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बुधवार, 10 जून 2026

जून १०, नवगीत, सरस्वती, पोएम, दोहे, पानी, लहसुन,

सलिल सृजन जून १०
नवगीत
० 
हवा गरम हो, 
हवा निकस गई 
हवा हो गओ चैन-अमन। 
तवा घाईं तप, 
तवा कहा रई, 
तवा हो गई धरा अगन।। 
दुबरा गई रे नेह-नरमदा, 
का जाने का भाग-बदा। 
सत्ता-वंदन करें मीडिया 
भौंके-उछले दिखा अदा। 
जाम हर सड़क 
जाम गटक रए 
यातायाती हड़प रकम। 
हवा गरम हो, 
हवा निकस गई 
हवा हो गओ चैन-अमन।। 
सूरज दहको, 
मौसम बहको 
झुलस गई रे! हरियाली। 
बदरी गायब, 
मानसून सँग- 
कितै बिलम गई खुसहाली।। 
धनी नें धोरी 
कुचल निंबोरी 
ठठा सियासत तजें सरम। 
हवा गरम हो, 
हवा निकस गई 
हवा हो गओ चैन-अमन।। 
रौंद रओ रे 
सहर गाँव को, 
तरसे पंछी वृक्ष-छाँव को। 
मंज़िल मटके 
कोसिस को छल- 
राह न जा रई कोए गाँव को। 
दवा जहर हो 
जान लै रई 
डागडर बाबू छीनै धन। 
हवा गरम हो, 
हवा निकस गई 
हवा हो गओ चैन-अमन।। 
०००

नवगीत . 
संधि पत्र पर 
करें दस्तखत 
बाज-व्हेल-चीते। 
गौरैयों पर पहरा देंगे, 
कछुआ का संरक्षण लेंगे। 
मृग-छौनों के 
बने गार्जियन 
पग-पग लगा पलीते। 
संधि पत्र पर 
करें दस्तखत 
बाज-व्हेल-चीते। 
कैंची लेकर पर कतरेंगे। 
खाल खुरच नैवेद्य चखेंगे। 
भार धरा का 
बढ़ा कहेंगे 
हरा-हार हम जीते। 
संधि पत्र पर 
करें दस्तखत 
बाज-व्हेल-चीते 
अंतरिक्ष भी कब्जाएँगे 
सागर-लहरें हथियाएँगे। 
भू हो भय से भीत, 
ठठाएँ, अंतर्मन से रीते। 
संधि पत्र पर 
करें दस्तखत 
बाज-व्हेल-चीते 
करें पेट्रोलियम से यारी 
हैवी वाटर चाहत भारी 
मिनरल लूट 
भरेंगे झोली 
तस्कर हैं गए बीते। 
संधि पत्र पर 
करें दस्तखत 
बाज-व्हेल-चीते। 
एल एन सी टी, जबलपुर 
००० 
नवगीत 
मौसम के सीने में 
भोंके तलवार। 
डूब रहा आदमी 
असमय मँझधार।। 
आतंकी आदमी 
रेतता गला। 
कुतर-काट वृक्ष कहे 
शाख का भला। 
बरगद की बोनसाई 
समय कहे बो न साई 
था विराट 
वामन अब 
हुआ है दईमार। 
मौसम के सीने में 
भोंके तलवार। 
डूब रहा आदमी 
असमय मँझधार।। 
छाया से भीत है 
आप मनचला। 
औरों को देख-देख 
दुखी मनजला। 
अपनी चुपड़ी न खाए 
गैर की रूखी लुभाए 
अंधभक्त चारण वर 
सच रहा बिसार। 
मौसम के सीने में 
भोंके तलवार। 
डूब रहा आदमी अ
समय मँझधार।। 
नहा रहा पातकी 
खून की नदी। 
अभिशापित कलप रही 
सिसकती सदी। 
भाई का सगा न भाई 
वृथा प्रेम की दुहाई 
खड़ी खाट अमानव हो 
खुद से शर्मशार। 
मौसम के सीने में 
भोंके तलवार। डूब रहा आदमी 
असमय मँझधार।। 
०००

दोहे
राम-श्याम थे विगत में, शिवमय रहा अतीत। 
यह कलियुग करता दुखी, होता सत्य प्रतीत।। 
कलि में कपटी ही बढ़ें, सज्जन होते भीत। 
कहे सनातन किस तरह, हम झुठलाएँ मीत।। 
सत्ता-चारण कवि न हो, यही सही है नीत। 
धूप-छाँव सह कह सके, सत्य उचित है रीत।।
१० . ६ . २०२६
०००
Particle
*
O tiny particle! You are really Great.
Are very heavy but without weight.
What is the size?, knowbody know.
From where you come?, where you go.
No caste, no cult, no religion, no race.
Still not loose, always win the race.
O little particle! nobody can destroy.
Nobody can sell, nobody can buy.
You are the ultimate root of universe.
You never bother fate favour or adverse.
world say your are the samllest.
But to me you are the biggest.
10-6-2022
***
मुक्तक
ले लेती है जिंदों की भी अनजाने ही जान मोहब्बत।
दे देती हैं मुर्दों को भी अनजाने ही जान मोहब्बत।।
मरुथल में भी फूल खिलाती, पत्थर फोड़ बहाती झरना-
यही जीव संजीव बनाती, करे प्राण संप्राण मोहब्बत।।...
१०-६-२०२१
***
सरस्वती वंदना
*
भोर भई पट खोल सुरसती
दरसन दे महतारी।
हात जोड़ ठाँड़े हैं सुर-नर
अकल देओ माँ! माँग रए वर
मौन न रह कुछ बोल सुरसती
काहे सुधी बिसारी?
ध्वनि-धुन, स्वर-सुर, वाक् देओ माँ!
मति गति-यति, लय-ताल, छंद गा
विधि-हरि-हर ने रमा-उमा सँग
तोरे भए पुजारी
नेह नरमदा की कलकल तू
पंछी गुंजाते कलरव तू
लोरी, बम्बुलिया, आल्हा तू
मैया! महिमा न्यारी
***
एक रचना
*
अरुण अर्णव लाल-नीला
अहम् तज मन रहे ढीला
स्वार्थ करता लाल-पीला
छंद लिखता नयन गीला
संतुलन चाबी, न ताला
बिना पेंदी का पतीला
नमन मीनाक्षी सुवाचा
गगन में अरविंद साँचा
मुकुल मन ने कथ्य बाँचा
कर रहा जग तीन-पाँचा
मंजरी सज्जित भुआला
पुनीता है शक्ति वर ले
विनीता मति भक्ति वर ले
युक्तिपूर्वक जिंदगी जी
मुक्ति कर कुछ कर्म वर ले
काल का सब जग निवाला
८-६-२०२०
***
वंदना
*
शारद मैया! कैंया लेओ
पल पल करता मन कुछ खटपट
चाहे सुख मिल जाए झटपट
भोला चंचल भाव अँजोरूँ
हूँ संतान तुम्हारी नटखट
आपन किरपा दैया! देओ
शारद मैया! कैंया लेओ
मो खों अच्छर ग्यान करा दे
परमशक्ति सें माँ मिलवा दे
इकनी एक, अनादि अजर 'अ'
दिक् अंबर मैया! पहना दे
किरपा पर कें नीचें सेओ
शारद मैया! कैंया लेओ
अँगुली थामो, राह दिखाओ
कंठ बिराजो, हृदै समाओ
सुर-सरगम-स्वर दे प्रसाद माँ
मत मोखों जादा अजमाओ
नाव 'सलिल' की भव में खेओ
शारद मैया! कैंया लेओ
९-६-२०२०
***
श्वास शारदा माँ बसीं, हैं प्रयास में शक्ति
आस लक्ष्मी माँ मिलीं, कर मन नवधा भक्ति
त्रिगुणा प्रकृति नमन स्वीकारो,
तीन देव की जय बोलो
तीन काल का आत्म मुसाफिर,
कर्म-धर्म मति से तोलो
नमन करो स्वीकार शारदे! नमन करो स्वीकार
सब कुछ तुम पर वार शारदे आया तेरे द्वार
तुम आद्या हो, तुम अनंत हो
तुम्हीं अंत मेरी माता
ध्यान तुम्हारे में खोता जो, वही आप को पा पाता
पाती मन की कोरी इस पर, ॐ लिखूँ झट सिखला दो
सलिल बिंदु हो नेह नर्मदा, झलक पुनीता विख्याता
ग्यान तारिका! कला साधिका!
मन मुकुलित पुष्पा दो माँ!
'मावस को कर शरत् पूर्णिमा,
मैया! वरदा प्रख्याता
शुभदा सुखदा मातु वर्मदा,
देवि धर्मदा जगजननी
वीणा झंकृत कर दो मन की,
जीवन अर्पित हे प्राता
जड़ है जीव करो संजीवित, चेतन हो सत् जान सके
शिव-सुंदर का चित्र गुप्त लख
रहे सदा तुमको ध्याता
१०-६-२०२०
***
क्षणिका
क्यों पूछते हो
राह यह जाती कहाँ है?
आदमी जाते हैं नादां
रास्ते जाते नहीं हैं।*
दिशाएँ दीवार,
छत है आसमान
बेदरो-दीवार
कहिए कौन है?
१०-६-२०१९
***
दोहे पानीदार
पानी तो अनमोल है, मत कह तू बेमोल।
कंठ सूखते ही तुझे, पता लगेगा मोल।।
*
वर्षा-जल संग्रहण कर, बुझे ग्रीष्म में प्यास।
बहा निरर्थक क्यों सहो, रे मानव संत्रास।।
*
सलिल' नीर जल अंबु बिन, कैसे हो आनंद।
कलकल ध्वनि बिन कल कहाँ, कैसे गूँज छंद।।
*
लहर-लहर हँस हहरकर, बन-मिट दे संदेश।
पाया-खोया भूलकर, चिंता मत कर लेश।।
*
पानी मरे न आँख का, रखिए हर दम ध्यान।
सूखे पानी आँख का, यदि कर तुरत निदान।।
*
10.6.2018
***
स्वास्थ्य सलिला
कुछ नुस्खे: छोटे लहसुन के बड़े फायदे.......
___________________________________________________
(इन बीमारियों में है रामबाण)
लहसुन सिर्फ खाने के स्वाद को ही नहीं बढ़ाता बल्कि शरीर के लिए एक औषधी की तरह भी काम करता है।इसमें प्रोटीन, विटामिन, खनिज, लवण और फॉस्फोरस, आयरन व विटामिन ए,बी व सी भी पाए जाते हैं। लहसुन शरीर की रोग प्रतिरोधी क्षमता को बढ़ाता है। भोजन में किसी भी तरह इसका सेवन करना शरीर के लिए बेहद फायदेमंद होता है आज हम बताने जा रहे हैं आपको औषधिय गुण से भरपूर लहसुन के कुछ ऐसे ही नुस्खों के बारे में जो नीचे लिखी स्वास्थ्य समस्याओं में रामबाण है।
1-- 100 ग्राम सरसों के तेल में दो ग्राम (आधा चम्मच) अजवाइन के दाने और आठ-दस लहसुन की कुली डालकर धीमी-धीमी आंच पर पकाएं। जब लहसुन और अजवाइन काली हो जाए तब तेल उतारकर ठंडा कर छान लें और बोतल में भर दें। इस तेल को गुनगुना कर इसकी मालिश करने से हर प्रकार का बदन का दर्द दूर हो जाता है।
2-- लहसुन की एक कली छीलकर सुबह एक गिलास पानी से निगल लेने से रक्त में कोलेस्ट्रॉल का स्तर नियंत्रित रहता है।साथ ही ब्लडप्रेशर भी कंट्रोल में रहता है।
3-- लहसुन डायबिटीज के रोगियों के लिए भी फायदेमंद होता है। यह शुगर के स्तर को नियंत्रित करने में कारगर साबित होता है।
4-- खांसी और टीबी में लहसुन बेहद फायदेमंद है। लहसुन के रस की कुछ बूंदे रुई पर डालकर सूंघने से सर्दी ठीक हो जाती है।
5-- लहसुन दमा के इलाज में कारगर साबित होता है। 30 मिली लीटर दूध में लहसुन की पांच कलियां उबालें और इस मिश्रण का हर रोज सेवन करने से दमे में शुरुआती अवस्था में काफी फायदा मिलता है। अदरक की गरम चाय में लहसुन की दो पिसी कलियां मिलाकर पीने से भी अस्थमा नियंत्रित रहता है।
6-- लहसुन की दो कलियों को पीसकर उसमें और एक छोटा चम्मच हल्दी पाउडर मिला कर क्रीम बना ले इसे सिर्फ मुहांसों पर लगाएं। मुहांसे साफ हो जाएंगे।
7-- लहसुन की दो कलियां पीसकर एक गिलास दूध में उबाल लें और ठंडा करके सुबह शाम कुछ दिन पीएं दिल से संबंधित बीमारियों में आराम मिलता है।
8-- लहसुन के नियमित सेवन से पेट और भोजन की नली का कैंसर और स्तन कैंसर की सम्भावना कम हो जाती है।
9-- नियमित लहसुन खाने से ब्लडप्रेशर नियमित रहता है। एसीडिटी और गैस्टिक ट्रबल में भी इसका प्रयोग फायदेमंद होता है। दिल की बीमारियों के साथ यह तनाव को भी नियंत्रित करती है।
10-- लहसुन की 5 कलियों को थोड़ा पानी डालकर पीस लें और उसमें 10 ग्राम शहद मिलाकर सुबह -शाम सेवन करें। इस उपाय को करने से सफेद बाल काले हो जाएंगे।
11- यदि रोज नियमित रूप से लहसुन की पाँच कलियाँ खाई जाएँ तो हृदय संबंधी रोग होने की संभावना में कमी आती है। इसको पीसकर त्वचा पर लेप करने से विषैले कीड़ों के काटने या डंक मारने से होने वाली जलन कम हो जाती है।
12- जुकाम और सर्दी में तो यह रामबाण की तरह काम करता है। पाँच साल तक के बच्चों में होने वाले प्रॉयमरी कॉम्प्लेक्स में यह बहुत फायदा करता है। लहसुन को दूध में उबालकर पिलाने से बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। लहसुन की कलियों को आग में भून कर खिलाने से बच्चों की साँस चलने की तकलीफ पर काफी काबू पाया जा सकता है।
13- लहसुन गठिया और अन्य जोड़ों के रोग में भी लहसुन का सेवन बहुत ही लाभदायक है।
लहसुन की बदबू-
अगर आपको लहसुन की गंध पसंद नहीं है कारण मुंह से बदबू आती है। मगर लहसुन खाना भी जरूरी है तो रोजमर्रा के लिये आप लहसुन को छीलकर या पीसकर दही में मिलाकर खाये तो आपके मुंह से बदबू नहीं आयेगी। लहसुन खाने के बाद इसकी बदबू से बचना है तो जरा सा गुड़ और सूखा धनिया मिलाकर मुंह में डालकर चूसें कुछ देर तक, बदबू बिल्कुल निकल जायेगी।
***

