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शनिवार, 24 अक्तूबर 2020

दुर्गा पूजा

दुर्गा पूजा परंपरा : सामाजिक उपादेयता
आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ 
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[लेखक परिचय: जन्म २०-८-१९५२, आत्मज - स्व. शांति देवी - स्व. राजबहादुर वर्मा, शिक्षा - डिप्लोमा सिविल इंजी., बी. ई., एम.आई.ई., एम.आई. जी.एस., एम.ए. (अर्थशास्त्र, दर्शन शास्त्र) विधि स्नातक, डिप्लोमा पत्रकारिता), संप्रति - पूर्व संभागीय परियोजना प्रबंधक/कार्यपालन यंत्री, अधिवक्ता म.प्र. उच्च न्यायालय, प्रकाशित पुस्तकें - ७, सहलेखन ५ पुस्तकें, संपादित पुस्तकें १५, स्मारिकाएँ १७, पत्रिकाएँ ७, भूमिका लेखन ५० पुस्तकें, समीक्षा ३०० पुस्तकें, तकनीकी शोध लेख २०, सम्मान - १२ राज्यों की संस्थाओं द्वारा १५० से अधिक सम्मान। उपलब्धि - इंस्टीट्यूशन ऑफ़ इंजीनियर्स द्वारा तकनीकी लेख ‘वैश्विकता के निकष पर भारतीय यांत्रिकी संरचनाएँ’ को राष्ट्रीय स्तर पर सेकेण्ड बेस्ट पेपर अवार्ड। ]
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सनातन धर्म में भक्त और भगवान का संबंध अनन्य और अभिन्न है। एक ओर भगवान सर्वशक्तिमान, करुणानिधान और दाता है तो दूसरी ओर 'भगत के बस में है भगवान' अर्थात भक्त बलवान हैं। सतही तौर पर ये दोनों अवधारणाएँ परस्पर विरोधी प्रतीत होती किंतु वस्तुत: पूरक हैं। सनातन धर्म पूरी तरह विग्यानसम्मत, तर्कसम्मत और सत्य है। जहाँ धर्म सम्मत कथ्य विग्यान से मेल न खाए वहाँ जानकारी का अभाव या सम्यक व्याख्या न हो पाना ही कारण है।
परमेश्वर ही परम ऊर्जा
सनातन धर्म परमेश्वर को अनादि, अनंत, अजर और अमर कहता है। थर्मोडायनामिक्स के अनुसार 'इनर्जी कैन नीदर बी क्रिएटेड नॉर बी डिस्ट्रायडट, कैन बी ट्रांसफार्म्ड ओनली'। ऊर्जा उत्पन्न नहीं की जा सकती इसलिए अनादि है, नष्ट नहीं की जा सकती इसलिए अमर है, ऊर्जा रूपांतरिहोती है, उसकी परिसीमन संभव नहीं इसलिए अनंत है। ऊर्जा कालातीत नहीं होती इसलिए अजर है। ऊर्जा ऊर्जा से उत्पन्न हो ऊर्जा में विलीन हो जाती है। पुराण कहता है -
'ॐ पूर्णमद: पूर्ण मिदं पूर्णात पूर्णस्यते
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्ण मेवावशिष्यते'
ॐ पूर्ण है वह पूर्ण है यह, पूर्ण है ब्रम्हांड सब
पूर्ण में से पूर्ण को यदि दें घटा, शेष तब भी पूर्ण ही रहता सदा।
अंशी (पूर्ण) और अंश का नाता ही परमात्मा और आत् का नाता है। अंश का अवतरण पूर्ण बनकर पूर्ण में मिलने हेतु ही होता है। इसलिए सनातनधर्मी परमसत्ता को निरपेक्ष मानते हैं। कंकर कंकर में शंकर की लोक मान्यतानुसार कण-कण में भगवान है, इसलिए 'आत्मा सो परमात्मा'। यह प्रतीति हो जाए कि हर जीव ही नहीं; जड़ चेतन' में भी उसी परमात्मा का अंश है, जिसका हम में है तो हम सकल सृष्टि को सहोदरी अर्थात एक माँ से उत्पन्न मानकर सबसे समता, सहानुभूति और संवेदनापूर्ण व्यवहार करेंगे। सबकी जननी एक है जो खुद के अंश को उत्पन्न कर, स्वतंत्र जीवन देती है। यह जगजननी ममतामयी ही नहीं है; वह दुष्टहंता भी है। उसके नौ रूपों का पूजन नव दुर्गा पर्व पर किया जाता है। दुर्गा सप्तशतीकार उसका वर्णन करता है-
सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणी नमोस्तुते।।
सब मंगल की मंगलकारी, शिवा सर्वार्थ साधिका 
शरण तुम्हारी त्रिलोचने, गौरी नारायणी नमन तुम्हें
मत्स्य पुराण के अनुसार मत्स्य भगवान से त्रिदेवों और त्रिदेवियों की उत्पत्ति हुई जिन्हें क्रमश: सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और विनाश का दायित्व मिला। ब्रह्मवैवर्त पुराण श्रीकृष्ण को सृष्टि का मूल मानता है। शिव पुराण के अनुसार शिव सबके मूल हैं। मार्कण्डेय पुराण और दुर्गा सप्तशती शक्ति को महत्व दें, यह स्वाभाविक है।
भारत में शक्ति पूजा की चिरकालिक परंपरा है। संतानें माँ को बेटी मानकर उनका आह्वान कर, स्वागत, पूजन, सत्कार, भजन तथा विदाई करती हैं। अंग्रेजी कहावत है 'चाइल्ड इज द फादर ऑफ़ मैन' अर्थात 'बेटा ही है बाप बाप का'। संतानें जगजननी को बेटी मानकर, उसके दो बेटों कार्तिकेय-गणेश व दो बेटियों शारदा-लक्ष्मी सहित मायके में उसकी अगवानी करती हैं। पर्वतेश्वर हिमवान की बेटी दुर्गा स्वेच्छा से वैरागी शिव का वरण करती है। बुद्धि से विघ्नों का निवारण करनेवाले गणेश और पराक्रमी कार्तिकेय उनके बेटे तथा ज्ञान की देवी शारदा व समृद्धि की देवी लक्ष्मी उनकी बेटियाँ हैं।
दुर्गा आत्मविश्वासी हैं, माता-पिता की अनिच्छा के बावजूद विरागी शिव से विवाहकर उन्हें अनुरागी बना लेती हैं। वे आत्मविश्वासी हैं, एक बार कदम आगे बढ़ाकर पीछे नहीं हटातीं। वे अपने निर्णय पर पश्चाताप भी नहीं करतीं। पितृग्रह में सब वैभव सुलभ होने पर भी विवाह पश्चात् शिव के अभावों से भरे परिवेश में बिना किसी गिले-शिकवे या क्लेश के सहज भाव से संतुष्ट-सुखी रहती हैं। शुंभ-निशुम्भ द्वारा भोग-विलास का प्रलोभन भी उन्हें पथ से डिगाता नहीं। शिक्षा के प्रसार और आर्थिक स्वावलंबन ने संतानों के लिए मनवांछित जीवन साथी पाने का अवसर सुलभ करा दिया है। देखा जाता है की जितनी तीव्रता से प्रेम विवाह तक पहुँचता है उतनी ही तीव्रता से विवाहोपरांत घटता है और दोनों के मनों में उपजता असंतोष संबंध विच्छेद तक पहुँच जाता है। 
शिव-शिवा का संबंध विश्व में सर्वाधिक विपरीत प्रवृत्तियों का मिलन है। शिव सर्वत्यागी हैं, उमा राजा हिमवान की दुलारी पुत्री, राजकुमारी हैं। शिव संसाधन विहीन हैं, उमा सर्व साधन संपन्न हैं। शिव वैरागी हैं, उमा अनुरागी। शिव पर आसक्त होकर उमा प्राण-प्रणसे जतन कर उन्हें मनाती हैं और स्वजनों की असहमति की चिंता किये बिना विवाह हेतु तत्पर होती हैं किंतुपितृ गृह से भागकर पिता की प्रतिष्ठा को आघात नहीं पहुँचातीं, सबके सहमत होने पर ही सामाजिक विधि-विधान, रीति-रिवाजों के साथ अपने प्रियतम की अर्धांगिनी हैं। समाज के युवकों और युवतियों के लिये यह प्रसंग जानना-समझना और इसका अनुकरण करना जीवन को पूर्णता प्रदान करने के लिए परमावश्यक है। शिव साधनविहीनता के बाद भी उमा से इसलिए विवाह नहीं करना चाहते कि वह राजकुमारी है। वे उमा की सच्ची प्रीति और अपने प्रति प्रतिबद्धता जानने के पश्चात ही सहमत होते हैं। विवाह में वे कोई दहेज़ या धन नहीं स्वीकारते, केवल उमा के साथ श्वसुरालय से विदा होते हैं। यहाँ यह समझना आवश्यक है कि सामाजिक और पारिवारिक मान-मर्यादा धन-वैभव प्रदर्शन में नहीं, संस्कारों के शालीनतापूर्वक संपादन में है। 
विवाह पश्चात नववधु उमा को पितृ-गृह से सर्वथा विपरीत वातावरण प्रिय-गृह में मिलता है। वहाँ सर्व सुविधा, साधन, सेविकाएँ उपलब्ध थीं यहाँ सर्वअसुविधा, साधनहीनता तथा ‘अपने सहायक आप हो’ की स्थिति किंतु उमा न तो अपने निर्णय पर पछताती हैं, न प्रियतम से किसी प्रकार की माँग करती हैं। वे शिव के साथ, नीर-क्षीर तरह एकात्म हो जाती हैं। वे मायके से कोई उपहार या सहायता नहीं लेतीं, न शिव को घर जमाई बनने हेतु प्रेरित या बाध्य करती हैं। शिव से नृत्य स्पर्धा होने पर माँ मात्र इसलिए पराजय स्वीकार लेती हैं कि शिव की तरह नृत्यमुद्रा बनाने पर अंग प्रदर्शन न हो जाए। उनका संदेश स्पष्ट है मर्यादा जय-पराजय से अधिक महत्वपूर्ण है, यह भी कि दाम्पत्य में हार (पराजय) को हार (माला) की तरह सहज स्वीकार लें तो हार ही जीत बन जाती है। यह ज्ञान लेकर श्वसुरालय जानेवाली बेटी बहू के रूप में सबका मन जीत सकेगी। उमा पराक्रमी होते हुए भी लज्जाशील हैं। शिव भी जान जाते हैं कि उमा ने प्रयास न कर उन्हें जयी होने दिया है। इससे शिव के मन में उनका मान बढ़ जाता है और वे शिव की ह्रदय-साम्राज्ञी हो पाती हैं। पाश्चात्य जीवन मूल्यों तथा चित्रपटीय भूषा पर मुग्ध तरुणियाँ दुर्गा माँ से अंग प्रदर्शन की अपेक्षा लज्जा निर्वहन का संस्कार ग्रहण कर मान-मर्यादा का पालन कर गौरव-गरिमा सकेंगी। उमा से अधिक तेजस्विनी कोई नहीं हो सकता पर वे उस तेज का प्रयोग शिव को अपने वश में करने हेतु नहीं करतीं, वे शिव के वश में होकर शिव का मन जीतती हैं हुए अपने तेज का प्रयोग समय आने पर अपनी संतानों को सुयोग्य बनाने और शिव पर आपदा आने पर उन्हें बचा
उमा अपनी संतानों को भी स्वावलंबन, संयम और स्वाभिमान की शिक्षा देती हैं। अपनी एक पुत्री को सर्वप्रकार की विद्या प्राप्त करने देती हैं, दूसरी पुत्री को उद्यमी बनाती हैं, एक पुत्र सर्व विघ्नों का शमन में निष्णात है तो दूसरा सर्व शत्रुओं का दमन करने में समर्थ। विश्व-इतिहास में केवल दो ही माताएँ अपनी संतानों को ऐसे दुर्लभ-दिव्य गुणों से संपन्न बना सकी हैं, एक उमा और दूसरी कैकेयी। 
लगभग १२०० वर्ष पुराने मार्कण्डेय पुराण के देवी महात्म्य में वे अनाचार के प्रतिकार हेतु सिंहवाहिनी होकर महाबलशाली महिषासुर का वध और रक्तबीज का रक्तपान करती हैं। अत्यधिक आवेश में वे सब कुछ नष्ट करने की दिशा में प्रेरित होती हैं तो शिव प्रलयंकर-अभ्यंकर होते हुए भी उनके पथ में लेट जाते हैं। शिव के वक्ष पर चरण रखते ही उन्हें मर्यादा भंग होने का ध्न आता है और उनके विकराल मुख से जिव्हा बाहर आ जाती है। तत्क्षण वे अपने कदम रोक लेती हैं। उनसे जुड़ा हर प्रसंग नव दंपतियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। जरा-जरा सी बात में अहं के कारण राई को पर्वत बनाकर टूटते संबंधों और बिखरते परिवारों को दुर्गा पूजन मात्र से संतुष्ट न होकर, उनके आचरण से सीख लेकर जीवन को सुखी बनाना चाहिए। एकांगी स्त्री-विमर्श के पक्षधर शिव-शिवा से जीवन के सूत्र ग्रहण कर सकें तो टकराव और बिखराव के कंटकाकीर्ण पथ को छोड़कर, अहं विसर्जन कर समर्पण और सहचार की पगडंडी पर चलकर परिवार जनों को स्वर्गवासी किये बिना स्वर्गोपम सुख पहुँचा सकेंगे। 
