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मंगलवार, 27 मार्च 2018

??? ॐ दोहा शतक नीता सैनी

दोहा शतक
नीता सैनी
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जन्म:
आत्मजा:
जीवन संगी:
शिक्षा:
लेखन विधा:
प्रकाशन:
उपलब्धि:
सम्प्रति:
संपर्क:
चलभाष: , ईमेल:
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दोहा शतक
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शारद की आराधना, करें लगाकर ध्यान।
भक्ति करे जो मन लगा, वह पाए सुख-ज्ञान।।
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धन की लिप्सा त्याग दो, बनो विवेकी आज।
मैया की आराधना, से बनते हैं काज।।
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हंस विवेकी तुम बनो, करो देश में नाम।
जो ऐसा करते सदा, वे पाते आराम।।
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तृप्ति मिले साहित्य से, मां की कृपा विशेष।
कपट त्याग निर्मल रहो, प्रीति न हो निश्शेष।।
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माता को अर्पित करो, नित श्रद्धा के फूल।
हर पल माँ का ध्यान हो, घर में है मतभूल।।
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माँ से बढ़कर जानिए, नहीं जगत में आप।
कुछ भी कर संतान ले, उऋण न माँ से आप।।
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माता का दिल सिंधु है, जननी बहुत उदार।
जो माँ की सेवा करे, उसका हो उद्धार।।
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माँ गंगा की धार है, तन-मन करे पवित्र।
ममता से बढ़ कौन सा, इस दुनिया में इत्र।।
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करुणा की देवी कहो , माँ का दिल है मोम।
हित में वह संतान के, जीवन करती होम।।
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माँ को कष्ट न दीजिए, रखिए पल-पल मान।
जो माँ की सेवा करे, उसका ही उत्थान।।
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करती व्रत-उपवास माँ, सुखी रहे संतान।
माँ से बढ़कर कौन है, कोइ कहाँ महान।।
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माँ ममता की खान है, उसका रखिए ध्यान।
सबको जग में दीजिए, माँ-सेवा का ज्ञान।।
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मां के चरणों में दिखे, जिसको चारों धाम।
'नीता' भव से पार हो, वह जाता सुरधाम।।
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तिल के लड्डू नेह से, सबको बाँटो दौड़।
परिजन-पुरजन खुश रहें, मन-पंछी तज होड़।।
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खूब उड़े आकाश में, सबकी आज पतंग।
सबके मुख पर हो हँसी, मन में उठे उमंग।।
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करें तरक्की देश की, दुःख पर पाकर जीत।
सदा एकता-बीज बो, फसल उगाओ मीत।।
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सभी बड़ों की वंदना, छोटों को आशीष।
'नीता' पूजते देश में, त्यागी संत-मनीष।।
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नए साल पर क्या लिखूँ, क्यों न साध लूँ मौन।
सुख-दुःख वंटन करा रहा, देखूँ खुद आ कौन।।
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जीवन में उल्लास हो, सबका हो उत्कर्ष।
चाह यही नव वर्ष में, चहुँ दिस हो सुख-हर्ष।।
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सबको रोटी, घर मिले, उन्नति हो भरपूर।
सुफल मनोरथ हों सदा, सज्जन हों मशहूर।।
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छंद लिखें हम प्रीति के, गाएँ सुमधुर गीत।
विहँस मिलें नव साल में, कुछ अनुरागी मीत।।
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अपने देश- समाज का, हम नित करें विकास।
हर घर में सुख-चैन हो, करें देवगण वास।।
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कड़क चाय नित पीजिए, लेकर हरि का नाम।
चाय बिना आती नहीं, खुलती नींद न राम।।
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जब तक पति के हाथ की, चाय न मिले सप्रीत।
तब तक बिस्तर से उठूँ, नहीं सुहाती रीत।।
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सुबह चाय पतिदेव ला, दें तब खुलते नैन।
बिना चाय पी यदि उठूँ, हुए करेला बैन।।
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गाँव-शहर में चाय ही, स्वागत का पर्याय।
गोरों की जूठन रुची, हमको क्या अभिप्राय।।
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हर घर की है जरूरत, बंद न हो अध्याय।
पिएँ अतिथि को पिलाएँ, सुबह-रात तक चाय।।
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महिमा न्यारी चाय की, पी बन जाता मूड।।
रहा न जाए चाय बिन, भले मत मिले फ़ूड।।
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चाय पियो दोहे लिखो, सधते सारे काम।
चाय मिले यदि समय पर, जीवन ललित ललाम।।
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अदरक डालो कूटकर, लो फिर बढ़िया स्वाद।
हो प्रियतम के हाथ की, चाय रहे नित याद।।
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रंगोली घर- घर बने, रौनक देहरी- द्वार।
'नीता' हर त्योहार में, खुशियाँ मिलें हजार।
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बेटी करछुल हाथ की, सुख देती है खूब।
हरी-भरी हरदम रहे, जैसी होती दूब।।
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बेटी जब घर से गई, हुआ कलेजा चाक।
चैन न घर-बाहर मिले,अमन-चैन है ख़ाकi।।
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बेटी को कम आँकना, कभी न मेरे मीत।
वक्त पड़े पर साथ दे, क्या गर्मी, क्या शीत।।
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कभी झगड़ती लाडली, कभी जताती प्यार।
बेटी से रौनक रहे, आँगन, देहरी , द्वार।।
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जो कन्या को मारते, उनका सत्यानास।
जो कन्या को पूजते, वे सच्चे हरिदास।।
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दो कुल का बेटी करे, अपने गुण से नाम।
बेटी की रक्षा करें, रघुपति सीताराम।।
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बेटी किंचित भी कभी, कष्ट न देती शिष्ट।
सिर पर फेरूँ हाथ तो, सोती पाकर इष्ट।।
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मनचाहा घर- वर मिले, बेटी को हो हर्ष।
'नीता' की शुभ कामना, बेटी क उत्कर्ष।।
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हिंदी माता का करे,हर मानव सम्मान।
यह केवल भाषा नहीं, छंद-ज्ञान की खान।।
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जिव्हा पर हरदम रहे, प्रभु! हिंदी का वास।
इसका मीठापन सदा, सबको आए रास।।
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हिंदी का अपमान है, भारत का अपमान।
हिंदी को सम्मान दें, रखिए इसका मान।।
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हिंदी बिंदी हिंद की, मस्तक की ही शान।
झंकृत मन के तार कर, करे शांति का गान।।
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हिंदी पूरे विश्व में, बोली जाती खूब।
इसको गले लगाइए, 'नीता' सुख में डूब।।
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'भाई' लाकर दो मुझे, कहे सुता मासूम।
राखी बाँधूँगी उसे, ले बाँहों में चूम।।
