कुल पेज दृश्य

शारदा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
शारदा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 26 जून 2026

जून २०, सदोका, कमलावती छंद, नागरिक अधिकार, त्रिसत सवैया, व्यंग्य कविता, लघु कथा, दोहा, शिवलिंग, शालिग्राम, पिता

सलिल सृजन जून २०
सरस्वती चालीसा
शारद माँ कलिकाल में, भव से सकतीं तार।
नित्य करें आराधना, जाएँ भव के पार।।
अक्षर-अक्षर नाद है, शब्द-शब्द ध्वनि लोक।
भाषा वाहक भाव की, लिपि लेखन आलोक।।
*
रस-सलिला माँ शारद वंदन। अर्पित श्रद्धा रोली चंदन।।
कर संजीव जीव के मन को। करो ज्ञानमय माँ जीवन को।।
श्रम संयम संतोष सफलता। शुभाशीष दो वरें विमलता।।
चित्र गुप्त छवि मन में लेखें। कंकर-कंकर शंकर देखें।।
दो विश्वास-आस मानस में। सभी इंद्रियाँ हो निज वश में।।
ध्यान लगा तव दर्शन पाएँ। चरण कमल में शीश नवाएँ।।
कृपा कटाक्ष धरोहर मैया। मिले विरासत आशिष छैंया।।
जय शारद-भारत-हिन्दी गा। सब भव बाधा दूर दे भगा।।
*
हों सितार के तार हम, चोट सहें बिन रोष।
कर तेरा गुणगान माँ!, तरें लिए संतोष।।
*
सत त्रेता द्वापर कलि युग में। तुम्हीं व्याप्त रहतीं क्षण-पल में।।
समझदार जन तुमको ध्याता। जीव नासमझ पार न पाता।।
भक्ति-शक्ति उपहार तुम्हारा। शांति-सौख्य जीवन आधारा।।
सदाचार नव जीवनदाता। अनाचार निज नाश बुलाता।।
उषा-किरण तम-तोम बुहारे। दिनकर नित जग को उजियारे।।
सुख-दुख चमक-दमकते तारे। बुझते-गिरते साँझ-सकारे।।
श्वास-आस ही नेह-नर्मदा। धवल धर्मदा विपुल वर्मदा।।
रस-सागर की लहर अनगिनत। महिमा गा करतीं मस्तक नत।।
*
जड़ को चेतन करें माँ, मूढ़ बनें मतिमान।
नीरस भी पाकर परस, हो रसज्ञ रस-खान।।
*
एक नाथ नित तुम्हें मनाते। प्रकृति-पुरुष दो नित यश गाते।।
तीन लोक हैं माँ के मंदिर। चारों युग झुक माँग रहे वर।।
पाँच गव्य शर भूत प्राण मिल। छ: दर्शन रस राग नमित खिल।।
सात दिवस करते परकम्मा। आठ योग वसु सिद्धि कहें माँ।।
नव ग्रह खड़े हाथ हैं जोड़े। दसों इंद्रियाँ हैं तव घोड़े।।
ग्यारह रुद्र माँगते हैं वर। बारह सूर्य राशि सह शंकर।।
तेरह नदियाँ पग पखारतीं। चौदह विद्या छवि निखारतीं।।
पंद्रह तिथियाँ ज्योतित तुमसे। सोलह कला समाहित तुममें।।
*
कर जोड़े हैं देवता, तैंतिस कोटी सदैव।
मंत्र एक सौ आठ जप, मेटें सकल कुटैव।।
*
नाद ताल आलाप थाप माँ। सकल सृष्टि में रहीं व्याप माँ।।
माँ उच्चार बोल स्वर सरगम। लय, गति-यति, रस, भाव असम-सम।
गीत ग़ज़ल ठुमरी चौपाई, छंद असंख्य सरस सुखदाई।।
निराकार साकार शून्य रव, पटल बिंदु रेखा कलरव नव।।
अंतरिक्ष में ऊर्जा व्यापी। मापक मापित मापन मापी।।
अपरा-परा शक्तियाँ अनुपम। अणिमा-गरिमा माँ का परचम।।
ऋद्धि-सिद्धि मिल गाएँ महिमा। सुफला सुजला सुखदा शुभदा।।
सुमति मिले सब जीव मनाएँ। शारद कृपा लक्ष्य वर पाएँ।।
*
अबला जोड़े हाथ कह, सबला कर दो मात।
प्रबला! भव-बाधा हरो, वरदानी विख्यात।।
*
शीश उठा नग करता वंदन। पवन प्रवाहित करे स्तवन।।
अग्नि आप आभित आभारी। अधरा धरा सुमंगलकारी।।
सलिल करे अभिषेक निरंतर। पद प्रक्षालन कर जाए तर।।
करें आचमन मैया जब जब। पाप मुक्ति हो जन्मों की तब।।
माँ हों रुष्ट फेर देतीं मति। हो जाती पल भर में दुर्गति।।
शुंभ-निशुंभ दशानन मिटते। संकट-बादल पल में छँटते।।
अपयश पातीं माँ कैकेई। पीड़ित उमा रमा वैदेही।।
कृष्णा कर्ण सुयोधन शापित। मातु कृपा पा पांडव दीपित।।
*
सभी देव-देवी सहज, होते परम प्रसन्न।
मातु शारदा बिन रहे, भाग्य देव भी खिन्न।।
सरस्वती कलिकाल में, सबकी तारणहार।
जिस पर हो शारद-कृपा, हो पल में उद्धार।।
माँ की महिमा अति अगम, कहें-सुनें जो धन्य।
मातु कृपा पा सफल हो, माँ सा कोई न अन्य।।
१९-२०.६.२०२६
एल एन सी टी जबलपुर
०००
सदोका सलिला
ई​ कविता में
करते काव्य स्नान ​
कवि​-कवयित्रियाँ।
सार्थक​ होता
जन्म निरख कर
दिव्य भाव छवियाँ।१।
ममता मिले
मन-कुसुम खिले,
सदोका-बगिया में।
क्षण में दिखी
छवि सस्मित मिली
कवि की डलिया में।२।
​न​ नौ नगद ​
न​ तेरह उधार,
लोन ले, हो फरार।
मस्तियाँ कर
किसी से मत डर
जिंदगी है बहार।३।
धूप बिखरी
कनकाभित छवि
वसुंधरा निखरी।
पंछी चहके
हुलस, न बहके
सुनयना सँवरी।४।
• ​
श्लोक गुंजित
मन भाव विभोर,
पुजा माखनचोर।
उठा हर्षित
सक्रिय हो नीरव
क्यों हो रहा शोर?५।
है चौकीदार
वफादार लेकिन
चोरियाँ होती रही।
लुटती रहीं
देश की तिजोरियाँ
जनता रोती रही।६।
गुलाबी हाथ
मृणाल अंगुलियाँ
कमल सा चेहरा।
गुलाब थामे
चम्पा सा बदन
सुंदरी या बगिया?७।
लिए उच्चार
पाँच, सात औ' सात
दो मर्तबा सदोका।
रूप सौंदर्य
क्षणिक, सदा रहे
प्रभाव सद्गुणों का।८।
सूरज बाँका
दीवाना है उषा का
मुट्ठी भर गुलाल
कपोलों पर
लगाया, मुस्कुराया
शोख उषा शर्माई।९।
आवारा मेघ
कर रहा था पीछा
देख अकेला दौड़ा
हाथ न आई
दामिनी ने गिराई
जमकर बिजली।१०।
हवलदार
पवन ने जैसे ही
फटकार लगाई।
बादल हुआ
झट नौ दो ग्यारह
धूप खिलखिलाई।११।
महकी कली
गुनगुनाते गीत
मँडराए भँवरे।
सगे किसके
आशिक हरजाई
बेईमान ठहरे।१२।
घर ना घाट
सन्यासी सा पलाश
ध्यानमग्न, एकाकी।
ध्यान भग्न
करना चाहे संध्या
दिखला अदा बाँकी।१३।
सतत बही
जो जलधार वह
सदा निर्मल रही।
ठहर गया
जो वह मैला हुआ
रहो चलते सदा।१४।
पंकज खिला
करता नहीं गिला
जन्म पंक में मिला।
पुरुषार्थ से
विश्व-वंद्य हुआ
देवों के सिर चढ़ा।१५।
खिलखिलाई
इठलाई शर्माई
सद्यस्नाता नवोढ़ा।
चिलमन भी
रूप देख बौराया
दर्पण आहें भरे।१६।
लहराती है
नागिन जैसी लट,
भाल-गाल चूमती।
बेला की गंध
मदिर सूँघ-सूँघ
बेड़नी सी नाचती।१७।
क्षितिज पर
मेघ घुमड़ आए
वसुंधरा हर्षाई।
पवन झूम
बिजली संग नाचा,
प्रणय पत्र बाँचा।१८।
लोकतंत्र में
नेता करे सो न्याय
अफसर का राज।
गौरैयों ने
राम का राज्य चाहा
बाजों को चुन लिया।१९।
घर को लगी
घर के चिराग से
दिन दहाड़े आग।
मंत्री का पूत
किसानों को कुचले
और छाती फुलाए। २०।
मेघ गरजे
रिमझिम बरसे
आसमान भी तर।
धरती भीगी
हवा में हवा हुआ
दुपट्टा, गाल लाल ।२१।
निर्मल नीर
गगन से भू पर
आकर मैला हुआ।
ज्यों कलियों का
दामन भँवरों ने
छूकर पंकिल किया।२२।
चुभ रही थी
गर्मी में तीखी धूप
जीव-जंतु परेशां।
धरा झुलसी
धन्य धरा धीरज
बारिश आने तक।२३।
करते पहुनाई
ढोल बजा दादुर
पत्ते बजाते ताली।
सौंधी महक
माटी ने फैला दी
झूम उठीं शाखाएँ।२४।
मेघ ठाकुर
आसमानी ड्योढी में
जमाए महफिल।
दिखाए नृत्य
कमर लचकाती
बिजली बलखाती।२५।
•••
***
ॐ सरस्वत्यै नम: ॐ
शारद वंदना
लाक्षणिक जातीय पद्मावती/कमलावती छंद
*
शारद छवि प्यारी, सबसे न्यारी, वेद-पुराण सुयश गाएँ।
कर लिए सुमिरनी, नाद जननि जी, जप ऋषि सुर नर तर जाएँ।।
माँ मोरवाहिनी!, राग-रागिनी नाद अनाहद गुंजाएँ।
सुर सरगमदात्री, छंद विधात्री, चरण - शरण दे मुसकाएँ।।
हे अक्षरमाता! शब्द प्रदाता! पटल लेखनी लिपि वासी।
अंजन जल स्याही, वाक् प्रवाही, रस-धुन-लय चारण दासी।।
हो ॐ व्योम माँ, श्वास-सोम माँ, जिह्वा पर आसीन रहें।
नित नेह नर्मदा, कहे शुभ सदा, सलिल लहर सम सदा बहें।।
कवि काव्य कामिनी, छंद दामिनी, भजन-कीर्तन यश गाए।
कर दया निहारो, माँ उपकारो, कवि कुल सारा तर जाए।।
*
२०-६-२०२०
***
विमर्श
निर्बल नागरिकों के अधिकारों का हनन
*
लोकतंत्र में निर्बल नागरिकों की जीवन रक्षा का भर जिन पर है वे उसका जीना मुश्किल कर दें और जब कोई असामाजिक तत्व ऐसी स्थिति में उग्र हो जाए तो पूरे देश में हड़ताल कर असंख्य बेगुनाहों को मरने के लिए विवश कर दिया जाए। शर्म आनी चाहिए कि बिना इलाज मरे मरीजों के कत्ल का मुकदमा आई एम् ए के पदाधिकारियों पर क्यों नहीं चलाती सरकार?
आम मरीजों के जीवन रक्षा के लिए कोर्ट में जनहित याचिका क्यों नहीं लाई जाती ?
मरीजों के मरने के बाद भी जो अस्पताल इलाज के नाम पर लाखों का बिल बनाते हैं, और लाश तक रोक लेते हैं उनके खिलाफ क्यों नहीं लाते पिटीशन?
दुर्घटना के बाद घायलों को बिना इलाज भगा देनेवाले डाक्टरों के खिलाफ क्यों नहीं होती पिटीशन?
राजस्थान में डॉक्टर ने मरीज को अस्पताल में सबके साबके मारा, उसके खिलाफ आई एम् ए ने क्या किया?
यही बदतमीजी वकील भी कर रहे हैं। एक वकील दूसरे वकील को मारे और पूरे देश में हड़ताल कर दो। न्याय की आस में घर, जमीन बेच चुके मुवक्किदिलाने ल की न्याय की चिंता नहीं है किसी वकील को।
आम आदमी को ब्लैक मेल कर रहे पत्रकारों के साथ पूरा मीडिया जुट जाता है।
कैसा लोकतंत्र बना रहे हैं हम। निर्बल और गरीब की जान बचानेवाला, न्याय
दिलाने वाला, उसकी आवाज उठाने वाला, उसके जीवन भर की कमाई देने का सपना दिखानेवाला सब संगठन बनाकर खड़े हैं। उन्हें समर्थन को संरक्षण चाहिए, और ये सब असहायकी जान लेते रहें उनके खिलाफ कुछ नहीं हो रहा।
शर्मनाक।
***
नवाविष्कृत त्रिसत सवैया 
गण सूत्र: स म त न भ स म ग ।वर्णिक यति: ७-७-७ ।
*
अँखुआए बीजों को, स्नेह सलिल से सींचो, हरियाली आयेगी।
अँकुराए पत्तों को, पाल धरणि धानी हो, खुशहाली पायेगी।
शुचिता के पौधों को, पाल कर बढ़ाओ तो, रँग होली लाएगी।
ममता के वृक्षों को, ढाल बन बचाओ तो, नव पीढ़ी गायेगी।
*
***
हिंदी का दैदीप्यमान सूर्य सलिल
आभा सक्सेना 'दूनवी'
संजीव वर्मा सलिल एक ऐसा नाम जिसकी जितनी प्रशंसा की जाए उतनी ही कम है |उनकी प्रशंसा करना मतलब सूर्य को दीपक दिखाने जैसा होगा |उनसे मेरा परिचय मुख पोथी पर सन 2014 - 2015 में हुआ |उसके बाद तो उनसे दूरभाष पर वार्तालाप का सिलसिला चल रहा है| सलिल जी स्वयं में ही एक पूरा छंद काव्य हैं| उन्होने किस विधा में नहीं लिखा हर विधा के वे ज्ञानी पंडित हैं उन के व्यक्तित्व में उनकी कवियित्री बुआ महादेवी वर्मा जी की साफ झलक दिखाई देती है |
सन 2014, उस समय मैं नवगीत लिखने का प्रयास कर रही थी उस समय मुझे उन्हों ने ही नवगीत विधा की बारीकियाँ सिखाईं
मेरा नव गीत उनके कुछ सुझावों के बाद -----------
नव गीत
कुछ तो
मुझसे बातें कर लो
अलस्सुबह जा
सांझ ढले
घर को आते हो
क्या जाने
किन हालातों से
टकराते हो
प्रियतम मेरे!
सारे दिन मैं
करूँ प्रतीक्षा-
मुझ को
निज बाँहों में भर लो
थका-चुका सा
तुम्हें देख
कैसे मुँह खोलूँ
बैठ तुम्हारे निकट
पीर क्या
हिचक टटोलूँ
श्लथ बाँहों में
गिर सोते
शिशु से भाते हो
मन इनकी
सब पीड़ा हर लो
.....आभा
आज कल वे सवैया छंद पर कार्य कर रहे हैं उनका कहना है कि
“सवैया आधुनिक हिंदी की शब्दावली के लिए पूरी तरह उपयुक्त छंद' है।
यह भ्रांति है कि सरस सवैये केवल लोकभाषाओं लिखे जा सकते हैं।
सत्य यह है कि सवैया वाचिक परंपरा से विकसित छंद है। लोक गायक प्रायः अशिक्षित या अल्प शिक्षित थे। उन्होंने लोक भाषा में सवैया रचे और उन्हें पढ़कर उन्हीं की शब्दावली हमें सहज लगती है। मैं सवैया कोष पर काम कर रहा हूँ। 160 प्रकार के सवैये बना चुका हूँ। सब आधुनिक हिंदी में हैं जिनमें वर्णिक व मात्रिक गणना व यति समान हैं। के सवैये बना चुका हूँ। सब आधुनिक हिंदी में हैं जिनमें वर्णिक व मात्रिक गणना व यति समान हैं”|
एक कथ्य चार छंद:
*
जनक छंद
फूल खिल रहे भले ही
गर्मी से पंजा लड़ा
पत्ते मुरझा रहे हैं
*
माहिया
चाहे खिल फूल रहे
गर्मी से हारे
पत्ते कुम्हलाय हरे.
*
दोहा
फूल भले ही खिल रहे, गर्मी में भी मौन.
पत्ते मुरझा रहे हैं, राहत दे कब-कौन.
*
सोरठा
गर्मी में रह मौन, फूल भले ही खिल रहे,
राहत दे कब-कौन, पत्ते मुरझा रहे हैं.
रोला
गर्मी में रह मौन, फूल खिल रहे भले ही.
राहत कैसे मिलेगी, पत्ते मुरझा रहे हैं.
*