स्त्री को दासी समझने का भ्रम पालनेवाले नासमझ शिव से सीख सकते हैं कि स्त्री की मान-मर्यादा की रक्षा ही पुरुष के पौरुष का प्रमाण है। शिव अनिच्छा के बाद भी उमा के आग्रह की रक्षा हेतु उनसे उनसे विवाह करते हैं किन्तु विवाह पश्चात् उमा का सुख ही उनके लिए सर्वस्व हो जाता है। लंबे समय तक प्रवास पश्चात् लौटने पर गृह द्वार पर एक अपरिचित बालक द्वारा हठपूर्वक रोके जाने पर शिव उसका वध कर देते हैं। कोलाहल सुनकर द्वार पर आई उमा द्वारा बालक की निष्प्राण देह पर विलाप करते हुए यह बताये जाने पर कि वह बालक उमा का पुत्र है और शिव ने उसका वध कर दिया, स्तब्ध शिव न तो उमा पर संदेह करते हैं, न लांछित करते हैं अपितु अपनी भूल स्वीकारते हुए बालक की चिकित्सा कर उसे नवजीवन देकर पुत्र स्वीकार लेते हैं। समाज में हर पति को शिव की तरह पत्नी के प्रति अखंड विश्वास रखना चाहिए। इस प्रसंग के पूर्व, पूर्वजन्म में शिव द्वारा मना करने के बाद भी सती (उमा का पूर्व जन्म में नाम) पिता दक्ष द्वारा आयोजित यज्ञ में गईं, स्वामी शिव की अवहेलना और निंदा न सह पाने के कारण यज्ञ वेदी में स्वयं को भस्म कर लिया। शिव ने यह ज्ञात होने पर यज्ञ ध्वंस कर दोषियों को दंड दिया तथा सती की देह उठाकर भटकने लगे। सृष्टि के हित हेतु विष्णु ने चक्र से देह को खंडित कर दिया, जहाँ-जहाँ सती के अंग गिरे वहाँ शक्ति पीठें स्थापित हुईं। 
शिव ने समाधि लगा ली। तारकासुर के विनाश हेतु शिवपुत्र की आवश्यकता होने पर कामदेव ने शिव का तप भंग किया किन्तु तपभंग से क्रुद्ध शिव की कोपाग्नि में भस्म हो गए। अति आवेश से स्खलित शिववीर्य का संरक्षण कृतिकाओं ने किया, जिससे कार्तिकेय का जन्म हुआ। पार्वती ने बिना कोई आपत्ति किये शिव पुत्र को अपना पुत्र मानकर लालन-पालन किया। क्या आज ऐसे परिवार की कल्पना भी की जा सकती है जिसमें पति का पुत्र पत्नी के गर्भ में न रहा हो, पत्नी के पुत्र से पति अनजान हो और फिर भी वे सब बिना किसी मतभेद के साथ हों, यही नहीं दोनों भाइयों में भी असीम स्नेह हो। शिव परिवार ऐसा ही दिव्य परिवार है जहाँ स्पर्धा भी मनभेद उत्पन्न नहीं कर पाती। कार्तिकेय और गणेश में श्रेष्ठता संबंधी विवाद होने पर शिव ने उन्हें सृष्टि परिक्रमा करने का दायित्व दिया। कार्तिकेय अपने वाहन मयूर पर सवार होकर उड़ गए, स्थूल गणेश ने मूषक पर जगत्पिता शिव और जगन्माता पार्वती की परिक्रमा कर ली और विजयी हुए। इस प्रसंग से शक्ति पर बुद्धि की श्रेष्ठता प्रमाणित हुई। 
दुर्गापूजा में माँ दुर्गा की प्रतिमा के साथ भगवान शिव, गणेशजी, लक्ष्मीजी, सरस्वती जी और कार्तिकेय जी की पूजा पूरे विधि-विधान के साथ की जाती है। श्री दुर्गासप्तशती पाठ (स्रोत,गीताप्रेस,गोरखपुर) के द्वितीय अध्याय में देह दुर्ग को जीतकर दुर्गा विरुद से विभूषित शक्ति द्वारा महिषासुर वध के पूर्व उनकी ज्येष्ठ पुत्री महालक्ष्मी का ध्यान किया गया है - 
ॐ अक्षस्त्रक्परशुंगदेषुकुलिशम् पद्मं धनुष्कुण्डिकाम्, दण्डं शक्तिमसिं च चर्म जलजं घण्टां सुराभाजनम्
शूलं पाशसुदर्शने च दधतीं हस्तै: प्रसन्नानां, सेवे सैरभमर्दिनिमिह महालक्ष्मीं सरोजस्थिताम्
ॐ अक्षमाल फरसा गदा बाण वज्र धनु पद्म, कुण्डि दंड बल खड्ग सह ढाल शंख मधुपात्र 
घंटा शूल सुपाश चक्र कर में लिए प्रसन्न, महिष दैत्य हंता रमा कमलासनी भजामि 
श्री दुर्गासप्तशती पाठ (स्रोत,गीताप्रेस,गोरखपुर) के पंचम अध्याय में इस बात की चर्चा है कि महासरस्वती अपने कर कमलों घण्टा, शूल, हल, शंख, मूसल, चक्र, धनुष और बाण धारण करती हैं। शरद ऋतु के शोभा सम्पन्न चन्द्रमा के समान उनकी मनोहर कांति है। वे तीनों लोकों की आधारभूता और शुम्भ आदि दैत्यों का नाश करने वाली हैं। पंचम अध्याय के प्रारम्भ में निम्न श्लोक दृष्टव्य है- 
ॐ घंटा शूलहलानि शंखमूसले चक्रं धनुं सायकं, हस्ताब्जैर्दधतीं घनान्तविलसच्छीतांशुतुल्यप्रभाम्
गौरी देहसमुद्भवां त्रिजगतामाधारभूतां महापूर्वामत्र सरस्वतीमनुभजे शुंभादिदैत्यार्दिनीम्
ॐ घंट शूल हल शंख मूसल चक्र धनु बाण, करकमलों में हैं लिए, शरत्चंद्र सम कांति 
गौरिज जगताधार पूर्वामत्र सरस्वती, शुम्भ दैत्यमर्दिनी नमन भजूं सतत पा शांति 
उल्लेखनीय है कि दुर्गाशप्तशती में माँ की दोनों पुत्रियों को महत्व दिया गया है किन्तु दोनों पुत्रों कार्तिकेय और गणेश नहीं हैं। सरस्वती जी पर केंद्रित ‘प्राधानिकं रहस्यं’ उपसंहार के अंतर्गत है। स्वयं शिव का स्थान भी माँ के स्वामी रूप में ही है, स्वतंत्र रूप से नहीं। इसका संकेत आरम्भ में अथ सप्तश्लोकी दुर्गा में शिव द्वारा देवताओं को माँ की महिमा बताने से किया गया है। विनियोग आरम्भ करते समय श्री महाकाली, महालक्ष्मी व् महासरस्वती का देवता रूप में उल्लेख है। स्त्री-पुरुष समानता के नाम पर समाज को विखंडित करनेवाले यदि दुर्गासप्तशती का मर्म समझ सकें तो उन्हें ज्ञात होगा कि सनातन धर्म लिंग भेद में विश्वास नहीं करता किंतु प्रकृति-पुरुष को एक दूसरे का पूरक मानकर यथावसर यथायोग्य महत्त्व देते है। त्रिदेवियों की महत्ता प्रतिपादित करती दुर्गा सप्तशती और माँ के प्रति भक्ति रखनेवालों में पुरुष कम नहीं हैं। यह भी कि माँ को सर्वाधिक प्यारी संतान परमहंस भी पुत्र ही हैं। 
दुर्गा परिवार - विसंगति से सुसंगति
दुर्गा परिवार विसंगति से सुसंगति प्राप्त करने का आदर्श उदाहरण है। शिव पुत्र कार्तिकेय (स्कंद) उनकी पत्नी के पुत्र नहीं हैं। स्कंद पुराण के अनुसार भगवान शिव-वरदान पाकर अति शक्तिशाली हुए अधर्मी राक्षस तारकासुर का वध केवल केवल शिवपुत्र ही कर सकता था। वैरागी शिव का पुत्र होने की संभावना न देख तारकासुर तीनों लोकों में हाहाकार मचा रहा था। त्रस्त देवगण विष्णु के परामर्श पर कैलाश पहुँचे। शिव-पार्वती देवदारु वन में एक गुफा में एकांतवास पर थे। अग्नि देव शिव से पुत्र उत्पत्ति हेतु प्रार्थना करने के उद्देश्य से गुफा-द्वार तक पहुँचे। शिव-शिवा अद्वैतानंद लेने की स्थिति में थे। परपुरुष की आहट पाते ही देवी ने लज्जा से अपना सुंदर मुख कमलपुष्प से ढक लिया, वह रूप लज्जा गौरी के नाम से प्रसिद्ध है। कामातुर शिव का वीर्यपात हो गया। अग्निदेव उस अमोघ वीर्य को कबूतर का रूप धारण कर, तारकासुर से बचाकर जाने लगे। वीर्य का उग्र ताप अग्निदेव से सहन नहीं हुआ। अग्नि ने वह अमोघ वीर्य गंगा को सौंप दिया किंतु उसके ताप से गंगा का पानी उबलने लगा। भयभीत गंगा ने वह दिव्य अंश शरवण वन में स्थापित कर दिया किंतु गंगाजल में बहते-बहते छह भागों में विभाजित उस दिव्य अंश से छह सुंदर-सुकोमल शिशुओं का जन्म हुआ। उस वन में विहार करती छह कृतिका कन्याओं ने उन बालकों का कृतिकालोक ले जाकर पालन-पोषण किया। नारद जी से यह वृतांत सुन शिव-पार्वती कृतिकालोक पहुँचे। पार्वती ने उन बालकों को इतने ज़ोर से गले लगाया कि वे छह शिशु एक शिशु हो गए जिसके छह शीश थे। शिव-पार्वती कृतिकाओं से बालक को लेकर कैलाश वापस आ गए। कृतिकाओं द्वारा पालित उस बालक को कार्तिकेय (स्कन्द, षडानन, पार्वतीनंदन, तारकजित्, महासेन, शरजन्मा, सुरसेनानी, अग्निभू, बाहुलेय, गुह,विशाख, शिखिवाहन, शक्तिश्वर, कुमार, क्रचदारण) कहा गया। कार्तिकेय ने बड़े होकर राक्षस तारकासुर का संहार किया। देवी अपने गर्भ से उत्पन्न न होने पर भी पति शिव के पुत्र को अपना मान लेती हैं।
पार्वती पुत्र गणेश उनके पति शिव के पुत्र नहीं हैं। शिव पुराण के अनुसार पार्वती जी शिव के प्रवास काल में स्नान करते समय द्वार पर प्रवेश निषेध के लिए अपने शरीर के मैल से पुतले का निर्माण कर प्राण डाल देती हैं। शिव को प्रवेश करने से रोकते हुए युद्ध में गणेश शहीद होते हैं। कोलाहल सुनकर बाहर आने पर वे पुत्र के लिए शोक करती हैं। शिव बिना कोई शंका या प्रश्न किये तुरंत उपचार हेतु सक्रिय होते हैं और मृत बालक के धड़ के साथ गज शिशु का मुख जोड़कर उसे अपना पुत्र बना लेते हैं। सृष्टि परिक्रमा की स्पर्धा होने पर गणेश कार्तिकेय को हराकर अग्रपूजित हो जाते हैं। यहाँ बल पर ज्ञान की श्रेष्ठता प्रतिपादित की गई है। 
युद्ध की देवी दुर्गा पर्व-पूजा के समय पितृ गृह में विश्राम हेतु पधारती हैं। हर बंगाली उन्हें अपनी पुत्री मानकर उनकी सुख-सुविधा का ध्यान रखता है जबकि भारत के अन्य हिस्सों में उन्हें मैया मानकर पूजा जाता है। सप्तमी, अष्टमी और नवमी में पति गृह जाने के पूर्व कन्या के मन-रंजन हेतु स्वादिष्ट व्यंजनों का भोग लगाया जाता है, गायन और नृत्य के आयोजन होते हैं। बंगाल में धुनुची नृत्य और सिन्दूर पूजा का विशेष महत्व है जबकि गुजरात में गरबा और डांडिया नृत्य किया जाता है। विजयादशमी के पश्चात् दुर्गा प्रतिमा बाड़ी या आँगन के बाहर की जाती है तब भावप्रवण बांगला नर-नारियाँ अश्रुपात करते देखे जा सकते हैं। एक अलौकिक शक्ति को लौकिक नाते में सहेजकर उससे शक्ति अर्जित करना सनातन धर्मियों का वैशिष्ट्य है। हमारी सामाजिक मान्यताएँ, रीति-रिवाज और जीवन मूल्य प्रकृति और पुरुष को एक साथ समेटते हुए जीवंत होते हैं। 
***
[संपर्क - विश्व वाणी हिंदी संस्थान ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, चलभाष - ७९९९५५९६१८ जिओ, ९४२५१८३२४४ वाट्सएप, ईमेल salil.sanjiv@gmail.com
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मुक्तक दिवाली

