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गुरुवार, 13 अगस्त 2026

रे मन! नर्मदा हो जा, छाया सक्सेना, पुरोवाक्, मन की बात

पुरोवाक्

"रे मन! नर्मदा हो जा : जग का ताप हर ले जा।"

- आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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"नर्मम् ददाति इति नर्मदा" जो परम आनन्द दे, वह नर्मदा है।
नर्मदा में कंकर-कंकर को शंकर करने की सामर्थ्य है।
नर्मदा किनारे का कंकर भी शिव-शिवा के रूप में पूजित होता है।
नर्मदा तट पर प्रवास हो या निवास शिव से साक्षात करना और शिवत्व को आत्मसात करना सहज हो जाता है किंतु तब ही जब मन मंदिर में अनहद नाद को कलकल निनाद के माध्यम से पाने की आकुलता हो।
नर्मदा से पाना तभी संभव होता है जब हाथ खाली हों, मन में अहंकार न हो, गुरु-लघु, अनुकूल-प्रतिकूल अनुभवों की सम भाव से ग्राह्यता हो।
नर्मदा तट पर देना तभी संभव होता है जब पाना हो सके।
नर्मदा निरभिमानता की प्रतिमूर्ति है। मन से विमलता, नेत्रों से शीतलता, सूर्य से तेजस्विता, पवन से चंचलता, गगन से अनंतता और धरा से धैर्य लेकर कलकल करती नर्मदा 'सर्व' के कल्याण हेतु 'स्व' को समर्पित करने में तनिक भी संकोच नहीं करतीं।
नर्मदा जीवन देती ही देती हैं, लेती कुछ नहीं।
नर्मदा भक्त की भावना के अनुरूप रूप धरण करने में संकोच नहीं करतीं। भक्त नर्मदा का गुणगान करते नहीं थकते।
नर्मदा नामावली १५५ विविध छवि-छटाओं की प्रतीति कराती है -

पुण्यतोया सदानीरा नर्मदा, शैलजा गिरिजा अनिंद्या वर्मदा।
शैलपुत्री सोमतनया निर्मला, अमरकंटी शाम्भवी शुभ-शर्मदा।।
आदिकन्या चिरकुमारी पावनी, जलधिगामिनी चित्रकूटा पद्मजा।
विमलहृदया क्षमादात्री कौतुकी, कमलनयना जगज्जननी हर्म्यदा।।
शशिसुता रुद्रा विनोदिनी नीरजा, मक्रवाहिनी ह्लादिनी सौन्दर्यदा।
शारदा वरदा सुफलदा अन्नदा, नेत्रवर्धिनी पापहारी धर्मदा।।
सिन्धु सीता गौतमी सोमात्मजा, रूपदा सौदामिनी सुख-सौख्यदा।
शिखरिणी नेत्रा तरंगिणी मेखला, नीलवासिनी दिव्यरूपा कर्मदा।।
बालुकावाहिनी दशार्णा रंजना, विपाशा मन्दाकिनी चित्रोत्पला।
रुद्रदेहा अनुसुया पय-अम्बुजा, सप्तगंगा समीरा जय-विजयदा।।
अमृता कलकल निनादिनी निर्भरा, शाम्भवी सोमोद्भवा स्वेदोद्भवा।
चन्दना शिव-आत्मजा सागर-प्रिया, वायुवाहिनी ह्लादिनी आनंददा।।
मुरदला मुरला त्रिकूटा अंजना, नंदना नम्माडियस भव-मुक्तिदा।
शैलकन्या शैलजायी सुरूपा, विराटा विदशा सुकन्या भूषिता।।
गतिमयी क्षिप्रा शिवा मेकलसुता, मतिमयी मन्मथजयी लावण्यदा।
रतिमयी उन्मादिनी उर्वर शुभा, यतिमयी भवत्यागिनी वैराग्यदा।।
शोभिता रम्या सुरूपा माननी, करुणहृदया पापहरिणी मुक्तिदा।
तापसी दिव्यांगना भवतारिणी, मनोहारिणी वत्सला सद्भक्तिदा।।
दिव्यरूपा त्यागिनी भयहारिणी, महार्णवा कमला निशंका मोक्षदा।
अम्ब रेवा करभ कालिंदी शुभा, कृपा तमसा शिवज सुरसा मर्मदा।।
तारिणी मनहारिणी नीलोत्पला, क्षमा यमुना मेकला यश-कीर्तिदा।
साधना-संजीवनी सुख-शांतिदा, सलिल-इष्टा माँ भवानी नरमदा।।

