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बुधवार, 12 मई 2021

स्वतंत्रता समर व सत्याग्रह में जबलपुर के कायस्थों का योगदान

 

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एका जबलपुर - विकास जबलपुर



भारतीय स्वतंत्रता अमृत महोत्सव २०२०-२०२१
स्वतंत्रता समर व सत्याग्रह में जबलपुर के कायस्थों का योगदान
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भारतीय स्वतंत्रता की अमृत जयंती वर्ष के अवसर पर भारत की स्वतन्त्रता प्राप्ति में जबलपुर के कायस्थों के योगदान की झलक प्रस्तुत करती स्मरणिका तैयार की जा रही है। इस हेतु जबलपुर में जन्मे / कार्यरत रहे / बसे कायस्थ शहीदोड़ों तथा सत्याग्रहियों के चित्र तथा संक्षिप्त परिचय (नाम, जन्म तिथि, मूल स्थान, माता-पिता-जीवनसाथी के नाम, शिक्षा, आजीविका, प्रकाशित पुस्तकें, उपलब्धियाँ, डाक का पता, दूरभाष/चलभाष क्रमांक, ईमेल आदि) आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' वॉट्सऐप ९४२५१-८३२४४ ईमेल salil.sanjiv@gmail.com या राजीव लाल वॉट्सऐप ९४२५८ ६४३६४ पर अविलंब उपलब्ध कराएँ। यह सामग्री भावी पीढ़ियों को अपने पूर्वजों के अवदान की जानकारी उपलब्ध कराएगी।
जबलपुर जिले तथा संभाग में स्थित चित्रगुप्त मंदिरों, कार्यरत कायस्थ संस्थाओं संबंधी जानकारी भी आमंत्रित है।
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हिंदी साहित्य के विकास में जबलपुर के कायस्थों का योगदान

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एका जबलपुर - विकास जबलपुर



भारतीय स्वतंत्रता अमृत महोत्सव २०२०-२०२१
हिंदी साहित्य के विकास में जबलपुर के कायस्थों का योगदान
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भारतीय स्वतंत्रता की अमृत जयंती वर्ष के अवसर पर हिंदी साहित्य के विकास में जबलपुर के कायस्थों के योगदान की झलक प्रस्तुत करती स्मरणिका तैयार की जा रही है। इस हेतु जबलपुर में जन्मे / कार्यरत रहे / बसे कायस्थ साहित्यकारों के चित्र तथा संक्षिप्त परिचय (नाम, जन्म तिथि, मूल स्थान, माता-पिता-जीवनसाथी के नाम, शिक्षा, आजीविका, प्रकाशित पुस्तकें, उपलब्धियाँ, डाक का पता, दूरभाष/चलभाष क्रमांक, ईमेल आदि) आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' वॉट्सऐप ९४२५१-८३२४४ ईमेल salil.sanjiv@gmail.com या राजीव लाल वॉट्सऐप ९४२५८ ६४३६४ पर अविलंब उपलब्ध कराएँ। यह सामग्री भावी पीढ़ियों को अपने पूर्वजों के अवदान की जानकारी उपलब्ध कराएगी।
जबलपुर जिले तथा संभाग में स्थित चित्रगुप्त मंदिरों, कार्यरत कायस्थ संस्थाओ, संबंधी जानकारी भी आमंत्रित है।
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दोहा सलिला

 दोहा सलिला

*
मंगल है मंगल करें, विनती मंगलनाथ
जंगल में मंगल रहे, अब हर पल रघुनाथ
सभ्य मनुज ने कर दिया, सर्वनाश सब ओर
फिर हो थोड़ा जंगली, हो उज्जवल हर भोर
संपद की चिंता करें, पल-पल सब श्रीमंत
अवमूल्यित हैं मूल्य पर, बढ़ते मूल्य अनंत
नया एक पल पुराना, आजीवन दे साथ
साथ न दे पग तो रहे, कैसे उन्नत माथ?
रह मस्ती में मस्त मन, कभी न होगा पस्त
तज न दस्तकारी मनुज, दो-दो पाकर दस्त
***
संजीव
१२-५-२०२०

दोहा, मुक्तक

दोहा सलिला 
*
जब चाहा संवाद हो, होता वाद-विवाद
निर्विवाद में भी मिला, हमको छिपा विवाद.
१२-५-२०१५
मुक्तक:
संजीव
.
कलकल बहते निर्झर गाते
पंछी कलरव गान सुनाते गान
मेरा भारत अनुपम अतुलित
लेने जन्म देवता आते
.
ऊषा-सूरज भोर उगाते
दिन सपने साकार कराते
सतरंगी संध्या मन मोहे
चंदा-तारे स्वप्न सजाते
.
एक साथ मिल बढ़ते जाते
गिरि-शिखरों पर चढ़ते जाते
सागर की गहराई नापें
आसमान पर उड़ मुस्काते
.
द्वार-द्वार अल्पना सजाते
रांगोली के रंग मन भाते
चौक पूरते करते पूजा
हर को हर दिन भजन सुनाते
.
शब्द-ब्रम्ह को शीश झुकाते
राष्ट्रदेव पर बलि-बलि जाते
धरती माँ की गोदी खेले
रेवा माँ में डूब नहाते
***
१२-५-२०१५

नवगीत कब होंगे आज़ाद?

नवगीत
कब होंगे आज़ाद???...
संजीव 'सलिल'
*
कब होंगे आजाद?
कहो हम
कब होंगे आजाद?
*
गए विदेशी पर देशी
अंग्रेज कर रहे शासन
भाषण देतीं सरकारें पर दे
न सकीं हैं राशन
मंत्री से संतरी तक कुटिल
कुतंत्री बनकर गिद्ध-
नोच-खा रहे
भारत माँ को
ले चटखारे स्वाद
कब होंगे आजाद?
कहो हम
कब होंगे आजाद?
*
नेता-अफसर दुर्योधन हैं,
जज-वकील धृतराष्ट्र
धमकी देता सकल राष्ट्र
को खुले आम महाराष्ट्र
आँख दिखाते सभी
पड़ोसी, देख हमारी फूट-
अपने ही हाथों
अपना घर
करते हम बर्बाद
कब होंगे आजाद?
कहो हम
कब होगे आजाद?
*
खाप और फतवे हैं अपने
मेल-जोल में रोड़ा
भष्टाचारी चौराहे पर खाए
न जब तक कोड़ा
तब तक वीर शहीदों के
हम बन न सकेंगे वारिस-
श्रम की पूजा हो
समाज में
ध्वस्त न हो मर्याद
कब होंगे आजाद?
कहो हम
कब होंगे आजाद?
*
पनघट फिर आबाद हो
सकें, चौपालें जीवंत
अमराई में कोयल कूके,
काग न हो श्रीमंत
बौरा-गौरा साथ कर सकें
नवभारत निर्माण-
जन न्यायालय पहुँच
गाँव में
विनत सुनें फ़रियाद-
कब होंगे आजाद?
कहो हम
कब होंगे आजाद?
*
रीति-नीति, आचार-विचारों
भाषा का हो ज्ञान
समझ बढ़े तो सीखें
रुचिकर धर्म प्रीति
विज्ञान
सुर न असुर, हम आदम
यदि बन पायेंगे इंसान-
स्वर्ग तभी तो
हो पायेगा
धरती पर आबाद
कब होंगे आजाद?
कहो हम
कब होंगे आजाद?
**************

महेश किशोर शर्मा

शोकांजलि 
महेश किशोर शर्मा जी के महाप्रस्थान पर
























भोला था स्वभाव जिनका वे श्री महेश जी नहीं रहे 
व्यथा कथा लक्ष्मी भौजी के मन की बोलो कौन कहे
कोरोना मैया क्या कर रईं?, कितनों को ले जाओगी?
शांत शीतला हुईं, आप भी शीघ्र शांत हो, सुत न दहे 

अग्रज जाते, हमको कहिए कौन मार्ग दिखलाएगा 
अनुज जा रहे, कंधों पर फिर हमको कौन उठाएगा?
परेशान यम गण बेचारे, निश-दिन करते काम थके-
कुछ अवकाश उन्हें दो, मानव भी कुछ राहत पाएगा 

अश्रु पोंछने कैसे जाएँ?, रोक लगी है मत निकलो 
घर में बैठ बहाओ आँसू, व्यथा-ताप पाकर पिघलो 
कठिन परीक्षा की बेला है, भौजी मन में धैर्य धरें -
बच्चे-बहुएँ, नाती-पोते, गहो विरासत झट सम्हलो 
१२-५-२०२१ 
***