 मुक्तक

दीपावली तो दीप का जय गान है
अमर माटी और श्रम का मान है
जन्म माटी से हुआ, माटी-मिलें
काम हो निष्काम तभी महान है
*
२४-१०-२०१६

शब्द साधना इला घोष विशेषांक

                             ॐ 
   -  :: शब्द साधना साहित्यिकी :: -    
     : महीयसी इला घोष विशेषांक : 
  विमोचन समारोह १५ अक्टूबर २०२०  
                             * 
शारद रमा उमा नमन,  वंदन श्री विघ्नेश  
जय-जय भारत-भारती, जय रेवा सलिलेश 
                             *
तारापद आशीष दें, तारासुंदरी संग 
सुव्रत सुनीति न छोड़िए, सपन भरे नव रंग 
                             *
इशिता संग ईशान आ, सुमिरें त्रिभुवन नाथ 
भक्ति अनन्या कर उमा, रंजू हो नत माथ 
                             * 
नारायण अमरेंद्र सह, हँस विदग्ध परमेश 
राधावल्लभ शांति दें, कृष्णकांत हर क्लेश 
                             *
सृजन साधना कर बनें, मनु सुमित्र  संजीव 
ललिता जयश्री उर्मिला, सुमन सु-मन राजीव 
                             * 
रहसबिहारी सुभद्रा, सुमन नवलता साथ 
आभा सुषमा लक्ष्मी, जयश्री शोभित माथ  
                             *
अन्नपूर्णा हों सदय, दें अनामिका कांति 
अरुणा-उषा तिमिर हरें, अपरा दे सुख-शांति 
                             *
अनामिका छाया स्मृति, दे आशा संतोष 
कर विवेक रंजन सके, हो सत का जयघोष  
                             *
चित्रा माला माधुरी, विनय सुमिर योगेश 
राधाकृष्ण कमलनयन, मना रहे कर्मेश 
                             *
'तमसा तीरे' पूर्णिमा, विचर रहे हरि राम   
'ऋग्वैदिक ऋषिका' करें, दर्शन दिव्य ललाम 
                             * 
'काव्य पुरुष- साहित्य वधु', सुमिर रहे मिथलेश 
संत बसंत दिगंत तक, लेख रहे शब्देश        
                              *
'शिल्पकलाएँ संस्कृत वांग्मय' में' शुभ श्रेष्ठ 
'वैदिक संस्कृति' फिर रचें, पंचम वेद सुश्रेष्ठ 
                             *
'हुए अवतरित राम क्यों', 'महीयसी' वनवास 
कैसे न्यायोचित कहें, सीता का संत्रास 
                             *
'कृषि विज्ञान' समझ सकें, ग्रंथ संस्कृत देख 
आंजनेय चरितम्' पढ़ें, 'सूत्र सफलता' रेख  
                             * 
 'चिंतन योग्य प्रसंग' माँ-परमहंस के दिव्य 
स्वामी विवेकानंद हो, युवा नरेंद्र अनिंद्य 
                             *
पढ़ 'पुराण गणिका' रुचिर, मैं करें रह मौन 
'अन्वेषी यायावरी', कर पाया कब कौन?
                             *
'तस्यै नम:' दिला सके, शारद का आशीष 
शब्द साधना सफल हो, मनु हो सके मनीष 
                           *** 
 

पुरोवाक बालगीत सुरेश तन्मय

पुरोवाक :
एक गीत गायें हम : देश नव बनायें हम 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 
*
बच्चे मनुष्य का भविष्य और देश के निर्माता हैं। शिशु और बाल साहित्य बाल मन को संस्कारित कर आजीवन बच्चे के साथ रहकर कालजयी हो जाता है। यह बाल-मन की मिट्टी में सदाचार के बीज को सद्भाव से सींचकर, सहिष्णुता के बेल में सहयोग के पुष्प और सहकार के फल खिलाता है। भाषा संस्कार की वाहक है। बाल गीतों की भाषा सहज, सरल, स्पष्ट, संक्षिप्त, सरस तथा सारगर्भित होना आवश्यक है। मुहावरेदार भाषा में लिखे गए लयबद्ध गीत बालक को खेल-खेल में कंठस्थ हो जाते हैं। ऐसे गीतों को दोहराकर बच्चे सही उच्चारण करने, नए-नए शब्द सीखने, सही भाषा बोलने प्रस्तुत करने के साथ पारस्परिक सद्भाव स्थापित कर सद्भाव और सहिष्णुता के साथ जीना सीखते हैं। सुसंस्कारित बच्चे कठिन से कठिन परिस्थिति में भी गलत राह पर नहीं जाते। दीन-हीन ही नहीं, समृद्ध और संपन्न परिवारों के बच्चे भी गलत राह पर जाने लगें तो स्पष्ट है कि उन्हें बाल्यकाल में अच्छे संस्कार अर्थात  अच्छे गीत नहीं मिले। 
माँ की लोरियों में मिली ममता में पला-पूसा बच्चा चलना सीखते ही बाह्य जगत के संपर्क में आने लगता है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार बच्चा पाँच वर्ष की आयु तक इतना सीख लेता है जितना वह शेष पूरी उम्र में नहीं सीखता। स्पष्ट है कि शिशु गीतों और बाल्य गीतों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण और बच्चे के पूरे जीवन को प्रभावित करने वाली होती है। वर्तमान द्रुत वैज्ञानिक प्रगति और आर्थिक मारामारी के संक्रांति काल में मनुष्य का प्रकृति के साथ संबंध छिन्न-भिन्न हो रहा है। शहरों में मनुष्य एकाकी और आत्मकेंद्रित होता जा रहा है। सबके साथ घुलने-मिलने की प्रवृत्ति समाप्त होती जा रही है। शिशु गीत, बाल गीत आदि बच्चों में सामुदायिक दायित्व और पारस्परिक समझ का विकास करते हैं। 
हिंदी और निमाड़ी के श्रेष्ठ-ज्येष्ठ साहित्यकार सुरेश कुशवाहा 'तन्मय' की ये रचनाएँ बालकों को गुदगुदाने, रिझाने, हँसाने, मन बहलाने, नई जानकारियाँ देने और एक साथ हिलमिलकर रहने का संस्कार उत्पन्न करने में समर्थ हैं। ये गीत बाल मन में उचित-अनुचित, सदासद, भले-बुरे का भेद सनझाने की प्रवृत्ति विकसित करने में समर्थ हैं। तन्मय जी परम्परा के नाम पर अंधानुकरण और आधुनिकता के नाम पर जड़ों से दूर होने की दुष्प्रवृत्ति से दूर रहते हुए, बाल-मनोभावों को हुलसित-पुलकित करते हुए सही दिशा में बढ़ाने के प्रति सजग हैं। इन गीतों में सहज खिलंदड़ापन, निश्छल जिज्ञासा, भोले प्रश्न, सम्यक समाधान, सतरंगे सपने और अनगिन अरमान यत्र-तत्र गुँथे हुए हैं। 
हिंदी बाल साहित्य दो मिथ्या धारणाओं का शिकार है। पहली यह कि इसकी विशेष उपादेयता नहीं है तथा दूसरे यह कि इसे लिखना बहुत आसान है। वस्तुत:, बाल साहित्य लिखना फिल्मों में फ्लैश बैक लिखने की तरह है। वयस्क-प्रौढ़ मस्तिष्क को बचपन में ले जाकर गत को वर्तमान में जीने और आगत से आँखें मिलाने की तरह है। मजे की बात यह है कि दो भिन्न काल खण्डों को तीसरे काल खंड में जीकर बाल साहित्य की सर्जना की जाती है। तन्मय जी रस्सी पर चलते हुए नट की तरह कथ्य, भाव, रस के मध्य दुष्कर संतुलन सहजतापूर्वक स्थापित करते हुए सोद्देश्यता, सहजता और सरलता की त्रिवेणी में अवगाहन करा देते हैं। बाल साहित्य के समक्ष 'बचकाना साहित्य' न होने की कड़ी चुनौती होती है। तैत्तिरीयोपनिषद में 'रसो वै स:' कहकर जिस काव्यानंद को इंगित किया गया है वह तन्मय जी के इन बालगीतों में सहज प्राप्य है। तन्मय जी की बाल कविताएँ पढ़ना कथ्य, भाषा, भाव, रस, छंद. अलंकार, बिम्ब, प्रतीक आदि की लहरियों से लबालब नर्मदा में स्नान करने की तरह सुखद है। 
 'लें आशीषें' शीर्षक गीत में बच्चों को संस्कारित कर बड़ों का सम्मान करने का मनोभाव विकसित किया गया है-
रोज सवेरे बिस्तर से उठते ही 
प्रभु का ध्यान करें 
सभी बड़ों के छूकर चरण 
ह्रदय से उन्हें प्रणाम करें। 
माँ-बच्चे का नाता संसार में सर्वाधिक निकट संबंध है।  कई शब्द चित्र माँ की विविध छवियाँ उकेरते हैं- 
मीठी वाणी से मन मोहे 
मिश्री प्रेम दुलारी माँ 
*
खेले संग, तब जान-बूझकर 
खा जाती है गच्ची माँ 
*
हैं अनंत खुशियों की खान 
मेरी मम्मी बहुत महान 
*
नहीं भूलते हैं हम अब भी 
जो भी पाठ पढ़ाती मम्मी 
मम्मी के हाथों में रहता 
स्वाद है बड़ा कमाल 
*
'मम्मी जी ने डाँट पिलाई', 'मुनिया रानी', 'मेरी नानी', 'दादा जी के साथ-साथ में', 'अखबार और दादाजी' आदि रचनाएँ पारिवारिक संबंधों के जीवंत चित्र उपस्थित करती हैं। 
'स्कूल की तैयारी है', 'हमको भी स्कूल जाना है', 'मैं भी लेखक बन जाऊँगी', 'आलस से लड़', अक्षर ज्ञान बढ़ाएं', 'चलो चलें स्कूल', 'मिलकर करें पढ़ाई', 'स्कूल चलें', 'पढ़ें पढ़ाएँ' आदि गीतों में बाल मन को शिक्षानुराग से संस्कारित किया गया है। 
हमको भी स्कूल है जाना पापा जी 
अक्षर ज्ञान हमें भी पाना पापाजी 
*
धंत ततड़ ततड़ ततड़ 
धंत ततड़ तड़ 
ले किताब जल्दी से 
और पाठ पढ़ 
*
बाल मन खेल-कूद में असीम आनंद पाता है। 'नाचें कूदें जी बहलायें', 'आओ! अगली सदी चलें', 'तबइक तुम भइ तबइक तुम', 'बाल आनंद', 'चलें गाँव पिकनिक मनाने', 'चलें मनाने को पिकनिक', 'उड़नखटोला', 'अगर मुझे उड़ना आता तो', 'बोल जमूरे!, हाँ उस्ताद', 'भालू जी का सूट',  आदि में खिलंदड़पन का उल्लास-उत्साह अभिव्यक्त हुआ है।  
बच्चो! बोलो छिपन छिपैया
छिपन छिपैया, छिपन छिपैया 
प्रगट हुए तब बंदर भैया 
खी खी करके हाथ हिलाया 
फिर थोड़ा मन में शरमाया
पूछा, तेरी कहाँ बंदरिया? 
छिपन छिपैया, छिपन छिपैया 
घूँघट ओढ़ बंदरिया आई
देख सभी को वह मुस्काई 
यह बंदर क्या तेरा सैंया? 
छिपन छिपैया, छिपन छिपैया 
*
'बाल मन की बातें', 'गाँव के बच्चे', हो जाऊं मैं शीघ्र बड़ा', 'होंगे उजले भावी दिन', 'नियम सड़क के', 'लहर-लहर लहराती नदिया', 'करें ज्ञान-विज्ञान की बातें', 'अच्छे दिन आनेवाले हैं', 'पुस्तक मेला', 'बरखा ऋतु आई 'बादल काले काले हैं', 'बादल आये', 'जब से नभ छाए बादल', 'मौसमी फल','गर्मी के मौसम में', 'धूप तेज है गर्म हवाएँ', 'गर्मी का मौसम आया', 'सर्दी आई', 'शुरू हुआ अप्रैल' 'दस दोहे मेला दर्शन', 'पेड़ों में भी प्राण हैं', 'सपने की सीख', 'कष्ट हरो मजदूर के', 'शिक्षक दिवस गुरु वंदन', 'उठो भोर में जल्दी' जैसे गीतों में पढ़ते-बढ़ते बालकों में परिवेश, पर्यावरण, मौसम, ऋतुचक्र आदि के प्रति सजगता उत्पन्न करने का सफल प्रयास हुआ है। 
बीती वर्षा, सर्दी आई 
निकले कंबल, शाल, रजाई
थर-थर लगी कांपने ठंडी 
इस बारिश में खूब नहाई 
*
सिकुड़ी सिमटी ठंड जा रही
मौसम गर्मी का आया 
आइसक्रीम के दौर, बर्फ के गोले 
श्री खंड याद आया 
जब से नभ में छाये बादल 
तन-मन को हर्षाये बादल 
रिमझिम रिमझिम पानी बरसे 
सब के मन को भाये बादल 
*
'दादा जी कहते हैं मेरे', 'शुरू हुआ अप्रैल', 'गोलू को पानी की सीख', जीवन जीना बहुत चाव से', 'सहयोग भावना', 'एक गीत 'गायें हम', 'आसमान के हैं ये तारे', 'अपनी हिंदी', 'हरी कैरियाँ पीले आम', 'सुनो कहानी आम की', 'सुबह की धूप मखमली', 'सुबह की धुप गुनगुनी', 'सुबह सवेरे', 'यह  कैसी बरसात?', 'मच्छरदानी में', 'बाल सुलभ संसार चाहिए', 'बोझ पढ़ाई का', 'अच्छे दिन आनेवाले हैं', 'कुर्सी दौड़', ' अधिकार न छीनो', 'मेरा सपना', 'मक्खी और मिठाई', 'कोरोना को मार भगाए', 'वंदे मातरम', 'नव वर्ष अभिनंदन', 'वरदायी चक्की और मेरी चाह', 'तथा लोरी कौन सुनाएगा अब' आदि गीतों में अपेक्षाकृत अधिक विकसित मस्तिष्क और चेतना संपन्न बालको के लिए ऐसा कथ्य रख गया है जो उनमें अधिकारों और कर्तव्यों की समझ, राष्ट्रीयता की भावना आदि करे। 
देश प्रेम के गाएँ मंगल गान 
वंदे  मातरम   
तन-मन से हम करें राष्ट्र सम्मान 
वंदे मातरम 
तन्मय जी के बाल गीतों का वैशिष्ट्य तोतले बोल, किलकारी, कल्पना की उड़ान, नन्हें प्रयास, धूप-छाँव, चिंता-मजा, गीत-संगीत  सम्यक अनुपात में यथास्थान उपस्थित होना है। वे किसी विचार को लेकर को लेकर सप्रयास गीत नहीं लिखते अपितु गीत को तारी होने देते हैं। इसलिए इन बाल गीतों  में कहीं भी छंद या कथ्य थोपा हुआ नहीं है, स्वाभाविक रूप  अंकुरित, पल्लवित और पुष्पित हुआ है. फलत: गीत सहज ग्राह्य, सुमधुर और उपयोगी बन गए हैं। 
" जब तुम बच्चों के लिए हो तो उस विशेष अवसर  विशेष शैली मत अपनाओ। अपनी पूरी क्षमता से लिखो  वस्तु को सजीव होकर आने दो।" अनातोले फ़्रांस के इस विचार को तन्मय जी ने अनजाने ही अपना लिया है। 
पॉल हेजार्ड ने है "बच्चे उन पुस्तकों को पसंद नहीं करते जिनमें उन्हें बराबर का दर्जा नहीं दिया जाता और उन्हें 'प्यारे नन्हें साथियों आदि शब्दों से संबोधित किया जाता है अथवा जो उनकी प्रकृति अनुरूप नहीं होतीं जिनके चित्र आँखों को और जिनकी सजीवता उनके ह्रदय को आकृष्ट नहीं कर पातीं अथवा उन्हें केवल वही चीजें सिखाती हैं जिन्हें वे स्कूल में सीखते हैं और जो उन्हें नींद की गोद में सुला सकती हैं किन्तु सपनों की दुनिया में नहीं ले जा सकतीं।' तन्मय जी ने  अपने बाल गीतों में विशेष ध्यान रखा है कि  बालगीत रोचक, उत्सुकताकरक और।  ये बाल गीत बच्चों और बड़ों दोनों को पसं आएँगे और तन्मय जी के अगले बाल गीत संग्रह के प्रति उत्सुक बनायेंगे। 
***
संपर्क : विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, 
चलभाष ९४२५१८३२४४, ईमेल salil.sanjiv@gmail.com 

