हाँ' सुनूँ तो क्यों मलाल है?
जो बात की धनी थी, है बाकी कहाँ नसल?
*
नेता औ' संत कुछ कहें न तू यकीन कर.
उपदेश रोज़ देते न करते कभी अमल..
*
मन की न कोई भी करे है फ़िक्र तनिक भी.
हर शख्स की है चाह संवारे रहे शकल..
*
ली फेर उसने आँख है क्यों ताज्जुब तुझे.?
होते हैं विदा आँख फेरकर कहे अज़ल..
*
माया न किसी की सगी थी, है, नहीं होगी.
क्यों 'सलिल' चाहता है, संग हो सके अचल?
***
द्विपदी
*
शूल दें साथ सदा फिर भी बदनाम हुए
फूल दें साथ छोड़ फिर भी सुर्खरू क्यों हैं?
*
२८-४-२०१५
***
दोहा दुनिया
बात से बात
*
बात बात से निकलती, करती अर्थ-अनर्थ
अपनी-अपनी दृष्टि है, क्या सार्थक क्या व्यर्थ?
*
'सर! हद सरहद की कहाँ?, कैसे सकते जान?
सर! गम है किस बात का, सरगम से अनजान
*
'रमा रहा मन रमा में, बिसरे राम-रमेश.
सब चाहें गौरी मिले, हों सँग नहीं महेश.
*
राम नाम की चाह में, चाह राम की नांय.
काम राम की आड़ में, संतों को भटकाय..
*
'है सराह में, वाह में, आह छिपी- यह देख.
चाह कहाँ कितनी रही?, करले इसका लेख..
*
'गुरु कहना तो ठीक है, कहें न गुरु घंटाल.
वरना भास्कर 'सलिल' में, डूब दिखेगा लाल..'
*
'लाजवाब में भी मिला, मुझको छिपा जवाब.
जैसे काँटे छिपाए, सुन्दर लगे गुलाब'.
*
'डूबेगा तो उगेगा, भास्कर ले नव भोर.
पंछी कलरव करेंगे, मनुज मचाए शोर..'
*
'एक-एक कर बढ़ चलें, पग लें मंजिल जीत.
बाधा माने हार जग, गाये जय के गीत.'.
*
'कौन कहाँ प्रस्तुत हुआ?, और अप्रस्तुत कौन?
जब भी पूछे प्रश्न मन, उत्तर पाया मौन.'.
*
तनखा ही तन खा रही, मन को बना गुलाम.
श्रम करता गम कम 'सलिल', करो काम निष्काम.
*
२८-४-२०१४
***
नवगीत: मत हो राम अधीर.........
*
जीवन के
सुख-दुःख हँस झेलो ,
मत हो राम अधीर.....
*
भाव, आभाव, प्रभाव ज़िन्दगी.
मिलन, विरह, अलगाव जिंदगी.
अनिल अनल परस नभ पानी-
पा, खो, बिसर स्वभाव ज़िन्दगी.
अवध रहो
या तजो, तुम्हें तो
सहनी होगी पीर.....
*
मत वामन हो, तुम विराट हो.
ढाबे सम्मुख बिछी खाट हो.
संग कबीरा का चाहो तो-
चरखा हो या फटा टाट हो.
सीता हो
या द्रुपद सुता हो
मैला होता चीर.....
*
विधि कुछ भी हो कुछ रच जाओ.
हरि मोहन हो नाच नचाओ.
हर हो तो विष पी मुस्काओ-
नेह नर्मदा नाद गुंजाओ.
जितना बहता
'सलिल' सदा हो
उतना निर्मल नीर.....
***
नव गीत: झुलस रहा गाँव..... ...
*
झुलस रहा गाँव
घाम में झुलस रहा...
*
राजनीति बैर की उगा रही फसल.
मेहनती युवाओं की खो गयी नसल..
माटी मोल बिक रहा बजार में असल.
शान से सजा माल में नक़ल..
गाँव शहर से कहो
कहाँ अलग रहा?
झुलस रहा गाँव
घाम में झुलस रहा...
*
एक दूसरे की लगे जेब काटने.
रेवड़ियाँ चीन्ह-चीन्ह लगे बाँटने.
चोर-चोर के लगा है एब ढाँकने.
हाथ नाग से मिला लिया है साँप ने..
'सलिल' भले से भला ही
क्यों विलग रहा?.....
झुलस रहा गाँव
घाम में झुलस रहा...
***
एक चैट चर्चा:
Sanjay bhaskar:
AAP YE DEKHEN CHOTI SI RACHNAAA:
'जारी है अभी सिलसिला सरहदों पर.'
मैं:
'हद सर करती है हमें, हद को कैसे सर करें,
कोई यह बतलाये?' 'रमे रमा में सब मिले,
राम न चाहे कोई.
'सलिल' राम की चाह में
काम बिसर गयो मोई'.
Sanjay: 'ARE WAAAAHHHHH'
मैं:
राम नाम की चाह में, चाह राम की नांय.
काम राम की आड़ में, संतों को भटकाय..
***
कार्यशाला - काव्य प्रश्नोत्तर
संजय:
'आप तो गुरु हो.'
मैं:
'है सराह में, वाह में, आह छिपी- यह देख
चाह कहाँ कितनी रही, करले इसका लेख..'
Sanjay:
'बढ़िया'
मैं:
'गुरु कहना तो ठीक है, कहें न गुरु घंटाल।
वरना भास्कर 'सलिल' में, डूब दिखेगा लाल..'
Sanjay:
'क्या बात है लाजवाब।'
मैं:
'लाजवाब में भी मिला, मुझको छिपा जवाब।
जैसे काँटे छिपाए, सुन्दर लगे गुलाब'.एक दोहा
*
जय हो सदा नरेन्द्र की, हो भयभीत सुरेन्द्र.
साधन बिन कर साधना, भू पर आ देवेंद्र
*
तनखा तन को खा रही, मन को बना गुलाम.
श्रम करता गम कम 'सलिल', करो काम निष्काम..
***
कुण्डलिनी:
*
हिन्दी की जय बोलिए, हो हिन्दीमय आप.
हिन्दी में पढ़-लिख 'सलिल', सकें विश्व में व्याप ..
नेह नर्मदा में नहा, निर्भय होकर डोल.
दिग-दिगंत को गुँजा दे, जी भर हिन्दी बोल..
जन-गण की आवाज़ है, भारत मान ता ताज.
हिन्दी नित बोले 'सलिल', माँ को होता नाज़..
२८-४-२०१० ***

