सलिल सृजन अप्रैल २६
दिव्य नर्मदा : हिंदी तथा अन्य भाषाओँ के मध्य साहित्यिक-सांस्कृतिक-सामाजिक संपर्क हेतु रचना सेतु A plateform for literal, social, cultural and spiritual creative works. Bridges gap between HINDI and other languages, literature and other forms of expression.
कुल पेज दृश्य
रविवार, 26 अप्रैल 2026
अप्रैल २६, सॉनेट, लघुकथा, प्लवंगम् छंद, मुक्तक - मुक्तिका, धरती, नेपाल भूकंप, पशुपति, गीत
गुरुवार, 23 अप्रैल 2026
अप्रैल २३, सॉनेट, पृथ्वी दिवस, लघुकथा, जाति, नोटा, बुक डे, सखी छंद, गंग छंद, लोरी, नवगीत
सलिल सृजन अप्रैल २३
*
उमर गँवाई, जाग न पाए।
प्रभु से कर अनुराग न पाए।।
कोशिश कर कर हार गए हैं-
सच से लेकिन भाग न पाए।।
२३-४-२०२३
•••
सॉनेट
पृथ्वी दिवस
•
पृथ्वी दनुजों से थर्रायी
ऐसा हमें अतीत बताता
पृथ्वी अब भी है घबरायी
ऐसा वर्तमान बतलाता
क्या भविष्य बस यही कहेगा
धरती पर रहते थे इन्सां
या भविष्य ही नहीं रहेगा?
होगा एक न करे जो बयां
मात्र 'मैं' सही, शेष गलत हैं
मेरा कहा सभी जन मानें
अहंकार भय क्रोध द्वेष हैं
मूल नाश के कारण जानें
विश्व एक परिवार, एक घर
माने हँसे साध सब मिलकर
२३-४-२०२२
•••
ॐ
चिंतन सलिला ५
कब?
•
'कब' का महत्व क्या, क्यों, कैसे के क्रम में अन्य किसी से कम नहीं है।
'कब' क्या करना है यह ज्ञात हो तो किये गये का परिणाम मनोनुकूल होता है।
'कब' का महत्व कैकेयनंदिनी कैकशी भली-भाँति जानती थीं। यदि उन्होंने कोप कर वरदान राम राज्याभिषेक के
ठीक पहले न माँगकर किसी अन्य मय माँगे होते तो राम का चरित्र निखर ही न पाता, न ही दनुज राज का अंत नहीं होता।
'कब' न जानने के कारण ही हमारी संस्थाओं के कार्य, कार्यक्रम और निर्णय फलदायी नहीं हैं।
'कब' करना या न करना कैसे जानें?
याद रखें 'अग्रसोची सदा सुखी'। समय से पहले सोच-विचारकर यथासमय किया गया काम ही सुलझाया होता है।
'कब' का सही अनुमान कर वर्षा के पूर्व छत और छाते की मरम्मत, शीत के पहले गर्म कपड़ों की धुलाई और गर्मी के पहले कूलर-पंखों की देखभाल न हो तो परेशानी होगी ही।
'कब' क्या करना या न करना, यह जानना संस्था पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं के लिए बहुत जरूरी है।
यह न जानने के कारण ही संस्थाएँ अप्रासंगिक हो गई हैं और समाज उनसे दूर हो गया है।
संस्थाओं का गठन समाज के मगल और कमजोरों की सहायता के लिए किया जाता है। संस्था से इस उद्देश्य की पूर्ति न हो, वह केवल संपन्न वर्ग के मिलने, मौज करने का माध्यम बन जाए तो समाज उससे दूर हो जाता है।
कब किसके लिए क्या किस प्रकार करना है? यह न सोचा जाए तो संस्था वैयक्तिक यश, लाभ और स्वार्थ का जरिया बनकर मर जाती है।
'कब' की कसौटी पर खुद को और संस्था को कसकर देखिए।
२३-४-२०२२
संजीव, ९४२५१८३२४४
•••
दोहा
कोरोना से लड़ रही, पाले स्वप्न अनेक
भंग न कोई कर सके, हम सब रखें विवेक
*
पुस्तक दिवस (२३ अप्रैल) पर
मुक्तिका
*
मीत मेरी पुस्तकें हैं
प्रीत मेरी पुस्तकें हैं
हार ले ले आ जमाना
जीत मेरी पुस्तकें हैं
साँस लय है; आस रस है
गीत मेरी पुस्तकें हैं
जमातें लाईं मशालें
भीत मेरी पुस्तकें हैं
जग अनीत-कुरीत ले ले
रीत मेरी पुस्तकें हैं
२३-४-२०२०
***
विमर्श : चाहिए या चाहिये?
हिन्दी लेखन में हमेशा स्वरात्मक शब्दों को प्रधानता दी जाती है मतलब हम जैसा बोलते हैं, वैसा ही लिखते हैं।
चाहिए या चाहिये दोनों शब्दों के अर्थ एक ही हैं। लेखन की दृष्टि से कब क्या लिखना चाहिए उसका वर्णन निम्नलिखित है।
चाहिए - स्वरात्मक शब्द है अर्थात बोलने में 'ए' स्वर का प्रयोग हो रहा है। इसलिए लेखन की दृष्टि से चाहिए सही है।
चाहिये - यह श्रुतिमूलक है अर्थात सुनने में ए जैसा ही प्रतीत होता है इसलिए चाहिये लिखना सही नहीं है। क्योंकि हिन्दी भाषा में स्वर आधारित शब्द जिसमें आते हैं, लिखने में वही सही माने जाते हैं।
आए, गए, करिए, सुनिए, ऐसे कई शब्द हैं जिसमें 'ए' का प्रयोग ही सही है।
***
मुक्तक
*
जगजननी संरक्षण करती संतानों का
अंतर करे न मत्स्य परिंदों इंसानों का
जीवन चक्र अनवरत गतिमय रखतीं मैया
कभी नहीं रह रुकने देती अरमानों का
*
इस दुनिया में जान लुटाता किस पर कौन?
जान अगर बेजान साथ में जाता कौन?
जान जान की जान मुसीबत में डाले
जान जान की जान न जान बताता कौन?
*
लघुकथा
जाति
*
_ बाबा! जाति क्या होती है?
= क्यों पूछ रही हो?
_ अखबारों और दूरदर्शन पर दलों द्वारा जाति के आधार चुनाव में प्रत्याशी खड़े किए जाने और नेताओं द्वारा जातिवाद को बुरा बताए जाने से भ्रमित पोती ने पूछा।
= बिटिया! तुम्हारे मित्र तुम्हारी तरह पढ़-लिख रहे बच्चे हैं या अनपढ़ और बूढ़े?
