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गुरुवार, 21 मई 2026

मई २१, सॉनेट, आयुर्वेद, चित्रक, नुस्खे, दोहा, कान, गीत, वास्तु,

 सलिल सृजन मई २१

*
नवगीत
भोर भई चूँ चूँ सुन प्रभु को दे धन्यवाद, भू-नभ-रवि को प्रणाम सुमिर पितर हाथ जोड़। . जो बीता सो बीता, घट रीता रे! आज खेत, गोड़-बीज डाल सींच। श्रम सीकर बहा, बैठ नयन मींच।। फल की चिंता मत कर, पढ़ गीता रे! शोर न कर दुपहर सुन धुन रुचि की, भोजन कर मन को रख शांत-शाद कल पर कम काम छोड़। भोर भई चूँ चूँ सुन प्रभु को दे धन्यवाद, भू-नभ-रवि को प्रणाम सुमिर पितर हाथ जोड़। . जग मीठा खट्टा कड़वा तीखा रे! अपना सपना नपना बना रीत। चादर पर पड़े खींच, रुक न नीत। आशा मत छोड़ वही परिणीता रे! जो मन को रुचती धुन उसको ही रखो याद, कीर्तिवान हो अकाम नाहक क्यों करें होड़। भोर भई चूँ चूँ सुन प्रभु को दे धन्यवाद, भू-नभ-रवि को प्रणाम सुमिर पितर हाथ जोड़। . झट बिसार जीत-हार, जो बीता रे! ले निहार जो पाया बहुत मान। और मिले सोच न दे व्यर्थ जान।। श्वास-आस गति-यति हो संगीता रे! नौ नगद भले न भूल तेरह उधार धूल, मन का संतोष कोष फिक्स डिपॉजिट न तोड़। भोर भई चूँ चूँ सुन प्रभु को दे धन्यवाद, भू-नभ-रवि को प्रणाम सुमिर पितर हाथ जोड़। २१.६.२०२६ ०००
सॉनेट
पेड़ की छाँव
मापनी: २१२-२१२-२१२-२१२
*
बैठिए दो घड़ी पेड़ की छाँव में,
पंछियों की सुनें चहचहाहट जरा,
देख लूँ मैं सपन आपकी ठाँव में,
देखने से अभी मन कहाँ है भरा।
आपके नैन में मैं बसा हूँ विहँस,
नैन में हैं बसे आप मेरे सनम,
दृष्टि बंकिम गई धँस; गया तीर फँस,
पीर हृद में उठी; आँख है मीत नम।
हाथ में हाथ ले हम चलें साथ हो,
ज़िंदगी की डगर पर कदम साथ रख,
दृष्टि नत हो मगर उच्च सिर-माथ हो,
प्रेम प्याला पिएँ विष-अमिय साथ चख।
तोड़ बेड़ी पड़ी जो रही पाँव में,
हम बसें हौसलों के किसी गाँव में।
२१.५.२०२४
***
प्रश्नोत्तर
प्रश्न -
आत्म विश्वास की कमी को कैसे दूर करें?
उत्तर -
दर्पण सम्मुख बैठकर, मिला नैन से नैन।
कहें आप से आप ही, मन मत हो बेचैन।।
किस्मत मेरे हाथ में, बनकर रहे लकीर।
अंकित भाग्य कपाल पर, हूँ सच बहुत अमीर।।
धरती माँ की गोद है, गगन पिता की छाँव।
स्नेहपूर्ण संबंध ही, है मेरा घर-गाँव।।
अपने मन का ब्रह्म मैं, विष्णु देह का सत्य।
तजता शिव बन असत को, मेरी आत्म अनित्य।।
जो वह वह मैं है नहीं, मुझमें प्रभु में भेद।
मुझसे मिलने अवतरे, वह भी करे न खेद।।
अधिक राम से भी रहे सिर्फ राम का दास।
मैं भी हूँ प्रभु से अधिक, मेरा बल विश्वास।।
***
आयुर्वेद, चित्रक
*
चित्रक की दो जातियाँ, श्वेत-रक्त हैं फूल।
भारत लंका बांग्ला, खिले न इसमें शूल।१।
*
कालमूल चीता दहन, अग्नि ब्याल है आम।
बेखबरंदा फारसी, अरब शैतरज नाम।२।
*
चित्रमूल चित्रो कहें, महाराष्ट्र गुजरात।
चित्रा है पंजाब में, लीडवर्ट ही भ्रात।३।
*
प्लंबैगो जेलेनिका, है वैज्ञानिक नाम।
कुल प्लंबैजिलेनिका, नेफ्थोक्विनोन अनाम।४।
*
कोमल चिकनी हरी हों, शाख आयु भरपूर।
जड़ पत्ते अरु अर्क भी, करें रोग झट दूर।५।
*
चीनी लिपिड फिनोल है, संग प्रोटीन-स्टार्च।
संधिशोथ कैंसर हरे, करे पंगु भी मार्च।६।
*
एंटीबायोटिक जड़ें, एंटी ऑक्सीडेन्ट।
करतीं दूर मलेरिया, सचमुच एक्सीलेंट।७।
*
अल्कलाइड प्लंबेंगिन, कैंसर हरता तात।
नेफ्रोटॉक्सिक असर को, सिस्प्लेटिन दे मात।८।
*
प्लंबेगिन अग्न्याशयी, कैंसर देता रोक।
कोलस्ट्राल एलडीएल, कम करता हर शोक।९।
*
पथरी गठिया पीलिया, प्रजनन कैंसर रोक।
किडनी-ह्रदय विकार हर, घाव भरे मत टोंक।१०।
*
छह फुटिया झाड़ीनुमा, पौधा सदाबहार।
तना रहे छोटा हरा, पत्ते लट्वाकार।११।
*
तीन इंच लंबा रहे, एक इंच फैलाव।
अग्रभाग पैना रहे, जड़ के साथ जुड़ाव।१२ ।
*
लंबाई नौ इंच के, नलिकावाले फूल।
गंधहीन गुच्छे खिलें, पुष्पदण्ड हो मूल।१३।
*
लंब-गोल फल में रहे, बीज हमेशा एक।
श्याम-श्वेत बाह्यांsतर, खाएँ सहित विवेक।१४।
*
जड़ भंगुर हों छाल पर, छोटे कई उभार।
स्वाद तीक्ष्ण-कटु चिपचिपे, रोमयुक्त फलदार।१५।
