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गुरुवार, 2 जुलाई 2026

जुलाई २, सॉनेट, दोहा, ग़जलिका, ग्रंथि, ​सवाई, छंद, चित्रगुप्त, कायस्थ, पोयम, प्रेम, गीत,



सलिल सृजन जुलाई २


अजब गजब

:मुंबइया हिंदी:


बनाना है केला

अविवाहित अकेला

श्रांत-क्लात थकेला

मन ऊबा तो पकेला

जो फँस गया अटकेला

आपे से बाहर सटकेला

उलझ गया सो लटकेला

राह भुलाई भटकेला

परलोक गया टपकेला

पानी न बरसा सुखेला

आँख से ओझल छुपेला

गड़बड़झाला झमेला

चढ़ा के आया पियेला

घर आया आरेला

बाहर जाए जारेला

बिना डकारे खायेला

अच्छा लगता भाएला

बिना काम का फिकेला

दाम लगा तो बिकेला

बार-बार जो दिखेला



वो सब इधरिच टिकेला

०००
सॉनेट
बहुत हुआ अब भर गया मन माया से यार
आभासी संसार से लेता हूँ विश्राम
खटिया कर दूँगा खड़ी सुनें विधाता वाम
खोलूँ लेखा दैव का वे भी हों बेजार।
लाइक अधिकाधिक मिलें, कोशिश करें हजार
भक्तों को वरदान दें दिवस-रात बेदाम
दौड़-भाग कर बनाएँ, सबके बिगड़े काम
जन को दें पैगाम कर, मन की
बात हजार।
लोकतंत्र में लोक को बतलाएँ भगवान
पेंशन-भत्ते बढ़ाएँ नेता अपने रोज
टैक्स बढ़ा अनुदान दे, मत पाने सरकार।
श्रमिक करें बेगार हो, अफसर का गुणगान
धनपति की पूँजी बढ़े, अरबों क्यों हो खोज?
गाँवों की चौपाल भी बने राज दरबार।।
२.७.२०२५
०0०
छंद चर्चा:
दोहा गोष्ठी:
*
सूर्य-कांता कह रही, जग!; उठ कर कुछ काम।
चंद्र-कांता हँस कहे, चल कर लें विश्राम।।
*
सूर्य-कांता भोर आ, करती ध्यान अडोल।
चंद्र-कांता साँझ सँग, हँस देती रस घोल।।
*
सूर्य-कांता गा रही, गौरैया सँग गीत।
चंद्र-कांता के हुए, जगमग तारे मीत।।
*
सूर्य-कांता खिलखिला, हँसी सूर्य-मुख लाल।
पवनपुत्र लग रहे हो, किसने मला गुलाल।।
*
चंद्र-कांता मुस्कुरा, रही चाँद पर रीझ।
पिता गगन को देखकर, चाँद सँकुचता खीझ।।
*
सूर्य-कांता मुग्ध हो, देखे अपना रूप।
सलिल-धार दर्पण हुई, सलिल हो गया भूप।।
*
चंद्र-कांता खेलती, सलिल-लहरियों संग।
मन मसोसता चाँद है, देख कुशलता दंग।।
*
सूर्य-कांता ने दिया, जग को कर्म सँदेश।
चंद्र-कांता से मिला, 'शांत रहो' निर्देश।।
२-७-२०१८
टीप: उक्त द्विपदियाँ दोहा हैं या नहीं?, अगर दोहा नहीं क्या यह नया छंद है?
मात्रा गणना के अनुसार प्रथम चरण में १२ मात्राएँ है किन्तु पढ़ने पर लय-भंग नहीं है। वाचिक छंद परंपरा में ऐसे छंद दोषयुक्त नहीं कहे जाते, चूँकि वाचन करते हुए समय-साम्य स्थापित कर लिया जाता है।
कथ्य के पश्चात ध्वनिखंड, लय, मात्रा व वर्ण में से किसे कितना महत्व मिले? आपके मत की प्रतीक्षा है।
***
मुक्तिका
*
उन्नीस मात्रिक महापौराणिक जातीय ग्रंथि छंद
मापनी: २१२२ २१२२ २१२
*
खौलती खामोशियों कुछ तो कहो
होश खोते होश सी चुप क्यों रहो?
*
स्वप्न देखो तो करो साकार भी
राह की बढ़ा नहीं चुप हो सहो
*
हौसलों के सौं नहीं मन मारना
हौसले सौ-सौ जियो, मत खो-ढहो
*
बैठ आधी रात संसद जागती
चैन की लो नींद, कल कहना अहो!
*
आ गया जी एस टी, अब देश में
साथ दो या दोष दो, चुप तो न हो
***
चिंतन और चर्चा-
चित्रगुप्त और कायस्थ
*
चित्रगुप्त अर्थात वह शक्ति जिसका चित्र गुप्त (अनुपलब्ध) है अर्थात नहीं है। चित्र बनाया जाता है आकार से, आकार काया (बॉडी) का होता है। काया बनती और नष्ट होती है। काया बनानेवाला, उसका उपयोग करनेवाला और उसे नष्ट करनेवाला कोई अन्य होता है। काया नश्वर होती है। काया का आकार (शेप) होता है जिसे मापा, नापा या तौला जा सकता है। काया का चित्र गुप्त नहीं प्रगट या दृश्य होता है। चित्रगुप्त का आकार तथा परिमाप नहीं है। स्पष्ट है कि चित्रगुप्त वह आदिशक्ति है जिसका आकार (शेप) नहीं है अर्थात जो निराकार है. आकार न होने से परिमाप (साइज़) भी नहीं हो सकता, जो किसी सीमा में नहीं बँधता वही असीम होता है और मापा नहीं जा सकता।आकार के बनने और मिटने की तिथि और स्थान, निर्माता तथा नाशक होते हैं। चित्रगुप्त निराकार अर्थात अनादि, अनंत, अक्षर, अजर, अमर, असीम, अजन्मा, अमरणा हैं। ये लक्षण परब्रम्ह के कहे गए हैं। चित्रगुप्त ही परब्रम्ह हैं।
.
"चित्रगुप्त प्रणम्यादौ वात्मानं सर्वदेहिनां" उन चित्रगुप्त को सबसे पहले प्रणाम जो सब देहधारियों में आत्मा के रूप में विराजमान हैं। 'आत्मा सो परमात्मा' अत: चित्रगुप्त ही परमात्मा हैं। इसलिए चित्रगुप्त की कोई मूर्ति, कथा, कहानी, व्रत, उपवास, मंदिर आदि आदिकाल से ३०० वर्ष पूर्व तक नहीं बनाये गए जबकि उनके उपासक समर्थ शासक-प्रशासक थे। जब-जिस रूप में किसी दैवीय शक्ति की पूजा, उपासना, व्रत, कथा आदि हुई वह परोक्षत: चित्रगुप्त जी की ही हुई क्योंकि उनमें चित्रगुप्त जी की ही शक्ति अन्तर्निहित थी। विदेशी आक्रान्ताओं द्वारा भारतीय शिक्षा संस्थानों को नष्ट करने और विद्वानों की हत्या के फलस्वरूप यह अद्वैत चिन्तन नष्ट होने लगा और अवतारवाद की संकल्पना हुई। इससे तात्कालिक रूप से भक्ति के आवरण में पीड़ित जन को सान्तवना मिली किन्तु पुष्ट वैचारिक आधार विस्मृत हुआ।अन्य मतावलंबियों का अनुकरण कर निराकार चित्रगुप्त की भी साकार कल्पना कर मूर्तियाँ और मंदिर बांये गए। वर्तमान में उपलब्ध सभी मूर्तियाँ और मंदिर मुग़ल काल और उसके बाद के हैं जबकि कायस्थों का उल्लेख वैदिक काल से है।
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"कायास्थित: स: कायस्थ:' अर्थात जब वह (परब्रम्ह) किसी काया में स्थित होता है तो उसे कायस्थ कहते हैं" तदनुसार सकल सृष्टि और उसका कण-कण कायस्थ है। मनुष्य ही नहीं, पशु-पक्षी, वनस्पतियाँ और अदृश्य जीव-जंतु भी कायस्थ है। व्यावहारिक दृष्टि से इस अवधारणा को स्वीकारकर जीनेवाला ही 'कायस्थ' है। तदनुसार कायस्थवाद मानवतावाद और वैशिवाकता से बहुत आगे सृष्टिवाद है। 'वसुधैव कुटुम्बकम', 'विश्वेनीडम', 'ग्लोबलाइजेशन', वैश्वीकरण आदि अवधारणायें कायस्थवाद का अंशमात्र है। अपने उदात्त रूप में 'कायस्थ' विश्व मानव है।
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देवता: वेदों में ३३ प्रकार के देवता (१२ आदित्य, १८ रूद्र, ८ वसु, १ इंद्र, और प्रजापति) ही नहीं श्री देवी, उषा, गायत्री आदि अन्य अनेक और भी अन्य पूज्य शक्तियाँ वर्णित हैं। मूलत: प्राकृतिक शक्तियों को दैवीय (मनुष्य के वश में न होने के कारण) देवता माना गया। इनके अमूर्त होने के कारण इनकी शक्तियों के स्वामी की कल्पना कर वरुण आदि देवों और देवों के राजा की कल्पना हुई। अमूर्त को मूर्त रूप देने के साथ मनुष्य आकृति और मनुष्य के गुणावगुण उनमें आरोपित कर अनेक कल्पित कथाएँ प्रचलित हुईं।प्रवचनकर्ताओं की इं कल्पित कथाओं ने यजमानों को संतोष और कथा वाचक को उदार पोषण का साधन तो दिया किन्तु धर्म की वैज्ञानिकता और प्रमाणिकता को नष्ट भी किया।
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आत्मा सो परमात्मा, अयमात्मा ब्रम्ह, कंकर सो शंकर, कंकर-कंकर में शंकर, शिवोहं, अहम ब्रम्हास्मि जैसी उक्तियाँ तो हर कण को ईश्वर कहती हैं। आचार्य रजनीश ने खुद को 'ओशो' कहा और आपत्तिकर्ताओं को उत्तर दिया कि तुम भी 'ओशो' हो अंतर यह है कि मैं जानता हूँ कि मैं 'ओशो' हूँ, तुम नहीं जानते। हर व्यक्ति अपने वास्वतिक दिव्य रूप को जानकार 'ओशो' हो सकता है।
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रामायण महाभारत ही नहीं अन्य वेद, पुराण, उपनिषद, आगम, निगम, ब्राम्हण ग्रन्थ आदि भी न केवल इतिहास हैं, न आख्यान या गल्प। भारत में सृजन दार्शनिक चिंतन पर आधारित रहा है। ग्रंथों में पश्चिम की तरह व्यक्तिपरकता नहीं है, यहाँ मूल्यात्मक चिंतन प्रमुख है। दृष्टान्तों या कथाओं का प्रयोग किसी चिंतनधारा को आम लोगों तक प्रत्यक्ष या परोक्षतः पहुँचाने के लिए किया गया है। अतः, सभी ग्रंथों में इतिहास, आख्यान, दर्शन और अन्य शाखाओं का मिश्रण है।
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देवताओं को विविध आधारों पर वर्गीकृत किया जा सकता है। यथा: जन्मा - अजन्मा, आर्य - अनार्य, वैदिक, पौराणिक, औपनिषदिक, सतयुगीन - त्रेतायुगीन - द्वापरयुगीन कलियुगीन, पुरुष देवता- स्त्री देवता, सामान्य मनुष्य की तरह - मानवेतर, पशुरूपी-मनुष्यरूपी आदि।यह भी सत्य है की देवता और दानव, सुर और असुर कहीं सहोदर और कहीं सहोदर न होने पर भी बंधु-बांधव हैं। सर्व सामान्य के लिए शुभकारक हुए तो देव, अशुभकारक हुए तो दानव। शुभ और अशुभ दोनों ही कर्म हैं। कर्म है तो उसका फल और फलदाता भी होगा ही। सकल प्राकृतिक शक्तियों, उनके स्वामियों और स्वामियों के विरोधियों के साथ-साथ जनसामान्य और प्राणिमात्र के कर्मों के फल का निर्धारण वही कर सकता है जिसने उन्हें उत्पन्न किया हो। इसलिए चित्रगुप्त ही कर्मफल दाता या पाप-पुण्य नियामक है।
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फल देनेवाले या सर्वोच्च निर्णायक को निष्पक्ष भी होना होगा। वह अपने आराधकों के दुर्गुण क्षमा करे और अन्यों के सद्गुणों को भुला दे, यह न तो उचित है, न संभव। इसलिए उसे सकल पूजा-पाठ, व्रत-त्यौहार, कथा-वार्ता, यज्ञ-हवन आदि मानवीय उपासनापद्धतियों से ऊपर और अलग रखना ही उचित है। ये सब मनुष्य के करती हैं जिन्हें मनुष्येतर जीव नहीं कर सकते। मनुष्य और मनुष्येतर जीवों के कर्म के प्रति निष्पक्ष रहकर फल निर्धारण तभी संभव है जब निर्णायक इन सबसे दूर हो। चित्र गुप्त को इसीलिए कर्म काण्ड से नहीं जोड़ा गया। कालांतर में अन्यों की नकल कर और अपने वास्विक रूप को भूलकर भले ही कायस्थ इस ओर प्रवृत्त हुए।
२-७-२०१७
***
एक रचना
*
येन-केन जीते चुनाव हम
बनी हमारी अब सरकार
कोई न रोके, कोई न टोके
करना हमको बंटाढार
*
हम भाषा के मालिक, कर सम्मेलन ताली बजवाएँ
टाँगें चित्र मगर रचनाकारों को बाहर करवाएँ
है साहित्य न हमको प्यारा, भाषा के हम ठेकेदार
भाषा करे विरोध न किंचित, छीने अंक बिना आधार
अंग्रेजी के अंक थोपकर, हिंदी पर हम करें प्रहार
भेज भाड़ में उन्हें, आज जो हैं हिंदी के रचनाकार
लिखो प्रशंसा मात्र हमारी
जो, हम उसके पैरोकार
कोई न रोके, कोई न टोके
करना हमको बंटाढार
*
जो आलोचक उनकी कलमें तोड़, नष्ट कर रचनाएँ
हम प्रशासनिक अफसर से, साहित्य नया ही लिखवाएँ
अब तक तुमने की मनमानी, आई हमारी बारी है
तुमसे ज्यादा बदतर हों हम, की पूरी तैयारी है
सचिवालय में भाषा गढ़ने, बैठा हर अधिकारी है
छुटभैया नेता बन बैठा, भाषा का व्यापारी है
हमें नहीं साहित्य चाहिए,
नहीं असहमति है स्वीकार
कोई न रोके, कोई न टोके
करना हमको बंटाढार
२-७-२०१६
***
नवगीत:
*
आँख की किरकिरी
बने रहना
*
चैन तुम बिन?
नहीं गवारा है.
दर्द जो भी मिले
मुझे सहना
आँख की किरकिरी
बने रहना
*
रात-दिन बिन
रुके पुकारा है
याद की चादरें
रुचा तहना
आँख की किरकिरी
बने रहना
*
मुस्कुरा दो कि
कल हमारा है
आसुँओं का न
पहनना गहना
आँख की किरकिरी
बने रहना
*
हर कहीं तुझे
ही निहारा है
ढाई आखर ही
तुझसे है कहना
आँख की किरकिरी
बने रहना
*
दिल ने दिल को
सतत गुहारा है
बूँद बन 'सलिल'
संग ही बहना
आँख की किरकिरी
बने रहना
***
मुक्तिका:
*
हाथ माटी में सनाया मैंने
ये दिया तब ही बनाया मैंने
खुद से खुद को न मिलाया मैंने
या खुदा तुझको भुलाया मैंने
बिदा बहनों को कर दिया लेकिन
किया उनको ना पराया मैंने
वक़्त ने लाखों दिये ज़ख्म मगर
नहीं बेकस को सताया मैंने
छू सकूँ आसमां को इस खातिर
मन को फौलाद बनाया मैंने
***
कविता-प्रतिकविता
* रामराज फ़ौज़दार 'फौजी'
जाने नहिं पीर न अधीरता को मान करे
अइसी बे-पीर से लगन लगि अपनी
अपने ही चाव में, मगन मन निशि-दिनि
तनिक न सुध करे दूसरे की कामिनी
कठिन मिताई के सताये गये 'फौजी' भाई
समय न जाने, गाँठे रोब बड़े मानिनी
जीत बने न बने मरत कहैं भी कहा
जाने कौन जन्मों की भाँज रही दुश्मनी
*
संजीव
राम राज सा, न फौजदार वन भेज सके
काम-काज छोड़ के नचाये नाच भामिनि
कामिनी न कोई आँखों में समा सके कभी
इसीलिये घूम-घूम घेरे गजगामिनी
माननी हो कामिनी तो फ़ौजी कर जोड़े रहें
रूठ जाए 'मावस हो, पूनम की यामिनी
जामिनि न कोई मिले कैद सात जनमों की
दे के, धमका रही है बेलन से नामनी
(जामनी = जमानत लेनेवाला, नामनी = नामवाला, कीर्तिवान)
२-७-२०१५
***
छंद सलिला:
​सवाई /समान छंद
संजीव
*
छंद-लक्षण: जाति लाक्षणिक, प्रति चरण मात्रा ३२ मात्रा, यति १६-१६, पदांत गुरु लघु लघु ।
लक्षण छंद:
हर चरण समान रख सवाई / झूम झूमकर रहा मोह मन
गुरु लघु लघु ले पदांत, यति / सोलह सोलह रख, मस्त मगन
उदाहरण:
१. राय प्रवीण सुनारी विदुषी / चंपकवर्णी तन-मन भावन
वाक् कूक सी, केश मेघवत / नैना मानसरोवर पावन
सुता शारदा की अनुपम वह / नृत्य-गान, शत छंद विशारद
सदाचार की प्रतिमा नर्तन / करे लगे हर्षाया सावन
२. केशवदास काव्य गुरु पूजित,/ नीति धर्म व्यवहार कलानिधि
रामलला-नटराज पुजारी / लोकपूज्य नृप-मान्य सभी विधि
भाषा-पिंगल शास्त्र निपुण वे / इंद्रजीत नृप के उद्धारक
दिल्लीपति के कपटजाल के / भंजक- त्वरित बुद्धि के साधक
३. दिल्लीपति आदेश: 'प्रवीणा भेजो' नृप करते मन मंथन
प्रेयसि भेजें तो दिल टूटे / अगर न भेजें_ रण, सुख भंजन
देश बचाने गये प्रवीणा /-केशव संग करो प्रभु रक्षण
'बारी कुत्ता काग मात्र ही / करें और का जूठा भक्षण
कहा प्रवीणा ने लज्जा से / शीश झुका खिसयाया था नृप
छिपा रहे मुख हँस दरबारी / दे उपहार पठाया वापि
२-७-२०१३
***
दोस्त / FRIEND
दोस्त
POEM : FRIEND
You came into my life as an unwelcome face,
Not ever knowing our friendship, I would one day embrace.
As I wonder through my thoughts and memories of you,
It brings many big smiles and laughter so true.
I love the special bond that we beautifully share,
I love the way you show you really care,
Our friendship means the absolute world to me,
I only hope this is something I can make you see.
Thankyou for opening your mind and your souls,
I wiee do all I can to help heal your hearts little holes.
Remember, your secrects are forever safe within me,
I will keep them under the tightest lock and key.
Thankyou for trusting me right from the start.
You truely have got a wonderful heart.
I am now so happy I felt that embrace.
For now I see the beauty of my best friend's face...
*********************
***
SMILE ALWAYS
Inside the strength is the laughter.
Inside the strength is the game.
Inside the strength is the freedom.
The one who knows his strength knows the paradise.
All which appears over your strengths is not necessarily Impossible,
but all which is possible for the human cannot be over your strengths.
Know how to smile :
What a strength of reassurance,
Strength of sweetness, peace,
Strength of brilliance !
May the wings of the butterfly kiss the sun
and find your shoulder to light on...
to bring you luck
happiness and cheers
smile always
२-७-२०१२
***
-: ग़जलिका :-
सूरज - १
*
उषा को नित्य पछियाता है सूरज.
न आती हाथ गरमाता है सूरज..
धरा समझा रही- 'मन शांत करले'
सखी संध्या से बतियाता है सूरज..
पवन उपहास करता, दिखा ठेंगा.
न चिढ़ता, मौन बढ़ जाता है सूरज..
अरूपा का लुभाता रूप- छलना.
सखी संध्या पे मर जाता है सूरज..
भटककर सच समझ आता है आखिर.
निशा को चाह घर लाता है सूरज..
नहीं है 'सूर', नाता नहीं 'रज' से
कभी क्या मन भी बहलाता है सूरज?.
करे निष्काम निश-दिन काम अपना.
'सलिल' तब मान-यश पाता है सूरज..
*
सूरज - २
चमकता है या चमकाता है सूरज?
बहुत पूछा न बतलाता है सूरज..
तिमिर छिप रो रहा दीपक के नीचे.
कहे- 'तन्नक नहीं भाता है सूरज'..
सप्त अश्वों की वल्गाएँ सम्हाले
कभी क्या क्लांत हो जाता है सूरज?
समय-कुसमय सभी को भोगना है.
गहन में श्याम पड़ जाता है सूरज..
न थक-चुक, रुक रहा, ना हार माने,
डूब फिर-फिर निकल आता है सूरज..
लुटाता तेज ले चंदा चमकता.
नया जीवन 'सलिल' पाता है सूरज..
'सलिल'-भुजपाश में विश्राम पाता.
बिम्ब-प्रतिबिम्ब मुस्काता है सूरज..
*
सूरज - ३
शांत शिशु सा नजर आता है सूरज.
सुबह सचमुच बहुत भाता है सूरज..
भरे किलकारियाँ बचपन में जी भर.
मचलता, मान भी जाता है सूरज..
किशोरों सा लजाता-झेंपता है.
गुनगुना गीत शरमाता है सूरज..
युवा सपने न कह, खुद से छिपाता.
कुलाचें भरता, मस्ताता है सूरज..
प्रौढ़ बोझा उठाये गृहस्थी का.
देख मँहगाई डर जाता है सूरज..
चांदनी जवां बेटी के लिये वर
खोजता है, बुढ़ा जाता है सूरज..
न पलभर चैन पाता ज़िंदगी में.
'सलिल' गुमसुम ही मर जाता है सूरज..
२-७-२०११
***
गीत:
प्रेम कविता...
*
प्रेम कविता कब कलम से
कभी कोई लिख सका है?
*
प्रेम कविता को लिखा जाता नहीं है.
प्रेम होता है किया जाता नहीं है..
जन्मते ही सुत जननि से प्रेम करता-
कहो क्या यह प्रेम का नाता नहीं है?.
कृष्ण ने जो यशोदा के साथ पाला
प्रेम की पोथी का उद्गाता वही है.
सिर्फ दैहिक मिलन को जो प्रेम कहते
प्रेममय गोपाल भी
क्या दिख सका है?
प्रेम कविता कब कलम से
कभी कोई लिख सका है?
*
प्रेम से हो क्षेम?, आवश्यक नहीं है.
प्रेम में हो त्याग, अंतिम सच यही है..
भगत ने, आजाद ने जो प्रेम पाला.
ज़िंदगी कुर्बान की, देकर उजाला.
कहो मीरां की करोगे याद क्या तुम
प्रेम में हो मस्त पीती गरल-प्याला.
और वह राधा सुमिरती श्याम को जो
प्रेम क्या उसका कभी
कुछ चुक सका है?
प्रेम कविता कब कलम से
कभी कोई लिख सका है?
*
अपर्णा के प्रेम को तुम जान पाये?
सिया के प्रिय-क्षेम को अनुमान पाये?
नर्मदा ने प्रेम-वश मेकल तजा था-
प्रेम कैकेयी का कुछ पहचान पाये?.
पद्मिनी ने प्रेम-हित जौहर वरा था.
शत्रुओं ने भी वहाँ थे सिर झुकाए.
प्रेम टूटी कलम का मोहताज क्यों हो?
प्रेम कब रोके किसी के
रुक सका है?
प्रेम कविता कब कलम से
कभी कोई लिख सका है?
२-७-२०१०
*