बुधवार, 29 अप्रैल 2026

अप्रैल २९, सरस्वती, बुंदेली, सॉनेट, नवगीत, मुक्तक, दोहे, सुमित्र, सिंधी, देवी नागरानी, यमक

सलिल सृजन अप्रैल २९
ग़ज़लिका
ख्वाब में बार-बार आते हैं
साथ होते न दूर जाते हैं
.
दें न दीदार, दीद फेरे हैं
आँख से आँख हँस चुराते हैंं
.
हैं न दिलवर, न दिलवरी ही है
पूछते हैं न कुछ बताते हैं
.
बात बेबात कुछ नहीं होती
खीझते हैं, कभी रिझाते हैं
.
प्यास बुझती नहीं बिना साकी
जाम नखरे कहाँ उठाते हैं?
.
बाँह में सूर्य, चाह में चंदा
वो वफ़ा इस तरह निभाते हैं
.
है न संजीव, न निर्जीव 'सलिल'
प्यास लेकिन सभी बुझाते हैं
२९.४.२०२६
०००
पूर्णिका
.
अपने सहायक आप हो
नहीं ईश्वर को दोष दो
.
सुख-दुख सहो सम भाव से
खुद को न कोस, न श्रेय लो
.
होनी न रोके से रुके
चुप देख तू हो या न हो
.
औषध व पथ्य न भूलना
मत दे गँवा मन-शांति को
.
कुछ ट्रेन छोड़ उतर गए
कुछ चढ़ गए हैं संग जो
.
ग़म की जमीं पे धैर्य से
संतोष की हँस फसल बो
.
संजीवनी हो श्वास हर
मत व्यर्थ मन का चैन खो
.
जीवन जिओ जिंदा रहो
मत आह भर, तज चाह ढो
२९.४.२०२५
०००
पूर्णिका
हर हर बम बम
मेटो प्रभु तम
.
नयन मूँदकर
ध्याते हैं हम
.
पर पीड़ा लख
नयन हुए नम
.
दहशतगर्दों
खातिर हम यम
.
कोमल हैं तो
मत समझो कम
.
गौरी-काली
नारी में दम
.
भाग न कायर
हो अब बेदम
.
शक्ति-भक्ति मिल
होती अणुबम
.
सलिल समर्पित
हर हर बम बम
२९.४.२०२५
०००
सरस्वती वंदना (बुंदेली)
ओ मैहरवारी सारदा! दरसन दै दो मात।
किरपा बिन सब काम बिगर रय, बनै नें कौनऊ बात।।
*
तुमखों पूजें सबई देवता, देवी, मनु-दनु-संत।
तुमईं सार, तुम बिन कौनउ में तनकउ कऊँ नें तंत।।
करुनाकर मैया! करुना कर, तुम बिन कोऊ नें तात।
ओ मैहरवारी सारदा! दरसन दै दो मात।
*
दसों दिसा मा गूँज रई रे मैया तोरी बीन।
सबई कलाओं में हो मैया सच्ची तुमई प्रबीन।।
सबरे स्वर-ब्यंजन मिल माता तोरे ही गुन गात।
ओ मैहरवारी सारदा! दरसन दै दो मात।
*
चित्र गुप्त है तोरो मैया, दरसन दै दो आज।
भवसागर सें तारो जननी, कर दो पग-रज ताज।।
मैं कपूत पर मैया तुम हो भगतबसल बिख्यात।
ओ मैहरवारी सारदा! दरसन दै दो मात।
२९.४.२०२४
•••
सॉनेट
माँगा, हाथ रहा रीता ही
बिन माँगे जो चाहा, पाया
साथ रहा चुप, पल बीता ही
चला गया जो भी मन भाया
वन जाती केवल सीता ही
सिंहासन रामों ने पाया
जनवाणी रहती क्रीता ही
चरण ने ईनाम कमाया
रहा सुनाता जो गीता ही
काम उसी के मन क्यों भाया?
रीति-नीति जिसकी प्रीता थी
अनय उसी ने ह्रदय बसाया
अपना ही हो गया पराया
साथ न तम में देता साया
२९-४-२०२२
***
नवगीत
*
चार आना भर उपज है,
आठ आना भर कर्ज
बारा आना मुसीबत,
कौन मिटाए मर्ज?
*
छिनी दिहाड़ी,
पेट है खाली कम अनुदान
शीश उठा कैसे जिएँ?
भीख न दो बिन मान
मेहनत कर खाना जुटे
निभा सकें हम फर्ज
*
रेल न बस, परबस भए
रेंग जा रहे गाँव
पीने को पानी नहीं
नहीं मूँड़ पर छाँव
बच्चे-बूढ़े परेशां
नहीं किसी को गर्ज
*
डंडे फटकारे पुलिस
मानो हम हैं चोर
साथ न दे परदेस में
कोई नगद न और
किस पर मुश्किल के लिए
करें मुकदमा दर्ज
२९-४-२०२०
***
गीत
*
नटखट गोपाल श्याम जसुमति का लाला
बरज रही बिरज मही जाओ मत तजकर
टेर रहीं धेनु दुलराओ भुज भरकर
माखन की मटकी लो गोरस का प्याला
जमुना की लहरें-तट, झूमते करील
कुंजों में राधिका, नयन गह्वर झील
वेणु का निनाद; कदंब ऊँचा रखवाला
रास का हुलास, फोड़ मटकी खो जाना
मीठी मुसकान मधुर मन में बो जाना
बाबा का लाड़, मोह मैया ने पाला
***
गीत
आज के इस दौर में भी
*
आज के इस दौर में भी समर्पण अध्याय हम
साधना संजीव होती किस तरह पर्याय हम
मन सतत बहता रहा है नर्मदा के घाट पर
तन तुम्हें तहता रहा है श्वास की हर बाट पर
जब भरी निश्वास; साहस शांति आशा ने दिया
सदा करता राज बहादुर; हुए सदुपाय हम
आपदा पहली नहीं कोविद; अनेकों झेलकर
लिखी मन्वन्तर कथाएँ अगिन लड़-भिड़ मेलकर
साक्ष्य तुहिना-कण कहें हर कली झरकर फिर खिले
हौसला धरकर; मुसीबत हर मिटाने धाय हम
ओम पुष्पा व्योम में, हनुमान सूरज की किरण
वरण कर को विद यहाँ? खोजें करें भारत भ्रमण
सूर सुषमा कृष्ण मोहन की सके बिन नयन लख
खिल गया राजीव पूनम में विनत मुस्काय हम
महामारी पूजते हम तुम्हें; माता शीतला
मिटा निर्बल मंदमति, मेटो मलिनता बन बला
श्लोक दुर्गा शती, चौपाई लिए मानस मुदित
काय को रोना?, न कोरोना हुए निरुपाय हम
गीत गूँजेंगे मिलन के, सृजन के निश-दिन सुनो
जहाँ थे हम बहुत आगे बढ़ेंगे, तुम सिर धुनो
बुनो सपने मीत मिल, अरि शीघ्र माटी में मिलो
सात पग धर, सात जन्मों संग पा हर्षाय हम
***
मुक्तक
सीता की जयकार से खुश हों राजा राम
जय न उमा की यदि करें झट शंकर हों वाम
अर्णव में अवगाह कर अरुण सुसज्जित पूर्व
चला कर्मपथ पर अडिग उषा रश्मि कर थाम
*
अपनी धरा अपना गगन, हम नवा सिर करते नमन
रवि तिमिर हर उजयार दे, भू भारती को कर चमन
जनगण करे सब काम मिल, आलस्य-स्वार्थ न साथ हो
श्रम-स्वेद की जयकार कर, कम हो न किंचित भी लगन
*
शीतल पवन बह कह रहा, आ मनुज प्राणायाम कर
पंछी करे कलरव मधुर उड़, उठ न अब आराम कर
धरकर धरा पर चरण बाँहों में उठा ले आसमां
सूरज तनय पहचान खुद को जगत में कुछ नाम कर
पूछता कोविद यहाँ को विद?
सभी हित काम कर
द्वेष-स्वार्थों में उलझ मत जिंदगी बदनाम कर
बहुत सोया जाग जा अब, टेरता है समय सुन
स्वेद सीकर में नहाकर हँस सुबह को शाम कर
उषा अगवानी करेगी, तम मिटाकर नामवर
भेंट भुजभर हँसे संध्या, रुक थक न चुक न विरामकर
निशा आँचल में सुलाये सुनहरे सपने दिखा
एक दिन तो 'संजीव' सारे काम तू निष्काम कर
२९-४-२०२०
***
सृजन चर्चा
सुमित्र जी के जिजीविषाजयी व्यंग्य दोहे
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
सनातन सलिल नर्मदा का अंचल सनातन काल से सृजनधर्मियों का साधना क्षेत्र रहा है. सम-सामयिक साहित्य सर्जकों में अग्रगण्य डॉ. राजकुमार तिवारी 'सुमित्र' विविध विधाओं में अपने श्रेष्ठ सृजन से सर्वत्र सतत समादृत हो रहे हैं।
दोहा हिंदी साहित्य कोष का दैदीप्यमान रत्न है। कथ्य की संक्षिप्तता, शब्दों की सटीकता, कहन की लयबद्धता , बिम्बों-प्रतीकों की मर्मस्पर्शिता तथा भाषा की लोक-ग्राह्यता के पञ्चतत्वी निकष पर खरे दोहे रचना सुमित्र जी के लिए सहज-साध्य है। सामयिकता, विसंगतियों का संकेतन, विडंबनाऑं पर प्रहार, जनाक्रोश की अभिव्यक्ति और परोक्षतः ही सही पारिस्थितिक वैषम्य निदान की प्रेरणा व्यंग्य विधा के पाँच सोपान हैं। सुमित्र की दशरथी कलम ''विगतं वा अगं यस्य'' की कसौटी पर खरे उतारनेवाले व्यंग्य दोहे रचकर अपनी सामर्थ्य का लोहा मनवाती है।
''आएगा, वह आयेगा, राह देखती नित्य / कहाँ न्याय का सिंहासन, कहाँ विक्रमादित्य'' कहकर दोहाकार आम आदमी की आशावादिता और उसकी निष्फलता दोनों को पूरी शिद्दत से बयां करता है।
समाज में येन-केन-प्रकारेण धनार्जन कर स्वयं को सकल संवैधानिक प्रावधानों से ऊपर समझनेवाले नव धनाढ्य वर्ग की भोगवादी मनोवृत्ति पर तीक्ष्ण कटाक्ष करते हुए निम्न दोहे में दोहाकार 'रसलीन' शब्द का सार्थक प्रयोग करता है- ''दिन को राहत बाँटकर, रात हुई रसलीन / जिस्म गरम करता रहा, बँगले का कालीन'' ।
राजनीति का ध्येय जनकल्याण से बदलकर पद-प्राप्ति और आत्म कल्याण होने की विडम्बना पर सुमित्र का कवि-ह्रदय व्यथित होकर कहता है-
नीतिहीन नेतृत्व है, नीतिबद्ध वक्तव्य।
चूहों से बिल्ली कहे, गलत नहीं मंतव्य।।
*
सेवा की संकल्पना, है अतीत की बात।
फोटो माला नोट है, नेता की औकात।।
*
शैक्षणिक संस्थाओं में व्याप्त अव्यवस्था पर व्यंग्य दोहा सीधे मन को छूता है-
पैर रखा है द्वार पर, पल्ला थामे पीठ।
कोलाहल का कोर्स है, मन का विद्यापीठ।।
*
पात्रता का विचार किये बिना पुरस्कार चर्चित होने की यशैषणा की निरर्थकता पर सुमित्र दोहा को कोड़े की तरह फटकारते हैं-
अकादमी से पुरस्कृत, गजट छपी तस्वीर।
सम्मानित यों कब हुए, तुलसी सूर कबीर।।
*
अति समृद्धि और अति सम्पन्नता के दो पाटों के बीच पिसते आम जन की मनस्थिति सुमित्र की अपनी है-
सपने में रोटी दिखे, लिखे भूख तब छंद।
स्वप्न-भूख का परस्पर, हो जाए अनुबंध।।
*
आँखों के आकाश में, अन्तःपुर आँसू बसें, नदी आग की, यादों की कंदील, तृष्णा कैसे मृग बनी, दरस-परस छवि-भंगिमा, मन का मौन मजूर, मौसम की गाली सुनें, संयम की सीमा कहाँ, संयम ने सौगंध ली, आँसू की औकात क्या, प्रेम-प्यास में फर्क, सागर से सरगोशियाँ, जैसे शब्द-प्रयोग और बिम्ब-प्रतीक दोहाकार की भाषिक सामर्थ्य की बानगी बनने के साथ-साथ नव दोहकारों के लिए सृजन का सबक भी हैं।