*
है यह ऊष्ण त्रिदोष हर, करे वात को शांत।
कृमिनाशी मल निकाले, पाचन दीपन कांत।१६।
*
कफ-ज्वर बंधक शोथहर, है पौष्टिक-कटु रुक्ष।
श्लेष्मा वमन प्रमेह विष, कुष्ठ मिटाए दक्ष।१७।
*
दुग्ध-रक्त शोधन करे, योनीदोष भी दूर।
गुल्म वायु दीपन अरुचि, मिटे शांति भरपूर।१८।
*
हो जाए नकसीर यदि, शहद-चूर्ण दो ग्राम।
चाट लीजिए तुरत हो, सच मानें आराम।१९।
*
चित्रक-हल्दी-आँवला, अजमोदा-यवक्षार।
तीन ग्राम चूरन बना, दिन में लें दो बार।२० अ।
खाएँ मधु-घृत में मिला, दूर रहे स्वर भेद।
रामबाण है यह दवा, चूक न करिए खेद।२० आ।
*
चित्रक-सेंधा नमक लें, हरड़-पिप्पली संग।
सुबह-शाम दो ग्राम पी, पानी गर्म मलंग।२१ अ।
पचता भोज्य गरिष्ठ भी, मत सँकुचें सरकार।
अग्नि दीप्त हो पच सके, जो खाएँ आहार।२१ आ।
*
ताजी जड़ का चूर्ण लें, नागरमोथे साथ।
वायविडंग न भूलिए, सम मात्रा रख हाथ।२२ अ।
पाँच ग्राम खा जाइए, भोजन करने पूर्व।
पाचन शक्ति दुरुस्त हो, लगती भूख अपूर्व।२२ आ।
*
कल्क सिद्ध घी लीजिए, चित्रक क्वाथ समेत।
भोजन पहले कीजिए, संग्रहणी हो खेत।२३।
*
चित्रक चूर्ण मिटा सके, तिल्ली-सूजन सत्य।
बीस ग्राम घृतकुमारी, गूदे सँग लें नित्य।२४।
*
चित्रक जड़ का चूर्ण लें, तीन बार हर रोज।
प्लीहा रोग मिटे- बढ़े, बल चेहरे का ओज।२५।
*
तक्र सहित दो ग्राम लें, चित्रक त्वक का चूर्ण।
तब ही भोजन कीजिए, अर्श मिटे संपूर्ण।२६।
*
चित्रक-जड़ का चूर्ण लें, मृदा-पात्र में लेप।
दही जमाएँ छाछ पी, अर्श मिटा मत झेंप।२७।
*
चित्रक-जड़ चूरन शहद, चाटें यदि दस ग्राम।
सहज सुखद हो प्रसव अरु, माँ पाए आराम।२८।
*
चित्रक-जड़ कुटकी हरड़, इंद्रजौ और अतीस।
काली पहाड़ जड़ मिलाएँ, सम उन्नीस न बीस।२९ अ।
तीन ग्राम लें चूर्ण नित, सुबह-शाम बिन भूल।
वात रोग से मुक्त हों, मिटे दर्द का शूल।२९ आ।
*
चित्रक जड़ पीपल हरड़, अरु चीनी रेबंद।
काला नमक व आँवला, लें पीड़ा हो मंद।३० अ।
गर्म नीर के साथ लें, पाँच ग्राम हर रात।
आंत-वायु के संग ही, संधिवात की मात।३० आ।
*
चित्रक जड़ ब्राह्मी सहित, वच समान लें पीस।
तीन बार दो ग्राम लें, हिस्टीरिआ मरीज।३१।
*
चित्रक जड़ पीपल मरीच, सौंठ चूर्ण सम आप।
चार ग्राम लें तो मिटे, जल्दी ही ज्वर-ताप।३२।
*
ज्वर में अन्न न खा सके, रक्त संचरण मंद।
टुकड़े चित्रक मूल के, चबा मिले आनंद।३३।
*
छत्रक जड़ रस निर्गुंडी, तीन बार दो ग्राम।
लें प्रसूतिका ज्वर घटे, झट पाएँ आराम।३४ अ।
गर्भाशय देता बहा, दूषित आर्तव दूर।
मिटता मक्क्ल शूल भी, पीड़ा होती दूर।३४ आ।
*
चित्रक छाला दूध-जल, पीस लेपिए आप।
चरम रोग अरु कुष्ठ भी, मिटे घटे संताप।३५ अ।
पुल्टिस बाँधें उठेगा, छाला जब हो ठीक।
दाग दूर हो जाएँगे, कहती आयुष लीक।३५ आ।
*
दूध लाल चित्रक लगा, खुजली पर लें लीप।
मिले शीघ्र आराम अरु, रोग न रहे समीप।३६।
*
सिफलिस-कोढ़ मिटा सके, सूखी जड़ की छाल।
सुबह-शाम त्रै ग्राम लें, चित्रक होगा लाल।३७।
*
पीप बहे लें घाव पर, लेप चित्रकी छाल।
घाव ठीक हो शीघ्र ही, आयुर्वेद कमाल।३८।
*
मूषक ज्वर जाए उतर, तलुए मलिए तेल।
चित्रक छाला चूर्ण सँग, पका न पीड़ा झेल।३९।
*
मात्रा अधिक न लें 'सलिल', विष सम करे अनिष्ट।
मात्रा-विधि हो सही तो, चित्रक हरता कष्ट।४०।
***
गीत
सफर अधूरा लगता है
*
मीत-प्रीत बिन गीत का सफर अधूरा लगता है
*
चरण करें अभिषेक पंथ का
नयन करें नित संग ग्रंथ का
चल गिर उठ बढ़ बिना रुके तू
बिना रुके तू, बिना झुके तू
मोह-छोह बिन रीत का सफर अधूरा लगता है
मीत-प्रीत बिन गीत का सफर अधूरा लगता है
*
मन में मनबसिया बैठा है
चाहे-अनचाहे पैठा है
राधा कैसे कहो निकाले
जब राधा को वही सम्हाले
हार मिले बिन जीत का सफर अधूरा लगता है
मीत-प्रीत बिन गीत का सफर अधूरा लगता है
*
मनमानी कर मन की बातें
मुई सियासत करती घातें
बिना सिया-सत राम नाम ले
भक्ति भूल आसक्ति थाम ले
बिना राग संगीत का सफर अधूरा लगता है
मीत-प्रीत बिन गीत का सफर अधूरा लगता है
२१.५.२०२३
***
मुक्तिका
*
मुश्किल कोई डगर नहीं है
बेरस कोई बहर नहीं है
