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बुधवार, 22 अप्रैल 2026

बुंदेली लो क गी तों में रा म डॉ रमा आर्य

 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 बुंदेली लो क गी तों में रा म डॉ रमा आर्य 1 शो धपत्र सा रां शरां - भा रत का हृदय स्थल बुंदेलखंड जहां कई संस्कृति यों आकर मि लती हैं या कहें कि संस्कृति जहां से शुरू हो कर संपूर्ण भा रत में फैलती है वह स्था न है बुंदेलखंड यहां की संस्कृति यहां कल लो क सा हि त्य यहां का सां स्कृसां स्कृति क वैभव सरलता से कि सी का भी मन अपनी और आकर्षि त कर ही लेता है यह कहना भी अति शयो क्ति नहीं हो गा कि बुंदेलखंड का लो क सा हि त्य संपूर्ण भा रत में अत्यधि क समृद्ध है । कि सी भी समा ज का प्रति बिं ब हम वहां की लो क संस्कृति में व्या प्तम लो कगी तों के मा ध्यम से समझ सकते हैं । लो कगी तों में लो क संस्कृति अपनेमूल स्वरूप में चि त्रि त हो ती है या कहीं लो क जी वन का सी धा सा धा परि चय लो कगी तों के मा ध्यम से मि ल जा ता है यह लो कगी त व्यक्ति की भा वनाओं आस्था वि चा र दर्शन जी वन शैली सब कुछ व्यक्त कर देते हैं । बुंदेलखंड की लो क आस्था का एक मजबूत आधा र है भगवा न श्री रा म । इस भक्ति सा गर केंद्र ओरछा है जि सके आसपा स रा म भक्ति सा गर के लो कगी तों में हेलोहे लोरे ले रहा है यहां के जन-जन के रगों में श्री रा म बसा करते हैं दूर- दूर से लो ग ओरछा आते हैं रा त भर अपने लो कगी तों के मा ध्यम से रा म जी को ले जा ते हैं और सुबह प्रा त बेरछा जी (नदी )में स्ना न कर रा म जी के दर्शन कर पुख़्य(पुष्य) नक्षत्र को केंद्र मा न कर अपना जी वन सुखद बना लेते हैं । यहां के लो कगी तों में रा म वि भि न्न रूपों में दर्शनीय है । मुख्य शब्द - बुंदेली लो कगी त, संस्कृति , सभ्यता , परंपरा , श्री रा म, लो कजी वन, लो क मा न्यता एँ, व्यवहा र एवं आचा र । प्रस्ता वना - बुंदेलखंड ऐति हा सि क, सा हि त्य, सां स्कृति क दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है बुंदेलखंड में सुवि धा ओं में भी एकता देखनेको सहज ही प्रा प्त हो ती है । बुंदेलखंड की लो क संस्कृति सभी लो क संस्कृति यों से समृद्ध प्रती त हो ती है । यहां का लो क सा हि त्य इतना समृद्ध है कि भा रत के 1 सहा यक प्रा ध्या पक (हि न्दी ), श्री पी तां बतां रा पी ठ संस्कृत महा वि द्या लय, दति या (मध्य प्रदेश) । Page 42 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 अन्यत्र कि सी क्षेत्र का सा हि त्य इतना समृद्ध और प्रसि द्ध नहीं हुआ । यहां लो कगी त , लो क कथा , लो क गा था , पहेलिहेलियां इत्या दि अत्यंत सहजता से देखनेको मि लती हैं । लो क जी वन के सुख-दुखदु उल्लास हर्ष वि षा द संघर्ष को अभि व्यक्त करनेके लि ए लो कगी त सर्वश्रेष्ठ मा ध्यम प्रती त हो ते हैं । यह लो कगी त जनजी वन में इतना रच बस गए हैं की यह सा मा न्य जी वन का अभि न्न हि स्सा बन चुके हैं । इन लो कगी तों के द्वा रा ही बुंदेली संस्कृति को समझा जा सकता है यह भी कह सकते हैं कि इन लो कगी तों के दर्पण से संस्कृति का प्रति बिं ब देखा जा सकता है । असल में लो क संस्कृति ही लो कगी तों की कहा नी है और इन कहा नि यों में जनसा मा न्य का जी वन मा नसि क उद्वेग, वि चा र, अभि व्यक्ति , व्यंजना, संस्का र, संस्कृति सब कुछ सूक्ष्मता से समा हि त हैं । यह लो कगी त संक्षि प्त सरल स्पष्ट स्वभा व एक सुंदर संगी त में हो ते हैं । बुंदेलखंड में प्रचलि त लो कगी त बुंदेली जि नके संस्का र, आचा र-वि चा र, उत्सव, अध्या त्मि क, दर्शन इत्या दि का तो परि चय देते हैं सा थ ही इन के मा ध्यम से सा मा जि क जी वन शैली का भी सा क्षा त्का र हो ता है । इन लो कगी तों का स्वस्थ भा व प्रवणता ला लि त्य दर्शनीय है । बुंदेलखंड का केंद्र झां सीझां सी से 17 कि लो मी टर दूर ओरछा मध्य प्रदेश के नि मा ड़ी जि ले में आता है । यहां प्रभु श्री रा म रा जा के रूप में वि रा जमा न हैं । प्रभु श्री रा म की भक्ति यहां के लो गों की रगों में बसी हुई है ।दूर-दूर से लो ग पुख्य नक्षत्र पर (ज्यो ति षी य गणना में पड़नेवा ला एक वि शेष नक्षत्र) यहां आते हैं अपनेरा जा रा म की प्रां गप्रां ण में पूरी रा त गी तों के मा ध्यम से अपनी भा वनाओं को व्यक्त कर अपनी धा र्मि क आस्था ओं की पूर्ति करते हैं । उनका प्रया स रहता है कि श्री रा म कि सी प्रकार एक नजर उन पर डा ल दें । यहां रा म जी लो कगी तों में उसी प्रकार समा हि त हैं जैसे ब्रज में श्री कृष्ण । रा म यहां वि भि न्न रूपों में व्या प्त है । बुंदेलखंड वह स्था न है जहां श्री रा म अपनेभक्तों की भा वना से वि भो र हो कर अवध से ओरछा पधा रे । कहा जा ता है कि ओरछा की महा रा नी कुंवर गणेशी श्री रा म के अनन्य भक्त थीं और उन्हीं की भक्ति व प्रेम पर री झ कर या कहें अपनेइस भक्त के हट से वि वश हो कर श्री रा म को ओरछा धा म आना पड़ा । भगवा न श्री रा म रा नी कुंवर गणेशी जी के नि वा स महल ओरछा में वि रा जमा न हुए और इस तरह बुंदेलखंड के क्षेत्र में श्री रा म रा जा के रूप में यहां वि रा जमा न हुए एक लो कगी त के अनुसा ररा जा मधुकर शा ह की रा नी कुंवर गणेश । अवधपुरी से ओरछा ला ई अवध नरेश ।। आज भी यहां की धरती से रा म जी के जन्म उत्सव पर उठनेवा ली बधा इयां हर घर में गा ई जा ती हैं क्यों किक्योंकि जब घर में बा लक हो ता है तो वह यहां रा मजी का स्वरूप ही हो ता है और मा ता एं गां वगां उठते हैं - कोसल्ला ले लो बधा ई अवध में लल्ला भये हि ल मि ल गा दो बधा ई अवध में लल्ला भये….. Page 43 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 एक भक्तों के द्वा रा श्री रा म के प्रां गप्रां ण में लो गों से आवा हन कि या जा रहा है कि वे रा मचंद्र से या री करनेएक लो कगी त का आनंदमयी अंदा ज रा मचंद्र से या री कर लो रा मचंद्र से या री जि नेभजे नर नारी कर लो रा मचंद्र से या री ….. झूठे बेर शबरी के खा ए रस्ता ता कि बेचा री ….. कर लो रा मचंद्र से या री …. रा मचंद्र से या री …….. तुलसी दा स भजो रे भगवा न तो आ गई वि पदा टा री … कर लो रा मचंद्र से या री ….. ईश्वर की कृपा से महा रा ज दशरथ को एक सा थ चा र पुत्रों की प्रा प्ति हुई । रा जपरि वा र सहि त पूरी अयो ध्या हर्षा ति रेक में डूबी हुई हैं । तो उसनेउत्तर दि या खवा सन ( नाइन ) बंदनवा र ले जा रही हैं । लो गों नेजि ज्ञा सा वश पूछा - जो बंदनवा रों कहां लयें जा ती , जो बंदनवा रों …रों … । नगर अयो ध्या में सुत भये सजनी , रा जा मही पतके नाती । रा जा दशरथ के पुत्रा भये हैं रघुकूल जो त उजया र दई बा ती । उजया र दई बा ती , उजया र दई बा ती । जो बंदनवा रों ... .. रा नी कौशल्या की कूँख जुड़ा नी " सब सखि यन की शी तल भई छा ती । नगर अयो ध्या में दा न भयें हैं लै लै दा न मगन भई सखि याँ । मगन भई सखि याँ , मगन भई सखि याँ जो बंदनबा रों कहाँ लये जा ती । दा ई नारा छी ननेके पूर्व नेग माँ गमाँ ती हैं । कोई हा र दे रही है, है कोई ति लरी और कोई मो ति यों का था र । परंतु वह तो प्रभु शि शु का दर्शन करना चा हती हैं । यहाँ के लो कगी तों मधुरता का ऐसा समरस चि त्र अंकि त हुआ है जि ससे समझ आता है कि यहां की संस्कृति कि तनी समृद्धि और मधुर है । एक अन्य गी त के द्वा रा रा नी मैत्रेयी के द्वा रा दशरथ जी से दो वरदा न मां गनेकी पूरी कथा वर्णि त है । रा जा दशरथ अपनी रा नी को मनानेकी पूरी कोशि श कर रहे हैं पर रा नी मैत्रेयी कि जि द हैं कि रा म को वनवा स पर भेजना है । रा जा दशरथ भरत को रा जगद्दी देनेके लि ए तैया र हैं किं तु मैत्रेयी के द्वा रा रा म को वनवा स देनेकी नहीं किं तु मैत्रेयी अपनी मनमा नी कर रही है और वह नहीं मा न रही - Page 44 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 रा जा तो पौ ढ़े पलंग पै रा नी मलें पी ड़ौ ली ' महा रा ज । हँस - हँस पूछे रा जा दशरथ कैसी धन- अनमनी महा रा ज । भौ तक ' तो कहि ये रा जा अन्न धन भौ तक लक्ष्मी महा रा ज । सूनो अयो ध्या को रा ज अकेली संचत बि ना महा रा ज । तुम रा जा जइयो बा जा रै ' संचत भो ल ल्या इयों महा रा ज । तुम रा नी मूरख अजा न कहाँ लौं समझा इयें महा रा ज । हा टों में हति यां बि कायें संचत नहीं पा इयों महा रा ज । नगर को नौवा ' बुला ओं छुरा मँगा इयों महा रा ज । ची रौ अभा गि न को कूँख रा जा गँवा रि न कहै महा रा ज । काशी के पंडि त बुलवा इयों वेद बचवा इयों महा रा ज । रा जा जनम के गो गि या ग्या वन ' हि रनी मा रि यों महा रा ज । सो नेकी हि रनी गढुवा य रूपे के गबैलुवा " महा रा ज । बन बन देव छुड़ा य संचत तब हुइयें महा रा ज । तुम रा जा जइयों पहा रैं सजी वन ल्या इयों महा रा ज । घि स लुड़ि या " बँटवा इयों कटोरन छा नि यों महा रा ज । पि यो हैं बाँ टबाँ - बडा र ती नई रा नी अधन 2 से महा रा ज भये हैं नों दस मा स ललन चा र हो गये महा रा ज । बा जन लगी आनन्द बधैया सखी गा वें सो हरें महा रा ज । गौ वा के गो बर मँगइयों अंगन लि पवा इयों महा रा ज । गजमो ति न के चौ क पुरा कलश धरवा इयों महा रा ज । काशी के पंडि त बुला वेद पढ़ वइयों महा रा ज । बा रा " बरस के हुइयें रा म तब वन खाँ जइये महा रा ज । इतनी तो सुन रा जा दशरथ अटा रि यों चढ़ गयो । महा रा ज पा हू से गई कौशि ल्या पूछें कैसे रा जा अनमनेमहा रा ज । बा रा बरस के हुई हैं रा म वन खों जइहैं महा रा ज । वन खो जैहैं तो जा न दे फेर घर आहे महा रा ज । मो रो मि ट गओ बाँ झबाँ को नाँवनाँ तुम्हारों वंश चलो महा रा ज । Page 45 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 