_ मैं क्यों अनपढ़ को मित्र बनाऊँगी? पोती तुनककर बोली।
= इसमें क्या बुराई है? किसी अनपढ़ की मित्र बनकर उसे पढ़ने-बढ़ने में मदद करो तो अच्छा ही है लेकिन अभी यह समझ लो कि तुम्हारे मित्रों में एक ही शाला में पढ़ रहे मित्र एक जाति के हुए, तुम्हारे बालमित्र जो अन्यत्र पढ़ रहे हैं अन्य जाति के हुए, तुम्हारे साथ नृत्य सीख रहे मित्र भिन्न जाति के हुए।
_ अरे! यह तो किसी समानता के आधार पर चयनित संवर्ग हुआ। जाति तो जन्म से होती है न?
= एक ही बात है। संस्कृत की 'जा' धातु का अर्थ होता है एक स्थान से अन्य स्थान पर जाना। जो नवजात गर्भ से संसार में जाता है वह जातक, जन्म देनेवाली जच्चा, जन्म देने की क्रिया जातकर्म, जन्म दिया अर्थात जाया....
_ तभी जगजननी दुर्गा का एक नाम जाया है।
= शाबाश! तुम सही समझीं। बुद्ध द्वारा विविध योनियों में जन्म या अवतार लेने की कहानियाँ जातक कथाएँ हैं।
_ यह तो ठीक है लेकिन मैं...
= तुम समान आचार-विचार का पालन कर रहे परिवारों के समूह और उनमें जन्म लेनेवाले बच्चों को जाति कह रही हो। यह भी एक अर्थ है।
_ लेकिन चुनाव के समय ही जाति की बात अधिक क्यों होती है?
= इसलिए कि समान सामाजिक पृष्ठभूमि के लोगों में जुड़ाव होता है तथा वे किसी परिस्थिति में समान व्यवहार करते हैं। चुनाव जीतने के लिए मत संख्या अधिक होना जरूरी है। इसलिए दल अधिक मतदाताओं वाली जाति का उम्मीदवार खड़ा करते हैं।
_ तब तो गुण और योग्यता के कोई अर्थ ही नहीं रहा?
= गुण और योग्यता को जाति का आधार बनाकर प्रत्याशी चुने जाएँ तो?
_ समझ गई, दल धनबल, बाहुबल और संख्याबल को स्थान पर शिक्षा, योग्यता, सच्चरित्रता और सेवा भावना को जाति का आधार बनाकर प्रत्याशी चुनें तो ही अच्छे जनप्रतिनिधि, अच्छी सरकार और अच्छी नीतियाँ बनेंगी।
= तुम तो सयानी हो गईं हो बिटिया! अब यह भी देखना कि तुम्हारे मित्रों की भी हो यही जाति।
***
लघुकथा
नोटा
*
वे नोटा के कटु आलोचक हैं। कोई नोटा का चर्चा करे तो वे लड़ने लगते। एकांगी सोच के कारण उन्हें और अन्य राजनैतिक दलों के प्रवक्ताओं के केवल अपनी बात कहने से मतलब था, आते भाषण देते और आगे बढ़ जाते।
मतदाताओं की परेशानी और राय से किसी को कोई मतलब नहीं था। चुनाव के पूर्व ग्रामवासी एकत्र हुए और मतदान के बहिष्कार का निर्णय लिया और एक भी मतदाता घर से नहीं निकला।
दूरदर्शन पर यह समाचार सुन काश, ग्रामवासी नोटा का संवैधानिक अधिकार जानकर प्रयोग करते तो व्यवस्था के प्रति विरोध व्यक्त करने के साथ ही संवैधानिक दायित्व का पालन कर सकते थे।
दलों के वैचारिक बँधुआ मजदूर संवैधानिक प्रतिबद्धता के बाद भी अपने अयोग्य ठहराए जाने के भय से मतदाताओं को नहीं बताना चाहते कि उनका अधिकार है नोटा।
२३-४-२०१९
***
गीत
देहरी बैठे दीप लिए दो
तन-मन अकुलाए.
संदेहों की बिजली चमकी,
नैना भर आए.
*
मस्तक तिलक लगाकर भेजा, सीमा पर तुमको.
गए न जाकर भी, साँसों में बसे हुए तुम तो.
प्यासों का क्या, सिसक-सिसककर चुप रह, रो लेंगी.
आसों ने हठ ठाना देहरी-द्वार न छोड़ेंगी.
दीपशिखा स्थिर आलापों सी,
मुखड़ा चमकाए.
मुखड़ा बिना अन्तरा कैसे
कौन गुनगुनाए?
*
मौन व्रती हैं पायल-चूड़ी, ऋषि श्रृंगारी सी.
चित्त वृत्तियाँ आहुति देती, हो अग्यारी सी.
रमा हुआ मन उसी एक में जिस बिन सार नहीं.
दुर्वासा ले आ, शकुंतला का झट प्यार यहीं.
माथे की बिंदी रवि सी
नथ शशि पर बलि जाए.
*
नीरव में आहट की चाहत, मौन अधर पाले.
गजरा ले आ जा निर्मोही, कजरा यश गा ले.
अधर अधर पर धर, न अधर में आशाएँ झूलें.
प्रणय पखेरू भर उड़ान, झट नील गगन छू लें.
ओ मनबसिया! वीर सिपहिया!!
याद बहुत आए.
घर-सरहद पर वामा
यामा कुलदीपक लाए.