मंगलवार, 11 मई 2021

बाल गीत: लँगड़ी खेलें

बाल गीत:
लँगड़ी खेलें.....
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
आओ! हम मिल
लँगड़ी खेलें.....
*
एक पैर लें
जमा जमीं पर।
रखें दूसरा
थोडा ऊपर।
बना संतुलन
निज शरीर का-
आउट कर दें
तुमको छूकर।
एक दिशा में
तुम्हें धकेलें।
आओ! हम मिल
लँगड़ी खेलें.....
*
आगे जो भी
दौड़ लगाये।
कोशिश यही
हाथ वह आये।
बचकर दूर न
जाने पाए-
चाहे कितना
भी भरमाये।
हम भी चुप रह
करें झमेले।
आओ! हम मिल
लँगड़ी खेलें.....
*
हा-हा-हैया,
ता-ता-थैया।
छू राधा को
किशन कन्हैया।
गिरें धूल में,
रो-उठ-हँसकर,
भूलें- झींकेगी
फिर मैया।
हर पल 'सलिल'
ख़ुशी के मेले।
आओ! हम मिल
लँगड़ी खेलें.....
*************

बाल कविता मुहावरा कौआ स्नान

बाल कविता
मुहावरा कौआ स्नान
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
कौआ पहुँचा नदी किनारे, शीतल जल से काँप-डरा रे!
कौवी ने ला कहाँ फँसाया, राम बचाओ फँसा बुरा रे!!
*
पानी में जाकर फिर सोचे, व्यर्थ नहाकर ही क्या होगा?
रहना काले का काला है, मेकप से मुँह गोरा होगा। .
*
पूछा पत्नी से 'न नहाऊँ, क्यों कहती हो बहुत जरूरी?'
पत्नी बोली आँख दिखाकर 'नहीं चलेगी अब मगरूरी।।'
*
नहा रहे या बेलन, चिमटा, झाड़ू लाऊँ सबक सिखाने
कौआ कहे 'न रूठो रानी! मैं बेबस हो चला नहाने'
*
निकट नदी के जाकर देखा पानी लगा जान का दुश्मन
शीतल जल है, करूँ किस तरह बम भोले! मैं कहो आचमन?
*
घूर रही कौवी को देखा पैर भिगाये साहस करके
जान न ले ले जान!, मुझे जीना ही होगा अब मर-मर के
*
जा पानी के निकट फड़फड़ा पंख दूर पल भर में भागा
'नहा लिया मैं, नहा लिया' चिल्लाया बहुत जोर से कागा
*
पानी में परछाईं दिखाकर बोला 'डुबकी आज लगाई
अब तो मेरा पीछा छोडो, ओ मेरे बच्चों की माई!'
*
रोनी सूरत देख दयाकर कौवी बोली 'धूप ताप लो
कहो नर्मदा मैया की जय, नाहक मुझको नहीं शाप दो'
*
गाय नर्मदा हिंदी भारत भू पाँचों माताओं की जय
भागवान! अब दया करो चैया दो तो हो पाऊँ निर्भय
*
उसे चिढ़ाने कौवी बोली' आओ! संग नहा लो-तैर'
कर ''कौआ स्नान'' उड़ा फुर, अब न निभाओ मुझसे बैर
*
बच्चों! नित्य नहाओ लेकिन मत करना कौआ स्नान
रहो स्वच्छ, मिल खेलो-कूदो, पढ़ो-बढ़ो बनकर मतिमान
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मुक्तक, गीत

मुक्तक
भारत का धन जो विदेश में उसको भारत लायेंगे.
रामदेव बाबा के संग हम सच की अलख जगायेंगे..
'सलिल'-साधना पूरी हो संकल्प सभी जन-गण ले अब-
राजनीति हो लोकनीति, हम नया सवेरा लायेंगे..
११-५-२०११

*
गीत:
ओ मेरे मन...  
*
धूप-छाँव सम सुख-दुःख आते-जाते रहते.
समय-नदी में लहर-भँवर प्रति पल हैं बहते.
राग-द्वेष से बच, शुभ का कर चिंतन.
ओ मेरे मन...
*
पुलक मिलन में, विकल विरह में तपना-दहना.
ऊँच-नीच को मौन भाव से चुप हो सहना.
बात दूसरों की सुन, खुद भी कर मन-मंथन.
ओ मेरे मन...
*
पीर-व्यथा अपने मन की मत जगसे कहना?
यादों की उजली चादर को फिर-फिर तहना.
दुनियावालों! दुनियादारी करती उन्मन.
ओ मेरे मन...
११-५-२०१२ 
*

दोहे गीता अध्याय २

 ॐ
श्रीमद्भग्वद्गीता  
*
छोटा मन रखकर कभी, बड़े न होते आप। 
औरों के पैरों कभी, खड़े न होते आप।।  
*
भीष्म भरम जड़ यथावत, ठुकराएँ बदलाव। 
अहंकार से ग्रस्त हो, खाते-देते घाव
*
अर्जुन संशय पूछता प्रश्न, न करता कर्म। 
मोह और आसक्ति को समझ रहा निज धर्म
*
पल-पल परिवर्तन सतत, है जीवन का मूल
कंकर हो शंकर कभी, और कभी हो धूल
*
उहापोह में भटकता, भूल रहा निज कर्म। 
चिंतन कर परिणाम का, करता भटक विकर्म
*
नहीं करूँगा युद्ध मैं, कहता धरकर शस्त्र। 
सम्मुख योद्धा हैं अगिन, लिए हाथ में अस्त्र
*
जो जन्मा वह मरेगा, उगा सूर्य हो अस्त। 
कब होते विद्वानजन, सोच-सोचकर त्रस्त
*
मिलीं इन्द्रियाँ इसलिए, कर उनसे तू कर्म। 
फल क्या होगा इन्द्रियाँ, सोच न करतीं धर्म
*
चम्मच में हो भात या, हलवा परसें आप।  
शोक-हर्ष सकता नहीं, है चम्मच में व्याप
*
मीठे या कटु बोल हों, माने कान समान। 
शोक-हर्ष करता नहीं, मन मत बन नादान
*
जीवन की निधि कर्म है, करते रहना धर्म। 
फल का चिन्तन व्यर्थ है, तज दो मान विकर्म
*
सांख्य शास्त्र सिद्धांत का, ज्ञान-कर्म का मेल। 
योगी दोनों साधते, जग-जीवन हो खेल
*
सम्यक समझ नहीं अगर, तब ग्रस लेता मोह
बुद्धि भ्रमित होती तभी, तन करता विद्रोह
*
मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। 
संशय कर देता भ्रमित, फल चिंता तज मीत
*
केवल देह न सत्य है, तन में मन भी साथ। 
तन-मन भूषण आत्म के, मूल एक परमात्म
*
आत्मा लेती जन्म जब, तब तन हो आधार। 
वस्त्र सरीखी बदलती, तन खुद बिन आकार।।
*
सांख्य ज्ञान सँग कर्म का, सम्मिश्रण है मीत।  
मन प्रवृत्ति कर विवेचन, सहज निभाए रीत
*
तर्क कुतर्क न बन सके, रखिए इसका ध्यान। 
सांख्य कहे भ्रम दूर कर, कर्म करे इंसान
*
देखें अपने दोष खुद, कहें न करिए शर्म
दोष दूर कर कर्म कर, वरिए अपना धर्म
*
कर सकते; करते नहीं, जो होते बदनाम। 
कर सकते जो कीजिए, तभी मिले यश-मान
*
होनी होती है अटल, होगी मत कर सोच। 
क्या कब कैसे सोचकर, रखो न किंचित लोच
*
दो पक्षों के बीच में, जा संशय मत पाल। 
बढ़ता रह निज राह पर, कर्म योग मत टाल
*
हानि-लाभ हैं एक से, यश-अपयश सम मान। 
सोच न फल कर कर्म निज, पाप न इसको जान
*
ज्ञान योग के साथ कर, कर्म योग का मेल। 
अपना धर्म न भूल तू, घटनाक्रम है खेल
*
हानि लाभ जीवन मरण, यश अपयश विधि हाथ। 
करता चल निज कर्म तू, उठा-झुका कर माथ
*
तज कर फल आसक्ति तू, करते जा निज कर्म। 
बंधन बने न कर्म तब, कर्म योग ही धर्म
*
१०-५-२०२१ 