भगवा न रा म के जन्म पर दा ई को देनेके लि ए महा रा ज दशरथ कौशल्या केकई सुमि त्रा सभी उपहा र लेकर खड़े हैं किं तु दा ई को बा हर नहीं भगवा न रा म की चतुर्भुज रूप में दर्शन चा हि ए इसी प्रसंग में एक लो कगी त - ' कैसी मचल रई " दा ई अवध में , कैसी मचल रई दा ई । सुरंग चूनरी कैकई लयें ठा ड़ी , बई " न लैवे दा ई । सो नेको हा र कौशल्या लयें ठा ड़ी , कूलों " मरो र गई दा ई । सो नेकी ति लरी सुमि त्रा लयें ठा ड़ी , मुखई " न बो ले दा ई । मुति यन था र रा जा लयें ठा ड़ें , नजर न फेरे दा ई । नरा तुमा रों जबई हम छी न दरसन दें रघुरा ई । रूप चतुरभुज प्रभु दरसा यों , खुशी भई तब दा ई । दरसन लै दा ई घर खौ घर - घर हो त बड़ा ई । एक और लो क गी त जि समें रा म जी के हो नेपर दि न सो नेके समा न प्रकाशमा न प्रती त हो ता है डा ई आकर रा जा दशरथ को बधा ई दे रही है और कह रही है कि आज दि न सो नेका है महा रा ज जैसा कि हम सभी जा नते हैं कि अयो ध्या स्वर्णमई है और रा म जी के जन्म उत्सव पर सो नेके कलश का ही प्रयो ग हो रहा है और रा जा दशरथ प्रसन्न हो कर भा इयों को स्वर्ण आभूषण ही भेंट कर रहे हैं - आज दि न सो नेकौ महा रा ज । रा जा दशरथ के पुत्र भये हैं । सो नेके कलश धरा ये महा रा ज । सो नेके सब दि न सो नेकी सब रा तें , सो नेदि अल उजा रे महा रा ज । सुरा गऊ के गो बर मंगा ये ढि कधर आंगन लि पा ये महा रा ज । ननदी जू आइ सां ति या धरा एँ खुसि यन नाँचनाँ दि खा ये महा रा ज । Page 46 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 शा दी की रस्मों के गी त भी बुंदेली लो क भा षा की शा न है । शा दी कि सी भी घर में हो रही है पर यह लो कगी त हर घर लि खी खुशि यां बढ़ा नेका कारण बनते हैं । भगवा न रा म की वि वा ह में तेल चढ़ा नेकी रस्म का एक सुंदर लो क गी त - 'सो आज मो रे रा म जू खों तेल चढत है । तेल चढ़त है , फुलेल चढ़त है । सो नेकटोरा में तेल भरा यो , सो हल्दी मि ला के कैसों झलकत है । सो आज ..... । कुँवा रि न नेमि ल तेल चढ़ा यों , सो नारी न मंगल गी त मढ़त है । सौ आज मो रे रा म जू खों लगुन चढ़त है । लगुन चढ़त है आनन्द बढ़त है । कानन कुंडल मो रे रा म जू खों सो हैं । सो गा लन बि च मो ति यन लर ” सरकत हैं । केसर खौ र मो रे रा म जू खों सो हैं । सो गर बि च गो प " जंजी र लसत हैं । कंकन चूरा मो रे रा म जू खों सो हैं सों हा तन * बि च गजरा दरसत हैं । रा म जू के दरशन खों जि यरा तरसत हैं । मों आज मो रे रा म जू खों लगुन चढ़त हैं । कै आज मो रे ...... इस प्रकार जनक जी के यहां दुल्हदु न ( बन्नी ) बनी सी ता जी की स्थि ति देखि ये । जब श्री रा म बा रा त लेकर रा जा जनक के द्वा र पर पहुंचहुं ते हैं उस समय का सुंदर चि त्र लो कगी तों के मा ध्यम से कि या गया है ।द्वा रचा र के समय यह गी त गा ये जा नेवा ला यह लो कगी त जो मंडप इत्या दि के वि षय का सुंदर उल्लेख कर रहा है - हरे बाँ स मंडप छा ये सि या जू को रा म ब्या हन आये । जब सि या जू की लि खत लगुनि या , रकम - रकम कागज आये । सि या जू को रा म ब्या हन आये । हरे बां स ………. Page 47 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 जब सि या जू को चढ़त चढ़ा ओं,ओं रकम रकम गहना आये । सि या जू को रा म ब्या हन आये । हरे बाँ स .. । जब सि या जू की परत भां वरे ब्रह्मा पंडि त बन आये । सि या जू को ..... जब सि या की हो त बि दा हैं सब सखि यन आँसू आये । सि या जू को रा म ...... हरे बाँ स मंडप छा ये , सि या जू को रा म ब्या हन आये । एक अन्य लो कगी त के मा ध्यम से वि वा ह का सुंदर चि त्र अत्यंत मनभा वन प्रती त हो रहा है । इसमें मंडप की सुंदरता , बा रा ति यों के द्वा रा चढ़ा वा , बां स का मंडप, मो ती के चौ क, सो नेके कलश इत्या दि का मनोहर वर्णन है - एक समय मुनि जी जा कहैं मो रे रंजन भौं राभौं रा । चलि ये जनकपुर गाँ व मंडप सि या रा म के, मन रंन भौ रा । काहे के मंडप मो रे रंजन भौं राभौं रा । काहे के दो ई खंभ जनक - मंडप तरें मौ रे रंजन भौं राभौं रा । हरे बां सबां मंडप बनेमो रे रंजन भौं राभौं रा । मलया गि र के खंभ भौ रे रंजना भौं राभौं रा । सो हत सी ता रा म जनक मंडप तरैं मो रे रंजन भौं राभौं रा । कारी घटा घनश्या म सि या है दा मि नी मो रें रंजन भौं राभौं रा । (मंडप के नीचे चढ़ा वा चढ़ा या जा रहा है अनगि नत अमूल्य रत्नों का ढेर , जि नकी गि नती नहीं की जा सकती हैं ) चली है बा रा त मंडवा तरें आई अब चढ़ा व की भई तया री ¨ । सुरहन गऊ के गो बर मँगा ये ढि गधर आँगन लि पा ये । गजमुति यन के चौ क पुरा ये, कंचन कलश उजि या र धरा ये । पा ट पी ता म्बर उल्लन - पल्लन " सो नेरूपे को पा र नौ " पा ओ । चढ़ो है चढ़ा व जनक सुख पा ओ भली भां ति कन्या पहि रा ओ । Page 48 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 ‘ज्यो नार’ (जेवनार) गी त वि वा ह के समय गा ए जा नेवा ले लो कगी तो में बुंदेली ज्यो नार गी त अत्यंत प्रसि द्ध हैं । ज्यो नार वि वा ह के समय खि ला ए जा नेभो जन की एक रस्म है जो आज हुई बुंदेली लो क में हर्ष के सा थ मनाई जा ती है । रा म जी को सी ता मैया की सखि यां भो जन करा रही हैं । कि सी सखी नेआलू ,कि सी नेपूरी , कि सी नेकचौ ड़ी , कि सी नेलड्डू, तो ,कि सी नेगुजि या और पेड़े परो से हैं - मो रे रा म से करो न ररि याँ " जनकपुर की सखि याँ उननेआतर परसी सो पा तर" परसी परस दई दुनिदुनियाँ । जनकपुर .... उननेरा मरस परसो , मि र्चा परसो , परत दई अमि यां । जनकपुर .... उननेआलू परसे, रता लू परसे, परस दई घुईयां । जनकपुर .... उननेपूड़ी परसी , कचौ ड़ी परसी , परस दई पुईयाँ । जनकपुर .... उननेलड्डू परसे, पेड़ा परसे, परस दई गुझि यां । जनकपुर … उसी समय एक मजा क हो गया । परो सनेवा ले नेबा रा ती पर दो ना गि रा दि ये जि ससे उसके कपड़े खरा ब हो गये - मा ड़े जो परसे झा बक झो ला " भर गई पा तर उलंग गये दौ ना । खाँ ड़ जो परसी मुठी बगरा ई, ऊपर घी की धा र लगा ई । मैली सी धो ती फैर धुआरहो " गरय " से सा जन फि र कहो पा ड़ों जेउँत - जेउँत बड़ी रुचि आई, बा र - बा र हरि करत बड़ा ई । कंकन खो लना - वि वा ह के पश्चा त दूल्हे के द्वा रा दुल्हदु न का कंगन खो ला जा ता है इस रस्म को बड़े हुए सुंदर ढंग से मनाया जा ता है ये रस्में दूल्हा दुल्हदु न के सा थ सा थ परि वा र के सभी सदस्य करी ब ले आती हैं - जो नै¨ हो वे धनुष को टो रबो , कठि न कंकन गाँ ठगाँ छो रबों । तुमनेजनक पुरी पग धा रे , शि व के धनुष टो र कै डा रे । Page 49 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 जो न हो वे मा री च को मा रि वों । कठि न कंकन को . जनकपुरी की नारी आखि र सा री ¨ लगें तुम्हा री । जि नको बि न हथया रन मा रि बों कठि न कंकन … वे तो जनकपुरी की नारी हाँ सी करें तुम्हारी । अब तो सी खों सि या को जो रबों । कठि न कंकन को छो रबो । वन गमन गी त - जब भगवा न रा म को अपनेपि ता के वचन की रक्षा के लि ए वन जा ना हो ता है तो मा ता सी ता और भा ई लक्ष्मण जी रा म जी के सा थ या त्रा पर चल पड़ते हैं । वन की या त्रा की गा ए जा ने वा ला एक बुंदेली लो कगी त जो उस समय की पति को मनोहरी ढंग से प्रकट करता है - कर घर तन को , चले सि या रा म लखन बन को । रा म लखन बन को चले , रहा अवध में न कोय हो रा म .. नर - नारी व्या कुल हो ई रो वे , धी र धरे न कोय । हो रा मा ..... । खुशी भई कैकई मइया को चले सि या रा म बन को । रा म लखन तपसी दूनो भइया सा धु बनेचले जा य मो रे ला ल । जां य . चलत - चलत सा धु बा गों में पहुंचेहुं चेमा लि न नेपूछी है बा त मो रेला ल । तनक तो छइयाँ बि लमा लों मो रे सा धू " गजरा पहर चले जा वें मो रेला ल । तुम्हरें छुयें गजरा ना पहि रें मा लि न , सा धु धरम घट जा य मो रेला ल । 'कि लपें¨ अवधपुरी नर नारी , कोमल जनक दुलादु लारी जूँ । जब मा ता सी ता वन गमन के समय चलते चलते अपनेलगते हैं तो मा ता लक्ष्मण से कहते हैं थो ड़ा धी रे चलो - धी रे चलों मैं हा री लक्ष्मन , धी रे चलो मैं हा री । एक तो हा री , दूजें सुकुमा री , ती जे मजल कीं मा री । लक्ष्मण धी रे ..... सँकरी गलि याँ काँटकाँ - कटीलें , फा टत हैं तन सा री Page 50 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 लक्ष्मण धी रे ... गैल " चलत मो य " प्या स लगत हैं , दूजे पवन प्रचा री । धी रे चलों मैं हा री लक्ष्मन , धी रे चलो मैं हा री । वट - पूजन गी त - 'नगर अजुध्या की गैल में इक महुआ इक आम । जे तरैं " बैठे दो जने" इक लक्ष्मन दूजे रा म । ली ली बछेरन "लक्ष्मन आइयो , रथ चढ़ " आओ श्री रा म । सा त संखि न के संग में बैठी सी ता सपरन " जा यें । बी च मि ले दो ऊ पा हुँनेसी ता रही सकुचा य । सपरखो र घर आई बा री सी ता भौ जी नेदये पलँग बि छा य । टेरों " जनक जू के नौवा बा रे लक्ष्मन को डेरा दुवादु वाव । कौशल्या मा ता श्री रा म जी के जनकपुरी से लौ टनेपर पूछती है कि बेटा तुम्हारे ससुरा ल कैसी है?है वहां सब कैसा है?है तुम्हारा आवभगत केसे की? और वहां के लो ग कैसे हैं?हैं रा म जी बता ते हैं कि ससुरा ल हमा री ती र्थ जैसी है । सा स-ससुर गंगा और यमुना की तरह है । रा त को दूध की बया री मेरी सा स देती थीं और सा ले हमें घुड़सवा री करा नेले जा ते थे । इस तरह रा म जी अपने ससुरा ल की बढ़ा ई अपनी मा ता से करते हैं - हँस - हँस पूछे मा त कौशि ल्या बेटा कैसी बनी ससुरा र सा स हमा री गंगा जमना ससुर है ती रथ धा म । सा स हमा री अधि कपि या री देती है दूध बि या री । सा रे " हमा रे घुड़ला फि रा वे सा रा जें तपें रसो ई । जैसी मा त मढ़ ” भी तर लि खीं पुतरि या बैसी है बहु तुमा र । 