कुल पेज दृश्य

राम लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
राम लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 25 जून 2026

जून २५, दोहा, नयन, सॉनेट, राम, सरस्वती, सवैया, मुक्तक, दोहागीत, ग़ज़लिका

 सलिल सृजन जून २५

*
नयनावली
नयन न मन की सुन रहे, करें नमन दिन-रैन।
नयन नयन से मिल हुए, चैन गँवा बेचैन।।
.
नयन चार जबसे हुए, भूल गए हैं द्वैत।
जब तक नैना चार हैं, तब तक प्रिय अद्वैत।।
.
नय न नयन को याद अब, नयन अनयन एक।
नयन न सुनते क्या कहें, अनुभव बुद्धि विवेक।।
.
नयन देखकर रूप को, कैसे करें बखान।
जिव्हा न देखे रूप को, पर करती गुणगान।।
.
नयन बोलते अबोले, देख न देखें सत्य।
भोगें चुप परिणाम पर, आप न करते कृत्य।।
.
शारद-शक्ति नयन बसें, नयन लक्ष्मी भक्त।
वाक् अवाक निहारती, किसको कहे सशक्त।।
.
नयन डूबकर नयन में, हो जाते भव पार।
जो नैना डूबन डरे, क्या जाने मझधार।।
.
नयन लड़े झुक उठ मिले, करे न युद्ध विराम।
साथ न होकर साथ हो, बन गुलाम बेदाम।।
२६.५.२०२५
***
सॉनेट
नर्तन
*
नर्तन करते खुद को भूल शिव ले डमरू, विषधर झूम,
सलिल करे अभिषेक, पखारे पद प्रलयंकर के हो धन्य,
नाद अनाहद सुनें उमा माँ बाजे घुँघरू, तिक तिक धूम,
गणपति कार्तिक नंदी मूषक सिंह नाचते दृश्य अनन्य।
शारद वीणा सुने पवन नभ धरा दिशा दिगंत जीवंत,
ग्रह-उपग्रह नक्षत्र सितारे, हुए परिक्रमित रचने सृष्टि,
शंख-नाद हरि करें, रमा की वाणी का माधुर्य अनंत,
मंत्र मुग्ध विधि, सकल सिद्धि दे शारद कहे रखो सम दृष्टि।
वादन-गायन करें कान्ह नटवर, नटराज विलोक प्रसन्न,
राग-ताल ठाणे कर जोड़े, राग-रागिनी जन्म सफल,
रसानंद की छंद कहे जय, गोपी-गोप मुग्ध आसन्न,
चित्र गुप्त अनहद अरु अनुपम, ह्रदय विराजित अचल अटल।
नर्तन परिवर्तन का साक्षी, दर्शन करे सुदर्शन का
दूर विकर्षण पल में कर, नैकट्य रचे आकर्षण का।
२५-६-२०२३
***
मुक्तक
निंगा देव मूल भारत के लिंगायत ले परम विराग
प्रकृति-पुरुष को बोल शिवा-शिव सृष्टि वृद्धि हित वरते राग
सिर पर अमृत, कंठ गरल धर, सलिल धार दे प्यास मिटा,
वृषभ कृषक, सिंह वन्यबंधु, मूषक लघु सबका अमर सुहाग
२५-६-२०२३
***
सॉनेट
अखिलेश
घटघटवासी औघड़दानी
हे अखिलेश! तुम्हारी जय जय।
विषपायी बाबा शमशानी
करो कृपा जिस पर हो निर्भय।
हे कामारि! कलाविद तुमसा
अन्य न कोई हुआ, न होगा।
शशिधर डमरूधर उमेश हे!
भक्त करें वंदन नित यश गा।
अखिल विश्व के भाग्यनियंता
सकल सृष्टि संप्राणित तुमसे।
लेकिन यह भी तो सच ही है
जगतपूज्य हो प्रभु तुम हमसे।
हें ओंकारनाथ! विपदा हर
हर्षित कर, गाए जन हर हर।
२५-६-२०२२
•••
दोहा सलिला
गीता पढ़कर नित पिता, रहे पढ़ाते पाठ
सदानंद कर्त्तव्य से, मिले करो हंस ठाठ
*
विभा-रश्मि जब साथ हो, तब न तिमिर को भूल
भूमि रेणु से जो जुड़े, वह सरला मति फूल
*
पिता शिवानी पूजते, माँ शंकर की भक्त
भोर दुपहरी रीझती, संध्या थी अनुरक्त
*
करते भजन रमेश का, थे न रमा आधीन
शेख मान शहजाद सम, दें आदर बन दीन
*
राहुल और यशोधरा, साथ रहे बन बुद्ध
थे अनुराग-विराग के मूर्त रूप सन्नद्ध
*
प्रतिमा मन में पिता की, शोभित माँ के साथ
जीव हुआ संजीव तब, धर पग में नत माथ
*
श्वास आस माता पिता, हैं श्रद्धा-विश्वास
इंद्र-इंदिरा ले गए, अब है शेष उजास
२५-६-२०२१
****
विमर्श:
कब हुए थे राम?
भारतीय कालगणना के अनुसार सृष्टि निर्मित हुए १ ९६ ०८ ५३ १२१ वर्ष हो चुके हैं। पाश्चात्य वैज्ञानिक गणना कालांश से पीछे भी जाते है। वे काल गणना ईसा के जन्म से मानते रहे जब देखा कि भारत का इतिहास इससे भी पुराना है, तब इन्होंने AD( anno Domini) ईसा के बाद, BC (Before christ)ईसा पूर्व की कल्पना गढ़ी।
आज से ५५५० वर्ष पूर्व द्वापर युग के अंत में महाभारत युद्ध हुआ था।रामायण त्रेतायुग में हुई थी जिसका काल वर्तमान वैवस्वत मन्वंतर की २८ वीं चतुर्युगी के त्रेतायुग का है। वैदिक गणित/विज्ञान के अनुसार सृष्टि १४ मन्वंतर तक चलती है। प्रत्येक मन्वंतर में ७१ चतुर्युग होते हैं। एक चतुर्युग में ४ युग- सत,त्रेता,द्वापर एवं कलियुग होते है। ७ वाँ मन्वंतर वैवस्वत मन्वंतर चल रहा है।
सतयुग १७,२८,००० वर्ष का, त्रेतायुग १२ ९६,००० वर्ष का, द्वापरयुग ८,६४,००० वर्ष एवं कलियुग ४,३२,००० वर्ष का कालखंड है। वर्तमान मे २८ वे चतुर्युग का कलियुग चल रहा है अर्थात् श्रीराम के जन्म होने और हमारे समय के बीच ८,६४,००० वर्ष का द्वापरयुग तथा कलियुग के लगभग ५२०० वर्ष बीत चुके हैं। महान गणितज्ञ एवं ज्योतिष वराहमिहिर जी के अनुसार -
असन्मथासु मुनय: शासति पृथिवी: युधिष्ठिरै नृपतौ:
षड्द्विकपञ्चद्वियुत शककालस्य राज्ञश्च:
युधिष्ठिर के शासनकाल मे सप्तऋषि मघा नक्षत्र में थे। भारतीय ज्योतिष में २७ नक्षत्र होते हैं, सप्तऋषि प्रत्येक नक्षत्र मे १०० वर्ष रहते है`। यह चक्र चलता रहता है। युधिष्ठिर के समय सप्तऋषियों के २७ चक्र, उसके बाद २४, कुल मिलाकर ५१ चक्र अर्थात् ५,१०० वर्ष हो चुके हैं। युधिष्ठिर ने लगभग ३८ वर्ष शासन किया। उसके कुछ समय बाद आरंभ कलियुग के ५१५५ वर्ष बीत चुके हैं।
इस प्रकार कलियुग से द्वापरयुग तक ८,६९,१५५ वर्ष।
श्रीराम का जन्म हुआ था त्रेतायुग के अंत में। इस प्रकार कम से कम ९ लाख वर्ष के आसपास श्रीराम और रामायण का काल आता है।
रामायण सुन्दरकांड सर्ग ५, श्लोक १२ मे महर्षि वाल्मीकि जी लिखते हैं-
वारणैश्चै चतुर्दन्तै श्वैताभ्रनिचयोपमे
भूषितं रूचिद्वारं मन्तैश्च मृगपक्षिभि:||
अर्थात् जब हनुमान जी वन में श्रीराम और लक्ष्मण के पास जाते हैं तब सफेद रंग और ४ दाँतोंवाले हाथी को देखते हैं। ऐसे हाथी के जीवाश्म सन १८७७० मे॔ मिले थे। कार्बन डेटिंग पद्धति से इनकी आयु लगभग १० लाख से ५० लाख के आसपास निकलती है।
वैज्ञानिक भाषा मे इस हाथी को Gomphothere नाम दिया गया। इससे रामायणकालीन घटनाएँ लगभग १० लाख साल के आसपास घटित होने का वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध होता है।
•••
अक्षरस्वामिनी आप इष्ट, ईश्वरी उजालावाही,
ऊपर एकल ऐश्वर्यी ओ!, औसरदाई अंबे।
अ: कर कृपा कविता करवा, छंद सिखा जगदंबे!!
*
सलिल करे अभिषेक धन्य हो, मैया! चरण पखार।
हृदयानंदित बसा मातु छवि, आप पधारें द्वार।।
हंसवाहिनी! स्वर-सरगम दे, कीर्ति-कथा कह पाऊँ।
तार बनूँ वीणा का शारद!, तुम छेड़ो तर जाऊँ।।
निर्मलवसने! मीनाक्षी हे! पद्माननी दयाकर।
ममतामयी! मृदुल अनुकंपा कर सुत को अपनाकर।।
ढाई आखर पोथी पढ़कर भाव साधना साधूँ।
रास-लास आवास हृदय को करें, तुम्हें आराधूँ।।
ध्यान धरूँ नित नयन मूँदकर, रूप अरूप निहारूँ।
सुध-बुध खोकर विश्वमोहिनी अपलक खुद को वारूँ।।
विधि-हरि-हर की कृपा मिले, हर चित्र गुप्त चुप देखूँ।
जो न अन्य को दिखे, वही लख, अक्षर-अक्षर लेखूँ।।
भवसागर तर आ पाए सुत, अहं भूल तव द्वार।
अविचल मति दे मैया मोरी शब्द ब्रह्म-सरकार।।
नमन स्वीकार ले, कृपा कर तार दे।
बिसर अपराध मम, जननि अँकवार ले।।
***
अभिनव प्रयोग-
नवान्वेषित त्रिप्रमाणिका सवैया
*
गणसूत्र - ज र ल ग, ज र ल ग, ज र ल ग।
*
चलो ध्वजा उठा चलें, प्रयाण गीत गा चलें, सभी सुलक्ष्य पा सकें।
कहीं नहीं कमी रहे, विकास की हवा बहे, गरीब सौख्य पा सकें।
नया उगे विहान भी, नया तने वितान भी, न भेद-भाव भा सकें।
उठो! उठो!! न हारना, जहां हमें सुधारना, सुछंद नित्य गा सकें।
***
दोहा सलिला
*
लाक्षणिकता हो प्रबल, सहज व्यंजना साध्य।
गति-यति-लय पच तत्वमय दोहा ही आराध्य।
*
दोहा-सुषमा सहजता, भाषिक सलिल प्रवाह।
पाठक करता वाह हो, श्रोता भरता आह।।
*
भाव बिंब रस भाव दें, दोहा के माधुर्य।
मिथक-प्रतीक सटीक हों, किन हो क्लिष्ट-प्राचुर्य।।
*
२५-६-२०१९
***
विमर्श:
कृष्णा अग्निहोत्री: ९०% पुरुष सामंती धारणा के हैं. आपकी क्या राय है?
*
और स्त्रियाँ? शत प्रतिशत...