मुक्तिका

मुक्तिका
*
कोरोना की टाँग अड़ी है
सबकी खटिया हुई खड़ी है
मुश्किल में है आज जिंदगी
सतत मौत की लगी झड़ी है
शासनतंत्र-प्रशासन असफल
भीत मीडिया विषम घड़ी है
जनगण मरता है, मरने दो
सत्ता की लालसा बड़ी है
रोजी-रोटी के लाले हैं
व्यापारी की नियत सड़ी है
अस्पताल औषधि अति मँहगे
केर-बेर की जुड़ी कड़ी है
मेहनतकश का जीना दूभर
भक्तों का दल लिए छड़ी है
***

रविवार, 9 मई 2021

कुण्डलिया - पुस्तक

कुण्डलिया - पुस्तक 
*
पुस्तक मानव सभ्यता, संस्कृति की पहचान
पृष्ठ-पृष्ठ पर समाहित, नव कोशिश अरमान
नव कोशिश अरमान, तिमिर में दीप जलाते
मानो कभी न हार, मनुज को पाठ पढ़ाते
कहे सलिल कविराय, ज्ञान दर पर दे दस्तक
राह दिखाती सतत, साथ तेरे यदि पुस्तक
*
पुस्तक प्यारी हो जिसे, उसका है सौभाग्य
पुस्तक छोड़ न पा रहे, जो लेते वैराग्य
जो लेते वैराग्य, न जोड़ें मिथ्या माया
लेकिन भाता उन्हें, सदा पुस्तक का साया
दो को ही कर नमन, झुकाते हैं ऋषि मस्तक
पहला है हरि चरण, और दूजी है पुस्तक
*
पुस्तक पुस्तक पर लिखा, है पाठक का नाम
बहुत अभागे वे मनुज, जिनका लिखा न नाम
जिनका लिखा न नाम, अपढ़ रह गए अजाने
भाग्य भरोसे जिएँ, तरीके सही न जानें
कहता कवि संजीव, बजाओ तब तुम हस्तक
जब लग जाए हाथ, तुम्हारे उत्तम पुस्तक
*

कोरोना

विश्ववाणी हिंदी संस्थान - अभियान जबलपुर
*
विमर्श - कोरोना : अभिशाप में वरदान
अध्यक्षीय संबोधन : संजीव वर्मा 'सलिल'
×
माँ शारदा - माँ भारती को प्रणाम। मुख्य अतिथि प्रिय विनोद जैन वाग्वर तथा सारगर्भित बीज वक्तव्य हेतु बसंत शर्मा जी के प्रति आभार। कुशल संचालन हेतु आलोक रंजन जी के प्रति शुभाशंसा। सभी वक्ताओं पुनीता जी, रजनी जी, छाया जी, मंजरी जी, संतोष जी, बबिता जी, शशि जी, कामना बिटिया, मुकुल जी, अरविन्द जी, अरुण जी, श्वेतांक किशोर जी, राजीव जी, श्यामलकिशोर जी, राजकुमार जी, महेशप्रकाश जी, ने विषय पर केंद्रित सटीक विचार व्यक्त कर इस विमर्श की सार्थकता सिद्ध की है। आप सबको हृद्तल से साधुवाद। इस विमर्श का विचार करते समय शंका थी कि कितना सफल होगा? आप सबने सिद्ध कर दिया 'विश्वासम फलदायकं' ।
कोरोना के संदर्भ में रामचरित मानस में उत्तरकाण्ड में कुछ संकेत हैं।
सब कई निंदा जे जड़ करहीं। ते चमगादुर होइ अवतरहीं।
सुनहु तात अब मानस रोगा। जिन्ह ते दुःख पावहिं सब लोग।। १२० / १४
सबकी निंदा करनेवाला चीन, चमगादड़ व् मेंढक उनका आहार है। वाइरोलोजी की पुस्तकों व् अनुसंधानों के अनुसार कोविद १९ महामारी चमगादडो से मनुष्यों में फैली है।
काम बात कफ लोभ अपारा। क्रोध पित्त नित छाती जारा।। १२० / १५
कोरोना में कफ ही कंठ और वक्ष को प्रभावित कर रहा है।
एक ब्याधि बस नर मरहिं ए असाधि बहु ब्याधि।
पीड़हिं संतत जीव कहुँ सो किमि लहै समाधि॥१२१ क
एक ही व्याधि (रोग कोविद १९) से असंख्य लोग मरेंगे, फिर अनेक व्याधियाँ (कोरोना के साथ मधुमेह, रक्तचाप, कैंसर, हृद्रोग आदि) हों तो मनुष्य चैन से समाधि (मुक्ति / शांति) भी नहीं पा सकता।
नेम धर्म आचार तप, ज्ञान जग्य जप दान।
भेषज पुनि कोटिन्ह नहिं, रोग जाहिं हरिजान।। १२१ ख
नियम (एकांतवास, क्वारेंटाइन), धर्म (समय पर औषधि लेना), सदाचरण (स्वच्छता, सामाजिक दूरी, सेनिटाइजेशन,गर्म पानी पीना आदि ), तप (व्यायाम आदि से प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाना), ज्ञान (क्या करें या न करें जानना), यज्ञ (मनोबल हेतु ईश्वर का स्मरण), दान (गरीबों को या प्रधान मंत्री कोष में) आदि अनेक उपाय हैं तथापि व्याधि सहजता से नहीं जाती।
एहि बिधि सकल जीव जग रोगी। सोक हरष भय प्रीति बियोगी।।
मानस रोग कछुक मैं गाए। हहिं सब कें लखि बिरलेहिं पाए।।१२१ / १
इस प्रकार सब जग रोगग्रस्त होगा (कोरोना से पूरा विश्व ग्रस्त है) जो शोक, हर्ष, भय, प्यार और विरह से ग्रस्त होगा। हर देश दूसरे देश के प्रति शंका, भय, द्वेष, स्वार्थवश संधि, और संधि भंग आदि से ग्रस्त है। तुलसी ने कुछ मानसिक रोगों का संकेत मात्र किया है, शेष को बहुत थोड़े लोग (नेता, अफसर, विशेषज्ञ) जान सकेंगे।
जाने ते छीजहिं कछु पापी। नास न पावहिं जन परितापी।।
बिषय कुपथ्य पाइ अंकुरे। मुनिहु हृदयँ का नर बापुरे।। १२१ / २
जिनके बारे में पता च जाएगा ऐसे पापी (कोरोनाग्रस्त रोगी, मृत्यु या चिकित्सा के कारण) कम हो जायेंगे , परन्तु विषाणु का पूरी तरह नाश नहीं होगा। विषय या कुपथ्य (अनुकूल परिस्थिति या बदपरहेजी) की स्थिति में मुनि (सज्जन, स्वस्थ्य जन) भी इनके शिकार हो सकते हैं जैसे कुछ चिकित्सक आदि शिकार हुए तथा ठीक हो चुके लोगों में दुबारा भी हो सकता है।
तुलसी यहीं नहीं रुकते, संकेतों में निदान भी बताते हैं।
राम कृपाँ नासहिं सब रोगा। जौं एहि भाँति बनै संजोगा॥
सदगुर बैद बचन बिस्वासा। संजम यह न बिषय कै आसा॥ १२१ / ३
ईश्वर की कृपा से संयोग (जिसमें रोगियों की चिकित्सा, पारस्परिक दूरी, स्वच्छता, शासन और जनता का सहयोग) बने, सद्गुरु (सरकार प्रमुख) तथा बैद (डॉक्टर) की सलाह मानें, संयम से रहे, पारस्परिक संपर्क न करें तो रोग का नाश हो सकता है।
नकारात्मकता हल नहीं :
कोरोना को लेकर पत्रकार जगत अतिशयोक्तिपरक सनसनीखेज नकारात्मकता फैलाता रहा है।
रात के अँधेरे के बाद भोर का उजाला :
हमारी दृष्टि यह है कि "रात भर का है मेहमां अँधेरा, किसके रोके रुका है सवेरा"। अभिशाप कोरोना का मुकाबला कर हम इसे वरदान बना दें।
तालाबंदी के इन दिनों में पारंपरिक परिवार पद्धति को पुनर्जीवन मिला है। पीढ़ियों के बीच का अंतर घटा है। दूरियों का स्थान निकटता ले रही है। बरसों बाद पूरा परिवार एक साथ दूरदर्शन देखते समय निकट रह पा रहा है। यह नैकट्य स्थायी हो। तीन पीढ़ियाँ एक साथ रहें, बात करें, सुख-दुख बाँटें। समाज में वृद्धाश्रम घटें।
विवाह, अंतिम संस्कार आदि सादगी व मितव्ययिता से करने की परंपरा बन रही है, इसे स्थायित्व दें। झूठी शान-शौकत की आदत ख़त्म करें। वह राशि किसी समाजोपयोगी कार्य में लगाएँ।
इस दुष्काल में निर्धनों व असहायों की सहायता की प्रवृत्ति बढ़ी है। जीव-जंतुओें, पशु-पक्षियों के प्रति सद्भावना बढ़ी है। हमारे बचपन में हर घर में हर दिन गाय, कुत्ते, भिखारी के लिए रोटी बनती थी। चीटियों, पंछियों और मछलियों को आहार दिया जाता था। यह अब फिर से हो।
कोरोना के प्रतिबंधों में पर्यावरण प्रदूषण घटा है। वायु, जल, ध्वनि सभी शुद्ध हुए हैं। सामाजिक प्रदूषण अपराध और भ्रष्टाचार कम हुआ है। क्यों न हम इसे हमेशा के लिए घटा दें? वाहनों का दुरुपयोग हमेशा के लिए छोड़ दिया जाए। देश के आयल पूल का घाटा कम हो। वाहन आवश्यक होने पर ही चलाएँ। इससे सड़क दुर्घटना भी कम होंगी।
कोरोना का मुकाबला करने के लिए सामाजिक एकता बढ़ी है। समर्थों के मन में असमर्थों के प्रति सहायता का भाव उमड़ा है। यह हमारे दैनिक जीवन का अंग बने। हर समर्थ व्यक्ति किसी गरीब विद्यार्थी के अध्ययन का खर्च उठाए। सामाजिक उपयोग के निर्माण कराए। जर्जर शाला भवनों के मरम्मत कराए।
स्वतंत्रता संघर्ष के समय विदेशी सत्ता के कानूनों को तोड़ने की मनोभावना स्वतंत्रता के बाद अपनी सरकार और अपने कानूनों को तोड़ने के रूप में उभरी। इस आपदा काल में तालाबंदी, एकांतवास, सामाजिक दूरी आदि के पालन ने अधिकांश लोगों को अनुशासन का पाठ सिखाया है। यह अनुशासन हमारे जीवन का स्थायी अंग बने। यातायात नियमों का उल्लंघन न हो। पान-गुटखा, शराब का बहिष्कार हो।
कोरोना ने वसुधैव कुटुंबकम्, विश्वैक नीड़म् की सनातन मान्यता को पुष्ट और व्यावहारिक किया है। सब देश मिलकर कोरोना का टीका और इलाज तलाश रहे हैं। एक दूसरे की सहायता कर रहे हैं। शीत युद्धों और गुटों में में बँटा विश्व चिकित्सा संसाधनों का आदान-प्रदान कर रहा है, कोरोना की औषधि खोज रहा है। यह सद्भाव बना रहे।
***
कुछ रचनाएँ
कर्फ्यू वंदना
(रैप सौंग)