बुधवार, 27 अप्रैल 2022

सॉनेट, छंद गोपी,कोविद,तेवरी,मुक्तिका,

अभिनव प्रयोग
गोपी छंदीय सॉनेट
*
घोर कलिकाल कठिन जीना।
हाय! भू पर संकट भारी।
घूँट खूं के पड़ते पीना।।
समर छेड़े अत्याचारी।।

सबल नित करता मनमानी।
पटकता बम नाहक दिन-रात।
निबल के आँसू भी पानी।।
दिख रही सच की होती मात।।

स्वार्थ सब अपना साध रहे।
सियासत केर-बेर का संग।
सत्य का कर परित्याग रहे।।
रंग जीवन के हैं बदरंग।।

धरा का छलनी है सीना।
घोर कलिकाल कठिन जीना।
२७-४-२०२२
***
कोविद विमर्श : ३
कोविद का समाजवाद और स्वर्णावसर
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
'कोविद' जोड़ें नाम संग, बढ़ता था सम्मान
अब कोविद के नाम से, निकल रही है जान
नयी पीढ़ी शायद ही जानती हो कि कोविद एक परीक्षा है जिसे उत्तीर्ण करना ही योग्यता का परिचायक है। इसलिए कई व्यक्ति अपने नाम के साथ कोविद उसी तरह लिखते थे जैसे स्व. लालबहादुर शास्त्री जी शास्त्री परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद 'शास्त्री' लिखने लगे थे। इस काल में जब प्रश्न पत्र खरीदने, नकल करने, अपने स्थान पर अन्य से उत्तर लिखने, मूल्यांकन में हेर-फेर और अंत में व्यापम मध्य प्रदेश की तरह लाखों रुपयों में मेडिकल सीटों का सौदा खुले-आम हो ही नहीं रहा, किसी अपराधी का बाल भी बाँका नहीं हो रहा हो तब परीक्षा किसी महामारी से कम नहीं। इस काल में कौन हिम्मत करेगा किसी उपाधि को नाम के साथ जोड़ने की? अन्य उपाधियों की तरह कोविद भ्रष्टाचार महामारी की शिकार न हुई तो उसके नाम की महामारी ही आ गई। बात आने तक ही सीमित होती तो भी गनीमत होती, वह तो आने के साथ ही पूरी दुनिया पर छा भी गयी और छाई भी इस तरह कि अच्छे-अच्छों की नींद उड़ा गई। जिन तीसमार खानों ने कोविद को हल्के में लेने की भूल की उनके देशवासियों को तो भारी कीमत चुकानी ही पड़ी, सरकारों को भी पसीना आ गया, खुद सत्ताधारियों, धनपतियों और बाहुबलियों को अस्पतालों की शरण लेकर अपनी जान बचानी पड़ी। नाज़ो-अदा की नुमाइश कर काम और दाम कमानेवालियाँ भी बच नहीं सकीं, और तो और अपने मंत्र-तंत्र, कर्म-काण्ड और आडंबरों से पतितों को तारने और पापियों को मारने का दवा करनेवाले धर्माचार्य भी कोरोना के आगे नतमस्तक हुए बिना बच नहीं सके। सकल सृष्टि के नियामक, पाक परवरदिगार और आलमाइटी सबके उपासनास्थलों में ताले पड़ गए। ऐसा तो किसी काल में कोई राक्षसराज भी नहीं कर सका।
कोविद का समाजवाद
कोविद के प्रकोप से हो रही जनहानि और धनहानि ने प्रशासन तंत्र और धन कुबेरों की नींद उड़ा दी है। आप आदमी को रोजी के बिना रोटी के लाले पड़े हैं। सरकार असरकार सिद्ध नहीं हो पा रही। मुखौटों के पीछे छिपी सच्चाइयाँ सामने आ रही हैं। सर्वाधिक उन्नत देशों का घमंड चूर-चूर हो गया है। सबसे अच्छी चिकित्सा व्यवस्थाएँ ताश के महलों की तरह ध्वस्त हो गयी हैं। कहावत है "घूरे के दिन बदलते हैं"। कोरोना ने इस कहावत को सौ टका खरा सिद्ध कर दिया है।
अपनी तानाशाही से तिब्बत को मिटा चुके और अधिनायकवादी रवैये से सारी दुनिया को परेशान कर रहे चीन को कोरोना ने आरंभ में ही 'चारों खाने चित्त' कर दिया। तथाकथित सर्वशक्तिमान अमेरिका के दंभी राष्ट्र अध्यक्ष के उन्नत 'शीश को झुकाने' में कोरोना ने देर नहीं की। पेट्रोलियम के पैसों पर गगनचुम्बी मीनारें खड़ी कर इतराते देशों को कोरोना ने 'घुटनों के बल' ला दिया। इटली, जर्मनी, ईरान, इराक, रूस, जापान, ऑस्ट्रलिया कोई भी कोरोना के घातक वार से बच नहीं सका। यह सिद्ध हो गया कि 'चमकनेवाली हर वस्तु सोना नहीं होती', यह भी कि 'सब दिन जात न एक समान'। कोरोना को हल्के से लेने की कीमत इंग्लैण्ड के प्रधान मंत्री को चुकानी पड़ी, गनीमत यह कि 'समय पर चेतने' के कारण रेल पूरी तरह 'पटरी से उतरी' नहीं। हमारे नादान पडोसी पकिस्तान ने कोरोनाग्रस्त चीन से अपने नागरिकों को न बुलाकर अपना 'दम-खम दिखाना' चाहा पर यह दाँव काम नहीं आया। कोरोना ने सच्चे समाजवादी की तरह तमाम काम का काम तमाम कर दिया।