किस मन में मिलने-जुलने की
कहिए उठती लहर नहीं है
सलिल-नलिन हैं रात-चाँद सम
इस बिन उसकी गुजर नहीं है
हो ऊषा तुम गृहाकाश की
तुम बिन होती सहर नहीं है
हूँ सूरज श्रम करता दिन भर
बिन मजदूरी बसर नहीं है
***
औरत
*
औरत होती नहीं रिटायर
करती रोज पुरुष को टायर
माँ बन आँचल में दुबकाए
बहना बन पहरा दिलवाए
सखी अँगुलि पर नाच नचाए
भौजी ताने नित्य सुनाए
बीबी सहयोगिनी कह आए
पर गृह की स्वामिन बन जाए
बेटी चिंता-फिक्र बढ़ाए
पल-पुस कर झट फुर हो जाए
बहू छीन ले आकर कमरा
वृद्धाश्रम की राह दिखाए
कहो न अबला, नारी सबला
तबला नर को बना बजाए
नर बेचारा समझ रहा यह
तम में आशा दीप जलाए
शारद-रमा-उमा नित पूजे
घर न घाट का पर रह जाए
२१-५-२०२०
***
मुक्तिका: जिंदगी की इमारत
जिंदगी की इमारत में, नींव हो विश्वास की।
प्रयासों की दिवालें हों, छत्र हों नव आस की।
*
बीम संयम की सुदृढ़, मजबूत कॉलम नियम के।
करें प्रबलीकरण रिश्ते, खिड़कियाँ हों हास की।।
*
कर तराई प्रेम से नित, छपाई कर नीति से।
ध्यान धरना दरारें बिलकुल न हों संत्रास की।।
*
रेत कसरत, गिट्टियाँ शिक्षा, कला सीमेंट हो।
फर्श श्रम का, मोगरा सी गंध हो वातास की।।
*
उजाला शुभकामना का, द्वार हो सद्भाव का।
हौसला विद्युतिकरण हो, रौशनी सुमिठास की।।
*
फेंसिंग व्यायाम, लिंटल मित्रता के हों 'सलिल'।
बालकनियाँ पड़ोसी अपनत्व के अहसास की।।
*
वरांडे हो मित्र, स्नानागार सलिला सरोवर।
पाकशाला तृप्ति, पूजास्थली हो सन्यास की।।
***
मुक्तिका
.
शब्द पानी हो गए
हो कहानी खो गए
.
आपसे जिस पल मिले
रातरानी हो गए
.
अश्रु आ रूमाल में
प्रिय निशानी हो गए
.
लाल चूनर ओढ़कर
क्या भवानी हो गए?
.
नाम के नाते सभी
अब जबानी हो गए
.
गाँव खुद बेमौत मर
राजधानी हो गए
.
हुए जुमले, वायदे
पानी पानी हो गए
२१-५-२०१७
...
एक गीत
*
मात्र मेला मत कहो
जनगण हुआ साकार है।
*
'लोक' का है 'तंत्र' अद्भुत
पर्व, तिथि कब कौन सी है?
कब-कहाँ, किस तरह जाना-नहाना है?
बताता कोई नहीं पर
सूचना सब तक पहुँचती।
बुलाता कोई नहीं पर
कामना मन में पुलकती
चलें, डुबकी लगा लें
यह मुक्ति का त्यौहार है।
*
'प्रजा' का है 'पर्व' पावन
सियासत को लगे भावन
कहीं पण्डे, कहीं झंडे- दुकाने हैं
टिकाता कोई नहीं पर
आस्था कब है अटकती?
बुझाता कोई नहीं पर
भावना मन में सुलगती
करें अर्पित, पुण्य पा लें
भक्ति का व्यापार है।
*
'देश' का है 'चित्र' अनुपम
दृष्ट केवल एकता है।
भिन्नताएँ भुला, पग मिल साथ बढ़ते
भुनाता कोई नहीं पर
स्नेह के सिक्के खनकते।
स्नान क्षिप्रा-नर्मदा में
करे, मानें पाप धुलते
पान अमृत का करे
मन आस्था-आगार है।
***
मुक्तिका
*
मखमली-मखमली
संदली-संदली
.
भोर- ऊषा-किरण
मनचली-मनचली
.
दोपहर है जवाँ
खिल गयी नव कली
.
साँझ सुन्दर सजी
साँवली-साँवली
.
चाँद-तारें चले
चन्द्रिका की गली
.
रात रानी न हो
बावली-बावली
.
राह रोके खड़ा
दुष्ट बादल छली
***
(दस मात्रिक दैशिक छन्द
रुक्न- फाइलुन फाइलुन)
२१-५-२०१६
***
अमीर खुसरो के रोचक घरेलू नुस्खे
.
हरड़-बहेड़ा आँवला, घी सक्कर में खाय!
हाथी दाबे काँख में, साठ कोस ले जाय!
.
मारन चाहो काऊ को, बिना छुरी बिन घाव!
तो वासे कह दीजियो, दूध से पूरी खाय!!
.
प्रतिदिन तुलसी बीज को, पान संग जो खाय!
रक्त-धातु दोनों बढ़े, नामर्दी मिट जाय!!
.
माटी के नव पात्र में, त्रिफला रैन में डारी!
सुबह-सवेरे-धोए के, आँख रोग को हारी!!
.
चना-चून के-नोन दिन, चौंसठ दिन जो खाए!
दाद-खाज-अरू सेहुवा-जरी मूल सो जाए!!
.
सौ-दवा की एक दवा, रोग कोई न आवे!
खुसरो-वाको-सरीर सुहावे, नित ताजी हवा जो खावे!!
***
दोहा सलिला- कान
वाद-विवाद किये बिना, करते चुप सहयोग
कान धीर-गंभीर पर, नहीं चाहते शोर
*
कान कतरना चाहती, खुद को स्याना मान
अपने ही माँ-बाप के, 'सलिल' आज सन्तान
*
कान न भरिये किसी के, मत तोड़ें विश्वास
कान-दान मत कीजिए, पायेंगे संत्रास
*
कर्ण न हो तो श्रवण, रण, ज्यामिति शोभाहीन
कर्ण-शूल बेचैन कर, अमन चैन ले छीन
*
कान न हों तो सुन सकें, हम कैसे आवाज?
