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रविवार, 4 अक्टूबर 2026

विजय बागरी

आलेख -

नवगीतों में नवता के वाहक विजय बागरी 
- आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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    नवगीत हिंदी गीतिकाव्य ही नहीं, सकल हिंदी साहित्य की वह विधा है जो जन-मन से और जिससे जन-मन अभिन्न है। नवगीती कचनार की गझिन शाखाओं में दिन-ब-दिन गहरे सुर्ख फूलों को खिलते देखना सगोत्री विस्तार से मिलनेवाले सुख या 'गूँगे के गुड़' की तरह है। नर्मदांचल के बुंदेलखंड क्षेत्र में नवगीत की क्यारी में सृजन के पौधे रोपने निरंतर रोपने में सर्व श्री विनोद निगम, राम सेंगर, भोलानाथ, आचार्य भगवत दुबे, गिरिमोहन गुरु, जंगबहादुर श्रीवास्तव, जयप्रकाश श्रीवास्तव आदि का अवदान उल्लेखनीय हैं। यत्किंचित योगदान मुझ अकिंचन का भी रहा है। इस क्रम में अनुजवत राजा अवस्थी, आनंद तिवारी, रामकिशोर दाहिया, विजय बागरी, अविनाश ब्योहार,  का जुड़ाव स्वागतेय है। शीघ्र ही सर्वश्री बसंत शर्मा, अरुण अर्णव खरे, सुरेश तन्मय, राजकुमार महोबिया तथा अविनाश ब्योहार, छाया सक्सेनाआदि की सृजन सामर्थ्य  नवगएट में नवाचार के प्रति आश्वस्त करती है। 

    उल्लेखनीय है कि स्व. जवाहर लाल चौरसिया 'तरुण', स्व. श्याम श्रीवास्तव, श्री यतीन्द्र नाथ 'राही', श्री कृष्णकुमार 'पथिक', श्री शिव कुमार 'अर्चन' तथा कुछ अन्य गीतकारों के रचना संसार में कई रचनाएँ नवगीत और गीत की परिधि पर हैं किंतु नवगीतों में विशिष्ट विचारधारा और शब्दावली के प्रति आग्रह से असहमति ने इन्हें नवगीतकार मानने में संकोच किया। इस कारण इन श्रेष्ठ रचनाकारों को नवगीत के आँगन में अपनी वाणी सुनाने का अवसर न मिला तो नवगीत भी इनकी उपस्थिति से गौरवान्वित होने के क्षण न पा सका। इस दुर्योग के कारण गीत और नवगीत को पिता-पुत्र की तरह परिभाषित करने और पिता का प्रवेश पुत्र के आँगन में वर्जित बतानेवालों ने अपनी अहं तुष्टि भले ही कर ली हो, नवगीत की हानि होने को नहीं रोक सके। 

    गीत के मरने का मिथ्यानुमान कर गर्व के हिमालय पर जा खड़ी हुई प्रगतिवादी कविता को फिसलने में देर न लगी। 'नानक नन्हें यों रही जैसी नन्हीं दूब' और 'प्रभुता से लघुता भली, प्रभुता से प्रभु दूर' को जी रहा गीत नव वस्त्र धारण कर 'नव' विशेषण से अभिषिक्त होकर पुन: लहलहा रहा है। अब 'नवगीत के वैचारिक पक्ष को प्रगतिवादी कविता से व्युत्पन्न', 'छांदसिकता को उर्दू ग़ज़ल से आयातित', 'गेयता को पारंपरिक गीत की देन' और 'लोकगीतों को प्रतिरोधी बताने' की दुरभिसंधि नवगीत को उसकी अपनी जमीन से दूर कर उसके प्रासाद में सेंध लगाने का तथाकथित प्रगतिवादी विचारधारा प्रणीत कुत्सित प्रयास है। वरिष्ठ नवगीतकार हर खेमे में अपनी पूछ-परख का ध्यान रखते हुए भले ही मौन रहें किंतु विजय बागरी जैसे कलमकार जो नवगीत को गीत का वारिस मानते हुए दोनों को अभिन्न देखते, मानते और साँस-साँस में जीते हैं, अपनी रचनाओं से प्रमाणित करते हैं कि नवगीती वैचारिकता अपने समय को जीते हुए गीत से, गेयता पग-पग, डग-डग पर हर दिन गुनगुन करते लोकगीत से ग्रहण करती है। नवगीत छंद को कथ्य, लय और शैली के समायोजन से आवश्यकतानुसार बनाता-अपनाता है। इसीलिये नवगीत पारंपरिक छंदों के समान्तर विविध छंदों का सम्मिश्रण भी मुखड़े और अंतरे में स्वाभाविकता, सहजता और अधिकारपूर्वक कर पाता है। 

    विजय बागरी का वैशिष्ट्य गत ५ दशकों से निरंतर न केवल सृजन करना अपितु पूर्व से बेहतर और सुविचारित सृजन करना है। वे ७ अनमोल कृतियों मैं दरिया सा बहता पानी (काव्य संग्रह), प्राची की मुस्कान (दोहा संग्रह), मैंने तुमको व्याकुल पाया (गीत संग्रह), ओझल रहे उजाले (नवगीत संग्रह), राशमियों के सारथी (नवगीत संग्रह), गीतों की मकरंद वाटिका (गीत संग्रह) तथा दिव्यंगना (मुक्तक संग्रह) का सृजन कर चुके हैं और अब विदुर पर महाकाव्य के प्रणयन में व्यस्त हैं। नवगीत की सृजन सामर्थ्य जैसे कालजयी ग्रंथ में स्थान की सीमा होना स्वाभाविक है। तदनुसार इस समीक्षालेख में विजय बागरी के दो नवगीत संग्रहों पर विमर्श कर संतोष करना होगा। नवगीतकार विजय बागरी का वैशिष्ट्य अपने परिवेश, प्रकृति और पर्यावरण के प्रति सजग और संवेदनशील होना है।उनकी गीति रचनाएँ कपोल कल्पना से दूर स्वभोगे अथवा अन्यों द्वारा भोगे हुए को साक्षी भाव से ग्रहण किये गए अनुभवों से नि:सृत हैं। विजय ग्राम्य और नागर दोनों अंचलों से जुड़े हैं इसलिए उनकी दृष्टि के सामने सृष्टि का व्यापक रूप अपनी छटा बिखेरता है। वे पूँजी  द्वारा श्रम का शोषण होते देखकर चुप न रहकर अपनी कलम से शब्द-वार करते हैं-

आँखों में घड़ियाली आँसू / बगुले करते जाप।
रंग बदलते- / गिरगिट देखे, / आसमान में साँप।
चमक-दमक, / कीकर की लगती,/ जैसे हो सागौन।
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मौसम गुंडा- / गर्दी करता / आदमखोर हवाएँ।
संवेदन की लाशें ढोतीं / कपटी शोकसभाएँ।
श्रम सीकर के / हरे घाव पर / लेपन करते लौन।

    विजय का युवा मन समस्याओं को सुलझाने का प्रयास करता है और समाधान के रास्तों पर अवरोधों को देखकर कुंठित नहीं होता, वह व्यवस्था परिवर्तन का उद्देश्य लेकर कमियों को निडरता से इंगित करता है-

समाधान के दरवाज़े पर / लटक रहे हैं ताले।
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जिरह पेशियाँ, कूट दलीलें / ढोती रोज कचहरी।
कैद फाइलों की कारा में, / अर्जी गूँगी-बहरी।
छद्म गवाही देनेवाले / गुंडे डेरा डाले।
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सजी वकीलों की दूकानें / प्रतिष्ठान पंडों के।
बड़े-बड़े दफ्तर फरेब के / लहराते झंडों के।
मुंशी चपरासी लगते हैं / जैसे जीजा-साले।

    जीवन के दरवाजे पर ताले लटकने के साथ-साथ दफ्तर की खिड़की भी बंद हो तो स्थिति बद से बदतर और गंभीर हो जाती है-

जीवन के / दफ़्तर की खिड़की
कब से नहीं खुली।
हठधर्मी के / ताले लटके, / सदियाँ बीत गईं।
मनुहारें करतीं / आँखों की / झीलें रीत गईं।
खुसुर-फुसुर / कर रहीं कुर्सियाँ, / मेजें मिलीं-जुलीं।
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दीवारों पर / शीश पटकती, / मन की उथल-पुथल।
संदूकों में / बंद अपीलें, / कुंठित अगल-बगल।
टूट रही / बूढ़ी साँसों की, / हिम्मत नपी-तुली।