सलिल जी बहुआयामी प्रतिभा के धनी हैं | उनको देख कर लगता है कि उनका साहित्य के प्रति विशेष रूप से लगाव है इसी लिए उन्होने अपना जीवन साहित्य के प्रति समर्पित कर दिया है |
दोहा लिखना भी मैंने उन से ही सीखा |
एक दोहा लिखा और लिख कर उन्होने मेरे नाम ही कर दिया |
आभामय दोहे नवल, आ भा करते बात। आभा पा आभित सलिल, पंक्ति पंक्ति जज़्बात ।।
इसे कहते हैं बड़प्पन |उनकी प्रतिभा दूर दूर तक देदीप्यमान है और रहेगी |
बेहद आभार आपका
अतः ऐसे व्यक्तित्व को मेरा कोटिशः नमन भविष्य में उनकी साहित्यिक प्रगति और अच्छे स्वास्थ्य एवं शतायु की कामना करते हुए .....
आभा सक्सेना दूनवी
देहरादून
***
व्यंग्य रचना:
अभिनंदन
लो
*
युग-कवयित्री!
अभिनंदन
लो....
*
सब जग अपना, कुछ न पराया
शुभ सिद्धांत तुम्हें यह भाया.
गैर नहीं कुछ भी है जग में-
'विश्व एक' अपना सरमाया.
जहाँ मिले झट झपट वहीं से
अपने माथे यश-चंदन लो
युग-कवयित्री
अभिनंदन
लो....
*
मेरा-तेरा मिथ्या माया
दास कबीरा ने बतलाया.
भुला परायेपन को तुमने
गैर लिखे को कंठ बसाया.
पर उपकारी अन्य न तुमसा
जहाँ रुचे कविता कुंदन लो
युग-कवयित्री
अभिनंदन
लो....
*
हिमगिरी-जय सा किया यत्न है
तुम सी प्रतिभा काव्य रत्न है.
चोरी-डाका-लूट कहे जग
निशा तस्करी मुदित-मग्न है.
अग्र वाल पर रचना मेरी
तेरी हुई, महान लग्न है.
तुमने कवि को धन्य किया है
खुद का खुद कर मूल्यांकन लो
युग-कवयित्री
अभिनंदन
लो....
*
कवि का क्या? 'बेचैन' बहुत वह
तुमने चैन गले में धारी.
'कुँवर' पंक्ति में खड़ा रहे पर
हो न सके सत्ता अधिकारी.
करी कृपा उसकी रचना ले
नभ-वाणी पर पढ़कर धन लो
युग-कवयित्री
अभिनंदन
लो....
*
तुम जग-जननी, कविता तनया
जब जी चाहा कर ली मृगया.
किसकी है औकात रोक ले-
हो स्वतंत्र तुम सचमुच अभया.
दुस्साहस प्रति जग नतमस्तक
'छद्म-रत्न' हो, अलंकरण लो
युग-कवयित्री
अभिनंदन
लो....
२०-६-२०१८
टीप: श्रेष्ठ कवि की रचना को अपनी बताकर २३-५-२०१८ को प्रात: ६.४० बजे काव्य धारा कार्यक्रम में आकाशवाणी पर प्रस्तुत कर धनार्जन का अद्भुत पराक्रम करने के उपलक्ष्य में यह रचना समर्पित उसे ही जो इसका सुपात्र है)
***
लघु कथा
राष्ट्रीय एकता
*
'माँ! दो भारतीयों के तीन मत क्यों होते हैं?'
''क्यों क्या हुआ?''
'संसद और विधायिकाओं में जितने जन प्रतिनिधि होते हैं उनसे अधिक मत व्यक्त किये जाते हैं.'
''बेटा! वे अलग-अलग दलों के होते हैं न.''
'अच्छा, फिर दूरदर्शनी परिचर्चाओं में किसी बात पर सहमति क्यों नहीं बनती?'
''वहाँ बैठे वक्ता अलग-अलग विचारधाराओं के होते हैं न?''
'वे किसी और बात पर नहीं तो असहमत होने के लिये ही सहमत हो जाएँ।
''ऐसा नहीं है कि भारतीय कभी सहमत ही नहीं होते।''
'मुझे तो भारतीय कभी सहमत होते नहीं दीखते। भाषा, भूषा, धर्म, प्रांत, दल, नीति, कर, शिक्षा यहाँ तक कि पानी पर भी विवाद करते हैं।'
''लेकिन जन प्रतिनिधियों की भत्ता वृद्धि, अधिकारियों-कर्मचारियों के वेतन बढ़ाने, व्यापारियों के कर घटाने, विद्यार्थियों के कक्षा से भागने, पंडितों के चढोत्री माँगने, समाचारों को सनसनीखेज बनाकर दिखाने, नृत्य के नाम पर काम से काम कपड़ों में फूहड़ उछल-कूद दिखाने और कमजोरों के शोषण पर कोई मतभेद देखा तुमने? भारतीय पक्के राष्ट्रवादी और आस्तिक हैं, अन्नदेवता के सच्चे पुजारी, छप्पन भोग की परंपरा का पूरी ईमानदारी से पालन करते हैं। मद्रास का इडली-डोसा, पंजाब का छोला-भटूरा, गुजरात का पोहा, बंगाल का रसगुल्ला और मध्यप्रदेश की जलेबी खिलाकर देखो, पूरा देश एक नज़र आयेगा।''
और बेटा निरुत्तर हो गया...
*
दोहा सलिला
*
जूही-चमेली देखकर, हुआ मोगरा मस्त
सदा सुहागिन ने बिगड़, किया हौसला पस्त
*
नैन मटक्का कर रहे, महुआ-सरसों झूम
बरगद बब्बा खाँसते। क्यों? किसको मालूम?
*
अमलतास ने झूमकर, किया प्रेम-संकेत
नीम षोडशी लजाई, महका पनघट-खेत
*
अमरबेल के मोह में, फँसकर सूखे आम
कहे वंशलोचन सम्हल, हो न विधाता वाम
*
शेफाली के हाथ पर, नाम लिखा कचनार
सुर्ख हिना के भेद ने, खोदे भेद हजार
*
गुलबकावली ने किया, इन्तिज़ार हर शाम
अमन-चैन कर दिया है,पारिजात के नाम
*
गौरा हेरें आम को, बौरा हुईं उदास
मिले निकट आ क्यों नहीं, बौरा रहे उदास?
*
बौरा कर हो गया है, आम आम से ख़ास
बौरा बौराये, करे दुनिया नहक हास
२०-६-२०१६
lnct jabalpur
***
एक रचना
*
प्रभु जी! हम जनता, तुम नेता
हम हारे, तुम भए विजेता।।
प्रभु जी! सत्ता तुमरी चेरी
हमें यातना-पीर घनेरी ।।
प्रभु जी! तुम घपला-घोटाला
हमखों मुस्किल भयो निवाला।।
प्रभु जी! तुम छत्तीसी छाती
तुम दुलहा, हम महज घराती।।
प्रभु जी! तुम जुमला हम ताली
भरी तिजोरी, जेबें खाली।।
प्रभु जी! हाथी, हँसिया, पंजा
कंघी बाँटें, कर खें गंजा।।
प्रभु जी! भोग और हम अनशन
लेंय खनाखन, देंय दनादन।।
प्रभु जी! मधुवन, हम तरु सूखा
तुम हलुआ, हम रोटा रूखा।।
प्रभु जी! वक्ता, हम हैं श्रोता
कटे सुपारी, काट सरोता।।
(रैदास से क्षमा प्रार्थना सहित)
२०-११-२०१५
चित्रकूट एक्सप्रेस, उन्नाव-कानपूर
***
शिवलिंग और शालिग्राम
*
हिन्दू धर्म के तीन प्रमुख देवता हैं- ब्रह्मा, विष्णु और महेश को क्रमश: शंख, शिवलिंगऔर शालिग्राम रूप में सर्वोत्तम माना है। शंख सूर्य व चंद्र के समान देवस्वरूप है जिसके मध्य में वरुण, पृष्ठ में ब्रह्मा तथा अग्र में गंगा और सरस्वती नदियों का वास है।
वैदिक धर्म में मूर्ति की पूजा नहीं होती। शिवलिंग और शालिग्राम की भगवान का विग्रह रूप मानकर पूजा की जानी चाहिए।
शालिग्राम का मंदिर : नेपाल में स्थित मुक्तिनाथ में स्थित शालिग्राम का प्रसिद्ध मंदिर वैष्‍णव संप्रदाय के प्रमुख मंदिरों में से एक है। काठमांडु से पोखरा, जोमसोम होकर जाना होता है। दुर्लभ शालिग्राम नेपाल के मुक्तिनाथ, काली गण्डकी नदी के तट पर पाया जाता है। काले और भूरे शालिग्राम के अलावा सफेद, नीले और ज्योतियुक्त शालिग्राम का पाया मिलना दुर्लभ है। पूर्ण शालिग्राम में भगवाण विष्णु के चक्र की आकृति अंकित होती है।
शालिग्राम के प्रकार : विष्णु के अवतारों के अनुसार शालिग्राम पाया जाता है। गोल शालिग्राम विष्णु का गोपाल रूप है। मछली के आकार काशालिग्राम मत्स्य अवतार का प्रतीक है। यदि शालिग्राम कछुए के आकार का है तो यह भगवान के कच्छप/कूर्म अवतार का प्रतीक है। शालिग्राम पर उभरने वाले चक्र और रेखाएं भी विष्णु के अन्य अवतारों और श्रीकृष्ण के कुल के लोगों को इंगित करती हैं। ३३ प्रकार के शालिग्राम में से २४ विष्णु के २४ अवतारों से संबंधित हैं। ये २४ शालिग्राम वर्ष की २४ एकादशी व्रत से संबंधित हैं।
शालिग्राम की पूजा :
* घर में सिर्फ एक ही शालिग्राम की पूजा करना चाहिए।
* विष्णु की मूर्ति से कहीं ज्यादा उत्तम है शालिग्राम की पूजा करना।
* शालिग्राम पर चंदन लगाकर उसके ऊपर तुलसी का एक पत्ता रखा जाता है।
* प्रतिदिन शालिग्राम को पंचामृत से स्नान कराया जाता है।
* जिस घर में शालिग्राम का पूजन होता है उस घर में लक्ष्मी का सदैव वास रहता है।
* शालिग्राम पूजन करने से अगले-पिछले सभी जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।
* शालिग्राम सात्विकता के प्रतीक हैं। उनके पूजन में आचार-विचार की शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता है।
शिवलिंग : शिवलिंग को भगवान शिव का प्रतीक माना जाता है तो जलाधारी को माता पार्वती का प्रतीक। निराकार रूप में भगवान शिव को शिवलिंग के रूप में पूजा जाता है।
ॐ नम: शिवाय । यह भगवान का पंचाक्षरी मंत्र है। इसका जप करते हुए शिवलिंग का पूजन या अभिषेक किया जाता है। इसके अलावा महामृत्युंजय मंत्र और शिवस्त्रोत का पाठ किया जाता है। शिवलिंग की पूजा का विधान बहुत ही विस्तृत है इसे किसी पुजारी के माध्यम से ही सम्पन्न किया जाता है।
शिवलिंग पूजा के नियम :
* शिवलिंग को पंचांमृत से स्नानादि कराकर उन पर भस्म से तीन आड़ी लकीरों वाला तिलक लगाएं।
*शिवलिंग पर हल्दी नहीं चढ़ाना चाहिए, लेकिन जलाधारी पर हल्दी चढ़ाई जा सकती है।
*शिवलिंग पर दूध, जल, काले तिल चढ़ाने के बाद बेलपत्र चढ़ाएं।
* केवड़ा तथा चम्पा के फूल न चढाएं। गुलाब और गेंदा किसी पुजारी से पूछकर ही चढ़ाएं।
* कनेर, धतूरे, आक, चमेली, जूही के फूल चढ़ा सकते हैं।
* शिवलिंग पर चढ़ाया हुआ प्रसाद ग्रहण नहीं किया जाता, सामने रखा गया प्रसाद अवश्य ले सकते हैं।
* शिवलिंग नहीं शिवमंदिर की आधी परिक्रमा ही की जाती है।
* शिवलिंग के पूजन से पहले पार्वती का पूजन करना जरूरी है
शिवलिंग का अर्थ : शिवलिंग को नाद और बिंदु का प्रतीक माना जाता है। पुराणों में इसे ज्योर्तिबिंद कहा गया है। पुराणों में शिवलिंग को कई अन्य नामों से भी संबोधित किया गया है जैसे- प्रकाश स्तंभ लिंग, अग्नि स्तंभ लिंग, ऊर्जा स्तंभ लिंग, ब्रह्मांडीय स्तंभ लिंग आदि।
शिव का अर्थ 'परम कल्याणकारी शुभ' और 'लिंग' का अर्थ है- 'सृजन ज्योति'। वेदों और वेदान्त में लिंग शब्द सूक्ष्म शरीर के लिए आता है। यह सूक्ष्म शरीर 17 तत्वों से बना होता है। 1- मन, 2- बुद्धि, 3- पांच ज्ञानेन्द्रियां, 4- पांच कर्मेन्द्रियां और पांच वायु। भ्रकुटी के बीच स्थित हमारी आत्मा या कहें कि हम स्वयं भी इसी तरह है। बिंदु रूप।
ब्राह्मांड का प्रतीक : शिवलिंग का आकार-प्रकार ब्रह्मांड में घूम रही हमारी आकाशगंगा की तरह है। यह शिवलिंग हमारे ब्रह्मांड में घूम रहे पिंडों का प्रतीक है। वेदानुसार ज्योतिर्लिंग यानी 'व्यापक ब्रह्मात्मलिंग' जिसका अर्थ है 'व्यापक प्रकाश'। शिवपुराण के अनुसार ब्रह्म, माया, जीव, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी को ज्योतिर्लिंग या ज्योति पिंड कहा गया है।
अरुणाचल है प्रमुख शिवलिंगी स्थान : भगवान शिव ने ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता को लेकर हुए विवाद को सुलझाने के लिए एक दिव्य लिंग (ज्योति) प्रकट किया था। इस लिंग का आदि और अंत ढूंढते हुए ब्रह्मा और विष्णु को शिव के परब्रह्म स्वरूप का ज्ञान हुआ। इसी समय से शिव के परब्रह्म मानते हुए उनके प्रतीक रूप में लिंग की पूजा आरंभ हुई। यह घटना अरुणाचल में घटित हुई थी।
आकाशीय पिंड : ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार विक्रम संवत के कुछ सहस्राब्‍दी पूर्व संपूर्ण धरती पर उल्कापात का अधिक प्रकोप हुआ। आदिमानव को यह रुद्र (शिव) का आविर्भाव दिखा। जहां-जहां ये पिंड गिरे, वहां-वहां इन पवित्र पिंडों की सुरक्षा के लिए मंदिर बना दिए गए। इस तरह धरती पर हजारों शिव मंदिरों का निर्माण हो गया। उनमें से प्रमुख थे 108 ज्योतिर्लिंग।
संग-ए-असवद : शिव पुराण के अनुसार उस समय आकाश से ज्‍योति पिंड पृथ्‍वी पर गिरे और उनसे थोड़ी देर के लिए प्रकाश फैल गया। इस तरह के अनेक उल्का पिंड आकाश से धरती पर गिरे थे। कहते हैं कि मक्का का संग-ए-असवद भी आकाश से गिरा था।
***
स्मृति गीत:
हर दिन पिता याद आते हैं...
संजीव 'सलिल'
*
जान रहे हम अब न मिलेंगे.
यादों में आ, गले लगेंगे.
आँख खुलेगी तो उदास हो-
हम अपने ही हाथ मलेंगे.
पर मिथ्या सपने भाते हैं.हर
दिन पिता याद आते हैं...
*
लाड़, डाँट, झिड़की, समझाइश.
कर न सकूँ इनकी पैमाइश.
ले पहचान गैर-अपनों को-
कर न दर्द की कभी नुमाइश.
अब न गोद में बिठलाते हैं.
हर दिन पिता याद आते हैं...
*
अक्षर-शब्द सिखाये तुमने.
नित घर-घाट दिखाए तुमने.
जब-जब मन कोशिश कर हारा-
फल साफल्य चखाए तुमने.
पग थमते, कर जुड़ जाते हैं
हर दिन पिता याद आते हैं...
*

