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शुक्रवार, 5 दिसंबर 2025

दिसंबर ५, सॉनेट, कबीर, जयललिता, हुर्रेमारा, अलंकार, अतिशयोक्ति, नवगीत, कचनार

 सलिल सृजन दिसंबर ५

*
सॉनेट
कबीर
*
ज्यों की त्यों चादर धर भाई
जिसने दी वह आएगा।
क्यों तैंने मैली कर दी है?
पूछे; क्या बतलायेगा?
काँकर-पाथर जोड़ बनाई
मस्जिद चढ़कर बांग दे।
पाथर पूज ईश कब मिलता?
नाहक रचता स्वांग रे!
दो पाटन के बीच न बचता
कोई सोच मत हो दुखी।
कीली लगा न किंचित पिसता
सत्य सीखकर हो सुखी।
फेंक, जोड़ मत; तभी अमीर
सत्य बोलता सदा कबीर।।
५-१२-२०२१
***
सॉनेट
भोर
*
भोर भई जागो रे भाई!
उठो न आलस करना।
कलरव करती चिड़िया आई।।
ईश-नमन कर हँसना।
खिड़की खोल, हवा का झोंका।
कमरे में आकर यह बोले।
चल बाहर हम घूमें थोड़ा।।
दाँत साफकर हल्का हो ले।।
लौट नहा कर, गोरस पी ले।
फिर कर ले कुछ देर पढ़ाई।
जी भर नए दिवस को जी ले।।
बाँटे अरुण विहँस अरुणाई।।
कोरोना से बचकर रहना।
पहन मुखौटा जैसे गहना।।
५-१२-२०२१
***
कचनार
हाँगकाँग का राष्ट्रीय, फूल बना कचनार।
बवासीर खाँसी दमा, हरकर दे उपहार।।
कचनार (काँचनार, कराली, बौहिनिया वेरिएगाटा) एक पर्णपाती वृक्ष है जिसमें विशिष्ट तितली के आकार के पत्ते और दिखावटी आर्किड जैसे फूल होते हैं। दक्षिण एशिया का मूल निवासी, यह वृक्ष १२ मीटर की ऊँचाई तक बढ़ता है, जिसमें फैला हुआ मुकुट और हरी-भूरी छाल होती है। इसके सफेद फ़ेद, पीले, लाल रंग के फूल, गुलाबी रंग की धारियों के साथ बेहद खूबसूरत दिखाई देते हैं। संस्कृत में कचनार शब्द का अर्थ है 'एक सुंदर चमकती हुई महिला', जो इस तरह के सुंदर वृक्ष के लिए एक उपयुक्त नाम है। इसे बगीचों और पार्कों में लगाया जाता है। फूलने पर इसका सौंदर्य देखने लायक होता है। दो-लोब वाली पत्तियों की विशेषता के कारण इस वृक्ष को इसका लैटिन नाम बौहिनिया मिला। इसकी पत्तियों के आकार के कारण इसे 'ऊँट के पैर का पेड़' भी कहा जाता है। कचनार मार्च-अप्रैल महीनों में फूलता है। मई-जून में इसकी फलियों में बीज पकते हैं जिन्हें इकट्ठा कर नए पौधे पाए जा सकते हैं। कचनार के पौधे में हेनट्रीकॉन्टेन, ऑक्टाकोसानॉल, साइटोस्टेरॉल और स्टिगमास्टरोल जैसे फाइटोकोन्स्टिट्यूएंट्स होते हैं जो पौधे की एंटीएलर्जिक गुणों में सहायक होते हैं। कचनार की दो प्रजातियाँ होती हैं। एक में सफेद कलर की पुष्प कालिकाएँ आती हैं जबकि दूसरी पर लाल रंग के फूल खिलते हैं। सर्दियों में यह पेड़ गुलाबी रंग के बहुत प्यारे प्यारे फूलों से लद जाता है। कचनार का पेड़ भारत, पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड, चीन, वियतनाम, कंबोडिया, लाओस, और इंडोनेशिया आदि देशों में पाया जाता है। भारत में विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, और ओडिशा राज्यों में अधिक पाया जाता है।
कचनार एंटीऑक्सीडेंट, एंटी-हेल्मिंटिक, एस्ट्रिंजेंट, एंटी-लेप्रोटिक, एंटी-डायबिटिक, एंटी-हाइपरग्लाइसेमिक और एंटी-माइक्रोबियल है। यह रक्त शर्करा स्तर को नियंत्रित करने में मदद कर मधुमेह (डायबिटीज) को प्रभावी रूप से प्रबंधित करने में मदद करते हैं। यह क्षय रोग, खाँसी, कफ में रामबाण औषधि का काम करता है। कचनार (बौहिनिया वेरिएगाटा) चयापचय में सुधार करस्टेम वजन घटाने में सहायक होता है। 'ग्रोथ हर्ब' के नाम से प्रसिद्ध कचनार घावों को ठीक कर नई कोशिकाओं के निर्माण को तेज करता है। आयुर्वेद के अनुसार कचनार-चूर्ण का गुनगुने पानी और शहद के साथ सेवन करें तो यह हाइपोथायरॉइड-प्रबंधन में मदद करता है। इस में त्रिदोष संतुलन और दीपन (क्षुधावर्धक) गुण होते हैं। अपने शीत और कसैले गुणों के कारण कचनार त्वचा की समस्याओं जैसे कि कील, मुँहासे आदि के इलाज में बहुत उपयोगी है। कचनार पौधे के यौगिक शरीर में इंसुलिन तंत्र को नियंत्रित कर बढ़ते रक्त शर्करा का स्तर कम करते हैं। मुँह में छाले, मसूड़े में कीड़े सहित जख्म या दुर्गंध हो तो दिन में तीन बार कचनार के पेड़ की छाल का काढ़ा बनाकर, छान कर गरारे करने से राहत मिलती है। कचनार की छाल को अच्छे से पीसकर बना चूर्ण रोज सुबह २ ग्राम पानी के साथ सेवन करने से पेट से संबंधित बीमारियों से भी राहत मिलती है। कचनार की पत्तियों का काढ़ा बनाकर पिएँ तो लिवर से संबंधित समस्याएँ, मधुमेह, रक्तचाप आदि नियंत्रित रहेगा। कचनार-चूर्ण शहद यागुनगुने पानी के साथ सेवन करें, तो उससे थायरायड का समाधान होता है।
कचनार का उपयोग हाइपोथायरायडिज्म के उपचार में किया जाता है। एक क्लासिकल आयुर्वेदिक पॉलीहर्बल औषधि 'कचनार गुग्गुल' हैत्वचा रोग, घाव, सूजन, पेचिश और अल्सर जैसी विभिन्न बीमारियों के इलाज में मदद करता है। यह फ्री रेडिकल्स से लड़ने में मदद करता है, इम्यूनिटी को बढ़ाता है, एंटी-इंफ्लेमेटरी गुणों के कारण सूजन कम करता है। आयुर्वेद के अनुसार, जब शहद के साथ मिलाया जाता है तो यह त्वचा के लिए एक क्लींजिंग एजेंट के रूप में काम कर खुजली, मुँहासे (पिंपल्स) आदि समस्याओं से राहत देता है। इसके कसैले गुणों के कारण त्वचा पर इसका कूलिंग प्रभाव पड़ता है। कचनार गुग्गुल गोली (टैबलेट) का उपयोग थायरॉयड डिसऑर्डर, पीसीओएस, सिस्ट, कैंसर, लिपोमा, फाइब्रॉएड, बाहरी और आंतरिक वृद्धि, त्वचा रोग आदि के लिए किया जाता है। कचनार अपने कषाय (कसैला) और सीत (ठंडा) स्वभाव के कारण प्रभावित क्षेत्र पर लगाने से दाँत दर्द कम करने में मदद करता है। यह बैक्टीरिया के विकास को भी रोकता है जो दाँत दर्द और मुँह से दुर्गंध का कारण बनते हैं। कचनार की पत्तियों में अल्सर रोधी गुण होते हैं और ये लीवर, किडनी की रक्षा करने के साथ ही जीवाणुरोधी गुण भी रखती हैं। मलेरिया बुखार में सिरदर्द से राहत पाने के लिए भारतीय लोग कचनार-पत्तियों के काढ़े का इस्तेमाल करते हैं।