समरथ को ही दोष गुसाईं
कोविद ने सबके साथ समानता का व्यवहार भी नहीं किया अपितु एक कदम आगे बढ़कर कौन कितनी चोट सहन कर सकता है, उस पर उतनी ही चोट करने की नीति अपनाई। तुलसी बब्बा भले ही लिख गए हों 'समरथ को नहीं दोष गुसाईं' कोविद ने इसे उचित नहीं माना और 'समरथ को ही दोष गुसाईं' का नया सिद्धांत न केवल खोजा अपितु क्रियान्वित कर दिया। कोविद ने चुन-चुन कर पहलवानों को अखाड़े में नहीं बुलाया अपितु चुन-चुन कर पहलवानों के अखाड़े जाकर उन्हें चित्त कर दिया। हमने बचपन में एक कविता 'नागपंचमी'पढ़ी थी जिसमें पहलवानों के मल्ल युद्ध का सजीव चित्रण था। कुछ पंक्तियाँ देखें -
यह पहलवान अम्बाले का
वह पहलवान पटियाले का
ये दोनों दूर विदेशों से
लड़ आये हैं परदेशों में
उतरेंगे आज अखाड़े में
चंदन चाचा के बाड़े में....
कोरोना के काल में यह कविता कुछ इस तरह लिखी जायेगी-
यह पहलवान जो बीजिंग का
जोकर निकला गिरकर रिंग का
वह पहलवान डॉलरवाला
उसका निकला है दीवाला
यह इटलीवाला चित्त हुआ
जर्मनवाले को पित्त हुआ
जापानी खस्ताहाल गिरा
अरबी ईरानी आप गिरा
सुध-बुध भूला पाकिस्तानी
मैदां मारे हिंदुस्तानी
यहाँ नहीं है कोई किसी का
अब तक दुनिया के समर्थदेश सामान्य परिस्थिति और मुश्किल हालत दोनों में अपनी चौधराहट दिखाते हुए अपेक्षाकृत कमजोर देशों को इस या उस खेमे में जाने को मजबूर करते थे, और संकट के समय उनके साथ खड़े होने का दावा करते थे। कोविद ने ऐसे सब संगठनों को 'मिट्टी का माधो' सिद्ध कर दिया। सीटों, नाटो आदि का कोई अस्तित्व शेष नहीं बचा। संयुक्त राष्ट्र संघ में पाकिस्तान का सच्चा दोस्त करनेवाला चीन कोविद-काल में पाकिस्तानी नागरिकों की रक्षा नहीं कर सका, नहीं उन्हें सुरक्षित पाकिस्तान भेजने का प्रयास किया।
पश्चिमी देशों की सरकारें और उनकी तथाकथित श्रेष्ठ चिकित्सा व्यवस्था नाकाफी और नाकाबिल साबित हुई। नेता सामने आने की हिम्मत नहीं जुटा सके। यहाँ तक कि वे अपने नागरिकों को समय पूर्व चेतावनी देने, सुरक्षात्मक उपाय अपनाने और उपलब्ध संसाधनों का योजनापूर्वक सीमित प्रयोग करने के लिए सहमत तक नहीं करा सके। जनवरी में जब कोविद प्रारंभिक चरण में था अमेरिका, इंग्लैण्ड आदि देशों के नागरिक अपनी सरकारों के प्रतिबंधात्मक आदेशों की खुलेआम धज्जिया उड़ाते और मजाक बनाते देखे गए। जल्दी ही उन्हें इसकी कीमत अपनी जान देकर चुकानी पडी किन्तु यह जग जाहिर हो गया कि सुशिक्षित नागरिक समझदार नहीं हैं और समृद्ध सरकारें असरदार नहीं है। व्यक्तिवादी भोग प्रधान पाश्चात्य संस्कृति में पले-बढ़े लोग सीमित संसाधनों को जुटाने के जुगाड़ में लग गए। फलत: जिन्हें अधिक जरूरत उन तक संसाधन पहुँच ही नहीं सके।
सबसे अधिक बुरी हालत इटली की हुई। सामान्यत: आपातकाल में कमजोरों की रक्षा पहले की जाती है। बच्चों, वृद्धों और महिलाओं को संसाधन उपलब्ध कराकर उन्हें पहले बचाया जाता है; उसके बाद युवाओं को किन्तु इसके सर्वथा विपरीत इटली में कमजोरों को लावारिस बिना समुचित चिकित्सा या देख-रेख के मरने दिया गया। हद तो यह हुई कि मृत्यु पश्चात् सम्मानजनक अंत्येष्टि संस्कार भी नहीं हो सका। एक-एक कब्र में एक साथ कई-कई लाशें दबाई गईं। पश्चिमी जीवन मूल्यों और सभ्यता का खोखलापन पूरी तरह उजागर हुई कि वासतव में 'यहाँ नहीं कोई किसी का। '
सभी सुखी हों, सभी निरापद
भारत दुनिया के तमाम देशों से अपने नागरिकों को सुरक्षित लाने तक सीमित नहीं रहा, उसने अन्य देशों के नागरिकों को भी बचाया, उनकी चिकित्सा की और उन्हें उनके देशों को भेजा। भारत को अविकसित कहकर उसका मजाक उड़ानेवाले राष्ट्रपति ट्रंप को जल्दी ही भारतीय नेतृत्व की प्रशंसा करने को बाध्य होना पड़ा किंतु विश्व के सबसे पुराने लोकतंत्र के राष्ट्र अध्यक्ष होने के बाद भी वे यह नहीं समझ सके कि लोकतंत्र में 'लोक' से बड़ा कोई नहीं होता। लोक से नाता मजबूत न हो तो, नेता की कोई अहमियत नहीं रह जाती। यदि अमेरिका की जनता आरंभ में ही सरकार के प्रतिबंधात्मक आदेशों की पालन करती तो स्थिति इतनी अधिक जटिल नहीं होती। संभवत: अमेरिका में वर्तमान पीढ़ी ने पहली बार यह देखा कि उसे अपने हित में न केवल प्रतिबंध मानने चाहिए, विश्व हित के साथ भी खड़ा होना चाहिए।
