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मंगलवार, 3 नवंबर 2026

अक्टूबर २६, ग़ज़ल, दोहा, मुक्तक, सॉनेट, राम, हाइकु गीत, प्रतीप अलंकार, नैरंतरी छंद

 सलिल सृजन अक्टूबर २६

*
ग़ज़ल ० हम कहाँ से चले थे, कहाँ आ गए? भक्त ही भोग भगवान का खा गए।। . सूर्य सहयोग का क्यों नहीं उग सका? संसदी शांति दल-भेद ही खा गए।। . ज़ुल्म गैरों पे माना मुनासिब मगर लोक पर तंत्र जुल्मो-सितम ढा गए।। . हो न मगरूर सत्ता न रहती सदा सूरमा जो बने, पटखनी खा गए।। . बाप का बाप बेटा कहाता "सलिल" बाप को आग बेटे ही लगवा गए।। . हर पड़ोसी के दुश्मन हमीं क्यों हुए? शेर को स्यार कर शोर धमका गए।। . जो महाशक्तियाँ दोस्त होती नहीं गैर को कह सगा, हम दगा खा गए।। . कोई किसका "सलिल" कब कभी हो सका। राम सीता को जंगल में भिजवा गए।। . हम जहाँ थे वहाँ भी नहीं रह सके दी गँवा सरजमीं, मात भी खा गए।।
००० 
दोहा मुक्तक अरण्य . जन अरण्य है हर शहर, जंगल-जंगल गाँव। धनपिशाच नर शिकारी, चलता पल-पल दाँव।। शांति हिरनिया खोजती, पाती कहीं न ठाँव। आशा गौरैया विवश, मिलती कहीं न छाँव।। . जा अरण्य कोई हुआ, त्रिभुवन का भगवान। जो अरण्य में ही जिया, उसको मिला न मान।। माँग अँगूठा गुरु करें, करनी पर अभिमान। जंगल-जंगल जल उठा, लड़ा गँवा दी जान।। . संसद सघन अरण्य सम, नायक घातक बाज। गौरैयों को नोचते, तनिक न आती लाज।। मात सियारों को मिली, हर नेता लफ्फाज। कुंतल रहा पर अन्य के, भरे न खुद परवाज़।। . शांत-सभ्य हैं शहर से, ज्यादा 'सलिल' अरण्य। सीताएँ पाती रहीँ, शरणागति कारुण्य।। राजा निर्वासित करे, गर्भवती निज नार- वंश-बेल रक्षित करें, जंगल हँस बेदाम।। . छंद पाकर दुष्यंत से, शकुंतलाएँ त्रस्त। हो अरण्य भगवान सम, कहे न होना पस्त।। जन संतानें भरत सी, गिनें शेर के दाँत- मानवता के सूर्य को, मत होने दो अस्त।। . रक्षित रखा अरण्य ने, चौदह वर्ष न भूल। अवधपुरी ने छुड़ाए, तीक्ष्ण विषैले शूल।। सीता को दिलवा दिया, बिना दोष वनवास। मना रही दीपावली, राम भोगते त्रास।। ००० दोहा सलिला अरुण ० तरुण अरुण मिल वरुण से, लिए गरुण को संग। कहें विष्णु से अब नहीं, करिए हमको तंग।। सोते रहते शेष पर, हम पर भार अशेष। चरण चापतीं माँ रमा, करतीँ कृपा विशेष।। तजें नींद अब अरुण के, साथ हुए काक्रोच। माँग मानिए अन्यथा, धरना हो बिन लोच।। उदित न होगा अब अरुण, खुद तपिए कर भोर। काम न आएँ भक्त अब, लाख मचाएँ शोर।। बिना अरुण के सृष्टि से, हट न सकेगी रात। भोर दिवस हो नृत्यरत, काक्रोची बारात।। उठे हड़बड़ा हरि तुरंत, करने मन की बात। कहें अरुण से त्रुटि हुई, लाज बचाएँ तात।। २६.१०.२६ डी , ५०४ रुद्राक्ष फेज २ भोपाल ०००

पूर्णिका
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दुनिया भले हो हिसाबी
कुदरत नहीं है हिजाबी