दक्षिण भारत, सिक्किम, बंगाल, बिहार और ओडिशा में इसकी पत्तियों का उपयोग पीलिया के इलाज तथा पेट में घाव और ट्यूमर को ठीक करने के लिए किया जाता है।
संस्कृति और परंपरा: कचनार प्रेम और पर्वोल्लास का पर्याय है। इसके फूलों का उपयोग पारंपरिक समारोहों और सजावट में किया जाता है। कला, साहित्य और धार्मिक प्रतीकवाद में इस पेड़ का सांस्कृतिक महत्व है। बच्चों को इसकी दो खंडीय पत्तियाँ बहुत रोचक लगती हैं और वे इसे अपने खेलों में पुस्तक के रूप में प्रयोग करते हैं। यह पौधा हिंदुओं के लिए पवित्र है, दशहरा पर इसकी पूजा की जाती है। कचनार के सफेद फूलों का उपयोग धन की देवी लक्ष्मी और ज्ञान की देवी सरस्वती की पूजा के लिए किया जाता है। इसकी पत्तियों में १०-१६ प्रतिशत प्रोटीन होने के कारण टहनियों और फलियों का उपयोग पशुओं के चारे के रूप में किया जाता है। हिमाचल प्रदेश के लोकगीतों में कचनार का स्थान महत्वपूर्ण और कालजयी है।
कचनार के फूल को हांगकांग के झंडे और सिक्कों पर दर्शाया गया है।
पर्यावरणीय प्रभाव: यह पेड़ फलीदार परिवार से संबंधित है और राइजोबियम बैक्टीरिया के साथ सहजीवी संबंध में रहता है, जो वायुमंडलीय नाइट्रोजन को ठीक करने और मिट्टी की उर्वरता में सुधार करने में मदद करता है। आर्किड के पेड़ परागणकों के लिए उच्च मूल्य प्रदान करते हैं। लंबी पूँछ वाली स्किपर तितली के लिए मेजबान कचनार के फूल का रस अन्य तितलियों, मधुमक्खियों और पक्षियों सहित कई अन्य परागणकों को आकर्षित करता है। यह चिलाडेस पांडवा - प्लेन्स क्यूपिड के लिए लार्वा मेजबान पौधा है।
भोजन और पाककला में उपयोग : हल्के तीखे स्वाद के कचनार के फूल पारंपरिक व्यंजनों तथा सलाद, स्टर-फ्राई या अचार जैसे व्यंजनों में शामिल किए जाते हैं। झारखंड के आदिवासी समुदाय इस बहुउद्देशीय पेड़ के हर हिस्से का सेवन करते हैं। कचनार के फूल, फल और पत्ते खाने योग्य और पोषण का एक महत्वपूर्ण स्रोत होते हैं। भोजन के बारहमासी स्रोत पत्तियों को करी के रूप में, तलकर या उन्हें थोड़े से नमक के साथ उबालकर चावल के साथ खाया जा सकता है।
मुंडा जनजातीय समुदाय सूखी पत्तियों को कई तरीकों से पकाते हैं। वे इसे गर्म पानी में भिगोकर मिर्च, लहसुन या सूखी मछली या सूखे झींगे या बाँस के अंकुर के साथ चटनी बनाकर या पके हुए चावल के पानी में मसालों के साथ पकाकर भूनते हैं। पत्तियों के चूर्ण (पाउडर) को इडली और कचौरी में भी मिलाया जा सकता है। सूप, चीला और उत्तपम में भी ताज़ी पत्तियों को मिलाया है। इससे व्यंजनों का पोषण मूल्य बढ़ जाता है। उत्तर भारत और नेपाल में "कचनार की काली की सब्जी" बनाने के लिए नई कचनार कलियों का उपयोग किया जाता है। कचनार के फूल और कलियाँ कच्चे होने पर कड़वे लगते हैं। इसका उपयोग अचार में किया जाता है।
गुण - लघु (पचाने में हल्का), रूक्ष (सूखापन), रस (स्वाद) - कषाय (कसैला), विपाक (पाचन के बाद का प्रभाव) - कटु (तीखा), वीर्य - शीतल (शीत), प्रभाव (विशेष प्रभाव) - गंडमाला नशा - सर्वाइकल लिम्फैडेनाइटिस और सभी प्रकार की थायरॉयड जटिलताओं में उपयोगी। त्रिदोष पर प्रभाव - कफ और पित्त से राहत दिलाता है।सोफहारा - सूजन से राहत दिलाता है। स्वराहार - अस्थमा से राहत दिलाता है। रसायन - कायाकल्प। कृमिघ्न - कीड़ों के संक्रमण में उपयोगी। कंदुघ्न- खुजली से राहत दिलाता है।। विशघ्न - विषहरण में उपयोगी। वृनहारा - घावों में उपयोगी। कसहारा-खांसी से राहत दिलाता है। कचनार के एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण बवासीर के कारण होने वाली सूजन और दर्द को कम करने में मदद करते हैं। इससे मल का मार्ग आसान हो जाता है। कचनार की छाल शरीर में कफ दोष की समस्या को ठीक करने में मदद करती है। यह थायरॉयड से हार्मोन के स्तर के संतुलन में असंतुलन को ठीक करने में मदद करता है। ऐसा इसलिए क्योंकि कचनार शरीर से कफ को बाहर निकालने में मदद करती है। कचनार की छाल डाइजेस्टिव सिस्टम को बेहतर बनाने में मदद करती है, यह पेट की समस्याओं को दूर करती है। कचनार के कसैले गुणों का पाचन तंत्र पर ठंडा प्रभाव पड़ता है। कचनार कैंसर कोशिकाओं के विकास को धीमा कर देता है और इस प्रकार कैंसर को रोकता है। कचनार के अर्क में इंसुलिन जैसे केमिकल्स होते हैं जो शुगर लेवल को कम करने और कंट्रोल में लाने में मदद करते हैं। कचनार के फूल शरीर के अंदरुनी घाव को भरने में काफी कारगर होते हैं। कचनार के पेड़ की छाल का पाउडर मुंह में बैक्टीरिया और कीटाणुओं से लड़ने में मदद करता है। यह बैक्टीरिया को मारने और मुँह में पीएच संतुलन बहाल करने में बहुत प्रभावी है। यह मुँह को सांसों की दुर्गंध से प्राकृतिक रूप से मुक्त रखता है। कचनार के कड़वे फूल रक्त शोधक का काम करते हैं। यह महिलाओं के लिए बेहद फायदेमंद है क्योंकि यह पीरियड्स को कंट्रोल करने में मदद करता है। यह ब्लड को साफ करता है और इसलिए शरीर के अन्य आवश्यक अंग, जैसे लिवर को भी साफ करता है। कचनार के फूल खाँसी को ठीक करते हैं और अपने एंटी-बैक्टीरियल गुणों से श्वसन पथ को साफ करते हैं। इसकी कलियाँ व फूल सब्जी, पत्तियाँ पशुओं के चारे के और लकड़ी ईंधन (जलावन) के रूप में प्रयोग होती है। तासीर ठंडी होने के कारण इसे सुखाकर गर्मी में सब्जी, अचार, पकौड़े बनाते हैं। कचनार की कली और फूल वात,रक्त पित, फोड़े, फुंसियों से निजात दिलाती हैं। पहाड़ी गीतों में भी है कराली (कचनार) को पिरोया गया है। १९९३ में बने हिंदी चलचित्र 'वक्त हमारा है' में अक्षय कुमार व आयशा जुल्का पर गीत 'कच्ची कली कचनार की तोड़ी नहीं जाती' का फिल्मांकन है।
