कुल पेज दृश्य

सॉनेट लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सॉनेट लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 21 सितंबर 2026

सितंबर २१, सॉनेट, दोहे, हाइकु गीत, अनुप्रास, बुन्देली भजन, गणेश, कायस्थ कुलनाम, राजू,

सलिल सृजन सितंबर २१
*
बुन्देली गणेश भजन
0
कोउ तो जगाओ, सो रओ
मोरो नन्नो सो गजानन
0
टेर रई मैं सुनतई नइयाँ
जगा करा दे मंजन गुइयाँ
सपर करे शिव जू की पूजा
मूस चढ़े, कोउ रुचे न दूजा
कोउ समझाओ, खिझा रओ
मोखों नन्नो सो गजानन
0
मन नें भरत मोदक से जाको
खाए-खवाए मौका ताको
कातिक खों ठेंगा दिखराए
नंदी सें जा लाड़ लड़ाए
सिंह खों छेड़, रिसा रओ
रोको नन्नो सो गजानन
२१.६.२०२६
0 0 0
दोस्त दोस्त की आँख हो, दोस्त दोस्त का कान।
दोस्त नहीं कहता मगर, बसे दोस्त में जान।।
*
कायस्थों के कुलनाम और उनके अर्थ
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
कायस्थों को बुद्धिजीवी, मसिजीवी, कलम का सिपाही आदि विशेषण दिए जाते रहे हैं। भारत के धर्म-अध्यात्म, शासन-प्रशासन, शिक्षा-समाज हर क्षेत्र में कायस्थों का योगदान सर्वोच्च और अविस्मरणीय है। कायस्थों के कई कुलनाम व उपनाम उनके कार्य से जुड़े रहे हैं। पुराण कथाओं में भगवान चित्रगुप्त के १२ पुत्र चारु, सुचारु, चित्र, मतिमान, हिमवान, चित्रचारु अरुण,अतीन्द्रिय,भानु, विभानु, विश्वभानु और वीर्यवान कहे गए हैं। ये सब विशेषताएँ बताते हैं। नाम चारु = सुंदर, सुचारु = सुदर्शन, चित्र = मनोहर, मतिमान = बुद्धिमान, हिमवान = समृद्ध, चित्रचारु = दर्शनीय, अरुण = प्रतापी, अतीन्द्रिय = ध्यानी, भानु = तेजस्वी, विभानु = प्रकाशक, विश्वभानु = अँधेरा मिटानेवाला तथा वीर्यवान = बहु संततिवान। कायस्थों के अवदान को देखते हुए उन्हें समय-समय पर उपनाम या उपाधियाँ दी गईं। कुछ कुलनाम निम्न हैं-
अंबष्ट/हिमवान- अंबा (दुर्गा) को आराध्य माननेवाले, हिम/बर्फ वाले हिमालय (पार्वती का जन्मस्थल) में जन्मे पार्वती भक्त ।
अग्निहोत्री- नित्य अग्निहोत्र करनेवाले।
अष्ठाना/अस्थाना- बाहुबल से स्थान (क्षेत्र) जीत राज्य स्थापित करनेवाले।
आडवाणी- सिन्धी कायस्थ।
करंजीकर- करंज क्षेत्र निवासी, जिनके हाथ में उच्च अधिकार होता था। कायस्थ/ब्राह्मण उच्च शिक्षित थे, वे कर (हाथ) की कलम से फैसले करते थे। वे उपनाम के अंत में 'कर' लगाते थे।
कर्ण/चारुण- राजा कर्ण के विश्वासपात्र तथा उनके नाम पर शासन करनेवाले।
कानूनगो- कानूनों का ज्ञान रखनेवाले, कानून बनानेवाले।
कुलश्रेष्ठ/अतीन्द्रिय- इंद्रियों पर विजय पाकर उच्च/कुलीन वंशवाले।
कुलीन- बंगाल-उड़ीसा निवासी उच्च कुल के कायस्थ।
खरे- खरा (शुद्ध) आचार-व्यवहार रखनेवाले।
गौर- हर काम पर गौर (ध्यान) पूर्वक करनेवाले।
घोष- श्रेष्ठ कार्यों हेतु जिनका जयघोष किया जाता रहा।
चंद्रसेनी- महाराष्ट्र-गुजरात निवासी चंद्रवंशी कायस्थ।
चिटनवीस- उच्च अधिकार प्राप्त जन जिनकी लिखी चिट (कागज की पर्ची) का पालन राजाज्ञा के तरह होता था। ये अधिकतर कायस्थ व ब्राह्मण होते थे।
ठाकरे/ठक्कर/ठाकुर/ठकराल- ठाकुर जी (साकार ईश्वर) को इष्ट माननेवाले, देश के अलग-अलग हिस्सों में बस गए और नाम भेद हो गया।
दत्त- ईश्वर द्वारा दिया गया, प्रभु कृपा से प्राप्त।
दयाल- दूसरों के प्रति दया भाव से युक्त।
दास- ईश्वर भक्त, सेवा वृत्ति (नौकरी) करनेवाले।
नारायण- विष्णु भक्त।
निगम/चित्रचारु- आगम-निगम ग्रंथों के जानकार, उच्च आध्यात्मिक वृत्ति के करण गम (दुख) न करनेवाले। सुंदर काया वाले।
प्रसाद- ईश्वरीय कृपा से प्राप्त, पवित्र, श्रेष्ठ।।
फड़नवीस- फड़ = सपाट सतह, नवीस = बनानेवाला, राज्य की समस्याएँ हल कर राजा का काम आसान बनाते थे । ये अधिकतर कायस्थ व ब्राह्मण होते थे।
बख्शी- जिन्हें बहुमूल्य योगदान के फलस्वरूप शासकों द्वारा जागीरें बख्शीश (ईनाम) के रूप में दी गईं।
ब्योहार- सद व्यवहार वृत्ति से युक्त।
बसु/बोस- बसु की उत्पत्ति वसु अर्थात समृद्ध व तेजस्वी होने से है।
बहादुर- पराक्रमी।
बिसारिया- यह सक्सेना (शक/संदेहों की सेना/समूह का नाश करनेवाले) मूल नाम (मतिमान = बुद्धिमान) कायस्थों की एक अल्ल (वंशनाम) है। एक बुंदेली कहावत है 'बीती ताहि बिसार दे' अर्थात अतीत के सुख-दुख पर गर्व या शोक न कर आगे बढ़ना चाहिए। जिन्होंने इस नीति वाक्य पर अमल किया उन्हें 'बिसारिया' कहा गया।
भटनागर/चित्र- सभ्य जुझारु योद्धा, देश-समाज के लिए युद्ध करनेवाले।
महालनोबीस- महाल = महल, नौविस/नौबिस = लेखा-जोखा खने वाला, राजमहल के नियंत्रक लेखाधिकारी।
माथुर/चारु- मथुरा निवासी, गौरवर्णी सुंदर।
मित्र- विश्वामित्र गोत्रीय कायस्थ जो निष्ठावान मित्र होते हैं।
मौलिक- बंगाल/उड़ीसावासी कायस्थ जो अपनी मिसाल आप (श्रेष्ठ) थे।
रंजन - कला निष्णात।
राय- शासकों को राय-मशविरा देनेवाले।
राढ़ी- राढ़ी नदी पार कर बंगाल-उड़ीसा आदि में शासन व्यवस्था स्थापित करनेवाले।
रायजादा- शासकों को बुद्धिमत्तापूर्णराय देनेवाले।
वर्मा- अपने देश-समाज की रक्षा करनेवाले।
वाल्मीकि-
श्रीवास्तव/भानु- वास्तव में श्री (लक्ष्मी) सम्पन्न, सूर्य की तरह ऐश्वर्यवान।
सक्सेना-मतिमान- शक आक्रमणकारियों की सेनाओं को परसर करनेवाले, शक (संदेहों) का समाधान करने वाले बुद्धिमान।
सहाय- सबकी सहायता हेतु तत्पर रहने वाले।
सारंग- समर्पित प्रेमी, सारंग पक्षी अपने साथी का निधन होने पर खुद भी जान दे देता है।
सूर्यध्वज/विभानु- सूर्यभक्त राजा जिनके ध्वज पर सूर्य अंकित होता था। सूर्य की तरह अँधेरा दूर करनेवाले।
सेन/सैन- संत अर्थात आध्यात्मिक तथा सैन्य अर्थात शौर्य की पृष्ठभूमिवाले। आन-बयान-शान की तरह नैन-बैन-सैन का प्रयोग होता है।
शाह/साहा- राजसत्ता युक्त।
गुणाधारित उपनाम विविध विविध जातियों के गुणवानों द्वारा प्रयोग किए जाने के कारण अग्निहोत्री व फड़नवीस ब्राह्मणों, वर्मा जाटों, माथुर वैश्यों, सिंह बहादुर आदि राजपूतों में भी प्रयोग किए जाते हैं। कायस्थों में गोत्र तथा अल्ल (वैश्यों में आँकने) भी होते हैं। कायस्थ यह सत्य जानने के कारण अन्तर्जातीय विवाह से परहेज नहीं करते। समय के साथ चलते हुए ज्ञान-विज्ञान, शासन-प्रशासन के यंग होते हैं। इसीलिए वे आधे मुसलमान और आधे अंग्रेज भी कहे गए। लोकोक्ति 'कायथ घर भोजन करे बचे न एकहु जात' का भावार्थ यही है कि कायस्थ के संबंधी हर जाति में होते हैं, कायस्थ के घर खाया तो उसके सब संबंधियों के घर भी खा लिया।
*
सॉनेट
राजू भाई!
*
बहुत हँसाया राजू भाई!
संग हमेशा रहे ठहाके
झुका न पाए तुमको फाके
उन्हें झुकाया राजू भाई!
खुद को पाया राजू भाई!
आम आदमी के किस्से कह
जन गण-मन में तुम पाए रह
युग-सच पाया राजू भाई!
हो कठोर क्यों गया ईश्वर?
रहे अनसुने क्रंदन के स्वर
दूर धरा से गया गजोधर
चाहा-पाया राजू भाई!
किया पराया राजू भाई!
बहुत रुलाया राजू भाई!
२१-९-२०२२
***
दोहा सलिला:
कुछ दोहे अनुप्रास के
*
अजर अमर अक्षर अमित, अजित असित अवनीश
अपराजित अनुपम अतुल, अभिनन्दन अमरीश
*
अंबर अवनि अनिल अनल, अम्बु अनाहद नाद
अम्बरीश अद्भुत अगम, अविनाशी आबाद
*
अथक अनवरत अपरिमित, अचल अटल अनुराग
अहिवातिन अंतर्मुखी, अन्तर्मन में आग
*
आलिंगन कर अवनि का, अरुण रश्मियाँ आप्त
आत्मिकता अध्याय रच, हैं अंतर में व्याप्त
*
अजब अनूठे अनसुने, अनसोचे अनजान
अनचीन्हें अनदिखे से,अद्भुत रस अनुमान
*
अरे अरे अ र र र अड़े, अड़म बड़म बम बूम
अपनापन अपवाद क्यों अहम्-वहम की धूम?
*
अकसर अवसर आ मिले, बिन आहट-आवाज़
अनबोले-अनजान पर, अलबेला अंदाज़
२१-९-२०१३
***
हाइकु गीत :
प्रात की बात
*
सूर्य रश्मियाँ
अलस सवेरे आ
नर्तित हुईं.
*
शयन कक्ष
आलोकित कर वे
कहतीं- 'जागो'.
*
कुसुम कली
लाई है परिमल
तुम क्यों सोए?
*
हूँ अवाक मैं
सृष्टि नई लगती
अब मुझको.
*
ताक-झाँक से
कुछ आह्ट हुई,
चाय आ गई.
*
चुस्की लेकर
ख़बर चटपटी
पढ़ूँ, कहाँ-क्या?
*
अघट घटा
या अनहोनी हुई?
बासी खबरें.
*
दुर्घटनाएँ,
रिश्वत, हत्या, चोरी,
पढ़ ऊबा हूँ.
*
चहक रही
गौरैया, समझूँ क्या
कहती वह?
*
चें-चें करती
नन्हीं चोचें दिखीं
ज़िन्दगी हँसी.
*
घुसा हवा का
ताज़ा झोंका, मुस्काया
मैं बाकी आशा.
*
मिटा न सब
कुछ अब भी बाकी
उठूँ-सहेजूँ.
***
शारदा की कृपा जब भी जिस पर हुई.
उसकी हर पंक्ति में इक ग़ज़ल रह गई॥
*
पुष्प सौरभ लुटाये न तो क्या करे?
तितलियों की नसल ही असल रह गई॥
२१.९.२०१०

