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गुरुवार, 11 अगस्त 2022

राखी, दोहे, अलंकार,लघुकथा,गीत, लेख,घनाक्षरी,कजलियाँ,मुक्तिका

दोहा सलिला:
*
रक्षा किसकी कर सके, कहिये जग में कौन?
पशुपतिनाथ सदय रहें, रक्षक जग के मौन
*
अविचारित रचनाओं का, शब्दजाल दिन-रात
छीन रहा सुख चैन नित, बचा शारदा मात
*
अच्छे दिन मँहगे हुए, अब राखी-रूमाल
श्रीफल कैसे खरीदें, जेब करे हड़ताल
*
कहीं मूसलाधार है, कहीं न्यून बरसात
दस दिश हाहाकार है, गहराती है रात
*
आ रक्षण कर निबल का, जो कहलाये पटेल
आरक्षण अब माँगते, अजब नियति का खेल
*
आरक्षण से कीजिए, रक्षा दीनानाथ
यथायोग्य हर को मिले, बढ़ें मिलकर हाथ
*
दीप्ति जगत उजियार दे, करे तिमिर का अंत
श्रेय नहीं लेती तनिक, ज्यों उपकारी संत.
*
तन का रक्षण मन करे, शांत लगाकर ध्यान
नश्वर को भी तब दिखें अविनाशी भगवान
*
कहते हैं आज़ाद पर, रक्षाबंधन-चाह
रपटीली चुन रहे हैं, अपने सपने राह
*
सावन भावन ही रहे, पावन रखें विचार
रक्षा हो हर बहिन की, बंधन तब त्यौहार
*
लघुकथा
पहल
*
आपके देश में हर साल अपनी बहिन की रक्षा करने का संकल्प लेने का त्यौहार मनाया जाता है फिर भी स्त्रियों के अपमान की इतनी ज्यादा घटनाएँ होती हैं। आइये! अपनी बहिन के समान औरों की बहनों के मान-सम्मान की रक्षा करने का संकल्प भी रक्षबंधन पर हम सब लें।

विदेशी पर्यटक से यह सुझाव आते ही सांस्कृतिक सम्मिलन के मंच पर छा गया मौन, अपनी-अपनी कलाइयों पर रक्षा सूत्रों का प्रदर्शन करते अतिथियों में कोई भी नहीं कर सका यह पहल।
***
लघुकथा:
समय की प्रवृत्ति
*
'माँ! मैं आज और अभी वापिस जा रही हूँ।'
"अरे! ऐसे... कैसे?... तुम इतने साल बाद राखी मनाने आईं और भाई को राखी बाँधे बिना वापिस जा रही हो? ऐसा भी होता है कहीं? राखी बाँध लो, फिर भैया तुम्हें पहुँचा आयेगा।"
'भाई इस लायक कहाँ रहा कहाँ कि कोई लड़की उसे राखी बाँधे? तुम्हें मालूम तो है कि कल रात वह कार से एक लड़की का पीछा कर रहा था। लड़की ने किसी तरह पुलिस को खबर की तो भाई पकड़ा गया।'
"तुझे इस सबसे क्या लेना-देना? तेरे पिताजी नेता हैं, उनके किसी विरोधी ने यह षड्यंत्र रचा होगा। थाने में तेरे पिता का नाम जानते ही पुलिस ने माफी माँग कर छोड़ भी तो दिया। आता ही होगा..."
'लेना-देना क्यों नहीं है? पिताजी के किसी विरोधी का षययन्त्र था तो भाई नशे में धुत्त कैसे मिला? वह और उसका दोस्त दोनों मदहोश थे।कल मैं भी राखी लेने बाज़ार गयी थी, किसी ने फब्ती कस दी तो भाई मरने-मरने पर उतारू हो गया।'
"देख तुझे कितना चाहता है और तू?"
'अपनी बहिन को चाहता है तो उसे यह नहीं पता कि वह लड़की भी किसी भाई की बहन है। वह अपनी बहन की बेइज्जती नहीं सह सकता तो उसे यह अधिकार किसने दिया कि किसी और की बहन की बेइज्जती करे। कल तक मुझे उस पर गर्व था पर आज मुझे उस पर शर्म आ रही है। मैं ससुराल में क्या मुँह दिखाऊँगी? भाई ने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा। इसीलिए उसके आने के पहले ही चले जाना चाहती हूँ।'
"क्या अनाप-शनाप बके जा रही है? दिमाग खराब हो गया है तेरा? मुसीबत में भाई का साथ देने की जगह तमाशा कर रही है।"
'तुम्हें मेरा तमाशा दिख रहा है और उसकी करतूत नहीं दिखती? ऐसी ही सोच इस बुराई की जड़ है। मैं एक बहन का अपमान करनेवाले अत्याचारी भाई को राखी नहीं बाँधूँगी।' 'भाई से कह देना कि अपनी गलती मानकर सच बोले, जेल जाए, सजा भोगे और उस लड़की और उसके परिवार वालों से क्षमायाचना करे। सजा भोगने और क्षमा पाने के बाद ही मैं उसे मां सकूँगी अपना भाई और बाँध सकूँगी राखी। सामान उठाकर घर से निकलते हुए उसने कहा- 'मैं अस्वीकार करती हूँ 'समय की प्रवृत्ति' को।
***
***
दोहा सलिला:
अलंकारों के रंग-राखी के संग
*
राखी ने राखी सदा, बहनों की मर्याद.

संकट में भाई सदा, पहलें आयें याद..
राखी= पर्व, रखना.
*
राखी की मक्कारियाँ, राखी देख लजाय.
आग लगे कलमुँही में, मुझसे सही न जाय..
राखी= अभिनेत्री, रक्षा बंधन पर्व.
*
मधुरा खीर लिये हुए, बहिना लाई थाल.
किसको पहले बँधेगी, राखी मचा धमाल..
*
अक्षत से अ-क्षत हुआ, भाई-बहन का नेह.
देह विदेहित हो 'सलिल', तनिक नहीं संदेह..
अक्षत = चाँवल के दाने,क्षतिहीन.
*
रो ली, अब हँस दे बहिन, भाई आया द्वार.
रोली का टीका लगा, बरसा निर्मल प्यार..
रो ली= रुदन किया, तिलक करने में प्रयुक्त पदार्थ.
*
बंध न सोहे खोजते, सभी मुक्ति की युक्ति.
रक्षा बंधन से कभी, कोई न चाहे मुक्ति..
*
हिना रचा बहिना करे, भाई से तकरार.
हार गया तू जीतकर, जीत गयी मैं हार..
*
कब आएगा भाई? कब, होगी जी भर भेंट?
कुंडी खटकी द्वार पर, भाई खड़ा ले भेंट..
भेंट= मिलन, उपहार.
*
मना रही बहिना मना, कहीं न कर दे सास.
जाऊँ मायके माय के, गले लगूँ है आस..
मना= मानना, रोकना, माय के=माता-पिता का घर, माँ के
*
गले लगी बहिना कहे, हर संकट हो दूर.
नेह बर्फ सा ना गले, मन हरषे भरपूर..
गले=कंठ, पिघलना.
***
राखी पर एक रचना -
बंधनों से मुक्त हो जा
*
बंधनों से मुक्त हो जा
कह रही राखी मुखर हो
कभी अबला रही बहिना
बने सबला अब प्रखर हो
तोड़ देना वह कलाई
जो अचाहे राह रोके
काट लेना जुबां जो
फिकरे कसे या तुझे टोंके
सासरे जा, मायके से
टूट मत, संयुक्त हो जा
कह रही राखी मुखर हो
बंधनों से मुक्त हो जा
*
बलि न तेरे हौसलों को
रीति वामन कर सके अब
इरादों को बाँध राखी
तू सफलता वर सके अब
बाँध रक्षा सूत्र तू ही
ज़िंदगी को ज़िंदगी दे
हो समर्थ-सुयोग्य तब ही
समय तुझको बन्दगी दे
स्वप्न हर साकार करने
कोशिशों के बीज बो जा
नयी फसलें उगाना है
बंधनों से मुक्त हो जा
*
पूज्य बन जा राम राखी
तुझे बाँधेगा जमाना
सहायक हो बँधा लांबा
घरों में रिश्ते जिलाना
वस्त्र-श्रीफल कर समर्पित
उसे जो सब योग्य दिखता
अवनि की हर विपद हर ले
शक्ति-वंदन विश्व करता
कसर कोई हो न बाकी
दाग-धब्बे दिखे धो जा
शिथिल कर दे नेह-नाते
बंधनों से मुक्त हो जा
***
विशेष आलेख-
रक्षाबंधन : कल, आज और कल
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
भारतीय लोक मनीषा उत्सवधर्मी है। ऋतु परिवर्तन, पवित्र तिथियों-मुहूर्तों, महापुरुषों की जयंतियों आदि प्रसंगों को त्यौहारों के रूप में मनाकर लोक मानस अभाव पर भाव का जयघोष करता है। ग्राम्य प्रथाएँ और परंपराएँ प्रकृति तथा मानव के मध्य स्नेह-सौख्य सेतु स्थापना का कार्य करती हैं। नागरजन अपनी व्यस्तता और समृद्धता के बाद भी लोक मंगल पर्वों से संयुक्त रहे आते हैं। हमारा धार्मिक साहित्य इतिहास, धर्म, दर्शन और सामाजिक मूल्यों का मिश्रण है। विविध कथा प्रसंगों के माध्यम से सामाजिक जीवन में नैतिक मूल्यों के नियमन का कार्य पुराणादि ग्रंथ करते हैं। श्रावण माह में त्योहारों की निरंतरता जन-जीवन में उत्साह का संचार करती है। रक्षाबंधन, कजलियाँ और भाईदूज के पर्व भारतीय नैतिक मूल्यों और पावन पारिवारिक संबंधों की अनूठी मिसाल हैं।

सावन में झूम-झूम, डालों से लूम-लूम, झूला झूल दुःख भूल, हँसिए हँसाइये.
एक दूसरे की बाँह, गहें बँधें रहे चाह, एक दूसरे को चाह, कजरी सुनाइये..
दिल में रहे न दाह, तन्नक पले न डाह, मन में भरे उछाह, पेंग को बढ़ाइए.
राखी की है साखी यही, पले प्रेम-पाखी यहीं, भाई-भगिनी का नाता, जन्म भर निभाइए..
(विजया घनाक्षरी)

रक्षा बंधन क्यों ?

स्कंदपुराण, पद्मपुराण तथा श्रीमद्भागवत में वामनावतार प्रसंग के अनुसार दानवेन्द्र राजा बलि का अहंकार मिटाकर उसे जनसेवा के सत्पथ पर लाने के लिए भगवान विष्णु ने वामन रूप धारणकर भिक्षा में ३ पग धरती माँगकर तीन पगों में तीनों लोकों को नाप लिया तथा उसके मस्तक पर चरणस्पर्श कर उसे रसातल भेज दिया। बलि ने भगवान से सदा अपने समक्ष रहने का वर माँगा। नारद के सुझाये अनुसार इस दिन लक्ष्मी जी ने बलि को रक्षासूत्र बाँधकर भाई माना तथा विष्णु जी को वापिस प्राप्त किया।


महाबली बलि को था, गर्व हुआ संपदा का, तीन लोक में नहीं है, मुझ सा कोई धनी.
मनमानी करूँ भी तो, रोक सकता न कोई, हूँ सुरेश से अधिक, शक्तिवान औ' गुनी..
महायज्ञ कर दिया, कीर्ति यश बल लिया, हरि को दे तीन पग, धरा मौन था गुनी.
सभी कुछ छिन गया, मुख न मलिन हुआ, हरि की शरण गया, सेवा व्रत ले धुनी..
(कलाधर घनाक्षरी)

भवन विष्णु के छल को पहचान कर असुर गुरु शुक्राचार्य ने शिष्य बलि को सचेत करते हुए वामन को दान न देने के लिए चेताया पर बलि न माना। यह देख शुक्राचार्य सक्षम रूप धारणकर जल कलश की टोंटी में प्रवाह विरुद्ध कर छिप गए ताकि जल के बिना भू दान का संकल्प पूरा न हो सके। इसे विष्णु ने भाँप लिया। उनहोंने कलश की टोंटी में एक सींक घुसेड़ दी जिससे शुक्राचार्य की एक आँख फुट गयी और वे भाग खड़े हुए-

