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मंगलवार, 3 नवंबर 2026

अक्टूबर २६, ग़ज़ल, दोहा, मुक्तक, सॉनेट, राम, हाइकु गीत, प्रतीप अलंकार, नैरंतरी छंद

 सलिल सृजन अक्टूबर २६

*
ग़ज़ल ० हम कहाँ से चले थे, कहाँ आ गए? भक्त ही भोग भगवान का खा गए।। . सूर्य सहयोग का क्यों नहीं उग सका? संसदी शांति दल-भेद ही खा गए।। . ज़ुल्म गैरों पे माना मुनासिब मगर लोक पर तंत्र जुल्मो-सितम ढा गए।। . हो न मगरूर सत्ता न रहती सदा सूरमा जो बने, पटखनी खा गए।। . बाप का बाप बेटा कहाता "सलिल" बाप को आग बेटे ही लगवा गए।। . हर पड़ोसी के दुश्मन हमीं क्यों हुए? शेर को स्यार कर शोर धमका गए।। . जो महाशक्तियाँ दोस्त होती नहीं गैर को कह सगा, हम दगा खा गए।। . कोई किसका "सलिल" कब कभी हो सका। राम सीता को जंगल में भिजवा गए।। . हम जहाँ थे वहाँ भी नहीं रह सके दी गँवा सरजमीं, मात भी खा गए।।
००० 
दोहा मुक्तक अरण्य . जन अरण्य है हर शहर, जंगल-जंगल गाँव। धनपिशाच नर शिकारी, चलता पल-पल दाँव।। शांति हिरनिया खोजती, पाती कहीं न ठाँव। आशा गौरैया विवश, मिलती कहीं न छाँव।। . जा अरण्य कोई हुआ, त्रिभुवन का भगवान। जो अरण्य में ही जिया, उसको मिला न मान।। माँग अँगूठा गुरु करें, करनी पर अभिमान। जंगल-जंगल जल उठा, लड़ा गँवा दी जान।। . संसद सघन अरण्य सम, नायक घातक बाज। गौरैयों को नोचते, तनिक न आती लाज।। मात सियारों को मिली, हर नेता लफ्फाज। कुंतल रहा पर अन्य के, भरे न खुद परवाज़।। . शांत-सभ्य हैं शहर से, ज्यादा 'सलिल' अरण्य। सीताएँ पाती रहीँ, शरणागति कारुण्य।। राजा निर्वासित करे, गर्भवती निज नार- वंश-बेल रक्षित करें, जंगल हँस बेदाम।। . छंद पाकर दुष्यंत से, शकुंतलाएँ त्रस्त। हो अरण्य भगवान सम, कहे न होना पस्त।। जन संतानें भरत सी, गिनें शेर के दाँत- मानवता के सूर्य को, मत होने दो अस्त।। . रक्षित रखा अरण्य ने, चौदह वर्ष न भूल। अवधपुरी ने छुड़ाए, तीक्ष्ण विषैले शूल।। सीता को दिलवा दिया, बिना दोष वनवास। मना रही दीपावली, राम भोगते त्रास।। ००० दोहा सलिला अरुण ० तरुण अरुण मिल वरुण से, लिए गरुण को संग। कहें विष्णु से अब नहीं, करिए हमको तंग।। सोते रहते शेष पर, हम पर भार अशेष। चरण चापतीं माँ रमा, करतीँ कृपा विशेष।। तजें नींद अब अरुण के, साथ हुए काक्रोच। माँग मानिए अन्यथा, धरना हो बिन लोच।। उदित न होगा अब अरुण, खुद तपिए कर भोर। काम न आएँ भक्त अब, लाख मचाएँ शोर।। बिना अरुण के सृष्टि से, हट न सकेगी रात। भोर दिवस हो नृत्यरत, काक्रोची बारात।। उठे हड़बड़ा हरि तुरंत, करने मन की बात। कहें अरुण से त्रुटि हुई, लाज बचाएँ तात।। २६.१०.२६ डी , ५०४ रुद्राक्ष फेज २ भोपाल ०००

पूर्णिका
•
दुनिया भले हो हिसाबी
कुदरत नहीं है हिजाबी
बिन पिए ही रहा झूम मैं
मिले नैन जब से गुलाबी
भँवरा रहा गुनगुना बाग में
दुनिया समझती शराबी
काँटों की संगत सुहाए
देखो कली की नवाबी
शबनम सहेली सुहाए
रंगत कई हर शबाबी
पैगाम लाएँ तितलियाँ
लेतीं सँदेशा जवाबी
ताला लगा पाए माली
बनी ही नहीं है वो चाबी
२६.१०.२०२४
•••
सॉनेट
बैठ चाँद पर
•
बैठ चाँद पर धरा देखकर व्रत तोड़ेंगी
कथा कहेंगी सात भाई इक बहिना वाली
कैसे बिगड़ी बात, किस तरह पुनः बना ली
सात जन्म तक पति का पीछा नहिं छोड़ेंगी
शरत्पूर्णिमा पर धारा उल्टी मोड़ेंगी
वसुधा की किरणों में रखें खीर की प्याली
धरा बुआ दिखलाएँ जसोदा धरकर थाली
बाल कृष्ण को बहला-समझा खुश हो लेंगी।
उल्टी गंगा बहे चाँद पर, धरती निरखें
कैसे छू लें धरा? सोच शशि- मानव तरसें
उस कक्षा से इस कक्षा में आकर हरषें
अभियंता-वैज्ञानिक कर नव खोजें परखें
सुमिर सुमिर मंगल-यात्रा को नैना बरसें
रवि की रूप छटाएँ मन को मन आकरषें।
२६.१०.२०२३
•••
अभिनव प्रयोग
राम
हाइकु गीत
(छंद वार्णिक, ५-७-५)
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
बल बनिए
निर्बल का तब ही
मिले प्रणाम।
क्षणभंगुर
भव सागर, कर
थामो हे राम।।
*
सुख तजिए / निर्बल की खातिर / दुःख सहिए।
मत डरिए / विपदा - आपद से / हँस लड़िए।।
सँग रहिए
निषाद, शबरी के
सुबहो-शाम।
क्षणभंगुर
भव सागर, कर
थामो हे राम।।
*
मार ताड़का / खर-दूषण वध / लड़ करिए।
तार अहल्या / उचित नीति पथ / पर चलिए।।
विवश रहे
सुग्रीव-विभीषण
कर लें थाम।
क्षणभंगुर
भव सागर, कर
थामो हे राम।।
*
सिय-हर्ता के / प्राण हरण कर / जग पुजिए।
आस पूर्ण हो / भरत-अवध की / नृप बनिए।।
त्रय माता, चौ
बहिन-बंधु, जन
जिएँ अकाम।
क्षणभंगुर
भव सागर, कर
थामो हे राम।।
२६-१०२०२२
***
अलंकार सलिला: २५
प्रतीप अलंकार
*
अलंकार में जब खींचे, 'सलिल' व्यंग की रेख.
चमत्कार सादृश्य का, लें प्रतीप में देख..
उपमा, अनन्वय तथा संदेह अलंकार की तरह प्रतीप अलंकार में भी सादृश्य का चमत्कार रहता है, अंतर यह है कि उपमा की अपेक्षा इसमें उल्टा रूप दिखाया जाता है। यह व्यंग पर आधारित सादृश्यमूलक अलंकार है। प्रसिद्ध उपमान को उपमेय और उपमेय को उपमान सिद्ध कर चमत्कारपूर्वक उपमेय या उपमान की उत्कृष्टता दिखाये जाने पर प्रतीप अलंकार होता है।जब उपमेय के समक्ष उपमान का तिरस्कार किया जाता है तो प्रतीप अलंकार होता है।
प्रतीप अलंकार के ५ प्रकार हैं।
उदाहरण-
१. प्रथम प्रतीप:
जहाँ प्रसिद्ध उपमान को उपमेय के रूप में वर्णित किया जाता है अर्थात उपमान को उपमेय और उपमेय को उपमान बनाकर।
उदाहरण-
१. यह मयंक तव मुख सम मोहन
२. है दाँतों की झलक मुझको दीखती दाडिमों में.
बिम्बाओं में पर अधर सी राजती लालिमा है.
मैं केलों में जघन युग की देखती मंजुता हूँ.
गुल्फों की सी ललित सुखमा है गुलों में दिखाती
३. वधिक सदृश नेता मुए, निबल गाय सम लोग
कहें छुरी-तरबूज या, शूल-फूल संयोग?
२. द्वितीय प्रतीप:
जहाँ प्रसिद्ध उपमान को अपेक्षाकृत हीन उपमेय कल्पित कर वास्तविक उपमेय का निरादर किया जाता है।
उदाहरण-
१. नृप-प्रताप सम सूर्य है, जस सम सोहत चंद
२. का घूँघट मुख मूँदहु नवला नारि.
चाँद सरग पर सोहत एहि अनुसारि
३. बगुला जैसे भक्त भी, धारे मन में धैर्य
बदला लेना ठनकर, दिखलाते निर्वैर्य
3. तृतीय प्रतीप:
जहाँ प्रसिद्ध उपमान का उपमेय के आगे निरादर होता है।
उदाहरण-
१. काहे करत गुमान मुख?, तुम सम मंजू मयंक
२. मृगियों ने दृग मूँद लिए दृग देख सिया के बांके.
गमन देखि हंसी ने छोडा चलना चाल बनाके.
जातरूप सा रूप देखकर चंपक भी कुम्हलाये.
देख सिया को गर्वीले वनवासी बहुत लजाये.
३. अभिनेत्री के वसन देख निर्वासन साधु शरमाये
हाव-भाव देखें छिप वैश्या, पार न इनसे पाये
४. चतुर्थ प्रतीप:
जहाँ उपमेय की बराबरी में उपमान नहीं तुल/ठहर पाता है, वहाँ चतुर्थ प्रतीप होता है।
उदाहरण-
१. काहे करत गुमान ससि! तव समान मुख-मंजु।
२. बीच-बीच में पुष्प गुंथे किन्तु तो भी बंधहीन
लहराते केश जाल जलद श्याम से क्या कभी?