विवाह होते ही स्वयं को हरः स्वामिनी मानकर पति के पूरे परिवार को बदलने या बेदखल करने की कोशिश, सफल न होने पर शोषण का आरोप, सम्बन्ध न निभा पाने पर खुद को न सुधार कर शेष सब को दंडित करने की कोशिश. जन्म से मरण तक खुद को पुरुष से मदद पाने का अधिकारी मानेंगी और उसी पर निराधार आरोप भी लगाएँगी. पिता की ममता, भाई का साथ, मित्र का अपनापन, पति का संरक्षण, ससुराल की धन-संपत्ति, बच्चों का लाड़, दामाद का आदर सब स्त्री का प्राप्य है किन्तु यह देनेवाला सामन्ती, शोषक, दुर्जन और न जाने क्या-क्या है. पुरुष प्रधान समाज में एक अकेली स्त्री आकर पति गृह की स्वामिनी हो जाती है जबकि पुरुष अपनी ससुराल में केवल अतिथि ही हो पाता है. यदि स्त्री प्रधान समाज हो तो स्त्री पुरु को जन्म ही न लेने दे या जन्मते ही दफना दे. इसीलिए प्रकृति ने पुरुष का अस्तित्व बचाए रखने के लिए प्राणी जगत में पुरुष को सबल बनाया.
*
डॉ.बिपिन पाण्डेय
बिल्कुल सही कहा आपने सर
7 वर्ष7 वर्ष पहले
बहुत पसंद
जवाब दें
Kanta Roy
मुंह ना खुले तो ही अच्छा है ,नहीं तो यहाँ आप हर दूसरी नारी कृष्णा अग्निहोत्री सी ही पायेंगे, संस्कारों व् अपमान का भय,सामजिक तिरस्कार का भय, घर में वापस कैद कर लिए जाने का भय .........इस भयों के कारण ही परिवार की पसंद पर खरी उतरने वाली आचरण व् रचनाएं लिखने को मजबूर है लेखिकाएं
7 वर्ष7 वर्ष पहले
बहुत पसंद
जवाब दें
एक्टिव
संजीव वर्मा 'सलिल'
नारी अपना तन मन दोनों उघाड़ती जा रही है. पुरुष यह नहीं कर रहा इसे उसकी कमजोरी नहीं माना जाए. एक चका पंचर होने पर भी गाडी घसिटती है, दोनों पंचर हुए तो भगवान ही मालिक है.
7 वर्ष7 वर्ष पहले
लाइक करें
जवाब दें
3
एक्टिव
संजीव वर्मा 'सलिल' ने जवाब दिया
·
12 जवाब
डॉ. रजनी कांत पांडेय
मै सलिल जी से पूर्णत: सहमत हूँ । तरह-तरह के अपराध का ठीकरा पुरुषो पर फोडने वाली स्त्री बिना पुरुष के चल भी नही पाती है । पुरुष बिना किसी शिकायत के कोल्हू के बैल जैसा दिन-रात चलता रहता है । अपनी खुशियाँ अपनी पत्नी तथा बच्चों के लिए बरबाद कर देता है फिर भी उसका कही नाम नही होता । मेरा मानना है कि स्त्री विमर्श के नाम पर केवल पुरुष को ही दोषी ठहराना उचित नही है ।आज के आधुनिक युग मे पुरुषों से किसी माने मे स्त्रियाँ कम नही है ।
7 वर्ष7 वर्ष पहले
बहुत पसंद
जवाब दें
2
Kanta Roy
आन्हाक उपस्थिति से मोन प्रसन्न भेल
7 वर्ष7 वर्ष पहले
बहुत पसंद
जवाब दें
एडिट किया
2
Kanta Roy
ई जे हमर ज्येष्ठ छथिन संजीव जी, झगड़ा करैत रहैत छैथ हमेशा लेकिन स्नेह सय ओत प्रोत सेहो रहैत छैथ
7 वर्ष7 वर्ष पहले
बहुत पसंद
जवाब दें
2
डॉ. रजनी कांत पांडेय
तुमने कसम खायी, दिल से मुझे मिटाने की ।
तो जिद मेरी भी है, दिल से नही जाने की ।
© डा. रजनी कान्त पान्डेय
7 वर्ष7 वर्ष पहले
बहुत पसंद
जवाब दें
2
डॉ. रजनी कांत पांडेय
7 वर्ष7 वर्ष पहले
लाइक करें
जवाब दें
2
Kanta Roy
7 वर्ष7 वर्ष पहले
लाइक करें
जवाब दें
संजीव वर्मा 'सलिल' के तौर पर कमेंट करें
Kiran Shrivastava
Bilkul sahi kaha he.
7 वर्ष7 वर्ष पहले
लाइक करें
जवाब दें
Harihar Jha
कहा जाता था दहेज प्रथा से स्त्रियों को सताया जा रहा है। जैसे ही 498A का लाभ स्त्रियों के पक्ष में मिला, बहू ने पति और सास-ससुर पर मुकदमें ठोकने शुरू कर दिये। तो फिर इसका ठीकरा पुरूषों पर मढ़ना कहाँ तक उचित है?
7 वर्ष7 वर्ष पहले
बहुत पसंद
जवाब दें
एक्टिव
संजीव वर्मा 'सलिल'
अब तो लड़के डर के कारण विवाह ही नहीं करना चाहते. लड़कियाँ सास ससुर नहीं चाहती सो लिव इन में जीवन नष्ट कर रही हैं.
7 वर्ष7 वर्ष पहले
लाइक करें
जवाब दें
अरुण शर्मा
पूर्णतः सहमत सर जी।
7 वर्ष7 वर्ष पहले
बहुत पसंद
जवाब दें
एक्टिव
डॉ. ब्रह्मजीत गौतम
अच्छी व्याख्या है !
7 वर्ष7 वर्ष पहले
बहुत पसंद
जवाब दें
एक्टिव
संजीव वर्मा 'सलिल'
कृष्णा जी ने पुरुष को लांछित नहीं महिमा-मंडित किया है. तभी वे राजेन्द्र जी की प्रशस्ति करती हैं. एकांगी सोच पुरुष-प्रशंसा के अंशों की अनदेखी कर पुरुष-निंदा के अंश को शीर्षक और नारे बना कर उछलती रहती है जिसका उद्देश्य सस्ती लोकप्रियता और सनसनी मात्र है. सुधरने की आवश्यकता पुरुष और स्त्री दोनों में उपस्थित रुग्ण मानसिकता को है. स्त्री और पुरुष दोनों में उपस्थित विवेक, सामर्थ्य और प्रयास को दिशा चाहिए. सुधरना दोनों को है. प्रकृति, परिवेश, परिस्थितियों के अनुरूप खुद को ढलते हुए सामंजस्य बैठाने की सामर्थ्य चुकने पर अन्यों को आरोपित कर खुद को दोषमुक्त समझना सरल तो है सत्य नहीं.
7 वर्ष7 वर्ष पहले
लाइक करें
जवाब दें
दर्शन बेजा़र
सभी विद्वानों के अलग अलग अनुभव अलग अलग टिप्पणियां जो स्वाभाविक भी है
6 वर्ष6 वर्ष पहले
बहुत पसंद
जवाब दें
Pushpa Saxena
स्त्री पुरुष दोनो एक दूसरे के पूरक हैं ।केवल एक के ही बल पर परिवार की रचना नही होती ।आपसी सामंजस्य स्नेह त्याग धैर्य संस्कार अच्छी सोच ही आदर्श परिवार व समाज गठित होता है ।एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप निराधार हैं ।कुंठित सोच है ।हमें उदार द्दष्टिकोण अपनाना चाहिए
***
रचना-प्रति रचना
राकेश खण्डेलवाल-आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
दिन सप्ताह महीने बीते
घिरे हुए प्रश्नों में जीते
अपने बिम्बों में अब खुद मैं
प्रश्न चिन्ह जैसा दिखता हूँ
अब मैं गीत नहीं लिखता हूँ
भावों की छलके गागरिया, पर न भरे शब्दों की आँजुर
होता नहीं अधर छूने को सरगम का कोई सुर आतुर
छन्दों की डोली पर आकर बैठ न पाये दुल्हन भाषा
बिलख बिलख कर रह जाती है सपनो की संजीवित आशा
टूटी परवाज़ें संगवा कर
पंखों के अबशेष उठाकर
नील गगन की पगडंडी को
सूनी नजरों से तकता हूँ
अब मैं गीत नहीं लिखता हूँ
पीड़ा आकर पंथ पुकारे, जागे नहीं लेखनी सोई
खंडित अभिलाषा कह देती होता वही राम रचि सोई
मंत्रबद्ध संकल्प, शरों से बिंधे शायिका पर बिखरे हैं
नागफ़नी से संबंधों के विषधर तन मन को जकड़े हैं
बुझी हुई हाथों में तीली
और पास की समिधा गीली
उठते हुए धुंए को पीता
मैं अन्दर अन्दर रिसता हूँ
अब मैं गीत नहीं लिखता हूँ
धरना देती रहीं बहारें दरवाजे की चौखट थामे
अंगनाई में वनपुष्पों की गंध सांस का दामन थामे
हर आशीष मिला, तकता है एक अपेक्षा ले नयनों में
ढूँढ़ा करता है हर लम्हा छुपे हुए उत्तर प्रश्नों में
पन्ने बिखरा रहीं हवायें
हुईं खोखली सभी दुआयें
तिनके जैसा, उंगली थामे
बही धार में मैं तिरता हूँ
अब मैं गीत नहीं लिखता हूँ
मानस में असमंजस बढ़ता, चित्र सभी हैं धुंधले धुंधले
हीरकनी की परछाईं लेकर शीशे के टुकड़े निकले
जिस पद रज को मेंहदी करके कर ली थी रंगीन हथेली
निमिष मात्र न पलकें गीली करने आई याद अकेली
परिवेशों से कटा हुआ सा
समीकरण से घटा हुआ सा
जिस पथ की मंज़िल न कोई
अब मैं उस पथ पर मिलता हूँ
अब मैं गीत नहीं लिखता हूँ
भावुकता की आहुतियां दे विश्वासों के दावानल में
धूप उगा करती है सायों के अब लहराते आँचल में
अर्थहीन हो गये दुपहरी, सन्ध्या और चाँदनी रातें
पड़ती नहीं सुनाई होतीं जो अब दिल से दिल की बातें
कभी पुकारा पनिहारी ने
कभी संभाला मनिहारी ने
चूड़ी के टुकडों जैसा मैं
पानी के भावों बिकता हूँ
अब मैं गीत नहीं लिखता हूँ
मन के बंधन कहाँ गीत के शब्दों में हैं बँधने पाये
व्यक्त कहां होती अनुभूति चाहे कोई कितना गाये
डाले हुए स्वयं को भ्रम में कब तक देता रहूँ दिलासा
नीड़ बना, बैठा पनघट पर, लेकिन मन प्यासा का प्यासा
बिखराये कर तिनके तिनके
भावों की माला के मनके
सीपी शंख बिन चुके जिससे
मैं तट की अब वह सिकता हूँ
अब मैं गीत नहीं लिखता हूँ
***
आदरणीय राकेश जी को सादर समर्पित -
बहुत बधाई तुमको भैया!
अब तुम गीत नहीं लिखते हो
जैसे हो तुम मन के अंदर
वैसे ही बाहर दिखते हो
बहुत बधाई तुमको भैया!
*
अब न रहा कंकर में शंकर, कण-कण में भगवान् कहाँ है?
कनककशिपु तो पग-पग पर हैं, पर प्रहलाद न कहीं यहाँ है
शील सती का भंग करें हरि, तो कैसे भगवान हम कहें?
नहीं जलंधर-हरि में अंतर, जन-निंदा में क्यों न वे दहें?
वर देते हैं शिव असुरों को
अभय दान फिर करें सुरों को
आप भवानी-भंग संग रम
प्रेरित करते नारि-नरों को
महाकाल दें दण्ड भयंकर
दया न करते किंचित दैया!
बहुत बधाई तुमको भैया!
अब तुम गीत नहीं लिखते हो
*
जन-हित राजकुमार भेजकर, सत्तासीन न करते हैं अब
कौन अहल्या को उद्धारे?, बना निर्भया हँसते हैं सब
नाक आसुरी काट न पाते, लिया कमीशन शीश झुकाते
कमजोरों को मार रहे हैं, उठा गले से अब न लगाते
हर दफ्तर में, हर कुर्सी पर
सोता कुम्भकर्ण जब जागे
थाना हो या हो न्यायालय
सदा भुखमरा रिश्वत माँगे
भोग करें, ले आड़ योग की
पेड़ काटकर छीनें छैंया
बहुत बधाई तुमको भैया!