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धन- दौलत कुछ भी नहीं, नहीं भेंट-उपहार।
केवल मुझको चाहिए, भाई तेरा प्यार।।
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भाई नित उन्नति करे, यही बहन की चाह।
सिखलाती हरदम चलो, पक्की-सच्ची राह।।
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कभी नहीं तुम भूलना, मेरे प्यारे वीर।
बहन दुलारी कह रही, भर नैनों में नीर।।
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राखी की शुभकामना, ढेर बधाई आज।
'नीता' कहती नेह से, रखना भैया लाज।।
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अपने देश- समाज का, रखें हमेशा मान।
जो टर्राए आपसे, ले लें उसकी जान।।
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नैतिकता कायम रहे, करिए चरित-विकास।
कोरे भाषण नीति के, तनिक न आते रास।।
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मानवता का लोप है, दानवता हुए सशक्त।
मानव, मानव का सतत, बहा रहा है रक्त।।
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भौतिकता की चाह में, मानव हिरण समान।
मृग-मरीचिका में फँसा, दुख पा देता जान।।
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हरि की सुधि बिसरा रहा, कैसे होगा पार।
बिना हरि-कृपा किस तरह, हो मानव-उद्धार।।
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खुशियाँ घर-परिवार में, करें हमेशा वास।
दोहा दे शुभकामना, कायम रहे सुवास।।
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कभी न विपदा-रोग हो, मधुमय हो अनुराग।
सब देवों की हो कृपा, द्वारे बजे विहाग।।
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जन्मदिवस शुभकामना, दूँ पुस्तक उपहार।
पौधा रोपो एक तुम, हो भू का सिंगार।
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सब मित्रों के नेह का, पड़ता बहुत प्रभाव।
नीता को बस चाहिए, अपनेपन का भाव।
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दीपक से बाती कहे, सत्य न जानें लोग।
जल-जलकर तो मैं मरी, सुयश तुम्हें संयोग।।
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दीप, तेल, बाती बिना, होता तम घनघोर।
तीनों के संयोग से, घर में होय अंजोर।।
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मेल-जोल, हित-त्याग से, सधते सारे काम।
दीपक से यह सीखिए, लेकर हरि का नाम।।
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धन की देवी धन लिए, घर-घर करें प्रवेश।
श्रम से उन्नति देश की, पनपें सभी प्रदेश।।
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मन कर मंगल कामना, जन हो मालामाल।
दुख-दारिद्र्य न शेष हो, भारत हो खुशहाल।।
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युगों-युगों से धो रहीं, गंगा मैया पाप।
निर्मल मन करतीं सदा, हरतीं पीड़ा-ताप।।
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गंगा-दर्शन के लिए, दौड़े आते लोग।
पूर्ण मनोरथ हो रहा, सुफल मिले संयोग।।
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बढ़ा प्रदूषण गंग में, स्वार्थ रहे सब साध।
भक्ति-भाव सच्चा नहीं, श्रद्धा नहीं अगाध।।
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मन मैला यदि आपका, तन धोना बेकार।
गंगा मां कहतीं यही, मन में हो न विकार।।
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मौसम है मधुमास का, मन में भरी उमंग।
अमिट छाप हँस छोड़ता, कुदरत का नव रंग।।
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फूल खिले हैं बाग़ में, चारों तरफ बहार।
मन को मन पुलकित रखो, कभी न माने हार।।
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भँवरे-तितली नाचते, कोयल गाती गीत।
मादक मौसम जलाए, कब आओगे मीत।।
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सरसों फूली खेत में, मन का हरे कलेश।
फगुआ सूना तुम बिना, आओ साजन देश।।
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खुशियों से जीवन भरे, रंगों का त्योहार।
कहीं नहीं दुख-दर्द हो, लगे भला संसार।
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सबको सुख की ही मिले, सदा यहाँ सौगात।
यही कामना देव से, हाथ जोड़ दिन- रात।।
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शांति सदा हो देश में, घूमे उन्नति-चक्र ।
पूर्ण रहे धन-धान्य से, भू न भाग्य हो वक्र।।
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रंग न फीका हो कभी, चटक गुलाबी-लाल ।
सतरंगी संसार हो, हर्षित सपने पाल।।
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भेद-भाव की कालिमा, हो जाए अति दूर।
ऐक्य-भाव का चंद्रमा, खूब बिखेरे नूर।।
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तोड़ो नाता कीच से, काजल-नैना आँज।
तन निर्मल कर जतन से, मन को तन्नक माँज।।
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साथी-संगी मिल गए, बना गेह-परिवार।
सद्विचार-साहित्य का, विस्तृत है संसार।।
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गीत, ग़ज़ल, कविता, कथा, नीता भाषा-ओज।
कथ्य,शिल्प, शैली सरस, सलिला सलिल सरोज।।
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माँ शारद की कृपा से, सुलभ ज्ञान-विज्ञान।
करे साधना जो सतत, होता वही सुजान।।
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सुंदर भाषा, भावयुत, हितकर लेखन फूल।
हों शारद-उद्यान में, मिटा भेद के शूल।।
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परसेवा-उपकार ही, हो मेरा पाथेय।
पार लगाओ पार्थ सम, या कर दो राधेय।।
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रच दूँ कविता प्यार की, और न कोई चाह।
दिखलाता है प्यार ही, नव जीवन की राह।।
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और नहीं कुछ चाहिए, दो- दो मीठे बोल।
प्यारे प्रियवर! प्रीति का, मीठा रस दो घोल।।
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नैन बावरे हो गए, तुमसे कर-कर प्रीति।
मुझको भाती ही नहीं, दुनियादारी रीति।।
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मूल्यवान मत दो मुझे, प्रिय! दो कुछ अनमोल।
'नीता' को अनुराग दो, प्रभु जी तुम दिल खोल।।
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गंग नहा मत मलिन कर, दर्शन कर कर जोड़।
आ! चल, कचरा उठाएँ, करें स्वच्छता-होड़।।
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सूर्यदेव को पूजकर, जल-अंजलि दो ढाल।
सौर ऊर्जा काम ले, चलो उठाकर भाल।।
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स्वागत में नव वर्ष के, वर्षा-जल ले रोक।
भू में नीचे उतारे, करो व्यवस्था टोक।।
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कविता बिन मुझको नहीं, मिले तनिक सुख-चैन।
डूबी रहती भाव में, लिखती हूँ दिन-रैन।। ९०
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आज बड़ा दिन है भला, खुशियों का त्योहार।
बाबा सांता क्लॉज जी, लाए हैं उपहार।।
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रौनक देखो शहर मे, सजा हुआ बाजार।
होना अब तो चाहिए, सबका मन गुलजार।।
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जन्म दिवस प्रभु यीशु का, धूमधाम चहुँ ओर।
हर दिन आए विश्व में, अमन -चैन की भोर।।
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सोमवार, 26 मार्च 2018

