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बुधवार, 28 जनवरी 2026

जनवरी २८, सोरठा, नर्मदाष्टक, राम, छंद, हास्य, सड़क पर, लघुकथा, बुन्देली, दोहा, मधुभार, नवगीत, लेख, समीक्षा

सलिल सृजन जनवरी २८
सोरठा सलिला

नयन नयन मिल दोस्त, दुश्मन भी होते नयन।
नयन नयन में डूब, पाते-देते सुख नयन।।
.
नयन दोस्त को देख, बाँह पसारे मिल रहे।
नयन मित्रता लेख, बेमौसम भी खिल रहे।।
.
पत्र दोस्त के नाम, नयन अभेजे भेजते।
कब सोचें परिणाम, सिर्फ स्नेह ही देखते।।
२८.१.२०२६
०००
नर्मदाष्टक ॥मणिप्रवाल मूलपाठ॥
॥नर्मदाष्टक मणिप्रवाल॥
हिंदी काव्यानुवाद - संजीव वर्मा "सलिल"॥
*
देवासुरा सुपावनी नमामि सिद्धिदायिनी,
त्रिपूरदैत्यभेदिनी विशाल तीर्थमेदिनी ।
शिवासनी शिवाकला किलोललोल चापला,
तरंग रंग सर्वदा नमामि देवि नर्मदा ।।१।।
.
सुर असुरों को पावन करतीं सिद्धिदायिनी,
त्रिपुर दैत्य को भेद विहँसतीं तीर्थमेदिनी।
शिवासनी शिवकला किलोलित चपल चंचला
भक्तिभाव में लीन सर्वदा, नमन नर्मदा ॥१॥
*
विशाल पद्मलोचनी समस्त दोषमोचनी,
गजेंद्रचालगामिनी विदीप्त तेजदामिनी ।।
कृपाकरी सुखाकरी अपार पारसुंदरी,
तरंग रंग सर्वदा नमामि देवि नर्मदा ।।२।।
.
नवल कमल से नयन, पाप हर हर लेतीं तुम,
गज सी चाल, दीप्ति विद्युत सी, हरती भय तम।
रूप अनूप, अनिन्द्य, सुखद, नित कृपा करें माँ
भक्तिभाव में लीन सर्वदा, नमन नर्मदा ॥२॥
*
तपोनिधी तपस्विनी स्वयोगयुक्तमाचरी,
तपःकला तपोबला तपस्विनी शुभामला ।
सुरासनी सुखासनी कुताप पापमोचनी,
तरंग रंग सर्वदा नमामि देवि नर्मदा ।।३।।
.
सतत साधनारत तपस्विनी तपोनिधी तुम,
योगलीन तपकला शक्तियुत शुभ हर विधि तुम।
पाप ताप हर, सुख देते तट, बसें सर्वदा,
भक्तिभाव में लीन सर्वदा, नमन नर्मदा ॥३॥
*
कलौमलापहारिणी नमामि ब्रम्हचारिणी,
सुरेंद्र शेषजीवनी अनादि सिद्धिधकरिणी ।
सुहासिनी असंगिनी जरायुमृत्युभंजिनी,
तरंग रंग सर्वदा नमामि देवि नर्मदा ।।४।।
.
ब्रम्हचारिणी! कलियुग का मल ताप मिटातीं,
सिद्धिधारिणी! जग की सुख संपदा बढ़ातीं ।
मनहर हँसी काल का भय हर, आयु दे बढ़ा,
भक्तिभाव में लीन सर्वदा, नमन नर्मदा ॥४॥
*
मुनींद्र वृंद सेवितं स्वरूपवन्हि सन्निभं,
न तेज दाहकारकं समस्त तापहारकं ।
अनंत पुण्य पावनी, सदैव शंभु भावनी,
तरंग रंग सर्वदा नमामि देवि नर्मदा ।।५।।
.
अग्निरूप हे! सेवा करते ऋषि, मुनि, सज्जन,
तेज जलाता नहीं, ताप हर लेता मज्जन ।
शिव को अतिशय प्रिय हो पुण्यदायिनी मैया,
भक्तिभाव में लीन सर्वदा, नमन नर्मदा ॥५॥
*
षडंगयोग खेचरी विभूति चंद्रशेखरी,
निजात्म बोध रूपिणी, फणीन्द्रहारभूषिणी ।
जटाकिरीटमंडनी समस्त पाप खंडनी,
तरंग रंग सर्वदा नमामि देवि नर्मदा ।।६।।
.
षडंग योग, खेचर विभूति, शशि शेखर शोभित,
आत्मबोध, नागेंद्रमाल युत मातु विभूषित ।
जटामुकुट मण्डित देतीं तुम पाप सब मिटा,
भक्तिभाव में लीन सर्वदा, नमन नर्मदा ॥६॥
*
भवाब्धि कर्णधारके!, भजामि मातु तारिके!
सुखड्गभेदछेदके! दिगंतरालभेदके!
कनिष्टबुद्धिछेदिनी विशाल बुद्धिवर्धिनी,
तरंग रंग सर्वदा नमामि देवि नर्मदा ।।७।।
.
कर्णधार! दो तार, भजें हम माता तुमको,
दिग्दिगंत को भेद, अमित सुख दे दो हमको ।
बुद्धि संकुचित मिटा, विशाल बुद्धि दे दो माँ!,
भक्तिभाव में लीन सर्वदा, नमन नर्मदा ॥७॥
*
समष्टि अण्ड खण्डनी पताल सप्त भैदिनी,
चतुर्दिशा सुवासिनी, पवित्र पुण्यदायिनी ।
धरा मरा स्वधारिणी समस्त लोकतारिणी,
तरंग रंग सर्वदा नमामि देवि नर्मदा ।।८।।
.
भेदे हैं पाताल सात सब अण्ड खण्ड कर,
पुण्यदायिनी! चतुर्दिशा में ही सुगंधकर ।
सर्वलोक दो तार करो धारण वसुंधरा,
भक्तिभाव में लीन सर्वदा, नमन नर्मदा ॥८॥
*
॥साभारःनर्मदा कल्पवल्ली, ॐकारानंद गिरि॥
***
राम सोरठावली
*
राम अनादि-अनंत, राम आत्म; परमात्म भी।
राम सृष्टि के कंत, चित्र गुप्त है राम का।।
राम अनाहद नाद, विधि-हरि-हर भी राम हैं।
राम भाव रस स्वाद, शब्दाक्षर लय-ताल हैं।।
मन होता है शांत, राम नाम गुणगान से।
माया करे न भ्रांत, राम-दास हो जा 'सलिल'।।
सबके मालिक-दास, राम आम के; खास के।
करते सतत प्रयास, राम कर्म के साथ हैं।।
कर दें भाव से पार, वाम न हों सिय-राम जू।
तुझको सुयश अपार, केवट के सँग मिलेगा।।
राम न रहते मौन, राम न सहते गलत को।
नहीं जानता कौन?, राम न कहते निज सुयश
राम न करते बैर, राम न बाधा मानते।
सबकी चाहें खैर, करते हैं सत्कर्म वे।।
वह जन परम सुजान, लक्ष्य रखे जो एक ही।
साध तीर संधान, लख न लक्ष; मन चुप रखे।।
.
लछ्मन लखन विशेष, रामानुज श्री लक्ष्मण।
शेष न रखते शेष, राम-काज सौमित्र कुछ।।
.
अँजुरी रखें अँजोर, सिया-सिंधु की उर्मि ला।
मनहर उज्ज्वल भोर, लछ्मन-मन नभ, उर्मिला।।
.
इसमें उसका वास, देह उर्मिला लखन मन।
कहिए पुष्प-सुवास, श्वास-आस सम मिल मगन।।
.
आज बने गणतंत्र हम, जनता हुई प्रसन्न।
भेद-भाव सब दूर हो, जन-जन हो संपन्न।
***
छंद सलिला १
*सात मात्रिक लौकिक जातीय छंद*
प्रकार २१
*१ शुभगति / सुगती छंद*
विधान पदांत गुरु
सप्त ऋषि हो
शांति-सुख बो
तप करो रे!
दुख हरो रे!
*
*आठ मात्रिक वासव जातीय छंद*
प्रकार ३४
*२ मधुभार / छवि छंद*
विधान पदांत जगण
अठ वसु! न हार
निज छवि निहार
हम कर सुधार
भू लें सँवार
*
*नौ मात्रिक आंक जातीय छंद*
प्रकार ५५
*३ गंग छंद*
विधान - पदांत यगण
जय गंग माता
जय जीव त्राता
सुधि लो हमारी
माँ क्यों बिसारी?