हो न सके संवाद तो, रुक जाएँ जग-काज
*
कान मकान दूकान से, बढ़ते क्रिया-कलाप
नहीं एक भी हो अगर, जीवन बने विलाप
*
कान-नाक से जुड़ा है, नाज़ुक नाड़ी-तन्त्र
छेद-कीलते विज्ञ जन, स्वस्थ्य रहे तन-यंत्र
*
आँखें चश्मा हीन हों, अगर नहीं हों कान
कान पकड़ चश्मा सजे, मगर न घटता मान
*
कान कटे जिसके लगे, श्रीयुत भी श्री हीन
नकटी शूर्पनखा लगे, नहीं श्रेष्ठ अति दीन
*
कान खींचना ही नहीं, भूलों का उपचार
मार्ग प्रदर्शन भी करें, तब हो बेडा पार
*
कनबहरी करिए नहीं, अवसर जाता चूक
व्यर्थ विवादों की दवा, लेकिन यही अचूक
*
आन गाँव का कनफटा, लगता जोगी सिद्ध
कौन बताये कब कहाँ, रहा मोह में बिद्ध
*
छवि देखें मुख चन्द्र की, कर्ण फूल के साथ
शतदल पाटल मध्य ज्यों, देख मुग्ध शशिनाथ
*
कान खड़े कर सुन रहा, जो न समय की बात
कान बंद कर जो रहा, दोनों की है मात
*
जो जन कच्चे कान के, उनसे रहें सतर्क
अफवाहों पर भरोसा, करें- न मानें तर्क
*
रूप नहीं गुण देखते, जो- वे हैं मतिमान
सुनें सतासत कान पर, दें न असत पर ध्यान
*
सूपे जैसे नख लिये, गई सुपनखा हार
सूप-काट ले गणपति, पुजें सकल संसार
*
आभा बढ़ती रूप की, गह आभामय हार
लेते-देते जो वही, जाते क्यों दिलहार
*
नूतन दाँव अचूक है, पहनाकर भुज-हार
गला दबा सकते 'सलिल', जता-जताकर प्यार
*
तेल कान में डालकर, बैठे सत्तासीन
कौन सुधारे देश को, सब स्वार्थों में लीन
*
स्वर्णहार ले आओ तो, विहँस कंठ में धार
पहना दूँ पल में तुम्हें, झट बाँहों का हार
*
रक्त कमल दल मध्य है, मुक्ता मणि रद-पंक्ति
आप आप पर रीझते, नयन गहें भव-मुक्ति
*
मिले अकेलापन कभी, खुद से खुद कर भेंट
'सलिल' व्यर्थ बिखराव को, होकर मौन समेट
***
षटपदी के रंग नाक के संग
*
नाक के बाल ने, नाक रगड़कर, नाक कटाने का काम किया है
नाकों चने चबवाए, घुसेड़ के नाक, न नाक का मान रखा है
नाक न ऊँची रखें अपनी, दम नाक में हो तो भी नाक दिखा लें
नाक पे मक्खी न बैठन दें, है सवाल ये नाक का, नाक बचा लें
नाक के नीचे अघट न घटे, जो घटे तो जुड़े कुछ राह निकालें
नाक नकेल भी डाल सखे, न कटे जंजाल तो नाक़ चढ़ा लें
२१-५-२०१५
***
वास्तु सूत्र
*
(१ ) भवन के मुख्य द्वार पर किसी भी ईमारत, मंदिर, वृक्ष, मीनार आदि की छाया नहीं पड़नी चाहिए।
(२ ) मुख्य द्वार के सामने रसोई बिलकुल नहीं होनी चाहिए।
(३ ) रसोई घर, पूजा कक्ष तथा शौचालय एक साथ अर्थात लगे हुए न हों। इनमे अंतर होना चाहिए।
(४ ) वाश बेसिन, सिंक, नल की टोंटी, दर्पण आदि उत्तरी या पूर्वी दीवार के सहारे ही लगवाएं।
(५) तिजोरी (केश बॉक्स या सेफ) दक्षिण या पश्चिमी दीवार में लगवाएं ताकि उसका दरवाजा उत्तर या पूर्व में खुले।
(६) भवन की छत एवं फर्श नैऋत्य में ऊँचा रखें एवं शान में नीचा रखें।
(७) पूजा स्थान इस तरह हो कि पूजा करते समय आपका मुँह पूर्व, उत्तर या ईशान (उत्तर-पूर्व) दिशा में हो।
(८) जल स्रोत (नल, कुआँ, ट्यूब वेल आदि), जल-टंकी ईशान में हो।
(९) अग्नि तत्व (रसोई गृह) भूखंड के आग्नेय में हो। चूल्हा, ओवन, बिजली का मीटर आदि कक्ष के दक्षिणआग्नेय में हों।
(१०) नैऋत्य दिशा में भारी निर्माण जीना, ममटी आदि तथा भारी सामान हो। घर की चहार दीवारी नैऋत्य में अधिक ऊँची व मोटी तथा ईशान में दीवार कम नीची व कम मोटी अर्थात पतली हो।
(११) वायव्य दिशा में अतिथि कक्ष, अविवाहित कन्याओं का कक्ष, कारखाने का उत्पादन कक्ष रखें। यहाँ सेप्टिक टैंक बना सकते हैं। टैक्सी सर्विस वाले यहाँ वहां रखें तो सफलता अधिक मिलेगी।
२१-५-२०१३
***
एक दोहा
प्राची से होती प्रगट, खोल कक्ष का द्वार.
अलस्सुबह ऊषा पुलक, गुपचुप झाँक-निहार..
२१-५-२०१२
***
नव गीत:
*
मौन देखकर
यह मत समझो
मुँह में नहीं जुबान...
*
शांति-शिष्टता,
धैर्य-भद्रता,
जीवट की पहचान.
शांत सतह के
नीचे हलचल,
मचल रहे अरमान.
श्वेत-शयन लख
यह मत समझो
रंगों से अनजान.
मौन देखकर
यह मत समझो
मुँह में नहीं जुबान...
*
ऊपर-नीचे
सब जानें पर
ऊँच-नीच से दूर.
दिक्-दिगंत पर
नजर जमाये
आशान्वित भरपूर.
मुस्कानों से
'सलिल' न होगा
पीड़ा का अनुमान.
मौन देखकर
यह मत समझो
मुँह में नहीं जुबान...
*
उत्तर का
प्रत्युत्तर देना
बहुत सहज आसान.
कह न अनर्गल
मौन साधना
क्या जानें नादान?
जो सचमुच
है बड़ा, 'सलिल' वह
नहीं दिखता शान.
मौन देखकर
यह मत समझो
मुँह में नहीं जुबान...
२१-५-२०१०

बुधवार, 20 मई 2026

मई २०, रूपमाला, अपूर्णान्वयी, छंद, मधुमक्खी, दोहा, आँख, शे 'र, हास्य, नवगीत, कुण्डलिया, ग़ज़ल, सोरठा

सलिल सृजन मई २०
विश्व मधुमक्खी दिवस
*
सोरठा सलिला
.
कार हुई बेकार, चला साइकिल यार अब।
बहा पसीना धार, देशभक्त बन सके तब।।
.