अब तुम गीत नहीं लिखते हो
*
जब तक था वह गगनबिहारी, जग ने हँस आरती उतारी
छलिये को नटनागर कहकर, ठगी गयी निष्ठा बेचारी
मटकी फोड़ी, माखन खाया, रास रचाई, नाच नचाया
चला गया रणछोड़ मोड़ मुख, युगों बाद सन्देश पठाया
कहता प्रेम-पंथ को तज कर
ज्ञान-मार्ग पर चलना बेहतर
कौन कहे पोंगा पंडित से
नहीं महल, हमने चाहा घर
रहें द्वारका में महारानी
हमें चाहिए बाबा-मैया
बहुत बधाई तुमको भैया!
अब तुम गीत नहीं लिखते हो
*
असत पुज रहा देवालय में, अब न सत्य में है नारायण
नेह नर्मदा मलिन हो रही, राग-द्वेष का कर पारायण
लीलावती-कलावतियों को 'लिव इन' रहना अब मन भाया
कोई बाँह में, कोई चाह में, खुद को ठगती खुद ही माया
कोकशास्त्र केजी में पढ़ती,
नव पीढ़ी के मूल्य नये हैं
खोटे सिक्कों का कब्ज़ा है
खरे हारकर दूर हुए हैं
वैतरणी करने चुनाव की
पार, हुई है साधन गैया
बहुत बधाई तुमको भैया!
अब तुम गीत नहीं लिखते हो
*
दाँत शेर के कौन गिनेगा?, देश शत्रु से कौन लड़ेगा?
बोधि वृक्ष ले राजकुँवरि को, भेज त्याग-तप मौन वरेगा?
जौहर करना सर न झुकाना, तृण-तिनकों की रोटी खाना
जीत शौर्य से राज्य आप ही, गुरु चरणों में विहँस चढ़ाना
जान जाए पर नीति न छोड़ें
धर्म-मार्ग से कदम न मोड़ें
महिषासुरमर्दिनी देश-हित
अरि-सत्ता कर नष्ट, न छोड़ें
सात जन्म के सम्बन्धों में
रोज न बदलें सजनी-सैंया
बहुत बधाई तुमको भैया!
अब तुम गीत नहीं लिखते हो
*
युद्ध-अपराधी कहा उसे जिसने, सर्वाधिक त्याग किया है
जननायक ने ही जनता की, पीठ में छुरा भोंक दिया है
सत्ता हित सिद्धांत बेचते, जन-हित की करते नीलामी
जिसमें जितनी अधिक खोट है, वह नेता है उतना दामी
साथ रहे सम्पूर्ण क्रांति में
जो वे स्वार्थ साध टकराते
भूले, बंदर रोटी खाता
बिल्ले लड़ते ही रह जाते
डुबा रहे मल्लाह धार में
ले जाकर अपनी ही नैया
बहुत बधाई तुमको भैया!
अब तुम गीत नहीं लिखते हो
*
कहा गरीबी दूर करेंगे, लेकिन अपनी भरी तिजोरी
धन विदेश में जमा कर दिया, सब नेता हो गए टपोरी
पति पत्नी बच्चों को कुर्सी, बैठा देश लूटते सब मिल
वादों को जुमला कह देते, पद-मद में रहते हैं गाफिल
बिन साहित्य कहें भाषा को
नेता-अफसर उद्धारेंगे
मात-पिता का जीना दूभर
कर जैसे बेटे तारेंगे
पर्व त्याग वैलेंटाइन पर
लुक-छिप चिपकें हाई-हैया
बहुत बधाई तुमको भैया!
अब तुम गीत नहीं लिखते हो
२५-६-२०१६
***
विमर्श :
हिन्दू - मुसलमान और शिक्षा - विज्ञान
गत १५० वर्ष में हुई प्रगति में पश्चिमी देशों अर्थात यहूदी और ईसाइयों की भागीदारी बहुत अधिक है, हिन्दुओं और मुस्लिमों की अपरक्षकृत बहुत कम। इस काल खंड में हिंदू और मुसलमान सत्ता और धर्म के लिए लड़ते-मरते रहे।
इस समय में हुए १०० महान वैज्ञानिकों के नाम लिखें तो हिन्दू और मुसलमान नाम मात्र को ही मिलेंगे।
दुनिया में ६१ इस्लामी देशों की जनसंख्या लगभग १.७५ अरब और उनमें विश्वविद्यालय लगभग ४५० हैं जबकि हिन्दुओं की जनसंख्या लगभग १.५० अरब और विश्वविद्यालय लगभग ४९० हैं। अमेरिका में ३००० से अधिक और जापान में ९०० से अधिक विश्वविद्यालय हैं।
लगभग ४५ % ईसाई युवक तथा ७५ % यहूदी युवक, २०% हिन्दू युवक तथा ३% मुस्लिम युवक उच्च शिक्षा लेते हैं।
दुनिया के २०० प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में से ५४ अमेरिका, २४इंग्लेंड, १७ ऑस्ट्रेलिया, १० चीन, १० जापान, १० हॉलॅंड, ९ फ़्राँस, 8 जर्मनी, २ भारत और १ इस्लामी मुल्क में हैं।
अमेरिका का जी.डी.पी १५ ट्रिलियन डॉलर से अधिक है जबकि पूरे इस्लामिक जगत का कुल जी.डी.पी लगभग ३.५ ट्रिलियन डॉलर है और भारत का लगभग१.९ ट्रिलियन डॉलर है।
दुनिया में ३८००० मल्टिनॅशनल कम्पनियाँ हैं जिनमें से ३२००० कम्पनियाँ अमेरिका और युरोप में हैं।
दुनिया के १०,००० बड़े अविष्कारों में से ६१०३ अमेरिका में और ८४१० ईसाइयों या यहूदियों ने किये हैं।
दुनिया के ५० अमीरो में से २० अमेरिका, ५ इंग्लेंड, ३ चीन, २ मक्सिको, ३ भारत और १ अरब मुल्क से हैं।
हम हिन्दू और मुसलमान जनहित, परोपकार या समाज सेवा मे भी ईसाईयों और यहूदियों से पीछे हैं। रेडक्रॉस दुनिया का सब से बड़ा मानवीय संगठन है।
बिल गेट्स ने १० बिलियन डॉलर से बिल- मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन की बुनियाद रखी जो कि पूरे विश्व के ८ करोड़ बच्चों की सेहत का ख्याल रखती है।
जबकि हम जानते है कि भारत में कई अरबपति हैं। मुकेश अंबानी अपना घर बनाने में ४००० करोड़ खर्च कर सकते हैं और अरब का अमीर शहज़ादा अपने स्पेशल जहाज पर ५०० मिलियन डॉलर खर्च कर सकते हैं। मगर मानवीय सहायता के लिये दोनों ही आगे नहीं आते।
ओलंपिक खेलों में अमेरिका ही सब से अधिक गोल्ड जीतता है। रूस, चीन, जापान, आदि कई देशों के बाद भारत का नाम अत है और मुस्लिम देश तो लगभग अंत में ही होते हैं। हम अतीत पर थोथा गर्व करते हैं किन्तु व्यवहार से वास्तव में व्यक्तिवादी और स्वार्थी हैं। आपस में लड़ने पर अधिक विश्वास रखते हैं। मानसिक रूप में हम हीनताग्रस्त और विदेशों खासकर पश्चिमी देशों की नकल कर गर्व अनुभव करते हैं। धर्म के नाम पर आपस में लड़ने में हम सबसे आगे हैं।
जरा सोचिये कि हमें किस तरफ अधिक ध्यान देने की जरूरत है, आपस में लड़ने या एक होकर देश और खुद को आगे बढ़ाने की? एक-दूसरे के धर्मस्थान तोड़े की या कल-कारखाने खड़े करने की। स्वर्ग और जन्नत के काल्पनिक स्वप्न देखने की या इस धरती और अपने जीवन को अधिक सुखमय बनाने की?
***
मुक्तक: दीप्ति
*
दीप्ति दुनिया की बढ़े नित, देव! यह वरदान देना,
जब कभी तूफां पठाओ, सिखा देना नाव खेना।
नहीं मोहन भोग की है चाह- लेकिन तृप्ति देना-
उदर अपना भर सकूँ, मेहमान भी पायें चबेना।।
*
दीप्ति निश-दिन हो अधिक से अधिक व्यापक,
लगें बौने हैं सभी दुनिया के मापक।
काव्यधारा रहे बहती, सत्य कहती -
दूर दुर्वासा सरीखे रहें शापक।।
*
दीप्ति चेहरे पर रहे नित नव सृजन की,
छंद में छवि देख पायें सब स्वजन की।
ह्रदय का हो हार हिंदी विश्व वाणी-
पत्रिका प्रेषित चरण में प्रभु! नमन की।।
*
दीप्ति आगत भोर का सन्देश देती,
दीप्ति दिनकर को बढ़ो आदेश देती।
दीप्ति संध्या से कहे दिन को नमन कर-
दीप्ति रजनी को सुला बांहों में लेती।।
*
दीप्ति सपनों से सतत दुनिया सजाती,
दीप्ति पाने ज़िंदगी दीपक जलाती।
दीप्ति पाले मोह किंचित कब किसी से-
दीप्ति भटके पगों को राहें दिखाती।।
*
दीप्ति की पाई विरासत धन्य भारत,
दीप्ति कर बदलाव दे, कर-कर बगावत।
दीप्ति बाँटें स्नेह सबको अथक निश-दिन-
दीप्ति से हो तम पराजित कर अदावत।।
*
दीप्ति की गाथा प्रयासों की कहानी,
दीप्ति से मैत्री नहीं होती जुबानी।।
दीप्ति कब मुहताज होती है समय की =-
दीप्ति का स्पर्श पा खिलती जवानी।।
२५.६.२०१३
***
दोहागीत :
मनुआ बेपरवाह.....
*
मन हुलसित पुलकित बदन, छूले नभ है चाह.
झूले पर पेंगें भरे, मनुआ बेपरवाह.....
*
ठेंगे पर दुनिया सकल,
जो कहना है- बोल.
अपने मन की गाँठ हर,
पंछी बनकर खोल..
गगन नाप ले पवन संग
सपनों में पर तोल.
कमसिन है लेकिन नहीं
संकल्पों में झोल.
आह भरे जग देखकर, या करता हो वाह.
झूले पर पेंगें भरे, मनुआ बेपरवाह.....
*
मौन करे कोशिश सदा,
कभी न पीटे ढोल.
जैसा है वैसा दिखे,
चाहे कोई न खोल..
बात कर रहा है खरी,
ज्ञात शब्द का मोल.
'सलिल'-धर में मीन बन,
चंचल करे किलोल.
कोमल मत समझो इसे, हँस सह ले हर दाह.
झूले पर पेंगें भरे, मनुआ बेपरवाह.....
२५.६.२०११
***
ग़ज़लिका :
लिखी तकदीर रब ने...
*
लिखी तकदीर रब ने फिर भी हम तदबीर करते हैं.
फलक उसने बनाया है, मगर हम रंग भरते हैं..
न हमको मौत का डर है, न जीने की तनिक चिंता-
न लाते हैं, न ले जाते मगर धन जोड़ मरते हैं..
कमाते हैं करोड़ों पाप कर, खैरात देते दस.
लगाकर भोग तुझको खुद ही खाते और तरते हैं..
कहें नेता- 'करें क्यों पुत्र अपने काम सेना में?
फसल घोटालों-घपलों की उगाते और चरते हैं..
न साधन थे तो फिरते थे बिना कपड़ों के आदम पर-
बहुत साधन मिले तो भी कहो क्यों न्यूड फिरते हैं..
न जीवन को जिया आँखें मिलाकर, सिर झुकाए क्यों?
समय जब आख़िरी आया तो खुद से खुद ही डरते हैं..
'सलिल' ने ज़िंदगी जी है, सदा जिंदादिली से ही.
मिले चट्टान तो थमते, नहीं सूराख करते हैं..