भारत में सर्वार्थ के लिए स्वार्थ का त्याग विरासत और परंपरा दोनों है। प्राचीन भारत में वनवासी राम की पत्नी का हरण होने पर पूरा भारत राम के साथ खड़ा था और रावण को मरकर सीता के वापिस आने तक ही उनके साथ नहीं रहा अपितु राम को इष्ट देव बनाकर अमर कर दिया। असहाय पांडवों के साथ अन्याय होने पर कुरुक्षेत्र में उनकी विजय और बाद तक लोक पांडवों के साथ था। कंस और जरासंध जैसे सबल सत्तधीशों के साथ न अर्हकार लोक समय ग्वाले कृष्ण के साथ था। आधुनिक भारत की बात करें तो धोतीधारी गाँधी और धोतीधारी सुभाष दोनों को लोक ने न केवल सहयोग दिया उनके हर आदेश को शिरोधार्य किया। भारत चीन युद्ध १९६२ के समय तत्कालीन प्रधान मंत्री नेहरू के आह्वान पर हर नागरिक यहाँ तक की शालेय छात्रों ने भी सुरक्षा कोष में धन दिया। मैं तब प्राथमिक शाला का विद्यार्थी था, हर माह २ पैसे (तब इसका मूल्य आज को ५ रु. से अधिक था) दिया करता था। भारत पाकिस्तान युद्ध के समय शास्त्री जी के आह्वान पर पूरा भारत सोमवार को एक समय उपवास करता था, इतने ही नहीं होटल आदि तक स्वेच्छा से बंद रहते थे। बांगला देश के उदय के समय सुरक्षा कोष के अलावा भारत की जनता ने शरणार्थी डाक टिकिट के माध्यम से अरबों रुपये सरकार को दिए। यह नैतिक बल भारतीय नेताओं की पूंजी रहा है। दुर्भाग्य से इस काल में विविध दलों के नेताओं में कटुता चरम पर होने के नाते जनता जो अधिकांश किसी न किसी दल से जुडी होती है, में सरकार की नीतियों और आदेशों का उल्लंघन करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है तथापि श्री मोदी के आह्वान पर सभी लोगों और दलों ने नोटबंदी और कोविद बंदी के समय शासनादेशों का पालन कर उनके मस्तक ऊंचा रखा है। राजनीति शास्त्र में उपयोगितावाद (यूटेलिटेरियनिस्म) में जेरेमी बेंथम प्रणीत एक सिद्धांत है 'अधिकतम का अधिकतम सुख' (मक्सिमम गुड़ ऑफ़ मैक्सिमम नंबर)। भारत में इससे आगे 'सर्वेभवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामय:' (सभी सुखी हों, सभी निरापद) की नीति मान्य है। इसी का पालन करते हुए भारत को विदेश नागरिकों को बचाने में खतरा उठाने या सीमित संसाधन खर्च करने में संकोच नहीं होता।
स्वर्णावसर
यह स्पष्ट है कि कोविद ने भारतीय दर्शन, भारतीय परंपराओं और भारतीय लोक की श्रेष्ठता पूरे विश्व में स्थापित की है। यह एक स्वर्णावसर है, विश्व नेतृत्व पाने का। यह अवसर है भारतीय कर्मठता, कार्यकुशलता और उत्पादन सामर्थ्य को प्रमाणित करने का किन्तु यह न तो अपने आप होगा, न सरलता से होगा। क्या हम एक देश के नाते, एक समाज के नाते इस स्वर्णावसर का लाभ उठा सकेंगे? यह यक्ष प्रश्न है जो हमें बूझना है।
क्रमश:
२७-४-२०२०
***
तेवरी :
प्यास
*
हुए प्यास से सब बेहाल.
सूखे कुएँ नदी सर ताल..
गौ माता को दिया निकाल.
श्वान रहे गोदी में पाल..
चमक-दमक की चाह जगी.
भुला सादगी की दी चाल..
शंकाएँ लीलें विश्वास.
डँसते नित नातों के व्याल..
कमियाँ दूर करेगा कौन?
बने बहाने ही जब ढाल..
मौन न सुन पाते जो लोग.
वही बजाते देखे गाल..
उत्तर मिलते नहीं 'सलिल'.
अनसुलझे नित नए सवाल..
***
मुक्तिका
*
ज़िन्दगी हँस के गुजारोगे तो कट जाएगी.
कोशिशें आस को चाहेंगी तो पट जाएगी..
जो भी करना है उसे कल पे न टालो वरना
आयेगा कल न कभी, साँस ही घट जाएगी..
वायदे करना ही फितरत रही सियासत की.
फिर से जो पूछोगे, हर बात से नट जाएगी..
रख के कुछ फासला मिलना, तो खलिश कम होगी.
किसी अपने की छुरी पीठ से सट जाएगी..
दूरियाँ हद से न ज्यादा हों 'सलिल' ध्यान रहे.
खुशी मर जाएगी गर खुद में सिमट जाएगी..
२७-४-२०१०
***