    तमाम विसंगतियों और विडंबनाओं के बावजूद ज़िंदगी दर्द का दस्तावेज मात्र नहीं है, उसमें अन्तर्निहित आनंद की अनुभूतियाँ उसे जीने योग्य बनाये रखती हैं। विजय इस जीवनानंद से निसृत रसानन्द से नवगीत की गागर को भरते हैं-

एक बदरिया / अँगना उतरी / छानी मार रही किलकारी।
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कोयल मंगल- / गान सुनाती, / अमराई में रास रचाती।
चौमासे की- / शगुन पत्रिका / बाँच रही पुरवा लहराती।
बट-पीपर / आलिंगन करते, / पाँव-पखार रही फुलवारी।
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भींज रही / पनघट पे गोरी, / उर अनुरागी चाँद-चकोरी।
ताँक-झाँक / कर रही बिजुरिया, / नैन मटक्का चोरा-चोरी।
बहुत दिनों के- / बाद दिखी हैं, / धरती की आँखें कजरारी।

    रस को नवगीत का प्राणतत्व माननेवाले विजय नीरसता को किनारे कर सरसता की गगरी नवगीतों की पंक्ति-पंक्ति में उड़ेलने की सामर्थ्य रखते हैं-

मेरे गीत, / तुम्हारे मन की- / गलियों से जब गुजर रहे थे।
कर सोलह- / श्रृंगार सुहाने, / सपन सलोने सँवर रहे थे।
अधर-अधर- / दोहा चौपाई, / नज़र-नज़र कुण्डलिया रागी।
धड़कन-धड़कन / राग बसंती, / कल्याणी कविता अनुरागी।
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कंठ-कंठ से / कलकंठी के, / सरगम के स्वर उतर रहे थे।

    विजय के नवगीतों में मौलिक बिंबों की छटा देखते ही बनती है-

सूरज की / बूढ़ी आँखों में, / गहन मोतियाबिंद हुआ.
खेल रही है / धवल चाँदनी, / अँधियारे के साथ जुआ।
भिनसारे का / कुटिल कुहासा, / धुआँधार तेजाबी है।
मलय पवन / के, नैंन नशीले, / अटपट चाल शराबी है।
मौसम की / मादक नीयत से, / टपक रहा जैसे महुआ।

    आधुनिक समाज में छद्म मुखौटा लगाने का प्रचलन इतना बढ़ गया है कि खाने से अधिक फेंकनेवाले भुखमरी पर पोथियाँ भरे जा रहे हैं जबकि भुखमरी की कगार पर खड़ा कर दिया गया आम जन तमाम अभावों से घिरा हुआ होकर भी पर्व-त्यौहार का आनंद ले-दे पाता है। विजय 'आजकल / कितनी विकल है / सभ्यता की नव सदी' 'लिख रहा / इतिहास गोया / रुग्णता की नव सदी' और 'हो रही / पत्थर ह्रदय / स्वच्छंदता की नव सदी' लिखकर विसंगतियाँ मात्र उद्घाटित नहीं करते अपितु 'कब पुजेगी / उल्लसित / उत्कृष्टता की नव सदी' लिखकर मुखौटों को उतारकर अकृत्रिमता की प्रतिष्ठा किये जाने का आव्हान भी करते हैं। 
 
    नवगीत में कई बार मैंने अपने नाम या उपनाम का प्रयोग उनके शब्दकोशीय अर्थ में किया है। 'चुप्पियों के गाँव में' शीर्षक नवगीत में विसंगतियों को उद्घाटित करने के साथ विजय ने भी अपने नाम / उपनाम का प्रयोग अंतिम पंक्ति में किया है। कवि के नाम या उपनाम को रचना में प्रयोग करने की यह परंपरा लोकगीतों तथा भक्ति काव्य से होते हुए उर्दू ग़ज़ल में 'तखल्लुस' के रूप में अपनाई गयी।

थरथराते / मौसमी मनुहार के,
गीत घायल / चुप्पियों के गाँव में।
चूम रहे काँटे, / अंधेरों के कुटिल,
दिन दहाड़े, / रौशनी के पाँव में।
ऋतुमती पछुआ / हवा-आसक्त उर,
सिद्धपीठों के पुजारी हो गए....
.... सभ्यता के / आचरण बगुलामुखी,
संस्कारों के शिकारी हो गए।
राजमहलों के / उजाले भी 'विजय'
आजकल षड्यंत्रकारी हो गए।

    विजय के इन नवगीतों की भाषा बुंदेलखंड के कस्बों में प्रयुक्त हो रही आम बोलचाल की भाषा है। आधुनिक हिंदी का शुद्ध स्वरूप इनमें दृष्टव्य है। यह भाषा खड़ी हिंदी, अपभ्रंश, बुंदेली, पचेली, संस्कृत, देशज, उर्दू तथा अंगरेजी शब्दों के यथावश्यक शब्दों के मेल-जोल से बनती है जिसमें व्याकरणिक नियम हिंदी के प्रयोग किये जाते हैं। विजय ने अंगरेजी शब्दों का प्रयोग (अपवाद नैट-चैट, टी. वी., मोबाइल) लगभग नहीं किया है। यह उनका वैशिष्ट्य है। संस्कृत निष्ठ शब्दों में स्वच्छंद, उद्घोष, निर्वासन, उल्लसित, कुम्भज, उदधि, गन्तव्य, मर्माहत, अहर्निश, विहंगम, अगोचर, अविरल, अभ्युत्थान, प्रहर्षित, हेमवर्णी, अंतर्व्यथा, निदाघ, नयनोदक, स्वस्तिवाचन, अंतर्तिमिर, शब्दातीत, तमासावृत्त, संसृति, प्रभंजन, संकल्पनाएं, प्रक्षालित, प्रनिपतों, पुलकावली, वल्लरियाँ आदि में दृष्टव्य है। देशज बुन्देली शब्दों की छवि-छटा अवां, होरा, चौमासा, खुसुर-फुसुर, भिनसारा, बतकहाव, बदरिया, भींज, बिजुरिया, बखर, माटी, नेंगचार, बूंदाबारी, चिरैया, बिलोना, कुठारी, भिनसारे, पहरुए, बिछुआ, दुपहरिया, टकोरे, छतनारी, परपंच, लगैया, को है, समुहानी, सपन, बौराने, ठकुरसुहाती, कमरिया, ओसारे, गठरिया, धुंधुवाती, नदिया, राम रसोई, चौंतरा, रामजुहारें आदि गले मिलते हुए कथ्य को सरस और ह्रदयग्राही बनाती हैं। उर्दू शब्द इम्तिहान, दफ्तर, नजरें, ज़हर, दुआ-सलाम, वक्त, सैलाब, परवाज़, रौशनी, ज़िंदगी, गर्द-गुबार, तेजाबी, नुक्ताचीनी, सरेआम, मशहूर, पनाह, नागवार, दस्तूर, सबक, मगरूर, गुस्ताखी, बगावत, अदावत, मासूम, निशाना, दिल, अरमानों, नासूर, जिगर, गाफिल, सिरफिरे, मातमपुरसी, नफरत, फ़कीर, तस्वीर, दागी, महबूब, बड़ा, मुनादी, अहसासों, हुकूमत, पर्दाफाश, फरेबी, हलाकान, मगरूर, तहकीकातों, तबाही, सवालों, बाज़ार, आबरू, तनहाइयों, शोखियाँ वगैरह हमारी गंगो-जमुनी विरासत को आगे बढ़ाते हैं।