२५-६-२०१०
***

बुधवार, 22 अप्रैल 2026

बुंदेली लो क गी तों में रा म डॉ रमा आर्य

 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 बुंदेली लो क गी तों में रा म डॉ रमा आर्य 1 शो धपत्र सा रां शरां - भा रत का हृदय स्थल बुंदेलखंड जहां कई संस्कृति यों आकर मि लती हैं या कहें कि संस्कृति जहां से शुरू हो कर संपूर्ण भा रत में फैलती है वह स्था न है बुंदेलखंड यहां की संस्कृति यहां कल लो क सा हि त्य यहां का सां स्कृसां स्कृति क वैभव सरलता से कि सी का भी मन अपनी और आकर्षि त कर ही लेता है यह कहना भी अति शयो क्ति नहीं हो गा कि बुंदेलखंड का लो क सा हि त्य संपूर्ण भा रत में अत्यधि क समृद्ध है । कि सी भी समा ज का प्रति बिं ब हम वहां की लो क संस्कृति में व्या प्तम लो कगी तों के मा ध्यम से समझ सकते हैं । लो कगी तों में लो क संस्कृति अपनेमूल स्वरूप में चि त्रि त हो ती है या कहीं लो क जी वन का सी धा सा धा परि चय लो कगी तों के मा ध्यम से मि ल जा ता है यह लो कगी त व्यक्ति की भा वनाओं आस्था वि चा र दर्शन जी वन शैली सब कुछ व्यक्त कर देते हैं । बुंदेलखंड की लो क आस्था का एक मजबूत आधा र है भगवा न श्री रा म । इस भक्ति सा गर केंद्र ओरछा है जि सके आसपा स रा म भक्ति सा गर के लो कगी तों में हेलोहे लोरे ले रहा है यहां के जन-जन के रगों में श्री रा म बसा करते हैं दूर- दूर से लो ग ओरछा आते हैं रा त भर अपने लो कगी तों के मा ध्यम से रा म जी को ले जा ते हैं और सुबह प्रा त बेरछा जी (नदी )में स्ना न कर रा म जी के दर्शन कर पुख़्य(पुष्य) नक्षत्र को केंद्र मा न कर अपना जी वन सुखद बना लेते हैं । यहां के लो कगी तों में रा म वि भि न्न रूपों में दर्शनीय है । मुख्य शब्द - बुंदेली लो कगी त, संस्कृति , सभ्यता , परंपरा , श्री रा म, लो कजी वन, लो क मा न्यता एँ, व्यवहा र एवं आचा र । प्रस्ता वना - बुंदेलखंड ऐति हा सि क, सा हि त्य, सां स्कृति क दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है बुंदेलखंड में सुवि धा ओं में भी एकता देखनेको सहज ही प्रा प्त हो ती है । बुंदेलखंड की लो क संस्कृति सभी लो क संस्कृति यों से समृद्ध प्रती त हो ती है । यहां का लो क सा हि त्य इतना समृद्ध है कि भा रत के 1 सहा यक प्रा ध्या पक (हि न्दी ), श्री पी तां बतां रा पी ठ संस्कृत महा वि द्या लय, दति या (मध्य प्रदेश) । Page 42 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 अन्यत्र कि सी क्षेत्र का सा हि त्य इतना समृद्ध और प्रसि द्ध नहीं हुआ । यहां लो कगी त , लो क कथा , लो क गा था , पहेलिहेलियां इत्या दि अत्यंत सहजता से देखनेको मि लती हैं । लो क जी वन के सुख-दुखदु उल्लास हर्ष वि षा द संघर्ष को अभि व्यक्त करनेके लि ए लो कगी त सर्वश्रेष्ठ मा ध्यम प्रती त हो ते हैं । यह लो कगी त जनजी वन में इतना रच बस गए हैं की यह सा मा न्य जी वन का अभि न्न हि स्सा बन चुके हैं । इन लो कगी तों के द्वा रा ही बुंदेली संस्कृति को समझा जा सकता है यह भी कह सकते हैं कि इन लो कगी तों के दर्पण से संस्कृति का प्रति बिं ब देखा जा सकता है । असल में लो क संस्कृति ही लो कगी तों की कहा नी है और इन कहा नि यों में जनसा मा न्य का जी वन मा नसि क उद्वेग, वि चा र, अभि व्यक्ति , व्यंजना, संस्का र, संस्कृति सब कुछ सूक्ष्मता से समा हि त हैं । यह लो कगी त संक्षि प्त सरल स्पष्ट स्वभा व एक सुंदर संगी त में हो ते हैं । बुंदेलखंड में प्रचलि त लो कगी त बुंदेली जि नके संस्का र, आचा र-वि चा र, उत्सव, अध्या त्मि क, दर्शन इत्या दि का तो परि चय देते हैं सा थ ही इन के मा ध्यम से सा मा जि क जी वन शैली का भी सा क्षा त्का र हो ता है । इन लो कगी तों का स्वस्थ भा व प्रवणता ला लि त्य दर्शनीय है । बुंदेलखंड का केंद्र झां सीझां सी से 17 कि लो मी टर दूर ओरछा मध्य प्रदेश के नि मा ड़ी जि ले में आता है । यहां प्रभु श्री रा म रा जा के रूप में वि रा जमा न हैं । प्रभु श्री रा म की भक्ति यहां के लो गों की रगों में बसी हुई है ।दूर-दूर से लो ग पुख्य नक्षत्र पर (ज्यो ति षी य गणना में पड़नेवा ला एक वि शेष नक्षत्र) यहां आते हैं अपनेरा जा रा म की प्रां गप्रां ण में पूरी रा त गी तों के मा ध्यम से अपनी भा वनाओं को व्यक्त कर अपनी धा र्मि क आस्था ओं की पूर्ति करते हैं । उनका प्रया स रहता है कि श्री रा म कि सी प्रकार एक नजर उन पर डा ल दें । यहां रा म जी लो कगी तों में उसी प्रकार समा हि त हैं जैसे ब्रज में श्री कृष्ण । रा म यहां वि भि न्न रूपों में व्या प्त है । बुंदेलखंड वह स्था न है जहां श्री रा म अपनेभक्तों की भा वना से वि भो र हो कर अवध से ओरछा पधा रे । कहा जा ता है कि ओरछा की महा रा नी कुंवर गणेशी श्री रा म के अनन्य भक्त थीं और उन्हीं की भक्ति व प्रेम पर री झ कर या कहें अपनेइस भक्त के हट से वि वश हो कर श्री रा म को ओरछा धा म आना पड़ा । भगवा न श्री रा म रा नी कुंवर गणेशी जी के नि वा स महल ओरछा में वि रा जमा न हुए और इस तरह बुंदेलखंड के क्षेत्र में श्री रा म रा जा के रूप में यहां वि रा जमा न हुए एक लो कगी त के अनुसा ररा जा मधुकर शा ह की रा नी कुंवर गणेश । अवधपुरी से ओरछा ला ई अवध नरेश ।। आज भी यहां की धरती से रा म जी के जन्म उत्सव पर उठनेवा ली बधा इयां हर घर में गा ई जा ती हैं क्यों किक्योंकि जब घर में बा लक हो ता है तो वह यहां रा मजी का स्वरूप ही हो ता है और मा ता एं गां वगां उठते हैं - कोसल्ला ले लो बधा ई अवध में लल्ला भये हि ल मि ल गा दो बधा ई अवध में लल्ला भये….. Page 43 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 एक भक्तों के द्वा रा श्री रा म के प्रां गप्रां ण में लो गों से आवा हन कि या जा रहा है कि वे रा मचंद्र से या री करनेएक लो कगी त का आनंदमयी अंदा ज रा मचंद्र से या री कर लो रा मचंद्र से या री जि नेभजे नर नारी कर लो रा मचंद्र से या री ….. झूठे बेर शबरी के खा ए रस्ता ता कि बेचा री ….. कर लो रा मचंद्र से या री …. रा मचंद्र से या री …….. तुलसी दा स भजो रे भगवा न तो आ गई वि पदा टा री … कर लो रा मचंद्र से या री ….. ईश्वर की कृपा से महा रा ज दशरथ को एक सा थ चा र पुत्रों की प्रा प्ति हुई । रा जपरि वा र सहि त पूरी अयो ध्या हर्षा ति रेक में डूबी हुई हैं । तो उसनेउत्तर दि या खवा सन ( नाइन ) बंदनवा र ले जा रही हैं । लो गों नेजि ज्ञा सा वश पूछा - जो बंदनवा रों कहां लयें जा ती , जो बंदनवा रों …रों … । नगर अयो ध्या में सुत भये सजनी , रा जा मही पतके नाती । रा जा दशरथ के पुत्रा भये हैं रघुकूल जो त उजया र दई बा ती । उजया र दई बा ती , उजया र दई बा ती । जो बंदनवा रों ... .. रा नी कौशल्या की कूँख जुड़ा नी " सब सखि यन की शी तल भई छा ती । नगर अयो ध्या में दा न भयें हैं लै लै दा न मगन भई सखि याँ । मगन भई सखि याँ , मगन भई सखि याँ जो बंदनबा रों कहाँ लये जा ती । दा ई नारा छी ननेके पूर्व नेग माँ गमाँ ती हैं । कोई हा र दे रही है, है कोई ति लरी और कोई मो ति यों का था र । परंतु वह तो प्रभु शि शु का दर्शन करना चा हती हैं । यहाँ के लो कगी तों मधुरता का ऐसा समरस चि त्र अंकि त हुआ है जि ससे समझ आता है कि यहां की संस्कृति कि तनी समृद्धि और मधुर है । एक अन्य गी त के द्वा रा रा नी मैत्रेयी के द्वा रा दशरथ जी से दो वरदा न मां गनेकी पूरी कथा वर्णि त है । रा जा दशरथ अपनी रा नी को मनानेकी पूरी कोशि श कर रहे हैं पर रा नी मैत्रेयी कि जि द हैं कि रा म को वनवा स पर भेजना है । रा जा दशरथ भरत को रा जगद्दी देनेके लि ए तैया र हैं किं तु मैत्रेयी के द्वा रा रा म को वनवा स देनेकी नहीं किं तु मैत्रेयी अपनी मनमा नी कर रही है और वह नहीं मा न रही - Page 44 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 रा जा तो पौ ढ़े पलंग पै रा नी मलें पी ड़ौ ली ' महा रा ज । हँस - हँस पूछे रा जा दशरथ कैसी धन- अनमनी महा रा ज । भौ तक ' तो कहि ये रा जा अन्न धन भौ तक लक्ष्मी महा रा ज । सूनो अयो ध्या को रा ज अकेली संचत बि ना महा रा ज । तुम रा जा जइयो बा जा रै ' संचत भो ल ल्या इयों महा रा ज । तुम रा नी मूरख अजा न कहाँ लौं समझा इयें महा रा ज । हा टों में हति यां बि कायें संचत नहीं पा इयों महा रा ज । नगर को नौवा ' बुला ओं छुरा मँगा इयों महा रा ज । ची रौ अभा गि न को कूँख रा जा गँवा रि न कहै महा रा ज । काशी के पंडि त बुलवा इयों वेद बचवा इयों महा रा ज । रा जा जनम के गो गि या ग्या वन ' हि रनी मा रि यों महा रा ज । सो नेकी हि रनी गढुवा य रूपे के गबैलुवा " महा रा ज । बन बन देव छुड़ा य संचत तब हुइयें महा रा ज । तुम रा जा जइयों पहा रैं सजी वन ल्या इयों महा रा ज । घि स लुड़ि या " बँटवा इयों कटोरन छा नि यों महा रा ज । पि यो हैं बाँ टबाँ - बडा र ती नई रा नी अधन 2 से महा रा ज भये हैं नों दस मा स ललन चा र हो गये महा रा ज । बा जन लगी आनन्द बधैया सखी गा वें सो हरें महा रा ज । गौ वा के गो बर मँगइयों अंगन लि पवा इयों महा रा