बुधवार, 1 जुलाई 2026

जुलाई १, लघुकथा, ग़ज़लिका, घनाक्षरी, त्रिभंगी, अचल धृति, सवाई छंद, सॉनेट, बिधान चंद्र रॉय

सलिल सृजन १ जुलाई
*
ग़ज़लिका ० आप क्या आए बहारें आ गईं बाग को कलियाँ हसीं महका गईं . तितलियों ने की तरक्की इस तरह बागबां को भ्रमर से मरवा गईं . भक्त ने भगवान को ही ठग लिया अप्सराएँ तपस्या तुड़वा गईं . चाकलेटी सियासत पर जो फिदा उन्हें उनकी दिलरुबा तरसा गईं . रोज लड़ते, गले मिल कन्फ्यूज हैं रॉकेटों को मिसाइल बतला गईं . नहीं जो करते सही, जोकर वही ट्रंप को गलतियाँ सच समझा गईं . बाड़ करने हिफ़ाज़त रक्खी गई मेंड़ को आँखें बचाकर खा गईं १.७.२०२६ ०००
हर साल १ जुलाई को पूरा भारत नेशनल डॉक्टर्स डे मनाता है। इस तारीख के पीछे खड़े हैं एक ऐसे व्यक्तित्व, जिन्होंने केवल मरीजों की जान ही नहीं बचाई, बल्कि एक बिखरे हुए राज्य को फिर से खड़ा किया, शहर बसाए, अस्पताल बनाए, शिक्षा को नई दिशा दी और देश के सबसे बड़े नेताओं का विश्वास जीता। यह कहानी है डॉ. बिधान चंद्र रॉय की, जिनके जीवन का सबसे बड़ा संयोग यह है कि १ जुलाई १८८२ को उनका जन्म हुआ और ठीक ८० वर्ष बाद १ जुलाई १९६२ को उन्होंने इसी दिन अंतिम सांस भी ली। उनका जीवन सेवा, समर्पण और कर्तव्य का सबसे बड़ा प्रतीक बन गया।