बिन पिए ही रहा झूम मैं
मिले नैन जब से गुलाबी
भँवरा रहा गुनगुना बाग में
दुनिया समझती शराबी
काँटों की संगत सुहाए
देखो कली की नवाबी
शबनम सहेली सुहाए
रंगत कई हर शबाबी
पैगाम लाएँ तितलियाँ
लेतीं सँदेशा जवाबी
ताला लगा पाए माली
बनी ही नहीं है वो चाबी
२६.१०.२०२४
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सॉनेट
बैठ चाँद पर
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बैठ चाँद पर धरा देखकर व्रत तोड़ेंगी
कथा कहेंगी सात भाई इक बहिना वाली
कैसे बिगड़ी बात, किस तरह पुनः बना ली
सात जन्म तक पति का पीछा नहिं छोड़ेंगी
शरत्पूर्णिमा पर धारा उल्टी मोड़ेंगी
वसुधा की किरणों में रखें खीर की प्याली
धरा बुआ दिखलाएँ जसोदा धरकर थाली
बाल कृष्ण को बहला-समझा खुश हो लेंगी।
उल्टी गंगा बहे चाँद पर, धरती निरखें
कैसे छू लें धरा? सोच शशि- मानव तरसें
उस कक्षा से इस कक्षा में आकर हरषें
अभियंता-वैज्ञानिक कर नव खोजें परखें
सुमिर सुमिर मंगल-यात्रा को नैना बरसें
रवि की रूप छटाएँ मन को मन आकरषें।
२६.१०.२०२३
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अभिनव प्रयोग
राम
हाइकु गीत
(छंद वार्णिक, ५-७-५)
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
बल बनिए
निर्बल का तब ही
मिले प्रणाम।
क्षणभंगुर
भव सागर, कर
थामो हे राम।।
*
सुख तजिए / निर्बल की खातिर / दुःख सहिए।
मत डरिए / विपदा - आपद से / हँस लड़िए।।
सँग रहिए
निषाद, शबरी के
सुबहो-शाम।
क्षणभंगुर
भव सागर, कर
थामो हे राम।।
*
मार ताड़का / खर-दूषण वध / लड़ करिए।
तार अहल्या / उचित नीति पथ / पर चलिए।।
विवश रहे
सुग्रीव-विभीषण
कर लें थाम।
क्षणभंगुर
भव सागर, कर
थामो हे राम।।
*
सिय-हर्ता के / प्राण हरण कर / जग पुजिए।
आस पूर्ण हो / भरत-अवध की / नृप बनिए।।
त्रय माता, चौ
बहिन-बंधु, जन
जिएँ अकाम।
क्षणभंगुर
भव सागर, कर
थामो हे राम।।
२६-१०२०२२
***
अलंकार सलिला: २५
प्रतीप अलंकार
*
अलंकार में जब खींचे, 'सलिल' व्यंग की रेख.
चमत्कार सादृश्य का, लें प्रतीप में देख..
उपमा, अनन्वय तथा संदेह अलंकार की तरह प्रतीप अलंकार में भी सादृश्य का चमत्कार रहता है, अंतर यह है कि उपमा की अपेक्षा इसमें उल्टा रूप दिखाया जाता है। यह व्यंग पर आधारित सादृश्यमूलक अलंकार है। प्रसिद्ध उपमान को उपमेय और उपमेय को उपमान सिद्ध कर चमत्कारपूर्वक उपमेय या उपमान की उत्कृष्टता दिखाये जाने पर प्रतीप अलंकार होता है।जब उपमेय के समक्ष उपमान का तिरस्कार किया जाता है तो प्रतीप अलंकार होता है।
प्रतीप अलंकार के ५ प्रकार हैं।
उदाहरण-
१. प्रथम प्रतीप:
जहाँ प्रसिद्ध उपमान को उपमेय के रूप में वर्णित किया जाता है अर्थात उपमान को उपमेय और उपमेय को उपमान बनाकर।
उदाहरण-
१. यह मयंक तव मुख सम मोहन
२. है दाँतों की झलक मुझको दीखती दाडिमों में.