नर्मदा के आँचल की छाया में न कोई बड़ा है, न कोई छोटा, न अपना, न पराया। कण-कण, तृण-तृण और क्षण-क्षण नर्मदा जल को स्पर्श करते ही अलौकिक हो जाते हैं।
नर्मदा के घाट पर जाना तो अहंकार तजकर जाना, नर्मदा तरंगों को देखते ही मन बंधन-मुक्त हो जाता है।
नर्मदा दर्शन की इच्छा जागृत होते ही हृदय में सहज शांति उतर आती है। नर्मदा का दर्शन ही भाव-विभोर कर देता है। शंकर नर्मदा के प्रलयंकर रूप को नमन करते हैं।
नर्मदा के स्पर्शमात्र से जल-तरंगों में भरी ऊर्जा अंतर्मन में प्रवाहित होने लगती है। नर्मदा के कल-कल निर्झर, नर्मदा तट पर पक्षियों की कलरव ध्वनि, हरित वन—यह सब दुःख हर लेता है।
नर्मदा जीवन से भागने नहीं जीवन का सामना करने का संदेश देती हैं। कुछ न मिले तो बहुत कुछ औरों को दो। नर्मदा सिखाती हैं कि दर्द और द्वंद्व में भी आनंद है।
नर्मदा ऋषियों और योगियों की साधना-स्थली है। अनगिनत वर्षों से मनीषियों ने तट पर तप कर सिद्धियाँ पाई हैं। जीवनारंभ, जलचर, थलचर, नभचर, डायनासौर, वन्य-ग्राम्य और नागर सभ्यताएँ, वैदिक-पौराणिक-औपनिषदिक ज्ञान-ध्यान साधना-आराधना, संस्कृति, संस्कार, सुर-नर-असुर, साधु-संत, ऋषि-मुनि, शैव-शाक्त-गाणपत्य-वैष्णव, लोकजीवन, नाट्यकला, लोककला, दर्शन-प्रदर्शन, ज्ञान-विज्ञान अर्थात आदि से अब तक हर तत्व किसी न किसी रूप में नर्मदा से जुड़ा हुआ है।
नर्मदा भारत के हृदयस्थल में प्रवाहित यह जीवनधारा है, केवल एक नदी नहीं चेतन पुंज है।
नर्मदा का दरस-परस प्रिय छाया को हुआ, यह सौभाग्य है। नर्मदा सलिल अंजुरी में भरकर अभिषेक करो, आचमन करो या पद प्रक्षालन कल्याण सुनिश्चित है।
नर्मदा के चाहे बिना ''रे मन! नर्मदा हो जा'' कहना और लिखना संभव नहीं हो सकता। नर्मदा दर्शन का पुण्य पाने देवता भी धरा पर अवतार लेते हैं।
नर्मदा में अवगाहने का सुअवसर उपलब्ध कराने के लिए छाया को शुभाशीष।
नर्मदा को सुनो-गुनो, नर्मदा से हिलो-मिलो, नर्मदा बनो और अंत में नर्मदा में मिलो ''जैसे मिल गए मताई औ बाप।''
- शुभाशीष सहित
नर्मदात्मज संजीव

मन की बात

“रे मन! नर्मदा हो जा” केवल नर्मदा तट की यात्रा का संस्मरण नहीं है। यह आत्मानुभूति है उस यात्रा की जिसमें नर्मदा के साथ चलते-चलते एक बाहरी यात्रा कब भीतर की यात्रा बन गई, इसका पता ही नहीं चला।

नर्मदा-तट पर जो देखा, जो सुना, जो अनुभव किया और जो भीतर उतरता गया, उसी अनुभव-गाथा को शब्द देने का एक सहज प्रयास है यह पुस्तक। इसमें किसी को उपदेश देने का प्रयास नहीं,केवल इतनी इच्छा है कि पाठक प्रसंग-दर-प्रसंगसाथ-साथ इस यात्रा में चले और अपने जीवन-अनुभवों को जोड़ सके।

यात्रा के बीच नर्मदा तट के अनेक प्रमुख स्थल, लोककथाएँ, किवदंतियाँ, मंदिर, ऋषि-मुनियों और साधु-संतों का सान्निध्य, पेड़-पौधों और प्रकृति के मौन-मुखर सौन्दर्य से साक्षात्कार स्वाभाविक है। कहीं किसी बच्चे की सहजता ने मन को छुआ, कहीं किसी वृद्ध की सेवा ने, कहीं किसी युवा की निस्वार्थ भावना ने। इन सबको लिखने का उद्देश्य किसी को बड़ा या छोटा दिखाना नहीं बल्कि उस स्थान से मिले अनुभव अपने भीतर उतारना रहा है।

नर्मदा तट पर बार-बार यह अनुभव हुआ कि जीवन के वे पाठ, जिन्हें हम सामान्य जीवन में वर्षों तक सीखने का प्रयास करते रहते हैं, वहाँ सहजता से जीवन का हिस्सा बनते जाते हैं, लेना और देना अलग-अलग नहीं लगता। यदि प्रकृति और जीवन से कुछ मिला है तो उसे लौटाना भी है। अकेले रहना और साथ रहना, मौन और कोलाहल भी कहीं न कहीं एक ही सत्य के दो रूप दिखाई देने लगते हैं।