***

रविवार, 20 सितंबर 2026

सितंबर २०, ग़ज़ल, सॉनेट, मुक्तक, भक्ति गीत, तुम, श्रंगार,

सलिल सृजन सितंबर २०
*
ग़ज़लिका
.
जो साहिबे-किरदार थे, जाने कहाँ गए? 
खुद के अलमबरदार ही तो हुक्मरां हुए
.
औरों को मश्विरा है कि रोज़े रखा करो
खुद ने किया उपवास तो खाते रहे पुए
हैं खास तो अवाम को दुत्कारते हैं आप
थे आम तो खासों के पैर बेवजह छुए
.
कुर्सी न थी तो चीथड़े उनका लिबास थे
मौका मिला तो बदलते परिधान सौ नए 
.
खुद के सिवा सभी में कमी दिख रही जिन्हें
वे जिंदगी तमाम खुद के वास्ते जिए
.
खादिम की खिदमतों का  है सौ बार शुक्रिया
मालिक की मिल्कियत लुटा जिसने मजे किए
.
उस्ताद को शागिर्द ने दी नसीहत, कहा-
"या तो करें तारीफ या बेहतर न बोलिए
२०.९.२०२६
०००
हिंदी ग़ज़ल
.
राम राम करते गिरीश जी
सत्य मानिए हैं मनीश जी
.
जिन्हें हकीकत यह मालुम हैं
कहें न लेकिन हैं हरीश जी
.
भिन्न न हरि-हर कृपा कर रहे
जब रमेश जी तब सतीश जी
.
पृथा पुत्र मनु, धरती माता
खुद को मत मानें पृथीश जी
.
राम काम निष्काम कीजिए
'सलिल' सदय होंगे कपीश जी
***
एक दोहा
छाया शुक्ला हो गई, छवि श्यामल है खूब।
दर्श राधिका-कान्ह कर, गए हर्ष में डूब।।
१९.९.२०२५
***
कार्यशाला
सॉनेट गणपति
शिप्रा सेन
*
वरद विनायक मयूरेश्वरा,
गणधीश्वर विघ्न हरो।
गिरिजात्मजा बल्लारेश्वरा,
ओमकार पार्वति तनया नमो।
चिंतामणि ही सिद्धिविनायक,
गुणप्रदायका नमो नमो।
महा गणपतये विघ्नेश्वरा,
प्रथम पूज्य की जय बोलो।
प्रणव स्वरूपा गण नाथा,
अंबा भवानी कुमार शंभो।
कारूण्य लावण्य लंबोदरा,
शरणम् शरणम् प्रभो।
महादेवादिदेव विनायका,
अष्ट विनायक श्री गणराया।।
सॉनेट की सभी १४ पंक्तियों का पदभार समान होना जरूरी है। उक्त में ११ से १७ उच्चारों का प्रयोग है।
*
सॉनेट संशोधित
गणपति
(पदभार १६)
*
वरद विनायक मयूरेश्वरा,
हे गणधीश्वर! विघ्न हरो प्रभु,
गिरिजात्मजा बल्लारेश्वरा,
हे ओंकार! पार्वती-तनय विभु।
चिंतामणि श्री सिद्धिविनायक,
गुणप्रदायका नमो नमो हे!
श्री गणपतये विघ्न ईश्वरा,
प्रथम पूज्य की जय बोलो रे!
प्रणव स्वरूपा हे गणनाथा!,
अंबा भवानी-शंभु कुमार,
शरणम् शरणम् हे जगनाथ!
क्षमा करें प्रभो! परम उदार।
श्री गणराया हे विनायका!
नमन नमन प्रभु वर प्रदायका।।
२०-९-२०२३
*
सॉनेट
अरण्य वाणी
*
मनुज पुलक; सुन अरण्य वाणी
जीवन मधुवन बन जाएगा
कंकर शंकर बन गाएगा
श्वास-आस होगी कल्याणी
भुज भेंटे आलोक तिमिर से
बारी-बारी आए-जाए
शयन-जागरण चक्र चलाए
सीख समन्वय गिरि-निर्झर से
टिट्-टिट् करती विहँस टिटहरी
कुट-कुट कुतरे सुफल गिलहरी
गरज करे वनराज अफसरी
खेलें-खाएँ हिल-मिल प्राणी
मधुरस पूरित टपरी-ढाणी
दस दिश गुंजित अरण्य वाणी
२०-९-२०२२
***
मुक्तिका
निराला हो
*
जैसे हुए, न वैसा ही हो, अब यह साल निराला हो
मेंहनतकश ही हाथों में, अब लिये सफलता प्याला हो
*
उजले वसन और तन जिनके, उनकी अग्निपरीक्षा है
सावधान हों सत्ता-धन-बल, मन न तनिक भी काला हो
*
चित्र गुप्त जिस परम शक्ति का, उसके पुतले खड़े न कर
मंदिर-मस्जिद के झगड़ों में, देव न अल्लाताला हो
*
कल को देख कलम कल का निर्माण आज ही करती है
किलकिल तज कलकल वरता मन-मंदिर शांत शिवाला हो
*
माटी तन माटी का दीपक बनकर तिमिर पिये हर पल
आए-रहे-जाए जब भी तब चारों ओर उजाला हो
*
क्षर हो अक्षर को आराधें, शब्द-ब्रम्ह की जय बोलें
काव्य-कामिनी रसगगरी, कवि-आत्म छंद का प्याला हो
*
हाथ हथौड़ा कन्नी करछुल कलम थाम, आराम तजे
जब जैसा हो जहाँ 'सलिल' कुछ नया रचे, मतवाला हो
२०-९-२०१७
***
मुक्तक सलिला:
*
प्रभु ने हम पर किया भरोसा, दिया दर्द अनुपम उपहार
धैर्य सहित कर कद्र, न विचलित हों हम, सादर कर स्वीकार
जितनी पीड़ा में खिलता है, जीवन कमल सुरभि पाता-
'सलिल' गौरवान्वित होता है, अन्यों का सुख विहँस निहार
***
भक्ति गीत:
*
हे प्रभु दीनानाथ दयानिधि
कृपा करो, हर विघ्न हमारे.
जब-जब पथ में छायें अँधेरे
तब-तब आशा दीप जला रे….
*
हममें तुम हो, तुममें हम हों
अधर हँसें, नैन ना नम हों.
पीर अधीर करे जब देवा!
धीरज-संबल कहबी न कम हों.
आपद-विपदा, संकट में प्रभु!
दे विवेक जो हमें उबारे….
*
अहंकार तज सकें ज्ञान का
हो निशांत, उद्गम विहान का.
हम बेपर पर दिए तुम्हीं ने
साहस दो हरि! नव उड़ान का.
सत-शिव-सुंदर राह दिखाकर
सत-चित-आनंद दर्श दिखा रे ….
*
शब्द ब्रम्ह आराध्य हमारा
अक्षर, क्षर का बना सहारा.
चित्र गुप्त है जो अविनाशी
उसने हो साकार निहारा.
गुप्त चित्र तव अगम, गम्य हो
हो प्रतीत जो जन्म सँवारे ….
२०-९-२०१३
***
नव गीत :
उत्सव का मौसम.....
*
तुम मुस्काईं जिस पल
उस पल उत्सव का मौसम.....
*
लगे दिहाड़ी पर हम
जैसे कितने ही मजदूर.
गीत रच रहे मिलन-विरह के
आँखें रहते सूर..
नयन नयन से मिले झुके
उठ मिले मिट गया गम.
तुम शर्माईं जिस पल
उस पल उत्सव का मौसम.....
*
देखे फिर दिखलाये
एक दूजे को सपन सलोने.
बिना तुम्हारे छुए लग रहे
हर पकवान अलोने..
स्वेद-सिंधु में नहा लगी
हर नेह-नर्मदा नम.
तुम अकुलाईं जिस पल
उस पल उत्सव का मौसम.....
*
कंडे थाप हाथ गुबरीले
सुना रहे थे फगुआ.
नयन नशीले दीपित
मना रहे दीवाली अगुआ..
गाल गुलाबी 'वैलेंटाइन
डे' की गाते सरगम.
तुम भर्माईं जिस पल
उस पल उत्सव का मौसम.....
***
प्रार्थना
भक्ति-भाव की विमल नर्मदा में अवगाहन कर तर जाएँ.
प्रभु ऐसे रीझें, भू पर आ, भक्तों के संग नाचें-गाएँ..
हम आरती उतारें प्रभु की, उनके चरणों पर गिर जाएँ.
जय महेश! जय बम-बम भोले, सुन प्रभु हमको कंठ लगाएँ..
स्वप्न देख ले 'सलिल' सुनहरे, पूर्व जन्म के पुण्य भुनाएँ..
प्रभु को मन-मंदिर में पाकर, तन को हँसकर भेंट चढ़ाएँ..
२०-९-२०१०
***

