नवगीत का वस्तु विन्यास
महेश अनघ
विषय की पूर्वपीठिका के रूप में पहले दो बातें कहना चाहूँगा। लौकिक काव्य संदर्भ में गीत की दो अनिवार्य शर्तें रही हैं - छंद संतुलन और अंत्यानुप्रास (तुकांत)। आदि कवि वाल्मीकि से लेकर अब तक गीत इसी रूप में पहचाना जाता है। यह अलग बात है कि इसके पूर्व, वैदिक साहित्य में ऋग्वेद एवं सामवेद की ऋचाएँ, जो गीत ही मानी जाती हैं, उपर्युक्त शर्तों के अधीन नहीं रहीं। वहाँ पर सांगीतिक लय ही गीत का आधार था और प्रत्येक ऋचा की एक सुनिश्चित गायन पद्धति निर्धारित थी, जिसे आरोह-अवरोह-स्वरित के नाम से चिह्नित किया गया था। अस्तु, वह लय पर आधारित काव्य था। बाद में सनातन गीत की इस अनिवार्य शर्त 'लय' को साधने के लिए छंद और तुकांत को साधन बनाया गया जो संस्कृत काव्य की वार्णिक छंद परंपरा तक बखूबी निर्वाह किया जाता रहा लेकिन हिंदी काव्य में, ख़ासतौर से मात्रिक छंद के रूढ़ प्रयोग और भाषाई जटिलता के कारण यह छंद रूपी साधन तो बना रहा, किंतु साध्य लय छूटती गई। एक लंबे समय तक इस विचलन पर किसी का ध्यान नहीं गया। (मैं तो कहूँगा, आज भी किसी का ध्यान नहीं है) यही पारंपरिक गीत का दुर्भाग्य था जिसके कारण गीत प्राण विहीन होकर आकार मात्र रह गया और उसकी इसी कमज़ोरी के कारण नई कविता ने उस पर आक्रमण कर उसे ग्रसने का प्रयास किया। यह स्पष्ट होता है कि वैदिक साहित्य से लेकर अद्यतन नवगीत तक लय ही एकमात्र ज़रूरी शर्त रही है गीत की। और यह भी, कि सांगीतिक गीतराग तथा मुद्रित गीतपाठ के बीच संबंध जोड़ने वाला एकमात्र कारक सेतु भी लय ही है। दो- नवगीत में और कुछ नहीं, केवल एक 'नव' उपसर्ग जुड़ गया है। लेकिन यह उपसर्ग बहुत व्यापक संदर्भों में जुड़ा हुआ है। इसके कई आशय परिलक्षित हैं। एक आशय यह कि नवगीत का तौर-तरीका अब तक रचे गए गीत से बिल्कुल अलग तरह का, नया हो। दूसरा आशय यह कि गीत की प्रथम बाध्यता-छंद को लय के आधार पर नया आकार दिया गया हो। तीसरा आशय यह कि अनुप्रास पंक्ति के अंत में होने की बजाय और कहीं भी हो, अथवा न भी हो। चौथा आशय यह कि गीत का अंदाज़ेबयाँ यानी शिल्प नए तरह का, बिल्कुल मौलिक हो। पाँचवाँ आशय यह कि गीत में प्रयुक्त हिंदी भाषा को आंचलिकता के साथ सविस्तार ग्रहण किया गया हो अथवा नए निजी शब्द गढ़े गए हों। और छठा आशय यह कि गीत में ऐसा कुछ कहा गया हो, जो अभी तक गीत विधा का विषय नहीं बन पाया था, आदि आदि। यहीं से मूल विषय पर चर्चा करते हैं। पहला सवाल - गीत में वस्तु की अनिवार्यता क्यों हैं? संगीत की रचनाओं में कथ्य की आवश्यकता नहीं होती। वहाँ लय चाहिए, राग-रागिनी चाहिए, सधा हुआ कंठ-स्वर चाहिए और संगत के लिए साज चाहिए। उदाहरण के लिए मियाँ तानसेन की रचनाएँ अथवा किसी ठुमरी को लीजिए, इन रचनाओं का श्रोता कभी भी गीत में अर्थ तलाश नहीं करता है बल्कि स्वर के आरोह-अवरोह में झूमता है। यहाँ हाल ज़्यादातर फ़िल्मी गीतों का भी है, जैसे 'डम डम डिगा डिगा. . .मौसम भीगा भीगा. . .'। इसीलिए फ़िल्मी गीतों में गीतकार की अपेक्षा दस गुना ज़्यादा महत्व संगीतकार का होता है।लेकिन काव्यगीत के साथ ऐसा नहीं है।
1 - व्यथा वेदना का है आलम / जीवन की अब शाम हो गई / विश्वास किया जिस पर भी मैंने / वही ह्रदय से खेला है / लाखों की चाहत की थी पर / हाथ न आया धेला है / सफ़र अनवरत / पर न मंज़िल / मौत स्वयं आयाम हो गई।/
2 - चंदन क्षण / डूबे अतीत में / यादें शेष रहीं / वे दिन जबकि विचारों में / प्रतिपल गुलाब महके / भावों के पाँखी / गदराई शाखों पर चहके / वर्तमान ही जिया / हुआ आगत का भान नहीं।
यहाँ पहला उद्धरण कथ्यविहीन, केवल वैयक्तिक निराशा का चित्रण है, जबकि दूसरे उद्धरण में वैयक्तिक अनुभूति की अभिव्यक्ति में सुखों के संरक्षण हेतु सतत सजग एवं भविष्योन्मुखी रहने की परोक्ष चेतावनी है, इसीलिए, यह वस्तुयुक्त नवगीत है। दोनों तुलनात्मक गीतों का प्रभाव एक सामान्य पाठक पर भी ऐसा ही पड़ेगा, कि वह एक गीत को पढ़ देगा, जबकि दूसरे गीत को पढ़कर उसमें अंतर्निहित आशय ग्रहण कर लेगा। और यह कि नवगीत रचना या कोई भी काव्य रचना अंततः सामान्य पाठक के निमित्त ही होती है - होनी चाहिए। इसलिए पाठगीत में वस्तु की अनिवार्यता सिद्ध है। नवगीत में वस्तु विविधता और विस्तार की भी व्यापक संभावनाएँ हैं। संभवतः और किसी काव्य विधा में इतने कथ्य प्रकार न समा सकें, जितने नवगीत में हो सकते हैं। समय था जब गीत को रागात्मक अभिव्यक्ति और केवल सकारात्मक विचार व्याप्ति तक सीमित मान लिया गया था। इसी तरह ग़ज़ल रूमानी ज़मीन पर केंद्रित थी, दोहा नैतिक एवं सामाजिक सूक्तियों के लिए आरक्षित था, घनाक्षरी ब्रज क्षेत्र की संपत्ति थी और नई कविता केवल वामपंथी विचारों का पुलिंदा रही। लेकिन नवगीत अपने आरंभ काल से ही अप्रतिबंधित कथ्य को लेकर चला है। उसने सौंदर्य तथा प्रेमानुभूति को तो साथ रखा ही, नैतिक - सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक विषयों सहित विश्व परिदृश्य को भी अपनी विषय वस्तु बनाया। यहाँ तक कि जो विषय गीत में वर्जित किए गए थे, ऐसे वीभत्स और क्रूर संदर्भों सहित विज्ञान और तकनीक को भी अपने अंदर समेट कर नवगीत ने वस्तु को इतना व्यापक आयाम दिया कि अब उसे निर्बाध गमन हेतु दसों दिशाएँ खुली हुई हैं। नवगीत के एक असाधारण कथ्य का अंश देखें - काँधे पर धरे हुए / खूनी यूरेनियम / हँसता है तम / युद्धों के लावा से / उठते हैं प्रश्न / और गिरते हैं हम / और भी ढेरों ऐसे नवगीत हैं जिनका कथ्य एकदम असाधारण और लीक से हट कर है। क्यों कि नवगीत अब बालिग हो चुका है। उसकी मूँछें निकल रही है, अतः उसे अपनी अभिव्यक्ति के विस्तार के लिए सारी धरती और सारा आकाश चाहिए। अंततः नवगीत वस्तु के विन्यास पर एक दृष्टि- समकालीन नई कविता की तरह, समकालीन नवगीत सपाटबयानी, गद्यात्मक शैली या रिपोर्ताज पसंद नहीं करता। चूँकि नवगीत हमेशा ही लय से संपृक्त होता है इस कारण वह गद्यात्मक तो हो ही नहीं सकता। वह काव्य विधाओं की भाँति अपने कथ्य का विन्यास भी करता है। इसे आप बुनावट या बनावट भी कह सकते हैं और कृत्रिमता का दोषारोपण भी कर सकते हैं। किंतु कौन-सी विधा कृत्रिम नहीं है? - ज़रा सोचिए। वस्तु को ज्यों का त्यों परोसने का दंभ भरने वाली समकालीन कविता भी आख़िर रची ही जाती है। यह 'रचना' आख़िर क्या है - वस्तुविन्यास ही न। कभी प्रतीकों के द्वारा, कभी व्यंजित शब्दों के माध्यम से और कभी ठेठ आँचलिक टटकी भाषा के सहारे अत्याधुनिक संदर्भों को कविता में एक नितांत नया रूप आकार दे दिया जाता है। यह विन्यास ज़रूरी भी है। यह न हो तो कविता, कविता जैसी नहीं लगेगी। इसी तरह, नवगीत भी विन्यास के बिना नवगीत तो क्या, गीत ही नहीं लगेगा। विन्यास के लिए नवगीत के पास बहुत प्रसाधन हैं। सबसे सशक्त और बहुप्रयुक्त साधन है - बिंब योजना। इस दौर के अधिकांश नवगीत बिंब केंद्रित हैं और इसी कारण ने आकर्षक तथा रोचक भी हैं। बिंब न सही, तो प्रतीक योजना है, जो नवगीत के अंग, उपांगों को आकर्षक बनाती है। इसके अतिरिक्त व्यंजना शैली है, सांस्कृतिक संदर्भों का रेखांकन है, पौराणिक-ऐतिहासिक मिथक है, इंगित है, वैज्ञानिक शब्दावली है, आंचलिक बोलियों का आकर्षण है, कोमल भावों का उत्प्रेरण है तथा रागात्मकता है। और कुछ भी न हो तो छंद, लय तथा तुकांत का शाश्वत रूप शृंगार तो है ही। इस प्रकार, हिंदी नवगीत अपनी अनिवार्य लय की प्राणवत्ता के साथ व्यापक वस्तु विन्यास का भरपूर उपयोग करके आज साहित्य भूमि में आदमक़द आकार में खड़ा है अप्रतिहत-अपराजित-अनश्वर। गीत और नवगीत के धरातल पर कुछ सवाल साहित्य में प्रवृत्यात्मक परिवर्तनों को नए नामों से पहचानना इतिहास-लेखन की प्रक्रिया की अनिवार्य भार्त है किन्तु यह नव्यता बोध, संवेदना और प्रवृत्तियों की है, विधाओं और काव्यरूपों की पारस्परिक कलह तक उसे बहुत दूर तक घसीटना सार्थक नहीं होगा। आदिकाल से अधुनातन युग तक काव्य में प्रवृत्यात्मक परिवर्तन निरन्तर होता रहा है, लोकप्रियता के आधार पर कभी किसी एक काव्यरूप को प्रमुखता मिली तो कभी दूसरे को किन्तु गीत और गीतेतर कविता का विवाद इसी शताब्दी के पाँचवे दशक की उपज है। बारीकी से देखा जाए तो यह टकराव भी छांदसिक और अछांदसिक काव्य रूपों के बीच अधिक है। तब गीत और नवगीत के विवाद का औचित्य समझना बहुत मुश्किल है।
स्पष्टत: गीत और नवगीत में काव्यरूपतामक अंतर नहीं है। हिन्दी गीत काल के एक बिन्दु पर आकर नवीन प्रवृत्तियों का अर्जन करता है।< उस बिंदु के परवर्ती प्रसार को नवगीत संज्ञा मिली है और उस नवगीत ने स्वयं के गीत होने को कभी अस्वीकार नहीं किया, पर इससे यह तो नहीं निश्चिंत हो जाता कि इतिहास के विकासक्रम में जो प्रवृत्तिगत परिवर्तन घटित हो चुके हैं, उन्हें नकार दिया जाए अथवा उन्हें अनदेखा किया जाए। बोध के अंतर को, इतिहास के पूर्वापर क्रम को नकार कर किसी मृत युग का स्तवन साहित्य के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध तो है ही, यह गीत के विकास को भी अवरुद्ध करने का प्रयास है और यह प्रयास या तो नितांत अज्ञानता-प्रेरित है या इसके पीछे चालाकी और गहरी साजिश क्रियाशिल है। यों तो नव्य विकास को व्यक्त करने वाली संज्ञा नवगीत का विरोध इसके जन्म के साथ ही होता रहा है, पर कुछ पुस्तकों एवं पत्रिकाओं में गत दो-तीन वर्षों में चालाकी अथवा अज्ञानता के कारण नवगीत के विरोध का स्वर तेज़ हुआ है। कहा जाने लगा है कि नयी कविता ने गीत का विरोध एवं अहित नहीं किया, उसका वास्तविक शत्रु तो नवगीत है। नवगीतकार ही वह मूल अपराधी है जिसे तिरस्कार की सूली पर लटका देना चाहिए। यह भी कहा जाने लगा है कि नवगीत का आंदोलन चलाने के बहाने कुछ खास लोगों को केन्द्र में लाया जा रहा है। पिछले दिनों जारी की गई इन भावुक अपीलों से गीत के क्षेत्र में एक खलबली मची है। क्या यह उचित न होगा कि स्थितियों का थोड़ा वैज्ञानिक विश्लेशण किया जाए। इस प्रसंग में जो मूल प्रश्न खड़े होते हैं वे इस प्रकार है- १. क्या पूर्ववर्ती रूढ़ गीत से नवगीत का प्रवृत्यात्मक अंतर है? २. क्या यह संज्ञा स्वयं में सार्थक है? ३. क्या नवगीत वास्तव में किसी अवधारणा या रचनाकार के विरोध में खड़ा है? ४. समग्र गीत के मूल्यांकन का आग्रह कितना समीचीन है? हम इन प्रश्नों पर आने से पूर्व एक और तथ्य को रेखांकित करना चाहेंगे। काव्य-चेतना यदि एक काल खंड से ही आबद्ध होकर रह जाए तो उससे आत्म-विकास ही अवरुद्ध नहीं होता, पूरे परिवेश की गतिशीलता से उसका परिचय भी छूट जाता है। यही कारण है कि रूढ़ गीत जिस बिंदु पर जड़ीभूत हुआ था, उस समय उसकी प्रतिद्वन्द्विता नई कविता से थी। विडम्बना यह है कि वह अपनी काव्य-चेतना का विकास तो कर ही नहीं पाया, उससे जुड़े आलोचक और कवि भी गीतेतर कविता के विकासक्रम से भी अपरिचित रह गए हैं। उन्हें यह भी ज्ञात नहीं है कि आज की छंद-मुक्त कविता को कोई 'नई कविता` नहीं कहता। नई-कविता की मृत्यु तो सन १९६४ के आसपास ही हो गई थी। तदनन्तर प्रगतिशीलता, आपातकालीन रूपवादिता, जनवादिता और उत्तर आधुनिकता के सोपानों का आरोहण गीतेतर कविता ने किया है और इन प्रवृत्तियों के साहचर्य की उपेक्षा करने की अपेक्षा सन १९५० के बाद गीत भी नवगीत में ढल कर उत्तरोत्तर कई नए सोपानों का आरोहण कर चुका है। कभी लोक-चेतना नवगीत के केन्द्र में रही होगी, आज वह उसका मूल धर्म नहीं है। महानगरीय बोध एक ज़माने में नवगीत की पहचान था, आज वही उसकी सीमा नहीं है। उपर्युक्त विश्लेषण का अभिप्राय यही है कि नवगीत ने सदैव स्वयं को रूढ़िग्रस्तता और जडता के विरोध में खड़ा किया है।
हम मानते हैं कि नवगीत का पूर्ववर्ती रूढ़ गीत से मूलभूत अंतर है। सन १९५० और १९६० के बीच जो गीत-साहित्य नवगीत के रूप में पहचाना जाने लगा था और क्रमश: सातवें, आठवें और नवें दशक में जिसने उत्तरोत्तर विकास किया, वह प्रवृत्यात्मकता में उस गीत-धारा से अलग है, जिसकी दृष्टि आत्मकेन्द्रित थी जो सामाजिक यथार्थ से कटा था, जिसने एक अवास्तव शाश्वतता के मोह में जीवन-संघर्ष से पलायन किया था, जिसमें चाँदनी में अभिसार के स्वप्न ही बुने गए हैं, समग्रत: जिसका भारतीय साहित्य की उस मूल जीवन-दृष्टि से, वस्तुपरकता से सामंजस्य नहीं है, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में, जिसके अभाव में कविता विभावहीन रह जाती है। ऐसे गीत की रचना चाहे सन् १९५० में हुई हो या १९९८ में, वह नवगीत नहीं है और यदि कोई नवगीत को गीत ही नाम देना आवश्यक समझे तो कहना होगा कि वह आज का गीत नहीं है अर्थात अप्रासंगिक है। इतिहास की गतिशीलता का कोई अर्थ तो मानना होगा कि तब के गीत की प्रवृत्ति, अब के गीत से अलग है।
तब के गीत और अब के गीत के बीच प्रवृत्यात्मक पार्थक्य को रेखांकित करने के लिए ही नवगीत संज्ञा की आवश्यकता है। हमारे पास दो ही विकल्प है। या तो हम नवगीत शब्द और उससे प्रतिध्वनित होने वाली अर्थ-छवियों को स्वीकार करके चलें अथवा समकालीन कविता की गीतधारा को गीत मात्र से सम्बोधित करते हुए यह याद रखें कि एक प्रवृत्यात्मक विकास के अंतर्गत गीत अपने वर्तमान का प्रतिनिधि है, वह किन्हीं रिडंडैंट प्रवृत्तियों के भार को नहीं ढो रहा। यहाँ यह स्पष्ट कर देना भी अपेक्षित है कि कोई भी रचना किसी विशेष लेबल से अपना स्वरूप निर्धारित नहीं करती। नवगीत लेबल लगा देने से कोई रचना श्रेष्ठता का प्रमाणपत्र प्राप्त नहीं कर लेती। हम मात्र प्रवृत्यात्मक पार्थक्य की बात कर रहे हैं।
दूसरे रूढ़ गीत और नवगीत के बीच अन्तर गणितीय नहीं है अर्थात जिस प्रकार हम कवित्त, सवैये, दोहे के संबंध में पिंगल शास्त्रीय निर्णय दे सकते हैं कि वे किस प्रकार एक दूसरे से पृथक् हैं, उस प्रकार का अंतर रूढ़ गीत और नवगीत के बीच स्थापित नहीं किया जा सकता। यह अंतर कहीं कहीं डिग्री का है, और कहीं-कहीं विषय के ट्रीटमेंट का। बहुत संभव है कि पुरानी भौली के किसी-किसी गीत में नवगीतात्मक बोध हो अथवा रूढ़ लेखन करने वाले किसी गीतकार की रचनाओं में नवगीत की भी झलक हो। परन्तु, इससे रूढ़ गीत और नवगीत का अन्तर समाप्त नहीं हो जाता।
तीसरा प्रश्न नवगीत पर लगाए जा रहे इस आरोप से सम्बन्ध रखता है कि उसका व्यक्तित्व शत्रु-धर्मी होता जा रहा है, वह गीत-हंता है, गीत-विद्वेशी है, गीतकारों का वह विरोध करता है। इससे अधिक निराधार आरोप तो कुछ हो ही नहीं सकता। इतिहास प्रमाण दे सकता है कि गीत से नवगीत तक की यात्रा गीत के परिश्कार की यात्रा है। क्या आत्म-परिष्कार और आत्म-विद्वेश समानार्थी है? प्रत्येक प्रगतिशील साहित्यकार का यह उत्तरदायित्व होता है कि वह काल में अप्रासंगिक होते जाते खर-पतवार को किनारे लगाता रहे और नित्य नवीनता के मार्गों का अन्वेशण करें।
इस प्रवहमानता में युगबोध की सजगता कभी व्यक्ति- विरोधी कैसे हो सकती है? यदि गीत का आलोचक अप्रासंगिक होती जाती प्रवृत्तियों की और उन प्रवृत्तियों से जुड़े रचनाकारों की चर्चा आज नहीं करना चाहता तो सोचना होगा कि वह किसी व्यक्ति-विशेष के प्रति शत्रुता या विद्वेश का आचरण कहा जाएगा या आलोचना का धर्म? हम पहले कह चुके हैं कि नवगीत भर कहला लेना साहित्यिक श्रेष्ठता का आधार नहीं है पर आज रचनाकार से पाठक की क्या माँग है, इसे तो अनदेखा नहीं किया जा सकता। समाज में साहित्य की भूमिका का निर्वाह एक काव्य-रूप में अन्य काव्यरूपों से भिन्न नहीं होता। आज हम जीवन के संघर्ष से पलायन नहीं कर सकते। नवगीत पर एक आरोप यह भी लगाया जाता है कि उसमें वही प्रवृत्तियाँ हैं जो गीतेतर काव्य-रूपों (उनके शब्दों में नई कविता) में है, अर्थात वे नवगीत को नई कविता का छंदानुवाद मानते हैं।
इस संदर्भ में दो बातें ध्यातव्य हैं। एक तो यह कि गीतेतर काव्यरूपों में रागात्मकता का वह स्तर नहीं है जो नवगीत में है। संवेदनशीलता के अपेक्षाकृत प्रभावी समावेश के अतिरिक्त अनेक ऐसे विशय-क्षेत्र भी हैं जिनकी असामाजिकता से नवगीत का कोई संबंध नहीं है। दूसरे यदि युगबोध की सजगता के कारण नवगीत का अन्य काव्यरूपों के साथ अनेक स्थलों पर प्रवृत्तिपरक साम्य भी है तो इसमें अनौचित्य क्या है? गीत को जिस प्रकार केवल फूल-पत्तियों के चित्रण तक सीमित नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार उसे किसी का आत्मालाप भी नहीं माना जा सकता न, ही गीत अतीत रोना रोते रहना है। गीत की सही दिशा क्या हो, इसका सबसे उच्च एवं सर्वाधिक दीप्त प्रकाश स्तंभ इस भाताब्दी के सबसे बड़े कवि निराला हैं। जरा सन १९५० के काव्य परिदृश्य को निहारिये, हमारे महान गीतकारों की आत्ममुग्धता की मसृण छलना के उद्गारों को देखिए और तुलना कीजिए निराला के उसी काल के इन गीतांशों से:-
(क)बान कूटता है
मुगरी लेकर सुख का
राज लूटता है
मूँज के फाले छाले
अच्छे बाँधों वाले
ऐसे बैठे ठाले
काज कूटता है।
(ख)
खेत जोत कर घर आए हैं
बैलों के कंधों पर माची
माची पर उल्टा हल रखा
बद्धी हाथ अधेड़ पिता जी
माता जी सिर गट्ठाल पक्का
पिता गए गौवों के गौंडे
माता घर लड़के धाये हैं।
क्या ये गीतांश उस काल में भावी गीत की दिशा का संकेत नहीं कर रहे हैं, यदि नवगीत ने इस दिशा में अपनी यात्रा को आगे बढ़ाते हुए माटी और पसीने से गीत का संबंध नहीं टूटने दिया है तो क्या इसीलिए वह तिरस्करणीय है। यदि ऐसा है, तो यह तिरस्कार पुरस्कार की भांति ग्रहणीय है।
चौथा प्रश्न समग्र गीत के मूल्यांकन का है। समग्रता तो सदैव प्रशंसनीय होती है और रचना के मूल्यांकन का आधार तो उसकी श्रेष्ठता मात्र है। जोश सभी सीमाएँ व्यर्थ हो जाती हैं अतएव हम गीत के समग्र मूल्यांकन का विरोध नहीं करते पर यहाँ भी कुछ आशंकाओं को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। वास्तव में जो लोग नवगीत शब्द के प्रयोग का विरोध करते हैं, उनकी मंशा मूलत: यही रहती है कि चाहे हम लिखें तो बासी और घिसापिटा पर हमारी चर्चा आज के प्रतिनिधि रचनाकारों में हो। यदि समग्र मूल्यांकन का अर्थ कालक्रमानुसार गीत का इतिहास प्रस्तुत करना और इस इतिहासक्रम में सभी रचनाकारों के प्रदेय का सापेक्ष मूल्यांकन करना है तो हमारा इससे कोई विरोध नहीं है, बल्कि इसे हम आलोचकीय उत्तरदायित्व मानते हैं किन्तु समग्र मूल्यांकन के नाम पर इतिहासबोध की हत्या और प्रत्यग्र विकास की अपेक्षा के नाम पर आत्म-केन्द्रित व्यतीतधर्मी गीत के लिए प्रमाणपत्र बाँटना अभिप्रेत है तो इससे गीत का नुकसान ही होगा। हमारा मत है कि इन सभी स्थितियों में विधा, साहित्य, और समाज ही महत्वपूर्ण होने चाहिए, वैयक्तिक रागद्वेश अथवा कुंठा को इसका निर्णायक आधार न बनने देना चाहिए।
समग्रता के संबंध में हम एक और तथ्य को रेखांकित करना चाहेंगे। गीत कहाँ तक युगानुरूप दायित्व का निर्वाह कर रहा है? उसके अवदान की श्रेष्ठता का स्तर क्या है? उसकी स्वीकृति का साहित्य की बस्ती में उसके अधिकृत नागरिक होने का आधार कितना दृढ है? यह जानने के लिए उसे समस्त कविता के साथ रख कर विचार करना होगा गीत का आग्रह यही होना चाहिए कि समकालीन कविता में उसकी धनात्मक भूमिका को स्वीकार किया जाए न कि चुनाव आयोग के द्वारा एक और नए दल को मान्यता देने की भांति उसकी एक दलगत अस्मिता खोजी जाए अतएव हम केवल गीत और नवगीत के समग्र मूल्यांकन के पक्षधर नहीं हैं, अपितु हमारा मत है कि गीत और गीतेतर कविता का भी समग्र मूल्यांकन होना चाहिए, जबकि कहा यह जा रहा है कि गीत के, अपने आंदोलन होने चाहिए, समकालीन कविता में घुसपैठ की प्रवृत्ति से गीत अपना अहित कर चुका है। यदि हम गीत के कद के प्रति आश्वस्त हैं तो अन्य काव्यरूपों के साथ उसके मूल्यांकन में हिचकिचाहट क्यों? गीत का तो दावा यही है कि वह किसी अन्य काव्यरूप से हीनतर नहीं है।
अंत में एक बात और! स्तर एवं संरचना को लेकर नवगीत पर लगाए गए कुछ आरोपों से उसे बरी करने की वकालत हम नहीं कर रहे हैं। उसमें जो अति बौद्धिकता के समावेश की बात कहीं जाती है, वह सही है। विकट शब्द-जाल या शब्दों की बाजीगरी भी अनेकत्र दिखलाई देती है। कहीं-कहीं वह दुरूह और बोझिल भी हुआ है। इन आरोपों में सत्यांश है पर यहाँ इस तथ्य को नहीं भूलना होगा कि किसी भी रचनाधारा में सभी रचनाएँ श्रेष्ठ नहीं होती। नवगीत नामधारी बहुत-सी तुकबंदियाँ शब्दजाल के अतिरिक्त कुछ नहीं है। अनेक ऐसी रचनाएँ नवगीत के नाम पर आ रही हैं जिनमें लय और छंद का निर्वाह भी नहीं है। हम कह चुके हैं कि नवगीत एक विशेष टिप्पणी के साथ गीत है और गीत में छंदोभंग स्वीकार्य नहीं है, इसलिए अधकचरी साधना तो गीत या नवगीत कुछ भी नहीं है पर क्या हमें इन असफल रचनाओं को नवगीत मूल्यांकन का आधार बना चाहिए। नवगीत के अन्तर्गत आने वाली सफल रचनाओं का अभाव नहीं है। वे सफल रचनाएँ न केवल गीत के अद्यतन विकास की परिचायक है अपितु आलोचक के सामने चुनौती भी है। उन्हें उपेक्षित कर समकालीन कविता का इतिहास नहीं लिखा जा सकता। १८ मई २००९ *** नवगीत में लोकतत्व की उपस्थित जगदीश व्योम कविता मनुष्य को और बेहतर मनुष्य बनाने के उद्देष्य से लिखी जाती है। जो कविता लोक के जितने निकट होगी, वह उतनी ही लोकप्रिय एवं दीर्घजीवी होगी। क्योंकि प्रत्येक मनुष्य लोक से किसी न किसी प्रकार से जुड़ा हुआ है। लोकजीवन से विलग होकर कोई व्यक्ति बहुत दिनों तक जीवित नहीं रह सकता। उसे किसी न किसी रूप में लोक पर निर्भर रहना ही पड़ता है। लोक से ही निकल कर हम आधुनिक और अत्याधुनिक बनते हैं। कभी-कभी हमें लगता है कि आधुनिकता के शिखर पर खड़े हाने के बाद लोक से हमारा भला क्या रिष्ता है ? परन्तु यह उसी प्रकार है जैसे किसी पेड़ की कोई डाली या पत्ती पेड़ के शिखर पर पहुँचते ही अपने को पेड़ की जड़ से अलग समझने का भ्रम पाल ले। ठीक इसी प्रकार से साहित्य का सम्बंध लोक और लोक जीवन से है। वासुदेव शरण अग्रवाल के शब्दों में-
‘‘वही साहित्य लोक में चिरजीवन पा सकता है, जिसकी जड़ें दूर तक पृथ्वी में गईं हों। जो साहित्य लोक की भूमि के साथ नहीं जुड़ा, वह मुरझा कर सूख जाता है।’’
समय के अनुसार कविता की विभिन्न विधाओं में परिवर्तन होता रहता है। क्योंकि एक ही तरह की कविता को सुनते-सुनते पाठक ऊबने लगता है और वह कुछ अलग हटकर पढ़ना व सुनना चाहता है। परिणामस्वरूप समय-समय पर कविता की विधाओं में परिवर्तन होता रहता है। गीत के बाद नवगीत इसी परिवर्तन का ही परिणाम कहा जा सकता है।
भाषा बहते हुए नीर की भाँति होती है इसलिए उसमें नए शब्दों, नई भाव-भंगिमाओं, नए मुहावरों का आगमन होता रहता है। नवगीतों में अपनी अनुभूति को कुछ नए ढँग से प्रस्तुत करना ही उसकी पहचान बनी। नवगीत में आम आदमी की पीड़ा, उसकी विवशताएँ, शोषण आदि को नवगीतकारों ने सीधे-सीधे प्रस्तुत किया, यही कारण है कि नवगीत आम आदमी से सीधे जुड़ रहा है, उसके दुख-दर्द को वाणी दे रहा है। नवगीत में यदि आम आदमी की भाषा व मुहावरों के विशेष शब्दनहीं होंगे तो भला वह आम आदमी को व्यक्त कैसे कर सकेगा।
लोक समाज की एक और विशेषता है कि वह जो कुछ माँगता है लोक से ही माँगता है, किसी और के सामने हाथ फैलाने वह कभी नहीं जाता है। उसकी आवश्यकताएँ सीमित हैं और उसका मन बहुत बड़ा है, वह स्वयं अभावों में जीता है परन्तु किसी से अपेक्षा नहीं रखता। वह भाषा का डिक्टेटर होता है। शब्दों को स्वयं निर्मित करता है, स्वयं लोकोक्तियाँ गढ़ता है, अपने मुहावरे स्वयं बनाता है और समय-समय पर अपने लिए काव्यों और महाकाव्यों को भी रचता है। परन्तु पढ़े-लिखे (मुनिजन) लोग उसके मौलिक सृजन को कुछ हेर-फेर करके अपना सृजन कहने लगते हैं।
लोक साहित्य के पुरोधा डा. सत्येन्द्र के शब्दों में- ‘‘जन मानस और मुनिमानस का संघर्ष आज का नहीं है। मुनि ने सदा यह दावा किया है कि उनकी रचना में शाष्वत प्रकट होता है, और उसने जहाँ तक हो सका है जन और उसकी कृति की अवहेलना की है, उसे हेय बताया है। ..... शताब्दियों पूर्व वेदों की रचना हुई। उन्हें जिस वर्ग ने निर्माण किया, उसी वर्ग के अन्य व्यक्तियों उसे अलौकिक और अपौरुषेय बताया। ऐसा उनका अपना आतंक और प्रभाव जमाने के लिए किया जाता रहा। यह आधुनिक काल तक न रह सका। लौकिक काव्य की उद्भावना हुई और आदि कवि बाल्मीकि ने रामायण रच डाली, वह उनकी रचना मुनि-मानस का प्रतिफलन न था, नहीं तो उसे लौकिक न कहा जाता। किन्तु मुनि-मानस एक और धाँधली करता रहा है। जन-मन की सृष्टियों को वह अपनी बनाता रहा है। बाल्मीकि और उनके वर्ग की रचनाएँ मुनि-मानस की वस्तुएँ हो गईं। जन का जो सुन्दर था उसे अपने लिया गया। वह परिमार्जन और संस्कार करना जानता है। लोक मानस से सामग्री लेकर उन पर केवल कलई मुनि-मानस कर देता है। मुनि को विद्वान कहा जा सकता है, तत्तवदर्षी कहा जा सकता है, किन्तु उसके पास जो कला है वह अपनी नहीं। कला के लिए उर्वर भूमि की आवश्यकता होती है। स्वतंत्रता और मुक्ति ही उर्वरता है।’’ - (डा. सत्येन्द्र, लोक साहित्य विज्ञान, पृ.-३६७-३६८, द्वितीय संस्करण-१९७१)
लोक मानव के पास यही उर्वर भूमि है, यही कारण है कि जीवन की हर स्थिति को अभिव्यक्त करने के लिए उसके पास सामग्री है। लोक मानव ने शोषण को स्वयं झेला है इसलिए शोषित की पीड़ा जिस ढँग से वह व्यक्त कर सकता है वैसी कोई और नहीं। जब किसी ऐसे प्रसंग के लिए लिखे जा रहे नवगीत में लोकगीत या लोकभाषा की उपस्थिति होती है तो उस गीत या नवगीत की संप्रेषणीयता और बढ़ जाती है, क्योंकि उन संदर्भों का विश्लेषण श्रोता के अन्तस में बैठे हुए लोकगीत या लोकगाथा या किसी लोक संदर्भ के सहारे पल भर में सहज हो जाता है और वह उसका भरपूर आनन्द लेने में सक्षम हो जाता है।
वीरेन्द्र आस्तिक जी के नवगीत की पंक्ति-
‘‘हिरना इस जंगल में / कब पूरी उमर जिए.........।’’
सुनते ही अवधी का वह प्रसिद्ध लोकगीत जो सदियों से लोकजीवन में व्याप्त है और सामन्तवादी व्यवस्था में आम आदमी पर होने वाले शोषण का जीवन्त दस्तावेज है, अनायास याद आ जाता है और सामन्तवादी सोच को पल भर में श्रोता के समक्ष चित्र की भाँति खोलकर देता है।
परिणामस्वरूप श्रोता या पाठक ऐसे किसी भी नवगीत का भरपूर आनन्द ले सकता है। नवगीत जब किसी लोकगीत के साथ भाषा या भाव के स्तर पर तादात्म्य बना लेता है तो उसका फलक बहुत और बहुत विस्तृत हो जाता है। अवधी भाषा का यह सुप्रसिद्ध लोकगीत तमाम नवगीतों की रेशमी गाँठों को सुलझाने में आम श्रोता या पाठक की बहुत मदद करने में सक्षम है-
(छापक पेड़ छिउलिआ अर्थात ढाक का ऐसा पेड़ जो उँचाई में कम हो और फैला हुआ हो, खूब पत्ते हों, के नीचे हिरनी खड़ी हुई है और उसका मन अनमना सा हो रहा है।)
छापक पेड़ छिउलिया त पतवन गहवर हो।
रामा तिहि तर ठाड़ि हरिनियाँ, त मन अति अनमन हो।
(हिरनी को अपने पुराने दिनों की याद आ जाती है, जब उसके साथ उसका हिरन था। एक दिन अचानक हिरनी को उदास देखकर वह पूछ बैठा कि वह क्यों उदास है ? क्या उसका चारागाह सूख गया है अथवा प्यास के कारण उसका मुख मुरझाया हुआ है?)