*
*४ निधि छंद*
विधान - पदांत लघु
मत जोड़ नौ निधि
श्रम साध्य हर सिधि
लघु ही नहीं लघु
गुरु ही नहीं गुरु
*
*दस मात्रिक दैशिक जातीय छंद*
प्रकार ८९
*५ दीप छंद*
विधान - पदांत नगल
जलाकर दस दीप
हरे तिमिर महीप
सूर्य सम वर तेज
रखे धूप सहेज
*
*ग्यारह मात्रिक रौद्र जातीय छंद*
प्रकार १४४
*६ अहीर छंद*
विधान - पदांत जगण
एकादशी अहीर
जगण अंत धर धीर
गौ पालें यदि आप
मिटे शोक दुख शाप
*
*७ शिव / अभीर छंद*
विधान- पदांत सरन
ग्यारह दीपक जला
ज्योतित सब जग बना
रखें शुद्ध भावना
फले मनोकामना
गहें रुद्र की शरण
करें भक्ति का वरण
*
*८ भव छंद*
विधान - पदांत ग या य
ग्यारस का व्रत करें
शिवाशीष नित वरें
भव बंधन न मोहे
गय पदांती सोहे
*
*बारह मात्रिक आदित्य जातीय छंद*
प्रकार - २३३
*९ तोमर छंद*
विधान - पदांत गल
बारह आदित्य श्रेष्ठ
तिमिर हरें सदा ज्येष्ठ
तोमर गुरु लघु पदांत
परहित-पथ वरें कांत
*
*१० ताण्डव छंद*
विधान - पदादि ल, पदांत ल
महादेव ताण्डव कर
अभयदान देते हर
डमरू डिमडिम डमडम
बम भोले शंकर बम
*
*११ लीला छंद*
विधान - पदांत जगण
सलिल ज्योति लिंग नाथ
पद पखार जोड़ हाथ
शक्ति पीठ कीर्ति गान
लीला का कर बखान
*
*१२ नित छंद*
विधान - पदांत रनस
कथ्य लय रस संग हों
भाव ध्वनि सत्संग हों
छंदों में रहो मगन
नये बनें करो जतन
नीति नयी नित न वरो
धैर्य सदा सलिल धरो
*
*तेरह मात्रिक भागवतजातीय छंद*
प्रकार - ३७७
*१३ उल्लाला / चंद्रमणि छंद*
विधान - ग्यारहवीं मात्रा लघु, पदांत नियम नहीं
उल्लाला तेरह कला
ग्यारहवाँ लघु ही भला
मिले चंद्र मणि लें तुरत
गुमे नहीं करिए जुगत
*
*१४ चण्डिका / धरणी छंद*
विधान - पदांत रगण
चण्डिका से दुष्ट डरें
धरणी पर छिपें विचरें
गुरु लघु गुरु रखें पदांत
यत्न मग्न रहें सुशांत
२८.१.२०२०
***
हास्य रचना
*
लल्ला-लल्ली रोए मचले हमें घूमना मेला
लालू-लाली ने यह झंझट बहुत देर तक झेला
डाँटा-डपटा बस न चला तो दोनों करें विचार
होटल या बाजार गए तो चपत लगेगी भारी
खाली जेब मुसीबत होगी मँहगी चीजें सारी
खर्चा कम, मन बहले ज्यादा, ऐसा करो उपाय
चलो नर्मदा तीर नहाएँ-घूमें, है सदुपाय
शिव पूजें पाएँ प्रसाद सूर्योदय देखें सुंदर
बच्चों का मन बहलेगा जब दिख जाएँगे बंदर
स्कूटर पर चारों बैठे मानो हो वह कार
ग्वारीघाट पहुँचकर ऊषा करे सिंगार
नभ पर बैठी माथे पर सूरज का बेंदा चमके
बिंब मनोहर बना नदी में, हीरे जैसा दमके
चहल-पहल थी खूब घाट पर घूम रहे नारी-नर
नहा रहे जो वे गुंजाएँ बम भोले नर्मद हर
पंडे करा रहे थे पूजा, माँग दक्षिणा भारी
पाप-पुण्य का भय दिखलाकर
चला चढ़ोत्री आरी
जाने क्या-क्या मंत्र पढ़ें फिर मस्तक मलते चंदन
नरियल चना चिरौंजीदाने पंडित देता गिन गिन
घूम थके भूखे हो बच्चे पैर पटककर बोले
अब तो चला नहीं जाता, कैसे बोलें बम भोले
लालू लाया सेव जलेबी सबने भोग लगाया
नौकायन कर मौज मनाई नर्मदाष्टक गाया
२७-१-२०२०
***
पुस्तक चर्चा-
'सड़क पर'- आशा और कर्मठता का संदेश
अमरेंद्र नारायण
भूतपूर्व महासचिव
एशिया पैसिफिक कम्युनिटी बैंकाक
*
[कृति विवरण: सड़क पर, गीत-नवगीत संग्रह, आचार्य संजीव वर्मा सलिल, प्रथम संस्करण २०१८, आकार १३.५ से.मी. x २१.५ से.मी., आवरण बहुरंगी, पेपरबैक, पृष्ठ ९६, मूल्य २५०/-, समन्वय प्रकाशन अभियान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन,
जबलपुर ४८२००१, चलभाष ९४२५१८३२४४ / ७९९९५५९६१८ ]
*
'सड़क पर' अपने परिवेश के प्रति सजग-सतर्क प्रसिद्ध कवि आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' जी रचित सहज संवेदना की अभिव्यक्ति है। सलिल जी भावुक, संवेदनशील कवि तो हैं हीं, एक अभियंता होने के नाते वे व्यावहारिक दृष्टि भी रखते हैं।
सलिल जी ने पुस्तक के आरंभ में माता-पिता को अपनी श्रद्धा अर्पित करते हुए लिखा है:
दीपक-बाती,
श्वास-आस तुम
पैर-कदम सम,
थिर प्रयास तुम
तुमसे हारी सब बाधाएँ
श्रम-सीकर,
मन का हुलास तुम
गयी देह, हैं
यादें प्यारी।
श्रद्धा, कृतज्ञता और कर्मठता की यही भावनाएँ विभिन्न कविताओं में लक्षित होती हैं। साथ-ही-साथ इन रचनाओं में आशावादिता है और कर्मठता का आह्वान भी-
आज नया इतिहास लिखें हम
अब तक जो बीता सो बीता
अब न आस-घट होगा रीता
अब न साध्य हो स्वार्थ-सुभीता
अब न कभी लांछित हो सीता
भोग-विलास न लक्ष्य रहे अब
हया-लाज-परिहास लिखें हम
आज नया इतिहास लिखें हम।
पुस्तक में सड़क पर शीर्षक से ही ९ कवितायेँ संकलित है जो जीवन के विभिन्न रंगों को चित्रित करती हैं।
सड़क प्रगति और यात्रा का माध्यम तो है, पर सड़क पर तेज गति से चलने वाली गाड़ियाँ, पैदल चलने वालों को किनारे धकेल देती हैं और अपनी सहगामिनी गाड़ियों की प्रतिस्पर्धा में यातायात अवरुद्ध भी कर देती हैं।
प्रगति -वाहिनी सड़क विषमता का पोषण करती रही है। कवि का अंतर्मन इस कुव्यवस्था के विरोध में कह उठता है:
रही सड़क पर
अब तक चुप्पी
पर अब सच कहना ही होगा।
लेकिन कवि के अंतर में आशा का दीपक प्रज्वलित है:
कशिश कोशिशों की
सड़क पर मिलेगी
कली मिह्नतों की
सड़क पर खिलेगी
पर कवि कहता है कि आखिरकार, सड़क तो सबकी है-
सड़क पर शर्म है,
सड़क बेशरम है
सड़क छिप सिसकती
सड़क पर क्षरण है!
इन कविताओं में प्रेरणा का संदेश है और आत्म-परीक्षण का आग्रह भी।
यही आत्म-परीक्षण तो हमें अध्यात्म के आलोक-पथ की ओर ले जाता है-
आँखें रहते सूर हो गए
जब हम खुद से दूर हो गए।
खुद से खुद की भेंट हुई तो
जग-जीवन के नूर हो गए।
'सड़क पर' की कवितायेँ पाठक को आनंद तो देती ही हैं,उसे कुछ सोचने के साथ-साथ कुछ करने की भी प्रेरणा देती हैं। इस संकलन की कविताएँ पाठक की भाव -भूमि पर गहरा प्रभाव डालती हैं। सलिल जी की इस आशावादिता को नमन।
---
दोहा सलिला
प्रजातंत्र में प्रजा का, सेवक होता तंत्र।
जनसेवी नेता बनें, यही सफलता-मंत्र।।
*
लोकतंत्र में लोकमत, होता है अनमोल।
हानि न करिए देश की, कलम उठाएँ तोल।।
*
तंत्र न जन की पीर हर, खुद भोगे अधिकार।
तो जनतंत्र न सफल है, शासन करे विचार।।
*
ध्वजा तिरंगी देश की, आन, बान, सम्मान।
झुकने कभी न दे 'सलिल', विहंस लुटा दें जान।।
*
संविधान को जानकर, पालन करिए नित्य।
अधिकारों की नींव हैं, फ़र्ज़ मानिए सत्य।।
*
जाति-धर्म को भुलाकर भारतीय हैं एक।
भाईचारा पालकर, चलो बनें हम नेक।।
***
नवगीत
*
बदल गए रे
दिन घूरे के
कैक्टस
दरवाज़े पर शोभित
तुलसी चौरा
घर से बाहर
पिज्जा
गटक रहे कान्हा जू
माखन से
दूरी जग जाहिर
गौरैया
कौए न बैठते
दुर्दिन पनघट-
कंगूरे के
मत पाने
चाहे जो बोलो
मत पाकर
निज पत्ते खोलो
सरकारी
संपत्ति बेच दो
जनगण-मन में
नफरत घोलो
लड़ा-भिड़ा
खेती बिकवा दो
तार तोड़ दो
तंबूरे के
२६.१.२०१८
***
विमर्श हिंदी- समस्या और समाधान-
१. भारत में बोली जा रही सब भाषाओँ - बोलियों को संविधान की ८ वीं अनुसूची में सम्मिलित किया जाए ताकि इस मुद्दे पर राजनीति समाप्त हो.
२. सब भाषाओँ को नागरी लिपि में भी लिखा जाए जैसा गाँधी जी चाहते थे।
३. हिंदी को अनुसूची से निकाल दिया जाए।
४. सब हिंदी अकादमी बन्द की जाएँ ताकि नेता - अफसर हिंदी के नाम पर मौज न कर सकें।
५. भारत की जन भाषा और प्रमुख विश्ववाणी हिंदी को सरकार किसी प्रकार का संरक्षण न दे, कोई सम्मेलन न करे, कोई विश्व विद्यालय न बनाये, किसी प्रकार की मदद न करे ताकि जनगण इसके विकास में अपनी भूमिका निभा सके।
हिंदी के सब समस्याएँ राजनेताओं और अफसरों के कारण हैं। ये दोनों वर्ग हिंदी का पीछा छोड़ दें तो हिंदी जी ही जायेगी अमर हो जाएगी।
२८-१-२०१७
***
लघुकथा
लक्ष्यवेध
*
'वत्स! धनुष पर तीर चढ़ाओ और लक्ष्य पर ध्यान केन्द्रित करो.' गुरु ने आदेश दिया।
सभी शिष्यों ने आदेश का पालन किया।
'अब बताओ तुम्हें क्या दिखाई दे रहा है देश सेवा, जन कल्याण, राष्ट्र निर्माण, गरीबी उन्मूलन या सांप्रदायिक एकता? जिस पर ध्यान केंद्रित करोगे वही लक्ष्य पा सकोगे. गुरु ने प्रश्न किया. ठीक से सोचकर बताओ।
'सत्ता गुरूजी!' सभी शिष्यों ने अविलम्ब उत्तर दिया।
२८-१-२०१७
***
पुस्तक सलिला-
चलो आज मिलकर नया कल बनायें - कुछ कर गुजरने की कवितायें
*
[कृति विवरण- चलो आज मिलकर नया कल बनायें, काव्य संग्रह, कुसुम वीर, आकार डिमाई, आवरण- बहुरंगी, सजिल्द, जैकेट सहित, पृष्ठ १३४, मुल्य २००/-, प्रकाशक ज्ञान गंगा २०५ बी, चावडी बाज़ार दिल्ली ११०००६]
*
सच्चा साहित्य सर्व कल्याण के सात्विक सनातन भाव से आपूरित होता है. कविता 'स्व' को 'सर्व' से संयुक्त कर कवि को कविर्मनीषी बनाती है. कोमलता और शौर्य का, अतीत और भविष्य का, कल्पना और यथार्थ का, विचार और अनुभूति का समन्वय होने पर कविता उपजती है. कुसुम वीर जी की रचनाएँ मांगल्य परक चिंतन से उपजी हैं. वे लिखने के लिये नहीं लिखतीं अपितु कुछ करने की चाह को अभिव्यक्त करने के लिए कागज़-कलम को माध्यम बनाती हैं. प्रौढ़ शिक्षा अधिकारी, तथा हिंदी प्रशक्षण संस्थान में निदेशक पदों पर अपने कार्यानुभवों को ४ पूर्व प्रकाशित पुस्तकों में पाठकों के साथ बाँट चुकने के पश्चात् इस कृति में कुसुम जी देश और समाज के वर्तमान से भविष्य गढ़ने के अपने सपने शब्दों के माध्यम से साकार कर सकी हैं.