शनिवार, 12 सितंबर 2026

सितंबर १२, सॉनेट, दोहा, गणेश, विसर्जन, नवगीत, हिंदी

 सलिल सृजन सितंबर १२

सॉनेट
तुम
तुमको शत-शत, साभार नमन
तुमको अर्पित निज अंतर्मन
तुम ही फागुन, तुम ही सावन
तुम ही श्वासों में पली लगन
तुम बिन मरुथल होता जीवन
तुम संग रहीं तो है मधुवन
तुम बनीं नयन, तुम बनीं वचन
तुमको पा जीवन है जीवन
तुम कहो, कौन है तुम सा धन
तुम साध्य, तुम्हीं तो हो साधन
तुम ही वादन, तुम ही गायन
तुम बिन हो पाता नहीं सृजन
तुम-मैं हम हैं कर विविध जतन
शत वर्ष हँसो, महकाओ चमन
१२-९-२०२२
●●●
मुक्तक
गीत पूर्णिमा जगमग तब हो जब राकेश प्रकाशित हो।
शब्द भाव रस लय मय ध्वनि से त्रिभुवन सकल निनादित हो।।
कलकल कलरव सुनकर श्रोता झूमे, करतल ध्वनि गूँजे-
मन से मन मिल सके, प्राण संप्राणित मुदित।।
***
एक विमर्श
विसर्जन क्यों और कैसे?
*
अनंत चतुर्दशी गणेश विसर्जन और पुनरागमन प्रार्थना का पर्व।
चतुर्थी पर स्थापना, दस दिन पूजन और फिर विसर्जन के नाम पर प्रतिभाओं की दुर्दशा और अकल्पनीय प्रदूषण।
यह त्रासदी नव दुर्गा महोत्सव पर दोहराई जाएगी।
शोचनीय है कि जिन्हें विघ्नेश कहकर उनसे विघ्न निवारण हेतु प्रार्थना की, उन्हीं को विघ्नेश में डाल दिया। मूर्तियों की दुर्दशा करने से बेहतर है परंपरा का पालन करते हुए हल्दी और सुपारी में दैवीय शक्तियों का आव्हान-पूजन कर विसर्जन हो। इससे न तो प्रदूषण फैलेगा, न मूर्तियों की दुर्दशा होगी।
पुष्प तथा अन्य पूजन सामग्री महानगरों में नगर निगम वालों को दें तथा गाँवों में एक गड्ढा खोदकर उसमें दबा दें।
प्लास्टिक, रसायनों, एस्बेस्टस, प्लास्टर अॉफ पेरिस आदि का प्रयोग कतई न करें।
मूर्ति पूजन में श्रद्धा हो तो धातु (सोना, चाँदी, ताँबा, पीतल, अष्टधातु, पत्थर या एल्यूमीनियम) की मूर्ति का पूजन करें। इसे पूरे वर्ष भी पूज सकते हैं और विसर्जन के बाद अगले वर्ष के लिए सुरक्षित भी रखते सकते हैं। इससे घर वर्ष मूर्ति पर और उसे लाने-ले जाने में होने वाला खर्च भी बचेगी जो मँहगाई का मार कुछ कम करेगा।
अन्य उपाय मिट्टी की ६ इंच तक की मूर्ति को विसर्जन पश्चात घर में ही स्वच्छ जल में विसर्जित कर उसे पेड़-पौधों का जड़ में डाल देना है।
चित्र का पूजन भी समान फल देता है। इसे विसर्जित न करें।
सनातन धर्म की मूल परंपरा प्रतीक पूजन है। वैष्णव देवी जैसे पुरातन स्थलों पर अनगढ़ पाषाण पिंड ही पूजे जाते हैं। यह सर्वमान्य है कि ईश्वर निराकार हैं। 'जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन तैसी' के अनुसार भक्त अपने इष्ट को रूपाकार देकर पूजते हैं। कई बार माताएँ पुत्र को पुत्री के रूप में अथवा पुत्री को पुत्री के रूप में सज्जित कर अपनी मनस्तुष्टि करती हैं । यही भाव भक्त से प्रतिमा बनाता है। इसीलिए कहा जाता है 'भगत के बस में हैं भगवान। भगवान सौजन्यता वश भक्त के 'बस' में होने पर भी 'बेबस' नहीं है। भक्त अपने इष्ट की प्रतिमा की दुर्दशा का निमित्त बनकर अपने ही कष्ट को आमंत्रित करता है।
आवश्यक है कि हम दैवीय शक्तियों का आह्वान अपने अंतर्मन में करें। प्रतिमा पूजन कम और लघ्वाकारी विग्रहों का हो। शिवलिंग पूजन प्रतीक पूजन का कालजयी उदाहरण है।
सनातन धर्म की परंपरानुसार बुद्ध ने भी मूर्ति का निषेध किया, भक्तों ने सबसे अधिक मूर्तियाँ बुद्ध की बनाकर समझा कि महान कार्य किया पर काल साक्षी है कि वे मूर्तियाँ तोड़ा गईं, बौद्ध धर्म का पराभव हुआ। पुरातात्त्विक अवशेषों में बड़ी संख्या में मूर्तियों के ध्वंसावशेषों को देखकर भी हम उनकी निस्सारता न समझें तो हमारी समझ का ही दोष है।
मूर्तियों के निर्माण में लगने वाला श्रम और सामग्री किसी जीवनोपयोगी निर्माण में लगे तो सबका भला होगा। 'मंदिर मंदिर मूरत तेरी, कहुँ न देखी सूरत तेरी' का अर्थ समझ मम मंदिर में देव स्थापना कर सकें तो विसर्जन करने का मन ही न होगा।
क्या हम प्रतिमा के स्थान पर देव और दिव्यता को पूजकर दैवीय गुणों से युक्त हो सकेंगे?
अनंत चौदस
१२-९-२०१९
७९९९५५९६१८
***
नवगीत:
हिंदी की जय हो...
संजीव 'सलिल'
*
हिंद और
हिंदी की जय हो...
*
जनगण-मन की
अभिलाषा है.
हिंदी भावी
जगभाषा है.
शत-शत रूप
देश में प्रचलित.
बोल हो रहा
जन-जन प्रमुदित.
ईर्ष्या, डाह, बैर
मत बोलो.
गर्व सहित
बोलो निर्भय हो.
हिंद और
हिंदी की जय हो...
*
ध्वनि विज्ञानं
समाहित इसमें.
जन-अनुभूति
प्रवाहित इसमें.
श्रुति-स्मृति की
गहे विरासत.
अलंकार, रस,
छंद, सुभाषित.
नेह-प्रेम का
अमृत घोलो.
शब्द-शक्तिमय