बाधा दनु-गुरु बने, विपद मेघ थे घने, एक नेत्र गँवा भगे, थी व्यथा अनसुनी.
रक्षा सूत्र बाँधे बलि, हरि से अभय मिली, हृदय की कली खिली, पटकथा यूँ बनी..
विप्र जब द्वार आये, राखी बांध मान पाये, शुभाशीष बरसाये, फिर न हो ठनाठनी.
कोई किसी से न लड़े, हाथ रहें मिले-जुड़े, साथ-साथ हों खड़े, राखी मने सावनी..
(कलाधर)

भविष्योत्तर पुराण के अनुसार देव-दानव युद्ध में इंद्र की पराजय सन्निकट देख उसकी पत्नी शशिकला (इन्द्राणी) ने तपकर प्राप्त रक्षासूत्र श्रवण पूर्णिमा को इंद्र की कलाई में बाँधकर उसे इतना शक्तिशाली बना दिया कि वह विजय प्राप्त कर सका।

गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं- 'मयि सर्वमिदं प्रोक्तं सूत्रे मणिगणा इव' अर्थात जिस प्रकार सूत्र बिखरे हुए मोतियों को अपने में पिरोकर माला के रूप में एक बनाये रखता है उसी तरह रक्षासूत्र लोगों को जोड़े रखता है। प्रसंगानुसार विश्व में जब-जब नैतिक मूल्यों पर संकट आता है भगवान शिव प्रजापिता ब्रम्हा द्वारा पवित्र धागे भेजते हैं जिन्हें बाँधकर बहिने भाइयों को दुःख-पीड़ा से मुक्ति दिलाती हैं। भगवान कृष्ण ने महाभारत युद्ध में विजय हेतु युधिष्ठिर को सेना सहित रक्षाबंधन पर्व मनाने का निर्देश दिया था।

बागी थे हों अनुरागी, विरागी थे हों सुहागी, कोई भी न हो अभागी, दैव से मनाइए.
सभी के माथे हो टीका, किसी का न पर्व फीका, बहनों का नेह नीका, राखी-गीत गाइए..
कलाई रहे न सूनी, राखी बाँध शोभा दूनी, आरती की ज्वाल धूनी, अशुभ मिटाइए.
मीठा खाएँ मीठा बोलें, जीवन में रस घोलें, बहना के पाँव छूलें, शुभाशीष पाइए..
(कलाधर घनाक्षरी)

उत्तरांचल में इसे श्रावणी कहा जाता है तथा यजुर्वेदी विप्रों का उपकर्म (उत्सर्जन, स्नान, ऋषितर्पण आदि के पश्चात नवीन यज्ञोपवीत धारण किया जाता है।) राजस्थान में रामराखी (लालडोरे पर पीले फुंदने लगा सूत्र) भगवान को, चूड़ाराखी (भाभियों को चूड़ी में) या लांबा (भाई की कलाई में) बाँधने की प्रथा है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ आदि में बहनें शुभ मुहूर्त में भाई-भाभी को तिलक लगाकर राखी बाँधकर मिठाई खिलाती तथा उपहार प्राप्त कर आशीष देती हैं।महाराष्ट्र में इसे नारियल पूर्णिमा कहा जाता है। इस दिन समुद्र, नदी तालाब आदि में स्नान कर जनेऊ बदलकर वरुणदेव को श्रीफल (नारियल) अर्पित किया जाता है। उड़ीसा, तमिलनाडु व् केरल में यह अवनिअवित्तम कहा जाता है। जलस्रोत में स्नानकर यज्ञोपवीत परिवर्तन व ऋषि का तर्पण किया जाता है।

बंधन न रास आये, बँधना न मन भाये, स्वतंत्रता ही सुहाये, सहज स्वभाव है.
निर्बंध अगर रहें, मर्याद को न गहें, कोई किसी को न सहें, चैन का अभाव है..
मना राखी नेह पर्व, करिए नातों पे गर्व, निभायें संबंध सर्व, नेह का निभाव है.
बंधन जो प्रेम का हो, कुशल का क्षेम का हो, धरम का नेम हो, 'सलिल' सत्प्रभाव है..
(कलाधर घनाक्षरी)

रक्षा बंधन से जुड़ा हुआ एक ऐतिहासिक प्रसंग भी है। राजस्थान की वीरांगना रानी कर्मावती ने राज्य को यवन शत्रुओं से बचने के लिए मुग़ल बादशाह हुमायूँ को राखी भेजी थी। राखी पाते ही हुमायूँ ने अपना कार्य छोड़कर बहिन कर्मवती की रक्षा के लिए प्रस्थान किया। विधि की विडंबना यह कि हुमायूँ के पहुँच पाने के पूर्व ही कर्मावती ने जौहर कर लिया, तब हुमायूँ ने कर्मवती के शत्रुओं का नाश किया।

संकट में लाज थी, गिरी सिर पे गाज थी, शत्रु-दृष्टि बाज थी, नैया कैसे पार हो?
करनावती महारानी, पूजतीं माता भवानी, शत्रु है बली बहुत, देश की न हार हो..
राखी हुमायूँ को भेजी, बादशाह ने सहेजी, बहिन की पत राखी, नेह का करार हो.
शत्रु को खदेड़ दिया, बहिना को मान दिया, नेह का जलाया दिया, भेंट स्वीकार हो..
(कलाधर घनाक्षरी )

रक्षा बंधन के दिन बहिन भाई के मस्तक पर कुंकुम, अक्षत के तिलक कर उसके दीर्घायु और समृद्ध होने की कामना करती है। भाई बहिन को स्नेहोपहारों से संतुष्ट कर, उसकी रक्षा करने का वचन देकर उसका आशीष पाता है।

कजलियाँ

कजलियां मुख्‍यरूप से बुंदेलखंड में रक्षाबंधन के दूसरे दिन की जाने वाली एक परंपरा है जिसमें नाग पंचमी के दूसरे दिन खेतों से लाई गई मिट्टी को बर्तनों में भरकर उसमें गेहूं बो दिये जाते हैं और उन गेंहू के बीजों में रक्षाबंंधन के दिन तक गोबर की खाद् और पानी दिया जाता है और देखभाल की जाती है, जब ये गेंहू के छोटे-छोटे पौधे उग आते हैं तो इससे यह अनुमान लगाया जाता है कि इस बार फसल कैसी होगी, गेंहू के इन छोटे-छोटे पौधों को कजलियां कहते हैं। कजलियां वाले दिन घर की लड़कियों द्वारा कजलियां के कोमल पत्‍ते तोडकर घर के पुरूषों के कानों के ऊपर लगाया जाता है, जिससे लिये पुरूषों द्वारा शगुन के तौर पर लड़कियों को रूपये भी दिये जाते हैं। इस पर्व में कजलिया लगाकर लोग एक दूसरे की शुभकामनाये के रूप कामना करते है कि सब लोग कजलिया की तरह खुश और धन धान्य से भरपूर रहे इसी लिए यह पर्व सुख समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।

भाई दूज

कजलियों के अगले दिन भाई दूज पर बहिनें गोबर से लोककला की आकृतियाँ बनाती हैं। भटकटैया के काँटों को मूसल से कूट-कूटकर भाई के संकट दूर होने की प्रार्थना करती हैं। नागपंचमी, राखी, कजलियाँ और भाई दूज के पर्व चतुष्टय भारतीय लोकमानस में पारिवारिक संबंधों की पवित्रता और प्रकृति से जुड़ाव के प्रतीक हैं। पाश्चात्य मूल्यों के दुष्प्रभाव के कारण नई पीढ़ी भले ही इनसे कम जुड़ पा रही है पर ग्रामीणजन और पुरानी पीढ़ी इनके महत्व से पूरी तरह परिचित है और आज भी इन त्योहारों को मनाकर नव स्फूर्ति प्राप्त करती है।
***
दोहा सलिला
*
जाते-जाते बता दें, क्यों थे अब तक मौन?
सत्य छिपा पद पर रहे, स्वार्थी इन सा कौन??
*
कुर्सी पाकर बंद थे, आज खुले हैं नैन.
हिम्मत दें भय-भीत को, रह पाए सुख-चैन.
*
वे मीठा कह कर गए, मिला स्नेह-सम्मान.
ये कड़वा कह जा रहे, क्यों लादे अभिमान?
*
कोयल-कौए ने कहे, मीठे-कडवे बोल.
कौन चाहता काग को?, कोयल है अनमोल.
*
मोहन भोग मिले मगर, सके न काग सराह.
देख छीछड़े निकलती, बरबस मुँह से आह.
*
फ़िक्र न खल की कीजिए, करे बात बेबात.
उसके न रात दिन, और नहीं दिन रात.
*
जितनी सुन्दर कल्पना, उतना सुन्दर सत्य.
नैन नैन में जब बसें, दिखता नित्य अनित्य.
११-८-२०१७
***
मुक्तिका:
मापनी: 212 212 212 212
छंद: महादैशिक जातीय, तगंत प्लवंगम
तुकांत (काफ़िआ): आ
पदांत (रदीफ़): चाहिये
बह्र: फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन
*
बात को जानते मानते हैं सदा
बात हो मानने योग्य तो ही कहें
वायदों को कभी तोडियेगा नहीं
कायदों का तकाज़ा नहीं भूलिए
बाँह में जो रही चाह में वो नहीं
चाह में जो रहे बाँह में थामिए
जा सकेंगे दिलों से कभी भी नहीं
जो दिलों में बसे हैं, नहीं जाएँगे
रौशनी की कसम हम पतंगे 'सलिल'
जां शमा पर लुटा के भी मुस्काएँगे
***
मुक्तिका:
मापनी: 212 212 212 212
छंद: महादैशिक जातीय, तगंत प्लवंगम
तुकांत (काफ़िआ): आ
पदांत (रदीफ़): चाहिये
बह्र: फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन
*
बोलना छोड़िए मौन हो सोचिए
बागबां कौन हो मौन हो सोचिए
रौंदते जो रहे तितलियों को सदा
रोकना है उन्हें मौन हो सोचिए
बोलते-बोलते भौंकने वे लगे
सांसदी क्यों चुने हो मौन हो सोचिए
आस का, प्यास का है हमें डर नहीं
त्रास का नाश हो मौन हो सोचिए
देह को चाहते, पूजते, भोगते
खुद खुदी चुक गये मौन हो सोचिए
मंदिरों में तलाशा जिसे ना मिला
वो मिला आत्म में ही छिपा सोचिए
छोड़ संजीवनी खा रहे संखिया
मौत अंजाम हो मौन हो सोचिए
***
मुक्तिका:
*
कारवाले कर रहे बेकार की बातें
प्यारवाले पा रहे हैं प्यार में घातें
दोपहर में हो रहे हैं काम वे काले
वास्ते जिनके कभी बदनाम थीं रातें
दगा अपनों ने करी इतिहास कहता है
दुश्मनों से क्या गिला? छल से मिली मातें
नाम गाँधी का भुनाते हैं चुनावों में
नहीं गलती से कभी जो सूत कुछ कातें
आदमी की जात का करिये भरोसा मत
स्वार्थ देखे तो बदल ले धर्म मत जातें
नुक्क्डों-गलियों को संसद ने हराया है
मिले नोबल चल रहे जूते कभी लातें
कहीं जल प्लावन, कहीं जन बूँद को तरसे
रुलाती हैं आजकल जन- गण को बरसातें
***
***
मुक्तक:
*
उषा कर रही नित्य प्रात ही सविता का अभिनन्दन
पवन शांत बह अर्पित करती यश का अक्षत-चंदन
दिग्दिगंत तक कीर्ति पा सकें छेड़ रागिनी मीत
'सलिल' नमन स्वीकारें, जग को कर दें मिल नंदन वन
११-८-२०१५
***

बुधवार, 10 अगस्त 2022

गीत, नवगीत, साधना,बुद्धिमान, धर्म, मूर्ति,सॉनेट, शलभ

सॉनेट
शलभ
ज्योति आराधक शलभ है
तपस्वी साधक शलभ है
वरण करता उजाले की
तिमिर-पथ बाधक शलभ है

शलभ सुर लय तान वरता
छंद गति-यति-लय विचरता
भ्रमर जैसे गीत गाता
प्रीत पाता, हँस सिहरता