२३-४-२०१८
***
एक षट्पदी
*
'बुक डे'
राह रोक कर हैं खड़े, 'बुक' ले पुलिस जवान
वाहन रोकें 'बुक' करें, छोड़ें ले चालान
छोड़ें ले चालान, कहें 'बुक' पूरी भरना
छूट न पाए एक, न नरमी तनिक बरतना
कारण पूछा- कहें, आज 'बुक डे' है भैया
अगर हो सके रोज, नचें कर ता-ता थैया
***
ॐ
छंद बहर का मूल है: १०
*
छंद परिचय:
संरचना: SIS SSI SS / SISS SISS
सूत्र: रतगग।
आठ वार्णिक अनुष्टुप जातीय छंद।
चौदह मात्रिक मानव जातीय सखी छंद।
बहर: फ़ाइलातुं फ़ाइलातुं ।
*
आप बोलें या न बोलें
सत्य खोलें या न खोलें
*
फैसला है आपका ही
प्यार के हो लें, न हो लें
*
कीजिए भी काम थोड़ा
नौकरी पा के, न डोलें
*
दूर हो विद्वेष सारा
स्नेह थोड़ा आप घोलें
*
तोड़ दें बंदूक-फेंकें
नैं आँसू से भिगो लें
*
बंद हो रस्मे-हलाला
औरतें भी सांस ले लें
*
काट डाले वृक्ष लाखों
हाथ पौधा एक ले लें
२३.४.२०१७
***
ॐ
छंद बहर का मूल है: ११
*
छंद परिचय:
संरचना: SIS SS
सूत्र: रगग।
पाँच वार्णिक सुप्रतिष्ठा जातीय छंद।
नौ मात्रिक आंक जातीय गंग छंद।
बहर: फ़ाइलातुं फ़े ।
*
भावनाएँ हैं
कामनाएँ हैं
*
आदमी है तो
वासनाएँ हैं
*
हों हरे वीरां
योजनाएँ हैं
*
त्याग की बेला
दाएँ-बाएँ हैं
*
आप ही पालीं
आपदाएँ हैं
*
आदमी जिंदा
वज्ह माएँ हैं
*
औरतें ही तो
वंदिताएँ हैं
***
द्विपदी
*
सबको एक नजर से कैसे देखूँ ?
आँख भगवान् ने दो-दो दी हैं।
*
उनको एक नजर से ज्योंही देखा
आँख मारी? कहा और पीट दिया।
*
२३-४-२०१७
***
दोहा सलिला
निज हाथों निज छवि लखें, सैल्फी कहते लोग,
लगा दिया चलभाष ने , आत्म मोह का रोग
*
नित्य कांति जिसकी ठगे, जिस-तिस को हर रोज।
झूठी उसकी लघु कथा, हम गंगू वह भोज।।
***
लोरी
*
सो जा रे सो जा, सो जा रे मुनिया
*
सपनों में आएँगे कान्हा दुआरे
'चल खेल खेलें' तुझको पुकारें
माखन चटा, तुझको मिसरी खिलाएं
जसुदा बलैयाँ लें तेरी गुड़िया
सो जा रे सो जा, सो जा रे मुनिया
*
साथी बनेंगे तेरे ये तारे
छिप-छिप शरारत करते हैं सारे
कोयल सुनाएगी मीठी सी लोरी
सुंदर मिलेगी सपनों की दुनिया
सो जा रे सो जा, सो जा रे मुनिया
२०-१०-२०१६
***
कविता:
अपनी बात:
.
पल दो पल का दर्द यहाँ है
पल दो पल की खुशियाँ है
आभासी जीवन जीते हम
नकली सारी दुनिया है
जिसने सच को जान लिया
वह ढाई आखर पढ़ता है
खाता पीता सोता है जग
हाथ अंत में मलता है
खता हमारी इतनी ही है
हमने तुमको चाहा है
तुमने अपना कहा मगर
गैरों को गले लगाया है
धूप-छाँव सा रिश्ता अपना
श्वास-आस सा नाता है
दूर न रह पाते पल भर भी
साथ रास कब आता है
नोक-झोक, खींचा-तानी ही
मैं-तुम को हम करती है
उषा दुपहरी संध्या रजनी
जीवन में रंग भरती है
कौन किसी का रहा हमेशा
सबको आना-जाना है
लेकिन जब तक रहें, न रोएँ
हमको तो मुस्काना है
*
***
मुक्तक:
.
आसमान कर रहा है इन्तिज़ार
तुम उड़ो तो हाथ थाम ले बहार
हौसलों के साथ रख चलो कदम
मंजिलों को जीत लो, मिले निखार
*
***
मुक्तिका:
हम
.
चल रहे पर अचल हैं हम
गीत भी हैं, गजल हैं हम
आप चाहें कहें मुक्तक
नकल हम हैं, असल हैं हम
हैं सनातन, चिर पुरातन
सत्य कहते नवल हैं हम
कभी हैं बंजर अहल्या
कभी बढ़ती फसल हैं हम
मन-मलिनता दूर करती
काव्य सलिला धवल हैं हम
जो न सुधरी आज तक वो
आदमी की नसल हैं हम
गिर पड़े तो यह न सोचो
उठ न सकते निबल हैं हम
ठान लें तो नियति बदलें
धरा के सुत सबल हैं हम
कह रही संजीव दुनिया
जानती है सलिल हैं हम
***
नवगीत
.
अलस्सुबह बाँस बना
ताज़ा अखबार.
.
फाँसी लगा किसान ने
खबर बनाई खूब.
पत्रकार-नेता गये
चर्चाओं में डूब.
जानेवाला गया है
उनको तनिक न रंज
क्षुद्र स्वार्थ हित कर रहे
जो औरों पर तंज.
ले किसान से सेठ को
दे जमीन सरकार
क्यों नादिर सा कर रही
जन पर अत्याचार?
बिना शक-शुबह तन गया
बन जन का हथियार
अलस्सुबह बाँस बना
ताज़ा अखबार.
.
भूमि गँवाकर डूब में
गाँव हुआ असहाय.
चिंता तनिक न शहर को
टंसुए श्रमिक बहाय.
वनवासी से वन छिना
विवश उठे हथियार
आतंकी कह भूनतीं
बंदूकें हर बार.
'ससुरों की ठठरी बँधे'
कोसे बाँस उदास
पछुआ चुप पछता रही
कोयल चुप है खाँस
करता पर कहता नहीं
बाँस कभी उपकार
अलस्सुबह बाँस बना
ताज़ा अखबार.
२३-४-२०१५
***
कहावत सलिला:
भोजपुरी कहावतें:
*
कहावत सलिला: १
कहावतें किसी भाषा की जान होती हैं.
कहावतें कम शब्दों में अधिक भाव व्यक्त करती हैं.
कहावतों के गूढार्थ तथा निहितार्थ भी होते हैं.
आप अपने अंचल में प्रचलित कहावतें अर्थ सहित प्रस्तुत करें.
भोजपुरी कहावतें:
*
१. अबरा के मेहर गाँव के भौजी.
२. अबरा के भईंस बिआले कs टोला.
३. अपने मुँह मियाँ मीठू बा.
४. अपने दिल से जानी पराया दिल के हाल.
५. मुर्गा न बोली त बिहाने न होई.
६. पोखरा खनाचे जिन मगर के डेरा.
७. कोढ़िया डरावे थूक से.
८. ढेर जोगी मठ के इजार होले.