सुमित्र के सार्थक, सशक्त व्यंग्य दोहों को समर्पित हैं कुछ दोहे-
पंक्ति-पंक्ति शब्दित 'सलिल', विडम्बना के चित्र।
संगुम्फित युग-विसंगति, दोहा हुआ सुमित्र।।
*
लय भाषा रस भाव छवि, बिम्ब-प्रतीक विधान।
है दोहा की खासियत, कम में अधिक बखान।।
*
सलिल-धार की लहर सम, द्रुत संक्षिप्त सटीक।
मर्म छुए दोहा कहे, सत्य हिचक बिन नीक।।
*
व्यंग्य पहन दोहा हुआ, छंदों का सरताज।
बन सुमित्र हृद-व्यथा का, कहता त्याग अकाज।।
***
छंद कोष से नया छंद
विधान
मापनी- २१२ २११ १२१ १२१ १२१ १२१ १२१ १२।
२३ वार्णिक, ३२ मात्रिक छंद।
गण सूत्र- रभजजजजजलग।
मात्रिक यति- ८-८-८-८, पदांत ११२।
वार्णिक यति- ५-६-६-६, पदांत सगण।
*
उदाहरण
हो गयी भोर, मतदान करों, मत-दान करो, सुविचार करो।
हो रहा शोर, उठ आप बढ़ो, दल-धर्म भुला, अपवाद बनो।।
है सही कौन, बस सोच यही, चुन काम करे, न प्रचार वरे।
जो नहीं गैर, अपना लगता, झट आप चुनें, नव स्वप्न बुनें।।
*
हो महावीर, सबसे बढ़िया, पर काम नहीं, करता यदि तो।
भूलिए आज, उसको न चुनें, पछता मत दे, मत आज उसे।।
जो रहे साथ, उसको चुनिए, कब क्या करता, यह भी गुनिए।
तोड़ता नित्य, अनुशासन जो, उसको हरवा, मन की सुनिए।।
*
नर्मदा तीर, जनतंत्र उठे, नव राह बने, फिर देश बढ़े।
जागिए मीत, हम हाथ मिला, कर कार्य सभी, निज भाग्य गढ़ें।।
मुश्किलें रोक, सकतीं पथ क्या?, पग साथ रखें, हम हाथ मिला।
माँगिए खैर, सबकी रब से, खुद की खुद हो, करना न गिला।।
२९-४-२०१९
***
हिंदी-सिंधी सेतु
एक महत्वपूर्ण सारस्वत अनुष्ठान. हिंदी-सिन्धी समन्वय सेतु, देवी नागरानी जी द्वारा संकलित, अनुवादित, संपादित ५५ हिंदी कवियों की रचनाएँ सिन्धी अनुवाद सहित एक संकलन में पढ़ना अपने आपमें अनूठा अनुभव. काश इसमें सिंधी वर्णमाला, वाक्य रचना और अन्य कुछ नियन परिशिष्ट के रूप में होता तो मैं सिंधी सीखकर उसमें कुछ लिखने का प्रयास करता.
देवी नागरानी जो और सभी सहभागियों को बधाई. मेरा सौभाग्य कि इसमें मेरी रचना भी है.अन्य भाषाओँ के रचनाकार भी ऐसा प्रयास करें.
अंग्रेजी, मलयालम और पंजाबी के बाद अब सिन्धी में भी रचना अनुदित हुई.
*
१. शब्द सिपाही................. १. लफ्ज़न जो सिपाही
*.....................................*
मैं हूँ अदना....................... माँ आहियाँ अदनो
शब्द सिपाही......................लफ्ज़न जो सिपाही.
अर्थ सहित दें......................अर्थ साणु डियन
शब्द गवाही.......................लफ्ज़ गवाही.
*.....................................*
२. सियासत.......................२. सियासत
तुम्हारा हर........................तुंहिंजो हर हिकु सचु
सच गलत है...................... गलत आहे.
हमारा हर......................... मुंहिंजो
सच गलत है.......................हर हिकु सचु गलत आहे
यही है...............................इहाई आहे
अब की सियासत.................अजु जी सियासत
दोस्त ही............................दोस्त ई
करते अदावत.....................कन दुश्मनी
*......................................*
[आमने-सामने, हिंदी-सिन्धी काव्य संग्रह, संपादन व अनुवाद देवी नागरानी
शिलालेख, ४/३२ सुभाष गली, विश्वास नगर, शाहदरा दिल्ली ११००३२. पृष्ठ १२६, २५०/-]
***
नवगीत:
.
जो हुआ सो हुआ
.
बाँध लो मुट्ठियाँ
चल पड़ो रख कदम
जो गये, वे गये
किन्तु बाकी हैं हम
है शपथ ईश की
आँख करना न नम
नीलकण्ठित बनो
पी सको सकल गम
वृक्ष कोशिश बने
हो सफलता सुआ
.
हो चुका पूर्व में
यह नहीं है प्रथम
राह कष्टों भरी
कोशिशें हों न कम
शेष साहस अभी
है बहुत हममें दम
सूर्य हैं सच कहें
हम मिटायेंगे तम
उठ बढ़ें, जय वरें
छोड़कर हर खुआ
.
चाहते क्यों रहें
देव का हम करम?
पालते क्यों रहें
व्यर्थ मन में भरम?
श्रम करें तज शरम
साथ रहना धरम
लोक अपना बनाएंगे
फिर श्रेष्ठ हम
गंग जल स्वेद है
माथ से जो चुआ
***
यमकीय दोहा
.
अंतर में अंतर पले, तब कैसे हो स्नेह
अंतर से अंतर मिटे, तब हो देह विदेह
अंतर = मन / भेद
.
देख रहे छिप-छिप कली, मन में जागी प्रीत
देख छिपकली वितृष्णा, क्यों हो छू भयभीत?
छिप कली = आड़ से रूपसी को देखना / एक जंतु
.
मूल्य बढ़े जीना हुआ, अब सचमुच दुश्वार
मूल्य गिरे जीना हुआ, अब सचमुच दुश्वार
मूल्य = कीमत, जीवन के मानक
.
अंचल से अंचल ढँकें, बची रह सके लाज
अंजन का अंजन करें, नैन बसें सरताज़
अंचल = दामन / भाग या हिस्सा, अंजन = काजल, आँख में लगाना
.
दिनकर तिमिर अँजोरता, फैले दिव्य प्रकाश
संध्या दिया अँजोरता, महल- कुटी में काश
अँजोरता = समेटता या हर्ता, जलाता या बालता
***
एक कविता : दो कवि
शिखा:
एक मिसरा कहीं अटक गया है
दरमियाँ मेरी ग़ज़ल के
जो बहती है तुम तक
जाने कितने ख़याल टकराते हैं उससे
और लौट आते हैं एक तूफ़ान बनकर
कई बार सोचा निकाल ही दूँ उसे
तेरे मेरे बीच ये रुकाव क्यूँ?
फिर से बहूँ तुझ तक बिना रुके
पर ये भी तो सच है
कि मिसरे पूरे न हों तो
ग़ज़ल मुकम्मल नहीं होती
*
संजीव
ग़ज़ल मुकम्मल होती है
तब जब
मिसरे दर मिसरे
दूरियों पर पुल बनाती है
बह्र और ख़याल
मक्ते और मतले
एक दूसरे को अर्थ देते हैं
गले मिलकर
काश! हम इंसान भी
साँसों और आसों के मिसरों से
पूरी कर सकें ज़िंदगी की ग़ज़ल
जिसे गुनगुनाकर कहें:
आदाब अर्ज़
आ भी जा ऐ अज़ल!
२९-४-२०१५
***
दोहा सलिला
*
अगम अनाहद नाद ही, सकल सृष्टि का मूल
व्यक्त करें लिख ॐ हम, सत्य कभी मत भूल
निराकार ओंकार का, चित्र न कोई एक
चित्र गुप्त कहते जिसे, उसका चित्र हरेक
सृष्टि रचे परब्रम्ह वह, पाले विष्णु हरीश
नष्ट करे शिव बन 'सलिल', कहते सदा मनीष
कंकर-कंकर में रमा, शंका का कर अन्त
अमृत-विष धारण करे, सत-शिव-सुन्दर संत
महाकाल के संग हैं, गौरी अमृत-कुण्ड
सलिल प्रवाहित शीश से, देखेँ चुप ग़ज़-तुण्ड
विष-अणु से जीवाणु को, रचते विष्णु हमेश
श्री अर्जित कर रम रहें, श्रीपति सुखी विशेष
ब्रम्ह-शारदा लीन हो, रचते सुर-धुन-ताल
अक्षर-शब्द सरस रचें, कण-कण हुआ निहाल
नाद तरंगें संघनित, टकरातीं होँ एक
कण से नव कण उपजते, होता एक अनेक
गुप्त चित्र साकार हो, निराकार से सत्य
हर आकार विलीन हो, निराकार में नित्य
आना-जाना सभी को, यथा समय सच मान
कोई न रहता हमेशा, परम सत्य यह जान
नील गगन से जल गिरे, बहे समुद मेँ लीन
जैसे वैसे जीव हो, प्रभु से प्रगट-विलीन
कलकल नाद सतत सुनो, छिपा इसी में छंद
कलरव-गर्जन चुप सुनो, मिले गहन आनंद
बीज बने आनंद ही, जीवन का है सत्य
जल थल पर गिर जीव को, प्रगटाता शुभ कृत्य
कर्म करे फल भोग कर, जाता खाली हाथ
शेष कर्म फल भोगने, फ़िर आता नत माथ
सत्य समझ मत जोड़िये, धन-सम्पद बेकार
आये कर उपयोग दें, औरों को कर प्यार
सलिला कब जोड़ें 'सलिल', कभी न रीते देख
भर-खाली हो फ़िर भरे, यह विधना का लेख
***
छंद सलिला:
त्रिलोकी छंद
*
छंद-लक्षण: जाति त्रैलोक , प्रति चरण मात्रा २१ मात्रा, चंद्रायण (५ + गुरु लघु गुरु लघु, / ५ + गुरु लघु गुरु ) तथा प्लवंगम् (गुरु + ६ / ८ + गुरु लघु गुरु ) का मिश्रित रूप ।
लक्षण छंद:
पाँच मात्रा गुरु लघु / गुरु लघु पहिले लें
पाँच मात्रा गुरु लघु / गुरु चंद्रायण है
है गुरु फ़िर छै / मात्रा छंद प्लवंगम्
आठ तथा गुरु / लघु गुरु मात्रा रखें हम
उदाहरण:
१. नाद अनाहद / जप ले रे मन बाँवरे
याद ईश की / कर ले सो मत जाग रे
सदाशिव ओम ओम / जप रहे ध्यान मेँ
बोल ओम ओम ओम / संझा-विहान में
२. काम बिन मन / कुछ न बोल कर काम तू
नीक काम कर / तब पाये कुछ नाम तू
कभी मत छोड़ होड़ / जय मिले होड़ से
लक्ष्य की डोर जोड़ / पथ परे मोड़ से
३. पुरातन देश-भूमि / पूजिए धन्य हो
मूल्य सनातन / सदा मानते प्रणम्य हो
हवा पाश्चात्य ये न / दे बदल आपको
छोड़िये न जड़ / न ही उखड़ें अनम्य हो
******************************
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, ककुभ, कज्जल, कामिनीमोहन, कीर्ति, कुडंली, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दीप, दीपकी, दोधक, नित, निधि, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनअवतार, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, योग, ऋद्धि, राजीव, रामा, लीला, वाणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुभगति, सरस, सार, सिद्धि, सुगति, सुजान, हेमंत, हंसगति, हंसी)
।। हिंदी आटा माढ़िये, उर्दू मोयन डाल । 'सलिल' संस्कृत सान दे, पूरी बने कमाल ।।
२९-४-२०१४
***
मुक्तक:
जो दूर रहते हैं वही समीप होते हैं.
जो हँस रहे, सचमुच वही महीप होते हैं.
जिनको मिला मेहनत बिना अतृप्त हैं वहीं-
जो पोसते मोती वही तो सीप होते हैं.
२९-४-२०१०
*