२०-६-२०१०

रविवार, 3 मई 2026

मई ३, रसामृत छंद, सॉनेट, शारदा, लघुकथा, घनाक्षरी, हास्य दिवस, हाइकु मुक्तक, दोहा, विवाह, नवगीत, जेठ


सलिल सृजन मई ३
०  
छंद शाला
दोहा+रोला=कुंडलिया
नयन सदा दो ही दिखें, कहता यही विवेक।
किंतु मिलें जब दृष्टियाँ, नयन दिखें तब एक।। - अशोक व्यग्र
नयन दिखें तब एक, चार हों नयन जब कभी।
दुनिया देखे नयन, नयन में रहें बस अभी।।
कभी न बिछुड़ें नयन, अजर हो अमर हो मिलन।
नयन नयन को थाम, चाह की चाह हों नयन।।
नयन सदा दो ही दिखें, कहता यही विवेक।
किंतु मिलें जब दृष्टियाँ, नयन दिखें तब एक।। - अशोक व्यग्र
नयन दिखें तब एक, करें जब बात प्रणय की।
वरें विहँस अद्वैत, द्वैत तज चाह विलय की।।
नयन तोड़ प्रतिबंध, भोगते दंड जो सदा।
नयन नयन में डूब, तैरते हैं नयन सदा।।
नयन सदा दो ही दिखें, कहता यही विवेक।
किंतु मिलें जब दृष्टियाँ, नयन दिखें तब एक।। - अशोक व्यग्र
नयन दिखें तब एक, जिन्हें यह नहीं सुहाए।
नयन मूँदकर बैठें, नादां खुद पछताएँ।।
नयन नयन से मिलें, न बोलें कभी विदा दो।
नयन एक हो जिएँ, भले ही नयन सदा दो।।
नयन सदा दो ही दिखें, कहता यही विवेक।
किंतु मिलें जब दृष्टियाँ, नयन दिखें तब एक।। - अशोक व्यग्र
नयन दिखें तब एक, न अंतर जब अंतर में।
बना रहे विश्वास अखंडित अभ्यंतर में।।
कम पड़ जाएँ शब्द, नयन-कथा जब भी लिखें।
कहता यही विवेक, नयन सदा दो ही दिखें।।
३.५.२०२६
०००
सॉनेट
शारदा स्तुति
*
शारद! वीणा मधुर बजाओ
कुमति नाश कर सुमति मुझे दो
कर्म धर्ममय करूँ सुगति हो
मैया! मन मंदिर में आओ।
अपरा सीखी, सत्य न पाया
माया मोह भुला भटकाते
नाते राह रोक अटकाते
माता! परा ज्ञान दो, आओ
जन्म जन्म संबंध निभाओ
सुत को अपनी गोद बिठाओ
अंबे! नाता मत बिसराओ
कान खींच लो हँस मुस्काओ
झट से रीझो पुलक रिझाओ
जननी! मुझको आप बनाओ
२-५-२०२२
•••
सॉनेट
सपने
अनजाने ही दिखते सपने
कब क्या कैसे क्यों होता है?
क्यों हँसता है, क्यों रोता है?
लागू कहीं न कोई नपने
आँख खुले तो गायब सपने
क्या पाता है, क्या खोता है?
नाहक ही चिंता ढोता है
कहीं नहीं जो रहे न अपने
बेसिरपैर घटें घटनाएँ
मरुथल में भी नव चलाएँ
जुमला कह सरकार बनाएँ
सपनों का घर-घाट न होता
कहीं न पिंजरा, कहीं न तोता
बिन साबुन-पानी मन धोता
३-५-२०२२
***
लघुकथा
मौन?
आज परशुराम जयंती है, समाचार पत्र में कई कार्यकर्मों की सूचनाएँ,, कुछ मित्र मुझे भी पकड़कर एक कार्यक्रम में ले गए। परशुराम जी की प्रशंसा में बहुत कुछ कहा गया, नारे लगाए गए। मुझे मौन देख एक ने एक वक्ता ने मेरी और घूरते हुए कहा जिस तरह परशुराम ने क्षत्रियों का संहार किया था उसी तरह हमें भी विधर्मियों का संहार करना होगा।
मेरी बारी आई तो मैंने कहा की परशुराम जी ने अपने पिता के कहने पर अपनी माँ का वध बिना कुछ आगा-पीछा किये कर दिया था। उनका अनुकरण आपमें से कौन करेगा?
उत्तर में छाया रहा मौन।
***
लघुकथा
जंगल में जनतंत्र
*
जंगल में चुनाव होनेवाले थे। मंत्री कौए जी एक जंगी आमसभा में सरकारी अमले द्वारा जुटाई गयी भीड़ के आगे भाषण दे रहे थे- 'जंगल में मंगल के लिए आपस का दंगल बंद कर एक साथ मिलकर उन्नति की रह पर क़दम रखिये। सिर्फ़ अपना नहीं सबका भला सोचिये।'
मंत्री जी! लाइसेंस दिलाने के लिए धन्यवाद। आपके काग़ज़ घर पर दे आया हूँ। ' भाषण के बाद चतुर सियार ने बताया।
मंत्री जी ख़ुश हुए।
तभी उल्लू ने आकर कहा- 'अब तो बहुत धाँसू बोलने लगे हैं। हाऊसिंग सोसायटी वाले मामले को दबाने के लिए रखिए' कहते हुए एक लिफ़ाफ़ा उन्हें सबकी नज़र बचाकर दे दिया।
विभिन्न महकमों के अफ़सरों ने अपना-अपना हिस्सा मंत्री जी के निजी सचिव गीध को देते हुए कामों की जानकारी दी।
'पार्टी विथ डिफ़रेंस' के मंत्री जी मिले उपहारों और लिफ़ाफ़ों को देखते हुए सोच रहे थे - 'जंगल में जनतंत्र जिंदाबाद।'
*
विश्व हास्य दिवस
विश्व भर में मई महीने के पहले रविवार को मनाया जाता है। इसका विश्व दिवस के रूप में प्रथम आयोजन ११ जनवरी, १९९८ को मुंबई में किया गया था। विश्व हास्य योग आंदोलन की स्थापना का श्रेय डॉ मदन कटारिया को जाता है।
हास्य रचनाः
नियति
संजीव
*
सहते मम्मी जी का भाषण, पूज्य पिताश्री का फिर शासन
भैया जीजी नयन तरेरें, सखी खूब लगवाये फेरे
बंदा हलाकान हो जाए, एक अदद तब बीबी पाए
सोचे धौन्स जमाऊँ इस पर, नचवाए वह आँसू भरकर
चुन्नू-मुन्नू बाल नोच लें, मुन्नी को बहलाए गोद ले
कही पड़ोसी कहें न द्ब्बू, लड़ता सिर्फ इसलिये बब्बू
***
घर से बाहर जान बचाए, पड़ोसिनों से आँख लड़ाए
फूल लिए जब देने जाए, फूल कहाकर वापिस आए
बिअर उठा जब फिर से जाए, दिखे दूर वह बियर उठाए
सोचे कोई और पटाये, शासन तालाबंदी लाए
लौट के बुद्धू घर को आए, बीबी से पटरी बैठाए
बैठे हैं निज मुँह लटकाए, बीबी खुशखबरी दे गाए
३-५-२०२०
***
***
कृति चर्चा:
'सच्ची बात' लघुकथाओं की ज़िंदगी से मुलाकात
चर्चाकार: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
[कृति विवरण: सच्ची बात, लघुकथा संग्रह, चंद्रकांता अग्निहोत्री, प्रथम संस्करण २०१५, आकार डिमाई, आवरण बहुरंगी सजिल्द जैकेट सहित, पृष्ठ ९६, मूल्य २२५/-, विश्वास प्रकाशन, अम्बाला शहर, हरयाणा, चलभाष ०९८९६१००५५७, लघुकथाकार संपर्क: कोठी ४०४, सेक्टर ६, पंचकुला, हरयाणा, चलभाष: ०९८७६६५०२४८, ईमेल: अग्निहोत्री.chandra@gmail.com]
*
लघुकथा गागर में गागर की तरह कम शब्दों में अधिक ही नहीं अधिक से अधिक कहने की कला है. सामान्यत: लघुकथा किसी क्षण विशेष में घटित घटनाजनित प्रभावों का मूल्यांकन होती है. लघुकथा में उपन्यास की तरह सुदीर्घ और सुचिंतित घटनाओं और चरित्रों का विस्तार और या कहानी की तरह किसी कालखंड विशेष या घटनाक्रम विशेष का विश्लेषण न होकर किसी घटना विशेष को केंद्र में रखकर उसके प्रभाव को इंगित मात्र किया जाता है. अब तो पर-लेखन की परंपरा को ही चलभाष ने काल-बाह्य सा कर दिया है किन्तु जब पत्र-लेखन ही अनुभूतियों, संवेदनाओं आयर परिस्थितियों को संप्रेषित करने का एक मात्र सुलभ-सस्ता साधन था तब
ग्रामीण बालाएँ सुदूर बसे प्रयतम को पत्र लिखते समय समयाभाव, शब्दाभाव, संकोच या प्रापक को मानसिक कष्ट से बचने के लिए के कारण अंत में 'कम लिखे से अधिक समझना' लिखकर मकुट हो लेती थीं. लघुकथा यही 'कम लिखे से अधिक समझाने' की कला है. लघुकथाकार घट्न या पात्रों का चित्रं नहीं संकेतन मात्र करता है, अनुभूत को संक्षेप में भिव्यत कर शेष पाठक के अनुमान पर छोड़ दिया जाता है. इसी लिए लघ्कथा लेखन जितना सरल दीखता है, उतना सरल होता नहीं.
***
हाइकु मुक्तक:
*
चंचला निशा, चाँदनी को चिढ़ाती, तारे हैं दंग.
पूर्णिमा भौजी, अमावस ननद, होनी है जंग.
चन्द्रमा भैया, चक्की-पाटों के बीच, बेबस पिसा
सूर्य ससुर, सास धूप नाराज, उतरा रंग
*
रवि फेंकता, मोहपाश गुलाबी, सैकड़ों कर
उषा भागती, मन-मन मुस्काती, बेताबी पर
नभ ठगा सा, दिशाएँ बतियातीं, वसुधा मौन-
चूं चूं गौरैया, शहनाई बजाती, हँसता घर
*
श्री वास्तव में, महिमामय कर, कीर्ति बढ़ाती.
करे अर्चना, ऋता सतत यश, सुषमा गाती.
मीनाक्षी सवि, करे लहर सँग, शत क्रीड़ाएँ
वर सुनीति, पथ बाधा से झट, जा टकराती..
*****
दो दुम का दोहा
*
राजनीति में नीति का,
कहीं न किंचित काम.
निज प्रशस्ति कर आप मुख,
रहो बढ़ाते दाम.
लोग बिलखें या रोएँ
काँध पर तुमको ढोएँ
*
एक दूसरे को चलो,
दें हम दोनों दोष.
मिल-जुल लूटें देश को,
दिखला झूठा रोष.
लोग संतोष करेंगे
हमारा कोष भरेंगे
३-५-२०१८
***
सामयिक लेख
विवाह, हम और समाज
*
अत्यंत तेज परिवर्तनों के इस समय में विवाह हेतु सुयोग्य जीवनसाथी खोजना पहले की तुलना में अधिक कठिन होता जा रहा है. हर व्यक्ति को समय का अभाव है. कठिनाई का सबसे बड़ा कारन अपनी योग्यता से बेहतर जीवन साथी की कामना है. पहले वर और वरपक्ष को कन्या पसंद आते ही विवाह निश्चित हो जाता था. अब ऐसा नहीं है. अधिकाँश लडकियाँ सुशिक्षित और कुछ नौकरीपेशा भी हैं. शिक्षा के साथ उनमें स्वतंत्र सोच भी होती है. इसलिए अब लड़के की पसंद के समान लडकी की पसंद भी महत्वपूर्ण है.
नारी अधिकारों के समर्थक इससे प्रसन्न हो सकते हैं किन्तु वैवाहिक सम्बन्ध तय होने में इससे कठिनाई बढ़ी है, यह भी सत्य है. अब यह आवश्यक है की अनावश्यक पत्राचार और समय बचाने के लिए विवाह सम्बन्धी सभी आवश्यक सूचनाएं एक साथ दी जाएँ ताकि प्रस्ताव पर शीघ्र निर्णय लेना संभव हो.
१. जन्म- जन्म तारीख, समय और स्थान स्पष्ट लिखें, यह भी कि कुंडली में विश्वास करते हैं या नहीं? केवल उम्र लिखना पर्याप्त नहीं होता है.
२. शिक्षा- महत्वपूर्ण उपाधियाँ, डिप्लोमा, शोध, प्रशिक्षण आदि की पूर्ण विषय, शाखा, प्राप्ति का वर्ष तथा संस्था का नाम भी दें. यदि आप किसी विशेष उपाधि या विषय में शिक्षित जीवन साथ चाहते हैं तो स्पष्ट लिखें.
३. शारीरिक गठन- अपनी ऊँचाई, वजन, रंग, चश्मा लगते हैं या नहीं, रक्त समूह, कोई रोग (मधुमेह, रक्तचाप, दमा आदि) हो तो उसका नाम आदि जानकारी दें. आरम्भ में जानकारी छिपा कर विवाह के बाद सम्बन्ध खराब होने से बेहतर है पहले जानकारी देकर उसी से सम्बन्ध हो जो सत्य को स्वीकार सके.