ज । गजमो ति न के चौ क पुरा कलश धरवा इयों महा रा ज । काशी के पंडि त बुला वेद पढ़ वइयों महा रा ज । बा रा " बरस के हुइयें रा म तब वन खाँ जइये महा रा ज । इतनी तो सुन रा जा दशरथ अटा रि यों चढ़ गयो । महा रा ज पा हू से गई कौशि ल्या पूछें कैसे रा जा अनमनेमहा रा ज । बा रा बरस के हुई हैं रा म वन खों जइहैं महा रा ज । वन खो जैहैं तो जा न दे फेर घर आहे महा रा ज । मो रो मि ट गओ बाँ झबाँ को नाँवनाँ तुम्हारों वंश चलो महा रा ज । Page 45 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 भगवा न रा म के जन्म पर दा ई को देनेके लि ए महा रा ज दशरथ कौशल्या केकई सुमि त्रा सभी उपहा र लेकर खड़े हैं किं तु दा ई को बा हर नहीं भगवा न रा म की चतुर्भुज रूप में दर्शन चा हि ए इसी प्रसंग में एक लो कगी त - ' कैसी मचल रई " दा ई अवध में , कैसी मचल रई दा ई । सुरंग चूनरी कैकई लयें ठा ड़ी , बई " न लैवे दा ई । सो नेको हा र कौशल्या लयें ठा ड़ी , कूलों " मरो र गई दा ई । सो नेकी ति लरी सुमि त्रा लयें ठा ड़ी , मुखई " न बो ले दा ई । मुति यन था र रा जा लयें ठा ड़ें , नजर न फेरे दा ई । नरा तुमा रों जबई हम छी न दरसन दें रघुरा ई । रूप चतुरभुज प्रभु दरसा यों , खुशी भई तब दा ई । दरसन लै दा ई घर खौ घर - घर हो त बड़ा ई । एक और लो क गी त जि समें रा म जी के हो नेपर दि न सो नेके समा न प्रकाशमा न प्रती त हो ता है डा ई आकर रा जा दशरथ को बधा ई दे रही है और कह रही है कि आज दि न सो नेका है महा रा ज जैसा कि हम सभी जा नते हैं कि अयो ध्या स्वर्णमई है और रा म जी के जन्म उत्सव पर सो नेके कलश का ही प्रयो ग हो रहा है और रा जा दशरथ प्रसन्न हो कर भा इयों को स्वर्ण आभूषण ही भेंट कर रहे हैं - आज दि न सो नेकौ महा रा ज । रा जा दशरथ के पुत्र भये हैं । सो नेके कलश धरा ये महा रा ज । सो नेके सब दि न सो नेकी सब रा तें , सो नेदि अल उजा रे महा रा ज । सुरा गऊ के गो बर मंगा ये ढि कधर आंगन लि पा ये महा रा ज । ननदी जू आइ सां ति या धरा एँ खुसि यन नाँचनाँ दि खा ये महा रा ज । Page 46 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 शा दी की रस्मों के गी त भी बुंदेली लो क भा षा की शा न है । शा दी कि सी भी घर में हो रही है पर यह लो कगी त हर घर लि खी खुशि यां बढ़ा नेका कारण बनते हैं । भगवा न रा म की वि वा ह में तेल चढ़ा नेकी रस्म का एक सुंदर लो क गी त - 'सो आज मो रे रा म जू खों तेल चढत है । तेल चढ़त है , फुलेल चढ़त है । सो नेकटोरा में तेल भरा यो , सो हल्दी मि ला के कैसों झलकत है । सो आज ..... । कुँवा रि न नेमि ल तेल चढ़ा यों , सो नारी न मंगल गी त मढ़त है । सौ आज मो रे रा म जू खों लगुन चढ़त है । लगुन चढ़त है आनन्द बढ़त है । कानन कुंडल मो रे रा म जू खों सो हैं । सो गा लन बि च मो ति यन लर ” सरकत हैं । केसर खौ र मो रे रा म जू खों सो हैं । सो गर बि च गो प " जंजी र लसत हैं । कंकन चूरा मो रे रा म जू खों सो हैं सों हा तन * बि च गजरा दरसत हैं । रा म जू के दरशन खों जि यरा तरसत हैं । मों आज मो रे रा म जू खों लगुन चढ़त हैं । कै आज मो रे ...... इस प्रकार जनक जी के यहां दुल्हदु न ( बन्नी ) बनी सी ता जी की स्थि ति देखि ये । जब श्री रा म बा रा त लेकर रा जा जनक के द्वा र पर पहुंचहुं ते हैं उस समय का सुंदर चि त्र लो कगी तों के मा ध्यम से कि या गया है ।द्वा रचा र के समय यह गी त गा ये जा नेवा ला यह लो कगी त जो मंडप इत्या दि के वि षय का सुंदर उल्लेख कर रहा है - हरे बाँ स मंडप छा ये सि या जू को रा म ब्या हन आये । जब सि या जू की लि खत लगुनि या , रकम - रकम कागज आये । सि या जू को रा म ब्या हन आये । हरे बां स ………. Page 47 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 जब सि या जू को चढ़त चढ़ा ओं,ओं रकम रकम गहना आये । सि या जू को रा म ब्या हन आये । हरे बाँ स .. । जब सि या जू की परत भां वरे ब्रह्मा पंडि त बन आये । सि या जू को ..... जब सि या की हो त बि दा हैं सब सखि यन आँसू आये । सि या जू को रा म ...... हरे बाँ स मंडप छा ये , सि या जू को रा म ब्या हन आये । एक अन्य लो कगी त के मा ध्यम से वि वा ह का सुंदर चि त्र अत्यंत मनभा वन प्रती त हो रहा है । इसमें मंडप की सुंदरता , बा रा ति यों के द्वा रा चढ़ा वा , बां स का मंडप, मो ती के चौ क, सो नेके कलश इत्या दि का मनोहर वर्णन है - एक समय मुनि जी जा कहैं मो रे रंजन भौं राभौं रा । चलि ये जनकपुर गाँ व मंडप सि या रा म के, मन रंन भौ रा । काहे के मंडप मो रे रंजन भौं राभौं रा । काहे के दो ई खंभ जनक - मंडप तरें मौ रे रंजन भौं राभौं रा । हरे बां सबां मंडप बनेमो रे रंजन भौं राभौं रा । मलया गि र के खंभ भौ रे रंजना भौं राभौं रा । सो हत सी ता रा म जनक मंडप तरैं मो रे रंजन भौं राभौं रा । कारी घटा घनश्या म सि या है दा मि नी मो रें रंजन भौं राभौं रा । (मंडप के नीचे चढ़ा वा चढ़ा या जा रहा है अनगि नत अमूल्य रत्नों का ढेर , जि नकी गि नती नहीं की जा सकती हैं ) चली है बा रा त मंडवा तरें आई अब चढ़ा व की भई तया री ¨ । सुरहन गऊ के गो बर मँगा ये ढि गधर आँगन लि पा ये । गजमुति यन के चौ क पुरा ये, कंचन कलश उजि या र धरा ये । पा ट पी ता म्बर उल्लन - पल्लन " सो नेरूपे को पा र नौ " पा ओ । चढ़ो है चढ़ा व जनक सुख पा ओ भली भां ति कन्या पहि रा ओ । Page 48 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 ‘ज्यो नार’ (जेवनार) गी त वि वा ह के समय गा ए जा नेवा ले लो कगी तो में बुंदेली ज्यो नार गी त अत्यंत प्रसि द्ध हैं । ज्यो नार वि वा ह के समय खि ला ए जा नेभो जन की एक रस्म है जो आज हुई बुंदेली लो क में हर्ष के सा थ मनाई जा ती है । रा म जी को सी ता मैया की सखि यां भो जन करा रही हैं । कि सी सखी नेआलू ,कि सी नेपूरी , कि सी नेकचौ ड़ी , कि सी नेलड्डू, तो ,कि सी नेगुजि या और पेड़े परो से हैं - मो रे रा म से करो न ररि याँ " जनकपुर की सखि याँ उननेआतर परसी सो पा तर" परसी परस दई दुनिदुनियाँ । जनकपुर .... उननेरा मरस परसो , मि र्चा परसो , परत दई अमि यां । जनकपुर .... उननेआलू परसे, रता लू परसे, परस दई घुईयां । जनकपुर .... उननेपूड़ी परसी , कचौ ड़ी परसी , परस दई पुईयाँ । जनकपुर .... उननेलड्डू परसे, पेड़ा परसे, परस दई गुझि यां । जनकपुर … उसी समय एक मजा क हो गया । परो सनेवा ले नेबा रा ती पर दो ना गि रा दि ये जि ससे उसके कपड़े खरा ब हो गये - मा ड़े जो परसे झा बक झो ला " भर गई पा तर उलंग गये दौ ना । खाँ ड़ जो परसी मुठी बगरा ई, ऊपर घी की धा र लगा ई । मैली सी धो ती फैर धुआरहो " गरय " से सा जन फि र कहो पा ड़ों जेउँत - जेउँत बड़ी रुचि आई, बा र - बा र हरि करत बड़ा ई । कंकन खो लना - वि वा ह के पश्चा त दूल्हे के द्वा रा दुल्हदु न का कंगन खो ला जा ता है इस रस्म को बड़े हुए सुंदर ढंग से मनाया जा ता है ये रस्में दूल्हा दुल्हदु न के सा थ सा थ परि वा र के सभी सदस्य करी ब ले आती हैं - जो नै¨ हो वे धनुष को टो रबो , कठि न कंकन गाँ ठगाँ छो रबों । तुमनेजनक पुरी पग धा रे , शि व के धनुष टो र कै डा रे । Page 49 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 जो न हो वे मा री च को मा रि वों । कठि न कंकन को . जनकपुरी की नारी आखि र सा री ¨ लगें तुम्हा री । जि नको बि न हथया रन मा रि बों कठि न कंकन … वे तो जनकपुरी की नारी हाँ सी करें तुम्हारी । अब तो सी खों सि या को जो रबों । कठि न कंकन को छो रबो । वन गमन गी त - जब भगवा न रा म को अपनेपि ता के वचन की रक्षा के लि ए वन जा ना हो ता है तो मा ता सी ता और भा ई लक्ष्मण जी रा म जी के सा थ या त्रा पर चल पड़ते हैं । वन की या त्रा की गा ए जा ने वा ला एक बुंदेली लो कगी त जो उस समय की पति को मनोहरी ढंग से प्रकट करता है - कर घर तन को , चले सि या रा म लखन बन को । रा म लखन बन को चले , रहा अवध में न कोय हो रा म .. नर - नारी व्या कुल हो ई रो वे , धी र धरे न कोय । हो रा मा ..... । खुशी भई कैकई मइया को चले सि या रा म बन को । रा म लखन तपसी दूनो भइया सा धु बनेचले जा य मो रे ला ल । जां य . चलत - चलत सा धु बा गों में पहुंचेहुं चेमा लि न नेपूछी है बा त मो रेला ल । तनक तो छइयाँ बि लमा लों मो रे सा धू " गजरा पहर चले जा वें मो रेला ल । तुम्हरें छुयें गजरा ना पहि रें मा लि न , सा धु धरम घट जा य मो रेला ल । 'कि लपें¨ अवधपुरी नर नारी , कोमल जनक दुलादु लारी जूँ । जब मा ता सी ता वन गमन के समय चलते चलते अपनेलगते हैं तो मा ता लक्ष्मण से कहते हैं थो ड़ा धी रे चलो - धी रे चलों मैं हा री लक्ष्मन , धी रे चलो मैं हा री । एक तो हा री , दूजें सुकुमा री , ती जे मजल कीं मा री । लक्ष्मण धी रे ..... सँकरी गलि याँ काँटकाँ - कटीलें , फा टत हैं तन सा री Page 50 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 लक्ष्मण धी रे ... गैल " चलत मो य " प्या स लगत हैं , दूजे पवन प्रचा री । धी रे चलों मैं हा री लक्ष्मन , धी रे चलो मैं हा री । वट - पूजन गी त - 'नगर अजुध्या की गैल में इक महुआ इक आम । जे तरैं " बैठे दो जने" इक लक्ष्मन दूजे रा म । ली ली बछेरन "लक्ष्मन आइयो , रथ चढ़ " आओ श्री रा म । सा त संखि न के संग में बैठी सी ता सपरन " जा यें । बी च मि ले दो ऊ पा हुँनेसी ता रही सकुचा य । सपरखो र घर आई बा री सी ता भौ जी नेदये पलँग बि छा य । टेरों " जनक जू के नौवा बा रे लक्ष्मन को डेरा दुवादु वाव । कौशल्या मा ता श्री रा म जी के जनकपुरी से लौ टनेपर पूछती है कि बेटा तुम्हारे ससुरा ल कैसी है?