मंगलवार, 14 अप्रैल 2026

अप्रैल १४, लघुकथा, गीत, दोहे, गीतिका, समानिका छंद, सवैया, कुण्डलिया, मुक्तक, सॉनेट लिली


सलिल सृजन अप्रैल १४
*
सॉनेट
लिली 
० 
लिली के लावण्य की जय 
मोह मन इठला रही है। 
नव युवा लालित्य की जय 
रूपसी मुस्का रही है।।
पर्ण कोमल दीर्घ चिकने  
हरितिमा में है निमज्जित। 
स्वप्न शत लगते विकसने 
चहुँमुखी पुष्पों सुसज्जित।। 
गुलाबी आभा अनोखी 
श्वेत छवि मन-ताप हरती। 
पीत रंजित बसंती भी 
रक्त वर्णी हँस विचरती। 
किशोरी खुद से लजाती   
चिरैया सी चहचहाती।। 
(शेक्सपीयरी शैली)
००० 
ग़ज़ल
दोस्ती की दास्तानें, गढ़ रहीं इतिहास हैं।
आम लगती हैं भले, ये सभी खासमखास हैं।।
.
नफरतें हैं चाहतें हैं, ठोकरें हैं कोशिशें
कशिश कम होती नहीं, मन में लिए हुलास हैं।।
.
मंजिलों से आशिकी की, गिने तारे रात भर।
सुबह को आँखें लगीं, जग उठ किए प्रयास हैं।।
.
अमावस के अँधेरे कब रोक पाए हैं कदम।
जले जुगनू की तरह मन में लिए उजास हैं।।
.
कदम छोटे ही सही, उठ बढ़े तो बढ़ते गए।
अब रुकेंगे औ' यहाँ, झूठे हुए कयास हैं।।
छंद शाला
दोहा - रोला - कुंडलिया
तीन लोक चौदह भुवन, नयन चले अवलोक।
सब लोकों में एक बस, नयन अलौकिक लोक।। - अशोक 'व्यग्र'
नयन अलौकिक लोक, खुलें तो सृष्टि निहारें।
नयन मुँदें तो मनस-लोक का रूप विचारें।।
नयन बंद हों मित्र, स्वजन रहें दुख में लीन।
नयन तजें तन मिलें, देवियाँ-देवता तीन।।
तीन लोक चौदह भुवन, नयन चले अवलोक।
सब लोकों में एक बस, नयन अलौकिक लोक।। - अशोक 'व्यग्र'
नयन अलौकिक लोक, विलोकें सारी दुनिया।
वृद्ध-युवा नर-नार, चपल मुन्ना अरु मुनिया।।
जीवन-मरण विधान, देखते सकें ना रोक।
एक लोक में वास, नयन में हैं तीन लोक।।
तीन लोक चौदह भुवन, नयन चले अवलोक।
सब लोकों में एक बस, नयन अलौकिक लोक।। - अशोक 'व्यग्र'
नयन अलौकिक लोक, विगत अब आगत देखें।
सकल सृष्टि व्यवहार, उचित अनुचित नित लेखें।।
भेदभाव से दूर, न अपने-गैर हों नयन।
सबसे रख सम भाव, तीन लोक चौदह भुवन।।
तीन लोक चौदह भुवन, नयन चले अवलोक।
सब लोकों में एक बस, नयन अलौकिक लोक।। - अशोक 'व्यग्र'
नयन अलौकिक लोक, शिवा-शिव मिलन कराएँ।
पुष्प वाटिका विचर, सिया से राम मिलाएँ।
राधा-कान्हा रास, नयन लखे हो तल्लीन।
जमुन लहर हो मग्न, बजा रहीं तालें तीन।।
१४.४.२०२६ 
०००
लघुकथा : कार्य शाला
इन्हें पढ़ें, मन में कोई प्रश्न हो तो पूछें या इन पर अपनी राय दें।
लघुकथाएँ
१. झूठी औरत : विष्णु नागर
"मैं तंग आ गयी हूँ इन बच्चों से। जान ले लूँगी इनकी।"
यह कहनेवाली माँ अभी-अभी अपने पति से झगड़ रही थी, "बिना बच्चों के अकेली कहीं नहीं जाऊँगी।" ३० शब्द
*
२.
क़ाज़ी का घर :
एक गरीब भूखा काज़ी के यहाँ गया, कहने लगा - 'मैं भूखा हूँ, कुछ मुझे दो तो मैं खाऊँ।'
काज़ी ने कहा - "यह काज़ी का घर है - कसम खा और चला जा।" ३१ शब्द
*
३.
कहूँ कहानी : रमेश बतरा
ऐ रफ़ीक़ भाई! सुनो। उत्पादन के सुख से भरपूर नींद की खुमारी लिए जब मैं घर पहुँचा तो मेरी बेटी ने एक कहानी कही - "एक लाजा था, वो बौत गलीब है।" ३१ शब्द
*
४.
एकलव्य : संजीव वर्मा 'सलिल'
दूरदर्शन पर नेताओं की बहस चल रही थी।
'बब्बा जी ! क्या एकलव्य भौंकते हुए कुत्ते का मुँह तीर चलाकर बंद कर देता था?'
"हाँ बेटा।"
'काश, वह आज भी होता।' पोते ने कहा। ३३ शब्द
*
५.
आज़ादी : खलील जिब्रान
वह मुझसे बोले - "किसी गुलाम को सोते देखो तो जगाओ मत; हो सकता है वह आज़ादी का सपना देख रहा हो।"
'अगर किसी गुलाम को सोते देखो तो उसे जगाओ और आज़ादी के बारे में बताओ। मैंने कहा।" ३८ शब्द
*
६.
मुँहतोड़ जवाब : भारतेन्दु हरिश्चंद्र
एक ने कहा - 'न जाने इसमें इतनी बुरी आदतें कहाँ से आईं? हमें यकीन है कि हमसे इसने कोई बुरी बातें नहीं सीखीं।'
लड़का सच से बोल उठा - "बहुत ठीक है क्योंकि हमने आपसे बुरी आदतें पाई होती तो आपमें बहुत सी काम हो जातीं।" ४५ शब्द
 ७ . 
एकलव्य : आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'  
- बब्बा! क्या एकलव्य भौंकते हुए कुत्ते का मुँह तीर चलाकर बंद कर देता था ?  
= हाँ ,  बेटा ! 
- काश वह आज भी होता?
दूरदर्शनी बहस से ऊबे पोते ने कहा।  २८ शब्द  
००० 
गीत
*
आओ! कुछ काम करें
वाम से इतर
लोक से जुड़े रहें
न मीत दूर हों
हाजमोला खा न भूख
लिखें सू़र हों
रेहड़ीवाले से करें
मोलभाव औ'
बारबालाओं पे लुटा
रुपै क्रूर क्यों?
मेहनत पैगाम करें
नाम से इतर
सार्थक भू धाम करें
वाम से इतर
खेतों में नहीं; जिम में
पसीना बहा रहे
पनहा न पिएँ कोक-
फैंटा; घर में ला रहे
चाट ठेले हँस रहे
रोती है अँगीठी
खेतों को राजमार्ग
निगलते ही जा रहे
जलजीरा पान करें
जाम से इतर
पनघटों का नाम करें
वाम से इतर
शहर में न लाज बिके
किसी गाँव की
क्रूज से रोटी न छिने
किसी नाव की
झोपड़ी उजाड़ दे न
सेठ की हवस
हो सके हत्या न नीम
तले छाँव की
सत्य का सम्मान करें
दाम से इतर
छोड़ खास, आम वरें
वाम से इतर
***
मानवता पर दोहे
*
मानवता के नाम पर, मजलिस बनी कलंक
शहर शहर को चुभ रहा, यह तबलीगी डंक
*
मानवता कह रही है, आज पुकार पुकार
एकाकी रहकर करो, कोरोना पर वार
*
मानवता लड़ रही है, अजब-अनूठी जंग
साधनहीनों की मदद, मानवता का रंग
*
मानवता के घाट पर, बैठे राम-रसूल
एक दूसरे की मदद, करें न लड़ते भूल
*
मानवता के बन गए, तबलीगी गद्दार
रहम न कर सख्ती करे, जेल भेज सरकार
*
मानवता लिख रही है, एक नया अध्याय
कोरोना से जीतकर, बनें ईश पर्याय
*
मानवता को बचाते, डॉक्टर पुलिस शहीद
मिल श्रद्धांजलि दें करें, अर्पित होली ईद
***
गीतिका 
*
जब बसंत हो, मुदित रहें राधे माधव
सुनें सभी की, कहें कभी राधे माधव
हीरा-लाल सदृश जोड़ी मनबसिया की
नारीभूषण पुरुषोत्तम राधे माधव
अमर स्नेह अमरेंद्र मिले हैं वसुधा पर
अमरावति बृज बना रहे राधे माधव
प्रभा किशोरी की; आलोक कन्हैया का
श्री श्रीधर द्वय मुकुलित मन राधे माधव
नत नारीश पगों में नरपति मुस्काते
अद्भुत मनोविनोद करें राधे माधव
***
विनय
हम भक्तों की पीर हरें राधे माधव
हम निज मन में धीर धरें राधे माधव
तबलीगी मजलिस जमात से दूर रहें
मुस्लिम भाई यही करें राधे माधव
समझदार मिल मुख्य धार में आ जाएँ
समय कहे सद्भाव वरें राधे माधव
बने रहे धर्मांध अगर वे तो तय है
बिन मारे खुद मार मरें राधे माधव
मरने का मकसद हो पाक जरूरी है
परहित कर मर; क्यों न तरें राधे माधव
लगा अकल पर ताला अल्ला ताला क्यों?
गलती मान खुदी सुधरें राधे माधव
१४-४-२०२०
***
एक गीत
*
दूर रहो नोटा से प्यारे!
*
इस-उस दल के यदि प्यादे हो
जिस-तिस नेता के वादे हो
पंडे की हो लिए पालकी
या झंडे सिर पर लादे हो
जाति-धर्म के दीवाने हो
या दल पर हो निज दिल हारे
दूर रहो नोटा से प्यारे!
*
आम आदमी से क्या लेना?
जी लेगा खा चना-चबेना
तुम अरबों के करो घोटाले
स्वार्थ नदी में नैया खेना
मंदिर-मस्जिद पर लड़वाकर
क्षेत्रवाद पर लड़ा-भिड़ा रे!
दूर रहो नोटा से प्यारे!
*
जा विपक्ष में रोको संसद
सत्ता पा बन जाओ अंगद०
भाषा की मर्यादा भूलो
निज हित हेतु तोड़ दो हर हद
जोड़-तोड़ बढ़ाकर भत्ते
बढ़ा टैक्स फिर गला दबा रे!
दूर रहो नोटा से प्यारे!
१४-४-२०१९
***
समय साक्षी गीत:
तुमने स्वर दे दिया
*
१.
तुमने स्वर दे दिया
चीखें, रोएँ, सिसकी भर ये,
वे गुर्राते हैं दहाड़कर।
चिंघाड़े कोई इस बाजू
फुफकारे कोई गुहारकर।
हाय रे! अमन-चैन ले लिया
तुमने स्वर दे दिया
*
२.
तुमने स्वर दे दिया
यह नेता बेहद धाँसू है
ठठा रहा देकर आँसू है
हँसता पीड़ित को लताड़कर।
तृप्त न होता फिर भी दानव
चाकर पुलिस लुकाती है शव
जाँच रपट देती सुधारकर।
न हो योगी को दर्द मिया
तुमने स्वर दे दिया
*
३.
तुमने स्वर दे दिया
वादा कह जुमला बतलाया
हो विपक्ष यह तनिक न भाया
रख देंगे सबको उजाड़कर।
सरहद पर सर हद से ज्यादा
कटें, न नेता-अफसर-सुत पर
हम बैठे हैं चुप निहारकर।
छप्पन इंची छाती है, न हिया
तुमने स्वर दे दिया
*
४.
तुमने स्वर दे दिया
खाला का घर है, घुस आओ
खूब पलीता यहाँ लगाओ
जनता को कूटो उभाड़कर।
अरबों-खरबों के घपले कर
मौज करो जाकर विदेश में
लड़ चुनाव लें, सच बिसारकर।
तीन-पाँच दो दूनी सदा किया
तुमने स्वर दे दिया
*
तुमने स्वर दे दिया
तोड़ तानपूरा फेंकेंगे
तबले पर रोटी सेकेंगे
संविधान बाँचें प्रहारकर।
सूरत नहीं सुधारेंगे हम
मूरत तोड़ बिगाड़ेंगे हम
मार-पीट, रोएँ गुहारकर
फर्जी हो प्यादे ने शोर किया
तुमने स्वर दे दिया
१४.४.२०१८
(टीप: जांच एजेंसियाँ ध्यान दें कि इस रचना का भारत से कुछ लेना-देना नहीं है।
***
नवलेखन कार्यशाला