'नौ दस मा स बेटा गरभ में रा खें वरस दसक लौं सेये । ती न दि ना खों बेटा गये ससुरा रे सौं जा य सि रा ही ससुरा ल । 'दुहादुहाई खँचों पि ता दशरथ की अब न जैहों ससुरा ल । अपनेरा म जी सों रही 10 करत हों बेटा नि त उठ जैंओं ससुरा र । बुंदेलखंड में प्रचलि त गा री के गी त इसमें हंसीहं सी मजा क के मा ध्यम से नोकझों कझों का आनंद लि या जा ता है इनके उदा हरण इस प्रकार हैं - Page 51 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 चढ़ा वे का लो कगी त ( गा री ) - आज श्री सि या जू को चढ़त चढ़ा व । हरे मण्डप के नीचे जू ।। धन्य धन्य दशरथ नेऐसा समय पा व । सेन्दुरन्दु की माँ गमाँ शी श फूल पहि रा व हरे मण्डप ………. ती न खा य घा गरे में जरकसी भरा व । मुक्तन को सा री में झलक रयौ भा व हरे मण्डप ………. बिं दि या अजूब ति लक वेंदा छवि छा व । कंचन के करण फूल सा करें सजा ब हरे मण्डप ………. ठुसी बी च ही रन को जड़ौ है जड़ा व । देखो सरमा ला को उत्तम सजा ब हरे मण्डप ………. नौ लखा सुहा र हि य ऊपर लटकाव । पां वपां पो स और दसऊ आंगरौ चढ़ा व हरे मण्डप ………. दा स कहे देख - देख अधि क सुख पा व हरे मण्डप ………. इस प्रकार जनकपुर की सखी श्री रा म से नौकझौं कझौं कर रही हैं, हैंयहाँ के लो कगी त की झाँ की झाँ देखि ये । यह भी एक गा री गी त है - रघुवंशी सुनेजइयो गा री , ओसर नोनो बनो ।। महा रा जा को भो रे बनाय लये ।। ओसर नोनो …… अलवेली अवध पति नारी ।। ओसर नोनो . ।। संगै लई ना सेज गये ।। ओसर नोनो ।। कैसे जा ये ललनवा चा रि ।। ओसर ।। गो रि न के कारे काय भयै ।। ओसर . ।। रा जा झगरौ दि यो नि रबा र ।। ओसर ।। कै गुन्डा गढी में कूद गये ।। ओसर ।। कै कामें बनायो मा र ।। ओसर ।। अवलौ वि नीत बड़ैहि रयै ।। ओसर . ।। मि थि ला में भयो नि रधा र ।। ओसर नोनो बनो ।। Page 52 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 रा म जी की भक्ति के द्वा रा एक गी त कि सके द्वा रा रा म जी के गुणों का बखा न कि या गया है जो रा म जी की शरण में एक बा र आ जा ता है ईश्वरी के अनुसा र उन्हों नेन्हों सदैव अपनेभक्तों की रक्षा की है और सभी कष्टों से उसे मुक्त कि या है - जि नके रा मचन्द्र रखवा रे, को कर सकत दगा रे । बड़े भये प्रह्ला द पक्ष में, हि रना कुश को मा रे । रा ना जहर दऔं मी रा खों ,खों प्री तम प्रा न समा रे । मसकी जा य ग्रा ह की गरदन, गह गजरा ज नि कारे । 'ईसुर' प्रभु नेला ज बचा ई , सि रपै गि रत हमा रे । नि ष्कर्ष - रा मचंद्र जी के प्रति लो गों में व्या प्त प्रेम एवं समर्पण उनकी भक्ति का ही प्रति बिं ब है वहीं रा मचंद्र जी उनके जी वन का दर्पण । रा म जी पर आधा रि त बुंदेली लो कगी तों में हम सा फ-सा फ बुंदेली संस्कृति एवं परंपरा ओं का दर्शन कर सकते हैं अर्था त यह कहना अनुचि त नहीं हो गा कि इन बुंदेली लो कगी तों के द्वा रा हम बुंदेलखंड की लो क संस्कृति को आसा नी से समझ सकते हैं जो परंपरा गत अभी स्वयं को संरक्षि त कि ए हुए हैं । यह समझना कठि न है कि इन लो कगी त के कारण संस्कृति संरक्षि त है अथवा संस्कृति का यह प्रवा ह लो कगी त को संरक्षि त कि ए हुए है । सरल शब्दों में कहा जा ए तो लो कगी त ही कि सी भी संस्कृति की सबसे सटी क परि चा यक हो ते हैं । लो क सा हि त्य की दृष्टि से बुंदेली भा षा स्वयं अन्य संस्कृति यों के बजा य अधि क समृद्ध प्रती त हो ती है । यहां के लो ग गी तों से भी यही अभि व्यंजना हो ती है अर्था त यह कहना उचि त हो गा कि बुंदेली लो कगी तों के श्री रा म बुंदेली संस्कृति में प्रा ण समा न है जो यहां की संस्कृति और वैभव को स्वयं में समेटे हुए हैं । संदर्भ ग्रंथ - 1. https://vimisahitya.wordpress.com/tag/bundeli/ 2. बुंदेली भा षा सा हि त्य का इति हा स, डॉ क्टर रा म नारा यण शर्मा , वा णी प्रकाशन, नई दि ल्ली । 3. बुंदेली , आरती दुबेदु बे, सा हि त्य अकादमी , दि ल्ली । 4. www.Bundelijalak.com 5. बुन्देली बि बि धा , डॉ क्टर गंगा प्रसा द बरसेया , अयन प्रकाशन, नई दि ल्ली । 6. बुंदेलखंड समग्र, संपा दक हरि वि ष्णु अवस्थी , मा धवरा व सप्रे संग्रहा लय एवं शो ध संस्था न भो पा ल । Page 53

अप्रैल २२, सॉनेट, सोरठे, हरिऔध, ट्रेन, श्री श्री, त्रिपदि, कुंडलिया, राम, सीता छंद, गीतिका छंद, दोहा, रोला, फतवा, नवगीत


सलिल सृजन अप्रैल २२
.
हरिऔध कथा २ 
सोरठा 
सुमिर नवाए माथ, हर हिंदी प्रेमी ऋणी। 
हिंदी मैया साथ, श्वास आखिरी तक रहे।। 

चूम 'लाल' कह माथ, मैया पहला दर्श कर। 
अंत 'राम' हों साथ, हिंदी साथ न छोड़ती।। 
चौपाई 
है हरिऔध कथा अति पावन। पढ़िए सुनिए करिए गायन।। 
श्रम निष्ठा आशा का परचम।‌सूर्य उगाए नित हरकर तम।। 
भारत माँ का पुत्र अनोखा।जिसका पूरा जीवन अनोखा।। 
था सामान्य असाधारण भी। हिंदी सुत, हिंदी सुत हिंदी चारण भी।। 
बृज अवधी उर्दू के झगड़े। भोजपुरी के दावे तगड़े।। 
बुंदेली कन्नौजी बोली। मेवाड़ी हाड़ौती टोली।। 
झगड़ मालवी संग निमाड़ी। खुद की जय खुद कर मरवाड़ी।। 
कठियावाड़ी शेखावाटी, सबका दावा सबकी माटी।। 
मन मुटाव की गठरी खोली। अंग्रेजी ने ताकत तोली।। 
सोरठा 
दो समूह हिंदी बँटी, संस्कृत-उर्दू द्वंद में। 
लड़कर निज ताकत घटी, फँसी विकट छल-छंद में।। 
चौपाई 
न्याय- प्रशासन का गुलाम मन। गौर मालिकों का बंदी तन।। 
लोक उपेक्षित है जब देखा। सिंह अयोध्या का कर लेखा।। 
टकसाली हिंदी का परचम। मैदां में आया ले दमखम।। 
अन्यों को दे सका चुनौती। हिंदी को मत मान बपौती।। 
सबकी हिंदी सबके हित हो। मत प्रधान इसमें निज हित हो।। 
सब देशज भाषाएँ सखियाँ। हिंदी सँग डालें गलबहियाँ।। 
सब हिंदी में घुल-मिल जाएँ। भारत भू की जय-जय गाएँ।। 
दयानंद स्वामी जी रचकर। कृति 'सत्यार्थ प्रकाश' दिवाकर।। 
'चंद्रकांता संतति' हिंदी में। लिख देवकीनंदन खत्री ने।। 
दिखलाई जो राह उसी पर। बढ़े अयोध्या सिंह चरण धर।। 
सोरठा 
तनिक न की परवाह, हुई बहुत आलोचना। 
रख हिंदी प्रति चाह, जुटे रहे हरिऔध जी।। 
२२.४.२०२६ 
०००
मुक्तक
नर पर दो दो मात्रा भारी।
खुश हो चलवा नर पर आरी।।
कभी न बोले 'हाँ', नित ना री!
कमजोरी ताकत भी नारी।।
सॉनेट
मुसाफ़िर
हम सब सिर्फ मुसाफिर यारो!
दुनिया प्लेटफार्म पर आए।
छीनो-झपटो व्यर्थ न प्यारो!
श्वास ट्रेन की टिकिट कटाए।।
सफर जिंदगी का हसीन हो।
हँस-बोलो तो कट जाएगा।
बजती मन में आस बीन हो।
संग न तू कुछ ले पाएगा।।
नाहक नहीं झमेला करना।
सबसे भाईचारा पालो।
नहीं टिकिटचैकर से डरना।।
जो चढ़-उतरे उसे सम्हालो।।
सफर न सफरिंग होने देना।
सर्फिंग कर भव नैया खेना।।
२२-४-२०२३●●●
मुसाफ़िरी सोरठे
*
ट्रेन कर रही ट्रेन, मुसाफिरों को सफर में।
सफर करे हमसफ़र, अगर मदद उसकी करें।।
*
जबलपूर आ गया, क्यों कहता है मुसाफिर।
आता-जाता आप, शहर जहाँ था है वहीं।।
*
करे मुसाफिर भूल, रेल रिजर्वेशन कहे।
बिछी जमीं पर रेल, बर्थ ट्रेन में सुरक्षित।।
*
बिना टिकिट चल रहे, रवि-शशि दोनों मुसाफिर।
समय ट्रेन पर रोज, टी सी नभ क्यों चुप रहे।।
*
नहीं मुसाफिर कौन, सब आते-जाते यहाँ।
प्लेटफ़ॉर्म का संग, नहीं सुहाता किसी को।।
*
देख मुसाफिर मौन, सिग्नल लाल हरा हुआ।
जा ले मंजिल खोज, प्रभु से है मेरी दुआ।।
*
सोरठा गीत
नाहक छोड़ न ठाँव।
*
रहे सुवासित श्वास,
श्रम सीकर सिंचित अगर।
मिले तृप्ति मिट प्यास,
हुई भोर उठ कर समर।।
कोयल कूके नित्य,
कागा करे न काँव
नाहक छोड़ न ठाँव।
*
टेर रही है साँझ,
नभ सिंदूरी हो रहा।
पंछी लौटे नीड़,
मानव लालच बो रहा।
थकी दुपहरी मौन
रोक कहीं तो पाँव,
नाहक छोड़ न ठाँव।
*
रात रुपहली जाग,
खनखन बजती चूड़ियाँ।
हेरे तेरी राह,
जयी न हों मजबूरियाँ।
पथिक भटक मत और
बुला रहा है गाँव।
नाहक छोड़ न ठाँव।
२२-४-२०२३
*
सॉनेट
मौसम
मौसम करवट बदल रहा है
इसका साथ निभाएँ कैसे?
इसको गले लगाएँ कैसे?
दहक रहा है, पिघल रहा है
बेगाना मन बहल रहा है
रोज आग बरसाता सूरज
धरती को धमकाता सूरज
वीरानापन टहल रहा है
संयम बेबस फिसल रहा है
है मुगालता सम्हल रहा है
यह मलबा भी महल रहा है
व्यर्थ न अपना शीश धुनो
कोरे सपने नहीं बुनो
मौसम की सिसकियाँ सुनो
२२-४-२०२२
•••
सॉनेट
महाशक्ति
महाशक्ति हूँ; दुनिया माने
जिससे रूठूँ; उसे मिटा दूँ
शत्रु शांति का; दुनिया जाने
चाहे जिसको मार उठा दूँ
मौतों का सौदागर निर्मम
गोरी चमड़ी; मन है काला
फैलाता डर दहशत मातम
लज्जित यम; मरघट की ज्वाला
नर पिशाच खूनी हत्यारा
मिटा जिंदगी खुश होता हूँ
बारूदी विष खाद मिलाकर
बीज मिसाइल के बोता हूँ
सुना नाश के रहा तराने
महाशक्ति हूँ दुनिया माने
२२-४-२०२२
•••
चिंतन ४
कैसे?
'कैसे' का विचार तभी होता है इससे पहले 'क्यों' और 'क्या' का निर्णय ले लिया गया हो।
'क्यों' करना है?
इस सवाल का जवाब कार्य का औचित्य प्रतिपादित करता है। अपनी गतिविधि से हम पाना क्या चाहते हैं?
'क्या' करना है?
इस प्रश्न का उत्तर परिवर्तन लाने की योजनाओं और प्रयासों की दिशा, गति, मंज़िल, संसाधन और सहयोगी निर्धारित करता है।
'कैसे'
सब तालों की चाबी यही है।
चमन में अमन कैसे हो?
अविनय (अहंकार) के काल में विनय (सहिष्णुता) से सहयोग कैसे मिले?
दुर्बोध हो रहे सामाजिक समीकरण सुबोध कैसे हों?
अंतर्राष्ट्रीय, वैश्विक और ब्रह्मांडीय संस्थाओं और बरसों से पदों को पकड़े पुराने चेहरों से बदलाव और बेहतरी की उम्मीद कैसे हो?
नई पीढ़ी की समस्याओं के आकलन और उनके समाधान की दिशा में सामाजिक संस्थाओं की भूमिका कितनी और कैसे हो?
नई पीढ़ी सामाजिक संस्थाओं, कार्यक्रमों और नीतियों से कैसे जुड़े?
कैसे? कैसे? कैसे?
इस यक्ष प्रश्न का उत्तर तलाशने का श्रीगणेश कैसे हो?