कोशिशें करता निरंतर
मंजिलें नित नई ले वर
तिलक कर तकनीक का, बढ़
लिखे अपना भाग्य यह फिर

शलभ बनना ही नियति है
शलभ बनना ही प्रगति है
१०-८-२०२२
•••
मुक्तिका/हिंदी ग़ज़ल
.
किस सा किस्सा?, कहे कहानी
गल्प- गप्प हँस कर मनमानी
.
कथ्य कथा है जी भर बाँचो
सुन, कह, समझे बुद्धि सयानी
.
बोध करा दे सत्य-असत का
बोध-कथा जो कहती नानी
.
देते पर उपदेश, न करते
आप आचरण पंडित-ज्ञानी
.
लाल बुझक्कड़ बूझ, न बूझें
कभी पहेली, पर ज़िद ठानी
***
[ सोलह मात्रिक संस्कारी जातीय, अरिल्ल छन्द]
२३-५-२०१६
विमर्श : बुद्धिमान कौन?
*
बिल्ली के सामने मिट्टी या पत्थर का चूहा बना कर रख दें, वह उस पर नहीं झपटती जबकि इंसान मिट्टी-पत्थर की मूरत बनाकर उसके सामने गिड़गिड़ाता रहता है और इसे धर्म कहता है।
कबीरदास कह गए -
काँकर-पाथर जोड़ के मस्जिद लई बनाय
ता चढ़ मुल्ला बांग दे बहिरा हुआ खुदाय

पाहन पूजे हरि मिले तो मैं पूजूँ पहार
ताते या चाकी भली पीस खाय संसार

मूँड़ मुँड़ाए हरि मिलै, सब कोउ लेय मुड़ाय
बार-बार के मूड़ते, भेद न बैकुंठ जाय
*
मेरे हाथों का बनाया हुआ
पत्थर का है बुत
कौन भगवान है सोचा जाए?
*
कंकर कंकर में बसे हैं शंकर भगवान
फिर मूरत क्यों बनाता, रे! मानव नादान?
***
विमर्श:
साधना क्या है....
पत्थर पर एकाएक बहुत सा पानी डाल दिया जाए तो पत्थर केवल भीगेगा, फिर पानी बह जाएगा और पत्थर सूख जाएगा किन्तु वह पानी पत्थर पर एक ही जगह पर बूँद-बूँद गिरता रहेगा, तो पत्थर में छेद होगा और कुछ दिनों बाद पत्थर टूट भी जाएगा। कुएं में पानी भरते समय एक ही स्थान पर रस्सी की रगड़ से पत्थर और लोहे पर निशान पड़कर अंत में वह टूट जाता है 'रसरी आवत जात ते सिल पर परत निसान'। इसी प्रकार निश्चित स्थान पर ध्यान की साधना की जाएगी तो उसका परिणाम अधिक होता है ।
चक्की में दो पाटे होते हैं। उनमें यदि एक स्थिर रहकर, दूसरा घूमता रहे तो अनाज पिस जाता है और आटा बाहर आ जाता है। यदि दोनों पाटे एक साथ घूमते रहेंगे तो अनाज नहीं पिसेगा और परिश्रम व्यर्थ होगा। इसी प्रकार मनुष्य में भी दो पाटे हैं; एक मन और दूसरा शरीर। उसमें मन स्थिर पाटा है और शरीर घूमने वाला पाटा है।
अपने मन को ध्यान द्वारा स्थिर किया जाए और शरीर से सांसारिक कार्य करें। प्रारब्ध रूपी खूँटा शरीर रूपी पाटे में बैठकर उसे घूमाता है और घूमाता रहेगा लेकिन मन रूपी पाटे को सिर्फ भगवान के प्रति स्थिर रखना है। देह को प्रारब्ध पर छोड़ दिया जाए और मन को ध्यान में मग्न कर दिया जाए; यही साधना है।
***
गीत
कह रहे सपने कथाएँ
.
सुन सको तो सुनो इनको
गुन सको तो गुनो इनको
पुराने हों तो न फेंको
बुन सको तो बुनो इनको
छोड़ दोगे तो लगेंगी
हाथ कुछ घायल व्यथाएँ
कह रहे सपने कथाएँ
.
कर परिश्रम वरो फिर फिर
डूबना मत, लौट तिर तिर
साफ होगा आसमां फिर
मेघ छाएँ भले घिर घिर
बिजलियाँ लाखों गिरें
हम नशेमन फिर भी बनाएँ
कह रहे सपने कथाएँ
.
कभी खुद को मारना मत
अँधेरों से हारना मत
दिशा लय बिन गति न वरना
प्रथा पुरखे तारना मत
गतागत को साथ लेकर
आज को सार्थक बनाएँ
कह रहे सपने कथाएँ
१०-८-२०१७
...
नवगीत
मेरा नाम बताऊँ? हाऊ
ना दैहौं तन्नक काऊ
*
बम भोले है अपनी जनता
देती छप्पर फाड़ के.
जो पाता वो खींच चीथड़े
मोल लगाता हाड़ के.
नेता, अफसर, सेठ त्रयी मिल
तीन तिलंगे कूटते.
पत्रकार चंडाल चौकड़ी
बना प्रजा को लूटते.
किससे गिला शिकायत शिकवा
करें न्याय भी बंदी है.
पुलिस नहीं रक्षक, भक्षक है
थाना दंदी-फंदी है.
काले कोट लगाये पहरा
मनमर्जी करते भाऊ
मेरा नाम बताऊँ? हाऊ
ना दैहौं तन्नक काऊ
*
पण्डे डंडे हो मुस्टंडे
घात करें विश्वास में.
व्यापम झेल रहे बरसों से
बच्चे कठिन प्रयास में.
मार रहे मरते मरीज को
डॉक्टर भूले लाज-शरम.
संसद में गुंडागर्दी है
टूट रहे हैं सभी भरम.
सीमा से आतंक घुस रहा
कहिए किसको फ़िक्र है?
जो शहीद होते क्या उनका
इतिहासों में ज़िक्र है?
पैसे वाले पद्म पा रहे
ताली पीट रहे दाऊ
मेरा नाम बताऊँ? हाऊ
ना दैहौं तन्नक काऊ
*
सेवा से मेवा पाने की
रीति-नीति बिसरायी है.
मेवा पाने ढोंग बनी सेवा
खुद से शरमायी है.
दूरदर्शनी दुनिया नकली
निकट आ घुसी है घर में.
अंग्रेजी ने सेंध लगा ली
हिंदी भाषा के स्वर में.
मस्त रहो मस्ती में, चाहे
आग लगी हो बस्ती में.
नंगे नाच पढ़ाते ऐसे
पाठ जां गयी सस्ते में.
आम आदमी समझ न पाये
छुरा भौंकते हैं ताऊ
मेरा नाम बताऊँ? हाऊ
ना दैहौं तन्नक काऊ
१०-८-२०१५
*

मंगलवार, 9 अगस्त 2022

बाल सॉनेट,तिरंगा,मुक्तक,नवगीत,

बाल सॉनेट 
तिरंगा
ध्वजा तिरंगा सबसे प्यारी
सभी ध्वजाओं में यह न्यारी
सबसे ऊपर केसरिया है
देश हेतु ही जन्म लिया है

कहे सफेद शांति से रहिए 
हरा कहे हरियाली करिए
चका कह रहा मेहनत करना
डंडा कहे न अरि से डरना

रस्सी कहे हमेशा साथ
रहना हाथों में ले हाथ 
झंडा फहरा, करो प्रणाम 
पौध लगा सींचो हर शाम

सुबह शाम नित करो पढ़ाई 
सबसे तब ही मिले बड़ाई
९-८-२०२२
•••

***
मुक्तक
आशा कुसुम, लता कोशिश पर खिलते हैं
सलिल तीर पर, हँस मन से मन मिलते हैं
नातों की नौका, खेते रह बिना थके-
लहरों जैसे बिछुड़-बिछुड़ हम मिलते हैं
*
पाठ जब हमको पढ़ाती जिंदगी।
तब न किंचित मुस्कुराती जिंदगी।
थाम कर आगे बढ़ाती प्यार से-
'सलिल' मन को तब सुहाती जिंदगी.
*
केवल प्रसाद सत्य है, बाकी तो कथा है
हर कथा का भू-बीज मिला, हर्ष-व्यथा है
फैला सको अँजुरी, तभी प्रसाद मिलेगा
पी ले 'सलिल' चुल्लू में यही सार-तथा है
तथा = तथ्य,
प्रयोग: कथा तथा = कथा का सार
*
आँखों में जिज्ञासा, आमंत्रण या वर्जन?
मौन धरे अधरों ने पैदा की है उलझन
धनुष भौंह पर तीर दृष्टि के चढ़े हुए हैं-
नागिन लट मोहे, भयभीत करे कर नर्तन
*
वही अचल हो सचल समूची सृष्टि रच रहा
कण-कणवासी किन्तु दृष्टि से सदा बच रहा
आँख खोजती बाहर वह भीतर पैठा है
आप नाचता और आप ही आप नच रहा
*
श्री प्रकाश पा पाँव पलोट रहा राधा के
बन महेश-सिर-चंद्र, पाश काटे बाधा के
नभ तारे राकेश धरा भू वज्र कुसुम वह-
तर्क-वितर्क-कुतर्क काट-सुनता व्याधा के
*
राम सुसाइड करें, कृष्ण का मर्डर होता
ईसा बन अपना सलीब वह खुद ही ढोता
आतंकी जब-जब जय बोलें तब भी वह ही 
बेबस बेकस छिपकर अपने नयन भिगोता
*
पाप-पुण्य क्या? सब कर्मों का फल मिलना है
मुरझाने के पहले जी भरकर खिलना है
'सलिल' शब्द-लहरों में डूबा-उतराता है
जड़ चेतन होना चाहे तो खुद हिलना है
९-८-२०१७
***
नवगीत:
*
दुनिया रंग रँगीली
बाबा
दुनिया रंग रँगीली रे!
*
धर्म हुआ व्यापार है
नेता रँगा सियार है
साध्वी करती नौटंकी
सेठ बना बटमार है
मैया छैल-छबीली
बाबा
दागी गंज-पतीली रे!
*
संसद में तकरार है
झूठा हर इकरार है
नित बढ़ते अपराध यहाँ
पुलिस भ्रष्ट-लाचार है
नैतिकता है ढीली
बाबा
विधि-माचिस है सीली रे!
*
टूट रहा घर-द्वार है
झूठों का सत्कार है
मानवतावादी भटके
आतंकी से प्यार है
निष्ठां हुई रसीली
बाबा
आस्था हुई नशीली रे!
९-८-२०१५
***

संगीता भरद्वाज

पुरोवाक
मैत्री की यात्राएँ : घुमक्कड़ बनाएँ
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
'आदमी मुसाफिर है, आता है, जाता है
आते-जाते रस्ते में, यादें छोड़ जाता है'

                         गीतकार आनंद बख्शी द्वारा लिखित चलचित्र 'अपनापन' में लता-रफ़ी द्वारा गाया गया, अभिनेता सुधीर दलवी, सुलक्षणा पंडित, निवेदिता, जितेंद्र आदि पर चित्रित इस गीत का दूसरा पहलू यह है कि आदमी यादें साथ छोड़ने के साथ-साथ यादें ले भी आता है जो ज़िन्दगी में पाथेय बन जाती हैं। डॉ. संगीता भरद्वाज 'मैत्री' लिखित यह पुस्तक यात्राओं में संजोई गई सुधियों की मंजूषा है, जिसे वे अपने पाठकों के लिए खोल रही हैं। सुखद यात्राओं का सबसे अधिक महत्वपूर्ण तत्व है सहभागिता, सहिष्णुता हुए सद्भाव।

यूँ ही कट जाएगा सफर साथ चलने से
कि मंज़िल आएगी नज़र साथ चलने से

                         समीर, नदीम श्रवण, कुमार सानू और अलका याग्निक इस गीत में यात्राओं को सुखद बनाने का सूत्र बता रहे हैं।'मैत्री' के यात्रा वर्णन सहभागियों के मध्य जिस सहकार, स्नेह हुए सम्मान के भाव से सराबोर हैं काश! वह सियासत और संसद/विधायिकाओं में भी हो तो देश के नवनिर्माण का सफर आम जन के लिए सुखद हो सके।