शुक्रवार, 23 अक्तूबर 2020

प्राक्कथन डॉ. निशा तिवारी

शीघ्र प्रकाश्य लघुकथा संकलन ‘आदमी जिंदा है’
प्राक्कथन
डॉ. निशा तिवारी
‘आदमी जिंदा है’ लघुकथा संग्रह मेरे अनुजवत संजीव वर्मा ‘सलिल’ की नव्य कृति है. यह नव्यता द्विपक्षीय है. प्रथम यह कृति कालक्रमानुसार नई है और दूसरे परंपरागत कहानी-विधा के सांचे को तोड़ती हुए नव्य रूप का सृजन करती है. यों नई शब्द समय सापेक्ष है. कोई भी सद्य:रचित कृति पुरानी की तुलना में नई होती है. स्वतंत्रता के पश्चात् हिंदी कहानी ने ‘नई कहानी’, ‘अकहानी’, ‘समान्तर कहानी’, ‘सचेतन कहानी’, ‘सहज कहानी’ इत्यादि कथा आंदोलनों के अनेमनेक पड़ावों पर कथ्यगत और रूपगत अनेक प्रतिमान स्थिर किये हैं. अद्यतन कहानी, लघुता और सूक्ष्मता के कम्प्युटरीकृत यथार्थ को रचती हुई अपनी नव्यता को प्रमाणित कर रही है. कंप्यूटर और मोबाइल की क्रांति लघुता और सूक्ष्मता को परिभाषित कर रही है.संप्रति सलिल जी का प्रकाश्य लघुकथा संग्रह भी तकनीकी युग की इसी सूक्ष्मता-लघुता से कहानी विधा को नवता प्रदान करता है. मुक्तक और क्षणिका की तर्ज पर उन्होंने कथा-सूत्र के ताने-बाने बुने हैं. अत्यंत लघु कलेवर में प्रतिपाद्य को सम्पूर्णता प्रदान करना अत्यंत दुष्कर कार्य है किंतु सलिल जी की भावनात्मकता तथा संवेदनशीलता ने समय और परिस्थितिगत वस्तु-चित्रणों को अपनी, इन कहानियों में बखूबी अनुस्यूत किया है. यही कारण है कि उनकी ये कहानियाँ उत्तर आधुनिक ‘पेरोडीज़’, ‘येश्तीज़’ तथा कतरनों की संज्ञाओं से बहुत दूर जाकर घटना और संवेदना का ऐसा विनियोग रचती हैं कि कथा-सूत्र टुकड़ों में नहीं छितराते वरन उन्हें एक पूर्ण परिणति प्रदान करते हैं.
लघुकथा संग्रह का शीर्षक ‘आदमी जिंदा है’ ही इस तथ्य का साक्ष्य है कि संख्या-बहुल ये एक सौ दस कहानियाँ आदमी को प्रत्येक कोण से परखती हुई उसकी आदमियत के विभिन्न रूपों का परिचय पाठक को देती हैं. ये कहानियां संख्या अथवा परिमाण में अधिक अवश्य हैं किन्तु विचार वैविध्य पाठक में जिज्ञासा बनाए रखता है और पाठक प्रत्येक कहानी के प्रतिपाद्य से निरंताराया में साक्षात् करता हुआ ह्बव-निमग्न होकर अगली कथा की और बढ़ जाता है. कहानी के सन्दर्भ में हमेशा यह फतवा दिया जाता है कि ‘जो एक बैठक में पढ़ी जा सके.’ सलिल जी की ये समस्त कहानियाँ पाठक को एकही बैठक में पढ़ी जाने के लिए आतुरता बनाये रखती हैं.
सलिल जी के नवगीत संग्रह ‘काल है संक्रांति का’ के नवगीतों की भांति ‘आदमी जिंदा है’ कथा संग्रह की कहानियों की विषय-वस्तु भी समान है. सामाजिक-पारिवारिक विसंगतियाँ एवं कुरीतियाँ (गाइड, मान-मनुहार, आदर्श), राजनीतिक कुचक्र एवं विडंबनाएँ (एकलव्य, सहनशीलता, जनसेवा, सर पर छाँव, राष्ट्रीय सुरक्षा, कानून के रखवाले, स्वतंत्रता, संग्राम, बाजीगर इत्यादि), पारिवारिक समस्या (दिया, अविश्वासी मन, आवेश आदि), राष्ट्र और लिपि की समस्या (अंधमोह), साहित्य जगत एवं छात्र जगत में फैली अराजकतायें (उपहार, अँगूठा, करनी-भरनी) इत्यादि विषयों के दंश से कहानीकार का विक्षुब्ध मन मानो चीत्कार करने लगता हुआ व्यंग्यात्मकता को वाणी देने लगता है. इस वाणी में हास्य कहीं नहीं है, बस उसकी पीड़ा ही मुखर है.
सलिल जी की कहनियों की सबसे बड़ी विशेषता है कि वे जिन समस्याओं को उठाते हैं उसके प्रति उदासीन और तटस्थ न रहकर उसका समाधान भी प्रस्तुत करते हैं. पारिवारिक समस्याओं के बीच वे नारी का मानवीय रूप प्रस्तुत करते हैं, साथ ही स्त्री-विमर्श के समानांतर पुरुष-विमर्श की आवश्यकता पर भी बल देते हैं. उनकी इन रचनाओं में आस्था की ज्योति है और मनुष्य का अस्मिताजन्य स्वाभिमान. ‘विक्षिप्तता’, ‘अनुभूति’ कल का छोकरा’, ‘सम्मान की दृष्टि’ इत्यादि कहानियाँ इसके उत्तम दृष्टांत हैं. सत्ता से जुड़कर मिडिया के पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण से आहूत होकर वे तनाव तो रचती हैं किन्तु ‘देशभक्ति और जनहित की दुहाई देते खोखले स्वर’ से जनगण की सजग-मानवीय चेतना को विचलित नहीं कर पातीं- ‘मन का दर्पण’ उसके मलिन प्रतिबिम्ब का साक्षी बन जाता है. लेखकीय अनुभति का यह कथा-संसार सचमुच मानवीय आभा से रंजित है. भविष्य में ऐसे ही और इससे भी अधिक परिपक्व सृजन की अपेक्षा है.
संपर्क- डॉ. निशा तिवारी, ६५० नेपियर टाउन, भंवरताल पानी की टंकी के सामने, जबलपुर ४८२००१, चलभाष ९४२५३८६२३४
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जनक मुक्तक

 जनक मुक्तक

मिल त्यौहार मनाइए
गीत ख़ुशी के गाइए
साफ़-सफाई सब जगह
पहले आप कराइए
*
प्रिया रात के माथ पर,
बेंदा जैसा चाँद धर.
कालदेवता झूमता-
थाम बाँह में चूमता।
*
गये मुकदमा लगाने
ऋद्धि-सिद्धि हरि कोर्ट में
माँगी फीस वकील ने
अकल आ गयी ठिकाने
*
नयन न नम कर नतमुखे!
देख न मुझको गिलाकर
जो मन चाहे, दिलाऊं-
समझा कटनी जेब है.
*
हुआ सम्मिलन दियों का
पर न हो सका दिलों का
तेल न निकला तिलों का
धुंआ धुंआ दिलजलों का
*
shailendra nagar raipur
diwali 2014.

सलिल और रचनाएँ


 

दोहा दीप

दोहा दीप
रांगोली से अल्पना, कहे देखकर चौक
चौंक न घर पर रौनकें, सूना लगता चौक
बाती मन, तन दीप से, कहे न देना ढील
बाँस प्रयासों का रखे, ऊँचा श्रम-कंदील
नेता जी गम्भीर हैं, सुनकर हँसते लोग
रोगी का कब डॉक्टर , किंचित करते सोग?
चाह रहे सब रमा को, बिसरा रहे रमेश
याचक हैं सौ सुरा के, चाहें नहीं सुरेश
रूप-दीप किस शिखा का, कहिए अधिक प्रकाश?
धरती धरती मौन जब, पूछे नीलाकाश
दोहा दीप जलाइए, स्नेह स्नेह का डाल
बाल न लेकिन बाल दें, करिए तनिक सम्हाल
कलम छोड़कर बाण जब, लगे चलने बाण
शशि-तारे जा छिप गए हो संकट से त्राण
raipur diwali 2014.

नवगीत

नवगीत:
*  
मंज़िल आकर
पग छू लेगी
 
ले प्रदीप
नव आशाओं के
एक साथ मिल
कदम रखें तो
रश्मि विजय का
तिलक करेगी 

होनें दें विश्वास
न डगमग
देश स्वच्छ हो
जगमग जगमग
भाग्य लक्ष्मी
तभी वरेगी 

हरी-भरी हो
सब वसुंधरा
हो समृद्धि तब ही
स्वयंवरा
तब तक़दीर न
कभी ढलेगी
***
२३-१०-२०१४

विमर्श : पत्र लेखन

 पत्र लेखन : 

पत्र लेखन एक रोचक कला एवं विज्ञान है। वर्तमान अंतर्जालीय - संगणकीय युग में भी पत्र लेखन अभिव्यक्ति के समस्त साधनों में सर्वाधिक प्रमुख, शक्तिशाली, प्रभावपूर्ण और मनोरम स्थान का अधिकारी है।  पत्र अपने लेखम के व्यक्तित्व कस दर्पण होता है। वैयक्तिक पत्र-लेखन में अन्तर्निहित आत्मीयता लेखक तथा पाठक, प्रेषक तथा प्रापक दोनों के संबंध को ताजगी तथा नैकट्य से समृद्ध करती है।औपचारिक पत्र लेखन का कथ्य और भाषा लिखित प्रापक को प्रेषक के व्यक्तित्व तथा प्रयोजन से अवगत कराकर त्वरित  निराकरण में सहायक या बाधक होता है। पत्र लेखन की की कला बुद्धि कौशल  और परिपक्व ज्ञान, व्यापक विचार सामर्थ्य, विषय का ज्ञान, अभिव्यक्ति की सामर्थ्य, शब्द चयन और भाषिक नियंत्रण से संपन्न होती है। पत्र लेखन विज्ञान प्रापक के व्यक्तित्व, प्रेषक के उद्देश्य तथा पत्र से उत्पन्न प्रभाव का पूर्वानुमान कर इच्छित परिणाम  में सहायक होता है।

महत्त्व :