२२•४•२०२२
***
प्रात नमन
*
मन में लिये उमंग पधारें राधे माधव
रचना सुमन विहँस स्वीकारें राधे माधव
राह दिखाएँ मातु शारदा सीख सकें कुछ
सीखें जिससे नहीं बिसारें राधे माधव
हों बसंत मंजरी सदृश पाठक रचनाएँ
दिन-दिन लेखन अधिक सुधारें राधे-माधव
तम घिर जाए तो न तनिक भी हैरां हों हम
दीपक बन दुनिया उजियारें राधे-माधव
जीतेंगे कोविंद न कोविद जीत सकेगा
जीवन की जय-जय उच्चारें राधे-माधव
***
प्राची ऊषा सूर्य मुदित राधे माधव
मलय समीरण अमल विमल राधे माधव
पंछी कलरव करते; कोयल कूक रही
गौरैया फिर फुदक रही राधे माधव
बैठ मुँडेरे कागा टेर रहा पाहुन
बनकर तुम ही आ जाओ राधे माधव
सुना बजाते बाँसुरिया; सुन पायें हम
सँग-सँग रास रचा जाओ राधे माधव
मन मंदिर में मौन न मूरत बन रहना
माखन मिसरी लुटा जाओ राधे माधव
२१-४-२०२०
***
दोहा सलिला
नियति रखे क्या; क्या पता, बनें नहीं अवरोध
जो दे देने दें उसे, रहिए आप अबोध
*
माँगे तो आते नहीं , होकर बाध्य विचार
मन को रखिए मुक्त तो, आते पा आधार
*
सोशल माध्यम में रहें, नहीं हमेशा व्यस्त
आते नहीं विचार यदि, आप रहें संत्रस्त
*
एक भूमिका ख़त्म कर, साफ़ कीजिए स्लेट
तभी दूसरी लिख सकें,समय न करता वेट
*
रूचि है लोगों में मगर, प्रोत्साहन दें नित्य
आप करें खुद तो नहीं, मिटे कला के कृत्य
*
विश्व संस्कृति के लगें, मेले हो आनंद
जीवन को हम कला से, समझें गाकर छंद
*
भ्रमर करे गुंजार मिल, करें रश्मि में स्नान
मन में खिलते सुमन शत, सलिल प्रवाहित भान
*
हैं विराट हम अनुभूति से, हुए ईश में लीन
अचल रहें सुन सकेंगे, प्रभु की चुप रह बीन
***
मनरंजन -
आर्य भट्ट ने शून्य की खोज ६ वीं सदी में की तो लगभग ५००० वर्ष पूर्व रामायण में रावण के दस सर की गणना और त्रेता में सौ कौरवों की गिनती कैसे की गयी जबकि उस समय लोग शून्य (जीरो) को जानते ही नही थे।
*
आर्यभट्ट ने ही (शून्य / जीरो) की खोज ६ वीं सदी में की, यह एक सत्य है। आर्यभट्ट ने ० (शून्य, जीरो) की खोज *अंकों मे* की थी, *शब्दों* नहीं। उससे पहले ० (अंक को) शब्दों में शून्य कहा जाता था। हिन्दू धर्म ग्रंथों जैसे शिव पुराण,स्कन्द पुराण आदि में आकाश को *शून्य* कहा गया है। यहाँ शून्य का अर्थ अनंत है । *रामायण व महाभारत* काल में गिनती अंकों में नहीं शब्दो में होती थी, वह भी *संस्कृत* में।
१ = प्रथम, २ = द्वितीय, ३ = तृतीय, ४ = चतुर्थ, ५ = पंचम, ६ = षष्ठं, ७ = सप्तम, ८ = अष्टम, ९= नवंम, १० = दशम आदि।
दशम में *दस* तो आ गया, लेकिन अंक का ० नहीं।
आया, ‍‍रावण को दशानन, दसकंधर, दसशीश, दसग्रीव, दशभुज कहा जाता है !!
*दशानन मतलव दश+आनन =दश सिरवाला।
त्रेता में *संस्कृत* में *कौरवो* की संख्या सौ *शत* शब्दों में बतायी गयी, अंकों में नहीं।
*शत्* संस्कृत शब्द है जिसका हिन्दी में अर्थ सौ (१००) है। *शत = सौ*
रोमन में १, २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९, ०, के स्थान पर i, ii, iii, iv, v, vi, vii, viii, ix, x आदि लिखा-पढ़ा जाता है किंतु शून्य नहीं आता।आप भी रोमन में एक से लेकर सौ की गिनती पढ़ लिख सकते है !!
आपको ० या ०० लिखने की जरूरत भी नहीं पड़ती है।
तब गिनती को *शब्दो में* लिखा जाता था !!
उस समय अंकों का ज्ञान नहीं, था। जैसे गीता,रामायण में अध्याय १, २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९, को प्रथम अध्याय, द्वितीय अध्याय, पंचम अध्याय,दशम अध्याय... आदि लिखा-पढ़ा जाका था।
दशम अध्याय ' मतलब दसवाँ पाठ (10th lesson) होता है !!
इसमे *दश* शब्द तो आ गया !! लेकिन इस दश मे *अंको का ०* (शून्य, जीरो)" का प्रयोग नही हुआ !!
आर्यभट्ट ने शून्य के लिये आंकिक प्रतीक "०" का अन्वेषण किया जो हमारे आभामंडल, पृथ्वी के परिपथ या सूर्य के आभामंडल का लघ्वाकार है।
*
२०-४-२०२०
कुंडलिया
*
नारी को नर पूजते, नारी नर की भक्त
एक दूसरे के बिना दोनों रहें अशक्त
दोनों रहें अशक्त, मिलें तो रचना करते
उनसा बनने भू पर, ईश्वर आप उतरते
यह दीपक वह ज्योत, पुजारिन और पुजारी
मन मंदिर में मौन, विराजे नर अरु नारी
२२-४-२०२०
***
दोहा-दोहा राम
*
भीतर-बाहर राम हैं, सोच न तू परिणाम
भला करे तू और का, भला करेंगे राम
*
विश्व मित्र के मित्र भी, होते परम विशिष्ट
युगों-युगों तक मनुज कुल, सीख मूल्य हो शिष्ट
*
राम-नाम है मरा में, जिया राम का नाम
सिया राम पैगाम है, राम सिया का नाम
*
उलटा-सीधा कम-अधिक, नीचा-ऊँच विकार
कम न अधिक हैं राम-सिय, पूर्णकाम अविकार
*
मन मारुतसुत हो सके, सुमिर-सुमिर सिय-राम
तन हनुमत जैसा बने, हो न सके विधि वाम
*
मुनि सुतीक्ष्ण मति सुमति हो, तन हो जनक विदेह
धन सेवक हनुमंत सा, सिया-राम का गेह
*
शबरी श्रम निष्ठा लगन, सत्प्रयास अविराम
पग पखर कर कवि सलिल, चल पथ पर पा राम
*
हो मतंग तेरी कलम, स्याही बन प्रभु राम
श्वास शब्द में समाहित, गुंजित हो निष्काम
*
अत्रि व्यक्ति की उच्चता, अनुसुइया तारल्य
ज्ञान किताबी भंग शर, कर्मठ राम प्रणम्य
*
निबल सरलता अहल्या, सिया सबल निष्पाप
गौतम संयम-नियम हैं, इंद्र शक्तिमय पाप
*
नियम समर्थन लोक का, पा बन जाते शक्ति
सत्ता दण्डित हो झुके, हो सत-प्रति अनुरक्ति
*
जनगण से मिल जूझते, अगर नहीं मतिमान.
आत्मदाह करते मनुज, दनुज करें अभिमान.
*
भंग करें धनु शर-रहित, संकुच-विहँस रघुनाथ.
भंग न धनु-शर-संग हो, सलिल उठे तब माथ.
२२-४-२०१९
***
श्री श्री चिंतन दोहा मंथन
इंद्रियाग्नि:
24.7.1995, माँट्रियल आश्रम, कनाडा
*
जीवन-इंद्रिय अग्नि हैं, जो डालें हो दग्ध।
दूषित करती शुद्ध भी, अग्नि मुक्ति-निर्बंध।।
*
अग्नि जले; उत्सव मने, अग्नि जले हो शोक।
अग्नि तुम्हीं जल-जलाते, या देते आलोक।।
*
खुद जल; जग रौशन करें, होते संत कपूर।
प्रेमिल ऊष्मा बिखेरें, जीव-मित्र भरपूर।।
*
निम्न अग्नि तम-धूम्र दे, मध्यम धुआँ-उजास।
उच्च अग्नि में ऊष्णता, सह प्रकाश का वास।।
*
करें इंद्रियाँ बुराई, तिमिर-धुआँ हो खूब।
संयम दे प्रकृति बदल, जा सुख में तू डूब।।
*
करें इंद्रियाँ भलाई, फैला कीर्ति-सुवास।
जहाँ रहें सत्-जन वहाँ, सब दिश रहे उजास।।
***
12.4.2018
मुक्तक
अर्थ डे है, अर्थ दें तो अर्थ का कुछ अर्थ हो.
जेब खाली ही रहे तो काटना भी व्यर्थ हो
जेब काटे अगर दर्जी तो न मर्जी पूछता
जेबकतरा जेब काटे बिन सजा न अनर्थ हो
***
अभिनव प्रयोग
त्रिपदियाँ
(सोलह मात्रिक संस्कारी जातीय छंद, पदांत गुरु)
*
तन्मय जिसमें रहें आप वो
मूरत मन-मंदिर में भी हो
तीन तलाक न दे पाएँगे।
*
नहीं एक के अगर हुए तो
दूजी-तीजी के क्या होंगे?
खाली हाथ सदा पाएँगे।
*
बीत गए हैं दिन फतवों के
साथ समय के नहीं चले तो
आप अकेले पड़ जाएँगे।
२२-४-२०१७
*
छन्द बहर का मूल है ९
मुक्तिका:
*
पंद्रह वार्णिक, अति शर्करी जातीय सीता छंद.
छब्बीस मात्रिक महाभागवत जातीय गीतिका छंद
मात्रा क्रम -२१२.२/२१.२२/२.१२२./२१२
गण सूत्र-रतमयर
बहर- फाइलातुन फाइलातुन फाइलातुन फाइलुन
*
कामना है रौशनी की भीख दें संसार को
मनुजता को जीत का उपहार दें, हर हार को
सर्प बाधा, जिलहरी है परीक्षा सामर्थ्य की
नर्मदा सा ढार दें शिवलिंग पर जलधार को
कौन चाहे मुश्किलों से हो कभी भी सामना
नाव को दे छोड़ जब हो जूझना मँझधार को
भरोसा किस पर करें जब साथ साया छोड़ दे
नाव से खतरा हुआ है हाय रे पतवार को
आ रहे हैं दिन कहीं अच्छे सुना क्या आपने?
सूर्य ही ठगता रहा जुमले कहा उद्गार को
२३-०७-२०१५
***
नवगीत
*
सत्ता-लाश
नोचने आतुर
गिद्ध, बाज, कऊआ.
*
जनमत के लोथड़े बटोरें
पद के भूखे चंद चटोरे.
दर-दर घूम समर्थन माँगें
ले हाथों में स्वार्थ-कटोरे.
मिलीभगत
फैला अफवाहें
खड़ा करो हऊआ.
सत्ता-लाश
नोचने आतुर
गिद्ध, बाज, कऊआ.
*
बाँट रहे अनगिन आश्वासन,
जुमला कहते पाकर शासन.
टैक्स और मँहगाई बढ़ाते
माल उड़ाते, देते भाषण.
त्याग-परिश्रम
हैं अवमूल्यित
साध्य खेल-चऊआ.
सत्ता-लाश
नोचने आतुर
गिद्ध, बाज, कऊआ.
*
निर्धन हैं बेबस अधनंगे
धनी-करें फैशन अधनंगे.
लाज न ढँक पाता है मध्यम
भद्र परेशां, लुच्चे चंगे.
खाली हाथ
सभी को जाना
सुने न क्यों खऊआ?
सत्ता-लाश
नोचने आतुर
गिद्ध, बाज, कऊआ.
*
नवगीत
फतवा
*
तुमने छींका
हमें न भाया
फतवा जारी।
*
ठेकेदार
हमीं मजहब के।
खासमखास
हमई हैं रब के।
जब चाहें
कर लें निकाह फिर
दें तलाक.
क्यों रायशुमारी?