साठ सारगर्भित, सुचिंतित, लक्ष्यवाही रचनाओं का यह संग्रह भाव, रस, बिम्ब, प्रतीक और शैली से पाठक को बाँधे रखता है.
हर नदी के पार होता है किनारा / हर अन्धेरी रात के आगे उजाला
मन की दुर्बलता मिटाकर तुम चलो / एक दीपक प्रज्वलित कर तुम चलो
बेहाल बच्चे, बदहवासी, कन्या नहीं अभिशाप हूँ, मैं एक बेटी, मत बाँटों इंसान को जैसी रचनाएँ वर्तमान विषमताओं और विडम्बनाओं से उपजी हैं. कवयित्री इन समस्याओं से निराश नहीं है, वह परिवर्तन का आवाहन आत्मबोध, प्रवाह, मंथन करता यह मन मेरा, जीवन ऐसे व्यर्थ नहो, अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए जैसी रचनाओं के माध्यम से करती है.
दिये के नीचे भले ही अँधेरा हो, ऊपर उजाला ही होता है. यह उजास की प्यास ही घोर तिमिर से भी सवेरा उगाती है. धूप धरा से मिलाने आयी, मधुर मिलन, वात्सल्य, पावस, तेरे आने की आहट से, प्राण ही शब्दित हुए, मन के झरोखे से अदि रचनाएँ जीवन में माधुर्य, आशा और उल्लास के स्वरों की अभिव्यंजना करती हैं.
कौन कहता है जगत में / प्रीति की भाषा नहीं है
मौन के अंत: सुरों से / प्राण ही शब्दित हुए हैं
शब्द शक्ति की जय-जयकार करती ऐसी पंक्तियाँ पाठक के मन-प्राण को स्पंदित कर देती हैं.
कुसुम जी की रचनाएँ अपने कथ्य की माँग के अनुसार छंद का प्रयोग करने या न करने का विकल्प चुनती हैं. दोनों हो प्रारूपों में उनकी अभिव्यक्ति प्रांजल और स्पष्ट है-
उषा को साथ ले/ अरुण-रथ पर सवार होकर
कल फिर लौटेगा सूरज / रत की पोटली में
सपनों को समेटे / पृथ्वी के प्रांगण पर
स्वर्णिम रश्मियों का उपहार बाँटने
किसी अकिञ्चन की चाह में
प्रसाद गुण संपन्न सरस-सहज बोधगम्य भाषा कुसुम जी की शक्ति है. वे मन से मन तक पहुँचने को कविता का गुण बना सकी हैं. डॉ. दिनेश श्रीवास्तव तथा इंद्रनाथ चौधुरी लिखित मंतव्यों ने संग्रह की गरिमा-वृद्धि की है. कुसुम जी का यह संग्रह उनकी अन्य रचनाओं को पढ़ने की प्यास जगाता है.
***
बुंदेली दोहांजलि
*
जब लौं बऊ-दद्दा जिए, भगत रए सुत दूर
अब काए खों कलपते?, काए हते तब सूर?
*
खूबई तौ खिसियात ते, दाबे कबऊं न गोड़
टँसुआ रोक न पा रए, गए डुकर जग छोड़
*
बने बिजूका मूँड़ पर, झेलें बरखा-घाम
छाँह छीन काए लई, काए बिधाता बाम
*
ए जी!, ओ जी!, पिता जी, सुन खें कान पिराय
'बेटा' सुनबे खों जिया, हुड़क-हुड़क अकुलाय
*
का भौ काय नटेर रय, दीदे मो खौं देख?
कई-सुनी बिसरा- लगा, गले मिटा खें रेख.
*
बऊ-दद्दा खिसिया रए, कौनौ धरें न कान
मौडीं-मौड़ां बाँट रये, अब बूढ़न खें ज्ञान.
२८.१.२०१६
***
मुक्तिका:
.
घर जलाते हैं दिए ही आजकल
बहकते पग बिन पिये ही आजकल
बात दिल की दिल को कैसे हो पता?
लब सिले हैं बिन सिले ही आजकल
गुनाहों की रहगुजर चाही न थी
हुए मुजरिम जुर्म बिन ही आजकल
लाजवंती है न देखो घूरकर
घूमती है बिन वसन ही आजकल
बेबसी-मासूमियत को छीनकर
जिंदगी जी बिन जिए ही आजकल
आपदाओं को लगाओ मत गले
लो न मुश्किल बिन लिये ही आजकल
सात फेरे जिंदगी भर आँसते
कहा बिन अनुभव किये ही आजकल
...
***
नवगीत:
भाग्य कुंडली
.
भाग्य कुंडली
बाँच रहे हो
कर्म-कुंडली को ठुकराकर
.
पंडित जी शनि साढ़े साती
और अढ़ैया ही मत देखो
श्रम भाग्येश कहाँ बैठा है?
कोशिश-दृष्टि कहाँ है लेखो?
संयम का गुरु
बता रहा है
.
डरो न मंगल से अकुलाकर
बुध से बुद्धि मिली है हर को
सूर्य-चन्द्र सम चमको नभ में
शुक्र चमकता कभी न डूबे
ध्रुवतारा हों हम उत्तर के
राहू-केतु को
धता बतायें
चुप बैठे हैं क्यों संकुचाकर?
...
छंद सलिला:
मधुभार छंद
*
(अब तक प्रस्तुत छंद: अग्र, अचल, अचल धृति, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, कीर्ति, घनाक्षरी, छवि, तोमर, दीप, दोधक, निधि, प्रेमा, मधुभार,माला, वाणी, शक्तिपूजा, शाला, शिव, शुभगति, सार, सुगति, सुजान, हंसी)
*
मधुभार अष्टमात्रिक छंद है. इसमें ३ -५ मात्राओं पर यति और चरणान्त में जगण होता है.
उदाहरण:
१. सहे मधुभार / सुमन गह सार
त्रिदल अरु पाँच / अष्ट छवि साँच
२. सुनो न हिडिम्ब / चलो अविलंब
बनो मत खंब / सदय अब अंब
---
नवगीत:
नाम बड़े हैं
.
नाम बड़े हैं
दर्शन छोटे
.
दिल्ली आया उड़न खटोला
देख पड़ोसी का दिल डोला
पडी डांट मत गड़बड़ करना
वरना दंड पड़ेगा भरना
हो शरीफ तो
हो शरीफ भी
मत हो
बेपेंदी के लोटे
.
क्या देंगे?, क्या ले जायेंगे?
अपनी नैया खे जायेंगे
फूँक-फूँककर कदम उठाना
नहीं देश का मान घटाना
नाता रखना बराबरी का
सम्हल न कोई
बहला-पोटे
.
देख रही है सारी दुनिया
अद्भुत है भारत का गुनिया
बदल रहा बिगड़ी हालत को
दूर कर रहा हर शामत को
कमल खिलाये दसों दिशा में
चल न पा रहे
सिक्के खोटे
२५.१.२०१५
....
लघु कथा:
सीख
*
भारत माता ने अपने घर में जन-कल्याण का जानदार आँगन बनाया। उसमें शिक्षा की शीतल हवा, स्वास्थ्य का निर्मल नीर, निर्भरता की उर्वर मिट्टी, उन्नति का आकाश, दृढ़ता के पर्वत, आस्था की सलिला, उदारता का समुद्र तथा आत्मीयता की अग्नि का स्पर्श पाकर जीवन के पौधे में प्रेम के पुष्प महक रहे थे।
सिर पर सफ़ेद टोपी लगाये एक बच्चा आया, रंग-बिरंगे पुष्प देखकर ललचाया, पुष्प पर सत्ता की तितली बैठी देखकर उसका मन ललचाया, तितली को पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया, तितली उड़ गई. बच्चा तितली के पीछे दौड़ा, गिरा, रोते हुए रह गया खड़ा।
कुछ देर बाद भगवा वस्त्रधारी दूसरा बच्चा खाकी पैंटवाले मित्र के साथ आया, सरोवर में खिला कमल का पुष्प उसके मन को भाया, मन ललचाया, बिना सोचे कदम बढ़ाया, किनारे लगी काई पर पैर फिसला, गिरा, भीगा और सिर झुकाए वापिस लौट गया।
तभी चक्र घुमाता तीसरा बच्चा अनुशासन को तोड़ता, शोर मचाता घर में घुसा और हाथ में हँसिया-हथौड़ा थामे चौथा बच्चा उससे जा भिड़ा. दोनों टकराए, गिरे, कांटें चुभे और वे चोटें सहलाते सिसकने लगे।
हाथी की तरह मोटे, अक्ल के छोटे, कुछ बच्चे एक साथ धमाल मचाते आए, औरों की अनदेखी कर जहाँ मन हुआ वहीं जगह घेरकर हाथ-पैर फैलाए, धक्का-मुक्की में फूल ही नहीं पौधे भी उखाड़ लाए।
कुछ देर बाद भारत माता घर में आईं, कमरे की दुर्दशा देखकर चुप नहीं रह पाईं, दुःख के साथ बोलीं- ‘ मत दो झूठी सफाई, मत कहो कि घर की यह दुर्दशा तुमने नहीं तितली ने बनाई। काश! तुम तितली को भुला पाते, काँटों को समय रहते देख पाते, मिल-जुल कर रह पाते, ख़ुद अपने लिये लड़ने की जगह औरों के लिए कुछ कर पाते तो आदमी बन जाते।
***
मुक्तक
*
बिटिया बोले तो बचपन को याद करो।
जब चुप तो खुद से ही संवाद करो।।
जब नाचे तो झूम उठो आनंद मना-
कभी न रोए प्रभु से यह फरियाद करो।।
*
नए हाथों को सहारा दें सदा।
शुक्रिया मिलकर खुद का हो अदा।।
नई राहों पे चले जो पग नए-
मंज़िलें होंगी 'सलिल' उन पर फिदा।।
२८.१.२०१४
विशेष लेख
नवगीत और देश
*
विश्व की पुरातनतम संस्कृति, मानव सभ्यता के उत्कृष्टतम मानव मूल्यों, समृद्धतम जनमानस, श्रेष्ठतम साहित्य तथा उदात्ततम दर्शन के धनी देश भारत वर्तमान में संक्रमणकाल से गुजर रहा है।पुरातन श्रेष्ठता, विगत पराधीनता, स्वतंत्रता पश्चात संघर्ष और विकास के चरण, सामयिक भूमंडलीकरण, उदारीकरण, उपभोक्तावाद, बाजारवाद, दिशाहीन मीडिया के वर्चस्व, विदेशों के प्रभाव, सत्तोन्मुख दलवादी राजनैतिक टकराव, आतंकी गतिविधियों, प्रदूषित होते पर्यावरण, विरूपित होते लोकतंत्र, प्रशासनिक विफलताओं तथा घटती आस्थाओं के इस दौर में साहित्य भी सतत परिवर्तित हुआ।छायावाद के अंतिम चरण के साथ ही साम्यवाद-समाजवाद प्रणीत नयी कविता ने पारम्परिक गीत के समक्ष जो चुनौती प्रस्तुत की उसका मुकाबला करते हुए गीत ने खुद को कलेवर और शिल्प में समुचित परिवर्तन कर नवगीत के रूप में ढालकर जनता जनार्दन की आवाज़ बनकर खुद को सार्थक किया ।