इस्तेमाल का तरीका
कचनार की छाल का चूर्ण ३-६ ग्राम,फूलों का रस १०-२० मिलीलीटर और छाल का काढ़ा ४०-८० मिलीलीटर की मात्रा में प्रयोग किया जाता है। इसकी छाल का महीन पिसा-छना चूर्ण ३-६ ग्राम (आधा से एक चम्मच) ठंडे पानी के साथ सुबह-शाम लेना लाभकारी होता है। इसका काढ़ा बनाकर भी सुबह-शाम ४-४ चम्मच मात्रा में (ठंडा करके) एक चम्मच शहद मिलाकर लेना फायदेमंद होता है।
- सूजन: कचनार की जड़ को पानी में घिसकर बनाया लेप गर्म कर सूजन वाली जगह पर लगाए, जल्दी ही आराम मिलेगा।
- मुँह के छाले: कचनार की छाल के काढ़े में थोड़ा-सा कत्था मिलाकार लगाएँ तुरंत आराम मिलता है और छाले जल्दी ठीक हो जाते हैं।
- बवासीर: कचनार की एक चम्मच छाल को एक कप मट्ठा (छाछ) के साथ दिन में ३ बार सेवन करने से बवासीर में खून गिरना बंद हो जाएगा। कचनार की कलियों के पाउडर को मक्खन और शक्कर मिलाकर ११ दिन खाने से पेट के कीड़े साफ हो जाते हैं।
- भूख न लगना: कचनार की फूल की कलियाँ घी में भूनकर सुबह-शाम खाएँ, भूख बढ़ जाएगी।
- वायु( गैस) विकार: कचनार की छाल का काढ़ा बनाकर, इसके २० मिलीलीटर काढ़े में आधा चम्मच पिसी अजवायन मिलाकर नियमित रूप से सुबह-शाम भोजन करने बाद पिएं, पेट फूलने की समस्या और गैस की तकलीफ दूर होती है।
-खांसी-दमा : शहद के साथ कचनार की छाल का काढ़ा २ चम्मच, दिन में ३ बार सेवन करने से खाँसी और दमा में आराम मिलता है।
- दांतों का दर्द: कचनार के पेड़ की छाल जलाकर उसकी राख से सुबह एवं रात को खाना खाने के बाद मंजन करने से दाँत-दर्द तथा मसूढ़ों से खून निकलना बंद होता है। इसकी छाल को उबालने के बाद ५०-५० मिलीलीटर गर्म पसनी से रोजाना ३-४ बार कुल्ला करें, दांतों का हिलना, दर्द, खून निकलना, मसूढों की सूजन और पायरिया खत्म हो जाता है।
- कब्ज: कचनार के फूलों को चीनी के साथ घोटकर शर्बत की तरह बनाकर सुबह-शाम पीने से कब्ज दूर होती है और पेट साफ रहता है। कचनार के फूलों का गुलकन्द रात में सोने से पहले २ चम्मच की मात्रा में कुछ दिनों तक सेवन करने से कब्ज दूर होती है।
- कैंसर: कचनार की छाल का काढ़ा बनाकर पीने से पेट का कैंसर ठीक होता है।
- दस्त: कचनार की छाल का काढ़ा दिन में २ बार पीने से दस्त रोग में ठीक होता है।
- पेशाब के साथ खून आना: कचनार के फूलों का काढ़ा बनाकर सुबह-शाम पीने से पेशाब में खून का आना बंद होता है। इसके सेवन से रक्त प्रदर एवं रक्तस्राव आदि भी ठीक होता है।
- बवासीर: कचनार की छाल का ३ ग्राम चूर्णएक गिलास छाछ के साथ प्रति दिन सुबह-शाम पीने से बवासीर एवं खूनी बवासीर में लाभ मिलता है। कचनार का ५ ग्राम चूर्ण प्रतिदिन सुबह पानी के साथ खाने से बवासीर ठीक होता है।
- खूनी दस्त: कचनार के फूल का काढ़ा सुबह-शाम पीने से खूनी दस्त (रक्तातिसार) में जल्दी लाभ मिलता है।
- कुबड़ापन: पीठ के नीचे कचनार का फूल बिछाकर सुलाने से, लगभग १ ग्राम का चौथाई भाग कचनार और गुग्गुल को शहद के साथ मिलाकर सेवन करने व कचनार का काढ़ा पीने से कुबड़ापन दूर होता है।
- घाव: कचनार की छाल का काढ़ा बनाकर सुबह-शाम पीने से घाव ठीक होता है। इसके काढ़े से घाव को धोना भी चाहिए।
- स्तन-गाँठ: कचनार की छाल पीसकर बना चूर्ण आधे ग्राम की मात्रा में सौंठ और चावल के पानी (धोवन) के साथ मिलाकर पीने और स्तनों पर लेप करने से गाँठ ठीक होती है।
- थायराइड: कचनार के फूल थायराइड की सबसे अच्छी दवा हैं। लिवर में किसी भी तरह की तकलीफ हो तो कचनार की जड़ का काढ़ा पीना बेहद लाभकारी होता है।
ध्यान रखें-
कचनार देर से हजम होती है और इसका सेवन करने से कब्ज हो सकता है। इसलिए जब तक कचनार का सेवन करें, तब तक पपीता खाएँ।
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दोहांजलि
*
जयललिता-लालित्य को
भूल सकेगा कौन?
शून्य एक उपजा,
भरे कौन?
छा गया मौन.
*
जननेत्री थीं लोकप्रिय,
अभिनेत्री संपूर्ण.
जयललिता
सौन्दर्य की
मूर्ति, शिष्ट-शालीन.
*
दीन जनों को राहतें,
दीं
जन-धन से खूब
समर्थकी जयकार में
हँसीं हमेशा डूब
*
भारी रहीं विपक्ष पर,
समर्थकों की इष्ट
स्वामिभक्ति
पाली प्रबल
भोगें शेष अनिष्ट
*
कर विपदा का सामना
पाई विजय विशेष
अंकित हैं
इतिहास में
'सलिल' न संशय लेश
***
दो द्विपदियाँ - दो स्थितियाँ
*
साथ थे तन न मन 'सलिल' पल भर
शेष शैया पे करवटें कितनी
*
संग थे तुम नहीं रहे पल भर
हैं मगर मन में चाहतें कितनी
***
दोहा सलिला-
कवि-कविता
*
जन कवि जन की बात को, करता है अभिव्यक्त
सुख-दुःख से जुड़ता रहे, शुभ में हो अनुरक्त
*
हो न लोक को पीर यह, जिस कवि का हो साध्य
घाघ-वृंद सम लोक कवि, रीति-नीति आराध्य
*
राग तजे वैराग को, भक्ति-भाव से जोड़
सूर-कबीरा भक्त कवि, दें समाज को मोड़
*
आल्हा-रासो रच किया, कलम-पराक्रम खूब
कविपुंगव बलिदान के, रंग गए थे डूब
*
जिसके मन को मोहती, थी पायल-झंकार
श्रंगारी कवि पर गया, देश-काल बलिहार
*
हँसा-हँसाकर भुलाई, जिसने युग की पीर
मंचों पर ताली मिली, वह हो गया अमीर
*
पीर-दर्द को शब्द दे, भर नयनों में नीर
जो कवि वह होता अमर, कविता बने नज़ीर
*
बच्चन, सुमन, नवीन से, कवि लूटें हर मंच
कविता-प्रस्तुति सौ टका, रही हमेशा टंच
*
महीयसी की श्रेष्ठता, निर्विवाद लें मान
प्रस्तुति गहन गंभीर थी, थीं न मंच की जान
*
काका की कविता सकी, हँसा हमें तत्काल
कथ्य-छंद की भूल पर, हुआ न किन्तु बवाल
*
समय-समय की बात है, समय-समय के लोग
सतहीपन का लग गया, मित्र आजकल रोग
५.१२.२०१६
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देवी दंतेश्वरी के दामाद - हुर्रेमारा