   विजय बागरी के गीतों-नवगीतों में हिंदी के व्याकरण नियमों का पालन किया गया है। उर्दू शब्दों के बहुवचन हिंदी व्याकरण के अनुसार हैं। जैसे- नजरें, अरमानों, अहसासों, तहकीकातों, सवालों, शोखियाँ आदि। कथ्य की सरसता में जन की जुबान पर चढ़े मुहावरों यथा- छाती पर होरा भूंजना, नैन मटक्का, घर का भेदी लंका ढाए, ठिकाने लगाना, जंगल में मंगल आदि वृद्धि की है। इस दशक के नवगीतकारों की भाषा शैली में में पूर्ववर्तियों की तुलना में दो नए रुझान बहुलता से शब्द-युग्मों का प्रयोग तथा शब्दावृत्तियों का प्रयोग देखने में आ रहे हैं। अपने नवगीत संग्रह 'काल है संक्रांति का' में मैंने शब्द-युग्मों तथा शब्दवृत्ति के प्रयोग किए हैं। इससे कथ्य के भाषिक-प्रवाह, लयात्मकता, सरसता तथा लोकरंजकता में वृद्धि होती है। विजय के नवगीत भी इन रुझानों से युक्त हैं। इस कृति में प्रयोग किये गए शब्द युग्मों में कुछ पारंपरिक किंतु अनेक सर्वथा नवीन हैं। मन-मतंग, हरा-भरा, धूल-धूसरित, सावन-भादों, दीन-हीन, खेतों-खलिहानों, राग-द्वेष, मान-मनौती, बाहर-भीतर, उथल-पुथल, सज-धज, पल-छिन, साँझ-सकारे, मेल-मुलाकातें, व्यथा-कथा, खेत-खलिहान, घाट-प्रतिघात, नेट-चैट, राम-रसोई, सुचिता-सच्चाई, रात-दिन, देह-पिंजरे, प्राण-पंछी, सुर-टाल, उमड़-घुमड़, दादुर-चातक, लपक-झपक, शब्द-अर्थ, लोक-लाज, हेल-मेल, रंग-बिरंगी, माया-मृग, मन-गन, तर्क-वितर्क, खंडन-मंडन, खेल-खिलौने, धरती-अम्बर, चाँद-सितारों, नदिया, पनघट, भूख-प्यास, चाँद-चकोरी, ताक-झाँक, चोरा-चोरी, मेघ-मल्हार, काल-कवलित, संगी-साथी, कुटुम-कबीले, पल-छिन, हरी-भारी, कोर-किनारे, हँसी-ठहाके, ठौर-ठिकाने, मन-मधुबन, सोलह-श्रृंगार, सपन-सलोने, दोहा-चौपाई, दुखी-निराश, सरित-सरोवर, उमड़-घुमड़, दर्द-पीर, वयः-कथा, गुना-भाग, रिश्ते-नातों, हर्ष-उल्लास, गर्द-गुबार, पुष्कर-पुण्डरीक, तुलसी-चौरे, विषय-वासना, नून-तेल, माखन-मिसरी, धक्का-मुक्की, भीड़-भाद, हाथा-पाई, ताना-बना, लुटे-पिटे, सृष्टि-दृष्टि, संत-कंत, गीत-प्रीत, नेह-गह, हेल-मेल, भूखी-प्यासी, हेरा-फेरी, जोड़-घटना, ज्ञान-ध्यान, पूजा निष्ठा, मन-मंदिर, रंग-भंग, छल-छंद, कुआँ-बावली, लू-लपट, भूखी-प्यासी, तट-तरुवर, मथुरा-काशी, माघ-पूस, जोगन-बैरागन, नाप-तौल, हँसी-खुशी, चाल-चलन, सुख-शांति, चाँद-तारे, घात-प्रतिघात, महकी-चहकी, कपट-कौशल, माघ-पूस, खात-बिछौना, छल-बल, संझा-बाती, गाँव-शहर, दावानल-पतझर, हानि-लाभ, सुख-दुःख, चहल-पहल, भूल-भूलैंया, नोंक-झोंक, रुदन-मुस्कान, छल-छंद-चतुरी, वर्ष-मास-दिन, सत्यं-शिवं-सुन्दरं आदि-आदि शब्द युग्म कथ्य की अर्थवत्ता तथा वाचिक सौन्दर्य की वृद्धि कर रहे हैं।

    यह कृति शब्दावृत्तियों के प्रयोग की दृष्टि से भी समृद्ध है। शब्दावृत्ति से आशय किसी शब्द के दो बार प्रयोग करने से है। ऐसा कथ्य पर अतिरिक्त जोर देने के लिए किया जाता है। इससे उत्पन्न पुनरावृत्ति अलंकार भाषिक तथा वाचिक सौन्दर्य वर्धक होता है। विजय ने अधर-अधर, नज़र-नज़र, धड़कन-धड़कन, कंठ-कंठ, लहर-लहर, अंग-अंग, छंद-छंद, रोम-रोम, किरण-किरण, अंग-अंग, गात-गात, कण-कण, पात-पात, पोर-पोर, पनघट-पनघट, धड़कन-धड़कन, पोर-पोर, फूंक-फूंक, लहर-लहर, घाट-घाट, कली-कली, दर-दर, धार-धार, लौट-लौट, पल-पल, चुपके-चुपके, रात-रात, करवट-करवट, शब्द-शब्द, उलट-उलट, अभी-अभी, जनम-जनम, सहते-सहते, कदम-कदम, कहीं-कहीं, किराचा-किराचा, सर-सर, पोर-पोर, जन-जन, चेहरे-चेहरे, तौबा-तौबा, प्रश्न-प्रशन, अक्षर-अक्षर, क्रंदन-क्रंदन, सींच-सींच, कुहू-कुहू, चुपके-चुपके, बूँद-बूँद, घाट-घाट, तिनका-तिनका, गली-गली, घर-घर, ऊँचे-ऊँचे, रिमझिम-रिमझिम, पोर-पोर, मंद-मंद, पट्टा-पट्टा, क्या-क्या, कभी-कभी, चूर-चूर, कण-कण, सांय-सांय, माखन-मिसरी, चाल-चरित्र आदि शब्दावृत्तियों का सार्थक-सटीक प्रयोग कर गीति रचनाओं को अर्थवत्ता प्रदान की है। 

     अपने परिवेश और पर्यावरण के प्रति सचेत हैं विजय बागरी। नवगीतों में वट, पीपल, अमराई, कचनार, केतकी, सरसों, हरसिंगार, पलाश, मोगरा, मंजरियाँ, फुलवारी आदि अपनी सुषमा यथास्थान बिखेर रहे हैं। कोयल, चिरैया, मैना, दादुर, चातक, बैल आदि पात्र ग्राम्यांचली परिवेश को जीवंत कर रहे हैं। यह नवगीतकार अपनी अभिव्यक्ति सामर्थ्य के बाल पर कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक कहने की पारंपरिक विरासत को सम्हाल सका है। पंख थकावट ओढ़े / बैठे, परवाजें संकट में पारिस्थिक विवशता, धूप पसीना पोंछ रही में विरोधाभास, चटनी-रोटी / खाते-खाते गयी ज़िंदगी ऊब में निराशा, बीजों से / जब अंकुर फूटे /खेतों ने श्रृंगार किया तथा उम्मीदों की / खोल खिड़कियाँ / मुखरित हुईं मचाने में आशावाद, उठ भिनसारे / विहग-स्वरों ने / गीतों का गुंजार किया तथा छलक उठे प्यासे अधरों से / प्रीति पेय, नवगीत तुम्हारे में श्रृंगार, रौशनी के तामसी / बरताव पर, मैं चुप रहूँ में दुविधा, नेताओं के / बतकहाव से / झरने लगे बताशे में राजनैतिक हलचल, हेरा-फेरी / के चक्कर में / चोरों के सरदार में सामाजिक वातावरण, खोटे सिक्के / चाल-चलन से / हुए बहुत मगरूर में सटीक बिम्बात्मकता, बेशर्मी की / मोटी खालें / सत्ता का दस्तूर में शासन के प्रति घटती जनास्था, वक्त छोड़कर / चला गया कुछ / तहकीकातें नयी-नयी में राजनैतिक भ्रष्टाचार, रात काटती / जलती बीडी / टूटा छप्पर, टाट-बिछौना में ग्रामीण विपन्नता, रोज दिहाड़ी / मारी जाती / सरे-आम छल-बल से में श्रमिक शोषण, चले शहर की / ओर गाँव की / पगडंडी के पाँव में ग्रामीण पलायन, कहीं-कहीं / छल-छंद-चातुरी / भला करे भगवान् में पारंपरिक भाग्यवादिता, दहक रही है / अंगारों में / मधुमासी तरुणाई में युवाओं के समक्ष उपस्थित विषम परिस्थितियाँ, बदल रही / चिन्तन की भाषा / मूल्यों का अनुवाद में सतत बदलते मूल्य, कितनी बरसातों / ने आकर / पूछा कभी हिसाब में प्रकृति की उदारता, नैट-चैट / टी. वी., मोबाइल / का जूनून, लादे सर पर / राम-रसोई / अंतर्पुर तक / विज्ञापन की गिद्ध नज़र में हावी होता बाजारवाद, उमड़-घुमड़ / कर बदरा छाए / नाचन लागे मोर में ऋतु-परिवर्तन, बंदनवार / सजें गीतों के / आभूषित अनुप्रास से में लोक की उत्सवधर्मिता, ज़िंदगी ही/ जिंदगी का / आखिरी पैगाम में जिजीविषा शब्दित होकर पाठक को रचनाओं से एकात्मकता स्थापित करने में सहायक है।