तुमने छींका
हमें न भाया
फतवा जारी।
*
सही-गलत क्या
हमें न मतलब।
मनमानी ही
अपना मजहब।
खुद्दारी से
जिए न औरत
हो जूती ही
अपनी चाहत।
ख्वाब न उसके
बनें हकीकत
है तैयारी।
तुमने छींका
हमें न भाया
फतवा जारी।
*
हमें नहीं
कानून मानना।
हठधर्मी कर
रार ठानना।
मनगढ़ंत
हम करें व्याख्या
लाइलाज है
अकल अजीरण
की बीमारी।
तुमने छींका
हमें न भाया
फतवा जारी।
*
नवगीत: बिंदु-बिंदु परिचय
*
१. नवगीत के २ हिस्से होते हैं १. मुखड़ा २. अंतरा।
२. मुखड़ा की पंक्तिसंख्या या पंक्ति में वर्ण या मात्रा संख्याका कोई बंधन नहीं होता पर मुखड़े की प्रथम या अंतिम एक पंक्ति के समान पदभार की पंक्ति अंतरे के अंत में आवश्यक है ताकि उसके बाद मुखड़े को दोहराया जा सके तो निरंतरता की प्रतीति हो।
३. सामान्यतः २ या ३ अंतरे होते हैं। अन्तरा सामान्यतः स्वतंत्र होता है पर पूर्व या पश्चात्वर्ती अंतरे से सम्बद्ध नहीं होता। अँतरे में पंक्ति या पंक्तियों में वर्ण या मात्रा का कोई बंधन नहीं होता किन्तु अंतरे की पंक्तियों में एक लय का होना तथा वही लय हर अन्तरे में दोहराई जाना आवश्यक है।
४. नवगीत में विषय, रस, भाव आदि का कोई बंधन नहीं होता।
५. संक्षिप्तता, लाक्षणिकता, मार्मिकता, बेधकता, स्पष्टता, सामयिकता, सहजता-सरलता नवगीत के गुण या विशेषतायें हैं।
६. नवगीत की भाषा में देशज शब्दों के प्रयोग से उपज टटकापन या अन्य भाषिक शब्द विशिष्टता मान्य है, जबकि लेख, निबंध में इसे दोष कहा जाता है।
७. नवगीत की भाषा सांकेतिक होती है, गीत में विस्तार होता है।
८. नवगीत में आम आदमी की या सार्वजनिक भावनाओं को अभिव्यक्ति दी जाती है जबकि गीत में गीतकार अपनी व्यक्तिगत अनुभूतियों को शब्दित करता है।
९. नवगीत में अप्रचलित छंद या नए छंद को विशेषता कहा जाता है। छंद मुक्तता भी स्वीकार्य है पर छंदहीनता नहीं।
१०. नवगीत में अलंकारों की वहीं तक स्वीकार्यता है जहाँ तक वे कथ्य की स्पष्ट-सहज अभिव्यक्ति में बाधक न हों।
११. नवगीत में प्रतीक, बिम्ब तथा रूपक भी कथ्य के सहायक के रूप में ही होते हैं।
सारत: हर नवगीत अपने आप में पूर्ण तथा गीत होता है पर हर गीत नवगीत नहीं होता। नवगीत का अपरिहार्य गुण उसका गेय होना है।
+++++++
नवगीत:
.
अपनों पर
अपनों की
तिरछी रहीं निगाहें.
.
साये से भय खाते लोग
दूर न होता शक का रोग
बलिदानी को युग भूले
अवसरवादी करता भोग
सत्य न सुन
सह पाते
झूठी होती वाहें
अपनों पर
अपनों की
तिरछी रहीं निगाहें.
.
उसने पाया था बहुमत
साथ उसी के था जनमत
सिद्धांतों की लेकर आड़
हुआ स्वार्थियों का जमघट
बलिदानी
कब करते
औरों की परवाहें
अपनों पर
अपनों की
तिरछी रहीं निगाहें.
.
सत्य, झूठ को बतलाते
सत्ता छिने न, भय खाते
छिपते नहीं कारनामे
जन-सम्मुख आ ही जाते
जननायक
का स्वांग
पाल रहे डाहें
अपनों पर
अपनों की
तिरछी रहीं निगाहें.
.
वह हलाहल रहा पीता
बिना बाजी लड़े जीता
हो विरागी की तपस्या
घट भरा वह, शेष रीता
जन के मध्य
रहा वह
चाही नहीं पनाहें
अपनों पर
अपनों की
तिरछी रहीं निगाहें.
.
कोई टोंक न पाया
खुद को झोंक न पाया
उठा हुआ उसका पग
कोई रोक न पाया
सबको सत्य
बताओ, जन की
सुनो सलाहें
अपनों पर
अपनों की
तिरछी रहीं निगाहें.
***
मुक्तक:
*
हम एक हों, हम नेक हों, बल दो हमें जगदंबिके!
नित प्रात हो, हम साथ हों, नत माथ हो जगवन्दिते !!
नित भोर भारत-भारती वर दें हमें सब हों सुखी
असहाय के प्रति हों सहायक हो न कोई भी दुखी
*
मत राज्य दो मत स्वर्ग दो मत जन्म दो हमको पुन:
मत नाम दो मत दाम दो मत काम दो हमको पुन:
यदि दो हमें बलिदान का यश दो, न हों जिन्दा रहें
कुछ काम मातु! न आ सके नर हो, न शर्मिंदा रहें
*
तज दे सभी अभिमान को हर आदमी गुणवान हो
हँस दे लुटा निज ज्ञान को हर लेखनी मतिमान हो
तरु हों हरे वसुधा हँसे नदियाँ सदा बहती रहें-
कर आरती माँ भारती! हम हों सुखी रसखान हों
*
फहरा ध्वजा हम शीश को अपने रखें नत हो उठा
मतभेद को मनभेद को पग के तले कुचलें बिठा
कर दो कृपा वर दो जया!हम काम भी कुछ आ सकें
तव आरती माँ भारती! हम एक होकर गा सकें
*
[छंद: हरिगीतिका, सूत्र: प्रति पंक्ति ११२१२ X ४]
२२-४-२०१५
***
षट्पदी :
*'
हिन्दी की जय बोलिए, हो हिन्दीमय आप.
हिन्दी में पढ़-लिख 'सलिल', सकें विश्व में व्याप्त..
नेह नर्मदा में नहा, निर्भय होकर डोल.
दिग-दिगंत को गुँजा दे, जी भर हिन्दी बोल..
जन-गण की आवाज़ है, भारत मान ता ताज.
हिन्दी नित बोले 'सलिल', माँ को होता नाज़..
*
२२-४-२०१०
छंद सलिला:
विशेषिका छंद
*
छंद-लक्षण: जाति महादैशिक , प्रति चरण मात्रा २० मात्रा, चरणांत तीन लघु लघु गुरु (सगण)।
लक्षण छंद:
'विशेषिका' कलाएँ बीस संग रहे
विशेष भावनाएँ कह दे बिन कहे
कमल ज्यों नर्मदा में हँस भ्रमण करे
'सलिल' चरण के अंत में सगण रहे
उदाहरण:
१. नेता जी! सीखो जनसेवा, सुधरो
रिश्वत लेना छोडो अब तो ससुरों!
जनगण ने देखे मत तोड़ो सपने
मानो कानून सभी मानक अपने
२. कान्हा रणछोड़ न जा बज मुरलिया
राधा का काँप रहा धड़कता जिया
निष्ठुर शुक मैना को छोड़ उड़ रहा
यमुना की लहरों का रंग उड़ रहा
नीलाम्बर मौन है, कदम्ब सिसकता
पीताम्बर अनकहनी कहे ठिठकता
समय महाबली नाच नचा हँस रहा
नटवर हो विवश काल-जाल फँस रहा
३. बंदर मामा पहन पजामा सजते
मामी जी पर रोब ज़माने लगते
चूहा देखा उठकर भागे घबरा
मामी मन ही मन मुस्काईं इतरा
२२-४-२०१४
*********************************************
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, ककुभ, कज्जल, कामिनीमोहन कीर्ति, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, छवि, जाया, तांडव, तोमर, दीप, दीपकी, दोधक, नित, निधि, प्रतिभा, प्रदोष, प्रेमा, बाला, भव, मदनअवतार, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, योग, ऋद्धि, राजीव, रामा, लीला, वाणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुभगति, सरस, सार, सिद्धि, सुगति, सुजान, हेमंत, हंसगति, हंसी)
***
मुक्तक:
नव संवत्सर मंगलमय हो.
हर दिन सूरज नया उदय हो.
सदा आप पर ईश सदय हों-
जग-जीवन में 'सलिल' विजय हो.
*
दिल चुराकर आप दिलवर बन गए.
दिल गँवाकर हम दीवाने हो गए.
दिल कुचलनेवाले दिल की क्यों सुनें?
थामकर दिल वे सयाने बन गए.
*
पीर पराई हो सगी, निज सुख भी हो गैर.
जिसको उसकी हमेशा, 'सलिल' रहेगी खैर..
सबसे करले मित्रता, बाँट सभी को स्नेह.
'सलिल' कभी मत किसी के, प्रति हो मन में बैर..
*
मन मंदिर में जो बसा, उसको भी पहचान.
जग कहता भगवान पर वह भी है इंसान..
जो खुद सब में देखता है ईश्वर का अंश-
दाना है वह ही 'सलिल' शेष सभी नादान..
*
'संबंधों के अनुबंधों में ही जीवन का सार है.
राधा से,मीरां से पूछो, सार भाव-व्यापार है..
साया छोडे साथ,गिला क्यों?,उसका यही स्वभाव है.
मानव वह जो हर रिश्ते से करता'सलिल'निभाव है.'
२२-४-२०१०
***

गुरुवार, 26 मार्च 2026

मार्च २६, कुंडलिया, ग़ज़ल, सॉनेट, राम, हाइकु गीत, यीट्स, अरविन्द घोष, भोजपुरी दोहे,

सलिल सृजन मार्च २६

छंद शाला
दोहा+रोला=कुंडलिया
बौद्ध जैन हों सिक्ख या, नयन वैष्णव शैव।
नयन धर्म सच एक है, देखें दृश्य सदैव।। - अशोक व्यग्र
देखें दृश्य सदैव, आप हैं नयन सनातन।
हैं नवीनतम नयन, नयन हैं पुरा-पुरातन।।
नयन शांति के दूत, होते हैं नयन प्रबौद्ध।
नयन राग-अनुराग, संतुलन साधें बौद्ध।।
२६.३.२०२६
०००
ग़ज़लिका
.
न्यायमूर्ति धृतराष्ट्र हो रहे
अन्यायों की फसल बो रहे
.
अनाचार के, दुराचार के
बने पक्षधर लाज खो रहे
.
बोरे भरकर नोट जलाएँ
कालिख के पर्याय हो रहे
.
वसन फाड़, अंगों को छूना
गलत न कहकर, पाप ढो रहे
.
खुद अपने मुख कालिख मलकर
गटर-गंद में नहा धो रहे
.
काला मन, कपड़े भी काले
ओढ़-बिछा अन्याय सो रहे
.
दु:शासन को कहें सुशासन
न्याय देवता 'सलिल' रो रहे
२६.३.२०२५
०००
पर्पल डे (मिर्गी/एपिलेप्सी दिवस)
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार लगभग ५ करोड़ लोग मिर्गी से पीड़ित हैं। इनमें ८०% से अधिक माध्यम या निम्न आय वर्ग से हैं। मिर्गी रोग के प्रति जन-जाग्रति बढ़ाने के लिए २६ मार्च को मिर्गी दिवस पर बैगनी (पर्पल) रंग के वस्त्र पहने जाते हैं. यह बीमारी लैवेंजर के फूल से प्रेरित और अकेलेपन को दर्शाती है। इसकी शुरुआत साल २००८ में एक ९ साल की मिर्गी रोगी बच्ची कैसिडी मेगन ने की थी। मिर्गी एक गंभीर न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर है। दिमाग से जुड़ीइस गंभीर बीमारी में सेल्स ठीक से काम नहीं करते, दौरे पड़ते हैं। यह दिमाग को कमजोर कर देती है। WHO के अनुसार दुनिया में लगभग ५ करोड़ लोग मिर्गी रोग से पीड़ित हैं। इसका खतरा सभी उम्र के लोगों में होता है। सामान्यत: इसका इलाज संभव नहीं है। मिर्गी आने पर शरीर में दर्द, अकड़न, मरोड़, कंपकंपाहट डर या घबराहट और बेहोशी होने लगती है। स्ट्रोक, ब्रेन स्ट्रोक, सिर पर चोट लगना, ड्रग्स या एल्कोहल सेवन, ब्रेन इंफेक्शन आदि मिर्गी का कारण हो सकते हैं।
*
सॉनेट
राम
*
मुझ में राम, तुझ में राम,
जिस में राम न, कहीं नहीं,
कण में राम, क्षण में राम,
रहते राम न कहाँ नहीं।
राम सुनाम; नहीं अनाम,
दस दिश धाम; न रमें कहीं,
हैं अविराम; राम अकाम,
भक्ति भावना अगिन तहीं।
पल में लगते राम अजान,
पूर्व मान्यता कई ढहीं,
पल में लगते राम सुजान,
बहुत कथाएँ गईं कहीं।
नयन मूँद ले कर दर्शन,
होगा तभी कृपा-वर्षण।
२६.३.२०२४
***
हाइकु गीत
मनमोहक
*
मन की बात
कहूँ मनमोहक
चुप सुनना।।
*
कोई न होना,
कभी असहमत,
दंड मिलेगा।
नाम लिवौआ,
तक न सलामत,
एक रहेगा।
दो दूनी हम,
तीन-पाँच कहते,
तुम कहना।
मन की बात
कहूँ मनमोहक
चुप सुनना।।
*
हमें विरोध,
न तनिक सुहाता,
सहमत हो।
अगर नहीं,
कालिख मल देंगे,
रहम न हो।
कुर्सी पा हम,
मनमानी करते,
चुप सहना।
मन की बात
कहूँ मनमोहक
चुप सुनना।।
*
बदलें हम,
इतिहास हार को,
जय लिख लें।
बदलें नाम,
अकाम काम हर,
तय लिख लें।
हैं भगवान,
भक्त सब कहते,
तुम कहना।
मन की बात
कहूँ मनमोहक
चुप सुनना।
***
काव्यानुवाद विलियम बटलर यीट्स की कविताओं का
३. लबादा, नाव और जूते
'बनाते क्या कहो सुंदर और आभामय?'