साधारण परिवार का असाधारण बेटा 

डॉ. बिधान चंद्र रॉय का जन्म बिहार की राजधानी पटना के बांकीपुर में एक बंगाली परिवार में हुआ। उनके पिता प्रकाश चंद्र रॉय सरकारी सेवा में एक्साइज इंस्पेक्टर थे, जबकि उनकी मां अघोरकामिनी देवी समाज सेवा के लिए जानी जाती थीं। परिवार ब्रह्म समाज की विचारधारा से प्रभावित था, जहां शिक्षा, सेवा और नैतिकता को सबसे बड़ा धर्म माना जाता था। बचपन से ही घर का वातावरण ऐसा था कि दूसरों के लिए कुछ करना ही जीवन का उद्देश्य बन गया। यही संस्कार आगे चलकर उन्हें केवल एक सफल डॉक्टर नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माता बना गए। 

गणित में स्नातक करने के बाद उन्होंने कोलकाता मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया। मेडिकल कॉलेज की दीवार पर लिखा एक वाक्य उनके जीवन का मंत्र बन गया—"जो भी काम करो, पूरी शक्ति और ईमानदारी से करो।" यही वाक्य उनके हर निर्णय और हर संघर्ष की प्रेरणा बना।
३० बार ठुकराए जाने के बाद मिली मंजिल... लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। आज के समय में एक या दो बार असफल होने पर लोग अपने सपने छोड़ देते हैं। लेकिन डॉ. बिधान चंद्र रॉय ने दुनिया को धैर्य का सबसे बड़ा उदाहरण दिया। वे इंग्लैंड के प्रतिष्ठित सेंट बार्थोलोम्यू हॉस्पिटल में उच्च चिकित्सा शिक्षा प्राप्त करना चाहते थे। लेकिन उस समय भारतीय छात्रों के लिए वहाँ प्रवेश पाना लगभग असंभव था। उनकी पहली अर्जी खारिज कर दी गई। दूसरी भी। तीसरी भी। चौथी भी... लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने एक-दो नहीं बल्कि करीब ३० बार आवेदन भेजे। आखिरकार कॉलेज के डीन उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने प्रवेश दे दिया। यह केवल एक छात्र की जीत नहीं थी, बल्कि उस भारतीय आत्मविश्वास की जीत थी, जिसने दुनिया को यह संदेश दिया कि लगातार प्रयास करने वाला व्यक्ति असंभव को भी संभव बना सकता है। 

डॉक्टर बने... चिकित्सा व्यवस्था बदली 

विदेश से लौटने के बाद उन्होंने आरामदायक निजी जीवन नहीं चुना। उन्होंने अपना पूरा जीवन भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत बनाने में लगा दिया। उन्होंने कोलकाता मेडिकल कॉलेज में अध्यापन किया और हजारों डॉक्टर तैयार किए। उनका मानना था कि केवल इलाज करना काफी नहीं है, बल्कि चिकित्सा शिक्षा और अस्पतालों का विस्तार भी उतना ही आवश्यक है। उनकी पहल पर जादवपुर टीबी अस्पताल, चित्तरंजन सेवा सदन, कमला नेहरू मेमोरियल अस्पताल, चित्तरंजन कैंसर अस्पताल, विक्टोरिया इंस्टीट्यूशन जैसी कई महत्वपूर्ण संस्थाओं की स्थापना हुई। महिलाओं और बच्चों के लिए बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध कराने में उनका योगदान ऐतिहासिक माना जाता है। उस दौर में जब आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं सीमित थीं, उन्होंने अस्पतालों को केवल इलाज का केंद्र नहीं, बल्कि समाज सेवा का माध्यम बना दिया।
 
महात्मा गांधी ने पूछा ऐसा सवाल... जिसने इतिहास में जगह बना ली

डॉ. बिधान चंद्र रॉय केवल एक महान चिकित्सक नहीं थे, बल्कि महात्मा गाँधी के निजी चिकित्सक और घनिष्ठ मित्र भी थे। दोनों के बीच एक घटना आज भी भारतीय इतिहास में सबसे प्रेरणादायक संवादों में गिनी जाती है। साल १९३३  में गांधीजी उपवास पर थे। उनकी तबीयत लगातार बिगड़ रही थी, लेकिन वे दवा लेने से इनकार कर रहे थे क्योंकि उनका मानना था कि वह पूरी तरह स्वदेशी नहीं थी। तब गाँधीजी ने डॉ. रॉय से पूछा- "मैं आपका इलाज क्यों कराऊं? क्या आप मेरे देश के चालीस करोड़ लोगों का मुफ्त इलाज करते हैं?" यह सवाल किसी भी डॉक्टर को निरुत्तर कर सकता था। लेकिन डॉ. रॉय ने जो उत्तर दिया, उसने गाँधीजी को भी सोचने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने कहा- "नहीं बापू, मैं सभी लोगों का मुफ्त इलाज नहीं कर सकता। लेकिन आज मैं मोहनदास करमचंद गाँधी का इलाज नहीं कर रहा, बल्कि उस व्यक्ति का इलाज कर रहा हूँ जो मेरे लिए पूरे भारत के चालीस करोड़ लोगों का प्रतिनिधित्व करता है।" इस उत्तर के बाद गाँधी जी ने उनका इलाज स्वीकार किया। यह केवल चिकित्सा नहीं थी, बल्कि कर्तव्य, सम्मान और राष्ट्रभक्ति का अद्भुत उदाहरण था। 

राजनीति में डॉक्टर की पहचान नहीं छोड़ी

साल १९२५ में उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया। उस समय स्वतंत्रता आंदोलन अपने चरम पर था। उन्होंने चुनाव लड़कर उस दौर के सबसे बड़े नेताओं में से एक सुरेन्द्रनाथ बनर्जी को हराकर सबको चौंका दिया। इसके बाद वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के महत्वपूर्ण नेता बने। उन्होंने कई बार जेल भी काटी, लेकिन उनकी सोच अलग थी। उनका मानना था कि केवल आंदोलन नहीं, बल्कि शिक्षित और सक्षम नागरिक ही मजबूत राष्ट्र बना सकते हैं। इसलिए वे चाहते थे कि छात्र पढ़ाई पूरी करें और अपने ज्ञान से देश का निर्माण करें। वे कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य बने, कोलकाता के मेयर बने और बाद में कोलकाता विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे। मेयर रहते हुए उन्होंने मुफ्त शिक्षा, मुफ्त चिकित्सा सहायता, बेहतर सड़कें, स्वच्छ जल और आधुनिक नागरिक सुविधाओं की शुरुआत कराई। उन्होंने नगर प्रशासन को जनता के करीब लाने का प्रयास किया।

मुख्यमंत्री बनने से इनकार... गाँधी जी ने बदलवाया फैसला

स्वतंत्रता के बाद पश्चिम बंगाल विभाजन की त्रासदी से जूझ रहा था। लाखों शरणार्थी, बेरोजगारी, सांप्रदायिक तनाव और आर्थिक संकट ने पूरे राज्य को कमजोर कर दिया था। कांग्रेस चाहती थी कि डॉ. बिधान चंद्र रॉय राज्य की कमान संभालें। लेकिन उन्होंने साफ मना कर दिया। उनका कहना था कि वे राजनीति से ज्यादा डॉक्टर बने रहना चाहते हैं। फिर एक दिन महात्मा गाँधी ने उनसे कहा कि अब देश को उनकी जरूरत अस्पताल से ज्यादा प्रशासन में है। वे गाँधी जी के इस आग्रह को वे टाल नहीं सके। २३ जनवरी १९४८ को उन्होंने पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री का पद संभाला और फिर १९५० में स्वतंत्र भारत के पहले पूर्णकालिक मुख्यमंत्री बने। उन्होंने लगातार कई वर्षों तक राज्य का नेतृत्व किया और पश्चिम बंगाल को नई दिशा दी।

सिर्फ अस्पताल नहीं पूरे शहर बसाए

डॉ. बिधान चंद्र रॉय की सबसे बड़ी पहचान केवल मुख्यमंत्री या डॉक्टर होना नहीं है। उनकी दूरदृष्टि ने आधुनिक पश्चिम बंगाल की नींव रखी।
उन्होंने बिधाननगर (सॉल्ट लेक), कल्याणी, दुर्गापुर और अशोकनगर-कल्याणगढ़ जैसे आधुनिक शहरों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उस समय विभाजन के कारण लाखों लोग विस्थापित हो चुके थे। उन्हें बसाने और रोजगार उपलब्ध कराने के लिए योजनाबद्ध शहरों की जरूरत थी। डॉ. रॉय ने इस आवश्यकता को समझा और भविष्य को ध्यान में रखते हुए नए नगरों की योजना बनाई। उनके प्रयासों से आईआईटी खड़गपुर की स्थापना भी संभव हुई। उन्होंने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को यह विश्वास दिलाया कि पश्चिम बंगाल तकनीकी शिक्षा का सबसे बड़ा केंद्र बन सकता है। आज आईआईटी खड़गपुर विश्व के प्रतिष्ठित संस्थानों में गिना जाता है, जिसकी नींव में डॉ. रॉय की दूरदर्शिता शामिल है। साल १९६१ में भारत सरकार ने उन्हें देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न प्रदान किया। लेकिन पुरस्कार मिलने के बाद भी उनके जीवन में कोई बदलाव नहीं आया। वे पहले की तरह मरीज देखते रहे, सरकारी फाइलें निपटाते रहे और जनता की सेवा करते रहे। उन्होंने अपना निजी घर भी समाज सेवा के लिए दान कर दिया, ताकि वहां नर्सिंग होम चलाया जा सके। उनके लिए सेवा कभी पद या पुरस्कार से बड़ी नहीं थी।

