स्मरण लेख
श्री वास्तव में शोभा पाती कृष्ण शरण के साथ
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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कायस्थ कुल सनातन काल से सरस्वती के उपासक रहे हैं। पीढ़ी-दर-पीढ़ी निराकार अक्षर ब्रह्म चित्र गुप्त जी, शिव और शक्ति की उपासना के साथ साकार विष्णु के अवतारों का पूजन, हर कायस्थ घर में होता रहा है। शैव-शाक्त-गाणपत्य और वैष्णव विचारधाराओं का समन्वय ही कायस्थ होना है। कायस्थों के लिए राम और कृष्ण में कोई भेद नहीं है। वे परा के द्वारा अपरा और अपरा के माध्यम से परा को साधते रहे हैं। इस विरासत को सहेजने में प्राण-प्राण से जुटे रहनेवाली शख्सियतों में से एक थे सीहोर में २५ अगस्त १९२५ को सीहोर मध्य प्रदेश में जन्मे कृष्ण शरण श्रीवास्तव जी। वे मितभाषी, अल्प क्रोधी, आत्म विश्वासी, स्वावलंबी तथा कर्मठ थे। कायस्थों की एक और विशेषता बहुभाषी होना है। संस्कृत के श्लोक मंत्र, हिन्दी में बातचीत, फारसी-उर्दू की शेरो-शायरी, बुंदेली बोली और अंग्रेजी की पचमेल मिक्स्ड वेजीटेबल प्राय: हर कायस्थ का आभूषण होती है। कृष्ण शरण जी भी इन विशेषताओं के धनी थे।
कायस्थ कदम-दर-कदम मंजिल की ओर बढ़ता है। कृष्ण शरण जी ने सीहोर के शहरयार हाई स्कूल (अब एक्सलेंस स्कूल) में अध्ययन करते हुए नवाब भोपाल से वजीफा (छात्र वृत्ति) पाकर 'होनहार बिरवान के होत चीकने पात' की कहावत को चरितार्थ किया। आरंभ में राशनिंग इंस्पेक्टर तथा उसके बाद स्टेशन मास्टर रहते हुए वे 'सादा जीवन उच्च विचार' के पाठ न केवल खुद चले अपितु अपनी संतानों को भी यही जीवन मंत्र दिया। कर्म कुशलता कायस्थ होने की सच्ची पहचान है। वे प्रतिदिन अपना कार्य पूर्ण समर्पण और निष्ठा के करते रहे। कायस्थों को उनके उदार विचारों के कारण 'आधा मुसलमान' कहा गया। कृष्ण शरण जी ने इस विरासत को गर्व सहित जिया। उनके मित्रों में मशहूर शायर कैफ भोपाली (मुहम्मद इदरीस) का भी शुमार था।
कायस्थों के घरों में रामायण और महाभारत, भगवद्गीता और मधुशाला एक साथ में रहती हैं, कभी नहीं झगड़तीं। इसी तरह कायस्थ भी कर्मकांड को लेकर विवाद नहीं करते। उनकी पूजा उपासना कर्म के प्रति समर्पण ही होता है। यही गुण कृष्ण शरण जी में भी था। उन्होंने अपने पुत्रों को भी अपने गुण विरासत में दिए। योग्य होते भ हुए भी पुत्र राजेश ने मेडिकल छोड़कर हिंदी में उच्च अध्ययन की राह पर पग रखा तो भी उन्होंने अपनी असहमति पर पुत्र की इच्छा को तरजीह दी। इस विरासत के कारण कायस्थों में कभी 'ऑनर किलिंग' जैसी सोच नहीं विकसित हो पाती। वे असहमति और सहमति दोनों का सम्मान करते थे।
वृद्धावस्था में छड़ी, श्रवण यंत्र आदि के सहारे जीने के स्थान पर कृष्ण शरण जी को अपने बल पर रहना पसंद था। वे 'सादा जीवन उच्च विचार' और 'जेहि विधि राखे राम ताही विधि रहियों' के सिद्धांत का अनुसरण करते रहे। वर्तमान सांस्कृतिक संक्रमण काल में कृष्ण शरण जी के विचारों और जीवनादर्शों को उनके पुत्र मूर्त कर रहे हैं। कर्म कुशलता की विरासत वंशजों में जीवित रहना ही उनके जीवन की सफलता का सूचक है। प्रभु से यही प्रार्थना है की सर्व धर्म सम भाव की उदारता, सहिष्णुता और सद्भाव का जो आदर्श कृष्ण शरण जी जी ने आजीवन मूर्त किया वह हर भारतवासी का आदर्श बने। कृष्ण शरण जी जो सच्ची श्रद्धाञ्जलि उनके विचारों और आदर्शों को अपनाना ही है।
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संपर्क- ४०१ विजय अपरतमंत, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१, चलभाष ९४२५१८३२४४
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