खर्च घटाएँ आप, नेता भत्ते  छोड़कर।
क्षेत्र पैर से नाप, भू से खुद को जोड़कर।।
.
कर सड़कों पर सैर, जज जज कर पाए समस्या।
मनु कम ज्यादा कार, दुर्घटना का हेतु क्या?? 
.
घर का जेवर बेच, हो जा तू कंगाल अब।
कहें क्रिकेट प्रभु क्यों, आप जोड़कर माल सब।।
.
राजमार्ग पर खूब, बैलगाड़ियाँ अब चलें।
गधे गधों पर बैठ, जन प्रतिनिधि बनकर छलें।।
.
मिले कलेक्टर रोज, चौराहों पर सिपाही। 
माँग सके नहिं घूस, वाहा वाही खूब हो।। 
जीना लें अब सीख, जीवन है तो खा हवा।। 
तू जनता सा दीख, नेताजी से मत कहें ।। 
दोस्त ट्रम्प का मौन, देख रहा है छल-कपट। 
दुख समझेगा कौन, सगा सियासत में नहीं।। 
दर दर भटके व्यर्थ, मिले खूब सम्मान पर। 
कहीं न पाया अर्थ, सब मतलब के यार हैं।। 
पत्रकार नीलाम, हर चैनल के हो रहे। 
जो भी देगा दाम, गीत उसी के गा रहे।। 
सत्ता बिना लगाम, राजमार्ग पर दौड़ती। 
नियम बनाती आप, आप स्वार्थ हित तोड़ती।। 
००० 
छंद शाला
दोहा+रोला=कुंडलिया
नर पर नारी के पड़ें, नयन सर्वदा बीस।
पड़े कभी जब आँकड़ा,
नयनों का छत्तीस।। - अशोक व्यग्र
नयनों का छत्तीस, सुहाए कभी न नाता।
रहे तिरेसठ सदा, 'सलिल' सबके मन भाता।।
नयन नयन में डूब, संग रहें पर नहिं गड़ें।
नयन सर्वदा बीस, नर पर नारी के पड़ें।।
नर पर नारी के पड़ें, नयन सर्वदा बीस।
पड़े कभी जब आँकड़ा,
नयनों का छत्तीस।। - अशोक व्यग्र
नयनों का छत्तीस, नहीं अनुबंध कभी हो।
नयन फेर लें नयन, नहीं प्रतिकूल कभी हो।।
नयन चलाए व्यग्र, नयन पर कभी न आरी।
नयन रहें संजीव, न भारी नर पर नारी।।
२०.५.२०२६
०००
आभूषण धारण करने से शरीर पर प्रभाव

* अगर आपका चंद्रमा कमजोर है तो आपको अंगूठी और कड़े ज़रूर पहननी चाहिए , अपने हाथ के अंगूठे मैं अगर आप चाँदी का छल्ला डालते है और साथ में अपनी कलाई का हिस्सा टाइट करके रखते है कड़े पहन कर तो उससे आपके मानसिक विकार दूर होते है , चांदी अपने आप में ही एक ANTIBIOTIC है | चांदी का प्रयोग करने से हमारे शरीर में ठंडक और शीतलता आती है , हमारे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ्ने लगती है , एकाग्रता और आत्मविश्वास में भी वृद्धि आती है |

* पुराने जमाने में बाजूबंद का चलन हुआ करता था , पर आजकल ज्यादा नहीं रह गया है | बाजूबंद हमारी कोहनी और कंधे के बिल्कुल बीचों बीच पहना जाता है , अगर हम इस्स हिस्से को बांधकर रखते है , यानि की हम बाजूबंद पहन कर रखते है तो यहा कुछ ऐसे Acupressure points होते है जो हमारी भूख और पेट से संबंधित बीमारियों को नियंत्रण में रखता है , अगर बाजूबंद पहने , तो जिनको गैस और धूप के कारण Migraine या सर दर्द जैसी शिकायतों से निजात पा सकते है , तनाव से होने वाले सर दर्द में भी यह बाजूबंद पहना चाहिए , और अगर आप सोना , चांदी और तांबे से बना हुआ त्रिधातु का बाजूबंद पहनते है तो यह आपका लिवर और भूख को ठीक रखता है |

नाभि हमारे पूरे शरीर का ऊर्जा का केंद्र है , Kidney , urine , liver , carbohydrate management , uterus यह सब यही से नियंत्रित होता है , नाभि हमारी मानसिक शक्ति को भी नियंत्रित रखती है , अगर इन में से आपको कही पर भी दिक्कत आ रही है तो कमरबंद पहना चाहिए नाभि से तीन उंगल ऊपर या नीचे |

हमारे कान हमारे दिमाग तक जा रहे खून का दौरा नियंत्रित रखता है , जहा कान छेदा जाता है और जहा पुरुष और महिलायें बालियाँ पहनती है , वह कुछ ऐसे प्रैशर पॉइंट्स होते है जो दिमाग तक जा रहे खून के दौरे में मदद करते है , अगर कानो में चांदी और तांबे से मिली हुई बालियाँ पहनते है तो काफी सारी बीमारियों से बचा जा सकता है | कन छेदन 3 वर्ष के बाद कभी भी करवाया जा सकता है |

* नाक हमारे शरीर का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है क्यूंकी यही से हम वायु अपने शरीर के अंदर लेकर जीवन शक्ति उत्पन्न करते है , हमारे शरीर की तीन नाड़ियों का स्वर यही आकर मिलता है , सूर्य , चन्द्र और सुषुम्ना , नथ पहनने से हमारी ज्ञान की शक्ति बड़ती है , और हमारे दिमाग में शक्ति का संचालन सही ढंग से होने लगता है |

* जहा महिलायें पायल पहनती है वह हिस्सा हमारे शरीर की बलता और शक्ति को दर्शाता है , पायल पहनने से हमारे पूरे शरीर में रक्त संचार सही ढंग से होने लगता है , शरीर में शक्ति बढ़ने लगती है , पेट और लिवर से जुड़ी समस्या में भी कमी आती है , अगर आप पायल नहीं पहन सकते तो आप पायल की जगह एक सूती काला धागा भी बांध सकते है |
०००
कुण्डलिया 
गुरु से कुछ गुर बिन लिए, सलिल न हो संजीव।
सासों के फँदे फँसे, जामाता निर्जीव।।
जामाता निर्जीव, डुकरिया की कर सेवा।