जन्म दिन पर दुनिया को अलविदा कहा

१ जुलाई १९६२ की सुबह भी किसी सामान्य दिन जैसी थी। उन्होंने मरीजों का इलाज किया, मुख्यमंत्री के रूप में सरकारी फाइलें देखीं और अपने प्रिय ब्रह्मो गीत गुनगुनाए। उसी दिन, अपने ८० वें जन्मदिन पर उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। उनके निधन के बाद भी उनका जीवन लोगों को प्रेरित करता रहा। वर्ष 1991 से भारत सरकार ने उनके सम्मान में 1 जुलाई को राष्ट्रीय डॉक्टर्स डे के रूप में मनाने की परंपरा शुरू की। आज भी हर डॉक्टर को सम्मान देने का सबसे बड़ा दिन उसी महान चिकित्सक की स्मृति से जुड़ा है, जिसने अपना पूरा जीवन दूसरों के लिए समर्पित कर दिया। डॉ. बिधान चंद्र रॉय का जीवन केवल एक महान डॉक्टर की कहानी नहीं है। यह उस इंसान की कहानी है जिसने साबित किया कि ज्ञान, सेवा और ईमानदारी अगर साथ हों तो एक व्यक्ति पूरे समाज की दिशा बदल सकता है। उन्होंने कभी राजनीति को सेवा से ऊपर नहीं रखा, कभी पद को कर्तव्य से बड़ा नहीं माना और कभी व्यक्तिगत सफलता को राष्ट्रहित से आगे नहीं रखा।
००० 
ग़ज़लिका
नमन सखी
रहें सुखी
.
करें नहीं
कभी दुखी
.
हो न शून्य
हाथ रखी
.
हार-जीत
विहँस चखी
.
धूप-छाँव
संग दिखी
.
सलिल धार
विमल लखी
०0०
ग़ज़लिका
प्रदीप दीप्त तम हरे
सुभाग्य आप नित वरे
.
जड़ें जमीन में जमा
हाथ पर गगन धरे
.
कहे प्रकाश देख जग
सफल प्रयास सुख करे
.
चले न खोट अब तनिक
बसें हृदय सदा खरे
.
सलिल विमल न रुद्ध हो
सुभाव हों मनस भरे
१.७.२०२५
०0०
सॉनेट
कठपुतली
कठपुतली सरकार बन गई
अंगुली नर्तन होगा खूब
जब रिमोट का बटन दबेगा
हलचल तभी मचेगी खूब
इसके कंधे पर उसकी गन
साध निशाना जब मारेगी
सत्ता के गलियारे में तब
छल-बल से निज कुल तारेगी
बगुला भगत स्वांग बहुतेरे
रचा दिखाएँगे निज लीला
जाँच साँच को दफनाएगी
ठाँस करेगी काला-पीला
पाला बदला बात बन गई
चाट अंगुली घी में सन गई
१-७-२०२२
•••
गीत
दे दनादन
*
लूट खा अब
देश को मिल
लाट साहब
लाल हों खिल
ढाल है यह
भाल है वह
आड़ है यह
वार है वह
खेलता मन
झेलता तन
नाचते बन
आप राजन
तोड़ते घर
पूत लायक
बाप जी पर
तान सायक
साध्य है पद
गौड़ है कद
मोल देकर
लो सभासद
देखते कब
है कहाँ सच?
पूछते पथ
जा बचें अब
जेब में झट
ले रखो धन
है खनाखन
दे दनादन
(छंद: कृष्णमोहन)
१-७-२०२२
•••
***
लाड़ले लला संजीव सलिल
कान्ति शुक्ला
*
मानव जीवन का विकास चिंतन, विचार और अनुभूतियों पर निर्भर करता है। उन्नति और प्रगति जीवन के आदर्श हैं। जो कवि जितना महान होता है, उसकी अनुभूतियाँ भी उतनी ही व्यापक होतीं हैं। मूर्धन्य विद्वान सुकवि छंद साधक आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' जी का नाम ध्यान में आते ही एक विराट साधक व्यक्तित्व का चित्र नेत्रों के समक्ष स्वतः ही स्पष्टतः परिलक्षित हो उठता है। मैंने 'सलिल' जी का नाम तो बहुत सुना था और उनके व्यक्तित्व, कृतित्व, सनातन छंदों के प्रति अगाध समर्पण संवर्द्धन की भावना ने उनके प्रति मेरे मन ने एक सम्मान की धारणा बना ली थी और जब रू-ब-रू भेंट हुई तब भी उनके सहज स्नेही स्वभाव ने प्रभावित किया और मन की धारणा को भी बल दिया परंतु यह धारणा मात्र कुछ दिन ही रही और पता नहीं कैसे हम ऐसे स्नेह-सूत्र में बँधे कि 'सलिल' जी मेरे नटखट देवर यानी 'लला' (हमारी बुंदेली भाषा में छोटे देवर को लला कहकर संबोधित करते हैं न) होकर ह्रदय में विराजमान हो गए और मैं उनकी ऐसी बड़ी भौजी जो गाहे-बगाहे दो-चार खरी-खोटी सुनाकर धौंस जमाने की पूर्ण अधिकारिणी हो गयी। हमारे बुंदेली परिवेश, संस्कृति और बुंदेली भाषा ने हमारे स्नेह को और प्रगाढ़ करने में महती भूमिका निभाई। हम फोन पर अथवा भेंट होने पर बुंदेली में संवाद करते हुए और अधिक सहज होते गए। अब वस्तुस्थिति यह है कि उनकी अटूट अथक साहित्य-साधना, छंद शोध, आचार्यत्व, विद्वता या समर्पण की चर्चा होती है तो मैं आत्मविभोर सी गौरवान्वित और स्नेहाभिभूत हो उठती हूँ।
व्यक्तित्व और कृतित्व की भूमिका में विराट को सूक्ष्म में कहना कितना कठिन होता है, मैं अनुभव कर रही हूँ। व्यक्तित्व और विचार दोनों ही दृष्टियों से स्पृहणीय रचनाकार'सलिल' जी की लेखनी पांडित्य के प्रभामंडल से परे चिंतन और चेतना में - प्रेरणा, प्रगति और परिणाम के त्रिपथ को एकाकार करती द्वन्द्वरहित अन्वेषित महामार्ग के निर्माण का प्रयास करती दिखाई देती है। उनके वैचारिक स्वभाव में अवसर और अनुकूलता की दिशा में बह जाने की कमजोरी नहीं- वे सत्य, स्वाभिमान और गौरवशाली परम्पराओं की रक्षा के लिए प्रतिकूलता के साथ पूरी ताकत से टक्कर लेने में विश्वास रखते हैं। जहाँ तक 'सलिल'जी की साहित्य संरचना का प्रश्न है वहाँ उनके साहित्य में जहाँ शाश्वत सिद्धांतों का समन्वय है, वहाँ युगानुकूल सामयिकता भी है, उत्तम दिशा-निर्देश है, चिरंतन साहित्य में चेतनामूलक सिद्धांतों का विवरण है जो प्रत्येक युग के लिए समान उपयोगी है तो सामयिक सृजन युग विशेष के लिए होते हुए भी मानव जीवन के समस्त पहेलुओं की विवृत्ति है, जहाँ एकांगी दृष्टिकोण को स्थान नहीं।
"सलिल' जी के रचनात्मक संसार में भाव, विचार और अनुभूतियों के सफल प्रकाशन के लिए भाषा का व्यापक रूप है जिसमें विविधरूपता का रहस्य भी समाहित है। एक शब्द में अनेक अर्थ और अभिव्यंजनाएँ हैं, जीवन की प्रेरणात्मक शक्ति है तो मानव मूल्यों के मनोविज्ञान का स्निग्धतम स्पर्श है, भावोद्रेक है। अभिनव बिम्बात्मक अभिव्यंजना है जिसने मुझे विशेष रूप से प्रभावित किया है। माँ वाणी की विशेष कृपा दृष्टि और श्रमसाध्य बड़े-बड़े कार्य करने की अपूर्व क्षमता ने जहाँ अनेक पुस्तकें लिखने की प्रेरणा दी है, वहीं पारंपरिक छंदों में सृजन करने के साथ सैकड़ों नवीन छंद रचने का अन्यतम कौशल भी प्रदान किया है- तो हमारे लाड़ले लला हैं कि कभी ' विश्व वाणी संवाद' का परचम लहरा रहे हैं, कभी दोहा मंथन कर रहे हैं तो कभी वृहद छंद कोष निर्मित कर रहे हैं ,कभी सवैया कोष में सनातन सवैयों के साथ नित नूतन सवैये रचे जा रहे हैं। सत्य तो यह है कि लला की असाधारण सृजन क्षमता, निष्ठा, अभूतपूर्व लगन और अप्रतिम कौशल चमत्कृत करता है और रचनात्मक कौशल विस्मय का सृजन करता है। समरसता और सहयोगी भावना तो इतनी अधिक प्रबल है कि सबको सिखाने के लिए सदैव तत्पर और उपलब्ध हैं, जो एक गुरू की विशिष्ट गरिमा का परिचायक है। मैंने स्वयं अपने कहानी संग्रह की भूमिका लिखने का अल्टीमेटम मात्र एक दिन की अवधि का दिया और सुखद आश्चर्य रहा कि वह मेरी अपेक्षा में खरे उतरे और एक ही दिन में सारगर्भित भूमिका मुझे प्रेषित कर दी ।
जहाँ तक रचनाओं का प्रश्न है, विशेष रूप से पुण्यसलिला माँ नर्मदा को जो समर्पित हैं- उन रचनाओं में मनोहारी शिल्पविन्यास, आस्था, भाषा-सौष्ठव, वर्णन का प्रवाह, भाव-विशदता, ओजस्विता तथा गीतिमत्ता का सुंदर समावेश है। जीवन के व्यवहार पक्ष के कार्य वैविध्य और अन्तर्पक्ष की वृत्ति विविधता है। प्राकृतिक भव्य दृश्यों की पृष्ठभूमि में कथ्य की अवधारणा में कलात्मकता और सघन सूक्ष्मता का समावेश है। प्रकृति के ह्रदयग्राही मनोरम रूप-वर्णन में भाव, गति और भाषा की दृष्टि से परिमार्जन स्पष्टतः परिलक्षित है । 'सलिल' जी के अन्य साहित्य में कविता का आधार स्वरूप छंद-सौरभ और शब्दों की व्यंजना है जो भावोत्पादक और विचारोत्पादक रहती है और जिस प्रांजल रूप में वह ह्रदय से रूप-परिग्रह करती है , वह स्थायी और कालांतर व्यापी है।
'सलिल' जी की सर्जना और उसमें प्रयुक्त भाषायी बिम्ब सांस्कृतिक अस्मिता के परिचायक हैं जो बोधगम्य ,रागात्मक और लोकाभिमुख होकर अत्यंत संश्लिष्ट सामाजिक यथार्थ की ओर दृष्टिक्षेप करते हैं। जिन उपमाओं का अर्थ एक परम्परा में बंधकर चलता है- उसी अर्थ का स्पष्टीकरण उनका कवि-मन सहजता से कर जाता है और उक्त स्थल पर अपने प्रतीकात्मक प्रयोग से अपने अभीष्ट को प्राप्त कर लेता है जो पाठक को रसोद्रेक के साथ अनायास ही छंद साधने की प्रक्रिया की ओर उन्मुख कर देता है। अपने सलिल नाम के अनुरूप सुरुचिपूर्ण सटीक सचेतक मृदु निनाद की अजस्र धारा इसी प्रकार सतत प्रवाहित रहे और नव रचनाकारों की प्रेरणा की संवाहक बने, ऐसी मेरी शुभेच्छा है। मैं संपूर्ण ह्रदय से 'सलिल' जी के स्वस्थ, सुखी और सुदीर्घ जीवन की ईश्वर से प्रार्थना करते हुए अपनी हार्दिक शुभकामनाएँ व्यक्त करती हूँ ।
[लेखिका परिचय : वरिष्ठ कहानीकार-कवयित्री, ग़ज़ल, बाल कविता तथा कहानी की ५ पुस्तकें प्रकाशित, ५ प्रकाशनाधीन। सचिव करवाय कला परिषद्, प्रधान संपादक साहित्य सरोज रैमसीकी। संपर्क - एम आई जी ३५ डी सेक्टर, अयोध्या नगर, भोपाल ४६२०४१, संपर्क ९९९३०४७७२६, ७००९५५८७१७, kantishukla47@gamil.com .]
***
सम्माननीय काव्य गुरु आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
इंजी. अमरेंद्र नारायण
[भूतपूर्व महासचिव एशिया पैसिफिक टेलीकौम्युनिटी शुभा आशीर्वाद, १०५५, रिज रोड, साउथ सिविल लाइन्स ,जबलपुर ४८२००१ मध्य प्रदेश दूरभाष +९१ ७६१ २६० ४६०० ई मेल amarnar@gmail.com]
*
आचार्य संजीव वर्मा सलिल जी बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति हैं। वे एक कुशल अभियंता, एक सफल विधिवेत्ता, एक प्रशिक्षित पत्रकार और एक विख्यात साहित्यकार तो हैं ही, साथ ही हिंदी साहित्य के प्रचार-प्रसार हेतु
निरंतर कार्यरत एक कर्मठ हिंदी सेवी संयोजक भी हैं।
सलिल जी ने कई मधुर गीत लिखे हैं और एक विशेषज्ञ अभियंता के रूप में तकनीकी विषयों पर उपयोगी लेख लिख कर उन्होंने तकनीक के प्रचार में अपना सहयोग भी दिया है । साहित्य, अभियान्त्रिकी और सामाजिक विषयों से जुड़े कई सामयिक विषयों पर उन्होंने मौलिक और व्यावहारिक विचार रखे हैं।
सलिल जी विभिन्न संस्थाओं के सदस्य मात्र ही नहीं हैं, वे कई संस्थाओं के जन्मदाता भी हैं और संयोजक भी हैं। उनकी योग्यता और उनके समर्पित व्यक्तित्व से प्रभावित हो कर कई लोग साहित्य के क्षेत्र में उन्हें अपना गुरु मानते हैं। साहित्य सृजन हेतु उत्सुक अनेक जनों को उन्होंने विधिवत भाषा, व्याकरण और पिंगल सिखाया और उनके लिखे को तराशा-सँवारा है।