चरत हि चरत हरिनवा, त हिरनी से पूछई हो
हिरनी! की तोर चरहा झुरान कि पानी बिनु मुरझइ हो।
(हिरनी अपनी उदासी का कारण बताते हुए हिरन से कहती है कि न तो मेरा चारागाह सूख गया है और न ही मुझे प्यास लगी है बल्कि मेरे उदास होने का कारण ये है कि राजा जी के यहाँ उनके बेटे की कल छठी है और राजा जी कल तुम्हें मरवा डालेंगे) -
नाहीं मोर चरहा झुरान, न पानी बिनु मुरझइ हो
हरिना ! काल्हि है राजा जी के छट्ठी तुहें मारि डरिहइँ हो।
(कालांतर में वही होता है जो हिरनी सोच रही थी, उसका पति हिरन राजा के शिकारियों द्वारा मार डाला जाता है। हिरनी अपने हिरन को तो नहीं बचा सकी परन्तु वह हिरन की स्मृति को सुरक्षित रखने के उद्देष्य से मृत हिरन की खाल को माँगने के लिए रानी के पास पहुँचती है और रानी से प्रार्थना करती है कि हे रानी ! आप मेरे प्रिय हिरन का माँस रसोई में पका लीजिए परन्तु उसकी खाल यदि आप मुझे दे देतीं तो मैं अपने हिरन की खाल को पेड़ पर टाँग लेती और अपने मन को समझाती रहती, मैं घूम फिर कर अपने प्रिय हिरन की खाल को ही देख-देख कर अपने मन को समझा लिया करूँगी कि मेरा हिरन जिन्दा है और वह मेरे साथ ही है) -
मचियहि बैठी कोसिला रानी हिरनी अरज करै हो
रानी, मंसुवा त सिझहीं रसोइया खलरिया हमें देतिउ हो।
पेड़वा ते टंगवइ खलरिया त मन समुझाउब हो
रानी, हेरि-फेरि देखितउं खलरिया जनकु हरिना जियतइ हो।
(हिरनी की इस करुण कातर प्रार्थना पर रानी को थोड़ी भी दया नहीं आती है और वह हिरनी को दुत्कारते हुए कहती है कि- हे हिरनी तुम यहाँ से भाग जाओ, मैं तुम्हें हिरन की खाल नहीं दूँगी, इस खाल से मैं खँजड़ी मढ़वाउँगी जिससे मेरे प्रिय राम खेला करेंगे) -
जाहु-जाहु हिरनी घर आपन, खलरिया नांहिं देतिउँ हो
हिरनी ! खलरी के खँजड़ी मिढ़उबइं त राम मोर खेलिहइं हो।
(हिरन की खाल से खंजड़ी मढ़वा ली जाती है और बालक राम उसे बजा-बजा कर खेलते हैं। हिरनी खंजड़ी के बजने की आवाज सुनती है तो उसे अपने प्रिय हिरन की याद आ जाती है। जब-जब खंजड़ी बजती है तब-तब खंजड़ी का शब्द सुनकर हिरनी करुणा से भरकर अहँकती है, और उसी ढाक के पेड़ के नीचे खड़े होकर अपने प्रिय हिरन को याद करती है)
जब-जब बाजइ खंजड़िया, सबद सुनि अहँकइ हो
हिरनी ठाड़ि ढकुलिया के नीचे हरिन के बिसूरइ हो।
इस सोहर लोकगीत में करुणा फूटकर बह निकली है। सामंत कालीन ऐसी व्यवस्था जिसमें आदमी की कोई कीमत नहीं। वह राजा के परिवार के लिए खाद्य सामग्री भी होता तो भी ठीक था, वह तो उसके बच्चे के मनोरंजन भर का साधन मात्र है। हिरन सामान्य जनता का प्रतीक है। आज भी एक मजदूर या गरीब आम आदमी अपने सामान्य अधिकारों से प्रायः वंचित रह जाता है। उसके द्वारा किये गए श्रमफल से पूँजीवादी आज भी खेल रहा है। यही सब तो आखिर एक नवगीत के सृजन का कारण बनता है। लोकजीवन की इन विसंगितियों और विद्रूपताओं को गहराई से समझे बिना कविता नहीं लिखी जा सकती।
लोक को बिना समझे नवगीत लिखना सरासर बेमानी है। इसका आशय ये कदापि नहीं है कि नवगीत, लोकगीत की तरह से लिखा जाए, परन्तु यह आवश्यक है कि नवगीत में लोकतत्तव की उपस्थिति हो। नवगीतों में जब लोकतत्तवों का अभाव होता है तो उनकी उम्र बहुत कम हो जाती है। जो नवगीत श्रोता या पाठक के मन पर सीधे प्रभाव डालते हैं, वही कालजयी नवगीत बन पाते हैं। उन्हीं की चर्चा लम्बे समय तक होती है। लम्बे समय तक जीवित रहने वाले नवगीतों के लिए रचनाकार का नाम बहुत महत्तव नहीं रखता, महत्तव रखता है तो उसकी भाषा की सहजता, लोक से जुड़ाव, उसकी संप्रेषणीयता और उसकी प्रस्तुति। *** नवगीत का शृंगार बोध -कुमार रवींद्र शृंगार मनुष्य की आदिम संज्ञा है : उसके प्रवृत्तिमूलक संज्ञान का सबसे आकर्षक एवं सम्मोहक स्वरूप है। मनुष्य की रागात्मक वृत्ति की सर्वोत्कृष्ट परिणति शृंगार में ही होती है। आज के आपाधापी भरे समय में दैहिक-पदार्थिक आग्रह के तहत हमारी स्वस्थ शृंगार वृत्ति का क्षरण हो गया है और उसके गर्हित पक्ष यानी मात्र वासनात्मक पक्ष की ओर ही हमारा ध्यान रह गया है। स्वस्थ सात्त्विक शृंगार का भाव, जो अपने उत्कृष्ट स्वरूप में भक्ति एवं श्रद्धा में परिणत हो जाता है, आज के संज्ञान से तिरोहित हो गया है। दैहिक आकर्षण, जो अंततः भाव-समाधि और आध्यात्मिक अनुभूति में परिवर्तित हो जाता है, आज मात्र एक उत्तेजक मशीनी काम-क्रीड़ा बन कर रह गया है। कविता किंवा संपूर्ण साहित्य से इस रसराज की रसानुभूति के तिरोहित हो जाने का संकट उपस्थित हो गया है। यह आज के समय की संभवतः सबसे बड़ी त्रासदी है। बीसवीं सदी के प्रसिद्ध अंग्रेजी कवि टी. एस. एलियट ने अपनी सर्वश्रेष्ठ काव्यकृति 'वेस्टलैंड' में हमारी आज की सभ्यता की इस त्रासदी का बड़ा ही सटीक अंकन किया है। मनुष्य आज एक बंजरभूमि में भटकन की स्थिति में है और इसका मुख्य कारक उसके जीवन से सहज शृंगार के आस्तिक भाव का तिरोभूत हो जाना है।
अक्सर यह आरोप सही मान लिया जाता है कि नवगीत में शृंगार का अंकन विरल है और नवगीत एक विशुद्ध बौद्धिकतापरक काव्य-विधा है। अस्तु, उसमें रागात्मक संवाद की गुंजाइश कम ही रह गई है। वस्तुतः पारंपरिक शृंगार की जो रीतिकाल से प्राप्त सर्वमान्य संज्ञाएँ या भंगिमाएँ रही हैं और जिनकी पुनरावृत्ति छायावादोत्तर स्वच्छंद कविता में देखने को मिली, वे अधिकांशतः नारी के दैहिक आकर्षण एवं उसके भोग्या स्वरूप पर ही केन्द्रित रहीं। बच्चन के 'निशा निमंत्रण' के गीतों में इससे प्रस्थान की चेष्टाएँ दिखाईं तो दीं, पर वे भी 'साथी', 'सखी' आदि संबोधनों के बावज़ूद नर-नारी की आम जीवन-व्यापारों में सहज सहभागिता को सही परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत नहीं कर पाईं। नारी को जो एक भोग्यसामग्री मानने की पारंपरिक दृष्टि रही थी, जिसमें नारी-देह को मात्र एक जिन्स के रूप में देखा गया था , उसका नये जीवन-सन्दर्भों के अनुरूप संस्कार नहीं हो पाया। हालाँकि छायावाद के अंतर्गत नारी-मन की उदात्त व्याख्या कहीं-कहीं की गयी थी, पर नारी के पुरुष-समांतर सहभागी रोप का चित्रण अधिकांशतः प्राचीन भारत या पौराणिक पात्र-छवियों तक ही सीमित रहा। और नवगीत पूर्व तक पहुँचते-पहुँचते वह संज्ञान भी धूमिल पड़ गया। 'नई कविता' से तो नारी लगभग अनुपस्थित ही हो गयी। उसके समानांतर उपजे 'नवगीत' के प्रारंभिक दौर में नारी-मन की आकृतियाँ वैसे तो कम ही रहीं, पर जहाँ-जहाँ भी वे अंकित हुईं, उनमें एक नई दृष्टि का आभास हुआ। कालान्तर में नवगीत ने जो विशद भाव-भंगिमाएँ अपनाईं, उनमें शृंगार की भी नई उद्भावनाएँ हुईं। प्रसाद के महाकाव्य 'कामायनी' की श्रद्धा जैसी किन्तु उससे नितांत अलग जीवन-संघर्ष में बराबर की हिस्सेदार एक सहचरी नारी की परिकल्पना नवगीत में हुई। नवगीत ने नर-नारी संबंध को मात्र दैहिक अथवा आध्यात्मिक धरातल से हटाकर एक नैतिक-रागात्मक आधार दिया। नवगीत की इस आधुनिक एवं नितांत अभिनव दृष्टि का परिचायक बना वह सहज कामभाव, जो मनुष्य के रागात्मक संज्ञान से ही उपजता है और उसी से हमें जोड़ता है। पारस्परिक वासनारहित लीलाभाव, जो संपूर्ण श्रृष्टि में परिव्याप्त आकर्षण की मूल संचेतना है, नवगीत की शृंगार दृष्टि का पर्याय बनी। कहन के धरातल पर नवगीत ने नये-नये बिम्बों की उद्भावना कथ्य के सभी प्रसंगों में की है। एकदम ताज़े-टटके बिम्बों के प्रयोग ने नवगीत के शृंगार-बोध को नई भंगिमाएँ ही नहीं दीं, अपितु उसकी अभिव्यक्ति की अभिनव संभावनाओं के द्वार भी खोले।
निराला के परवर्ती गीतों में कविता के छंद-प्रसंग को कहन के नये आयाम तो दिये ही, उनके माध्यम से शृंगार की अभिव्यक्ति के नये धरातल भी प्रस्तुत हुए। उन्हीं की भावभूमि से उपजा नवगीत का सहज स्वस्थ शृंगार-बोध। नवगीत ने निराला की इन बहु-उद्धृत शृंगारपरक गीत-पंक्तियों को नई भाव-अनुभूतियों एवं नये सन्दर्भों से जोड़कर शृंगार की नई-नई उद्भावनाएँ प्राप्त कीं -
बाँधो न नाव इस ठाँव, बन्धु ! / पूछेगा सारा गाँव, बन्धु !
यह घाट वही जिस पर हँसकर / वह कभी नहाती थी धँसकर
आँखें रह जातीं थीं फँसकर / कँपते थे दोनों पाँव, बन्धु !
वह हँसी बहुत कुछ कहती थी / फिर भी अपने में रहती थी
सबकी सुनती थी, सहती थी / देती थी सबको दाँव, बन्धु !
उसी कालखंड में माखनलाल चतुर्वेदी के गीतों में भी नई कहन के संकेत आ रहे थे, जिनमें शृंगार की भी छवियाँ कहीं-कहीं उमग जातीं थीं। बच्चन और नरेंद्र शर्मा की श्रृंगारिक कहन में भी नई भंगिमाएँ यदा-कदा देखने को मिल जाती हैं। नई कविता के प्रवर्तक अज्ञेय की 'काँगड़े की छोरी', 'तुम्हारी पलकों का कँपना', शमशेर बहादुर सिंह की 'निंदिया सतावे मोहे संझही से सजनी' , केदारनाथ अग्रवाल की 'माँझी न बजाओ वंशी' और 'धीरे उठाओ मेरी पालकी', शंभुनाथ सिंह की 'टेर रही प्रिया तुम कहाँ', गिरिजा कुमार माथुर की 'पिया आया बसंत फूल रस के भरे', नागार्जुन की 'झुकी पीठ को मिला / किसी हथेली का स्पर्श / तन गयी रीढ़', भवानी प्रसाद मिश्र की 'बूँद टपकी एक नभ से', धर्मवीर भर्ती की 'तुम्हारे पाँव मेरी गोद में' जैसी गीत-प्रस्तुतियाँ उसी भावभूमि से उपजीं थीं, जिनसे बाद में नवगीत की श्रृंगारिक कहन का विकास हुआ यानी प्रयोगधर्मी बिम्बात्मक अभिव्यंजना दृष्टि। किन्तु नवगीत ने कहन की जो दिशा ली और कथ्य के धरातल पर भी जो फ़िलवक्त से जुड़ी बिम्बात्मक दृष्टि अपनायी, उसने इन पूर्ववर्ती श्रृंगारिक भाव-भंगिमाओं को बहुत पीछे छोड़ दिया।
ईस्वी सन १९५९ में ठाकुर प्रसाद सिंह के संताली अनुभूतियों के गीतों के संग्रह 'वंशी और मादल' के आगमन से पहले चरण के प्रकृतिपरक भंगिमा वाले नवगीत को जो जनजातीय संस्कार मिला, उसने सहज रसानुभूति की कविता के लिए नई ज़मीन तैयार की। उन गीतों में वनजातियों का सहज-सरल शृंगार भाव कहीं प्रच्छन्न तो कहीं प्रत्यक्ष रूप में बार-बार अभिव्यक्त हुआ। देखें उस ऐतिहासिक संग्रह के कुछ शृंगारपरक गीतांश --
पर्वत पर आग जला वासन्ती रात में
नाच रहे हम-तुम हाथ दिए हाथ में
... ... ...
आओ रे लाज भरे / खेलो सब खेलो
ओठों पर वंशी हो , हवा हँसे झर-झर
पास भरा पानी हो, हाथों में मादर
फिर बोलो क्या रक्खा / दुनिया की बात में / हाथ दिए हाथ में
साखू की डाल पर उदासे मन / उन्मन का क्या होगा
पात-पात पर अंकित चुम्बन / चुम्बन का क्या होगा
मन -मन पर डाल दिए बंधन / बंधन का क्या होगा
पात झरे, गलियों-गलियों बिखरे
एक ओर सम्मोहक सहज रोमांस की की ये अनुभूति-आकृतियाँ और दूसरी ओर उद्दाम वासना की यह अभीप्सा -
जामुन की कोंपल-सी चिकनी ओ !
मुझे छिपा आँचल में / जाड़ा लगता है क्या भीतर आ जाऊँ
फूलों की मह-मह-सी रानी ओ / मुझे ढाँक बालों में
बादल घिरते हैं क्या भीतर आ जाऊँ
आदिम जनवासी जीवन में सहज एवं खुले श्रृंगारानुभूति की ये उत्तेजक छवियाँ 'वंशी और मादल' के माध्यम से जब नवगीत में अवतरित हुईं, तो अज्ञेय के शब्दों में हिंदी कविता में 'नये वातायन ' खुलते दीख पड़े। इन गीतों की लयात्मकता में जो सहजता हे और उनकी भाषिक संरचना में जो झर-झर झरते सोतों का प्रवाह है, उसने निश्चित ही नवगीत को एक नई ऊर्जा, एक नई अर्थवत्ता से भर दिया। ठाकुर भाई के इन गीतों की कहन आज भी अनुपमेय बनी हुई है। रामचन्द्र चन्द्रभूषण की ये गीत-पंक्तियाँ ऐसी ही सहज लयात्मकता को साधती हैं। हालाँकि इनकी भाषिक संरचना नागरी एवं क्लासिकी है, किन्तु इनमें भी शृंगार का भाव-जगत वही है -
शब्द ये चमेली के / किस पौरी पर धर दूँ
मिले नहीं समाचार / गीत की हवेली के
... ... ...
उड़े / पद्मपाखी के मौन उड़े / अर्थ जुडे
किसी चित्रवर्णा के
'फूलन-मड़वे' निहुरे / परस मिले / संदली हथेली के
इनमे शृंगार की अनुभूति अधिक गहराई से उपजी है और वह नैसर्गिक सम्मोहनों से जुड़कर उपस्थित हुई है। देवेन्द्र कुमार की कहन भी इससे बहुत अलग नहीं है। देखें उनके एक प्रसिद्ध गीत का अंश -
सोलह डैने वाली चिड़िया / रंगारंग फूलों की गुड़िया
कहीं बैठकर लिखती होगी / चिट्ठी मेरे नाम
देव उठाती, सगुन मनाती / रात जलाती घी की बाती
दोनों हाथ दूर से झुककर / करती चाँद-प्रणाम
सुनो ! सुनो ! खेतों की रानी
तालों में घुटने भर पानी
लंबी रात खड़ी कुहरे में / खिड़की पल्ले थाम
इसमें आये सांस्कृतिक संकेत हमें ग्राम्य-सभ्यता के परिवेश से जोड़ जाते हैं। यह नवगीत का वनों से, वन-संस्कृति से ग्राम्य परिवेश की ओर आगमन का संकेतक है।
सोम ठाकुर इस 'सोलह डैनों वाली चिड़िया' एवं 'फूलों वाली गुड़िया' की चिट्ठी का उत्तर यों देते हैं -
सुर्ख सुबह / चंपई दुपहरी / मोरपंखिया-शाम
रँग-रँग से लिख जाता मन, पत्र तम्हारे नाम
बाँहों के खालीपन पर यह /बढ़ता हुआ दबाव
चेहरे पर थकान के जाले / बुनता हुआ तनाव
बढने लगे देह से लिपटी यादों के आयाम
शृंगार जीवन के संघर्षों एवं उनसे उपजे तनाव और थकन से जुड़कर यहाँ एक सामाजिक मुद्रा अपनाने लगा है।
शिवबहादुर सिंह भदौरिया शृंगार को ऋतु-परिवर्तन से जोड़कर देखते हैं। उनके यहाँ शृंगार ऋतुराज की वह भंगिमा है, जिसमें
फूल-पत्तों के नये शृंगार थे / प्यार के पाँवों पड़े उपहार थे
खिलखिलाते खेत, हिलती डालियाँ / आम से हँसते हुए दिन आ गये
लग्न की ड्यौढ़ी, बजीं शहनाइयाँ / सजे मडवे के हिलीं परछाइयाँ
भाल के हर ओर फेरे गुनगुने हैं / पाग से - / कसते हुए दिन आ गये
... ... ...
भार से हलके हुए गृहकाज के / फिर अरुणवर्णी गुलालों के तले ... ...
ऋतु-प्रसंग से शृंगार का यह जुड़ाव नईम के गीतों में भी दिखाई देता है } मालवे की धरती से जुड़ी उनकी श्रृंगारानुभूति कई बिम्बाकृतियों को परसती चलती है -
नीले जल झीलों के / बतखों-सी तैर रही / पुरवैया क्वार की सपनों के मन्दिर गढ़ / खेतों मड़ैया चढ़ / रखवाली करती है / मकई औ' ज्वार की
आ जाती घर भीतर / कच्ची ताड़ी पीकर / लीपा-पोती करती / देहरी औ' द्वार की
नैहर के अल्हड़पन / पीहर शर्माए मन / रूठ-रूठ जाती है / बेला में हार की
वीरेंद्र मिश्र इन्हीं दिनों अपने गीतों में प्रणय और शृंगार की एक नई ऋतु रच रहे थे। वह ऋतु थी पारंपरिक और नई कहन के मेल की। अपनी क्लासिकी सांगीतिकता से वे गीत का नव-शृंगार कर रहे थे एक ओर तो दूसरी ओर अपनी एकान्तिक प्रणय-पीर को सामाजिकता के संस्कार भी दे रहे थे। देखें उनका एक गीत-अंश -
आज मुझसे कहा गीत ने / मन किसी रूप का जीतने / मौज से हार जा
... ... ...
सिर्फ तू ही नहीं है दुखी / पी रही पीर चन्दामुखी
आज मुझसे कहा प्राण ने / स्वप्न के भेद को जानने / अश्रु के द्वार जा
नरेश सक्सेना एक नई बिम्ब-भंगिमा तो लेकर आये, पर उनका शृंगार पारंपरिक गीत के दायरे में ही बना रहा। देखें -
रह-रह कर आज साँझ मन टूटे
काँचों पर गिरी हुई किरनों-सा बिछ्ला है
तनिक देर को छत पर हो आओ
चाँद तुम्हारे घर के पिछवारे से निकला है
शृंगार की ये वीरेंद्र मिश्र और नरेश सक्सेना वाली भंगिमाएँ स्वच्छन्दतावादी शृंगार से हटकर तो हैं, किन्तु वे नवगीत में सुगबुगाती एकदम ताज़ी-टटकी चेष्टाओं के बरअक्स उसकी श्रृगार-कहन को कोई नई दिशा नहीं दे पातीं। इस दृष्टि से उनका केवल ऐतिहासिक महत्त्व है।
और इसी बीच शृंगार की एकदम ताज़ी नई भंगिमा देखने में आई उमाकांत मालवीय के गीतों में। 'चन्द्रमा उगा' जैसे गीत में वे शृंगार को हमारी सांस्कृतिक आस्था में बड़े ही मनोरम रूप में खोजते हैं। देखें उस गीत का एक अंश -
चन्द्रमा उगा करवा चौथ का
तुमने भी अर्घ्य दिया होगा मेरे लिए
निर्जल उपवास किया होगा मेरे लिए
प्रियतम परदेस में न सो सका / भरी-भरी आँख ही सँजो सका
वहीँ 'फूल नहीं बदले गुलदस्तों के' जैसे गीत में वे शृंगार को अंतःपुर से निकालकर आम आदमी की दिनचर्या और फ़िलवक्त के सरोकारों एवं रोज़ की चिंताओं से जोड़ देते हैं -
टूटे आस्तीन का बटन / या कुर्ते की खुले सिवन
कदम-कदम पर मौके, तुम्हें याद करने के
फूल नहीं बदले गुलदस्तों के / धूल मेजपोश पर जमी हुई
जहाँ-तहाँ पड़ी दस किताबों पर / घनी सौ उदासियाँ थमी हुईं
पोर-पोर टूटता बदन / कुछ कहने-सुनने का मन ... ...
अरसे से बदला रूमाल नहीं / चाभी क्या जाने रख दी कहाँ
दर्पण पर सिन्दूरी रेख नहीं / चीज नहीं मिलती रख दो जहाँ
चौके की धुआँती घुटन / सुग्गे की सुमिरनी रटन ... ...
किसे पड़ी, मछली-सी तडप जाय / गाल शेव करने में छिल गया
तुमने जो कलम एक रोपी थी / उसमें पहला गुलाब खिल गया
पत्र की प्रतीक्षा के क्षण / शहद की शराब की चुभन
कदम-कदम पर मौके / तुम्हें याद करने के
यह पूरा गीत एक दस्तावेज़ है नवगीत की नई शृंगार-भंगिमा का। पुरानी दृश्यावलियों से एकदम अलग, एकदम अछूती यही वह कथ्य और कहन की यथार्थ-दृष्टि है, जिससे नवगीत नये युग के संपूर्ण भावबोध को एक नया आयाम दे रहा था। इसी प्रस्थान-बिंदु से आगे का नवगीत शृंगार को नाज़ुकखयाली और कोमलकान्त पदावली से बिलगाकर उसे जीवन के कटु एवं विषम यथार्थ से जोड़ पाया।
सात्त्विक प्रणय के प्रसंग नवगीत में जिस अनूठेपन से प्रस्तुत हुए हैं, वैसे पहले की गीतिकविता में कभी नहीं हो पाए थे। कुँअर बेचैन के दो प्रणय-गीतों के निम्न अंश उमाकांत मालवीय की कहन का ही जैसे विस्तार हैं -
तुम्हारे हाथ से टंककर / बने हीरे, बने मोती / बटन मेरी कमीज़ों के
... ... ...
बने झंकार वीणा की / तुम्हारी चूड़ियों के हाथ में / यह चाय की प्याली
थकावट की चिलकती धूप को / दो नैन हरियाली
तुम्हारी दृष्टियाँ छूकर / उभरने और ज्यादा लग गये / ये रंग चीजों के
* * *
हाँ, ज़रा सुनना / वो मेरी पैंट है न / वो फटी है जो अकेले पायचों पर
तुम ज़रा उसमें लगाकर चंद टाँके / इस तरह से जो नई हर कोई आँके
कल थमे वातावरण से मैं निकालूँगा प्रलय कुछ
ले चलूँगा फिर तुम्हें इस भीड़ से कुछ दूर
मुझको माफ़ करना / आज तो इस वक्त काफी देर ग्यारह पर सुई है
ऐसी ही दैनंदिन जीवन से जुड़ी प्रणय-शृंगार की छवि है कुमार रवीन्द्र के इस गीतांश में -
तुम नहीं हो / सिर्फ ये हैं - अलगनी पर सूखते कपड़े
रात-भर / पहने हुए / ये सुबह धोये गये
लग रहे हैं / रौशनी के पंख-से ये नये
कुछ मुलायम / रेशमी हैं - / कुछ बहुत अकड़े
मैं हवा के / द्वीप पर / बैठा हुआ हूँ
कभी सूरज हूँ / कभी कड़वा धुआं हूँ
दिन अकेला है / उसी से हो रहे झगड़े
शृंगार एक ऐसा सम्मोहक भाव-संवाद है दो व्यक्तियों के बीच में, जो उन्हें एकात्म कर जाता है। नवगीत में यह जुड़ाव एक सात्त्विक भाव-बोध बनकर उपस्थित हुआ है। माहेश्वर तिवारी के एक गीत की इन पंक्तियों में इस आस्तिक मनस्थिति को ज़रा देखें -
याद तुम्हारी जैसे कोई / कंचन कलश भरे
जैसे कोई किरन अकेली / पर्वत पार करे
लौट रही गायों के / सँग-सँग / याद तम्हारी आती
और धूल के / सँग-सँग / मेरे माथे को छू जाती
दर्पण में अपनी ही छाया-सी / रह-रह उभरे
जैसे कोई हंस अकेला / आंगन में उतरे
प्रिया के न होने पर प्रिया की याद का जो सम्मोहन है, उसे अन्य कई नवगीतकारों ने अपने-अपने अनूठे ढंग से अभिव्यक्ति दी है। देखें -
फिर सजाये मेज के गुलदान में कुछ फूल
फिर बटोरे देह की पगडंडियों के शूल
फिर लिखे हँसते हुए / गमगीन कुछ संवाद
फिर तुम्हारी याद आई आज ( अश्वघोष )
चादर मैली / कपड़े गंदे / कमरा कूड़ाघर
देखूँ जिधर / तुम्हीं-तुम / मुझको आने लगीं नज़र
गैस खत्म है / डिब्बे खाली / मुश्किल हुई चाय की प्याली
सूख रहे गमलों के पौधे / ढूंढ रहे हैं अपना माली ( मधुकर अष्ठाना )
यादों में एक-दो मूंगफलियाँ / रंगारंग अंतरंग बातें
यादों में तह करके रख लें हम / पार्कों में हुईं मुलाकातें
एक हँसी / फेंककर इधर-उधर / दूबों को सहलाना प्यार से
पल्लू को स्वतः खिसकने दिया / माथ झुका गन्धिल आभार से
कसी हुई पसीजतीं हथेलियाँ / उमड़-घुमड़ गुज़रीं बरसातें ( शांति सुमन )
तुमको घर से गये अभी / बीता पखवारा है
चादर नई खाट पर अब तक / नहीं बिछाई है
वैसी की वैसी आँगन में बिछी / चटाई है
कागज़ का हर टुकड़ा फिरता / मारा-मारा है
... ... ...