बीबी बेटी हुई, खिलाए गुल हे देवा।।
कर भविष्य की फिक्र, ब्याह वह करे न फिर से।
सास जमाई साथ, न जाए गुर ले गुरु से।।
२०.५.२०२५
***
दोहा सलिला
*
नारी नदिया पुरुष की, नाव लगाती पार।
मचले तो देती डुबा, रूठ बीच मझधार।।
*
कांता जैसी चाँदनी, लिये हाथ में हाथ।
कांत चाँद सा सोहता, सदा उठाए माथ।।
*
कैसे हैं? क्या होएँगे?, सोच न आती काम।
जैसा चाहे विधि रखे, करे न बस बेकाम।
*
मन बच्चा-सच्चा रहे, कच्चा तन बदनाम।
बिन टूटे बादाम हो, टूटे तो बेदाम।।
*
मार न पड़ती उम्र की, बढ़ता अनुभव-तेज।
तब करते थे जंग, अब जमा रहे हैं रंग।।
*
समय छोड़ पाया नहीं, अपना तनिक प्रभाव।
तब सा अब भी चेहरा, आदत, सृजन, स्वभाव।।
*
छीन रहे थे और के, मुँह से रोटी-कौर।
अपने मुँह से छिन गया, आया ऐसा दौर।।
*
मन बच्चा-सच्चा रहे, कच्चा तन बदनाम।
बिन टूटे बादाम हो, टूटे तो बेदाम।।
*
कैसे हैं? क्या होएँगे?, सोच न आती काम।
जैसा चाहे विधि रखे, करे न बस बेकाम।
*
कांता जैसी चाँदनी, लिये हाथ में हाथ।
कांत चाँद सा सोहता, सदा उठाए माथ।।
*
मिल कर भी मिलती नहीं, मंजिल खेले खेल।
यात्रा होती रहे तो, हर मुश्किल लें झेल।।
*
मार न पड़ती उम्र की, बढ़ता अनुभव संग।
तब करते थे जंग, अब जमा रहे हैं रंग।।
२०-५-२०१८
***
पुस्तक चर्चा-
संक्रांतिकाल की साक्षी कवितायें
आचार्य भगवत दुबे
*
[पुस्तक विवरण- काल है संक्रांति का, गीत-नवगीत संग्रह, आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', प्रथम संस्करण २०१६, आकार २२ से.मी. x १३.५ से.मी., आवरण बहुरंगी, पेपरबैक जैकेट सहित, पृष्ठ १२८, मूल्य जन संस्करण २००/-, पुस्तकालय संस्करण ३००/-, समन्वय प्रकाशन, २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१]
कविता को परखने की कोई सर्वमान्य कसौटी तो है नहीं जिस पर कविता को परखा जा सके। कविता के सही मूल्याङ्कन की सबसे बड़ी बाधा यह है कि लोग अपने पूर्वाग्रहों और तैयार पैमानों को लेकर किसी कृति में प्रवेश करते हैं और अपने पूर्वाग्रही झुकाव के अनुरूप अपना निर्णय दे देते हैं। अतः, ऐसे भ्रामक नतीजे हमें कृतिकार की भावना से सामंजस्य स्थापित नहीं करने देते। कविता को कविता की तरह ही पढ़ना अभी अधिकांश पाठकों को नहीं आता है। इसलिए श्री दिनकर सोनवलकर ने कहा था कि 'कविता निश्चय ही किसी कवि के सम्पूर्ण व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति है। किसी व्यक्ति का चेहरा किसी दूसरे व्यक्ति से नहीं मिलता, इसलिए प्रत्येक कवी की कविता से हमें कवी की आत्मा को तलाशने का यथासम्भव यत्न करना चाहिए, तभी हम कृति के साथ न्याय कर सकेंगे।' शायद इसीलिए हिंदी के उद्भट विद्वान डॉ. रामप्रसाद मिश्र जब अपनी पुस्तक किसी को समीक्षार्थ भेंट करते थे तो वे 'समीक्षार्थ' न लिखकर 'न्यायार्थ' लिखा करते थे।
रचनाकार का मस्तिष्क और ह्रदय, अपने आसपास फैले सृष्टि-विस्तार और उसके क्रिया-व्यापारों को अपने सोच एवं दृष्टिकोण से ग्रहण करता है। बाह्य वातावरण का मन पर सुखात्मक अथवा पीड़ात्मक प्रभाव पड़ता है। उससे कभी संवेद नात्मक शिराएँ पुलकित हो उठती हैं अथवा तड़प उठती हैं। स्थूल सृष्टि और मानवीय भाव-जगत तथा उसकी अनुभूति एक नये चेतन संसार की सृष्टि कर उसके साथ संलाप का सेतु निर्मित कर, कल्पना लोक में विचरण करते हुए कभी लयबद्ध निनाद करता है तो कभी शुष्क, नीरस खुरदुरेपन की प्रतीति से तिलमिला उठता है।
गीत-नवगीत संग्रह 'काल है संक्रांति का' के रचनाकार आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' श्रेष्ठ साहित्यिक पत्रिका 'दिव्य नर्मदा' के यशस्वी संपादक रहे हैं जिसमें वे समय के साथ चलते हुए १९९४ से अंतरजाल पर अपने चिट्ठे (ब्लॉग) के रूप में निरन्तर प्रकाशित करते हुए अब तक ४००० से अधिक रचनाएँ प्रकाशित कर चुके हैं। अन्य अंतर्जालीय मंचों (वेब साइटों) पर भी उनकी लगभग इतनी ही रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। वे देश के विविध प्रांतों में भव्य कार्यक्रम आयोजित कर 'अखिल भारतीय दिव्य नर्मदा अलंकरण' के माध्यम से हिंदी के श्रेष्ठ रचनाकारों के उत्तम कृतित्व को वर्षों तक विविध अलंकरणों से अलंकृत करने, सत्साहित्य प्रकाशित करने तथा पर्यावरण सुधर, आपदा निवारण व् शिक्षा प्रसार के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने का श्रेय प्राप्त अभियान संस्था के संस्थापक-अध्यक्ष हैं। इंजीनियर्स फॉर्म (भारत) के महामंत्री के अभियंता वर्ग को राष्ट्रीय-सामाजिक दायित्वों के प्रति सचेत कर उनकी पीड़ा को समाज के सम्मुख उद्घाटित कर सलिल जी ने सथक संवाद-सेतु बनाया है। वे विश्व हिंदी परिषद जबलपुर के संयोजक भी हैं। अभिव्यक्ति विश्वम दुबई द्वारा आपके प्रथम नवगीत संग्रह 'सड़क पर...' की पाण्डुलिपि को 'नवांकुर अलंकरण २०१६' (१२०००/- नगद) से अलङ्कृत किया गया है। अब तक आपकी चार कृतियाँ कलम के देव (भक्तिगीत), लोकतंत्र का मक़बरा तथा मीत मेरे (काव्य संग्रह) तथा भूकम्प ले साथ जीना सीखें (लोकोपयोगी) प्रकाशित हो चुकी हैं।