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का कोई अभिवक्ता एक प्रतिष्ठित अभियंता हो और पिंगल तथा उरूज का ज्ञाता भी हो- यह कोई साधारण बात नहीं है। विस्मृति के गह्वर से पुराने छंदों को खोज-खोज कर उनका मधुर शब्दावली से श्रृंगार कोई ऐसा शब्द चितेरा ही कर सकता है जिसमें एक विद्वान् की अन्वेषण क्षमता, अभियंता की व्यावहारिक सृजन प्रतिभा और एक सिद्धहस्त कलाकार के सौन्दर्य बोध का सम्यक समन्वय हो। सलिल जी का प्रभावशाली व्यक्तित्व इसी कोटि का है ।
सलिल जी का आग्रह है-
''मौन तज कर मनीषा कह बात अपनी''
यह आज के ऐसे परिवेश में और भी आवश्यक है जहाँ
''तंत्र लाठियाँ घुमाता, जन खाता है मार
उजियारे की हो रही अन्धकार से हार!''
कई रचनाकार संवेदनशील तो होते हैं पर वे मुखर नहीं हो पाते। सलिल जी का कहना है-
''रही सड़क पर अब तक चुप्पी,पर अब सच कहना ही होगा!''
साहित्यकार जब अपना मौन तोड़ता है तो उसकी वाणी कभी गर्जना कर चुनौती देती है तो कभी तीर बन कर बेंधती है । सलिल जी का साहित्यकार इसी प्रकृति का है! सलिल जी शुभ जहाँ है,उसका नमन करते हुए सनातन
सत्य की अभिव्यक्ति में विश्वास रखते हैं।
माँ सरस्वती से उनकी प्रार्थना है-
''अमल -धवल शुचि विमल सनातन मैया!
बुद्धि-ज्ञान-विज्ञान प्रदायिनी छैयां''
तिमिर हारिणी
भय निवारिणी सुखदा,
नाद-ताल, गति-यति
खेलें तव कैंया
अनहद सुनवा दो कल्याणी!
जय-जय वीणापाणी!''
उम्मीदों की फसल उगाने का आह्वान करते हुए सलिल जी ईश्वर, अपने माता पिता और पुरखों के प्रति भक्ति,श्रद्धा और कृतज्ञता अर्पित कर अपनी विनम्रता और शुभ का सम्मान करने की अपनी प्रवृत्ति का परिचय देते हैं । हर भावुक और संवेदनशील साहित्यकार अपने आस-पास बिखरे परिवेश पर अपनी दृष्टि डालता है और जहाँ उसकी भावुकता ठहर जाती है, वहां उसका चिंतन उसे उद्वेलित करने लगता है । इस ठहराव में भी गति का सन्देश है और आशा की प्रेरणा भी! सलिल जी का आह्वान है-
''आज नया इतिहास लिखें हम
कठिनाई में संकल्पों का
नव हास लिखें हम!''
सलिल जी एक कर्मठ साहित्य साधक और एक सम्माननीय काव्य गुरु भी हैं। अनेक युवा साहित्यकार उनसे प्रेरणा पाकर उत्कृष्ट साहित्य की सर्जना कर रहे हैं। उनका यह योगदान निरंतर फूलता-फलता रहे और उनकी प्रखर प्रतिभा के प्रसून खिलते रहें! हिंदी भाषा के विकास,विस्तार,प्रसार के लिये ऐसे समर्पित साधकों की बहुत आवश्यकता है। उन्हें सप्रेम नमस्कार।
१-७-२०१९
***
कार्यशाला: रचना-प्रति रचना
घनाक्षरी
फेसबुक
*
गुरु सक्सेना नरसिंहपुर मध्य प्रदेश
*
चमक-दमक साज-सज्जा मुख-मंडल पै
तड़क-भड़क भी विशेष होना चाहिए।
आत्म प्रचार की क्रिकेट का हो बल्लेबाज
लिस्ट कार्यक्रमों वाली पेश होना चाहिए।।
मछली फँसानेवाले काँटे जैसी शब्दावली
हीरो जैसा आकर्षक भेष होना चाहिए।
फेसबुक पर मित्र कैसे मैं बनाऊँ तुम्हे
फेसबुक जैसा भी तो फेस होना चाहिए।।
*
फेस 'बुक' हो ना पाए, गुरु यही बेहतर है
फेस 'बुक' हुआ तो छुडाना मजबूरी है।
फेस की लिपाई या पुताई चाहे जितनी हो
फेस की असलियत जानना जरूरी है।।
फेस रेस करेगा तो पोल खुल जायेगी ही
फेस फेस ना करे तैयारी जो अधूरी है।
फ़ेस देख दे रहे हैं लाइक पे लाइक जो
हीरो जीरो, फ्रेंडशिप सिर्फ मगरूरी है।।
१-७-२०१७
***
रसानंद दे छंद नर्मदा ३६ : अचल धृति छंद
दोहा, सोरठा, रोला, आल्हा, सार, ताटंक, रूपमाला (मदन), चौपाई, हरिगीतिका, उल्लाला,गीतिका,घनाक्षरी, बरवै, त्रिभंगी, सरसी, छप्पय, भुजंगप्रयात, कुंडलिनी, सवैया, शोभन या सिंहिका, सुमित्र, सुगीतिका, शंकर, मनहरण (कवित्त/घनाक्षरी), उपेन्द्रवज्रा, इंद्रवज्रा, सखी तथा वासव छंदों से साक्षात के पश्चात् मिलिए अचल धृति छंद से
अचल धृति छंद
संजीव
*
छंद विधान: सूत्र: ५ न १ ल, ५ नगण १ लघु = ५ (१ + १ +१ )+१ = हर पद में १६ लघु मात्रा, १६ वर्ण
उदाहरण:
१. कदम / कदम / पर ठ/हर ठ/हर क/र
ठिठक / ठिठक / कर सि/हर सि/हर क/र
हुलस / हुलस / कर म/चल म/चल क/र
मनसि/ज सम / खिल स/लिल ल/हर क/र
२. सतत / अनव/रत प/थ पर / पग ध/र
अचल / फिसल / गर सँ/भल ठि/ठकक/र
रुक म/त झुक / मत चु/क मत / थक म/त
'सलिल' / विहँस/कर प्र/वह ह/हरक/र
३. खिल-खिल ख़िलक़र मुकुलित मनसिज
हिलमिल झटपट चटपट सरसिज
सचल-अचल सब जग कर सुरभित
दिन कर दिनकर सुर - नर प्रमुदित
***
***
एक बहर दो ग़ज़लें
बहर - २१२२ २१२२ २१२
छन्द- महापौराणिक जातीय, पीयूषवर्ष छंद
*
महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश
बस दिखावे की तुम्हारी प्रीत है
ये भला कोई वफ़ा की रीत है
साथ बस दो चार पल का है यहाँ
फिर जुदा हो जाए मन का मीत है
ज़िंदगी की असलियत है सिर्फ़ ये
चार दिन में जाए जीवन बीत है
फ़िक्र क्यों हो इश्क़ के अंजाम की
प्यार में क्या हार है क्या जीत है
कब ख़लिश चुक जाए ये किसको पता
ज़िंदगी का आखिरी ये गीत है.
*
संजीव
हारिए मत, कोशिशें कुछ और हों
कोशिशों पर कोशिशों के दौर हों
*
श्याम का तन श्याम है तो क्या हुआ?
श्याम मन में राधिका तो गौर हों
*
जेठ की गर्मी-तपिश सह आम में
पत्तियों संग झूमते हँस बौर हों
*
साँझ पर सूरज 'सलिल' है फिर फ़िदा
साँझ के अधरों न किरणें कौर हों
*
'हाय रे! इंसान की मजबूरियाँ / पास रहकर भी हैं कितनी दूरियाँ' गीत इसी बहर में है।
१-७-२०१६
***
दोहा सलिला:
*
रचना निज आनंद हित, करिये रहकर मौन
सृजन हीन होता नहीं, श्रेष्ठ हुआ कब कौन?
*
जग में जितने ढोल हैं, बाहर से सब गोल
जो जितना ज्यादा बड़ा, उतनी ज्यादा पोल
*
जो सब से पीछे खड़ा, हो आगे तत्काल
'पीछे मुड़' के हुक्म से, होता यही कमाल
*
पहुँच विदेशों में करें, जो जाहिर मतभेद
नाक काटकर देश की, नाहक है हर खेद
*
बहुमत जब करता गलत, उचित न हो परिणाम
सही अल्प मत उपेक्षित, अगर- विधाता वाम
*
मौलिकता के निकष पर, अगर हाजिरी श्रेष्ठ
गुणवत्ता को भूलिए, हो कनिष्ठ ही ज्येष्ठ
*
मनमानी के लिये क्यों, व्यर्थ खोजिए ढाल?
मनचाही कर लीजिए, खुद हुजूर तत्काल
१-७-२०१५
***
छंद सलिला:
सवाई /समान छंद
*
छंद-लक्षण: जाति लाक्षणिक, प्रति चरण मात्रा ३२ मात्रा, यति १६-१६, पदांत गुरु लघु लघु ।
लक्षण छंद:
हर चरण समान रख सवाई / झूम झूमकर रहा मोह मन
गुरु लघु लघु ले पदांत, यति / सोलह सोलह रख, मस्त मगन
उदाहरण:
१. राय प्रवीण सुनारी विदुषी / चंपकवर्णी तन-मन भावन
वाक् कूक सी, केश मेघवत / नैना मानसरोवर पावन
सुता शारदा की अनुपम वह / नृत्य-गान, शत छंद विशारद
सदाचार की प्रतिमा नर्तन / करे लगे हर्षाया सावन
२. केशवदास काव्य गुरु पूजित,/ नीति धर्म व्यवहार कलानिधि
रामलला-नटराज पुजारी / लोकपूज्य नृप-मान्य सभी विधि
भाषा-पिंगल शास्त्र निपुण वे / इंद्रजीत नृप के उद्धारक
दिल्लीपति के कपटजाल के / भंजक- त्वरित बुद्धि के साधक
३. दिल्लीपति आदेश: 'प्रवीणा भेजो' नृप करते मन मंथन
प्रेयसि भेजें तो दिल टूटे / अगर न भेजें_ रण, सुख भंजन
देश बचाने गये प्रवीणा /-केशव संग करो प्रभु रक्षण
'बारी कुत्ता काग मात्र ही / करें और का जूठा भक्षण
कहा प्रवीणा ने लज्जा से / शीश झुका खिसयाया था नृप
छिपा रहे मुख हँस दरबारी / दे उपहार पठाया वापिस
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(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामिनीमोहन, काव्य, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिभंगी, त्रिलोकी, दण्डकला, दिक्पाल, दीप, दीपकी, दोधक, दृढ़पद, नित, निधि, निश्चल, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदन,मदनावतारी, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, मृदुगति, योग, ऋद्धि, रसामृत, रसाल, राजीव, राधिका, रामा, रूपमाला, लीला, वस्तुवदनक, वाणी, विरहणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुद्ध ध्वनि, शुभगति, शोभन, समान, सरस, सवाई, सार, सारस, सिद्धि, सिंहिका, सुखदा, सुगति, सुजान, सुमित्र, संपदा, हरि, हेमंत, हंसगति, हंसी)
***
छंद सलिला:
त्रिभंगी छंद
*
छंद-लक्षण: जाति लाक्षणिक, प्रति चरण मात्रा ३२ मात्रा, यति १०-८-८-६, पदांत गुरु, चौकल में पयोधर (लघु गुरु लघु / जगण) निषेध।
लक्षण छंद:
रच छंद त्रिभंगी / रस अनुषंगी / जन-मन संगी / कलम सदा
दस आठ आठ छह / यति गति मति सह / गुरु पदांत कह / सुकवि सदा
उदाहरण:
१. भारत माँ परायी / जग से न्यारी / सब संसारी नमन करें
सुंदर फुलवारी / महके क्यारी / सत आगारी / चमन करें
मत हों व्यापारी / नगद-उधारी / स्वार्थविहारी / तनिक डरें
हों सद आचारी / नीति पुजारी / भू सिंगारी / धर्म धरें
२. मिल कदम बढ़ायें / नग़मे गायें / मंज़िल पायें / बिना थके
'मिल सकें हम गले / नील नभ तले / ऊग रवि ढ़ले / बिना रुके
नित नमन सत्य को / नाद नृत्य को / सुकृत कृत्य को / बिना चुके
शत दीप जलाएं / तिमिर हटायें / भोर उगायें / बिना झुके
३. वैराग-राग जी / तुहिन-आग जी / भजन-फाग जी / अविचल हो
कर दे मन्वन्तर / दुःख छूमंतर / शुचि अभ्यंतर अविकल हो
बन दीप जलेंगे / स्वप्न पलेंगे / कर न मलेंगे / उन्मन हो
मिल स्वेद बहाने / लगन लगाने / अमिय बनाने / मंथन हो
१-७-२०१४
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(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामिनीमोहन, काव्य, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिभंगी, त्रिलोकी, दण्डकला, दिक्पाल, दीप, दीपकी, दोधक, दृढ़पद, नित, निधि, निश्चल, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदन,मदनावतारी, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, मृदुगति, योग, ऋद्धि, रसामृत, रसाल, राजीव, राधिका, रामा, रूपमाला, लीला, वस्तुवदनक, वाणी, विरहणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुद्ध ध्वनि, शुभगति, शोभन, सरस, सार, सारस, सिद्धि, सिंहिका, सुखदा, सुगति, सुजान, सुमित्र, संपदा, हरि, हेमंत, हंसगति, हंसी)
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विमर्श
साईं, स्वरूपानंद और मैं
*
स्वामी स्वरूपानंद द्वारा उठायी गयी साईं संबंधी आपत्ति मुझे बिलकुल ठीक प्रतीत होती है। एक सामान्य व्यक्ति के नाते मेरी जानकारी और चिंतन के आधार पर मेरा मत निम्न है:
१. सनातन: वह जिसका आदि अंत नहीं है अर्थात जो देश, काल, परिस्थिति का नियंत्रण-मार्गदर्शन करने के साथ-साथ खुद को भी चेतन होने के नाते परिवर्तित करता रहता है, जड़ नहीं होता इसी लोए सनातन धर्म में समय-समय पर देवी-देवता , पूजा-पद्धतियाँ, गुरु, स्वामी ही नहीं दार्शनिक विचार धाराएं और संप्रदाय भी पनपते और मान्य होते रहे हैं।
२. देवता: वेदों में ३३ प्रकार के देवता (१२ आदित्य, १८ रूद्र, ८ वसु, १ इंद्र, और प्रजापति) ही नहीं श्री देवी, उषा, गायत्री आदि अन्य अनेक और भी वर्णित हैं। आत्मा सो परमात्मा, अयमात्मा ब्रम्ह, कंकर सो शंकर, कंकर-कंकर में शंकर, शिवोहं, अहम ब्रम्हास्मि जैसी उक्तियाँ तो हर कण को ईश्वर कहती हैं। आचार्य रजनीश ने खुद को ओशो कहा और आपत्तिकर्ताओं को उत्तर दिया कि तुम भी ओशो हो अंतर यह है की मैं जानता हूँ कि मैं ओशो हूँ, तुम नहीं जानते। अतः साईं को कोई साईं भक्त भगवान माँने और पूजे इसमें किसी सनातन धर्मी को आपत्ति नहीं हो सकती।
३. रामायण महाभारत ही नहीं अन्य वेद, पुराण, उपनिषद, आगम, निगम, ब्राम्हण ग्रन्थ आदि भी न केवल इतिहास हैं न आख्यान या गल्प। भारत में सृजन दार्शनिक चिंतन पर आधारित रहा है। ग्रंथों में पश्चिम की तरह व्यक्तिपरकता नहीं है, यहाँ मूल्यात्मक चिंतन प्रमुख है। दृष्टान्तों या कथाओं का प्रयोग किसी चिंतनधारा को आम लोगों तक प्रत्यक्ष या परोक्षतः पहुँचाने के लिए किया गया है। अतः सभी ग्रंथों में इतिहास, आख्यान, दर्शन और अन्य शाखाओं का मिश्रण है।
देवताओं को विविध आधारों पर वर्गीकृत किया जा सकता है। यथा: जन्मा - अजन्मा, आर्य - अनार्य, वैदिक, पौराणिक, औपनिषदिक, सतयुगीन - त्रेतायुगीन - द्वापरयुगीन कलियुगीन, पुरुष देवता - स्त्री देवता आदि।
४. बाली, शंबूक, बर्बरीक, अश्वत्थामा, दुर्योधन जैसे अन्य भी अनेक प्रसंग हैं किन्तु इनका साईं से कुछ लेना-देना नहीं है। इनपर अलग-अलग चर्चा हो सकती है। राम और कृष्ण का देवत्व इन पर निर्भर नहीं है।
५. बुद्ध और महावीर का सनातन धर्म से विरोध और नव पंथों की स्थापना लगभग समकालिक होते हुए भी बुद्ध को अवतार मानना और महावीर को अवतार न मानना अर्थात बौद्धों को सनातनधर्मी माना जाना और जैनियों को सनातन धर्मी न माना जाना भी साईं से जुड़ा विषय नहीं है और पृथक विवेचन चाहता है।
६. अवतारवाद के अनुसार देवी - देवता कारण विशेष से प्रगट होते हैं फिर अदृश्य हो जाते हैं, इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि वे नष्ट हो जाते हैं। वे किसी वाहन से नहीं आते - जाते, वे शक्तियां रूपांतरित या स्थानांतरित होकर भी पुनः प्रगट होती हैं, एक साथ अनेक स्थानों पर भी प्रगट हो सकती हैं। यह केवल सनातन धर्म नहीं इस्लाम, ईसाई आय अन्य धर्मों में भी वर्णित है। हरि अनंत हरि कथा अनंता, उनके रूप भी अनंत हैं, प्रभु एक हैं वे भक्त की भावनानुसार प्रगट होते हैं, इसीलिए एक ईश्वर के भी अनेक रूप हैं गोपाल, मधुसूदन, श्याम, कान्हा, मुरारी आदि। इनके मन्त्र, पूजन विधि, साहित्य, कथाएं, माहात्म्य भी अलग हैं पर इनमें अंतर्विरोध नहीं है। सत्यनारायण, शालिग्राम, नृसिंह और अन्य विष्णु के ही अवतार कहे गये हैं।
७. गौतमी, सरस्वती और ऐसे ही अनेक अन्य प्रकरण यही स्थापित करते हैं की सर्व शक्तिमान होने के बाद भी देवता आम जनों से ऊपर विशेषधिकार प्राप्त नहीं हैं, जब वे देह धारण करते हैं तो उनसे भी सामान्य मनुष्यों की तरह गलतियां होती हैं और उन्हें भी इसका दंड भोगना होता है। 'to err is human' का सिद्धांत ही यहाँ बिम्बित है। कर्मफलवाद गीता में भी वर्णित है।
८. रामानंद, नानक, कबीर, चैतन्य, तुलसी, सूर, कबीर, नानक, मीरा या अन्य सूफी फकीर सभी अपने इष्ट के उपासक हैं। 'राम ते अधिक राम के दासा'… सनातन धर्मी किसी देव के भाकर से द्वेष नहीं करता। सिख का अस्तित्व ही सनातन की रक्षा के लिए है, उसे धर्म, पंथ, सम्प्रदाय कुछ भी कहें वह "ॐ" ओंकार का ही पूजक है। एक अकाल पुरुख परमब्रम्ह ही है। सनातन धर्मी गुरुद्वारों को पूजास्थली ही मानता है। गुरुओं ने भी राम,कृष्णादि को देवता मन कर वंदना की है और उनपर साहित्य रचा है।
९. वाल्मीकि को रामभक्त और आदिकवि के नाते हर सनातनधर्मी पूज्य मानता है। कोई उनका मंदिर बनाकर पूजे तो किसी को क्या आपत्ति? कबीर, तुलसी, मीरा की मूर्तियां भी पूजा ग्रहों और मंदिरों में मिल जायेंगी।
१०. साईं ईश्वरतत्व के प्रति नहीं साईं को अन्य धर्मावलम्बियों के मंदिरों, पूजाविधियों और मन्त्रों में घुसेड़े जाने का विरोध है। नमाज की आयात में, ग्रंथसाहब के सबद में, बाइबल के किसी अंश में साईं नाम रखकर देखें आपको उनकी प्रतिक्रिया मिल जाएगी। सनातन धर्मी ही सर्वाधिक सहिष्णु है इसलिए इतने दिनों तक झेलता रहा किन्तु कमशः साईं के नाम पर अन्य देवी-देवताओं के स्थानों पर बेजा कब्ज़ा तथा मूल स्थान पर अति व्यावसायिकता के कारन यह स्वर उठा है।
अंत में एक सत्य और स्वरूपानंद जी के प्रति उनके कांग्रेस मोह और दिग्विजय सिंग जैसे भ्रष्ट नेताओं के प्रति स्नेह भाव के कारण सनातनधर्मियों की बहुत श्रद्धा नहीं रही। मैं जबलपुर में रहते हुए भी आज तक उन तक नहीं गया। किन्तु एक प्रसंग में असहमति से व्यक्ति हमेशा के लिए और पूरी तरह गलत नहीं होता। साईं प्रसंग में स्वरूपानंद जी ने सनातनधर्मियों के मन में छिपे आक्रोश, क्षोभ और असंतोष को वाणी देकर उनका सम्मान पाया है। यह दायित्व साइभक्तों का है की वे अपने स्थानों से अन्य देवी-देवताओं के नाम हटाकर उन्हें साईं को इष्ट सादगी, सरलता और शुचितापरक कार्यपद्धति अपनाकर अन्यों का विश्वास जीतें। चढोत्री में आये धन का उपयोग स्थान को स्वर्ण से मरहने के स्थान पर उन दरिद्रों के कल्याण के लिए हो जिनकी सेवा करने का साईं ने उपदेश दिया। अनेक इत्रों के बयां पढ़े हैं की वे स्वरूपानंद जी के बीसियों वर्षों से भक्त हैं पर साईं सम्बन्धी वक्तव्य से उनकी श्रद्धा नष्ट हो गयी। ये कैसा शिष्यत्व है जो दोहरी निष्ठां ही नहीं रखता गुरु की कोई बात समझ न आने पर गुरु से मार्गदर्शन नहीं लेता, सत्य नहीं समझता और उसकी बरसों की श्रद्धा पल में नष्ट हो जाती है?
अस्तु साईं प्रसंग में स्वरूपानंद जी द्वारा उठाई गयी आपत्ति से सहमत हूँ।
१-७-२०१४
***
कल और आज: घनाक्षरी
कल :
कज्जल के कूट पर दीप शिखा सोती है कि,
श्याम घन मंडल मे दामिनी की धारा है ।
भामिनी के अंक में कलाधर की कोर है कि,
राहु के कबंध पै कराल केतु तारा है ।
शंकर कसौटी पर कंचन की लीक है कि,
तेज ने तिमिर के हिये मे तीर मारा है ।
काली पाटियों के बीच मोहनी की माँग है कि,
ढ़ाल पर खाँड़ा कामदेव का दुधारा है ।
काले केशों के बीच सुन्दरी की माँग की शोभा का वर्णन करते हुए कवि ने ८ उपमाएँ दी हैं.-
१. काजल के पर्वत पर दीपक की बाती.
२. काले मेघों में बिजली की चमक.
३. नारी की गोद में बाल-चन्द्र.
४. राहु के काँधे पर केतु तारा.
५. कसौटी के पत्थर पर सोने की रेखा.
६. काले बालों के बीच मन को मोहने वाली स्त्री की माँग.
७. अँधेरे के कलेजे में उजाले का तीर.
८. ढाल पर कामदेव की दो धारवाली तलवार.
कबंध=धड़. राहु काला है और केतु तारा स्वर्णिम, कसौटी के काले पत्थर पर रेखा खींचकर सोने को पहचाना जाता है. ढाल पर खाँडे की चमकती धार. यह सब केश-राशि के बीच माँग की दमकती रेखा का वर्णन है.
*****
आज : संजीव 'सलिल'
संसद के मंच पर, लोक-मत तोड़े दम,
राजनीति सत्ता-नीति, दल-नीति कारा है ।
नेताओं को निजी हित, साध्य- देश साधन है,
मतदाता घुटालों में, घिर बेसहारा है ।
'सलिल' कसौटी पर, कंचन की लीक है कि,
अन्ना-रामदेव युति, उगा ध्रुवतारा है।
स्विस बैंक में जमा जो, धन आये भारत में ,
देर न करो भारत, माता ने पुकारा है।
******
घनाक्षरी: वर्णिक छंद, चतुष्पदी, हर पद- ३१ वर्ण, सोलह चरण-
हर पद के प्रथम ३ चरण ८ वर्ण, अंतिम ४ चरण ७ वर्ण.
******
१-७-२०१२
***
ग़ज़लिका :
ज़ख्म कुरेदेंगे....
*
ज़ख्म कुरेदोगे तो पीर सघन होगी.
शोले हैं तो उनके साथ अगन होगी..
*
छिपे हुए को बाहर लाकर क्या होगा?
रहा छिपा तो पीछे कहीं लगन होगी..
*
मत उधेड़-बुन को लादो, फुर्सत ओढ़ो.
होंगे बर्तन चार अगर खन-खन होगी..
*
फूलों के शूलों को हँसकर सहन करो.
वरना भ्रमरों के हाथों में गन होगी..
*
बीत गया जो रीत गया उसको भूलो.
कब्र न खोदो, कोई याद दफन होगी..
*
आज हमेशा कल को लेकर आता है.
स्वीकारो, वरना कल से अनबन होगी..
*
नेह नर्मदा 'सलिल' हमेशा बहने दो.
अगर रुकी तो मलिन और उन्मन होगी..
१-७-२०१०
***
लघु कथा
विजय दिवस
*
करगिल विजय की वर्षगांठ को विजय दिवस के रूप में मनाये जाने की खबर पाकर एक मित्र बोले-
'क्या चोर या बदमाश को घर से निकाल बाहर करना विजय कहलाता है?'
''पड़ोसियों को अपने घर से निकल बाहर करने के लिए देश-हितों की उपेक्षा, सीमाओं की अनदेखी, राजनैतिक मतभेदों को राष्ट्रीयता पर वरीयता और पड़ोसियों की ज्यादतियों को सहन करने की बुरी आदत (कुटैव या लत) पर विजय पाने की वर्ष गांठ को विजय दिवस कहना ठीक ही तो है. '' मैंने कहा.
'इसमें गर्व करने जैसा क्या है? यह तो सैनिकों का फ़र्ज़ है, उन्हें इसकी तनखा मिलती है.' -मित्र बोले.
'''तनखा तो हर कर्मचारी को मिलती है लेकिन कितने हैं जो जान पर खेलकर भी फ़र्ज़ निभाते हैं. सैनिक सीमा से जान बचाकर भाग खड़े होते तो हम और आप कैसे बचते?''
'यह तो सेना में भरती होते समय उन्हें पता रहता है.'
पता तो नेताओं को भी रहता है कि उन्हें आम जनता-और देश के हित में काम करना है, वकील जानता है कि उसे मुवक्किल के हित को बचाना है, न्यायाधीश जनता है कि उसे निष्पक्ष रहना है, व्यापारी जनता है कि उसे शुद्ध माल कम से कम मुनाफे में बेचना है, अफसर जानता है कि उसे जनता कि सेवा करना है पर कोई करता है क्या? सेना ने अपने फ़र्ज़ को दिलो-जां से अंजाम दिया इसीलिये वे तारीफ और सलामी के हकदार हैं. विजय दिवस उनके बलिदानों की याद में हमारी श्रद्धांजलि है, इससे नयी पीढी को प्रेरणा मिलेगी.''
प्रगतिवादी मित्र भुनभुनाते हुए सर झुकाए आगे बढ़ गए..
जुलाई २९, २००९
***