    'रश्मियों  के सारथी' (२०२०, पृष्ठ १६०, आवरण पेपरबैक बहुरंगी, मूल्य २००/-, बोधि प्रकाशन सी ४६ सूदर्शनपुरा इंडस्ट्रियल एरिया एक्सटेंशन, नाला रोड, २२ गोदाम जयपुर) विजय बागरी का दूसरा नवगीत संग्रह है। इस संग्रह की भूमिका में आधुनिक नवगीतों में नवता के पुरोधा डॉ. राम सनेही लाल शर्मा 'यायावर' का कथन  ''विजय बागरी के नवगीतों की एक धतातव्य विशेषता यह है कि वे मिथकों का सुसहठू प्रयोग और उनका अर्थ-दोहन करने में अत्यंत कुशल हैं। मिथक का शिअल्पिक उपादान के रूप में प्रयोग वही व्यक्ति कर सकता है जो हमारे अर्थ-साहित्य की परंपरा से भली-भांति परिचित हो।'' विजय बागरी के नवगीतकार के निरंतर परिपक्व होने का प्रमाण है। 

    विजय बागरी का यह नवगीत संग्रह युगीन विमर्शों की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे लोक के कवि हैं। लोकपर्व होली को पर्यावरणीय विमर्श का अवसर बनाते हुए विजय कहते हैं- 

हाथों में जो / रंग-बिरंगी /जहरीली पिचकारी है ।  
 बूद-बूंद में, /  नए दौर की, / संक्रामक बीमारी है।। 
साँसों की / बुनियाद हिलाए, / ऐसी भी क्या होली है। 

    नगर और ग्राम दोनों में एक साथ रह रहे विजय नगरीय विमर्श और ग्राम्य विमर्श एक साथ साधते हैं- 

खोज रहे ठूँठों के जंगल / रुंड-मुंड आकर नगरों में। 
छलक रहीं सागर की आँखें / धुआँ-धुआँ नदिया की चितवन 
रूठ गया हर खेत-खेत के, / प्यासे कंठ-कंठ से पानी। 
फुलबगिया से अमराई तक, पतझर की चलती मनमानी।।  

    आधुनिक सभ्यता की सर्वाधिक दारुण त्रासदी अनगिनत मनुष्यों का जड़ों से उखड़कर बंजारा हो जाना है। विजय इस बंजर विमर्श को देख पाते हैं- 

उम्मीदों की / गठरी लादे, / कितने ठौर-ठिकाने बदले। 
विराहकूल / आँखों से पल-पल, / कितने रोज हिमालय पिघले।। 
कितने निष्ठुर / तूफ़ानों से / मेरी दुआ सलाम हो गई।। 

    विकास विमर्श को विजय तमाम सरकारी दावों और प्रचारों के बावजूद लक्ष्य से दूर पाते हैं-

राजपथ पर / सभ्यता की, /  रोशनी भरपूर है। 
किंतु अंधी / दौड़ से,/ गंतव्य कोसों दूर है।। 
झिलमिलाती / तितलियों सी वंचनाओं की नदी।। 

    राजनैतिक विमर्श इस संकलन के नवगीतों में यत्र-तत्र बिखरा हुआ सहज ही देखा जा सकता है। एक बानगी देखें- 

जोड़-तोड़ की / राजनीति के, चौतरफा व्यापारी 
बात मिठाई / जैसी करते, / चलते चाल शिकारी।। 
दीन-हीन / असहाय, अपाहिज / हैं ढाई आखर।।  

    प्रशासनिक विमर्श करते हुए विजय राजनीति और प्रशासन तंत्र की बीच की सूक्ष्म सीमा रेखा के प्रति सजग हैं-

समाधान के / दरवाजों पर, / लटक रहे हैं कब से ताले 
चोर-सिपाही / का गठबंधन, / चौपालों पर डेरा डाले।। 
कब तक / सहनशक्ति की छाती, / रौंदेगी धृतराष्ट्र व्यवस्था।।
कब तक / कुटिया मनरेगा की, / मजदूरी से पेट भरेगी। 
कब तक महँगाई सपनों की, / हरियाली की फसल चरेगी।। 
कब तक / मर्यादा की रेखा, / लाँघेगी धृतराष्ट्र व्यवस्था।।      

    नवगीत पर रुदन गीत, स्यापा गीत या नैराश्य प्रधान होने के आरोपों का उत्तर विजय बागरी अपने नवगीतों में प्रकृति सौन्दर्य, शृंगार और नवाशा का संकेत कर देते हैं।

सज-धज कर / प्राची से निकली, / उषा दिव्य अवतारी। 
लूट राही / वसुधा को स्वर्णिम, / प्रभापुनज, सुकुमारी।। 
पंछी गाते / राग भैरवी, / नर्तन करते मोर।। 
और 
ओस नहाई / धनी चूनर, / पहन धरा मुसकाती । 
महादेव को / गंगोदक से, / परबतिया नहलाती।। 
तटबंधों का / चुंबन लेती / नदिया की हिलकोर। 

    जो साहित्य सकल युगीन कलुषताओं के कीच में नव संकल्पों के कमल खिलाने की प्रेरणा न दे सके, वह अपनी मौत आप मरते है लेकिन देश और समाज को भी मरघर पहुँच देता है। विजय बागरी इस सनातन सत्य से सुपरिचित हैं। काल है संक्रांति का में '''जगो /  सूर्य लेकर आता है /  अच्छे दिन'', ''भोर होते ही उठाकर / फिर नये बस्ते हजारों / मैं बढ़ूँगा / मैँ लड़ूँगा।'' के स्वरों को आगे बढ़ाते हुए विजय बागरी लिखते हैं- 

संकल्पों के / पंख लगाकर,/ उड़न सीख रहा हूँ मैं। 
मैं, साहस की / शब्द-चेतन / का चैतन्य प्रणेता हूँ। 
रश्मिराठी / दिनकर की कविता, / गीतों का नचिकेता हूँ।। 
कालकूट / कटुता का पीकर, / हँसना सीख रहा हूँ मैं।   

  विजय बगारी के गीत समय-साक्षी गीति-रचनाओं (गीत-नवगीत) का गुलदस्ता हैं जिनमें नाना प्रकार के पुष्प अपने रूप, रंग, सुरभि की नैसर्गिक छटा से पाठक को मंत्र-मुग्ध कर जीवन की विषमताओं के चक्रव्यूह से उपजी पीड़ा और दर्द के संत्रास को सहने, उससे बाहर निकलने के आस्था-दीप को जलाये रखने तथा अभिमन्यु की तरह जूझने की प्रेरणा देता है। नर्मदांचली लोक जीवन की सहज-सरस बानगी समेटे गीत-पंक्तियों से स्वस्थ्य जन-मन-रंजन करने की दिशा में कलम चलाता युवा रचनाकार अपनी भाषिक सामर्थ्य, शैल्पिक कौशल, छान्दस नैपुण्य तथा अभिव्यक्ति क्षमता से अपने उज्जवल भविष्य के प्रति आश्वस्त करता है। 
*****
संपर्क: ४०१, विजय अपार्टमेंट, सुभद्रा वार्ड, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१
ईमेल:  salil.sanjiv@gmail.com, चलभाष: ९४२५१८३२४४ / ७९९५५५९६१८