परिक्रमा-पाठ पर आगे बढ़ते हुए शरीर की थकान बढ़ने के साथ मन की थकान कम होने पर विस्मय होता है। जैसे-जैसे कदम आगे बढ़ते हैं, भीतर का कोई बोझ पीछे छूटता जाता है। मन के विकार, उलझनें और अनावश्यक आग्रह धीरे-धीरे हल्के होते जाते हैं।

जब नर्मदा सागर-संगम की ओर बढ़ती है, तब एक अद्भुत अनुभूति होती है- नर्मदा सागर में अपना अस्तित्व खो नहीं रही, बल्कि अपने अस्तित्व को पा रही है, ''स्व'' से ''सर्व'' हो रही है। यह दृश्य केवल नदी का सागर में मिलना नहीं रह जाता; यह जीवन के एक गहरे सत्य का अनुभव बन जाता है।

सागर-संगम से लौटते समय मन पहले से अधिक हल्का होता है जैसे यात्रा में हमने बहुत कुछ पाया ही नहीं, बल्कि बहुत कुछ छोड़ भी दिया है। जो बोझ लेकर चले थे, उसका कुछ अंश रास्ते में ही उतर गया और उसके स्थान पर एक नई जीवन्तता भीतर उतरती चली गई।

यही नर्मदा की शिक्षा है-वह सिखाती कम है, दिखती अधिक है। कोई प्रेरणा बाहर से थोपनी नहीं पड़ती। पथ पर चलते-चलते, लोगों से मिलते-जुलते, प्रकृति को देखते और अनुभवों से गुजरते हुए बदलाव अपने आप भीतर जन्म लेने लगता है।

परिक्रमा पूरी होने तक लगता है कि हमने जीवन के बारे में बहुत कुछ सीखा नहीं, बल्कि जी लिया है। तब समझ में आने लगता है कि अपनी दिनचर्या में क्या बदलना है, अपने व्यवहार में क्या सुधारना है और स्वयं के भीतर किस तरह का परिवर्तन लाना है। यह परिवर्तन किसी बाहरी प्रेरणा से नहीं आता; माँ की गोद में बच्चे की तरह चलते-चलते, वह सहज ही भीतर उतरता जाता है।

''रे मन! नर्मदा हो जा'' मेरे लिए नर्मदा की यात्रा लिखने का प्रयास भर नहीं, उन क्षणों को सँजोने का प्रयास है, जिन्होंने मुझे भीतर से छुआ, बदला और कुछ नया देखने की दृष्टि दी।

इस यात्रा और इस पुस्तक के पीछे मेरे साहित्यिक गुरु आचार्य संजीव वर्मा ''सलिल'' जी का स्नेह, मार्गदर्शन और आशीर्वाद रहा। उनके विश्वास ने इस यात्रा को शब्द देने का साहस दिया। सलिल जी की ७५ वीं वर्ष ग्रन्थि पर ७५ प्रसंगों में निबद्ध यह संस्मरण-कथा ''तेरा तुझको अर्पित क्या लागे मेरा'' की भावना से उन्हें संमर्पित करते हुए मैं आह्लादित हूँ।

मेरे माता-पिता का विश्वास, मेरे पति का निरंतर सहयोग, बच्चों का उत्साह और पूरे परिवार का स्नेह एवं प्रोत्साहन मेरे लिए हमेशा शक्ति बना रहा। परिवार के हर सदस्य ने मुझे कुछ अच्छा करने के लिए प्रेरित किया और मेरे प्रयासों में अपना विश्वास बनाए रखा।

वे सभी लोग, जो किसी न किसी रूप में मुझसे जुड़े रहे, उनकी आँखों में दिखाई देने वाली उम्मीद भी मेरे लिए बहुत बड़ी प्रेरणा रही। उन्हें विश्वास था कि मैं कुछ अच्छा करूँगी। उस विश्वास को शब्दों में व्यक्त करना संभव नहीं, लेकिन इस पुस्तक के हर पन्ने में उस स्नेह और विश्वास के प्रति मेरी कृतज्ञता अवश्य है।

''रे मन! नर्मदा हो जा'' किसी उपलब्धि का दावा नहीं, बल्कि उन अनुभवों को विनम्रता से ग्रहण करने का प्रयास है, जो माँ नर्मदा ने मेरी झोली में डाले।
जबलपुर                                                                                                                                                                   रेवार्पणम् अस्तु।

२९ जुलाई २०२६                                                                                                                                              नर्मदात्मजा छाया सक्सेना