४. आजीविका- अपने व्यवसाय या नौकरी के सम्बन्ध में पूरी जानकारी दें. कहाँ, किस तरह का कार्य है, वेतन-भत्ते आदि कुल वार्षिक आय कितनी है? कोई ऋण लिया हो और उसकी क़िस्त आदि कट रही हो तो छिपाइए मत. अचल संपत्ति, वाहन आदि वही बताइये जो वास्तव में आपका हो. सम्बन्ध स्वीकारने वाला पक्ष आपकी जानकारी को सत्य मानता है. बाद में पाता चले की आपके द्वारा बाते मकान आपका नहीं पिताजी का है, वाहन भाई का है, दूकान सांझा कई तो वह ठगा सा अनुभव करता है. इसलिए जो भी हो स्थिति हो स्पष्ट कर दें
५. पसंद- यदि जीवन साथी के समबन्ध में आपकी कोई खास पसंद हो तो बता दें ताकि अनुकूल प्रस्ताव पर ही बात आगे बढ़े.
६. दहेज- दहेज़ की माँग क़ानूनी अपराध, सामाजिक बुराई और व्यक्तिगत कमजोरी है. याद रखें दुल्हन ही सच्चा दहेज है. दहेज़ न लेने पर नए सम्बन्धियों में आपकी मान-प्रतिष्ठा बढ़ जाती है. यदि आप अपनी प्रतिष्ठा गंवा कर भी पराये धन की कामना करते है तो इसका अर्थ है कि आपको खुद पर विश्वास नहीं है. ऐसी स्थिति में पहले ही अपनी माँग बता दें ताकि वह सामर्थ्य होने पर ही बात बढ़े. सम्बन्ध तय होने के बाद किसी बहाने से कोई माँग करना बहुत गलत है. ऐसा हो तो समबन्ध ही नहीं करें.
७. चित्र- आजकल लडकियों के चित्र प्रस्ताव के साथ ही भेजने का चलन है. चित्र भेजते समय शालीनता का ध्यान रखें. चश्मा पहनते हैं तो पहने रहें. विग लगाते हों तो बता दें. बहुत तडक-भड़क वाली पोशाक न हो बेहतर.
८. भेंट- बात अनुकूल प्रतीत हो और दुसरे पक्ष की सहमती हो तो प्रत्यक्ष भेंट का कार्यक्रम बनाने के पूर्व दूरभाष या चलभाष पर बातचीत कर एक दुसरे के विचार जान लें. अनुकूल होने पर ही भेंट हेतु जाएँ या बुलाएँ. वैचारिक ताल-मेल के बिना जाने पर धन और समय के अपव्यय के बाद भी परिणाम अनुकूल नहीं होता.
९. आयोजन- सम्बन्ध तय हो जाने पर 'चाट मंगनी पट ब्याह' की कहावत के अनुसार 'शुभस्य शीघ्रं' दोनों परिवारों के अनुकूल गरिमापूर्ण आयोजन करें. आयोजन में अपव्यय न करें. सुरापान, मांसाहार, बंदूक दागना आदि न हो तो बेहतर. विवाह एक सामाजिक, पारिवारिक तथा धार्मिक आयोजन होता है जिससे दो व्यक्ति ही नहीं दो परिवार, कुल और खानदान भी एक होते हैं. अत: एक दूसरे की भावनाओं का सम्मान करते हुए आयोजन को सादगी, पवित्रता और उल्लास के वातावरण में पूर्ण करें
***
***
नवगीत
धरती की छाती पै होरा
रओ रे सूरज भून।
*
दरक रए मैदान-खेत सब
मुरझा रए खलिहान।
माँगे सीतल पेय भिखारी
ले न रुपैया दान।
संझा ने अधरों पे बहिना
लगा रखो है खून।
धरती की छाती पै होरा
रओ रे सूरज भून।
*
धोंय, निचोरें सूखें कपरा
पहने गीले होंय।
चलत-चलत कूलर, हीटर भओ
पंखें चल-थक रोंय।
आँख-मिचौरी खेरे बिजुरी
मलमल लग रओ ऊन।
धरती की छाती पै होरा
रओ रे सूरज भून।
*
गरमा-गरम नें कोऊ चाहे
रोएँ चूल्हा-भट्टी।
सब खों लगे तरावट नीकी
पनहा, अमिया खट्टी।
धारें झरें नई नैनन सें
बहें बदन सें दून।
धरती की छाती पै होरा
रओ रे सूरज भून।
*
लिखो तजुरबा, पढ़ तरबूजा
चक्कर खांय दिमाग।
मृगनैनी खों लू खें झोंकें
लगे लगा रए आग।
अब नें सरक पे घूमें रसिया
चौक परे रे! सून।
धरती की छाती पै होरा
रओ रे सूरज भून।
*
अंधड़ रेत-बगूले घेरे
लगी सहर में आग।
कितै गए पनघट, अमराई
कोयल गाए नें राग।
आँखों मिर्ची झौंके मौसम
लगा र ओ रे चून।
धरती की छाती पै होरा
रओ रे सूरज भून।
*
***
दोहे गरमागरम :
*
जेठ जेठ में हो रहे, गर्मी से बदहाल
जेठी की हेठी हुई, थक हो रहीं निढाल
*
चढ़ा करेला नीम पर, लू पर धूप सवार
जान निकाले ले रही, उमस हुई हथियार
*
चुआ पसीना तर-बतर, हलाकान हैं लोग
पोंछे टेसू हवा से, तनिक न करता सोग
*
नीम-डाल में डाल दे, झूला ठंडी छाँव
पकी निम्बोली चूस कर, भूल न जाना गाँव
*
मदिर गंध मन मोहती, महुआ चुआ बटोर
ओली में भर स्वाद लूँ, पवन न करना शोर
*
कूल न कूलर रह गया, हीट कर रही तंग
फैन न कोई फैन का, हारा बेबस जंग
*
एसी टसुए बहाता, बिजली होती गोल
पीट रही है ढोल लू, जय सूरज की बोल
*
दोहे गरमागरम सुन, उड़ा जा रहा रंग
मेकप सारा धुल गया, हुई गजल बदरंग
३-५-२०१७
*
घनाक्षरी सलिला:१
घनाक्षरी: एक परिचय
*
हिंदी के मुक्तक छंदों में घनाक्षरी सर्वाधिक लोकप्रिय, सरस और प्रभावी छंदों में से एक है. घनाक्षरी की पंक्तियों में वर्ण-संख्या निश्चित (३१, ३२, या ३३) होती है किन्तु मात्रा गणना नहीं की जाती. अतः, घनाक्षरी की पंक्तियाँ समान वर्णिक किन्तु विविध मात्रिक पदभार की होती हैं जिन्हें पढ़ते समय कभी लघु का दीर्घवत् उच्चारण और कभी दीर्घ का लघुवत् उच्चारण करना पड़ सकता है. इससे घनाक्षरी में लालित्य और बाधा दोनों हो सकती हैं. वर्णिक छंदों में गण नियम प्रभावी नहीं होते. इसलिए घनाक्षरीकार को लय और शब्द-प्रवाह के प्रति अधिक सजग होना होता है. समान पदभार के शब्द, समान उच्चार के शब्द, आनुप्रासिक शब्द आदि के प्रयोग से घनाक्षरी का लावण्य निखरता है. वर्ण गणना करते समय लघु वर्ण, दीर्घ वर्ण तथा संयुक्ताक्षरों को एक ही गिना जाता है अर्थात अर्ध ध्वनि की गणना नहीं की जाती है।
२ वर्ण = कल, प्राण, आप्त, ईर्ष्या, योग्य, मूर्त, वैश्य आदि.
३ वर्ण = सजल,प्रवक्ता, आभासी, वायव्य, प्रवक्ता आदि.
४ वर्ण = ऊर्जस्वित, अधिवक्ता, अधिशासी आदि.
५ वर्ण. = वातानुकूलित, पर्यावरण आदि.
घनाक्षरी के ९ प्रकार होते हैं;
१. मनहर: कुल वर्ण संख्या ३१. समान पदभार, समतुकांत, पदांत गुरु अथवा लघु-गुरु, चार चरण ८-८-८-७ वर्ण।
२. जनहरण: कुल वर्ण संख्या ३१. समान पदभार, समतुकांत, पदांत गुरु शेष सब वर्ण लघु।
३. कलाधर: कुल वर्ण संख्या ३१. समान पदभार, समतुकांत, पदांत गुरु-लघु, चार चरण ८-८-८-७ वर्ण ।
४. रूप: कुल वर्ण संख्या ३२. समान पदभार, समतुकांत, पदांत गुरु-लघु, चार चरण ८-८-८-८ वर्ण।
५. जलहरण: कुल वर्ण संख्या ३२. समान पदभार, समतुकांत, पदांत लघु-लघु, चार चरण ८-८-८-८ वर्ण।
६. डमरू: कुल वर्ण संख्या ३२. समान पदभार, समतुकांत, पदांत बंधन नहीं, चार चरण ८-८-८-८ सभी लघु वर्ण।
७. कृपाण: कुल वर्ण संख्या ३२. समान पदभार, समतुकांत, पदांत गुरु-लघु, चार चरण, प्रथम ३ चरणों में समान अंतर तुकांतता, ८-८-८-८ वर्ण।
८. विजया: कुल वर्ण संख्या ३२. समान पदभार, समतुकांत, पदांत लघु-गुरु, चार चरण ८-८-८-८ वर्ण।
९. देव: कुल वर्ण संख्या ३३. समान पदभार, समतुकांत, पदांत ३ लघु-गुरु, चार चरण ८-८-८-९ वर्ण।
*****
२.५.२०१५
कौन-सा धर्मग्रंथ कब लिखा गया...
अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'
हिन्दू धर्मग्रंथ : देशी और विदेशी शोधकर्ताओं और इतिहासकारों के अनुसार संस्कृत में लिखे गए 'ऋग्वेद' को दुनिया की प्रथम और सबसे प्राचीन पुस्तक माना जाता है। हिन्दू धर्म इसी ग्रंथ पर आधारित है। इस ग्रंथ को इतिहास की दृष्टि से भी एक महत्वपूर्ण रचना माना गया है। प्रोफेसर विंटरनिट्ज मानते हैं कि वैदिक साहित्य का रचनाकाल 2000-2500 ईसा पूर्व हुआ था।
हिन्दू धर्मग्रंथ 'वेद' को जानिए...
लिखित रूप से पाया गया ऋग्वेद इतिहासकारों के अनुसार 1800 से 1500 ईस्वी पूर्व का है। इसका मतलब कि आज से 3 हजार 815 वर्ष पूर्व इसे लिखा गया था। हालांकि शोधकर्ता यह भी कहते हैं कि वेद वैदिककाल की वाचिक परंपरा की अनुपम कृति है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी पिछले 6-7 हजार ईस्वी पूर्व से चली आ रही है, क्योंकि इसमें उक्त काल के ग्रहों और मौसम की जानकारी से इसकी प्राचीनता सिद्ध होती है। खैर, हम यह मान लें कि 3 हजार 815 वर्ष पूर्व लिखे गए अर्थात महाभारत काल के बहुत बाद में तब लिखे गए, जब ह. अब्राहम थे जिनको इस्लाम में इब्राहीम कहा जाता है। महान खगोल वैज्ञानिक आर्यभट्‍ट के अनुसार महाभारत युद्ध 3137 ईसा पूर्व में हुआ यानी 5152 वर्ष पूर्व। इस युद्ध के 35 वर्ष पश्चात भगवान कृष्ण ने देह छोड़ दी थी।
शोधानुसार पता चलता है कि भगवान राम का जन्म आज से 7129 वर्ष पूर्व अर्थात 5114 ईस्वी पूर्व हुआ था। चैत्र मास की नवमी को रामनवमी के रूप में मनाया जाता है। उल्लेखनीय है कि वेदों का सार उपनिषद और उपनिषदों का सार गीता है। 18 पुराण, स्मृतियां, महाभारत और रामायण हिन्दू धर्मग्रंथ नहीं हैं। वेद, उपनिषद और गीता ही धर् धर्मग्रंथ : जैन धर्म का मूल भारत की प्राचीन परंपराओं में रहा है। आर्यों के काल में ऋषभदेव और अरिष्टनेमि को लेकर जैन धर्म की परंपरा का वर्णन भी मिलता है। जैन धर्म की प्राचीनता प्रामाणिक करने वाले अनेक उल्लेख वैदिक साहित्य में प्रचुर मात्रा में हैं। अर्हंतं, जिन, ऋषभदेव, अरिष्टनेमि आदि तीर्थंकरों का उल्लेख ऋग्वेदादि में बहुलता से मिलता है जिससे यह स्वतः सिद्ध होता है कि वेदों की रचना के पहले जैन-धर्म का अस्तित्व भारत में था।
जैन धर्मग्रंथ और पुराण
महाभारतकाल में इस धर्म के प्रमुख नेमिनाथ थे। जैन धर्म के 22वें तीर्थंकर अरिष्ट नेमिनाथ भगवान कृष्ण के चचेरे भाई थे। माना जाता है कि ईसा से 800 वर्ष पूर्व 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ हुए जिनका जन्म काशी में हुआ था।
599 ईस्वी पूर्व अर्थात 2614 वर्ष पूर्व अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर ने तीर्थंकरों के धर्म और परंपरा को सुव्यवस्थित रूप दिया। कैवल्य का राजपथ निर्मित किया। संघ-व्यवस्था का निर्माण किया- मुनि, आर्यिका, श्रावक और श्राविका। यही उनका चतुर्विध संघ कहलाया। भगवान महावीर ने 72 वर्ष की आयु में देह त्याग किया।
यहूदी धर्मग्रंथ : यहूदियों के धर्मग्रंथ 'तनख' के अनुसार यहूदी जाति का उद्भव पैगंबर हजरत अबराहम (इस्लाम में इब्राहीम, ईसाइयत में अब्राहम) से शुरू होता है। आज से करीब 4,000 साल पुराना यहूदी धर्म वर्तमान में इसराइल का राजधर्म है।