९. गरीब के मेहरारू सभ के भौजाई.
१०. अँखिया पथरा गइल.
***
मुक्तिका :
*
राजनीति धैर्य निज खोती नहीं.
भावनाओं की फसल बोती नहीं..
*
स्वार्थ के सौदे नगद होते यहाँ.
दोस्ती या दुश्मनी होती नहीं..
*
रुलाती है विरोधी को सियासत
हारकर भी खुद कभी रोती नहीं..
*
सुन्दरी सत्ता की है सबकी प्रिया.
त्याग-सेवा-श्रम का सगोती नहीं..
*
दाग-धब्बों की नहीं है फ़िक्र कुछ.
यह मलिन चादर 'सलिल' धोती नहीं..
२३-४-२०१०
*
बुधवार, 22 अप्रैल 2026
बुंदेली लो क गी तों में रा म डॉ रमा आर्य
बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 बुंदेली लो क गी तों में रा म डॉ रमा आर्य 1 शो धपत्र सा रां शरां - भा रत का हृदय स्थल बुंदेलखंड जहां कई संस्कृति यों आकर मि लती हैं या कहें कि संस्कृति जहां से शुरू हो कर संपूर्ण भा रत में फैलती है वह स्था न है बुंदेलखंड यहां की संस्कृति यहां कल लो क सा हि त्य यहां का सां स्कृसां स्कृति क वैभव सरलता से कि सी का भी मन अपनी और आकर्षि त कर ही लेता है यह कहना भी अति शयो क्ति नहीं हो गा कि बुंदेलखंड का लो क सा हि त्य संपूर्ण भा रत में अत्यधि क समृद्ध है । कि सी भी समा ज का प्रति बिं ब हम वहां की लो क संस्कृति में व्या प्तम लो कगी तों के मा ध्यम से समझ सकते हैं । लो कगी तों में लो क संस्कृति अपनेमूल स्वरूप में चि त्रि त हो ती है या कहीं लो क जी वन का सी धा सा धा परि चय लो कगी तों के मा ध्यम से मि ल जा ता है यह लो कगी त व्यक्ति की भा वनाओं आस्था वि चा र दर्शन जी वन शैली सब कुछ व्यक्त कर देते हैं । बुंदेलखंड की लो क आस्था का एक मजबूत आधा र है भगवा न श्री रा म । इस भक्ति सा गर केंद्र ओरछा है जि सके आसपा स रा म भक्ति सा गर के लो कगी तों में हेलोहे लोरे ले रहा है यहां के जन-जन के रगों में श्री रा म बसा करते हैं दूर- दूर से लो ग ओरछा आते हैं रा त भर अपने लो कगी तों के मा ध्यम से रा म जी को ले जा ते हैं और सुबह प्रा त बेरछा जी (नदी )में स्ना न कर रा म जी के दर्शन कर पुख़्य(पुष्य) नक्षत्र को केंद्र मा न कर अपना जी वन सुखद बना लेते हैं । यहां के लो कगी तों में रा म वि भि न्न रूपों में दर्शनीय है । मुख्य शब्द - बुंदेली लो कगी त, संस्कृति , सभ्यता , परंपरा , श्री रा म, लो कजी वन, लो क मा न्यता एँ, व्यवहा र एवं आचा र । प्रस्ता वना - बुंदेलखंड ऐति हा सि क, सा हि त्य, सां स्कृति क दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है बुंदेलखंड में सुवि धा ओं में भी एकता देखनेको सहज ही प्रा प्त हो ती है । बुंदेलखंड की लो क संस्कृति सभी लो क संस्कृति यों से समृद्ध प्रती त हो ती है । यहां का लो क सा हि त्य इतना समृद्ध है कि भा रत के 1 सहा यक प्रा ध्या पक (हि न्दी ), श्री पी तां बतां रा पी ठ संस्कृत महा वि द्या लय, दति या (मध्य प्रदेश) । Page 42 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 अन्यत्र कि सी क्षेत्र का सा हि त्य इतना समृद्ध और प्रसि द्ध नहीं हुआ । यहां लो कगी त , लो क कथा , लो क गा था , पहेलिहेलियां इत्या दि अत्यंत सहजता से देखनेको मि लती हैं । लो क जी वन के सुख-दुखदु उल्लास हर्ष वि षा द संघर्ष को अभि व्यक्त करनेके लि ए लो कगी त सर्वश्रेष्ठ मा ध्यम प्रती त हो ते हैं । यह लो कगी त जनजी वन में इतना रच बस गए हैं की यह सा मा न्य जी वन का अभि न्न हि स्सा बन चुके हैं । इन लो कगी तों के द्वा रा ही बुंदेली संस्कृति को समझा जा सकता है यह भी कह सकते हैं कि इन लो कगी तों के दर्पण से संस्कृति का प्रति बिं ब देखा जा सकता है । असल में लो क संस्कृति ही लो कगी तों की कहा नी है और इन कहा नि यों में जनसा मा न्य का जी वन मा नसि क उद्वेग, वि चा र, अभि व्यक्ति , व्यंजना, संस्का र, संस्कृति सब कुछ सूक्ष्मता से समा हि त हैं । यह लो कगी त संक्षि प्त सरल स्पष्ट स्वभा व एक सुंदर संगी त में हो ते हैं । बुंदेलखंड में प्रचलि त लो कगी त बुंदेली जि नके संस्का र, आचा र-वि चा र, उत्सव, अध्या त्मि क, दर्शन इत्या दि का तो परि चय देते हैं सा थ ही इन के मा ध्यम से सा मा जि क जी वन शैली का भी सा क्षा त्का र हो ता है । इन लो कगी तों का स्वस्थ भा व प्रवणता ला लि त्य दर्शनीय है । बुंदेलखंड का केंद्र झां सीझां सी से 17 कि लो मी टर दूर ओरछा मध्य प्रदेश के नि मा ड़ी जि ले में आता है । यहां प्रभु श्री रा म रा जा के रूप में वि रा जमा न हैं । प्रभु श्री रा म की भक्ति यहां के लो गों की रगों में बसी हुई है ।