मंगलवार, 26 अप्रैल 2022

गीत, सॉनेट,मुक्तक,मुक्तिका,छंद प्लवंगम्,हाइकु ,भूकंप नेपाल, नवगीत



सॉनेट 
ओ तू
ओ तू कितना सदय-निठुर है?
बिन माँगे सब कुछ दे देता।
बिना बताए ले भी लेता
अपना-गैर न, कृपा-कहर है।।

मिलकर मिले न, जुदा न होता
सब करते हैं तेरी बातें।
मंदिर-मस्जिद में शह-मातें
फसल काटता, फिर फिर बोता।।

ओ तू क्या है? कभी बता दे?
ओ तू मुझसे मुझे मिला दे।
ओ तू मुझको राह दिखा दे।।

मुझे नचा खुश है क्या ओ तू?
भेज-बुला खुश है क्या ओ तू?
तुझमें मैं, मुझमें क्या ओ तू??
२६-४-२०२२
•••
मुक्तक और मुक्तिका
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल
*
हिंदी काव्य में वे समान पदभार के वे छंद जो अपने आप में पूर्ण हों अर्थात जिनका अर्थ उनके पहले या बाद की पंक्तियों से संबद्ध न हो उन्हें मुक्तक छंद कहा गया है। इस अर्थ में दोहा, रोला, सोरठा, उल्लाला, कुण्डलिया, घनाक्षरी, सवैये आदि मुक्तक छंद हैं।
कालांतर में चौपदी या चतुष्पदी (चार पंक्ति की काव्य रचना) को मुक्तक कहने का चलन हो गया। इनके पदान्तता के आधार पर विविध प्रकार हैं। १. चारों पंक्तियों का समान पदांत -
हर संकट को जीत
विहँस गाइए गीत
कभी न कम हो प्रीत
बनिए सच्चे मीत (ग्यारह मात्रिक पद)
२. पहली, दूसरी और चौथी पंक्ति का समान तुकांत -
घर के भीतर ही रहें
खुद ही सुन खुद ही कहें
हाथ बटाएँ काम में
अफवाहों में मत बहें (तेरह मात्रिक पद)
३. पहली-दूसरी पंक्ति का एक तुकांत, तीसरी-चौथी पंक्ति का भिन्न तुकांत -
चूं-चूं करती है गौरैया
सबको भाती है गौरैया
चुन-चुनकर दाना खाती है
निकट गए तो उड़ जाती है (सोलह मात्रिक)
४. पहली-तीसरी-चौथी पंक्ति का समान तुकांत -
भारत की जयकार करें
दुश्मन की छाती दहले
देश एक स्वीकार करें
ऐक्य भाव साकार करें (चौदह मात्रिक)
५. पहली-दूसरी-तीसरी पंक्ति का समान तुकांत -
भारत माँ के बच्चे
झूठ न बोलें सच्चे
नहीं अकल के कच्चे
बैरी को मारेंगे (बारह मात्रिक)
६. दूसरी, तीसरी, चौथी पंक्ति की समान तुक -
नेता जी आश्वासन फेंक
हर चुनाव में जाते जीत
धोखा देना इनकी रीत
नहीं किसी के हैं ये मीत (पंद्रह मात्रिक)
७. पहली-चौथी पंक्ति की एक तुक दूसरी-तीसरी पंक्ति की दूसरी तुक -
रात रानी खिली
मोगरा हँस दिया
बाग़ में ले दिया
आ चमेली मिली (दस मात्रिक)
८. पहली-तीसरी पंक्ति की एक तुक, दुसरी-चौथी पंक्ति की अन्य तुक -
होली के रंग
कान्हा पे डाल
राधा के संग
गोपियाँ निहाल (नौ मात्रिक)
*
इनमें से दूसरे प्रकार के मुक्तक अधिक लोकप्रिय हुए हैं ।
घर के भीतर ही रहें
खुद ही सुन खुद ही कहें
हाथ बटाएँ काम में
अफवाहों में मत बहें
यह तेरह मात्रिक मुक्तक है।
इसमें तीसरी-चौथी पंक्ति की तरह पंक्तियाँ जोड़ें -
घर के भीतर ही रहें
खुद ही सुन खुद ही कहें
हाथ बटाएँ काम में
अफवाहों में मत बहें
प्रगति देखकर अन्य की
द्वेष अग्नि में मत दहें
पीर पराई बाँट लें
अपनी चुप होकर सहें
याद प्रीत की ह्रदय में
अपने हरदम ही तहें
यह मुक्तिका हो गयी। इस शिल्प की कुछ रचनाओं को ग़ज़ल, गीतिका, सजल, तेवरी आदि भी कहा जाता है।
*
संपर्क ९४२५१८३२४४
***
हिंदी आटा माढ़िये, उर्दू मोयन डाल
'सलिल' संस्कृत सान दे, पूरी बने कमाल
छंद सलिला:
प्लवंगम् छंद
संजीव
*
छंद-लक्षण: जाति त्रैलोक लोक , प्रति चरण मात्रा २१ मात्रा, चरणारंभ गुरु, चरणांत गुरु लघु गुरु (रगण), यति ८-१३।
लक्षण छंद:
प्लवंगम् में / रगण हो सदा अन्त में
आठ - तेरह न / भूलें यति हो अन्त में
आरम्भ करे / गुरु- लय न कभी छोड़िये
जीत लें सभी / मुश्किलें मुँह न मोड़िए
उदाहरण:
१. मुग्ध उषा का / सूरज करे सिंगार है
भाल सिंदूरी / हुआ लाल अंगार है
माँ वसुधा नभ / पिता-ह्रदय बलिहार है
बंधु नाचता / पवन लुटाता प्यार है
२. राधा-राधा / जपते प्रति पल श्याम ज़ू