बिम्बाओं में पर अधर सी राजती लालिमा है.
मैं केलों में जघन युग की देखती मंजुता हूँ.
गुल्फों की सी ललित सुखमा है गुलों में दिखाती
३. वधिक सदृश नेता मुए, निबल गाय सम लोग
कहें छुरी-तरबूज या, शूल-फूल संयोग?
२. द्वितीय प्रतीप:
जहाँ प्रसिद्ध उपमान को अपेक्षाकृत हीन उपमेय कल्पित कर वास्तविक उपमेय का निरादर किया जाता है।
उदाहरण-
१. नृप-प्रताप सम सूर्य है, जस सम सोहत चंद
२. का घूँघट मुख मूँदहु नवला नारि.
चाँद सरग पर सोहत एहि अनुसारि
३. बगुला जैसे भक्त भी, धारे मन में धैर्य
बदला लेना ठनकर, दिखलाते निर्वैर्य
3. तृतीय प्रतीप:
जहाँ प्रसिद्ध उपमान का उपमेय के आगे निरादर होता है।
उदाहरण-
१. काहे करत गुमान मुख?, तुम सम मंजू मयंक
२. मृगियों ने दृग मूँद लिए दृग देख सिया के बांके.
गमन देखि हंसी ने छोडा चलना चाल बनाके.
जातरूप सा रूप देखकर चंपक भी कुम्हलाये.
देख सिया को गर्वीले वनवासी बहुत लजाये.
३. अभिनेत्री के वसन देख निर्वासन साधु शरमाये
हाव-भाव देखें छिप वैश्या, पार न इनसे पाये
४. चतुर्थ प्रतीप:
जहाँ उपमेय की बराबरी में उपमान नहीं तुल/ठहर पाता है, वहाँ चतुर्थ प्रतीप होता है।
उदाहरण-
१. काहे करत गुमान ससि! तव समान मुख-मंजु।
२. बीच-बीच में पुष्प गुंथे किन्तु तो भी बंधहीन
लहराते केश जाल जलद श्याम से क्या कभी?
समता कर सकता है
नील नभ तडित्तारकों चित्र ले?
३. बोली वह पूछा तो तुमने शुभे चाहती हो तुम क्या?
इन दसनों-अधरों के आगे क्या मुक्ता हैं विद्रुम क्या?
४. अफसर करते गर्व क्यों, देश गढ़ें मजदूर?
सात्विक साध्वी से डरे, देवराज की हूर
५. पंचम प्रतीप:
जहाँ उपमान का कार्य करने के लिए उपमेय ही पर्याप्त होता है और उपमान का महत्व और उपयोगिता व्यर्थ हो जाती है, वहाँ पंचम प्रतीप होता है।
उदाहरण-
१. का सरवर तेहि देऊँ मयंकू
२. अमिय झरत चहुँ ओर से, नयन ताप हरि लेत.
राधा जू को बदन अस चन्द्र उदय केहि हेत..
३. छाह करे छितिमंडल में सब ऊपर यों मतिराम भए हैं.
पानिय को सरसावत हैं सिगरे जग के मिटि ताप गए हैं.
भूमि पुरंदर भाऊ के हाथ पयोदन ही के सुकाज ठये हैं.
पंथिन के पथ रोकिबे को घने वारिद वृन्द वृथा उनए हैं.
४. क्यों आया रे दशानन!, शिव सम्मुख ले क्रोध
पाँव अँगूठे से दबा, तब पाया सत-बोध
२८-१०-२०१५
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नैरंतरी छंद
रात जा रही, उषा आ रही
उषा आ रही, प्रात ला रही
प्रात ला रही, गीत गा रही
गीत गा रही, मीत भा रही
मीत भा रही, जीत पा रही
जीत पा रही, रात आ रही
गुप-चुप डोलो, राज न खोलो
राज न खोलो, सच मत तोलो
सच मत तोलो,मन तुम सो लो
मन तुम सो लो, नव रस घोलो
नव रस घोलो, घर जा सो लो
घर जा सो लो, गुप-चुप डोलो
२६-१०-२०१४
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