वाक् अजय हो.
हिंद और
हिंदी की जय हो...
*
शब्द-सम्पदा
तत्सम-तद्भव.
भाव-व्यंजना
अद्भुत-अभिनव.
कारक-कर्तामय
जनवाणी.
कर्म-क्रिया कर
हो कल्याणी.
जो भी बोलो
पहले तौलो.
जगवाणी बोलो
रसमय हो.
हिंद और
हिंदी की जय हो...
***
नवगीत:
अपना हर पल है हिन्दीमय....
संजीव 'सलिल'
*
अपना हर पल है हिन्दीमय
एक दिवस क्या खाक मनाएँ?
बोलें-लिखें नित्य अंग्रेजी
जो वे एक दिवस जय गाएँ...
*
निज भाषा को कहते पिछडी.
पर भाषा उन्नत बतलाते.
घरवाली से आँख फेरकर
देख पडोसन को ललचाते.
ऐसों की जमात में बोलो,
हम कैसे शामिल हो जाएँ?...
*
हिंदी है दासों की बोली,
अंग्रेजी शासक की भाषा.
जिसकी ऐसी गलत सोच है,
उससे क्या पालें हम आशा?
इन जयचंदों की खातिर
हिंदीसुत पृथ्वीराज बन जाएँ...
*
ध्वनिविज्ञान-नियम हिंदी के
शब्द-शब्द में माने जाते.
कुछ लिख, कुछ का कुछ पढने की
रीत न हम हिंदी में पाते.
वैज्ञानिक लिपि, उच्चारण भी
शब्द-अर्थ में साम्य बताएँ...
*
अलंकार, रस, छंद बिम्ब,
शक्तियाँ शब्द की बिम्ब अनूठे.
नहीं किसी भाषा में मिलते,
दावे करलें चाहे झूठे.
देश-विदेशों में हिन्दीभाषी
दिन-प्रतिदिन बढ़ते जाएँ...
*
अन्तरिक्ष में संप्रेषण की
भाषा हिंदी सबसे उत्तम.
सूक्ष्म और विस्तृत वर्णन में
हिंदी है सर्वाधिक सक्षम.
हिंदी भावी जग-वाणी है
निज आत्मा में 'सलिल' बसाएँ...
१२.९.२०१६
***
दोहा दुनिया
जो अच्छा उसको दिखे, अच्छा सब संसार
धन्य भाग्य जो पा रहा, 'सलिल' स्नेह उपहार
*
शरण मिली कमलेश की, 'सलिल' हुआ है धन्य
दिव्या कविता सा नहीं, दूज मीत अनन्य
*
शब्दों के संसार में, मिल जाते हैं मीत
पता न चलता समय का, कब जाता दिन बीत
*
दोहा सलिला:
करना है साहित्य बिन, भाषा का व्यापार
भाषा का करती 'सलिल', सत्ता बंटाधार
*
मनमानी करते सदा, सत्ताधारी लोग
अब भाषा के भोग का, इन्हें लगा है रोग
*
करता है मन-प्राण जब, अर्पित रचनाकार
तब भाषा की मृदा से, रचना ले आकार
*
भाषा तन साहित्य की, आत्मा बिन निष्प्राण
शिवा रहित शिव शव सदृश, धनुष बिना ज्यों बाण
*
भाषा रथ को हाँकता, सत्ता सूत अजान
दिशा-दशा साहित्य दे, कैसे? दूर सुजान
*
अवगुंठन ही ज़िन्दगी, अनावृत्त है ईश
प्रणव नाद में लीन हो, पाते सत्य मनीष
*
पढ़ ली मन की बात पर, ममता साधे मौन
अपनापन जैसा भला, नाहक तोड़े कौन
*
जीव किरायेदार है, मालिक है भगवान
हुआ किरायेदार के, वश में दयानिधान
*
रचना रचनाकार से, रच ना कहे न आप
रचना रचनाकार में, रच जाती है व्याप
*
जल-बुझकर वंदन करे, जुगनू रजनी मग्न
चाँद-चाँदनी का हुआ, जब पूनम को लग्न
*
तिमिर-उजाले में रही, सत्य संतान प्रीति
चोली-दामन के सदृश, संग निभाते रीति
*
जिसे हुआ संतोष वह, रंक अमीर समान
असंतोषमय धनिक सम, दीन न कोई जा
अवगुंठन ही ज़िन्दगी, अनावृत्त है ईश
प्रणव नाद में लीन हो, पाते सत्य मनीष
*
पढ़ ली मन की बात पर, ममता साधे मौन
अपनापन जैसा भला, नाहक तोड़े कौन
*
जीव किरायेदार है, मालिक है भगवान
हुआ किरायेदार के, वश में दयानिधान
*
रचना रचनाकार से, रच ना कहे न आप
रचना रचनाकार में, रच जाती है व्याप
*
जल-बुझकर वंदन करे, जुगनू रजनी मग्न
चाँद-चाँदनी का हुआ, जब पूनम को लग्न
*
तिमिर-उजाले में रही, सत्य संतान प्रीति
चोली-दामन के सदृश, संग निभाते रीति
*
जिसे हुआ संतोष वह, रंक अमीर समान
असंतोषमय धनिक सम, दीन न कोई जान
***
नवगीत:
संजीव
*
सिसक रही है
हिंदी मैया
कॉन्वेंट स्कूल में
*
शानदार सम्मलेन होता
किन्तु न इसमें जान है.
बुंदेली को जगह नहीं है
न ही मालवी-मान है.
रुद्ध प्रवेश निमाड़ी का है
छत्तीसगढ़ी न श्लाघ्य है
बृज, अवधी, मैथिली न पूछो
हल्बी का न निशान है.
भोजपुरी को भूल
नहीं क्या
घिरते हैं हम भूल में?
सिसक रही है
हिंदी मैया
कॉन्वेंट स्कूल में
*
महीयसी को बिठलाया है
प्रेस गैलरी द्वार पर.
भारतेंदु क्या छोड़ गये हैं
सम्मेलन ही हारकर?
मातृशक्ति की अनदेखी
क्यों संतानें ही करती हैं?
घाघ-भड्डरी को बिसराया
देशजता से रार कर?
बिंधी हुई है
हिंदी कलिका
अंग्रेजी के शूल में
सिसक रही है
हिंदी मैया
कॉन्वेंट स्कूल में
*
रास, राई, बंबुलिया रोये
जगनिक-आल्हा यहाँ नहीं.
भगतें, जस, कजरी गायब हैं
गीत बटोही मिला नहीं.
सुआ गीत, पंथी या फागें
बिन हिंदी है कहाँ कहो?
जड़ बिसराकर पत्ते गिनते
माटी का संग मिला नहीं।
ताल-मेल बिन
सपने सारे
मिल जाएंगे धूल में.
सिसक रही है
हिंदी मैया
कॉन्वेंट स्कूल में
*
(१०-९-१५ को विश्व हिंदी सम्मेलन भोपाल में उद्घाटन के पूर्व लिखा गया)
१२.९.२०१५
०००