शनिवार, 3 अक्टूबर 2026

अक्टूबर ३, सॉनेट, काली, सरस्वती, पुनीत छंद, हरियाणवी हाइकु, तीर अलंकार, सिक्के

सलिल सृजन अक्टूबर ३
·

सॉनेट
काली
•
कल क्यों?, काल आज ला काली
अत्याचारी का विनाश कर
करा पाप से दुनिया खाली
सत्ता-सुख का भवन ताश कर
कलकत्ते की मातु कराली
घर घर आ नैवेद्य ग्रहण कर
हाथों में ले थाम भुजाली
शस्य श्यामला वसुंधरा कर
खप्पर कभी न हो माँ खाली
आतंकी का लहू पान कर
फूल-फलों लद झूमे डाली
सुजला सुफला सलिला हो हर
सींचो बगिया बनकर माली
सदय रहो हे मैया काली
३-१०-२०२२
•••
प्रार्थना
कब लौं बड़ाई करौं सारदा तिहारी
मति बौराई, जस गा जुबान हारी।
बीना के तारन मा संतन सम संयम
चोट खांय गुनगुनांय धुन सुनांय प्यारी।
सरस छंद छांव देओ, मैया दो अक्कल
फागुन घर आओ रचा फागें माँ न्यारी।
तैं तो सयानी मातु, मूरख अजानो मैं
मातु मति दै दुलार, 'सलिल' काब्य क्यारी।
***
ॐ
छंदशाला ३०
पुनीत छंद
(इससे पूर्व- सुगती/शुभगति, छवि/मधुभार, गंग, निधि, दीप, अहीर/अभीर, शिव, भव, तोमर, ताण्डव, लीला, नित, चंद्रमणि/उल्लाला, धरणी/चंडिका, कज्जल, सखी, विजाति, हाकलि, मानव, मधुमालती, सुलक्षण, मनमोहन, सरस, मनोरम, चौबोला, गोपी, जयकारी/चौपई, भुजंगिनी/गुपाल व उज्जवला छंद)
•
विधान
प्रति पद १५ मात्रा, पदांत SSI ।
लक्षण छंद-
तिथि पुनीत पंद्रहवी खूब।
चाँद-चाँदनी सोहें खूब।।
गुरु गुरु लघु पद का हो अंत।
सरस सरल हो तो ही तंत।।
उदाहरण-
राजा नहीं, प्रजा का राज।
करता तंत्र लोक का काज।।
भूल न मालिक सच्चा- लोक।
सेवक है नहिं नेता- शोक।।
अफसर शोषण करता देख।
न्यायालय नहिं खींचे रेख।।
व्यापारी करता है लूट।
पत्रकारगण डाले फूट।।
सत्ता नहीं घटाती भाव।
जनता सहे घाव पर घाव।।
२-१०-२०२२
•••
०००
हरियाणवी हाइकु
*
घणा कड़वा
आक करेला नीम
भला हकीम।१।
*
​गोरी गाम की
घाघरा-चुनरिया
नम अँखियाँ।२।
*
बैरी बुढ़ापा
छाती तान के आग्या
अकड़ कोन्या।३।
*
जवानी-नशा
पोरी पोरी मटकै
जोबन-बम।४।
*
कोरा कागज
हरियाणवी हाइकु
लिक्खण बैठ्या।५।
*
'हरि' का 'यान'
देस प्रेम मैं आग्गै
'बहु धान्यक'।६।
*
पीछै पड़ गे
टाबर चिलम के
होश उड़ गे।७।
*
मानुष एक
छुआछूत कर्‌या
रै बेइमान।८।
*
हैं भारतीय
आपस म्हं विरोध
भूल भी जाओ।९।
*
चिन्ता नै चाट्टी
म्हारी हाण कचोट
रंज नै खाई।१०।
*
ना है बाज का
चिडिय़ा नै खतरा
है चिड़वा का।११।
*
गुरू का दर्जा
शिक्षा के मन्दिर मैं
सबतै ऊँच्चा।१२।
*
कली नै माली
मसलण लाग्या हे
बची ना आस। १३।
*
माणस-बीज
मरणा हे लड़कै
नहीं झुककै।१४।
*
लड़ी लड़ाई
जमीन छुड़वाई
नेता लौटाई।१५।
*
भुख्खा किसाण
कर्ज से कर्ज तारै
माटी भा दाणे।१६।
*
बाग म्हं कूकै
बिरहण कोयल
दिल सौ टूक।१७।
*
चिट्ठी आई सै
आंख्या पाणी भरग्या
फौजी हरख्या।१८।
*
सब नै दंग
करती चूड़ी-बिंदी
मैडल ल्याई।१९।
*
लाडो आ तूं
किलकारी मारकै
सुपणा मेरा।२०।
*
000
अभिनव प्रयोग
दृश्य काव्य-
तीर अलंकार
*
मैं
बच्चा,
बचपन
से दूर हूँ।
मत समझो
बेबस-मजबूर हूँ।
दुनिया बदल सकता
मेहनत से अपनी।
कहूँगा समय से
कल- देख ले!
मैं भी तो
मशहूर
हूँ।
३.१०.२०१६
000
अतीत के सिक्के : आज के मुहावरे
2..दमड़ी =1 पाई (पावली )
2..पाई = 1 धेला
2..धेला = 1 पैसा
2..पैसे का 1 टका
2..टका का 1 आना
2..टका की 1 दुवन्नी
2..दुवन्नी की 1 चवन्नी
2.. चवन्नी की 1 अट्ठनी
2.. अट्ठन्नी का 1 रुपया अर्थात् 64 पैसों का एक रुपया ।
स्वामी दयानंद सरस्वती ने सत्य प्रकाश ग्रन्थ में कर्मकांडी पंडितों की अर्थ लोलुपता पर एक श्लोक कहा है:
टका धर्मष्टकाकर्मष्टकाहि परमं पदं
यस्य गृहे टका नास्ति हा टका टकटकायते
इनसे कुछ मुहावरे भी बने:
चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए = कृपाण, कंजूस
पाई-पाई जोड़ना = थोड़ा-थोड़ा बचाना
ढेला भर अकल न होना = थोड़ी भी बुद्धि न होना
पैसे-पैसे को मुहताज = अत्यधिक गरीबी
टका सेर भाजी, टका सेर खाजा, अंधेर नगरी, चौपट राजा = भला-बुरा बराबर
सोलह आने सही = पूरी तरह ठीक
बाप भला न भैया, सबसे भला रुपैया= दुनिया में मतों की नहीं दौलत की कदर होती है.
स्वातंत्र्य सत्याग्रह के समय एक एक नारा लगाकर चंदा माँगा जाता था -
एक चवन्नी चाँदी की, जय बोलो महात्मा गांधी की
कुछ चित्रपटीय गीतों में भी मुद्राओं का जिक्र हुआ है.
000
गीत:
कम हैं...
*
जितने रिश्ते बनते कम हैं...
अनगिनती रिश्ते दुनिया में
बनते और बिगड़ते रहते.
कुछ मिल एकाकार हुए तो
कुछ अनजान अकड़ते रहते.
लेकिन सारे के सारे ही
लगे मित्रता के हामी हैं.
कुछ गुमनामी के मारे हैं,
कई प्रतिष्ठित हैं, नामी हैं.
कोई दूर से आँख तरेरे
निकट किसी की ऑंखें नम हैं
जितने रिश्ते बनते कम हैं...
हमराही हमसाथी बनते
मैत्री का पथ अजब-अनोखा
कोई न देता-पाता धोखा
हर रिश्ता लगता है चोखा.
खलिश नहीं नासूर हो सकी
पल में शिकवे दूर हुए हैं.
शब्द-भाव के अनुबंधों से
दूर रहे जो सूर हुए हैं.
मैं-तुम के बंधन को तोड़े
जाग्रत होता रिश्ता 'हम' हैं
जितने रिश्ते बनते कम हैं...
हम सब एक दूजे के पूरक
लगते हैं लेकिन प्रतिद्वंदी.
उड़ते हैं उन्मुक्त गगन में
लगते कभी दुराग्रह-बंदी.
कौन रहा कब एकाकी है?
मन से मन के तार जुड़े हैं.
सत्य यही है अपने घुटने
'सलिल' पेट की ओर मुड़े हैं.
रिश्तों के दीपक के नीचे
अजनबियत के कुछ तम-गम हैं.
जितने रिश्ते बनते कम हैं...
३-१०-२०११


***

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026

अक्टूबर २, गाँधी, चंद्रमा, छंद, नवगीत, दोहा, चौबोला, गोपी, जयकारी, भुजंगिनी, उज्ज्वला, राधिका,