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            दंतेश्वरी देवी और आदिवासी संयोजन की अनेक कहानियों में से एक है उनके दामाद हुर्रेमारा की। आदिवासी मान्यतायें न केवल उन्हें अपने परिवार के स्तर तक जोड़ती हैं अपितु वे देवी के भी बेटे-बेटियों, नाती-पोतों की पूरी दुनिया स्थापित कर देते हैं। देवी के ये परिजन आपस में लड़ते-झगड़ते भी हैं तथा प्रेम-मनुहार भी करते हैं।
            कहते हैं देवी दंतेश्वरी की पुत्री मावोलिंगो को देख कर जनजातीय देव हुर्रेमारा आसक्त हो गए। उन्होंने मावोलिंगो से अपना प्रेम व्यक्त किया। यह प्यार अपनी परिणति तक पहुँचता इससे पहले ही लड़की की माँ अर्थात देवी दंतेश्वरी को इसकी जानकारी मिल गई और उन्होंने अपनी असहमति व्यक्त कर दी। हुर्रेमारा भी कोई साधारण देव तो थे नहीं, उन्होंने कुछ समय तक प्रयास किया कि दंतेश्वरी मान जाएँ और अपनी पुत्री से उनके विवाह को स्वीकारोक्ति प्रदान कर दें। बात न बनते देख वे क्रोधित हो गए। उन्होंने अपनी बात मनवाने की जिद में शंखिनी-डंकिनी नदियों के पानी को ही संगम के निकट रोक दिया। अब जलस्तर बढ़ने लगा और धीरे धीरे देवी दंतेश्वरी का मंदिर डूब जाने की स्थिति निर्मित हो गई। दंतेश्वरी को हार कर हुर्रेमारा की जिद माननी पड़ी। उनकी पुत्री मावोलिंगो से हुर्रेमारा का विवाह सम्पन्न हो गया।
            दामाद हुर्रेमारा जब ससुराल पहुँचे तो उनके अपने ही नखरे थे, तुनक मुजाज हुर्रेमारा हर रोज नई माँग रखते, अपने स्वागत की नई-नई अपेक्षाएँ प्रदर्शित करते और किसी न किसी बात पर झगड़ लेते। एक दिन सास-दामाद अर्थात दंतेश्वरी और हुर्रेमारा में ऐसी बिगड़ी कि दोनों ने एक दूसरे से मिलना बंद कर दिया। यद्यपि देवी के स्थान में हुर्रेमारा की और हुर्रेमारा के स्थान में देवी दंतेश्वरी की विशेष व्यवस्था की जाती है। दंतेवाड़ा से कुछ ही दूर भांसी गाँव के पास एक पहाड़ी तलहटी में हुर्रेमारा का स्थान है जहाँ वे अपनी पत्नी मावोलिंगो व अपने एक पुत्र के साथ रह रहे हैं। इस देव परिवार की अनेक संततियाँ हैं जो निकटस्थ अनेक गाँवों में निवासरत हैं और वहाँ के निवासियों द्वारा सम्मान पाती हैं।
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अलंकार सलिला ३९
अतिशयोक्ति सीमा हनें
*
जब सीमा को तोड़कर, होते सीमाहीन
अतिशयोक्ति तब जनमती, सुनिए दीन-अदीन..
बढा-चढ़ाकर जब कहें, बातें सीमा तोड़.
अतिशयोक्ति तब जानिए, सारी शंका छोड़..
जहाँ लोक-सीमा का अतिक्रमण करते हुए किसी बात को अत्यधिक बढा-चढाकर कहा गया हो, वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है।
जहाँ पर प्रस्तुत या उपमेय को बढा-चढाकर शब्दांकित किया जाये वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है।
उदाहरण:
१. परवल पाक, फाट हिय गोहूँ।
यहाँ प्रसिद्ध कवि मालिक मोहम्मद जायसी ने नायिका नागमती के विरह का वर्णन करते हुए कहा है कि उसके विरह के ताप के कारण परवल पक गये तथा गेहूँ का ह्रदय फट गया।
२. मैं तो राम विरह की मारी, मोरी मुंदरी हो गयी कँगना।
इन पंक्तियों में श्री राम के विरह में दुर्बल सीताजी की अँगूठी कंगन हो जाने का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन है।
३. ऐसे बेहाल बेबाइन सों, पग कंटक-जल लगे पुनि जोये।
हाय! महादुख पायो सखा, तुम आये न इतै कितै दिन खोये।।
देखि सुदामा की दीन दसा, करुना करि के करुनानिधि रोये।
पानी परात को हाथ छुओ नहिं, नैनन के जल सौं पग धोये।।
४. बूँद-बूँद मँह जानहू।
५. कहुकी-कहुकी जस कोइलि रोई।
६. रकत आँसु घुंघुची बन बोई।
७. कुंजा गुन्जि करहिं पिऊ पीऊ।
८. तेहि दुःख भये परास निपाते।
९. हनुमान की पूँछ में, लगन न पाई आग।
लंका सारी जल गयी, गए निसाचर भाग।। -तुलसी
१०. देख लो साकेत नगरी है यही।
स्वर्ग से मिलने गगन को जा रही।। -मैथिलीशरण गुप्त
११. प्रिय-प्रवास की बात चलत ही, सूखी गया तिय कोमल गात।
१२. दसन जोति बरनी नहिं जाई. चौंधे दिष्टि देखि चमकाई.
१३. आगे नदिया पडी अपार, घोड़ा कैसे उतरे पार।
राणा ने सोचा इस पार, तब तक था चेतक उस पार।।
१४. भूषण भनत नाद विहद नगारन के, नदी नाद मद गैबरन के रलत है।
१५. ये दुनिया भर के झगडे, घर के किस्से, काम की बातें।
बला हर एक टल जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ।। -जावेद अख्तर
१६. मैं रोया परदेस में, भीगा माँ का प्यार।
दुःख ने दुःख से बात की, बिन चिट्ठी बिन तार।। -निदा फाज़ली
अतिशयोक्ति अलंकार के निम्न ८ प्रकार (भेद) हैं।
१. संबंधातिशयोक्ति-
जब दो वस्तुओं में संबंध न होने पर भी संबंध दिखाया जाए अथवा जब अयोग्यता में योग्यता प्रदर्शित की जाए तब संबंधातिशयोक्ति अलंकार होता है।
उदाहरण-
१. फबि फहरहिं अति उच्च निसाना।
जिन्ह मँह अटकहिं बिबुध बिमाना।।
फबि = शोभा देना, निसाना = ध्वज, बिबुध = देवता।
यहाँ झंडे और विमानों में अटकने का संबंध न होने पर भी बताया गया है।
२. पँखुरी लगे गुलाब की, परिहै गात खरोंच
गुलाब की पँखुरी और गात में खरोंच का संबंध न होने पर भी बता दिया गया है।
३. भूलि गयो भोज, बलि विक्रम बिसर गए, जाके आगे और तन दौरत न दीदे हैं।
राजा-राइ राने, उमराइ उनमाने उन, माने निज गुन के गरब गिरबी दे हैं।।
सुजस बजाज जाके सौदागर सुकबि, चलेई आवै दसहूँ दिशान ते उनींदे हैं।
भोगी लाल भूप लाख पाखर ले बलैया जिन, लाखन खरचि रूचि आखर ख़रीदे हैं।।
यहाँ भुला देने अयोग्य भोग आदि भोगीलाल के आगे भुला देने योग्य ठहराये गये हैं।
४. जटित जवाहर सौ दोहरे देवानखाने, दूज्जा छति आँगन हौज सर फेरे के।
करी औ किवार देवदारु के लगाए लखो, लह्यो है सुदामा फल हरि फल हेरे के।।
पल में महल बिस्व करमै तयार कीन्हों, कहै रघुनाथ कइयो योजन के घेरे में।
अति ही बुलंद जहाँ चंद मे ते अमी चारु चूसत चकोर बैठे ऊपर मुंडेरे के।।
५. आपुन के बिछुरे मनमोहन बीती अबै घरी एक कि द्वै है।