समता कर सकता है
नील नभ तडित्तारकों चित्र ले?
३. बोली वह पूछा तो तुमने शुभे चाहती हो तुम क्या?
इन दसनों-अधरों के आगे क्या मुक्ता हैं विद्रुम क्या?
४. अफसर करते गर्व क्यों, देश गढ़ें मजदूर?
सात्विक साध्वी से डरे, देवराज की हूर
५. पंचम प्रतीप:
जहाँ उपमान का कार्य करने के लिए उपमेय ही पर्याप्त होता है और उपमान का महत्व और उपयोगिता व्यर्थ हो जाती है, वहाँ पंचम प्रतीप होता है।
उदाहरण-
१. का सरवर तेहि देऊँ मयंकू
२. अमिय झरत चहुँ ओर से, नयन ताप हरि लेत.
राधा जू को बदन अस चन्द्र उदय केहि हेत..
३. छाह करे छितिमंडल में सब ऊपर यों मतिराम भए हैं.
पानिय को सरसावत हैं सिगरे जग के मिटि ताप गए हैं.
भूमि पुरंदर भाऊ के हाथ पयोदन ही के सुकाज ठये हैं.
पंथिन के पथ रोकिबे को घने वारिद वृन्द वृथा उनए हैं.
४. क्यों आया रे दशानन!, शिव सम्मुख ले क्रोध
पाँव अँगूठे से दबा, तब पाया सत-बोध
२८-१०-२०१५
***
नैरंतरी छंद
रात जा रही, उषा आ रही
उषा आ रही, प्रात ला रही
प्रात ला रही, गीत गा रही
गीत गा रही, मीत भा रही
मीत भा रही, जीत पा रही
जीत पा रही, रात आ रही
गुप-चुप डोलो, राज न खोलो
राज न खोलो, सच मत तोलो
सच मत तोलो,मन तुम सो लो
मन तुम सो लो, नव रस घोलो
नव रस घोलो, घर जा सो लो
घर जा सो लो, गुप-चुप डोलो
२६-१०-२०१४
***

गुरुवार, 25 जून 2026

जून २५, दोहा, नयन, सॉनेट, राम, सरस्वती, सवैया, मुक्तक, दोहागीत, ग़ज़लिका

 सलिल सृजन जून २५

*
नयनावली
नयन न मन की सुन रहे, करें नमन दिन-रैन।
नयन नयन से मिल हुए, चैन गँवा बेचैन।।
.
नयन चार जबसे हुए, भूल गए हैं द्वैत।
जब तक नैना चार हैं, तब तक प्रिय अद्वैत।।
.
नय न नयन को याद अब, नयन अनयन एक।
नयन न सुनते क्या कहें, अनुभव बुद्धि विवेक।।
.
नयन देखकर रूप को, कैसे करें बखान।
जिव्हा न देखे रूप को, पर करती गुणगान।।
.
नयन बोलते अबोले, देख न देखें सत्य।
भोगें चुप परिणाम पर, आप न करते कृत्य।।
.
शारद-शक्ति नयन बसें, नयन लक्ष्मी भक्त।
वाक् अवाक निहारती, किसको कहे सशक्त।।
.
नयन डूबकर नयन में, हो जाते भव पार।
जो नैना डूबन डरे, क्या जाने मझधार।।
.
नयन लड़े झुक उठ मिले, करे न युद्ध विराम।
साथ न होकर साथ हो, बन गुलाम बेदाम।।
२६.५.२०२५
***
सॉनेट
नर्तन
*
नर्तन करते खुद को भूल शिव ले डमरू, विषधर झूम,
सलिल करे अभिषेक, पखारे पद प्रलयंकर के हो धन्य,
नाद अनाहद सुनें उमा माँ बाजे घुँघरू, तिक तिक धूम,
गणपति कार्तिक नंदी मूषक सिंह नाचते दृश्य अनन्य।
शारद वीणा सुने पवन नभ धरा दिशा दिगंत जीवंत,
ग्रह-उपग्रह नक्षत्र सितारे, हुए परिक्रमित रचने सृष्टि,
शंख-नाद हरि करें, रमा की वाणी का माधुर्य अनंत,
मंत्र मुग्ध विधि, सकल सिद्धि दे शारद कहे रखो सम दृष्टि।
वादन-गायन करें कान्ह नटवर, नटराज विलोक प्रसन्न,
राग-ताल ठाणे कर जोड़े, राग-रागिनी जन्म सफल,
रसानंद की छंद कहे जय, गोपी-गोप मुग्ध आसन्न,
चित्र गुप्त अनहद अरु अनुपम, ह्रदय विराजित अचल अटल।
नर्तन परिवर्तन का साक्षी, दर्शन करे सुदर्शन का
दूर विकर्षण पल में कर, नैकट्य रचे आकर्षण का।
२५-६-२०२३
***
मुक्तक
निंगा देव मूल भारत के लिंगायत ले परम विराग
प्रकृति-पुरुष को बोल शिवा-शिव सृष्टि वृद्धि हित वरते राग
सिर पर अमृत, कंठ गरल धर, सलिल धार दे प्यास मिटा,
वृषभ कृषक, सिंह वन्यबंधु, मूषक लघु सबका अमर सुहाग
२५-६-२०२३
***
सॉनेट
अखिलेश
•
घटघटवासी औघड़दानी
हे अखिलेश! तुम्हारी जय जय।
विषपायी बाबा शमशानी
करो कृपा जिस पर हो निर्भय।
हे कामारि! कलाविद तुमसा
अन्य न कोई हुआ, न होगा।
शशिधर डमरूधर उमेश हे!
भक्त करें वंदन नित यश गा।
अखिल विश्व के भाग्यनियंता
सकल सृष्टि संप्राणित तुमसे।
लेकिन यह भी तो सच ही है
जगतपूज्य हो प्रभु तुम हमसे।
हें ओंकारनाथ! विपदा हर
हर्षित कर, गाए जन हर हर।
२५-६-२०२२
•••
दोहा सलिला
गीता पढ़कर नित पिता, रहे पढ़ाते पाठ
सदानंद कर्त्तव्य से, मिले करो हंस ठाठ
*
विभा-रश्मि जब साथ हो, तब न तिमिर को भूल
भूमि रेणु से जो जुड़े, वह सरला मति फूल
*
पिता शिवानी पूजते, माँ शंकर की भक्त
भोर दुपहरी रीझती, संध्या थी अनुरक्त
*
करते भजन रमेश का, थे न रमा आधीन
शेख मान शहजाद सम, दें आदर बन दीन
*
राहुल और यशोधरा, साथ रहे बन बुद्ध
थे अनुराग-विराग के मूर्त रूप सन्नद्ध
*
प्रतिमा मन में पिता की, शोभित माँ के साथ
जीव हुआ संजीव तब, धर पग में नत माथ
*
श्वास आस माता पिता, हैं श्रद्धा-विश्वास
इंद्र-इंदिरा ले गए, अब है शेष उजास
२५-६-२०२१
****
विमर्श:
कब हुए थे राम?
•
भारतीय कालगणना के अनुसार सृष्टि निर्मित हुए १ ९६ ०८ ५३ १२१ वर्ष हो चुके हैं। पाश्चात्य वैज्ञानिक गणना कालांश से पीछे भी जाते है। वे काल गणना ईसा के जन्म से मानते रहे जब देखा कि भारत का इतिहास इससे भी पुराना है, तब इन्होंने AD( anno Domini) ईसा के बाद, BC (Before christ)ईसा पूर्व की कल्पना गढ़ी।
आज से ५५५० वर्ष पूर्व द्वापर युग के अंत में महाभारत युद्ध हुआ था।रामायण त्रेतायुग में हुई थी जिसका काल वर्तमान वैवस्वत मन्वंतर की २८ वीं चतुर्युगी के त्रेतायुग का है। वैदिक गणित/विज्ञान के अनुसार सृष्टि १४ मन्वंतर तक चलती है। प्रत्येक मन्वंतर में ७१ चतुर्युग होते हैं। एक चतुर्युग में ४ युग- सत,त्रेता,द्वापर एवं कलियुग होते है। ७ वाँ मन्वंतर वैवस्वत मन्वंतर चल रहा है।
सतयुग १७,२८,००० वर्ष का, त्रेतायुग १२ ९६,००० वर्ष का, द्वापरयुग ८,६४,००० वर्ष एवं कलियुग ४,३२,००० वर्ष का कालखंड है। वर्तमान मे २८ वे चतुर्युग का कलियुग चल रहा है अर्थात् श्रीराम के जन्म होने और हमारे समय के बीच ८,६४,००० वर्ष का द्वापरयुग तथा कलियुग के लगभग ५२०० वर्ष बीत चुके हैं। महान गणितज्ञ एवं ज्योतिष वराहमिहिर जी के अनुसार -
असन्मथासु मुनय: शासति पृथिवी: युधिष्ठिरै नृपतौ:
षड्द्विकपञ्चद्वियुत शककालस्य राज्ञश्च:
युधिष्ठिर के शासनकाल मे सप्तऋषि मघा नक्षत्र में थे। भारतीय ज्योतिष में २७ नक्षत्र होते हैं, सप्तऋषि प्रत्येक नक्षत्र मे १०० वर्ष रहते है`। यह चक्र चलता रहता है। युधिष्ठिर के समय सप्तऋषियों के २७ चक्र, उसके बाद २४, कुल मिलाकर ५१ चक्र अर्थात् ५,१०० वर्ष हो चुके हैं। युधिष्ठिर ने लगभग ३८ वर्ष शासन किया। उसके कुछ समय बाद आरंभ कलियुग के ५१५५ वर्ष बीत चुके हैं।
इस प्रकार कलियुग से द्वापरयुग तक ८,६९,१५५ वर्ष।
श्रीराम का जन्म हुआ था त्रेतायुग के अंत में। इस प्रकार कम से कम ९ लाख वर्ष के आसपास श्रीराम और रामायण का काल आता है।
रामायण सुन्दरकांड सर्ग ५, श्लोक १२ मे महर्षि वाल्मीकि जी लिखते हैं-
वारणैश्चै चतुर्दन्तै श्वैताभ्रनिचयोपमे
भूषितं रूचिद्वारं मन्तैश्च मृगपक्षिभि:||
अर्थात् जब हनुमान जी वन में श्रीराम और लक्ष्मण के पास जाते हैं तब सफेद रंग और ४ दाँतोंवाले हाथी को देखते हैं। ऐसे हाथी के जीवाश्म सन १८७७० मे॔ मिले थे। कार्बन डेटिंग पद्धति से इनकी आयु लगभग १० लाख से ५० लाख के आसपास निकलती है।
वैज्ञानिक भाषा मे इस हाथी को Gomphothere नाम दिया गया। इससे रामायणकालीन घटनाएँ लगभग १० लाख साल के आसपास घटित होने का वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध होता है।
•••
अक्षरस्वामिनी आप इष्ट, ईश्वरी उजालावाही,
ऊपर एकल ऐश्वर्यी ओ!, औसरदाई अंबे।
अ: कर कृपा कविता करवा, छंद सिखा जगदंबे!!