 सलिल सृजन अक्टूबर २

*
नवगीत
काल है दिग्भ्रांति का
.
काल है दिग्भ्रांति का
चीन्ह-चीन्ह कर बाँट।
रे अंधे! नित रेवड़ी,
सत्ता को ले साँट।
.
करना मन की बात
न छोड़ो,
मनमानी कर
सिस्टम तोड़ो।
संविधान
ठेंगे पर मारो,
मतदाता-पग
वापिस मोड़ो।
खोट रखकर
फैसले में,
बोल-
"सच है खाँट"।
काल है दिग्भ्रांति का
चीन्ह-चीन्ह कर बाँट।
.
त्रुटि के जिम्मेदार
अन्य कह,
अपने नाम
श्रेय सब ले, हँस।
वादों को
जुमला बतला कर,
महाबली खुद को
खुद कह, फँस।
हित की बात
न सुने दशानन,
कहे सो पाए लात।
काल है दिग्भ्रांति का
चीन्ह-चीन्ह कर बाँट।
.
निराधार
टैरिफ कर ठोंको।
चीनी दादा
सम्मुख पोंको।
मानवता की
रक्षा बोलो,
समर-अग्नि में
दुनिया झोंको।
खुद की खुद ही कर खड़ी
प्यारे! अपनी खाट
काल है दिग्भ्रांति का
चीन्ह-चीन्ह कर बाँट।
०००
गाँधी जी पर दोहे
गाँधी जी का नाम ले, गाँधी-द्रोही नीति।
शासन है पथ भ्रष्ट पर, किंचित् नहीं प्रतीति।।
.
गाँधी जी के वधिक ही, जपकर उनका नाम।
सत्ता पर आसीन हैं, तज सिद्धांत तमाम।।
.
गाँधी की जय बोलकर, अदा न होता कर्ज।
अपनाएँ आदर्श भी, तब पूरा हो फर्ज।।
.
कर्म योग अपनाइए, गाँधी का संदेश।
काम करें निष्काम रह, तब हो सत्य निवेश।।
.
सत्य-अहिंसा अस्त्र ले, साधे संयम शस्त्र।
अमल-विमल चादर रही, गाँधी जी का वस्त्र।।
.
रहे पटैल सुभाष भी, गाँधी जी के भक्त।
गाँधी-दर्शन प्रति रही, सब दुनिया आसक्त।।
.
खुद के लिए कठोर ही, गाँधी रहे हमेश।
दलितों के प्रति सदय थे,साध्य मात्र था देश।।
.
सात समुंदर पार जा, डूब गए अंगरेज।
गाँधी की आँधी प्रबल, आभा मंडल तेज।।
.
सारी दुनिया कर रही, नत सिर नम्र प्रणाम।
रघुपति राजा राम ही, गाँधी जी का धाम।।
.
केवल पुतले मत करें, खड़े रोज ही आप।
मूर्त करें आचरण मेँ, गाँधी जपें न आप।।
.
समय नहीं यह युद्ध का, करें शांति की बात।
जब जागें तब सबेरा, गाँधी युग के तात।।
०००
दोहा सलिला
.
जब जब लिखें बसंत ने, पत्र धरा के नाम।
तब तब भेजे, गगन ने बिना तार पैगाम।।
.
हाथों ने ली खोल जब, बरबस खोज किताब।
तन-मन उन्मन हो गया, पाकर फूल गुलाब।।
.
खत पर खत लिखते नहीं, कभी थके जो हाथ।
वे ही ख़त तजकर थके, बैठे पकड़े माथ।।
.
दरस-परस के दिन गुमे, मिलकर रहे अतृप्त।
सुधियों का मकरंद पी, हुए प्राण-मन तृप्त।।
.
हारे का हरिनाम है, प्रिये! तुम्हारा साथ।
रामबाण यह संपदा, खोकर नाथ अनाथ।।
.
कागज़ पीला पड़ गया, स्याही फीकी मौन।
अक्षर धुँधले पढ़ रहा, बिन झिझके मैं कौन?
२.१०.२०२६
०००
हास्य रस
चंद्रमा पर
ढूंढते रह जाओगे!!
लुगाईयाँ का घाघरा
खिचड़ी का बाजरा
सिरसम का साग
सर पै पाग
आँगण मै ऊखल
कूण मै मूसल
ढूंढते रह जाओगे!!
घरां मै लस्सी
लत्ते टाँगण की रस्सी
आग चूल्हे की
संटी दुल्हे की
कोरडा होली का
नाल मौली का
पहलवानां का लंगोट
हनुमानजी का रोट
ढूंढते रह जाओगे!!
घूंघट आली लुगाई
गाँम मै दाई
लालटेण का चानणा
बनछटीयाँ का बालणा
बधाई की भेल्ली
गाम मै हेल्ली
घरां मै बुड्ढे
बैठकाँ मै मुड्ढे
ढूंढते रह जाओगे!!
बास्सी रोटी अर अचार
गली मै घूमते लुहार
खांड का कसार
टींट का अचार
काँसी की थाली
डांगरां के पाली
बीजणा नौ डांडी का
दूध दही घी हांडी का
रसोई मै दरात
बालकां की दवात
ढूंढते रह जाओगे!!
बटेऊआँ की शान
बहुआं की आन
पील गर्मियां मैं
गूँद सर्दियाँ मैं
ताऊ का हुक्का
ब्याह का रुक्का
बोरला नानी का
गंडासा सान्नी का
कातक का नहाण
मूंज के बाण
ढूंढते रह जाओगे !!
चूल आली जोड़ी [ किवाड़ ]
गिनती मै कौड़ी
कोथली साम्मण की
रौनक दाम्मण की
पाटड़े पै नहाणा
पत्तल पै खाणा
छात्याँ मै खडंजे अर कड़ी
गुग्गा पीर की छड़ी
ढूँढते रह जाओगे !!
लूणी घी की डली
गवार की फली
पाणी भरे देग
बाहण-बेटियां के नेग
मोटे सूत की धोत्ती
घी बूरा अर रोटी
पीले चावलाँ का न्यौता
सात पोतियाँ पै पोत्ता
धौण धड़ी के बाट
मूँज - जेवड़ी की खाट
घी का माट
भुन्दे होए टाट
ढूंढते रह जाओगे!!
गुल्ली - डंडे का खेल
गुड की सेळ
ब्याह के बनवारे
सुहागी मैं छुहारे
ताँगे की सवारी
दूध की हारी
पेचदार पगड़ी
घोट्टे आली चुन्दडी
सर पै भरोट्टी
कमर पै चोट्टी
ढूढ़ते रह जाओगे !!
कासण मांजन का जूणा
साधूआँ का बलदा धुणा
गुग्गे का गुलगला
बालक चुलबला
बोरले आली ताई
सूत की कताई
मुल्तानी अर गेरू
बलध अर रेहडू
कमोई अर करवे
चा - पाणी के बरवे
ब्याह मै खोड़िया
बालकां का पोड़िया
ढूंढते रह जाओगे !!
हटड़ी अर आला
बुडकलाँ की माला
दूध पै मलाई
लोगाँ कै समाई
खेताँ मै कोल्हू
नामाँ मै गोल्हू
ढूंढते रह जाओगे
गुड़ की सुहाली
खेताँ मै हाली
हारे की सिलगती आग
ब्याह मै पेठे का साग
हाथ का बँटा बाण
सरगुन्दी आली नाण
हाथ मै झोला
खीर का कचोला
ड्योढ़ी की सोड
बंदडे का मोड़ [सेहरा ]
खेत में बैठ के खाना,
डोल्ला का सिरहाना,
लावणी करती लुगाईया,
पानी प्याती पनहारिया,
डेला नीचे खाट,
भाटा के बाट,
ढूंढते रह जाओगे !!
सिर मैं भौरी
अणपढ़ छौरी
चरमक चूँ की जूती
दुध प्यांण की तूती
मावस की खीर
पहंडे का नीर
गर्मियां मैं राबड़ी
खेताँ मैं छाबड़ी
घरां मैं पौली
कोरडे की होली
चणे के साग की कढी
चाबी तैं चालदी घडी
काबुआ कांसी का
काढ़ा खांसी का
काजल कौंचे की
शुद्धताई चौंके की
गुलगला बरसात का
चूरमा सकरात का
सीठणे लुगाइयाँ के
नखरे हलवाईयाँ के
ढूंढते रह जाओगे !!
***
छंदशाला २५
चौबोला छंद
•
विधान-
प्रति पद १५ मात्रा, पदांत IS ।
लक्षण छंद-
पंद्रह मात्रा के पद रखे।
लघु-गुरु पदों का अंत सखे।।
चौबोला बोला गह हाथ।
शारद सम्मुख हो नत माथ।।
उदाहरण-
बुंदेली खें मीठे बोल।
रस कानन मां देउत घोल।।
बम्बुलिया गा भौतइ नीक।
तुरतइ रचौ अनूठी लीक।।
आल्हा सुन खें मूँछ मरोर।
बैरी सँग अजमाउत जोर।।
मचलें कजरी राई कबीर।
फाग गा रए मलें अबीर।।
सारद माँ खें पूजन जांय।
पैले रेवा खूब नहांय।।