है वहां सब कैसा है?है तुम्हारा आवभगत केसे की? और वहां के लो ग कैसे हैं?हैं रा म जी बता ते हैं कि ससुरा ल हमा री ती र्थ जैसी है । सा स-ससुर गंगा और यमुना की तरह है । रा त को दूध की बया री मेरी सा स देती थीं और सा ले हमें घुड़सवा री करा नेले जा ते थे । इस तरह रा म जी अपने ससुरा ल की बढ़ा ई अपनी मा ता से करते हैं - हँस - हँस पूछे मा त कौशि ल्या बेटा कैसी बनी ससुरा र सा स हमा री गंगा जमना ससुर है ती रथ धा म । सा स हमा री अधि कपि या री देती है दूध बि या री । सा रे " हमा रे घुड़ला फि रा वे सा रा जें तपें रसो ई । जैसी मा त मढ़ ” भी तर लि खीं पुतरि या बैसी है बहु तुमा र । 'नौ दस मा स बेटा गरभ में रा खें वरस दसक लौं सेये । ती न दि ना खों बेटा गये ससुरा रे सौं जा य सि रा ही ससुरा ल । 'दुहादुहाई खँचों पि ता दशरथ की अब न जैहों ससुरा ल । अपनेरा म जी सों रही 10 करत हों बेटा नि त उठ जैंओं ससुरा र । बुंदेलखंड में प्रचलि त गा री के गी त इसमें हंसीहं सी मजा क के मा ध्यम से नोकझों कझों का आनंद लि या जा ता है इनके उदा हरण इस प्रकार हैं - Page 51 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 चढ़ा वे का लो कगी त ( गा री ) - आज श्री सि या जू को चढ़त चढ़ा व । हरे मण्डप के नीचे जू ।। धन्य धन्य दशरथ नेऐसा समय पा व । सेन्दुरन्दु की माँ गमाँ शी श फूल पहि रा व हरे मण्डप ………. ती न खा य घा गरे में जरकसी भरा व । मुक्तन को सा री में झलक रयौ भा व हरे मण्डप ………. बिं दि या अजूब ति लक वेंदा छवि छा व । कंचन के करण फूल सा करें सजा ब हरे मण्डप ………. ठुसी बी च ही रन को जड़ौ है जड़ा व । देखो सरमा ला को उत्तम सजा ब हरे मण्डप ………. नौ लखा सुहा र हि य ऊपर लटकाव । पां वपां पो स और दसऊ आंगरौ चढ़ा व हरे मण्डप ………. दा स कहे देख - देख अधि क सुख पा व हरे मण्डप ………. इस प्रकार जनकपुर की सखी श्री रा म से नौकझौं कझौं कर रही हैं, हैंयहाँ के लो कगी त की झाँ की झाँ देखि ये । यह भी एक गा री गी त है - रघुवंशी सुनेजइयो गा री , ओसर नोनो बनो ।। महा रा जा को भो रे बनाय लये ।। ओसर नोनो …… अलवेली अवध पति नारी ।। ओसर नोनो . ।। संगै लई ना सेज गये ।। ओसर नोनो ।। कैसे जा ये ललनवा चा रि ।। ओसर ।। गो रि न के कारे काय भयै ।। ओसर . ।। रा जा झगरौ दि यो नि रबा र ।। ओसर ।। कै गुन्डा गढी में कूद गये ।। ओसर ।। कै कामें बनायो मा र ।। ओसर ।। अवलौ वि नीत बड़ैहि रयै ।। ओसर . ।। मि थि ला में भयो नि रधा र ।। ओसर नोनो बनो ।। Page 52 बुन्देबु न्देलखण्ड वि मर्श, प्रथम वर्ष, प्रथम अंक, दि सम्बर 2023 रा म जी की भक्ति के द्वा रा एक गी त कि सके द्वा रा रा म जी के गुणों का बखा न कि या गया है जो रा म जी की शरण में एक बा र आ जा ता है ईश्वरी के अनुसा र उन्हों नेन्हों सदैव अपनेभक्तों की रक्षा की है और सभी कष्टों से उसे मुक्त कि या है - जि नके रा मचन्द्र रखवा रे, को कर सकत दगा रे । बड़े भये प्रह्ला द पक्ष में, हि रना कुश को मा रे । रा ना जहर दऔं मी रा खों ,खों प्री तम प्रा न समा रे । मसकी जा य ग्रा ह की गरदन, गह गजरा ज नि कारे । 'ईसुर' प्रभु नेला ज बचा ई , सि रपै गि रत हमा रे । नि ष्कर्ष - रा मचंद्र जी के प्रति लो गों में व्या प्त प्रेम एवं समर्पण उनकी भक्ति का ही प्रति बिं ब है वहीं रा मचंद्र जी उनके जी वन का दर्पण । रा म जी पर आधा रि त बुंदेली लो कगी तों में हम सा फ-सा फ बुंदेली संस्कृति एवं परंपरा ओं का दर्शन कर सकते हैं अर्था त यह कहना अनुचि त नहीं हो गा कि इन बुंदेली लो कगी तों के द्वा रा हम बुंदेलखंड की लो क संस्कृति को आसा नी से समझ सकते हैं जो परंपरा गत अभी स्वयं को संरक्षि त कि ए हुए हैं । यह समझना कठि न है कि इन लो कगी त के कारण संस्कृति संरक्षि त है अथवा संस्कृति का यह प्रवा ह लो कगी त को संरक्षि त कि ए हुए है । सरल शब्दों में कहा जा ए तो लो कगी त ही कि सी भी संस्कृति की सबसे सटी क परि चा यक हो ते हैं । लो क सा हि त्य की दृष्टि से बुंदेली भा षा स्वयं अन्य संस्कृति यों के बजा य अधि क समृद्ध प्रती त हो ती है । यहां के लो ग गी तों से भी यही अभि व्यंजना हो ती है अर्था त यह कहना उचि त हो गा कि बुंदेली लो कगी तों के श्री रा म बुंदेली संस्कृति में प्रा ण समा न है जो यहां की संस्कृति और वैभव को स्वयं में समेटे हुए हैं । संदर्भ ग्रंथ - 1. https://vimisahitya.wordpress.com/tag/bundeli/ 2. बुंदेली भा षा सा हि त्य का इति हा स, डॉ क्टर रा म नारा यण शर्मा , वा णी प्रकाशन, नई दि ल्ली । 3. बुंदेली , आरती दुबेदु बे, सा हि त्य अकादमी , दि ल्ली । 4. www.Bundelijalak.com 5. बुन्देली बि बि धा , डॉ क्टर गंगा प्रसा द बरसेया , अयन प्रकाशन, नई दि ल्ली । 6. बुंदेलखंड समग्र, संपा दक हरि वि ष्णु अवस्थी , मा धवरा व सप्रे संग्रहा लय एवं शो ध संस्था न भो पा ल । Page 53

अप्रैल २२, सॉनेट, सोरठे, हरिऔध, ट्रेन, श्री श्री, त्रिपदि, कुंडलिया, राम, सीता छंद, गीतिका छंद, दोहा, रोला, फतवा, नवगीत


सलिल सृजन अप्रैल २२
.
हरिऔध कथा २ 
सोरठा 
सुमिर नवाए माथ, हर हिंदी प्रेमी ऋणी। 
हिंदी मैया साथ, श्वास आखिरी तक रहे।। 

चूम 'लाल' कह माथ, मैया पहला दर्श कर। 
अंत 'राम' हों साथ, हिंदी साथ न छोड़ती।। 
चौपाई 
है हरिऔध कथा अति पावन। पढ़िए सुनिए करिए गायन।। 
श्रम निष्ठा आशा का परचम।‌सूर्य उगाए नित हरकर तम।। 
भारत माँ का पुत्र अनोखा।जिसका पूरा जीवन अनोखा।। 
था सामान्य असाधारण भी। हिंदी सुत, हिंदी सुत हिंदी चारण भी।। 
बृज अवधी उर्दू के झगड़े। भोजपुरी के दावे तगड़े।। 
बुंदेली कन्नौजी बोली। मेवाड़ी हाड़ौती टोली।। 
झगड़ मालवी संग निमाड़ी। खुद की जय खुद कर मरवाड़ी।। 
कठियावाड़ी शेखावाटी, सबका दावा सबकी माटी।। 
मन मुटाव की गठरी खोली। अंग्रेजी ने ताकत तोली।। 
सोरठा 
दो समूह हिंदी बँटी, संस्कृत-उर्दू द्वंद में। 
लड़कर निज ताकत घटी, फँसी विकट छल-छंद में।। 
चौपाई 
न्याय- प्रशासन का गुलाम मन। गौर मालिकों का बंदी तन।। 
लोक उपेक्षित है जब देखा। सिंह अयोध्या का कर लेखा।। 
टकसाली हिंदी का परचम। मैदां में आया ले दमखम।। 
अन्यों को दे सका चुनौती। हिंदी को मत मान बपौती।। 
सबकी हिंदी सबके हित हो। मत प्रधान इसमें निज हित हो।। 
सब देशज भाषाएँ सखियाँ। हिंदी सँग डालें गलबहियाँ।। 
सब हिंदी में घुल-मिल जाएँ। भारत भू की जय-जय गाएँ।। 
दयानंद स्वामी जी रचकर। कृति 'सत्यार्थ प्रकाश' दिवाकर।। 
'चंद्रकांता संतति' हिंदी में। लिख देवकीनंदन खत्री ने।। 
दिखलाई जो राह उसी पर। बढ़े अयोध्या सिंह चरण धर।। 
सोरठा 
तनिक न की परवाह, हुई बहुत आलोचना। 
रख हिंदी प्रति चाह, जुटे रहे हरिऔध जी।। 
२२.४.२०२६ 
०००
मुक्तक
नर पर दो दो मात्रा भारी।
खुश हो चलवा नर पर आरी।।
कभी न बोले 'हाँ', नित ना री!
कमजोरी ताकत भी नारी।।
सॉनेट
मुसाफ़िर
हम सब सिर्फ मुसाफिर यारो!
दुनिया प्लेटफार्म पर आए।
छीनो-झपटो व्यर्थ न प्यारो!
श्वास ट्रेन की टिकिट कटाए।।
सफर जिंदगी का हसीन हो।
हँस-बोलो तो कट जाएगा।
बजती मन में आस बीन हो।
संग न तू कुछ ले पाएगा।।
नाहक नहीं झमेला करना।
सबसे भाईचारा पालो।
नहीं टिकिटचैकर से डरना।।
जो चढ़-उतरे उसे सम्हालो।।
सफर न सफरिंग होने देना।
सर्फिंग कर भव नैया खेना।।
२२-४-२०२३●●●
मुसाफ़िरी सोरठे
*
ट्रेन कर रही ट्रेन, मुसाफिरों को सफर में।
सफर करे हमसफ़र, अगर मदद उसकी करें।।
*
जबलपूर आ गया, क्यों कहता है मुसाफिर।
आता-जाता आप, शहर जहाँ था है वहीं।।
*
करे मुसाफिर भूल, रेल रिजर्वेशन कहे।
बिछी जमीं पर रेल, बर्थ ट्रेन में सुरक्षित।।
*
बिना टिकिट चल रहे, रवि-शशि दोनों मुसाफिर।
समय ट्रेन पर रोज, टी सी नभ क्यों चुप रहे।।
*
नहीं मुसाफिर कौन, सब आते-जाते यहाँ।
प्लेटफ़ॉर्म का संग, नहीं सुहाता किसी को।।
*
देख मुसाफिर मौन, सिग्नल लाल हरा हुआ।
जा ले मंजिल खोज, प्रभु से है मेरी दुआ।।
*
सोरठा गीत
नाहक छोड़ न ठाँव।
*
रहे सुवासित श्वास,
श्रम सीकर सिंचित अगर।
मिले तृप्ति मिट प्यास,
हुई भोर उठ कर समर।।
कोयल कूके नित्य,
कागा करे न काँव
नाहक छोड़ न ठाँव।
*
टेर रही है साँझ,
नभ सिंदूरी हो रहा।
पंछी लौटे नीड़,
मानव लालच बो रहा।
थकी दुपहरी मौन
रोक कहीं तो पाँव,
नाहक छोड़ न ठाँव।
*
रात रुपहली जाग,
खनखन बजती चूड़ियाँ।
हेरे तेरी राह,
जयी न हों मजबूरियाँ।
पथिक भटक मत और
बुला रहा है गाँव।
नाहक छोड़ न ठाँव।
२२-४-२०२३
*
सॉनेट
मौसम
मौसम करवट बदल रहा है
इसका साथ निभाएँ कैसे?
इसको गले लगाएँ कैसे?