सलिल जी छन्द शास्त्र के ज्ञाता हैं। दोहा छन्द, अलंकार, लघुकथा, नवगीत तथा अन्य साहित्यिक विषयों के साथ अभियांत्रिकी-तकनीकी विषयों पर आपने अनेक शोधपूर्ण आलेख लिखे हैं। आपको अनेक सहयोगी संकलनों, स्मारिकाओं तथा पत्रिकाओं के संपादन हेतु साहित्य मंडल श्रीनाथद्वारा ने 'संपादक रत्न' अलंकरण से सम्मानित किया है। हिंदी साहित्य सम्मलेन प्रयाग ने संस्कृत स्त्रोतों के सारगर्भित हिंदी काव्यानुवाद पर 'वाग्विदाम्बर सम्मान' से सलिल जी को सम्मानित किया है। कहने का तात्पर्य यह है कि सलिल जी साहित्य के सुचर्चित हस्ताक्षर हैं। 'काल है संक्रांति का' आपकी पाँचवी प्रकाशित कृति है जिसमें आपने दोहा, सोरठा, मुक्तक, चौकड़िया, हरिगीतिका, आल्हा अदि छन्दों का आश्रय लेकर गीति रचनाओं का सृजन किया है।
भगवन चित्रगुप्त, वाग्देवी माँ सरस्वती तथा पुरखों के स्तवन एवं अपनी बहनों (रक्त संबंधी व् मुँहबोली) के रपति गीतात्मक समर्पण से प्रारम्भ इस कृति में संक्रांतिकाल जनित अराजकताओं से सजग करते हुए चेतावनी व् सावधानियों के सन्देश अन्तर्निहित है।
'सूरज को ढाँके बादल
सीमा पर सैनिक घायल
नाग-सांप फिर साथ हुए
गुँजा रहे वंशी मादल
लूट-छिप माल दो
जगो, उठो।'
उठो सूरज, जागो सूर्य आता है, उगना नित, आओ भी सूरज, उग रहे या ढल रहे?, छुएँ सूरज, हे साल नये आदि शीर्षक नवगीतों में जागरण का सन्देश मुखर है। 'सूरज बबुआ' नामक बाल-नवगीत में प्रकृति उपादानों से तादात्म्य स्थापित करते हुए गीतकार सलिल जी ने पारिवारिक रिश्तों के अच्छे रूपक बाँधे हैं-
'सूरज बबुआ!
चल स्कूल।
धरती माँ की मीठी लोरी
सुनकर मस्ती खूब करी।
बहिम उषा को गिर दिया
तो पिता गगन से डाँट पड़ीं।
धूप बुआ ने लपक उठाया
पछुआ लायी
बस्ते फूल।'
गत वर्ष के अनुभवों के आधार पर 'में हिचक' नामक नवगीत में देश की सियासी गतिविधियों को देखते हुए कवी ने आशा-प्रत्याशा, शंका-कुशंका को भी रेखांकित किया है।
'नये साल
मत हिचक
बता दे क्या होगा?
सियासती गुटबाजी
क्या रंग लाएगी?
'देश एक' की नीति
कभी फल पाएगी?
धारा तीन सौ सत्तर
बनी रहेगी क्या?
गयी हटाई
तो क्या
घटनाक्रम होगा?'
पाठक-मन को रिझाते ये गीत-नवगीत देश में व्याप्त गंभीर समस्याओं, बेईमानी, दोगलापन, गरीबी, भुखमरी, शोषण, भ्रष्टाचार, उग्रवाद एवं आतंक जैसी विकराल विद्रूपताओं को बहुत शिद्दत के साथ उजागर करते हुए गम्भीरता की ओर अग्रसर होते हैं।
बुंदेली लोकशैली का पुट देते हुए कवि ने देश में व्याप्त सामाजिक, आर्थिक, विषमताओं एवं अन्याय को व्यंग्यात्मक शैली में उजागर किया है।
मिलती काय ने ऊँचीबारी
कुर्सी हमखों गुईंया
पैला लेऊँ कमिसन भारी
बेंच खदानें सारी
पाँछू घपले-घोटालों सों
रकम बिदेस भिजा री
समीक्ष्य कृति में 'अच्छे दिन आने वाले' नारे एवं स्वच्छता अभियान को सटीक काव्यात्मक अभिव्यक्ति दी गयी है। 'दरक न पायेन दीवारें नामक नवगीत में सत्ता एवं विपक्ष के साथ-साथ आम नागरिकों को भी अपनी ज़िम्मेदारियों के प्रति सचेष्ट करते हुए कवि ने मनुष्यता को बचाये रखने की आशावादी अपील की है।
कवी आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ने वर्तमान के युगबोधी यथार्थ को ही उजागर नहीं किया है अपितु अपनी सांस्कृतिक अस्मिता के प्रति सुदृढ़ आस्था का परिचय भी दिया है। अतः, यह विश्वास किया जा सकता है कि कविवर सलिल जी की यह कृति 'काल है संक्रांति का' सारस्वत सराहना प्राप्त करेगी।
आचार्य भगवत दुबे
महामंत्री कादंबरी
***
दोहों के रंग आँख के संग
*
आँख लड़ी झुक उठ मिली, मुंदी कहानी पूर्ण
लाड़ मुहब्बत ख्वाब सँग, श्वास-आस का चूर्ण
*
आँख कहानी लघुकथा, उपन्यास रस छंद
गीत गजल कविता भजन, सुख-दुःख परमानंद
*
एक आँख से देखते, धूप-छाँव जो मीत
वही उतार-चढ़ाव पर, चलकर पाते जीत
*
धूल झोंकते आँख में, आँख बिछाकर लोग
चुरा-मिला आँखें दिखा, झूठ मनाते सोग
*
कभी किसी की आँख का, बनें न काँटा आप
कभी आप की आँख में, सके न काँटा व्याप
*
***
नवगीत:
*
जिंदगी के गणित में
कुछ इस तरह
उलझे हैं हम.
बंदगी के गणित
कर लें हल
रही बाकी न दम.
*
इंद्र है युग लीन सुख में
तपस्याओं से डरे.
अहल्याओं को तलाशे
लाख मारो न मरे.
जन दधीची अस्थियाँ दे
बनाता विजयी रहा-
हुई हर आशा दुराशा
कभी कुछ संयम वरे.