दूर-दूर से लो ग पुख्य नक्षत्र पर (ज्यो ति षी य गणना में पड़नेवा ला एक वि शेष नक्षत्र) यहां आते हैं अपनेरा जा रा म की प्रां गप्रां ण में पूरी रा त गी तों के मा ध्यम से अपनी भा वनाओं को व्यक्त कर अपनी धा र्मि क आस्था ओं की पूर्ति करते हैं । उनका प्रया स रहता है कि श्री रा म कि सी प्रकार एक नजर उन पर डा ल दें । यहां रा म जी लो कगी तों में उसी प्रकार समा हि त हैं जैसे ब्रज में श्री कृष्ण । रा म यहां वि भि न्न रूपों में व्या प्त है । बुंदेलखंड वह स्था न है जहां श्री रा म अपनेभक्तों की भा वना से वि भो र हो कर अवध से ओरछा पधा रे । कहा जा ता है कि ओरछा की महा रा नी कुंवर गणेशी श्री रा म के अनन्य भक्त थीं और उन्हीं की भक्ति व प्रेम पर री झ कर या कहें अपनेइस भक्त के हट से वि वश हो कर श्री रा म को ओरछा धा म आना पड़ा । भगवा न श्री रा म रा नी कुंवर गणेशी जी के नि वा स महल ओरछा में वि रा जमा न हुए और इस तरह बुंदेलखंड के क्षेत्र में श्री रा म रा जा के रूप में यहां वि रा जमा न हुए एक लो कगी त के अनुसा ररा जा मधुकर शा ह की रा नी कुंवर गणेश । अवधपुरी से ओरछा ला ई अवध नरेश ।। आज भी यहां की धरती से रा म जी के जन्म उत्सव पर उठनेवा ली बधा इयां हर घर में गा ई जा ती हैं क्यों किक्योंकि जब घर में बा लक हो ता है तो वह यहां रा मजी का स्वरूप ही हो ता है और मा ता एं गां वगां उठते हैं - कोसल्ला ले लो बधा ई अवध में लल्ला भये हि ल मि ल गा दो बधा ई अवध में लल्ला भये….. Page 43 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 एक भक्तों के द्वा रा श्री रा म के प्रां गप्रां ण में लो गों से आवा हन कि या जा रहा है कि वे रा मचंद्र से या री करनेएक लो कगी त का आनंदमयी अंदा ज रा मचंद्र से या री कर लो रा मचंद्र से या री जि नेभजे नर नारी कर लो रा मचंद्र से या री ….. झूठे बेर शबरी के खा ए रस्ता ता कि बेचा री ….. कर लो रा मचंद्र से या री …. रा मचंद्र से या री …….. तुलसी दा स भजो रे भगवा न तो आ गई वि पदा टा री … कर लो रा मचंद्र से या री ….. ईश्वर की कृपा से महा रा ज दशरथ को एक सा थ चा र पुत्रों की प्रा प्ति हुई । रा जपरि वा र सहि त पूरी अयो ध्या हर्षा ति रेक में डूबी हुई हैं । तो उसनेउत्तर दि या खवा सन ( नाइन ) बंदनवा र ले जा रही हैं । लो गों नेजि ज्ञा सा वश पूछा - जो बंदनवा रों कहां लयें जा ती , जो बंदनवा रों …रों … । नगर अयो ध्या में सुत भये सजनी , रा जा मही पतके नाती । रा जा दशरथ के पुत्रा भये हैं रघुकूल जो त उजया र दई बा ती । उजया र दई बा ती , उजया र दई बा ती । जो बंदनवा रों ... .. रा नी कौशल्या की कूँख जुड़ा नी " सब सखि यन की शी तल भई छा ती । नगर अयो ध्या में दा न भयें हैं लै लै दा न मगन भई सखि याँ । मगन भई सखि याँ , मगन भई सखि याँ जो बंदनबा रों कहाँ लये जा ती । दा ई नारा छी ननेके पूर्व नेग माँ गमाँ ती हैं । कोई हा र दे रही है, है कोई ति लरी और कोई मो ति यों का था र । परंतु वह तो प्रभु शि शु का दर्शन करना चा हती हैं । यहाँ के लो कगी तों मधुरता का ऐसा समरस चि त्र अंकि त हुआ है जि ससे समझ आता है कि यहां की संस्कृति कि तनी समृद्धि और मधुर है । एक अन्य गी त के द्वा रा रा नी मैत्रेयी के द्वा रा दशरथ जी से दो वरदा न मां गनेकी पूरी कथा वर्णि त है । रा जा दशरथ अपनी रा नी को मनानेकी पूरी कोशि श कर रहे हैं पर रा नी मैत्रेयी कि जि द हैं कि रा म को वनवा स पर भेजना है । रा जा दशरथ भरत को रा जगद्दी देनेके लि ए तैया र हैं किं तु मैत्रेयी के द्वा रा रा म को वनवा स देनेकी नहीं किं तु मैत्रेयी अपनी मनमा नी कर रही है और वह नहीं मा न रही - Page 44 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 रा जा तो पौ ढ़े पलंग पै रा नी मलें पी ड़ौ ली ' महा रा ज । हँस - हँस पूछे रा जा दशरथ कैसी धन- अनमनी महा रा ज । भौ तक ' तो कहि ये रा जा अन्न धन भौ तक लक्ष्मी महा रा ज । सूनो अयो ध्या को रा ज अकेली संचत बि ना महा रा ज । तुम रा जा जइयो बा जा रै ' संचत भो ल ल्या इयों महा रा ज । तुम रा नी मूरख अजा न कहाँ लौं समझा इयें महा रा ज । हा टों में हति यां बि कायें संचत नहीं पा इयों महा रा ज । नगर को नौवा ' बुला ओं छुरा मँगा इयों महा रा ज । ची रौ अभा गि न को कूँख रा जा गँवा रि न कहै महा रा ज । काशी के पंडि त बुलवा इयों वेद बचवा इयों महा रा ज । रा जा जनम के गो गि या ग्या वन ' हि रनी मा रि यों महा रा ज । सो नेकी हि रनी गढुवा य रूपे के गबैलुवा " महा रा ज । बन बन देव छुड़ा य संचत तब हुइयें महा रा ज । तुम रा जा जइयों पहा रैं सजी वन ल्या इयों महा रा ज । घि स लुड़ि या " बँटवा इयों कटोरन छा नि यों महा रा ज । पि यो हैं बाँ टबाँ - बडा र ती नई रा नी अधन 2 से महा रा ज भये हैं नों दस मा स ललन चा र हो गये महा रा ज । बा जन लगी आनन्द बधैया सखी गा वें सो हरें महा रा ज । गौ वा के गो बर मँगइयों अंगन लि पवा इयों महा रा ज । गजमो ति न के चौ क पुरा कलश धरवा इयों महा रा ज । काशी के पंडि त