गुरुवार, 10 सितंबर 2026

सितंबर १०, सॉनेट, गीत, बाल, बिटिया, दोहा, कौन हैं हम, कविता,

 सलिल सृजन सितंबर १०

*
सॉनेट गीत
श्रौता-वक्ता
मैं श्रोता हूँ, मैँ श्रौता हूँ
वक्ता गण आते-जाते हैं
क्या जाने क्या कह जाते हैं
कर सुना अनसुना सोता हूँ।
हो जहाँ न कुछ मैं होता हूँ
कुछ गर्दभ स्वर में गाते हैं
भाषण दे तनिक न भाते हैं
कर हूट उन्हें मैं धोता हूँ।
पहले सोचो तब ही बोलो
घोलो मौलिकता की मिसरी
महकाओ जग की बगिया को।
जब भी बोलो पहले तोलो
बिखरे न विचारों की गठरी
चहकाओ मन गौरैया को।
मैं वक्ता हूँ, मैँ वक्ता हूँ
श्रोता गण आते-जाते हैं
क्या छोड़ें, क्या ले जाते हैं
दिन-रात बोल नहिं थकता हूँ।
सब सोते तब भी जगता हूँ
पंडित नेता कहलाते हैं
बन प्राध्यापक भरमाते हैं
खुद को खुद ही मैं ठगता हूँ।
चाहो आँखें मूँदो सो लो
धीरज की बँध जाए ठठरी
लूटो हो जहाँ रुपैया को।
दुनिया हिल जाए मत डोलो
चुभलाओ नफरत की मठरी
ठेंगा दिखलाता दुनिया को।
१०.९.२०२५
०००
विश्ववाणी हिंदी संस्थान अभियान जबलपुर
समन्वय प्रकाशन जबलपुर विश्व
कीर्तिमान धारी पुस्तकें
*हिंदी सॉनेट सलिला*
१. पहला हिंदी सॉनेट साझा संकलन
२. पहला सॉनेट संकलन जिसमें ३२ सॉनेटकार हैं।
३. पहला सॉनेट संकलन जिसमें ३२१ सॉनेट हैं।
हर सॉनेट प्रेमी के लिए पठनीय-संग्रहणीय। २१६ पृष्ठ, बहुरंगी सजिल्द जैकेट युक्त आवरण, उत्तम छपाई, स्तरीय कागज और बँधाई।
सीमित प्रतियाँ। अपनी प्रति तुरंत मँगाने के लिए ९४२५१ ८३२४४ पर भेजिए ५००/-।
पैकिंग-डाक व्यय निशुल्क।
*चंद्र विजय अभियान*
१. हिंदी का पहला काव्य संकलन जिसमें वैज्ञानिक परियोजना पर २६८ कविताएँ हैं।
२. हिंदी का पहला काव्य संकलन जिसमें ५१ भाषा-बोलिओं की रचनाएँ हैं।
३. हिंदी का पहला काव्य संकलन जिसमें ५ देशों के २१७ कवि सम्मिलित हैं।
हर काव्य प्रेमी के लिए पठनीय-संग्रहणीय। ३०० पृष्ठ, बहुरंगी पेपरबैक आवरण, उत्तम छपाई, स्तरीय कागज और बँधाई।
सीमित प्रतियाँ। अपनी प्रति तुरंत मँगाने के लिए ९४२५१ ८३२४४ पर भेजिए ५००/-।
पैकिंग-डाक व्यय निशुल्क।
*फुलबगिया*
१. हिंदी का पहला काव्य संकलन जिसमें १२१ फूलों पर ७७ कवियों की २७० कविताएँ सम्मिलित हैं।
२. हिंदी का पहला काव्य संकलन जिसमें फूलों पर प्रकाशित भारत के ४८ डाक तिकीटों के चित्र हैं।
३. हिंदी का पहला काव्य संकलन जिसमें फूलों पर चित्रपटीय गीतों के मुखड़ों की सूची है।
हर काव्य प्रेमी के लिए पठनीय-संग्रहणीय। ३१८ पृष्ठ, बहुरंगी पेपरबैक आवरण, उत्तम छपाई, स्तरीय कागज और बँधाई।
सीमित प्रतियाँ। अपनी प्रति तुरंत मँगाने के लिए ९४२५१ ८३२४४ पर भेजिए ५००/-।
पैकिंग-डाक व्यय निशुल्क।
*ओ मेरी तुम *
१. हिंदी का पहला काव्य संकलन जिसमें ५३ शृंगार गीत तथा ५२ हिंदी-बुंदेली सम्मिलित हैं।
हर काव्य प्रेमी के लिए पठनीय-संग्रहणीय। ११२ पृष्ठ, बहुरंगी पेपरबैक आवरण, उत्तम छपाई, स्तरीय कागज और बँधाई।
सीमित प्रतियाँ। अपनी प्रति तुरंत मँगाने के लिए ९४२५१ ८३२४४ पर भेजिए ३००/-।
पैकिंग-डाक व्यय निशुल्क।
*
सॉनेट
कर-कलम
कर कलम थामे समय का सच कहें,
ढहें मत, थिर रहे कोशिश की कशिश,
तपिश हर बदलाव की हँसकर सहें,
हो न जब तक पूर्ण मन में पली विश।
कर कलम को लें बना तलवार झट,
नट न पाएँ रास्ते पग मंजिलें,
काफिले पीछे चलें तू बढ़ सतत,
विगत से ले सीख, आगत से मिलें।
कर कलम कर दें कलम बाधा सभी,
अभी को टालें कभी पर आप मत,
मत-विमत सम्मत व्यवस्था हो सभी,
तभी करतल ध्वनि करें सब रख सुमत।
कर कलम करवाल हो, करताल हो।
कर कलम हड़ताल हो, पड़ताल हो।
१०.९.२०२३
•••
बाल रचना
बिटिया छोटी
*
फ़िक्र बड़ी पर बिटिया छोटी
क्यों न खेलती कन्ना-गोटी?
*
ऐनक के काँचों से आँखें
झाँकें लगतीं मोटी-मोटी
*
इतनी ज्यादा गुस्सा क्यों है?
किसने की है हरकत खोटी
*
दो-दो फूल सजे हैं प्यारे
सर पर सोहे सुंदर चोटी
*
हलुआ-पूड़ी इसे खिलाओ
तनिक न भाती इसको रोटी
*
खेल-कूद में मन लगता है
नहीं पढ़ेगी पोथी मोटी
१०-९-२०१७
***
दोहा सलिला-
तन मंजूषा ने तहीं, नाना भाव तरंग
मन-मंजूषा ने कहीं, कविता सहित उमंग
*
आत्म दीप जब जल उठे, जन्म हुआ तब मान
श्वास-स्वास हो अमिय-घट, आस-आस रस-खान
*
सत-शिव-सुंदर भाव भर, रचना करिये नित्य
सत-चित-आनन्द दरश दें, जीवन सरस अनित्य
*
मिले नकार नकार को, स्वीकृत हो स्वीकार।
स्नेह स्नेह को दीजिए, सके प्रहार प्रहार।।
***
एक रचना
कौन हैं हम?
*
कौन हैं हम?
देह नश्वर,
या कि हैं आत्मा चिरन्तन??
*
स्नेह सलिला नर्मदा हैं।
सत्य-रक्षक वर्मदा हैं।
कोई माने या न माने
श्वास सारी धर्मदा हैं।
जान या
मत जान लेकिन
मित्र है साहस-प्रभंजन।
कौन हैं हम?
देह नश्वर,
या कि हैं आत्मा चिरन्तन??
*
सभ्यता के सिंधु हैं हम,
भले लघुतम बिंदु हैं हम।
गरल धारे कण्ठ में पर
शीश अमृत-बिंदु हैं हम।
अमरकंटक-
सतपुड़ा हम,
विंध्य हैं सह हर विखण्डन।
कौन हैं हम?
देह नश्वर,
या कि हैं आत्मा चिरन्तन??
*
ब्रम्हपुत्रा की लहर हैं,
गंग-यमुना की भँवर हैं।
गोमती-सरयू-सरस्वति
अवध-ब्रज की रज-डगर हैं।
बेतवा, शिव-
नाथ, ताप्ती,
हमीं क्षिप्रा, शिव निरंजन।
कौन हैं हम?
देह नश्वर,
या कि हैं आत्मा चिरन्तन??
*
तुंगभद्रा पतित पावन,
कृष्णा-कावेरी सुहावन।
सुनो साबरमती हैं हम,
सोन-कोसी-हिरन भावन।
व्यास-झेलम,
लूनी-सतलज
हमीं हैं गण्डक सुपावन।
कौन हैं हम?
देह नश्वर,
या कि हैं आत्मा चिरन्तन??
*
मेघ बरसे भरी गागर,
करी खाली पहुँच सागर।
शारदा, चितवन किनारे-
नागरी लिखते सुनागर।
हमीं पेनर
चारु चंबल
घाटियाँ हम, शिखर- गिरिवन
कौन हैं हम?
देह नश्वर,
या कि हैं आत्मा चिरन्तन??
१०-९-२०१६
***
गीत
कौन?
*
कौन रचेगा राम-कहानी?
कौन कहेगा कृष्ण-कथाएँ??
खुशियों की खेती अनसिंचित,
सिंचित खरपतवार व्यथाएँ।
*
खेत
कारखाने-कॉलोनी
बनकर, बिना मौत मरते हैं।
असुर हुए इंसान,
न दाना-पानी खा,
दौलत चरते हैं।
वन भेजी जाती सीताएँ,
मन्दिर पुजतीं शूर्पणखाएँ।
कौन रचेगा राम-कहानी?
कौन कहेगा कृष्ण-कथाएँ??
*
गौरैयों की देखभाल कर
मिली बाज को जिम्मेदारी।
अय्यारी का पाठ रटाती,
पैठ मदरसों में बटमारी।
एसिड की शिकार राधाएँ
कंस जाँच आयोग बिठाएँ।
कौन रचेगा राम-कहानी?
कौन कहेगा कृष्ण-कथाएँ??
*
रिद्धि-सिद्धि, हरि करें न शिक़वा,
लछमी पूजती है गणेश सँग।
'ऑनर किलिंग' कर रहे दद्दू
मूँछ ऐंठकर, जमा रहे रंग।
ठगते मोह-मान-मायाएँ
घर-घर कुरुक्षेत्र-गाथाएँ।
कौन रचेगा राम-कहानी?
कौन कहेगा कृष्ण-कथाएँ??
*
हर कर्तव्य तुझे करना है,
हर अधिकार मुझे वरना है।
माँग भरो, हर माँग पूर्ण कर
वरना रपट मुझे करना है।
देह मात्र होतीं वनिताएँ
घर को होटल मात्र बनाएँ।
कौन रचेगा राम-कहानी?
कौन कहेगा कृष्ण-कथाएँ??
*
दोष न देखें दल के अंदर,
और न गुण दिखते दल-बाहर।
तोड़ रहे कानून बना, सांसद,
संसद मंडी-जलसा घर।
बस में हो तो साँसों पर भी
सरकारें अब टैक्स लगाएँ।
कौन रचेगा राम-कहानी?
कौन कहेगा कृष्ण-कथाएँ??
९-८-२०१६
गोरखपुर दंत चिकित्सालय
जबलपुर
***