*
सलिल करे अभिषेक धन्य हो, मैया! चरण पखार।
हृदयानंदित बसा मातु छवि, आप पधारें द्वार।।
हंसवाहिनी! स्वर-सरगम दे, कीर्ति-कथा कह पाऊँ।
तार बनूँ वीणा का शारद!, तुम छेड़ो तर जाऊँ।।
निर्मलवसने! मीनाक्षी हे! पद्माननी दयाकर।
ममतामयी! मृदुल अनुकंपा कर सुत को अपनाकर।।
ढाई आखर पोथी पढ़कर भाव साधना साधूँ।
रास-लास आवास हृदय को करें, तुम्हें आराधूँ।।
ध्यान धरूँ नित नयन मूँदकर, रूप अरूप निहारूँ।
सुध-बुध खोकर विश्वमोहिनी अपलक खुद को वारूँ।।
विधि-हरि-हर की कृपा मिले, हर चित्र गुप्त चुप देखूँ।
जो न अन्य को दिखे, वही लख, अक्षर-अक्षर लेखूँ।।
भवसागर तर आ पाए सुत, अहं भूल तव द्वार।
अविचल मति दे मैया मोरी शब्द ब्रह्म-सरकार।।
नमन स्वीकार ले, कृपा कर तार दे।
बिसर अपराध मम, जननि अँकवार ले।।
***
अभिनव प्रयोग-
नवान्वेषित त्रिप्रमाणिका सवैया
*
गणसूत्र - ज र ल ग, ज र ल ग, ज र ल ग।
*
चलो ध्वजा उठा चलें, प्रयाण गीत गा चलें, सभी सुलक्ष्य पा सकें।
कहीं नहीं कमी रहे, विकास की हवा बहे, गरीब सौख्य पा सकें।
नया उगे विहान भी, नया तने वितान भी, न भेद-भाव भा सकें।
उठो! उठो!! न हारना, जहां हमें सुधारना, सुछंद नित्य गा सकें।
***
दोहा सलिला
*
लाक्षणिकता हो प्रबल, सहज व्यंजना साध्य।
गति-यति-लय पच तत्वमय दोहा ही आराध्य।
*
दोहा-सुषमा सहजता, भाषिक सलिल प्रवाह।
पाठक करता वाह हो, श्रोता भरता आह।।
*
भाव बिंब रस भाव दें, दोहा के माधुर्य।
मिथक-प्रतीक सटीक हों, किन हो क्लिष्ट-प्राचुर्य।।
*
२५-६-२०१९
***
विमर्श:
कृष्णा अग्निहोत्री: ९०% पुरुष सामंती धारणा के हैं. आपकी क्या राय है?
*
और स्त्रियाँ? शत प्रतिशत...
विवाह होते ही स्वयं को हरः स्वामिनी मानकर पति के पूरे परिवार को बदलने या बेदखल करने की कोशिश, सफल न होने पर शोषण का आरोप, सम्बन्ध न निभा पाने पर खुद को न सुधार कर शेष सब को दंडित करने की कोशिश. जन्म से मरण तक खुद को पुरुष से मदद पाने का अधिकारी मानेंगी और उसी पर निराधार आरोप भी लगाएँगी. पिता की ममता, भाई का साथ, मित्र का अपनापन, पति का संरक्षण, ससुराल की धन-संपत्ति, बच्चों का लाड़, दामाद का आदर सब स्त्री का प्राप्य है किन्तु यह देनेवाला सामन्ती, शोषक, दुर्जन और न जाने क्या-क्या है. पुरुष प्रधान समाज में एक अकेली स्त्री आकर पति गृह की स्वामिनी हो जाती है जबकि पुरुष अपनी ससुराल में केवल अतिथि ही हो पाता है. यदि स्त्री प्रधान समाज हो तो स्त्री पुरु को जन्म ही न लेने दे या जन्मते ही दफना दे. इसीलिए प्रकृति ने पुरुष का अस्तित्व बचाए रखने के लिए प्राणी जगत में पुरुष को सबल बनाया.
*
डॉ.बिपिन पाण्डेय
बिल्कुल सही कहा आपने सर
7 वर्ष7 वर्ष पहले
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Kanta Roy
मुंह ना खुले तो ही अच्छा है ,नहीं तो यहाँ आप हर दूसरी नारी कृष्णा अग्निहोत्री सी ही पायेंगे, संस्कारों व् अपमान का भय,सामजिक तिरस्कार का भय, घर में वापस कैद कर लिए जाने का भय .........इस भयों के कारण ही परिवार की पसंद पर खरी उतरने वाली आचरण व् रचनाएं लिखने को मजबूर है लेखिकाएं
7 वर्ष7 वर्ष पहले
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एक्टिव
संजीव वर्मा 'सलिल'
नारी अपना तन मन दोनों उघाड़ती जा रही है. पुरुष यह नहीं कर रहा इसे उसकी कमजोरी नहीं माना जाए. एक चका पंचर होने पर भी गाडी घसिटती है, दोनों पंचर हुए तो भगवान ही मालिक है.
7 वर्ष7 वर्ष पहले
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3
एक्टिव
संजीव वर्मा 'सलिल' ने जवाब दिया
·
12 जवाब
डॉ. रजनी कांत पांडेय
मै सलिल जी से पूर्णत: सहमत हूँ । तरह-तरह के अपराध का ठीकरा पुरुषो पर फोडने वाली स्त्री बिना पुरुष के चल भी नही पाती है । पुरुष बिना किसी शिकायत के कोल्हू के बैल जैसा दिन-रात चलता रहता है । अपनी खुशियाँ अपनी पत्नी तथा बच्चों के लिए बरबाद कर देता है फिर भी उसका कही नाम नही होता । मेरा मानना है कि स्त्री विमर्श के नाम पर केवल पुरुष को ही दोषी ठहराना उचित नही है ।आज के आधुनिक युग मे पुरुषों से किसी माने मे स्त्रियाँ कम नही है ।
7 वर्ष7 वर्ष पहले
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2
Kanta Roy
आन्हाक उपस्थिति से मोन प्रसन्न भेल
7 वर्ष7 वर्ष पहले
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एडिट किया
2
Kanta Roy
ई जे हमर ज्येष्ठ छथिन संजीव जी, झगड़ा करैत रहैत छैथ हमेशा लेकिन स्नेह सय ओत प्रोत सेहो रहैत छैथ
7 वर्ष7 वर्ष पहले
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2
डॉ. रजनी कांत पांडेय
तुमने कसम खायी, दिल से मुझे मिटाने की ।
तो जिद मेरी भी है, दिल से नही जाने की ।
© डा. रजनी कान्त पान्डेय
7 वर्ष7 वर्ष पहले
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2
डॉ. रजनी कांत पांडेय
7 वर्ष7 वर्ष पहले
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2
Kanta Roy
7 वर्ष7 वर्ष पहले
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संजीव वर्मा 'सलिल' के तौर पर कमेंट करें
Kiran Shrivastava
Bilkul sahi kaha he.
7 वर्ष7 वर्ष पहले
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Harihar Jha
कहा जाता था दहेज प्रथा से स्त्रियों को सताया जा रहा है। जैसे ही 498A का लाभ स्त्रियों के पक्ष में मिला, बहू ने पति और सास-ससुर पर मुकदमें ठोकने शुरू कर दिये। तो फिर इसका ठीकरा पुरूषों पर मढ़ना कहाँ तक उचित है?
7 वर्ष7 वर्ष पहले
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एक्टिव
संजीव वर्मा 'सलिल'
अब तो लड़के डर के कारण विवाह ही नहीं करना चाहते. लड़कियाँ सास ससुर नहीं चाहती सो लिव इन में जीवन नष्ट कर रही हैं.
7 वर्ष7 वर्ष पहले
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अरुण शर्मा
पूर्णतः सहमत सर जी।
7 वर्ष7 वर्ष पहले
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एक्टिव
डॉ. ब्रह्मजीत गौतम
अच्छी व्याख्या है !
7 वर्ष7 वर्ष पहले
बहुत पसंद
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एक्टिव
संजीव वर्मा 'सलिल'
कृष्णा जी ने पुरुष को लांछित नहीं महिमा-मंडित किया है. तभी वे राजेन्द्र जी की प्रशस्ति करती हैं. एकांगी सोच पुरुष-प्रशंसा के अंशों की अनदेखी कर पुरुष-निंदा के अंश को शीर्षक और नारे बना कर उछलती रहती है जिसका उद्देश्य सस्ती लोकप्रियता और सनसनी मात्र है. सुधरने की आवश्यकता पुरुष और स्त्री दोनों में उपस्थित रुग्ण मानसिकता को है. स्त्री और पुरुष दोनों में उपस्थित विवेक, सामर्थ्य और प्रयास को दिशा चाहिए. सुधरना दोनों को है. प्रकृति, परिवेश, परिस्थितियों के अनुरूप खुद को ढलते हुए सामंजस्य बैठाने की सामर्थ्य चुकने पर अन्यों को आरोपित कर खुद को दोषमुक्त समझना सरल तो है सत्य नहीं.