सीता को उर / धरते प्रति पल राम ज़ू
शंकरजी के / उर में उमा विराजतीं
ब्रम्ह - शारदा / भव सागर से तारतीं
३. दादी -नानी / कथा-कहानी गुमे कहाँ?
नाती-पोतों / बिन बूढ़ा मन रमें कहाँ?
चंदा मामा / गुमा- शेष अब मून है
चैट-ऐप में फँसा बाल-मन सून है
*********************************************
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, ककुभ, कज्जल, कामिनीमोहन कीर्ति, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जाया, तांडव, तोमर, दीप, दीपकी, दोधक, नित, निधि, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रेमा, बाला, भव, मंजुतिलका, मदनअवतार, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, योग, ऋद्धि, राजीव, रामा, लीला, वाणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुभगति, सरस, सार, सिद्धि, सुगति, सुजान, हेमंत, हंसगति, हंसी)
२६-४-२०१४
***
नेपाल में भूकंपजनित महाविनाश के पश्चात रचित
हाइकु सलिला:
संजीव
.
सागर माथा
नत हुआ आज फिर
देख विनाश.
.
झुक गया है
गर्वित एवरेस्ट
खोखली नीव
.
मनमानी से
मानव पराजित
मिटे निर्माण
.
अब भी चेतो
न करो छेड़छाड़
प्रकृति संग
.
न काटो वृक्ष
मत खोदो पहाड़
कम हो नाश
.
न हो हताश
करें नव निर्माण
हाथ मिलाएं.
.
पोंछने अश्रु
पीड़ितों के चलिए
न छोड़ें कमी
***
नेपाल में भूकंपीय महाविनाश के पश्चात् रचित
नवगीत:
संजीव
.
पशुपतिनाथ!
तुम्हारे रहते
जनगण हुआ अनाथ?
.
वसुधा मैया भईं कुपित
डोल गईं चट्टानें.
किसमें बूता
धरती कब
काँपेगी अनुमाने?
देख-देख भूडोल
चकित क्यों?
सीखें रहना साथ.
अनसमझा भूकम्प न हो अब
मानवता का काल.
पृथ्वी पर भूचाल
हुए, हो रहे, सदा होएंगे.
हम जीना सीखेंगे या
हो नष्ट बिलख रोएँगे?
जीवन शैली गलत हमारी
करे प्रकृति से बैर.
रहें सुरक्षित पशु-पक्षी, तरु
नहीं हमारी खैर.
जैसी करनी
वैसी भरनी
फूट रहा है माथ.
पशुपतिनाथ!
तुम्हारे रहते
जनगण हुआ अनाथ?
.
टैक्टानिक हलचल को समझें
हटें-मिलें भू-प्लेटें.
ऊर्जा विपुल
मुक्त हो फैले
भवन तोड़, भू मेटें.
रहे लचीला
तरु ना टूटे
अड़ियल भवन चटकता.
नींव न जो
मजबूत रखे
वह जीवन-शैली खोती.
उठी अकेली जो
ऊँची मीनार
भग्न हो रोती.
वन हरिया दें, रुके भूस्खलन
कम हो तभी विनाश।
बंधन हो मजबूत, न ढीले
रहें हमारे पाश.
छूट न पायें
कसकर थामें
'सलिल' हाथ में हाथ
पशुपतिनाथ!
तुम्हारे रहते
जनगण हुआ अनाथ?
.
नवगीत:
संजीव
.
धरती की छाती फ़टी
फैला हाहाकार
.
पर्वत, घाटी या मैदान
सभी जगह मानव हैरान
क्रंदन-रुदन न रुकता है
जागा क्या कोई शैतान?
विधना हमसे क्यों रूठा?
क्या करुणासागर झूठा?
किया भरोसा क्या नाहक
पल भर में ऐसे टूटा?
डँसते सर्पों से सवाल
बार-बार फुँफकार
धरती की छाती फ़टी
फैला हाहाकार
.
कभी नहीं मारे भूकंप
कबि नहीं हांरे भूकंप
एक प्राकृतिक घटना है
दोष न स्वीकारे भूकंप
दोषपूर्ण निर्माण किये
मानव ने खुद प्राण दिए
वन काटे, पर्वत खोदे
खुद ही खुद के प्राण लिये
प्रकृति अनुकूल जिओ
मात्र एक उपचार
.
नींव कूटकर खूब भरो
हर कोना मजबूत करो
अलग न कोई भाग रहे
एकरूपता सदा धरो
जड़ मत हो घबराहट से
बिन सोचे ही मत दौड़ो
द्वार-पलंग नीचे छिपकर
राह काल की भी मोड़ो
फैलता अफवाह जो
उसको दो फटकार
धरती की छाती फ़टी
फैला हाहाकार
.
बिजली-अग्नि बुझाओ तुरत
मिले चिकित्सा करो जुगत
दीवारों से लग मत सो
रहो खुले में, वरो सुगत
तोड़ो हर कमजोर भवन
मलबा तनिक न रहे अगन
बैठो जा मैदानों में
हिम्मत देने करो जतन
दूर करो सब दूरियाँ
गले लगा दो प्यार
धरती की छाती फ़टी
फैला हाहाकार
*
२६-४-२०२१५
हरदोई में मिल गये, हरि हर दोई संग।
रमा उमा ने कर दिया जब दोनों को तंग।।
जब दोनों को तंग, याद तब विधि की आई।
जान बचायें दैव, हमें दें रक्षा का वर।
विधि बोले शारदा पड़ी हैं पीछे हरिहर।।
***