'मैं बनाता लबादा दुःख का :
भला लगे देखना नज़रों में
बसा हुआ है लबादा दुःख का,
सब मनुष्यों की नज़र में'।
'बनाते किससे हो पाल भर सको उड़ान?'
'मैं बनाता नाव दुःख के लिए:
सिंधु पर गतिमान निशि-दिन
पार करे यायावर दुःख को
पूरे दिन अरु रात।'
'बुन रहे क्या इस कपासी ऊन से?'
'मैं बुनता हूँ पादुका दुःख की:
ध्वनि बिना हल्की रहे पदचाप
मनुष्यों के दुखित कानों में'
अचानक अरु बहुत हल्की।'
२६-३-२०२२
***
3. The Cloak, The Boat And The Shoes
'What do you make so fair and bright?'
'I make the cloak of Sorrow:
O lovely to see in all men's sight
Shall be the cloak of Sorrow,
In all men's sight.'
'What do you build with sails for flight?'
'I build a boat for Sorrow:
O swift on the seas all day and night
Saileth the rover Sorrow,
All day and night.'
What do you weave with wool so white?'
'I weave the shoes of Sorrow:
Soundless shall be the footfall light
In all men's ears of Sorrow,
Sudden and light.'
***
४. सलिल-द्वीप में
छुईमुई वह, छुईमुई वह,
छुईमुई मनबसिया मेरी,
आती है वह धुंधलके में
अलग-थलग हो लुकती-छिपती।
वह रकाबियों में लाती है
और सीध में रख जाती है
एक द्वीप में सलिल बीच मैं
उसके साथ बसूँ जाकर।
वह आती ले मोमबत्तियाँ
दमकाती कमरा परदामय
शरमाती है बीच डगर में
हो उदास शरमाती है;
छुईमुई खरगोश सरीखी,
नेक और शर्मीली है.
एक द्वीप में सलिल बीच, उड़
उसके साथ बसूँ जाकर।
२६-३-२०२२
***
4. To an Isle in the Water
Shy one, shy one,
Shy one of my heart,
She moves in the firelight
Pensively apart.
She carries in the dishes,
And lays them in a row.
To an isle in the water
With her would I go.
She carries in the candles,
And lights the curtained room,
Shy in the doorway
And shy in the gloom;
And shy as a rabbit,
Helpful and shy.
To an isle in the water
With her would I fly.
२६-३-२०२२
*
५. मछली
यद्यपि तुम छिप जाती हो भाटे-बहाव में
पीत ज्वार में, ढल जाता जब आप चंद्रमा,
आनेवाले कल के सभी लोग जानेंगे
मेरे जाल से भाग निकलने के बारे में,
समझ न पाएँगे कैसे तुम लाँघ सकीं थीं
नन्हीं रजत डोरियों पर से,
वे सोचेंगे तुम कठोर थीं; निर्दय भी थीं
देंगे तुम्हें दोष, वे कड़वे शब्द कहेंगे।
२६-३-२०२२
*
5. The Fish
Although you hide in the ebb and flow
Of the pale tide when the moon has set,
The people of coming days will know
About the casting out of my net,
And how you have leaped times out of mind
Over the little silver cords,
And think that you were hard and unkind,
And blame you with many bitter words.
२६-३-२०२२
***
अरविन्द घोष
श्री अरबिंदो का जीवन युवाकाल से ही उतार चढ़ाव से भरा रहा है। बंगाल विभाजन के बाद श्री अरबिंदो शिक्षा छोड़ कर स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारी के रूप में लग गए। कुछ सालों बाद वह कलकत्ता छोड़ पॉन्डिचेरी बस गए जहाँ उन्होंने एक आश्रम का निर्माण किया। जिसका नेतृत्व मीरा अल्फासा से अपने मृत्यु २४ नवम्बर १९२६ तक किया जिन्हे माँ के नाम से पुकारा जाता था। श्री अरबिंदो का जीवन वेद ,उपनिषद और ग्रंथों को पढ़ने और उनके अभ्यास करने में गुजरा। श्री अरबिंदो ने क्रांतिकारी जीवन त्याग शारीरिक,मानसिक और आत्मिक द्रिष्टी से योग पर अभ्यास किया और दिव्य शक्ति को प्राप्त किया। श्री अरबिंदो का शैक्षिक जीवन भी रहा है जब वे बड़ौदा के एक राजकीय विद्यालय में उपप्रधानाचार्य रह चुके थे। श्री अरबिंदो ने अपनी प्रार्थना में यह माँगा कि – “मैं तो केवल ऐसी शक्ति माँगता हूँ जिससे इस राष्ट्र का उत्थान कर सकूँ, केवल यही चाहता हूँ कि मुझे उन लोगों के लिये जीवित रहने और काम करने दिया जाये जिन्हें मैं प्यार करता हूँ तथा जिनके लिए मेरी प्रार्थना है कि मैं अपना जीवन लगा सकूँ|” उनके अनुसार समग्र योग का लक्ष्य है आध्यात्मिक सिद्धि और अनुभव प्राप्त करना साथ ही साथ सारी सामाजिक समस्यायों से छुटकारा पाना। राष्ट्रीयता एक आध्यात्मिक बल है जो सदैव विद्यमान रहती है और इसमें किसी प्रकार का कोलाहल नहीं होता। श्री अरबिंदो के अनुसार जीवन एक अखंड प्रक्रिया है क्यूंकि यही एक माध्यम है जिससे मानव जाति सम्पूर्ण रूप से सत्य और चेतना का अभ्यास कर दिव्य शक्ति को प्राप्त कर सकते हैं।
अरबिंद कृष्णधन घोष या श्री अरबिंदो एक महान योगी और गुरु होने के साथ साथ गुरु और दार्शनिक भी थे। ईनका जन्म १५ अगस्त १८७२ को कलकत्ता पश्चिम बंगाल में हुआ था। युवा-अवस्था में ही इन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारियों के साथ देश की आज़ादी में हिस्सा लिया। समय ढलते ये योगी बन गए और इन्होंने पांडिचेरी में खुद का एक आश्रम स्थापित किया। वेद, उपनिषद तथा ग्रंथों का पूर्ण ज्ञान होने के कारण इन्होंने योग साधना पर मौलिक ग्रंथ लिखे। श्री अरबिंदो के जीवन का सही प्रभाव विश्वभर के दर्शन शास्त्र पर पड़ रहा है। अलीपुर सेंट्रल जेल से मुक्त होने के बाद श्री अरबिंदो का जीवन ज्यादातर योग और ध्यान में गुजरा।
श्री अरबिंदो के पिता कृष्णधुन घोष और माँ स्वर्णलता और भाई बारीन्द्र कुमार घोष तथा मनमोहन घोष थे। उनके पिताजी बंगाल के रंगपुर में सहायक सर्जन थे और उन्हें अंग्रेजों की संस्कृति काफी प्रभावित करती थी इसलिए उन्होंने उनके बच्चो को इंग्लिश स्कूल में डाल दिया था। वे चाहते थे कि उनके बच्चे क्रिश्चियन धर्म के बारे में भी बहुत कुछ जान सकें। घोष चाहते थे कि वे उच्च शिक्षा ग्रहण कर उच्च सरकारी पद प्राप्त करें। जब अरविंद घोष पाँच साल के थे, तो उन्हें पढ़ने के लिए दार्जिलिंग के लोरेटो कॉन्वेंट स्कूल में भेजा गया। यह अंग्रेज सरकार के संस्कृति का मुख्य केंद्र माना जाता था। तत्पश्चात उन्होंने ७ वर्ष की अल्पायु में ही श्री अरबिंदो को पढ़ने इंग्लैंड भेज दिया। इंग्लैंड में अरबिन्दों घोष ने अपनी पढाई की शुरुवात सैंट पौल्स स्कूल (1884) से की और छात्रवृत्ति मिलने के बाद में उन्होंने कैम्ब्रिज के किंग्स कॉलेज (१८९०) में पढाई पूरी की। १८ वर्ष के होते ही श्री अरबिंदो ने ICS की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। १८ साल की आयु में इन्हें कैंब्रिज में प्रवेश मिल गया। अरविंद घोष ना केवल आध्यात्मिक प्रकृति के धनी थे बल्कि उनकी उच्च साहित्यिक क्षमता उनके माँ की शैली की थी। इसके साथ ही साथ उन्हें अंग्रेज़ी, फ्रेंच, ग्रीक, जर्मन और इटालियन जैसे कई भाषाओं में निपुणता थी। सभी परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद भी वे घुड़सवारी के परीक्षा में विफल रहे जिसके कारण उन्हें भारतीय सिविल सेवा में प्रवेश नहीं मिला।
सन् १८९३ में श्री अरबिंदो भारत लौट आए और बड़ौदा के एक राजकीय विद्यालय में ७५० रुपये वेतन पर उपप्रधानाचार्य नियुक्त किए गए। बड़ौदा के राजा द्वारा उन्हें सम्मानित किया गया। १८९३ से १९०६ तक उन्होंने संस्कृत, बंगाली साहित्य, दर्शनशास्त्र और राजनीति विज्ञान का विस्तार से अध्ययन किया। स्वदेश आने पर उनके विचारों से प्रभावित होकर गायकवाड़ नरेश ने उन्हें बड़ौदा में अपनी निजी सचिव के पद पर नियुक्त किया। यहीं से वे कोलकाता आए और फिर महर्षि अरविंद आजादी के आंदोलन में कूद पड़े। अरबिन्दो घोष के परदादा ब्राह्मो समाज जैसी धार्मिक सुधारना आन्दोलन में काफी सक्रिय रहते थे। उनसे प्रेरित होकर ही अरबिन्दो घोष सामाजिक सुधारना लाना चाहते थे। २८ साल की उम्र में साल१९०१ में अरबिन्दों घोष ने भूपाल चन्द्र बोस की लड़की मृणालिनी से विवाह किया था। लेकिन दिसंबर १९१८ में इन्फ्लुएंजा के संक्रमण से मृणालिनी की मृत्यु हो गयी थी।
उनके भाई बारिन ने उन्हें बाघा जतिन, जतिन बनर्जी और सुरेंद्रनाथ टैगोर जैसी क्रांतिकारियों से मिलवाया। कुछ सालों तक भारत में रहने के बाद में अरबिन्दो घोष को एहसास हुआ कि अंग्रेजों ने भारतीय संस्कृति को नष्ट करने की कोशिश की है और इसलिए धीरे धीरे वह राजनीति में रुचि लेने लगे थे। उन्होंने शुरू से ही भारत के लिए पूर्ण स्वतंत्रता की मांग पर जोर दिया था। इसके बाद वे १९०२ में अहमदाबाद के कांग्रेस सत्र में बाल गंगाधर तिलक से मिले और बाल गंगाधर से प्रभावित होकर स्वतंत्रता संघर्ष से जुड़ गए। वर्ष १९०६ में बंग-भग आंदोलन के दौरान महर्षि ने बड़ौदा से कलकत्ता की तरफ कदम बढ़ाए और इसी दौरान उन्होंने अपनी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया।
नौकरी छोड़ने के बाद उन्होंने 'वंदे मातरम्' साप्ताहिक के सहसंपादन के रूप से अपना काम प्रारंभ किया। उन्होंने ब्रिटिश सरकार के अन्याय के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करते हुए जोरदार आलोचना की। ब्रिटिश सरकार के खिलाफ लिखने पर उन पर मुकदमा दर्ज किया गया, लेकिन वे छूट गए। १९०५ में हुए बंगाल बिभाजन के बाद हुए क्रांतिकारी आंदोलन से इनका नाम जोड़ा गया। १९०५ मे व्हाईसरॉय लॉर्ड कर्झन ने बंगाल का विभाजन किया। पूारे देश मे बंगाल के विभाजन के खिलाफ आंदोलन शुरु हुए। पूरा राष्ट्र इस विभाजन के खिलाफ उठ खडा हुआ। ऐसे समय में अरबिंद जैसे क्रांतिकारक का चैन से बैठना नामुमकिन था। बंगाल का विभाजन होने के बाद वह सन १९०६ में कोलकाता आ गए थे। ऊपर से अरबिन्दो घोष असहकार और शांत तरीके से अंग्रेज सरकार का विरोध करते थे, लेकिन अंदर से वे क्रांतिकारी संघटना के साथ काम करते थे। बंगाल के अरबिंदो घोष कई क्रांतिकारियों के साथ में रहते थे और उन्होंने ही बाघा जतिन, जतिन बनर्जी और सुरेन्द्रनाथ टैगोर को प्रेरित किया था।१९०६ में बंगाल विभाजन के बाद श्री अरबिंदो ने इस्तीफा दे दिया और देश की आज़ादी के लिए आंदोलनों में सक्रिय होने लगे।