7 वर्ष7 वर्ष पहले
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दर्शन बेजा़र
सभी विद्वानों के अलग अलग अनुभव अलग अलग टिप्पणियां जो स्वाभाविक भी है
6 वर्ष6 वर्ष पहले
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Pushpa Saxena
स्त्री पुरुष दोनो एक दूसरे के पूरक हैं ।केवल एक के ही बल पर परिवार की रचना नही होती ।आपसी सामंजस्य स्नेह त्याग धैर्य संस्कार अच्छी सोच ही आदर्श परिवार व समाज गठित होता है ।एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप निराधार हैं ।कुंठित सोच है ।हमें उदार द्दष्टिकोण अपनाना चाहिए
***
रचना-प्रति रचना
राकेश खण्डेलवाल-आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
दिन सप्ताह महीने बीते
घिरे हुए प्रश्नों में जीते
अपने बिम्बों में अब खुद मैं
प्रश्न चिन्ह जैसा दिखता हूँ
अब मैं गीत नहीं लिखता हूँ
भावों की छलके गागरिया, पर न भरे शब्दों की आँजुर
होता नहीं अधर छूने को सरगम का कोई सुर आतुर
छन्दों की डोली पर आकर बैठ न पाये दुल्हन भाषा
बिलख बिलख कर रह जाती है सपनो की संजीवित आशा
टूटी परवाज़ें संगवा कर
पंखों के अबशेष उठाकर
नील गगन की पगडंडी को
सूनी नजरों से तकता हूँ
अब मैं गीत नहीं लिखता हूँ
पीड़ा आकर पंथ पुकारे, जागे नहीं लेखनी सोई
खंडित अभिलाषा कह देती होता वही राम रचि सोई
मंत्रबद्ध संकल्प, शरों से बिंधे शायिका पर बिखरे हैं
नागफ़नी से संबंधों के विषधर तन मन को जकड़े हैं
बुझी हुई हाथों में तीली
और पास की समिधा गीली
उठते हुए धुंए को पीता
मैं अन्दर अन्दर रिसता हूँ
अब मैं गीत नहीं लिखता हूँ
धरना देती रहीं बहारें दरवाजे की चौखट थामे
अंगनाई में वनपुष्पों की गंध सांस का दामन थामे
हर आशीष मिला, तकता है एक अपेक्षा ले नयनों में
ढूँढ़ा करता है हर लम्हा छुपे हुए उत्तर प्रश्नों में
पन्ने बिखरा रहीं हवायें
हुईं खोखली सभी दुआयें
तिनके जैसा, उंगली थामे
बही धार में मैं तिरता हूँ
अब मैं गीत नहीं लिखता हूँ
मानस में असमंजस बढ़ता, चित्र सभी हैं धुंधले धुंधले
हीरकनी की परछाईं लेकर शीशे के टुकड़े निकले
जिस पद रज को मेंहदी करके कर ली थी रंगीन हथेली
निमिष मात्र न पलकें गीली करने आई याद अकेली
परिवेशों से कटा हुआ सा
समीकरण से घटा हुआ सा
जिस पथ की मंज़िल न कोई
अब मैं उस पथ पर मिलता हूँ
अब मैं गीत नहीं लिखता हूँ
भावुकता की आहुतियां दे विश्वासों के दावानल में
धूप उगा करती है सायों के अब लहराते आँचल में
अर्थहीन हो गये दुपहरी, सन्ध्या और चाँदनी रातें
पड़ती नहीं सुनाई होतीं जो अब दिल से दिल की बातें
कभी पुकारा पनिहारी ने
कभी संभाला मनिहारी ने
चूड़ी के टुकडों जैसा मैं
पानी के भावों बिकता हूँ
अब मैं गीत नहीं लिखता हूँ
मन के बंधन कहाँ गीत के शब्दों में हैं बँधने पाये
व्यक्त कहां होती अनुभूति चाहे कोई कितना गाये
डाले हुए स्वयं को भ्रम में कब तक देता रहूँ दिलासा
नीड़ बना, बैठा पनघट पर, लेकिन मन प्यासा का प्यासा
बिखराये कर तिनके तिनके
भावों की माला के मनके
सीपी शंख बिन चुके जिससे
मैं तट की अब वह सिकता हूँ
अब मैं गीत नहीं लिखता हूँ
***
आदरणीय राकेश जी को सादर समर्पित -
बहुत बधाई तुमको भैया!
अब तुम गीत नहीं लिखते हो
जैसे हो तुम मन के अंदर
वैसे ही बाहर दिखते हो
बहुत बधाई तुमको भैया!
*
अब न रहा कंकर में शंकर, कण-कण में भगवान् कहाँ है?
कनककशिपु तो पग-पग पर हैं, पर प्रहलाद न कहीं यहाँ है
शील सती का भंग करें हरि, तो कैसे भगवान हम कहें?
नहीं जलंधर-हरि में अंतर, जन-निंदा में क्यों न वे दहें?
वर देते हैं शिव असुरों को
अभय दान फिर करें सुरों को
आप भवानी-भंग संग रम
प्रेरित करते नारि-नरों को
महाकाल दें दण्ड भयंकर
दया न करते किंचित दैया!
बहुत बधाई तुमको भैया!
अब तुम गीत नहीं लिखते हो
*
जन-हित राजकुमार भेजकर, सत्तासीन न करते हैं अब
कौन अहल्या को उद्धारे?, बना निर्भया हँसते हैं सब
नाक आसुरी काट न पाते, लिया कमीशन शीश झुकाते
कमजोरों को मार रहे हैं, उठा गले से अब न लगाते
हर दफ्तर में, हर कुर्सी पर
सोता कुम्भकर्ण जब जागे
थाना हो या हो न्यायालय
सदा भुखमरा रिश्वत माँगे
भोग करें, ले आड़ योग की
पेड़ काटकर छीनें छैंया
बहुत बधाई तुमको भैया!
अब तुम गीत नहीं लिखते हो
*
जब तक था वह गगनबिहारी, जग ने हँस आरती उतारी
छलिये को नटनागर कहकर, ठगी गयी निष्ठा बेचारी
मटकी फोड़ी, माखन खाया, रास रचाई, नाच नचाया
चला गया रणछोड़ मोड़ मुख, युगों बाद सन्देश पठाया
कहता प्रेम-पंथ को तज कर
ज्ञान-मार्ग पर चलना बेहतर
कौन कहे पोंगा पंडित से
नहीं महल, हमने चाहा घर
रहें द्वारका में महारानी
हमें चाहिए बाबा-मैया
बहुत बधाई तुमको भैया!
अब तुम गीत नहीं लिखते हो
*
असत पुज रहा देवालय में, अब न सत्य में है नारायण
नेह नर्मदा मलिन हो रही, राग-द्वेष का कर पारायण
लीलावती-कलावतियों को 'लिव इन' रहना अब मन भाया
कोई बाँह में, कोई चाह में, खुद को ठगती खुद ही माया
कोकशास्त्र केजी में पढ़ती,
नव पीढ़ी के मूल्य नये हैं
खोटे सिक्कों का कब्ज़ा है
खरे हारकर दूर हुए हैं
वैतरणी करने चुनाव की
पार, हुई है साधन गैया
बहुत बधाई तुमको भैया!
अब तुम गीत नहीं लिखते हो
*
दाँत शेर के कौन गिनेगा?, देश शत्रु से कौन लड़ेगा?
बोधि वृक्ष ले राजकुँवरि को, भेज त्याग-तप मौन वरेगा?
जौहर करना सर न झुकाना, तृण-तिनकों की रोटी खाना
जीत शौर्य से राज्य आप ही, गुरु चरणों में विहँस चढ़ाना
जान जाए पर नीति न छोड़ें
धर्म-मार्ग से कदम न मोड़ें
महिषासुरमर्दिनी देश-हित
अरि-सत्ता कर नष्ट, न छोड़ें
सात जन्म के सम्बन्धों में
रोज न बदलें सजनी-सैंया
बहुत बधाई तुमको भैया!
अब तुम गीत नहीं लिखते हो
*
युद्ध-अपराधी कहा उसे जिसने, सर्वाधिक त्याग किया है
जननायक ने ही जनता की, पीठ में छुरा भोंक दिया है
सत्ता हित सिद्धांत बेचते, जन-हित की करते नीलामी
जिसमें जितनी अधिक खोट है, वह नेता है उतना दामी
साथ रहे सम्पूर्ण क्रांति में
जो वे स्वार्थ साध टकराते
भूले, बंदर रोटी खाता
बिल्ले लड़ते ही रह जाते
डुबा रहे मल्लाह धार में
ले जाकर अपनी ही नैया
बहुत बधाई तुमको भैया!
अब तुम गीत नहीं लिखते हो
*
कहा गरीबी दूर करेंगे, लेकिन अपनी भरी तिजोरी
धन विदेश में जमा कर दिया, सब नेता हो गए टपोरी
पति पत्नी बच्चों को कुर्सी, बैठा देश लूटते सब मिल
वादों को जुमला कह देते, पद-मद में रहते हैं गाफिल
बिन साहित्य कहें भाषा को
नेता-अफसर उद्धारेंगे
मात-पिता का जीना दूभर
कर जैसे बेटे तारेंगे
पर्व त्याग वैलेंटाइन पर
लुक-छिप चिपकें हाई-हैया
बहुत बधाई तुमको भैया!