*
घर में घर कर
बाहर मत जा
बीबी जो दे
खुश होकर खा
ठेला-नुक्कड़
बिसरा भुख्खड़
बेमतलब की
बोल न बातें
हाँ में हाँ कर
पा सौगातें
ताँक-झाँक तज
भुला पड़ोसन
बीबी के संग
कर योगासन
चौबिस घंटे
तुझ पर भारी
काम न आए
प्यारे यारी
बन जा पप्पू
आग्याकारी
तभी बेअसर
हो बीमारी
बिसरा झप्पी
माँग न पप्पी
चूड़ी कंगन
करें न खनखन
कहे लिपिस्टिक
माँजो बर्तन
झाड़ू मारो
जरा ठीक से
पौंछा करना
बिना पीक के
कपड़े धोना
पर मत रोना
बाई न आई
तुम हो भाई
तुरुप के इक्के
बनकर छक्के
फल चाहे बिन
करो काम गिन
बीबी चालीसा
हँस पढ़ना
अपनी किस्मत
खुद ही गढ़ना
जब तक कहें न
किस मत करना
मिस को मिस कर
मन मत मरना
जान बचाना
जान बुलाना
मिल लड़ जाएँ
नैन झुकाना
कर फ्यू लेकिन
कई वार हैं
कर्फ्यू में
झुक रहो, सार है
बीबी बाबा बेबी की जय
बोल रहो घुस घर में निर्भय।।
***
नवगीत
*
पीर ने पूछें
दोस दै रये
काय निकल रय?
*
कै तो दई 'घर बैठो भइया'
दवा गरीबी की कछु नइया
ढो लाये कछु कौन देस सें
हम भोगें कोरोना दइया
रोजी-रोटी गई
राम रे! हांत सें
तोते उड़ रय
पीर ने पूछें
दोस दै रये
काय निकल रय?
*
बचो-बचाओ जो बो खाओ
फिर उधार सें काम चलाओ
दो दिन भूखे बैठ बिता लए
जान बचाने, गाँव बुला रओ
रेल-बसें भईं बंद
राम रे! लट्ठ
फुकट में घल रय
पीर ने पूछें
दोस दै रये
काय निकल रय?
*
खोदत-खाउत जिनगी बीती
बिकी कसेंड़ी, गुल्लक रीती
तकवारों की मौज भई रे
जनता हारी, रिस्वत जीती
कग्गज पै बँट रओ
धन-रासन, आसें
गिद्ध निगल रय
पीर ने पूछें
दोस दै रये
काय निकल रय?
***
हास्य गीत
कोरोना की जयकार करो
*
कोरोना की जयकार करो
तुम नहीं तनिक भी कभी डरो
*
घरवाले हो घर से बाहर
तुम रहे भटकते सदा सखे!
घरवाली का कब्ज़ा घर पर
तुम रहे अटकते सदा सखे!
जीवन में पहली बार मिला
अवसर घर में तुम रह पाओ
घरवाली की तारीफ़ करो
अवसर पाकर सत्कार करो
तुम नहीं तनिक भी कभी डरो
कोरोना की जयकार करो
*
जैसी है अपनी किस्मत है
गुणगान करो यह मान सदा
झगड़े झंझट बहसें छोडो
पाई जो उस पर रहो फ़िदा
हीरोइन से ज्यादा दिलकश
बोलो उसकी हर एक अदा
हँस नखरे नाज़ उठाओ नित  
चरणों पर झुककर शीश धरो
तुम नहीं तनिक भी कभी डरो
कोरोना की जयकार करो
*
झाड़ू मारो, बर्तन धोलो
फिर चाय-नाश्ता दे बोलो
'भोजन में क्या तैयार करूँ?'
जो कहें बना षडरस घोलो
भोग लगाकर ग्रहण करो
परसाद दया निश्चय होगी
झट दबा कमर, पग-सेवा कर
उनके तन-मन की पीर हरो
तुम नहीं तनिक भी कभी डरो
कोरोना की जयकार करो
***
ज्योति ज्योति ले हाथ में, देख रही है मौन
तोड़ लॉकडाउन खड़ा, दरवाजे पर कौन?
कोरोना के कैरियर, दूँगी नहीं प्रवेश
रख सोशल डिस्टेंसिंग, मान शासनादेश
जाँच करा अपनी प्रथम, कर एकाकीवास
लक्षण हों यदि रोग के, कर रोगालय वास
नाता केवल तभी जब, तन-मन रहे निरोग
नादां से नाता नहीं, जो करनी वह भोग
*
बेबस बाती जल मरी, किन्तु न पाया नाम
लालटेन को यश मिला, तेल जला बेदाम
***
एक रचना : साथ मोदी के
*
कर्ता करता है सही, मानव जाने सत्य
कोरोना का काय को रोना कर निज कृत्य
कोरो ना मोशाय जी, गुपचुप अपना काम
जो डरता मरता वही, काम छोड़ नाकाम
भीत न किंचित् हों रहें, घर के अंदर शांत
मदद करें सरकार की, तनिक नहीं हों भ्रांत
बिना जरूरत क्रय करें, नहीं अधिक सामान
पढ़ें न भेजें सँदेशे, निराधार नादान
सोमवार को किया था, हम सबने उपवास
शास्त्री जी को मिली थी, उससे ताकत खास
जनता कर्फ्यू लगेगा, शत प्रतिशत इस बार
कोरोना को पराजित, कर देगा यह वार
नमन चिकित्सा जगत को, करें झुकाकर शीश
जान हथेली पर लिए, बचा रहे बन ईश
देश पूरा साथ मिलकर, लड़ रहा है जंग
साथ मोदी के खड़ा है, देश जय बजरंग
***
आओ यदि रघुवीर
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
गले न मिलना भरत से, आओ यदि रघुवीर
धर लेगी योगी पुलिस, मिले जेल में पीर
कोरोना कलिकाल में, प्रबल- करें वनवास
कुटिया में सिय सँग रहें, ले अधरों पर हास
शूर्पणखा की काटकर, नाक धोइए हाथ
सोशल डिस्टेंसिंग रखें, तीर मारकर नाथ
भरत न आएँ अवध में, रहिए नंदीग्राम
सेनेटाइज शत्रुघन, करें- न विधि हो वाम
कैकई क्वारंटाइनी, कितने करतीं लेख
रातों जगें सुमंत्र खुद, रहे व्यवस्था देख
कोसल्या चाहें कुसल, पूज सुमित्रा साथ
मना रहीं कुलदेव को, कर जोड़े नत माथ
देवि उर्मिला मांडवी, पढ़ा रहीं हैं पाठ
साफ-सफाई सब रखें, खास उम्र यदि साठ
श्रुतिकीरति जी देखतीं, परिचर्या हो ठीक
अवधपुरी में सुदृढ़ हो, अनुशासन की लीक
तट के वट नीचे डटे, केवट देखें राह
हर तब्लीगी पुलिस को, सौंप पा रहे वाह
मिला घूमता जो पिटा, सुनी नहीं फरियाद
सख्ती से आदेश निज, मनवा रहे निषाद
निकट न आते, दूर रह वानर तोड़ें फ्रूट
राजाज्ञा सुग्रीव की, मिलकर करो न लूट
रात-रात भर जागकर, करें सुषेण इलाज
कोरोना से विभीषण, ग्रस्त विपद में ताज
भक्त न प्रभु के निकट हों, रोकें खुद हनुमान
मास्क लगाए नाक पर, बैठे दयानिधान
कौन जानकी जान की, कहो करे परवाह?
लव-कुश विश्वामित्र ऋषि, करते फ़िक्र अथाह
वध न अवध में हो सके, कोरोना यह मान
घुसा मगर आदित्य ने, सुखा निकली जान
*
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
९४२५१८३२४४