१-१०-२०२२
•••
छंदशाला २६
गोपी छंद
•
विधान-
प्रति पद १५ मात्रा, पदादि त्रिकल, पदांत S ।
लक्षण छंद-
पंद्रह कल, त्रिकलादि न भुला।
रास रचा कान्हा मन खिला।।
गोपी-गोप अंत गुरु रखें।
फोड़ें मटकी, माखन चखें।।
उदाहरण-
छंद साथ गोपी मिल रचें।
आदि त्रिकल, अंत गुरु परखें।।
कला दिखा पंद्रह सुख दिया।
नंद-यशोदा हुलसा हिया।।
बंसी बजी गोप सुन गए।
रास रचा प्रभु पुलकित हुए।।
जमुना तट पर खेलें खेल।
होता द्वैताद्वैती मेल।।
कान्हा हर गोपी सह नचे।
नाना रूप मनोहर रचे।।
१-१०-२०२२
•••
छंदशाला २७
जयकारी छंद
•
विधान-
प्रति पद १५ मात्रा, पदांत SI ।
लक्षण छंद-
अंतिम तिथि कल संख्या मीत।
गुरु-लघु पद का अंत सुनीत।।
जयकारी-चौपई सुनाम।
गति-यति-लय-रस छंद ललाम।।
(संकेत- अंतिम तिथि १५)
उदाहरण-
जयकारी की कला महान।
चमचे सीखें, भरें उड़ान।।
करे वार तारीफ अचूक।
बढ़ती जाती सुनकर भूख।।
कंकर को शंकर कह रहे।
बहती गंगा में बह रहे।।
चरते खेत ईनामों का।
समय है बेईमानों का।।
लेन-देन सौदे कर रहे।
कवि चारण जीकर मर रहे।।
१-१०-२०२२
•••
छंदशाला २८
भुजंगिनी/गुपाल छंद
•
विधान
प्रति पद १५ मात्रा, पदांत ISI ।
लक्षण छंद-
नचा भुजंगिनी नच गुपाल।
वसु-ऋषि नाचे ले करताल।।
लघु-गुरु-लघु पद अंत रसाल।
छंद रचे कवि, करे कमाल।।
(संकेत- वसु८+ऋषि७=१५)
उदाहरण-
अपना भारत देश महान।
जग करता इसका गुणगान।।
सजा हिमालय सिर पर ताज।
पग धोता सागर दे मान।।
नदियाँ कलकल बह दिन-रात।
पढ़तीं गीता, ग्रंथ, कुरान।।
पंछी कलरव करें हमेश।
नाप नील नभ भरें उड़ान।।
बहा पसीना करें समृद्ध।
देश हमारे श्रमिक-किसान।।
चूसें नेता-अफसर-सेठ।
खून बचाओ कृपानिधान।।
एक-नेक हम करें निसार।
भारत माँ पर अपनी जान।।
१-१०-२०२२
•••
छंदशाला २९
उज्ज्वला छंद
(इससे पूर्व- सुगती/शुभगति, छवि/मधुभार, गंग, निधि, दीप, अहीर/अभीर, शिव, भव, तोमर, ताण्डव, लीला, नित, चंद्रमणि/उल्लाला, धरणी/चंडिका, कज्जल, सखी, विजाति, हाकलि, मानव, मधुमालती, सुलक्षण, मनमोहन, सरस, मनोरम, चौबोला, गोपी, जयकारी/चौपई व भुजंगिनी/गुपाल छंद)
•
विधान
प्रति पद १५ मात्रा, पदांत SIS ।
लक्षण छंद-
उज्ज्वला रच बात बोलिए।
पंद्रह कला लिए डोलिए।।
गुरु-लघु-गुरु पदांत हो सखे!
बात में रस सलिल घोलिए।।
उदाहरण-
कृष्ण भजें पल पल राधिका।
कान्ह सुमिरे अचल साधिका।।
भव भुला चुप डूब भाव में।
भक्ति हो पतवार नाव में।।
शांत बैठ मन कर साधना।
अमला विमला रख भावना।।
नयन सूर हो बृज देख ले।
कान्ह पद रज शीश लेख ले।।
काम न आई मन कामना।
जब तक मिलता हँस श्याम ना।
२-१०-२०२२
•••
मुक्तिका
*
वो ही खुद को तलाश पाया है
जिसने खुद को खुदी भुलाया है
जो खुदी को खुदा में खोज रहा
वो खुदा में खुदी समाया है
आईना उसको क्या दिखाएगा
जिसने कुछ भी नहीं छिपाया है
जो बहा वह सलिल रहा निर्मल
जो रुका साफ रह न पाया है
देखता है जो बंदकर आँखें
दीप हो उसने तम मिटाया है
है कमालों ने क्या कमाल किया
आ कबीरों को बेच-खाया है
मार गाँधी को कह रहे बापू
झूठ ने सत्य को हराया है
***
छंद कार्य शाला :
राधिका छंद १३-९
लक्षण: २२ मात्रिक, द्विपदिक, समतुकांती छंद.
विधान: यति १३-९, पदांत मगण २२२
उदाहरण:
१.
जिसने हिंदी को छोड़, लिखी अंग्रेजी
उसने अपनी ही आन, गर्त में भेजी
निज भाषा-भूषा की न, चाह क्यों पाली?
क्यों दुग्ध छोड़कर मय, प्याले में ढाली
*
नवप्रयोग
२. मुक्तक
गाँधी की आँधी चली, लोग थे जागे
सत्याग्रहियों में होड़, कौन हो आगे?
लाठी-डंडों को थाम, सिपाही दौड़े-
जो कायर थे वे पीठ, दिखा झट भागे
*
३. मुक्तिका
था लालबहादुर सा न, दूसरा नेता
रह सत्ता-सुख से दूर, नाव निज खेता
.
अवसर आए अनगिनत, न किंतु भुनाए
वे जिए जनक सम अडिग, न उन सा जेता
.
पाकी छोटा तन देख, समर में कूदे
हिमगिरि सा ऊँचा अजित, मनोबल चेता
.
व्रत सोमवार को करे, देश मिल सारा
अमरीका का अभिमान, कर दिया रेता
.
कर 'जय जवान' उद्घोष, गगन गुंजाया
फिर 'जय किसान' था जोश, नया भर देता
*
असमय ही आया समय, विदा होने का
क्या समझे कोई लाल, विदा है लेता
छंद कार्य शाला :
राधिका छंद
लक्षण: २२ मात्रिक, द्विपदिक, समतुकांती छंद।
विधान: यति १३-९, पदांत यगण १२२ , मगण २२२।
***
अभिनव प्रयोग
गीत
*
क्यों मूल्य हुए निर्मूल्य,
कौन बतलाए?
क्यों अपने ही रह गए,
न सगे; पराए।।
*
तुलसी न उगाई कहाँ,
नवाएँ माथा?
'लिव इन' में कैसे लगे
बहू का हाथा?
क्या होता अर्पण और
समर्पण क्यों हो?
जब बराबरी ही मात्र,
लक्ष्य रह जाए?
क्यों मूल्य हुए निर्मूल्य,
कौन बतलाए?
*
रिश्ते न टिकाऊ रहे,
यही है रोना।
संबंध बिकाऊ बना
चैन मत खोना।।
मिल प्रेम-त्याग का पाठ
न भूल पढ़ाएँ।
बिन दिशा तय किए कदम,
न मंजिल पाए।।
क्यों मूल्य हुए निर्मूल्य,
कौन बतलाए?
*
२-१०-२०१८
***
नवगीत:
*
सत्याग्रह के नाम पर.
तोडा था कानून
लगा शेर की दाढ़ में
मनमानी का खून
*
बीज बोकर हो गये हैं दूर
टीसता है रोज ही नासूर
तोड़ते नेता सतत कानून
सियासत है स्वार्थ से भरपूर
.
भगतसिंह से किया था अन्याय
कौन जाने क्या रहा अभिप्राय?
गौर तन में श्याम मन का वास
देश भक्तों को मिला संत्रास
.
कब कहाँ थे खो गये सुभाष?
बुने किसने धूर्तता के पाश??
समय कैसे कर सकेगा माफ़?
वंश का ही हो न जाए नाश.
.
तीन-पाँच पढ़ते रहे
अब तक जो दो दून
समय न छोड़े सत्य की
भट्टी में दे भून
*
नहीं सुधरे पटकनी खाई
दाँत पीसो व्यर्थ मत भाई
शास्त्री जी की हुई क्यों मौत?
अभी तक अज्ञात सच्चाई
.
क्यों दिये कश्मीरियत को घाव?
दहशतों का बढ़ गया प्रभाव
हिन्दुओं से गैरियत पाली
डूबा ही दी एकता की नाव
.
जान की बाजी लगाते वीर
जीतते हैं युद्ध सहकर पीर
वार्ता की मेज जाते हार
जमीं लौटा भोंकते हो तीर
.
क्यों बिसराते सत्य यह
बिन पानी सब सून?
अब तो बख्शो देश को
'सलिल' अदा कर नून