                         यह पुस्तक सामान्य यात्रा वृत्त होकर रह जाता यदि इसकी भाषा सरस, सरल, सहज न होती। संगीता यात्राओं में घट रही घटनाओं का इतना जीवंत वर्णन करती हैं कि पाठक के मन में उन स्थानों पर जाने की इच्छा उत्पन्न हो जाती है। उनकी यह कला चलचित्र 'मधुमती' (१९५८) मुकेश द्वारा गाए गीत की याद दिलाती है-

सुहाना सफर और ये मौसम हसीं
हमें डर है हम खो न जाएँ कहीं

                         वाल्टर हेगेन कहते हैं- ''न जल्दी करो न परेशान हो क्योंकि आप यहाँ पर एक छोटी सी यात्रा पर हो, इसलिए निश्चिन्त होकर रुको और फूलों की खुशबू का आनंद लो।'' मेरा मत है-

यायावर साँसों मत ठहरो, आसों का दम घुट जाएगा
घाट-घाट जब पग भटकेगा, अपने सपने जी पाएगा
नेह नर्मदा, स्नेह सलिल से सराबोर कलकल करती है
जो कलरव ध्वनि नाद सुनेगा, वह आनंदित हो गाएगा

                         संगीता ने भोपाल, दिल्ली, बागडोगरा, सिलीगुड़ी, गंगटोक, दार्जिलिंग, सियालदह, कोलकाता, पोर्टब्लेयर, अंडमान, पोर्टब्लेयर, चेन्नई, बेंगलुरु, भोपाल यात्रा के पड़ाव-पड़ाव पर प्रकृति माँ से आनंद पाया है। जहाँ जो-जैसा देखा उसे जैसे का तैसा शब्दों में बयान करना आसान नहीं होता, संगीता छोटे से छोटे विवरणों और वर्णनों को शब्दों की माला में इस तरह पिरोती है कि स्थान शब्द में और शब्द स्थान में नीर-क्षीर की तरह घुल-मिल जाते हैं। याद आता है चलचित्र परिचय के लिए  गुलज़ार  लिखित, किशोर दा द्वारा गाया गया,  जितेन्द्र-जया भादुड़ी और बाल कलाकारों पर फिल्माया गया गीत- 

मुसाफिर हूँ यारों, न घर है न ठिकाना 
मुझे चलते जाना है, बस चलते जाना 
एक रह रुक गई तो और जुड़ गई 
मैं मुड़ा तो साथ-साथ राह मुड़ गई  
हवा के परों पर मेरा आशियाना 

                         हवा के परों पर पहली बार उड़ते हुए दिल्ली से बागडोगरा पहुँचना जितना रोमांचक था उससे अधिक रोमांचक थी सिलीगुड़ी से गंगतोक की यात्रा के बीच रुपहली तीस्ता एयर रणजीत नदियों से नर्मदा सुता की मुलाकात। संगीता की शब्द सामर्थ्य का जादू पाठक को मंत्रमुग्ध कर देता है। भाषा और शब्दों से गलबहियाँ डालकर बातें करना संगीता ने पितृश्री तरुण जी और चाचा द्वय पथिक जी और मधुर जी से सीखा है-  ''हम रास्ते में कई विहंगम दृश्य और निराली नयनाभिराम छटाओं को सदा के लिए अपने कैमरे में कैद करते गए। एक ओर सैंकड़ों फ़ीट गहरी खाइयाँ, घाटियाँ कि जहाँ धरती के दर्शन भी दुर्लभ और दूसरी ओर आकाशीय ऊँचाई लिए पर्वत एवं ऊँचे-ऊँचे सघन वृक्षों की कतारें जो मधुर पवन के साथ लहराते से प्रतीत हो रहे थे हुए अपनी जानी-अनजानी खुशबुओं से हमारे हृदयों को बाँध रहे थे, अपनी और बुला रहे थे। वहीं कल-कल ध्वनि से घाटियों की ख़ामोशी में सुमधुर गीत सा गुनगुनाती 'तीस्ता' चंचल, अल्हड़ नवयौवना की तरह इठलाती सी निरन्तर बढ़ती जा रही थी। उसकी तरलता में हम स्वयं को घुलता हुआ सा महसूस कर रहे थे। छोटी-छोटी पर्वत श्रृंखलाएँ 'फर्न' आदि से लड़ी पड़ी थीं, पुष्पों का  अनोखा संसार सरे वातावरण में  खुशबुओं-सुगंधों का जादू बिखेरता; एक नई मस्ती व तरंग भर रहा था, हम रंगों और तरंगों के आगोश में खुद को गिरफ्तार पा रहे थे ....

                         .....हम हमारी जीवन दायिनी, पापहन्त्री पुनिता माँ नर्मदा जी को याद करने लगे। हमारे मध्य प्रदेश की जीवन रेखा माँ नर्मदा जो सिर्फ नदी नहीं बल्कि हम सबकी जीवनदात्री हैं। रेवा की ेश्वर दात्री, जनदुख हन्त्री, पवित्र धारा सदा हो कल्याणकारी और लोकधर्मिणी रही है हुए उसी पवित्र अनवरत बहती निर्मल धरा के जादुई स्पर्श से अंधियारे गोरे प्रतीत होते हैं, धुप चंदन सी महकती है हुए बैर और गैर का भाव ह्रदय से धूमिल होकर मनुष्य-मनुष्य में स्नेह उपजता है, गैरों में भी अपनेपन की आनंदानुभूति महसूस होती है।'' 

                         ऐसी मनस्थिति में मुसाफिर जाने-अनजाने, चाहे-अनचाहे गुनगुनाने लगता है-

गीत गाता चल ओ साथी गुनगुनाता चल
ओ बंधु रे! हँसते हसाते बीते हर घड़ी हर पल
गीत गाता चल ओ साथी गुनगुनाता चल
(गीत गाता चल, १९७५, गीत-संगीत रविंद्र जैन, गायक सतपाल सिंह। कलाकार सचिन-सारिका)


                         संगीत द्वारा लिखित दुर्लभ क्षणों में 'मंदिर की तस्वीर' उपशीर्षक के अन्तर्गत भारत-चीन सीमा पर अरदास करते मेजर (बाबा) हरभजन सिंह द्वारा अरदास अधूरी छोड़कर शत्रु को मुँह तोड़ उत्तर देते हुए अदृश्य हो जाने का वर्णन रोमांचक है। उनके द्वारा साल के ११ माह उस पोस्ट की रक्षा करना और साल में एक बार अवकाश लेकर घर जाने के समय उनके लिए रेलगाड़ी में शायिका आरक्षित कराई जाना उनकी आसंदी पर कोइ अन्य बैठने के प्रयास करे तो चाँटा लगना आदि पढ़कर स्तब्ध रह जाना पड़ता है। 'जो राह चुनी तूने, उसी राह पे राही चलते जाना रे'' -(गीतकार : एम. जी. हशमत, गायक : किशोर कुमार, संगीतकार : रविन्द्र जैन, चित्रपट : तपस्या,१९७५)

                         चाय बागान, दर्जिलिंग, कंचनजंघा, शिला उद्यान (रॉक गार्डन), तस्करी, हावड़ा पल, ट्राम, विक्टोरिया  मेमोरियल, अंडमान, निकोबार, सिंक आइलैंड, सेल्युलर जेल, भारतीय स्वातंत्र्य शहीदों की पराक्रम कथाएँ, जॉली वाय द्वीप, समुद्र गर्भ का तिलस्मी संसार, हैवलॉक आइलैंड आदि के जीवन वर्णन पठनीय हैं। इन वरबननाओं के साथ संगीता अपनी भावाभिव्यक्ति काव्य पंक्तियों में भी करती हैं जो सोने में सुहागा की तरह है।  संगीता लिखती हैं- 
ए चाँद! तू गगन में है, याकि पानी में 
अभी अपने बचपन में है, याकि जवानी में 
आज सचमुच है पास मेरे या सिर्फ मेरी कहानी में 
लहरों पर सवार है या फिर उसकी रवानी में 

                         इन वर्णनों को पढ़कर याद आता है एक और गीत (गीत-संगीत-गायन किशोर कुमार, दूर गगन की छाँव में)-
 
जहाँ दूर नज़र दौड़ाए, आजाद गगन लहराए 
जहाँ रंग-बिरंगे पंछी आशा का संदेसा लाएँ 
सपनों में पली, हँसती हो कली 
जहाँ शाम सुहानी ढले 
आ चल के तुझे मैं ले के चलूँ 
एक ऐसे गगन के तले 

                         यात्रा संस्मरणों में भांडवगढ़ अभयारण्य जो सफेद शेर के लिए जगत्प्रसिद्ध है, की सैर का वर्णन अनूठा है। 'ये रात ये चाँदनी फिर कहाँ, सुन जा दिल (वन ) की दास्ताँ', इस संस्मरण में विंध्याटवी के प्राकृतिक सौंदर्य, पेड़-पौधों, वन्य पशुओं आदि का जीवंत वर्णन मोहक है। 'जंगल में मोर नाचा किसने देखा' की कहावत अब सत्य नहीं रह गयी है, अब तो यह 'जंगल में मोर नाचा सबने देखा' हो गई है। अधखाया साँप और उसे उदरस्थ कर सुस्ताती चील, शेषशैया में बलुआ पत्थर में तराशे गए शैयाशायी विष्णु प्रतिमा और अंत में वनराज के दर्शन का वर्णन पढ़कर ऐसा लगता है यह आँखों के आगे घट रहा है। 

                         'यात्राओं की तलाश' वास्तव में यात्राओं के माध्यम से अपनी तलाश है, अपने अंदर छिपे गुणों और प्रवृत्तियों (धैर्य, साहस, उत्सुकता, सहिष्णुता आदि) की तलाश।  इस तलाश में संगीता और सभी स्वजन सफल हुआ हैं। अपने प्राप्य रसानंद को सबके साथ बाँटने की भावना से यह संस्मरण लिखे गए हैं। हिंदी वाङ्मय में संस्मरण साहित्य अपेक्षाकृत कम लिखा गया है, जो लिखा गया है उसमें अधिकाँश व्यक्तिपरक है। यात्रा वृत्तों में धार्मिक स्थलों को वरीयता दी जाती है। प्रकृति-वैभव को केंद्र बनाकर रचे गए साहित्य में इन संस्मरणों को सम्मान मिलेगा, ऐसा मेरा विश्वास है। संगीता का संदेश एक गीत (साहिर लुधियानवी, गायक : किशोर कुमार, संगीतकार : सपन चक्रवर्ती, चित्रपट : ज़मीर,१९७५) के माध्यम से अभिव्यक्त हुआ है-  
तुम भी चलो, हम भी चलें, चलती रहे ज़िंदगी 
ना जमीं मंज़िल, न आसमाँ, ज़िंदगी है ज़िंदगी 
***
[संपर्क - विश्ववाणी हिंदी संस्थान अभियान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, चलभाष: ९४२५१८३२४४, ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com ]

सोमवार, 8 अगस्त 2022

सॉनेट, मीरा,गैंग्रीन,दस्त,डायरिया,दोहा,मुक्तक,लघु कथा,

सॉनेट 
मीरा 
● 
दुख में सुख मीरा की प्रीत 
मिले फूल को पत्थर मीत 
सिसक रहे चुप होकर गीत 
समय न बदले काहे रीत 

मीरा कभी न हुई अतीत 
लगे हार भी उसको जीत 
दुनियादारी कहे अनीत 
वह गुंजाती हरि के गीत 