*
आ. गुरूजी
एक प्रयास किया है । कृपया मार्गदर्शन दें । सादर ।
शारदे माँ ( मधुमालती छंद)
माँ शारदे वरदान दो
सद्बुद्धि दो संग ज्ञान दो
मन में नहीं अभिमान हों
अच्छे बुरे की पहचान दो ।
वाणी मधुर रसवान दो
मैं मैं का न गुणगान हों
बच्चे अभी नादान हम
निर्मल एक मुस्कान दो
न जाने कि हम कौन हैं
हमें अपनी पहचान दो
अल्प ज्ञानी मानो हमें
बस चरण में तुम स्थान दो ।।
कल्पना भट्ट
*
प्रिय कल्पना!
सदा खुश रहें।
मधुमालती १४-१४ के दो चरण, ७-७ पर यति, पदांत २१२ ।
शारदे माँ ( मधुमालती छंद)
माँ शारदे! वरदान दो
सदबुद्धि दो, सँग ज्ञान दो
मन में नहीं अभिमान हो
शुभ-अशुभ की पहचान दो।
वाणी मधुर रसवान दो
'मैं' का नहीं गुण गान हो
बच्चे अभी नादान हैं
निर्मल मधुर मुस्कान दो
किसको पता हम कौन हैं
अपनी हमें पहचान दो
हम अल्प ज्ञानी माँ! हमें
निज चरण में तुम स्थान दो ।।
१४-४-२०१७
***
छंद बहर का मूल है: २
*
छंद परिचय:
ग्यारह मात्रिक रौद्र जातीय छंद।
सप्तवार्णिक उष्णिक जातीय समानिका छंद।
संरचना: SIS ISI S
सूत्र: रगण जगण गुरु / रजग।
बहर: फ़ाइलुं मुफ़ाइलुं ।
*
सूर्य आप भी बने
*
सत्य को न मारना
झूठ से न हारना
गैर को न पूजना
दीन से न भागना
बात आत्म की सुनें
सूर्य आप भी बने
*
काम काम से रखें
राम-राम भी भजें
डूब राग-रंग में
धर्म-कर्म ना तजें
शुभ विचार कर गुनें
सूर्य आप भी बने
*
देव दैत्य आप हैं
पुण्य-पाप आप हैं
आप ही बुरे-भले
आप ही उगे-ढले
साक्ष्य भाव से जियें
सूर्य आप भी बने
१४.४.२०१७
***
रसानंद दे छंद नर्मदा २५ : १४-०४-२०१६
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
दोहा, सोरठा, रोला, आल्हा, सार, ताटंक, रूपमाला (मदन), चौपाई, हरिगीतिका, उल्लाला, गीतिका, घनाक्षरी, बरवै, त्रिभंगी, सरसी, छप्पय, भुजंगप्रयात तथा कुण्डलिनी छंदों से साक्षात के पश्चात् अब मिलिए सवैया छन्द से.
दोहा, सोरठा, रोला, आल्हा, सार, ताटंक, रूपमाला (मदन), चौपाई, हरिगीतिका, उल्लाला, गीतिका, घनाक्षरी, बरवै, त्रिभंगी, सरसी, छप्पय, भुजंगप्रयात तथा कुण्डलिनी छंदों से साक्षात के पश्चात् अब मिलिए सवैया छन्द से.
सरस सवैया रच पढ़ें
गण की आवृत्ति सात हों, दो गुरु रहें पदांत।
सरस सवैया नित पढो, 'सलिल' न तनिक रसांत।।
बाइस से छब्बीस वर्णों के (सामान्य वृत्तो से बड़े और दंडक छंदों से छोटे) छंदों को सवैया कहा जाता है। सवैया वार्णिक छंद हैं। विविध गणों में से किसी एक गण की सात बार आवृत्तियाँ तथा अंत में दो दीर्घ अक्षरों का प्रयोग कर सवैये की रचना की जाती है। यह एक वर्णिक छन्द है। सवैया को वार्णिक मुक्तक अर्थात वर्ण संख्या के आधार पर रचित मुक्तक भी कहा जाता है। इसका कारन यह है की सवैया में गुरु को लघु पढ़ने की छूट है। जानकी नाथ सिंह ने अपने शोध निबन्ध 'द कंट्रीब्युशन ऑफ़ हिंदी पोयेट्स टु प्राजोडी के चौथे अध्याय में सवैया को वार्णिक सम वृत्त मानने का कारण हिंदी में लय में गाते समय 'गुरु' का 'लघु' की तरह उच्चारण किये जाने की प्रवृत्ति को बताया है। हिंदी में 'ए' के लघु उच्चारण हेतु कोई वर्ण या संकेत चिन्ह नहीं है। रीति काल और भक्ति काल में कवित्त और सवैया बहुत लोकप्रिय रहे हैं. कवितावलि में तुलसी ने इन्हीं दो छंदों का अधिक प्रयोग किया है। कवित्त की ही तरह सवैया भी लय-आधारित छंद है।
विविध गणों के प्रयोग के आधार पर इस छन्द के कई प्रकार (भेद) हैं। यगण, तगण तथा रगण पर आधारित सवैये की गति धीमी होती है जबकि भगण, जगण तथा सगण पर आधारित सवैया तेज गति युक्त होता है। ले के साथ कथ्य के भावपूर्ण शब्द-चित्र अंकित होते हैं। श्रृंगार तथा भक्ति परक वर्ण में विभव, अनुभव, आलंबन, उद्दीपन, संचारी भाव, नायक-नायिका भेद आदि के शब्द-चित्रण में तुलसी, रसखान, घनानंद, आलम आदि ने भावोद्वेग की उत्तम अभिव्यक्ति के लिए सवैया को ही उपयुक्त पाया। भूषण ने वीर रस के लिए सवैये का प्रयोग किया किन्तु वह अपेक्षाकृत फीका रहा।
प्रकार-
सवैया के मुख्य १४ प्रकार हैं।
१. मदिरा, २. मत्तगयन्द, ३. सुमुखि, ४. दुर्मिल, ५. किरीट, ६. गंगोदक, ७. मुक्तहरा, ८. वाम, ९. अरसात, १०. सुन्दरी, ११. अरविन्द, १२. मानिनी, १३. महाभुजंगप्रयात, १४. सुखी सवैया।
मत्तगयंद (मालती) सवैया
इस वर्णिक छंद के चार चरण होते हैं। हर चरण में सात भगण (S I I) के पश्चात् अंत में दो गुरु (SS) वर्ण होते हैं।
उदाहरण:
१.
धूरि भरे अति सोभित स्यामजू, तैंसी बनी सिर सुन्दर चोटी।
खेलत-खात फिरें अँगना, पग पैंजनिया, कटी पीरि कछौटी।।
वा छवि को रसखान विलोकत, वारत काम कलानिधि कोटी।
काग के भाग बड़े सजनी, हरि हाथ सों ली गयो माखन-रोटी।।
२.
यौवन रूप त्रिया तन गोधन, भोग विनश्वर है जग भाई।
ज्यों चपला चमके नभ में, जिमि मंदर देखत जात बिलाई।।
देव खगादि नरेन्द्र हरी मरते न बचावत कोई सहाई।
ज्यों मृग को हरि दौड़ दले, वन-रक्षक ताहि न कोई लखाई।।
३.
मोर पखा सिर ऊपर राखिहौं, गुंज की माल गले पहिरौंगी।
ओढ़ी पीताम्बर लै लकुटी, वन गोधन गजधन संग फिरौंगी।।
भाव तो याहि कहो रसखान जो, तेरे कहे सब स्वांग करौंगी।
या मुरली मुरलीधर की अधरान धरी अधरा न धरौंगी।।
दुर्मिल (चन्द्रकला) सवैया
इस वर्णिक छंद के चार चरणों में से प्रत्येक में आठ सगण (I I S) और अंत में दो गुरु मिलाकर कुल २५ वर्ण होते हैं.
उदाहरण:
बरसा-बरसा कर प्रेम सुधा, वसुधा न सँवार सकी जिनको।
तरसा-तरसा कर वारि पिता, सु-रसा न सुधार सकी जिनको।।
सविता-कर सी कविता छवि ले, जनता न पुकार सकी जिनको।
नव तार सितार बजा करके, नरता न दुलार सकी जिनको।।
उपजाति सवैया (जिसमें दो भिन्न सवैया एक साथ प्रयुक्त हुए हों) तुलसी की देन है। सर्वप्रथम तुलसी ने 'कवितावली' में तथा बाद में रसखान व केशवदास ने इसका प्रयोग किया।
मत्तगयन्द - सुन्दरी
प्रथम पद मत्तगयन्द (७ भगण + २ गुरु) - "या लटुकी अरु कामरिया पर राज तिहूँ पुरको तजि डारौ"। तीसरा पद सुन्दरी (७ सगन + १ गुरु) - "रसखानि कबों इन आँखिनते, ब्रजके बन बाग़ तड़ाग निहारौ"।
मदिरा - दुर्मिल
तुलसी ने एक पद मदिरा का रखकर शेष दुर्मिल के पद रखे हैं। केशव ने भी इसका अनुसरण किया है। पहला मदिरा का पद (७ भगण + एक गुरु) - "ठाढ़े हैं नौ द्रम डार गहे, धनु काँधे धरे कर सायक लै"। दूसरा दुर्मिल का पद (८ सगण) - "बिकटी भृकुटी बड़री अँखियाँ, अनमोल कपोलन की छवि है"।
मत्तगयन्द-वाम और वाम-सुन्दरी की उपजातियाँ तुलसी (कवितावली) में तथा केशव (रसिकप्रिया) में सुप्राप्य है। कवियों ने भाव-चित्रण में अधिक सौन्दर्य तथा चमत्कार उत्पन्न करने हेतु ऐसे प्रयोग किये हैं।
आधुनिक कवियों में भारतेंदु हरिश्चन्द्र, लक्ष्मण सिंह, नाथूराम शंकर आदि ने इनका सुन्दर प्रयोग किया है। जगदीश गुप्त ने इस छन्द में आधुनिक लक्षणा शक्ति का समावेश किया है।
१४-४-२०१६
***
एक दोहा
जन्म ब्याह राखी तिलक, गृह प्रवेश त्यौहार
हर अवसर पर दे 'सलिल', पुस्तक शुभ उपहार
***
मुक्तक :
आपने आपको साथ में लेकर आपके साथ ही घात किया है
एक बनेंगे नेक बनेंगे वादा भुला अपराध किया है
मौक़ा न चूकें, न फिर पायेंगे, काम करें मिल-बाँट सभी जन
अन्ना के सँग बैठ मिटा मतभेद न क्यों मन एक किया है?
***
हिंदू देवी-देवता : ३३ कोटि (प्रकार)
१२ आदित्य(धाता, मित, आर्यमा, शक्र, वरुण, अंश, भाग, विवस्वान, पूष, सविता, तवास्था, विष्णु)
८ वसु (धर, ध्रुव, सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्युष, प्रभाष)
११ रूद्र (हर, बहुरूप, त्रयंबक, अपराजिता, बृषाकापि, शंभु, कपार्दी, रैवत, मृगव्याध, शर्वा, कपाली)
२ अश्विनी-कुमार
१४.४.२०१५
***
मुक्तक सलिला:
बोल जब भी जबान से निकले,
पान ज्यों पानदान से निकले।
कान में घोल दे गुलकंद 'सलिल-
ज्यों उजाला विहान से निकले।।
*
जो मिला उससे है संतोष नहीं,
छोड़ता है कुबेर कोष नहीं।
नाग पी दूध ज़हर देता है-
यही फितरत है, कहीं दोष नहीं।।
*
बाग़ पुष्पा है, महकती क्यारी,
गंध में गंध घुल रही न्यारी।
मन्त्र पढ़ते हैं भ्रमर पंडित जी-
तितलियाँ ला रही हैं अग्यारी।।
*
आज प्रियदर्शी बना है अम्बर,
शिव लपेटे हैं नाग- बाघम्बर।
नेह की भेंट आप लाई हैं-
चुप उमा छोड़ सकल आडम्बर।।
*
ये प्रभाकर ही योगराज रहा,
स्नेह-सलिला के साथ मौन बहा।
ऊषा-संध्या के साथ रास रचा-
हाथ रजनी का खुले-आम गहा।।
*
करी कल्पना सत्य हो रही,
कालिख कपड़े श्वेत धो रही।
कांति न कांता के चहरे पर-
कलिका पथ में शूल बो रही।।
१८-४-२०१४
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सोमवार, 13 अप्रैल 2026