समीक्षा नवगीत: गिरिमोहन गुरु


कृति चर्चा: 
गिरिमोहन गुरु के नवगीत : बनाते-नवरीत 

चर्चाकार : आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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[कृति विवरण: गिरिमोहन गुरु के नवगीत, नवगीत संग्रह, गिरिमोहन गुरु, संवत २०६६, पृष्ठ ८८, १००/-, आकार डिमाई, आवरण पेपरबैक दोरंगी, मध्य प्रदेश तुलसी अकादमी ५० महाबली नगर, कोलार मार्ग, भोपाल, गीतकार संपर्क:शिव संकल्प साहित्य परिषद्, गृह निर्माण कोलोनी होशंगाबाद ] 
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                        विवेच्य कृति नर्मदांचल के वरिष्ठ साहित्यकार श्री गिरिमोहन गुरु के ६७ नवगीतों का सुवासित प्रतिनिधि गीतगुच्छ है जिसमें से कुछ गीत पूर्व में 'मुझे नर्मदा कहो' शीर्षक से पुस्तकाकार प्रकाशित हो चुके हैं। इन गीतों का चयन श्री रामकृष्ण दीक्षित तथा श्री गिरिवर गिरि 'निर्मोही' ने किया है। नवगीत प्रवर्तकों में से एक डॉ. शंभुनाथ सिंह, नवगीत पुरोधा डॉ. देवेन्द्र शर्मा 'इंद्र', पद्म श्री गोपालदास नीरज, डॉ. अनंतराम मिश्र अनंत, डॉ. गणेशदत्त सारस्वत, डॉ. उर्मिलेश, डॉ. परमलाल गुप्त, डॉ. रामचंद्र मालवीय, कुमार रवीन्द्र, स्व. कृष्णचन्द्र बेरी आदि ने प्रशंसात्मक टिप्पणियों में नर्मदांचल के वरिष्ठ नवगीतकार श्री गिरिमोहन गुरु के नवगीतों पर अपना अभिमत व्यक्त किया है। डॉ. दया कृष्ण विजयवर्गीय के अनुसार इन नवगीतों में 'शब्द की प्रच्छन्न ऊर्जा को कल्पना के विस्तृत नीलाकाश में उड़ाने की जो छान्दसिक अबाध गति है, वह गुरूजी को नवगीत का सशक्त हस्ताक्षर बना देती है।