ठंडे चूल्हे में अब तक है / थोड़ी राख बची
दर्पण पर सिन्दूरी रेखा नहीं / गई खुरची
जिसके भीतर मुस्काता / आभास तुम्हारा है ( नचिकेता )
यह वसंती साँझ / कुहरिल रूप / उस पर टेरतीं यादें तुम्हारीं
चाँदनी में घुल गयी केसर / मदनगंधा हुईं साँसें
फिर हवा ने गुनगुनाया गीत /फूलों से लदीं शाखें
मंदिरों में जगमगाए दीप / झिलमिल हो गयीं / आँखें तुम्हारी ( श्याम निर्मम )
तुम एक बिसरे गीत-सा मुझको भुला देना
जब नीम का यह ठूंठ डूबेगा अँधेरे में
जब दूर पर लौ झोंपड़ी में टिमटिमाएगी
होगी समेटे गोद में कुछ राग अनजाने
वह एक ख़ामोशी तुम्हारे पास आएगी
यदि यों अकेले में कभी शिशु याद के जागें
दे थपकियाँ चुपचाप तुम उनको सुला देना ( राजेन्द्र गौतम )
नीम-आमों के झरे / तन पर मदीले बौर
एक खजुराहो हुए थे / झुरमुटों के ठौर
बेल-से लिपटे चले / थीं खूब सँकरी वीथियाँ
* * *
नाश्ता भी बन न पाया / व्यर्थ के प्रतिवाद में
शर्ट भी तो प्रेस-लगी / कोई न आई हाथ में
आज ड्यूटी की हुई है देर / जायेंगे नहीं ( वीरेन्द्र आस्तिक )
ये हैं यादों में हुए वे प्रणय-संवाद, जिनमें शृंगार की संचेतना जीवन के खट्टे-मीठे यथार्थों से जुड़कर एक ठोस आकृति पाने का प्रयास करती है। इन संवादों में सूर्योदय हैं तो जीवन के ढलते हुए कालखंड का रोमांस भी है। ऐसा ही एक संवाद-चित्र है सत्यनारायण के इस गीत-अंश में -
घंटी बजी / और फोन पर / मैंने 'हैलो' कहा
वही-वही बिल्कुल / पहले जैसी ही / धुली-धुली
उधर हँसी तुम / और इधर / बगुले की पाँख खुली
बँधी झील में / सहसा पूरनमासी गई नहा
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बढ़ी उम्र ने / खींची ही होंगीं / कुछ रेखाएँ
बाल सफेद हुए होंगे / शायद दाएँ-बाएँ
फिर भी होगा / वही चेहरा / था जो कभी रहा
उम्र की ढलान की प्रणयानुभूति कितनी सहज, कितनी परिपक्व, कितनी पावन होती है, उसकी गूँज इस गीतांश की एक-एक पंक्ति में है। संयोग शृंगार की ऐसी ही किन्तु युवावस्था की मादकता से ओत-प्रोत छवि है यश मालवीय के इस गीतांश में -
पोंछकर तन / चाँदनी के तौलिये से
तुम नहाकर पास आईं / रात के दूजे पहर
एक कनखी से तिमिर की स्लेट पर / तारीख डाली
देह भाषा हुई क्षण भर / आहटों ने भी विदा ली
पर्व के क्षण / रोशनी के शावकों से
आ गये फिर घाटियों में / गंध की सीढ़ी उतर
चाँदनी के तौलिये से तन को पोंछने, कनखी से तिमिर-स्लेट पर तारीख डालने, क्षण भर देह के भाषा होने और पर्व के क्षणों के रौशनी के शावकों की तरह गंध-सीढ़ी उतरने के मोहक एवं मृदुल बिम्बों से बुनी गयी इस गीतांश की प्रणयानुभूति कितनी सम्मोहक बन पड़ी है, कहने की बात नहीं है। ऐसे ही मधुर क्षणों की स्मृति से उपजी हैं राधेश्याम शुक्ल की ये लोकगीतात्मक गीत-पंक्तियाँ -
मन में / सगुनचिरैया गाये / पाहुन आये
आँखों-आँखों / पुरी रँगोली / सुधियाँ टीके / कुंकुम रोली
वयःसंधि के खत मुसकाये / उमर मिठाये
देह हुई चाँदनी 'पियासी' / परस गयी मन / धूप कुहासी
रीझ-रीझ / दर्पण बतियाये / छंद सुनाये
नवगीत में शृंगार की सहज आनन्दमयी प्रस्तुति की दृष्टि से जो कुछ नाम उभरकर सामने आये हैं, उनमें एक हैं बुद्धिनाथ मिश्र। उनके गीतों में प्रणय की व्यक्तिगत सुखानुभूति एवं सामाजिक सरोकारों का अद्भुत सामंजस्य हुआ है। वे कहते हैं -
मैंने युग का सारा तमस पिया है, सच है
लेकिन तुमको प्यार किया है, यह भी सच है
आज का युग-संदेश भी यही है - व्यक्तिगत अनुराग के साथ-साथ युग के तमस की संचेतना स्वस्थ सामाजिक उत्तरदायित्त्व बोध का सृजन कर सकती है। बाह्य वातावरण और आंतरिक पर्यावरण के इस संतुलित सामंजस्य से ही आज के नवगीत की युगधर्मी आकृति बनती है और इसी अनुरागमयी 'स्व' से 'सर्व' होती अभीप्सा से सर्वहितकारी आस्था की उद्भावना हो पति है। आदिम सहचर भाव ही आज की बढ़ती संवेदनहीनता का एकमात्र समाधान है।
अवधबिहारी श्रीवास्तव ने 'हल्दी के छापे' शीर्षक अपने गीत-संग्रह में गृहरति की अत्यंत मनोरम छवियाँ अंकित की हैं। उनमें से एक छवि प्रिया के हाथों के हल्दी के छापों की है। देखें -
एक पत्र लिखना हाथों की छापों से
घर की कथा हथेली ही बतलायेगी
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कोई छवि थाली में मंगल-दीप लिये
तुलसीचौरे पर अक्षत धर आयेगी
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बिजली रचे महावर / गोरे पाँवों में
आँगन की बिछलन में / बचकर चलती है
कैसा जादूभरा गीत / मैं सुनता हूँ
शायद सात सुरों में / पायल बजती है
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बालों से खेलती अँगुलियों / की छुवनें
ओठों पर झुकते गुलाब का / सम्मोहन
उनके एक अन्य गीत में कूड़ा बिनती एक लडकी के अभावग्रस्त जीवन के यथार्थ के बीच भी जो रोमांस जीवित है, उसका बड़ा ही मनोहारी चित्र अंकित हुआ है - एक ओर है दो दिनों से चल रही बरसात के कारण घर भर के फाँके से जूझती लडकी के आक्रोश का चित्र और दूसरी ओर है उसके निजी एकांतिक रोमांस की छवि - यथार्थ और रोमांस का यह संयोजन अनूठा बन पड़ा है -
बीड़ी पीता हुआ छोकरा / 'लाल रिबन' देकर भागा है
पिल्ले को सहलाती लडकी आसमान में उड़ने निकली
सहज अनुराग की इस उड़ान में अन्तःपुरी शृंगार से अलग एक सहज उल्लास की सृष्टि हुई है। उपर्युक्त पंक्तियों में जो तटस्थ निजता है, वह इस गीत को पारंपरिक गलदश्रु या वासनात्मक शृंगार से बिलगाती
है। यही तटस्थ निजता आज के गीत की पहचान है। ऐसी ही तटस्थ निजता का चित्र है कुमार रवीन्द्र की इन पंक्तियों में -
नदी का तट / हम खड़े हैं हाथ में ले हाथ / धूप भी है साथ
छेड़ता है / एक उजली हवा का झोंका / तुम्हारे बाल
पास / बरगद की नई कोंपल सिहरती / और बूढी डाल
बज रही है / कहीं वंशीधुन / सुन रहा हूँ मैं तुम्हारी बात
देख लो / पागल हुआ है / छू रहा है / इस जगह को घाम
रेत पर / तुमने लिखा था / जहाँ मेरा नाम
तुम लहर-सी / खिलखिलाती हो / सोचता हूँ उतर आये शाम
रवीन्द्र भ्रमर की ये गीत-पंक्तियाँ भी ऐसे ही उदात्त प्रकृतिपरक बिम्बों से शृंगार की उद्भावना करती हैं -
घर पीछे तालाब / उगे हैं लाल कमल के ढेर
तुम आँखों में उग आयी हो / प्रात गंध की बेर
यह मौसम कितना उदास लगता है - तुम बिन
शुद्ध यथार्थपरक ग्राम्य बिम्बों में रोमांस की सृष्टि करने में गुलाब सिंह, कैलाश गौतम और अनूप अशेष के नाम उल्लेखनीय हैं। कैलाश गौतम की ऐसी ही यथार्थपरक चरित्र-सृष्टि है 'खरपत्तू बो'। देखें उसकी शोख मनोहारी छवियाँ -
छुवन माधुरी, हँसी पाँखुरी, बातें रस की गगरी
जामुन-सी कजरारी आँखें, पुतली जल की मछरी
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जैसे आते बौर आम में, वह कोयल हो जाती
रात-रात भर गाँव जागता, ऐसा चहका गाती
सरसों तीसी टेसू सेमल जैसे वस्त्र बदलती
कहीं फुदकती मैना जैसी हिरनी कहीं उछलती
मेले-ठेले भीड़-भाड़ में करती हँसी ठिठोली
रस मिलता जब चुटकी लेती और बोलती बोली
एक नहीं फागुन में सुनती अपने मन का करती
लाल गुलाबी नीले पीले रंगों से घर भरती
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घर-घर रँग है घर-घर फागुन घर-घर लहँगा चोली
खरपत्तू बो नहीं रही अब टीस रही है होली
ऐसी ही एक छवि है गुलाब सिंह के एक गीत की भाभी की -
साहब का बेटा / अशीषतीं / होली गा-गा अनाज पीसतीं
दीपक की पीली-पीली लौ में / हल्दी की बरखा से भीजतीं
भाभी का तन-मन / कत्था-चूना पान का
अनूप अशेष अपनी विरह-व्यथा को खेत-खलिहानों से जोड़कर यों अभिव्यक्ति देते हैं -
फूली पीली सरसों / ऐसा लगता / बिना तुम्हारे / हुए खेत में बरसों
भाँटा-फूल / रंग में बोरे / लहके अलसी क्यारी
ऊँचा-डीह / पिपरहा घूरे / मसुरी दीठ उतारी
मन में पाला / लगे अरहरी / सूरज छिपे मदरसों
मन-सी गोर / गुलाबी इच्छा / गदरी पलकें भारी
पात-पात पर / सुधियाँ डोलें / तिनके हँसें अनारी
एक-एक दिन / तिथियाँ लाएँ / आज और कल परसों
लगभग हर नवगीतकार ने कभी-न-कभी जीवन के रोमांस और शृंगार को अपने जीवन में भरपूर जिया है। उपर्युक्त विवेचन से अलग देखें कुछ ऐसी छवियाँ -
रेत से लिखो या जलधार से लिखो
मेरा है नाम, इसे प्यार से लिखो
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भरकर पूरनमासी चाँदनी / शिराओं में
बाँहों में धार नदी-निर्झर की जोड़कर
छोड़कर हिरन साँसों के / चन्दन-वन में
हम-तुम बह जायेंगे लहरों को तोड़कर
पल से चाहे छिन से / याकि निमिष भर मन से
दो मंगल अक्षर त्योहार से लिखो ( विनोद निगम )
पीले हरे गलीचे खेतों बीच बिछाये हैं
विहगवृन्द ने कलरव करके / अलख जगाये हैं
सूरज के रथ पर सवार हो / अंबर के पथ से
पुष्पों का धनु लिये हुए / ऋतुराजा आये हैं
सारस-युगल केलि करता है / गाता है फगुआ ( विद्यानंदन राजीव )
आ बैठी / ओठों पर / फागुनी हँसी
सतरंगी चूनर बदनाम हो गई
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चुटकी भर / प्यार और / अंजुरी भर रंग
थिरक उठी / कदमों पर / ठंडाई-भंग
कस्तूरी देह / कई धाम हो गई ( ओमप्रकाश सिंह )
इच्छाएँ हो गईं दिगंबर / कुंठाएँ हो गईं पवन
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एक पक्ष कृष्ण बजाए वंशी / एक पक्ष राधा की चाँदनी
ऋतुओं के उत्सव लीला रचैं / मलयगंध बहती उन्मादिनी
घटा-घटा रास रच रहे जैसे / उड़ते हैं गोकुल वृन्दावन ( विष्णु विराट )
गीत तो गाये बहुत जाने-अजाने
स्वर तुम्हारे पास पहुँचे या न पहुँचे / कौन जाने
उड़ गये कुछ बोल जो मेरे हवा में
स्यात उनकी कुछ भनक तुमको लगी हो
स्नान के निशि-होलिका में रंग घोले
स्यात कोरी नींद की चूनर रँगी हो
भेज दी मैंने तुम्हें लिख ज्योति-पाती
साँझ-बाती के समय दीपक जलाने के बहाने ( श्रीकृष्ण शर्मा )
बाट तेरी जोहते दी काट सारी / राहें देखते
आँखें दरद के आँसुओं से भीगी हुईं / बरसात वाले बादलों-सी
झुटपुटे में साँझ के कल तुम नहीं थे
दूसरा कोई बटोही आ रहा था / राह पकड़े ( सूर्यप्रताप सिंह )
कभी ग़ज़ल का मुखड़ा बनकर / कभी गीत की लय
पिया प्रेम का झरना / बहता है अविरल अक्षय
छुई-मुई-सी याद तुम्हारी / और निगोड़ी शाम
जाने क्या-क्या लिख जाती है / पत्र तुम्हारे नाम ( जगदीश श्रीवास्तव )
तुझ जैसी बहकती बयार मिले / या कोई जलता अंगार मिले
पुरवइया सपनों तक ले जाये / दर्द पोर-पोर तार-तार मिले
स्वप्न-सुन्दरी तुझको कहने से / हर सपना ही सुहाग हो गया
मौलसिरी तुझको जो कह दिया / फूल-फूल आग-आग हो गया ( दिनेश सिंह )
सुबह-सुबह की धूप बना लूँ / भर दूँ रंग पलाश का
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सोंधी हल्दी सनी हथेली / कुमकुम की सौगंध
रह-रहकर आमंत्रित करती / नेहातुर अनुगंध
मन को पावन और बना लूँ / तन को हिम कैलाश का ( निर्मल शुक्ल )
याद आयेगी / दूधिया झरनों सरीखी / यह हँसी की धार
सर्दियों की धूप जैसी / प्यार की ये गुनगुनी बातें
ओस-भीगे पारिजातों की / टहनियों से जुड़ी रातें
कुहासों की नदी में ये / तैरते / दो द्वीप, जल की धार ( अखिलेश कुमार सिंह )
याद करो जब हम तुम दोनों / 'गोविन्दम' के छंद हुए थे
यौवन की पहली पावस में / कस्तूरी की गंध हुए थे
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संधि न कोई समझौता था / ठगे गये संवाद कुँवारे
एक अनूठे सम्मोहन में / बँधे-बँधे हम सब कुछ हारे
स्वीकृतियाँ अनबोल रहीं पर / कई नये अनुबंध हुए थे ( सतीश कौशिक }
मुझ तक पहुँची गंध / धूप में / तुमने केश सुखाये होंगे
तुमने ली / अँगड़ाई मन में / इंद्रधनुष उग आए
यमुनाजल में / ताज़महल जैसे- / डूबे-उतराए
मुझ तक पहुँची किरण / ताल में / तुमने दीप सिराए होंगे ( इसाक 'अश्क' )
फिर-फिर संशय के पुल टूटे / जाने कितनी बार
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रात-रात भर वासन्ती / तरु से मिलकर रोयी
पतझर की छतरी के नीचे / फिर कलियाँ सोयीं
देवी और देवता रूठे / जाने कितनी बार ( भारतेन्दु मिश्र )
इस आँधी-पानी में / खिड़की पर बैठना
फिर सोचना / क्या-क्या भूल हुई / उम्र की इस नादानी में
उँगलियों के पोर-पोर पर / अंगों के कोमल हस्ताक्षर
रह-रहकर दहक रहे हैं / कंठ और जिह्वा पर चढ़कर
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मन में मानसून का घिरना / अंगों में जेठ का महीना
मन को धातु-सा गलाना / जड़ना फिर प्यार का नगीना
प्यार की तुलना / केवड़े से / गंध के दो कीमती दिन ( श्याम नारायण मिश्र )
फागुनी की बाँसुरी / फाग-राग टेरे
मधुमासी के दिन हैं / बस तेरे-मेरे
पक आयीं फसलें / चुकेगा उधार
अब चिंता छोड़कर / हो जा तैयार
विन्ध्याचल की गोरी / प्रेम-पत्र भेजे
ओ बस्तरवासी / कर जा तू फेरे ( सुश्री शरद सिंह )
मेघवती / रतनारी आँखें / देख-देख मन मोर हुआ
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मदमय आँखों की / मादकता / सारे बंधन तोड़ गयी
पाप-पुण्य का लेखा-जोखा / चौपालों से जोड़ गयी
झिलमिल / तारों मध्य महकता / अर्धचाँद चितचोर हुआ ( भोलानाथ )
उपर्युक्त सभी उद्धरणों में अलग-अलग किसिम की बिम्ब-संयोजना और कहन-शैली नवगीत में शृंगार-भंगिमाओं की समृद्धि को दर्शाती है। वस्तुतः नवगीत की शृंगार-दृष्टि उसके गैर-पारंपरिक सौन्दर्य-बोध से जुडी हुई है। राजेन्द्र गौतम के अनुसार, " नवगीतकार का नारी-विषयक सौन्दर्यबोध वैयक्तिक न होकर सामाजिक सौन्दर्य चेतना का प्रतिनिधित्व करता है।... ... नवगीतकार ने घर-परिवार से जुड़े नारी-सन्दर्भों की मिठास, संवेग और सामीप्य-बोध को विशेष रूप से अपने गीतों का विषय बनाया है , इसीलिए उसके सौन्दर्य-चित्रण में सांस्कृतिक मर्यादा है ...।".नवगीत में शृंगार अपने उदात्त सहचर-सहचरी भाव में प्रस्तुत हुआ है, न कि उद्दाम या लम्पट वासनात्मक स्वरूप में। एक ओर नवगीत मनुष्य के इस आदिम राग को आध्यात्मिक धरातल तक ले जाता है, तो दूसरी ओर वह उसे जीवन के सख्त एवं खुरदुरे यथार्थों से भी जुडा रखता है। जीवन के कड़वे यथार्थ और संघर्ष के बीच भी एक आत्मीय मिठास बनी रहे, इसके लिए यह लाज़िमी है कि नर-नारी संबंधों में एक प्रेमिल संवाद की स्थिति बनी रहे। नवगीत के शृंगार-बोध का यही अभीष्ट मंतव्य है। यही संवाद आम जीवन की क्रियाओं एवं दिनचर्याओं से जुड़कर नवगीत के इस सम्मोहक प्रसंग को रोचक बनाता है। इसका सांस्कृतिक क्लासिकी धरातल हमें देवेन्द्र शर्मा 'इन्द्र' की इन पंक्तियों में बखूबी देखने को मिलता है -
पुछ गया गुलाल भाल से / पर हृदय रँगा अभी तलक
... ... ...
तुमने मन बाँध ही लिया / अनजाने हर सिंगार से
ज्योत्स्ना की रश्मिगंध ले / स्वप्न झरे हरसिंगार से
उलझा मन धूम जाल से / ज्योति के लिए उठा ललक
धूम्र जाल की उलझन के बीच ज्योति की ललक जगाने का उपक्रम करती शृंगार की यही सात्त्विक आस्था नवगीत की श्रृंगारिक संचेतना को अलगाती है पारंपरिक शृंगार-बोध से। यह आस्था समस्त सृष्टि की जिजीविषा की परिचायक है। नवगीत में शृंगार की प्रस्तुति इसी जिजीविषा से जुड़कर हुई है। और यही है नवगीत के शृंगार-बोध का विशिष्ट मर्म। *** नवगीत का सौंदर्य बोध -डॉ. राजेन्द्र गौतम प्राचीन साहित्यशास्त्र में स्वीकृत काव्य-धर्म की रसाश्रितता और आधुनिक समीक्षाशास्त्र में मान्य उसकी सौन्दर्य-निष्ठता तत्वतः अभिन्न है, परन्तु युग परिवर्तन के साथ-साथ सौन्दर्य के न केवल निर्धारक मानदण्ड बदलते रहते हैं, बल्कि उसमें स्वरूपगत अंतर भी आता रहता हैं इसी से प्रत्येक काव्यधारा की निजी सौन्दर्य-दृष्टि होती है। आधुनिक हिन्दी काव्य में, छायावाद ने सौन्दर्य के जो स्वच्छन्दतावादी मान उपस्थित किए थे, निश्चय ही वे एक नवीन इतिहास के संस्थापक सिद्ध हुए थे परन्तु यह भी सही है कि वे स्वयं में पर्याप्त नहीं थे। इसीलिए परवर्ती काव्यान्दोलनों ने उसको नया रूप दिया।
नवगीत के माध्यम से यह परिवर्तन पुनः एक ऐतिहासिक मोड़ लेता है- गत तीन दशकों का हिन्दी काव्य इसका साक्षी है। सौन्दर्य-शास्त्र दर्शन, मनोविज्ञान एवं नृतत्व के उपलब्ध ज्ञान के आलोक में मानव-मन की संवेदन प्रक्रिया का अध्ययन करता हैं। साहित्य में एक ओर सुन्दर की अभिव्यक्ति रहती है, दूसरी ओर अभिव्यक्ति का सौन्दर्य। इसीलिए सौन्दर्य-शास्त्र रस-निष्पत्ति, साधारणीकरण अथवा संवेदना से जितना जुड़ा है, उतना ही अभिव्यंजना-शिल्प एवं शैली विज्ञान से भी । यदि उसका एक चरण परम्परा की सुदृढ़ भूमि पर टिका है, तो दूसरा आधुनिकता के निये क्षितिज की ओर उठा रहता है। काव्य-मूल्यों की दृष्टि से नवगीत भी स्वयं में परम्परा और आधुनिकता की संश्लिष्ट परिणति है। व्यापक जन-सम्पृक्ति, गहन वैयक्ति आवेग, स्वकीय लोक-धर्मिता और युगबोध की सचेतता के साथ-साथ नये एवं समृद्ध शिल्प की योजना नवगीत की प्रमुख विशेषताएँ है। इसीलिए यदि यह काव्य-धारा बीसवीं शताब्दी के उतरार्द्ध की हिन्दी कविता में विशिष्ट उपलब्धि के रूप में स्वीकार की जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
नवगीत की सौन्दर्य-चेतना अपने पूर्ववर्ती-काव्य एवं समसामयिक काव्य रूपों से दो धरातलों पर भिन्न है। इस भिन्नता को विषय के रूप में गृहीत सौन्दर्य उपादानों के चुनाव तथा अभिव्यक्ति-सौन्दर्य में इसके द्वारा उपस्थित किये गये क्रांतिकारी परिवर्तन के रूप में देखा जा सकता है। सैद्धान्तिक रूप में छायावादी सौन्दर्य-दृष्टि व्यक्तिपरक, भाववादी एवं सूक्ष्मता-केन्द्रित थी। छायावादोत्तर काल में यह व्यक्तिवादी दृष्टि ही मांसल एवं रोमानी अधिक हुई है, जबकि प्रगतिवादी और प्रयोगवाद की मूल चेतना को यथार्थोन्मुख होने के कारण इनमें सौन्दर्य के वाह्यमानों को ही अधिक प्रमुखता मिली है, परन्तु नवगीत के नये युग के सौन्दर्यबोध को उसकी वस्तुपरक प्राणवत्ता और भावपरक तरलता के संयोगात्मक रूप में उपस्थित किया है। यद्यपि नवगीत की दृष्टि भी यथार्थमूलक है, पर यह यथार्थ प्रगतिाद की भांति केवल स्थूल उपयोगिता तक केन्द्रित नहीं है और नही यह प्रयोगवाद की तरह भदेस का ही पर्याय है। आधुनिक संस्कृति और ज्ञान-विज्ञान के भारतीय जीवन को उसकी मानसिकता को जो नया रूप दिया है, उसके अनुरूप ही नवगीत को सौन्दर्य चेतना विकसित हुई है, उसने विराट और महान से परहेज नहीं किया है, परन्तु जीवन की साधारणता में भी उसने सौन्दर्य की पहचान की है, उसकी सहजता में भी उसने सौन्दर्य को पाया है और समस्त विसंगतियों के बीच उसे अनुभव किया हैं परम्परिक गीत के पनघटी अभिसार से ऊबकर प्रगतिवाद की निवैयक्तिक अंतराष्ट्रीयता से विमुख होकर और प्रयोगवाद तथा नयी कविता की लयहीन चमत्कारिकता से आहत हेकर नवगीतकार ने वैयक्तिक ऊष्मा में तपाकर जीवन के यथार्थ, कठोर एवं खुरदरे रूपों में जिस सौन्दर्य को देखा है, वह उसकी नवीन दृष्टि की परिचायक है।
नवगीत की मूल चेतना के स्रोत ’’निराला’’ हैं। उनके पश्चात गत तीन दशकों में नवगीत की परिष्कृत सौन्दर्य-चेतना ने हिन्दी कविता को नये आयाम दिये हैं। नवगीत के प्रथम चरण से जुड़े कुछ कवियों में यद्यपि छायावादी अवशेष थे, परन्तु क्रमशः स्वयं को रोमांसवादी भावबोध से मुक्त करते हुए नवगीतकारों ने सौन्दर्य के नवीन गवाक्षों को खोला है।
नारी और प्रकृति काव्य में ग्रहण किये जाने वाले सौन्दर्य के शाश्वत उपादान है और नवगीत इसका अपवाद नहीं। परन्तु इन दोनो ही क्षेत्रों में नवगीतकार ने रूढ़ियों की जकड़न को तोड़ा है। नवगीतकार के लिए नारी न तो रीतिकालीन नायिका विशेष है और न ही छायावादी अदृष्ट दिव्यलोक की प्रेयसी, बल्कि उसके लिए नारी सहकर्मिणी, मित्र और जीवन की सहभोक्ता है। इसी नव्य सम्बन्ध योजना ने उसके सामने नये सौन्दर्य-मूल्यों को उपस्थित किया हैं उसके लिए नारी न तो वह स्थूल उपभोग सामग्री है, जिसके सौन्दर्य को नखशिख के बीजक से ही वर्णित किया जा सके और न ही उसकी मानसिकता इतनी बंधनग्रस्त है कि वह अपने सौन्दर्य की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति की अपेक्षा अस्पष्ट प्रतीकों का आश्रय ले। वियुक्ता प्रेयसी का संदर्भ हो या संयुक्ता सहचरी की मुग्धकर्त्री छवि का- नवगीतकार ने शरीर धर्मी सौन्दर्य को हेय नहीं माना है पर रूप के उस स्वर्ण में उसने सम्बन्धों की भावगंध को अवश्य सम्मिश्रित किया माना है। नवगीतकार की सौन्दर्य-दृष्टि अकुंठ है। उसने यदि नारी के सौन्दर्य को यौवन के अयलज अलंकारों और कंगन, चूड़ी, बिछुवा, कर्णफूल आदि दैनंदिन प्रयुक्त होने वाले शोभावर्धक आभूषणों के साथ चित्रित किया है, तो साथ ही उसने मेंहदी, महावर, सिंदूर, काजल, कुंकुम, रोली आदि वर्ण-सज्जाओं के साथ भी नारी का चित्रण किया है, किन्तु ये अलंकरण मात्र शोभावर्धक नहीं है बल्कि विशिष्ट सांस्कृतिक सामाजिक रीतियों व परिवेश के अंग भी है।
वस्तुतः नवगीतकार का नारी विषयक सौन्दर्यबोध वैयक्तिक न होकर सामाजिक सौन्दर्य चेतना का प्रतिनिधित्व करता है। साथ ही नवगीतकार ने सौन्दर्य को लोक-जीवन के परिप्रेक्ष्य में चित्रित करते हुये उसकी संप्रेषणीयता को बढ़ाया है। निराला ले ’बाँधों न नाव इस ठाँव बन्धु’ गीत में स्मृति के माध्यम से घाट में धँसकर नहाती प्रेयसी के जिस रूप सौन्दर्य का चित्रण किया है, वह नवगीत के पूर्ववर्ती साहित्य में अपवाद रूप में ही आया है, आगे चलकर नवगीत ने सौन्दर्य का संपूर्ण परिप्रेक्ष्य ही बदल दिया। यदि छठे दशक की पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रहे गीतों का सूक्ष्म विश्लेषण करें तो पाते हैं कि इस काल में नवीन सौन्दर्य परक दृष्टि के परिणामस्वरूप नवगीततात्मक प्रवृत्तियों का अंकुरण स्पष्ट दिखलायी देने लगा था। इस काव्य में नारी शिलास्थित होकर झील की लहरें गिनने वाली चाँदनी की रजत-रश्मियों से बनी काया वाली प्रेयसी नहीं है, बल्कि वह खेत-खलिहान में काम करती हुई श्रमजीवी नारी है, अथवा मध्यमवर्गीय परिवार में घरेलू कामों उलझी हुई गृहणी। इसीलिए उसके सौन्दर्य में पसीने की गंध है और रूप में तरुणाई की छलकन।