 'पत्र' लिखित रूप में अपने मन के भावों एवं विचारों को प्रकट करने का एक माध्यम है। 'पत्र' का शाब्दिक अर्थ सामान्यत: कागज़ अपवाद स्वरूप पत्तों, वस्त्र, शिला आदि प रलिखित, टंकित, मुद्रित अथवा चित्रित संदेश है प्रेषक द्वारा किसी उद्देश्य के लिए प्रापक को भेजा गया हो। पत्रद्वारा प्रेषक अपनी बातों प्रापक तक लिखकर पहुँचाता हैं। पत्र अभिव्यक्ति का एक सहज सुलभ सशक्त माध्यम है। व्यक्ति जिन बातों को आमने-सामने या सीधे मौखिक रूप से कहने में संकोच करता हैं, हिचकिचाता हैं; उन सभी बातों कोपत्र के माध्यम से लिखित रूप में खुलकर अभिव्यक्त कर सकता हैं। दूरस्थ सबन्धियों अथवा मित्रों की कुशलता जानने के लिए अथवा / तथा अपनी कुशल-क्षेम सूचित करने के लिए पत्र एक साधन है। वैयक्तिक, व्यापारिक, व्यावसायिक अथवा सामाजिक कारणों व कार्यों के लिए भी पत्र लिखे जाते है।

इस समय बातचीत करने के अनेक आधुनिक साधन उपलब्ध दूरभाष, चलभाष, ई-मेल, फैक्स आदि सुलभ हैं तथापि पत्र लेखन आवश्यक है। अंतर्जालीय पटल पत्र लेखन का आधुनिक माध्यम है, विकल्प नहीं। सम्भाषण अथवा वार्तालाप पात्र लेखन का विकल्प नहीं हो सकता। पत्र लिखना महत्त्वपूर्ण ही नहीं, अपितु अत्यंत आवश्यक है। किसी कारण वश अपने कार्य से अनुपस्थित रहने पर सूचित करने तथा अवकाश स्वीकृति कराने के लिए प्रार्थना-पत्र लिखना होता है। स्वजनों को कुशल समाचार सूचित करने के लिए भी पत्र सहज सुलभ माध्यम है, विशेषकर उन स्थानों और परिस्थितियों में जान अंतर्जालीय सुविधा अनुपलब्ध हो। दूर्भाषिक वार्ता अस्थायी होती है, जिसे अभिलेख की तरह सुरक्षित नहीं रखा जा सकता।

 विशेषता 

१. सरलता : पत्र की भाषा सरल, आसानी से समझ आनेवाली हो। साहित्यिक, प्रशासनिक, व्यावसायिक अथवा वैज्ञानिक शब्दावली का प्रयोग तभी किया जाना चाहिए जब प्रापक उसे समझने में समर्थ हो तथा पात्र लेखन उद्देश्य वैसा है। 

२. स्पष्टता : पत्र की भाषा में स्पष्टता होना आवश्यक है। चयनित शब्द, वाक्य रचना तथा विचार ऐसे हों जिससे प्रापक  पत्र भेजने का उद्देश्य सहज ही समझ सके।

३. संक्षिप्तता: पत्र की भाषा में संक्षिप्त, अनावश्यक विस्तार रहित तथा अपने आप में पूर्ण हो। 

४. मौलिकता : पत्र प्रेषक के व्यक्तित्व तथा विचारों का परिचायक होता है। ात:, उसमें व्यक्त विचार तथा शब्द मौलिक हों, किसी अन्य के विचार प्रेषक की असामर्थ्य का संकेत करती है। यथावश्यक उध्दरण, आँकड़े आदि अन्यत्र से साभार संदर्भ सहित लिए जा सकते हैं।

५. सोद्देश्यता : पत्र जिस उद्देश्य से लिखा जा रहा है, उसके अनुरूप, संबोधन, अभिवादन तथा भाषा से युक्त होना चाहिए। 

६. रोचकता : पत्र में वर्णित कथ्य नीरस, उबाऊ, लंबा या जटिल न हो। यथासंभव विचारों को सरल, रोचक और सहज ग्राह्य बनाकर प्रस्तुत किया जाना चाहिए। 

७. शिष्टता : पत्र में प्रयुक्त संबोधन तथा भाषा प्रापक के मान-सम्मान व् रूचि के अनुरूप होना चाहिए। असहमति की अभिव्यक्ति शालीनता तथा सम्मान सहित हो। रुक्ष, अशिष्ट, अश्लील अथवा क्रोधादि पूर्ण भाषा का प्रयोग नहीं करना चाहिए। 

८. लघु वाक्य : पात्र में प्रयुक्त वाक्य यथासंभव छोटे हों। लंबे, संयोजक चिन्हों या क्लिष्ट शब्दों आदि के प्रयोग से पत्र का कथ्य ग्रहण करने में प्रापक को कठिनाई हो सकती है। विराम चिन्हों का प्रयोग यथास्थान किया जाना चाहिए।  

९. भाव : पत्र इस तरह लिखें की उसे पढ़कर प्रापक को सुखानुभूति हो। दुखद  देने के पूर्व व् पश्चातसान्त्वनाकारक शब्द / भावों का प्रयोग किया जाना चाहिए। 

प्रकार : 

१. व्यक्तिगत 

२. सार्वजनिक

३. पारिवारिक 

४. साहित्यिक 

५. शासकीय / कार्यालयीन 

६. तकनीकी 

७. औपचारिक 

अंग / तत्व :

१. प्रेषक : नाम, पता, दूरभाष, चलभाष, ईमेल आदि। 

२. दिनांक व स्थान 

३. विषय 

४. संदर्भ 

५. संबोधन 

६. कथ्य या विषय वस्तु 

७. समापन 

८. समापन सूचक शब्द 

९. हस्ताक्षर 

१०. नाम 

११. संलग्नक 

१२. पुनश्च  

१३. प्रापक का पता : नाम, भवन क्रमांक, गली-पथ, मोहल्ला, शहर/कस्बा, जिला, डाकघर का पिनकोड, प्रापक का दूरभाष/चलभाष। 

१४ शुल्क : डाक टिकिट, पंजीयन शुल्क, कूरियर शुल्क आदि  

पत्र लेखन साहित्य :

बापू के पत्र सरदार वल्लभ भाई के नाम 

सरदार की सीख (पत्रों से उद्धरण)

पिता के पत्र पुत्री के नाम - जवाहरलाल नेहरू 

नाती के पत्र  


भाई कुलबीर के नाम भगत सिंह द्वारा लिखा गया अन्तिम पत्र।

सैण्ट्रल जेल,
लाहौर।

दिनांक 3 मार्च, 1931

प्रिय कुलबीर सिंह,
तुमने मेरे लिए बहुत कुछ किया है। तुमने खत के जवाब में कुछ लिख देने के लिए कहा। मैं कुछ अल्फाज (शब्द) लिख रहा हूँ- मैंने किसी के लिए कुछ नहीं किया, तुम्हारे लिए भी कुछ नहीं। अब तुम्हें मुसीबत में छोड़कर जा रहा हूँ। तुम्हारी जिन्दगी का क्या होगा? तुम गुजारा कैसे करोगे? यह सब सोचकर ही काँप जाता हूँ, मगर भाई हौंसला रखना, मुसीबत से कभी मत घबराना। मेहनत से बढ़ते जाना। अगर कोई काम सीख सको तो बेहतर होगा लेकिन सब कुछ पिताजी की सलाह से ही करना। मेरे अजीज, प्यारे भाई जिन्दगी बहुत कठिन है। सभी लोग बेरहम है। सिर्फ मुहब्बत और हौंसले से ही गुजारा हो सकता है। अच्छा भाई अलविदा.....।

तुम्हारा अग्रज
भगत सिंह

(4) पं. मोतीलाल नेहरू द्वारा अपने पुत्र जवाहरलाल नेहरू को लिखा गया पत्र।

बनारस,
कांग्रेस कैम्प,

दिनांक 28 दिसम्बर, 1905

प्रिय जवाहर,
नमस्कार।

मैं कांग्रेस के कार्यक्रम में भाग ले रहा हूँ, यह उपर्युक्त पते से ही आपको ज्ञात हो गया होगा। मैं यहाँ खासतौर से गोखले जी का भाषण सुनने आया था, जो मैं गत वर्ष नहीं सुन सका। उनका भाषण सुनियोजित तथा प्रशंसनीय था, फिर भी मुझे उसमें कोई असाधारण बात दिखाई नहीं पड़ी। 'इण्डियन पीपुल' की प्रति मैं भेज रहा हूँ, उसमें तुम्हें पूरा भाषण पढ़ने को मिल जाएगा। आज मैंने सुरेन्द्रनाथ जी का भाषण सुना तथा कल मैं इलाहाबाद वापस चला जाऊँगा। अब देखने-सुनने लायक कोई नई बात नहीं रह गई है। मुझे पता चला है कि लगाई गई प्रदर्शनी में कोई खास बात नहीं है। मैंने अभी तक यद्यपि देखी नहीं है, किन्तु यह पत्र लिख चुकने के बाद मैं उसे देखने जाऊँगा।

मैं बड़ी उत्सुकता से यह जानने की प्रतीक्षा में था कि पैर में मोच आ जाने के कारण तुम्हें फुटबॉल नहीं खेलना पड़ेगा। हैरो का डॉक्टर कभी तुम्हें नहीं छोड़ता, यदि चोट मालूम होती। तुम्हारा अगला पत्र मिलने पर पूरी जानकारी प्राप्त कर प्रसन्नता होगी।

इलाहाबाद से यहाँ आते समय तुम्हारी माँ की तबीयत बिलकुल ठीक थी। लखनऊ मेडिकल कॉलेज का शिलान्यास प्रिंस ऑफ वेल्स द्वारा किया गया। समारोह भव्य था। मुझे वेल्स के राजकुमार तथा राजकुमारी को काफी निकट से देखने का मौका मिला था।

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अदिति सिंह भदौरिया।

पापा,

आज काफी समय बाद खुद के लिए कुछ कहने का मौका मिला, तभी आपकी याद आईं। सोचा जो कह ना सकी वो पत्र में लिखकर आपको कह दूँ।   हर पल आपके प्रेम को समाज के भौतिक पदार्थों में तौलती रही ओर जाने अनजाने आप से नाराज होती रही । 
               आज जब आप नहीं है तो हर भौतिक पदार्थ मुझ पर हस रहे है,  मानो कह रहे हो, आओ ओर हमारे भीतर निश्छल प्यार को ढूँढ सको तो ढूँढ लो ओर मैं अपनी कलसी से बहते को रोकने की नाकाम कोशिश करके आपकी तस्वीर को पोछने लगती हूँ। काश मेरे जैसा हर बच्चा भावनाओं को समझें, तो उसे काश कभी ना कहना पडे।
    
           आज आप होते तो जान पाते कि मैं वो बनने की कोशिश कर रही हूँ जो आप मुझे बनते देखना चाहते थे।
                     पापा हो सके तो अपनी लाडो को माफ कर देना।

आपकी ओर बस आपकी,
अदिति ।
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गीता शुक्ला

प्रिय रूचि,  प्रसन्न रहो l 
समझ नहीं आ रहा कि पत्र कहाँ से आरम्भ करूँ....l एकाएक शब्द मूक हो गए और विश्वास का दायरा सीमित हो गया l फ़ोन पर अम्मा ने जब उस दुर्घटना के बारे में बताया तो एकाएक तो यकीन ही नहीं हुआ l ऐसे में तुम्हारे बारे में सोच कर बहुत उदास हो गई थी मैं l चाहती तो थी कि उड़ कर तुम्हारे पास आ जाऊँ l किन्तु चाहा हुआ सब हो तो नहीं जाता l स्वयं को बहुत विवश महसूस किया, परन्तु फिर दिल को समझाया कि जो बात अपने वश में न हो उसे इश्वर पर ही छोड़ देना चाहिए क्योंकि हम चाहें या न चाहें हमें उसका फैंसला मानना ही पड़ता है l 
यही बात तुम्हे भी समझाना चाहती हूँ कि तुम लोग उदास मत होना l समय आने पर सब ठीक हो जाएगा l हो सकता है उस शिशु के न आने में ही कोई अच्छाई छिपी हो l ध्यान रखना बहना, यह तुम्हारे जीवन का अंतिम सत्य नहीं है l ईश्वरीय विधान पर विश्वास रखो और आगे कि संभावनाओं कि धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा भी l भावनाओं पर संयम रखना मुश्किल अवश्य होता है किन्तु ऐसा ही करने के अतिरिक्त कोई और विकल्प फिलहाल है भी तो नहीं l मुझे विशवास दिलाओ कि तुम भी ऐसा ही करोगी l इसके लिए आवश्यक है कि तबीयत ठीक होने पर मुझे फ़ोन करना और पत्र का उत्तर अवश्य देना l यह वर्ष समाप्त होने को है, जाते हुए वर्ष  के साथ वह सब कुछ, जिसका कारण तुम नहीं हो, भूल कर आने वाले वर्ष का स्वागत नए विशवास, आशा और उमंग के साथ करो यही समय की सच्चाई है l 
इधर कुछ दिनों से तुम्हारी बहुत चर्चा हो रही थी l प्रतिदिन तुम्हारे फ़ोन और पत्र की प्रतीक्षा होती थी l बबलू स्कूल जाते हुए अक्सर रो कर जाता था l मासी यहाँ होती तो ऐसा होता, वैसा होता; यही सब कह कर बार-बार पूछता था कि मासी दिल्ली कब आएगी ? अम्मा बार-बार यही कहती थी कि पता नहीं रूचि की तबीयत कैसी है.... सभी का ध्यान तुम्हारी ओर लगा हुआ था l और यकीन मानो इश्वर का ध्यान भी तुम्हारी ओर ही था, इसीलिये तो उन्होंने शायद कुछ अधिक कठिन देखने से बचा लिया तुम्हे l मुझे लगता है जब हम उदास होते हैं तो मन और मस्तिष्क दोनों से ही अपने प्रिय से ज्यादा जुड़ जाते हैं l ठीक ऐसा ही आजकल महसूस हो रहा है l सचमुच तेरी बहुत याद आ रही है.......l 
 छोड़.... कुछ और सुना अन्यथा ये भावनाएँ हमें पागल ही कर देंगी l  
गोपाल के ऑफिस का क्या हाल है ? जब उन्हें ऑफिस के काम से बाहर जाना होता है तो तू समय कैसे बिताती है ? किस तरह की पुस्तकें पढ़ रही है आजकल, बताना l मेरा तो कहीं आना-जाना होता नहीं l 12 दिसम्बर को मीना की शादी थी, बस वहीँ गई थी, वहीँ सब रिश्तेदारों से मिलना हुआ l सब ठीक हैं l 
अच्छा अब मै यह पत्र यहीं समाप्त कर रही हूँ, तुम्हारा पत्र पाने के विशवास पर .... लिखेगी न ... मुस्कुरा कर ...l एक बार पुनः तुम दोनों को बहुत-बहुत प्यार l तुम्हारे जीजाजी कि भावनाएं भी यही हैं किन्तु तू तो जानती ही है पत्र न लिखना उनकी मजबूरी है l हर बार यही कहते है कि मेरी तरफ से भी लिख देना l सचमुच इन ग्यारह वर्षों में मैंने उन्हें कभी किसी को पत्र लिखते नहीं देखा l उनका स्नेह तो सदा तुम दोनों के साथ है ही l तुम्हारे पिछले पत्र में भी अनुरोध था कि जीजाजी भी कभी आशीर्वाद के दो शब्द लिख दें इसीलिये तुम्हे ये सब बता रही हूँ l 
गोपाल से मेरा स्नेह कहना और अपना विशेष ख्याल रखना शारीरिक भी और मानसिक भी l 
शेष फिर... 
तुम्हारी दीदी
गीता
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क्रम संख्या - 3
गीता चौबे 'गूँज'