ऐसी दसा इतने भई रघुनाथ सुने भय ते मन भ्वै है।।
गोपिन के अँसुवान को सागर बाढ़त जात मनो नभ छ्वै है।
बात कहा कहिए ब्रज की अब बूड़ोई व्है है कि बूडत व्है हैं।।
२. असम्बन्धातिशयोक्ति-
जब दो वस्तुओं में संबंध होने पर भी संबंध न दिखाया जाए अथवा जब योग्यता में अयोग्यता प्रदर्शित की जाए तब असंबंधातिशयोक्ति अलंकार होता है।
उदाहरण-
१. जेहि वर वाजि राम असवारा। तेहि सारदा न बरनै पारा।।
वाजि = घोडा, न बरनै पारा = वर्णन नहीं कर सकीं।
२. अति सुन्दर लखि सिय! मुख तेरो। आदर हम न करहिं ससि केरो।।
करो = का। चन्द्रमा में मुख- सौदर्य की समानता के योग्यता होने पर भी अस्वीकार गया है।
३. देखि गति भासन ते शासन न मानै सखी
कहिबै को चहत गहत गरो परि जाय
कौन भाँति उनको संदेशो आवै रघुनाथ
आइबे को न यो न उपाय कछू करि जाय
विरह विथा की बात लिख्यो जब चाहे तब
ऐसे दशा होति आँच आखर में भरि जाय
हरि जाय चेत चित्त सूखि स्याही छरि जाय
३. चपलातिशयोक्ति-
जब कारण के होते ही तुरंत कार्य हो जाए।
उदाहरण-
१. तव सिव तीसर नैन उघारा। चितवत काम भयऊ जरि छारा।।
शिव के नेत्र खुलते ही कामदेव जलकर राख हो गया।
२. आयो-आयो सुनत ही सिव सरजा तव नाँव।
बैरि नारि दृग जलन सौं बूडिजात अरिगाँव।।
४. अक्रमातिशयोक्ति-
जब कारण और कार्य एक साथ हों।
उदाहरण-
१. बाणन के साथ छूटे प्राण दनुजन के।
सामान्यत: बाण छूटने और लगने के बाद प्राण निकालेंगे पर यहाँ दोनों क्रियाएं एक साथ होना बताया गया है।
२. पाँव के धरत, अति भार के परत, भयो एक ही परत, मिली सपत पताल को।
३. सन्ध्यानों प्रभु विशिख कराला, उठी उदधि उर अंतर ज्वाला।
४. क्षण भर उसे संधानने में वे यथा शोभित हुए।
है भाल नेत्र जवाल हर, ज्यों छोड़ते शोभित हुए।।
वह शर इधर गांडीव गुण से भिन्न जैसे ही हुआ।
धड से जयद्रथ का उधर सिर छिन्न वैसे ही हुआ।।
५. अत्यंतातिशयोक्ति-
जब कारण के पहले ही कार्य संपन्न हो जाए।
उदाहरण:
१. हनूमान की पूँछ में, लगन न पाई आग।
लंका सगरी जर गयी, गये निसाचर भाग।।
२. धूमधाम ऐसी रामचद्र-वीरता की मची, लछि राम रावन सरोश सरकस तें।
बैरी मिले गरद मरोरत कमान गोसे, पीछे काढ़े बाण तेजमान तरकस तें।।
६. भेदकातिशयोक्ति-
जहाँ उपमेय या प्रस्तुत का अन्यत्व वर्णन किया जाए, अभेद में भी भेद दिखाया जाए अथवा जब और ही, निराला, न्यारा, अनोखा आदि शब्दों का प्रयोग कर किसी की अत्यधिक या अतिरेकी प्रशंसा की जाए।
उदाहरण-
१. न्यारी रीति भूतल, निहारी सिवराज की।
२. औरे कछु चितवनि चलनि, औरे मृदु मुसकान।
औरे कछु सुख देत हैं, सकें न नैन बखान।।
अनियारे दीरघ दृगनि, किती न तरुनि समान।
वह चितवन औरे कछू, जेहि बस होत सुजान।।
७. रूपकातिशयोक्ति-
उदाहरण-
१. जब केवल उपमान या अप्रस्तुत का कथन कर उसी से उपमेय या प्रस्तुत का बोध कराया जाए अथवा उपमेय का लोप कर उपमान मात्र का कथा किया जाए अर्थात उपमान से ही अपमान का भी अर्थ अभीष्ट हो तब रूपकातिशयोक्ति होता है। रूपकातिशयोक्ति का अधिक विक्सित और रूढ़ रूप प्रतिक योजना है।
उदाहरण-
१. कनकलता पर चंद्रमा, धरे धनुष दो बान।
कनकलता = स्वर्ण जैसी आभामय शरीर, चंद्रमा = मुख, धनुष = भ्रकुटी, बाण = नेत्र, कटाक्षकनकलता यहाँ नायिका के सौन्दर्य का वर्णन है। शरीर, मुख, भ्रकुटी, कटाक्ष आदि उप्मेयों का लोप कर केवल लता, चन्द्र, धनुष, बाण आदि का कथन किया गया है किन्तु प्रसंग से अर्थ ज्ञात हो जाता है।
२. गुरुदेव! देखो तो नया यह सिंह सोते से जगा।
यहाँ उपमेय अभिमानु का उल्लेख न कर उपमान सिंह मात्र का उल्लेख है जिससे अर्थ ग्रहण किया जा सकता है।
३.विद्रुम सीपी संपुट में, मोती के दाने कैसे।
है हंस न शुक यह फिर क्यों, चुगने को मुक्त ऐसे।।
४. पन्नग पंकज मुख गाहे, खंजन तहाँ बईठ।
छत्र सिंहासन राजधन, ताकहँ होइ जू दीठ।।
८. सापन्हवातिशयोक्ति-
यह अपन्हुति और रूपकातिशयोक्ति का सम्मिलित रूप है। जहाँ रूपकातिशयोक्ति प्रतिषेधगर्भित रूप में आती है वहाँ सापन्हवातिशयोक्ति होता है।
उदाहरण-
१. अली कमल तेरे तनहिं, सर में कहत अयान।
यहाँ सर में कमल का निषेध कर उन्हें मुख और नेत्र के रूप में केवल उपमान द्वारा शरीर में वर्णित किया गया है।
टिप्पणी: उक्त ३, ४, ५ अर्थात चपलातिशयोक्ति, अक्रमातिशयोक्ति तथा अत्यंतातिशयोक्ति का भेद कारण के आधार पर होने के कारण कुछ विद्वान् इन्हें कारणातिशयोक्ति के भेद-रूप में वर्णित करते हैं।
***
***
गीत -
*
महाकाल के पूजक हैं हम
पाश काल के नहीं सुहाते
नहीं समय-असमय की चिंता
कब विलंब से हम घबराते?
*
खुद की ओर उठीं त्रै ऊँगली
अनदेखी ही रहीं हमेशा
एक उठी जो औरों पर ही
देख उसी को ख़ुशी मनाते
*
कथनी-करनी एक न करते
द्वैत हमारी श्वासों में है
प्यासों की कतार में आगे
आसों पर कब रोक लगाते?
*
अपनी दोनों आँख फोड़ लें
अगर तुम्हें काना कर पायें
संसद में आचरण दुरंगा
हो निलज्ज हम रहे दिखाते
*
आम आदमी की ताकत ही
रखे देश को ज़िंदा अब तक
नेता अफसर सेठ बेचकर
वरना भारत भी खा जाते
५.१२.२०१५
***
नवगीत :
*
या तो वो देता नहीं
या देता छप्पर फाड़ के
*
मर्जी हो तो पंगु को
गिरि पर देता है चढ़ा
अंधे को देता दिखा
निर्धन को कर दे धनी
भक्तों को लेता बचा
वो खुले-आम, बिन आड़ के
या तो वो देता नहीं
या देता छप्पर फाड़ के
*
पानी बिन सूखा कहीं
पानी-पानी है कहीं
उसका कुछ सानी नहीं
रहे न कुछ उससे छिपा
मनमानी करता सदा
फिर पत्ते चलता ताड़ के
या तो वो देता नहीं
या देता छप्पर फाड़ के
*
अपनी बीबी छुड़ाने
औरों को देता लड़ा
और कभी बंसी बजा
करता डेटिंग रास कह
चने फोड़ता हो सलिल
ज्यों भड़भूंजा भाड़ बिन
या तो वो देता नहीं
या देता छप्पर फाड़ के
३-१२-२०१५
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गुरुवार, 4 दिसंबर 2025