अप्रैल १३, सॉनेट, दोहे, लघुकथा, नवगीत, सोमराजी छंद, भव छंद, रतन टाटा, कुण्डलिया

सलिल सृजन अप्रैल १३

छंद शाला दोहा+सोरठा=कुंडलिया ० १. सोना और निहारना, यही नयन के काम। पलक ओढ़ लें फिर करें, उभय नयन विश्राम।। -अशोक व्यग्र उभय नयन विश्राम, करें सौ सपने देखें। स्वप्न करें साकार, कोशिशें अनगिनत लेखें।। नव आशा की फसल, चाहते नैना बोना। कंकर शंकर करें, नयन माटी को सोना।।

२. सोना और निहारना, यही नयन के काम। पलक ओढ़ लें फिर करें, उभय नयन विश्राम।। -अशोक व्यग्र उभय नयन विश्राम, न कर गर रहें जागते। सरहद पर सैनिक, दुश्मन के रहें भागते।। कठिनाई का कभी, न सैनिक रोते रोना। डटे हुए दिन-रात, भूलकर जगना-सोना।। ००० ३. सोना और निहारना, यही नयन के काम। पलक ओढ़ लें फिर करें, उभय नयन विश्राम।। -अशोक व्यग्र उभय नयन विश्राम, त्यागकर दुनिया बदलें। भू पर स्वर्ग उतार, चंद्रमा पर जा टहलें।। कहें नयन से नयन, न रो कष्टों का रोना। जाए बदल दें जग, असमय नाहक तू सो ना।। १२.४.२०२६ ००० ४. सोना और निहारना, यही नयन के काम। पलक ओढ़ लें फिर करें, उभय नयन विश्राम।। -अशोक व्यग्र उभय नयन विश्राम, करेंगे मंज़िल पाकर। हाथ हाथ में डाल, मधुरतम नगमे गाकर।। श्वास-आस भू बीज, प्रणय को ना बिसारना। यही नयन के काम, सोना और निहारना।। ०००