दहक रहा है, पिघल रहा है
बेगाना मन बहल रहा है
रोज आग बरसाता सूरज
धरती को धमकाता सूरज
वीरानापन टहल रहा है
संयम बेबस फिसल रहा है
है मुगालता सम्हल रहा है
यह मलबा भी महल रहा है
व्यर्थ न अपना शीश धुनो
कोरे सपने नहीं बुनो
मौसम की सिसकियाँ सुनो
२२-४-२०२२
•••
सॉनेट
महाशक्ति
महाशक्ति हूँ; दुनिया माने
जिससे रूठूँ; उसे मिटा दूँ
शत्रु शांति का; दुनिया जाने
चाहे जिसको मार उठा दूँ
मौतों का सौदागर निर्मम
गोरी चमड़ी; मन है काला
फैलाता डर दहशत मातम
लज्जित यम; मरघट की ज्वाला
नर पिशाच खूनी हत्यारा
मिटा जिंदगी खुश होता हूँ
बारूदी विष खाद मिलाकर
बीज मिसाइल के बोता हूँ
सुना नाश के रहा तराने
महाशक्ति हूँ दुनिया माने
२२-४-२०२२
•••
चिंतन ४
कैसे?
'कैसे' का विचार तभी होता है इससे पहले 'क्यों' और 'क्या' का निर्णय ले लिया गया हो।
'क्यों' करना है?
इस सवाल का जवाब कार्य का औचित्य प्रतिपादित करता है। अपनी गतिविधि से हम पाना क्या चाहते हैं?
'क्या' करना है?
इस प्रश्न का उत्तर परिवर्तन लाने की योजनाओं और प्रयासों की दिशा, गति, मंज़िल, संसाधन और सहयोगी निर्धारित करता है।
'कैसे'
सब तालों की चाबी यही है।
चमन में अमन कैसे हो?
अविनय (अहंकार) के काल में विनय (सहिष्णुता) से सहयोग कैसे मिले?
दुर्बोध हो रहे सामाजिक समीकरण सुबोध कैसे हों?
अंतर्राष्ट्रीय, वैश्विक और ब्रह्मांडीय संस्थाओं और बरसों से पदों को पकड़े पुराने चेहरों से बदलाव और बेहतरी की उम्मीद कैसे हो?
नई पीढ़ी की समस्याओं के आकलन और उनके समाधान की दिशा में सामाजिक संस्थाओं की भूमिका कितनी और कैसे हो?
नई पीढ़ी सामाजिक संस्थाओं, कार्यक्रमों और नीतियों से कैसे जुड़े?
कैसे? कैसे? कैसे?
इस यक्ष प्रश्न का उत्तर तलाशने का श्रीगणेश कैसे हो?
२२•४•२०२२
***
प्रात नमन
*
मन में लिये उमंग पधारें राधे माधव
रचना सुमन विहँस स्वीकारें राधे माधव
राह दिखाएँ मातु शारदा सीख सकें कुछ
सीखें जिससे नहीं बिसारें राधे माधव
हों बसंत मंजरी सदृश पाठक रचनाएँ
दिन-दिन लेखन अधिक सुधारें राधे-माधव
तम घिर जाए तो न तनिक भी हैरां हों हम
दीपक बन दुनिया उजियारें राधे-माधव
जीतेंगे कोविंद न कोविद जीत सकेगा
जीवन की जय-जय उच्चारें राधे-माधव
***
प्राची ऊषा सूर्य मुदित राधे माधव
मलय समीरण अमल विमल राधे माधव
पंछी कलरव करते; कोयल कूक रही
गौरैया फिर फुदक रही राधे माधव
बैठ मुँडेरे कागा टेर रहा पाहुन
बनकर तुम ही आ जाओ राधे माधव
सुना बजाते बाँसुरिया; सुन पायें हम
सँग-सँग रास रचा जाओ राधे माधव
मन मंदिर में मौन न मूरत बन रहना
माखन मिसरी लुटा जाओ राधे माधव
२१-४-२०२०
***
दोहा सलिला
नियति रखे क्या; क्या पता, बनें नहीं अवरोध
जो दे देने दें उसे, रहिए आप अबोध
*
माँगे तो आते नहीं , होकर बाध्य विचार
मन को रखिए मुक्त तो, आते पा आधार
*
सोशल माध्यम में रहें, नहीं हमेशा व्यस्त
आते नहीं विचार यदि, आप रहें संत्रस्त
*
एक भूमिका ख़त्म कर, साफ़ कीजिए स्लेट
तभी दूसरी लिख सकें,समय न करता वेट
*
रूचि है लोगों में मगर, प्रोत्साहन दें नित्य
आप करें खुद तो नहीं, मिटे कला के कृत्य
*
विश्व संस्कृति के लगें, मेले हो आनंद
जीवन को हम कला से, समझें गाकर छंद
*
भ्रमर करे गुंजार मिल, करें रश्मि में स्नान
मन में खिलते सुमन शत, सलिल प्रवाहित भान
*
हैं विराट हम अनुभूति से, हुए ईश में लीन
अचल रहें सुन सकेंगे, प्रभु की चुप रह बीन
***
मनरंजन -
आर्य भट्ट ने शून्य की खोज ६ वीं सदी में की तो लगभग ५००० वर्ष पूर्व रामायण में रावण के दस सर की गणना और त्रेता में सौ कौरवों की गिनती कैसे की गयी जबकि उस समय लोग शून्य (जीरो) को जानते ही नही थे।
*
आर्यभट्ट ने ही (शून्य / जीरो) की खोज ६ वीं सदी में की, यह एक सत्य है। आर्यभट्ट ने ० (शून्य, जीरो) की खोज *अंकों मे* की थी, *शब्दों* नहीं। उससे पहले ० (अंक को) शब्दों में शून्य कहा जाता था। हिन्दू धर्म ग्रंथों जैसे शिव पुराण,स्कन्द पुराण आदि में आकाश को *शून्य* कहा गया है। यहाँ शून्य का अर्थ अनंत है । *रामायण व महाभारत* काल में गिनती अंकों में नहीं शब्दो में होती थी, वह भी *संस्कृत* में।
१ = प्रथम, २ = द्वितीय, ३ = तृतीय, ४ = चतुर्थ, ५ = पंचम, ६ = षष्ठं, ७ = सप्तम, ८ = अष्टम, ९= नवंम, १० = दशम आदि।
दशम में *दस* तो आ गया, लेकिन अंक का ० नहीं।
आया, ‍‍रावण को दशानन, दसकंधर, दसशीश, दसग्रीव, दशभुज कहा जाता है !!
*दशानन मतलव दश+आनन =दश सिरवाला।
त्रेता में *संस्कृत* में *कौरवो* की संख्या सौ *शत* शब्दों में बतायी गयी, अंकों में नहीं।
*शत्* संस्कृत शब्द है जिसका हिन्दी में अर्थ सौ (१००) है। *शत = सौ*
रोमन में १, २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९, ०, के स्थान पर i, ii, iii, iv, v, vi, vii, viii, ix, x आदि लिखा-पढ़ा जाता है किंतु शून्य नहीं आता।आप भी रोमन में एक से लेकर सौ की गिनती पढ़ लिख सकते है !!
आपको ० या ०० लिखने की जरूरत भी नहीं पड़ती है।
तब गिनती को *शब्दो में* लिखा जाता था !!
उस समय अंकों का ज्ञान नहीं, था। जैसे गीता,रामायण में अध्याय १, २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९, को प्रथम अध्याय, द्वितीय अध्याय, पंचम अध्याय,दशम अध्याय... आदि लिखा-पढ़ा जाका था।
दशम अध्याय ' मतलब दसवाँ पाठ (10th lesson) होता है !!
इसमे *दश* शब्द तो आ गया !! लेकिन इस दश मे *अंको का ०* (शून्य, जीरो)" का प्रयोग नही हुआ !!
आर्यभट्ट ने शून्य के लिये आंकिक प्रतीक "०" का अन्वेषण किया जो हमारे आभामंडल, पृथ्वी के परिपथ या सूर्य के आभामंडल का लघ्वाकार है।
*
२०-४-२०२०
कुंडलिया
*
नारी को नर पूजते, नारी नर की भक्त
एक दूसरे के बिना दोनों रहें अशक्त
दोनों रहें अशक्त, मिलें तो रचना करते
उनसा बनने भू पर, ईश्वर आप उतरते
यह दीपक वह ज्योत, पुजारिन और पुजारी
मन मंदिर में मौन, विराजे नर अरु नारी
२२-४-२०२०
***
दोहा-दोहा राम
*
भीतर-बाहर राम हैं, सोच न तू परिणाम
भला करे तू और का, भला करेंगे राम
*
विश्व मित्र के मित्र भी, होते परम विशिष्ट
युगों-युगों तक मनुज कुल, सीख मूल्य हो शिष्ट
*
राम-नाम है मरा में, जिया राम का नाम
सिया राम पैगाम है, राम सिया का नाम
*
उलटा-सीधा कम-अधिक, नीचा-ऊँच विकार
कम न अधिक हैं राम-सिय, पूर्णकाम अविकार
*
मन मारुतसुत हो सके, सुमिर-सुमिर सिय-राम
तन हनुमत जैसा बने, हो न सके विधि वाम
*
मुनि सुतीक्ष्ण मति सुमति हो, तन हो जनक विदेह
धन सेवक हनुमंत सा, सिया-राम का गेह
*
शबरी श्रम निष्ठा लगन, सत्प्रयास अविराम
पग पखर कर कवि सलिल, चल पथ पर पा राम
*
हो मतंग तेरी कलम, स्याही बन प्रभु राम
श्वास शब्द में समाहित, गुंजित हो निष्काम
*
अत्रि व्यक्ति की उच्चता, अनुसुइया तारल्य
ज्ञान किताबी भंग शर, कर्मठ राम प्रणम्य
*
निबल सरलता अहल्या, सिया सबल निष्पाप
गौतम संयम-नियम हैं, इंद्र शक्तिमय पाप
*
नियम समर्थन लोक का, पा बन जाते शक्ति
सत्ता दण्डित हो झुके, हो सत-प्रति अनुरक्ति
*
जनगण से मिल जूझते, अगर नहीं मतिमान.
आत्मदाह करते मनुज, दनुज करें अभिमान.
*
भंग करें धनु शर-रहित, संकुच-विहँस रघुनाथ.
भंग न धनु-शर-संग हो, सलिल उठे तब माथ.
२२-४-२०१९
***
श्री श्री चिंतन दोहा मंथन
इंद्रियाग्नि:
24.7.1995, माँट्रियल आश्रम, कनाडा
*
जीवन-इंद्रिय अग्नि हैं, जो डालें हो दग्ध।
दूषित करती शुद्ध भी, अग्नि मुक्ति-निर्बंध।।
*
अग्नि जले; उत्सव मने, अग्नि जले हो शोक।
अग्नि तुम्हीं जल-जलाते, या देते आलोक।।
*
खुद जल; जग रौशन करें, होते संत कपूर।
प्रेमिल ऊष्मा बिखेरें, जीव-मित्र भरपूर।।
*
निम्न अग्नि तम-धूम्र दे, मध्यम धुआँ-उजास।
उच्च अग्नि में ऊष्णता, सह प्रकाश का वास।।
*
करें इंद्रियाँ बुराई, तिमिर-धुआँ हो खूब।
संयम दे प्रकृति बदल, जा सुख में तू डूब।।
*
करें इंद्रियाँ भलाई, फैला कीर्ति-सुवास।
जहाँ रहें सत्-जन वहाँ, सब दिश रहे उजास।।
***
12.4.2018
मुक्तक
अर्थ डे है, अर्थ दें तो अर्थ का कुछ अर्थ हो.
जेब खाली ही रहे तो काटना भी व्यर्थ हो
जेब काटे अगर दर्जी तो न मर्जी पूछता
जेबकतरा जेब काटे बिन सजा न अनर्थ हो
***
अभिनव प्रयोग
त्रिपदियाँ
(सोलह मात्रिक संस्कारी जातीय छंद, पदांत गुरु)
*
तन्मय जिसमें रहें आप वो
मूरत मन-मंदिर में भी हो
तीन तलाक न दे पाएँगे।
*
नहीं एक के अगर हुए तो
दूजी-तीजी के क्या होंगे?