                        कृति के आरम्भ में डॉ. अनंत ने आमुख में डॉ. शम्भुनाथ सिंह के साथ नवगीत पर परिचर्चा का उल्लेख करते हुए लिखा है कि "डॉ. शंभुनाथ सिंह ने नवगीत के वर्ण्य विषयों में धर्म-आध्यात्म-दर्शन, नीति-सुभाषित, प्रेम-श्रृंगार तथा प्रकृति-चित्रण की वर्जना की है। उन्होंने केवल युगबोधजनित भावभूमि तथा यत्र-तत्र एक सी टीस जगानेवाले पारंपरिक या सांस्कृतिक बिंब-विधान को ही नवगीत के लिए सर्वोपयुक्त बतलाया था।" महाप्राण निराला द्वारा 'नव गति, नव ले, ताल-छंद नव' के आव्हान के अगले कदम के रूप में यह तर्क सम्मत भी था किन्तु किसी विधा को आरंभ से ही प्रतिबंधों में जकड़ने से उसका विकास और प्रगति प्रभावित होना भी स्वाभाविक है। एक विचार विशेष के प्रति प्रतिबद्धता ने प्रगतिशील कविता को जन सामान्य से काटकर विचार धारा समर्थक बुद्धिजीवियों तक सीमित कर दिया। नवगीत को इस परिणति से बचाकर, कल से कल तक सृजन सेतु बनाते हुए नव पीढ़ी तक पहुँचाने में जिन रचनाधर्मियों ने साहसपूर्वक निर्धारित की थाती को अनिर्धारित की भूमि पर स्थापित करते हुए अपनी मौलिक राह चुनी उनमें गुरु जी भी एक हैं। विधि का विधान यह कि शम्भुनाथ जी द्वारा वर्जित 'धर्म-आध्यात्म-दर्शन, नीति-सुभाषित, प्रेम-श्रृंगार तथा प्रकृति-चित्रण' गुरु जी के नवगीतों में प्रचुरता से व्याप्त है। डॉ. अनंत ने प्रसन्नता व्यक्त की है कि "गुरु ने नवगीत से प्रभाव अवश्य ग्रहण किए हैं और उसके नवीन शिल्प विधान को भी अपने गीतों में अपनाया है परन्तु उन विशेषताओं को प्राय: नहीं अपनाया जो बहुआयामी मानव-जीवन के विविध कोणीय वर्ण्य विषयों को सीमित करके काव्य को प्रतिबद्धता की श्रंखलाओं में बंधने  के लिए बाध्य करती है।" 

                        नवगीत के शिल्प-विधान को आत्मसात करते हुए कथ्य के स्तर पर निज चिंतन प्रणीत विषयों और स्वस्फूर्त भंगिमाओं को माधुर्य और सौन्दर्य सहित अभिव्यंजित कर गुरु जी ने विधा को गौड़ और विधा में लिख रहे हस्ताक्षर को प्रमुख होने की प्रवृत्ति को चुनौती दी। जीवन में विरोधाभासजनित संत्रास की अभिव्यक्ति देखिए-
अश्रु जल में तैरते हैं / स्वप्न के शैवाल 
नाववाले नाविकों के / हाथ है जाल 
. 
हम रहे शीतल भले ही / आग के आगे रहे 
वह मिला प्रतिपल कि जिससे / उम्र भर भागे रहे

                        वैषम्य और विडंबना बयां करने का गुरु जी अपना ही अंदाज़ है-
घूरे पर पत्तलें / पत्तलों में औंधे दौने 
एक तरफ हैं श्वान / दूसरी तरफ मनुज छौने

                        अनुभूति की ताजगी, अभिव्यक्ति की सादगी तथा सुंस्कृत भाषा की बानगी गुरु के नवगीतों की जान है। उनके नवगीत निराशा में आशा, बिखराव में सम्मिलन, अलगाव में संगठन और अनेकता में एकता की प्रतीति कर -  करा पाते हैं-
लौटकर फिर आ रही निज थान पर / स्वयं बँधने कामना की गाय 

हृदय बछड़े सा खड़ा है द्वार पर / एकटक सा देखता निरुपाय 
हौसला भी एक निर्मम ग्वाल बन / दूध दुहने बाँधता है, छोड़ता है