नवगीतकार ने घर-परिवार से जुड़े नारी-संदर्भों की मिठास, संवेग और सामीप्यबोध को विशेष रूप से अपने गीतों का विषय बनाया है, इसीलिये उसके सौन्दर्य चित्रण में सांस्कारिक मर्यादा है, लम्पट निर्लज्जता नहीं। इस रूप में यह काव्यधारा अपने भारतीय चेतना के साथ जुड़े होने का प्रमाण देती है। उमाकान्त मालवीय, माहेश्वर तिवारी, नईम और ओम प्रभाकर के गीतों में नारी को ऐसे ही पारिवारिक संदर्भों में चित्रित किया गया है अथवा देवेन्द्र शर्मा ’इन्द्र’ आदि कुछ अन्य कवियों के गीतों में उसे प्रकृतिमय करके एक अभिजात औदात्य प्रदान किया गया है। नवगीत का नारी-सौन्दर्य निरूपण न तो रीतिकालीन रतिचित्रों का एलबम है, न इसमें छायावाद की तरह अमूर्त कल्पनाओं की भरमार है और न ही आधुनिक फ्रायडियन लेखन की कुंठाग्रस्त तमस-छायाएँ इस पर पड़ी है। मानव मन की सहज रूप लिप्सा का तिरस्कार भी इसमें नहीं है। नवगीत में नारी सौन्दर्य निरूपण के संदर्भ में रवीन्द्र ’’भ्रमर’’ का उल्लेख एक विशष्टता के साथ किया जाना चाहिए। भ्रमर जी का उत्तर काव्य प्रणय की उदात्त भूमि पर ही स्थित है। उन्होंने नारी के मोहक अंगिक सौन्दर्य और उससे उत्पन्न होने वाले सात्विक प्रणय का व्यापक चित्रण अपने गीतों में किया है।
जैसा कि पहले कहा गया है, छायावाद के बाद प्रकृति को सर्वाधिक स्थान नवगीत में मिला है। पर नवगीत में प्रकृति यथार्थ से पलायन के आश्रय-स्थल के रूप में नहीं आयी है बल्कि एक ओर यहाँ वह अपनी स्वतंत्र सौन्दर्यात्मक सत्ता रखती है, दूसरी ओर मानवीय अनुराग या युग के त्रासद संदर्भ को संवेदनात्मक रूप में उपस्थित करती है। अतएव नवगीत में प्रकृति पारम्परिक रमणीय रूपों में ही चित्रित नहीं है, वरन इसमें वेदना और उल्लास दोनों भावों की उपस्थिति है। यदि आलंकारिक संदर्भों के माध्यम से इसमें सहज उल्लास की अभिव्यक्ति अधिक है तो आज के जीवन के समानांतर उपस्थित किये गये प्रकृतिबिम्बों में उदासी की तरलता अधिक है परन्तु यह उदासी भी अपने चारेां ओर आकर्षण का एक चुम्बकीय क्षेत्र निर्मित किये रहती है जो वेदना-संदर्भों को भी सौन्दर्य-धर्मी बनाता है।
प्रकृति के आंचलिक संदर्भों को नवगीत में शंभुनाथ सिंह, ठाकुर प्रसाद सिंह, शिवबहादुर सिंह भदौरिया व अनूप ’’अशेष’’ ने विशेष रूप से चित्रित किया है। इन आँचलिक संदर्भों में प्रकृति के सौन्दर्य की स्वतंत्र व्यंजना अधिक हुई है। प्रकृति-सौन्दर्य के चित्रण की माहेश्वर तिवारी की एक निजी शैली है। उन्होंने आज के मनुष्य के छोटे से छोटे और बड़े से बडे़ अनुभव को इस रूप में प्रकृतिमय किया है कि उनकी भाषा अनायास ही बिम्बों की विशिष्टता पर गयी है। देवेन्द्र शर्मा ’’इन्द्र’’ ने विम्बरचना के लिए प्रकृति के सौन्दर्य उपादानों का सर्वाधिक उपयोग किया है। साथ ही उन्होंने प्रकृति के अनेक भव्य स्वतंत्र चित्र भी प्रस्तुत किए हैं, यथा- ’’अमलतास के पीले-पीले फूलों वाली दोपहरी।’’ इनके अतिरिक्त सुरेश श्रीवास्तव (संध्या ने आँचल से पोछा चुवा पसीना कित्ता) कुमार रवीन्द्र (रात के कम्बल बढ़ाकर बादलों को हवा ने कह दिया सोने को) देवेन्द्र कुमार (गले हुए पीतल को सागर नाम न दो) तथा राजेन्द्र गौतम (धूप के कुछ फूल धरता आ गया मौसम) आदि नवगीतकारों ने प्रकृति के दृश्य-सौन्दर्य को अंकित किया है।
चाँदनी-धुले अलिप्त चित्रों की अपेक्षा जीवन की श्रम-धूलि से सने और माटी की गंध में रचे-बसे अनुभवों को अंकित करने वाले नवगीतकार के लिए प्रकृति अपने वैभव में ही सुंदर नहीं है, बल्कि उसने पत्रहीन ठूँठों और ओर-छोर फेले मरुस्थल में भी सौन्दर्य को खोजा है। पलाश, अमलतास और गुलमोहर जैसे ग्रीष्म में फूलने वाले वृक्षों को नवगीत में जो प्रमुखता मिली है, वह इस बात की परिचायक है कि नवगीत की सौन्दर्य-दृष्टि विपरीत परिस्थितियों के बीच विकसित हो सकते वाली जिजीविषा से प्रेरित है, क्योंकि वह मूलतः अस्थायी दृष्टि है।
नवगीत में शिल्पगत नवता भी उसकी विशिष्ट सौन्दर्य-चेतना की परिचायक है। यह विशिष्टता सपाटबयानी की अपेक्षा बिम्बप्रधान रचना में व्यक्त हुई है। सौन्दर्य मूलतः संवेदना का विषय है। बिम्ब इंन्द्रिय-संवैद्य होने के कारण काव्य-शिल्प में सौन्दर्य- विधान का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तत्व है। काव्येतर जगत का सौन्दर्य प्रकृति की सृष्टि है जबकि काव्य में उपस्थित सौन्दर्य उसके रचयिता कवि की सर्जना है। कवि द्वारा सर्जित सौन्दर्य की रचना-प्रक्रिया का विश्लेषण जटिल होते हुए भी सर्वथा अव्याख्येय नहीं है। कवि जिस सुंदर को प्रस्तुत करता है तथा उसकी प्रस्तुति में जिस शिल्प सौन्दर्य का आधान करता है, उसमें सर्वाधिक सहयोग कल्पना का होता है किन्तु जहाँ स्थूल कल्पना इतिवृत्तात्मक काव्य रचना में सहयोगी होती है, वहाँ सूक्ष्म कल्पना भाववादी एवं स्वछन्दतावादी साहित्य की सर्जिका है जबकि कल्पना अपने पश्यन्ती अथा प्रतिभारूप में उस बिम्ब-प्रधान कविता की रचना करती है जो अपने इर्द-गिर्द एक तेजवलय का निर्माण करने में सक्षम है। नवगीत में ऐसी ही सौन्दर्य विधायिनी कल्पना की सक्रियता देखी जा सकती है।
नवगीत में अनुकृत, अलंकृत एवं स्मृत बिम्बों की बहुलता नहीं है, वरन कल्पनाश्रित, प्रतीकात्मक, प्रतिभा, मिथकीय एवं गत्यात्मक बिम्बों की प्रचुरता के माध्यम से इसमें जटिल अनुभूतियों एवं अमूर्त संदर्भों से ठोस, पारदर्शी एवं संश्लिष्ट अभिव्यक्ति प्रदान की है ओर ये बिम्ब इतने मौलिक एवं सौन्दर्यनिष्ठ है कि हठात पाठक को बाँध लेते हैं। इस दृष्टि से आधुनिक काव्य में नवगीत विशिष्ठतम स्थान रखता है। ’’घायल दिन किरणों की टहनी पर लटका’’ (देवेन्द्र शर्मा ’’इन्द्र’’) ऋचाओं सी गूँजती अन्तर्कथाएँ डबडबाई आस्तिक ध्वनियाँ (महेश्वर तिवारी) ’’एक हाथ कई-कई बलाएँ/जुती हुई अनगिनत प्रतीक्षाएँ’’ (वीरेन्द्र मिश्र), आसमान की ऐंठन सी घुएँ की लकीर (शंभुनाथ सिंह) फुनगियों पर बैठे सूर्यास्त (कुमार रवीन्द्र) ’घाटियाँ ओढ़े कुसुंभी धूप के टुकड़े (श्यामसुन्दर दुबे) ’एक अपशकुन आकर पसर गया आस-पास’ (जहीर कुरैशी), उलझी है एक याद बरगद की डाल पर (सोम ठाकुर), गुजर गया सन्नाटा इस सूने मोड़ से (नईम) तथा उड़ गई पगडंडियों से खुशबुएँ सब आहटों की (राजेन्द्र गौतम) जैसे नितांत नए टटके बिम्ब, मौलिक अप्रस्तुत एवं नवीन संदर्भों के अन्वेषक नवगीत के विशिष्ट सौन्दर्य शास्त्र का निर्माण करते हैं।
नवगीत की सौन्दर्य चेतना न तो नयी कविता की भांति चमत्काराश्रित है और न ही पारंपरिक गीत की भाँति रूढ़ एवं रुग्ण मानसिकता से ग्रस्त। वह अपने पूर्ववर्ती गीतिकाव्य की मात्र प्रेयस-केंद्रियता से अधिक व्यापक और छायावाद की वायवीयता से अधिक मूर्त है। नवगीत की सौन्दर्य परक अवधारणा पारंपरिक कविता से इस रूप में भी भिन्न है कि इसमें अत्यंत परिचित और सामान्य को ही विशष्ट रूप प्रदान किया है न तो नवगीत का कथ्य ही सामान्य मानव के अनुभव से परे है और न ही इसमें अप्रस्तुत एवं बिम्ब दूरारूढ़ अदृश्य लोक से लिये गये है, तथापि ये परिचित संदर्भ रागात्मक तरलता से सिक्त हैं। यही नवगीत की सौन्दर्यपरक विशिष्टता है। मनुष्य एवं प्रकृति के अनुभवों का एकाकार होना और अभिव्यक्ति का वैयक्तिक विशिष्टता से सम्पन्न होना नवगीत के भाव और शिल्प सौन्दर्य का आधार है। इस दिशा में नवगीतकार की सफलता का रहस्य यह है कि वह हिन्दी कविता के अन्य सामायिक आंदोलनों की तरह सनसनी की खोज में पश्चिम के अनुकरण के लिए मारा-मारा नहीं फिरा है, बल्कि अपनी माटी की गंध से ही उसने कविता के क्षेत्र को महकाया है।
अपने परिवेश के प्रति अत्यंत सजग एवं संवेदनशील होने के कारण नवगीत की सौन्दर्य-चेतना यथार्थमूलक है। यही यथार्थपरकता गीत को उस रोमानियत से मुक्त करती है, जो साहित्य को जीवन से काटकर देखने की आदी रही है और जिसके लिए कविता दिवास्वप्न के अधिक समीप हैं वस्तुतः नवगीतकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती आज का विसंगतियों भरा परिवेश ही था। ध्वंसक अणु-शस्त्रों के आतंक के साये में, याँत्रिक युग के भयावह तनाव में, भौतिकता के स्फोट से मानवीय संबंधों की खंडितता के बीच, आदर्शों के टूट बिखर जाने वाले खोखलेपन के दौरान, अनिश्चय की अँधेरी सुरंगो से गुजरते हुए, मुखौटाधारी राजनीति के परिहासनाटक के बीच तथा मूल्यों की भित्ति को भरभराकर गिरते देखते हुए भी जीवन में सौन्दर्य की एक नवीन खोज ही मानवीय विश्वास की उपलब्धि का एक मात्र रास्ता हो सकती थी और यह खोज जिस प्रकार के सौन्दर्य तक इस पीढ़ी को ले गयी है, उस की मूल संरचना का पूर्ववर्ती सौन्दर्य की ’’कैमिस्ट्री’’ से भिन्न होना भी अपरिहार्य था, संभवतः इसीलिए नवगीतकार ने मशीनी कोलाहल के बीच लयों का संधान किया है, तनावों के बीच संवेगों को अभिव्यक्ति दी है, एकरस भौतिकता के बीच प्राणवान बिम्बों का सर्जन किया है, बिखराव और टूटन के बीच शिल्प को सश्लिष्टीकृत रूप दिया है।
नवगीत का सौन्दर्य दर्शन इन्हीं विसंगतियों ओर विरोधों के बीच विकसित हुआ है, इसी में उसके आधुनिकता-बोध की प्रखरता नित्य विद्यमान रही हैं। नवगीत में मेहनतकश मजदूर की दृढ़ता भी है और युवा चिंतक की सजगता भी इसीलिए उसका सौन्दर्यबोध रीढ़वान भी है और सुरूचिपूर्ण भी। याँत्रिकता और महानगरीयता ने यदि उसे जीवन का एक नया बोध दिया है तो साथ ही इसी अनुभूति ने उसे जीवन के एक दूसरे पक्ष से भी जोड़ा है। प्रकृति, आदिम संवेग और ग्राम्य आंचलिकता नवगीत में सौन्दर्य-निरूपण के प्रमुख घटक हैं। इनकी प्रमुखता का कारण यही है कि उपर्युक्त याँत्रिकता एवं नगर-बोध ने नवगीतकार को उन अनुभवों के साथ जुड़ने को प्रेरित किया है, जिनकी संजीवनी शक्ति अक्षय है जो मानव जाति के आदिम संवेदना से गहरे संपृक्त हैं। नवगीत में उस समाज निरपेक्ष कतिपय सौंदर्य का चित्रण नहीं है, वरन नवगीतकार उस सौंदर्य का स्रष्टा है, जिसका साक्षात्कार उसने स्वयं जीवन की उन्मुक्तता में किया है और उसका वह अनुभव अपनी सामाजिक प्रासंगिकता में जीवंत सुरुचिपूर्ण एवं संवेदनात्मक है। *** लोक संस्कृति और नवगीत -कुमार रवीन्द्र किसी भी देश की लोक संस्कृति उसकी जातीय स्मृति का रूपक होती है। किसी भी समुदाय की समूची जातीय इयत्ता उससे परिभाषित होती है। वह उस समुदाय की आध्यात्मिक-नैतिक चेतना को भी रूपायित करती है। लोक में पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रचलित-प्रचारित रीति रिवाजों एवं संस्कारों से उसकी निर्मिति होती है। यही वह भावभूमि है, जिससे समुदाय के सारे रिश्ते-नाते, उसके तीज-त्यौहार उपजते हैं। उस समुदाय की उत्सवधर्मिता को लोक संस्कृति ही पालती-पोसती है, उसका संवर्धन-परिवर्द्धन करती है। इसी से उसकी अलग पहचान बनती है यानी वह उसके जातीय बोध को व्याख्यायित करती है। उस लयात्मकता को भी जिससे वह पूरा समुदाय अपने अंग-संचालन, नृत्य-गान, काव्य-साहित्य आदि सभी मानुषी उत्सव की क्रियाओं को संचालित करता है, यही संस्कृति बोध उपजाता है। अवचेतन में इसी की गूँज हमारे सारे चेतन क्रिया-कलापों को एक आकर्षक आकृति देती है।
लोक संस्कृति की चेतना या जातीय बोध का कविता से क्या रिश्ता है, यह एक रोचक प्रश्न है। लयात्मकता दोनों की साँझी प्रकृति है। कविता का प्रारंभिक और आदिम रूप लोकगीतों में ही उपलब्ध हुआ, आज भी उपलब्ध है। वस्तुतः कविता अपने-आप में एक लोकधर्मी सांस्कृतिक क्रिया है और मनुष्य की जातीय संस्कृति-संचेतना की उद्भावना उसमें सहज और स्वतः होती है। सांस्कृतिक चेतना को संक्रमित-विस्तारित करने का भी यह सबसे प्रामाणिक माध्यम है। वैश्विक धरातल पर आज हम उस जातीय संस्कृति-बोध को प्रक्षेपित करने को एक ओर समुत्सुक भी हैं तो दूसरी ओर उसके विशद विश्वव्यापी माहौल में बिला जाने की आशंका से ग्रस्त भी हैं। एक प्रकार से हम अपने जातीय बोध को वर्तमान समय में पुनर्व्याख्यायित कर रहे हैं। इस अभियान में आज की गीतिकविता की, विशेष रूप से नवगीत की विशिष्ट भूमिका रही है। लगभग पचास वर्ष पूरव् प्रारम्भ हुई नवगीत-यात्रा के सभी चरणों में जातीय अस्मिता और संस्कृति-बोध की जितनी प्रखरता से अभिव्यक्ति हुई है, उतनी संभवतः कविता की अन्य किसी विधा में नहीं हुई है। लोक सांस्कृतिक चेतना की यह धारा नवगीत में निरंतर प्रवाहित रही है। कहीं प्रत्यक्ष और स्पष्ट रूप में तो कहीं प्रच्छन्न और परोक्ष रूप में। नवगीत में लोक-संस्कृति की उपस्थिति के प्रश्न पर अपनी बात को मैं भाई महेश अनघ के इस वक्तव्य से शुरू करना चाहूँगा -
" उधर संतो कहारिन कहती है कवि कोई एक कैसे हो सकता है। कवि सभापति कैसे हो सकता है। कवि हाकिम कैसे हो सकता है। हाकिम तो संतो है क्योंकि संतो ही लोक है और यह कि जीवित वही है जो लोक में है। जो लोक में नहीं वह ताबूत में है। मानव जाति के इतिहास में केवल एक व्यक्ति हुआ है जो सौ फीसदी लोक से जुड़ा रहा, उसका नाम है श्रीकृष्ण। इसी कारण उसकी वाणी महागीत है, गीता है। किसी भी संतो से पूछकर देख लो वह कविता पसंद करेगी। कविता में छंद पसंद करेगी।... उसे कविता में सुख-दुख का ज़िकर पसंद आयेगा। सुख-दुख भी आदमी का क्योंकि आदमी ही आदमी को पहचानता है ... संतो को अपनी ही भाषा में कविता पसंद आती है - अपनी यानी अम्मा के द्वारा दी गयी भाषा...लय-छंद हो, प्रतीकात्मक कहन हो, सहज भाषा हो, मानव जीवन की बात हो और हर पल नई निकोर ताज़गी हो, तभी तो वह संतो को पसंद आएगा।"
तो यह लोक तत्व है, जो कविता को प्राण देता है और इस लोक तत्व वाली कविता के उपादान हैं - आदमी को पहचान देते उसके सुख-दुख, अम्मा के द्वारा दी गयी भाषा और हर पल नई निकोर ताज़गी वाली लय-छंदात्मक कहन। संतो कहारिन की समझ यानी सहज बुद्धि ही वह कसौटी है, जिससे हम सही कविता की परख कर सकते हैं। नवगीत में लोक-संस्कृति की उपस्थिति का प्रश्न एक ओर इसी जीवंत लोक चेतना से जुड़ा है, जो लोकगीतों, लोक-कहनों या गली-नुक्कड़ पर फिरते साधू-फ़कीर के सधुककाड़ी गायन से उसमें आई और दूसरी ओर पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही उस सांस्कृतिक विरासत से संबद्ध है, जिसमें घर-घर में रोज़ सुबह जलता तुलसीचौरे पर का दीया है, नुक्कड़ का शिवाला या देवीचौरा है, अक्षत-चन्दन-गोरोचन-हल्दी-रोली-दूध-दही-कुमकुम वाले मंगल-घट की जातीय स्मृतियाँ हैं। मस्जिद की अज़ान और देवीचौरा की आरती एक-साथ इस लोक-संस्कृति में उपस्थित है। नवगीत इन्हीं संस्कृति-पहचानों का काव्य है। जो संतो कहारिन के सोच में है, वही नवगीत में है यानी सब कुछ को स्वीकारने - अपनाने का सहज भाव। वस्तुतः नवगीत अवचेतना का काव्य है, उस सामूहिक अवचेतना का जो किसी समुदाय को समग्र रूप में परिभाषित करता है। नवगीत की सांस्कृतिक चेतना लोक में उपजी लोक से प्राप्त संचेतना है। इसीलिए वह सहज जीवंत है। लोक से प्राप्त, लोक में व्याप्त सांस्कृतिक बिम्ब नवगीत की कहन के सबसे समृद्ध स्रोत हैं। गाँव की सुबह का दृश्यांकन करती गुलाब सिंह की ये गीत-पंक्तियाँ इसी लोक-समृद्ध कहन की बानगी देती हैं -
हरे लहरे खेत / टहकारती सोना पतारी
ले रहे बाबा हरी का नाम
खींचतीं अम्मा पकड़कर कोर चादर की
उठीं दीदी-जगीं अँगड़ाइयाँ
खनकता आँगन सँवरते बरतनों से
लीपतीं चौका-ओसारा भोर-सी भौजाइयाँ
दोहनी में धार/ तार सितार के बजते
सुबह के संगीत होते काम
इसी सुबह के संगीत होते काम वाली संचेतना से हमारे रिश्ते-नाते व्याख्यायित होते हैं। ठाकुर प्रसाद सिंह हमारे नेह के नातों को यों परिभाषित करते हैं -
माँ हमारी दूध का तरु / बाप बादल
औ' बहन हर बोल पर
बजती हुई मादल
उतर आ हंसी कि मैं वंशी
नवगीत की एक विशिष्टता है उसकी गहरी लोक संपृक्ति। यह लोक संपृक्ति नवगीत में कई रूपों में प्रकट हुई है। मसलन हमारे विविध ऋतु-प्रसंग, हमारे उत्सवधर्मी तीज-त्यौहार, हमारे पारस्परिक नेह-भाव से बँधे गाँव-गली के तमाम रिश्ते-नाते, हमारे खेत-खलिहान-नदी-झील-झरनों-पठारों-घाटियों-मैदानों से परिभाषित हमारा राष्ट्र-बोध और और भी तमाम रूपक जो हमें लोक-संस्कृति से सहज प्राप्त हैं। इसी सहज आस्तिक भाव से उपजे हैं ये नवगीत-प्रसंग -
मेरी कोशिश है कि नदी का बहना मुझमें हो
मैं न रुकूँ संग्रह के घर में
धार रहे मेरे तेवर में
मेरा बदन काटकर लहरें
ले जाएँ पानी ऊसर मे
जहाँ कहीं हो/ बंजरपन का मरना मुझमें हो (शिवबहादुर सिंह भदौरिया )
देख लिया बादल को जी के
अनडूबे पाट हम नदी के
कहाँ देवदास की भुजाएँ
जहाँ मोहभंग समस्याएँ
अनफूले फूल इस सदी के ( देवेन्द्र कुमार )
बहो तुम भी बहो जैसे नदी
झेलकर सब शीत वर्षा घाम
लिख गई तट पर नगर वन ग्राम
सृष्टि की यह कथा तुम भी कहो जैसे नदी ( सत्यनारायण )
यह नदी होकर सृष्टि की कथा कहते हुए बहने का आग्रह नवगीत में बार-बार उपजा है। कहीं सहज जीवन- धर्म बनकर तो कहीं अस्तित्व के संघर्ष का प्रतीक बनकर। वह रसमयता जो नदी में है वही नवगीत की संवेदना में है। लोक-संस्कृति के टूटने-बिखरने, उसके धीरे-धीरे बिला जाने की व्यथा-कथा नवगीत में जगह-जगह कही गई है।
देवेन्द्र शर्मा 'इंद्र' अपने 'सूर्यमुखी संपाती यात्रा' वाले गीतों में 'मंगल कुमकुम वाले घट के किसने / बूटों से ठुकराकर ठीकरे बिखेरे' के प्रश्न से और दूध-दही, गोरोचन, अक्षत, घृत, तुलसी' की मांगलिक छवियों और 'दादी के आँचर के दाख-छुहारे / दादा की पगड़ी के गेंद कतारे' की मन्त्रवती परम्परा के बिला जाने के प्रसंग से उद्वेलित हैं। लोक में व्याप्त पौराणिक-सांस्कृतिक आख्यायिकाओं का आधुनिक सन्दर्भों को व्याख्यायित करने के लिए जैसा सटीक बिमबागत्मक उपयोग 'इंद्र' जी ने अपने गीतों में किया है, वैसा, मेरी दृष्टि में, अन्य कोई नवगीतकार नहीं कर पाया है।
नईम 'शिकमी हो या जोतदार / क्षण आये हैं खेतों थकने के' के छटपटाहट भरे अहसास को क्रांति के स्वर के शोर हो जाने की नियति से जोड़कर लोक संस्कृति के आहत होने की चिंता को यों व्यक्त करते हैं -
दूब अक्षत हरी टहनी / बूँद-भर जल / गोद माँ की
भीड़-भाड़े के बसेरे / दिवस तिरछे राह बाँकी
शोर में डूबे हुए हैं क्रांति के स्वर
अनूप अशेष दर-ब-दर सर्वहारा की पीर की गाथा यों कहते हैं -
बाँस का टूटा हुआ जंगला / फटी भीती
बंधु, हम यहाँ रहते हैं
द्वार पर तहसील सी धमकी हवा
... ... ...
पाँव से सिर तक लपेटे हुक्म
दर न छोड़ने के संस्कार
कुएँ में ठहरा हुआ सूखा / प्यासी गाय
बन्धु, खुलकर नहीं कहते हैं
'घर' का प्रयोग नवगीत में हमारी नेह-अस्मिता को प्रतीकार्थ में व्याख्यायित करने के लिए हुआ है। माहेश्वर तिवारी घर को ममतामयी शरणस्थ्ली के रूप में पाते हैं -
धूप में जब भी जले हैं पाँव / घर की याद आई
नीम की छोटी छरहरी छाँव में / डूबा हुआ मन
द्वार का आधा झुका बरगद / पिता-माँ से बंधा आँगन
सफ़र में जब भी दुखे हैं पाँव / घर की याद आई
वहीँ दूसरी ओर ओम प्रभाकर इसे टूटन और चिंताओं के प्रतीक के रूप में देखते हैं -
जैसे-जैसे घर नियराया / बाहर बाबू बैठे दीखे
लिये उमर की बोझिल घड़ियाँ / भीतर अम्मा रोटी करतीं
लेकिन जलतीं नहीं लकड़ियाँ
कैसा है यह दृश्य कटखना / मैं तन से मन तक घबराया
कुमार रवीन्द्र के एक गीत में इसी संदर्भ का एक तीसरा पक्ष उजागर हुआ है। पुश्तैनी घर की नई पीढ़ी के द्वारा उपेक्षा का मार्मिक चित्रण उसमें हुआ है। देखें -
माँ को है लकवा / हैं बाउजी बूढ़े
घर के हर कोने में ढेरों हैं कूड़े
चूती है छत कच्ची / लोनी दीवारें
दरवाजे-खिड़की से झाँकती दरारें
बेटों की नेकटाई / बहुओं के जूड़े
पानी बिन सूख रही / गमले की तुलसी
ढह रही बरांडे में / दादा की कुरसी
भीग रहे आँगन में पड़े हुए मूढ़े
काँपते कैलेंडर पर / पिछली तारीखें
बता रहीं / कितनी हैं बुढ़ा रहीं लीकें
अगले दिन-हफ्तों को / कौन यहाँ ढूँढ़े
लोक संस्कृति में मानव संस्कारों के पराभव का यह दृश्य अकेला नहीं है। पारंपरिक नैतिक मूल्यों और उनको पालते-पोसते आस्था-बिम्बों की पराजय की प्रतीक-कथा नवगीत में बार-बार कही गई है।
भारतीय जातीय और राष्ट्र बोध की कल्पना, जिसे पहली बार महाभारत में आकार मिला, तुलसी, सूर, कबीर , मीरा की बानी से होती हुई भारतेंदु, मैथिलीशरण गुप्त, प्रसाद, दिनकर के काव्य तक आते-आते एक प्रखर राष्ट्रीय चेतना बनकर उभरी। नवगीत में राष्ट्र-बोध हमारी लोक सांस्कृतिक चेतना का हिस्सा बनकर ही अभिव्यक्त हुआ। शम्भुनाथ सिंह इसे इसी रूप में देखते हैं -
देश हैं हम / महज़ राजधानी नहीं
हम बदलते हुए भी न बदले कभी
लडखडाये कभी और सँभले कभी
हम हजारों बरस से जिसे जी रहे
ज़िंदगी वह नई या पुरानी नहीं
और
सब की सीमायें / पर मेरी सीमा नहीं
एक मैं हूँ / कि गुम रौशनी की ख़बर
बाँटता हूँ इधर / बाँटता हूँ उधर
यह जो असीम होकर रौशनी बाँटने की आस्तिकता है, यही तो है वह मूल लोक सांस्कृतिक चेतना, जिससे भारत की राष्ट्रीय अस्मिता परिभाषित होती है। इसी चेतना का अटूट हिस्सा हैं हमारी नदियाँ - गंगा, यमुना, सरस्वती, सिंध, व्यास, सतलुज, नर्मदा, कावेरी, कृष्णा, ब्रह्मपुत्र। गंगा तो हमारी संस्कृति का मेरुदंड ही है। वह मात्र एक नदी नहीं है। वह तो पूरा एक मिथक है हमारी अन्तश्चेतना का मातृत्व के प्रतीक इस नदी का आख्यान उमाकांत मालवीय ने अपनी इन गीत पंक्तियों में बड़े ही सम्मोहक बिम्बों में किया है -
भूखा कहीं देवव्रत टेरे, दूध भरी है छाती
दौड़ रही ममता की मारी, तजकर संग-संगाती
गंगा नित्य रँभाती फिरती जैसे कपिला गइया
सारा देश क्षुधातुर बेटा, वत्सल गंगा मइया
इन पावन गंगाओं के भ्रष्ट होने की त्रासदी की कथा भी नवगीत ने कही है -
अब न वे नदियाँ न वे नावें / हवायें भी नहीं अनुकूल
हर सुबह होती किनारे लाश / पानी पर उगे मस्तूल
आँधियों के ये समर्पित भाव / पहचाने नहीं जाते ( उमाशंकर तिवारी )
राजेन्द्र गौतम महानगर में आकर अपने खुली खिड़कियों वाले घर को तलाशते मन के अपने सीमांत को गूँगे होते देखते हैं -
एक खिड़कियों वाला घर/ हम कब से रहे तलाश
बिसरे बाबा के बरगद की / छाया के दृष्टान्त
सड़कों से है लगातार / उठता जंगल का शोर
ऋचा नहीं यह है शहरों का / छन्दहीन इतिहास
गूँगे हुए यहाँ आकर / मन के सारे सीमांत
बुद्धिनाथ मिश्र आज के कबंध से युग में 'घर अपना हो गया आज / पर्चों की एक सराय' के साथ 'जलावतन का दर्द / झेलता आंगन का मेहराब ' वाले वातावरण में 'सिरहाने के धरे फूल की / किसको रही खबर ' की त्रासदी का अंकन करते हैं। विजयकिशोर मानव घर को कसाईबाड़े में तब्दील हो जाने की खबर देते हैं, क्योंकि सारा रागात्मक परिवेश ही आज विखंडन की त्रासदी झेल रहा है -
घर हो गये कसाईबाड़े मुर्दाघर से शहर
... ... ...