साथ ही कई सारी समितियों की स्थापना की थी जिसमें अनुशीलन समिति भी शामिल है। साल १९०६ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में भी उन्होंने हिस्सा लिया था, दादाभाई नौरोजी इस अधिवेशन के अध्यक्ष थे। उन्होंने राष्ट्रीय आन्दोलन के चार मुख्य उद्देश्यों- स्वराज, स्वदेश, बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा की पूर्ति के लिए काम किया था। उन्होंने सन १९०७ में ‘वन्दे मातरम’ अखबार निकाला।सरकार के अन्याय पर ‘वंदे मातरम्’ मे सें उन्होंने जोरदार आलोचना की। ‘वंदे मातरम्’ मे ब्रिटिश के खिलाफ लिखने की वजह से उनके उपर मामला दर्ज किया गया लेकीन वो छुट गए। सन १९०७ में कांग्रेस मध्यम और चरमपंथी ऐसे दो गुटों में बट चूका थे। अरविन्द घोष चरमपंथी गुटों में शामिल थे और वह बाल गंगाधर तिलक का समर्थन करते थे। उसके बाद मे अरविन्द घोष पुणे, बरोदा बॉम्बे गए और वहापर उन्होंने राष्ट्रीय आन्दोलन के लिए बहुत काम किया।
१९०८ मे खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी इन अनुशीलन समिति के दो युवकोंने किंग्जफोर्ड इस जुलमी जज को मार डालने की योजना बनाई। पर उसमे वो नाकाम रहे। खुदीराम बोस पुलिस के हाथों लगे। उन्हें फांसी दी गयी। पुलिस ने अनुशीलन समिति के सदस्यों को पकड़ना शुरु किया। अरविंद घोष को भी गिरफ्तार किया गया। १९०८-०९ में उन पर अलीपुर बमकांड मामले में राजद्रोह का मुकदमा चला। अलीपुर बम केस श्री अरबिंदो के जीवन का अहम हिस्सा था। एक साल के लिए उन्हें अलीपुर सेंट्रल जेल के सेल में रखा गया जहाँ उन्होंने एक सपना देखा कि भगवान ने उन्हें एक दिव्य मिशन पर जाने का उपदेश दिया। इसके बाद कहा जाता है कि उन्हें अलीपुर जेल में ही भगावन कृष्ण के दर्शन हुए। यहाँ से उनका जीवन पूरी तरह बदला और वे साधना और तप करते, गीता पढ़ते और भगवान श्रीकृष्ण की आराधना करते। वह अपनी अवधि से जल्दी बरी हो गए थे। स्वतंत्रता संग्राम में प्रमुख भूमिका निभाने के साथ साथ उन्होनें अंग्रेज़ी दैनिक ‘वंदे मातरम’ पत्रिका का प्रकाशन किया और निर्भय होकर लेख लिखें।
रिहाई के बाद उन्होंने कई ध्यान किए और उनपर निरंतर अभ्यास करते रहें। सन् १९१० में श्री अरबिंदो कलकत्ता छोड़कर पांडिचेरी बस गए। वहाँ उन्होंने एक संस्था बनाई और एक आश्रम का निर्माण किया। जब वे जेल से बाहर आए, तो आंदोलन से नहीं जुड़े और १९१० में पुड्डचेरी चले गए और यहाँ उन्होंने योग द्वारा सिद्धि प्राप्त कर काशवाहिनी नामक रचना की। १९२६ में अपनी आध्यात्मिक सहचरी मिर्रा अल्फस्सा (माता) की मदद से श्री अरबिन्दो आश्रम की स्थापना की।महर्षि अरविंद एक महान योगी और दार्शनिक थे। उन्होंने योग साधना पर कई मौलिक ग्रंथ लिखे। सन् १९१४ में श्री अरबिंदो ने आर्य नामक दार्शनिक मासिक पत्रिका का प्रकाशन किया। अगले ६ सालों में उन्होंने कई महत्वपूर्ण रचनाएँ की। कई शास्त्रों और वेदों का ज्ञान उन्होंने जेल में ही प्रारंभ कर दी थी। सन् १९२६ में श्री अरबिंदो सार्वजनिक जीवन में लीन हो गए।
द रेनेसां इन इंडिया – The Renesan in India, वार एंड सेल्फ डिटरमिनेसन – War and Self Determination, द ह्यूमन साइकिल – The Human Cycle, द आइडियल ऑफ़ ह्यूमन यूनिटी – The Ideal of Human Unity तथा द फ्यूचर पोएट्री – The Future Poetry, दिव्य जीवन, द मदर, लेटर्स आन् योगा, सावित्री, योग समन्वय, महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं। कविता को समृद्ध बनाने में उन्होंने १९३० के दौरान महान योगदान दिया है। उन्होंने “सावित्री” नाम की एक बड़ी २४००० पंक्तियों की कविता लिखी है और उनकी यह कविता अध्यात्म पर आधारित है। इन सब के साथ-साथ वे दर्शनशास्त्री, कवि, अनुवादक और वेद, उपनिषद और भगवत् गीता पर लिखने का भी काम करते थे।अरबिन्दो घोष को कविता, अध्यात्म और तत्त्वज्ञान में जो योगदान दिया उसके लिए उन्हें नोबेल का साहित्य पुरस्कार(१९४३) और नोबेल का शांति पुरस्कार(१९५०) के लिए भी नामित किया गया था।
५ दिसंबर, १९५० को श्री अरबिन्दो घोष की मृत्यु हो गयी थी। निधन के चार दिन तक उनके पार्थिव शरीर में दिव्य आभा बनी रही, जिसकी वजह से उनका अतिम संस्कार नहीं किया गया और ९ दिसंबर १९५० को उन्हें आश्रम में ही समाधि दी गई।
सॉनेट
निष्णात
*
आइए! निष्णात हों हम।
अहर्निश कर लें परिश्रम।
टिक न पाए तनिक भी तम।।
भले झरते पात हों हम।।
हो ख़ुशी या साथ हो गम।
हारना हिम्मत नहीं है।
दूर हमसे प्रभु नहीं है।।
छाँव हो या धूप, हो सम।।
कुछ अधिक या कुछ मिले कम।
बाँट लेंगे साथ मिल हम।
ऑंख कोई भी न हो नम।।
भय न हमको है तनिक यम।
ठोंकते भी हम नहीं खम।
गले मिल लें आओ हमदम।।
***
सॉनेट
पलाश
रेवा तट पर तप रत योगी
चट्टानों पर अचल पलाश
लाल नेत्र कहते जग भोगी
नित विराग यह रहा तलाश
गिरि वन नदी मिटाता रोगी
मानव करता खुद का नाश
अन्य न इसके जैसा ढोंगी
खुद को खुदी सुधारे काश
हुई, हो रही, दुर्गति होगी
नोचें गीदड़-गीध न लाश
मनु का मनु से युद्ध हुआ तो
बिखरेंगे घर जैसे ताश
क्रुद्ध बहुत पर है न हताश।
बुद्ध खोजता नित्य पलाश।।
२६-३-२०२२
***
मुक्तिका
*
सुधियाँ तुम्हारी जब तहें
अमृत-कलश तब हम गहें
श्रम दीप मंज़िल ज्योति हो
कोशिश शलभ हम मत दहें
बन स्नेह सलिला बिन रुके
नफरत मिटा बहते रहें
लें चूम सुमुखि कपोल जब
संयम किले पल में ढहें
कर काम सब निष्काम हम
गीता न कहकर भी कहें
***
गीत
*
डरो नें कोरोना से गुइयाँ,
जा जमराज-डिठौना
अनाचार जो मानुस कर रै
दुराचार कर के बे मर रै
भार तनक घट रऔ धरती को
संग गहूँ के घुन सोइ पिस रै
भोग-रोग सें ग्रस्त करा रय
असमय अंतिम गौना
खरे बोल सुन खरे रओ रे!
परबत पै भी हरे रओ रे!
झूठी बात नें तनक बनाओ
अनुसासित रै जीबन पाओ
तन-मन ऊँसई साफ करो रे
जैसें करत भगौना
घर में घरकर रओ खुसी सें
एक-दूजे को सओ खुसी सें
गोड़-हांत-मूँ जब-तब धोओ
राम-राम कै, डटकर सोओ
बाकी काम सबई निबटा लो
करो नें अद्धा-पौना
***
मुक्तिका
*
अर्णव-अरुण का सम्मिलन
जिस पल हुआ वह खास है
श्री वास्तव में है वहीं
जहँ हर हृदय में हुलास है
श्रद्धा जगत जननी उमा
शंकारि शिव विश्वास है
सद्भाव सलिला है सुखद
मालिन्य बस संत्रास है
मिल गैर से गंभीर रह
अपनत्व में परिहास है
मिथिलेश तन नृप हो भले
मन जनक तो वनवास है
मीरा मनन राधा जतन
कान्हा सुकर्म प्रयास है
२६-३-२०२०
***
भोजपुरी दोहे:
नेह-छोह रखाब सदा
*
नेह-छोह राखब सदा, आपन मन के जोश.
सत्ता का बल पाइ त, 'सलिल; न छाँड़ब होश..
*
कइसे बिसरब नियति के, मन में लगल कचोट.
खरे-खरे पीछे रहल, आगे आइल खोट..
*
जीए के सहरा गइल, आरच्छन के हाथ.
अनदेखी काबलियत कs, लख-हरि पीटल माथ..
*
आस बन गइल सांस के, हाथ न पड़ल नकेल.
खाली बतिय जरत बा, बाकी बचल न तेल..
*
दामन दोस्तन से बचा, दुसमन से मत भाग.
नहीं पराया आपना, मुला लगावल आग..
*
प्रेम बाग़ लहलहा के, क्षेम सबहिं के माँग.
सुरज सबहिं बर धूप दे, मुर्गा सब के बाँग..
*
शीशा के जेकर मकां, ऊहै पाथर फेंक.
अपने घर खुद बार के, हाथ काय बर सेंक?.
२६-३-२०१८
***
विधा विविधा:
हाइकु:
(त्रिपदिक वाचिक जापानी छंद ५-७-५ ध्वनि)
.
गुलाब खिले
तुम्हारे गालों पर
निगाह मिले.
*
माहिया:
(त्रिपदिक मात्रिक पंजाबी छंद, १३-१०-१३ मात्रा)
.
मत माँगने मत आना
जुमला वादों को
कह चाहते बिसराना.
*
क्षणिका:
( नियम मुक्त)
.
मन-पंछी
उड़ा नीलाभ नभ में
सिंदूरी प्राची से आँख मिलाने,
झटपट भागा
सूरज ने आँख तरेरी
लगा धरती को जलाने.
***
चित्र अलंकार: समकोण त्रिभुज
(वर्ण पिरामिड: ७ पंक्ति, वर्ण क्रमश: १ से ७)
मैं
भीरु
कायर
डरपोंक,
हूँ भयभीत
वर्ण पिरामिड
लिखना नहीं आता.
*
हो
तुम
साहसी
पराक्रमी
बहादुर भी
मुझ असाहसी
को झेलते रहे हो.
२५.३.२०१८
***
हास्य सलिला:
उमर क़ैद
*
नोटिस पाकर कचहरी पहुँचे चुप दम साध.
जज बोलीं: 'दिल चुराया, है चोरी अपराध..'
हाथ जोड़ उत्तर दिया, 'क्षमा करें सरकार!.
दिल देकर ही दिल लिया, किया महज व्यापार..'
'बेजा कब्जा कर बसे, दिल में छीना चैन.
रात स्वप्न में आ किया, बरबस कर बेचैन..
लाख़ करो इनकार तुम, हम मानें इकरार.
करो जुर्म स्वीकार- अब, बंद करो तकरार..'
'देख अदा लत लग गयी, किया न कोई गुनाह.
बैठ अदालत में भरें, हम दिल थामे आह..'
'नहीं जमानत मिलेगी, सात पड़ेंगे फंद.
उम्र क़ैद की अमानत, मिली- बोलती बंद..
***
कुण्डलिया
सरिता शर्माती नहीं, हरे जगत की प्यास
बिन सरिता कैसे मिटे, असह्य तृषा का त्रास
असह्य तृषा का त्रास, हरे सरिता बिन बोले
वंदन-निंदा कुछ करिये, चुप रहे न तोले
'सलिल' साक्षी है, युग-प्राण बचाती भरिता
हरे जगत की प्यास नहीं शर्माती सरिता
*
देह दुर्ग में विराजित, दुर्ग-ईश्वरी आत्म
तुम बिन कैसे अवतरित, हो भू पर परमात्म?