बुला वेद पढ़ वइयों महा रा ज । बा रा " बरस के हुइयें रा म तब वन खाँ जइये महा रा ज । इतनी तो सुन रा जा दशरथ अटा रि यों चढ़ गयो । महा रा ज पा हू से गई कौशि ल्या पूछें कैसे रा जा अनमनेमहा रा ज । बा रा बरस के हुई हैं रा म वन खों जइहैं महा रा ज । वन खो जैहैं तो जा न दे फेर घर आहे महा रा ज । मो रो मि ट गओ बाँ झबाँ को नाँवनाँ तुम्हारों वंश चलो महा रा ज । Page 45 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 भगवा न रा म के जन्म पर दा ई को देनेके लि ए महा रा ज दशरथ कौशल्या केकई सुमि त्रा सभी उपहा र लेकर खड़े हैं किं तु दा ई को बा हर नहीं भगवा न रा म की चतुर्भुज रूप में दर्शन चा हि ए इसी प्रसंग में एक लो कगी त - ' कैसी मचल रई " दा ई अवध में , कैसी मचल रई दा ई । सुरंग चूनरी कैकई लयें ठा ड़ी , बई " न लैवे दा ई । सो नेको हा र कौशल्या लयें ठा ड़ी , कूलों " मरो र गई दा ई । सो नेकी ति लरी सुमि त्रा लयें ठा ड़ी , मुखई " न बो ले दा ई । मुति यन था र रा जा लयें ठा ड़ें , नजर न फेरे दा ई । नरा तुमा रों जबई हम छी न दरसन दें रघुरा ई । रूप चतुरभुज प्रभु दरसा यों , खुशी भई तब दा ई । दरसन लै दा ई घर खौ घर - घर हो त बड़ा ई । एक और लो क गी त जि समें रा म जी के हो नेपर दि न सो नेके समा न प्रकाशमा न प्रती त हो ता है डा ई आकर रा जा दशरथ को बधा ई दे रही है और कह रही है कि आज दि न सो नेका है महा रा ज जैसा कि हम सभी जा नते हैं कि अयो ध्या स्वर्णमई है और रा म जी के जन्म उत्सव पर सो नेके कलश का ही प्रयो ग हो रहा है और रा जा दशरथ प्रसन्न हो कर भा इयों को स्वर्ण आभूषण ही भेंट कर रहे हैं - आज दि न सो नेकौ महा रा ज । रा जा दशरथ के पुत्र भये हैं । सो नेके कलश धरा ये महा रा ज । सो नेके सब दि न सो नेकी सब रा तें , सो नेदि अल उजा रे महा रा ज । सुरा गऊ के गो बर मंगा ये ढि कधर आंगन लि पा ये महा रा ज । ननदी जू आइ सां ति या धरा एँ खुसि यन नाँचनाँ दि खा ये महा रा ज । Page 46 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 शा दी की रस्मों के गी त भी बुंदेली लो क भा षा की शा न है । शा दी कि सी भी घर में हो रही है पर यह लो कगी त हर घर लि खी खुशि यां बढ़ा नेका कारण बनते हैं । भगवा न रा म की वि वा ह में तेल चढ़ा नेकी रस्म का एक सुंदर लो क गी त - 'सो आज मो रे रा म जू खों तेल चढत है । तेल चढ़त है , फुलेल चढ़त है । सो नेकटोरा में तेल भरा यो , सो हल्दी मि ला के कैसों झलकत है । सो आज ..... । कुँवा रि न नेमि ल तेल चढ़ा यों , सो नारी न मंगल गी त मढ़त है । सौ आज मो रे रा म जू खों लगुन चढ़त है । लगुन चढ़त है आनन्द बढ़त है । कानन कुंडल मो रे रा म जू खों सो हैं । सो गा लन बि च मो ति यन लर ” सरकत हैं । केसर खौ र मो रे रा म जू खों सो हैं । सो गर बि च गो प " जंजी र लसत हैं । कंकन चूरा मो रे रा म जू खों सो हैं सों हा तन * बि च गजरा दरसत हैं । रा म जू के दरशन खों जि यरा तरसत हैं । मों आज मो रे रा म जू खों लगुन चढ़त हैं । कै आज मो रे ...... इस प्रकार जनक जी के यहां दुल्हदु न ( बन्नी ) बनी सी ता जी की स्थि ति देखि ये । जब श्री रा म बा रा त लेकर रा जा जनक के द्वा र पर पहुंचहुं ते हैं उस समय का सुंदर चि त्र लो कगी तों के मा ध्यम से कि या गया है ।द्वा रचा र के समय यह गी त गा ये जा नेवा ला यह लो कगी त जो मंडप इत्या दि के वि षय का सुंदर उल्लेख कर रहा है - हरे बाँ स मंडप छा ये सि या जू को रा म ब्या हन आये । जब सि या जू की लि खत लगुनि या , रकम - रकम कागज आये । सि या जू को रा म ब्या हन आये । हरे बां स ………. Page 47 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 जब सि या जू को चढ़त चढ़ा ओं,ओं रकम रकम गहना आये । सि या जू को रा म ब्या हन आये । हरे बाँ स .. । जब सि या जू की परत भां वरे ब्रह्मा पंडि त बन आये । सि या जू को ..... जब सि या की हो त बि दा हैं सब सखि यन आँसू आये । सि या जू को रा म ...... हरे बाँ स मंडप छा ये , सि या जू को रा म ब्या हन आये । एक अन्य लो कगी त के मा ध्यम से वि वा ह का सुंदर चि त्र अत्यंत मनभा वन प्रती त हो रहा है । इसमें मंडप की सुंदरता , बा रा ति यों के द्वा रा चढ़ा वा , बां स का मंडप, मो ती के चौ क, सो नेके कलश इत्या दि का मनोहर वर्णन है - एक समय मुनि जी जा कहैं मो रे रंजन भौं राभौं रा । चलि ये जनकपुर गाँ व मंडप सि या रा म के, मन रंन भौ रा । काहे के मंडप मो रे रंजन भौं राभौं रा । काहे के दो ई खंभ जनक - मंडप तरें मौ रे रंजन भौं राभौं रा । हरे बां सबां मंडप बनेमो रे रंजन भौं राभौं रा । मलया गि र के खंभ भौ रे रंजना भौं राभौं रा । सो हत सी ता रा म जनक मंडप तरैं मो रे रंजन भौं राभौं रा । कारी घटा घनश्या म सि या है दा मि