गीत
हे समय के देवता!
*
हे समय के देवता! गर दे सको वरदान दो तुम...
*
श्वास जब तक चल रही है, आस जब तक पल रही है
अमावस का चीरकर तम,प्राण-बाती जल रही है.
तब तलक रवि-शशि सदृश हम, रौशनी दें तनिक जग को.
ठोकरों से पग न हारें-करें ज्योतित नित्य मग को.
दे सको हारे मनुज को, विजय का अरमान दो तुम.
हे समय के देवता! गर दे सको वरदान दो तुम...
*
नयन में आँसू न आये, हुलसकर हर कंठ गाये.
कंटकों से भरे पथ पर-चरण पग धर भेंट आये.
समर्पण विश्वास निष्ठांसिर उठाकर जी सके अब.
मनुज हँसकर गरल लेकर-शम्भु-शिववत पी सकें अब.
दे सको हर अधर को मुस्कान दो, मधुगान दो तुम..
हे समय के देवता! गर दे सको वरदान दो तुम...
*
सत्य-शिव को पा सकें हम, गीत सुन्दर गा सकें हम.
सत्-चित्-आनंद घन बन, दर्द-दुःख पर छा सकें हम.
काल का कुछ भय न व्यापे, अभय दो प्रभु!, सब वयों को.
प्रलय में भी जयी हों-संकल्प दो हम मृण्मयों को.
दे सको पुरुषार्थ को परमार्थ की पहचान दो तुम.
हे समय के देवता! गर दे सको वरदान दो तुम...
२६-४-२०१०
***

रविवार, 24 अप्रैल 2022

माँ, दोहे,षटपदी,मुक्तिका,मुक्तक,चिंतन, सॉनेट,सावित्री

सॉनेट
सावित्री
सकल सृष्टि सर्जक सावित्री।
शक्तिवान तनया अवतारी।
संजीवित शाश्वत सावित्री।।
परम चेतना नित अविकारी।