मीरा किंचित हुई न भीत 
जन्म-जन्म से हरि की क्रीत 
मिलन हेतु नित रहे अधीत 

आत्म हुई परमात्म प्रणीत 
मीरा को है वही सुनीत 
जग कहता है जिसे कुरीत 
८-८-२०२२ 
•••
चिकित्सा सलिला
नुस्खे
गैंग्रीन (अंग का सड़ जाना) Osteomyelitis, कटे-पके घाव का इलाज
मधुमेह रोगी (डाईबेटिक पेशेंट) की चोट जल्दी ठीक ही नही हो तो धीरे धीरे गैंग्रीन (अंग का सड़ जाना) में बदल जाती है अंत में वह अंग काटना पड़ता है। गैंग्रीन माने अंग का सड़ जाना, जहाँ पे नए कोशिका विकसित नही होते। न तो मांस में और न ही हड्डी में और सब पुराने कोशिका मरते चले जाते हैं। Osteomyelitis में भी कोशिका कभी पुनर्जीवित नही होती, जिस हिस्से में हो वहाँ बहुत बड़ा घाव हो जाता है और वो ऐसा सड़ता है कि काटने केअलावा और कोई दूसरा उपाय नही रहता।
एक औषधि है जो गैंग्रीन को भी ठीक करती है और Osteomyelitis (अस्थिमज्जा का प्रदाह) को भी ठीक करती है।इसे आप अपने घर में तैयार कर सकते हैं। औषधि है देशी गाय का मूत्र (आठ परत सूती कपड़े में छानकर) , हल्दी और गेंदे का फूल। पीले या नारंगी गेंदे के फुल की पंखुरियाँ निकालकर उसमें हल्दी मिला दें फिर गाय मूत्र में डालकर उसकी चटनी बना लें। यह चटनी घाव पर दिन में दो बार लगा कर उसके ऊपर रुई रखकर पट्टी बाँधिए। चटनी लगाने के पहले घाव को छाने हुए जो मूत्र से ही धो लें। डेटोल आदि का प्रयोग मत करिए।
यह बहुत प्रभावशाली है। इस औषधि को हमेशा ताजा बनाकर लगाना है। किसी भी प्रकार का ज़ख्म जो किसी भी औषधि से ठीक नही हो रहा है तो यह औषधि आजमाइए। गीला सोराइसिस जिसमेँ खून भी निकलता है, पस भी निकलता है उसको यह औषधि पूर्णरूप से ठीक कर देती है। दुर्घटनाजनित घाव पर इसे अलगते ही रक्त स्राव रुक जाता है। ऑपरेशन के घाव के लिए भी यह उत्तम औषधि है। गीले एक्जीमा में यह औषधि बहुत काम करती है, जले हुए जखम में भी लाभप्रद है।
*
हाथ, पैर और तलुओं की जलन
हाथ-पैर, तलुओं और शरीर में जलन की शिकायत हो तो ५ कच्चे बेल के फलों के गूदे को २५० मिली लीटर नारियल तेल में एक सप्ताह तक डुबाये रखने के बाद में छानकर जलन देने वाले शारीरिक हिस्सों पर मालिश करनी चाहिए, अतिशीघ्र जलन की शिकायत दूर हो जाएगी।
*
दस्त - डायरिया
नींबू का रस निकालने के बाद छिलके छाँव में रखकर सुखा लें। कच्चे हरे केले का छिल्का उतारकर बारीक-बारीक टुकड़े करें और इसे भी छाँव में सुखा लें। केले में स्टार्च और नीबू के छिल्कों मे सबसे ज्यादा मात्रा में पेक्टिन होता है। दोनों अच्छी तरह सूख जाएँ तो समान मात्रा लेकर बारीक पीस लें या मिक्सर में एक साथ ग्राइंड कर लें। यह चूर्ण दस्त और डायरिया का अचूक इलाज है। दो-दो घंटे के अंतराल से १ चम्मच चूर्ण खाइये। शीघ्र आराम मिलता है।
८-८-२०२०
***
दोहा सलिला
बिंब और प्रतिबिंब में, साम्य न किंचित भेद
मैं-तू ईश्वर अंश हैं, एक परिश्रम-स्वेद
*
एक एक होते नहीं, दो; दो मिलकर एक
या ग्यारह होते सलिल, अगर इरादे नेक
मुक्तक
मधु रहे गोपाल बरसा वेणु वादन कर युगों से
हम बधिर सुन ही न पाते, घिरे हैं छलिया ठगों से
कहाँ नटनागर मिलेगा,पूछते रणछोड़ से क्यों?
बढ़ चलें सब भूल तो ही पा सकें नन्हें पगों से
*
रंज ना कर मुक्ति की चर्चा न होती बंधनों में
कभी खुशियों ने जगह पाई तनिक क्या क्रन्दनों में?
जो जिए हैं सृजन में सच्चाई के निज स्वर मिलाने
'सलिल' मिलती है जगह उनको न किंचित वंदनों में
***
लघु कथा
काल्पनिक सुख
*
'दीदी! चलो बाँधो राखी' भाई की आवाज़ सुनते ही उछल पडी वह। बचपन से ही दोनों राखी के दिन खूब मस्ती करते, लड़ते का कोई न कोई कारण खोज लेते और फिर रूठने-मनाने का दौर।
'तू इतनी देर से आ रहा है? शर्म नहीं आती, जानता है मैं राखी बाँधे बिना कुछ खाती-पीती नहीं। फिर भी जल्दी नहीं आ सकता।'
"क्यों आऊँ जल्दी? किसने कहा है तुझे न खाने को? मोटी हो रही है तो डाइटिंग कर रही है, मुझ पर अहसान क्यों थोपती है?"
'मैं और मोटी? मुझे मिस स्लिम का खिताब मिला और तू मोटी कहता है.... रुक जरा बताती हूँ.'... वह मारने दौड़ती और भाई यह जा, वह जा, दोनों की धाम-चौकड़ी से परेशान होने का अभिनय करती माँ डांटती भी और मुस्कुराती भी।
उसे थकता-रुकता-हारता देख भाई खुद ही पकड़ में आ जाता और कान पकड़ते हुई माफ़ी माँगने लगता। वह भी शाहाना अंदाज़ में कहती- 'जाओ माफ़ किया, तुम भी क्या याद रखोगे?'
'अरे! हम भूले ही कहाँ हैं जो याद रखें और माफी किस बात की दे दी?' पति ने उसे जगाकर बाँहों में भरते हुए शरारत से कहा 'बताओ तो ताकि फिर से करूँ वह गलती'...
"हटो भी तुम्हें कुछ और सूझता ही नहीं'' कहती, पति को ठेलती उठ पडी वह। कैसे कहती कि अनजाने ही छीन गया है उसका काल्पनिक सुख।
८-८-२०१७
***
दोहा सलिलाः
संजीव
*
प्राची पर आभा दिखी, हुआ तिमिर का अन्त
अन्तर्मन जागृत करें, सन्त बन सकें सन्त
*
आशा पर आकाश है, कहते हैं सब लोग
आशा जीवन श्वास है, ईश्वर हो न वियोग
*
जो न उषा को चाह्ता, उसके फूटे भाग
कौन सुबह आकर कहे, उससे जल्दी जाग
*
लाल-गुलाबी जब दिखें, मनुआ प्राची-गाल
सेज छोड़कर नमन कर, फेर कर्म की माल
*
गाल टमाटर की तरह, अब न बोलना आप
प्रेयसि के नखरे बढ़ें, प्रेमी पाये शाप.
*
प्याज कुमारी से करे, युवा टमाटर प्यार
किसके ज्यादा भाव हैं?, हुई मुई तकरार
*
८.८.२०१४

रविवार, 7 अगस्त 2022

सुषमा स्वराज,लघुकथा,दोहा सलिला

भावांजलि
*
शारद सुता विदा हुई, माँ शारद के लोक
धरती माँ व्याकुल हुई, चाह न सकती रोक
*
सुषमा से सुषमा मिली, कमल खिला अनमोल
मानवता का पढ़ सकीं, थीं तुम ही भूगोल
*
हर पीड़ित की मदद कर, रचा नया इतिहास
सुषमा नारी शक्ति का, करा सकीं आभास
*
पा सुराज लेकर विदा, है स्वराज इतिहास
सब स्वराज हित ही जिएँ, निश-दिन किए प्रयास
*
राजनीति में विमलता, विहँस करी साकार
ओजस्वी वक्तव्य से, दे ममता कर वार
*
वाक् कला पटु ही नहीं, कौशल का पर्याय
लिखे कुशलता के कई, कौशलमय अध्याय
*
राजनीति को दे दिया, सुषमामय आयाम
भुला न सकता देश यह, अमर तुम्हारा नाम
*
शब्द-शब्द अंगार था, शीतल सलिल-फुहार
नवरस का आगार तुम, अरि-हित घातक वार
*
कर्म-कुशलता के कई, मानक रचे अनन्य
सुषमा जी शत-शत नमन, पाकर जनगण धन्य
*
शब्दों को संजीव कर, फूँके उनमें प्राण
दल-हित से जन-हित सधे, लोकतंत्र संप्राण
*
महिमामयी महीयसी, जैसा शुचि व्यक्तित्व
फिर आओ झट लौटकर, रटने नव भवितव्य
*
चिर अभिलाषा पूर्ति से, होकर परम प्रसन्न
निबल देह तुमने तजी, हम हो गए विपन्न
*
युग तुमसे ले प्रेरणा, रखे लक्ष्य पर दृष्टि
परमेश्वर फिर-फिर रचे, नव सुषमामय सृष्टि
*
संजीव
७-८-२०१९
***
लघुकथा
बेपेंदी का लोटा
*
'आज कल किसी का भरोसा नहीं, जो कुर्सी पर आया लोग उसी के गुणगान करने लगते हैं और स्वार्थ साधने की कोशिश करते हैं। मनुष्य को एक बात पर स्थिर रहना चाहिए।' पंडित जी नैतिकता का पाठ पढ़ा रहे थे।
प्रवचन से ऊब चूका बेटा बोल पड़ा- 'आप कहते तो ठीक हैं लेकिन एक यजमान के घर कथा में सत्यनारायण भगवान की जयकार करते हैं, दूसरे के यहाँ रुद्राभिषेक में शंकर जी की जयकार करते हैं, तीसरे के निवास पर जन्माष्टमी में कृष्ण जी का कीर्तन करते हैं, चौथे से अखंड रामायण करने के लिए कह कर राम जी को सर झुकाते हैं, किसी अन्य से नवदुर्गा का हवन करने के लिए कहते हैं। परमात्मा आपको भी तो कहता होंगे बेपेंदी का लोटा।'
***
लघुकथा
शर संधान
*
आजकल स्त्री विमर्श पर खूब लिख रही हो। 'लिव इन' की जमकर वकालत कर रहे हैं तुम्हारी रचनाओं के पात्र। मैं समझ सकती हूँ।
तू मुझे नहीं समझेगी तो और कौन समझेगा?
अच्छा है, इनको पढ़कर परिवारजनों और मित्रों की मानसिकता ऐसे रिश्ते को स्वीकारने की बन जाए उसके बाद बताना कि तुम भी ऐसा करने जा रही हो। सफल हो तुम्हारा शर-संधान।
***
लघुकथा
निज स्वामित्व
*
आप लघुकथा में वातावरण, परिवेश या पृष्ठ भूमि क्यों नहीं जोड़ते? दिग्गज हस्ताक्षर इसे आवश्यक बताते हैं।
यदि विस्तार में जाए बिना कथ्य पाठक तक पहुँच रहा है तो अनावश्यक विस्तार क्यों देना चाहिए? लघुकथा तो कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक कहने की विधा है न? मैं किसी अन्य विचारों को अपने लेखन पर बन्धन क्यों बनने दूँ। किसी विधा पर कैसे हो सकता है कुछ समीक्षकों या रचनाकारों का निज स्वामित्व?
***
लघुकथा
दूषित वातावरण
*
अपने दल की महिला नेत्री की आलोचना को नारी अपमान बताते हुए आलोचक की माँ, पत्नि, बहन और बेटी के प्रति अपमानजनक शब्दों की बौछार करते चमचों ने पूरे शहर में जुलूस निकाला। दूरदर्शन पर दृश्य और समाचार देख के बुरी माँ सदमें में बीमार हो गयी जबकि बेटी दहशत के मारे विद्यालय भी न जा सकी। यह देख पत्नी और बहन ने हिम्मत कर कुछ पत्रकारों से भेंट कर विषम स्थिति की जानकारी देते हुए महिला नेत्री और उनके दलीय कार्यकर्ताओं को कटघरे में खड़ा किया।
कुछ वकीलों की मदद से क़ानूनी कार्यवाही आरम्भ की। उनकी गंभीरता देखकर शासन - प्रशासन को सक्रिय होना पड़ा, कई प्रतिबन्ध लगा दिए गए ताकि शांति को खतरा न हो। इस बहस के बीच रोज कमाने-खानेवालों के सामने संकट उपस्थित कर गया दूषित वातावरण।
७-८-२०१७