                        छंद-विधान, बिम्ब, प्रतीक, फैंटेसी, मिथकीय चेतना, प्रकृति चित्रण, मूल्य-क्षरण, वैषम्य विरोध और कुंठा - निषेध आदि को शब्दित करते समय गुरु जी परंपरा की सनातनता का नव मूल्यों से समन्वय करते हैं।
कृषक के कंधे हुए कमजोर / हल से हल नहीं हो पा रही / हर बात 
शहर की कृत्रिम सडक बेधड़क / गाँवों तक पहुँच / करने लगी उत्पात

                        गुरु जी के मौलिक बिम्बों-प्रतीकों की छटा देखे-
इमली के कोचर का गिरगिट दिखता है रंगदार 
शाखा पर बैठी गौरैया दिखती है लाचार 
. 
एक अंधड़ ने किया / दंगा हुए सब वृक्ष नंगे 
हो गए सब फूल ज्वर से ग्रस्त / केवल शूल चंगे 
. 
भैया बदले, भाभी बदले / देवर बदल गए 
वक्त के तेवर बदल गए 
. 
काँपते सपेरों के हाथ साँपों के आगे 
झुक रहे पुण्य, स्वयं माथ, पापों के आगे
                        सामाजिक वैषम्य की अभिव्यक्ति का अभिनव अंदाज़ देखिये-
चाँदी के ही चेहरों का स्वागत होता झुक-झुक 
खड़ा भोज ही, बड़ा भोज, कहलाने को उत्सुक 
फिर से हम पश्चिमी स्वप्न में स्यात लगे खोने 
. 
सपने में सोन मछरिया पकड़ी थी मैंने 
किन्तु आँख खुलते ही 
हाथ से फिसल गयी 
. 
इधर पीलिया उधर खिल गए 
अमलतास के फूल 
                        गुरु के नवगीतों का वैशिष्ट्य नूतन छ्न्दीय भंगिमाएँ भी है। वे शब्द चित्र चित्रित करने में प्रवीण हैं।
बूढ़ा चाँद जर्जरित पीपल 
अधनंगा चौपाल
इमली के कोचर का गिरगिट 
दिखता है रंगदार 
नदी किनारेवाला मछुआ 
रह-रह बुनता जाल 
भूखे-प्यासे ढोर देखते 
चरवाहों की और 
भेड़ चरानेवाली, वन में 
फायर ढूंढती भोर 
मरना यदि मुश्किल है तो
जीना भी है जंजाल
                        गुरु जी नवगीतों में नवाशा के दीप जलाने में भी संकोच नहीं करते-
एक चिड़िया की चहक सुनकर 
गीत पत्तों पर लगे छपने 
. 
स्वप्न ने अँगड़ाइयाँ लीं, सुग्बुआऎ आस 
जिंदगी की बन गयी पहचान नूतन प्यास
                        छंदों का सधा होना उनके कोमल-कान्त पदावली सज्जित नवगीतों की माधुरी को गुलाबजली सुवास भी देता है। प्रेम, प्रकृति और संस्कृति की त्रिवेणी इन गीतों में सर्वत्र प्रवाहित है।
जग को अगर नचाना हो तो / पहले खुद नाचो, मौसम के अधरों पर / विश्वासी भाषा, प्यासों को देख, तृप्ति / लौटती सखेद, ले आया पावस के पत्र / मेघ डाकिया, अख़बारों से मिली सुचना / फिर बसंत आया जैसी अभिव्यक्तियाँ पाठक को गुनगुनाने के लिए प्रेरित करती हैं। 
                        नवगीतों को उसके उद्भव काल में निर्धारित प्रतिबंधों के खूँटे से बांधकर रखने के पक्षधरों को नवगीत की यह भावमुद्रा स्वीकारने में असहजता प्रतीत हो सकती है, कोई कट्टर हस्ताक्षर नाक-भौं सिकोड़ सकता है पर नवगीत संसद के दरवाजे पर दस्तक देते अनेक नवगीतकार इन नवगीतों का अनुसरणकर खुद को गौरवान्वित अनुभव करेंगे।
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संपर्क: विश्व वाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१, चलभाष: ७९९९५५९६१८, ९४२५१८३२४४ ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com  

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haiku, mahiya, kashnika, pyaramid,

विधा विविधा:
हाइकु:
(त्रिपदिक वाचिक जापानी छंद ५-७-५ ध्वनि) 
.
गुलाब खिले 
तुम्हारे गालों पर
निगाह मिले.
*
माहिया:
(त्रिपदिक मात्रिक पंजाबी छंद, १३-१०-१३ मात्रा)
.
मत माँगने मत आना
जुमला वादों को
कह चाहते बिसराना.
*
क्षणिका:
( नियम मुक्त)
.
मन-पंछी
उड़ा नीलाभ नभ में
सिंदूरी प्राची से आँख मिलाने,
झटपट भागा
सूरज ने आँख तरेरी
लगा धरती को जलाने.
***
चित्र अलंकार: समकोण त्रिभुज
(वर्ण पिरामिड: ७ पंक्ति, वर्ण क्रमश: १ से ७)
मैं
भीरु
कायर
डरपोंक,
हूँ भयभीत
वर्ण पिरामिड
लिखना नहीं आता.
*
हो
तुम
साहसी
पराक्रमी
बहादुर भी
मुझ असाहसी
को झेलते रहे हो.
*