माँ की पाती बिटिया के नाम...
                                        09/04/2020 
मेरी प्यारी गुड़िया,                    
              सदा सुखी रहो।
मैं यहाँ तुम्हारे पापा के साथ सकुशल हूँ और आशा करती हूँ कि तुम भी अपने ससुराल में अपने नए परिवार के साथ कुशलतापूर्वक जीवन व्यतीत कर रही होगी। अभी पूरे विश्व में उथल-पुथल मची हुई है जिसमें हमारा देश भी शामिल है। पूरे देश में लाॅक डाउन की स्थिति है।
     तुम्हारे पूज्य श्वसुर जी के देहांत की खबर सुनकर मन को बहुत धक्का लगा, परंतु साथ ही यह जानकर खुशी हुई कि तुम उनके अंतिम समय में उनके साथ थी और जिस तरह तुमने पूरे परिवार को सम्भाला वह अत्यंत ही प्रशंसनीय है। मुझे गर्व है कि तुमने अपने दायित्वों का निर्वहन बहुत अच्छी तरह से किया। एक माँ को इससे ज्यादा और क्या चाहिए।
        मैं मानती हूँ कि श्वसुर जी के श्राद्ध कर्म हो जाने के बाद भी लाॅक डाउन के कारण तुम्हें संयुक्त परिवार में रहना पड़ रहा है। इंटेरनेट की अनियमितता के कारण तुम्हारा आनलाइन कारोबार प्रभावित हो रहा है। परंतु गुड़िया, कभी-कभी जब कुछ चीजें हमारे वश में नहीं होती हैं और तब हमें उसे ईश्वर पर छोड़ देना चाहिए।
तुम पहले कभी संयुक्त परिवार में नहीं रही। अतः तुम्हें कुछ कठिनाइयां अवश्य आ रही होंगी, परंतु तुम इस नए परिवेश को देखने और समझने का सुअवसर मानकर चलो तो उत्सुकता के साथ तुम्हारा उत्साह बना रहेगा। वहाँ के बड़े - बुजुर्गों से एक नए प्रदेश की संस्कृति के साथ कुछ नए रस्मों और रिवाजों की भी जानकारी तुम्हें मिलेगी।
मैं जानती हूँ मेरी बच्ची कि जिसने कभी घरेलू काम नहीं किया उसे एक संयुक्त परिवार में पूरा-पूरा दिन रसोई घर में बिताना कितना कठिन हो रहा होगा। परंतु तुम तो शुरू से ही चुनौतियों का सामना डटकर करती आयी हो। मुझे आशा ही नहीं बल्कि पूर्ण विश्वास है कि तुम दृढ़तापूर्वक ही चुनौती को स्वीकार करोगी और पूरी सफलता भी प्राप्त करोगी।
   एक माँ के रूप में मैं हमेशा यही सीख दूँगी कि अपने मन, वचन और कर्म से कभी किसी का दिल न दुखाना। बड़ों को आदर और छोटो को प्यार देना।
                             तुम्हारी माँ 
                            गीता चौबे गूँज 
                           रांची झारखंड 
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क्रम संख्या - 4
रमेश सेठी

पैगाम लिखूं 
या कलाम लिखू
पहला पत्र मैं
तेरे नाम लिखूं    2
अरमान लिखू
या मुस्कान लिखूं 
पहला पत्र मैं 
तेरे नाम लिखूं 2

तेरी चमक लिखूं
या परवाज लिखूं 
तुझे ताज लिखूं 
या मुमताज लिखूं
तेरी हर अदा पे 
मुझे नाज़ लिखूं

पहला पत्र मैं
तेरे नाम लिखूं   2

तुझे शहद लिखूं
या मिठासभरी 
कोहिनूर लिखूं
या स्वर्ग परी
तेरी महिमा का
कैसे गुणगान लिखूं
पहला पत्र मैं 
तेरे नाम लिखूं 2

मोटे नयन लिखूं
मन बैचैन लिखूं
जो मिलो कभी 
तो चैन लिखूं
तेरे भोलेपन पे
कुर्बान लिखूं

पहला पत्र मैं 
तेरे नाम लिखूं 2

तुझे प्रेरणा लिखूं
या प्रेम की मूरत
करुणा से भरी 
या भोली सूरत 
कोई सरगम लिखूं
या साज़ लिखूं 

पहला पत्र मैं
तेरे नाम लिखूं  2

सब्र हो तुम
मैं बेसबरा
रब ने मिलाया
रब की रज़ा 
उसकी रज़ा का
एहतराम लिखूं

पहला पत्र मैं 
तेरे नाम लिखूं  2

गीत    पहला पत्र 
स्वयं रचित
रमेश सेठी 
रोपड़ पंजाब
7009267952
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क्रम संख्या - 5
शाइस्ता खान

मेरे प्यारे बेटे 
हमैशा ख़ुश रहो
आज तुम्हारी सालगिरह है और आज तुम 18 बरस के हो गये एक बारगी तो यक़ीन ही नहीं हो रहा तुम युवावस्था में क़दम रख रहे हो,मुझे तो ऐसा लग रहा है जैसे कल की ही बात हो जब उंगली पकड़ कर तुम ने चलना सीखा. 
तुम्हारे पीछे भाग भाग कर तुम्हे खाना खिलाया तुम्हारे बालों में ढेर ढेर सारा तेल डालकर तुम्हारे गालों को पकड़ कर कंघा किया 
तुम्हे काजल लगाया 
आज तुम मेरे कंधे से भी ऊंचे निकल गये हो आज मैं सोच रही थी तुम्हें क्या गिफ्ट दूं???  शेविंग किट दूं , टी शर्ट दूं , बैग दूं ? मगर नहीं 18 साल के युवा बेटे को तो कुछ स्पेशल गिफ़्ट देनी चाहिए इसलिये मोबाइल  लेपटॉप  इंटरनेट के वक्त में ख़त लिख रहीं हूं इसे तुम डिलीट नहीं कर सकते मेरा यह ख़त तुम हमैशा सम्हाल कर रखोगे. 
           प्यारे बेटे आज में तुम से एक बात कहना चाहती थी उम्र के  जिस मोड़ पर तुम हो वहां से बहुत सी चमकदार राहें नज़र आयेंगी जिन पर चल कर तुम्हें पल भर की खुशियां तो मिल जायेंगी लेकिन ज़िन्दगी की असली खुशियों के दरवाजे़ हमैशा के लिये बंद हो जायेगें तुम भटक सकते हो इसलिये तुम इन राहों पर कभी मत चलना तुम उस राह पर चलना उस मंज़िल को पाना जिस का ख़्वाब मैं ने तुम्हें दिखाया है !
                 तुम्हें याद होगा जब तुम चौथी या पांचवी क्लास में थे एक दिन स्कूल से आकर तुम ने पूछा था अम्मी मैं बड़ा होकर क्या बनूँगा मैं ने कहा अच्छा इंसान  तुमने कहा ठीक है मगर में बनूंगा क्या ? मैंने फिर कहा अच्छा इंसान ! अब तुम्हारे झुंझलाने की बारी थी  तुमने कहा टीचर ने सबसे पूछा है कल मुझे भी बताना है मैं क्या बनूंगा मैं उस वक्त तुम्हारे पास बैठी और तुम्हें प्यार से समझाया :
बेटा आजीविका के लिये कुछ भी बनो डाक्टर, इंजीनियर, वकील, टीचर,बिज़नेस मेन,नेता,अभिनेता लेकिन उससे पहले एक अच्छे इंसान ज़रूर बनो जब तक तुम ईमानदार नहीं होगे ग़रीबों के लिये हमदर्द नहीं होगे देश से प्यार नहीं करोगे औरत की इज़्ज़त नहीं करोगे तुम अपने काम को भी इमानदारी से नहीं कर सकते हम कुछ भी बनें लेकिन पहले एक अच्छा इंसान बनना बेहद ज़रूरी है मुझे बहुत खुशी है बरसों पहले मेरी कही इस बात पर तुम ईमानदारी से चल रहे हो तुमने एक बात ज़रूर सुनी होगी ज़िन्दगी न मिलेगी दुबारा. खु़दा ने हमें खूबसूरत ज़िन्दगी  दी है इसकी क़द्र करो जब तुम अपनी ज़िंदगी से प्यार करोगे तो बुरी आदतें तुम्हारे पास भी नहीं आयेंगी आज के युवा धूम्रपान, गुटका,शराब पीना अपनी शान समझते हैं उन्हें नहीं मालूम वे पल पल क़दम दर क़दम किन परेशानियों को अपने पास बुला रहे हैं तुम्हें यह बात याद होगी मगर आज फिर याद दिला रही हूं एक दिन मैंने तुमसे कहा था जिस दिन तुमने सुपारी का एक दाना भी मुंह मे रख लिया उस दिन से उस मुंह  से मुझे अम्मी मत कहना  यह तुम्हें धमकी नहीं थी यह मेरा प्यार था में चाहती थी तुम्हें कोई चीज नुक़सान न पहुंचाये मुझे खुशी है मेरी यह बात तुम्हारे लिये पत्थर की लकीर हो  गईतुम्हें मालूम है न किसी की सेवा करने से ग़रीब की मदद करने से कितनी खु़शी मिलती है दिल को बड़ा सुकून सा मिलता है समाज सेवा हम जिस तरह से करते है वह भी हमारे प्यार की तरह निराला है शादी पार्टी मे से बचा खाना लाकर ग़रीब बच्चों को खिलाना जब वे बच्चे सुकून और मज़े से खाते हैं तो हमें तुम्हारे बाबा की डांट भी प्यारी लगती है रिश्तेदारो दोस्तो के यहां से खिलौने पुराने कपड़े लाकर ग़रीबों में बांटना हमारा शौक़ बन गया है तम्हें याद है गर्मी के दिनों में सब्ज़ी वाले फ़ेरी वाले को ठंडा पानी पिलाना सर्दी के दिनों में बुज़ुर्गों को अदरक की चाय पिलाना हमें कितना सुकून देता है  राह चलते किसी बुज़ुर्ग की मदद करना, ग़रीब अशिक्षित बच्चों को बोल चाल का तरीक़ा सिखाना, साफ़ सफ़ई से रहना, लड़ाई झगड़ा न करना, शिक्षा पर ज़ोर देना हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन गया है , मैं चाहती हुं तुम इन सब बातों को अपनी ज़िन्दगी का स्थायी हिस्सा बना लोअभी तुम्हारी उम्र शादी की तो नहीं है मगर उस सिलसिले में भी तुम से कुछ कहना चाहती हूं, तुम जिस लड़की को भी अपना हम सफ़र बनाओ उसके साथ पूरे ईमानदार रहना,उसकी इज़्ज़त करना,उसके वालदेन की इज़्ज़त भी इसी तरह करना जैसे तुम अपने वालदेन की इज़्ज़त करते हो तुम्हारी बातें,तुम्हारे किसी भी काम से उन्हें दुख न पहुंचे 
ख़त के शुरू मे मैंने लिखा था खुश रहो अब एक बात और कहना चाहती हूं सब को भी ख़ुश रखो, मुझे उम्मीद है तुम्हे मेरा यह तोहफ़ा पसदं आया होगा और तुम इसे हमेशा सम्हाल कर रखोगे 
                            तुम्हारी अम्मी
                      (शाइस्ता ख़ान भोपाल )
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क्रम संख्या - 6
संध्या गोयल 'सुगम्या'