किसी देश को उसकी सभ्यता, संस्कृति, लोकमूल्यों, धन-धान्य, जनसामान्य, शिक्षा स्तर, आर्थिक ढाँचे, सैन्यशक्ति, धार्मिक-राजनैतिक-सामाजिक संरचना से जाना जाता है। अपने उद्भव से ही नवगीत ने सामयिक समस्याओं से दो-चार होते हुए, आम आदमी के दर्द, संघर्ष, हौसले और संकल्पों को वाणी दी। कथ्य और शिल्प दोनों स्तर पर नवगीत ने वैशिष्ट्य पर सामान्यता को वरीयता देते हुए खुद को साग्रह जमीन से जोड़े रखा प्रेम, सौंदर्य, श्रृंगार, ममता, करुणा, सामाजिक टकराव, चेतना, दलित-नारी विमर्श, सांप्रदायिक सद्भाव, राजनैतिक सामंजस्य, पीढ़ी के अंतर, राजनैतिक विसंगति, प्रशासनिक अन्याय आदि सब कुछ को समेटते हुइ नवगीत ने नयी पीढ़ी के लिये आशा, आस्था, विश्वास और सपने सुरक्षित रखने में सफलता पायी है।
पुरातन विरासत:
किसी देश की नींव उसके अतीत में होती है। नवगीत ने भारत के वैदिक, पौराणिक, औपनिषदिक काल से लेकर अधिक समय तक के कालक्रम, घटना चक्र और मिथकों को अपनी ताकत बनाये रखा है। वर्तमान परिस्थितियों और विसंगतियों का विश्लेषण और समाधान करता नवगीत पुरातन चरित्रों और मिथकों का उपयोग करते नहीं हिचकता। (जागकर करेंगे हम क्या? / सोना भी हो गया हराम / रावण को सौंपकर सिया / जपता मारीच राम-राम - मधुकर अष्ठाना, वक़्त आदमखोर), अंधों के आदेश / रात-दिन ढोता राजमहल / मिला हस्तिनापुर को / जाने किस करनी का फल (जय चक्रवर्ती, थोड़ा लिखा समझना ज्यादा) में देश की पुरातन विरासत पर गर्वित नवगीत सहज दृष्टव्य है।
संवैधानिक अधिकार:
भारत का संविधान देश के नागरिकों को अधिकार देता है किन्तु यथार्थ इसके विपरीत है- मौलिक अधिकारों से वंचित है / भारत यह स्वतंत्र नागरिक / वैचारिक क्रांति अगर आये तो / ढल सकती दोपहरी कारुणिक (आनंद तिवारी, धरती तपती है), क्यों व्यवस्था / अनसुना करते हुए यों / एकलव्यों को / नहीं अपना रही है? (जगदीश पंकज, सुनो मुझे भी), तंत्र घुमाता लाठियाँ / जन खाता है मार / उजियारे की हो रही अन्धकार से हार / सरहद पर बम फट रहे / सैनिक हैं निरुपाय / रण जीतें तो सियासत / हारें, भूल बताँय / बाँट रहे हैं रेवाड़ी / अंधे तनिक न गम / क्या सचमुच स्वाधीन हम? (आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', सड़क पर) आदि में नवगीत देश के आम नागरिक के प्रति चिंतित है।
गणतंत्र:
देश के संविधान, ध्वज हर नागरिक के लिये बहुमूल्य हैं। गणतंत्र की महिमा गायन कर हर नागरिक का सर गर्व से उठ जाता है - गणतंत्र हर तूफ़ान से गुजर हुआ है / पर प्यार से फहरा हुआ है ताल दो मिलकर / की कलियुग में / नया भारत बनाना है (पूर्णिमा बर्मन, चोंच में आकाश)। नवगीत केवक विसंकटी और विडम्बना का चित्रण नहीं है, वह देश के प्रति गर्वानुभूति भी करता है - पेट से बटुए तलक का / सफर तय करते मुसाफिर / बात तू माने न माने / देश पर अभिमान करने / के अभी लाखों बहाने (रामशंकर वर्मा, चार दिन फागुन के), मुक्ति-गान गूँजे, जब / मातृ-चरण पूजें जब / मुक्त धरा-अम्बर से / चिर कृतज्ञ अंतर से / बरबस हिल्लोल उठें / भावाकुल बोल उठें / स्वतंत्रता- संगरो नमन / हुंकृत मन्वन्तरों नमन (जवाहर लाल चौरसिया 'तरुण', तमसा के दिन करो नमन) आदि में देश के गणतंत्र और शहीदों को नमन कर रहा है नवगीत।
वर्ग संघर्ष-शोषण:
कोई देश जब परिवर्तन और विकास की राह पर चलता है तो वर्ग संघर्ष होना स्वाभाविक है. नवगीत ने इस टकराव को मुखर होकर बयान किया है- हम हैं खर-पतवार / सड़कर खाद बनते हैं / हम जले / ईंटे पकाने / महल तनते हैं (आचार्य भगवत दुबे, हिरन सुगंधों के), धूप का रथ / दूर आगे बढ़ गया / सिर्फ पहियों की / लकीरें रह गयीं (प्रो. देवेंद्र शर्मा 'इंद्र'), सड़क-दर-सड़क / भटक रहे तुम / लोग चकित हैं / सधे हुए जो अस्त्र-शास्त्र / वे अभिमंत्रित हैं (कुमार रवीन्द्र), व्यर्थ निष्फल / तीर और कमान / राजा रामजी / क्या करे लक्षमण बड़ा हैरान / राजा राम जी (स्व. डॉ. विष्णु विराट) आदि में नवगीत देश में स्थापित होते दो वर्गों का स्पष्ट संकेत करता है।
विकासशील देश में बदलते जीवन मूल्य शोषण के विविध आयामों को जन्म देता है. स्त्री शोषण के लिए सहज-सुलभ है. नवगीत इस शोषण के विरुद्ध बार-बार खड़ा होता है- विधवा हुई रमोली की भी / किस्मत कैसी फूटी / जेठ-ससुर की मैली नजरें / अब टूटीं, तब टूटीं (राजा अवस्थी, जिस जगह यह नाव है), कहीं खड़ी चौराहे कोई / कृष्ण नहीं आया / बनी अहल्या लेकिन कोई राम नहीं पाया / कहीं मांडवी थी लाचार घुटने टेक पड़ी (गीता पंडित, अब और नहीं बस), होरी दिन भर बोझ ढोता / एक तगाड़ी से / पत्नी भूखी, बच्चे भूखे / जब सो जाते हैं / पत्थर की दुनिया में आँसू तक खो जाते हैं (जगदीश श्रीवास्तव) कहते हुए नवगीत देश में बढ़ रहे शोषण के प्रति सचेत करता है।
परिवर्तन-विस्थापन:
देश के नवनिर्माण की कीमत विस्थापित को चुकानी पड़ती है. विकास के साथ सुरसाकार होते शहर गाँवों को निगलते जाते हैं- खेतों को मुखिया ने लूटा / काका लुटे कचहरी में / चौका सूना भूखी गैया / प्यासी खड़ी दुपहरी में (राधेश्याम /बंधु', एक गुमसुम धूप), सन्नाटों में गाँव / छिपी-छिपी सी छाँव / तपते सारे खेत / भट्टी बनी है रेत / नदियां हैं बेहाल / लू-लपटों के जाल (अशोक गीते, धुप है मुंडेर की), अंतहीन जलने की पीड़ा / मैं बिन तेल दिया की बाती / मन भीतर जलप्रपात है / धुआँधार की मोहक वादी / सलिल कणों में दिन उगते ही / माचिस की तीली टपका दी (रामकिशोर दाहिया, अल्लाखोह मची), प्रतिद्वंदी हो रहे शहर के / आसपास के गाँव / गाये गीत गये ठूंठों के / जीत गये कंटक / ज़हर नदी अपना उद्भव / कह रही अमरकंटक / मुझे नर्मदा कहो कह रहा / एक सूखा तालाब (गिरिमोहन गुरु, मुझे नर्मदा कहो), बने बाँध / नदियों पर / उजड़े हैं गाँव / विस्थापित हुए / और मिट्टी से कटे / बच रहे तन / पर अभागे मन बँटे / पथरीली राहों पर / फिसले हैं पाँव (जयप्रकाश श्रीवास्तव, परिंदे संवेदना के) आदि भाव मुद्राओं में देश विकास के की कीमत चुकाते वर्ग को व्यथा-कथा शब्दित कर उनके साथ खड़ा है नवगीत।
पर्यावरण प्रदूषण:
देश के विकास साथ-साथ की समस्या सिर उठाने लगाती है। नवगीत ने पर्यावरण असंतुलन को अपना कथ्य बनाने से गुरेज नहीं किया- इस पृथ्वी ने पहन लिए क्यों / विष डूबे परिधान? / धुआँ मंत्र सा उगल रही है / चिमनी पीकर आग / भटक गया है चौराहे पर / प्राणवायु का राग / रहे खाँसते ऋतुएँ, मौसम / दमा करे हलकान (निर्मल शुक्ल, एक और अरण्य काल), पेड़ कब से तक रहा / पंछी घरों को लौट आएं / और फिर / अपनी उड़ानों की खबर / हमको सुनाएँ / अनकहे से शब्द में / फिर कर रही आगाह / क्या सारी दिशाएँ (रोहित रूसिया, नदी की धार सी संवेदनाएँ) कहते हुए नवगीत देश ही नहीं विश्व के लिए खतरा बन रहे पर्यावरण प्रदूषण को काम करने के प्रति अपनी चिंता व्यक्त करता है।
भ्रष्टाचार:
देश में पदों और अधिकारों का का दुरुपयोग करनेवाले काम नहीं हैं। नवगीत उनकी पोल खोलने में पीछे नहीं रहता- लोकतंत्र में / गाली देना / है अपना अधिकार / अपना काम पड़े तो देना / टेबिल के नीचे से लेना (ओमप्रकाश तिवारी, खिड़कियाँ खोलो) स्वर्णाक्षर सम्मान पत्र / नकली गुलदस्ते हैं / चतुराई के मोल ख़रीदे / कितने सस्ते हैं (महेश अनघ), आत्माएँ गिरवी रख / सुविधाएँ ले आये / लोथड़ा कलेजे का, वनबिलाव चीलों में / गंगा की गोदी में या की ताल-झीलों में / क्वाँरी माँ जैसे, अपना बच्चा दे आये (नईम), अंधी नगरी चौपट राजा / शासन सिक्के का / हर बाज़ी पर कब्जा दिखता / जालिम इक्के का (शीलेन्द्र सिंह चौहान) आदि में नवगीत देश में शिष्टाचार बन चुके भ्रष्टाचार को उद्घाटित कर समाप्ति हेतु प्रेरणा देता है।
उन्नति और विकास:
नवगीत विसंगति और विडम्बनाओं तक सीमित नहीं रहता, वह आशा-विश्वास और विकास की गाथा भी कहता है- देखते ही देखते बिटिया / सयानी हो गयी / उच्च शिक्षा प्राप्त कर वह नौकरी करने चली / कल तलक थी साथ में / अब कर्म पथ वरने चली (ब्रजेश श्रीवास्तव, बाँसों के झुरमुट से), मुश्किलों को मीत मानो / जीत तय होगी / हौसलों के पंख हों तो।/ चिर विजय होगी (कल्पना रामानी, हौसलों के पंख) कहते हुए नवगीत देश की युवा पीढ़ी को आश्वस्त करता है की विसंगतियों और विडम्बनाओं की काली रात के बाद उन्नति और विकास का स्वर्णिम विहान निकट है।
प्यार :
किसी देश का निर्माण सहयोग, सद्भाव और प्यार से हो होता है. टकराव से सिर्फ बिखराव होता है. नवगीत ने प्यार की महत्ता को भी स्वर दिया है- प्यार है / तो ज़िंदगी महका / हुआ एक फूल है / अन्यथा हर क्षण / ह्रदय में / तीव्र चुभता शूल है / ज़िंदगी में / प्यार से दुष्कर / कहीं कुछ भी नहीं (महेंद्र भटनागर, दृष्टि और सृष्टि), रातरानी से मधुर / उन्वान हम / फिर से लिखेंगे / बस चलो उस और सँग तुम / प्रीत बंधन है जहाँ (सीमा अग्रवाल, खुशबू सीली गलियों की) में नवगीत जीवन में प्यार और श्रृंगार की महक बिखेरता है।
आव्हान :
सपनों से नाता जोड़ो पर / जाग्रति से नाता मत तोड़ो तथा यह जीवन / कितना सुन्दर है / जी कर देखो... शिव समान / संसार हेतु / विष पीकर देखो (राजेंद्र वर्मा, कागज़ की नाव), सबके हाथ / बराबर रोटी बाँटो मेरे भाई (जयकृष्ण तुषार), गूंज रहा मेरे अंतर में / ऋषियों का यह गान / अपनी धरती, अपना अम्बर / अपना देश महान (मधु प्रसाद, साँस-साँस वृन्दावन) आदि अभिव्यक्तियाँ नवगीत के अंतर में देश के नव निर्माण की आकुलता की अभव्यक्ति करते हुई आश्वस्त करती हैं की देश का भविष्य उज्जवल है और युवाओं को विषमता का अंत कर समता-ममता के बीज बोने होंगे।
*** 

शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

जनवरी २२,फुलबगिया, बुंदेली, झूमर गीत, सोरठा, सॉनेट, सड़क पर, बाँसुरी, गीत, अनुकूला छंद,

सलिल सृजन जनवरी २२
भारत की फुलबगिया में खिलते हैं अगणित पुष्प। कुछ हैं- अपराजिता, अमलतास, अर्जुन, अश्वगंधा, आंवला, आक, आम, आर्किड, एलोविरा, एस्टर, कचनार, कदंब, कनेर, कमल, काँस, कॉसमॉस, कुमुदिनी, केतकी, केवड़ा, कैक्टस, कैलेंडुला, क्रोकस, गुलमेंहदी, गुलाब, गेंदा-गेंदी, ग्लेडुलस, चंपा, चमेली, चाँदनी, चेरी, जिप्सोफिला, जासौन, जीनिया, जुही, डहलिया, डायंथस, डेफोडिल, धतूरा, नागचंपा, निर्विषी, पलाश, पथरचटा, पेटूनिया, पैशन, पैंसी, बन्धूक, बाँस, बुरांस, बेशरम, ब्राह्मी, भटकटैया, मगरमस्त, मधुमालती, मधुमालिनी, महुआ, महोनिआ, मेंहदी, मोगरा, रजनीगंधा, रातरानी, रुद्राक्ष, लिली, वैजयंती, शमी, सदासुहागन, सरसों, साल्विया, सिनेरेरिया, सूरजमुखी, हरसिंगार आदि। फुलबागिया संकलन में सम्मिलित लिए गए पुष्प- १ अकौआ, २ अमलतास, अमलतास, आइरिस, आम, इक्जोरा, कचनार, कदंब,  कनेर, कपास, कमल, काकमाची, काँस, कॉसमॉस, कुमुदिनी, केतकी, केली, कैमेलिया, क्रोकस, गलगोटा, गुड़हल, गुलमोहर, गुलदाउदी, गुलाब, गेंदा, ग्लैडुला, चंपा, चकौड़ा, चमेली, चाँदनी, जकरांदा, छुईमुई, जासौन, जिनिया, जुही, टेसू, ट्यूलिप, डहेलिया, डेजी, धतूरा, धानीकोना, नागचंपा, नीलकमल, पलाश, पारिजात, प्रिमरोज, बारहमासी, बिगोनिआ, बुरांश, बेला, ब्रह्मकमल, भटकटैया, मकोय, मधुकामिनी, मधुमालती, मल्लिका, महुआ, मोगरा, रजनीगंधा, रातरानी,  रोहिड़ा,  ललताना, लिली, वैजयंती, शंख पुष्पी, शमी, शिरीष, सदाबहार, सदासुहागन, सहजन, सूरजमुखी, हरसिंगार आदि।  
फुलबगिया 
० 
फुलबगिया में रूप-रंग है 
भरम न जाना महक-गंध है। 
अलस्सुबह घाँसों पर घूमो 
भू पर पैर, 
गगन को छू लो। 
क्या करते हो?  
सुमन न तोड़ो, 
कली-पुष्प रक्षित कर छोड़ो। 
आई आई तितली आई 
संग भ्रमर मतवाले लाई। 
कली लली परिवार न तजती 
रक्षा भ्रमर भाई से मिलती। 
टिड्डा अगर आँख दिखलाता 
फल आ उसको दूर भगाता। 
कोयल संग टिटहरी बोले 
मन मयूर नाचे हँस डोले। 
सब हिल-मिलकर साथ रहेंगे 
व्यथा-कथा निज नहीं कहेंगे। 
पौ फटती प्राची को देखो 
रूप उषा का मन में लेखो। 
आँख मूँद लो अपनी बैठो 
तज चिंता निज मन में पैठो। 
पवन दुलार रहा हो मुकुलित 
सूर्य किरण करती आलिंगित। 
खींचो श्वास रोक अब छोड़ो 
योगासन से तन-मन जोड़ो। 
सुमिरो नाम इष्ट का सविनय 
करो प्रार्थना सभी हों अभय। 
फुलबगिया के पौधे विकसें 
कभी सलिल के लिए न तरसें। 
पौधों-फूलों को पहचानें 
गुण-उपयोग आदि भी जानें। 
पेड़ न काटें, नए लगाएँ 
संजीवित हो मोद मनाएँ। 
हम सब वनमाली हो पाएँ 
हरियाली की जय गुँजाएँ। 
२२.१.२०२५  
०००
भोजपुरी-बुंदेली झूमर गीत
कवन रंग मुंगवा, कवन रंग मोतिया !
भोजपुरी और बुंदेली क्षेत्रों में चिरकाल से ख़ुशी के मौके पर जोड़े या समूह में औरतों द्वारा झूमर गीत गायन की परंपरा रही है। दुर्भाग्य से फ़िल्मी गीतों के प्रचलन के साथ झूमर की गायन परंपरा गाँवों में भी समाप्त होती जा रही है। हमारी पीढ़ी के लोग बचपन में माँ-बहनों-भाभियों को झूमर गाते देखते हुए ही बड़े हुए हैं। एक झूमर गीत 'कवन रंग मुंगवा, कवन रंग मोतिया, कवन रंग ननदी तोर भैया।' सदियों से सर्वाधिक लोकप्रिय गीत रहा है। लोकगीतों और लोकधुनों के आधार पर लेकर साहित्यकार और चित्रपटीय गीतकार रचनकर्म करते रहे हैं। किसी से प्रेरणा लेने में कोई बुराई भी नहीं है किंतु वर्ष १९५९ की एक हिंदी फिल्म 'हीरा मोती' में संगीतकार रोशन ने चक्की चलाती ननद और भौजाई के मुँह से सदियों पुराने लोकगीत को न केवल ज्यों का त्यों गवाया, इसके रचनाकार के रूप में प्रेम धवन का नाम दे दिया। यह वास्तव में अपराध है कि लोक संपदा का उपयोग कर व्यक्तिगत लाभर्जन किया जाए। फ़िल्मीकरण ने इस झूमर गीत को देशव्यापी लोकप्रियता दिलाई। वास्तव में बीसवी सदी के आरंभ में इस गीत को बनारस के रहनेवाले एक भोजपुरी कवि दिमाग राम ने लिखा था। संवाद शैली में लिखे गए इस गीत में ननद और भाभी के हास-परिहास का रंग इतना आत्मीय और गहरा था कि यह गीत देखते-देखते समूचे भोजपुरी क्षेत्र में फ़ैल गया। यह गीत उनके नाम से एक बहुत पुरानी किताब 'झूमर तरंग' में संकलित है। दिमाग राम जी को नमन करते हुए आपके साथ इस पूरे गीत को साझा कर रहा हूं।
कवन रंग मुंगवा, कवन रंग मोतिया,
कवन रंग ननदी तोर भैया।
लाल रंग मुंगवा, सफ़ेद रंग मोतिया,
सांवर रंग भौजी मोरा भैया।
कान सोभे मोतिया, गले सोभे मुंगवा,
पलंग सोभे ननदी तोर भैया।
टूटी जैहे मोतिया, छितराई जैहे मुंगवा,
कि रूसि जैहे भौजी मोरा भैया।
चुनी लेबो मोतिया, बटोरि लेंबो मुंगवा,
मनाई लेबो ननदी तोर भैया।
***
सोरठा सलिला
घुटना रहता मौन, घुट कर भी घुट ना सके।
दिवस रात्रि या भौन, घटता या बढ़ता नहीं।।
घोंट-छान हो तृप्त, कर जिह्वा रसपान कर।
घुटना है संतप्त, भोग न पाता कभी कुछ।।
उठा न पाया शीश, घुटना जिस पर धर गया।
बचकर रहें मनीष, घुटने से दूरी रखें।।
घुटना छूते लोग, करें शत्रुता निमंत्रित।
लाइलाज है रोग, समझें आदर दे रहे।।
कभी असल को मात, नकली दे सकता नहीं।
घुटना देखें तात, असल-नकल सम हैं नहीं।।
कहता यही विवेक, हो जबरा यदि सामने।
झट घुटना दें टेक, शीश न कटा; उठाइए।।
घुट मत मन में बाद, जो कहना बिंदास कह।
घूँट घूँट ले स्वाद, मत उड़ेल रस कंठ में।।
बाबा रामदास जी नर्मदापुरम
राम दास जी सिद्ध हैं, अविनाशी प्रभु दास।
लीन निगुण विधि में रहे, भव-त्यागी हरि-खास।।
*
आत्माराम सराहिए, परमात्मा के दास।
जा गिरि मोहन बस रहे, गुरु पर कर विश्वास।।
***
सॉनेट
आवागमन
*
देह मृण्मय रहो तन्मय।
श्वास अगली है अनिश्चित।
गमन से क्यों हो कहें भय।।
लौट आना है सुनिश्चित।।
दूर करती अनबनों से।
क्या गलत है, क्या सही है?