हो 
गया 
अवाक्, 
घटनाएँ 
सतत घट, 
कर अचंभित 
कहें मत रुकना।   
 *
२५.३.२०१८

समीक्षा नवगीत: हम जंगल के अमलतास, भगवत दुबे - संजीव वर्मा 'सलिल'

कृति चर्चा: 
हम जंगल के अमलतास : नवाशा प्रवाही नवगीत संकलन
चर्चाकार: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 
salil.sanjiv@gmail.com, ९४२५१ ८३२४४ 
[कृति विवरण: हम जंगल के अमलतास, नवगीत संग्रह, आचार्य भगवत दुबे, २००८, पृष्ठ १२०, १५० रु., आकार डिमाई, आवरण सजिल्द बहुरंगी जैकेटयुक्त, प्रकाशक कादंबरी जबलपुर, संपर्क: २६७२ विमल स्मृति, समीप पिसनहारी मढ़िया, जबलपुर ४८२००३, चलभाष ९३००६१३९७५] 
*
विश्ववाणी हिंदी के समृद्ध वांग्मय को रसप्लावित करती नवगीतीय भावधारा के समर्थ-सशक्त हस्ताक्षर आचार्य भगवत दुबे के नवगीत उनके व्यक्तित्व की तरह सहज, सरल, खुरदरे, प्राणवंत ततः जिजीविषाजयी हैं. इन नवगीतों का कथ्य सामाजिक विसंगतियों के मरुस्थल  में मृग-मरीचिका की तरह आँखों में झूलते - टूटते स्वप्नों को पूरी बेबाकी से उद्घाटित तो करता है किन्तु हताश-निराश होकर आर्तनाद नहीं करता. ये नवगीत विधागत संकीर्ण मान्यताओं की अनदेखी कर, नवाशा का संचार करते हुए, अपने पद-चिन्हों से नव सृअन-पथ का अभिषेक करते हैं. संग्रह के प्रथम नवगीत 'ध्वजा नवगीत की' में आचार्य दुबे नवगीत के उन तत्वों का उल्लेख करते हैं जिन्हें वे नवगीत में आवश्यक मानते हैं:

                       नव प्रतीक, नव ताल, छंद नव लाये हैं 
                       जन-जीवन के सारे चित्र बनाये हैं 
                                              की सरगम तैयार नये संगीत की 
                       कसे उक्ति वैचित्र्य, चमत्कृत करते हैं 
                       छोटी सी गागर में सागर भरते हैं 
                                              जहाँ मछलियाँ विचरण करें प्रतीत की 
                       जो विरूपतायें समाज में दिखती हैं 
                       गीत पंक्तियाँ उसी व्यथा को लिखती हैं 
                                              लीक छोड़ दी पारंपरिक अतीत की 
                                              अब फहराने लगी ध्वजा नवगीत की 

सजग महाकाव्यकार, निपुण दोहाकार, प्रसिद्ध गजलकार, कुशल कहानीकार, विद्वान समीक्षक, सहृदय लोकगीतकार, मौलिक हाइकुकार आदि विविध रूपों में दुबे जी सतत सृजन कर चर्चित-सम्मानित हुए हैं. इन नवगीतों का वैशिष्ट्य आंचलिक जन-जीवन से अनुप्राणित होकर ग्राम्य जीवन के सहजानंद को शहरी जीवन के त्रासद वैभव पर वरीयता देते हुए मानव मूल्यों को शिखर पर स्थापित करना है. प्रो. देवेन्द्र शर्मा 'इंद्र' इन नवगीतों के संबंध में ठीक ही लिखते हैं: '...भाषा, छंद, लय, बिम्ब और प्रतीकों के समन्वित-सज्जित प्रयोग की कसौटी पर भी दुबे जी खरे उतरते हैं. उनके गीत थके-हरे और अवसाद-जर्जर मानव-मन को आस्था और विश्वास की लोकांतर यात्रा करने में पूर्णत: सफल हुए हैं. अलंकार लोकोक्तियों और मुहावरों के प्रचुर प्रयोग ने गीतों में जो ताजगी और खुशबू भर दी है, वह श्लाघनीय है.' 