नन्हीं गौरैया के सिर पर दिन की छत तपती
मैना बूढ़ी हुई / पेट की रामायण जपती
बाहर से हैं बंद किवाड़ें पिंजरे की सब उमर
राम क्या होना है
योगेन्द्र दत्त शर्मा की ये गीत पंक्तियाँ गाँव यानी मनुष्य की मूल सांस्कृतिक रागात्मकता के , जो अभी भी स्मृतियों में उपस्थित है, वर्तमान समय में पराभव को जिस प्रखरता से अभिव्यक्त करती हैं, उससे नवगीत की वर्तमान चिंताओं का बखूबी पता चलता है -
बर्फ सी ठंडी हुई है रेत / पर खरगोश / अब तक तिलमिलाता है
बस्तियों में काँच सा मन टूट जाता है
गाँव जब पीछे शहर से छूट जाता है
बीच आँगन में खड़ी / तुलसी / स्वयं अपराजिता सी
वत्सला अमराइयाँ / वह छाँह पीपल की पिता सी
एक झोंका स्नेह का मन गुदगुदाता है
नवगीत की लोकोन्मुखी दृष्टि और लोकधर्मिता उसके कथ्य के सरोकारों और उसकी चिंताओं में साफ झलकती है। लोकाग्रही ये चिंताएँ स्वातंत्र्योत्तर कालखंड में तेजी से पनपी लोक-विरोधी स्थितियों और शक्तियों के बढ़ते वर्चस्व से ही उपजी है। डॉ० सुरेश के इस गीत-अंश में राजनीति और पूँजी-केन्द्रित आर्थिक विकास के प्रपंच में फँसीमानुषी आस्तिकता के आहत होने की व्यथा बखूबी व्यक्त हुई है -
कंधे कुली बोझ शहजादे / कोई फ़र्क नहीं
राजे कभी कभी महराजे / कोई फ़र्क नहीं
अख़बारों की रँगी सुर्खियाँ / बड़बोलों की चाल
सूरज सोया गोदामों में / ठहरी काली रात
झूठी कसमें झूठे वादे / कोई फ़र्क नहीं
लोक संस्कृति का ही अभिन्न अंग हैं हमारे लोकगीत यानी सोहर, सरिया, ब्याह, कजरी, लावनी, टप्पा आदि और उन्हीं से उपजे ठुमरी दादरा कव्वाली जैसे अर्द्धशास्त्रीय गायन। नवगीत ने लय-छंद के धरातल पर इनको साधा और इस तरह लय की अनुपमेय आवृत्तियाँ प्रस्तुत कीं। पारंपरिक छंद-पदगीत से अलग हट कर नवगीत ने लय की अनूठी भंगिमाओं का अनुसंधान किया पारंपरिक छंदों यथा छप्पय, सवैया, सोरठा आदि के टुकड़ों को नये रूपाकारों में ढालने का काम भी नवगीत ने बखूबी किया। प्रयोगधर्मी काव्य विधा के रूप में इस दृष्टि से भी नवगीत की उपलब्धियाँ महती रही हैं। छोटी लयों का अनुसंधान और आविष्कार नवगीत की विशिष्टता रही है। इधर के नवगीतों में ग़ज़ल की छोटी बहरों का भी बड़ा ही सफल उपयोग हुआ है।
वर्तमान कालखंड में वैश्विक और महानगरीय आतंक के माहौल में नवगीत की ये चिंताएँ कितनी मौजूँ हैं, कहने की आवश्यकता नहीं। हम आज सभ्यता एवं संस्कृति की सीमांत रेखा पर खड़े हैं। लोक संस्कृति की जिज्ञासाएँ और आस्थाएँ ही हमारे पूरी तरह आशयमुक्त, अनर्गल और बेहूदा होते सामाजिक माहौल को एक बार फिर जीवंत और जीवनदायी बना सकती है। यह चिन्तन आज के नवगीत का मुख्य चिन्तन है। नवगीत किंवा समूची कविता का यही एकमात्र प्रयोजन होना भी चाहिए। आज कविता की प्रासंगिकता लोक संस्कृति को पुनर्जीवित करने और उसे समाज के सार्थक बदलाव का माध्यम बनाने में ही निहित है। आज का नवगीत इस दृष्टि से निरंतर जागरूक है। यह एक स्वस्थ और उत्साहप्रद स्थिति है। २१ मार्च २०११ *** नवगीत और जातीय अस्मिता -डॉ. राजेन्द्र गौतम समकालीन हिंदी आलोचना के संदर्भ में नवगीत और जातीय अस्मिता जैसे पद काफी असुविधा पैदा करते हैं क्योंकि अब भी हिन्दी आलोचना और रचना से जुड़ा एक वर्ग इनके प्रति न तो सहज रूप से ग्रहणशील है और न ही इनकी प्रासंगकिता के प्रति आश्वस्त है। नवगीत का एक उभार नवें दशक में 'नवगीतदशक` योजना के साथ आया था। इक्कीसवीं सदी का आरंभ फिर इसके नए उभार के साथ हुआ है। वर्तमान दशक में कई अच्छे नवगीत संग्रह प्रकाशित हुए हैं
नवगीत अब लगभग पाँच दशक की यात्रा पूरी कर चुका है। इन पाँच दशकों में हिन्दी कविता में अनेक प्रवृत्तिगत परिवर्तन हुए हैं। इसमें संदेह नहीं है कि आम आदनी तो आज भी समूची छंदमुक्त कविता को 'नयी कविता` के रूप में ही जानता है, जबकि यह सन् ६२-६३ तक आते-आते ही मृतप्राय: हो गई थी। मुक्तिबोध् की मृत्यु के साथ ही महत्त्व प्राप्त करने वाली नवप्रगतिशील कविता, तदनंतर आपात्काल के आंतक की प्रतिक्रिया में जन्मी कविता और फिर अस्सी और नब्बे के दौर में आम आदमी और जनवाद की कविता अंतत: भूमण्डलीकरण और उत्तराधुनिकता के दौर तक पहुँचती है। इन पाँच दशकों में अपेक्षाकृत विशिष्ट अभिव्यक्तिगत क्षमता का परिचय देते हुए नवगीत ने भी हिन्दी कविता में समकक्ष पूरकता की भूमिका का निर्वाह किया है और यह धरा किसी भी रूप में जड़ीभूत नहीं हुई है। इसमें समूची हिन्दी कविता के समानांतर निरंतर प्रवृत्तिगत परिवर्तन हुए हैं परन्तु यह प्रवृत्तिसाम्य किसी भी रूप में नवगीत के व्यक्तित्व का विलय नहीं है अपितु युगबोध् के सजग वहन के साथ-साथ इसकी कुछ व्यावर्तक विशेषताएँ हैं। लयात्मक अभिव्यक्ति के साथ-साथ जातीय अस्मिता की अभिव्यक्ति गत पाँच दशकों की हिन्दी कविता में नवगीत की अपनी पहचान रेखांकित करती हैं।
आरंभ में ही हमने कहा था कि जातीय अभिव्यक्ति को भी आज के अनेक विमर्श ग्राह्य मूल्य नहीं मानते। जातीयता का एक अनुवाद 'नेशनलिटी` भी कर लिया जाता है और 'नेशनलिटी` का पुनरनुवाद राष्ट्रीयता है। आज राष्ट्रवाद को वर्चस्व की संस्कृति का लक्षण बतलाते हुए एक ओर जहाँ इसे उस संकीर्णतावादी उभार से जोड़ा जाता है, जिसकी उपस्थिति उन्नीसवी-बीसवीं शती में आधुनिक काल की प्रथम दो चरणों की कविता में और आलोचना में दिखलाई जाती है, दूसरी ओर इसे एक भावनात्मक 'रेजिमेंटशन` के रूप में देखा जाता है। हमारा मानना है कि नवगीत में जातीय अस्मिता की उपस्थिति इन रूपों में नहीं है। वास्तव में यहाँ जातीय अस्मिता किसी संकीर्ण राष्ट्रवाद की स्थापना न हो कर 'देश` से जुड़ने की, उससे परिचय प्राप्त करने और उसे प्रगाढ़ करने की मन:स्थिति से सम्बद्ध है।
निश्चित रूप से जातीयता का संबंध संस्कृति से है, पर यह संस्कृति विविधता - की ही द्योतक है। यदि इस वैविध्य-सम्पन्न जातीयता अथवा सांस्कृतिकता का कोई प्रतिलोम है तो वह है-- वैश्वीकरण या भूमंडलीकरण। विश्वग्राम का नारा लेकर आनेवाले उत्तर आधुनिक संदर्भ गज़ब की एकरूप संस्कृति रच रहे हैं। ये बोलियों और लोकभाषाओं को हड़पते हुए आ रहे हैं। ग्लोबलाइजेशन तमाम आंचलिक विशेषताओं को निगलता जा रहा है। पेप्सी-कोला की समरूप समता की आँधी हमारी सांस्कृतिक जड़ों को झकझोर रही है, आदमी की पहचान वस्तु के रूप में स्थापित हो रही है और साहित्य और संस्कृति की उत्पाद के रूप में ।
बाज़ारवाद की वर्तमान आँधी में विश्वग्राम के 'हिडन एजेंडा` के माध्यम से होने वाले आर्थिक शोषण को भी उसने पहचाना है। गुलाब सिंह, अनूप अशेष और कैलाश गौतम के गाँव आज शोषण और विकृति से घिर कर कैसे होते जा रहे हैं, उनकी चिंता के बहुत से पक्ष जातीय अस्मिता से ही जुड़े हैं। विशेष यह है कि विश्वग्राम के एकरूपता वाले इस खतरे को हिन्दी साहित्यकारों ने अब आकर पहचाना है जबकि नवगीत आरंभ से ही इसकी ओर ध्यान दिलाता रहा है। जातीयता की अभिव्यक्ति की दो दिशाएँ होती हैं -- प्रकृति और संस्कृति। प्रकृति का आगामी विस्तार लोक-चेतना, आंचलिकता और दृश्यात्मक प्रकृति में होता है, संस्कृति की व्याप्ति सामाजिक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में, लोकाचारों में, उत्सवों-पर्वों में तथा जीवन-मरण के अनेक प्रसंगों में होती है।
सन् `४३ के बाद का 'नयी कविता` का आंदोलन एक कृत्रिम अंतर्राष्ट्रीयता के दावे के साथ कविता को परम्परा और संस्कृति से काट देता है और साहित्य में जातीय अस्मिता लुप्त होती नजर आती है। इसीलिए डॉ. शंभुनाथ सिंह नवगीत के स्वरूप की व्याख्या करते हुए सर्वाध्कि बल जातीय अस्मिता पर ही देते हैं। 'नवगीत दशक-दो` की भूमिका में वे लिखते हैं - ''नवगीत आधुनिकतावादी कविता है, किन्तु वह आधुनिकता को सार्वभौम और सार्वकालिक नहीं बल्कि देश-काल-सापेक्ष मानता है। अत: आधुनिकता भारतीय परिप्रेक्ष्य वाली विशिष्ट आधुनिकता है.... नवगीत भारत की आत्मा को प्रतिबिम्बित करने वाली कविता है ... यह लोकधर्मी और लोकाश्रयी कविता है, यह नयी कविता की तरह गिनेचुने अभिजात जनों एलीट की कविता नहीं है ... नवगीत इस अर्थ में भी भारतीय कविता है कि वह अपने देश की ज़मीन और सामान्य जनता से जुड़ा है। उसकी जड़े गहरायी तक भारतीय जनजीवन में घुसी हैं। वह देश की आँचलिक संस्कृति और विभिन्न क्षेत्रों की लकधिर्मिता को अपना उपजीव्य बना कर आदिम बिम्बों की सृष्टि करता है और इस तरह भारतीय अस्मिता को उजागर करता है। फलत: वह नयी कविता की भाँति विदेशों से आयातित कविता नहीं बल्कि भारतीय मिट्टी की बहुविध रसगंध में रची बसी देसी कविता है।``
नयी कविता के बाद धूमिल आदि के माध्यम से हिन्दी कविता आर्थिक स्तर पर भारतीय संदर्भों की ओर मुड़ती जरूर है परन्तु क्रमश: अपने वक्तव्य-प्रधन स्वरूप में वह अनुभव और चेतना के स्तर पर जनजीवन से नहीं जुड़ पाती। बाद में तो संप्रेषण की विकलांगता ने कविता के अस्तित्व को ही संकटग्रस्त बना दिया है। समकालीन कविता का बहुलांश ऐसा है, जिसमें ऋतुएँ गायब हैं, गाँव अनुपस्थित हैं, प्रकृति का दूर-दूर तक अस्तित्व नहीं, लोक-भाषा की ऊष्मा नहीं, जिसका उत्सव-धर्मिता से कोई नाता नहीं, जबकि नवगीत या तो इन स्थितियों के माध्यम से जन के मन से जुड़ा है अथवा उसने इनकी अनुपस्थिति से उत्पन्न हुएशून्य को रेखांकित किया है। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि नवगीत बारहमासा या कैलेंडर-गाथा है अथवा प्रगति-विरोधी है। यह सही है कि इसमें जातीय अस्मिता के चित्राण के संदर्भ में अकसर अतीत उभरा है, अकसर कवि नोस्टैल्जिक भी हुए हैं, अकसर इसमें पुरा-बिम्बों का प्रयोग हुआ है, अकसर भारतीय मिथक वर्तमान के चित्रण के लिए आए है परन्तु ये स्थितियाँ इसी प्रकार प्रगति-विरोधी नहीं हैं, जिस प्रकार मिथकों के प्रयोग से त्रिालोचन जन-कविता के लिए अछूत नहीं हो जाते। जब नवगीतकार यह कहता है - 'ये शहर होते गाँव पहचाने नहीं जाते` तो इसका अर्थ यह नहीं है कि नवगीत विकास का विरोध कर रहा है। यहाँ तो संकेतित विकृतियों का ही, उल्लेख प्रासंगिक है। गुलाबसिंह गाँव की इस सांस्कृतिक शाश्वता को यदि यों रेखांकित करते हैं :
जलती यहाँ वहाँ बुझ जाती/आँच अलावों की
गोरी कभी साँवली दिखती/काया गाँवों की
तो वे उसके अंतहीन शोषण का इतिहास भी तो इस रूप में लिखते हैं :
शब्दों के हाथी पर/ऊँघता महावत है,
गाँव इधर/लाठी और भैंस की कहावत है
शीत-घाम का वैभव, रातों का अंधकार,
पकते गुड़ की सुंगध/धूल धुएँ का गुबार,
पेट-पीठ के रिश्ते/ढो रहा यथावत है
यह सही है कि नवगीत में 'पिछले दिन` हैं अर्थात 'छूटे हुए अतीत की कचोट` कुछ ज्यादा ही है। परन्तु क्या यह स्मृति-उद्वेग कुछ टूट जाने, कुछ छूट जाने के कारण नहीं हैं यह टूटना और छूटना क्या मनुष्यता का ही नहीं है? इसीलिए तो कुमार रवीन्द्र की गुहार लगाते हैं:
भाई, जा रहे हैं आप, हमारे शहर/वहीं रहते दिन पिछले
बूढ़ा बरगद वहाँ मिलेगा/खड़ा ऊँघता गली मोड़ पर
उसे पता है हर मकान का/कौन कहाँ पर किसका है घर
ढलता चाँद उसी के पीछे/सूरज रोज वहीं से निकले
वहीं मिलेगा भाई आपको/सपनों का भी पता ठिकाना
वहीं किनारे धूप मिलेगी/दिन भर बुनती ताना बाना
वहीं आरती की गूँजे हैं/वहीं घाट पर जल हैं छिछले
बात केवल अतीत की नहीं है। आशंकाएँ भविष्य को लेकर भी हैं। नवगीत जब जीवन में जातीय अस्मिता को अनुपस्थित पाता है तो चिंतित होकर सत्यनारायण के शब्दों में कह उठता है :
एका, आने वाला है कल समय कठिन
खेल खिलौने नहीं रहेंगे/रोबट होगा
जल के प्लावन में डूबा/अक्षय वट होगा
नहीं दिखेंगे कूल किनारे /नहीं पुलिन
दाँत समय के होंगे/ज्यादा ही पैने
बिखरे होंगे तोते मैनों के डैने
नहीं रहेंगे कथा कहानी वाले दिन
किलकारी पर कलरव पर/पहरे होंगे
मृग छोने सहमे ठिठके/ठहरे होंगे,
होंगे नहीं कुलाँचे भरते हुए हिरन
नवगीत को केवल अतीत-चर्चा मानने वाले 'सुधी जनों` को उस त्रास्दी को भी समझना होगा, जिसे आज का सामान्य जन झेल रहा है। उसकी तो यह भी विडम्बना है कि पीछे लौटने का उसके पास विकल्प ही नहीं रह गया है। योगेंद्रदत्त इस विडम्बना को यों चित्रिात करते हैं :
अब पीछे लौटना असंभव है/हम ने हर पिछला पुल तोड़ दिया
माना आगे जलता जंगल है/पीपल की भी ठंडी छाँह नहीं
इन सूनी अँधियारी रातों में/ थामेगा अब कोई बाँह नहीं
नवगीत में जातीय अस्मिता की चर्चा के साथ कुछ खतरे भी जुड़े हैं। उनके प्रति हमें सावधान रहना होगा। उत्सवों, पर्वों, पुरा-संदर्भों, इतिहास-प्रकरणों आदि के उल्लेख के आधार पर इस जातीय अस्मिता को साम्प्रदायिक संकीर्णता के साथ रखकर देखने की चूक का अंदेसा बना रहता है। नवगीत न केवल 'सेक्यूलर` काव्य है अपितु यह हर तरह की साम्प्रदायिकता का विरोधी भी है। हमनें पहले ही कहा था कि राजभक्ति की पर्याय राष्ट्रभक्ति नवगीत में नहीं है। है, तो बस देशप्रेम और यह उसके अनुभव का अंग है, पचास वर्षों की हिन्दी की छंदमुक्त कविता में अधिकांशत: देश का 'एरियल सर्वे` ही मिलता है पर नवगीत ने भारत को पैदल चल कर ही जाना-पहचाना है। वह बाबा आम्टे का आदर्श प्रस्तुत करता है। नईम का मालवा उनके गीतों में सप्राण रूप में उपस्थित है। वंशी और मादल में ठाकुर प्रसाद सिंह ने संथाल परगना को जीवंत कर दिया है। अनूप अशेष और श्याम सुंदर दुबे ने यदि अपने अंचल के गाँवों के जीवन की एक तस्वीर प्रस्तुत की है तो गुलाब सिंह के गीत इन कवियों की फोटोकॉपी नहीं हैं। बल्कि पूर्वाचंल की अलग तस्वीर उनमें है।
जनपरक गीतों में भी रमेश रंजक, नचिकेता या शांति सुमन के गीत भी एक दूसरे का दोहराव नहीं हैं। महेश अनघ का लोक अपनी तरह की मौलिकता लिए है। सत्यनारायण ने ग्राम-नगर की जिंदगी के समानांतर संदर्भ प्रस्तुत किये हैं तो माहेश्वर तिवारी ने वर्तमान की जटिलताओं के समानांतर जातीय अस्मिता को प्रस्तुत किया है। यहाँ तक कि इनकी अग्रज पीढ़ी के नवगीतकारों में यदि 'पुरवैया धीर बहो` जैसे गीतों में लोक का एक विशिष्ट रूप शंभुनाथ सिंह प्रस्तुत करते हैं तो वीरेन्द्र मिश्र सागर-संस्कृति का एक दूसरा ही लोक प्रस्तुत करते हैं। देवेन्द्र शर्मा 'इन्द्र` के गीत पुराबिम्बों का बेजोड़ वैशिष्ट्य लिए हैं, तो शिव बहादुर सिंह भदौरिया जन-संवेदना को अपनी तरह से साकार करते हैं। कैलाश गौतम ने अपसंस्कृति के गाँव को प्रस्तुत किया है तो दिनेश सिंह के रिश्तों की छीजन को व्यक्त करते गीतों की अपनी दुनिया है।
यश का छोटी-छोटी घटनाओं वाले दैनिक जीवन से जुड़ा अपना सांस्कृतिक बोध है और भारतेन्दु वर्तमान को अलग तरह से जन-साक्षेप बिम्बों में प्रस्तुत करते हैं। समग्रत: नवगीत संस्कार का काव्य है और इसके लिए वह शर्मिंदा नहीं है। स्वर्गीय उमाकांत मालवीय ने लिखा था ''अपने एकांत क्षणों में मैं बहुधा बड़े खेद से अनुभव करता हूँ कि मेरी पीढ़ी संस्कारों से अपेक्षाकृत बहुत ही विपन्न है ....`` मालवीय जी की यह खिन्नता तत्कालीन नयी कविता के संदर्भ में सही है पर उन्होंने जिस परम्परा से अपने को जोड़ा था उस नवगीत-धरा में संस्कार-जन्य जातीय अस्मिता के काव्य को हीप्रमुखता मिली है।
दूसरी भ्रांति इस संदर्भ में यह हो सकती है कि जातीय अस्मिता का चित्रण करने वाला नवगीत काव्य पलायन का काव्य है। परम्परा और संस्कारों से जुड़े होने का अर्थ अतीतजीवी होना नहीं है। गत दो दशकों में राष्ट्र साम्प्रादायिकता और आतंकवाद के तीखे दंशों को झेलता रहा है। नवगीत काव्य में इन संदर्भों को जिस शिद्दत के साथ चित्रित किया है, वह उसकी युगबोध की सजगता का प्रमाण है। बाजारवाद हो या भूमंडलीकरण, स्त्री-विमर्श हो या दलित विमर्श, उत्तर उपनिवेशवाद हो या उत्तर आधुनिकता, नवगीत में न तो खोल में छिपने की स्थिति है, न दृष्टिभ्रम की। हाँ, क्रांति विरोधियों के षडयंत्र जब सफल हो जाते हैं तब नवगीतकार आहत तो होता ही है। उमाकांत मालवीय ने इस विडम्बना को यों रेखांकित किया था:
कंधें पर सैंकड़ों/सलीब लिये प्रश्न के
सूर्योदय होते हैं/हारे थके
सोख गयी स्वाति मेघ/कुछ कृतघ्न सीपियाँ,
वांझिन हो गई,/किस नियोजन से क्रांतियाँ
कुहरों की शिकने है/मस्तक पर घाम के
उत्तर की तलबगार द्वार पर दस्तकें
नवगीत की पलायन-विरोधी संघर्षशील प्रवृत्ति के दर्शन इसकी सहवर्ती धरा जनगीत में होते हैं जो खेल-खलिहान में किसान के संघर्ष के माध्यम से जातीय अस्थिरता को चित्रिात करती है। मैं जनगीत को नवगीत के अंतर्गत ही मानता हूँ।
कविता में जातीय अस्मिता की अभिव्यक्ति को लेकर एक तीसरा सवाल यह उठाया जा सकता है कि आज के उत्तर आधुनिक युग में जब 'इतिहास` और 'परम्परा` ही अप्रासंगिक हो गए यहाँ तक कि विचारधराओं के स्थगन के साथ विचार का भी अंत हो गया है, तब स्मृति-आश्रित जातीय अस्मिता की क्या प्रासंगिकता है? एक स्मृतिभ्रष्ट राष्ट्र की दानवीयता और नृशंसता हम इराकऱ्युद्ध में देख चुके हैं। जब-जब हम सह अस्तित्व के इतिहास की उपेक्षा करते हैं, तभी ऐसीस्थितियाँ पैदा होती हैं, जिसे समय के संदर्भ में गवाही देते हुए गहरे दु:ख के साथ नईम ने रेखांकित किया है:
प्यार से मिलते हुए दिन/ईद से उत्सव कभी
आज बल्लम बर्छियों स/भेंटते मुझको सभी
नवगीत ने अंतराष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय संदर्भों में स्मृतिभ्रष्टता से उत्पन्न ऐसी स्थितियों की ओर यदि ध्यान आकर्षित किया है तो इसे हिन्दी कविता की उपलिब्ध ही माना जाना चाहिए। इतिहास और परम्परा की हत्या के क्रम में हमारी भाषाओं और बोलियों को दफ्रऩ करने का जो अंतर्राष्ट्रीय षड्यंत्र है, नवगीत ने उसका भी प्रतिरोध किया है। ओसारा, डीह, मसुरी, माँडने कढ़ा, शिकनी, जोतदार, सूप, निबौरी, उज्जर-वाजर, दिया देवी, बंसवारी, उजरौटी, पाग, छानी-छप्पर, टेंट, खपरैल, मड़ैया, टूसे, जोन्हा, पोथी, कजरी, चैता, बिरहा, क्वार, बासन जैसे हजारों ऐसे शब्द हैं जिनमें लोक की संवेदनाएँ धड़कती हैं, जिनके मरने से कविता की जन-संवेदनाओं को व्यक्त करने की शक्ति ही खत्म हो जाएगी। नवगीत कविता ने ऐसे असंख्य शब्दों को जिंदा रखा है। इसी प्रकार मिथक कविता को अर्थगत बहुस्तरीयता प्रदान करते हैं। नवगीत में भाषा के संदर्भ में मिथकीय तत्त्वों का प्रयोग जातीय अस्मिता का एक और रूप प्रस्तुत करता है।
नवगीत की जातीय अस्मिता के संदर्भ में एक उल्लेखनीय तथ्य यह है कि शायद ही गत पाँच दशकों की हिन्दी कविता की किसी अन्य काव्य-सरणी में नदी के रूपक का इतना प्रयेाग हुआ है, जितना नवगीत में। भदौरिया जी चाहते हैं कि नदी का बहना मुझमें हो, वीरेन्द्र मिश्र सावधन करते हैं- 'नदी के अंग कटेंगे तो नदी रोएगी।` इन्द्र जी अनुभव करते हैं- 'नदी की देह में छाले पड़े`, माहेश्वर तिवारी नदी के अकेलेपन को महसूसते हैं, योगेन्द्रदत्त शर्मा ने गाया था यमुना को रेत रही घेर साँवरे, प्रस्तुत लेखक की चिंता है कि कर कत्ल नदी का ध्येय सरी का फैलना बस रेगिस्तान, यश कहते हैं सब नदियां अपनी गहराई में रोती हैं, निराला ने कहा था नद के उद्गार घटे, कैलाश महसूसते हैं ओझल नदी के कूल से हम छू गए, श्रीकृष्ण को दूध की नदी के जहर होने का मलाल है, कुँवर बेचैन कुहरे भरी नदी में मां की काया को देखते हैं, शंभुनाथ जी ने अनुभव किया था जहाँ बह रहा है नदियों में फौलाद, सत्यनारायण नदी-सा बहता हुआ दिन तलाश रहे हैं, विद्यानंदन राजीव बहती गर्म नदी की दहकते सूरज की बीच की विडम्बना को प्रस्तुत करते हैं। विनोद श्रीवास्तव कहते हैं-'आज नदी में पाँव डुबोते याद हमें किरणों की आई। वास्तव में एक शाश्वती परम्परा ही यह नदी है। जातीय अस्मिता में उसी का अस्तित्व है और नवगीतकार तमाम सवालों से टकराता हुआ, वर्तमान के सारे संकटों से भेंटता हुआ, अपने वक्त के रूबरू खड़ा होकर जो लड़ाई लड़ रहा है, उसमें इस परम्परा की प्रेरद नदी का होना जरूरी है। कृष्ण बक्षी के शब्दों में कहें: 'गढ़ सके तो गढ़/ बुन सके तो बुन/ एक भाषा है नदी की।`
यों तो समकालीन हिंदी कविता में नवगीत की उपलिब्ध के अनेक पक्ष हैं, जातीय अस्मिता का प्रभावपूर्ण चित्रण भी इसकी उपेक्षा को असंभव बनाता है। १६ मई २०११ *** नवगीत- परिप्रेक्ष्य और प्रासंगिकता - डॉ. अनिल कुमार प्राथमिक अवस्था में गीत मुख्यतया गेय था। उसके भाव-प्रसार के लिए काव्यत्व का आग्रह नहीं था। मिलन-विरह, हर्ष-शोक, आनन्द-विषाद का चित्र भावुकता द्वारा नहीं, बल्कि संगीत की भावाकुलता, भावना की अनुरूपता तथा गेयता का आधार लेकर उपस्थित हुआ और अतीत में इसी तरह अनुभूति बोधक गीतों का विकास होता रहा।
जिस प्रकार लोकगाथाओं का साहित्यिक रूप महाकाव्य, खण्डकाव्य आदि प्रबन्ध- काव्यों में प्रकट हुआ, उसी प्रकार व्यक्तिगत हर्ष-शोक से परिपूर्ण गीतों का साहित्यिक रूप गीतिकाव्य या प्रगीत मुक्तकों में स्थान पाया। वस्तुतः लोकगीत ही इन साहित्यिक गीतों का आधार है। वाल्मीकीय रामायण गेय है और लव-कुश ने, जैसा कहा जाता है, राम के सामने उसका सस्वर गान किया था। अतएव यह कहना अनुचित नहीं होगा कि गीत भारतीय कविता का मूल स्रोत है। यदि इसके इतिहास में झाँके तो दृष्टि वेदों, उपनिषदों तक पहुँच जाती है। विश्व के प्राचीनतम ग्रंथ ऋग्वेद की ऋचाएँ, गायत्री और अनुष्टुप आदि छंद रूप में ही रचा साहित्य है। इसलिए गीत को सृष्टि की आरम्भिक सर्जना समझना चाहिए।
बदलते काल परिप्रेक्ष्य में गीत विधा में अत्यधिक बदलाव आया। युगानुकूल परिवेश एवं परिस्थितियों के प्रभाव के कारण गीत का अंदाज ही नहीं मिजाज भी बदला है। किन्तु इतने बदलावों के बावजूद भी अनुभूति की लयवत्ता की सहज अभिव्यक्ति आज भी गीत में बनी हुई है। यह बात अलग है कि पारम्परिक गीतों में ठहराव और आत्ममुग्धता की स्थिति उत्पन्न हो जाने के कारण छान्दस काव्य को रचनात्मक गति देने की प्रयोजनीयता को ध्यान में रखकर साठोत्तरी गीत काव्य की समष्टिवादी प्रवृत्तियों के अनुकूल विकसित करने की विवशता गीतकारों के सामने आ खडी हुई थी और वह विवशता इसलिए हुई कि स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात सामाजिक परिप्रेक्ष्य से उत्पन्न विसंगतियों को गीत के पारम्परिक रूप में अभिव्यक्त करना संभव नहीं था।
नवगीत के पुरोधाओं को इस बात से परहेज नहीं होगा कि नवगीत रचना का कारण हिन्दी कविताओं के नगर के यांत्रीकरण एवं महानगरीय जीवन की दुर्दान्त निर्ममता के विरोध में हुआ। जीवनगत विसंगतियों, मूल्य-क्षरण बाजारवाद, वैश्वीकरण के दुष्परिणाम, रिश्तों में पनपती स्वार्थपरता आदि गीत के छंद में बंद बनने लगे। वास्तव में हिन्दी कविता की अत्याधुनिकता की परिस्थिति में गीत अपने नयेपन के साथ अनेक आयामों में और अनेक कालखण्डों में विकसित हुआ है। भारतेन्दु काल के नाट्यगीतों में, द्विवेदीकाल के राष्ट्रीय गीतों में, छायावादी काल के प्रकृतिवादी गीतों में और प्रगतिवादी काल के वर्ग संघर्ष गीतों में नवगीत की ध्वनि सुनी जा सकती है।
सन् १९५० से ५५ के बीच गीतों में शिल्प की नवीनता, लोकतत्त्व, प्रकृति-साहचर्य और सामाजिक मनःस्थिति का विशेष रूप से सूत्रपात हुआ। फलस्वरूप १९५८ में जब ’गीतांगिनी‘ की सम्पादन राजेन्द्र प्रसाद सिंह के द्वारा हुआ तब उन्होंने उसकी भूमिका में नवगीत के लिए जीवन-दर्शन, आत्मनिष्ठ, व्यक्तिबोध, प्रीतितत्त्व और परिसंचय जैसे पाँच तत्वों की प्रतिष्ठापना की तथा गीतों की कालातीत संभावनाओं का ध्यान कर नवगीत को नवगीत ही रहने दिया।
वास्तव में नवगीत एक ऐसा संबोधन है, जिसकी नवीनता कभी समाप्त नहीं हो सकती। क्योंकि इसके मूल में तनाव रहित मन है। इसके संयोग से साहित्य और संगीत का एकीकरण हो जाता है तथा रचनारत होकर गीत और नवगीत एक महत्त्वपूर्ण अर्थ में परिवर्तित हो जाते हैं। इसलिए किसी भी गीतकार के मनोगायन का यह विशिष्ट कारण भी बन जाता है। इसकी चेतना इसके नये बिम्बों, प्रतीकों, नये संकेतों, भाषा के नये प्रयोगों, मिथकीय बिन्दुओं के नये आयामों आदि के प्रयोगों में एक ऐसा आकर्षण प्रस्तुत करती है, जो अनायास ही मन को चिन्तन की लयात्मकता में बाँध लेता है। इन गुणों के अतिरिक्त इसमें वस्तुनिष्ठ और आत्मनिष्ठता का संयोग इस विशिष्टता के साथ समाहित होता है कि इसके नयेपन के धूमिल होने की संभावना भी संभावना बनकर रह जाती है।
नवगीत वर्तमान काल का सबसे विशिष्ट जनाग्रही अनुभूतियों का व्याख्याता है। यह विधा आज इतना विविधर्मी है कि जीवन से संबंधित तमाम अनुभूतियाँ इसकी परिधि पर निरन्तर व्याख्यायित होती रहती है। दरअसल, ग्राम्य जीवन एवं नगरीय वातावरण के तादात्म्य से समाज में विषमता, विद्रूपता, विसंगति, शोषण-उत्पीडन, दुःख-दर्द, मूल्यहीनता, सांस्कृतिक पतन, मर्यादाओं का अंत, मंदी की मार, विवश बुढापा, बाजारवाद, वैश्विक अवधारणा, भूमंडलीकरण का दुष्प्रभाव, भाषा-प्रान्त-सम्प्रदाय आदि की जो भ्रांतिमूलक अवधारणाएँ उत्पन्न होती हैं, उन्हीं से आहत होकर नवगीतकारों की सर्जनाएँ गति प्राप्त करती हैं। मुझे यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं हो रहा है कि नवगीत समकालीन जीवन की सही परख है। अपनी विशिष्ट भाषा, नवीन शिल्प और नूतन प्रतीक, बिम्बों से समयानुकूल कथ्य सम्प्रेषण की अद्भुत कला के कारण यह समकालीन सत्यता को अभिव्यंजित करने का उपयुक्त सोपान है।