सॉनेट
कौन?
पूछ रहा मन मैं हूँ कौन?
हुआ कहाँ से मेरा आना?
उत्तर में छाया है मौन।।
जाना कहाँ? न कोई ठिकाना।।
रचनाकार कौन है मेरा?
कहो किसलिए मुझे बनाया?
पलट कभी क्या मुझे न हेरा?
भू पर काहे मुझे पठाया?
प्रश्न कई गायब हैं उत्तर।
छोड़ो चिंता, मौज मनाओ।
मुस्काना नव सॉनेट रचकर।।
खुद को रचनाकार बनाओ।।
जिसका अंश उसी के सम हो।
राई-नौन उतारो यम हो।।
१३-४-२०२३
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सॉनेट
आशा
पल में तोला, पल में माशा।
आशा और निराशा जीवन।
कर्म करो नित बिन प्रत्याशा।।
तभी बनेगी दुनिया मधुबन।।
सुख-दुःख दोनों साथी सच्चे।
धूप-छाँव आती-जाती है।
विहँस उतरते-चढ़ते बच्चे।।
मंज़िल छिनती-मिल जाती है।।
चुग्गा चुगती है गौरैया।
लेकिन खुद कम ही खाती है।
चूजे नाचें ता ता थैया।।
जब मैया चुग्गा लाती है।।
मन में आने दो न निराशा।
सच्ची जीवन साथ आशा।।
१३-४-२०२३
•••
मुक्तिका
सपनों की लहरों
*
सपनों की लहरों मत रुकना।
टूट-बिखर, मत थक, फिर बढ़ना।।
बिंदु सिंधु में, सिंधु बिंदु में।
अपनी किस्मत खुद ही लिखना।।
बाँहों में हो, चाहों में जो।
छल कर खुद को खुद मत ठगना।।
मंज़िल तुम तक खुद आएगी।
चलना गिरना उठना चढ़ना।।
बाधाओं को चित्र मानकर।
फ्रेम कोशिशों का ले मढ़ना।।
१३-४-२०२३
•••
सॉनेट
आलोक
लोक में आलोक हो प्रभु!
तोम-तम भी साथ में हो।
हृदय में हो प्रेम हे विभु!
हाथ कोई हाथ में हो।
मुस्कुराएँ हम उषा में।
दोपहर में मेहनत कर।
साँझ झूमे मन खुशी से।।
रात में हो बात जी भर।।
नवाशा दीपक जलाएँ।
गीत गाएँ प्रयासों के।
तुझे सबमें देख पाएँ।।
रंग देखें उजासों के।।
तू बुलाए, दौड़ आएँ।
तुझे तुझसे ही मिलाएँ।।
१३-४-२०२२
•••
सामयिक दोहे
*
शिशु भी बात समझ रहे, घर में है सुख-चैन
नादां बाहर घूमते, दिन हो चाहे रैन
*
तब्लीगी की फ़िक्र में, बच्चे हैं बेचैन
मजलिस में अब्बू गुमे, गीले सबके नैन
*
बुला रहा जो उसे हो, सबसे भारी दंड
देव लात के बात से, कब मानें उद्द्ण्ड
*
नेताजी की चाह है, हर दिन कहीं चुनाव
कोरोना की फ़िक्र तज, सरकारों का चाव
*
मंत्री जी पहिनें नहीं, मास्क न कोई बात
किंतु नागरिक खा रहे, रोज पुलिसिया लात
*
दवा-ओषजन है नहीं, जनगण है लाचार
शासन झूठ परोसता, हर दिन सौ सौ बार
*
दवा ब्लैक में बेचना, निज आत्मा को मार
लानत है व्यापारियों, पड़े काल की मार
*
अँधा शासन प्रशासन, बहरा गूँगे लोग
लाजवाब जनतंत्र यह, ' सलिल' कीजिए सोग
*
भाँग विष नहीं घोल दें, मुफ्त न पीता कौन?
आश्वासन रूपी सुरा, नेता फिर हों मौन
*
देश लाश का ढेर है, फिर भी हैं हम मस्त
शेष न कहीं विपक्ष हो, सोच हो रहे त्रस्त
*
लोकतंत्र में 'तंत्र' का, अब है 'लोक' गुलाम
आजादी हैं नाम की, लेकिन देश गुलाम
१३-४-२०२१
***
***
दोहे
शिशु भी बात समझ रहे, घर में है सुख-चैन
नादां बाहर घूमते, दिन हो चाहे रैन
तब्लीगी की फ़िक्र में बच्चे हैं बेचैन
मजलिस में अब्बू गुमे, गीले सबके नैन
बुला रहा जो उसे हो सबसे भारी दंड
देव लात के बात से कब मानें उद्द्ण्ड
***
कैसी हो लघुकथा?
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
यह यक्ष प्रश्न ऐसा है जिसका हर पांडव अलग-अलग उत्तर देता है और यक्ष का उत्तर सबसे अलग होना ही है। अर्थशास्त्र में कहा जाता है कि दो अर्थशास्त्रियों के तीन मत होते हैं। लघुकथा के सन्दर्भ में दो लघुकथाकारों के चार मत होते हैं, इसलिए एक ही लघुकथाकार अलग-अलग समय पर अलग-अलग बातें कहता है। बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी.... संपादक जी के कहे अनुसार 'कम में अधिक' कहना है तो मेरे मत में 'लघु' को 'देखन में छोटे लगें घाव करें गंभीर' की तरह 'कम से कम में अधिक से अधिक कहने' में समर्थ होना चाहिए। कितना लघु? हो यह कथ्य की माँग और कथाकार की सामर्थ्य पर निर्भर है।एक-दो वाक्यों से लेकर लगभग एक पृष्ठ तक। पश्चात्वर्ती पर अधिक महत्वपूर्ण तत्व है 'कथा', कथा वह जो कही जाए, कही वह जाए जो कहने योग्य हो, कहने योग्य वह जिसे कहने का कुछ उद्देश्य हो, निरुद्देश्य कथा कही जाए या न कही जाए, क्या फर्क पड़ता है? सोद्देश्य कथा तो उपन्यास, आख्यायिका, और कहानी में भी कही जाती है। लघुकथा सबसे भिन्न इसलिए है कि इसमें 'पिन पॉइंटेड' कहना है। चरित्र चित्रण, कथोकथन आदि का स्थान नहीं है। लघु कथा में अ. लघुता, आ. कथात्मकता, इ. मर्मस्पर्शिता/मर्मबेधकता तथा ई. उद्देश्य परकता ये चार तत्व अनिवार्य हैं। शीर्षक, मारक वाक्य, अंत, भाषा शैली, शब्द चयन वाक्य संरचना आदि विधा के तत्व नहीं लेखक की शैली के अंग हैं। लघुकथा के कई प्रकार हैं। भारत में सनातन साहित्यिक-सामाजिक विरासत का अभिन्न हिस्सा लघुकथा कई प्रकार से लोककथा, पर्व कथा, बाल कथा, बोध कथा, दृष्टांत कथा, उपदेश कथा, नुक्क्ड़ कथा, यात्रा कथा, शिकार कथा, गल्प, गप्प, आख्यान आदिके रूप में कहीं गयी है। ये विधा के तत्व नहीं प्रकार है। लक्षणात्मकता, व्यञजनात्मकता, सरसता, सरलता, प्रासंगिकता, समसामयिकता आदि लघुकथा विशेष की विशेषता है तत्व नहीं। लघुकथा की सुदीर्घ विरासत, प्रकार और प्रभाव जितना भारत में है, अन्यत्र कहीं नहीं है।
***
दोहा सलिला
*
ओवरटाइम कर रहे, दिवस-रात यमदूत
शाबासी यमराज दें, भत्ते बाँट अकूत
*
आहुति पाकर चंडिका, कंकाली के साथ
भ्रमण करें भयभीत जग, झुका नवाये माथ
*
जनसंख्या यमलोक में, बढ़ी नहीं भूखंड
रेट हाई हैं आजकल, बढ़ी डिमांड प्रचंड
*