निराला द्वारा 'नव गति, नव लय, ताल-छंद नव' के आव्हान से नवगीत का प्रादुर्भाव मानने और स्व. राजेंद्र प्रसाद सिंह तथा स्व. शम्भुनाथ सिंह द्वारा प्रतिष्ठापित नवगीत को उद्भव काल की मान्यताओं और सीमाओं में कैद रखने का आग्रह करनेवाले नवगीतकार यह विस्मृत कट देते हैं कि काव्य विधा पल-पल परिवर्तित होती सलिला सदृश्य किसी विशिष्ट भाव-भंगिमा में कैद की ही नहीं जा सकती. सतत बदलाव ही काव्य की प्राण शक्ति है. दुबे जी नवगीत में परिवर्तन के पक्षधर हैं: "पिंजरों में जंगल की / मैना मत पालिये / पाँव  में हवाओं के / बेड़ी मत डालिए... अब तक हैं यायावर' 

वृद्ध मेघ क्वांर के (मुखड़ा १२+११ x २, ३ अन्तरा १२+१२ x २ + १२+ ११), वक्त यह बहुरुपिया (मुखड़ा १४+१२ , १-३ अन्तरा १४+१२ x ३, २ अन्तरा १२+ १४ x २ अ= १४=१२), यातनाओं की सुई (मुखड़ा १९,२०,१९,१९, ३ अन्तरा १९ x ६), हम त्रिशंकु जैसे तारे हैं, नयन लाज के भी झुक जाते - पादाकुलक छंद(मुखड़ा १६x २, ३ अन्तरा १६x ६), स्वार्थी सब शिखरस्थ हुए- महाभागवत जाति (२६ मात्रीय), हवा हुई ज्वर ग्रस्त २५ या २६ मात्रा, मार्गदर्शन मनचलों का-यौगिक जाति (मुखड़ा १४ x ४, ३ अन्तरा २८ x २ ), आचरण आदर्श के बौने हुए- महापौराणिक जाति (मुखड़ा १९ x २, ३ अन्तरा १९ x ४), पसलियाँ बचीं (मुखड़ा १२+८,  १०=१०, ३ अन्तरा २०, २१ या २२ मात्रिक ४ पंक्तियाँ), खर्राटे भर रहे पहरुए (मुखड़ा १६ x २+१०, ३ अन्तरा १४ x ३ + १६+ १०),समय क्रूर डाकू ददुआ (मुखड़ा १६+१४ x २, ३ अन्तरा १६ x ४ + १४), दिल्ली तक जाएँगी लपटें (मुखड़ा २६x २, ३ अन्तरा २६x २ + २६), ओछे गणवेश (मुखड़ा २१ x २, ३ अन्तरा २० x २ + १२+१२ या ९), बूढ़ा हुआ बसंत (मुखड़ा २६ x २, ३ अन्तरा १६ x २ + २६), ब्याज रहे भरते (मुखड़ा २६ x २, ३ अन्तरा २६ x २ + २६) आदि से स्पष्ट है कि दुबे जी को छंदों पर अधिकार प्राप्त है. वे छंद के मानक रूप के अतिरिक्त कथ्य की माँग पर परिवर्तित रूप का प्रयोग भी करते हैं. वे लय को साधते हैं, यति-स्थान को नहीं. इससे उन्हें शब्द-चयन तथा शब्द-प्रयोग में सुविधा तथा स्वतंत्रता मिल जाती है जिससे भाव की समुचित अभिव्यक्ति संभव हो पाती है.
यथार्थवाद और प्रगतिवाद के खोखले नारों पर आधरित तथाकथित प्रगतिवादी कविता की नीरसता के व्यूह को अपने सरस नवगीतों से छिन्न-भिन्न करते हुए दुबे जी अपने नवगीतों को छद्म क्रांतिधर्मिता से बचाकर रचनात्मक अनुभूतियों और सृजनात्मकता की और उन्मुख कर पाते हैं: 'जुल्म का अनुवाद / ये टूटी पसलियाँ हैं / देखिये जिस ओर / आतंकी बिजलियाँ हैं / हो रहे तेजाब जैसे / वक्त के तेव ... युगीन विसंतियों के निराकरण के उपाय भी घातक हैं: 'उर्वरक डाले विषैले / मूक माटी में / उग रहे हथियार पीने / शांत घाटी में'...   किन्तु कहीं भी हताशा-निराशा या अवसाद नहीं है. अगले ही पल नवगीत आव्हान करता है: 'रूढ़ि-अंधविश्वासों की ये काराएँ तोड़ें'...'भ्रम के खरपतवार / ज्ञान की खुरपी से गोड़ें'. युगीन विडंबनाओं के साथ समन्वय और नवनिर्माण का स्वर समन्वित कर दुबेजी नवगीत को उद्देश्यपरक बना देते हैं.

राजनैतिक विद्रूपता का जीवंत चित्रण देखें: 'चीरहरण हो जाया करते / शकुनी के पाँसों से / छली गयी है प्रजा हमेशा / सत्ता के झाँसों से / राजनीti में सम्मानित / होती करतूतें काली'  प्रकृति का सानिंध्य चेतना और स्फूर्ति देता है. अतः, पर्यावरण की सुरक्षा हमारा दायित्व है:

कभी ग्रीष्म, पावस, शीतलता 
कभी वसंत सुहाना 
विपुल खनिज-फल-फूल अन्न 
जल-वायु प्रकृति से पाना
पर्यावरण सुरक्षा करके 
हों हम मुक्त ऋणों से 

नकारात्मता में भी सकरात्मकता देख पाने की दृष्टि स्वागतेय है:

ग्रीष्म ने जब भी जलाये पाँव मेरे
पीर की अनुभूति से परिचय हुआ है...