पुरोवाक्, समीक्षा, मनीषा सहाय, सुरेन्द्र नाथ सक्सेना

पुरोवाक्
''विष-बाण'' देशभक्ति भावधारा का प्राण 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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            भारत के जन-जीवन, संस्कृति और सभ्यता में राष्ट्र को देवता माना गया है। विश्व गुरु भारत में देश को 'माँ' कहा गया है जबकि शेष अधिकांश देशों में 'पिता' माना गया है। माँ के गर्भधारण के साथ एक शिशु 'माँ' से जुड़ जाता है और माँ की हर अनुभूति को खुद भी अनुभव करता है जबकि पिता के साथ जुड़ाव जन्म लेने के पश्चात ही हो पाता है। भारत की संतानों का भारत 'माँ' के साथ ऐसा ही अभिन्न जुड़ाव होना स्वाभाविक है। माँ संकट में हो तो संतान उसकी पीड़ा दूर करने के जी-जान से प्रयास करता है, यहाँ तक की खुद अपनी जान हथेली पर लेकर माँ के श्री चरणों पर अर्पित कर देता है। भारत माँ की आन-बान-शान, महिमा, गौरव, सौंदर्य आदि तथा उस पर कुर्बान होनेवाले रण-बाँकुरे पुत्रों-पुत्रियों का गौरव गान करने की सनातन परंपरा भारत में रही है। 
            
            मानव सभ्यता के जन्म के साथ ही जन्म-भूमि से जुड़ाव और जन्म भूमि की रक्षा के लिए संघर्ष करने की प्रवृत्ति की भावधारा निरंतर विकसित होती रही है। भाषा के व्याकरण, पिंगल और लिपि के विकास के पूर्व से लोक में 'मातृ-देवता' और 'मातृ-भूमि' की संकल्पना रही है। 'पंच मातृकाओं', सप्त मातृकाओं की अवधारणा पहले लोक में ही विकसित हुई। 'माँ' से शिशु पोषित होता है इसलिए मनुष्य के पोषण के लिए जिन तत्वों को अपरिहार्य पाया गया, उन सबको लोक ने मातृवत ही नहीं मातृ  ही माँ लिया। इसीलिए लोक में जन्मदात्री, धाय, विमाता, धरती, गौ, नदी, वाक् अथवा वाग्देवी, समृद्धिदात्री लक्ष्मी, शक्तिदात्री शिवा आदि को माता कहा गया। मातृ-भाव का विकास अनिष्टकारिणी शक्तियों तक हुआ और शीतल माता आदि के रूप में महामारियों को भी माता मानकर पूजा गया ताकि में संतान के प्रति ममत्व भाव रखकर अनिष्ट न करें। इस चिंतन-धारा ने आपात-काल में मानव को धैर्य, सहिष्णुता, सद्भाव और सहयोग भाव के साथ मिलकर जूझने और उबरने का सामर्थ्य दिया जबकि कोरोना काल में इस भाव की अनुपस्थिति ने जन सामान्य को कातर, असहाय और भीरु बना दिया। लोक ने मातृभूमि के प्रति आभार व्यक्त करते हुए लोक काव्य में राष्ट्रीय भावधारा को सतत विकसित और समृद्ध किया। लोक काव्य  सीधे जनता से जुड़ता है और राष्ट्रीय चेतना, प्रेम, बलिदान और गौरव की भावना को सरल और प्रभावी ढंग से व्यक्त करता है। 