कामनाओं से ग्रसित
होकर भ्रमित
बिखरे हैं हम.
वासनाओं से जड़ित
होते दमित
अँखियाँ न नम.
जिंदगी के गणित में
कुछ इस तरह
उलझे हैं हम.
बंदगी के गणित
कर लें हल
चलो मिलकर सनम.
*
पडोसी के द्वार पर जा
रोज छिप कचरा धरें.
चाह आकर विधाता-
नित व्याधियाँ-मुश्किल हरें .
सुधारों का शंख जिसने
बजाया विनयी रहा-
सिया को वन भेजता जो
देह तज कैसे तरे?
भूल को स्वीकार
संशोधन किये
निखरे हैं हम.
शूल से कर प्यार
वरते कूल
लहरें हैं न कम.
जिंदगी के गणित में
कुछ इस तरह
उलझे हैं हम.
बंदगी के गणित
कर लें हल
बढ़ें संग रख कदम.
*
***
द्विपदी सलिला:
*
जो दिखता होता नहीं, केवल उतना सत्य
छोटे तन में बड़ा मन, करता अद्भुत कृत्य
*
ओझा कर दे टोटका, फूंक कभी तो मन्त्र
मन-अँगना में भी लगे, फूलों का संयंत्र
*
नित मन्दिर में माँगते, किन्तु न होते तृप्त
दो चहरे ढोते फिरे, नर-पशु सदा अतृप्त
*
जब जो जी चाहे करे, राजा वह ही न्याय
लोक मान्यता कराती, राजा से अन्याय
*
पर उपकारी हैं बहुत, हम भारत के लोग
मुफ्त मशवरे दें 'सलिल', यही हमारा रोग
*
वक़्त सुनता ही नहीं सिर्फ सुनाता रहता
नजर घरवाली की ही इसमें अदा आती है
*
दिखाया आईना मैंने कि वो भी देख सके
आँख में उसकी बसा चेहरा मेरा ही है
*
आसमां को थाम लें हाथों में अपने हम अगर
पैर ज़माने के लिये जमीं रब हमें दे दे
*
तुम्हें जानना है महज इसलिए ही
दुनिया के सारे शिखर नापते हैं
*
दिले-दिलवर को खटखटाते रहे नज़रों से
आँख का डाकिया पैगाम कभी तो देगा
*
बेरुखी लाख दिखाये वो सरे-आम मगर
नज़र जो मिल के झुके प्यार भी हो सकती है
*
अंत नहीं है प्यास का, नहीं मोह का छोर
मुट्ठी में ममता मिली, दिनकर लिया अँजोर
*
लेन-देन जिंदगी में इस कदर बढ़ा
बाकी नहीं है फर्क आदमी-दूकान में
*
साथ चलते हाथ छूटे कब-कहाँ- कैसे कहें
बेहतर है फिर मिलें मन मीत! हम कुछ मत कहें
*
सारे सौदे वो नगद करता है जन्म से ही रहे उधार हैं हम
सारी दुनिया में जाके कहते हैं भारत में हुए सुधार हैं हम
२०-५-२०१५
*

छंद सलिला:
रूपमाला छंद
*
छंद-लक्षण: जाति अवतारी, प्रति चरण मात्रा २४ मात्रा, यति चौदह-दस, पदांत गुरु-लघु (जगण)
लक्षण छंद:
रूपमाला रत्न चौदह, दस दिशा सम ख्यात
कला गुरु-लघु रख चरण के, अंत उग प्रभात
नाग पिंगल को नमनकर, छंद रचिए आप्त
नव रसों का पान करिए, ख़ुशी हो मन-व्याप्त
उदाहरण:
१. देश ही सर्वोच्च है- दें / देश-हित में प्राण
जो- उन्हीं के योग से है / देश यह संप्राण
करें श्रद्धा-सुमन अर्पित / यादकर बलिदान
पीढ़ियों तक वीरता का / 'सलिल'होगा गान
२. वीर राणा अश्व पर थे, हाथ में तलवार
मुगल सैनिक घेर करते, अथक घातक वार
दिया राणा ने कई को, मौत-घाट उतार
पा न पाये हाय! फिर भी, दुश्मनों से पार
ऐंड़ चेटक को लगायी, अश्व में थी आग
प्राण-प्राण से उड़ हवा में, चला शर सम भाग
पैर में था घाव फिर भी, गिरा जाकर दूर
प्राण त्यागे, प्राण-रक्षा की- रुदन भरपूर
किया राणा ने, कहा: 'हे अश्व! तुम हो धन्य
अमर होगा नाम तुम हो तात! सत्य अनन्य।
२०-५-२०१४
***
अपूर्णान्वयी छंद:
(Enjambment poetry in Hindi)
झूठ न होता झूठ
*
'झूठ कभी मत बोलना', शिक्षक ने दी सीख
पूछा बालक ने: 'कहाँ इससे बढ़कर झूठ।
झूठ न बोलें तो कहें, कैसे होगा काम?
काम बिना हो जाएगा, अपना काम तमाम।
झूठ बिना क्या कहेगा? नेता, पंडित, चोर।
रहे मौन तो नहीं क्या, होगा संकट घोर?
झूठ बिना थाने सभी, हो जायेंगे बंद।
सभी वकील-अदालतें, गायेंगे क्या छंद?
झूठ बिना क्या कहेंगे, दफ्तर जाकर लेट?
छापा मारे आयकर, जिस पर वह अपसेट।
झूठ बिना खुद सत्य भी, मर जाए बिन मौत।
क्या कह दें? पूछे पुलिस कौन हुआ है फौत?
'झूठ न होता झूठ गर सच दें उसको नाम।'
शिक्षक बोला, छात्र ने सविनय किया प्रणाम।।
***
हास्य रचना
बतलायेगा कौन?
*
मैं जाता था ट्रेन में, लड़ा मुसाफिर एक.
पिटकर मैंने तुरत दी, धमकी रखा विवेक।।
मुझको मारा भाई को, नहीं लगाना हाथ।
पल में रख दे फोड़कर, हाथ पैर सर माथ ।।
भाई पिटा तो दोस्त का, उच्चारा था नाम।
दोस्त और फिर पुत्र को, मारा उसने थाम।।
रहा न कोई तो किया, उसने एक सवाल।
आप पिटे तो मौन रह, टाला क्यों न बवाल?
क्यों पिटवाया सभी को, क्या पाया श्रीमान?
मैं बोला यह राज है, किन्तु लीजिये जान।।
अब घर जाकर सभी को रखना होगा मौन।
पीटा मुझको किसी ने, बतलायेगा कौन??
२०-५-२०१३
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