अब तुम गीत नहीं लिखते हो
२५-६-२०१६
***
विमर्श :
हिन्दू - मुसलमान और शिक्षा - विज्ञान
गत १५० वर्ष में हुई प्रगति में पश्चिमी देशों अर्थात यहूदी और ईसाइयों की भागीदारी बहुत अधिक है, हिन्दुओं और मुस्लिमों की अपरक्षकृत बहुत कम। इस काल खंड में हिंदू और मुसलमान सत्ता और धर्म के लिए लड़ते-मरते रहे।
इस समय में हुए १०० महान वैज्ञानिकों के नाम लिखें तो हिन्दू और मुसलमान नाम मात्र को ही मिलेंगे।
दुनिया में ६१ इस्लामी देशों की जनसंख्या लगभग १.७५ अरब और उनमें विश्वविद्यालय लगभग ४५० हैं जबकि हिन्दुओं की जनसंख्या लगभग १.५० अरब और विश्वविद्यालय लगभग ४९० हैं। अमेरिका में ३००० से अधिक और जापान में ९०० से अधिक विश्वविद्यालय हैं।
लगभग ४५ % ईसाई युवक तथा ७५ % यहूदी युवक, २०% हिन्दू युवक तथा ३% मुस्लिम युवक उच्च शिक्षा लेते हैं।
दुनिया के २०० प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में से ५४ अमेरिका, २४इंग्लेंड, १७ ऑस्ट्रेलिया, १० चीन, १० जापान, १० हॉलॅंड, ९ फ़्राँस, 8 जर्मनी, २ भारत और १ इस्लामी मुल्क में हैं।
अमेरिका का जी.डी.पी १५ ट्रिलियन डॉलर से अधिक है जबकि पूरे इस्लामिक जगत का कुल जी.डी.पी लगभग ३.५ ट्रिलियन डॉलर है और भारत का लगभग१.९ ट्रिलियन डॉलर है।
दुनिया में ३८००० मल्टिनॅशनल कम्पनियाँ हैं जिनमें से ३२००० कम्पनियाँ अमेरिका और युरोप में हैं।
दुनिया के १०,००० बड़े अविष्कारों में से ६१०३ अमेरिका में और ८४१० ईसाइयों या यहूदियों ने किये हैं।
दुनिया के ५० अमीरो में से २० अमेरिका, ५ इंग्लेंड, ३ चीन, २ मक्सिको, ३ भारत और १ अरब मुल्क से हैं।
हम हिन्दू और मुसलमान जनहित, परोपकार या समाज सेवा मे भी ईसाईयों और यहूदियों से पीछे हैं। रेडक्रॉस दुनिया का सब से बड़ा मानवीय संगठन है।
बिल गेट्स ने १० बिलियन डॉलर से बिल- मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन की बुनियाद रखी जो कि पूरे विश्व के ८ करोड़ बच्चों की सेहत का ख्याल रखती है।
जबकि हम जानते है कि भारत में कई अरबपति हैं। मुकेश अंबानी अपना घर बनाने में ४००० करोड़ खर्च कर सकते हैं और अरब का अमीर शहज़ादा अपने स्पेशल जहाज पर ५०० मिलियन डॉलर खर्च कर सकते हैं। मगर मानवीय सहायता के लिये दोनों ही आगे नहीं आते।
ओलंपिक खेलों में अमेरिका ही सब से अधिक गोल्ड जीतता है। रूस, चीन, जापान, आदि कई देशों के बाद भारत का नाम अत है और मुस्लिम देश तो लगभग अंत में ही होते हैं। हम अतीत पर थोथा गर्व करते हैं किन्तु व्यवहार से वास्तव में व्यक्तिवादी और स्वार्थी हैं। आपस में लड़ने पर अधिक विश्वास रखते हैं। मानसिक रूप में हम हीनताग्रस्त और विदेशों खासकर पश्चिमी देशों की नकल कर गर्व अनुभव करते हैं। धर्म के नाम पर आपस में लड़ने में हम सबसे आगे हैं।
जरा सोचिये कि हमें किस तरफ अधिक ध्यान देने की जरूरत है, आपस में लड़ने या एक होकर देश और खुद को आगे बढ़ाने की? एक-दूसरे के धर्मस्थान तोड़े की या कल-कारखाने खड़े करने की। स्वर्ग और जन्नत के काल्पनिक स्वप्न देखने की या इस धरती और अपने जीवन को अधिक सुखमय बनाने की?
***
मुक्तक: दीप्ति
*
दीप्ति दुनिया की बढ़े नित, देव! यह वरदान देना,
जब कभी तूफां पठाओ, सिखा देना नाव खेना।
नहीं मोहन भोग की है चाह- लेकिन तृप्ति देना-
उदर अपना भर सकूँ, मेहमान भी पायें चबेना।।
*
दीप्ति निश-दिन हो अधिक से अधिक व्यापक,
लगें बौने हैं सभी दुनिया के मापक।
काव्यधारा रहे बहती, सत्य कहती -
दूर दुर्वासा सरीखे रहें शापक।।
*
दीप्ति चेहरे पर रहे नित नव सृजन की,
छंद में छवि देख पायें सब स्वजन की।
ह्रदय का हो हार हिंदी विश्व वाणी-
पत्रिका प्रेषित चरण में प्रभु! नमन की।।
*
दीप्ति आगत भोर का सन्देश देती,
दीप्ति दिनकर को बढ़ो आदेश देती।
दीप्ति संध्या से कहे दिन को नमन कर-
दीप्ति रजनी को सुला बांहों में लेती।।
*
दीप्ति सपनों से सतत दुनिया सजाती,
दीप्ति पाने ज़िंदगी दीपक जलाती।
दीप्ति पाले मोह किंचित कब किसी से-
दीप्ति भटके पगों को राहें दिखाती।।
*
दीप्ति की पाई विरासत धन्य भारत,
दीप्ति कर बदलाव दे, कर-कर बगावत।
दीप्ति बाँटें स्नेह सबको अथक निश-दिन-
दीप्ति से हो तम पराजित कर अदावत।।
*
दीप्ति की गाथा प्रयासों की कहानी,
दीप्ति से मैत्री नहीं होती जुबानी।।
दीप्ति कब मुहताज होती है समय की =-
दीप्ति का स्पर्श पा खिलती जवानी।।
२५.६.२०१३
***
दोहागीत :
मनुआ बेपरवाह.....
*
मन हुलसित पुलकित बदन, छूले नभ है चाह.
झूले पर पेंगें भरे, मनुआ बेपरवाह.....
*
ठेंगे पर दुनिया सकल,
जो कहना है- बोल.
अपने मन की गाँठ हर,
पंछी बनकर खोल..
गगन नाप ले पवन संग
सपनों में पर तोल.
कमसिन है लेकिन नहीं
संकल्पों में झोल.
आह भरे जग देखकर, या करता हो वाह.
झूले पर पेंगें भरे, मनुआ बेपरवाह.....
*
मौन करे कोशिश सदा,
कभी न पीटे ढोल.
जैसा है वैसा दिखे,
चाहे कोई न खोल..
बात कर रहा है खरी,
ज्ञात शब्द का मोल.
'सलिल'-धर में मीन बन,
चंचल करे किलोल.
कोमल मत समझो इसे, हँस सह ले हर दाह.
झूले पर पेंगें भरे, मनुआ बेपरवाह.....
२५.६.२०११
***
ग़ज़लिका :
लिखी तकदीर रब ने...
*
लिखी तकदीर रब ने फिर भी हम तदबीर करते हैं.
फलक उसने बनाया है, मगर हम रंग भरते हैं..
न हमको मौत का डर है, न जीने की तनिक चिंता-
न लाते हैं, न ले जाते मगर धन जोड़ मरते हैं..
कमाते हैं करोड़ों पाप कर, खैरात देते दस.
लगाकर भोग तुझको खुद ही खाते और तरते हैं..
कहें नेता- 'करें क्यों पुत्र अपने काम सेना में?
फसल घोटालों-घपलों की उगाते और चरते हैं..
न साधन थे तो फिरते थे बिना कपड़ों के आदम पर-
बहुत साधन मिले तो भी कहो क्यों न्यूड फिरते हैं..
न जीवन को जिया आँखें मिलाकर, सिर झुकाए क्यों?
समय जब आख़िरी आया तो खुद से खुद ही डरते हैं..
'सलिल' ने ज़िंदगी जी है, सदा जिंदादिली से ही.
मिले चट्टान तो थमते, नहीं सूराख करते हैं..