गीत

भाई जयप्रकाश जी के लिए -
गीत
*
काहे को रोना?, कोरोना आया है तो जाएगा भी
आदम पृथा पुत्र नभ बेटा, तुझे जीतकर गाएगा भी.....
*
सूर्य तनय हम सघन तिमिर में, जलकर जय प्रकाश की गाते
हों निराश क्यों?, पवनपुत्र के वारिस संजीवनि ले आते
सलिल-धार सिर धार सदाशिव, सर्प शशीश धरें निर्भय हो
को विद?, पूछ रहा है कोविद, कुछ खोकर कुछ पाएगा भी
नेह नर्मदा नित्य नहाकर, लहर-लहर लहराएगा भी....
*
एक आत्म दो कर्ण नेत्र त्रय, कर-पग चार, पाँच हैं नाते
षडरागी हम सप्त सुरों में, अष्ट अंग नव ग्रह संग गाते
दस इंद्रिय ग्यारह रुद्रों सम, द्वादश रवि धनतेरस-तेरहीं
रूप चौदशी आत्म दीप राजिव शतदल खिल पाएगा भी
सफल साधना नव आशा पुष्पा उपवन सुषमाएगा भी.....
*
जय प्रकाश की बोल बढ़ें जब, 'मावस भी पूनम बन जाए
ओम व्योम में गुंजित हो यदि, मन मंदिर में प्रभु मुसकाए
श्वास ग्रंथ के नवल पृष्ठ पर, आस कलम नित गीत लिख रही
अलंकार रस छंद भावमय कथ्य हृदय छू जाएगा ही
गीत प्रीत की रीत निभाने, मीत ध्वजा फहराएगा ही
***
९-५-२०२०

जागो रे! रवींद्रनाथ ठाकुर

जागो रे!
रवींद्रनाथ ठाकुर
*
हे मोर चित्त, पुण्य तीर्थे जागो रे धीरे.
एइ भारतेर महामानवेर सागर तीरे.
जागो रे धीरे.
हेथाय आर्य, हेथाय अनार्य, हेथाय द्राविड़-छीन.
शक-हूण डीके पठान-मोगल एक देहे होलो लीन.
पश्चिमे आजी खुल आये द्वार
सेथाहते सबे आने उपहार
दिबे आर निबे, मिलाबे-मिलिबे.
जाबो ना फिरे.
एइ भारतेर महामानवेर सागर तीरे.
*
हिंदी काव्यानुवाद: संजीव 'सलिल'
*
हे मेरे मन! पुण्य तीर्थ में जागो धीरे रे.
इस भारत के महामनुज सागर के तीरे रे..
जागो धीरे रे...
*
आर्य-अनार्य यहीं थे, आए यहीं थे द्राविड़-चीन.
हूण पठन मुग़ल शक, सब हैं एक देह में लीन..
खुले आज पश्चिम के द्वार,
सभी ग्रहण कर लें उपहार.
दे दो-ले लो, मिलो-मिलाओ
जाओ ना फिर रे...
*
इस भारत के महामनुज सागर के तीरे रे..
जागो धीरे रे...
*

आनुप्रसिक दोहा / यमकीय दोहा

एक आनुप्रसिक दोहा
*
दया-दफीना दे दिया, दस्तफ्शां को दान
दरा-दमामा दाद दे, दल्कपोश हैरान
(दरा = घंटा-घड़ियाल, दफीना = खज़ाना, दस्तफ्शां = विरक्त, दमामा = नक्कारा, दल्कपोश = भिखारी)
*
९-५-२०१७
यमकीय दोहा 
कहा वेद ने वेदने, मनोरमा है नाम
मनो रमा मन रमा में, भूल राम का नाम
९-५-२०२० 
*