मंगलवार, 8 सितंबर 2026

सितंबर ८, ग़ज़ल, सॉनेट, , हाइकु, नवगीत, दोहा, चाँद, सरस्वती, लाजवंती, शहर

सलिल सृजन सितंबर ८
ग़ज़लिका (वाचिक)
मुझे जानता मैं ही नहीं,  
तुझे जानता संसार है।  
.
मैं ही मार 'मैं' न कभी सका  
तुझे हार भी जय-हार है।  
.
न फिदा हुआ, ना जुदा हुआ 
कह किस पे कौन निसार है? 
.
मैं न तू हुआ, तू न मैं हुआ  
हैं जुदा न धार-किनार है।  
.
मैं फिसल गिरा, तू सम्हल उठा  
मैं तिमिर, तू ओज-निखार है।  
.
मैं जहाँ नहीं, तू वहीँ मिला  
है गिला नहीं, ये करार है।  
.
मैं जहाँ गया, तू वहीं मिला  
न नकार, नहिं हुंकार है।  
.
जो न दुख हुआ तो न दुख हुआ  
जो न ग़म हुआ तो करार है 
.
मैं स्याह हूँ और सफेद तू 
इंकार में ही इकरार है। 
.
न कहो ''सलिल' गर है न निर्मल 16
नेह नर्मद-धार है। 12
८.९.२०२६
०००
सरस्वती वंदना 
शारद माँ का रूप सुहाना लगता है २२
सत-शिव-सुंदर नाद अनाहद सजता है
.
नीर-क्षीर मति लेकर राजहंस पुलकित
चरण शरण पा हर्षित-हुलसित रहता है
.
श्वेत वसन गौरांगी सरस्वती माता
मैया के कर में सितार सज बजता है
.
निराकार-साकार बिंदु-रेखा तुम ही
नाद-ताल भाषा-अक्षर तम हरता है
.
अनल अनिल भू गगन सलिल में संजीवित
कृपा दृष्टि पाने जनगण-मन भजता है
८.९.२०२५
०००
गीत
लाजवंती
लाजवंती! हो कहाँ तुम
खोजते हैं नैन?
ज़िंदगी की बंदगी करती रहीं
छुई-मुई हे! तारती तरती रहीं।
मार पाया काल भी तुमको नहीं-
दे परीक्षा मौत खुद वरती रहीं।
बिन तुम्हारे विष्णु-शिव
विधि अधूरे-बेचैन
लाजवंती! हो कहाँ तुम
खोजते हैं नैन?
अग्नि में दह क्यों परीक्षा दी कहो?१
चीर हरने दिया क्यों पीड़ा तहो।२
बाँध पग में राइफल कर क्रांति दो३-
शक्ति खुद हो शक्ति बिन आगे न हो।
घूमते बेफिक्र एसिड डाल जो न उनको
मिले पल भर चैन
लाजवंती! हो कहाँ तुम
खोजते हैं नैन?
मोह में पड़ सत्य मत भूलो
वासना झूला नहीं झूलो।
रहे ममता हृदय में पर हाथ
शस्त्र थामे दुष्ट-हृद हूलो।
रमा-शारद-शक्ति युग अनुरूप
यथोचित बोलो हमेशा बैन
लाजवंती! हो कहाँ तुम
खोजते हैं नैन?
१ सीता जी, २ द्रौपदी, ३ दुर्गा भाभी- भगवतीचरण वोहरा की पत्नी, लाहौर कांड के बाद भगत सिंह की पत्नी के रूप में पैरों में राइफल बाँध कर भागने में सहायक हुईं।
000
लेख-
लाजवंती एक असरदार औषधि
लाजवंती को आमतौर पर "छू-छू" पौधे के रूप में जाना जाता है। इसे आमतौर पर उच्च सजावटी मूल्य का पौधा माना जाता है और इसका उपयोग विभिन्न औषधीय प्रयोजनों के लिए भी किया जाता है। लाजवंती अपने एंटीऑक्सीडेंट गुणों के कारण इंसुलिन के स्राव को बढ़ाकर रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने में मदद करती है। यह मूत्र संबंधी समस्याओं के लिए उपयोगी है क्योंकि यह अपने मूत्रवर्धक गुण के कारण मूत्र उत्पादन को बढ़ाती है। लाजवंती मिर्गी के प्रबंधन में भी मदद कर सकती है क्योंकि इसमें ऐंठनरोधी गुण होते हैं। आप इसके एंटीऑक्सीडेंट और रोगाणुरोधी गुणों के कारण घाव को जल्दी भरने के लिए लाजवंती के लेप का उपयोग कर सकते हैं। यह अपने सूजनरोधी गुणों के कारण घावों से संबंधित दर्द और सूजन को कम करने में भी मदद करती है। आयुर्वेद के अनुसार, लाजवंती अपने सीता (शीतल) और कषाय (कसैले) गुणों के कारण बवासीर के प्रबंधन में मदद कर सकती है।
लाजवंती के समानार्थी शब्द मिमोसा पुडिका, समांगा, वराक्रांता, नमस्कारकारी, लजुबिलाटा, अदामालती, लजाका, लज्जावंती, टच-मी-नॉट, रिसामणि, लजावंती, लजामनी, छुइमुई, लजौनी, मुत्तिदसेनुई, माचिकेगिडा, लज्जावती, थोट्टा वटी, लजालू, लजाकुरी, लजाना, थोट्टावाडी, टोटलचुरुंगी, मुदुगुदमारा आदि हैं।
लाजवंती के फायदे
बवासीर
बवासीर, जिसे आयुर्वेद में अर्श के रूप में जाना जाता है, अस्वास्थ्यकर आहार और गतिहीन जीवन शैली के कारण होता है। इससे तीनों दोषों, मुख्य रूप से वात और पित्त दोषों की हानि होती है, जिसके परिणामस्वरूप पाचन अग्नि कम होती है और अंततः लगातार कब्ज होता है। इससे मलाशय क्षेत्र में नसों में सूजन और बवासीर का विकास होता है। लाजवंती का लेप या मलहम अपने सीता (शीतल) और कषाय (कसैले) गुणों के कारण जलन या खुजली की स्थिति से राहत पाने के लिए बवासीर के मस्सों पर लगाया जा सकता है।
माइग्रेन
माइग्रेन एक ऐसी स्थिति है जो पित्त दोष के बढ़ने के कारण होती है। लाजवंती का लेप अपने पित्त संतुलन गुण के कारण माइग्रेन से राहत प्रदान करने के लिए माथे पर लगाया जाता है ।
लाजवंती का पेस्ट- कुछ ताज़ा लाजवंती के पत्ते लें। पत्तों को पीसकर पेस्ट बना लें। चिकना पेस्ट बनाने के लिए आप इसमें थोड़ा पानी भी मिला सकते हैं। घाव या सूजन पर इस पेस्ट को लगाने से घाव जल्दी भर जाता है।
८.९.२०२५
०००
सॉनेट
चले चाँद की ओर १
जय जय सोमनाथ की कहकर,
चले चांँद की ओर साथ मिल,
इसरो जा रॉकेट से बँधकर,
फुर्र उड़ें, चंदा है मंजिल।
चंद्रमुखी पथ हेर रही है,
आते हैं हम मत घबराना,
जाने कब से टेर रही है,
बने चाँद ही नया ठिकाना।
मत रोको टोको जी हमको,
चलना है काँधे पर बैठो,
ट्रैफिक पुलिस ने हमसे दमड़ी,
मिल पाएगी एकउ तुमको।
मोदी जी-राहुल जी आओ,
ये दिल मांँगे मोर दिलाओ।।
८-९-२०२३
•••
चले चाँद की ओर २
आएँ सॉनेटवीरों! आप, चलें आप भी साथ
इस दल का हो या उस दल का; नेता का ले नाम
मनमानी करते हैं हम सब चलें उठाकर माथ
डरते नहीं पुलिस से लाठी का न यहाँ कुछ काम
घरवाली थी चंद्रमुखी अब सूर्यमुखी विकराल
सात सात जन्मों को बाँधे इसीलिए हम भाग
चले चाँद की ओर बजाए घर पर बैठी गाल
फुर्र हो रहे हम वह चाहे जितनी उगले आग
चीन्ह न पाए इसीलिए तो हम ढाँकें हैं मुखड़ा