"हस्तलिखित पत्र"

कभी सोचा भी न था कि हस्तलिखित पत्र एक गुज़रे जमाने की चीज़ हो जाएंगे। आज के इस तकनीकी युग में पैदा हुए, पले बढ़े बच्चों के लिये उस युग की कल्पना भी सहज नहीं है, जब अपनी भावनायें दूसरे तक पहुँचाने का, एक दूसरे की कुशलक्षेम पूछने का और एक दूसरे के जीवन में अच्छा- बुरा जो कुछ भी चल रहा है, उसे जानने का एकमात्र जरिया थे ये पत्र। इनके इंतज़ार में जो मज़ा था, और इनको पाने का जो आनन्द था, उसका वर्णन शब्दों में कर पाना लगभग असम्भव ही है।
हमारे पिताजी श्री नन्दगोपाल सिंहल साहित्यिक रुचि वाले एक जागरूक व्यक्ति थे। उन्होंने हम सभी बच्चों में पत्र लेखन की आदत एक पौधे की भाँति रोप दी थी। हमारे खाली समय का एक बड़ा हिस्सा इन पत्रों की भेंट चढ़ता था। इनके माध्यम से हम दूर दराज रहने वाले अपने सभी रिश्तेदारों एवं मित्रों से जुड़े रहते थे। आजकल जिस पोस्टमैन की उपस्थिति को भी सब नज़रअंदाज़ कर देते हैं, उसी पोस्टमैन का इन्तज़ार हम बड़ी बेसब्री से किया करते थे। इसीलिये हम बच्चों ने अपने स्कूली ज्ञान का सदुपयोग करते हुए अपनी पत्र पेटी में एक घण्टी लगा दी थी। जैसे ही उसमें पत्र आते, घण्टी बज उठती और हम बच्चे दौड़ पड़ते पत्र लाने के लिये। जल्दी ही मोहल्ले के शरारती बच्चों को इस घण्टी की खबर लग गई। फिर क्या था, अब तो पत्र पेटी की घण्टी हर समय बजने लगी। बच्चे उसमें कागज डाल देते और घण्टी बजने पर भाग खड़े होते। कहना न होगा कि उनकी शरारतों से तंग आकर वह घण्टी हमें हटानी ही पड़ गई थी। 
आइये, अब आपको लगभग आधी शती पुराना एक संस्मरण सुनाती हूँ, जो पत्र लेखन से ही सम्बन्धित है।

सन उन्नीस सौ पिचहत्तर की बात है। 
देश में आपातकाल लागू किया गया था। सन उन्नीस सौ इकहत्तर में बने एक कानून "मीसा"(maintenance of internal security, आन्तरिक सुरक्षा व्यवस्था अधिनियम) का इन दिनों व्यापक रूप से इस्तेमाल हुआ। देश भर में राजनीतिक विरोधियों की धरपकड़ हुई और रातों-रात इन विरोधियों से जेलें भर दी गईं। इसी तूफान की चपेट में आये शिकोहाबाद (मैनपुरी) निवासी हमारे मामा जी श्री ओंकारनाथ अग्रवाल एवं मौसा जी श्री जयप्रकाश गुप्त। ये वे लोग थे जो चींटियों की लाइन देखकर उन्हें बचाने के लिये अपनी राह बदल देते थे। पर आज इनसे देश की सुरक्षा को खतरा बताया जा रहा था। इस दंश को जिसने झेला है, वही जानता है कि यह सब कितना भयावह था। मीसा बन्दियों से मिलना असम्भव था। उनकी खैरियत पता करने का भी कोई जरिया नहीं था। ऐसे में घरवालों पर क्या बीत रही होगी, आप इसका बस अंदाज़ा ही लगा सकते हैं। काफी समय बीत जाने पर मीसा बन्दियों को एक छोटा सा पेपर और पेन दिया गया। उन्हें सिर्फ एक पत्र लिखने की इजाज़त दी गई थी। हमारे मामा जी ने इस पत्र के लिये हमारे माता पिता को चुना। फलस्वरूप कुछ दिन बाद माँ पिताजी को मामा जी का एक हस्तलिखित पत्र प्राप्त हुआ जिसमें उन्होंने अपनी खैरियत लिखी थी और  घर के सब लोगों को याद किया था।  इस पत्र की विशेषता बताई जानी अभी शेष है। इस छोटे से पत्र में बेहद बारीक अक्षरों में सात पैरेग्राफ लिखे गये थे। इसमें केवल पहला पैरेग्राफ हमारे परिवार के लिये था। फिर अगले पाँच पैरे हमारी पाँच मौसियों के परिवार के लिए थे। और सातवाँ पैरा मामा जी के खुद के परिवार यानि नाना जी, नानी जी व मामी जी के लिये था। 
उन दिनों हर हाथ में क्या, हर घर में भी फोन नहीं हुआ करता था। वरना तो पिताजी सभी घरों में फोन करके उनकी खैरियत की सूचना सभी को दे देते। पिताजी मामा जी का इशारा समझ गए थे। उन्होंने इस पत्र की सात कटिंग कीं। अपनी कटिंग अपने पास रखकर शेष छह कटिंग छह लिफाफों में रखीं और सभी के पते लिखकर पोस्ट कर दीं। ये छह पत्र उन छह घरों में कैसे हाथों हाथ लिये गये होंगे और कैसे उन्हें भगवान के प्रसाद की भाँति सिर आँखों से लगाया गया होगा, इसकी बस आज कल्पना ही की जा सकती है।

सन्ध्या गोयल सुगम्या
ग़ाज़ियाबाद
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क्रम संख्या - 7
मनोरमा जैन 'पाखी'
नमन मंच 
आयोजन -#खत उनके नाम 

आज इतने सालों बाद फिर तुम याद आये। और साथ में कितनी यादें भी। आओ न फिर से चलते हैं उन्हीं वादियों में। 

प्रिय ,
कैसे हो?याद करते हो मुझे ?नहीं न!झल्ले हो तुम ।
सुनो ,कुछ याद आ रहा है ।बताती हूँ।उम्र ही क्या थी ,सोलहवाँ ही तो लागा था। कुछ ख्वाब पल रहे थे आंखों में,कुछ ख्वाहिशें कैद हो रही थी पलकों में।लबों पर गीत रुकने लगे थे। कुछ रुहानी सा मौसम ।शब की चांदनी भीगी ,भीगी लगती तो सुबह शबनम में नहाई। सर्द हवायें  तन को छूती थी पर कुछ था जो #मन को छू रहा था। तभी आया वैलेंटाइन डे।सहेली खोज रही थी अपने दोस्त को देने के लिए लव-कार्ड। मैं बस देख रही थी। मन हुआ था कि ले लूँ। पर किसके लिए ?एक कार्ड पसंद करके शॉप से निकल रही थी, अचानक तुम सामने आ गये। सकपका गयी थी । याद है तुमको ? तुमको लगा वो कार्ड मैंने लिया है।क्योंं कि मेरे हाथों में ही था। सहेली के आने से हम लोग चले गये थे। पर तुम्हारी आंखों में उभरे थे सवाल ।
14 फरवरी को रोज की तरह जैसे ही मैं तुम्हारे घर के नीचे से निकली । आँटी ने आवाज लगाई। अक्सर बाजार से कुछ मँगाना होता था तो यूँ ही तो बुला लेती थी वो। मैं घर पहुँची तो उन्होंने सामान की पर्ची थमाते पूछा, कालेज से लौटते ले आएगी न? कोई दिक्कत तो नहीं।
न ,ले आऊँगी। तभी तुमने बोला था।मम्मी इन लड़कियों को तो बहाना है कॉलेज का । असली मकसद तो ...।मुझे चाय दे दो ,देर हो रही कालेज के लिऐ।बात अधूरी छोड़ कर पलट भी दी थी तुमने। मेरा चेहरा लाल हुआ था।खिसिया भी गयी थी। 
आँटी रसोई में गयी और पलक झपकते ही एक छोटा सा खूबसूरत लिफाफा हाथ में पकड़ी बुक्स के अंदर । मैं हकबका गयी। चुप रहना और जबाव का इंतजार करूँगा। एक आँख शरारत से दबाते हुये मुस्कुरा दिये थे तुम।सच ,कितना हिम्मत थी तुमने। तब तक आँटी पैसे और दो चाय भी ले आई थी। मेरी हिम्मत कहाँ थी अब चाय पीने की। पसीने छूट रहे थे। अरे तुझे क्या हुआ ?अभी तो ठीक थी। पसीना आ रहा है। अरे तू काँप भी रही है ,क्या हुआ सडनली। अचानक मेरी हालत देख आँटी चौक गयी थी। 
मम्मी, शायद सर्दी लग रही होगी। चाय पीने से आराम आयेगा।
मेरी आँसू भरी आँखे तुम्हारी ओर उठ गयीं थी। उनमें अपने लिए चिंता देखी थी। चाय पीने का इशारा किया। मेरी नज़र झुक गयी थी। दिल की धड़कनें जैसे कनपटी पर बज रही थीं। चाय के घूंट जैसे तैसे हलक से नीचे उतरे। उतनी देर चिंतित से आप वहीं खड़े रहे थे।
बाद में कहा था तुमने । यार डरा ही दिया था। कितनी पागल हो तुम और सीधी भी। इसी पागलपन से तो प्यार हुआ मुझे। 
याद है, तुमने रिप्लाई  माँगा था। समझ न आया क्या रेप्लाईदूँ। पेंटिंग का शौक था तो हाथ से कुछ पीस बना कर दिए थे।जिनको एक दूसरे से जोड़ कर सुंदर सी पेंटिग बनती थी।और वो लिखा था तुम्हारा नाम।
तुमने उसे अपनी स्टडी टेबल पर सामने ही लगा लिया था। यह कह कर कि  कालेज के दोस्त ने दिया।
सच में नील , कितने प्यारे ,इनोसेंट से थे वो दिन । आज भी हैं तुम्हारी यादें मेरे पास ,जेहन में भी और मेरे कलेक्शन में भी। सबसे खूबसूरत याद तो वो पेन है ग्रीन कलर का । जो तुम्हें बहुत पसंद था। किसी को न देते थे। हर एग्जाम में वो तुम्हारा लकी चार्म था। मेरे पेपर के पहले दिन गिफ्ट दिया था वह। जानती हूँ जब इस पल मैं तुमको काव्यांचल के कारण याद कर रही हूँ ।तो लग रहा है ये दिन तुमको भी याद आ रहे होंगे। यही तो दिन थे जब सोलहवें साल में तुम करीब आये थे। आलवेज लव यू। ये खत तुमको न दूँगी।
                                                                                                                            तुम्हारी
                                                                                                                              Xyz

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क्रम संख्या - 8
डॉ. निरुपमा वर्मा 
एटा, उत्तर प्रदेश

देवी लक्ष्मी को पत्र 

हे! विष्णु की महान भार्या ,आप की माया अपरंपार है आपकी कृपा दृष्टि से से हम सभी भारतीय राजनीतिज्ञगण की अभिलाषाएं पूर्ण होती हैं । आपकी दया दृष्टि की सदैव हम कामना करते हैं । स्वर्ण चिड़िया का यह देश मुगलों और फिर अंग्रेजों के बाद हम भारतीय राजनीतिज्ञ गणों को प्राप्त हुआ । आपके लिए हमने काली, नीली ,पीली ,लाल ,सफेद विभिन्न टोपियां धारण की, लठ चलाए गोलियां चलवाई । तब इस सोने की चिड़िया को प्राप्त किया आप तो जानती हैं हम नेता बनने से पूर्व कितनी दयनीय अवस्था में जी रहे थे। अब लाखों करोड़ों को संभालने के लिए हमें मंदिर मंदिर जाना होता है, स्विस बैंक की शरण लेनी पड़ती है। हे महालक्ष्मी !! आपकी कृपा से पिछड़ा वर्ग, दलित वर्ग, आदिवासी वर्ग, अल्पसंख्यक, बहुसंख्यक ग्रामीण, विधवा पेंशन जैसे विभिन्न मद आबंटन बनाकर उसमें से अपना हिस्सा प्राप्त करके समाजवादी समानता संवैधानिक वायदे पूरा करते हैं। हमने आपकी ही झलक दिखा कर बेरोजगार युवाओं को रोजगार प्रदान करते हुए उन्हें हथियार , पार्टी के झंडे की सुरक्षा प्रदान की । और उन्हें धर्म और जाति के नाम पर भीड़ में शामिल किया । 
इस तरह लोकतंत्र में हमने तुम्हारी मदद से लोक को गोली मार दी और तंत्र पर काबिज हो गए । 
अब तो मुख्य न्यायाधीश , चुनाव आयुक्त , सीबीआई , भीआपकी कृपा से हमारे दबाव में है। यह आपका ही प्रताप है कि कई तथाकथित बाबा , गुरु और तांत्रिक और ज्योतिषी को हमने अपने दल में बैकडोर से अपने दल में शामिल कर रखा है ।
अतः हे!! कृपा निधान लक्ष्मी जी !! आपकी इन महती सब कृपा को मद्देनजर रखते हुए हम भारतीय नेता दीपावली पर विनम्र भाव से एक सम्मान पत्र सादर समर्पित करने वाले हैं। 
-----आप की कृपा दृष्टि के सदैव याचक 
हम है ---
भवदीय 
स्वतंत्र भारत देश के राजनीतिक नेता
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क्रम संख्या - 10
बबिता भाटिया 
दिल्ली 
जन्मदिन के अवसर पर पिता का पत्र  ~
बिटिया के नाम  

मेरी प्यारी बेटी  श्रुति! 
२८ अक्टूबर अब तक का वह खूबसूरत  दिन है, इस दिन मुझे स्वर्ग से सर्वश्रेष्ठ उपहार मिला था तुम्हारे रूप में ... आज के दिन मुझे पिता बनने की अनुभूति  हुई थी । तुम्हारी मधुर मुस्कान ने मेरा मन मोह लिया । जब तुम लाड से मुझे गलबहियाँ डालती हो तो मेरी सारी थकान दूर हो जाती है। ...