लघुकथा मीठा-मीठा गप्प

लघुकथा
मीठा-मीठा गप्प
*
आपको गंभीर बीमारी है. इसकी चिकित्सा लंबी और खर्चीली है. हम पूरा प्रयास करेंगे पर सफलता आपके शरीर द्वारा इलाज के प्रति की जाने वाली प्रतिक्रिया पर निर्भर है. तत्काल इलाज न प्रारंभ करने पर यह बीमारी बहुत तेजी से फैलती है. तब इसका कोई उपचार संभव नहीं होता. आप निराश न हों, अभिशाप में वरदान यह है की आरम्भ में ही चिकित्सा हो तो यह पूरी तरह ठीक हो जाती है. चिकित्सक अपनी तरफ से मेरा मनोबल बढ़ाने का पूरा - पूरा प्रयास कर रहा था.
मरता क्या न करता? किसी तरह धन की व्यवस्था की और चिकित्सा आरम्भ हुई. मझे ईश्वर से बहुत शिकायत थी कि मैंने कभी किसी का कुछ बुरा नहीं किया. फिर साथ ऐसा क्यों हुआ? अस्पताल में देखा मेरी अपेक्षा बहुत कम आर्थिक संसाधन वाले, बहुत कम आयु के बच्चे, कठिन चिकित्सा प्रक्रिया से गुजर रहे थे. मुझे उनके आगे अपनी पीड़ा बिसर जाती. उनके दुःख से अपना दुःख बहुत कम प्रतीत होता.
अस्पताल प्रांगण में स्थापित भगवान् की मूर्ति पर दृष्टि पड़ी तो लगा भगवान् पूछ रहे हैं मैं निर्मम हूँ या करूँ इसकी जाँच हर व्यक्ति अपने-अपने कष्ट के समय ही क्यों करता है, आनंद के समय क्यों नहीं करता? खुशियाँ तुम्हारे कर्म का परिणाम है तो कष्ट के लिए भी तुम्हारे कर्म ही कारण हैं न?. मैं कुछ पाती इसके पहले ही अपना पल्लू खिंचते देख पीछे मुड़कर देखा. कीमोथिरेपी कराकर बाहर आया वही छोटा सा बच्चा था जिसे मैंने वादा किया था कि बीमारी के कारण उसकी पढ़ाई की हानि नहीं हो इसलिए मुझसे पूछ लिया करे. एक हाथ में किताब लिए पूछ रहा था- इस मुहावरे का अर्थ बताइए 'मीठा-मीठा गप्प, कड़वा-कड़वा थू.'
९-५-२०१७
***
लघुकथा
धुँधला विवेक
संसार में अन्याय, अत्याचार और पीड़ा देखकर संदेह होता है कि ईश्वर नहीं है. जरा से बच्चे को इतनी बीमारियाँ, बेईमानों को सफलता, मेहनती की फाकाकशी देखकर जगता है या तो ईश्वर है ही नहीं या अविवेकी है? - एक ने कहा.
संसार में आनेवाले और संसार से जानेवाले हर जीव के कर्मों का खाता होता है. ठीक वैसे ही जैसे बैंक में घुसने और बैंक से निकलनेवाले का होता है. कोई खाली हाथ जाकर गड्डियाँ लाता है तो कोई गड्डी ले जाकर खाली हाथ निकलता है. हम इसे अंधेरगर्दी नहीं कहते क्योंकि हम जानते हैं कि कोई पहले जमा किया धन निकाल रहा है, कोई आगे के लिए जमा कर रहा है या कर्ज़ चुका रहा है. किसी जीव की कर्म पुस्तक हम नहीं जानते, इसलिए उसे मिल रहा फल हमें अनुचित प्रतीत होता है.
ईश्वर परम न्यायी और निष्पक्ष है तो वह करुणासागर नहीं हो सकता. कोई व्यक्ति कितना ही प्रसाद चढ़ाए या प्रार्थना करे, अपने कर्म फल से बच नहीं सकता. दूसरे ने समझाया.
ऐसा है तो हर धर्म में पुजारी वर्ग कर्मकांड और पूजा-पाठ क्यों करता है?
पेट पालने के लिए और यजमान को गलत राह पर ले जाता है किसी भी प्रकार राहत पाने की इच्छा और उसका धुंधला विवेक.
९-५-२०१७
***
सफेदपोश तबका
देश के विकास और निर्माण की कथा जैसी होती है वैसी दिखती नहीं, और जैसी दिखती है वैसी दिखती नहीं.... क्या कहा?, नहीं समझे?... कोइ बात नहीं समझाता हूँ.
किसी देश का विकास उत्पादन से होता है. उत्पादन सिर्फ दो वर्ग करते हैं किसान और मजदूर. उत्पादनकर्ता की समझ बढ़ाने के लिए शिक्षक, तकनीक हेतु अभियंता तथा स्वास्थ्य हेतु चिकित्सक, शांति व्यवस्था हेतु पुलिस तथा विवाद सुलझाने हेतु न्यायालय ये पाँच वर्ग आवश्यक हैं. शेष सभी वर्ग अनुत्पादक तथा अर्थ व्यवस्था पर भार होते हैं. -वक्ता ने कहा.
फिर तो नेता, अफसर, व्यापारी और बाबू अर्थव्यवस्था पर भार हुए? क्यों न इन्हें हटा दिया जाए?-किसी ने पूछा.
भार ही तो हुए. ये कितने भी अधिक हों हमेशा खुद को कम बताएँगे और अपने अधिकार, वेतन और सुविधाएं बढ़ाते जायेंगे. यह शोषक वर्ग प्रशासन के नाम पर पुलिस के सहारे सब पर लद जाता है. उत्पादक और उत्पादन-सहायक वर्ग का शोषण करता है. सारे काले कारनामे करने के बाद भी कहलाता है 'सफेदपोश तबका'.
***

नवगीत

नवगीत:
संजीव
*
जो 'फुट' पर चलते
पलते हैं 'पाथों' पर
उनका ही हक है सारे
'फुटपाथों' पर
*
बेलाइसेंसी कारोंवालों शर्म करो
मदहोशी में जब कोई दुष्कर्म करो
माफी मांगों, सजा भोग लो आगे आ
जिनको कुचला उन्हें पाल कुछ धर्म करो
धन-दौलत पर बहुत अधिक इतराओ मत
बहुत अधिक मोटा मत अपना चर्म करो
दिन भर मेहनत कर
जो थककर सोते हैं
पड़ते छाले उनके
हाथों-पांवों पर
जो 'फुट' पर चलते
पलते हैं 'पाथों' पर
उनका ही हक है सारे
'फुटपाथों' पर
*
महलों के अंदर रहकर तुम ऐश करो
किसने दिया तुम्हें हक़ ड्राइविंग रैश करो
येन-केन बचने के लिये वकील लगा
झूठे लाओ गवाह खर्च नित कैश करो
चुल्लू भर पानी में जाकर डूब मारो
सत्य-असत्य कोर्ट में मत तुम मैश करो
न्यायालय में न्याय
तनिक हो जाने दो
जनगण क्यों चुप्पी
साधे ज़ज़्बातों पर
जो 'फुट' पर चलते
पलते हैं 'पाथों' पर
उनका ही हक है सारे
'फुटपाथों' पर
*
स्वार्थ सध रहे जिनके वे ही संग जुटे
उनकी सोचो जिनके जीवन-ख्वाब लुटे
जो बेवक़्त बोलते कड़वे बोल यहाँ
जनता को मिल जाएँ अगर बेभाव कुटें
कहे शरीयत जान, जान के बदले दो
दम है मंज़ूर करो, मसला सुलटे
हो मासूम अगर तो
माँगो दण्ड स्वयं
लज्जित होना सीखो
हुए गुनाहों पर
जो 'फुट' पर चलते
पलते हैं 'पाथों' पर
उनका ही हक है सारे
'फुटपाथों' पर
*
८-५-२०१५

मोहन छंद

 

छंद सलिला:
मोहन छंद
संजीव
*
छंद-लक्षण: जाति रौद्राक, प्रति चरण मात्रा २३ मात्रा, यति ५-६-६-६, चरणांत गुरु लघु लघु गुरु
लक्षण छंद:
गोपियाँ / मोहन के / संग रास / खेल रहीं
राधिका / कान्हा के / रंग रंगी / मेल रहीं
पाँच पग / छह छह छह / सखी रखे / साथ-साथ
कहीं गुरु / लघु, लघु गुुरु / कहीं, गहें / हाथ-हाथ
उदाहरण:
१. सुरमयी / शाम मिले / सजन शर्त / हार गयी
खिलखिला / लाल हुई / चंद्र देख / भाग गयी
रात ने / जाल बिछा / तारों के / दीप जला
चाँद को / मोह लिया / हवा बही / हाय छला
२. कभी खुशी / गम कभी / कभी छाँव / धूप कभी
नयन नम / करो न मन / नमन करो / आज अभी
कभी तम / उजास में / आस प्यास / साथ मिले
कभी हँस / प्रयास में / आम-खास / हाथ मिले
३. प्यार में / हार जीत / जीत हार / प्यार करो
रात भी / दिवस लगे / दिवस रात / प्यार वरो
आह भी / वाह लगे / डाह तजो / चाह करो
आस को / प्यास करो / त्रास सहो / हास करो
९-५-२०१४
*********
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामिनीमोहन, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दीप, दीपकी, दोधक, दृढ़पद, नित, निधि, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनअवतार, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, योग, ऋद्धि, रसामृत, राजीव, राधिका, रामा, लीला, वाणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुभगति, सरस, सार, सिद्धि, सुगति, सुजान, संपदा, हरि, हेमंत, हंसगति, हंसी)

मुक्तिका

मुक्तिका:
तुम क्या जानो
संजीव 'सलिल'
*
तुम क्या जानो कितना सुख है दर्दों की पहुनाई में.
नाम हुआ करता आशिक का गली-गली रुसवाई में..

उषा और संझा की लाली अनायास ही साथ मिली.
कली कमल की खिली-अधखिली नैनों में, अंगड़ाई में..

चने चबाते थे लोहे के, किन्तु न अब वे दाँत रहे.
कहे बुढ़ापा किससे क्या-क्या कर गुजरा तरुणाई में..

सरस परस दोहों-गीतों का सुकूं जान को देता है.
चैन रूह को मिलते देखा गजलों में, रूबाई में..