            भाषा और नागर सभ्यता के विकास के साथ लोक में पली-बढ़ी राष्ट्रीय काव्य-धारा का व्यवस्थित विकास एक महत्वपूर्ण साहित्यिक और ऐतिहासिक प्रक्रिया रही है जो विविध कालों में भारत भूमि पर विदेशी आक्रमणों के समय देशवासियों के मनोबल बढ़ाने, शौर्य जगाने और आत्माहुति हेतु तत्पर युवाओं को संघर्ष करने हेतु आत्म-बल दे सकी। आधुनिक काल में भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान राष्ट्रीय काव्य-धाराअपने चरम पर पहुँची । इस भावधारा ने कवियों को देश प्रेम, सांस्कृतिक गौरव, बलिदान और एकता की भावना को अपनी रचनाओं के माध्यम से व्यक्त करने के लिए प्रेरित किया। इस राष्ट्रीय भावधारा की मुख्य विशेषताएँ देश प्रेम और बलिदान भाव, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक गौरव गान, भारत के गौरवशाली इतिहास और वीर योद्धाओं का गुणगान, जनजागरण और एकतापरक जनगान और आह्वान गीत, आक्रान्ताओं-आतंकियों तथा साम्राज्यवाद विरोधी तथा आदर्शवाद रहे हैं। भारत के दार्शनिक ऋषि-मुनियों ने देश हेतु संघर्षरत योद्धाओं को 'सुर', 'देव' आदि तथा आक्रमणकारियों को 'असुर', 'दैत्य' आदि के रूप में चित्रित किया। असुरों की संहारिणी शक्ति को मातृ-शक्ति के रूप में निरंतर पूजा गया। 

            हिंदी के विकास के साथ राष्ट्रीय भावधारापरक साहित्य सृजन की उदात्त परंपरा सतत पुष्ट होती गई। आदिकाल को वीरगाथाओं के विपुल सृजन के कारण 'वीरगाथा काल' के रूप में नामित किया गया। भक्ति काल में न्याय के पक्ष में संघर्षरत स्थानीय शक्तियों को देव और अन्याय कर रही शक्तियों को राक्षस कहते हुए देवों के पराक्रम और शौर्य का गायन किया गया। सम-सामयिक आक्रान्ताओं के नाश हेतु दैवीय शक्तियों से याचना-प्रार्थना आदि के रूप में राष्ट्रीय-काव्य का नव रूप सामने आया। शिव, दुर्गा, राम और कृष्ण भक्ति काल में राष्ट्रीय नायकों के रूप में अपने भक्तों सहित पूजित हुए। रीतिकाल में कला और शृंगार की प्रधानता होते हुए भी रानी दुर्गावती, राणा प्रताप, चाँद बीबी, छत्रपति शिवाजी, छत्रसाल बुंदेला आदि के संघर्ष और त्याग-बलिदान का गुणगान, आक्रांता यवनों के अत्याचारों का विरोध आदि के रूप राष्ट्रीय काव्यधारा भी पुष्ट होती रही। अंग्रेज शासन-काल में उसने जूझनेवाले बुंदेला क्रांतिकारी, रानी लक्ष्मीबाई, गोड़ राजा शंकरशाह व उनके पुत्र रघुनाथ शाह, कुँवर सिंह, नाना साहब, तात्या टोपे, क्रांतिकारी भगवती चरण वोहरा व उनकी पत्नी दुर्गा भाभी, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, रास बिहारी बोस, सुभाष चंद्र बोस आदि तथा उनके वीरोचित कार्य राष्ट्रीय काव्य धारा के केंद्र में रहे। स्वाधीनता हेतु संघर्षरत अहिंसक राष्ट्र नायकों भीखाजी कामा, लाल-बाल-पाल, राजा, राम मोहन राय, म. गाँधी, सरोजिनी नायडू, जवाहर लाल नेहरू, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, महर्षि अरविंद घोष, मौलाना आजाद आदि, सत्याग्रह आंदोलनों आदि को केंद्र में रखकर राष्ट्रीय काव्यधारा समय साक्षी हुई।

            स्वतंत्रता पश्चात हिंदी काव्य में राष्ट्रीय चेतना सतत विकसित होती रही। भारत माता, तिरंगा, क्रांतिकारियों, शहीदों सत्याग्राहियों, राष्ट्र निर्माताओं व सेनाओं का गौरव-गान, जनाकांक्षाओं व लोकमत की अभिव्यक्ति, नए तीर्थों (बाँध, कारखानों आदि), कृषि, राष्ट्रीय प्रतीकों-भाषाओं आदि का महिमा गायन, राष्ट्र के नव निर्माण हेतु आह्वान गान, जनगीत आदि आयाम राष्ट्रीय चेतना के पर्याय बनते गए। विडंबन है कि अपनी उदार व सर्व समावेशी नीति के बाद भी भारत को पड़ोसियों की कुदृष्टि का शिकार होकर आक्रमणों का सामना करने की विवशतावश हथियार थमने पड़े। इस स्थिति में आक्रामकों की निंदा, राष्ट्रीय अस्मिता की रक्ष हेतु जन जागरूकता, सैनिकों की कीर्ति-कथा गायन आदि भी राष्ट्रीय चेतना के अंग हो गए। चीन तथा पाकिस्तान के हमलों के विरोध में देश का है साहित्यकार सेनाओं के मनोबल बढ़ाने, जन-गण में चेतन जगाने, सरकार के हाथ मजबूत करने के लिए 'कल'म को मिसाइल के तरह थामकर शत्रुओं पर शब्द-बाण संधान करने हेतु सन्नद्ध हो गया। हिंदी के श्रेष्ठ-ज्येष्ठ कवि डॉ. सुरेन्द्रनाथ सक्सेना ने ''विष-बाण'' सुदीर्घ काव्य की रचना २ सर्गों, ९४ चतुष्पदियों में करते हुए वीर सैनकों के प्रति काव्यांजली समर्पित की। २१ मार्च १९६३ से १५ फरवरी १०६४ की कालावधि में लिखी गई यह वीर-गाथा किसी एक सेनानी के प्रति न लिखी जाकर देश के सैन्य-बल को नायक मानकर लिखी गई है। 

               सरहद पर अपनी जान हथेली पर लिए अहर्निश जाग रहे सैनिक तथा उसके आयुधों की मान-वंदना करते हुए कवि कहता है- 

जय हो उस मस्तक की, जो कट गया किंतु जो झुका नहीं 
जय हो उस उन्मुक्त चरण की, गिरा किंतु जो रुका नहीं 
जय हो उन हाथों की, जिनने कोटि-कोटि है वार किया
जय हो उन तोपों-गोलों की जिनने कोटि-कोटि है वार किया

जय हो उस अदम्य साहस की, रण में भी जो डिगा नहीं  
जय हो उस नर-नाहर की, जो रण-स्थल तज हटा नहीं 
उनकी ही जय के गीतों से, गगन गूँजता नारों से 
गूँज रहा है आज हिमालय, उनकी जय-जयकारों से 

            सीमा पर हमला कर रहे चीन के नेता द्वय चाउ एन लाई तथा माओ त्से तुंग को कवि विश्व के मिट्टी में मिल चुके तानाशाहों में शुमार कर, लानत भेजते हुए चेताता है- 

सँभलो ए दगाबाज! धोखेबाजों! धरती के गद्दारों!
चेतो चाऊ-माऊ युग-युग के, छद्मवेशी नर! मक्कारों!  
धरती की छाती चीर दिखा दूँगा सो रहे सिकंदर को 
ले विश्व विजय की ध्वस्त कामना, मिले खाक में हिटलर को 

यह बोनापार्ट नया देखो आ गया तुम्हारे ही पथ पर
होने दो दफन इसे भी तो, अपनी श्रेणी में इधर-उधर 