***

दोहा सलिला:
'मैं'-'मैं' मिल जब 'हम' हुए...
संजीव 'सलिल'
*
'मैं'-'मैं' मिल जब 'हम' हुए, 'तुम' जा बैठा दूर.
जो न देख पाया रहा, आँखें रहते सूर..
*
'मैं' में 'तुम' जब हो गया, अपने आप विलीन.
व्याप गयी घर में खुशी, हर पल 'सलिल' नवीन..
*
'तुम' से 'मैं' की गैरियत, है जी का जंजाल.
'सलिल' इसी में खैरियत, 'हम' बन हों खुशहाल..
*
'मैं' ने 'मैं' को कब दिया, याद नहीं उपहार?
'मैं' गुमसुम 'तुम' हो गयी, रूठीं 'सलिल' बहार..
*
'मैं' 'तुम' 'यह' 'वह' प्यार से, भू पर लाते स्वर्ग.
'सलिल' करें तकरार तो, दूर रहे अपवर्ग..
*
'मैं' की आँखों में बसा, 'तू' बनकर मधुमास.
जिस-तिस की क्यों फ़िक्र हो, आया सावन मास..
*
'तू' 'मैं' के दो चक्र पर, गृह-वाहन गतिशील.
'हम' ईधन गति-दिशा दे, बाधा सके न लील..
*
'तू' 'तू' है, 'मैं' 'मैं' रहा, हो न सके जब एक.
तू-तू मैं-मैं न्योत कर, विपदा लाईं अनेक..
*
'मैं' 'तुम' हँस हमदम हुए, ह्रदय हर्ष से चूर.
गाल गुलाबी हो गये, नत नयनों में नूर..
*
'मैं' में 'मैं' का मिलन ही, 'मैं'-तम करे समाप्त.
'हम'-रवि की प्रेमिल किरण, हो घर भर में व्याप्त..
७-८-२०१२
*

गिल हरबिंदर सिंह,बर्लिन दीवार,आस्था

पुरोवाक 
ये पत्थर और ढहती बर्लिन दीवार 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
भारतीय काव्याचार्यों ने काव्य को ‘दोष रहित गुण सहित रचना’ (मम्मट), ‘रमणीय अर्थ प्रतिपादक’ (जगन्नाथ), ‘लोकोत्तर आनंददाता’ (अंबिकादत्त व्यास), रसात्मक वाक्य (विश्वनाथ), सौंदर्ययुक्त रचना (भोज, अभिनव गुप्त), चारुत्वयुक्त (लोचन), अलंकार प्रधान (मेघा विरुद्र, भामह, रुद्रट), रीति प्रधान (वामन), ध्वनिप्रधान (आनंदवर्धन), औचित्यप्रधान (क्षेमेन्द्र), हेतुप्रधान (वाग्भट्ट), भावप्रधान (शारदातनय), रसमय आनंददायी वाक्य (शौद्धोदिनी), अर्थ-गुण-अलंकार सज्जित रसमय वाक्य (केशव मिश्र), आदि कहा है जबकि पश्चिमी विचारकों ने आनंद का सबल साधन (प्लेटो), ज्ञानवर्धन में सहायक (अरस्तू), प्रबल अनुभूतियों का तात्कालिक बहाव (वर्ड्सवर्थ), सुस्पष्ट संगीत (ड्राइडन) माना है।
हिंदी कवियों में केशव ने केशव ने अलंकार, श्रीपति ने रस, चिंतामणि ने रस-अलंकार-अर्थ, देव ने रस-छंद-अलंकार, सूरति मिश्र ने मनरंजन व रीति, सोमनाथ ने गुण-पिंगल-अलंकार, ठाकुर ने विद्वानों को भाना, प्रतापसाहि ने व्यंग्य-ध्वनि-अलंकार, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने चित्तवृत्तियों का चित्रण, आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हृदय मुक्तिसाधना हेतु शब्द विधान, महाकवि जयशंकर प्रसाद ने संकल्पनात्मक अनुभूति, महीयसी महादेवी वर्मा ने हृदय की भावनाएँ, सुमित्रानंदन पंत ने परिपूर्ण क्षणों की वाणी, केदारनाथ सिंह ने स्वाद को कंकरियों से बचाना, धूमिल ने शब्द-अदालत के कटघरे में खड़े निर्दोष आदमी का हलफनामा, अज्ञेय ने आदि से अंत तक शब्द कहकर कविता को परिभाषित किया है। वस्तुतः कविता कवि की अनुभूति को अभिव्यक्त कर पाठक तक पहुँचानेवाली रस व लय से युक्त ऐसी भावप्रधान रचना है जिसे सुन-पढ़ कर श्रोता-पाठक के मन में समान अनुभूति का संचार हो।

प्रस्तुत कृति लोकोपयोगी अर्थ प्रतिपादक, गुण-दोषयुक्त, मननीय, रोचक, भाव प्रधान काव्य रचना है।

काव्य हेतु:

बाबू गुलाबराय के अनुसार ‘काव्य हेतु’ काव्य रचना में सहायक साधन हैं। भामह के अनुसार शब्द, छंद, अभिधान, इतिहास कथा, लोक कथा तथा युक्ति कला काव्य साधन हैं। इंडी ने प्रतिभा, ज्ञान व अभ्यास को काव्य हेतु कहा है। वामन, जगन्नाथ व हेमचंद्र ने प्रतिभा को काव्य का बीज कहा है। रुद्रट के मत में शक्ति, व्यत्पत्ति व अभ्यास को काव्य हेतु हैं। आनंदवर्धन जन्मजात संस्कार रूपी प्रतिभा को काव्य हेतु कहते हैं। राजशेखर ने प्रतिभा के कारयित्री और भावयित्री दो प्रकार तथा 7 काव्य हेतु स्वास्थ्य, प्रतिभा, अभ्यास, भक्ति, वृत्त कथा, निपुणता, स्मृति व अनुराग माने हैं। मम्मट शक्ति, लोकशास्त्र में निपुणता और अभ्यास को काव्य हेतु कहते हैं। कुंतक, महिम भट्ट और मम्मट प्रतिभा को काव्य हेतु मानते हुए उसे शक्ति, तृतीय नेत्र व काव्य बीज कहते हैं। डॉ. नगेंद्र प्रतिभा को काव्य का मूल, ईश्वर प्रदत्त शक्ति और काव्य बीज कहते हैं।
इस काव्य रचना का हेतु मानव हित, इतिहास कथा, मुक्त छंद, वृत्त कथा, मौलिक विश्लेषण तथा अभ्यास है। कवि हरविंदर सिंह गिल की कारयित्री और भावयित्री प्रतिभा के स्वंत्र अध्यवसाय का सुफल है यह कृति।

विषय चयन:
सामान्यतः काव्य रचना में रस की उपस्थिति मानते हए कोमलकांत पदावली तथा रोचक-रसयुक्त विषय चुने जाते हैं। पत्थर और दीवार ‘एक तो करेला ऊपर से नीम चढ़ा’ की कहावत को चरितार्थ करते हैं। ऐसे नीरस विषय का चयन कर उस पर प्रबंध काव्य रचना अपेक्षाकृत दुष्कर कार्य है जिसे हरविंदर जी ने सहजता से पूर्ण किया है। पत्थर महाप्राण निराला का प्रिय पात्र रहा है।

प्रबंध काव्य तुलसीदास में देश दशा वर्णन हो या अहल्या प्रसंग, पाषाण के बिना कैसे पूर्ण होता-
17
”हनती आँखों की ज्वाला चल,
पाषाण-खण्ड रहता जल-जल,
ऋतु सभी प्रबलतर बदल-बदलकर आते;
वर्षा में पंक-प्रवाहित सरि,
है शीर्ण-काय-कारण हिम अरि;
केवल दुख देकर उदरम्भरि जन जाते।“
20
”लो चढ़ा तार-लो चढ़ा तार,
पाषाण-खण्ड ये, करो हार,
दे स्पर्श अहल्योद्धार-सार उस जग का;
अन्यथा यहाँ क्या? अन्धकार,
बन्धुर पथ, पंकिल सरि, कगार,
झरने, झाड़ी, कंटक; विहार पशु-खग का!

निराला की प्रसिद्ध रचना ‘वह तोड़ती पत्थर’ साक्षी है कि पत्थर भी मानव की व्यथा-कथा कह सकता है-
वह तोड़ती पत्थर;
देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर-
वह तोड़ती पत्थर।....
...एक क्षण के बाद वह काँपी सुघर,
ढुलक माथे से गिरे सीकर,
लीन होते कर्म में फिर ज्यों कहा-
”मैं तोड़ती पत्थर।“

मेरे काव्य संकलन ‘मीत मेरे’ में एक कविता है ‘पाषाण पूजा’ जिसमें पत्थर मानवीय संवेदनाओं का वाहक बनकर पाषाण हृदय मनुष्य के काम आता है-
ईश्वर!
पूजन तुम्हारा किया जग ने सुमन लेकर
किन्तु मैं पूजन करूँगा पत्थरों से
वही पत्थर जो कि नींवों में लगा है
सही जिसने अकथ पीड़ा, चोट अनगिन
जबकि वह कटा गया था।
मौन था यह सोचकर
दो जून रोटी पायेगा वह
कर परिश्रम काटता जो।......
.....वही पत्थर हृदय जिसका
सुकोमल है बालकों सा
काम आया उस मनुज के
हृदय है पाषाण जिसका।
सुहैल अज़ीमाबादी का दिल दोस्तों द्वारा मारे गए पत्थर से घायल है-
पत्थर तो हजारों ने मारे हैं मुझे लेकिन
जो दिल पे लगा आकर एक दोस्त ने मारा है

आम तौर पथराई आँखें, पत्थर दिल, पत्थर पड़ना जैसी अभिव्यक्तियाँ पत्थर को कटघरे में ही खड़ा करती हैं किन्तु ‘जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे कवि’। ‘पत्थर के सनम तुझे हमने मुहब्बत का खुदा जाना’ कहनेवाले शायर के सगोत्री हरविंदर जी ने बर्लिन देश को दो भागों में विभाजित करनेवाली दीवार के टूटने पर गिरते पत्थर को मानवीय संवेदनाओं से जोड़ते हुए इस काव्य कृति की रचना की। कवि हरविंदर पंजाब से हैं, विस्मय यह है कि मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति के लिए उन्होंने ‘जलियांवाला बाग़ के कुएँ का पत्थर’ न चुनकर सुदूर बर्लिन की दीवार का पत्थर चुना, शायद इसलिए कि उबर्लिनवासियों ने निरंतर विरोधकर सत्तधीशों को उस दीवार को तोड़ने के लिए विवश कर दिया। इससे एक सीख भारत उपमहाद्वीप ने निवासियों को लेना चाहिए जो भारत-पाकिस्तान और भारत-बांगलादेश के बीच काँटों की बाड़ को अधिकाधिक मजबूत किया जाता देख मौन हैं, और उसे मिटाने की बात सोच भी नहीं पा रहे।

‘कंकर-कंकर में शंकर’ और ‘कण-कण में भगवान’ देखने की विरासत समेटे भारतीय मनीषा आध्यात्म ही नहीं सर जगदीश चंद्र बसु के विज्ञान सम्मत शोध कार्यों के माध्यम से भी जानती और मानती है कि जो जड़ दिखता है उसमें भी चेतना होती है। ढहती बर्लिन दीवार के ढहते हुए पत्थरों को कवि निर्जीव नहीं चेतन मानते हुए उनमें भविष्य की श्वास-प्रश्वास अनुभव करता है।

ये पत्थर
निर्जीव नहीं है,
अपितु हैं उनमें
मानवता के आनेवाले कल की साँसें।
‘कोई पत्थर से ना मारे मेरे दीवाने को’ कहती हई व्यवस्था के विरोध में खड़ी लैला, स्वेच्छा रूपी ‘कैस’ (मजनू) को पत्थर से बचाने की गुहार हमेशा करती आई है। कवि लैला को जनता, कैस को जनमत और पत्थर को हथियार मानता है-
पत्थर निर्जीव नहीं हैं
ये जन्मदाता हैं आधुनिक हथियारों के।
आदिकाल से मानव
इन नुकीले पत्थरों से
शिकार करता था
मानव और जानवर दोनों का।
कवि पत्थर में भी दिल की धड़कनें सुना पाता है-
इनमें प्यार करनेवाले
दिलों की धड़कनें भी होती हैं।
यदि ऐसा न होता तो
ताजमहल इतना जीवंत न होता।
कठोर पत्थर ही दयानिधान, करुणावतार को मूर्तित कर प्रेरणा स्रोत बनता है-
ये प्रेरणा स्रोत भी हैं
यदि ऐसा न होता
तो चौराहों पर लगी मूर्तियाँ
या स्तंभ और स्मारक
पूज्यनीय और आराधनीय न होते।