'सलिल' उजाला सभी चाहते, लेकिन वह खलता भी है.
तृषित पथिक को राहत मिलती अमराई - परछाँई में
९-५-२०११ 
***************

दोहा सलिला

दोहा सलिला 
*
गंगा के वट निरखते, सलिल पखारे पैर।
केवट पी भव समुद को, पार कर गया तैर।।
*
पत्नी
 ने तन-मन लुटा, किया तुझे स्वीकार.
तू भी क्या उस पर कभी, सब कुछ पाया वार?
*
अगर नहीं तो यह बता, किसका कितना दोष.
प्यार न क्यों दे-ले सका, अब मत हो मदहोश..
*
बने-बनाया कुछ नहीं, खुद जाते हम टूट.
दोष दे रहे और को, बोल रहे हैं झूठ.
*
वह क्यों तोड़ेगा कभी, वह है रचनाकार.
चल मिलकर कुछ रचें हम, शून्य गहे आकार..
*
अमर नाथ वह मर्त्य हम, व्यर्थ बनाते मूर्ति
पूज रहे बस इसलिए, करे स्वार्थ की पूर्ति
*
छिपी वाह में आह है, इससे बचना यार.
जग-जीवन में लुटाना, बिना मोल नित प्यार.
*
वह तो केवल बनाता, टूट रहे हम आप.
अगर न टूटें तो कहो, कैसें सकते व्याप?
*
बिंदु सिन्धु हो बिखरकर, सिन्धु सिमटकर बिंदु.
तारे हैं अगणित मगर, सिर्फ एक है इंदु..
*
जो पैसों से कर रहा, तू वह है व्यापार.
माँ की ममता का दिया, सिला कभी क्या यार.
*
बहिना ने तुझको दिया, प्रतिपल नेह-दुलार.
तू दे पाया क्या उसे?, कर ले तनिक विचार
*
शंका समाधान:
उसने क्यों सिरजा मुझे, मकसद जाने कौन?
जिससे पूछा वही चुप, मैं खुद तोडूँ मौन.
*
मकसद केवल एक है, मिट्टी ले आकार
हर कंकर शंकर बने, नियति करे स्वीकार
हाथों की रेखा कहे, मिटा न मुझको मीत
अन्यों से ज्यादा बड़ी, खींच- सही है रीत..
*
९-५-२०१० 

हास्य षट्पदी

हास्य षट्पदी : 
अगर न होता काश तो
*
अगर न होता काश तो, ना होता अवकाश.
कहिये कैसे देखते हम, सिर पर आकाश?.
रवि शशि दीपक बल्ब भी, हो जाते बेकार-
गहन तिमिर में किस तरह, मिलता कहें प्रकाश?.
धरना देता अतिथि जब, अनचाहा चढ़ शीश.
मन ही मन कर जोड़कर, कहते अब जा काश..
*

एक शेर

नहीं हैं दूरदर्शी नीति-नेता
सिसकती पीर युग युग तक कहेगी

शनिवार, 8 मई 2021

बाङ्ग्ला-हिंदी भाषा सेतु: पूजा गीत रवीन्द्रनाथ ठाकुर

बाङ्ग्ला-हिंदी भाषा सेतु:
पूजा गीत
रवीन्द्रनाथ ठाकुर
*
जीवन जखन छिल फूलेर मतो
पापडि ताहार छिल शत शत।
बसन्ते से हत जखन दाता
रिए दित दु-चारटि तार पाता,
तबउ जे तार बाकि रइत कत
आज बुझि तार फल धरेछे,
ताइ हाते ताहार अधिक किछु नाइ।
हेमन्ते तार समय हल एबे
पूर्ण करे आपनाके से देबे
रसेर भारे ताइ से अवनत।
*
पूजा गीत: रवीन्द्रनाथ ठाकुर
हिंदी काव्यानुवाद : संजीव
*
फूलों सा खिलता जब जीवन
पंखुरियां सौ-सौ झरतीं।
यह बसंत भी बनकर दाता
रहा झराता कुछ पत्ती।
संभवतः वह आज फला है
इसीलिये खाली हैं हाथ।
अपना सब रस करो निछावर
हे हेमंत! झुककर माथ।
*
८-५-२०१४

शुक्रवार, 7 मई 2021

माहिया गीत

माहिया गीत
मौसम के कानों में
संजीव 'सलिल'
*
(माहिया:पंजाब का त्रिपदिक मात्रिक छंद है. पदभार 12-10-12, प्रथम-तृतीय पद सम तुकांत, विषम पद तगण+यगण+2 लघु = 221 122 11, सम पद 22 या 21 से आरंभ, एक गुरु के स्थान पर दो गुरु या दो गुरु के स्थान पर एक लघु का प्रयोग किया जाता है, पदारंभ में 21 मात्रा का शब्द वर्जित।)
*
मौसम के कानों में
कोयलिया बोले,
खेतों-खलिहानों में।
*
आओ! अमराई से
आज मिल लो गले,
भाई और माई से।
*
आमों के दानों में,
गर्मी रस घोले,
बागों-बागानों में---
*
होरी, गारी, फगुआ
गाता है फागुन,
बच्चा, बब्बा, अगुआ।
*
प्राणों में, गानों में,
मस्ती है छाई,
दाना-नादानों में---
*
संजीव वर्मा 'सलिल' ७९९९५५९६१८

दोहा, मुक्तक

दोहा सलिला 
*
कौन अकेला जगत में, प्रभु हैं सबके साथ। 
काम करो निष्काम रह, उठा-झुकाओ माथ।। 
*
मन में अब भी रह रहे, पल-पल मैया-तात।
जाने क्यों जग कह रहा, नहीं रहे बेबात।।
*
कल की फिर-फिर कल्पना, कर न कलपना व्यर्थ।
मन में छवि साकार कर, अर्पित कर कुछ अर्ध्य।।
*
जब तक जीवन-श्वास है, तब तक कर्म सुवास।
आस धर्म का मर्म है, करें; न तजें प्रयास।।
*
मोह दुखों का हेतु है, काम करें निष्काम।
रहें नहीं बेकाम हम, चाहें रहें अ-काम।।
*
खुद न करें निज कद्र गर, कद्र करेगा कौन?
खुद को कभी सराहिए, व्यर्थ न रहिए मौन.
*
प्रभु ने जैसा भी गढ़ा, वही श्रेष्ठ लें मान।
जो न सराहे; वही है, खुद अपूर्ण-नादान।।
*
लता कल्पना की बढ़े, खिलें सुमन अनमोल।
तूफां आ झकझोर दे, समझ न पाए मोल।।
*
क्रोध न छूटे अंत तक, रखें काम से काम।
गीता में कहते किशन, मत होना बेकाम।।
*
जिस पर बीते जानता, वही; बात है सत्य।
देख समझ लेता मनुज, यह भी नहीं असत्य।।
*
भिन्न न सत्य-असत्य हैं, कॉइन के दो फेस।
घोड़ा और सवार हो, अलग न जीतें रेस।।
***
७.५.२०१८
मुक्तक 
बात हो बेबात तो 'क्या बात' कहा जाता है। 
छू ली जो दिल को ज़ज्बात कहा जाता है।। 
घटती हैं घटनाएँ हर पल ही बहुत सी लेकिन-
गहरा हो असर तो हालात कहा जाता है
।। 
*

गुरुवार, 6 मई 2021

गीत

 गीत:

संजीव
*
आन के स्तन न होते, किस तरह तन पुष्ट होता
जान कैसे जान पाती, मान कब संतुष्ट होता?
*
पय रहे पी निरन्तर विष को उगलते हम न थकते
लक्ष्य भूले पग भटकते थक गये फ़िर भी न थकते
मौन तकते हैं गगन को कहीँ क़ोई पथ दिखा दे
काश! अपनापन न अपनोँ से कभी भी रुष्ट होता
*
पय पिया संग-संग अचेतन को मिली थी चेतना भी
पयस्वनि ने कब बतायी उसे कैसी वेदना थी?
प्यार संग तकरार या इंकार को स्वीकार करना
काश! हम भी सीख पाते तो मनस परिपुष्ट होता
*
पय पिला पाला न लेकिन मोल माँगा कभी जिसने
वंदनीया है वही, हो उऋण उससे कोई कैसे?
आन भी वह, मान भी वह, जान भी वह, प्राण भी वह
खान ममता की न होती, दान कैसे तुष्ट होता?
*
६-५-२०१४

