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मंगलवार, 3 नवंबर 2026

नवंबर २, हाइकु, दीवाली, लक्ष्मी, दीप

सलिल सृजन नवंबर २
०
हाइकु सलिला
छल
.
कभी न कर
खुद से खुद छल
न होगी कल।
.
सीता को छल
मारा गया रावण
राम के हाथों।
.
छंद ना बल
राजनीति का साध्य
केवल जीत।
.
भ्रमर करे
नित्य दिन दहाड़े
कली से छल।
.
छंद प्रपंच
पल-पुस बढ़ता
राजनीति में।
.
रजनी तज
उषा के संग रास
सूर्य का छल।
.
करना कल
आज तो दूर रख
खुद से छल।
२.११.२०२६
०००
[08:44, 02/11/2026] sanjiv verma: गीत
न रौंदे दीप, बाती को
०
न रौंदे दीप, बाती को
न रौंदें दीप-बाती को
०
ये माटी है, वो माटी है,
मैं माटी हूँ, तू माटी है।
मिले माटी से हँस माटी,
है परिपाटी यही खाँटी।
निभाना है सनातन को,
मनाना है पुरातन को।
न अधुनातन कभी भूले-
सजाना है मनांगन को।
न बिसरे स्नेह की पीड़ा
पढ़ो गुमनाम पाती को।
न रौंदे दीप, बाती को
न रौंदें दीप-बाती को
०
ये भाती है, वो भाती है,
पराई क्यों लुभाती है?
कभी घर में जलाती है,
कभी टुकड़े कराती है।
न हो संबंध ही प्रतिबंध,
मन का मन से हो अनुबंध।
न टूटें प्यार के झूले-
दिया-बाती फलक छू ले।
जलें तो साथ हिल-मिलकर
चलें ले संग सँगाती को।
न रौंदे दीप, बाती को
न रौंदें दीप-बाती को
०
ये राधा, वो सकीना है,
मैं मुँदरी, वो नगीना है।
पराया कौन सब अपने,
प्रीति का इत्र भीना है।
रहे गंगो-जमुन मिलती,
घराँगन में खुशी खिलती।
मने सावन, कभी फागुन-
रहें खुशियाँ अगिन पलती।
नयापन नित बुलाती को
समझ नव्या विजाती को।
न रौंदे दीप, बाती को
न रौंदें दीप-बाती को
०००
गीत
.
जब दीप जले तब अइयो
लछमी!
और कहूँ मत जइयो
.
तैं सतजुग से भटक रई रे!
जहँ मन चाहा अटक रई रे!
कुंडी चढ़ा रोकना चाहूँ-
मन भरमा के सटक रई रे!
गटक रए तव सोभा नैना
और न अब तड़पइयो।
जब दीप जले तब अइयो
लछमी!
और कहूँ मत जइयो
.
भई छीरसागर में बंदी
पनघट-जमघट भूली।
नारायन के पाँव पलोटत
नर-दर काय नें झूली।
इतै किसान, मजूर उतै
हैरां हैं, दगा नें दइयो।
जब दीप जले तब अइयो
लछमी!
और कहूँ मत जइयो
.
डालर बेंच-खरीद रुपैया
ट्रंप करे दीवाला।
भारत मैया के चरनन में
झुक जाए हर आला।
सीस झुकाएँ पुरा-परोसी
ऐसो दाँव बतइयो
जब दीप जले तब अइयो
लछमी!
और कहूँ मत जइयो
.
रहे पूर्णिमा सब रातन में
हो प्रवीन सब जनता।
रहे सिया-सत सदृश सियासत
मोदी-मन में ममता।
समता शाह-फकीर कर सके
माया मत दिखलइयो
जब दीप जले तब अइयो
लछमी!
और कहूँ मत जइयो
.
ट्रंप पुतिन पिंग कर जोड़ें
जग गुरु हो जाए भारत।
अरिदल धूल धूसरित हो माँ! 
बेड़ा कर दो गारत।
जीव सबई संजीव हो सकें
जई साधना करइयो
जब दीप जले तब अइयो
लछमी!
और कहूँ मत जइयो
२.११.२०२६
भोपाल

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