२५-६-२०१०
***

बुधवार, 22 अप्रैल 2026

बुंदेली लो क गी तों में रा म डॉ रमा आर्य

 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 बुंदेली लो क गी तों में रा म डॉ रमा आर्य 1 शो धपत्र सा रां शरां - भा रत का हृदय स्थल बुंदेलखंड जहां कई संस्कृति यों आकर मि लती हैं या कहें कि संस्कृति जहां से शुरू हो कर संपूर्ण भा रत में फैलती है वह स्था न है बुंदेलखंड यहां की संस्कृति यहां कल लो क सा हि त्य यहां का सां स्कृसां स्कृति क वैभव सरलता से कि सी का भी मन अपनी और आकर्षि त कर ही लेता है यह कहना भी अति शयो क्ति नहीं हो गा कि बुंदेलखंड का लो क सा हि त्य संपूर्ण भा रत में अत्यधि क समृद्ध है । कि सी भी समा ज का प्रति बिं ब हम वहां की लो क संस्कृति में व्या प्तम लो कगी तों के मा ध्यम से समझ सकते हैं । लो कगी तों में लो क संस्कृति अपनेमूल स्वरूप में चि त्रि त हो ती है या कहीं लो क जी वन का सी धा सा धा परि चय लो कगी तों के मा ध्यम से मि ल जा ता है यह लो कगी त व्यक्ति की भा वनाओं आस्था वि चा र दर्शन जी वन शैली सब कुछ व्यक्त कर देते हैं । बुंदेलखंड की लो क आस्था का एक मजबूत आधा र है भगवा न श्री रा म । इस भक्ति सा गर केंद्र ओरछा है जि सके आसपा स रा म भक्ति सा गर के लो कगी तों में हेलोहे लोरे ले रहा है यहां के जन-जन के रगों में श्री रा म बसा करते हैं दूर- दूर से लो ग ओरछा आते हैं रा त भर अपने लो कगी तों के मा ध्यम से रा म जी को ले जा ते हैं और सुबह प्रा त बेरछा जी (नदी )में स्ना न कर रा म जी के दर्शन कर पुख़्य(पुष्य) नक्षत्र को केंद्र मा न कर अपना जी वन सुखद बना लेते हैं । यहां के लो कगी तों में रा म वि भि न्न रूपों में दर्शनीय है । मुख्य शब्द - बुंदेली लो कगी त, संस्कृति , सभ्यता , परंपरा , श्री रा म, लो कजी वन, लो क मा न्यता एँ, व्यवहा र एवं आचा र । प्रस्ता वना - बुंदेलखंड ऐति हा सि क, सा हि त्य, सां स्कृति क दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है बुंदेलखंड में सुवि धा ओं में भी एकता देखनेको सहज ही प्रा प्त हो ती है । बुंदेलखंड की लो क संस्कृति सभी लो क संस्कृति यों से समृद्ध प्रती त हो ती है । यहां का लो क सा हि त्य इतना समृद्ध है कि भा रत के 1 सहा यक प्रा ध्या पक (हि न्दी ), श्री पी तां बतां रा पी ठ संस्कृत महा वि द्या लय, दति या (मध्य प्रदेश) । Page 42 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 अन्यत्र कि सी क्षेत्र का सा हि त्य इतना समृद्ध और प्रसि द्ध नहीं हुआ । यहां लो कगी त , लो क कथा , लो क गा था , पहेलिहेलियां इत्या दि अत्यंत सहजता से देखनेको मि लती हैं । लो क जी वन के सुख-दुखदु उल्लास हर्ष वि षा द संघर्ष को अभि व्यक्त करनेके लि ए लो कगी त सर्वश्रेष्ठ मा ध्यम प्रती त हो ते हैं । यह लो कगी त जनजी वन में इतना रच बस गए हैं की यह सा मा न्य जी वन का अभि न्न हि स्सा बन चुके हैं । इन लो कगी तों के द्वा रा ही बुंदेली संस्कृति को समझा जा सकता है यह भी कह सकते हैं कि इन लो कगी तों के दर्पण से संस्कृति का प्रति बिं ब देखा जा सकता है । असल में लो क संस्कृति ही लो कगी तों की कहा नी है और इन कहा नि यों में जनसा मा न्य का जी वन मा नसि क उद्वेग, वि चा र, अभि व्यक्ति , व्यंजना, संस्का र, संस्कृति सब कुछ सूक्ष्मता से समा हि त हैं । यह लो कगी त संक्षि प्त सरल स्पष्ट स्वभा व एक सुंदर संगी त में हो ते हैं । बुंदेलखंड में प्रचलि त लो कगी त बुंदेली जि नके संस्का र, आचा र-वि चा र, उत्सव, अध्या त्मि क, दर्शन इत्या दि का तो परि चय देते हैं सा थ ही इन के मा ध्यम से सा मा जि क जी वन शैली का भी सा क्षा त्का र हो ता है । इन लो कगी तों का स्वस्थ भा व प्रवणता ला लि त्य दर्शनीय है । बुंदेलखंड का केंद्र झां सीझां सी से 17 कि लो मी टर दूर ओरछा मध्य प्रदेश के नि मा ड़ी जि ले में आता है । यहां प्रभु श्री रा म रा जा के रूप में वि रा जमा न हैं । प्रभु श्री रा म की भक्ति यहां के लो गों की रगों में बसी हुई है ।दूर-दूर से लो ग पुख्य नक्षत्र पर (ज्यो ति षी य गणना में पड़नेवा ला एक वि शेष नक्षत्र) यहां आते हैं अपनेरा जा रा म की प्रां गप्रां ण में पूरी रा त गी तों के मा ध्यम से अपनी भा वनाओं को व्यक्त कर अपनी धा र्मि क आस्था ओं की पूर्ति करते हैं । उनका प्रया स रहता है कि श्री रा म कि सी प्रकार एक नजर उन पर डा ल दें । यहां रा म जी लो कगी तों में उसी प्रकार समा हि त हैं जैसे ब्रज में श्री कृष्ण । रा म यहां वि भि न्न रूपों में व्या प्त है । बुंदेलखंड वह स्था न है जहां श्री रा म अपनेभक्तों की भा वना से वि भो र हो कर अवध से ओरछा पधा रे । कहा जा ता है कि ओरछा की महा रा नी कुंवर गणेशी श्री रा म के अनन्य भक्त थीं और उन्हीं की भक्ति व प्रेम पर री झ कर या कहें अपनेइस भक्त के हट से वि वश हो कर श्री रा म को ओरछा धा म आना पड़ा । भगवा न श्री रा म रा नी कुंवर गणेशी जी के नि वा स महल ओरछा में वि रा जमा न हुए और इस तरह बुंदेलखंड के क्षेत्र में श्री रा म रा जा के रूप में यहां वि रा जमा न हुए एक लो कगी त के अनुसा ररा जा मधुकर शा ह की रा नी कुंवर गणेश । अवधपुरी से ओरछा ला ई अवध नरेश ।। आज भी यहां की धरती से रा म जी के जन्म उत्सव पर उठनेवा ली बधा इयां हर घर में गा ई जा ती हैं क्यों किक्योंकि जब घर में बा लक हो ता है तो वह यहां रा मजी का स्वरूप ही हो ता है और मा ता एं गां वगां उठते हैं - कोसल्ला ले लो बधा ई अवध में लल्ला भये हि ल मि ल गा दो बधा ई अवध में लल्ला भये….. Page 43 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 एक भक्तों के द्वा रा श्री रा म के प्रां गप्रां ण में लो गों से आवा हन कि या जा रहा है कि वे रा मचंद्र से या री करनेएक लो कगी त का आनंदमयी अंदा ज रा मचंद्र से या री कर लो रा मचंद्र से या री जि नेभजे नर नारी कर लो रा मचंद्र से या री ….. झूठे बेर शबरी के खा ए रस्ता ता कि बेचा री ….. कर लो रा मचंद्र से या री …. रा मचंद्र से या री …….. तुलसी दा स भजो रे भगवा न तो आ गई वि पदा टा री … कर लो रा मचंद्र से या री ….. ईश्वर की कृपा से महा रा ज दशरथ को एक सा थ चा र पुत्रों की प्रा प्ति हुई । रा जपरि वा र सहि त पूरी अयो ध्या हर्षा ति रेक में डूबी हुई हैं । तो उसनेउत्तर दि या खवा सन ( नाइन ) बंदनवा र ले जा रही हैं । लो गों नेजि ज्ञा सा वश पूछा - जो बंदनवा रों कहां लयें जा ती , जो बंदनवा रों …रों … । नगर अयो ध्या में सुत भये सजनी , रा जा मही पतके नाती । रा जा दशरथ के पुत्रा भये हैं रघुकूल जो त उजया र दई बा ती । उजया र दई बा ती , उजया र दई बा ती । जो बंदनवा रों ... .. रा नी कौशल्या की कूँख जुड़ा नी " सब सखि यन की शी तल भई छा ती । नगर अयो ध्या में दा न भयें हैं लै लै दा न मगन भई सखि याँ । मगन भई सखि याँ , मगन भई सखि याँ जो बंदनबा रों कहाँ लये जा ती । दा ई नारा छी ननेके पूर्व नेग माँ गमाँ ती हैं । कोई हा र दे रही है, है कोई ति लरी और कोई मो ति यों का था र । परंतु वह तो प्रभु शि शु का दर्शन करना चा हती हैं । यहाँ के लो कगी तों मधुरता का ऐसा समरस चि त्र अंकि त हुआ है जि ससे समझ आता है कि यहां की संस्कृति कि तनी समृद्धि और मधुर है । एक अन्य गी त के द्वा रा रा नी मैत्रेयी के द्वा रा दशरथ जी से दो वरदा न मां गनेकी पूरी कथा वर्णि त है । रा जा दशरथ अपनी रा नी को मनानेकी पूरी कोशि श कर रहे हैं पर रा नी मैत्रेयी कि जि द हैं कि रा म को वनवा स पर भेजना है । रा जा दशरथ भरत को रा जगद्दी देनेके लि ए तैया र हैं किं तु मैत्रेयी के द्वा रा रा म को वनवा स देनेकी नहीं किं तु मैत्रेयी अपनी मनमा नी कर रही है और वह नहीं मा न रही - Page 44 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 रा