’नवगीत और उसका युगबोध‘ में डॉ. नामवर सिंह तथा अन्य कई प्रगतिशील और जनवादी आलोचकों ने गीत को भी कविता मानने का उपक्रम किया है। किन्तु गीत की अस्मिता स्तरीय कविताओं के भीतर समाहित होती है। कविता में गीतात्मकता गुण है और गीतात्मक आन्तरिकता की रूपात्मक अभिव्यक्ति गीत है। गीत का रूपाकार, रचना-प्रविधि, रचना-प्रक्रिया, रचनात्मक उद्देश्य और प्रभावान्विति कविता से एकदम पृथक है। यहाँ इतना और जोडूँ कि गीत कविता के अन्दर एक विधा है। कुमारेन्द्र पारसनाथ सिंह ने कविता और गीत के अन्तर को स्पष्ट करते हुए कहा है, ’’गीत का कविता से एक अलग ढाँचा होता है, जो ध्वनि से अपनी तथ्यपरक व्यंजनात्मकता के सहारे एक विशिष्ट आवर्त्त से मुखरित होकर भावप्रकाश करने में समर्थ होता है।‘‘ नथाली सरात के अनुसार ’’एक विधा दूसरी विधा को समय-समय पर प्रभावित करती रहती है, किन्तु इस प्रभावात्मकता के कारण इन विधाओं की बुनियादी अनिवार्यताएँ समाप्त नहीं हो जातीं। अर्थात् गीत और कविता एक नहीं है, बल्कि पूरक है।‘‘ इस संदर्भ में अरुण कमल की यह उक्ति अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है कि ’’गीत कविता का एक रूप है। श्रेष्ठ कविता जब संगीत के निकट आती है तब गीत की रचना होती है और वह कवित्वमय गीत होता है।‘‘
वस्तुतः गीत में आवश्यक विस्तार तथा लयात्मक छन्द योजना होती है। इसके साथ ही गीत की प्रतिबद्धता एक ही विचार, भाव, अनुभूति, संवेदना और मनःस्थिति में निहित होती है। काव्यशास्त्र के आचार्यों का मत है, छन्द कविता के चरण हैं, भाषिक अनुशासन उसकी लय है तथा बिम्ब और प्रतीक उसके रूप हैं और इन्हीं तीनों के संयोग से जिस नाद की उत्पत्ति होती है, उसी में गीत अंकुरित होता है। अर्थात् लय-ध्वनि, संगीत और ताल के कुशल उपयोग से श्रेष्ठ गीत की उत्पत्ति होती है।
नवगीत में शिल्प एक महत्त्वपूर्ण अवयव है। अपनी इसी विशिष्ट शिल्पकला के कारण गीत नवगीत बना। विचारों की संश्लिष्टता, ताजगी, प्रयोगधर्मिता नई भाषा और बिम्बों के विशिष्ट समायोजन से इस विधा का गठन हुआ। इसमें कथ्य के अनुरूप ही भाषा, शिल्प, छंद विधान और प्रतीक आदि बिम्बात्मक उपकरण उत्पन्न होते हैं। भाषा के कुशल प्रयोग से ही कथ्य में धार पैदा होती है। भाषागत सरलता में जब लोक जीवन के मुहावरे छंद में ढलते हैं, तब नवगीत का वैशिष्ट्य बोध अपने आप परिलक्षित होता है।
उपर्युक्त विवेचना के आधार पर नवगीत में समसामयिक परिवेश और परिस्थितियों का समुच्चय बोधक तत्त्व अवश्य होना चाहिए। इसमें सर्जनात्मकता की ताजगी, विचार और संवेदना की गहराई, समय की टंकार-सी धुन, अत्याधुनिक जीवन की विसंगतियों एवं क्रूर-अमानवीयताओं के विरुद्ध प्रभावकारी स्वर अभिव्यंजित होना भी आवश्यक है। समकालीनता से ओत-प्रोत ताजा-तरीन अभिव्यक्ति के साथ जनवादी प्रवृत्तियों तथा यथार्थ जीवन संघर्षों की व्याख्या इसके नाम की सार्थकता को अद्वितीय बनाने में सफल भूमिका का निर्वाह करेगी।
आज वह जीवन स्वरूप जिसे भारतीय जनमानस स्वीकारता है, नवगीत उसे अपनी धारदार कहन से अनवरत उपादेय और उपयुक्त बनाता है तथा अमानवीय क्रियाकलापों को बेनकाब कर जिन जीवन-मूल्यों की प्रतिष्ठापना का प्रयास करता है, वही उसकी विशिष्ट उपलब्धि है। अत्याधुनिक यथार्थपरक कहन (अभिव्यक्ति) जिसमें नवजीवन की अनेकानेक चिन्ताओं के चिंतन का सहन (अनुभूति) प्रतिपादित होता है तथा समय सापेक्ष, समाज सापेक्ष एवं लोकमन की भावनाओं का जो व्याख्यान प्रस्तुत किया जाता है, उसी में इसकी दीर्घकालीन नवता का उन्मेष परिलक्षित है। कदाचित यही कारण है कि थियोडोर अडर्नो ने कहा है, ’’गीत की पुकार का मर्म वही समझ सकता है जो उसकी आत्मपरकता में अन्तर्निहित मानवीयता की आवाज सुन पाता है। व्यक्ति की अनुभूति की संरचनाएँ जिसमें भाव, विचार, संवेदनाएँ, भाषा और शिल्प समाहित हो, अभिव्यक्त होने पर गीत होता है। गीत का यही संस्कार, आंतरिक गुण और अस्मिता है और इसी में उसकी समग्रता का बोध भी निहित है।‘‘
गौरतलब बात यह है कि जब गीतकार मानवीय मन की पीडा, करुणा, सुख-दुख, आक्रोश-विद्रोह आदि को अपनी अनुभूति के स्तर पर गहराई से अनुभव करता है और उन्हें अपने गीतों में पूरी निष्ठा के साथ समेट कर अभिव्यक्त करता है, तब ग्रहणकर्त्ता के मर्म को स्पर्श करने में वह समर्थ होता है। जन-जीवन में जो कुछ वह देखता है और अपने संवेदन तंत्र पर उसकी जो झंकार सुनता है तथा अपनी चेतना पर सामाजिकता के लिए जो दबाव झेलता है, उसे ही नवगीत में ढालकर जन-मन के लिए परोसता है। वास्तविकता यह है कि समकालीन जन्दगी की असली संवेगात्मक अनुभूतियों को अभिव्यंजित करने में नवगीत एक कुशल विधा है। यथा -
दो पहर में
जेठ बरसाता कहर जब,
गर्म होकर
आग बन जाता पहर तब,
कहीं रिक्शा
कहीं ठेला ठेलते हैं।
लाल आँखें
भाल पर लादे पसीना,
शुष्क पथ पर
पाँव नंगे, तान सीना,
लू लपट में
मौत से हम खेलते हैं।
डॉ. राजेन्द्र गौतम के अनुसार, ’’वस्तुतः यांत्रिकता एवं नगर-बोध ने ही नवगीतकार को उन अनुभवों के साथ जुडने को प्रेरित किया है, जनकी संजीवनी शक्ति अक्षय है। नवगीत में उस समाज निरपेक्ष ललित-सौंदर्य का चित्रण नहीं है, जिसकी सीमा कवि की आत्ममुग्धता तक जाकर समाप्त हो जाती है, वरन् नवगीतकार उस सौंदर्य का स्रष्टा है, जिसका साक्षात्कार उसने स्वयं जीवन की उन्मुक्तता में किया और उसका वह अनुभव सामाजिक प्रासंगिकता में जीवन्त सुरुचिपूर्ण एवं संवेदनात्मक है।‘‘ डॉ. गौतम का यह कथन नवगीत अथवा नवगीतकारों के लिए सूक्ति नहीं है, बल्कि अनुभूति की विशद्ता में डूबी हुई भावना की समझ है। गहरे अध्ययन के चरमोत्कर्ष पर ठहरी हुई सामाजिकता के चिन्तन की शोधपरक व्याख्या है। सामाजिक जीवन की दीर्घकालिक अँधेरे और कुहासे को समझने की कशमकश में जिस आत्मसंघर्ष की पीडा गीतकार को झेलनी पडती है, उसका रसोद्रेक है। मैंने भी अपने गीतों में इस अनुभव को रूपायित किया है -
वंशीवट की माया उजडी
सूखे सभी कदंब,
गई जवानी हर करौंद की
रोते जामुन अंब,
तूँत, बेल को कौन पूछता
इमली पेड भले ।
अब खजूर के दिन आये हैं
गया नीम मुँह फाड
मलय घिरा सर्पों से रोता
खडा विहँसता ताड
अमलतास अब नजर न आता
पीपल गये तले ।
उपन्यास विधा में जीवन के सुख-दुख को विस्तार से समेटने का अधिक अवसर मिलता है। भाव की स्वछन्दता में स्मृति की सिहरनों को सम्पूर्णता से बाँटने-बिखेरने में सहुलियत होती है। आगत-अनागत को चित्रित करने के लिए अनेक सुविधाएँ प्राप्त होती हैं, किन्तु गीत में इतना विस्तार दोष माना जाता है और नवगीत में तो इसकी गुंजाइश ही नहीं है। क्योंकि नवगीत में आत्मकथा कहने की प्रवृत्ति नहीं है। यह सच है कि गीत में स्वानुभव का प्राथमिक महत्त्व है, किन्तु विस्तृत संदर्भों में सामाजिक यथार्थ का ही अवलंबन श्रेयस्कर है। वस्तुतः नये प्रतीक, नये बिम्ब के सहारे कथ्य को सामयिक यथार्थ से जोडकर सामाजिक जीवन को चित्रित करना नवगीत का उद्देश्य है और यह मुझे इतना प्रिय प्रतीत हुआ कि मैं नवगीत का हिमायती बन गया -
जन्दगी नित
लौह, पत्थर
हो रही है,
हर कदम पर
आदमीयत
खो रही है,
वृद्ध थाली
प्लेट बचपन
धो रहा है।
समकालीन गीतकारों में दो श्रेणियाँ आज स्पष्ट देखने को मिलती हैं, एक वे हैं, जो छंदों को महत्त्व देकर उसकी मर्यादा में रहकर गीत लिखते हैं और दूसरे वे हैं, जो छन्द में नये प्रयोग करते हैं और लयाश्रित गीत लिखते हैं। अब एक तीसरी श्रेणी भी पनप रही है, जो छन्द और लय दोनों को नकारने की कोशिश कर रही है। नव अंकुरित गीतकारों की दलील है कि नवगीत को अधुनातन संवेदनाओं को व्यक्त करने के लिए छन्द और लय के कटघरे को तोडना आवश्यक हो गया है अन्यथा गीत की लिजलिजी भावुकता उसका पीछा नहीं छोडेगी। यह दलील एक लम्बे बहस का मुद्दा है। इसलिए यहाँ इतना कहना उपयुक्त होगा कि भारतीय संस्कृति की गंध में गंधाये गीतों की सर्जना को समाज के जीवन-मूल्य, संवेदना का सत्य, सामयिक यथार्थ स्वयं ही लिजलिजी भावुकता से मुक्त होकर नवता प्रदान करने में सहायक होते हैं। गीत मानवीय संवेदनाओं के समीप होने के कारण छन्द और लय से कटकर बेतुका और बेताला प्रतीत होता है। मिसाल के तौर पर गिरिजा कुमार माथुर के द्वारा ’वी शैल ओवर कम‘ का अनुवाद ’हम होंगे कामयाब‘ अपनी गीतात्मकता और लयात्मकता के कारण ही मानवीय समाज का हृदय छूने में कामयाब हुआ।
उपर्युक्त विवेचना को ध्यान में रखकर यह कहना मौजू महसूस होता है कि नयेपन के लिए छन्द तोडना आवश्यक नहीं, बल्कि उसकी सीमा में रहकर आत्मा और हृदय की मुक्तावस्था को शब्दों, प्रतीकों, बिम्बों तथा लोक सम्मत मुहावरों के द्वारा नयेपन के प्रति प्रतिबद्ध होना आवश्यक है। क्योंकि बिम्ब, प्रतीक एवं मिथक नवगीत के वे नियामक हैं, जिनके कारण अर्थवत्ता नई अनुभूति की महत्ता में स्नात होकर अन्तस् के सौंदर्य को प्रकट करती है। वस्तुतः छन्द और लय गीत में नाद तथा नृत्य उत्पन्न करने के सर्वश्रेष्ठ माध्यम हैं। मेलाये, रींबो, पाउन्ड, इलियट, रिचर्डस जैसे पाश्चात्य काव्य शिल्पियों ने भी इन्हीं तत्त्वों पर अधिक जोर दिया है। मैंने स्वयं भी अपने गीतों में इसका ध्यान रखा है -
जुगनुओं से
कालिमा चकमक हुई
हर मुंडेरे दीपिका
इतरा उठी
फुलझरी हर खेत में
छितरा उठी
चाँद-सा मुखडा खिला
हर द्वार पर
कमल-सा घर
झील का आँगन हुआ।
साहित्य में भाव और भाषा दो ऐसे तत्त्व हैं, जो किसी रचना को रचना बनाते हैं। अनुभूति की सच्ची अभिव्यक्तिउसे सार्थक बनाती है। शिल्प युक्त कथ्य के कारण वह शाश्वत सिद्धि अर्जित करती है तथा छन्द एवं लय रसिकों को आनन्द देने में समर्थ होते हैं -
तुम हँसे तो
दीप मंदिर के जले हैं ।
रोशनी से
पल उदासी के घटे हैं,
चेहरे से
दुखों के बादल छँटे हैं,
स्वप्न फूले
पेड मरुथल के फले हैं।
नवगीत अपने आगम परिवेश की परिस्थितियों में जन जीवन के साथ सार्थक संवाद और सम्फ कार्य करने की दिशा में पुरअसर साहित्यिक माध्यम होगा। क्योंकि नवगीत में विशुद्ध ग्लोबल चिन्तन से लेकर लोकरंजन तक की व्याप्ति है। पारिवारिक और सामाजिक जीवन में भी नवगीत और सम्प्रेषणीयता के कारण अधिक प्रिय है। अस्तु, यह कहना ही पर्याप्त नहीं होगा कि नवगीत का भविष्य अत्यन्त उर्वर और उत्साहवर्द्धक है, अपितु अपने नवीन शिल्प और यथार्थपरक अभिव्यक्ति के कारण वह कविता के आधुनिक रूप का संवाहक है। अपनी गहरी अनुभूति के अछूते पहलुओं के चिन्तन का तथा आदमी के मनोभावों के विशद् भाव का वाहक है। ८ अगस्त २०११ ***
नवगीत पाँचवें दशक से सातवें दशक तक -उमाशंकर तिवारी नवगीत का वास्तविक प्रादुर्भाव नयी कविता के युग में अर्थात सन १९५० के बाद हुआ। तब से लेकर अब तक नवगीत अपने वस्तु तत्व एवं शिल्प में निरंतर विकास करता हुआ एक सुनिश्चित काव्य-धारा के रूप में प्रतिष्ठित हो चुका है। उसकी इस विकास-यात्रा को तीन स्पष्ट चरणों में विभाजित किया जा सकता है:
१. प्रथम चरण का नवगीत (१९४५ से १९५५ तक):
इस काल में गीतिकाव्य नवीन रूपाकार में ढलकर पूर्ववर्ती गीतों से भिन्न रूप में प्रतिष्ठित हुआ। इस युग के जिन कवियों ने गीत-विधा को अपनाया, उनमें से अज्ञेय, शम्भुनाथ सिंह एवं त्रिलोचन ने, जो छायावादी ढंग की कवितायें पर्याप्त लिख चुके थे, गीतिकाव्य को नयी दिशा में मोड़ने का प्रयत्न किया। इसी तरह शमशेर बहादुर सिंह, केदारनाथ अग्रवाल और भवानी प्रसाद मिश्र जैसे कुछ इने-गिने कवियों ने प्रयोगवादी काव्य के दौर में ही गीतिकाव्य के क्षेत्र में कुछ नवीनता और ताज़गी लाने का प्रयास किया था। इस तरह नयी कविता के एक आन्दोलन के रूप में आने के पूर्व अर्थात सन १९४५ से १९५० तक नवगीत का प्रारम्भिक रूप सामने आ गया था।
अज्ञेय ने सन १९४५ के बाद प्रयोगवादी रचनाओं के साथ गीतों में भी नये प्रयोग प्रारंभ किये। ऐसे गीत उनके 'इत्यलम्' (१९४६) और 'हरी घास पर क्षण भर' (१९४९) नामक काव्य-संकलनों में संगृहीत हैं। इन गीतों में कुछ परंपरागत, सममात्रिक छंदोंवाले तथा टेक युक्त हैं, कुछ में विभिन्न चरणों की 'टेक' और छंद-योजना अलग-अलग है और कुछ मुक्त छंदवाले गीत हैं। उनके 'ओ मेरे दिल' और 'शाली' परंपरागत छंद-योजना वाले नवगीत हैं तथा 'जैसे तुझे स्वीकार हो।' 'हेमन्त बयार, माघ फागुन चैत' 'आषाढ़स्य प्रथम दिवसे' और 'जागरण' आदि गीत मुक्त छंद से युक्त टेक पद्धति वाले गीत हैं। उन्होंने लोक जीवन के प्रभावों को गीत-रूप में व्यक्त करने की पद्धति प्रारंभ से ही अपना ली थी जो 'इत्यलम्' के 'पानी बरसा' शीर्षक गीत के रूप में दिखलाई पड़ता है। इसी तरह शंभुनाथ सिंह के काव्य-संकलन 'दिवालोक' (१९५३) में व्यक्तिवादी स्वच्छन्दतावादी गीति शैली के साथ-साथ ऐसे गीत भी संगृहीत हैं जो भाषा, बिम्ब-योजना तथा गेयता-सभी दृष्टियों से नवगीत के प्रारम्भिक रूप प्रतीत होते हैं। उनमें से 'प्रीति-धारा', 'आज', 'आकाश-बेल', 'एक क्षण', 'क्षणों के फूल', और 'चकाचौंध' शीर्षक गीत टेकयुक्त काव्य-संकलन प्रकाशित हुआ जिसमें गीतों में नये-नये प्रयोग किये हैं। फिर उनके तत्कालीन गीतों का समग्र प्रभाव यही पड़ता है कि कवि के कथ्य में सूक्ष्मता और गहराई कम है क्योंकि उनके कुछ गीतों में अति सामान्यता है जिसे सतहीपन भी कहा जा सकता है और कुछ में निराला का स्पष्ट अनुकरण दिखलाई पड़ता है फिर भी उपर्युक्त संग्रह के 'नीम में नव फूल आये', 'धूप सुंदर', 'हरा भरा संसार, 'आज मैं अकेला हूँ', 'स्वस्थ तन, स्वस्थ मन' आदि गीत 'नवगीत' के निकट दिखलाई पड़ते हैं।
इसी तरह प्रथम चरण के नवगीतों की विशेषता यह है कि उनमें छायावादी भाव-भूमि, भाषा और छंद-योजना का परित्याग कर दिया गया। प्रेम-संबंधों की सीधी अभिव्यक्ति, संवेदनाओं की अछूती दिशा तथा सर्वथा नवीन शब्दावली के कारण ही ये गीत 'नवगीत' माने जा सकते हैं। अज्ञेय में लोक-जीवन के प्रभावों को गीत-रूप में व्यक्त करने की प्रवृत्ति प्रारंभ से ही वर्तमान थी। यह प्रवृत्ति अन्य कवियों में विकास के दूसरे चरण में दिखलाई पड़ती है।
२ द्वितीय चरण का नवगीत (१९५५ से १९६५ तक):
नवगीत को 'नयी कविता' के काल में ही वास्तविक प्रतिष्ठा प्राप्त हुई क्योंकि इस काल के सप्तकीय तथा सप्तकेतर कवियों में से कई कवियों ने 'गीत' को नया रूपाकार देने का प्रयास किया। नवगीत के प्रथम चरण के कवियों में से अज्ञेय और शंभुनाथ सिंह ने इस काव्य-प्रवत्ति को दृढ़तापूर्वक अपनाते हुए और भी अग्रसर किया और साथ ही 'गीत' के लिए एक ऐसा वातावरण प्रस्तुत किया जिसके परिणामस्वरूप 'नयी कविता' के उत्साही कवियों ने भी 'नवगीत' का पल्ला नहीं छोड़ा। इस काल के सप्तकीय कवियों में भवानी प्रसाद मिश्र, गिरिजाकुमार माथुर, धर्मवीर भारती, नरेश मेहता, केदारनाथ सिंह, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, मदन वात्स्यायन तथा सप्तकेतर कवियों में से ठाकुर प्रसाद सिंह, वीरेन्द्र मिश्र, रामदरश मिश्र, परमानन्द श्रीवास्तव आदि ने 'नवगीत' को नयी दिशा में मोड़ने का प्रयास किया। अज्ञेय के 'बावरा अहेरी' का 'जो कहा नहीं गया', 'अन्धड़' तथा 'यह दीप-अकेला' गीतों में आधुनिक भाव-बोध को प्रतीकात्मक ढंग से व्यक्त किया गया है। उन्होंने प्रकृति के लैण्डस्केप और नागरिक जीवन के क्लान्त-श्रान्त स्वरूप का चित्रण तटस्थ होकर नहीं, अनुभूत क्षणों के भोक्ता के रूप में किया है। इसी प्रकार शंभुनाथ सिंह के माध्यम मैं (१९७५) के कुछ गीत लोकगीतों के जीवंतसंस्पर्श और ग्राम्य जीवन की ताज़गी से भरे हुए हैं। सप्तकीय कवियों में से नरेश मेहता, हरिनारायण व्यास, धर्मवीर भारती, विजयदेव नारायण 'साही', केदारनाथ सिंह और कुँवर नारायण के गीतों में छायावादी कल्पनाशीलता और किशोर रोमानी भावना वर्तमान है फिर भी उनके गीतों में कुछ नवीनता और ताज़गी अवश्य है। भारती और केदारनाथ सिंह के कई गीत लोक गीतों की शैली से प्रभावित हैं और ग्राम्य जीवन की सोंधी गंध से युक्त होने के कारण 'नवगीत' की श्रेणी में आते हैं। भारती की 'फागुन की शाम', डोले का गीत, बेला महका, बोवाई का गीत और केदारनाथ सिंह की दुपहरिया, फागुन का गीत, पात नये आ गये, 'धानों का गीत' और 'रात' शीर्षक कविताएँ भी इसी प्रकार की हैं। द्वितीय और तृतीय सप्तक में संकलित भारती, केदारनाथ सिंह और सर्वेश्वर के गीत भी लोक धुनों पर ही आधारित हैं।
तीसरा सप्तक के प्रकाशन काल (सन १९५९) तक नवगीत पूर्णतः प्रतिष्ठित हो गया। इसका प्रमाण यह है जहाँ तारसप्तक में इने-गिने ही गीत हैं और दूसरे सप्तक में भी गीतों की संख्या अधिक नहीं है, वहाँ तीसरे सप्तक में गीतों की संख्या बहुत अधिक है। तीसरे सप्तक में प्रयाग नारायण त्रिपाठी को छोड़कर शेष सभी कवियों ने पर्याप्त संख्या में गीतों की रचना की ओर विशेष उन्मुखता दिखाई जैसे ठाकुर प्रसाद सिंह, वीरेन्द्र मिश्र, श्रीकान्त वर्मा, रामदरश मिश्र, कुमारी रमा सिंह आदि। यह नयी कविता के प्रथम दशक (१९५० से १९६०) का काल था। नयी कविता के विरोधियों की आवाज इस दशक का अंत होते-होते दब गई और दोनों वर्गों में एक अलिखित समझौता हो गया, जिसके अनुसार मन ही मन यह मान लिया गया कि नयी कविता और नवगीत में कोई अंतर नहीं है। मुक्त छंद में नये ढंग की कविता लिखने वाले कवि भी 'गीतिकाव्य' की रचना कर सकते हैं बशर्ते कि उन गीतों में किसी न किसी प्रकार की नवीनता और ताज़गी हो, साथ ही परंपरागत गीत पद्धति की लीक पर चलने वाले कवि भी मुक्त छंद की नयी कविता तथा नवगीतों की रचना कर सकते हैं। इस मनोवृत्ति-परिवर्तन के फलस्वरूप केदारनाथ सिंह, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, कीर्ति चौधरी और कुँवर नारायण जैसे नवगीतकारों का उद्भव हुआ और साथ ही वीरेन्द्र मिश्र, ठाकुर प्रसाद सिंह, रामदरश मिश्र, रवीन्द्र भ्रमर जैसे गीतकार कवियों को नयी कविता का संस्कार मिला जिससे वे सफल और सशक्त नवगीत की रचना कर सके।
तीसरे सप्तक के कवियों में सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, कुँवर नारायण और केदारनाथ सिंह आदि ने सबसे अधिक गीत लिखे हैं। उनमें वह सूक्ष्म और गहरी अनुभूति तथा सहज अभिव्यंजना-शक्ति वर्तमान है जो नवगीत के लिए आवश्यक है। उन्होंने तीन प्रकार के गीत लिखे हैं- लोकगीत-भावित, परंपरागत सममात्रिक-समतुकान्त गीत और मुक्त छंद के गीत। लोकगीत-भावित कविता को इन दोनों कवियों ने चरम परिणति दी है। सर्वेश्वर के सुहागिन के गीत और बंजारे का गीत, सावन का गीत, झूले का गीत, चरवाहों का युगलगान, आँधीपानी आया, आदि गीतों में न केवल लोक गीत जीवन के तत्वों और उपादानों को सही ढंग से पकड़ा गया है प्रत्युत उनमें नवीन अर्थ भी भरा गया है।
३ तीसरे चरण का नवगीत:
सातवें दशक में प्रवेश करने के साथ ही परिवर्तित सामाजिक दबाव के कारण 'नयी कविता' में ह्मसोन्मुख तत्व जोर मारने लगे और काव्यगत अन्तर्विरोध के फलस्वरूप अराजकता तथा मूल्यहीनता की प्रवृत्ति बढ़ने लगी थी। इन दबावों का प्रभाव नवगीत पर भी पड़ा। इस दबाव की नयी कविता में तथा उसी के समानान्तर 'नवगीत' में अब लोक-व्यंजना के स्थान पर आधुनिकता जन्य मानवीय संकट, विविध आवेगों की आशंका, भय, आतंक, अकेलापन, कुंठा, संत्रास, अजनबीपन और विवशता की भावना का प्राबल्य दिखलाई पड़ने लगा। मध्यवर्ग में तथा बेरोजगार नयी पीढ़ी में मूल्यहीनता और असुरक्षा की भावना के कारण तनाव और उद्वेग जनित बेचैनी बढ़ गई। फलतः उसकी सहज स्वाभाविक प्रतिक्रिया में नवगीत के रचनाकारों का स्वर भी बदल गया।
सन १९६० के बाद कथ्य के बदलाव को महसूस करके प्रतिबद्ध मुद्रा में गीत काव्य की रचना करने वाले कवियों में ओम प्रभाकर, शलभ श्रीराम सिंह, देवेन्द्र कुमार, नईम, उमाकान्त मालवीय, माहेश्वर 'शलभ', नरेश सक्सेना, बालकृष्ण उपाध्याय, रमेश रंजक, रामचन्द्र, चन्द्र भूषण, श्री कृष्ण तिवारी, गुलाब सिंह, उमाशंकर तिवारी, अनूप अशेष, कैलाश गौतम, सत्यनारायण आदि ऐसे कवि हैं जिन्होंने विषयवस्तु, लय और अनुभूति की दिशा में 'नयी कविता' की संपूर्ण अभिव्यक्ति को अपने में समेट लिया है। ये सभी कवि युवा-पीढ़ी के कवि हैं और सन ६० के बाद विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से उभरकर सामने आये हैं। उन्होंने मानव-मन के अंतर्द्वंद्व को सही शक्ल में पेश कर एक ओर तो पारिवारिक जीवन की सहजता को प्रस्तावित किया है, प्रकृति को नये उपमानों और ताजे-टटके बिम्बों के साथ चित्रित किया है दूसरी ओर आज के लघु मानव के संशय, अनिश्चय, घुटन, घृणा और कातरता को नयी जुबान दी है।
द्वितीय चरण के नवगीत लिखने वाले कवियों में से केवल शंभुनाथ सिंह ने नवगीत को आधुनिकता-बोध से जोड़ने की दिशा में इस युग में भी क्रियाशीलता दिखलाई है। उन्होंने यथार्थ जीवन की विसंगतियों के साथ-साथ वैज्ञानिक बोध को भी अपना कथ्य बनाकर नवगीत के एक नये और अछूते आयाम को उद्घाटित किया है। इन कवियों की कवितायें पत्र-पत्रिकाओं-विशेषतः लघु पत्रिकाओं और उनके विशेषांकों में प्रकाशित होती रही हैं, इस प्रकार विगत ३० वर्षों में नवगीत, नयी कविता की एक सर्वाधिक सशक्त विधा के रूप में विकसित होकर प्रतिष्ठित हुआ है। उसकी उपलब्धियाँ भले ही अभी पूर्णतः विश्लेषित और रेखांकित न की जा सकी हों, किंतु साहित्य का भावी इतिहासकार इस शताब्दी के साहित्य के इतिहास के परिप्रेक्ष्य में 'नवगीत' का सही मूल्यांकन कर सकेगा। अभी उसकी संभावनायें 'नयी कविता' के समान चुकी नहीं हैं। अतः नया नवगीतकार 'नवगीत' को और भी उत्कर्ष तक ले जा सकेगा, यह संभावना व्यक्त की जा सकती है। २१ अक्तूबर २०१३ *** समकालीन हिंदी नवगीत -कुमार रवीन्द्र
समकालीन हिंदी कविता एक भ्रम , एक द्विधा से ग्रस्त है। वह भ्रम है गीत को कविता से इतर मानने की प्रवृत्ति। गीत का कविता से यह बिलगाव आधुनिक हिंदी काव्य की ही समस्या है। पूर्व-अज्ञेय युग में कविता का व्यक्तित्व इस प्रकार खंडित नहीं था। अज्ञेय ने ही सबसे पहले कविता से गीत के इस अलगाव को अपने सप्तकों की भूमिकाओं के माध्यम से एक काव्य-शास्त्रीय आधार दिया, हालाँकि उन्होंने कभी भी, कहीं भी खुले तौर पर गीत को कविता मानने से इंकार भी नहीं किया। उनके प्रभाव के तहत ही यह अलगाव पनपा और एक स्थिति वह आ गई कि तथाकथित प्रयोगवादी या नई कविता के खेमे के लोग गीत लिखने-पढने-समझने तक से परहेज़ करने लगे।
'अर्थ की लय' के नाम पर उन्होंने एक कृत्रिम मन्त्र रचा, जिसके तहत कविता होने की एकमात्र शर्त उसका लय-छंदहीन होना ही हो गई। उत्तर-अज्ञेय काल में यह पूर्वाग्रह दुराग्रह बन गया। लय-छंद को नकार कर कवि बनना आसान हो गया और पूरे हिंदी प्रदेश की हर गाँव-गली में तथाकथित कवियों की ऐसी बाढ़ आई कि कविता को परिभाषित करना ही कठिन हो गया। केवल आधुनिक भावबोध के नाम पर गीत को कविता से ख़ारिज़ करने का यह व्यापार कुछ समय तक नई कविता की हठधर्मी के रहते खूब चला। सत्ता-प्रतिष्ठानों को कब्ज़ा लेने के बाद ज़बरदस्ती गीत को हाशिये पर रखने की साज़िश कामयाब भी रही कुछ हद तक। एक हल्ले के तहत गीत को कविता की एक समाप्तप्राय:विधा घोषित कर दिया गया और आधुनिक जटिल जीवन-प्रसंगों का हवाला देकर गीत को नकारा एवं अप्रासंगिक सिद्ध करने की भरपूर कोशिश की गई।
यह सही है कि बदलते रागात्मक संबंधों के बरअक्स कविता का संस्कार बदल रहा था, पर इसके लिए गीत या छांदिक किसी भी कविता-विधा को कविता से निष्कासित करना एकदम अनर्गल था। उसी कालखंड में 'नई कविता' के समानांतर ही गीत भी अपने स्वरूप को बदल रहा था, इस बात को नकारना किसी भी समझदार कविता के अध्येता के लिए नामुमकिन है। यह सही है कि छायावाद के तुरंत बाद का गीत कुछ अपवादों को छोड़कर मंच के अतिरिक्त मोह के कारण अपने प्रभावी स्वरूप को खोने लगा था, किन्तु मंच से अतिरिक्त भी गीत की उपस्थिति थी, जो प्रारंभ में प्रयोगधर्मी 'नई कविता' का अभिन्न अंग रही। गीत की भी आधुनिक भाव-बोध से संपृक्ति हो रही थी और उसका भी स्वरूप बदल रहा था। किन्तु एक ज़ेहाद के तहत उसे कविता की मुख्य धारा से बाहर कर दिया गया। हिदी कविता का यह गीत-विरोधी स्वर पिछली सदी के छठे से आठवें दशक तक अपने चरमोत्कर्ष पर था। कई श्रेष्ठ गीतकारों को भी इस विरोध ने विचलित किया और वे भी गीत-विरोधी स्वर अपनाने से नहीं बच पाए। हिंदी कविता की यह एक अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण परिणति थी। हिंदी कविता का संपूर्ण स्वरूप ही इससे खंडित और आहत हुआ, इसमें कोई संदेह नहीं है। इसने दोनों ओर ग्रन्थियों को जन्म दिया और गीत-विरोधी एवं गीत-समर्थक खेमेबाजी को प्रश्रय दिया।
पिछली सदी के अंतिम दशक में स्थितियों में बदलाव आया है। नवें दशक के प्रारंभ से ही गीत ने अपनी साहित्यिक अस्मिता को बड़े ही प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है। अपनी अलग पहचान बड़े सशक्त रूप से प्रस्तुत कर इस छद्म का पर्दाफाश भी किया है कि गीत के माध्यम से आधुनिक भावबोध की प्रस्तुति संभव ही नहीं है। इस समय नवगीत अपने अधुनातन स्वरूप में कविता की मुख्य धारा के रूप में स्थापित हो चुका है, इसमें कोई संदेह नहीं है।
वास्तविकता तो यह है कि कुछ अर्थों में छंदानुशासन के कारण नवगीत कविता के रूप में अधिक सक्षम सिद्ध हुआ है। वैचारिकता और भावात्मकता का जैसा संयुत रूप आज के नवगीत में प्रस्तुत हुआ है, वैसा छंदहीन कविता में अधिकांशतः नहीं दीखता। मेरी राय में, आज की कविता के दो रूप माने जा सकते हैं - छान्दसिक कविता और छ्न्देतर कविता। दोनों ही रूप अपनी-अपनी अस्मिता में महत्त्वपूर्ण हैं एवं एक-दुसरे के समानांतर हैं न कि एक-दूसरे के विरोधी, क्योंकि कविता होना दोनों का ही समान धर्म, लक्षण एवं गुण है।