चलें मून शिव-शक्ति वहीं पर छान रहे हैं भाँग
दुर्घटना है ताने सुनना, किसे सुनाएँ दुखड़ा
छह के कंधे पर छह बैठें, नहीं अड़ाएँ टाँग
सॉनेट सलिला के सब साथी व्यंजन लाएँ खूब
खाकर अमिधा और लक्षणा में गपियाएँ डूब
८-९-२०२३
***
सॉनेट
थोथा चना
*
थोथा चना; बाजे घना
मनमानी मन की बातें
ठूँठ सरीखा रहता तना
अपनों से करता घातें
बने मिया मिट्ठू यह रोज
औरों में नित देखे दोष
करा रहा गिद्धों को भोज
दोनों हाथ लुटाए कोष
साइकिल पंजा हाथी फूल
संसद में करते हैं मौज
जनता फाँक रही है धूल
बोझ बनी नेता की फ़ौज
यह भौंका; वह गुर्राया
यह खीझा, वह टर्राया
८-९-२०२२
*
हिन्दी के बारे में विद्वानों के विचार
सी.टी.मेटकॉफ़ ने १८०६ ई.में अपने शिक्षा गुरु जॉन गिलक्राइस्ट को लिखा-
'भारत के जिस भाग में भी मुझे काम करना पड़ा है,कलकत्ता से लेकर लाहौर तक,कुमाऊं के पहाड़ों से लेकर नर्मदा नदी तक मैंने उस भाषा का आम व्यवहार देखा है,जिसकी शिक्षा आपने मुझे दी है। मैं कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक या जावा से सिंधु तक इस विश्वास से यात्रा करने की हिम्मत कर सकता हूं कि मुझे हर जगह ऐसे लोग मिल जाएंगे जो हिन्दुस्तानी बोल लेते होंगे।'
टॉमस रोबक ने १८०७ ई.में लिखा-
'जैसे इंग्लैण्ड जाने वाले को लैटिन सेक्सन या फ़्रेंच के बदले अंग्रेजी सीखनी चाहिए,वैसे ही भारत आने वाले को अरबी-फारसी या संस्कृत के बदले हिन्दुस्तानी सीखनी चाहिए।'
विलियम केरी ने १८१६ ई. में लिखा-
'हिन्दी किसी एक प्रदेश की भाषा नहीं बल्कि देश में सर्वत्र बोली जाने वाली भाषा है।'
एच.टी. केलब्रुक ने लिखा-
'जिस भाषा का व्यवहार भारत के प्रत्येक प्रान्त के लोग करते हैं,जो पढ़े-लिखे तथा अनपढ़ दोनों की साधारण बोलचाल की भाषा है,जिसको प्रत्येक गांव में थोड़े बहुत लोग अवश्य ही समझ लेते हैं, उसी का यथार्थ नाम हिन्दी है।'
८-९-२०२२
***
लेख :
श्वास-प्रश्वास की गति ही गीत-नवगीत
*
भाषा का जन्म
प्रकृति के सानिंध्य में अनुभूत ध्वनियों को स्मरण कर अभिव्यक्त करने की कला और सामर्थ्य से भाषा का जन्म हुआ। प्राकृतिक घटनाओं वर्ष, जल प्रवाह, तड़ित, वायु प्रवाह था जीव-जंतुओं व पशु-पक्षियों की बोली कूक, चहचहाहट, हिनहिनाहट, फुँफकार, गर्जन आदि में अन्तर्निहित ध्वनि-खंडों को स्मरण रखकर उनकी आवृत्ति कर मनुष्य ने अपने सहयोगियों को संदेश देना सीखा। रुदन और हास ने उसे रसानुभूति करने में समर्थ बनाया। ध्वनिखंडों की पुनरावृत्ति कर श्वास-प्रश्वास के आरोह-अवरोह के साथ मनुष्य ने लय की प्रतीति की। सार्थक और निरर्थक ध्वनि का अंतर कर मनुष्य ने वाचिक अभिव्यक्ति की डगर पर पग रखे। अभिव्यक्त को स्थाई रूप से संचित करने की चाह ने ध्वनियों के लिए संकेत निर्धारण का पथ प्रशस्त किया, संकेतों के अंकन हेतु पटल, कलम और स्याही या रंग का उपयोग कर मनुष्य ने कालांतर में चित्र लिपियों और अक्षर लिपियों का विकास किया। अक्षरों से शब्द, शब्द से वाक्य बनाकर मनुष्य ने भाषा विकास में अन्य सब प्राणियों को पीछे छोड़ दिया।
भाषा की समझ
वाचिक अभिव्यक्ति में लय के कम-अधिक होने से क्रमश: गद्य व पद्य का विकास हुआ। नवजात शिशु मनुष्य की भाषा, शब्दों के अर्थ नहीं समझता पर वह अपने आस-पास की ध्वनियों को मस्तिष्क में संचित कर क्रमश: इनका अर्थ ग्रहण करने लगता है। लोरी सुनकर बच्चा लय, रस और भाव ग्रहण करता है। यही काव्य जगत में प्रवेश का द्वार है। श्वास-प्रश्वास के आरोह-अवरोह के साथ शिशु लय से तादात्म्य स्थापित करता है जो जीवन पर्यन्त बन रहता है। यह लय अनजाने ही मस्तिष्क में छाकर मन को प्रफुल्लित करती है। मन पर छह जाने वाली ध्वनियों की आवृत्ति ही 'छंद' को जन्म देती है। वाचिक व् लौकिक छंदों में लघु-दीर्घ उच्चार का संयोजन होता है। इन्हे पहचान और गईं कर वर्णिक-मात्रिक छंद बनाये जाते हैं।
गीत - नवगीत का शिल्प और तत्व
गीति काव्य में मुखड़े अंतरे मुखड़े का शिल्प गीत को जन्म देता है। गीत में गीतकार की वैयक्तिक अनुभूतियों की अभिव्यक्ति होती है। गीत के अनिवार्य तत्व कथ्य, लय, रस, बिम्ब, प्रतीक, भाषा शैली आदि हैं। वर्ण संख्या, मात्रा संख्या, पंक्ति संख्या, पद संख्या, अलंकार, मिथक आदि आवश्यकतानुसार उपयोग किये जाते हैं। गीत सामान्यत: नवगीत से अधिक लंबा होता है।
लगभग ७० वर्ष पूर्व कुछ गीतकारों ने अपने गीतों को नवगीत कहा। गत सात दशकों में नवगीत की न तो स्वतंत्र पहचान बनी, न परिभाषा। वस्तुत: गीत वृक्ष का बोनसाई की तरह लघ्वाकारी रूप नवगीत है। नवगीत का शिल्प गीत की ही तरह मुखड़े और अंतरे का संयोजन है। मुखड़े और अंतरे में वर्ण संख्या, मात्रा संख्या, पंक्ति संख्या आदि का बंधन नहीं होता। मुखड़ा और अंतरा में छंद समान हो सकता है और भिन्न भी। सामान्यत: मुखड़े की पंक्तियाँ सम भारीय होती है। अंतरे की पंक्तियाँ मुखड़े की पंक्तियों के समान अथवा उससे भिन्न सम भार की होती हैं। सामान्यत: मुखड़े की पंक्तियों का पदांत समान होता है। अंतरे के बाद एक पंक्ति मुखड़े के पदभार और पड़ंत की होती है जिसके बाद मुखड़ा दोहराया जाता है।
गीत - नवगीत में अंतर