यहूदी धर्म को जानें
दुनिया के प्राचीन धर्मों में से एक यहूदी धर्म से ही ईसाई और इस्लाम धर्म की उत्पत्ति हुई है। यहूदी धर्म की शुरुआत पैगंबर अब्राहम (अबराहम या इब्राहीम) से मानी जाती है, जो ईसा से लगभग 1800 वर्ष पूर्व हुए थे अर्थात आज से 3814 वर्ष पूर्व। ईसा से लगभग 1,400 वर्ष पूर्व अबराहम के बाद यहूदी इतिहास में सबसे बड़ा नाम 'पैगंबर मूसा' का है। मूसा ही यहूदी जाति के प्रमुख व्यवस्थाकार हैं। मूसा को ही पहले से ही चली आ रही एक परंपरा को स्थापित करने के कारण यहूदी धर्म का संस्थापक माना जाता है।
यहूदी मान्यता के अनुसार यहोवा (ईश्वर) ने तौरात (तोराह व तनख) जो कि मूसा को प्रदान की, इससे पहले सहूफ़-ए-इब्राहीमी, जो कि इब्राहीम को प्रदान की गईं। यह किताब अब लुप्त हो चुकी है। इसके बाद ज़बूर, जो कि दाऊद को प्रदान की गई। फिर इसके बाद इंजील (बाइबल), जो कि ईसा मसीह को प्रदान की गई।
अब्राहम और मूसा के बाद दाऊद और उसके बेटे सुलेमान को यहूदी धर्म में अधिक आदरणीय माना जाता है। सुलेमान के समय दूसरे देशों के साथ इसराइल के व्यापार में खूब उन्नति हुई। सुलेमान का यहूदी जाति के उत्थान में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। 37 वर्ष के योग्य शासन के बाद सन् 937 ईपू में सुलेमान की मृत्यु हुई।
यहूदियों की धर्मभाषा 'इब्रानी' (हिब्रू) और यहूदी धर्मग्रंथ का नाम 'तनख' है, जो इब्रानी भाषा में लिखा गया है। इसे 'तालमुद' या 'तोरा' भी कहते हैं। असल में ईसाइयों की बाइबिल में इस धर्मग्रंथ को शामिल करके इसे 'पुराना अहदनामा' अर्थात ओल्ड टेस्टामेंट कहते हैं। तनख का रचनाकाल ईपू 444 से लेकर ईपू 100 के बीच का माना जाता है।
पारसियों का धर्मग्रंथ 'जेंद अवेस्ता' : पारसी धर्म या 'जरथुस्त्र धर्म' विश्व के अत्यंत प्राचीन धर्मों में से एक है जिसकी स्थापना आर्यों की ईरानी शाखा के एक प्रोफेट जरथुष्ट्र ने की थी। इसके धर्मावलंबियों को पारसी या जोराबियन कहा जाता है। यह धर्म एकेश्वरवादी धर्म है। ये ईश्वर को 'आहुरा माज्दा' कहते हैं। 'आहुर' शब्द 'असुर' शब्द से बना है। जरथुष्ट्र को ऋग्वेद के अंगिरा, बृहस्पति आदि ऋषियों का समकालिक माना जाता है। वे ईरानी आर्यों के स्पीतमा कुटुम्ब के पौरूषहस्प के पुत्र थे। उनकी माता का नाम दुधधोवा (दोग्दों) था, जो कुंवारी थी। 30 वर्ष की आयु में जरथुस्त्र को ज्ञान प्राप्त हुआ। उनकी मृत्यु 77 वर्ष 11 दिन की आयु में हुई। महान दार्शनिक नीत्से ने एक किताब लिखी थी जिसका नाम '‍दि स्पेक ऑव जरथुस्त्र' है। कई विद्वान मानते हैं कि जेंद अवेस्ता तो अथर्ववेद का भाष्यांतरण है।
पारसियों का हिन्दुओं से नाता, जानिए
फारस के शहंशाह विश्तास्प के शासनकाल में पैगंबर जरथुस्त्र ने दूर-दूर तक भ्रमण कर अपना संदेश दिया। इतिहासकारों का मत है कि जरथुस्त्र 1700-1500 ईपू के बीच हुए थे। यह लगभग वही काल था, जबकि हजरत इब्राहीम अपने धर्म का प्रचार-प्रसार कर रहे थे।
पारसियों का धर्मग्रंथ 'जेंद अवेस्ता' है, जो ऋग्वैदिक संस्कृत की ही एक पुरातन शाखा अवेस्ता भाषा में लिखा गया है। यही कारण है कि ऋग्वेद और अवेस्ता में बहुत से शब्दों की समानता है। ऋग्वेदिक काल में ईरान को पारस्य देश कहा जाता था। अफगानिस्तान के इलाके से आर्यों की एक शाखा ने ईरान का रुख किया, तो दूसरी ने भारत का। ईरान को प्राचीनकाल में पारस्य देश कहा जाता था। इसके निवासी अत्रि कुल के माने जाते हैं।
धर्मग्रंथ : बुद्ध ने अपने उपदेश पालि भाषा में दिए, जो त्रिपिटकों में संकलित हैं। त्रिपिटक के 3 भाग हैं- विनयपिटक, सुत्तपिटक और अभिधम्मपिटक। उक्त पिटकों के अंतर्गत उपग्रंथों की विशाल श्रृंखलाएं हैं। सुत्तपिटक के 5 भागों में से एक खुद्दक निकाय की 15 रचनाओं में से एक है धम्मपद। धम्मपद ज्यादा प्रचलित है।
बौद्ध धर्म के मूल तत्व हैं- 4 आर्य सत्य, आष्टांगिक मार्ग, प्रतीत्यसमुत्पाद, अव्याकृत प्रश्नों पर बुद्ध का मौन, बुद्ध कथाएं, अनात्मवाद और निर्वाण। बुद्ध ने अपने उपदेश पालि भाषा में दिए, जो त्रिपिटकों में संकलित हैं। त्रिपिटक के 3 भाग हैं- विनयपिटक, सुत्तपिटक और अभिधम्मपिटक। उक्त पिटकों के अंतर्गत उपग्रंथों की विशाल श्रृंखलाएं हैं। सुत्तपिटक के 5 भाग में से एक खुद्दक निकाय की 15 रचनाओं में से एक है धम्मपद। धम्मपद ज्यादा प्रचलित है।
हालांकि धम्मपद पहले से ही विद्यमान था, लेकिन उसकी जो पां‍डुलिपियां प्राप्त हुई हैं, वे 300 ईसापूर्व की हैं। भगवान बुद्ध के निर्वाण (देहांत) के बाद प्रथम संगीति राजगृह में 483 ईसा पूर्व हुई थी। दूसरी संगीति वैशाली में, तृतीय संगीति 249 ईसा पूर्व पाटलीपुत्र में हुई थी और चतुर्थ संगीति कश्मीर में हुई थी। माना जाता है कि चतुर्थ संगीति में ईसा मसीह भी शामिल हुए थे। माना जाता है कि तृतीय बौद्ध संगीति में त्रिपि‍टक को अंतिम रूप दिया गया था।
वैशाख माह की पूर्णिमा के दिन बुद्ध का जन्म नेपाल के लुम्बिनी में ईसा पूर्व 563 को हुआ। इसी दिन 528 ईसा पूर्व उन्होंने भारत के बोधगया में सत्य को जाना और इसी दिन वे 483 ईसा पूर्व को 80 वर्ष की उम्र में भारत के कुशीनगर में निर्वाण (मृत्यु) को उपलब्ध हुए।
***
मुक्तिका:
.
हमको बहुत है फख्र कि मजदूर हैं
क्या हुआ जो हम तनिक मजबूर हैं.
.
कह रहे हमसे फफोले हाथ के
कोशिशों की माँग का सिन्दूर हैं
.
आबलों को शूल से शिकवा नहीं
हौसले अपने बहुत मगरूर हैं.
*
कलश महलों के न हमको चाहिए
जमीनी सच्चाई से भरपूर हैं.
.
स्वेद गंगा में नहाते रोज ही
देव सुरसरि-'सलिल' नामंज़ूर है.
३-५-२०१५
***
छंद सलिला:
रसामृत छंद
*
छंद-लक्षण: जाति महारौद्र , प्रति चरण मात्रा २२ मात्रा, यति १६ - ६, चरणान्त गुरु लघु (तगण, जगण) ।
लक्षण छंद:
काव्य रसामृत का करिए / नित विहँस पान
ईश - देश महिमा का करिए / सतत गान
सोलह कला छहों रस गुरु लघु / चरण अंत
सत-शिव-सुन्दर, सत-चित-आनंद / तज न संत
उदाहरण:
१. राजनीति ने लोकनीति का / किया त्याग
लूटें नेता, लुटे न जनता / कहे भाग
शोषक अफसर पत्रकार ले / रहे घूस
पूँजीपति डॉक्टर अधिवक्ता / हुए मूस
जाग कृषक - मजदूर मिटा दे / अनय जाग
देशभक्ति का छेड़े जनगण / पुण्य राग
२. हुआ महाभारत भारत में / सीख पाठ
शासक शासित की दम पर मत / करे ठाठ
जाग गयी जनता तो देगी / लगा आग
फूँक देश को नेता खेलें / अब न फाग
धन विदेश में ले जाकर जो / रहे जोड़
उनका मुँह काला करने की / मचे होड़
भाषा भूषा धर्म जोड़ते, देँ न फ़ूड
लसलिल; देश-हिट खातिर दें मत/भेद छोङ
३. महाराष्ट्र में राष्ट्रवाद क्यों / रहा हार?
गैर मैराथन को लगता है / क्यों बिहार?
काश्मीर का दर्ज़ा क्यों है / हुआ खास?
राजनीती के स्वार्थ गले की / बने फाँस
राष्ट्रीय सरकार बने दल / मिटें आज
संसद में हुड़दंग न हो कुछ / करो लाज
असम विषम हो रहा रोक लो / बढ़ा हाथ
आतंकी बल जो- दें उनका / झुका माथ
देशप्रेम की राह चलें हम / उठा शीश
दे पाये निज प्राण देश-हित / 'सलिल' ईश
*********
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामिनीमोहन, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दीप, दीपकी, दोधक, नित, निधि, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनअवतार, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, योग, ऋद्धि, रसामृत, राजीव, राधिका, रामा, लीला, वाणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुभगति, सरस, सार, सिद्धि, सुगति, सुजान, हेमंत, हंसगति, हंसी)
गीत: हमें जरूरत है...
*
हमें जरूरत है लालू की...
*
हम बिन पेंदी के लोटे हैं.
दिखते खरे मगर खोटे हैं.
जिसने जमकर लात लगाई
उसके चरणों में लोटे हैं.
लगा मुखौटा हर चेहरे पर
भाए आरक्षण कोटे हैं.
देख समस्या आँख मूँद ले
हमें जरूरत है टालू की...
*
औरों पर उँगलियाँ उठाते.
लेकिन खुद के दोष छिपाते.
नहीं सराहे यदि दुनिया तो
खुद ही खुद की कीरति गाते.
तन को तन की चाह हमेशा
मन को मन से मिला न पाते.
सहज सभी सँग जो खप जाए
हमें जरूरत है आलू की...
***
राजस्थानी मुक्तिका :
... तैर भायला
*
लार नर्मदा तैर भायला.
बह जावैगो बैर भायला..
गेलो आपून आप मलैगो.
मंजिल की सुण टेर भायला..
मुसकल है हरदां सूँ खडनो.
तू आवैगो फेर भायला..
घणू कठिन है कविता करनो.
आकासां की सैर भायला..
सूल गैल पै यार 'सलिल' तूं.
चाल मेलतो पैर भायला..
३-५-२०१२
***
आरती:
हे चित्रगुप्त भगवान्...
संजीव वर्मा 'सलिल'
*
हे चित्रगुप्त भगवान!
करूँ गुणगान
दया प्रभु कीजै, विनती
मोरी सुन लीजै...
*
जनम-जनम से भटक रहे हम,
चमक-दमक में अटक रहे हम.
भवसागर में भोगें दुःख,
उद्धार हमारा कीजै...
*
हम है याचक, तुम हो दाता,
भक्ति अटल दो भाग्य विधाता.
मुक्ति पा सकें जन्म-चक्र से,
युक्ति बता वह दीजै...
*
लिपि-लेखनी के आविष्कारक,
वर्ण व्यवस्था के उद्धारक.
हे जन-गण-मन के अधिनायक!,
सब जग तुम पर रीझै...
*
ब्रम्हा-विष्णु-महेश तुम्हीं हो,
भक्त तुम्हीं भक्तेश तुम्हीं हो.
शब्द ब्रम्हमय तन-मन कर दो,
चरण-शरण प्रभु दीजै...
*
करो कृपा हे देव दयालु,
लक्ष्मी-शारद-शक्ति कृपालु.
'सलिल' शरण है जनम-जनम से,
सफल साधना कीजै...
३-५-२०११
***
क्षणिका:
लेबर डे
*
वे,
लेबर डे मना रहे हैं.
बिना नागा
हर वर्ष
अपनी पत्नि को
लेबर रूम में
भिजवा रहे हैं.
३-५-२०१०
***

बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

फरवरी ४, लघुकथा, सॉनेट, शारदा, सोरठे, बसंत, शंभूनाथ डे, यमकीय दोहे, गीत, मुक्तिका

सलिल सृजन ४ फरवरी

लघुकथा

समाधान

            मेरे बेटे के स्कूल से सूचना आई कि वह पिछले माह १२ दिन अनुपस्थित रहा। कक्षा शिक्षिका ने अगले दिन प्राचार्य से मिलने को कहा अन्यथा बच्चे के विरुद्ध कार्यवाही की जाएगी, यह भी बताया। मैं अगले दिन स्कूल गया तो बच्चा वहाँ नहीं था जबकि सवेरे घर से बस्ता और टिफिन लेकर स्कूल के लिए निकला था। प्राचार्य के पूछने पर मैंने बताया कि मुझे रात में काम पर जाना होता है, सवेरे लौटने पर देर हो जाती है। तब तक बच्चा जा चुका होता है। रविवार को ही बेटे से भेंट हो पाती है। मैंने अनुरोध किया कि अगले सोमवार को मैं बेटे के साथ प्राचार्य से मिलूँगा इसके पहले कोई कार्यवाही न की जाए। थोड़ी ना-नुकुर के बाद प्राचार्य ने सहमति जताई।

            मैंने बेटे से कुछ कहे बिना सचाई जानने का निर्णय लिया। कार्यालय से अवकाश लिया। अगली सुबह बेटा स्कूल के लिए निकला तो मैंने उसका पीछा किया। वह स्कूल न जाकर सरकारी अस्पताल में चला गया। वहाँ भर्ती मरीजों से हाल-चाल पूछता हुआ एक वृदधा के निकट जाकर रुका, उसे अपना डब्बा खिला दिया। वार्ड बॉय ने बताया कि बेटा रोज उसकी सेवा करता है। मैं घर लौट आया। शाम को बच्चे से पूछा कि वह अस्पताल में किस महिला की सेवा करता है?

            बच्चा पहले तो घबराया किन्तु जब मैंने कहा कि यह तो अच्छी बात है कि किसी के काम आ रहे हो पर पढ़ाई का क्या होगा? बेटे ने बताया कि उसके दिवंगत मित्र की माँ है अस्पताल में। जब मित्र था तो माँ से उसे बहुत लाड़ मिलता रहा था। मैंने अगले सोमवार प्राचार्य से मिलकर सब जानकारी दी। प्राचार्य ने कहा कि मैं बेटे को रोकूँ और उसे स्कूल भेजूँ, भलाई करने के लिए जिंदगी पड़ी है। मैं सोचता हूँ कि हम नई पीढ़ी के प्रति शिकायत तो करते हैं किन्तु उन्हें समझते नहीं। प्राचार्य से कहा बेटे के विरुद्ध कार्यवाही न करें। बेटे को समझाया कि स्कूल समय पर जाए, मैं उसके दोस्त की माँ को खाना पहुँचा दूँगा, स्कूल से लौटते समय वह खुद अस्पताल जाकर सेवा कर सकता है।