गुफा के रूप में आदि मानव के शरणस्थली बने पत्थर, मानव सभ्यता के सबल और सदाबहार सहायक रहे हैं-
इनमें छिपे हैं अनंत उपदेश जीवन के
वर्ण गुफाएँ जो पहाड़ों के गर्भ में
समेटे होती हैं अँधेरा अपने आप में
क्योंकर सार्थक कर देतीं तपस्या को
जो उन संतों ने की थीं।

मनुष्य भाषा, भूषा, लिंग, देश, जाति ही नहीं धरती, पानी और हवा को लेकर भी एक-दूसरे को मरता रहता है किन्तु पत्थर सौहार्द, सद्भाव और सहिष्णुता की मिसाल हैं। ये न तो एक दूसरे पर हमला न करते हैं, न एक दूसरे का शिकार करते हैं-

ये तो नाचते-गाते भी हैं
यदि ऐसा न होता
तो दक्षिण के मंदिरों में बनी
ये पत्थरों की मूर्तियाँ
जीवंत भारत नाट्यम की
मुद्राएँ न होतीं
और आनेवाली पीढ़ियों के लिए
साधना का उत्तम
मंच बनकर न रह पातीं।

पत्थर सीढ़ी के रूप में मानव के उत्थान-पतन में उसका सहारा बनता है। शाला भवन की दीवार बनकर पत्थर ज्ञान का दीपक जलाता है, यही नहीं जब सगे-संबंधी भी साथ छोड़ देते तब भी पत्थर साथ निभाता है-

अंतिम समय में
न ही उसके भाई-बहन और
न ही जीवन साथी
उसका साथ देते हैं।
साथ देते हैं ये पत्थर
जो उसकी कब्र पर सजते हैं।

यहाँ उल्लेख्य है कि गोंडवाने की राजमाता दुर्गावती की शहादत के पश्चात उनकी समाधि पर श्रद्धांजलि के रूप में सफेद कंकर चढ़ाने की परंपरा है।

पत्थर ठोकर लगाकर मनुष्य को आँख खोलकर चलने की सीख और लड़खड़ाने पर सम्हलने का अवसर भी देते हैं।
यदि ऐसा न होता तो
मानव को ठोकर शब्द का
ज्ञान ही नहीं हो पाता
और ठोकर के अभाव में
कोई भी ज्ञान
अपने आप में कभी पूर्ण नहीं होता।
पत्थर अतीत की कहानी कहते हैं, कल को कल तक पहुँचाते हैं, कल से कल के बीच में संपर्क सेतु बनाते हैं-
ये इतिहास के अपनने हैं,
यदि ऐसा न होता तो
कैसे पता चल पाता
मोहनजोदड़ो और हङप्पा का।
पत्थर के बने पाँसों के कारण भारत में महाभारत हुआ-
ये चालें भी चलते हैं,
यदि ऐसा न होता
चौरस के खेल
में इन पत्थरों से बानी गोटियाँ
दो परिवारों को
जिनमें खून का रिश्ता था
कुरुक्षेत्र में घसीट
न ले जाते और
न होता जन्म
महाभारत का।
द्वार में लगकर पत्थर स्वागत और बिदाई भी करते हैं-
इन पत्थरों से बने द्वार ही
करते हैं स्वागत आनेवाले का
और देते हैं विदाई दुःख भरे दिल से
हर कनेवाले मेहमान को
पर्वत बनकर पत्थर वन प्रांतर और बर्षा का आधार बनते हैं-
यदि पत्थरों से बानी
ये पर्वत की चोटियां
बहती हवाओं के रुख को
महसूस न कर पातीं
तो धरती बरसात के अभाव में
एक रेगिस्तान बनकर रह जाती।
विद्यालय में लगकर पत्थर भविष्य को गढ़ते भी हैं-
स्कूल के प्रांगण में
विचरते बच्चों के जीवन पर
इनकी गहरी निगाह होती है
और उनके एक-एक कदम को
एक गहराई से निहारते हैं
जैसे कोई सतर्क व्यक्ति
कदमों की आहट से ही
आनेवाले कल को पढ़ लेता है।

पत्थर जीवन मूल्यों की शिक्षा भी देता है, मानव को चेताता है कि हिंसा से किसी समस्या का समाधान होता है-

इतिहास में
खून की स्याही से
आज तक कभी कोई
अपने नाम को
रौशन नहीं कर पाया
न कर पायेगा।
वह तो मानवता के लिए
बहाये पसीने से ही
स्याही को अक्षरों में
बदलता है।

यह कृति 40 कविताओं का संकलन है, जो बर्लिन को विभाजित करनेवाली ध्वस्त होती दीवार के पत्थर को केंद्र रखकर रची गयी हैं। इस तरह की दो कृतियाँ राम की शक्ति पूजा और तुलसीदास निराला जी ने रची हैं जो श्री राम तथा संत तुलसीदास को केंद्र में रची गयी हैं।

सामान्यतः किसी मानव को केंद्र में रखकर प्रबंध काव्य रचे जाते हैं किंतु कुछ कवियों ने नदी, पर्वत आदि को केंद्र में रखकर प्रबंध काव्य रचे हैं। डॉ. अनंत राम मिश्र अनंत ने नर्मदा, गंगा, यमुना, कृष्णा, कावेरी, चम्बल, सिंधु आदि नदियों पर प्रबंध काव्य रचे हैं। कप्तान हरविंदर सिंह गिल ने इसी पथ पर पग रखते हए ‘ये पत्थर और ढहती बर्लिन दीवार’ प्रबंध काव्य की रचना की है। जीवन भर देश की रक्षार्थ हाथों में हथियार थामनेवाले करों में सेवानिवृत्ति के पश्चात् कलम थामकर सामाजिक-पारिवारिक मानवीय मूल्यों की मशाल जलाकर कप्तान हरविंदर सिंह गिल ने अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है। उनकी मौलिक चिंतन वृत्ति आगामी कृतियों के प्रति उत्सुकता जगाती है। इस कृति को निश्चय ही विद्वज्जनों और सामान्य पाठकों से अच्छा प्रतिसाद मिलेगा यह विश्वास है।