***
: अलंकार चर्चा १५ :
शब्दालंकार : तुलना और अंतर
*
शब्द कथ्य को अलंकृत, करता विविध प्रकार
अलंकार बहु शब्द के, कविता का श्रृंगार
यमक श्लेष अनुप्रास सँग, वक्र-उक्ति का रंग
छटा लात-अनुप्रास की, कर देती है दंग
साम्य और अंतर 'सलिल', रसानंद का स्रोत
समझ रचें कविता अगर, कवि न रहे खद्योत
शब्दालंकारों से काव्य के सौंदर्य में निस्संदेह वृद्धि होती है, कथ्य अधिक ग्रहणीय तथा स्मरणीय हो जाता है. शब्दालंकारों में समानता तथा विषमता की जानकारी न हो तो भ्रम उत्पन्न हो जाता है. यह प्रसंग विद्यार्थियों के साथ-साथ शिक्षकों, जान सामान्य तथा रचनाकारों के लिये समान रूप से उपयोगी है.
अ. अनुप्रास और लाटानुप्रास:
समानता: दोनों में आवृत्ति जनित काव्य सौंदर्य होता है.
अंतर: अनुप्रास में वर्ण (अक्षर या मात्रा) का दुहराव होता है.
लाटानुप्रास में शब्द (सार्थक अक्षर-समूह) का दुहराव होता है.
उदाहरण: अगम अनादि अनंत अनश्वर, अद्भुत अविनाशी
'सलिल' सतासतधारी जहँ-तहँ है काबा-काशी - अनुप्रास (छेकानुप्रास, अ, स, क)
*
अपना कुछ भी रहा न अपना
सपना निकला झूठा सपना - लाटानुप्रास (अपना. सपना समान अर्थ में भिन्न अन्वयों के साथ शब्द का दुहराव)
आ. लाटानुप्रास और यमक:
समानता : दोनों में शब्द की आवृत्ति होती है.
अंतर: लाटानुप्रास में दुहराये जा रहे शब्द का अर्थ एक ही होता है जबकि यमक में दुहराया गया शब्द हर बार भिन्न (अलग) अर्थ में प्रयोग किया जाता है.
उदाहरण: वह जीवन जीवन नहीं, जिसमें शेष न आस
वह मानव मानव नहीं जिसमें शेष न श्वास - लाटानुप्रास (जीवन तथा मानव शब्दों का समान अर्थ में दुहराव)
*
ढाल रहे हैं ढाल को, सके आक्रमण रोक
ढाल न पाये ढाल वह, सके ढाल पर टोंक - यमक (ढाल = ढालना, हथियार, उतार)
इ. यमक और श्लेष:
समानता: दोनों में शब्द के अनेक (एक से अधिक) अर्थ होते हैं.
अंतर: यमक में शब्द की कई आवृत्तियाँ अलग-अलग अर्थ में होती हैं.
श्लेष में एक बार प्रयोग किया गया शब्द एक से अधिक अर्थों की प्रतीति कराता है.
उदाहरण: छप्पर छाया तो हुई, सर पर छाया मीत
छाया छाया बिन शयन, करती भूल अतीत - यमक (छाया = बनाया, छाँह, नाम, परछाईं)
*
चाहे-अनचाहे मिले, जीवन में तय हार
बिन हिचके कर लो 'सलिल', बढ़कर झट स्वीकार -श्लेष (हार = माला, पराजय)
*
ई. श्लेष और श्लेष वक्रोक्ति:
समानता: श्लेष और श्लेष वक्रोक्ति दोनों में किसी शब्द के एक से अधिक अर्थ होते हैं.
अंतर: श्लेष में किसी शब्द के बहु अर्थ होना ही पर्याप्त है. वक्रोक्ति में एक अर्थ में कही गयी बात का श्रोता द्वारा भिन्न अर्थ निकाला (कल्पित किया जाना) आवश्यक है.
उदहारण: सुर साधे सुख-शांति हो, मुँद जाते हैं नैन
मानस जीवन-मूल्यमय, देता है नित चैन - श्लेष (सुर = स्वर, देवता / मानस = मनस्पटल, रामचरित मानस)
'पहन लो चूड़ी', कहा तो, हो गयी नाराज
ब्याहता से कहा ऐसा क्यों न आई लाज? - श्लेष वक्रोक्ति (पहन लो चूड़ी - चूड़ी खरीद लो, कल्पित अर्थ ब्याह कर लो)
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नवगीत:
गाँधी
*
गाँधी को मारा
आरोप
गाँधी को भूले
आक्रोश
भूल सुधारी
गर वंदन कर
गाँधी को छीना
प्रतिरोध
गाँधी नहीं बपौती
मानो
गाँधी सद्विचार
सच जानो
बाँधो मत सीमा में
गाँधी
गाँधी परिवर्तन की
आँधी
स्वार्थ साधते रहे
अबोध
गाँधी की मत
नकल उतारो
गाँधी को मत
पूज बिसारो
गाँधी बैठे मन
मंदिर में
तन से गाँधी को
मनुहारो
कर्म करो सत
है अनुरोध
२-१०-२०२०
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मुक्तक :
सज्जित कर दे रत्न मणि, हिंदी मंदिर आज
'सलिल' निरंतर सृजन कर, हो हिंदी-सर ताज
सरकारों ने कब किया भाषा का उत्थान?
जनवाणी जनतंत्र में, कब कर पाई राज??
२.१०.२०१५
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लघुकथा:
गाँधी और गाँधीवाद
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'बापू आम आदमी के प्रतिनिधि थे. जब तक हर भारतीय को कपडा न मिले, तब तक कपडे न पहनने का संकल्प उनकी महानता का जीवत उदाहरण है. वे हमारे प्रेरणास्रोत हैं' -नेताजी भाषण फटकारकर मंच से उतरकर अपनी मंहगी आयातित कार में बैठने लगे तो पत्रकारों ऐ उनसे कथनी-करनी में अन्तर का कारन पूछा.
नेताजी बोले- 'बापू पराधीन भारत के नेता थे. उनका अधनंगापन पराये शासन में देश की दुर्दशा दर्शाता था, हम स्वतंत्र भारत के नेता हैं. अपने देश के जीवनस्तर की समृद्धि तथा सरकार की सफलता दिखाने के लिए हमें यह ऐश्वर्य भरा जीवन जीना होता है. हमारी कोशिश तो यह है की हर जनप्रतिनिधि को अधिक से अधिक सुविधाएं दी जायें.'
' चाहे जन प्रतिनिधियों की सविधाएं जुटाने में देश के जनगण क दीवाला निकल जाए. अभावों की आग में देश का जन सामान्य जलाता रहे मगर नेता नीरो की तरह बांसुरी बजाते ही रहेंगे- वह भी गाँधी जैसे आदर्श नेता की आड़ में.' - एक युवा पत्रकार बोल पड़ा. अगले दिन से उसे सरकारी विज्ञापन मिलना बंद हो गया.
२-१०-२०१४
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नवगीत: उत्सव का मौसम
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उत्सव का
मौसम आया
मन बन्दनवार बनो...
*
सूना पनघट और न सिसके.
चौपालों की ईंट न खिसके..
खलिहानों-अमराई की सुध
ले, बखरी की नींव न भिसके..
हवा विषैली
राजनीति की
बनकर पाल तनो...
*
पछुआ को रोके पुरवाई.
ब्रेड-बटर तज दूध-मलाई
खिला किसन को हँसे जसोदा-
आल्हा-कजरी पड़े सुनाई..
कंस बिराजे
फिर सत्ता पर
बन बलराम धुनो...
*
नेह नर्मदा सा अविकल बह.
गगनविहारी बन न, धरा गह..
खुद में ही खुद मत सिमटा रह-
पीर धीर धर, औरों की कह..
दीप ढालने
खातिर माटी के
सँग 'सलिल' सनो.
२-१०-११
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