                                                                                ००० 

दोहा

बाली गृहणी नचाती, गेहूँ नाचे झूम।
नजर बचा रवि-धरा की, इक-दूजे को चूम।।
४.२.२०२४
***
सॉनेट
शारदा
हृदय विराजी मातु शारदा
सलिल करे अभिषेक निरंतर
जन्म सफल करता नित यश गा
सुमति मिले विनती सिर, पग धर
वीणा अनहद नाद गुँजाती
भव्य चारुता अनुपम-अक्षय
सातों स्वर-सरगम दे थाती
विद्या-ज्ञान बनाते निर्भय
अपरा-परा नहीं बिसराएँ
जड़-चेतन में तुम ही तुम हो
देख सकें, नित महिमा गाएँ
तुमसे आए, तुममें गुम हों
सरस्वती माँ सरसवती हे!
भव से तार, दिव्य दर्शन दे
४-२-२०२३
•••
सोरठे बसंत के
नहीं जगत में सार, कहते थे माया जिसे।
कहें जरूरी प्यार, संत बसंत निहारते।।
महुआ फूला खूब, वनश्री का शृङगार कर।
गया रंग में डूब, किंशुक वन अंगार भर।।
नेह नर्मदा तीर, योगी साधक सम खड़ा।
टेसू धरकर धीर, पल लगता दिन से बड़ा।।
देख रहा आकाश, करे तपस्या अहर्निश।
होकर लाल पलाश, विचलित तनिक न हो रहा।।
कट-छिद-दग है शांत, बाँस न भरता आह भी।
कृष्ण बनेंगे कान्त, वेणु थाम कर; धर अधर।।
कोयल कूके भोर, गीत विरह के सुर बसे।
साँझ मिले चितचोर, कसकर बाँहों में कसे।।
नहीं मिलन बिन चैन, बिन बोले बोलें नयन।
मन नाहक बेचैन, दिवस चाहता है शयन।।
छीनें मन का चैन, मधु-रस भीगे सोरठे।
दिवस कटे नहिं रैन, प्रिय दर्शन पाए बिना।।
अच्छा लगे बसंत, पुष्पित तरु; गंधित पवन।
संग कामिनी-कंत, पद्मित सलिल, अमित लगन।।
•••
एक अज्ञात महानायक - शंभूनाथ डे
सन १८१७ में 'ब्लू डैथ' (कॉलेरा, हैजा) विश्व में मौत का तांडव करने लगा और इसकी चपेट में आकर उस समय लगभग एक करोड़ अस्सी लाख लोगों की मौत हो गई। दुनिया भर के वैज्ञानिक हैजा का इलाज खोजने में जुट गए ।
सन १८४४ में रॉबर्ट कॉख नामक वैज्ञानिक ने उस जीवाणु का पता लगाया जिसकी वजह से हैजा होता है और उस जीवाणु को नाम दिया 'वाइब्रियो कॉलेरी'। रॉबर्ट कॉक के शोध के अनुसार जीवाणु व्यक्ति के सर्कुलेटरी सिस्टम यानी कि खून में जाकर उसे प्रभावित करता है। कॉख ने जीवाणु का पता तो लगा लिया लेकिन वह यह पता लगाने में नाकाम रहे कि वाइब्रियो कॉलेरी को कैसे निष्क्रिय किया जा सकता है।
हैज़ा फैलता रहा, लोग मरते रहे और इस जानलेवा बीमारी को ब्लू डेथ यानि "नीली मौत" का नाम दे दिया गया।
१ फरवरी १९१५ को पश्चिम बंगाल के एक दरिद्र परिवार में एक बालक का जन्म हुआ, नाम रखा गया 'शंभूनाथ'। शुरुआत से ही शंभूनाथ पढ़ाई में अव्वल रहे। उन्हें कोलकाता मेडिकल कॉलेज में प्रवेश मिल गया। डॉक्टरी से अधिक उनका रुझान शोध कार्य की ओर था। इसलिये १९४७ में उन्होंने यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के कैमरोन लैब में पीएच. डी. में दाखिला लिया। मानव शरीर की संरचना पर शोध करते समय शंभूनाथ डे का ध्यान हैज़ा फैलाने वाले जीवाणु वाइब्रियो कॉलेरी की ओर गया।
माटी का प्यार १९४९ में शंभूनाथ डे को वापिस भारत खींच लाया। उन्हें कलकत्ता मेडिकल कॉलेज के पैथोलॉजी विभाग का निदेशक नियुक्त किया गया और वह महामारी का रूप ले चुके हैज़े का इलाज ढूँढ़ने में जुट गए।
बंगाल उस समय हैज़े के कहर से काँप उठा था। हॉस्पिटल हैजे के मरीजों से भरे हुये थे।
१८४४ में रॉबर्ट कॉख ने गलती की, उन्होंने कभी सोचा ही नहीं कि यह जीवाणु व्यक्ति के किसी और अंग के ज़रिए शरीर में जहर फैला सकता है। शंभूनाथ के शोध से पता चला वाइब्रियो कॉलेरी खून के रास्ते नहीं बल्कि छोटी आंत में जाकर एक टोक्सिन/जहरीला पदार्थ छोड़ता है... इसकी वजह से इंसान के शरीर में खून गाढ़ा होने लगता है और पानी की कमी होने लगती है। शंभूनाथ डे ने अपने शोध के निष्कर्ष से विश्व भर में सनसनी फैला दी।
१९५३ में शंभूनाथ डे का शोध प्रकाशित के पश्चात ही ऑरल डिहाइड्रेशन सॉल्यूशन (ORS) बनाया गया। यह सॉल्यूशन हैजे का रामबाण इलाज साबित हुआ। भारत और अफ्रीका में इस सॉल्यूशन के जरिये लाखों मरीजों को मौत के मुँह से निकाल लिया गया। विश्व भर में शंभूनाथ डे के शोध का डंका बज चुका था परंतु उनका दुर्भाग्य था के वह शोध भारत भूमि पर हुआ था। लाखों करोड़ों लोगों को जीवनदान देने वाले शंभूनाथ को अपने ही राष्ट्र में पहचान व्स सम्मान नहीं मिला। शंभूनाथ आगे इस जीवाणु पर और शोध करना चाहते थे लेकिन भारत में साधनों की कमी के चलते नहीं कर पाये। उनका नाम एक से अधिक बार नोबेल पुरस्कार के लिए भी दिया गया। इसके अलावा, उन्हें दुनिया भर में सम्मानों से नवाज़ा गया लेकिन भारत में वह एक गुमनाम शख्स की ज़िंदगी जीते रहे।
***
एक सत्य कथा
बदला
*
एक पंडित जी और एक ठाकुर साहब जिगरी दोस्त थे- दो जिस्म एक जान। बचपन से चालीसवें तक। फिर जाने क्या हुआ कि दुश्मनी हो गई। हर दूसरे दिन गोली चलना- लठैत ही नहीं, दोनों के कई बेटे तक दुश्मनी की आग का ईंधन बन गए मगर दुश्मनी चलती रही।
नदी का पानी और लड़की की उम्र बढ़ते देर नहीं लगती। ठाकुर साहब की बेटी की शादी तय हो गई। भारत में दुश्मनी कितनी भी बड़ी हो, बहन बेटियों की शादी-ब्याह में बाधक नहीं बनती। बंदूक़ें ख़ामोश हो जाती हैं। एकदम ख़ामोश। और किसी ने यह परंपरा तोड़ी तो वो ज़िंदगी और पूरब दोनों की नज़र से गिर जाता है। उस गाँव में भी यही हुआ।
ठाकुर के दरवाजे पर आ गई बारात गोलियाँ दागती, आतिशबाज़ी करती, तवायफ़ नाचती जैसी उस समय परंपरा थी। पंडित बहुत बेचैन थे, गोद खिलाई बच्ची की शादी और वे में न जा सकने के मलाल और बिना बुलाए न जाने की मजबूरी।अचानक उनकी नाउन ठुमकती हुई बखरी में घुसी और पंडिताइन से बोली- ' ए भौजी-! बरतिया लौटत बा। कुल हेकड़ई ख़त्म ठाकुर साहब के।
पंडिताइन स्तब्ध और पंडित जी को तो काटो तो ख़ून नहीं। बहुत मरी आवाज़ में पूछा कि ‘भवा का’?
नाउन ने बताया कि समधी अचानक कार माँग लिहिन- माने दाम। बाबू साहब के लगे ओतना पैसा रहा नाय तो बरात लौटे वाली है। 'निकालो जीप'दहाड़ते हुए से पंडित जी उठे। पल भर में बाकी बचे बेटे, लठैत सब तैयार होकर दस मिनट में पूरा अमला बाबू साहब के दरवाज़े पर दर्जनों दुनालियों और पचासों लाठियों के साथ जा धमके।
ठाकुर साहब को ख़बर लगी तो वो भागते हुए पहुँचे दुआर पे- 'एतना गिरि गया पंडित। आजे के दिन मिला रहा बदला भजावे की खातिर।'
पंडित जी ने बस इतना कहा- 'दुश्मनी चलत रही, बहुत हिसाब बाकी है, बकिल आज बिटिया के बियाह हा। गलतियो से बीच मा जिन अइहा।' ठाकुर साहब चुपचाप हट गयेए।
पंडित जी पहुँचे समधी के पास- 'पाँव छुए, आश्चर्य की बात। सामान्यत: पंडित लोग पाँव छूते नहीं, 'बोले कार दी।' पीछे खड़े कारिंदे ने सूटकेस थमा दिया। द्वारचार, शादी, अगले दिन बड़हार (बिरादरी भोज) हुआ ।
विदाई के पहले अंतिम भोज में बारात खाने बैठी तो पंडित जी ने दूल्हा छोड़ सबकी थाली में १०१-१०१ रुपए डलवा दिए दक्षिणा के, परंपरानुसार थाली के नीचे नहीं, थाली में।
अब पूरी बारात सदमे में क्योंकि भोजन के बाद थाली में जो बच जाए वह जूठन होता है, जूठन जेब में कैसे रखें? उस सस्ते के ज़माने में १०० रुपए का लोभ छोड़ना भी कठिन और उससे अधिक कठिन पंडित जी की नाराजगी का खतरा उठाना।
समधी ने पंडित जी की तरफ़ देखा, पंडित जी बड़ी शांति से बोले।- 'बिटिया है हमारी देवी, पूजते हैं हम लोग। आपने बारात वापस ले जाने की बात कर देवी का अपमान किया। इसलिए इतना दंड तो बनता है की देवी की जूठन प्रसाद मान कर ग्रहण करें। समधी जी! पलकों पर रही है यहाँ,वहाँ ज़रा सा कष्ट हो गया तो दक्ष प्रजापति और बिटिया सती की कहानी सुने ही होंगे। आप समधी बिटिया की वजह से हैं। दूल्हे को दामाद होने के नाते नहीं छोड़ दिए, इसलिये छोड़े कि उसीके विवाह में उसकी बात कहाँ सुनता है कोई।
सर झुकाकर जीमते रहे बाराती और फिर बारात बिटिया (अपनी बहू) लेकर बिदा हो गई।
पंडित जी वापस घर को हुए। ठाकुर साहब ने हाथ जोड़े तो बोले- 'बस्स, दम निकरि गय ठाकुर? ऊ बिटिया है, गोद मा खेलाये हन, तू दुश्मन, दुश्मनी चली।
लेकिन फिर दोनों ख़ानदानों में कभी गोली न चली। पंडित जी और बाबू साहब न सही, दोनों की पत्नियाँ गले मिलकर ख़ूब रोईं, बच्चों का फिर आना-जाना शुरु हुआ।
भारतीय बेटियों को लेकर बहुत भावुक होते हैं, उनकी बहुत इज़्ज़त करते हैं। फिर चाहे बेटी दुश्मन की ही क्यों न हो।
जो माँ-बहनों की इज्जत नहीं करते वे और चाहे जो हों, भारतीय नहीं हो सकते।
***
विमर्श
मध्यकाल के यमकीय दोहे
*
अब क्यों करिकेँ घर जैयतु है,अरु काही सुनैयतु बीती भई।
कवि मण्डन मोहन ठीक ठगी, सु तो ऐसी लिलार लिखी ती दई।
सखि और भई सो भली ही भई, पर एक जो बात बितीती नई।
रति हूँ ते गई मति हूँ ते गई पति हूँ ते गई पति हू ते गई।- मण्डन
नायिका पति को छोड़कर उपनायक से मिलने जाती है। वह भी धोखा दे जाता है, संकेत स्थल पर नहीं मिलता। नायिका पश्चाताप करती है। अंतिम पंक्ति में पतिहू (पति या स्वामी) तथा पतिहूँ (प्रतिष्ठा या लज्जा) में यमक का चमत्कार है ।
*
जल ढारि सनीचर गंग बधू विनबै कर जोरि सु पीपर सों।
तरुदेव गोसाँई बड़े तुम होयः माँगति दीन ह्वै पी परसों।
आवन के दिन तीस कहे गति औधि की ठीक तपी परसों
भूलि गये हरि दूरि विदेस किधौं अटके कहूँ पी पर सों। -गङ्ग
नायिका प्रोषितपतिका अर्थात जिसका पति प्रदेश में हो, है। एक महीने में आने की कह कर गया अवधि २ दिन पहले बीत गयी ,आया नहीं। शनिवार को पीपल पर जल चढाती है। चमत्कार अंतिम शब्दों में है
1 पीपर सों-अर्थात पीपल के वृक्ष से विनम्रता पूर्वक निवेदन करती है
2-पी परसों-विनम्रता पूर्वक माँगती है कि प्रियतम का स्पर्श करूँ
3-तपी परसों-पति के आने की अवधि परसों ही समाप्त हो गयी
4-पी पर सों -शायद कहीं मेरा प्रियतम किसी अन्य (नारी से)न अटक गया हो उससे प्रेम न कर बैठा हो
***
विमर्श -
ढोल गँवार शूद्र पशु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी।
क्या यह पंक्ति आपत्ति जनक है?
नहीं।
बुंदेली में ताड़ना के दो अर्थ होते हैं।
ताड़ते रहना खेत में जानवर न घुस पाएँ।
ताड़ना = देखना, निगाह रखना, सुरक्षा करना।
पापी को ताड़ना दी ही जाना चाहिए।
ताड़ना = दंड।
ढोल गँवार शूद्र पशु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी।
इस अर्धाली का अर्थ अपनी-अपनी समझ के अनुसार लगाया जाता है।
१. ढोल गँवार शूद्र पशु नारी, ये सभी ताड़ना अर्थात देखभाल के पात्र हैं। ढोल बजने के पहले उसकी डोरी ठीक से कसी है या नहीं?, गँवार (नासमझ) ठीक आचरण कर रहा है या नहीं?, शूद्र (अपात्र) वर्जित कार्य तो नहीं कर रहा?, पशु किसी के खेत में तो नहीं घुस रहा?, नारी को कोई तंग तो नहीं कर रहा?, इसे ताड़ते रहना चाहिए।
२. ढोल बिना थाप, गँवार बिना भय, पशु बिना मार, नारी बिना प्रतिबंध उचित आचरण नहीं करते इसलिए अंकुश आवश्यक है।
३. पशु-नारी = वह नारी जो पशुवत (अमर्यादित) आचरण करे।
'जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखि तिन तैसी।'
पाठक अपनी विचारधारा के अनुसार अर्थ निकालता है। तुलसीदास तो मिल नहीं सकते जो यह बताएँ कि किस अर्थ में लिखा है?
जय-जय गिरिवर राजकिसोरी। जय महेस मुख चंद्र चकोरी।।
जय गजवदन षडानन माता। जगत जननि दामिनि दुति गाता।।
लिखकर पार्वती जी की वंदना की है तुलसीदास जी ने।
वाल्मीकि रामायण में जयंत द्वारा सीता जी के वक्ष पर चंचु-प्रहार का उल्लेख होने के बाद भी तुलसीदास जी ने स्त्री सम्मान रक्षा की दृष्टि से पैर पर प्रहार लिखा। वे अन्यत्र भी स्त्री पात्रों के प्रति भी संवेदनशील हैं। इसलिए उन्हें पूर्वाग्रहग्रसित नहीं कहा जा सकता।
४-२-२०२३
***
मुक्तिका
मुस्कुराने लगे।
गीत गाने लगे।।
भूल पाए नहीं
याद आने लगे।।
था भरोसा मगर
गुल खिलाने लगे।।
बात मन की करी
दिल दुखाने लगे।।
जो नहीं थे खरे
आजमाने लगे।।
तोड़ दिल, दर्द दे
आप जाने लगे।।
कह रहे, बिन कहे
हम लुभाने लगे।।
•••
मुक्तिका
खोली किताब।
निकले गुलाब।।
सुधियाँ अनेक
लाए जनाब।।
ऊँची उड़ान
भरते उकाब।।
है फटी जेब
फिर भी नवाब।।
छेड़ें न लोग
ओढ़ो नकाब।।
दाने न चार
देते जुलाब।।
थामो लगाम
पैरों रकाब।।
***
सॉनेट
ऋतुराज
ऋतुराज का स्वागत करो!
पवन पिक हिलमिल रहे हैं
आम्र तरुवर खिल रहे हैं।।
पुलक पल पल सुख वरो।।
सुमन चहके, सुमन महके।
भ्रमर कर रसपान उन्मत।
फलवती हो मिलन चाहत।।
रहीं कलिकाएँ दहक।।
बाग में गुंजार रसमय।
काममय संसार मधुमय।
बिन पिए भी चढ़ी है मय।।
भोगियों को है नहीं भय।
रोगियों का रोग हो क्षय।
योगियों होना न निर्भय।।
४-२-२०२२
•••
कुंडलिया
अगर सफलता चाहता, खुद को बना सुपात्र।
कभी न देती सफलता, केवल किस्मत मात्र।।
केवल किस्मत मात्र, न सिंह-मुख में मृग देती।
जाग दौड़ खुद मार, कौर मुँह में तब देती।।
कहे सलिल संजीव, भुनाए जो हर अवसर।
खुद को साबित करे, करो मत अगर या मगर।।
***
मुक्तक
अपनी धरा; अपना गगन, अपना सलिल, अपना पवन।
अपनी उषा-संध्या-दिशा, अपना सुमन, अपना चमन।।
पुष्पा रहा; मुस्का रहा, पल-पल वतन महका रहा-
तकदीर निज दमका रहा,
अपना युवक, अपना जतन।।
***
दोहा है रस-राज
*