गीत कुल में जन्मा नवगीत अपने मूल से कुछ समानता और कुछ असमानता रखता है। दोनों में मुखड़े-अंतरे का शिल्प समान होता है किन्तु भावाभिव्यक्ति में अन्तर होता है। गीत की भाषा प्रांजल और शुद्ध होती है जबकि नवगीत की भाषा में देशज टटकापन होता है। गीतकार कथ्य को अभिव्यक्त करते समय वैयक्तिक दृष्टिकोण को प्रधानता देता है जबकि नवगीतकार सामाजिक दृष्टिकोण को प्रमुखता देता है। गीत में आलंकारिकता को सराहा जाता है, नवगीत में सरलता और स्पष्टता को। नवगीतकारों का एक वर्ग विसंगति, विडम्बना, टकराव, बिखराव, दर्द और पीड़ा को नवगीत में आवश्यक मंटा रह है किन्तु अब यह विचार धारा कालातीत हो रही है। मेरे कई नवगीत हर्ष, उल्लास, श्रृंगार, वीर, भक्ति आदि रसों से सिक्त हैं। कुमार रवींद्र, पूर्णिमा बर्मन, निर्मल शुक्ल, धनंजय सिंह, गोपाल कृष्ण भट्ट 'आकुल', जय प्रकाश श्रीवास्तव, अशोक गीते, मधु प्रधान, बसंत शर्मा, रविशंकर मिश्र, प्रदीप शुक्ल, शशि पुरवार, संध्या सिंह, अविनाश ब्योहार, भावना तिवारी, कल्पना रामानी , हरिहर झा, देवकीनंदन 'शांत' आदि अनेक नवगीतकारों के नवगीतों में सांस्कृतिक रूचि और सकारात्मक ऊर्जा का प्राधान्य है। पूर्णिमा बर्मन ने भारतीय पर्वों, पेड़-पौधों और पुष्पों पर नवगीत लेखन कराकर नवगीत को विसंगतिपरकता के कठमुल्लेपन से निजात दिलाने में महती भूमिका निभाई है।
नवगीत का नया कलेवर
साम्यवादी वैचारिक प्रतिबद्धता के नाम पर सामाजिक विघटन, टकराव और द्वेषपरक नकारात्मकता से सामाजिक समरसता को क्षति पहुँचा रहे नवगीतकारों ने समाज-द्रोह को प्रोत्साहित कर परिवार संस्था को अकल्पनीय क्षति पहुँचाई है। नवगीत हे इन्हीं लघुकथा, व्यंग्य लेख आदि विधाओं में भी यह कुप्रवृत्ति घर कर गयी है। नवगीत ने नकारात्मकता का सकारात्मकता से सामना करने में पहल की है। कुमार रवींद्र की अप्प दीपो भव, पूर्णिमा बर्मन की चोंच में आकाश, आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' की काल है संक्रांति का और सड़क पर, देवेंद्र सफल की हरापन बाकी है, आचार्य भगवत दुबे की हिरन सुगंधों के, जय प्रकाश श्रीवास्तव की परिंदे संवेदनाओं के, अशोक गीते की धूप है मुंडेर की आदि कृतियों में नवाशापरक नवगीत संभावनाओं के द्वार खटखटा रहे हैं।
नवगीत अब विसंगति का ढोल नहीं पीट रहा अपितु नव निर्माण, नव संभावनाओं, नवोत्कर्ष की राह पर पग बढ़ा रहा है। नवगीत के आवश्यक तत्व सम-सामयिक कथ्य, सहज भाषा, स्पष्ट कथन, कथ्य को उभार देते प्रतीक और बिंब, सहज ग्राह्य शैली, लचीला शिल्प, लयात्मकता, छांदसिकता। लाक्षणिकता, व्यंजनात्मकता और जमीनी जुड़ाव हैं। आकाश कुसुम जैसी कल्पनाएँ नवगीत के लिए उपयुक्त नहीं हैं। क्लिष्ट भाषा नवगीत के है। नवगीत आम आदमी को लक्ष्य मानकर अपनी बात कहता है। नवगीत प्रयोगधर्मी काव्य विधा है। कुमार रवींद्र ने बुद्ध के जीवन से जुड़े पात्रों के माध्यम से एक-एक नवगीत कहकर प्रथम नवगीतात्मक प्रबंध काव्य की रचना की है। इन पंक्तियों के लेखक है संक्रांति का में नवगीत में शारद वंदन, फाग, सोहर आदि लोकगीतों की धुन, आल्हा, सरथा, दोहा आदि छंदों प्रयोग प्रथमत: किया है। पूर्णिमा बर्मन ने भारतीय सांस्कृतिक प्रतीकों को नवगीतों में बखूबी पिरोया है।
नवगीत के तत्वों का उल्लेख करते हुए एक रचना की कुछ पंक्तियाँ देखें-
मौन तजकर मनीषा कह बात अपनी
नव्यता संप्रेषणों में जान भरती
गेयता संवेदनों का गान करती
तथ्य होता कथ्य का आधार खाँटा
सधी गति-यति अंतरों का मान बनती
अंतरों के बाद मुखड़ा आ विहँसता
छंदहीना नई कविता क्यों सिरजनी
सरलता-संक्षिप्तता से बात बनती
मर्मबेधकता न हो तो रार थांती
लाक्षणिकता, भाव, रस,रूपक सलोने
बिम्ब टटकापन सजती नाचता
नवगीत के संग लोक का मन
ताल-लय बिन बेतुकी क्यों रहे कथनी?
नवगीत का भविष्य तभी उज्जवल होगा जब नवगीतकार प्रगतिवाद की आड़ में वैचारिक प्रतिबद्धता के नाम पर समाप्तप्राय राजनैतिक विचारधारा के कठमुल्लों हुए अंध राष्ट्रवाद से तटस्थ रहकर वैयक्तिकता और वैश्विकता, स्व और सर्व के मध्य समन्वय-संतुलन स्थापित करते हुए मानवीय जिजीविषा गुंजाते सकारात्मकता ऊर्जा संपन्न नवगीतों से विश्ववाणी हिंदी के रचना कोष को समृद्ध करते रहें।
८-९-२०२०
***
हाइकु सलिला
*
हाइकु करे
शब्द-शब्द जीवंत
छवि भी दिखे।
*
सलिल धार
निर्मल निनादित
हरे थकान।
*
मेघ गरजा
टप टप मृदंग
बजने लगा।
*
किया प्रयास
शाबाशी इसरो को
न हो हताश
*
जब भी लिखो
हमेशा अपना हो
अलग दिखो।
***
मुक्तिका
अपना शहर
*
अपना शहर अपना नहीं, पल-पल पराया हो रहा।
अपनत्व की सलिला सुखा पहचान अपनी खो रहा।।
मन मैल का आगार है लेकिन नहीं चिंता तनिक।
मल-मल बदन को खूब मँहगे सोप से हँस धो रहा।।
था जंगलों के बीच भी महफूज, अब घर में नहीं।
वन काट, पर्वत खोद कोसे ईश को क्यों, रो रहा।।
थी बेबसी नंगी मगर अब रईसी नंगी हुई।
है फूल कुचले फूल, सुख से फूल काँटे बो रहा।।
आती नहीं है नींद स्लीपिंग पिल्स लेकर जागता
गद्दे परेशां देख तनहा झींक कहता सो रहा।।
संजीव थे, निर्जीव नाते मर रहे बेमौत ही
संबंध को अनुबंध कर, यह लाश सुख की ढो रहा।।
सिसकती लज्जा, हया बेशर्म खुद को बेचती।
हाय! संयम बिलख आँसू हार में छिप पो रहा।।
८-९-२०१९
***
दोहा
गोविन्द गुस्सा कब हुआ, कोई सके न जान
जौहर करे न जौहरी, क्या उपमा-उपमान
*
मुक्तिका:
*
तेवर बिन तेवरी नहीं, ज्यों बिन धार प्रपात
शब्द-शब्द आघात कर, दे दर्दों को मात
*
तेवरीकार न मौन हो, करे चोट पर चोट
पत्थर को भी तोड़ दे, मार लात पर लात
*
निज पीड़ा सहकर हँसे, लगा ठहाके खूब
तम का सीना फाड़ कर, ज्यों नित उगे प्रभात
*
हाथ न युग के जोड़ना, हाथ मिला दे तोड़
दिग्दिगंत तक गुँजा दे, क्रांति भरे नग्मात
*
कंकर को शंकर करे, तेरा दृढ़ संकल्प
बूँद पसीने के बने, यादों की बारात
*
चाह न मन में रमा की, सरस्वती है इष्ट
फिर भी हमीं रमेश हैं, राज न चाहा तात
*
ब्रम्ह देव शर्मा रहे, क्यों बतलाये कौन?
पांसे फेंकें कर्म के, जीवन हुआ बिसात
*
लोहा सब जग मान ले, ऐसी ठोकर मार
आडम्बर से मिल सके, सबको 'सलिल' निजात
८.९.२०१५ 
***