मंगलवार, 30 जून 2026

जून ३०, क्षुद्र ग्रह, सॉनेट, बुंदेली, दोहा, समुच्चय-आक्षेप अलंकार, दण्डकला छंद, ग़ज़लिका, मुक्तक

 सलिल सृजन जून ३०

क्षुद्र ग्रह (ऐस्टरॉइड) दिवस
*
ग़ज़लिका १ ० गुणा-भाग कर रहे कबीर जोड़-घटा हो रहे अमीर . सियासत बना नहीं सकी मिटाती है अदब की लकीर . कर गुरूर उड़ रहा तिनका कह रहा पहाड़ है हकीर . लीक प्रश्नपत्र बिक रहे खूब हम बना रहे नज़ीर . 'सलिल' चौकीदार को सजा दे रहा है चोर बन वजीर ३०.६.२०२६ ००० ग़ज़लिका २ . ज़िंदगी है सफ़र नहीं मंज़िल नाप दरिया न भूलना साहिल . आइनों पर न भरोसा करना अक्स को देख न होना ग़ाफ़िल . कोशिशों ने कभी न पूछा है क्या हुआ है उन्हें कभी हासिल . जो हक़ीक़त बयान करता है उससे नाराज़ क्यों रहा काबिल . नामुरादों! मुराद हो पूरी बेरहम पर न हो रहम नाज़िल ३०.६.२०२६ ०००
०००
मन-बगिया पधराओ सारद महरानी
बीना मधुर बजाओ सारद महरानी
.
कली फूल फल पत्ते टेरें
भू-बनमाली ब्याकुल हेरें।
तितली-भँवरे करें प्रार्थना-
माया-मोह नें नाहक घेरें।
चरन-सरन दिलबाओ सारद महरानी
मन-बगिया पधराओ सारद महरानी
.
ऊँच-नींच पथ पे पग फिसरो
धूप-छाँव में बैंया पकरो।
स्वार्थ सधे के सगरे नाते-
बिपदा में बैरी जग सगरो।
अपनों सें मिलबाओ सारद महरानी
मन-बगिया पधराओ सारद महरानी
.
मैया! 'इकनी एक' सिखा दे
'अ' अनार का पाठ पढ़ा दे
सबद-सबक पुस्तक सें यारी-
कंकर में संकर दिखला दे।
अनहद नाद सुनाओ सारद महरानी
मन-बगिया पधराओ सारद महरानी
३०.६.२०२५
***
क्षुद्र ग्रह (ऐस्टरॉइड) दिवस
क्षुद्रग्रह खगोलीय पिंड होते है जो ब्रह्माण्ड में विचरण करते रहते है। यह अपने आकार में ग्रहों से छोटे और उल्का पिंडों से बड़े होते हैं। खोजा जाने वाला पहला क्षुद्रग्रह, सेरेस, १८१९ में ग्यूसेप पियाज़ी द्वारा पाया गया था और इसे मूल रूप से एक नया ग्रह माना जाता था।
* १९०५ आइंस्टीन ने सापेक्षता सिद्धांत प्रकाशित किया।
३० जून, १९०५ को अल्बर्ट आइंस्टीन ने जर्मन भौतिकी पत्रिका एनालेन डेर फिजिक में "ज़ूर इलेक्ट्रोडायनामिक बेवेग्टर कोर्पर (चलती वस्तुओं के इलेक्ट्रोडायनामिक्स पर)" नामक एक पेपर प्रकाशित किया, जो उनके विशेष सापेक्षता के सिद्धांत को प्रस्तुत करता है। आइंस्टीन के इस अभूतपूर्व कार्य ने भौतिकी की नींव हिला दी।
स्विट्जरलैंड के ज्यूरिख में फेडरल पॉलिटेक्निक स्कूल में पढ़ने के बाद, आइंस्टीन ने १९०२ से १९०९ तक बर्न में स्विस पेटेंट कार्यालय में काम किया। उन्हें "तृतीय श्रेणी के तकनीकी विशेषज्ञ" के रूप में नियुक्त किया गया था, जहाँ वे आविष्कारों की पेटेंट योग्यता की जाँच करते थे, संभवतः उनमें बजरी छाँटने की मशीन और मौसम संकेतक शामिल थे। अपने मित्र मिशेल बेसो को लिखे एक पत्र में, आइंस्टीन ने पेटेंट कार्यालय को " वह धर्मनिरपेक्ष मठ माना जहाँ मैंने अपने सबसे सुंदर विचारों को जन्म दिया ।"
इनमें से सबसे गहन विचार १९०५ में एक के बाद एक लिखे गए पाँच सैद्धांतिक शोधपत्रों में उभरे, जिन्होंने २० वीं सदी के वैज्ञानिक विचारों में क्रांति ला दी। इतिहासकारों ने बाद में इस अवधि को आइंस्टीन के एनस मिराबिलिस या "चमत्कार वर्ष" के रूप में संदर्भित किया। उनके पहले शोधपत्र में प्रकाश के कण सिद्धांत का वर्णन किया गया था, जिसके लिए उन्हें बाद में १९२१ में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला। उनके दूसरे शोधपत्र ने आणविक आकार निर्धारित करने के लिए एक नई विधि बनाई, और उनके तीसरे शोधपत्र ने ब्राउनियन गति की जांच की, जिसमें द्रव में निलंबित कणों की गति के लिए गणितीय व्याख्या प्रस्तुत की गई।
आइंस्टीन का चौथा पेपर, जिसे अक्सर भौतिकी के क्षेत्र में प्रकाशित सबसे महत्वपूर्ण पेपरों में से एक माना जाता है, ने सापेक्षता के अपने विशेष सिद्धांत को प्रस्तुत किया, जिसने ब्रह्मांड के लंबे समय से स्थापित विचारों को पलट दिया जो आइजैक न्यूटन द्वारा गति के नियमों को पेश करने के बाद से प्रचलित थे। न्यूटन ने लिखा, "समय, किसी भी बाहरी चीज़ से संबंध के बिना समान रूप से बहता है," जबकि अंतरिक्ष "हमेशा समान और अचल रहता है।" हालाँकि, आइंस्टीन के कट्टरपंथी सिद्धांत ने माना कि समय और स्थान निरपेक्ष नहीं हैं, बल्कि पर्यवेक्षक की गति के सापेक्ष हैं।
मान लीजिए कि दो पर्यवेक्षक हैं; एक ट्रेन की पटरी पर स्थिर खड़ा है, जबकि दूसरा ट्रेन के बीच में बैठकर एक समान गति से ट्रेन से यात्रा कर रहा है। यदि ट्रेन के दोनों छोर पर बिजली गिरती है, ठीक उसी समय जब ट्रेन का मध्य बिंदु स्थिर पर्यवेक्षक से गुजरता है, तो प्रत्येक बिजली के झटके से प्रकाश को पर्यवेक्षक तक पहुंचने में समान समय लगेगा। वह सही ढंग से मान लेगा कि बिजली के झटके एक साथ हुए थे। हालाँकि, ट्रेन यात्री घटनाओं को अलग तरह से देखेगा। प्रकाश की गति स्थिर रहने पर, पीछे से आने वाला प्रकाश सामने से आने वाले प्रकाश की तुलना में बाद में दिखाई देगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि पीछे से आने वाले प्रकाश को यात्री तक पहुँचने के लिए अधिक दूरी तय करनी पड़ती है क्योंकि वह पीछे से आने वाले बिजली के झटके से दूर जा रही थी और सामने से आने वाले बिजली के झटके की ओर जा रही थी। इसलिए, यात्री को लगेगा कि बिजली के दो झटके एक साथ नहीं हुए हैं, और यह सही भी होगा। सितंबर में, आइंस्टीन ने विशेष सापेक्षता के गणितीय अन्वेषण के साथ पांचवां पेपर प्रकाशित किया: E=mc 2 , जिसमें ऊर्जा (E) द्रव्यमान (m) गुणा प्रकाश की गति (c) वर्ग ( 2 ) के बराबर है। दुनिया में सबसे प्रसिद्ध समीकरण यह माना गया कि द्रव्यमान और ऊर्जा एक दूसरे के स्थान पर इस्तेमाल किए जा सकते हैं और एक ही चीज़ को मापने के अलग-अलग तरीके हैं। इस खोज के दूरगामी परिणाम हुए और इसने परमाणु ऊर्जा और परमाणु बम के अंतिम विकास के लिए मंच तैयार किया, जिसमें आइंस्टीन की कोई प्रत्यक्ष भागीदारी नहीं थी। वास्तव में, शुरुआत में अमेरिका द्वारा परमाणु बम विकसित करने के समर्थक होने के बावजूद, आइंस्टीन ने उस समर्थन को पूरी तरह से त्याग दिया।
एस्टेरॉइड्स, जिन्हें क्षुद्रग्रह भी कहा जाता है, अंतरिक्ष की अजीब और पत्थर जैसी चट्टानें होती हैं जो सूरज के चारों ओर घूमती हैं। ये न तो ग्रह होते हैं और न ही धूमकेतु। ये चट्टान, धातु या बर्फ से बने होते हैं। कुछ एस्टेरॉइड बहुत छोटे होते हैं, जैसे मलबा, जबकि कुछ इतने बड़े होते हैं कि वे छोटे ग्रह जैसे दिखते हैं। इनके पास कोई हवा या वातावरण नहीं होता, लेकिन फिर भी ये बहुत खतरनाक हो सकते हैं। अगर कोई एस्टेरॉइड धरती से टकरा जाए, तो भारी नुकसान हो सकता है। ३० जून १९०८ को तुंगुस्का घटना की सालगिरह पर जब एक उल्कापिंड के हवाई विस्फोट ने साइबेरिया , रूस में लगभग २,१५० वर्ग कि.मी. जंगल को नष्ट कर दिया था । क्षुद्रग्रह दिवस की स्थापना २०१४ में (२०१३ चेल्याबिंस्क उल्कापिंड वायु विस्फोट के बाद के वर्ष में) भौतिक विज्ञानी स्टीफन हॉकिंग , बी ६१२ फाउंडेशन की अध्यक्ष डेनिका रेमी, अपोलो ९ के अंतरिक्ष यात्री रस्टी श्वेकार्ट , फिल्म निर्माता ग्रिगोरी रिक्टर और ब्रायन मे (क्वीन गिटारवादक और खगोल भौतिकीविद्) द्वारा की गई थी। २०१६ में, संयुक्त राष्ट्र ने अपने संकल्प में हर साल 30 जून को विश्व स्तर पर क्षुद्रग्रह दिवस मनाने की घोषणा की। इस आयोजन का उद्देश्य क्षुद्रग्रहों के बारे में जागरूकता बढ़ाना और भविष्य में कोई एस्टेरॉइड धरती से टकराया, तो इसका असर कितना गंभीर हो सकता है, यह बताना है।
***
सॉनेट
सरकार
जाको ईंटा, बाको रोड़ो
आई बहुरिया, मैया बिसरी
भओ पराओ अपनो मोड़ो
जा पसरी, बा एड़ी घिस रई
पल मा पाला बदल ऐंठ रए
खाल ओढ़ लई रे गर्दभ की
धोबी के हो सेर रेंक रए
बारी बंदर के करतब की
मूँड़ मुड़ाओ, सीस झुकाओ
बदलो पाला, लै लो माला
राजा जी की जै-जै गाओ
करो रात-दिन गड़बड़झाला
मनमानी कर लो हर बार
जोड़-तोड़ कर, बन सरकार
३०-६-२०२२
•••
बुंदेली लोकगीत
काए टेरो
*
काए टेरो?, मैया काए टेरो?
सो रओ थो, कओ मैया काए टेरो?
*
दोरा की कुंडी बज रई खटखट
कौना पाहुना हेरो झटपट?
कौना लगा रओ पगफेरो?
काय टेरो?, मैया काए टेरो?...
*
हांत पाँव मों तुरतई धुलाओ
भुज नें भेंटियो, दूरई बिठाओ
मों पै लेओ गमछा घेरो
काय टेरो?, मैया काए टेरो?
*
बिन धोए सामान नें लइयो
बिन कारज बाहर नें जइयो
घरई डार रइओ डेरो
काए टेरो?, मैया काए टेरो
३०-६-२०२०
***
दोहा सलिला
*
नहीं कार्य का अंत है, नहीं कार्य में तंत।
माया है सारा जगत, कहते ज्ञानी संत।।
*
आता-जाता कब समय, आते-जाते लोग।
जो चाहें वह कार्य कर, नहीं मनाएँ सोग।।
*
अपनी-पानी चाह है, अपनी-पानी राह।
करें वही जो मन रुचे, पाएँ उसकी थाह।।
*
एक वही है चौधरी, जग जिसकी चौपाल।
विनय उसी से सब करें, सुन कर करे निहाल।।
*
जीव न जग में उलझकर, देखे उसकी ओर।
हो संजीव न चाहता, हटे कृपा की कोर।।
*
मंजुल मूरत श्याम की, कण-कण में अभिराम।
देख सके तो देख ले, करले विनत प्रणाम।।
*
कृष्णा से कब रह सके, कृष्ण कभी भी दूर।
उनके कर में बाँसुरी, इनका मन संतूर।।
*
अपनी करनी कर सदा, कथनी कर ले मौन।
किस पल उससे भेंट हो, कह पाया कब-कौन??
*
करता वह, कर्ता वही, मानव मात्र निमित्त।
निर्णायक खुद को समझ, भरमाता है चित्त।।
*
चित्रकार वह; दृश्य वह, वही चित्र है मित्र।
जीव समझता स्वयं को, माया यही विचित्र।।
*
बिंब प्रदीपा ज्योति का, सलिल-धार में देख।
निज प्रकाश मत समझ रे!, चित्त तनिक सच लेख।।
३०.६.२०१८
***
आज की कार्यशाला:
रचना-प्रतिरचना
गुरु सक्सेना नरसिंहपुर-संजीव वर्मा सलिल जबलपुर
*
समुच्चय और आक्षेप अलंकार
घनाक्षरी छंद
दुर्गा गणेश ब्रह्मा विष्णु महेश