.....भ्रूण अँकुराये लता की कोख में जब
हार में भी जीत का निश्चय हुआ है. 
      


प्रो. विद्यानंदन राजीव के अनुसार ये 'नवगीत वर्तमान जीवन के यथार्थ से न केवल रू-ब-रू होते हैं वरन सामाजिक विसंगतियों से मुठभेड़ करने की प्रहारक मुद्रा में दिखाई देते हैं.'

सामाजिक मर्यादा को क्षत-विक्षत करती स्थिति का चित्रण देखें: 'आबरू बेशर्म होकर / दे रही न्योते प्रणय के / हैं घिनौने चित्र ये / अंग्रेजियत से संविलय के / कर रही है यौन शिक्षा / मार्गदर्शन मनचलों का'

मौसमी परिवर्तनों पर दुबे जी के नवगीतों की मुद्रा अपनी मिसाल आप है: 'सूरज मार  रहा किरणों के / कस-कस कर कोड़े / हवा हुई ज्वर ग्रस्त / देह पीली वृक्षों की / उलझी प्रश्नावली / नदी तट के यक्षों की / किन्तु युधिष्ठिर कृषक / धैर्य की वल्गा ना छोड़े.''

नवगीतकारों के सम्मुख नव छंद की समस्या प्राय: मुँह बाये रहती है. विवेच्य संग्रह के नवगीत पिन्गलीय विधानों का पालन करते हुए भी कथ्य की आवश्यकतानुसार गति-यति में परिवर्तन कर नवता की रक्षा कर पाते हैं.

'ध्वजा नवगीत की' शीर्षक नवगीत में २२-२२-२१ मात्रीय पंक्तियों के ६ अंतरे हैं. पहला समूह मुखड़े का कार्य कर रहा है, शेष समूह अंतरे के रूप में हैं. तृतीय पंक्ति में आनुप्रसिक तुकांतता का पालन किया गया है.

'हम जंगल के अमलतास' शीर्षक नवगीत पर कृति का नामकरण किया गया है. यह नवगीत महाभागवत जाति के गीतिका छंद में १४+१२ = २६ मात्रीय पंक्तियों में रचा गया है तथा पंक्त्यांत में  लघु-गुरु का भी पालन है. मुखड़े में २ तथा अंतरों में ३-३ पंक्तियाँ हैं.

'जहाँ लोकरस रहते शहदीले' शीर्षक रचना महाभागवत जातीय छंद में है.  मुखड़े तथा २ अंतरांत में गुरु-गुरु का पालन है, जबकि ३ रे अंतरे में एक गुरु है. यति में विविधता है: १६-१०, ११-१५, १४-१२.

'हार न मानी अच्छाई ने' शीर्षक गीत में प्रत्येक पंक्ति १६ मात्रीय है. मुखड़ा १६+१६=३२ मात्रिक है. अंतरे में ३२ मात्रिक २ (१६x४)  समतुकांती पंक्तियाँ है. सवैया के समान मात्राएँ होने पर भी पंक्त्यांत में भगण न होने से यह सवैया गीत नहीं है.

'ममता का छप्पर'  नवगीत महाभागवत जाति का है किन्तु यति में विविधता  १६+१०, ११+१५, १५+११ आदि के कारण यह मिश्रित संकर छंद में है.

'बेड़ियाँ न डालिये' के अंतरे में १२+११=२३ मात्रिक २ पंक्तियाँ, पहले-तीसरे अंतरे में १२+१२=२४ मात्रिक २-२ पंक्तियाँ तथा दूसरे अंतरे में १०+१३=२३ मात्रिक २ पंक्तियाँ है. तीनों अंतरों के अंत में मुखड़े के सामान १२+१२ मात्रिक पंक्ति है. गीत में मात्रिक तथा यति की विविधता के बावजूद प्रवाह भंग नहीं है.

'नंगपन ऊँचे महल का शील है' शीर्षक गीत महापौराणिक जातीय छंद में है. अधिकांश पंक्तियों में ग्रंथि छंद के पिन्गलीय विधान (पंक्त्यांत लघु-गुरु) का पालन है किन्तु कहीं-कहीं अंत के गुरु को २ लघु में बदल लिया गया है तथापि लय भंग न हो इसका ध्यान रखा गया है.


इन नवगीतों में खड़ी हिंदी, देशज बुन्देली, यदा-कदा उर्दू व् अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग, मुहावरों तथा लोकोक्तियों का प्रयोग हुआ है जो लालित्य में वृद्धि करता है. दुबे जी कथ्यानुसार प्रतीकों, बिम्बों, उपमाओं तथा रूपकों का प्रयोग करते हैं. उनका मत है: 'इस नयी विधा ने काव्य पर कुटिलतापूर्वक लादे गए अतिबौद्धिक अछ्न्दिल बोझ को हल्का अवश्य किया है.' हम जंगल के अमलतास' एक महत्वपूर्ण नवगीत संग्रह है जो छान्दस वैविध्य और लालित्यपूर्ण अभिव्यक्ति से परिपूर्ण है.
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