हैं रसूल एकांत में, सब बंदों से दूर
कह सोशल डिस्टेंसिंग, बंदे करें जरूर
*
गुरु कहते रख स्वच्छता, बाँटो कड़ा प्रसाद
कोई भूखा ना रहे, तभी सुनूँ अरदास
*
ईसा मूसा नमस्ते करें, जोड़कर हाथ
गले क्यों मिलें दिल मिले, जनम जनम का साथ
*
आज सुरेंद्र नरेंद्र का, है समान संदेश
सुर नर व्यर्थ न घूमिए, मानें परमादेश
*
भोले भंडारी कहें, खुले रखो भंडार
जितना दो उतना बढ़े, सच मानो व्यापार
*
मौन लक्ष्मी दे रहीं, भक्तों को संदेश
दान दिया धन दस गुना, हो दे लाभ अशेष
*
शारद के भंडार को, जो बाँटे ले जोड़
इसीलिए तो लगी है, नवलेखन की होड़
*
चित्र गुप्त हो रहे हैं, उद्घाटित नित आज
नादां कहते दुर्वचन, रहा न दूजा काज
***
नवगीत:
.
भोर भई दूँ बुहार देहरी अँगना
बाँस बहरी टेर रही रुक जा सजना
बाँसगुला केश सजा हेरूँ ऐना
बाँसपिया देख-देख फैले नैना
बाँसपूर लुगरी ना पहिरब बाबा
लज्जा से मर जाउब, कर मत सैना
बाँस पुटु खूब रुचे, जीमे ललना
बाँस बजें तैं न जा मोरी सौगंध
बाँस बराबर लबार बरठा बरबंड
बाँस चढ़े मूँड़ झुके बाँसा कट जाए
बाँसी ले, बाँसलिया बजा देख चंद
बाँस-गीत गुनगुना, भोले भजना
बगदई मैया पूजूँ, बगियाना भूल
बतिया बड़का लइका, चल बखरी झूल
झिन बद्दी दे मोको, बटर-बटर हेर
कर ले बमरी-दतौन, डलने दे धूल
बेंस खोल, बासी खा, झल दे बिजना
***
शब्दार्थ : बाँस बहरी = बाँस की झाड़ू, बाँस पुटु = बाँस का मशरूम, जीमना = खाना, बाँसपान = धान के बाल का सिरा जिसके पकने से धान के पकाने का अनुमान किया जाता है, बाँसगुला = गहरे गुलाबी रंग का फूल, ऐना = आईना, बाँसपिया = सुनहरे कँसरइया पुष्प की काँटेदार झाड़ी, बाँसपूर = बारीक कपड़ा, लुगरी = छोटी धोती, सैना = संकेत, बाँस बजें = मारपीट होना, लट्ठ चलना, बाँस बराबर = बहुत लंबा, लबार = झूठा, बरठा = दुश्मन, बरबंड - उपद्रवी, बाँस चढ़े = बदनाम हुए, बाँसा = नाक की उभरी हुई अस्थि, बाँसी = बारीक-सुगन्धित चावल, बाँसलिया = बाँसुरी, बाँस-गीत = बाँस निर्मित वाद्य के साथ अहीरों द्वारा गाये जानेवाले लोकगीत, बगदई = एक लोक देवी, बगियाना = आग बबूला होना, बतिया = बात कर, बड़का लइका = बड़ा लड़का, बखरी = चौकोर परछी युक्त आवास, झिन = मत, बद्दी = दोष, मोको = मुझे, बटर-बटर हेर = एकटक देख, बमरी-दतौन = बबूल की डंडी जिससे दन्त साफ़ किये जाते हैं, धूल डालना = दबाना, भुलाना, बेंस = दरवाजे का पल्ला, कपाट, बासी = रात को पकाकर पानी डालकर रखा गया भात, बिजना = बाँस का पंखा.
१३-४-२०२०
***
सामयिक दोहे
*
लोकतंत्र की हो गई, आज हार्ट-गति तेज?
राजनीति को हार्ट ने, दिया सँदेसा भेज?
*
वादा कर जुमला बता, करते मन की बात
मनमानी को रोक दे, नोटा झटपट तात
*
मत करिए मत-दान पर, करिए जग मतदान
राज-नीति जन-हित करे, समय पूर्व अनुमान
*
लोकतंत्र में लोकमत, ठुकराएँ मत भूल
दल-हित साध न झोंकिए, निज आँखों में धूल
*
सत्ता साध्य न हो सखे, हो जन-हित आराध्य
खो न तंत्र विश्वास दे, जनहित से हो बाध्य
*
नोटा का उपयोग कर, दें उन सबको रोक
स्वार्थ साधते जो रहे, उनको ठीकरा लोक
*
'वृद्ध-रत्न' सम्मान दें, बच्चों को यदि आप।
कहें न क्या अपमान यह, रहे किस तरह माप?
*
'उत्तम कोंग्रेसी' दिया, अलंकरण हो हर्ष।
भाजपाई किस तरह ले, उसे लगा अपकर्ष।।
*
'श्रेष्ठ यवन' क्यों दे रहे पंडित जी को मित्र।
'मर्द रत्न' महिला गहे, बहुत अजूबा चित्र।।
*
'फूल मित्र' ले रहे हैं, हँसकर शूल खिताब।
'उत्तम पत्थर'विरुद पा, पीटे शीश गुलाब।।
*
देने-लेने ने किया, सचमुच बंटाढार।
लेन-देन की सत्य ही महिमा सलिल अपार।।
***
१३.४.२०१९
***
छंद बहर का मूल है: १
छंद परिचय:
दस मात्रिक दैशिक जातीय भव छंद।
षडवार्णिक गायत्री जातीय सोमराजी छंद।
संरचना: ISS ISS,
सूत्र: यगण यगण, यय।
बहर: फ़ऊलुं फ़ऊलुं ।
*
कहेगा-कहेगा
सुनेगा-सुनेगा।
हमारा-तुम्हारा
फ़साना जमाना।
मिलेंगे-खिलेंगे
चलेंगे-बढ़ेंगे।
गिरेंगे-उठेंगे
बनेंगे निशाना।
न रोके रुकेंगे
न टोंके झुकेंगे।
कभी ना चुकेंगे
हमें लक्ष्य पाना।
नदी हो बहेंगे
न पीड़ा तहेंगे।
ख़ुशी से रहेंगे
सुनाएँ तराना।
नहीं हार मानें
नहीं रार ठानें।
नहीं भूल जाएँ
वफायें निभाना।
***
एक कुंडलिया- दो रचनाकार
दोहा: शशि पुरवार
रोला: संजीव
*
सड़कों के दोनों तरफ, गंधों भरा चिराग
गुलमोहर की छाँव में, फूल रहा अनुराग
फूल रहा अनुराग, लीन घनश्याम-राधिका
दग्ध कंस-उर, हँसें रश्मि-रवि श्वास साधिका
नेह नर्मदा प्रवह, छंद गाती मधुपों के
गंधों भरे चिराग, प्रज्वलित हैं सड़कों के
१३-४-२०१७
***
जैनेन्द्र कुमार ने कहा था :
1. भाषा के बारे में कोई कुछ भी सुझाव दे, ध्यान मत दो ।
2. जिस लेखक को तिरस्कार मिलता है, वह उससे बेहत्तर लिखता है, जिसे जल्द पुरस्कार मिल जाता है
***
रतन टाटा के सुविचार दोहानुवाद सहित
१. नाश न लोहे का करे, अन्य किन्तु निज जंग
अन्य नहीं मस्तिष्क निज, करें व्यक्ति को तंग
1. None can destroy iron, but its own rust can!
Likewise, none can destroy a person, but his own mindset can.
२. ऊँच-नीच से ही मिले, जीवन में आनंद
ई.सी.जी. में पंक्ति यदि, सीधी धड़कन बंद
2. Ups and downs in life are very important to keep us going, because a straight line even in an E.C.G. means we are not alive.
३. भय के दो ही अर्थ हैं, भूल भुलाकर भाग
या डटकर कर सामना, जूझ लगा दे आग
3. F-E-A-R : has two meanings :
1. Forget Everything And Run
2. Face Everything And Rise.
***