संपर्क: आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’, संचालक, विश्ववाणी हिंदी संस्थान, 401 विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर - 472001, चलभाष 9425173244, ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com
***
पुरोवाक्:
'असीम आस्था' मानव और मानवता पर
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
कविता
कविता मनुष्य के हृदय को उन्नत कर, उसका उत्कृष्ट और अलौकिक पदार्थों का परिचय कराती है। कविता बहुप्रयोजनीय विधा है जो संसार की सभ्य और असभ्य सभी जातियों में आदिकाल से पाई जाती है। संसार के अनेक कृत्रिम व्यापारों में व्यस्त मनुष्य की मानुषी प्रकृति और प्रवृत्ति के संरक्षण व संवर्धन हेतु कविता रामबाण उपाय है। कविता मनुष्य को प्रकृति की और उन्मुख कर समन्वय, साहचर्यं, सद्भाव, सहकार, सहिष्णुता के बीज बोती है। काव्य- प्रेरणा से कार्य में प्रवृत्ति बढ़ जाती है। केवल लाभ-हानि का अनुमानकर मनुष्य किसी काम के करने या न करने के लिए तैयार नहीं होता किंतु हर्ष, आह्लाद, करुणा, प्रेरणा, क्रोध या द्वेष वश विचलित होकर वः काम करने या न करने के लिए प्रस्तुत होता है। कार्य प्रेरणा केवल मस्तिष्क (बुद्धि) नहीं अपितु मन (भावना) से उत्प्रेरित होती है। कार्य-प्रवृत्ति के लिए मन में आवेग - संवेग होना आवश्यक है।
सैनिक
सैनिक कर्मव्रती और कर्मवीर होता है। वह निष्काम कर्म नहीं करता। 'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचिन' सैनिक का आदर्श होकर भी नहीं होता। सैनिक कर्म करता है तो उसे परिणाम चाहिए, इसलिए उसका कर्म सकाम है किंतु उसका कर्म वैयक्तिक राग-द्वेष, हानि-लाभ से जुड़ा नहीं है, इसलिए वह अनासक्त है। प्रस्तुत कृति 'असीम आस्था' के कवि कैप्टेन हरबिंदर सिंह गिल सैन्याधिकारी रहे हैं। निरासक्त भाव से कर्मकर प्राप्त फल 'सर्वजनहिताय, सर्वजन सुखाय' अर्पित करते रहना उनका स्वभाव है। विवेच्य कृति 'असीम आस्था' तथा पूर्वकृति 'बर्लिन की दीवार' दोनों के मूल में मानव हित की भावना तथा सर्व कल्याण की कामना अंतर्निहित है। 'बर्लिन की दीवार' का कवि मानव मूल्यों के पहरेदार की तरह निष्प्राण पाषाण में अन्तर्निहित चेतना से साक्षात करते हुए विश्वइतिहास में विविध कालखंडों में घटित घटनाओं को वृहत्तर परिप्रेक्ष्य में विवेचित करते हुए पत्थर के माध्यम से गहन विमर्शकर सम्यक संदेश देता है। हरबिंदर जी का सैनिक मन कर्तव्य भाव को सर्वोपरि रखकर 'आस्था' को जीवन का उसकी रक्षार्थ विविध आयुधों की तरह काव्य रचनाओं में सत्य-शिव-सुंदर का संधान करता है। कवि की चिंता 'आष्टा' को विखंडित-कलंकित होने से बचाने की है-
कैसा समय आ गया है
शब्दों के अर्थ
इतनी तीव्र गति से
बदल रहे हैं (कि)
वाक्य तो वाक्य
पूरे का पूरा पाठ
अपना अर्थ खो रहा है।
मानव सभ्यता के विकसित और चिरजीवी होने का कारण स्वयं में, अपने चितन में, अपने प्रयासों में, अपने लक्ष्य में आस्था होना ही है। संशय आस्था का शत्रु है। 'शब्द ब्रह्म' मानव चेतना का प्रागट्य है। शब्दों के अर्थ खोने लगें तो 'वाक्य' और 'पाठ' ही नहीं 'पुस्तकें' और 'रचना कर्म भी' अर्थहीन हो जाएगा और बिना रचना कर्म के मनुष्य ही अर्थहीन हो जाएगा।
'एक शब्द मानव स्वयं है ..... मानव अपना अस्तित्व खोता जा रहा है ..... काश, मानव, मानवता की महत्ता जान ले ..... हो जाएगा उजाला ही उजाला' गागर में सागर भर दिया है कवि ने कम से कम शब्दों में।
'आस्था' मानुष को सीमातीत सामर्थ्य प्रदान करती है -
काश, मानव
इन परिधियों की सीमाएँ
आसमान के क्षितिज तक
सकता
शब्दों के अर्थ में आ जाती
सच्चाई प्रकृति की
और हो प्रसन्नचित्त
झूमने लगती
मेरी उदास माँ मानवता।
साहित्य रसानंद या सच्चिदानंद प्राप्ति का माध्यम है। साहित्य ही संकुचित हो जाए तो मानवता के सम्मुख खतरा उपस्थित हो जाता है। कवि समकालिक साहित्यिक प्रवृत्तियों में वैयक्तिक दृष्टि और हितों की प्रधानता देख कर चिंतित है-
साहित्य तोते की तरह
एक खूबसूरत पालतू
पक्षी बनकर रह गया है।
सिखाया है,
रटाया जाता है कि
क्या बोलना है?
(साहित्य) वही बोलता है
जो मालिक चाहता है।
साहित्य व्यक्तिगत हित साधन का उपक्रम मात्र बना लिया जाए तो मानवता के समक्ष नष्ट होने के खतरा बढ़ जाता है।
(साहित्य) दर्पण में आई दरार
मनुष्य के मुख पर ही नहीं
उसकी अंतरात्मा पर भी
एक प्रश्न चिन्ह छोड़ जाएगी।
प्रश्न चिन्ह किसी प्रश्न का उत्तर नहीं होता किंतु वह समय की सार्थकता को कटघरे में अवश्य खड़ा करता है। कवि भली-भाँति जानता है कि -
मानव ने आज तक
शब्दों को
अहं के गहने के रूप में
सजाया और सँवारा है
उन्हें कभी
आस्था के फूल समझ
मानवता को अर्पण नहीं किया है।
मानव मूल्यों और मानवीय आचरण का पहरुआ कवि स्पष्ट शब्दों में चेतावनी देता है-
इसलिए मानव
यह भूल न कर लेना
मानवता को ही बना मूर्ख ,
भगवान की आँखों में
कभी धूल झोंक पाएगा।
आस्था पर अडिग आस्था रखता कवि-मन जानता है कि सच्चे मन से की गई प्रार्थना निष्फल नहीं होती-
यह प्रकृति का सत्य है
प्रार्थना
कभी व्यर्थ नहीं जाती।
यह तभी होता है
जब उसके शब्द
कंठ से न निकलकर
आत्मा से निकलें।
चतुर्दिक पूजास्थलों की भरमार होने के बाद भी भगवान के भक्तों की मनोकामना पूर्ण न होने का कारण मस्तिष्क (स्वार्थ) द्वारा मन (परमार्थ) को गुलाम बना लेना है। अर्थहीन शब्दों को सजा-सँवारकर आधुनिकता कहना की चादर पहनाना मानव की बड़ी भूल है। शब्दों से खिलवाड़ का दुष्परिणाम शब्दों में अन्तर्निहित अर्थ खो जाना और कविता का शब्दकोष बनते जाना है-
कंप्यूटर के युग में
शब्द तो दूर की बात है
अक्षर भी
अपनी मौलिकता खोने लगे हैं। यह शायद इसलिए हो रहा है कि
नैतिकता और आध्यात्मिकता को
कंप्यूटर स्वीकार करने से
इंकार कर देता है।
अपने पूर्वजों की विरासत को विस्मृत करना, मानवता में आस्था न होना ही त्रासदी का कारण है।
मानवता में आस्था
एक परम आनंद की
अनुभूति देता है,
उसमें सुगंध आती है
श्रद्धा के फूलों की
क्योंकि इसी माँ की गोद में
सो रहे हैं
हमारे अपने पूर्वज।
परन्तु आज का मानव
अपनी ही संतानों के मोह में
इतना खो गया है
कि वह पूर्वज तो दूर
स्वयं को भी भूल गया है।
इतिहास साक्षी है कि महाभारत भी विरासत को विस्मृत कर संतानों के प्रति अंधमोह का हो दुष्परिणाम था। मुझे स्मरण है कि पूज्या बुआश्री महीयसी महादेवी वर्मा ने अपने एक पत्र में मुझे लिखा था- ....महाभारतकार का यह वाक्य सदा स्मरण रखना 'नहि मान्युषात् श्रेष्ठतरं हि किंचित्', मनुष्य से श्रेष्ठ और कुछ नहीं होता। जब मनुष्य को हीन समझ लिया जाता है तब न मनुष्य बचता है, न धन-संपदा।कवि जानता है कि आस्था कपोल कल्पना नहीं यथार्थ है -
मानवता में आस्था
सिर्फ कविता रूपी
कोरी कल्पना नहीं है
अपितु
यथार्थ है
हर एक प्राणी का
जो लेता है श्वास। *
कवि आस्था के प्रति आस्था न होने का कारण यांत्रिकीकरण को मानता है। वह कहता है-
यह इसलिए हो रहा है
मानव के मस्तिष्क में
चिन्तन की जगह
फार्मूलों ने ले ली है
और कारखानों से
बनकर निकल रहे हैं
बरबादी के समीकरण ....
.... परंतु चिंतन
बरबादी के ऐसे समीकरणों को
कतई स्वीकारेगा नहीं
क्योंकि उसकी आस्था
हमेशा
मानवीय गहनता में होती है
न कि मानव के
उथले विचारों में।
शायद इसलिए ही
कबीर जुलाहा होते हुए भी
सबसे (अधिक) धनाढ्य था, है और रहेगा।
आचार्य चतुरसेन और अन्य कई साहित्यकारों चिंतकों ने 'राष्ट्र' की अवधारणा को सर्वाधिक मानव वध काकारण कहा है। कैप्टेन हरबिंदर सिंह सैन्याधिकारी रह चुके हैं, वे पूरी गंभीरता और ईमानदारी से पूछते हैं-
क्या मातृभूमि के नाम पर ये नयी सीमाएँ
समाज की एक ऐसी जरूरत हैं
जिनके बिना
मानव जी नहीं सकता?....
.... चारों तरफ जंगली घास की तरह
फ़ैल रही हैं देशों की नयी सीमाएँ।
यह शर्म की बात है
विज्ञान के इस युग में
इस जंगली घास को
मानव ख़त्म नहीं कर सका है।
कवि को अपनी मानस सृष्टि का ब्रह्मा ठीक ही कहा गया है। वह गतागत और वर्तमान तीनों में एक ही क्षण में जीते हुए उन्हें अपनी मानस सृष्टि में निबद्ध कर सकता है। इसीलिये कहा जाता है 'जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे कवि'। मानवीय आस्था का उपहास सिर्फ 'राष्ट्र' की अवधारणा ने नहीं किया है, धर्म (पंथ, मजहब, रिलीजन) भी बराबरी का भागीदार है इस गुनाह में। आस्था का केंद्र होते हुए भी हर धर्म ने अन्य धर्मों से न केवल असहमति रखी, उनके अनुयायियों का उपहास उड़ाया, कत्लेआम किया। धर्म के चंगुल में फँसकर मनुष्य मानवता ही भूल गया। 'अयमात्मा ब्रह्म', 'शिवोहं', 'अहं ब्रह्मास्मि' कहनेवाला विश्व का सर्वाधिक उदार धर्म भी 'त्वयमात्मा ब्रह्म' या 'सर्वात्मा ब्रह्म' नहीं कहता। कवि हरबिंदर के शब्दों में -
उसने अपनी पहचान को
धर्म के चिह्नों तक
कर सीमित
अपनी स्वयं की पहचान को
कर दिया है खत्म।
'वैश्विक नीड़म्' कहनेवाला देश भी सीमा पर आवाजाही को रोकता सीमा विस्तार के लिए युद्ध करता है। आदमी की पहचान इंसान के नाते न होकर हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई के नाते होती है। कवि कहता है-
कितना अच्छा होता
धार्मिक पहचान के साथ-साथ
वो मानवता को भी
पहचानने की करता कोशिश
और देख सकता
कितनी खूबसूरत है दुनिया।
सीमा सिर्फ देशों के बीच नहीं होती। मनुष्य खुद को नित नयी-नयी सीमाओं में कैद करता रहता है-
विभिन्न वर्गों में बँटा समाज
क्या कभी तोड़ पाएगा ये सीमाएँ?"
सैनिक से अधिक खून की होली और कौन खेल सकता है? कैप्टेन गिल अंतर्मन से अनुभव करते हैं कि अब सरहदों पर खुनी खेल बंद होना चाहिए, माँओं का आँचल खली न हो, पत्नियों की मांगों का सिंदूर न उजड़े। कवि गिल कहता है-
बहुत हो गई
ये खून की होली
कभी देश के प्रसार के लिए
तो कभी
अपने ही देश में
नयी सीमाओं की उत्पत्ति के लिए
*
बहुत हो गई
ये आँखमिचौली
जो मानव
मानवता के साथ
खेल रहा है।
देश के अंदर भी सड़कों पर खून की होली खेलने का चलन दिन-ब-दिन बढ़ता जाता है। कवि इस दरिंदगी को भी समाप्त होते देखना चाहता है-
कहते हैं
जब बरबादी के दिन
भाग्य में लिखे हों
महलों रहनेवाले
सड़कों पर
आ जाया करते हैं
और राज जाते हैं
फुटपाथ, बन बसेरा
*
परंतु मानव भूल रहा है
सड़क कभी भी
मंज़िल नहीं हो सकती
वह तो माध्यम है
ध्येय प्राप्ति का।
आस्था की नीलामी, भाँति-भाँति के विभाजन, संघर्ष और ज़िन्दगियों का समापन, इस सबके बाद भी कवि निराश नहीं है। वह जानता है अमावसी अँधेरे के बाद उजयारी भोर और पूनम की रात भी होती है। कवी बच्चों को भावी विश्व का निर्माता मानते हुए बच्चों के साथ सपनों की दुनिया में नवाशा की किरण देखन चाहता है-
इसलिए क्यों न
सपनों की दुनिया में
जिया जाए
जहाँ बच्चे
देख सकें आशा की किरण।
*
बच्चों! प्यार के गीत गाओ
और मनुष्य से
साथ में गाने के लिए कहो
मानवता कोई वस्तु नहीं है
*
'असीम आस्था' अपराजित है। आस्था को केंद्र में रची गयी वे विविध कविताएँ एक लंबी कविता के रूप में भी पठनीय हैं और स्वतंत्र रचनाओं के रूप में भी। हिंदी में लंबी कविता का इतिहास नया नहीं है, भले उसे पारिभाषिक अभिधा मुक्तिबोध की लंबी कविताओं से प्राप्त हुई हो । पुराने कवियों को छोड़ दें, तो लंबी कविता द्विवेदी-युग के कवियों से लेकर समवर्ती युग के कवियों तक ने लिखी है। लंबी कविता का संबंध निश्चय ही केवल आकार से न होकर प्रकार से भी है। महाकवि निराला कृत 'सरोज-स्मृति' के चित्रों को यदि स्मृति का सूत्र गुंफित करता है, तो 'राम की शक्ति-पूजा' कथा के सहारे आगे बढ़ती है । मुक्तिबोध रचित 'ब्रह्मराक्षस' और 'अँधेरे में' दोनों ही फैंटास्टिक कविताएँ हैं, लेकिन एक की फैंटेसी जहाँ एक अखंड रूपक के रूप में है, वहाँ दूसरी की फैंटेसी एक पूरी चित्रशाला है।
आज के युग की जटिलता की अभिव्‍यक्ति के लिए परंपरागत प्रबंधात्‍मकता उपयुक्‍त नहीं है। व्यापक अनुभवों को वृहद फलक पर प्रस्तुत करने के लिए ही लंबी कविता का जन्म हुआ है। समकालीन बोध एवं यथार्थ के प्रति अतिरिक्त रुझान, समाजेतिहासिक स्थितियों की गहरी समझ के परिणामस्वरूप लंबी कविता का जन्‍म हुआ। लगभग ऐसी ही परिवर्तनकारी सामाजिक स्थितियों के अधीन अंग्रेजी के विख्यात कवि विलियम वर्ड्सवर्थ के समय लंबी कविता प्रभावी रूप से अंग्रेजी साहित्य में उपस्थित हुई। भारत में आधुनिकता के आगमन के साथ स्वार्थबद्ध, जनविरोधी, राजनीतिक प्रदीर्घ नीतियों, कार्यवाहियों के कारण जीवन के सभी क्षेत्रों में अनैतिकता का बोलबाला बढ़ा। इसी से उपजी निराशा, कुंठा, हताशा के बड़े लंबे मानवीय संघर्ष के समानांतर लंबी कविता के उद्भव एवं विकास की पृष्ठ भूमि बनी। बिहार के इंजी। केदारनाथ ने 'प्रेम' को केंद्र में रखकर लंबी कविता लिखी है। कैप्टेन हरबिंदर सिंह गिल ने 'बर्लिन की दीवार' में दीवार के पत्थर तथा 'असीम आस्था में' मानवीय आस्था को केंद्र में रखकर माला के मानकों की तरह छोटी रचनाओं को कथ्य के धागे में पिरोकर लंबी काव्य माल बनाई है।
यह कृति लीक से हटकर रची गयी है। यथार्थ और आदर्श के मध्य झूलती कृति का कथ्य, अमिधा में कही गयी रचनाएँ। सहज-सरल प्रवाहमयी भाषा, प्रचलित बिम्ब-प्रतीकों, स्पष्ट कथ्य तथा मर्म को स्पर्श करने की सामर्थ्य के लिए याद की जाएगी।
६-११-२०२०
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संपर्क: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', संयोजक विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, चलभाष ९४२५१८३२४४, ईमेल salil.sanjiv@gmail.com