दोहा छंद की भावाभिव्यक्ति क्षमता अनुपम है। हर रस को दोहा छंद भली-भाँति अभिव्यक्त करता है। हर रस को केंद्र में दोहा रखकर दोहा रचने का आनंद अनूठा है।
श्रृंगार रस
रसराज श्रृंगार रसराज अत्यंत व्यापक है। श्रृंगार शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है श्रृंग + आर। 'श्रृंग' का अर्थ है "कामोद्रेक", 'आर' का अर्थ है वृद्धि प्राप्ति। श्रृंगार का अर्थ है कामोद्रेक की प्राप्ति या विधि श्रृंगार रस का स्थाई भाव प्रेम है। पति-पत्नी या प्रेमी-प्रेमिका द्वारा प्रेम की अभिव्यंजना श्रृंगार रस की विषय-वस्तु है। प्राचीन आचार्यों ने स्त्री पुरुष के शुद्ध प्रेम को ही रति कहा है। परकीया प्रिया-चित्रण को रस नहीं रसाभास कहा गया है किंतु 'लिव इन' के इस काल में यह मान्यता अनुपयुक्त प्रतीत होती है। श्रृंगार रस में अश्लीलता का समावेश न होने दें। श्रृंगार रस के २ भेद संयोग और वियोग हैं। प्रेम जीवन के संघर्षों में खेलता है, कष्टों में पलता है, प्रिय के प्रति कल्याण-भाव रखकर खुद कष्ट सहता है। ऐसा प्रेम ही उदात्त श्रृंगार रस का विषय बनता है।
संयोग श्रृंगार:
नायक-नायिका के मिलन, मिलन की कल्पना आदि का शब्द-चित्रण संयोग श्रृंगार का मुख्य विषय है।
उदाहरण:
नयन नयन से मिल झुके, उठे मिले बेचैन।
नयन नयन में बस गए, किंचित मिले न चैन।।
वियोग श्रृंगार:
नायक-नायिका में परस्पर प्रेम होने पर भी मिलन संभव नहीं हो तो वियोग श्रृंगार होता है। यह अलगाव स्थाई भी हो सकता है, अस्थायी भी। कभी मिले बिना भी विरह हो सकता है, मिल चुकने के बाद भी हो सकता है। विरह व्यथा दोनों और भी हो सकती है, एक तरफा भी। प्राचीन काव्य शास्त्र ने वियोग के चार भाग किए हैं :-
१. पूर्व राग पहले का आकर्षण
२. मान रूठना
३. प्रवास छोड़कर जाना
४. करुण विप्रलंभ मरने से पूर्व की करुणा।
उदाहरण:
मन करता चुप याद नित, नयन बहाते नीर।
पल-पल विकल गुहरातीं, सिय 'आओ रघुवीर'।।
हास्यः
हास्य रस का स्थाई भाव 'हास्य 'है। साहित्य में हास्य रस का निरूपण कठिन होता है,थोड़ी सी असावधानी से हास्य फूहड़ मजाक बनकर रह जाता है । हास्य रस के लिए उक्ति व्यंग्यात्मक होना चाहिए। हास्य और व्यंग्य में अंतर है। दोनों का आलंबन विकृत या अनुचित होता है। हास्य खिलखिलाता है, व्यंग्य चुभकर सोचने पर विवश करता है।
उदाहरण:
'ममी-डैड' माँ-बाप को, कहें उठाकर शीश।
बने लँगूरा कूदते, हँसते देख कपीश।।
व्यंग्यः
उदाहरण:
'फ्रीडमता' 'लेडियों' को, मिले दे रहे तर्क।
'कार्य' करें तो शर्म है, गर्व करें यदि 'वर्क'।।
करुणः
भवभूति: 'एकोरसः करुण' अर्थात करूण रस एक मात्र रस है। करुण रस के दो भेद स्वनिष्ठ व परनिष्ठ हैं।
उदाहरण:
चीर द्रौपदी का खिंचा, विदुर रो रहे मौन।
भीग रहा है अंगरखा, धीर धराए कौन?।
रौद्रः
इसका स्थाई भाव क्रोध है विभाव अनुभाव और संचारी भावों के सहयोग से वासना रूप में समाजिक के हृदय में स्थित क्रोध स्थाई भाव आस्वादित होता हुआ रोद्र रस में परिणत हो जाता है ।
उदाहरण:
शिखर कारगिल पर मचल, फड़क रहे भुजपाश। ‌
जान हथेली पर लिये, अरि को करते लाश।।
वीरः
स्थाई भाव उत्साह काव्य-वर्णित विभाव, अनुभाव, संचारी भाव के संयोग से रस अवस्था में आस्वाद योग्य बनकर वीर रस कहलाता है । इसकी मुख्य चार प्रवृत्तियाँ हैं।
उदाहरण:
१.दयावीर: जहाँ दुखी-पीड़ित जन की सहायता का भाव हो।
देख सुदामा दीन को, दुखी द्वारकानाथ।
गंगा-यमुना बह रहीं, सिसकें पकड़े हाथ।।
२. दानवीर : इसके आलंबन में दान प्राप्त करने की योग्यता होना अनिवार्य है।
उदाहरण:
राणा थे निरुपाय झट, उठकर भामाशाह।
चरणों में धन रख कहें, नाथ! न भरिए आह।।
३. धर्मवीर : इसके स्थाई भाव में धर्म का ज्ञान प्राप्त करना या धर्म-पालन करना प्रमुख है।
उदाहरण:
माया दुःख का मूल है, समझे राजकुमार।
वरण किया संन्यास तज, प्रिया पुत्र घर-द्वार।।
4 युद्धवीर : काव्य व लोक में युद्धवीर की प्रतिष्ठा होती है। इसका स्थाई भाव 'शत्रुनाशक उत्साह' है।
उदाहरण:
धवल बर्फ हो गया था, वीर-रक्त से लाल।
झुका न भारत जननि का, लेकिन पल भर भाल।।
भयानकः
विभाव, अनुभाव, संचारी भावों के प्रयोग से जब भय उत्पन्न या प्रकट होकर रस में परिणत हो तब भयानक रस होता है। भय केवल मनुष्य में नहीं, समस्त प्राणी जगत में व्याप्त है।
उदाहरण:
धांय-धांय गोले चले, टैंक हो गए ध्वस्त।
पाकिस्तानी सूर्य झट, सहम हो गया अस्त।।
वीभत्सः
घृणित वस्तुओं को देख, सुन जुगुप्सा नामक स्थाई भाव विभाव, अनुभाव, संचारी भावों के सहयोग से परिपक्व हो वीभत्स रस में परिणत हो जाता है। इसकी विशेषता तीव्रता से प्रभावित करना है। आचार्य विश्वनाथ के अनुसार वीभत्स रस का स्थाई भाव जुगुप्सा है। इसके आलंबन दुर्गंध, मांस-रक्त है, इनमें कीड़े पड़ना उद्दीपन, मोह आवेग व्याधि ,मरण आदि व्यभिचारी भाव है, अनुभाव की कोई सीमा नहीं है। वाचित अनुभाव के रूप में छिँछी की ध्वनि, अपशब्द, निंदा करना आदि, कायिक अनुभावों में नाक-भौं चढ़ाना , थूकना, आँखें बंद करना, कान पर हाथ रखना, ठोकर मारना आदि हैं।
उदाहरण:
हा, पशुओं की लाश को, नोचें कौए गिद्ध। ‌
हा, जनता का खून पी, नेता अफसर सिद्ध।।
अद्भुतः
अद्भुत रस के स्थाई भाव विस्मय में मानव की आदिम वृत्ति खेल-तमाशे या कला-कौशल से उत्पन्न विस्मय उदात्त भाव है। ऐसी शक्तियां और व्यंजना जिसमें चमत्कार प्रधान हो वह अद्भुत रस से संबंधित है। अदभुत रस विस्मयकारी घटनाओं, वस्तुओं, व्यक्तियों तथा उनके चमत्कार कोके क्रिया-कलापों के आलंबन से प्रकट होता है। उनके अद्भुत व्यापार, घटनाएँ, परिस्थितियाँ आदि उद्दीपन बनती हैं। आँखें खुली रह जाना, एकटक देखना प्रसन्नता, रोमांच, कंपन, स्वेद आदि अनुभाव सहज ही प्रकट होते हैं। उत्सुकता, जिज्ञासा, आवेग, भ्रम, हर्ष, मति, गर्व, जड़ता, धैर्य, आशंका, चिंता आदि संचारी भाव धारणकर अद्भुत रस में परिणत हो जाता है।
उदाहरण:
पल में प्रगटे सामने, पल में होता लुप्त।
अट्टहास करता असुर, लखन पड़े चित सुप्त।।
शांतः
शांत रस की उत्पत्ति तत्वभाव व वैराग्य से होती है। विभाव, अनुभाव व संचारी भावों से संयोग से हृदय में विद्यमान निर्वेद स्थाई भाव स्पष्ट होकर शांत रस में परिणित हो जाता है। आनंदवर्धन ने तृष्णा और सुख को शांत रस का स्थाई भाव कहा है। वैराग्यजनित आध्यात्मिक भाव शांत रस का विषय है संसार की अवस्था मृत्यु-जरा आदि इसके आलंबन हैं। जीवन की अनित्यता का अनुभाव, सत्संग-धार्मिक ग्रंथ पठन-श्रवण आदि उद्दीपन विभाव, और संयम स्वार्थ त्याग सत्संग गृहत्याग स्वाध्याय आत्म चिंतन आदि अनुभाव हैं। शांत रस के संचारी में ग्लानि, घृणा ,हर्ष , स्मृति ,संयोग ,विश्वास, आशा दैन्य आदि की परिगणना की जा सकती है।
उदाहरण:
कल तक था अनुराग पर, उपजा आज विराग।
चीवर पहने चल दिया, भिक्षुक माया त्याग।।
वात्सल्यः
वात्सल्य रस के प्रतिष्ठा विश्वनाथ ने की। सूर, तुलसी आदि के काव्य में वात्सल्य भाव के सुंदर विवेचन पश्चात इसे रस स्वीकार कर लिया गया। वात्सल्य रस का स्थाई भाव वत्सलता है। बच्चों की तोतली बोली, उनकी किलकारियाँ, लीलाएँ उद्दीपन है। माता-पिता का बच्चों पर बलिहारी जाना, आनंदित होना, हँसना, उन्हें आशीष देना आदि इसके अनुभाव कहे जा सकते हैं। आवेग, तीव्रता, जड़ता, रोमांच, स्वेद आदि संचारी भाव हैं।वात्सल्य रस के दो भेद हैं।
१ संयोग वात्सल्य
उदाहरण:
छौने को दिल से लगा, हिरनी चाटे खाल। ‌
पिला रही पय मनाती, चिरजीवी हो लाल।।
२ वियोग वात्सल्य
उदाहरण:
चपल छिपा कह खोज ले, मैया करें प्रतीति।
लाल कंस को मारकर, बना रहा नव रीति।।
भक्तिः
संस्कृत साहित्य में व्यक्ति की सत्ता स्वतंत्र रूप से नहीं है। मध्यकालीन भक्त कवियों की भक्ति भावना देखते हुए इसे स्वतंत्र रस के रूप में व्यंजित किया गया। इस रस का संबंध मानव उच्च नैतिक आध्यात्मिकता से है।इसका स्थाई भाव ईश्वर के प्रति रति या प्रेम है। भगवान के प्रति समर्पण, कथा श्रवण, दया आदि उद्दीपन विभाव है। अनुभाव के रूप में सेवा अर्चना कीर्तन वंदना गुणगान प्रशंसा आदि हैं। अनेक कायिक, वाचिक, स्वेद आदि अनुभाव हैं। संचारी रूप में हर्ष, आशा, गर्व, स्तुति, धैर्य, संतोष आदि अनेक भाव संचरण करते हैं।इसमें आलंबन ईश्वर और आश्रय उस ईश्वर के प्रेम के अनुरूप मन है |
उदाहरण:
चित्र गुप्त है नाथ का, सभी नाथ के चित्र।
हैं अनाथ के नाथ भी, दीन जनों के मित्र।।
***
गीत
चिरैया!
आ, चहचहा
*
द्वार सूना
टेरता है।
राह तोता
हेरता है।
बाज कपटी
ताक नभ से-
डाल फंदा
घेरता है।
सँभलकर चल
लगा पाए,
ना जमाना
कहकहा।
चिरैया!
आ, चहचहा
*
चिरैया
माँ की निशानी
चिरैया
माँ की कहानी
कह रही
बदले समय में
चिरैया
कर निगहबानी
मनो रमा है
मन हमेशा
याद सिरहाने
तहा
चिरैया!
आ चहचहा
*
तौल री पर
हारना मत।
हौसलों को
मारना मत।
मत ठिठकना,
मत बहकना-
ख्वाब अपने
गाड़ना मत।
ज्योत्सना
सँग महमहा
चिरैया!
आ, चहचहा
*
२१-८-२०१९
मुक्तिका
मन
*
सूर्यमुखी बन
झूम-झूम मन
पर्वत सा जड़
हो न व्यर्थ तन
बिजुरी-बादल
सँग हो सावन
सिहर-बिखर लख
पायल-करधन
गा कबीर हो
हर दिन फागुन
है जीवनधन
ही जीवनधन
सुख पा देकर
जोड़ न कंचन
श्वास-श्वास कर
मधुमय मधुवन
४-२-२०२०
***
दोहा,
छंदोंवाले राग ने, छीना मन का चैन।
तन्मय मन उन्मन हुआ, रुद्ध हो गए बैन।।
४.२.२०१८
***
विमर्श - जौहर
संध्या सिंह-
न इतिहास के गौरव से प्रभावित न भविष्य के पतन से आशंकित ...... तटस्थ हो कर आप सबसे एक प्रश्न ;;;कितने लोग बदलती विचारधारा के परिपेक्ष्य में जौहर को आज भी वाजिब कहेंगे ...और महिमामंडित करेंगे .. ...और स्त्री को अस्मिता पर हमले के समय जौहर का सुझाव देंगे ?????
संजीव-
जौहर ऐसा साहस है जो हर कोई नहीं कर सकता. जौहर का सती प्रथा से कोई संबंध नहीं था.
जौहर विधर्मी स्वदेशी सेनाओं की पराजय के बाद शत्रुओं के हाथों में पड़कर बलात्कृत होने से बचने के लिए परजिर सैनिकों कि पत्नियों द्वारा स्वेच्छा से किया जाता था जबकि पति की मृत्यु होने पर पत्नि स्वेच्छा से प्राण त्याग कर सती होती थी. दोनों में कोई समानता नहीं है.
स्मरण हो जौहर अकेली पद्मिनी ने नहीं किया था. एक नारी के सम्मान पर आघात का प्रतिकार १५००० नारियों ने आत्मदाह कर किया जबकि उनके जीवन साथी लड़ते-लड़ते मर गए थे. ऐसा वीरोचित उदाहरण अन्य नहीं है. जब कोई अन्य उपाय शेष न रहे तब मानवीय अस्मिता और आत्म-गरिमा खोकर जीने से बेहतर आत्माहुति होती है. इसमें कोई संदेह नहीं है. ऐसे भी लाखों भारतीय स्त्री-पुरुष हैं जिन्होंने मुग़ल आक्रान्ताओं के सामने घुटने टेक दिए और आज के मुसलमानों को जन्म दिया जो आज भी भारत नहीं मक्का-मदीना को तीर्थ मानते हैं, जन गण मन गाने से परहेज करते हैं. ऐसे प्रसंगों पर इस तरह के प्रश्न जो प्रष्ठभूमि से हटकर हों, आहत करते हैं. एक संवेदनशील विदुषी से यह अपेक्षा नहीं होती. प्रश्न ऐसा हो जो पूर्ण घटना और चरित्रों के साथ न्याय करे.
आज भी यदि ऐसी परिस्थिति बनेगी तो ऐसा ही किया जाना उचित होगा. परिस्थिति विशेष में कोई अन्य मार्ग न रहने पर प्राण को दाँव पर लगाना बलिदान होता है. जौहर करनेवाली रानी पद्मिनी हों, या देश कि आज़ादी के लिए प्राण गँवानेवाले क्रांन्तिकारी या भ्रष्टाचार मिटाने हेतु आमरण अनशन करनेवाले अन्ना सब का कार्य अप्रतिम और अनुकरणीय है.
***
मुक्तक
कल्पना के बिना खेल होता नहीं
शब्द का शब्द से मेल होता यहीं
गिर 'सलिल' पर हुईं बिजलियाँ लुप्त खुद
कलप ना, कलपना व्यर्थ होता कहीं?
*
आ भा कहते, आ भा सुनते, आभा चेहरे की बदल गयी
आभा आई-छाई मुख पर, आभा चेहरे की नवल हुई
आते-आते, भाते-भाते, कल बेकल हो फिर चपल हुई
कलकल किलकिल हो विकल हुई, अविचल होकर हँस मचल गयी
***
मुक्तिका
*
नाजनीं को नमन मुस्कुरा दीजिए
मशविरा है बिजलियाँ गिरा दीजिए
*
चिलमनों के न पीछे से अब वार हो
आँख से आँख बरबस मिला दीजिए
*
कल्पना ही सही, क्या बुरा है अगर
प्रेरणा बन के आगे बढ़ा दीजिए
*
जो खलिश दिल में बाकी रही उम्र भर
ले के बाँहों में मुझको सजा दीजिए
*
कांता के हुए कांत अब तो 'सलिल'
बैठ पलकों पे उनको बिठा दीजिए
***
कुंडलिया
जिस पर बिजली गिर गई, वह तो बैठा शांत
गिरा रहे जो वे हुए, अपने आप अशांत
अपने आप अशांत बढ़ा बैठे ब्लड प्रेशर
करें कल्पना हुए, लाल कश्मीरी केसर
'सलिल' हुआ है मुग्ध, अनूठा रूप देखकर
वही हुआ है दग्ध, गिरी बिजली खुद जिस पर।।
४-२-२०१७
***
गीत:
संग समय के...'
*
*
संग समय के चलती रहती सतत घड़ी.
रहे अखंडित कालचक्र की मौन कड़ी.....
*
छोटी-छोटी खुशियाँ मिलकर जी पायें.
पीर-दर्द सह आँसू हँसकर पी पायें..
सभी युगों में लगी दृगों से रही झड़ी.....
*
अंकुर, पल्लव, कली, फूल, फल, बीज बना.
सीख न पाया झुकना तरुवर रहा तना।
तूफां ने आ शीश झुकाया व्यथा बड़ी.....
*
दूब डूब जाती पानी में- मुस्काती.
जड़ें जमा माटी में, रक्षे हरियाती..
बरगद बब्बा बोले रखना जड़ें गडी.....
*
वृक्ष मौलश्री किसको हेरे एकाकी.
ध्यान लगा खो गया, नगर अब भी बाकी..
'ओ! सो मत', ओशो कहते: 'तज सोच सड़ी'.....
*
शैशव यौवन संग बुढ़ापा टहल रहा.
मचल रही अभिलाषा देखे, बहल रहा..
रुक, झुक, चुक मत, आगे बढ़ ले 'सलिल' छड़ी.....
४-२-२०१३

***