मुक्त करती बंधनों से।।
मौत तो मातामही है।।
चाह करते जिंदगी की।
कशमकश में है गुजरती।
राह भूले बंदगी की।।
थके आ-जा दम ठहरती।।
डूब सूरज, उगे फिर कल
भूल किलकिल, करो खिलखिल।।
२२-१-२०२२
***
पुस्तक सलिला
समीक्षक - आचार्य संजीव वर्मा "सलिल"
*
(पुस्तक विवरण - मधुर निनाद, गीत संग्रह, गोपालकृष्ण चौरसिया "मधुर", प्रथम संस्करण २०१७, ISBN ९७८-९३-८३४६८-७९-९, आकार डिमाई, आवरण बहुरंगी सजिल्द जैकेट सहित, पृष्ठ १३५, मूल्य २००/-, साहित्यागार प्रकाशन, जयपुर, गीतकार संपर्क चलभाष ८१२७७८९७१०, दूरभाष ०७६१ २६५५५९९)
*
छंद हीन कविता और तथाकथित नवगीतों के कृत्रिम आर्तनाद से ऊबे अंतर्मन को मधुर निनाद के रस-लय-भाव भरे गीतों का रसपान कर मरुथल की तप्त बालू में वर्षा की तरह सुखद प्रतीति होती है। विसंगतियों और विडम्बनाओं को साहित्य सृजन का लक्श्य मान लेने के वर्तमान दुष्काल में सनातन सलिला नर्मदा के अंचल में स्थित संस्कारधानी जबलपुर में निवास कर रहे अभियंता कवि गोपालकृष्ण चौरसिया "मधुर" का उपनाम ही मधुर नहीं है, उनके गीत भी कृष्ण-वेणु की तान की तरह सुमधुर हैं। कृति के आवरण चित्र में वेणु वादन के सुरों में लीन राधा-कृष्ण और मयूर की छवि ही नहीं, शीर्षक मधुर निनाद भी पाठक को गीतों में अंतर्निहित माधुर्य की प्रतीति करा देता है। प्रख्यात संस्कृत विद्वान आचार्य कृष्णकांत चतुर्वेदी ने अपने अभिमत में ठीक ही लिखा है कि मधुर निनाद का अवतरण एक साहित्यिक और रसराज, ब्रजराज की आह्लादिनी शक्ति श्री राधा के अनुपम प्रेम से आप्लावित अत:करण के मधुरतम स्वर का उद्घोष है.....प्रत्येक गीत जहाँ मधुर निनाद शीर्षक को सार्थक करता हुआ नाद ब्रह्म की चिन्मय पीठिका पर विराजित है, वहीं शब्द-शिल्प उपमान चयन पारंपरिकता का आश्रय लेता हुआ चिन्मय श्रृंगार को प्रस्तुत करता है।
विवेच्य कृति में कवि के कैशोर्य से अब तक गत पाँच दशकों से अधिक कालावधि की प्रतिनिधि रचनाएँ हैं। स्वाभाविक है कि कैशोर्य और तारुण्य काल की गीति रचनाओं में रूमानी कल्पनाओं का प्रवेश हो।
इंसान को क्या दे सकोगे?, फूलों सा जग को महकाओ, रे माँझी! अभी न लेना ठाँव, कब से दर-दर भटक रहा है, रूठो नहीं यार आज, युग परिवर्तन चाह रहा, मैं काँटों में राह बनाता जाऊँगा आदि गीतों में अतीत की प्रतीति सहज ही की जा सकती है। इन गीतों का परिपक्व शिल्प, संतुलित भावाभिव्यक्ति, सटीक बिंबादि उस समय अभियांत्रिकी पढ़ रहे कवि की सामर्थ्य और संस्कार के परिचायक हैं।
इनमें व्याप्त गीतानुशासन और शाब्दिक सटीकता का मूल कवि के पारिवारिक संस्कारों में है। कवि के पिता स्वतंत्रता सत्याग्रही स्मृतिशेष माणिकलाल मुसाफिर तथा अग्रजद्वय स्मृतिशेष प्रो. जवाहर लाल चौरसिया "तरुण" व श्री कृष्ण कुमार चौरसिया "पथिक" समर्थ कवि रहे हैं किंतु प्राप्य को स्वीकार कर उसका संवर्धन करने का पूरा श्रेय कवि को है। इन गीतों के कथ्य में कैशोर्योचित रूमानियत के साथ ईश्वर के प्रति लगन के अंकुर भी दृष्टव्य हैं। कवि के भावी जीवन में आध्यात्मिकता के प्रवेश का संकेत इन गीतों में है।
२२-१-२०२१
***
कार्यशाला
पद
पद शब्द का प्रयोग दो अर्थों में किया जाता है।
१. कुंडलिया षट्पदिक छंद है। यहाँ पद का अर्थ पंक्ति है।
२. मीरा ने कृष्ष भक्ति के पद रचे। यहाँ पद का अर्थ पूरी काव्य रचना से है।
शब्द कोशीय अर्थ में पद का अर्थ पैर होता है। बैल चतुष्पदीय जानवर है।
पैर के माध्यम से एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं। कृष्ण भक्ति का संदेश पदों के माध्यम से फैला। किसी काव्य रचना का कथ्य पंक्ति के माध्यम से दिया - लिया जाता है। पद के तीनों अर्थों के मूल में 'विचरण' है।
चरण
शब्द कोशीय अर्थ में पद और चरण दोनों का अर्थ पैर है किंतु काव्य शास्त्र में पद का अर्थ पंक्ति या पंक्ति समूह है जबकि चरण का अर्थ पंक्ति का भाग है।
दोहा के हर पद में दो चरण होते हैं जबकि चौपई के हर पद में तीन चरण होते हैं। यहाँ चरण का अर्थ दो विरामस्थलों के बीच का भाग है।
तुक
पंक्तियों में एक स्थान पर समान उच्चार वाले शब्दों का प्रयोग तुक कहलाता है। इसे संगत शब्द प्रयोग भी कह सकते हैं। असंगत बात को बेतुकी बात कहा जाता है।
लय
समान समय में समान उच्चारों का प्रयोग लय कहलाता है। समय में उच्चार का लीन होना ही लय है। लय से ही मलय, विलय, प्रलय जैसे शब्द बने हैं।
रस
फल का रस पीने से आनंद मिलता है। काव्य से मिलने वाला आनंद ही काव्य का रस है। जिसमें रस न हो वह नीरस काव्य कोई नहीं चाहता।
भाव
भाव अनेकार्थी शब्द है। भाव की अनुपस्थिति अभाव या कमी दर्शाती है। भाव का पूरक शब्द मोल है। मोल भाव वस्तु की उपलब्धता सुनिश्चित करती है। कविता के संदर्भ में भाव का आशय रचना में वह होना है जिसे सम्प्रेषित करने के लिए रचना की गई। स्वभाव, निभाव, प्रभाव जैसे शब्द भाव से ही बनते हैं।
बिंब
बिंब और प्रतिबिंब एक दूसरे के पूरक हैं।
***
कार्यशाला
३० मात्रिक महातैथिक जातीय चौपइया छंद
१०-८-१२ पर यति चरणांत गुरु
*
जय जय अविनाशी, जय सुखराशी, प्रणतपाल भगवंता
- गो. तुलसीदास
*
जय जय माँ हिंदी, भारत बिंदी, बारहखड़ी विशेषा
अनुपम स्वर-व्यंजन, नाद निकंदन, छंद अपार अशेषा
वाचिक वैदिक सह, वार्णिक मात्रिक, जनगण-हृदय विराजे
रस भाव बिंब लय, अलंकार शत, कथ्य सुरुचिमय साजे
श्रुति वेद पुराणा, रच रच नाना, ऋषि-मुनि कथा सुनाते
मानव मूल्यों के, पाठ सनातन, जनगण को समझाते
जो बोलें लिखते, बिन त्रुटि पढ़ते, रचते काव्य-कथाएँ
गायक गण गाते, नर्तक भाते, दिखा भाव मुद्राएँ
नव शब्द बनाएँ, कोश बढ़ाएँ, विषय जटिल समझाएँ
जगवाणी हिंदी, सरल सहज सब, नित इसके गुण गाएँ
२२-१-२०२०
***
मुक्तक
*
देश है पहले सियासत बाद में।
शत्रु मारें; हो इनायत बाद में।।
बगावत को कुचल दें हम साथ मिल-
वार्ता की हो रवायत बाद में।।
*
जगह दहशत के लिये कुछ है नहीं।
जगह वहशत के लिए कुछ है नहीं।।
पत्थरों को मिले उत्तर गनों से -
जगह रहमत के लिए कुछ है नहीं।।
*
सैनिकों को टोंकना अपराध है।
फ़ौज के पग रोकना अपराध है।।
पठारों को फूल मत दें शूल दें-
देश से विद्रोह भी अपराध है।।
***
पुस्तक चर्चा
डॉ. संतोष शुक्ला
*
सडक़ पर- नवगीत संग्रह, गीतकार-आचार्य संजीव वर्मा ' सलिल '
*
[कृति विवरण: सड़क पर, गीत-नवगीत संग्रह, आचार्य संजीव वर्मा सलिल, प्रथम संस्करण २०१८, आकार १३.५ से.मी. x २१.५ से.मी., आवरण बहुरंगी, पेपरबैक, पृष्ठ ९६, मूल्य २५०/-, समन्वय प्रकाशन अभियान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, चलभाष ९४२५१८३२४४ / ७९९९५५९६१८ ]
*
आचार्य संजीव वर्मा ' सलिल ' जी का नाम नवीन छंदों के निर्माण तथा उनपर गहनता से कये गए कार्यों के लिए प्रबुद्ध जगत में बड़े गौरव से लिया जाता है।
माँ भारती के वरदपुत्र आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल 'जी को अथस्रोतञान का भण्डार मानो उन्हें विरासत में मिला हो। स्वयं आचार्य सलिल जी अपनी बुआश्री महादेवी वर्मा और अपनी माँ कवियत्री शांति देवी को साहित्य और भाषा के प्रति अटूट स्नेह का प्रेरणा श्रोत मानते हैं। जिनकी रग-रग में संस्कारों के बीज बचपन से ही अंकुरित, प्रस्फुटित और पल्लवित हुए हों उनकी प्रतिभा का आकलन करना सरल काम नहीं।