            महाकाल मृत्युंजय सदा शिव तथा आदिशक्ति चंडिका का आह्वान करता कवि पुन: तांडव करने की प्रार्थना करता है। भारतीय सेना के रणबाँकुरों से शत्रु को माटी में मिलाने की अपेक्षा करता है- 

लेना बहादूरों एक-एक दुश्मन को चुन-चुनकर लेना 
पापी शत्रु की छाती में, गहरी तलवार घुसा देना
जिन आँखों ने लिप्सा-दृष्टि डाली है इस धरती पर 
पिघला शीशा भरकर उनमें, धरती में उन्हें सुला देना 

            आतताई चीन को आईना दिखाता कवि भारत के के-एक सैनिक के साथ दस-दस सैनिकों को लड़ाने की नीति पर कटाक्ष करता है -

ओ मार्क्सवाद के अंधभक्त! यह रण-कौशल किससे सीखा?
इंसान चीन में होते हैं, या मात्र भेड़ रण-भयभीता?
ये बलि के बकरे काट-काट क्यों व्यर्थ समय को खोता है?
अत्याचारों का घट भरकर क्यों बोझ पाप का ढोता है?

            चीन द्वारा वादा-खिलाफी और विश्वासघात पर शब्दाघात करने के साथ कवि उसे भारत से मिली बौद्ध धर्म की विरासत तथा व्हेनसांग की परंपरा याद दिलाते हुए युद्धों से आसन्न विश्व के विनाश के खतरे के प्रति सजग करता है। 

अणु के विस्फोटों से पहले, फूटेगा यह मानस कराल 
जलने से पहले अखिल विश्व, धधकेगा यह गिरिवर विशाल 

            दुर्भाग्यवश युद्ध में मिली पराजय से निराश न होकर कवि नए संकल्प के साथ कृष्ण से मिले गीता-ज्ञान को हृदयंगम कर, इतिहास हो चुके बलिदानी-पराक्रमी भारतीय महावीरों के बल-विक्रम को याद कर एक ओर देश के जन-मानस में नव आशा, विश्वास और पुन: उठ खड़े होकर आगे बढ़ने काअ भाव जगाता है दूसरी ओर विश्व शक्तियों को उनके दायित्व की याद और पड़ोसी पाकिस्तान को चीन के साथ गलबहियाँ करने पर लताड़ता है। कवि सर्गांत में यह प्रश्न पूछता है की मानव मात्र का कल्याण युद्ध या शांति किसमें है, महाशक्तियाँ इस पर विचार कर अपना आचरण बदलें और दायित्व का निर्वहन करें। 

            द्वितीय सर्ग में पाकिस्तान द्वारा कच्छ के रन में पाकिस्तान द्वारा किए गए आक्रमण के प्रतिकार में कवि दोनों देशों की नीतियों, आदर्शों और आचरण में अंतर को इंगित करता है- 

यह पाकिस्तान और भारत का युद्ध मात्र ही नहीं रहा 
इतिहास साक्षी है हमने रण की पुकार को नहीं सहा 
हमने न सिकंदर उपजाए जो लौट जाए मुँह की खाकर 

            पाकिस्तान में सेना के दबदबे और उसकी अमेरिका-परस्ती पर कटाक्ष कर कवि उसे आईना दिखाता है- 

लाहौर बेच डाला अमरीका के हाथों इन नीचों ने
मुँह बंद कर दिया जनता का जब संगीनों की नोकों से 
तब रावलपिंडी को बेचा चीनी शैतानों के हाथों 
यों पाक नीति के मस्तक पर, नाच रहा चीनी माओ 

            कवि सुरेन्द्र नाथ जी युद्ध-चर्चा तक सीमित नहीं रहते, वे विश्व और मानवता की हित-चिंता करते हुए अतीत और इतिहास के प्रसंगों को इंगित कर उनसे सीख लेने और विश्व-शांति के समक्ष खतरा बन रहे तत्वों का विरोध कर रही शक्तियों से एक साथ मिलने का आह्वान करते हैं- 
 
जो शक्ति गुटों से परे और जिनको स्वतंत्रता प्यारी है
जागे अफ्रीकी-एशियाई, यह घोर घटा घिर आई है 
जम जाए विदेशी चरण नहीं, प्यारे स्वदेश की धरती पर 
जल जाए स्वार्थ के मोह-जाल में पाल स्वयं ही उभर-उभर 

            कवि युग-धर्म के प्रति सचेत करते हुए शांति प्रिय देशों को उनका दायित्व याद दिलाते हुए कृति को युग-बोध का पर्याय बना देता है -

जिन हाथों में है शक्ति और नैतिक बल आत्म-सुरक्षा का 
उन को न किसी का भय-बंधन, उनकी न किसी पर निर्भरता 
क्यों रुके वीरता के बढ़ते पग, किसी अन्य की आशा में 
है व्यर्थ बात करना दुष्टों से, सदा सभ्यतम भाषा में 

            पाकिस्तान द्वारा युद्ध का विस्तार कश्मीर तक किए जाने पर कवि पाकिस्तानी जनता, सैनिकों और नेताओं को याद दिलाता है कि उनकी रगों में बह रहा रक्त किसी ने का नहिं, भारत माता का ही है- 

पूछो हर एक सिपाही से जो खून बह रहा है उसमें 
वह पाकिस्तानी माँ का है या भारत का है रग-रग में?
पूछो हर एक नमाजी से जब वह सजदे में झुकता है 
तब उसकी आँखों के आगे यह कैसा चित्र उभरता है 

            पकिसतान निर्माण की पृष्ठभूमि में भारत के प्रति घृणा को इंगित कर कवि, विश्व और मानवता के कल्याण हेतु पाकिस्तान का भारत में विलय ही एकमात्र समाधान बताता है- 

धो दो आपस का भेदभाव, हम एक राष्ट्र हों बलशाली
फैले सर्वत्र विभा अपनी, जगमग हो अपनी दीवाली 
जय हो जन जीवन की जय हो, विजयी हो जग में जन मानस
हो भारत-पाक संघ निर्मित, हीव फिर से अखंड भारत

            कृति का शीर्षक भले ही 'विष-बाण'' है किंतु समूची कृति में विषैले वर्तमान से आसन्न सर्वनाश की विभीषिका के प्रति चेतावनी देते हुए विश्व और मानव-कल्याण की कामना ही कवि का लक्ष्य है। 

            सुरेन्द्र नाथ जी की भाषा प्रसंगानुकूल, प्रवाहमयी,  सरल, सरस और शब्द-चयन सटीक है। वीर रस और शांति रस प्रधान इस कृति में करुण रस भी यत्र-तत्र है। कवि ने छंद सृजन में विविधता और शिल्प पर कथ्य को वरीयता की राह चुनी है। हिंदी की राष्ट्रीय काव्य धारा में 
''विष-बाण'' देखन में छोटन लगें, घाव करें गंभीर'' की परंपरा का निर्वहन करता है। गागर में सागर की तरह संकेतों में बहुत महत्वपूर्ण और सर्वकालिक मूल्यों की जयकार करता ''विषबाण'' कवि की अभिव्यक्ति सामर्थ्य और सनातन सत्य मूल्य परक चिंतन का दस्तावेज है। 
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संपर्क- विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, व्हाटऐप ९४२५१८३२४४