नी मो रें रंजन भौं राभौं रा । (मंडप के नीचे चढ़ा वा चढ़ा या जा रहा है अनगि नत अमूल्य रत्नों का ढेर , जि नकी गि नती नहीं की जा सकती हैं ) चली है बा रा त मंडवा तरें आई अब चढ़ा व की भई तया री ¨ । सुरहन गऊ के गो बर मँगा ये ढि गधर आँगन लि पा ये । गजमुति यन के चौ क पुरा ये, कंचन कलश उजि या र धरा ये । पा ट पी ता म्बर उल्लन - पल्लन " सो नेरूपे को पा र नौ " पा ओ । चढ़ो है चढ़ा व जनक सुख पा ओ भली भां ति कन्या पहि रा ओ । Page 48 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 ‘ज्यो नार’ (जेवनार) गी त वि वा ह के समय गा ए जा नेवा ले लो कगी तो में बुंदेली ज्यो नार गी त अत्यंत प्रसि द्ध हैं । ज्यो नार वि वा ह के समय खि ला ए जा नेभो जन की एक रस्म है जो आज हुई बुंदेली लो क में हर्ष के सा थ मनाई जा ती है । रा म जी को सी ता मैया की सखि यां भो जन करा रही हैं । कि सी सखी नेआलू ,कि सी नेपूरी , कि सी नेकचौ ड़ी , कि सी नेलड्डू, तो ,कि सी नेगुजि या और पेड़े परो से हैं - मो रे रा म से करो न ररि याँ " जनकपुर की सखि याँ उननेआतर परसी सो पा तर" परसी परस दई दुनिदुनियाँ । जनकपुर .... उननेरा मरस परसो , मि र्चा परसो , परत दई अमि यां । जनकपुर .... उननेआलू परसे, रता लू परसे, परस दई घुईयां । जनकपुर .... उननेपूड़ी परसी , कचौ ड़ी परसी , परस दई पुईयाँ । जनकपुर .... उननेलड्डू परसे, पेड़ा परसे, परस दई गुझि यां । जनकपुर … उसी समय एक मजा क हो गया । परो सनेवा ले नेबा रा ती पर दो ना गि रा दि ये जि ससे उसके कपड़े खरा ब हो गये - मा ड़े जो परसे झा बक झो ला " भर गई पा तर उलंग गये दौ ना । खाँ ड़ जो परसी मुठी बगरा ई, ऊपर घी की धा र लगा ई । मैली सी धो ती फैर धुआरहो " गरय " से सा जन फि र कहो पा ड़ों जेउँत - जेउँत बड़ी रुचि आई, बा र - बा र हरि करत बड़ा ई । कंकन खो लना - वि वा ह के पश्चा त दूल्हे के द्वा रा दुल्हदु न का कंगन खो ला जा ता है इस रस्म को बड़े हुए सुंदर ढंग से मनाया जा ता है ये रस्में दूल्हा दुल्हदु न के सा थ सा थ परि वा र के सभी सदस्य करी ब ले आती हैं - जो नै¨ हो वे धनुष को टो रबो , कठि न कंकन गाँ ठगाँ छो रबों । तुमनेजनक पुरी पग धा रे , शि व के धनुष टो र कै डा रे । Page 49 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 जो न हो वे मा री च को मा रि वों । कठि न कंकन को . जनकपुरी की नारी आखि र सा री ¨ लगें तुम्हा री । जि नको बि न हथया रन मा रि बों कठि न कंकन … वे तो जनकपुरी की नारी हाँ सी करें तुम्हारी । अब तो सी खों सि या को जो रबों । कठि न कंकन को छो रबो । वन गमन गी त - जब भगवा न रा म को अपनेपि ता के वचन की रक्षा के लि ए वन जा ना हो ता है तो मा ता सी ता और भा ई लक्ष्मण जी रा म जी के सा थ या त्रा पर चल पड़ते हैं । वन की या त्रा की गा ए जा ने वा ला एक बुंदेली लो कगी त जो उस समय की पति को मनोहरी ढंग से प्रकट करता है - कर घर तन को , चले सि या रा म लखन बन को । रा म लखन बन को चले , रहा अवध में न कोय हो रा म .. नर - नारी व्या कुल हो ई रो वे , धी र धरे न कोय । हो रा मा ..... । खुशी भई कैकई मइया को चले सि या रा म बन को । रा म लखन तपसी दूनो भइया सा धु बनेचले जा य मो रे ला ल । जां य . चलत - चलत सा धु बा गों में पहुंचेहुं चेमा लि न नेपूछी है बा त मो रेला ल । तनक तो छइयाँ बि लमा लों मो रे सा धू " गजरा पहर चले जा वें मो रेला ल । तुम्हरें छुयें गजरा ना पहि रें मा लि न , सा धु धरम घट जा य मो रेला ल । 'कि लपें¨ अवधपुरी नर नारी , कोमल जनक दुलादु लारी जूँ । जब मा ता सी ता वन गमन के समय चलते चलते अपनेलगते हैं तो मा ता लक्ष्मण से कहते हैं थो ड़ा धी रे चलो - धी रे चलों मैं हा री लक्ष्मन , धी रे चलो मैं हा री । एक तो हा री , दूजें सुकुमा री , ती जे मजल कीं मा री । लक्ष्मण धी रे ..... सँकरी गलि याँ काँटकाँ - कटीलें , फा टत हैं तन सा री Page 50 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 लक्ष्मण धी रे ... गैल " चलत मो य " प्या स लगत हैं , दूजे पवन प्रचा री । धी रे चलों मैं हा री लक्ष्मन , धी रे चलो मैं हा री । वट - पूजन गी त - 'नगर अजुध्या की गैल में इक महुआ इक आम । जे तरैं " बैठे दो जने" इक लक्ष्मन दूजे रा म । ली ली बछेरन "लक्ष्मन आइयो , रथ चढ़ " आओ श्री रा म । सा त संखि न के संग में बैठी सी ता सपरन " जा यें । बी च मि ले दो ऊ पा हुँनेसी ता रही सकुचा य । सपरखो र घर आई बा री सी ता भौ जी नेदये पलँग बि छा य । टेरों " जनक जू के नौवा बा रे लक्ष्मन को डेरा दुवादु वाव । कौशल्या मा ता श्री रा म जी के जनकपुरी से लौ टनेपर पूछती है कि बेटा तुम्हारे ससुरा ल कैसी है?है वहां सब कैसा है?है तुम्हारा आवभगत केसे की? और वहां के लो ग कैसे हैं?