सत्यवान रक्षक सावित्री।
असत कालिमा यम-भयहारी।
मुक्त मुक्ति से हो सावित्री।।
लौटे भू पर हो साकारी।।

सत्य राज्य लाती सावित्री।
दैवी ज्योति उजासविहारी।।
समय सनातन सत् सावित्री।
आप निहारक; आप निहारी।।

भोग-भोक्ता शिव सावित्री।
योग-योक्ता चित सावित्री।।
२४-४-२०२२
•••
ॐ 
चिंतन सलिला ५ 
कहाँ? 
• 
कहाँ? 
'कहाँ' का ज्ञान न हो तो 'कहीं भी, कुछ भी' करते रहकर कुछ हासिल नहीं होता और तब करनेवाला शिकायत पुस्तक (कंप्लेंट बुक) बनकर अपने अलावा सब को दोषी मान लेता है।
 
कहाँ का भान और मान तो उस कबीर को भी था जो कहता था 'जो घर फूँके आपना चले हमारे साथ'। घर फूँकने के पहले 'कहाँ' जाना है, यह जान लेना जरूरी है। 

'कहाँ' जाने बिना घर फूँकने पर 'घर का न घाट का' की हालत और 'माया मिली न राम' का परिणाम ही हाथ लगेगा। 

'कहाँ' का ज्ञान लिया भी जा सकता है, किया भी जा सकता है। 'कहाँ' का ज्ञान किसी दूकान, किसी बाजार में नहीं मिलता। गुरु और जीवनानुभव ही 'कहाँ' का उत्तर दे सकते हैं। 

'कहाँ' से आए, कहाँ हैं और कहाँ जाना है? यह जाने बिना 'पग की किस्मत सिर्फ भटकना' ही हो सकती है। '
कहाँ' तय होने पर ही सामान बाँधकर यात्रा के लिए संसाधन जुटाए और पैर बढ़ाए जाते हैं। 

'कहाँ' का ज्ञान कुदरतन (अपने आप) हर पक्षी को हो जाता है, तभी वह बिना पूछे-बताए सुबह-शाम दो विपरीत दिशाओं में उड़ान भरता है। 

'कहाँ' का ज्ञान मनुष्य को कुदरतन नहीं होता क्योंकि वह कुदरत से दूर हो चुका है, स्वार्थ में फँसकर सर्वार्थ और परमार्थ की रह पर चलना छोड़ चुका है। 

'कहाँ' पाना है?, कहाँ देना है?, कहाँ मिलना है?, कहाँ बिछुड़ना है?, कहाँ बोना है?, कहाँ काटना है? कहाँ पीठ ठोंकना है?, कहाँ डाँटना है? यह तय करते समय याद रखें- 

'आदमी मुसाफ़िर है आता है जाता है। आते-जाते रस्ते में यादें छोड़ जाता है' 

'कहाँ-कैसी' यादें छोड़ रहे हैं हम? 

'कहाँ' की चूक संस्थाओं, कार्यक्रमों और व्यक्तियों की राह में बाधक है, सफल साधक बनने के लिए 'कहाँ' की समझ विकसित करना ही एकमात्र उपाय है। 
२४-४-२०२२ 
संजीव, ९४२५१८३२४४
 •••
मुक्तक
जो मुश्किलों में हँसी-खुशी गीत गाते हैं
वो हारते नहीं; हमेशा जीत जाते हैं
मैं 'सलिल' हूँ; ठहरा नहीं बहता रहा सदा
जो अंजुरी में रहे, लोग रीत जाते हैं.
२४-४-२०२०
***
मुक्तिका
हँस इबादत करो .
मत अदावत करो

मौन बैठो न तुम
कुछ शरारत करो

सो लिये हो बहुत
जग बगावत करो

अब न फेरो नजर
मिल इनायत करो

आज शिकवे सुनो
कल शिकायत करो

छोड़ चलभाष दो
खत किताबत करो

बेहतरी का कदम
हर रवायत करो
२४-४-२०१६
***
एक षटपदी :
*
भारत के गुण गाइए, ध्वजा तिरंगी थाम.
सब जग पर छा जाइये, सब जन एक समान..
सब जन एक समान प्रगति का चक्र चलायें.
दंड थाम उद्दंड शत्रु को पथ पढ़ायें..
बलिदानी केसरिया की जयकार करें शत.
हरियाली सुख, शांति श्वेत, मुस्काए भारत..
२४-४-२०११
***
माँ पर दोहे

माँ गौ भाषा मातृभू, प्रकृति का आभार.
श्वास-श्वास मेरी ऋणी, नमन करूँ शत बार..

भूल मार तज जननि को, मनुज कर रहा पाप.
शाप बना जेवन 'सलिल', दोषी है सुत आप..

दो माओं के पूत से, पाया गीता-ज्ञान.
पाँच जननियाँ कह रहीं, सुत पा-दे वरदान..

रग-रग में जो रक्त है, मैया का उपहार.
है कृतघ्न जो भूलता, अपनी माँ का प्यार..

माँ से, का, के लिए है, 'सलिल' समूचा लोक.
मातृ-चरण बिन पायेगा, कैसे तू आलोक?
२४-४-२०१०
***