खाली हाथ सदा पाएँगे।
*
बीत गए हैं दिन फतवों के
साथ समय के नहीं चले तो
आप अकेले पड़ जाएँगे।
२२-४-२०१७
*
छन्द बहर का मूल है ९
मुक्तिका:
*
पंद्रह वार्णिक, अति शर्करी जातीय सीता छंद.
छब्बीस मात्रिक महाभागवत जातीय गीतिका छंद
मात्रा क्रम -२१२.२/२१.२२/२.१२२./२१२
गण सूत्र-रतमयर
बहर- फाइलातुन फाइलातुन फाइलातुन फाइलुन
*
कामना है रौशनी की भीख दें संसार को
मनुजता को जीत का उपहार दें, हर हार को
सर्प बाधा, जिलहरी है परीक्षा सामर्थ्य की
नर्मदा सा ढार दें शिवलिंग पर जलधार को
कौन चाहे मुश्किलों से हो कभी भी सामना
नाव को दे छोड़ जब हो जूझना मँझधार को
भरोसा किस पर करें जब साथ साया छोड़ दे
नाव से खतरा हुआ है हाय रे पतवार को
आ रहे हैं दिन कहीं अच्छे सुना क्या आपने?
सूर्य ही ठगता रहा जुमले कहा उद्गार को
२३-०७-२०१५
***
नवगीत
*
सत्ता-लाश
नोचने आतुर
गिद्ध, बाज, कऊआ.
*
जनमत के लोथड़े बटोरें
पद के भूखे चंद चटोरे.
दर-दर घूम समर्थन माँगें
ले हाथों में स्वार्थ-कटोरे.
मिलीभगत
फैला अफवाहें
खड़ा करो हऊआ.
सत्ता-लाश
नोचने आतुर
गिद्ध, बाज, कऊआ.
*
बाँट रहे अनगिन आश्वासन,
जुमला कहते पाकर शासन.
टैक्स और मँहगाई बढ़ाते
माल उड़ाते, देते भाषण.
त्याग-परिश्रम
हैं अवमूल्यित
साध्य खेल-चऊआ.
सत्ता-लाश
नोचने आतुर
गिद्ध, बाज, कऊआ.
*
निर्धन हैं बेबस अधनंगे
धनी-करें फैशन अधनंगे.
लाज न ढँक पाता है मध्यम
भद्र परेशां, लुच्चे चंगे.
खाली हाथ
सभी को जाना
सुने न क्यों खऊआ?
सत्ता-लाश
नोचने आतुर
गिद्ध, बाज, कऊआ.
*
नवगीत
फतवा
*
तुमने छींका
हमें न भाया
फतवा जारी।
*
ठेकेदार
हमीं मजहब के।
खासमखास
हमई हैं रब के।
जब चाहें
कर लें निकाह फिर
दें तलाक.
क्यों रायशुमारी?
तुमने छींका
हमें न भाया
फतवा जारी।
*
सही-गलत क्या
हमें न मतलब।
मनमानी ही
अपना मजहब।
खुद्दारी से
जिए न औरत
हो जूती ही
अपनी चाहत।
ख्वाब न उसके
बनें हकीकत
है तैयारी।
तुमने छींका
हमें न भाया
फतवा जारी।
*
हमें नहीं
कानून मानना।
हठधर्मी कर
रार ठानना।
मनगढ़ंत
हम करें व्याख्या
लाइलाज है
अकल अजीरण
की बीमारी।
तुमने छींका
हमें न भाया
फतवा जारी।
*
नवगीत: बिंदु-बिंदु परिचय
*
१. नवगीत के २ हिस्से होते हैं १. मुखड़ा २. अंतरा।
२. मुखड़ा की पंक्तिसंख्या या पंक्ति में वर्ण या मात्रा संख्याका कोई बंधन नहीं होता पर मुखड़े की प्रथम या अंतिम एक पंक्ति के समान पदभार की पंक्ति अंतरे के अंत में आवश्यक है ताकि उसके बाद मुखड़े को दोहराया जा सके तो निरंतरता की प्रतीति हो।
३. सामान्यतः २ या ३ अंतरे होते हैं। अन्तरा सामान्यतः स्वतंत्र होता है पर पूर्व या पश्चात्वर्ती अंतरे से सम्बद्ध नहीं होता। अँतरे में पंक्ति या पंक्तियों में वर्ण या मात्रा का कोई बंधन नहीं होता किन्तु अंतरे की पंक्तियों में एक लय का होना तथा वही लय हर अन्तरे में दोहराई जाना आवश्यक है।
४. नवगीत में विषय, रस, भाव आदि का कोई बंधन नहीं होता।
५. संक्षिप्तता, लाक्षणिकता, मार्मिकता, बेधकता, स्पष्टता, सामयिकता, सहजता-सरलता नवगीत के गुण या विशेषतायें हैं।
६. नवगीत की भाषा में देशज शब्दों के प्रयोग से उपज टटकापन या अन्य भाषिक शब्द विशिष्टता मान्य है, जबकि लेख, निबंध में इसे दोष कहा जाता है।
७. नवगीत की भाषा सांकेतिक होती है, गीत में विस्तार होता है।
८. नवगीत में आम आदमी की या सार्वजनिक भावनाओं को अभिव्यक्ति दी जाती है जबकि गीत में गीतकार अपनी व्यक्तिगत अनुभूतियों को शब्दित करता है।
९. नवगीत में अप्रचलित छंद या नए छंद को विशेषता कहा जाता है। छंद मुक्तता भी स्वीकार्य है पर छंदहीनता नहीं।
१०. नवगीत में अलंकारों की वहीं तक स्वीकार्यता है जहाँ तक वे कथ्य की स्पष्ट-सहज अभिव्यक्ति में बाधक न हों।
११. नवगीत में प्रतीक, बिम्ब तथा रूपक भी कथ्य के सहायक के रूप में ही होते हैं।
सारत: हर नवगीत अपने आप में पूर्ण तथा गीत होता है पर हर गीत नवगीत नहीं होता। नवगीत का अपरिहार्य गुण उसका गेय होना है।
+++++++
नवगीत:
.
अपनों पर
अपनों की
तिरछी रहीं निगाहें.
.
साये से भय खाते लोग
दूर न होता शक का रोग
बलिदानी को युग भूले
अवसरवादी करता भोग
सत्य न सुन
सह पाते
झूठी होती वाहें
अपनों पर
अपनों की
तिरछी रहीं निगाहें.
.
उसने पाया था बहुमत
साथ उसी के था जनमत
सिद्धांतों की लेकर आड़
हुआ स्वार्थियों का जमघट
बलिदानी
कब करते
औरों की परवाहें
अपनों पर
अपनों की
तिरछी रहीं निगाहें.
.
सत्य, झूठ को बतलाते
सत्ता छिने न, भय खाते
छिपते नहीं कारनामे
जन-सम्मुख आ ही जाते
जननायक
का स्वांग
पाल रहे डाहें
अपनों पर
अपनों की
तिरछी रहीं निगाहें.
.
वह हलाहल रहा पीता
बिना बाजी लड़े जीता
हो विरागी की तपस्या
घट भरा वह, शेष रीता
जन के मध्य
रहा वह
चाही नहीं पनाहें
अपनों पर
अपनों की
तिरछी रहीं निगाहें.
.
कोई टोंक न पाया
खुद को झोंक न पाया
उठा हुआ उसका पग
कोई रोक न पाया
सबको सत्य
बताओ, जन की
सुनो सलाहें
अपनों पर
अपनों की
तिरछी रहीं निगाहें.
***
मुक्तक:
*
हम एक हों, हम नेक हों, बल दो हमें जगदंबिके!
नित प्रात हो, हम साथ हों, नत माथ हो जगवन्दिते !!
नित भोर भारत-भारती वर दें हमें सब हों सुखी
असहाय के प्रति हों सहायक हो न कोई भी दुखी
*
मत राज्य दो मत स्वर्ग दो मत जन्म दो हमको पुन:
मत नाम दो मत दाम दो मत काम दो हमको पुन:
यदि दो हमें बलिदान का यश दो, न हों जिन्दा रहें
कुछ काम मातु! न आ सके नर हो, न शर्मिंदा रहें
*
तज दे सभी अभिमान को हर आदमी गुणवान हो
हँस दे लुटा निज ज्ञान को हर लेखनी मतिमान हो
तरु हों हरे वसुधा हँसे नदियाँ सदा बहती रहें-
कर आरती माँ भारती! हम हों सुखी रसखान हों
*
फहरा ध्वजा हम शीश को अपने रखें नत हो उठा
मतभेद को मनभेद को पग के तले कुचलें बिठा
कर दो कृपा वर दो जया!हम काम भी कुछ आ सकें
तव आरती माँ भारती! हम एक होकर गा सकें
*
[छंद: हरिगीतिका, सूत्र: प्रति पंक्ति ११२१२ X ४]
२२-४-२०१५
***
षट्पदी :
*'
हिन्दी की जय बोलिए, हो हिन्दीमय आप.
हिन्दी में पढ़-लिख 'सलिल', सकें विश्व में व्याप्त..
नेह नर्मदा में नहा, निर्भय होकर डोल.
दिग-दिगंत को गुँजा दे, जी भर हिन्दी बोल..
जन-गण की आवाज़ है, भारत मान ता ताज.
हिन्दी नित बोले 'सलिल', माँ को होता नाज़..
*
२२-४-२०१०
छंद सलिला:
विशेषिका छंद
*
छंद-लक्षण: जाति महादैशिक , प्रति चरण मात्रा २० मात्रा, चरणांत तीन लघु लघु गुरु (सगण)।
लक्षण छंद:
'विशेषिका' कलाएँ बीस संग रहे
विशेष भावनाएँ कह दे बिन कहे
कमल ज्यों नर्मदा में हँस भ्रमण करे
'सलिल' चरण के अंत में सगण रहे
उदाहरण:
१. नेता जी! सीखो जनसेवा, सुधरो
रिश्वत लेना छोडो अब तो ससुरों!
जनगण ने देखे मत तोड़ो सपने
मानो कानून सभी मानक अपने
२. कान्हा रणछोड़ न जा बज मुरलिया
राधा का काँप रहा धड़कता जिया
निष्ठुर शुक मैना को छोड़ उड़ रहा
यमुना की लहरों का रंग उड़ रहा
नीलाम्बर मौन है, कदम्ब सिसकता
पीताम्बर अनकहनी कहे ठिठकता
समय महाबली नाच नचा हँस रहा
नटवर हो विवश काल-जाल फँस रहा
३. बंदर मामा पहन पजामा सजते
मामी जी पर रोब ज़माने लगते
चूहा देखा उठकर भागे घबरा
मामी मन ही मन मुस्काईं इतरा
२२-४-२०१४
*********************************************
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, ककुभ, कज्जल, कामिनीमोहन कीर्ति, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, छवि, जाया, तांडव, तोमर, दीप, दीपकी, दोधक, नित, निधि, प्रतिभा, प्रदोष, प्रेमा, बाला, भव, मदनअवतार, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, योग, ऋद्धि, राजीव, रामा, लीला, वाणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुभगति, सरस, सार, सिद्धि, सुगति, सुजान, हेमंत, हंसगति, हंसी)
***
मुक्तक:
नव संवत्सर मंगलमय हो.
हर दिन सूरज नया उदय हो.
सदा आप पर ईश सदय हों-
जग-जीवन में 'सलिल' विजय हो.
*
दिल चुराकर आप दिलवर बन गए.
दिल गँवाकर हम दीवाने हो गए.
दिल कुचलनेवाले दिल की क्यों सुनें?
थामकर दिल वे सयाने बन गए.
*
पीर पराई हो सगी, निज सुख भी हो गैर.
जिसको उसकी हमेशा, 'सलिल' रहेगी खैर..
सबसे करले मित्रता, बाँट सभी को स्नेह.
'सलिल' कभी मत किसी के, प्रति हो मन में बैर..
*
मन मंदिर में जो बसा, उसको भी पहचान.
जग कहता भगवान पर वह भी है इंसान..
जो खुद सब में देखता है ईश्वर का अंश-
दाना है वह ही 'सलिल' शेष सभी नादान..
*
'संबंधों के अनुबंधों में ही जीवन का सार है.
राधा से,मीरां से पूछो, सार भाव-व्यापार है..
साया छोडे साथ,गिला क्यों?,उसका यही स्वभाव है.
मानव वह जो हर रिश्ते से करता'सलिल'निभाव है.'
२२-४-२०१०
***