पांच देव मेरे भाग्य के सितारे चमकाइये
पांचों का भी जोर भाग्य चमकाने कम पड़े
रामकृष्ण जी को इस कार्य में लगाइए।
रामकृष्ण जी के बाद भाग्य ना चमक सके
लगे हाथ हनुमान जी को आजमाइए।
सभी मिलकर एक साथ मुझे कॉलोनी में
तीस बाई साठ का प्लाट दिलवाइए।
३०-६-२०१७
***
प्रतिरचना:
देव! कवि 'गुरु' प्लाट माँगते हैं आपसे
गुरु गुड, चेले को शुगर आप मानिए।
प्लाट ऐसा दे दें धाँसू कवितायें हो सकें,
चेले को भूखंड दे भवन एक तानिए।
प्रार्थना है आपसे कि खाली मन-मंदिर है,
सिया-उमा, भोले- हनुमान संग विराजिए।
सियासत हो रही अवध में न आप रुकें,
नर्मदा 'सलिल' सँग आ पंजीरी फाँकिये।
***
मुक्तक
मतभेदों की नींव पर खड़े कर मतैक्य के महल अगर हम
मनभेदों को भुला सकें तो घट जायेंगे निश्चय ही गम
मानव दुविधा में सुविधा की खोज करे, कुछ पाएगा ही
कुछ कोशिश करना ही होगी, फहराना ही है यदि परचम
*
गले अजनबी से मिलकर यूँ लगा कि कोई अपना है
अपने मिले मगर अपनापन लगा कि केवल सपना है
बारिश ठंडी ग्रीष्म न ठहरे, आए आकर चले गए-
सलिल तुम्हारा भाग्य न बदला, नाहक माला जपना है
***
गीत
तुलसी
*
तुलसी को
अपदस्थ कर गयी
आकर नागफनी।
सहिष्णुता का
पौधा सूखा
घर-घर तनातनी।
*
सदा सुहागन मुरझाई है
खुशियाँ दूर हुईं।
सम्बन्धों की नदियाँ सूखीं
या फिर पूर हुईं।
आसों-श्वासों में
आपस में
बातें नहीं बनी।
तुलसी को
अपदस्थ कर गयी
आकर नागफनी।
*
जुही-चमेली पर
चंपा ने
क्या जादू फेरा।
मगरमस्त संग
'लिव इन' में
हैं कैद, कसा घेरा।
चार दिनों में
म्यारी टूटी
लकड़ी रही घुनी।
तुलसी को
अपदस्थ कर गयी
आकर नागफनी।
*
झुके न कोई तो कैसे
हो तालमेल मुमकिन।
बर्तन रहें खटकते फिर भी
गा-नाचें ता-धिन।
तृप्ति चाहते
प्यासों ने ध्वनि
कलकल नहीं सुनी।
तुलसी को
अपदस्थ कर गयी
आकर नागफनी।
***
पुस्तक सलिला-
'लोकल विद्वान' व्यंग्य का रोचक वितान
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
[पुस्तक विवरण- लोकल विद्वान, व्यंग्य लेख संगर्ह, अशोक भाटिया, प्रथम संस्करण, ISBN ९७८-९३-८५९४२-१०-५, २०.५ से. मी. x १४ से. मी., पृष्ठ ९६, मूल्य ८०/-, आवरण पेपरबैक, दोरंगी, बोधि प्रकाशन, ऍफ़ ७७, सेक़्टर ९, मार्ग ११, करतारपुरा औद्योगिक क्षेत्र, बाईस गोदाम, जयपुर ३०२००६, दूरभाष ०१४१ २५०३९८९, व्यंग्यकार संपर्क बसेरा, सेक़्टर १३, करनाल १३२००१ चलभाष ९४१६११५२१००, ahsokbhatiahes@gmail.com]
*
हिंदी गद्य के लोकप्रय विधाओं में व्यंग्य लेख प्रमुख है। व्यंञकार समसामयिक घटनाओं और समस्याओं की नब्ज़ पर हाथ रखकर उनके कारन और निदान की सीढ़ी चर्चा न कर इंगितों, व्यंगोक्तियों और वक्रोक्तियों के माध्यम से गुदगुदाने, चिकोटी काटने या तीखे व्यंग्य के तिलमिलाते हुए पाठक को चिंतन हेतु प्रेरित करता है। वह उपचार न कर, उपचार हेतु चेतना उत्पन्न करता है
हिंदी व्यंग्य लेखन को हाशिये से मुख्य धारा में लाने में हरिशंकर परसाई, शरद जोशी, रवींद्रनाथ त्यागी, श्री लाल शुक्ल आदि की परंपरा को समृद्ध करनेवाले वर्तमान व्यंग्यकारों में अशोक भाटिया उल्लेखनीय हैं। भाटिया जी हिंदी प्राध्यापक हैं इसलिए उनमें विधा के उद्भव, विकास तथा वर्तमान की चेतना और विकास के प्रति संवेदनशील दृष्टि है। स्पष्ट समझ उन्हें हास्य औेर व्यंग्य के मध्य बारीक सीमा रख का उल्लंघन नहीं करने देती। वे व्यंग्य और लघुकथा के क्षेत्र में चर्चित रहे हैं।
विवेच्य कृति लोकल विद्वान में २१ व्यंग्य लेख तथा १४ व्यंग्यात्मक लघुकथाएँ हैं। कुत्ता न हो पाने का दुःख में लोभवृत्ति, लोकल विद्वान में बुद्धिजीवियों के पाखण्ड, महान बनने के नुस्खे में आत्म प्रचार, चलते-चलते में प्रदर्शन वृत्ति , कुत्ता चिंतन सार में स्वार्थपरता, नेता और अभिनेता में राजनैतिक विद्रूप , साड़ीवाद में महिलाओं की सौंदर्यप्रियता, मेले का ग्रहण में मेलों की आड़ में होते कदाचार, असंतोष धन में वर्तमान परिप्रेक्ष्य में पारम्परिक मुहावरों के नए अर्थ, तेरा क्या होगा? में आचरण के दोमुंहेपन, निठल्ले के बोल में राजनैतिक नेता के मिथ्या प्रलाप, फाल करने का सुख में अंग्रेजी शब्द के प्रति मोह, विलास राम शामिल के कारनामे में साहित्यकारों के प्रपंचों, रबड़श्री भारतीय खेल दल में क्रीड़ा क्षेत्र व्याप्त विसंगतियों, किस्म-किस्म की समीक्षा में विषय पर विश्लेषणपरक विवेचन, इम्तहान एक सभ्य फ्राड में शिक्षा जगत की कमियों, साहित्य के ओवरसियर में लेखका का आत्ममोह, ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर में धन-लोभ, पीड़ा हरण समारोह में साहित्य क्षेत्र में व्याप्त कुप्रवृत्तियों, नौ सौ चूहे बिल्ली और हज में राजनीति तथा नई प्रेम कथा में प्रेम के नाम पर हो रहे दुराचार पर अशोक जी ने कटाक्ष किये हैं।
इन व्यंग्य लेखों में प्रायः आकारगत संतुलन, वैचारिक मौलिकता, शैलीगत सहजता, वर्णनात्मक रोचकता और विषयगत है जो पाठक को बाँधे रखने के साथ सोचने के लिए प्रवृत्त करता है। अशोक जी विषयों का चयन सामान्य जन के परिवेश को देखकर करते हैं इसलिए पाठक की उनमें रूचि होना स्वाभाविक है। वे आम बोलचाल की भाषा के पक्षधर हैं, इसलिए अंग्रेजी-उर्दी के शब्दों का स्वाभाविकता के साथ प्रयोग करते हैं।
लघु कथाओं में अशोक जी किसी न किसी मानवीय प्रवृत्ति के इर्द-गिर्द कथानक बुनते हुए गंभीर चुटकी लेते हैं। रोग और इलाज में नेताओं की बयानबाजी, क्या मथुरा क्या द्वारका में अफसर की बीबी की ठसक, सच्चा प्यार में नयी पीढ़ी में व्याप्त प्रेम-रोग, दोहरी समझ में वैचारिक प्रतिबद्धता के भाव, अच्छा घर में प्रच्छन्न दहेज़, वीटो में पति-पत्नी में अविश्वास, अंतहीन में बेसिर पैर की गुफ्तगू, साहब में अधिकारियों के काम न करने, दर्शन में स्वार्थ भाव से मंदिर जाने, एस एम एस में व्यक्तिगत संपर्क के स्थान पर संदेश भेजने, पहचान में आदमी को किसी न किसी आधार पर बाँटने तथा दान में स्वार्थपरता को केंद्र में रखकर अशोक जी ने पैने व्यंग्य किये हैं।
सम सामायिक पर सहज, सुबोध, रोचक शैली में तीखे व्यंग्य पाठक को चिंतन दृष्टि देने समर्थ हैं। अशोक जी की १२ पुस्तकें पूर्व प्रकाशित हैं। उनकी सूक्ष्म अवलोकन वृत्ति उन्हें दैनन्दिन जीवन के प्रसंगों पर नए कोण से देखने, सोचने और लिखने सक्षम बनाती है। इस व्यंग्य संग्रह का स्वागत होगा।
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मुक्तक
मतभेदों की नींव पर खड़े कर मतैक्य के महल अगर हम
मनभेदों को भुला सकें तो घट जायेंगे निश्चय ही गम
मानव दुविधा में सुविधा की खोज करे, कुछ पाएगा ही
कुछ कोशिश करना ही होगी, फहराना ही है यदि परचम
३०-६-२०१६
दो पदी
गले अजनबी से मिलकर यूँ लगा कि कोई अपना है
अपने मिले मगर अपनापन लगा कि केवल सपना है
३०-६-२०१५
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छंद सलिला:
दण्डकला छंद
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छंद-लक्षण: जाति लाक्षणिक, प्रति चरण मात्रा ३२ मात्रा, यति १०-८-८-६, पदांत लघुगुरु, चौकल में पयोधर (लघु गुरु लघु / जगण) निषेध।
लक्षण छंद: यति दण्डकला दस / आठ आठ छह / लघु गुरु सदैव / पदांत हो
जाति लाक्षणिक गिन / रखें हर पंक्ति / बत्तिस मात्रा / सुखांत हो
उदाहरण:
१. कल कल कल प्रवहित / नर्तित प्रमुदित / रेवा मैया / मन मोहे
निर्मल जलधारा / भय-दुःख हारा / शीतल छैयां / सम सोहे
कूदे पर्वत से / छप-छपाक् से / जलप्रपात रच / हँस नाचे
चुप मंथर गति बह / पीर-व्यथा दह / सत-शिव-सुंदर / नित बाँचे
२. जय जय छत्रसाल / योद्धा-मराल / शत वंदन नर / नाहर हे!
'बुन्देलखंडपति / यवननाथ अरि / अभिनन्दन असि / साधक हे
बल-वीर्य पराक्रम / विजय-वरण क्षम / दुश्मन नाशक / रण-जेता
थी जाती बाजी / लाकर बाजी / भव-सागर नौ/का खेता
३. संध्या मन मोहे / गाल गुलाबी / चाल शराबी / हिरणी सी
शशि देख झूमता / लपक चूमता / सिहर उठे वह / घरनी सी
कुण्डी खड़काये / ननद दुपहरी / सास निशा खों-/खों खांसे
देवर तारे ससु/र आसमां बह/ला मन फेंके / छिप पांसे
----------
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामिनीमोहन, काव्य, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दण्डकला, दिक्पाल, दीप, दीपकी, दोधक, दृढ़पद, नित, निधि, निश्चल, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदन,मदनावतारी, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, मृदुगति, योग, ऋद्धि, रसामृत, रसाल, राजीव, राधिका, रामा, रूपमाला, लीला, वस्तुवदनक, वाणी, विरहणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुद्ध ध्वनि, शुभगति, शोभन, सरस, सार, सारस, सिद्धि, सिंहिका, सुखदा, सुगति, सुजान, सुमित्र, संपदा, हरि, हेमंत, हंसगति, हंसी)
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नवगीत
*
इसरो को शाबाशी
किया अनूठा काम
'पैर जमाकर
भू पर
नभ ले लूँ हाथों में'
कहा कभी
न्यूटन ने
सत्य किया
इसरो ने
पैर रखे
धरती पर
नभ छूते अरमान
एक छलाँग लगाई
मंगल पर
है यान
पवनपुत्र के वारिस
काम करें निष्काम
अभियंता-वैज्ञानिक
जाति-पंथ
हैं भिन्न
लेकिन कोई
किसी से
कभी न
होता खिन्न
कर्म-पुजारी
सच्चे
नर हों या हों नारी
समिधा
लगन-समर्पण
देश हुआ आभारी
गहें प्रेरणा हम सब
करें विश्व में नाम
२४-९-२०१४
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भोजपुरी हाइकु:
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आपन बोली
आ ओकर सुभाव
मैया क लोरी.
*
खूबी-खामी के
कवनो लोकभासा
पहचानल.
*
तिरिया जन्म
दमन आ शोषण
चक्की पिसात.
*
बामनवाद
कुक्कुरन के राज
खोखलापन.
*
छटपटात
अउरत-दलित
सदियन से.
*
राग अलापे
हरियल दूब प
मन-माफिक.
*
गहरी जड़
देहात के जीवन
मोह-ममता.
३०-६-२०१४
***