समय पंख लगा कर उङ गया ...  और तुम कब न जाने छोटी से बड़ी हो गयी,,  अपनी समझ से खुद ही अपनी राह तय करती रही।  हमारे परिवार की मीठी सी खुश्बू हो तुम,  सबको बांधे रखने का हुनर है तुम में ,,  कुनबे से हर शख्स का  एक  एक गुण समेटे पापा की लाडो अब श्रुति से मिस श्रुति भाटिया हो गयी ,, 
  
सब पर एक सा भाव ,  तर्क अधिकार में , और भाव से , रिश्तों में धागा सी हो तुम  ,   ऐसे थोड़ी श्रुति दी को श्रेष्ठ भाई  सुप्रीम कोर्ट कहता है ,   ढेर सी दुआएं है तेरे साथ ,  सदैव खुश रहोगी तुम ...  क्योंकि तुझमे कला है खुशियाँ बाँटने की ,  फितरत में है तेरी ,, सबको अपना बनाकर रखना,  बनी रहे भाईयों की लाडली , ऐसे थोड़ी कहते है वो ,  श्रुति जैसा कोई नही ,,   
सबकी तरफ से जन्मदिन पर ढेर  सारी शुभकामनायें ,, अनंत ,, ....बस समेटती रहो ,, गठरी भरी रहे।
 इन शुभ कामनाओं के साथ...

तुम्हारे पापा   
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 निर्भया के नाम एक काल्पनिक पत्र
सदानंद कवीश्वर
प्रिय बेटी, निर्भया.....
समझ नहीं पा रहा हूँ कि आगे क्या लिखूँ ? साधारणतया किसी भी पत्र में नाम लिखने के बाद शुभाशीष, खुश रहो, सुखी रहो ... या ऐसा ही कुछ लिखने की प्रथा है... और हाँ, मैं भी जब कोई पत्र लिखता हूँ तो यही सब लिखता हूँ किन्तु आज तुम्हे पत्र लिखते हुए न जाने क्यों समझ ही नहीं पा रहा हूँ कि तुम्हारे नाम के बाद क्या लिखूँ ? 
यदि शुभाशीष लिखता हूँ तो लगता है किस मुँह से लिखूँ, क्या आशीष दूँ तुम्हे ? तुम्हारा वह दर्द भरा चेहरा आ जाता है आँखों के सामने l क्या कर पाए हम तुम्हे बचाने के लिए... अरे बचाना तो छोडो हम तो घटना घटने से पहले तुम्हे सुरक्षित भी नहीं रख पाए l अब आशीष दें या न दें क्या फर्क पड़ता है ? कभी कभी लगता है हम इतने विवश क्यों हैं ? क्यों नहीं हम संस्कार दे पाए अपने बच्चों को ? क्या एक अकेली लड़की के साथ यह सब होना ही उसकी किस्मत में लिखा है ? प्रश्न तो बहुत हैं पर उत्तर कहाँ है ? जब तुम इस दुनिया में थीं तब तुम्हे भी तो आशीष मिले ही होंगे पर बेटा, जितने तुम्हे आशीष मिले उससे कहीं ज्यादा शैतान पैदा हो गए इस दुनिया में l अक्सर सुनने में आता है कि किसी की जेब कट गई, कहीं चोरी हो गई, कोई पर्स ले कर भाग गया...... पर बेटा जैसा तुम्हारे साथ हुआ वह तो न किसी ने सुना न देखा l जिंदा होते हुए मिले आशीष ही जब तुम्हारे काम न आए तो अब क्या आशीष दूँ तुम्हे ?
तो क्या ‘खुश रहो’ कहूँ...? कैसे खुश रह पाओगी बिटिया तुम ? जिस बेदर्दी से तुम्हे चोट पहुँचाई गई उसके बाद कोई कैसे खुश रह सकता है ? मैं आजतक यह नहीं समझ पाया कि आखिर गलती क्या थी तुम्हारी ? क्या लड़की होना ही तुम्हारी एकमात्र गल्ती थी ? और कोई इतना क्रूर कैसे हो सकता है ? मानसिक रूप से कमज़ोर व्यक्ति भी ऐसी हरकत नहीं कर सकता l शारीरिक और मानसिक कष्ट अपने होंठ दबा कर सहन करती हुईं तुम लाचार हो कर चलीं गईं, अब कैसे कहूँ कि “खुश रहो l”
‘सुखी रहो’ कहना भी बेमानी ही लग रहा है l जब जीते जी ही हम तुम्हे सुख न दे सके तो अब क्या दे पाएंगे ? कभी कभी लगता है कि इस क्रूर और निर्मम दुनिया से, जहाँ इंसान की शक्ल में शैतान रहते हैं, तुम नाता तोड़ कर चली गईं यह ठीक ही हुआ क्योंकि इस सीमा तक दुःख, कष्ट और अपमान सहने के बाद यदि तुम बच जातीं तो क्या सुखी रह पातीं ? पर जो बात सबसे अधिक कष्ट देती है वह यह कि आखिर तुम्हे इस समाज ने इस स्थिति तक पहुँचने के लिए मजबूर किया ही क्यों ? इतना सब होने के बाद कैसे कहूँ बिटिया कि... ‘सुखी रहो’
मेरी वेदना यहीं समाप्त नहीं हो जाती बेटा... कष्ट तो इस बात का भी बहुत है कि उस घटना के कुछ समय बाद सारे अपराधी पकड़ भी लिए गए थे किन्तु हमारे देश की न्याय पद्धति ने उन्हें सजा दिलवाने के लिए सात साल का समय लिया l इस बात से तुम्हारी आत्मा को कितना कष्ट हुआ होगा इस बात का अंदाजा भी संभवतः नहीं लगा पाएंगे हम कभी l 

इन सबसे भी ज्यादा तकलीफ इस बात की है कि उस जानलेवा घटना के बाद नारे लगे, जुलूस निकले, कसमें खाईं गईं, पोस्टर लगे, मोमबत्तियां जलीं, क़ानून बने पर वैसी घिनौनी घटनाएँ तो अब भी हो ही रहीं हैं l कुछ भी नहीं बदला बिटिया... तुम्हारे जैसी मासूम कलियाँ आज भी मसल दी जातीं हैं, उन्हें भी उसी तरह बेदर्दी, बेरहमी से मार दिया जाता है l  शैतान आज भी जिंदा हैं बेटा... अगर कोई मरा है तो वह है, इंसानियत, अगर कोई मरा है तो वह है इस देश का कानून, हमारा ज़मीर मर गया बेटा, हमारी आँखों की शर्म मर गई l 
हम तुमसे, तुम्हारी याद से, तुम्हारी आँखों के उन प्रश्नों से आँख मिलाने लायक नहीं हैं बेटा... तुम एक बार मर कर मुक्त हो गईं... हम रोज़ मर रहे हैं, अपनी नज़रों में गिर रहे हैं... फिर भी जिंदा हैं l
हमें माफ़ कर दो बेटा.... माफ़ कर दो.... माफ़ कर दो....l 

तुम्हारा शुभचिंतक (जो तुम्हारे लिए कुछ भी शुभ न कर सका) 
-सदानंद कवीश्वर
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डॉ आलोक रंजन कुमार 
मिलन की प्रेम-पाती 
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कहाँ  खो  गई  वो  बहारें ,
कहाँ  सो  गई  वो  नज़ारें।
ढूंढा  था  बड़ी  मेहनत  से,
कहां  खो  गई  वो  सितारें।

नदी  का  किनारा  था और    
चमन  में  थे  फूल  खिले ।
मकर  संक्रांति  के  मेले  में,
सनम ! हम दोनों  थे  मिले।

तन्हाई में जीने नआता मुझे,
तन्हा  जियूं कैसे  तेरे  बिना।
यादें ही अब शेष रह गई  हैं ,
विरह में जियूं कैसे तेरे बिना।
 
मैं तो दिल लगाए बैठा हूं औ'
तुझपर मां का सख्त पहरा है।
वो क्या जानें,ऐ मेरे हमसफर!
दर्द का रिश्ता बहुत ही गहरा है।

तेरे हर एक लफ्ज़ से देखा है,
पैग़ामे-मोहब्बत निकलते हुए।
हर एक  नज़रों  में  देखा  है ,
तेरे  दिल  को  पिघलते  हुए।

ये जो मुझ में लौ जल रही है ,
वो यादें मुझे अब खल रही हैं।
तेरे प्रेम-दीप की रोशनी से ही,
ये ज़िंदगी अबतक पल रही है।

जब तलक दीपक में तेल है,
तभी तक इस लौ का मेल है।
जहां  खत्म हुआ  तेल सनम,
तो ज़िंदगी का खत्म खेल है।

तुझ से गुज़ारिश है ऐ प्रेम-परी,
मेरी नज़रों में छाई रहो हर घड़ी।
पर तुम बेवफा मत बन जाना,
वरना आ जाएगी अंतिम घड़ी।

बड़े फ़क्र से लिखा है प्रेम-पाती,
जिसका  कोई  हिसाब  नहीं ।
तेरा सिर्फ यूं ही मुस्कुरा देना ,
मेरे प्रेम-पत्र का जवाब नहीं ।

निराश न करना ऐ मेरी प्रेम पाती,
ज़रा उनको प्रेम-संदेश सुनाना।
मेरे हमसफ़र रश्मि प्रकाश के,
उर में सुर बनकर समा जाना।

मिलन की प्रेम पाती के ज़रिए,
संदेश भेजा है आलोक रंजन।
ठुकरा ना देना इस पाती को ,
करना इसका हार्दिक-अभिनंदन!

हार्दिक नमन ! 
श्री गणेशाय नमः
                 जपला,पलामू।
             दिनांक:२३-१०-२०

आदरणीय भ्राताश्री !
सादर नमस्कार ! 🙏

  कुशलांतरे कुशलाभिलाषी !
बड़े अरमान से पाती प्रेषित किया है। विलम्ब के लिए क्षमा प्रार्थी ! आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि मुझे भी आपका आशीर्वाद प्राप्त होगा।
      पुनः हार्दिक नमन के साथ -
      आपका ही अनुज -
      आलोक रंजन ।
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प्रिय नदी

छुट्टियों में घूमने का कार्यक्रम बन रहा है । कहाँ जाया जाए,,,, कभी नैनीताल, कभी शिमला, कभी मनाली । अल्मोड़ा का नाम आते ही मैनें झट हाँ कर दी क्योंकि बचपन से इच्छा थी वहाँ जाने की । सुमित्रानंदन पंत जैसे महान व्यक्तित्व जहाँ से निकले वह जगह कितनी महान होगी । पर चर्चा चलते चलते मन्सूरी पर आकर अटक गई ।अल्मोडा अगले साल चल पड़ेंगे कहकर सबने मुझे हरिद्वार मन्सूरी ट्रिप पर चलने के लिए तैयार कर लिया। 

सच में गंगा स्नान का आनन्द हमेशा अविस्मरणीय रहता है । वहाँ की कचौडी और हलवे का स्वाद तो जैसे सभी भी जीभ पर ही है । शाम को वहाँ से मसूरी के लिए चल दिये, दो दिन रुके । खूब घूमे । मौसम बहुत सुहावना था तो घूमने का आनन्द दुगुना हो गया । 

वापिसी पर आते हुए वाया देहरादून आये । वहाँ रास्ते में जब हमारी कार छोटे से पुल से गुजर रही थी तो बाहर की ओर देखा । पुल नदी पर बना हुआ था पर नदी.... बिन पानी की नदी । जी धक्क से रह गया । उचक कर दूर तक देखने की कोशिश की पर वही नजारा! आँखे बरबस भर आई । हम रुडकी रोड पर थे सड़क पर कंस्ट्रक्शन का काम चल रहा था और साथ ही साथ चल रही थी सूखी उदास बेबस नदी! 

सभी सभ्यताओं का विकास नदी किनारे से ही शुरु हुआ और आज नदियों की क्या दशा कर दी हमने ! अपने विनाश के लिए खुद ही गडडा खोद रहे हैं हम । क्या फायदा इस पढ़ाई लिखाई का कि प्रकृति से ही खिलवाड़ करने लगे हम!

नदियाँ तो जीवनदायिनी होती हैं और यहाँ तो नदी खुद जीवन दान के लिए बिलख रही है । सौ सौ सवाल पूछे खुद से! पर निरुत्तर ! 

हे नदी ! हाथ जोड़ आपसे क्षमाप्रार्थी हूँ अपने इन्सान होने पर, अपने जाहिल पर । शर्मिंदा हूँ अपने कृत्यों पर कि आज आप को इस हाल पर ला खड़ा कर दिया ।

क्षमाप्रार्थी
अंजू खरबंदा 
दिल्ली
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