'तार सप्तक' के दुसरे संस्करण की भूमिका में अज्ञेय ने ऐलान किया था कि 'कवि का युग-संबंध सदा के लिए बदल गया था ' जिसके कारण मनुष्य के मूल राग-विरागों के वैसे ही रहने पर भी,जैसा कि उन्होंने 'दूसरा सप्तक' की भूमिका में कहा, रागात्मक संबंधों की प्रणालियाँ बदल गई हैं'। यहीं पर अज्ञेय ने यह भी स्वीकार किया है कि 'कवि का क्षेत्र रागात्मक संबंधों का क्षेत्र होता है' और यह भी कि 'सत्य' वह 'तथ्य' है, जिसके साथ हमारा रागात्मक संबंध है'। जीवन के साथ रागात्मक संबंधों की स्थापना को यदि कविता का मुख्य सरोकार मान लिया जाये, तो गीत की छंद-अनिवार्यता, उसकी रागात्मक अर्थवत्ता को काव्येतर मानने का प्रश्न ही नहीं उठता। 'रागात्मक संबंधों' की बदली प्रणालियों के बरअक्स भी छंदानुशासन की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। शब्दों के चमत्कारिक व्यंजनात्मक अर्थों के माध्यम से 'युग-संबंध' के बदले स्वरूप की व्याख्या करने की प्रक्रिया में स्वर-लय-छंद का महती योगदान हो सकता है। ऐसा हुआ भी है। पारिभाषिक अर्थों से अलग शब्दों के पारस्परिक स्वर-संघात में और उच्चारण-ध्वनियों के बीच में स्थित गूँज में जो अर्थ कई बार निहित होता है, उसका निर्वाह छान्दसिक कविता में जितने सशक्त रूप में हो पाता है, उतना छंदहीन कविता में नहीं। ध्वनियों की संगति का भी अपना एक अर्थ होता है। ध्वनियों की आपसी टकराहट से भी अर्थ-उद्रेक होता है, इसका अनुभव हम सभी को है। तीसरे सप्तक तक पहुँचते-पहुँचते अज्ञेय को भी इस बात की पहचान हो गयी थी कि 'शिल्प इतना नगण्य नहीं है' और 'वस्तु से रूपाकार को बिल्कुल अलग किया ही नहीं जा सकता '। वस्तुतः कविता का शिल्प उसके अपने गहरे अर्थ से स्वाभाविक रूप से और स्वयमेव उपजता है ; इसलिए वह उससे अभिन्न होता है। छंदाग्रही कविता इसी गिरा-अर्थ के अन्योन्याश्रित गहरे संबंध को दर्शाती है। इस नाते छंद को विशेष काव्य-तत्त्व और कविता का एक विशिष्ट गुण माना जाना चाहिए, न कि उसकी कमी अथवा दोष।
लय मनुष्य की सारी जैविक - दैहिक-मानसिक दोनों ही - क्रियाओं-प्रक्रियाओं का एक स्वाभाविक लक्षण
है। एक अबूझी लय से हमारी सारी चेष्टाएँ बँधी हुई हैं। यह लय लगातार एक छांदिक गति से हमारे हर क्रिया-कलाप में चलती रहती है। अलग-अलग भाव-स्थितियों में इस लय की अलग-अलग संगतियाँ हो जाती हैं। ये संगतियाँ पद्य के ज्यादा निकट पड़ती हैं। इसीलिए पद्य भाव-संवेग को समुचित रूप में साधकर उसे व्यक्त करने का सबसे सहज और स्वाभाविक साधन रहा है, आज भी है। कविता में सोच या विचार की अभिव्यक्ति भाव-बिम्बों में ही हो पाती है, यह भी सच है। भाव-बिम्ब वे संक्षिप्त प्रतीक-चिह्न हैं, जिनके माध्यम से सोच की लंबी जटिल प्रक्रिया को अकस्मात अनुभूतिपरक आकार मिल जाता है। इसी से इनमें विचार का स्वरूप, उसकी तर्क-आधारित आकृति बदल जाती है। विचारों के इंगित भर बने रह जाते हैं; उनका सतही संज्ञान विलुप्त हो जाता है। कविता में 'अचरज' एक भाव भी है और एक दृष्टि भी। इस 'अचरज' भाव-दृष्टि से ही कविता एक नाटकीय भावानुभूति बनकर उपस्थित होती है और इस अचरज भाव-दृष्टि की संरचना अधिक सहज रूप में पद्य में हो पाती है।
गीत, मेरी राय में, कविता होने की सहज सायास प्रक्रिया है। सायासता मनुष्य होने की एक विशिष्ट पहचान है। भावाभिव्यक्ति कविता का प्राण है, किन्तु उसे भी गिरा-अर्थ के संयोजन की एक अबूझी सायास प्रक्रिया से गुज़रना पड़ता है। यह सायासता इतनी सहज होती है कि उसे हम जान नहीं पाते| वस्तुतः कविता का तात्पर्य मनुष्य के अंदर छिपे अर्थों की खोज करना है, उन्हें उजागर करना भी है। वे अर्थ केवल मात्र तात्कालिक भाव-संज्ञानों से नहीं उपजते। उन्हें समझने में,बनाने में मनुष्य की तमाम चेष्टाएँ. जिनमें उसकी बौद्धिक चेष्टाएँ भी शामिल हैं, सक्रिय होती हैं। नवगीत इन्हीं समूची मानुषी चेष्टाओं, उनके अर्थों को उनकी समग्र गूँजों-अनुगूँजों के साथ व्यक्त करने का काव्य है।
समकालीन कविता के परिदृश्य में नवगीत का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है। समकालीन कविता - चाहे वह छान्दसिक हो या छ्न्देतर - एक ही मनोभूमि से उपजी हैं और वह मनोभूमि है पदार्थ जगत की मानवेतर उपलब्धियों के दबाव, राजनैतिक-आर्थिक सत्ता के अमानवीयकरण से आहत व्यक्ति-मनुष्य की इयत्ता, उसकी रागात्मक संचेतना ; पूँजी-केन्द्रित औद्योगीकरण के तन्त्र के तहत मानवीय मूल्यों के क्षरण से आपाधापीभरी जो अपसंस्कृति उपजी है, उसके विरुद्ध आज की कविता, विशेष रूप से गीतिकविता खड़ी है। नग्न पूंजीवादी आसुरी संपदा के बरअक्स एक मानवतावादी मूल्य-दृष्टि का विकास न हो पाने से जो सामजिक बिखराव आया, उसकी चेतना भी समकालीन कविता में शिद्दत से उभरी है। आज के अति-विकसित संचार- तंत्र के माध्यम से जिस पॉप संस्कृति और भ्रष्ट एवं ह्रासोन्मुख सामजिक परिवेश की संरचना की गई है, उसके तहत व्यक्ति और उसकी इयत्ता में स्वाभाविक रूप से निहित दैवी संपदा - दोनों का हनन हुआ है।
व्यक्तिगत अस्मिता और सामाजिक अस्मिता में कोई अन्तर्विरोध नहीं है, किन्तु बहुमत की राजनीति के खेल में जिस भीड़-तंत्र का विकास हुआ है, उसमें ये दोनों विरोधी होकर उपस्थित हुए लगते हैं। इस षड्यंत्र के विरुद्ध भी आज की कविता का संघर्ष है। वस्तुतः समकालीन छ्न्दाश्रयी कविता में आज के इन सरोकारों को जिस प्रखरता से प्रस्तुति मिली है, उतनी छ्न्देतर कविता के माध्यम से नहीं। गीत और गीतेतर अन्य छंद-विधाएँ इस दृष्टि से आज की प्रमुख काव्य-धाराएँ बन गयी हैं। प्रगतिकामी चेतना का जितना सहज प्रवाह नये गीत के माध्यम से हुआ है, उतना तथाकथित नई कविता के माध्यम से नहीं। वास्तव में पिछली चौथाई सदी में गीत नवगीत के रूप में अधिक वस्तु-निष्ठ और बहिर्मुखी एवं समाजपरक हुआ है, जबकि छ्न्देतर कविता अधिकांशतः अन्तर्मुखी और मनोविश्लेषणात्मक होती गई है। नवगीत का स्वर आज की व्यवस्था के विरुद्ध खुले रूप से जुझारू रहा है, जबकि छ्न्देतर कविता अपने ही द्वारा रची कुहेलिकाओं में उलझकर रह गई है। नई कविता का यह नव-रहस्यवाद कुछ हद तक छायावादी रहस्यानुभूति का ही विस्तार है; उसी वस्तुस्थिति से पलायन से उपजा है। दूसरी ओर गीतिकविता के प्रयोजन निरंतर विकासमान रहे हैं।
समकालीन गीतिकविता जीवन के लगभग सभी सरोकारों, सोचों से गहराई से जुड़ी है। अनुभूति के धरातल पर वह सभी अमानवीय प्रसंगों से जूझी है ; उन्हें उसने बेनक़ाब किया है। नये समय-सन्दर्भ में उसने नये रागात्मक संबंधों की खोज की है; अछूते शिल्पगत प्रयोगों, अनूठी बिम्ब-संयोजनाओं से उसने भाषा और कहन को अनंत विस्तार दिया है। आज का नया गीत यानी ' नवगीत ' पूरी सक्षमता से मनुष्यता के अधुनातन प्रश्नों से रू-ब-रू है। असहज होते अर्थों को भी उसने अर्थ-विभ्रम से बचाते हुए उन्हें सहज भाव-बिम्बों में व्यक्त करने की कला विकसित की है। प्रतीक और बिम्बों की जटिलता से वह मुक्त होकर अधिक आमफहम कहन की ओर उन्मुख हुआ है। आज का नवगीत रोजमर्रा की बातचीत का गीत है। अस्तु उसमें वार्तालाप और संवाद का स्वर स्वतः ही मुखर हुआ है।
आज से लगभग ढाई दशक पूर्व वाराणसी में आयोजित 'नवगीत अर्द्धशती ' समारोह में इन पंक्तियों के लेखक की उपस्थिति में जिन लक्षणों तथा आयामों को खोजा गया था, वे सभी समकालीन नवगीत में पूरी तरह विद्यमान हैं। वे लक्षण तथा आयाम हैं -
(१) छांदसिकता और लयात्मकता
(२) संवेदनधर्मिता
(३) सम्प्रेषणीयता तथा ऋजुता
(४) बिम्बधर्मिता
(५) अनलंकृति अथवा सादगी
(६) लोकसंपृक्ति
( ७) भारतीय सांस्कृतिक चेतना और जातीय बोध
( ८) यथार्थ प्रसंगों की अभिव्यक्ति और आम आदमी के सरोकारों से जुड़ाव
(९) जीवन के केंद्र में मानव की प्रतिष्ठा और मानवीय भाव-स्थितियों की जीवनी-शक्ति के रूप में स्वीकृति (१०) भारतीय रंग का आधुनिकता बोध और परंपरा से जुड़ी नवता।
ध्यान देने की बात है कि ये सभी विशिष्टताएँ ऐसी हैं, जिनके माध्यम से ही हम भारतीय अस्मिता को क़ायम रख सकते हैं। नये गीत में इनकी स्थापना से यह स्पष्ट है कि वही अधुनातन भारतीय अस्मिता का संवाहक काव्य है। आज के वैश्वीकरण के हल्ले के बीच नये गीत की प्रयोजनीयता इस दृष्टि से स्वयंसिद्ध है।
हिंदी गीत के वर्तमान संस्करण यानी नवगीत के उद्भव को अर्द्धशती से ऊपर हो चुके हैं। उसकी तीन पीढ़ियों की इस महायात्रा में जिन गीतकवियों ने अपने प्रदेय से कविता के इस छान्दसिक स्वरूप को बदलते 'युग संबंध' के तहत नई गीत-प्रणालियों से समृद्ध किया है और उसे समकालीन कविता की मुख्य विधा के रूप में स्थापित करने में महती योगदान दिया है, उनमें प्रमुख हैं - सर्वश्री शंभुनाथ सिंह, ठाकुर प्रसाद सिंह, उमाकांत मालवीय, रवीन्द्र 'भ्रमर', वीरेन्द्र मिश्र, देवेन्द्र कुमार, रमेश रंजक, भगवान स्वरूप 'सरस', शिवबहादुर सिंह भदौरिया, देवेन्द्र शर्मा 'इन्द्र', श्रीकृष्ण तिवारी, श्रीकृष्ण शर्मा, नईम, ओम प्रभाकर, रामचन्द्र चंद्रभूषण, किशोर काबरा, मुकुट सक्सेना, अवधबिहारी श्रीवास्तव, अमरनाथ श्रीवास्तव, विद्यानंदन राजीव, सत्यनारायण, नचिकेता, शांति सुमन, उमाशंकर तिवारी, माहेश्वर तिवारी, गुलाब सिंह, राम सेंगर, कुमार रवीन्द्र, कुँअर बेचैन, विष्णु विराट, नीलम श्रीवास्तव, राजेन्द्र गौतम, श्याम निर्मम, बुद्धिनाथ मिश्र, अश्वघोष, राधेश्याम शुक्ल, महेश अनघ, योगेन्द्र दत्त शर्मा, विनोद निगम, दिनेश सिंह, इसाक अश्क, विजय किशोर मानव, उद्भ्रांत, शतदल, ब्रजनाथ श्रीवास्तव, विनोद श्रीवास्तव, हरीश निगम, ज़हीर कुरेशी, भारतेंदु मिश्र, धनंजय सिंह, कुमार शिव, श्याम नारायण मिश्र, यश मालवीय, शीलेन्द्र कुमार सिंह, राधेश्याम बन्धु, मयंक श्रीवास्तव, वसु मालवीय आदि-आदि।
इनमें से कुछ को छोड़कर, जो या तो काल-कवलित हो गये या किन्हीं कारणों से कविता की अन्य विधाओं की ओर मुड़ गये, सभी आज भी नवगीत के नये-नये आयामों को खोजने एवं प्राप्त करने में महती भूमिका निभा रहे हैं। इनके अतिरिक्त शताधिक ऐसे गीतकार हैं, जो नवगीत के मुहावरे से परिचित रहे हैं और कहीं-न-कहीं अपने गीतों में नये गीत की भंगिमाओं को आंशिक रूप से प्रस्तुत करते रहे हैं। आज नये गीतकारों की एक पूरी पीढ़ी इन भंगिमाओं को अपनाकर गीत के क्षितिजों का विस्तार करने को उपस्थित हैं। अस्तु, हिदी नवगीत आज की ही नहीं, भविष्य की भी मुख्य काव्यधारा रहेगी, इसमें कोई संदेह नहीं है।
समग्रतः हिदी नवगीत समकालीन कविता का वह रूप है, जिसने कबीर और निराला की परंपरा में नये क्षितिज, नये आयाम जोड़े हैं; उनका निरंतर खोजी भी है। 'शब्द' के चमत्कारिक 'अर्थ' की उसने पुनर्स्थापना की है और कविता में 'अचरज' के भाव को पुनः प्राप्त किया है। निश्चित ही नवगीत ने कविता के रागोत्तेजक स्वरूप को नई भंगिमाएँ, नई दिशाएँ दी हैं, नये प्रतिमान दिए हैं।
१४ फरवरी २०११
गीत और नवगीत के बीच
एक ऋतुमती प्यास
प्रत्येक गीत बीते युग के सन्दर्भ में अपने समय का नवगीत होता है और प्रत्येक नवगीत आने वाले कल की पृष्ठभूमि मे अपने जमाने का गीत होता है।ये नव, नूतन या अभिनव उपसर्ग तो पीढ़ियों के अन्तर को उनमें छिपे अस्तित्व के संघर्ष को बताते हैं।इनका देशकाल से सम्बन्ध है, शाश्वती का इनसे क्या लेना देना? फूलों की माला में छिपे धागे की तरह एक ही प्यास पूरे गीति तत्व को सँभाले हुए है और वह है ऋतुमती प्यास! प्यास जो ऋतुमती है, ऋतुमती जो प्यासी है अर्थात गीतकार और संगीतकार के बीच किसी नवगीत के सृजन की अतृप्त उत्सुकता, उर्वर जिज्ञासा, नए मुहावरे की तलाश, पुराने को छोड़ कर नए शिल्प को ग्रहण करने की आनन्ददायक उत्तेजना, एक चुनौती, किसी टूटन को... शब्द से सी देने की एक लयात्मक ललक, सूई धागे की तरह एक -दूसरे में होने न होने के बीच की अनुभूति, मिट्टी की गंध के आकाशी सपनों को थामने और आकाशी सपनों के मिट्टी सने पाँवों को टटोलने की अनथक कोशिश का नाम नवगीत है, जिससे हर गीत को नवगीत बनने के लिए गुजरना पड़ता है।
मैं किसी आन्दोलन से जुड़े नवगीत की बात नहीं करता, मैं सच्ची कविता के जुड़े गीति तत्व की चर्चा करता हूँ। कविता का सम्बन्ध साहित्यिक बौद्धिकता से नहीं, चिन्तन की लयात्मक जागरुकता से होता है। कविता की यात्रा हृदय तक होती है।वह एक सतत प्रवाहिणी भागीरथी है, जो जब तक सरिता है, जब तक बहती है, रुक गई तो तालाबों में बँट जाती है, सड़ जाती है, फिर एक दूसरे के विरुद्ध नारे लगाती है। जब से कुछ आलोचकों ने कविता लिखनी शुरु कर दी है, और जब से कुछ कवियों ने आलोचना प्रारंभ कर दी है, तब से दोनों क्षेत्र दूषित हो गए हैं।काश, यह न होता तो न वह फतवेबाजी होती, न यह नारे बाजी होती। नारेबाजी कविता नहीं, फतवे बाजी कविता नहीं, ऋतुमती प्यास कविता है।जो लोग यह कहते हैं कि गीत केवल गीत है, इसे खेमो में नहीं बाँटना चाहिए, उनके साथ मुश्किल यह है कि वे इसके परम्परागत तत्वों को ही स्वीकार करते जाते हैं, इस तरह से बासी होते जाते हैं, जुगाली किए जाते हैं।जो लोग इसे पृथक कविता आन्दोलन की तरह लेते हैं और गीत को नई कविता से अलग करने के लिए नवगीत संज्ञा देते हैं, उनके साथ भी एक मुसीबत है और वह यह कि वे पुराने सभी तत्वों को नकारते जाते हैं और एक अनगढ़ टटके मुहावरे को उछालते जाते हैं और इस तरह वे दुरूहतर होते जाते हैं।
हिन्दी कविता के आधुनिकरण के साथ ही गीत अपने नएपन के साथ कई आयामों में गुजरा है। भारतेन्दु युग के प्रार्थना पदों और नाट्य गीतों में, द्विवेदी युग के राष्ट्रीय एवं विलाप गीतों में, छायावादी युग के कलानिष्ठ और प्रकृति गीतों में, प्रगतियुग के क्रान्ति एवं वर्ग संघर्ष के गीतों में नए गीत की प्रतिध्वनियाँ हैं।प्रयोगवादी कविता के उत्थान ने गीत काव्य में वैयक्तिक एवं एकान्तिक अनुभूति को अयोग्य माना और तब नवगीत के जन्म की संभावनाएँ नजर आने लगीं।
सन् 1950-55 के बीच जिन गीतकारों के कविता संग्रह प्रकाशित हुए उनमें शिल्प की नवीनता, लोकतत्व, प्रकृति साहचर्य तथा सामाजिक मनस्थिति का सूत्रपात हुआ।गीत का स्वभाव एक नए फैलाव, एक नए परिवेश की माँग करने लगा।सन् 1951-52 की काशी में आयोजित नवगीत की नौका गोष्ठी, 1955 में वीरेन्द्र मिश्र का हालावाद के साहित्यकार सम्मेलन में नवगीत के आविर्भाव का संकेत तथा फार्म एवं करेन्ट दोनों में परिवर्तन की चर्चा और फिर 1958 का वह ऐतिहासिक क्षण जब राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने " गीतांगिनी " गीत संग्रह का संपादन किया, उसमें निराला से उदय खन्ना तब समूची गीत यात्रा से जुड़े पाँच पीढ़ियों के 75 गीतों को स्थान मिला और उसकी भूमिका में नवगीतों के पाँच तत्व प्रतिष्ठित किए गएः जीवन दर्शन, आत्मनिष्ठा, व्यक्तिबोध प्रीति तत्व और परिसंचय। इस नए आन्दोलन में गीत के लिए कई नाम प्रस्तावित हुए ..आधुनिकतर गीत, बिम्ब गीत, तालिक गीत, किन्तु राजेन्द्र प्रसाद सिंह गीतों की सम्भावना को काल की प्रवृत्ति और शिल्प की एकान्तिक सीमा में नहीं बाँधना चाहते थे, इसलिए नवगीत संज्ञा से उन गीतों को अभिहित किया।नवगीत के जिन तत्वों का गीतांगिनी में उल्लेख है, वे चौथाई सदी तक समर्थन और सहमति प्राप्त करते रहे। उनमें बदलाव भी आया है, पर क्रमिक रूप से, यहौ कारण है कि नवगीत में आंचलिक प्रयोग, लोक संस्कृति, शिल्प एवं भाषा का गुंफन होने लगा और छन्दाश्रित गीत रचना और लयाश्रित गीत रचना में फर्क समझा जाने लगा। अब कुछ लोग मानने लगे हैं कि नवगीत को नवगीत के नाम से कोठरी में बन्द नहीं किया जा सकता।
गीतांगिनी के प्रकाशन के बाद 1960 में डा. शिवप्रसाद सिंह ने नवगीत आन्दोलन छेड़ा।रवीन्द्र भ्रमर ने 1961 में नवगीत की विस्तृत चर्चा की और नई कविता के समानान्तर इसे एक सहज विकसित काव्य विधा माना।लेखनी बेला (1958) में नवगीत की विस्तृत चर्चा की और नई कविता के समानान्तर इसे सहज विकसित काव्य विधा माना।लेखनी वेला (1958), बंशी और मादल (1960), आओ खुली बयार (1962), समवेत नई कविता अंक (1969), गीत एक (1962), पाँच जोड़ बाँसुरी (1969) और बाद में नवगीत दशक एक दो तीन की कृतियाँ नवगीत विकास यात्रा में माइल स्टोन की तरह स्मरणीय रहेंगी।लहर वासन्ती कल्पना, ज्योत्सना, अन्तराल, कल्पना, ज्ञानोदय आदि पत्रपत्रिकाओं ने सभी प्रहारों का उत्तर दिया।मूर्धन्य नवगीतकारों में वीरेन्द्र मिश्र, धर्मवीर भारती, रवीन्द्र भ्रमर, नचिकेता, देवेन्द्र शर्मा, महेन्द्र शंकर, सूर्यभानु गुप्त, केलाश गौतम, रामदरसमिश्र, राजेन्द्र प्रसाद सिंह, ओम प्रभाकर, बालस्वरूप, नईम, प्रेम शंकर, शंभुनाथ सिंह, उमाकान्त मालवीय, सोम ठाकुर, ठाकुर प्रसाद सिंह, भारतभूषण, चन्द्रसेन विराट, उमाशंकर तिवारी, नरेश सक्सेना, माहेश्वर तिवारी, रमेश रंजक, कुँवर बैचेन, शान्ति सुमन आदि के नाम कानों में बजते रहे।
नवगीत का खतरा उसके आलोचकों से नहीं उसके नादान दोस्तों से रहा है।कुछ घुसपैठिये गीत, नव गीत और नई कविता तीनों में जमे रहे, बाद में उन्होंने ही नवगीत को ही झूठा नारा घोषित किया।वे नवगीत को नई कविता में तिरोहित मानने लगे और उसके फलस्वरूप अगीत का जन्म हुआ।नई कविता से नवनीत को अलग न मानने के फलस्वरूप अगीत का जन्म हुआ।नई कविता से नवनीत को अलग ना मानने केउन लोगों ने दो तर्क दिए.. पहला यह है कि नई कविता के खेमे की चीज ही नवगीत है और दूसरा यह कि नई कविता के विशिष्ट कवि ही नवगीतकार हैं।नई कविता से अकविता तक उन लोगों ने नवगीत के विरुद्ध नयागीत, अगीत, प्रगीत, भूखी नंगी श्मशानी अकविता जैसे कई कुरुचिपूर्ण काव्य आन्दोलन चलाए।अज्ञेय ने सप्तकों में सम्मिलित कविता नई कविता के गीतकारों को ही नवगीतकार मान लिया तो उमाकाकान्त मालवीय ने यहाँ तक कहा .."तार सप्तक कवियों में नवगीत की तलाश कोई अर्थ नहीं रखती।"
छायावादी गीत सृष्टि का खैयामी दर्शन बच्चन नीरज जैसे स्वच्छन्दतावादी कवियों की छत्रछाया में अतृप्तिमूलक मांसल दार्शनिकता को व्यक्त करता रहा, जबकि मार्क्स चिन्तन ने जनवादी कविता तक की यात्रा में गीत की वैयक्तिकता को संगीतमय बनाकर पोस्टरबाजी तक पहुँचाया, लेकिन नई कविता की वैयक्तिता को संगीतमय बनाकर तथा समाजवादी विचारधारा को पोस्टरबाजी से हटा कर गीतों के नए प्रयोगधर्मी एवं आधुनिकता के समर्थक नवगीतकार रुमानियन के साथ ही जीवन की जटिलता को भी व्यक्त करते रहे।सही अर्थ में वे ही नवगीतकार हैं।नई कविता के मूल में मानसिक तनाव था, नवगीत के मन में तनावमुक्त मन था आनन्द पूर्ण एकान्त क्षणों का मुख्य लेखाजोखा था।वहाँ साहित्य और संगीत एकाकार हो गए।इसी नवगीतत धारा ने शुद्ध साहित्य देकर कवि सम्मेलन के मंचों को चुटकुले बाजी और तुक्कड़ से बचाए रखा।गीत अपने बड़े अर्थ में रचनारत गीतकार का मनोगायन होते हैं।वह वस्तनिष्ठ और आत्मनिष्ठ दोनो होता है। यही चेतना उसमे नयापन पैदा करती है और नये मुहावरों, ताजा टटके उपमानों, नए बिम्ब प्रतीकों, साँस्कृतिक चेतना के नए संकेतों, भाषा के नए प्रयोगो, मिथकीय बिन्दुओं के नए आयामों, आंचलिक दृष्यों और आधुनिक विसंगतियों के ऐन्द्रिक प्रयोगों के प्रति उसे आकर्षित करती है।मेलामे, रीवाँ, पाउंड, इलियट, रिचर्ड्स जैसे पाश्चात्य काव्य शिल्पियों ने इन्हीं तत्वों की सराहना की है।मेलामे ने कहा है.. वही कविता श्रेष्ठ है, जो अनुभूति का संकेत मात्र दे और उसका शनैः शनैः उद्घाटन करे।तोष कवि ने भी कहा है..देखि रहे ओ दुरान रहे कवि तोध सोई कविता मन भावे।
१४ फरवरी २०११
समकालीन गीत: आलोचना के आयाम
हिन्दी कविता मे सर्वाधिक अंश गीत का है, स्वातंत्र्योत्तर गीत से ही विकसित हुए हैं- नवगीत और जनगीत, दोनो एक ही सिक्के दो पहलू हैं। गीत की संवेदना वृत्ताकार होकर शब्दलय और अर्थलय की परिधियों को पार कर जीवन की केन्द्रीय लय तक पहुँचती है उसे ही रसानुभूति या रसलय कह सकते हैं। जीवन की केन्द्रीय लय तो जन्म से ही हमारी साँसों मे व्याप्त है। जैसे जैसे हमारे जीवन के सौन्दर्यमूल्य विकसित हुए हैं वैसी ही काव्य की अनुभूति हमें होती है। हमारे आचार्यों ने काव्य को सामान्य तौर पर व्यंजना के आधार पर उत्तम,मद्धयम और अधम तीन प्रकार का माना है। मम्मट आदि के अनुसार हमारा नवगीत भी इन तीनो श्रेणियो मे रखा जा सकता है। अर्थात कहीं वह लय सहज है तो कहीं उसे पकडना पडता है तो कहीं वह टूट भी जाती है।
हमारे प्रारम्भिक कवितापारखी, कलापारखी और रंगमंचकार भरत ने कहा था-अलातचक्रप्रतिमम कर्तव्यो नाट्य योक्तृभि: अर्थात नाटक को अलातचक्र के समान सृजित करना चाहिए। अलात चक्र अर्थात आग का वह गोला जो तमाशा करने वाले मदारी द्वारा जलता हुआ पलीता बाँधे हुए दण्ड को घुमाने से निर्मित होते हैं। उसकी वास्तव मे कोई सत्ता नही होती किंतु वह अपने सृजन से लेकर अवसान तक दर्शक को बाँधकर रखता है। वहाँ महत्वपूर्ण संतुलन होता है। संतुलन बिगडते ही आग के गोले की रचना बन्द हो जाती है, अर्थात कलात्मक सुख समाप्त हो जाता है। अर्थात संतुलन ही कला की सबसे बडी विशेषता है। गीत मूलत: काव्य कला का ही एक रूप है उसमें जहाँ कहीं भी संतुलन का अभाव होगा वहाँ वह गीत नही बन पायेगा।
समकालीन गीत के परिदृश्य में पारम्परिक शैली के गीत के अलावा हर एक गीतकार– नवगीत और जनगीत दोनो तरह की रचनाएँ लिख रहा है। जनगीत हो या नवगीत रचना मे गीति और छन्द का सही निर्वाह तो होना ही चाहिए। आलोचना को न सह पाना सत्य को न स्वीकारने जैसा होता है। अधिकतर नये कवियों के छन्द लडखडा रहे हैं। छन्द पूरा है तो अर्थ की लय टूटी हुई है। सब जल्दी में हैं जब हम गीत की समीक्षा की बात करेंगे तो उसके शिल्प और शब्द दोनो पर विचार करना ही होगा। यह समय गीत के विविध प्रयोग और उनके आयामो को व्याख्यायित करने का है। न कि गीत नवगीत जनगीत के नामकरण को लेकर बहस करने का। हमने अपने समीक्षा कौशल के नाम पर गीत और नवगीत के नामकरण पर निरर्थक लम्बी बहसें की हैं।
जब प्रलेस (१९३६) से जुडे कुछ कावियों/शायरों ने इफ्टा का गठन किया तो कैफी आजमी जैसे शायर जनता के बीच जाकर प्रलेस के अधिवेशनों में अपनी शायरी प्रस्तुत करते थे। बाद मे प्रगतिशील विचारों से जुडे कवियों ने जनगीत का नारा दिया। वे सचमुच समूह मे जाकर जन जागरण करते थे। लखनऊ के रवीन्द्र नागर जैसे गायकों से जिन लोगों ने प्रगतिशील कवियों (केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, शमशेर, त्रिलोचन आदि) का कविता पाठ सुना है वे जानते होंगे कि काव्यपाठ शैली किसे कहते हैं। रवीन्द्र नागर ऐसे ही जनगायक हैं। वे भी इफ्टा से जुडे रहे है। चौथे, पाँचवे दशक में यह नवगीत आन्दोलन जो नई कविता के समय से शुरू हुआ था उसी के समकक्ष वर्गीय चेतना को प्रखर बनाने के लिए नुक्कड नाटकों में प्रयुक्त गीतों द्वारा जनजागरण का कार्य भी शुरू किया गया। रमेश रंजक जनगीत के प्रमुख उन्नायक थे। हम यह भी कह सकते हैं कि नवगीत दशक योजना में शामिल न हो पाने की खीझ ने उन्हे जनगीतकार बनाया।
नचिकेता जी का उत्तरायण में छपा लेख नवगीत के जनबोध की हकीकत में नवगीत बनाम जनगीत की बहस है। उन्होने सप्रमाण श्रीकृष्ण तिवारी, देवेन्द्र शर्मा इन्द्र और कुमार रवीन्द्र के गीतों के अंश देते हुए अपनी बात रखी है। उन्हे बधाई कि साफगोई से नवगीत में यह आलोचना की परम्परा आगे चलती हुई दिखाई दे रही है। बहुत प्रसन्नता हुई कि नवगीतके टेक्स्ट पर उन्होने बात की। मैने कुमार रवीन्द्र जी का लेख नही पढा। उत्तरायण के सम्पादक निर्मल शुक्ल को भी साधुवाद कि उन्होने बहस शुरू की। बात निकली है तो फिर दूर तलक जायेगी।
सवाल यह है कि गीत नवगीत की आलोचना के सिद्धांत या औजार कौन से होंगे? अब सवाल यह भी उठता है कि मार्क्सवादी विचारधारा के अलावा क्या हमारे साहित्य के समाजशास्त्र मे और कोई विचार या धारा है? यदि है तो कितनी महत्वपूर्ण और दूरगामी है? जलेस ने रमेश रंजक के लिए क्या किया? मैने व्यक्तिगत तौर पर उन्हे जनवादी लेखक संघ के दफ्तर में चंचल चौहान जैसों से अगीत और जनगीत की अकेले लडाई लडते देखा है। जनवादियों ने उन्हे तब कवि नही माना था शम्भुनाथ जी ने अपने दुराग्रह के चलते उन्हे ही नही शलभ श्रीराम सिंह, शांति सुमन और वीरेन्द्र मिश्र को नवगीतकार नही माना।हालाँकि जिन तीस कवियों को उन्होने नवगीतकार माना उनका क्या हश्र हुआ? यह अलग सवाल है।
विचार कोई जड वस्तु नही होती उसकी धारा में भी परिवर्तन होता है। रूस मे पेरेस्त्रायिका लागू होने के बाद से पूरी दुनिया में बदलाव हुआ, अभी पश्चिम बंगाल में सिन्गुर ग्राम मे वर्ग चेतना की ही नही बल्कि आम जन की धज्जियाँ कलावादियों ने नही बल्कि मार्क्सवादी काडर द्वारा उडायी जा चुकी हैं। जिन्हे आम आदमी से जुडे होने के कारण कामरेड कहा जाता था उनमें से अधिकांश नवसामंत बन गये हैं। अभी-अभी अमरीका जैसे पूँजीवादी देश मे ओबामा की अध्यक्षता में कामन हेल्थ बिल पास हुआ तो सबकी आँखे खुल गयी हैं-कि पूँजीवादी देश में यह कामन मैन का फार्मूला कहाँ से आया? यह अंतर्विरोध और विरोधाभास अक्सर हर समाज में होता है। आज जब मार्क्सवाद और उसके वैचारिक पक्ष और वर्गीय चेतना का अवमूल्यन हो चुका है जब कामरेडों की घृणित सच्चाई सजग कवि के सामने समकालीन गीत के रूप में आने लगी है तो हमें सावधान होने की जरूरत है। क्या फर्क पडता है कि आप कवि को नवगीतकार कहें या जनगीतकार मानें- कमरों मे कामरेड बैठे हैं सडकों पर खून बह रहा है--यश मालवीय।
हम सब मूक दर्शक हैं। हर एक कवि के यहाँ कुछ रचनाएँ पारम्परिक गीत या नवगीत या फिर जनगीत हो सकती हैं। यह मेरी संकल्पना है। यह कवि की मानसिकता और उसकी निर्मिति पर निर्भर करेगा। जहाँ तक मार्क्सवादी समीक्षा सिद्धांत की बात है तो उसकी कुछ बातें हम सभी स्वीकार करते हैं। आम आदमी के अधिकार के लिए संघर्ष का स्वर देने में गीतकार नवगीतकार पीछे नही रहे। श्रम सौन्दर्य की उपेक्षा नवगीत ने कभी नही की। लेकिन भारतीय सौन्दर्य चेतना का उत्स तो ऋग्वेदकालीन समाज से ही विकसित हुआ और बाद में सामभ्यो गीत मेव च की सदियों पुरानी भरत मुनि की अवधरणा से जुडा है। हमें उसकी सनातनता पर भी ध्यान देना होगा। गीत की रचना उसकी रससिद्धि से जुडा मामला है, वह केवल संवेग के विरेचन से जुडा मामला भर नही है। खण्डित लय और छन्द वाली कविताओं को हम गीत कैसे मान सकते हैं?