सलिल जी आभासी जगत में भी अपनी निरंतर साहित्यिक उपलब्धियों से साहित्य प्रमियों को लाभान्वित कर रहे हैं। अभियंता और अधिवक्ता होते हुए भी हिंदी की कोई भी विधा नहीं है जिस पर आचार्य जी ने गहनता से कार्य न किया हो। रस, अलंकार और छंद का गहन ज्ञान उनकी कृतियों में स्पष्ट दिखाई देता है। विषय वस्तु की दृष्टि से कोई विषय उनकी लेखनी से बचा नहीं है। रचनाओं पर उनकी पकड़ गहरी है। हर क्षेत्र का अनुभव उसी रूप में बोलता है जिससे पाठक और श्रोता उसी परिवेश में पहुंच जाता है। हिन्दी के साथ साथ बुन्देली, पचेली, भोजपुरी, ब्रजभाषा, अवधी, राजस्थानी, मालवी, छत्तीसगढ़ी, हरियाणवी तथा अंग्रेजी भाषा में भी आपने लेखन कार्य किया है।
उनकी पूर्व प्रकाशित नवगीत कृति 'काल है संक्रांति की 'उद्भट समीक्षकों द्वारा की गई समीक्षाओं को पढ़कर ही पता चलता है कि आचार्य सलिल जी ज्ञान के अक्षय भण्डार हैं अनन्त सागर हैं। आचार्य सलिल जी की सद्य प्रकाशित 'सड़क पर' मैंने अभी-अभी पढ़ी है। 'सड़क पर' नवगीत संग्रह में गीतकार सलिल जी ने देश में हो रहे राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक परिवर्तनों को स्पष्ट रूप से दर्शाया है। उनके नवगीतों में भाग्य के सहारे न रहकर परिश्रम द्वारा लक्ष्य प्राप्त करने पर सदैव जोर दिया है।छोटे छोटे शब्दों द्वारा बड़े बड़े संदेश दिये हैं और चेतावनी भी दी है। कहीं अभावग्रसित होने के कारण तो कहीं अत्याधुनिक होने पर प्यार की खरीद फरोख्त को भी उन्होंने सृजन में उकेरा है।आजकल शादी कम और तलाक ज्यादा होते हैं, यह भी आधुनिकता का एक चोला है।
इसके अतिरिक्त सलिल जी ने एक और डाइवोर्स की बात लिखी है-
निष्ठा ने मेहनत से
डाइवोर्स चाहा है।
आगे भी
मलिन बिंब देख -देख
मन दर्पण
चटका है
आजकल बिना रिश्वत के कोई काम नहीं होता
सलिल जी के शब्दों में
पद -मद ने रिश्वत का
टैक्स फिर उगाहा है ।
पाश्चात्य के प्रभाव में लोगों को ग्रसित देख गीतकार का हृदय व्यथित है-
देह को दिखाना ही
प्रगति परिचायक है
मानो लगी होड़
कौन कितना सकता है छोड़।
पाशचात्य प्रभाव के कारण ही लोग अपने माता-पिता को वृद्धाश्रम में असहाय छोड़ कर अपनी जिम्मेदारियों से मुँह मोड़ लेते हैं। अपने पुराने स्वास्थ्य वर्धक खान-पान को भूलकर हानिकारक चीजों को शौक से खाते हैं। एक शब्द-चित्र देखिए-
ब्रेड बटर बिस्कुट
मन उन्मन ने
गटका है।
अब
लोरी को राइम ने
औंधे मुँह पटका है
इसी क्रम में-
नाक बहा,टाई बाँध
अंग्रेजी बोलेंगे
कब कान्हा गोकुल में
शायद ही डोलेंगे।
आजकल शिक्षा बहुत मँहगी हो गई है।उच्च शिक्षा प्राप्त युवक नौकरी की तलाश इधर- उधर भटकते हैं।बढ़ती बेरोजगारी पर भी आचार्य जी ने चिंता व्यक्त की है।शायद ही कोई ऐसा विषय है जिस पर सलिल जी की पैनी दृष्टि न पड़ी हो।
आचार्य जी के नवगीतों के केंद्र में श्रमजीवी श्रमिक है। चाहे वह खेतों में काम करनेवाला किसान हो,फैक्ट्रियों में काम करनेवाला श्रमिक या दिनभर पसीना बहाने वाला कोई मजदूर जो अथक परिश्रम के बाद भी उचित पारिश्रमिक नहीं पाता तो दूसरी ओर मिल मालिक, सेठों,सूदखोरों की तोंद बढ़ती रहती है।
देखिए-
चूहा झाँक रहा हंडी में
लेकिन पाई
सिर्फ हताशा
यह भी देखने में आता है
जो नंही हासिल
वही चाहिए
जितनी आँखें
उतने सपने
समाज के विभिन्न पहलुओं पर बड़ी बरीकी से कलम चलाई है। घर में काम वाली बाइयों, ऑफिस में सहकर्मियों तथा पास पड़ोस में रहने वाली महिलाओं के प्रति पुरुषों की कुदृष्टि को भी आपने पैनी कलम का शिकार बनाया है।
आज भले ही लगभग सभी क्षेत्रों में अपना वर्चस्व स्थापित कर रही हैं फिर भी मध्यम और सामान्य वर्ग की महिलाओं की स्थिति अभी भी बहुत अच्छी नहीं है। कार्यरत महिलाओं को दोहरी भूमिका निभाने के बाद भी ताने, प्रताड़ना और उपेक्षा का सामना करना पड़ता है।
सलिल जी के शब्दों में
मैंने पाए कर कमल,तुमने पाए हाथ
मेरा सर ऊँचा रहे झुके तुम्हारा माथ
सलिल जी ने नवगीतों में विसंगतियों को खूब उकेरा है।कुछ उदाहरण देखते हैं-
आँखें रहते सूर हो गए
जब हम खुद से दूर हो गए
**
मन की मछली तन की तितली
हाथ न आई पल में फिसली
जब तक कुर्सी तब तक ठाट
नाच जमूरा नाच मदारी
**
मँहगाई आई
दीवाली दीवाला है
नेता हैं अफसर हैं
पग-पग घोटाला है
आजादी के इतने वर्षों बाद भी गाँव और गरीबी का अभी भी बुरा हाल है लेकिन गीतकार का कहना है-
अब तक जो बीता सो बीता
अब न आस घट होगा रीता
**
मिल कर काटें तम की कारा
उजियारे के हों पौ बारा
**
बहुत झुकाया अब तक तूने
अब तो अपना भाल उठा
मन भावन सावन के माध्यम से जहाँ किसानों की खुशी का अंकन किया है वहीं बरसात में होने वाली समस्याओं को भी चित्रित किया है।
आचार्य जी ने नये नये छंदों की रचना कर अभिनव प्रयोग किया है।
सलिल जी ने नवगीतों में परिवेश की सजीवता बनाए रखने के लिए उन्होंने घरों में उपयोग में आने वाली वस्तुओं, रिश्तों के सम्बोधनों आदि का ही प्रयोग किया है। संचार क्रांति के आने से लोगों में कितना बदलाव आया है उसकी चिंता भी गीतकार को है
हलो हाय मोबाइल ने
दिया न हाय गले मिलने
नातों को जीता छलने
आचार्य ' सलिल 'जी ने गीतों-नवगीतों में लयबद्धता पर विशेष जोर दिया है।
लोकगीतों में गाये जाने वाले शब्दों, छंदों , अन्य भाषाओं के शब्दों, नये-नये बिंबों तथा प्रतीकों का निर्माण कर लोगों के लिए सड़क पर भी फुटपाथ बनाये हैं।जो बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। 'सड़क पर' गीत नवगीत संग्रह में अनेकानेक छोटे-छोटे बिंदुओं को अंकित किया है, उन सब को इंगित करना असंभव है।
सलिल जी ने ' सड़क पर ' गीत-नवगीत संग्रह में सड़क को केंद्र बिंदु बनाकर जीवन के अनेकानेक पहलुओं को बड़ी कुशलता से चित्रित किया है-
सड़क पर जनम है
सड़क पर मरण है
सड़क पर शरम है
सड़क बेशरम है
सड़क पर सियासत
सड़क पर भजन है
सड़क सख्त लेकिन
सड़क ही नरम है
सड़क पर सड़क से
सड़क मिल रही है।
आचार्य संजीव वर्मा ' सलिल 'जी ने अपनी सभी रचनाओं में माँ नर्मदा के वर्चस्व को सदा वर्णित किया है तथा 'सलिल' को अपनी रचनाओं में भी यथासंभव प्रयुक्त किया है। माँ नर्मदा के पावन निर्मल सलिल की तरह आचार्य 'सलिल 'जी भी सदा प्रवहमान हैं और सदा रहेंगे। उनकी इस कृति को पाठकों का भरपूर मान, सम्मान और प्यार मिलेगा ऐसा मेरा विश्वास है।
२२.१.२०१९
***
नवगीत:
बाँसुरी
*
बजा बाँसुरी
झूम-झूम मन...
*
जंगल-जंगल
गमक रहा है.
महुआ फूला
महक रहा है.
बौराया है
आम दशहरी-
पिक कूकी, चित
चहक रहा है.
डगर-डगर पर
छाया फागुन...
*
पियराई सरसों
जवान है.
मनसिज ताने
शर-कमान है.
दिनकर छेड़े
उषा लजाई-
प्रेम-साक्षी
चुप मचान है.
बैरन पायल
करती गायन...
*
रतिपति बिन रति
कैसी दुर्गति?
कौन फ़िराये
बौरा की मति?
दूर करें विघ्नेश
विघ्न सब-
ऋतुपति की हो
हे हर! सद्गति.
गौरा माँगें वर
मन भावन...