हैं रा म जी बता ते हैं कि ससुरा ल हमा री ती र्थ जैसी है । सा स-ससुर गंगा और यमुना की तरह है । रा त को दूध की बया री मेरी सा स देती थीं और सा ले हमें घुड़सवा री करा नेले जा ते थे । इस तरह रा म जी अपने ससुरा ल की बढ़ा ई अपनी मा ता से करते हैं - हँस - हँस पूछे मा त कौशि ल्या बेटा कैसी बनी ससुरा र सा स हमा री गंगा जमना ससुर है ती रथ धा म । सा स हमा री अधि कपि या री देती है दूध बि या री । सा रे " हमा रे घुड़ला फि रा वे सा रा जें तपें रसो ई । जैसी मा त मढ़ ” भी तर लि खीं पुतरि या बैसी है बहु तुमा र । 'नौ दस मा स बेटा गरभ में रा खें वरस दसक लौं सेये । ती न दि ना खों बेटा गये ससुरा रे सौं जा य सि रा ही ससुरा ल । 'दुहादुहाई खँचों पि ता दशरथ की अब न जैहों ससुरा ल । अपनेरा म जी सों रही 10 करत हों बेटा नि त उठ जैंओं ससुरा र । बुंदेलखंड में प्रचलि त गा री के गी त इसमें हंसीहं सी मजा क के मा ध्यम से नोकझों कझों का आनंद लि या जा ता है इनके उदा हरण इस प्रकार हैं - Page 51 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 चढ़ा वे का लो कगी त ( गा री ) - आज श्री सि या जू को चढ़त चढ़ा व । हरे मण्डप के नीचे जू ।। धन्य धन्य दशरथ नेऐसा समय पा व । सेन्दुरन्दु की माँ गमाँ शी श फूल पहि रा व हरे मण्डप ………. ती न खा य घा गरे में जरकसी भरा व । मुक्तन को सा री में झलक रयौ भा व हरे मण्डप ………. बिं दि या अजूब ति लक वेंदा छवि छा व । कंचन के करण फूल सा करें सजा ब हरे मण्डप ………. ठुसी बी च ही रन को जड़ौ है जड़ा व । देखो सरमा ला को उत्तम सजा ब हरे मण्डप ………. नौ लखा सुहा र हि य ऊपर लटकाव । पां वपां पो स और दसऊ आंगरौ चढ़ा व हरे मण्डप ………. दा स कहे देख - देख अधि क सुख पा व हरे मण्डप ………. इस प्रकार जनकपुर की सखी श्री रा म से नौकझौं कझौं कर रही हैं, हैंयहाँ के लो कगी त की झाँ की झाँ देखि ये । यह भी एक गा री गी त है - रघुवंशी सुनेजइयो गा री , ओसर नोनो बनो ।। महा रा जा को भो रे बनाय लये ।। ओसर नोनो …… अलवेली अवध पति नारी ।। ओसर नोनो . ।। संगै लई ना सेज गये ।। ओसर नोनो ।। कैसे जा ये ललनवा चा रि ।। ओसर ।। गो रि न के कारे काय भयै ।। ओसर . ।। रा जा झगरौ दि यो नि रबा र ।। ओसर ।। कै गुन्डा गढी में कूद गये ।। ओसर ।। कै कामें बनायो मा र ।। ओसर ।। अवलौ वि नीत बड़ैहि रयै ।। ओसर . ।। मि थि ला में भयो नि रधा र ।। ओसर नोनो बनो ।। Page 52 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 रा म जी की भक्ति के द्वा रा एक गी त कि सके द्वा रा रा म जी के गुणों का बखा न कि या गया है जो रा म जी की शरण में एक बा र आ जा ता है ईश्वरी के अनुसा र उन्हों नेन्हों सदैव अपनेभक्तों की रक्षा की है और सभी कष्टों से उसे मुक्त कि या है - जि नके रा मचन्द्र रखवा रे, को कर सकत दगा रे । बड़े भये प्रह्ला द पक्ष में, हि रना कुश को मा रे । रा ना जहर दऔं मी रा खों ,खों प्री तम प्रा न समा रे । मसकी जा य ग्रा ह की गरदन, गह गजरा ज नि कारे । 'ईसुर' प्रभु नेला ज बचा ई , सि रपै गि रत हमा रे । नि ष्कर्ष - रा मचंद्र जी के प्रति लो गों में व्या प्त प्रेम एवं समर्पण उनकी भक्ति का ही प्रति बिं ब है वहीं रा मचंद्र जी उनके जी वन का दर्पण । रा म जी पर आधा रि त बुंदेली लो कगी तों में हम सा फ-सा फ बुंदेली संस्कृति एवं परंपरा ओं का दर्शन कर सकते हैं अर्था त यह कहना अनुचि त नहीं हो गा कि इन बुंदेली लो कगी तों के द्वा रा हम बुंदेलखंड की लो क संस्कृति को आसा नी से समझ सकते हैं जो परंपरा गत अभी स्वयं को संरक्षि त कि ए हुए हैं । यह समझना कठि न है कि इन लो कगी त के कारण संस्कृति संरक्षि त है अथवा संस्कृति का यह प्रवा ह लो कगी त को संरक्षि त कि ए हुए है । सरल शब्दों में कहा जा ए तो लो कगी त ही कि सी भी संस्कृति की सबसे सटी क परि चा यक हो ते हैं । लो क सा हि त्य की दृष्टि से बुंदेली भा षा स्वयं अन्य संस्कृति यों के बजा य अधि क समृद्ध प्रती त हो ती है । यहां के लो ग गी तों से भी यही अभि व्यंजना हो ती है अर्था त यह कहना उचि त हो गा कि बुंदेली लो कगी तों के श्री रा म बुंदेली संस्कृति में प्रा ण समा न है जो यहां की संस्कृति और वैभव को स्वयं में समेटे हुए हैं । संदर्भ ग्रंथ - 1. https://vimisahitya.wordpress.com/tag/bundeli/ 2. बुंदेली भा षा सा हि त्य का इति हा स, डॉ क्टर रा म नारा यण शर्मा , वा णी प्रकाशन, नई दि ल्ली । 3. बुंदेली , आरती दुबेदु बे, सा हि त्य अकादमी , दि ल्ली । 4. www.Bundelijalak.com 5. बुन्देली बि बि धा , डॉ क्टर गंगा प्रसा द बरसेया , अयन प्रकाशन, नई दि ल्ली । 6. बुंदेलखंड समग्र, संपा दक हरि वि ष्णु अवस्थी , मा धवरा व सप्रे संग्रहा लय एवं शो ध संस्था न भो पा ल । Page 53