जा तो पौ ढ़े पलंग पै रा नी मलें पी ड़ौ ली ' महा रा ज । हँस - हँस पूछे रा जा दशरथ कैसी धन- अनमनी महा रा ज । भौ तक ' तो कहि ये रा जा अन्न धन भौ तक लक्ष्मी महा रा ज । सूनो अयो ध्या को रा ज अकेली संचत बि ना महा रा ज । तुम रा जा जइयो बा जा रै ' संचत भो ल ल्या इयों महा रा ज । तुम रा नी मूरख अजा न कहाँ लौं समझा इयें महा रा ज । हा टों में हति यां बि कायें संचत नहीं पा इयों महा रा ज । नगर को नौवा ' बुला ओं छुरा मँगा इयों महा रा ज । ची रौ अभा गि न को कूँख रा जा गँवा रि न कहै महा रा ज । काशी के पंडि त बुलवा इयों वेद बचवा इयों महा रा ज । रा जा जनम के गो गि या ग्या वन ' हि रनी मा रि यों महा रा ज । सो नेकी हि रनी गढुवा य रूपे के गबैलुवा " महा रा ज । बन बन देव छुड़ा य संचत तब हुइयें महा रा ज । तुम रा जा जइयों पहा रैं सजी वन ल्या इयों महा रा ज । घि स लुड़ि या " बँटवा इयों कटोरन छा नि यों महा रा ज । पि यो हैं बाँ टबाँ - बडा र ती नई रा नी अधन 2 से महा रा ज भये हैं नों दस मा स ललन चा र हो गये महा रा ज । बा जन लगी आनन्द बधैया सखी गा वें सो हरें महा रा ज । गौ वा के गो बर मँगइयों अंगन लि पवा इयों महा रा ज । गजमो ति न के चौ क पुरा कलश धरवा इयों महा रा ज । काशी के पंडि त बुला वेद पढ़ वइयों महा रा ज । बा रा " बरस के हुइयें रा म तब वन खाँ जइये महा रा ज । इतनी तो सुन रा जा दशरथ अटा रि यों चढ़ गयो । महा रा ज पा हू से गई कौशि ल्या पूछें कैसे रा जा अनमनेमहा रा ज । बा रा बरस के हुई हैं रा म वन खों जइहैं महा रा ज । वन खो जैहैं तो जा न दे फेर घर आहे महा रा ज । मो रो मि ट गओ बाँ झबाँ को नाँवनाँ तुम्हारों वंश चलो महा रा ज । Page 45 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 भगवा न रा म के जन्म पर दा ई को देनेके लि ए महा रा ज दशरथ कौशल्या केकई सुमि त्रा सभी उपहा र लेकर खड़े हैं किं तु दा ई को बा हर नहीं भगवा न रा म की चतुर्भुज रूप में दर्शन चा हि ए इसी प्रसंग में एक लो कगी त - ' कैसी मचल रई " दा ई अवध में , कैसी मचल रई दा ई । सुरंग चूनरी कैकई लयें ठा ड़ी , बई " न लैवे दा ई । सो नेको हा र कौशल्या लयें ठा ड़ी , कूलों " मरो र गई दा ई । सो नेकी ति लरी सुमि त्रा लयें ठा ड़ी , मुखई " न बो ले दा ई । मुति यन था र रा जा लयें ठा ड़ें , नजर न फेरे दा ई । नरा तुमा रों जबई हम छी न दरसन दें रघुरा ई । रूप चतुरभुज प्रभु दरसा यों , खुशी भई तब दा ई । दरसन लै दा ई घर खौ घर - घर हो त बड़ा ई । एक और लो क गी त जि समें रा म जी के हो नेपर दि न सो नेके समा न प्रकाशमा न प्रती त हो ता है डा ई आकर रा जा दशरथ को बधा ई दे रही है और कह रही है कि आज दि न सो नेका है महा रा ज जैसा कि हम सभी जा नते हैं कि अयो ध्या स्वर्णमई है और रा म जी के जन्म उत्सव पर सो नेके कलश का ही प्रयो ग हो रहा है और रा जा दशरथ प्रसन्न हो कर भा इयों को स्वर्ण आभूषण ही भेंट कर रहे हैं - आज दि न सो नेकौ महा रा ज । रा जा दशरथ के पुत्र भये हैं । सो नेके कलश धरा ये महा रा ज । सो नेके सब दि न सो नेकी सब रा तें , सो नेदि अल उजा रे महा रा ज । सुरा गऊ के गो बर मंगा ये ढि कधर आंगन लि पा ये महा रा ज । ननदी जू आइ सां ति या धरा एँ खुसि यन नाँचनाँ दि खा ये महा रा ज । Page 46 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 शा दी की रस्मों के गी त भी बुंदेली लो क भा षा की शा न है । शा दी कि सी भी घर में हो रही है पर यह लो कगी त हर घर लि खी खुशि यां बढ़ा नेका कारण बनते हैं । भगवा न रा म की वि वा ह में तेल चढ़ा नेकी रस्म का एक सुंदर लो क गी त - 'सो आज मो रे रा म जू खों तेल चढत है । तेल चढ़त है , फुलेल चढ़त है । सो नेकटोरा में तेल भरा यो , सो हल्दी मि ला के कैसों झलकत है । सो आज ..... । कुँवा रि न नेमि ल तेल चढ़ा यों , सो नारी न मंगल गी त मढ़त है । सौ आज मो रे रा म जू खों लगुन चढ़त है । लगुन चढ़त है आनन्द बढ़त है । कानन कुंडल मो रे रा म जू खों सो हैं । सो गा लन बि च मो ति यन लर ” सरकत हैं । केसर खौ र मो रे रा म जू खों सो हैं । सो गर बि च गो प " जंजी र लसत हैं । कंकन चूरा मो रे रा म जू खों सो हैं सों हा तन * बि च गजरा दरसत हैं । रा म जू के दरशन खों जि यरा तरसत हैं । मों आज मो रे रा म जू खों लगुन चढ़त हैं । कै आज मो रे ...... इस प्रकार जनक जी के यहां दुल्हदु न ( बन्नी ) बनी सी ता जी की स्थि ति देखि ये । जब श्री रा म बा रा त लेकर रा जा जनक के द्वा र पर पहुंचहुं ते हैं उस समय का सुंदर चि त्र लो कगी तों के मा ध्यम से कि या गया है ।द्वा रचा र के समय यह गी त गा ये जा नेवा ला यह लो कगी त जो मंडप इत्या दि के वि षय का सुंदर उल्लेख कर रहा है - हरे बाँ स मंडप छा ये सि या जू को रा म ब्या हन आये । जब सि या जू की लि खत लगुनि या , रकम - रकम कागज आये । सि या जू को रा म ब्या हन आये । हरे बां स ………. Page 47 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 जब सि या जू को चढ़त चढ़ा ओं,ओं रकम रकम गहना आये । सि या जू को रा म ब्या हन आये । हरे बाँ स .. । जब सि या जू की परत भां वरे ब्रह्मा पंडि त बन आये । सि या जू को ..... जब सि या की हो त बि दा हैं सब सखि यन आँसू आये । सि या जू को रा म ...... हरे बाँ स मंडप छा ये , सि या जू को रा म ब्या हन आये । एक अन्य लो कगी त के मा ध्यम से वि वा ह का सुंदर चि त्र अत्यंत मनभा वन प्रती त हो रहा है । इसमें मंडप की सुंदरता , बा रा ति यों के द्वा रा चढ़ा वा , बां स का मंडप, मो ती के चौ क, सो नेके कलश इत्या दि का मनोहर वर्णन है - एक समय मुनि जी जा कहैं मो रे रंजन भौं राभौं रा । चलि ये जनकपुर गाँ व मंडप सि या रा म के, मन रंन भौ रा । काहे के मंडप मो रे रंजन भौं राभौं रा । काहे के दो ई खंभ जनक - मंडप तरें मौ रे रंजन भौं राभौं रा । हरे बां सबां मंडप बनेमो रे रंजन भौं राभौं रा । मलया गि र के खंभ भौ रे रंजना भौं राभौं रा । सो हत सी ता रा म जनक मंडप तरैं मो रे रंजन भौं राभौं रा । कारी घटा घनश्या म सि या है दा मि नी मो रें रंजन भौं राभौं रा । (मंडप के नीचे चढ़ा वा चढ़ा या जा रहा है अनगि नत अमूल्य रत्नों का ढेर , जि नकी गि नती नहीं की जा सकती हैं ) चली है बा रा त मंडवा तरें आई अब चढ़ा व की भई तया री ¨ । सुरहन गऊ के गो बर मँगा ये ढि गधर आँगन लि पा ये । गजमुति यन के चौ क पुरा ये, कंचन कलश उजि या र धरा ये । पा ट पी ता म्बर उल्लन - पल्लन " सो नेरूपे को पा र नौ " पा ओ । चढ़ो है चढ़ा व जनक सुख पा ओ भली भां ति कन्या पहि रा ओ । Page 48 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 ‘ज्यो नार’ (जेवनार) गी त वि वा ह के समय गा ए जा नेवा ले लो कगी तो में बुंदेली ज्यो नार गी त अत्यंत प्रसि द्ध हैं । ज्यो नार वि वा ह के समय खि ला ए जा नेभो जन की एक रस्म है जो आज हुई बुंदेली लो क में हर्ष के सा थ मनाई जा ती है । रा म जी को सी ता मैया की सखि यां भो जन करा रही हैं । कि सी सखी नेआलू ,कि सी नेपूरी , कि सी नेकचौ ड़ी , कि सी नेलड्डू, तो ,कि सी नेगुजि या और पेड़े परो से हैं - मो रे रा म से करो न ररि याँ " जनकपुर की सखि याँ उननेआतर परसी सो पा तर" परसी परस दई दुनिदुनियाँ । जनकपुर .... उननेरा मरस परसो , मि र्चा परसो , परत दई अमि यां । जनकपुर .... उननेआलू परसे, रता लू परसे, परस दई घुईयां । जनकपुर .... उननेपूड़ी परसी , कचौ ड़ी परसी , परस दई पुईयाँ । जनकपुर .... उननेलड्डू परसे, पेड़ा परसे, परस दई गुझि यां । जनकपुर … उसी समय एक मजा क हो गया । परो सनेवा ले नेबा रा ती पर दो ना गि रा दि ये जि ससे उसके कपड़े खरा ब हो गये - मा ड़े जो परसे झा बक झो ला " भर गई पा तर उलंग गये दौ ना । खाँ ड़ जो परसी मुठी बगरा ई, ऊपर घी की धा र लगा ई । मैली सी धो ती फैर धुआरहो " गरय " से सा जन फि र कहो पा ड़ों जेउँत - जेउँत बड़ी रुचि आई, बा र - बा र हरि करत बड़ा ई । कंकन खो लना - वि वा ह के पश्चा त दूल्हे के द्वा रा दुल्हदु न का कंगन खो ला जा ता है इस रस्म को बड़े हुए सुंदर ढंग से मनाया जा ता है ये रस्में दूल्हा दुल्हदु न के सा थ सा थ परि वा र के सभी सदस्य करी ब ले आती हैं - जो नै¨ हो वे धनुष को टो रबो , कठि न कंकन गाँ ठगाँ छो रबों । तुमनेजनक पुरी पग धा रे , शि व के धनुष टो र कै डा रे । Page 49 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 जो न हो वे मा री च को मा रि वों । कठि न कंकन को . जनकपुरी की नारी आखि र सा री ¨ लगें तुम्हा री । जि नको बि न हथया रन मा रि बों कठि न कंकन … वे तो जनकपुरी की नारी हाँ सी करें तुम्हारी । अब तो सी खों सि या को जो रबों । कठि न कंकन को छो रबो । वन गमन गी त - जब भगवा न रा म को अपनेपि ता के वचन की रक्षा के लि ए वन जा ना हो ता है तो मा ता सी ता और भा ई लक्ष्मण जी रा म जी के सा थ या त्रा पर चल पड़ते हैं । वन की या त्रा की गा ए जा ने वा ला एक बुंदेली लो कगी त जो उस समय की पति को मनोहरी ढंग से प्रकट करता है - कर घर तन को , चले सि या रा म लखन बन को । रा म लखन बन को चले , रहा अवध में न कोय हो रा म .. नर - नारी व्या कुल हो ई रो वे , धी र धरे न कोय । हो रा मा ..... । खुशी भई कैकई मइया को चले सि या रा म बन को । रा म लखन तपसी दूनो भइया सा धु बनेचले जा य मो रे ला ल । जां य . चलत - चलत सा धु बा गों में पहुंचेहुं चेमा लि न नेपूछी है बा त मो रेला ल । तनक तो छइयाँ बि लमा लों मो रे सा धू " गजरा पहर चले जा वें मो रेला ल । तुम्हरें छुयें गजरा ना पहि रें मा लि न , सा धु धरम घट जा य मो रेला ल । 'कि लपें¨ अवधपुरी नर नारी , कोमल जनक दुलादु लारी जूँ । जब मा ता सी ता वन गमन के समय चलते चलते अपनेलगते हैं तो मा ता लक्ष्मण से कहते हैं थो ड़ा धी रे चलो - धी रे चलों मैं हा री लक्ष्मन , धी रे चलो मैं हा री । एक तो हा री , दूजें सुकुमा री , ती जे मजल कीं मा री । लक्ष्मण धी रे ..... सँकरी गलि याँ काँटकाँ - कटीलें , फा टत हैं तन सा री Page 50 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 लक्ष्मण धी रे ... गैल " चलत मो य " प्या स लगत हैं , दूजे पवन प्रचा री । धी रे चलों मैं हा री लक्ष्मन , धी रे चलो मैं हा री । वट - पूजन गी त - 'नगर अजुध्या की गैल में इक महुआ इक आम । जे तरैं " बैठे दो जने" इक लक्ष्मन दूजे रा म । ली ली बछेरन "लक्ष्मन आइयो , रथ चढ़ " आओ श्री रा म । सा त संखि न के संग में बैठी सी ता सपरन " जा यें । बी च मि ले दो ऊ पा हुँनेसी ता रही सकुचा य । सपरखो र घर आई बा री सी ता भौ जी नेदये पलँग बि छा य । टेरों " जनक जू के नौवा बा रे लक्ष्मन को डेरा दुवादु वाव । कौशल्या मा ता श्री रा म जी के जनकपुरी से लौ टनेपर पूछती है कि बेटा तुम्हारे ससुरा ल कैसी है?है वहां सब कैसा है?है तुम्हारा आवभगत केसे की? और वहां के लो ग कैसे हैं?हैं रा म जी बता ते हैं कि ससुरा ल हमा री ती र्थ जैसी है । सा स-ससुर गंगा और यमुना की तरह है । रा त को दूध की बया री मेरी सा स देती थीं और सा ले हमें घुड़सवा री करा नेले जा ते थे । इस तरह रा म जी अपने ससुरा ल की बढ़ा ई अपनी मा ता से करते हैं - हँस - हँस पूछे मा त कौशि ल्या बेटा कैसी बनी ससुरा र सा स हमा री गंगा जमना ससुर है ती रथ धा म । सा स हमा री अधि कपि या री देती है दूध बि या री । सा रे " हमा रे घुड़ला फि रा वे सा रा जें तपें रसो ई । जैसी मा त मढ़ ” भी तर लि खीं पुतरि या बैसी है बहु तुमा र । 'नौ दस मा स बेटा गरभ में रा खें वरस दसक लौं सेये । ती न दि ना खों बेटा गये ससुरा रे सौं जा य सि रा ही ससुरा ल । 'दुहादुहाई खँचों पि ता दशरथ की अब न जैहों ससुरा ल । अपनेरा म जी सों रही 10 करत हों बेटा नि त उठ जैंओं ससुरा र । बुंदेलखंड में प्रचलि त गा री के गी त इसमें हंसीहं सी मजा क के मा ध्यम से नोकझों कझों का आनंद लि या जा ता है इनके उदा हरण इस प्रकार हैं - Page 51 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 चढ़ा वे का लो कगी त ( गा री ) - आज श्री सि या जू को चढ़त चढ़ा व । हरे मण्डप के नीचे जू ।। धन्य धन्य दशरथ नेऐसा समय पा व । सेन्दुरन्दु की माँ गमाँ शी श फूल पहि रा व हरे मण्डप ………. ती न खा य घा गरे में जरकसी भरा व । मुक्तन को सा री में झलक रयौ भा व हरे मण्डप ………. बिं दि या अजूब ति लक वेंदा छवि छा व । कंचन के करण फूल सा करें सजा ब हरे मण्डप ………. ठुसी बी च ही रन को जड़ौ है जड़ा व । देखो सरमा ला को उत्तम सजा ब हरे मण्डप ………. नौ लखा सुहा र हि य ऊपर लटकाव । पां वपां पो स और दसऊ आंगरौ चढ़ा व हरे मण्डप ………. दा स कहे देख - देख अधि क सुख पा व हरे मण्डप ………. इस प्रकार जनकपुर की सखी श्री रा म से नौकझौं कझौं कर रही हैं, हैंयहाँ के लो कगी त की झाँ की झाँ देखि ये । यह भी एक गा री गी त है - रघुवंशी सुनेजइयो गा री , ओसर नोनो बनो ।। महा रा जा को भो रे बनाय लये ।। ओसर नोनो …… अलवेली अवध पति नारी ।। ओसर नोनो . ।। संगै लई ना सेज गये ।। ओसर नोनो ।। कैसे जा ये ललनवा चा रि ।। ओसर ।। गो रि न के कारे काय भयै ।। ओसर . ।। रा जा झगरौ दि यो नि रबा र ।। ओसर ।। कै गुन्डा गढी में कूद गये ।। ओसर ।। कै कामें बनायो मा र ।। ओसर ।। अवलौ वि नीत बड़ैहि रयै ।। ओसर . ।। मि थि ला में भयो नि रधा र ।। ओसर नोनो बनो ।। Page 52 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 रा म जी की भक्ति के द्वा रा एक गी त कि सके द्वा रा रा म जी के गुणों का बखा न कि या गया है जो रा म जी की शरण में एक बा र आ जा ता है ईश्वरी के अनुसा र उन्हों नेन्हों सदैव अपनेभक्तों की रक्षा की है और सभी कष्टों से उसे मुक्त कि या है - जि नके रा मचन्द्र रखवा रे, को कर सकत दगा रे । बड़े भये प्रह्ला द पक्ष में, हि रना कुश को मा रे । रा ना जहर दऔं मी रा खों ,खों प्री तम प्रा न समा रे । मसकी जा य ग्रा ह की गरदन, गह गजरा ज नि कारे । 'ईसुर' प्रभु नेला ज बचा ई , सि रपै गि रत हमा रे । नि ष्कर्ष - रा मचंद्र जी के प्रति लो गों में व्या प्त प्रेम एवं समर्पण उनकी भक्ति का ही प्रति बिं ब है वहीं रा मचंद्र जी उनके जी वन का दर्पण । रा म जी पर आधा रि त बुंदेली लो कगी तों में हम सा फ-सा फ बुंदेली संस्कृति एवं परंपरा ओं का दर्शन कर सकते हैं अर्था त यह कहना अनुचि त नहीं हो गा कि इन बुंदेली लो कगी तों के द्वा रा हम बुंदेलखंड की लो क संस्कृति को आसा नी से समझ सकते हैं जो परंपरा गत अभी स्वयं को संरक्षि त कि ए हुए हैं । यह समझना कठि न है कि इन लो कगी त के कारण संस्कृति संरक्षि त है अथवा संस्कृति का यह प्रवा ह लो कगी त को संरक्षि त कि ए हुए है । सरल शब्दों में कहा जा ए तो लो कगी त ही कि सी भी संस्कृति की सबसे सटी क परि चा यक हो ते हैं । लो क सा हि त्य की दृष्टि से बुंदेली भा षा स्वयं अन्य संस्कृति यों के बजा य अधि क समृद्ध प्रती त हो ती है । यहां के लो ग गी तों से भी यही अभि व्यंजना हो ती है अर्था त यह कहना उचि त हो गा कि बुंदेली लो कगी तों के श्री रा म बुंदेली संस्कृति में प्रा ण समा न है जो यहां की संस्कृति और वैभव को स्वयं में समेटे हुए हैं । संदर्भ ग्रंथ - 1. https://vimisahitya.wordpress.com/tag/bundeli/ 2. बुंदेली भा षा सा हि त्य का इति हा स, डॉ क्टर रा म नारा यण शर्मा , वा णी प्रकाशन, नई दि ल्ली । 3. बुंदेली , आरती दुबेदु बे, सा हि त्य अकादमी , दि ल्ली । 4. www.Bundelijalak.com 5. बुन्देली बि बि धा , डॉ क्टर गंगा प्रसा द बरसेया , अयन प्रकाशन, नई दि ल्ली । 6. बुंदेलखंड समग्र, संपा दक हरि वि ष्णु अवस्थी , मा धवरा व सप्रे संग्रहा लय एवं शो ध संस्था न भो पा ल । Page 53