कृष्ण चिंतन क्रमांक -११

 *

विश्ववाणी हिंदी संस्थान अभियान जबलपुर 
कृष्ण चिंतन क्रमांक -११
आत्मीय स्वजन!
जय श्री कृष्ण,
कृष्ण जी की कृपा एवं आदरणीय आचार्य संजीव 
वर्मा 'सलिल' जी के मार्गदर्शन में आगामी सोमवार १० मई को दोपहर ४ बजे से ६ बजे के मध्य फेसबुक पर कृष्ण चिंतन की दसवीं गोष्ठी आयोजित होने जा रही है। लिंक सोमवार अपरान्ह दी जाएगी।
सहभागिता के इच्छुक साथी अपने नाम तथा चलभाष क्रमांक यहाँ अंकित करें।  
विषय - 'गीता मेरी दृष्टि में'।
समय - अधिकतम ७ मिनट।
संयोजक : आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' जी।
संचालन : सरला वर्मा जी।
मुख्य वक्ता : डॉ सुरेश कुमार वर्मा जी।
सरस्वती वंदना - छाया सक्सेना जी ।
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अध्याय २ सांख्य योग -  
वक्ता - सर्व आदरणीय
विषय प्रवर्तन -आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' जी। 
चौदह वक्ता ५ - ५ श्लोकों का अध्ययन-मनन कर उन पर अपना लिखित चिंतन ७ - ७ मिनिट में प्रस्तुत करेंगे। सहभागिता के इच्छुक साथी अपने नाम तथा चलभाष क्रमांक तत्काल संचालक सरला वर्मा जी को वॉट्सऐप क्रमांक ९७७०६ ७७४५३ पर सूचित करें तथा स्वीकृति मिलने पर दिए गए श्लोकों पर केंद्रित अपना टंकित आलेख शनिवार ८-५-२०२१ को रात्रि तक भेज दें। निराशा से बचने के लिए शीघ्रता करें। भेजने के पहले आलेख का वचन कर समयावधि जाँच लें।    
मुख्य वक्ता - डॉ. सुरेश कुमार वर्मा जी।
                   - आचार्य कृष्णकांत चतुर्वेदी जी।  
आभार - संजीव वर्मा 'सलिल'।
गीता आरती - 
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अनुरोध - वक्ताओं से निवेदन है कि 
- आवंटित श्लोकों का अध्ययन कर उन पर चिन्तन-मनन कर, अपने मौलिक विचार व्यक्त करें। श्लोक तथा अथवा अर्थ सबको सुलभ है। 
- कृपया, समयावधि का ध्यान रखें। संबोधन, आभार आदि में समय नष्ट न कर सीधे विषय पर आएँ ताकि पूरी बात कह सकें।   
- पटल से २० मिनिट पहले जुड़कर नेटवर्क आदि जाँच लें। 
- अपने क्रम पर बोलते समय माइक अनम्यूट (चालू) करें, शेष समय माइक म्यूट (बंद) रखें। 
- नेट संपर्क न जुड़ने या किसी अन्य कारण से न जुड़ सकने की स्थिति में संयोजक / संचालक को यथाशीघ्र सूचित कर दें ताकि वैकल्पिक व्यवस्था की जा सके।
- अपने विचार टंकित कर संचालक को एक दिन पूर्व भेज दें। किसी कारणवश आप उपस्थित न हों तो आपका आलेख अन्य द्वारा प्रस्तुत कर क्रम-भंग रोका जा सकेगा।
- पटल पर संचालक, अध्यक्ष व मुख्य अतिथि के अतिरिक्त अधिकतम ३ वक्ता ही रह सकते हैं, शेष साथी श्रोता के रूप में प्रारंभ से अंत तक जुड़े रहें। पहला वक्ता बोले तो दूसरा प्रस्तुति के लिए तैयार रहे। पहले वक्ता के जाते ही तीसरे वक्ता को पटल पर स्थान दिया जाएगा। इस तरह क्रम जारी रहेगा। जो वक्ता अन्यों को नहीं सुनेगा, उसे आगामी चर्चाओं में अवसर नहीं मिलेगा। 
- श्रोता बंधु सुनने के साथ-साथ अपने विचार और जिज्ञासाएँ टिप्पणी स्थल (चैट बॉक्स) में अंकित करते रहें। सभी श्लोकों पर चर्चा के पश्चात मुख्य वक्ता सभी प्रस्तुतियों और पूरे अध्याय पर अपने विचार व्यक्त करेंगे।
- अध्याय १ व २ संबंधी जिज्ञासाएँ संचालक को भेजी जा सकती हैं।
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बुधवार, 5 मई 2021

ओशो चिंतन: दोहा मंथन १

 ओशो चिंतन: दोहा मंथन १.

लाओत्से ने कहा है, भोजन में लो स्वाद।
सुन्दर सी पोशाक में, हो घर में आबाद।।
रीति का मजा खूब लो
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लाओत्से ने बताया, नहीं सरलता व्यर्थ।
रस बिन भोजन का नहीं, सत्य समझ कुछ अर्थ।।
रस न लिया; रस-वासना, अस्वाभाविक रूप।
ले विकृत हो जाएगी, जैसे अँधा कूप।।
छोटी-छोटी बात में, रस लेना मत भूल।
करो सलिल-स्पर्श तो, लगे खिले शत फ़ूल।
जल-प्रपात जल-धार की, शीतलता अनुकूल।।
जीवन रस का कोष है, नहीं मोक्ष की फ़िक्र।
जीवन से रस खो करें, लोग मोक्ष का ज़िक्र।।
मंदिर-मस्जिद की करे, चिंता कौन अकाम।
घर को मंदिर बना लो, हो संतुष्ट सकाम।।
छोटा घर संतोष से, भर होता प्रभु-धाम।
तृप्ति आदमी को मिले, घर ही तीरथ-धाम।।
महलों में तुम पाओगे, जगह नहीं है शेष।
सौख्य और संतोष का, नाम न बाकी लेश।।
जहाँ वासना लबालब, असंतोष का वास।
बड़ा महल भी तृप्ति बिन, हो छोटा ज्यों दास।।
क्या चाहोगे? महल या, छोटा घर; हो तृप्त?
रसमय घर या वरोगे, महल विराट अतृप्त।।
लाओत्से ने कहा है:, "भोजन रस की खान।
सुन्दर कपड़े पहनिए, जीवन हो रसवान।।"
लाओ नैसर्गिक बहुत, स्वाभाविक है बात।
मोर नाचता; पंख पर, रंगों की बारात।।
तितली-तितली झूमती, प्रकृति बहुत रंगीन।
प्रकृति-पुत्र मानव कहो, क्यों हो रंग-विहीन?
पशु-पक्षी तक ले रहे, रंगों से आनंद।
मानव ले; तो क्या बुरा, झूमे-गाए छंद।।
वस्त्राभूषण पहनते, थे पहले के लोग।
अब न पहनते; क्यों लगा, नाहक ही यह रोग?
स्त्री सुंदर पहनती, क्यों सुंदर पोशाक।
नहीं प्राकृतिक यह चलन, रखिए इसको ताक।।
पंख मोर के; किंतु है, मादा पंख-विहीन।
गाता कोयल नर; मिले, मादा कूक विहीन।।
नर भी आभूषण वसन, बहुरंगी ले धार।
रंग न मँहगे, फूल से, करे सुखद सिंगार।।
लाओ कहता: पहनना, सुन्दर वस्त्र हमेश।
दुश्मन रस के साधु हैं, कहें: 'न सुख लो लेश।।'
लाओ कहता: 'जो सहज, मानो उसको ठीक।'
मुनि कठोर पाबंद हैं, कहें न तोड़ो लीक।।
मन-वैज्ञानिक कहेंगे:, 'मना न होली व्यर्थ।
दीवाली पर मत जला, दीप रस्म बेअर्थ।।'
खाल बाल की निकालें, यह ही उनका काम।
खुशी न मिल पाए तनिक, करते काम तमाम।।
अपने जैसे सभी का, जीवन करें खराब।
मन-वैज्ञानिक शूल चुन, फेंके फूल गुलाब।।
लाओ कहता: 'रीति का, मत सोचो क्या अर्थ?
मजा मिला; यह बहुत है, शेष फ़िक्र है व्यर्थ।।
होली-दीवाली मना, दीपक रंग-गुलाल।
सबका लो आनंद तुम, नहीं बजाओ गाल।।
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५-५-२०१८, १८.२०