***
मुक्तक
*
श्वास-श्वास आस-आस झूमता बसन्त हो
मन्ज़िलों को पग तले चूमता बसन्त हो
भू-गगन हुए मगन दिग-दिगन्त देखकर
लिए प्रसन्नता अनंत घूमता बसन्त हो
*
साथ-साथ थाम हाथ ख्वाब में बसन्त हो
अँगना में, सड़कों पर, बाग़ में बसन्त हो
तन-मन को रँग दे बासंती रंग में विहँस
राग में, विराग में, सुहाग में बसन्त हो
*
अपना हो, सपना हो, नपना बसन्त हो
पूजा हो, माला को जपना बसन्त हो
मन-मन्दिर, गिरिजा, गुरुद्वारा बसन्त हो
जुम्बिश खा अधरों का हँसना बसन्त हो
*
अक्षर में, शब्दों में, बसता बसन्त हो
छंदों में, बन्दों में हँसता बसन्त हो
विरहा में नागिन सा डँसता बसन्त हो
साजन बन बाँहों में कसता बसन्त हो
*
मुश्किल से जीतेंगे कहता बसन्त हो
किंचित ना रीतेंगे कहता बसन्त हो
पत्थर को पिघलाकर मोम सदृश कर देंगे
हम न अभी बीतेंगे कहता बसन्त हो
*
सत्यजित न हारेगा कहता बसन्त है
कांता सम पीर मौन सहता बसंत है
कैंसर के काँटों को पल में देगा उखाड़
नर्मदा निनादित हो बहता बसन्त है
*
मन में लड्डू फूटते आया आज बसंत
गजल कह रही ले मजा लाया आज बसंत
मिली प्रेरणा शाल को बोली तजूं न साथ
सलिल साधना कर सतत छाया आज बसंत
*
वंदना है, प्रार्थना है, अर्चना बसंत है
साधना-आराधना है, सर्जना बसंत है
कामना है, भावना है, वायदा है, कायदा है
मत इसे जुमला कहो उपासना बसंत है
***
गीत
छंद - अनुकूला
गणसूत्र - भतनगग
मापनी - २११ २२१ १११ २२
*
देश दुलारा, जनगण प्यारा
जान लुटाई तन-मन वारा
त्याग-तपस्या ऋषि-मुनि थाती
खेत किसानी श्रम परिपाटी
राघव-सीता घर-घर खेले
नंद-यशोदा मधुवन मेले
श्रम-सीकर से इसे सँवारा
देश दुलारा, जन गण प्यारा
पौध लगाओ, तरु सुख देंगे
छाँह मिलेगी, नित फल लेंगे
फूल खिलेंगे, सुरभि मिलेगी
औषध लेंगे, विपति मिटेगी
सूर्य-उषा ने गगन सँवारा
देश दुलारा, जनगण प्यारा
ग्यान हमारा जनहितकारी
ध्यान हमेशा मनहितकारी
खोज करें मानव उपयोगी
संयम धारें बनकर योगी
विश्व समूचा सुहृद हमारा
देश दुलारा जनगण प्यारा
***
बासंती दोहा ग़ज़ल (मुक्तिका)
*
स्वागत में ऋतुराज के, पुष्पित शत कचनार.
किंशुक कुसुम विहँस रहे, या दहके अंगार..
पर्ण-पर्ण पर छा गया, मादक रूप निखार.
पवन खो रहा होश निज, लख वनश्री श्रृंगार..
महुआ महका देखकर, चहका-बहका प्यार.
मधुशाला में बिन पिए, सिर पर नशा सवार..
नहीं निशाना चूकती, पंचशरों की मार.
पनघट-पनघट हो रहा, इंगित का व्यापार..
नैन मिले लड़ मिल झुके, करने को इंकार.
देख नैन में बिम्ब निज, कर बैठे इकरार..
मैं तुम यह वह ही नहीं, बौराया संसार.
फागुन में सब पर चढ़ा, मिलने गले खुमार..
ढोलक, टिमकी, मँजीरा, करें ठुमक इसरार.
फगुनौटी चिंता भुला. नाचो-गाओ यार..
घर-आँगन, तन धो लिया, अनुपम रूप निखार.
अपने मन का मैल भी, किंचित 'सलिल' बुहार..
बासंती दोहा ग़ज़ल, मन्मथ की मनुहार.
सीरत-सूरत रख 'सलिल', निर्मल सहज सँवार..
२२-१-२०१८
***
नवगीत:
अभियंता की यंत्रणा
.
'अगले जनम
अभियंता न कीजो'
करे प्रार्थना मिल अभियंता
पिघले-प्रगटे भाग्यनियंता
'वत्स! बताओ, मुश्किल क्या है?
क्यों है इस माथे पर चिंता?'
'देव! प्रमोशन एक दिला दो
फिर चाहे जो काम करा लो'
'वत्स न यह संभव हो सकता
कलियुग में सच कभी न फलता'
है प्रशासनिक अफसर हावी
तुझ पर तकनीकों का पातक
वह डंडे के साथ रहेगा
तुझ पर हरदम वार करेगा
तुझे भेज साईट पर सोए
तू उन्नति के अवसर खोए
तू है नींव, कलश है अफसर
इसीलिये वह पाता अवसर
वह बढ़ मुख्य सचिव हो जाता
तू न पदोन्नति कोई पाता
तेरी मेहनत उसका परचम
उसको खुशियाँ, तुझको मातम
सर्वे कर प्राक्कलन बनाता
फिर स्वीकृति हित दौड़ लगाता
तू साईट पर बहा पसीना
वह कहलाता रहा नगीना
काम करा तू देयक लाता
जोड़ बजट में वः यश पाता
ठेकेदार सगे हैं उसके
पत्रकार फल पाते मिलके
मंत्री सभी उसी के संग हैं
पग-पग पर तू होता तंग है
पार न तू इनसे पाएगा
रोग पाल, घुट मर जाएगा
अफसर से मत कभी होड़ ले
भूल पदोन्नति, हाथ जोड़ ले
तेरा होना नहीं प्रमोशन
तेरा होगा नहीं डिमोशन
तू मृत्युंजय नहीं झोल दे
उठकर इनकी पोल खोल दे
खुश रह जैसा और जहाँ है
तुझसे बेहतर कौन-कहाँ है?
पाप कट रहे तेरे सारे
अफसर को ठेंगा दिखला रे!
बच्चे पढ़ें-बढ़ेंगे तेरे
तब सँवरेंगे साँझ-सवेरे
कर्म योग तेरी किस्मत में
भोग-रोग उनकी किस्मत में
कह न किसी से कभी पसीजो
श्रम-सीकर खुश रह भीजो
मुक्तिका
.
आप मानें या न मानें, सत्य हूँ किस्सा नहीं हूँ
कौन कह सकता है, हूँ इस सरीखा, उस सा नहीं हूँ
मुझे भी मालुम नहीं है, क्या बता सकता है कोई
पूछता हूँ आजिजी से, कहें मैं किस सा नहीं हूँ
साफगोई ने अदावत का दिया है दंड हरदम
फिर भी मुझको फख्र है, मैं छल रहा घिस्सा नहीं हूँ
हाथ थामो या न थामो, फैसला-मर्जी तुम्हारी
कस नहीं सकता गले में, आदमी- रस्सा नहीं हूँ
अधर पर तिल समझ मुझको, दूर अपने से न करना
हनु न रवि को निगल लेना, हाथ में गस्सा नहीं हूँ
निकट हो या दूर हो तुम, नूर हो तुम हूर हो तुम
पर बहुत मगरूर हो तुम, सच कहा गुस्सा नहीं हूँ
खामियाँ कम, खूबियाँ ज्यादा, तुम्हें तब तक दिखेंगी
मान जब तक यह न लोगे, तुम्हारा हिस्सा नहीं हूँ
.
***
हास्य सलिला:
औरत भी ले लो.…
*
लाली जी से हो गए जब लालू जी तंग
जा मुशायरे में किया 'सलिल' रंग में भंग
' ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो'
सुनकर बोले आप, 'मेरी तो औरत भी ले लो
मिटे तभी संताप, सुन हुड़दंगा मच गया, ताली सीटी शोर
श्रोता चीखे: 'लालू जी वंस मोर, वंस मोर'
२२.१.२०१४ 
***
.
उग रहे या ढल रहे तुम
कान्त प्रतिपल रहे सूरज
.
हम मनुज हैं अंश तेरे
तिमिर रहता सदा घेरे
आस दीपक जला कर हम
पूजते हैं उठ सवेरे
पालते या पल रहे तुम
भ्रांत होते नहीं सूरज
.
अनवरत विस्फोट होता
गगन-सागर चरण धोता
कैंसर झेलो ग्रहण का
कीमियो नव आस बोता
रश्मियों की कलम ले
नवगीत रचते मिले सूरज
.
कै मरे कब गिने तुमने?
बिम्ब के प्रतिबिम्ब गढ़ने
कैमरे में कैद होते
हास का मधुमास वरने
हौसले तुमने दिये शत
ऊगने फिर ढले सूरज
.
***
मुक्तक:
*
चिंता न करें हाथ-पैर अगर सर्द हैं
कुछ फ़िक्र न हो चहरे भी अगर ज़र्द हैं
होशो-हवास शेष है, दिल में जोश है
गिर-गिरकर उठ खड़े हुए, हम ऐसे मर्द हैं.
*
जीत लेंगे लड़ के हम कैसा भी मर्ज़ हो
चैन लें उतार कर कैसा भी क़र्ज़ हो
हौसला इतना हमेशा देना ऐ खुदा!
मिटकर भी मिटा सकूँ मैं कैसा भी फ़र्ज़ हो
***
नवगीत:
*
मिली दिहाड़ी
चल बाजार
चावल-दाल किलो भर ले-ले
दस रुपये की भाजी
घासलेट का तेल लिटर भर
धनिया-मिर्ची ताजी
तेल पाव भर फ़ल्ली का
सिंदूर एक पुडिया दे
दे अमरूद पांच का, बेटी की
न सहूं नाराजी
खाली जेब पसीना चूता
अब मत रुक रे!
मन बेजार
निमक-प्याज भी ले लऊँ तन्नक
पत्ती चैयावाली
खाली पाकिट हफ्ते भर को
फिर छाई कंगाली
चूड़ी-बिंदी दिल न पाया
रूठ न मो सें प्यारी
अगली बेर पहलऊँ लेऊँ
अब तो दे मुस्का री!
चमरौधे की बात भूल जा
सहले चुभते
कंकर-खार
नवगीत:
.
अधर पर धर अधर १०
छिप २
नवगीत का मुखड़ा कहा १४
.
चाह मन में जगी १०
अब कुछ अंतरे भी गाइये १६
पंचतत्वों ने बनाकर १४
देह की लघु अंजुरी १२
पंच अमृत भर दिये १२
कर पान हँस-मुस्काइये १४
हाथ में पा हाथ १०
मन
लय गुनगुनाता खुश हुआ १४
अधर पर धर अधर १०
छिप
नवगीत का मुखड़ा कहा १४
.
सादगी पर मर मिटा १२
अनुरोध जब उसने किया १४
एक संग्रह अब मुझे १२
नवगीत का ही चाहिए १४
मिटाकर खुद को मिला क्या? १४
कौन कह सकता यहाँ? १२
आत्म से मिल आत्म १०
हो
परमात्म मरकर जी गया १४
अधर पर धर अधर १०
छिप
नवगीत का मुखड़ा कहा १४
२२-१-२०१५