हो भू पर परमात्म, दुर्ग है तन का बन्धन
मन का बन्धन टूटे तो, मन करता क्रंदन
जाति वंश परिवार, हैं सुदृढ़ दुर्ग सदेह
रिश्ते-नातों अदिख, हैं दुर्ग घेरते देह
२६-३-२०१७
***
पुस्तक सलिला-
ज़ख्म - स्त्री विमर्श की लघुकथाएँ
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
[पुस्तक विवरण- ज़ख्म, लघुकथा संग्रह, विद्या लाल, वर्ष २०१६, पृष्ठ ८८, मूल्य ७०/-, आकार डिमाई, आवरण बहुरंगी पेपरबैक, बोधि प्रकाशन ऍफ़ ७७, सेक़्टर ९, मार्ग ११, करतारपुरा औद्योगिक क्षेत्र, बाईस गोदाम, जयपुर ३०२००६, ०१४१ २५०३९८९, bodhiprakashan@gmail.com, रचनाकार संपर्क द्वारा श्री मिथलेश कुमार, अशोक नगर मार्ग १ ऍफ़, अशोक नगर, पटना २०, चलभाष ०९१६२६१९६३६]
*
वैदिक काल से भारतीय संस्कृति सनातनता की पोषक रही है। साहित्य सनातन मूल्यों का सृजक और रक्षक की भूमिका में सत्य-शिव-सुन्दर को लक्षित कर रचा जाता रहा। विधा का 'साहित्य' नामकरण ही 'हित सहित' का पर्याय है. हित किसी एक का नहीं, समष्टि का। 'सत्यं ज्ञानं अनंतं ब्रम्ह' सत्य और ज्ञान ब्रम्ह की तरह अनन्त हैं। स्वाभाविक है कि उनके विस्तार को देखने के अनेक कोण हों। दृष्टि जिस कोण पर होगी उससे होनेवाली अनुभूति को ही सत्य मान लेगी, साथ ही भिन्न कोण से हो रही अनुभूति को असत्य कहने का भ्रम पाल लेगी। इससे बचने के लिये समग्र को समझने की चेष्टा मनीषियों ने की है। बोध कथाओं, दृष्टांत कथाओं, उपदेश कथाओं, जातक कथाओं, पंचतंत्र, बेताल कथाओं, किस्सा चहार दरवेश, किस्सा हातिम ताई, अलीबाबा आदि में छोटी-बड़ी कहानियों के माध्यम से शुभ-अशुभ, भले-बुरे में अंतर कर सकनेवाले जीवन मूल्यों के विकास, बुरे से लड़ने का मनोबल देने वाली घटनाओं का शब्दांकन, स्वस्थ्य मनोरंजन देने का प्रयास हुआ। साहित्य का लक्ष्य क्रमश: सकल सृष्टि, समस्त जीव, मानव संस्कृति तथा उसकी प्रतिनिधि इकाई के रूप में व्यक्ति का कल्याण रहा।
पराभव काल में भारतीय साहित्य परंपरा पर विदेशी हमलावरों द्वारा कुठाराघात तथा पराधीनता के दौर ने सामाजिक समरसता को नष्टप्राय कर दिया और तन अथवा मन से कमजोर वर्ग शोषण का शिकार हुआ। यवनों द्वारा बड़ी संख्या में स्त्री-हरण के कारण नारियों को परदे में रखने, शिक्षा से वंचित रखने की विवशता हो गयी। अंग्रेजों ने अपनी भाषा और संस्कृति थोपने की प्रक्रिया में भारत के श्रेष्ठ को न केवल हीं कहा अपितु शिक्षा के माध्यम से यह विचार आम जन के मानस में रोप दिया। स्वतंत्रता के पश्चात अवसरवादी राजनिति का लक्ष्य सत्ता प्राप्ति रह गया। समाज को विभाजित कर शासन करने की प्रवृत्ति ने सवर्ण-दलित, अगड़े-पिछड़े, बुर्जुआ-सर्वहारा के परस्पर विरोधी आधारों पर राजनीति और साहित्य को धकेल दिया। आधुनिक हिंदी को आरम्भ से अंग्रेजी के वर्चस्व, स्थानीय भाषाओँ-बोलियों के द्वेष तथा अंग्रेजी व् अन्य भाषाओं से ग्रहीत मान्यताओं का बोझ धोना पड़ा। फलत: उसे अपनी पारम्परिक उदात्त मूल्यों की विरासत सहेजने में देरी हुई।
विदेश मान्यताओं ने साहित्य का लक्ष्य सर्वकल्याण के स्थान पर वर्ग-हित निरुपित किया। इस कारण समाज में विघटन व टकराव बढ़ा। साहित्यिक विधाओं ने दूरी काम करने के स्थान पर परस्पर दोषारोपण की पगडण्डी पकड़ ली। साम्यवादी विचारधारा के संगठित रचनाकारों और समीक्षकों ने साहित्य का लक्ष्य अभावों, विसंगतियों, शोषण और विडंबनाओं का छिद्रान्वेषण मात्र बताया। समन्वय, समाधान तथा सहयोग भाव हीं साहित्य समाज के लिये हितकर न हो सका तो आम जन साहित्य से दूर हो गया। दिशाहीन नगरीकरण और औद्योगिकीकरण ने आर्थिक, धार्मिक, भाषिक और लैंगिक आधार पर विभाजन और विघटन को प्रश्रय दिया। इस पृष्ठभूमि में विसंगतियों के निराकरण के स्थान पर उन्हें वीभत्स्ता से चित्रित कर चर्चित होने ही चाह ने साहित्य से 'हित' को विलोपित कर दिया। स्त्री प्रताड़ना का संपूर्ण दोष पुरुष को देने की मनोवृत्ति साहित्य ही नहीं, राजनीती आकर समाज में भी यहाँ तक बढ़ी कि सर्वोच्च न्यायलय को हबी अनेक प्रकरणों में कहना पड़ा कि निर्दोष पुरुष की रक्षा के लिये भी कानून हो।
विवेच्य कृति ज़ख्म का लेखन इसी पृष्ठ भूमि में हुआ है। अधिकांश लघुकथाएँ पुरुष को स्त्री की दुर्दशा का दोषी मानकर रची गयी हैं। लेखन में विसंगतियों, विडंबनाओं, शोषण, अत्याचार को अतिरेकी उभार देने से पीड़ित के प्रति सहानुभूति तो उपज सकती है, पर पीड़ित का मनोबल नहीं बढ़ सकता। 'कथ' धातु से व्युत्पन्न कथा 'वह जो कही जाए' अर्थात जिसमें कही जा सकनेवाली घटना (घटनाक्रम नहीं), उसका प्रभाव (दुष्प्रभाव हो तो उससे हुई पीड़ा अथवा निदान, उपदेश नहीं), आकारगत लघुता (अनावश्यक विस्तार न हो), शीर्षक को केंद्र में रखकर कथा का बुनाव तथा प्रभावपूर्ण समापन के निकष पर लघुकथाओं को परखा जाता है। विद्यालाल जी का प्रथम लघुकथा संग्रह 'जूठन और अन्य लघुकथाएँ' वर्ष २०१३ में आ चुका है। अत: उनसे श्रेष्ठ लघुकथाओं की अपेक्षा होना स्वाभाविक है।
ज़ख्म की ६४ लघुकथाएँ एक ही विषय नारी-विमर्श पर केंद्रित हैं। विषयगत विविधता न होने से एकरसता की प्रतीति स्वाभाविक है। कृति समर्पण में निर्भय स्त्री तथा निस्संकोच पुरुष से संपन्न भावी समाज की कामना व्यक्त की गयी है किन्तु कृति पुरुष को कटघरे में रखकर, पुरुष के दर्द की पूरी तरह अनदेखी करती है। बेमेल विवाह, अवैध संबंध, वर्ण-वैषम्य, जातिगत-लिंगगत, भेदभाव, स्त्री के प्रति स्त्री की संवेदनहीनता, बेटी-बहू में भेद, मिथ्याभिमान, यौन-अपराध, दोहरे जीवन मूल्य, लड़कियों और बहन के प्रति भिन्न दृष्टि, आरक्षण का गलत लाभ, बच्चों से दुष्कर्म, विजातीय विवाह, विधवा को सामान्य स्त्री की तरह जीने के अधिकार, दहेज, पुरुष के दंभ, असंख्य मनोकामनाएँ, धार्मिक पाखण्ड, अन्धविश्वास, स्त्री जागरूकता, समानाधिकार, स्त्री-पुरुष के दैहिक संबंधों पर भिन्न सोच, मध्य पान, भाग्यवाद, कन्या-शिक्षा, पवित्रता की मिथ्या धारणा, पुनर्विवाह, मतदान में गड़बड़ी, महिला स्वावलम्बन, पुत्र जन्म की कामना, पुरुष वैश्या, परित्यक्ता समस्या, स्त्री स्वावलम्बन, सिंदूर-मंगलसूत्र की व्यर्थता आदि विषयों पर संग्रह की लघुकथाएं केंद्रित हैं।
विद्या जी की अधिकांश लघुकथाओं में संवाद शैली का सहारा लिया गया है जबकि समीक्षकों का एक वर्ग लघुकथा में संवाद का निषेध करता है। मेरी अपनी राय में संवाद घटना को स्पष्ट और प्रामाणिक बनने में सहायक हो तो उन्हें उपयोग किया जाना चाहिए। कई लघुकथाओं में संवाद के पश्चात एक पक्ष को निरुत्तरित बताया गया है, इससे दुहराव तथा सहमति का आभाव इंगित होता है। संवाद या तर्क-वितरक के पश्चात सहमति भी हो सकती है। रोजमर्रा के जीवन से जुडी लघुकथाओं के विषय सटीक हैं। भाषिक कसाव और काम शब्दों में अधिक कहने की कल अभी और अभ्यास चाहती है। कहीं-कहीं लघुकथा में कहानी की शैली का स्पर्श है। लघुकथा में चरित्र चित्रण से बचा जाना चाहिए। घटना ही पात्रों के चरित को इंगित करे, लघुकथाकार अलग से न बताये तो अधिक प्रभावी होता है। ज़ख्म की लघुकथाएँ सामान्य पाठक को चिंतन सामग्री देती हैं। नयी पीढ़ी की सोच में लोच को भी यदा-कदा सामने लाया गया है।संग्रह का मुद्रण सुरुचिपूर्ण तथा पाठ्य त्रुटि-रहित है।
२६.३.२०१६
***
सामयिक रचना :
करे फैसला कौन?
*
मन का भाव बुनावट में निखरा कढ़कर है
जो भीतर से जगा, कौन उससे दृढ़कर है?
करे फैसला कौन?, कौन किससे बढ़कर है??
*
जगा जगा दुनिया को हारे खुद सोते ही रहे
गीत नर्मदा के गाए पर खुद ही नहीं बहे
अकथ कहानी चाह-आह की किससे कौन कहे
कर्म चदरिया बुने कबीरा गुपचुप बिना तहे
निज नज़रों में हर कोई सबसे चढ़कर है
जो भीतर से जगा, कौन उससे बढ़कर है?
करे फैसला कौन?, कौन किससे बढ़कर है??
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निर्माता-निर्देशक भौंचक कितनी पीर सहे
पात्र पटकथा लिख मनमानी अपने हाथ गहे
मण्डी में मंदी, मानक के पल में मूल्य ढहे
सोच रहा निष्पक्ष भाव जो अपनी आग दहे
माटी माटी से माटी आई गढ़कर है
जो भीतर से जगा, कौन उससे बढ़कर है?
करे फैसला कौन?, कौन किससे बढ़कर है??
२६-३-२०१४
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दोहा सलिला:
दोहा पिचकारी लिये
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दोहा पिचकारी लिये,फेंक रहा है रंग.
बरजोरी कुंडलि करे, रोला कहे अभंग..
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नैन मटक्का कर रहा, हाइकु होरी संग.
फागें ढोलक पीटती, झांझ-मंजीरा तंग..
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नैन झुके, धड़कन बढ़ी, हुआ रंग बदरंग.
पनघट के गालों चढ़ा, खलिहानों का रंग..
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चौपालों पर बह रही, प्रीत-प्यार की गंग.
सद्भावों की नर्मदा, बजा रही है चंग..
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गले ईद से मिल रही, होली-पुलकित अंग.
क्रिसमस-दीवाली हुलस, नर्तित हैं निस्संग..
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गुझिया मुँह मीठा करे, खाता जाये मलंग.
दाँत न खट्टे कर- कहे, दहीबड़े से भंग..
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मटक-मटक मटका हुआ, जीवित हास्य प्रसंग.
मुग्ध, सुराही को तके, तन-मन हुए तुरंग..
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बेलन से बोला पटा, लग रोटी के अंग.
आज लाज तज एक हैं, दोनों नंग-अनंग..
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फुँकनी को छेड़े तवा, 'तू लग रही सुरंग'.
फुँकनी बोली: 'हाय रे! करिया लगे भुजंग'..
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मादल-टिमकी में छिड़ी, महुआ पीने जंग.
'और-और' दोनों करें, एक-दूजे से मंग..
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हाला-प्याला यों लगे, ज्यों तलवार-निहंग.
भावों के आवेश में, उड़ते गगन विहंग..
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खटिया से नैना मिला, भरता माँग पलंग.
उसने बरजा तो कहे:, 'यही प्रीत का ढंग'..
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भंग भवानी की कृपा, मच्छर हुआ मतंग.
पैर न धरती पर पड़ें, बेपर उड़े पतंग..
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रंग पर चढ़ा अबीर या, है अबीर पर रंग.
बूझ न कोई पा रहा, सारी दुनिया दंग..
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मतंग=हाथी, विहंग = पक्षी,
२६.३.२०१३
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दोहा
नेह-नर्मदा सनातन, 'सलिल' सच्चिदानंद.
अक्षर की आराधना, शाश्वत परमानंद..
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मुक्तक
ममता को समता के पलड़े में कैसे हम तौल सकेंगे.
मासूमों से कानूनों की परिभाषा क्या बोल सकेंगे?
जिन्हें चाहिए लाड-प्यार की सरस हवा के शीतल झोंके-
'सलिल' सिर्फ सुविधा देकर साँसों में मिसरी घोल सकेंगे?
२६-३-२०१०
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