केवल नामवर जी, मैनेजर जी या प्रभाकर श्रोत्रिय जी हमारे आदर्श समीक्षक विचारक कैसे हो सकते हैं? वे जब समीक्षा की बात करते हैं तो उनके सामने गीत बिल्कुल नही होता। हम उनके औजारों को गीत की समीक्षा में कैसे शामिल कर सकते हैं? जैसा कि नचिकेता जी उन्हे कोड करते हुए अपनी बात रखते हैं। मैने देखा है स्व.रमानाथ अवस्थी को नामवर जी के सामने गिडगिडाते हुए –हे नामवर अब बेचारे गरीब गीत पर रहम करो, कुछ लिखो।‘श्रेष्ठ हिन्दी गीत संचयन (सं.कन्हैया लाला नन्दन) के लोकार्पण के अवसर पर, तब नामवर जी ने साहित्य अकादमी के मंच से कहा था-‘गीत मेरे लिए आलोचना से परे है। जैसा कि भागवत मे गोपी प्रेम के विषय मे कृष्ण ने कहा था-अनालोच्यो हि प्रेम्ण:। अर्थात जैसे गोपीप्रेम आलोचना का विषय नही हो सकता वैसे ही गीत मेरे लिए आलोचना का विषय नही है।‘ साहित्य अकादमी के सभागार मे एक ठहाका गूँजा था। इस प्रकार उड़ गया था सारा विचार हँसी में, तो इन लोगों ने कभी छन्दोबद्ध कविता को सकारात्मक कविता नही माना। उनके लिए, राजेश जोशी, मंगलेश डबराल, अरुण कमल आदि बडे कवि हैं ये सभी कितनी बार किसानों मजदूरों के साथ जेल गये हैं या उनके लिए पुलिस की लाठी खायी है, शायद ही किसी कवि को मालूम हो।
तद्भव-२ मे छपी डाँ.नामवर सिंह की आत्मकथा पढने से बहुत निराशा होती है। ये परिस्थितियाँ आक्रांत तो करती है, लेकिन गीतकार को इनसे घबराने की जरूरत नही है। इनका विचार या चिंतन ही अंतिम सत्य नही हो सकता। हम सब- जब तब उनके दोहरे तेहरे वैचारिक विचलन और जीवन को देखते रहे हैं। ये चकित करने वाले हैं हमारी मिट्टी मे जनमी कविता की जडें खोदने के लिए विदेशी औजार इन्ही लोगों ने खोजे हैं। यही कारण है कि हमारा नवयुवक आज भारतीय चिंतन प्रक्रिया से कट गया है। आज का समीक्षक ब्रेख्त, चेमस्की, क्रिस्टोफर काडबेल, शिम्बोर्स्का जैसे विदेशी चिंतकों के विचारों के आधार पर सरोज स्मृति, राम की शक्तिपूजा और तुलसीदास जैसी महान कविताओ को पीछे ढकेल कर मुक्तिबोध के ब्रह्मराक्षस से दो दो हाथ करने की नाकाम कोशिश करते हैं। उसके सामने भरत, दण्डी, आनन्दवर्धन, अभिनवगुप्त, मम्मट, आदि नही हैं, क्योकि इन लोगों ने कवि को उसके लोक सन्दर्भ से काटकर उसकी व्याख्या अपने औजारों से की है।
ये अभिनवगुप्त, रामचन्द्र शुक्ल, राहुल सांकृत्यायन और हजारीप्रसाद द्विवेदी जैसे साहित्य मनीषियों को मूर्ख मान बैठे हैं। महात्मा गाँधी को भी ये उल्लेखनीय विचारक नही मानते। अगर रामविलास शर्मा जैसा समन्वयवादी आलोचक निराला को नही मिलता तो इन्होने निराला को भी खारिज कर दिया होता। ये वही लोग हैं जिन्होने रामविलास शर्मा जैसे महान मार्क्सवादी विचारक को भी हिन्दुत्ववादी घोषित कर डाला। क्योंकि रामविलास जी जानते थे कि कोई एक विचार या धारा या विचार धारा ही हमारे समाज का प्रतिनिधित्व नही करती। हमारा समाज बहुलतावादी रहा है। हर समाज का आम आदमी कह सकता है- जिस तरह तू सोचता है उस तरह तू लिख और इसके बाद भी मुझसे बडा तू दिख। भवानी प्रसाद मिश्र या कि आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री के शब्दों में- सब अपनी अपनी कहते हैं कोई न किसी की सुनता है, नाहक कोई सिर धुनता है दिल बहलाने को चल फिर कर, फिर सब अपने में रहते हैं।
कविता के सरोकार आम आदमी से जुडे होने चाहिए इसमें कोई दो राय नही है। बहरहाल आज के समीक्षक को ईसा पूर्व चौथी शताब्दी के भरत मुनि का नाम तक ज्ञात नही है। वह यह भी नही जानता कि भरत ही सर्व प्रथम भारतीय कलाविद रंगप्रयोक्ता और कला विश्लेशक हैं जिनके नाट्यशास्त्र की रचना स्त्रियों और दलित जातियों के लिए हुई थी। नमालूम कितने विविध जातियों के भरतपुत्रों ने मिलकर उस महाग्रंथ का समाज के हित में प्रयोग किया।
कविता, नृत्य, अभिनय, वास्तु, चित्रकला, भाषा, व्याकरण, गीत- संगीत आदि के साथ लोक और जीवन के प्राय: सभी पक्षों पर वहाँ भी विचार किया गया है। भरत कहते हैं-तस्माल्लोकप्रमाणम हि विज्ञेयम नाट्यम अर्थात नाटक या कला की श्रेष्ठता का अंतिम प्रमाण लोक है। लोक क्या है?-- जिसके आलोक में जन के सारे क्रिया व्यापार चलते हैं-वह लोक है, उसी में कविता भी है, गीत भी है। वहाँ लोक और जन का भेद नही है। वहाँ लोक भाषा, लोक रीत, लोक कलाएँ, लोक गीत, लोकमंच, सब कुछ है। वहाँ लोकजन भी है और अभिजन भी है किंतु वह ग्रामीड और नागर के रूप में है। अत: हमे लोक शब्द का अर्थ किसी बर्तोल्त ब्रेख्त आदि से पूछने की जरूरत नही है।
अब तनिक आज के हमारे सामाजिक ताने बाने को देखें तो यहाँ भी जिसे आज जन कहा जाता हैं, वह किसान मजदूर और सर्वहारा ही तो है और जिसे वो अभिजन कहते हैं वो महानगरीय सभ्यता का पैरोकार सुविधा भोगी है। हम जन पर कविता लिखते हैं, उसके पैरोकार की भूमिका तो निभाना चाहते हैं, परंतु उस जैसा जीवन कितने लोग जीते हैं? हमारे यहाँ जब किसान आत्महत्या करता है या जब किसी गरीब मज्दूर पर अत्याचार होता है, या जब आदिवासियों को उजाडा जाता है तब हमारा आज का जनगीतकार क्या कर रहा होता है? प्राचीन वीर रस के कवि चन्दबरदायी, जगनिक आदि जैसे लड़ते हुए सकारात्मक ज्ञानात्मक संवेदना के आधार पर कविताई करते थे, वैसे आज कितने जनगीतकार हैं जो किसान मज्दूर के साथ खडे होकर लड़ रहे हैं। केवल धूमिल और मुक्तिबोध की माला जपने से तो काम नही बनेगा। हबीब तनवीर जैसे कितने रंगकर्मी हैं जो लण्डन से रंगनिर्देशन मे डिग्री लेकर अपने गाँव मे नया थियेटर की स्थापना करते हैं और अपने जन के साथ खडे हुए दिखायी देते हैं। महात्मा गाँधी जैसे कितने हैं जो स्वयं अपनी टट्टी साफ करने (मिट्टी मे दबाने) के बाद दलितों के हित की बात करते हैं।
सवाल यह उठता है कि तेलगू के कवि वर्वर राव और मराठी कवि नारायण सुर्वे जब कविता मे क्रांति की बात करते हैं तो अच्छे लगते हैं। वे सचमुच लडते रहे हैं, किंतु समकालीन हिन्दी का कवि जिसे अपना ही पडोसी नही जानता वह इण्टरनेट पर जब जब क्रांति की बात करता है तो उसका चेहरा मुझे अश्लील लगने लगता है। आज दशा यह है कि अमरीका के किसी पूँजीपति (फोर्डफाउण्डेशन आदि एन.जी.ओ.) से विज्ञापन के नाम पर एक तखत माँगकर उसपर खडे होकर हम उसी पूँजीवादी या नवसाम्राज्यवादी व्यवस्था को सिर्फ दिखावे के लिए गरिया रहे हैं। हम इसी नौटंकी में समझते हैं कि हमने क्रांति कर डाली, हम ही केवल सार्थक हैं-हमने ही मंच लूट लिया, कि हमने बाजार का विरोध कर दिया- मगर हुआ क्या?पूँजीवादी ताकतें और मजबूत हुईं। हमने जिस तरह साम्प्रदायिकता विरोध का नाटक किया उससे सौ गुना धर्म का धन्धा फल फूल रहा है। हजारों बाबा अपनी दुकान सजाये बैठे हैं। हमने क्या किया इतने जनवादी कवियों के बावजूद ‘अब तक क्या किया, जीवन क्या जिया? जब मुक्तिबोध पूछते हैं तो सार्थक लगता है।
जब वो मार्क्सवादी सौन्दर्यशास्त्र गढते हैं तो भारतीयता की कहीं उपेक्षा नही होती। लेकिन तुलसी, सूर, मीरा को मनुवादी कह कर गरियाने वाले, विवेकानन्द को हिन्दुत्ववादी, सुभाषचन्द्र बोस को भगोडा, महात्मा गान्धी को नपुंसक साबित करने वाले कुछ मूर्ख चिंतक भी हैं। जो अपने आपको मार्क्सवादी कहते हैं। उनसे हमें अपने को ही नही गीत को भी बचाना है। ये मन्दमति मार्क्सवादी इसी देश में पैदा हुए और विदेशी मुखौटे लगाकर झूठ की मूठ पकडे तमाम नौटंकी रचने मे लगे हैं। प्रगतिशील लेखक संघ दिल्ली के प्रथम अध्यक्ष विष्णु प्रभाकर थे, उनको भी ऐसे ही लोगों ने न जाने कब भाजपाई साबित कर दिया। अत: निवेदन है कि लोक और जन को पूरी भारतीय परम्परा में देखा जाय मूर्ख मार्क्सवादियों की भाँति असम्बद्ध करके नही। मेरी दृष्टि में नवगीत की प्रगतिशील परम्परा का ही नाम जनगीत हो सकता है।
जैसे हर गीतकार नवगीतकार नही होता वैसे ही हर नवगीतकार जनगीतकार नही होता। नवगीत की प्रवृत्ति के रूप में यदि कुमार रवीन्द्र जनबोध को रेखांकित करना चाहते हैं तो इसमें क्या बुरायी हैं? मेरी दृष्टि मे समकालीन नवगीतकार जनवादी संवेदना की प्रवृत्तियों के गीतकार हो सकते हैं जनगीतकार नही। अवध के हिसाब से कहूँ तो पढीस, बंशीधर शुक्ल, रमई काका, दिवाकर प्रकाश अग्निहोत्री, शील जी और घूरू किसान जैसे कवि जनकवि कहे जायेंगें- ईंट किसानन के हाँडन की, लगा खून का गारा पाथर अस जियरा किसान का चमक आँख का तारा- बंशीधर शुक्ल। जनगीत जनभाषा में होता है, मुझे लगता है कि हिन्दी में कवि की अपनी किसी जनभाषा (बोली) का समावेश किए बिना खडीबोली में जनगीत नही लिखा जा सकता। अवधी, ब्रज, भोजपुरी, मगही, मैथिली, बुन्देली, कुमाउनी तथा अन्य सामान्य तौर पर किसान और मजदूरो द्वारा बोली जाने वाली भाषाओं मे की जाने वाली कविता को जन कविता या जनगीत कहा जाता रहा है। अत: जब हम जनगीत को नवगीत से अलग करके देखेंगे तो ऐसे अनेक प्रश्न हैं जिनपर नचिकेता जी को गम्भीरता से विचार करना होगा। मेरी दृष्टि में ये सभी बिन्दु समकालीन गीत-नवगीत और जनगीत को समझने के लिए आवश्यक हैं। यह कह कर मै कलावादी या रूपवादी नवगीतकारों की रक्षा नही कर रहा हूँ।
यह बात अवश्य है कि कलावादी और जनवादी दोनो प्रवृत्तियाँ हर समाज में हर समय मे रही हैं। सभी नवगीतकार कलावादी हैं और जनगीतकार नवगीतकार से नितांत भिन्न हैं। यह कहना गलत होगा। नकलीपन की अगर बात करेंगे तो नवगीत का ही नही अधिकांश हिन्दी कविता का जनबोध दिखावटी लगेगा कहीं कहीं जनगीत का भी। आवश्यक यह है कि पहले असली जनगीतकारों की सूची तैयार की जाये। जैसे राधावल्लभ त्रिपाठी ने संस्कृत कविता की दूसरी परम्परा की खोज की है और विल्हण, कल्हण, योगेश्वर , श्रीधरदास, शार्डदेव जैसे करीब पाँच सौ प्राचीन लोक कवियों की कविताओं का कोश सम्पादित किया है।देखें-- स्तब्धस्तिष्ठसि पश्यदन्धपुरत:किं दर्शनाकाड्क्षया जल्पनमूकमुखादित: प्रतिवच: किं श्रोतुमाकाड्क्षसि य: शृण्वद्वधिर:शृणोति स कथं विज्ञप्तिकां तावकीं प्राणप्रेतमुपासमाननपठनमूर्खस्त्वदन्यो जन:।(वल्लण) अर्थात अन्धे के सामने चुपचाप खडे होकर उसके द्वारा देखे जाने की आकांक्षा रखते हो? मूक के सम्मुख कुछ कहकर उसका उत्तर सुन लेना चाहते हो? जो बधिर है वह तुम्हारा निवेदन कैसे सुनेगा? प्राणपण से जिस अन्धे –गूगे- बहरे प्रेत जैसे स्वामी की सेवा में लगे हो तुमसे अधिक मूर्ख और कौन होगा?
वल्लण श्रमिक को जगाते हुए कहते हैं-हे,सेवक जिस मालिक की सेवा तू कर रहा है वह तेरी सेवकाई के प्रति न तो कुछ देखना चाहता है, न कुछ सुनना चाहता है,न कुछ कहना चाहता है फिर भी मूर्ख तू उसकी सेवा प्राणपण से कर रहा है? ये जादातर गरीब किसान और खेतिहर मजदूरों तथा उनकी महिलाओं के सरोकारों पर लिखी गयी कविताएँ हैं। हम संस्कृत कवियों के नाम पर केवल कालिदास भारवि माघ आदि को ही जानते हैं। सचमुच हम अपने ही बारे में बहुत कम जानते हैं। अर्थात हमारे समाज मे जनपक्ष की कविताई पहले से ही होती आ रही है। जनवाद की राजनीति में गीत को घसीटना उचित नही है। हमारी परिस्थितियों मे विकसित हमारा सौन्दर्यशास्त्र हमारे लोक जीवन को आलोकित करता है। त्रिलोचन कहते थे-अवध का हर एक गाँव विश्वविद्यालय है।
ऐसा किसी भी क्षेत्र के गाँव के बारे मे कहा जा सकता है। जिन कवियों ने आम जन के हितो की उपेक्षा होने पर प्रतिरोध का परचम लहराया ,सत्ता के सामने जाकर धरना प्रदर्शन किया जेल गये और लाठी खायी। वे असली जनकवि या जनगीतकार कहे जाने चाहिए। अब ऐसे कितने बचे हैं। वे नही जो तमाम सुविधाएँ भोगते हुए केवल पुरस्कारों के लिए तिकडम फिट करते घूम रहे हैं। सवाल यहाँ अपनी रचनात्मकता और अपनी वैचारिक ईमानदारी का भी है। हमें सोचना होगा कि आज तुलसी का लोकमंगल वाला काव्यप्रयोजन या फिर निराला और मुक्तिबोध का काव्यप्रयोजन हमारे लिए कितना महldत्वपूर्ण है? हम धन चाहते हैं,या यश? क्रांति या लोकहित तो हमारा ल्क्ष्य नही है? जो कवि अपनी फोटो अपनी किताब के मुखपृष्ट पर छपवाकर अपने जीते जी अपनी प्रशस्ति देख लेना चाहते हैं। ऐसे आत्ममुग्ध कवियों की रचनात्मक प्रतिबद्धता पर विचार करना अपना सिर पीटने से कम नही है। साहित्य का ऐसे कवियों से कभी कोई भला होने वाला नही है। यह विवाद नया नही है।माहेश्वर तिवारी कहते हैं- धूप में जब भी जले हैं पाँव/घर की याद आयी। इसके जवाब में देखिये रमेश रंजक लिखते हैं- धूप में जब भी जले हैं पाँव/सीना तन गया है।
सवाल यह है कि धूप में पाँव जलने से आम आदमी छाँव की तलाश करना चाहता है, वह घर हो सकता है, वृक्ष हो सकता है। ताप और थकान मिटाने के लिए स्वाभाविक रूप से सर्वहारा को घर की याद आती है खासकर जो वर्ग अपना घर गाँव छोडकर शहरों मे नौकरी करने आता है उसको, क्योकि वह अपने घर की बेहतरी के लिए ही धूप मे मेहनत कर रहा होता है,यह गृह रति है पलायन नही। यह माहेश्वर तिवारी के गीत की स्वाभाविक जनवादी व्यंजना है। दूसरी ओर रमेशरंजक की पंक्ति मे अक्खड और अडियलपन है यहाँ धूप में पाँव जलने पर सीना तन जाने की दुरूह कल्पना की गयी है। यहाँ यह स्पष्ट नही है कि वह किसान या मज्दूर किस प्रयोजन के लिए पाँव जलने पर भी धूप मे सीना ताने खडा है। गीत के भाव से लगता है कि वह आत्मघात करने जा रहा है। यह कल्पना कितनी वास्तविक है- इसका अन्दाजा धूप में नंगे पाँव काम करते किसान मजदूर से पूछकर ही तय किया जाना चाहिए। कही यह जनवादी नारे के शिल्प मे नवगीत को जवाब देने की कवायत तो नही थी? जो भी हो समकालीन गीत के भविष्य के लिए नवगीत या जनगीत जैसे विवाद बहुत हानिकर हैं। सृजन स्वच्छ मन से किया जाता है- तभी उसका महत्त्व होता है।
१५ नवंबर २०१०
गीत और नवगीत के धरातल पर कुछ सवाल
-डॉ. राजेन्द्र गौतम
साहित्य में प्रवृत्यात्मक परिवर्तनों को नए नामों से पहचानना इतिहास-लेखन की प्रक्रिया की अनिवार्य भार्त है किन्तु यह नव्यता बोध, संवेदना और प्रवृत्तियों की है, विधाओं और काव्यरूपों की पारस्परिक कलह तक उसे बहुत दूर तक घसीटना सार्थक नहीं होगा। आदिकाल से अधुनातन युग तक काव्य में प्रवृत्यात्मक परिवर्तन निरन्तर होता रहा है, लोकप्रियता के आधार पर कभी किसी एक काव्यरूप को प्रमुखता मिली तो कभी दूसरे को किन्तु गीत और गीतेतर कविता का विवाद इसी शताब्दी के पाँचवे दशक की उपज है। बारीकी से देखा जाए तो यह टकराव भी छांदसिक और अछांदसिक काव्य रूपों के बीच अधिक है। तब गीत और नवगीत के विवाद का औचित्य समझना बहुत मुश्किल है। स्पष्टत: गीत और नवगीत में काव्यरूपतामक अंतर नहीं है। हिन्दी गीत काल के एक बिन्दु पर आकर नवीन प्रवृत्तियों का अर्जन करता है।
उस बिंदु के परवर्ती प्रसार को नवगीत संज्ञा मिली है और उस नवगीत ने स्वयं के गीत होने को कभी अस्वीकार नहीं किया, पर इससे यह तो नहीं निश्चिंत हो जाता कि इतिहास के विकासक्रम में जो प्रवृत्तिगत परिवर्तन घटित हो चुके हैं, उन्हें नकार दिया जाए अथवा उन्हें अनदेखा किया जाए। बोध के अंतर को, इतिहास के पूर्वापर क्रम को नकार कर किसी मृत युग का स्तवन साहित्य के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध तो है ही, यह गीत के विकास को भी अवरुद्ध करने का प्रयास है और यह प्रयास या तो नितांत अज्ञानता-प्रेरित है या इसके पीछे चालाकी और गहरी साजिश क्रियाशिल है। यों तो नव्य विकास को व्यक्त करने वाली संज्ञा नवगीत का विरोध इसके जन्म के साथ ही होता रहा है, पर कुछ पुस्तकों एवं पत्रिकाओं में गत दो-तीन वर्षों में चालाकी अथवा अज्ञानता के कारण नवगीत के विरोध का स्वर तेज़ हुआ है। कहा जाने लगा है कि नयी कविता ने गीत का विरोध एवं अहित नहीं किया, उसका वास्तविक शत्रु तो नवगीत है। नवगीतकार ही वह मूल अपराधी है जिसे तिरस्कार की सूली पर लटका देना चाहिए। यह भी कहा जाने लगा है कि नवगीत का आंदोलन चलाने के बहाने कुछ खास लोगों को केन्द्र में लाया जा रहा है। पिछले दिनों जारी की गई इन भावुक अपीलों से गीत के क्षेत्र में एक खलबली मची है। क्या यह उचित न होगा कि स्थितियों का थोड़ा वैज्ञानिक विश्लेशण किया जाए।
इस प्रसंग में जो मूल प्रश्न खड़े होते हैं वे इस प्रकार है-
१. क्या पूर्ववर्ती रूढ़ गीत से नवगीत का प्रवृत्यात्मक अंतर है?
२. क्या यह संज्ञा स्वयं में सार्थक है?
३. क्या नवगीत वास्तव में किसी अवधारणा या रचनाकार के विरोध में खड़ा है?
४. समग्र गीत के मूल्यांकन का आग्रह कितना समीचीन है?
हम इन प्रश्नों पर आने से पूर्व एक और तथ्य को रेखांकित करना चाहेंगे। काव्य-चेतना यदि एक काल खंड से ही आबद्ध होकर रह जाए तो उससे आत्म-विकास ही अवरुद्ध नहीं होता, पूरे परिवेश की गतिशीलता से उसका परिचय भी छूट जाता है। यही कारण है कि रूढ़ गीत जिस बिंदु पर जड़ीभूत हुआ था, उस समय उसकी प्रतिद्वन्द्विता नई कविता से थी। विडम्बना यह है कि वह अपनी काव्य-चेतना का विकास तो कर ही नहीं पाया, उससे जुड़े आलोचक और कवि भी गीतेतर कविता के विकासक्रम से भी अपरिचित रह गए हैं। उन्हें यह भी ज्ञात नहीं है कि आज की छंद-मुक्त कविता को कोई 'नई कविता` नहीं कहता। नई-कविता की मृत्यु तो सन १९६४ के आसपास ही हो गई थी। तदनन्तर प्रगतिशीलता, आपातकालीन रूपवादिता, जनवादिता और उत्तर आधुनिकता के सोपानों का आरोहण गीतेतर कविता ने किया है और इन प्रवृत्तियों के साहचर्य की उपेक्षा करने की अपेक्षा सन १९५० के बाद गीत भी नवगीत में ढल कर उत्तरोत्तर कई नए सोपानों का आरोहण कर चुका है। कभी लोक-चेतना नवगीत के केन्द्र में रही होगी, आज वह उसका मूल धर्म नहीं है। महानगरीय बोध एक ज़माने में नवगीत की पहचान था, आज वही उसकी सीमा नहीं है। उपर्युक्त विश्लेषण का अभिप्राय यही है कि नवगीत ने सदैव स्वयं को रूढ़िग्रस्तता और जडता के विरोध में खड़ा किया है।
हम मानते हैं कि नवगीत का पूर्ववर्ती रूढ़ गीत से मूलभूत अंतर है। सन १९५० और १९६० के बीच जो गीत-साहित्य नवगीत के रूप में पहचाना जाने लगा था और क्रमश: सातवें, आठवें और नवें दशक में जिसने उत्तरोत्तर विकास किया, वह प्रवृत्यात्मकता में उस गीत-धारा से अलग है, जिसकी दृष्टि आत्मकेन्द्रित थी जो सामाजिक यथार्थ से कटा था, जिसने एक अवास्तव शाश्वतता के मोह में जीवन-संघर्ष से पलायन किया था, जिसमें चाँदनी में अभिसार के स्वप्न ही बुने गए हैं, समग्रत: जिसका भारतीय साहित्य की उस मूल जीवन-दृष्टि से, वस्तुपरकता से सामंजस्य नहीं है, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में, जिसके अभाव में कविता विभावहीन रह जाती है। ऐसे गीत की रचना चाहे सन् १९५० में हुई हो या १९९८ में, वह नवगीत नहीं है और यदि कोई नवगीत को गीत ही नाम देना आवश्यक समझे तो कहना होगा कि वह आज का गीत नहीं है अर्थात अप्रासंगिक है। इतिहास की गतिशीलता का कोई अर्थ तो मानना होगा कि तब के गीत की प्रवृत्ति, अब के गीत से अलग है।
तब के गीत और अब के गीत के बीच प्रवृत्यात्मक पार्थक्य को रेखांकित करने के लिए ही नवगीत संज्ञा की आवश्यकता है। हमारे पास दो ही विकल्प है। या तो हम नवगीत शब्द और उससे प्रतिध्वनित होने वाली अर्थ-छवियों को स्वीकार करके चलें अथवा समकालीन कविता की गीतधारा को गीत मात्र से सम्बोधित करते हुए यह याद रखें कि एक प्रवृत्यात्मक विकास के अंतर्गत गीत अपने वर्तमान का प्रतिनिधि है, वह किन्हीं रिडंडैंट प्रवृत्तियों के भार को नहीं ढो रहा। यहाँ यह स्पष्ट कर देना भी अपेक्षित है कि कोई भी रचना किसी विशेष लेबल से अपना स्वरूप निर्धारित नहीं करती। नवगीत लेबल लगा देने से कोई रचना श्रेष्ठता का प्रमाणपत्र प्राप्त नहीं कर लेती। हम मात्र प्रवृत्यात्मक पार्थक्य की बात कर रहे हैं।
दूसरे रूढ़ गीत और नवगीत के बीच अन्तर गणितीय नहीं है अर्थात जिस प्रकार हम कवित्त, सवैये, दोहे के संबंध में पिंगल शास्त्रीय निर्णय दे सकते हैं कि वे किस प्रकार एक दूसरे से पृथक् हैं, उस प्रकार का अंतर रूढ़ गीत और नवगीत के बीच स्थापित नहीं किया जा सकता। यह अंतर कहीं कहीं डिग्री का है, और कहीं-कहीं विषय के ट्रीटमेंट का। बहुत संभव है कि पुरानी भौली के किसी-किसी गीत में नवगीतात्मक बोध हो अथवा रूढ़ लेखन करने वाले किसी गीतकार की रचनाओं में नवगीत की भी झलक हो। परन्तु, इससे रूढ़ गीत और नवगीत का अन्तर समाप्त नहीं हो जाता।
तीसरा प्रश्न नवगीत पर लगाए जा रहे इस आरोप से सम्बन्ध रखता है कि उसका व्यक्तित्व शत्रु-धर्मी होता जा रहा है, वह गीत-हंता है, गीत-विद्वेशी है, गीतकारों का वह विरोध करता है। इससे अधिक निराधार आरोप तो कुछ हो ही नहीं सकता। इतिहास प्रमाण दे सकता है कि गीत से नवगीत तक की यात्रा गीत के परिश्कार की यात्रा है। क्या आत्म-परिष्कार और आत्म-विद्वेश समानार्थी है? प्रत्येक प्रगतिशील साहित्यकार का यह उत्तरदायित्व होता है कि वह काल में अप्रासंगिक होते जाते खर-पतवार को किनारे लगाता रहे और नित्य नवीनता के मार्गों का अन्वेशण करें।
इस प्रवहमानता में युगबोध की सजगता कभी व्यक्ति- विरोधी कैसे हो सकती है? यदि गीत का आलोचक अप्रासंगिक होती जाती प्रवृत्तियों की और उन प्रवृत्तियों से जुड़े रचनाकारों की चर्चा आज नहीं करना चाहता तो सोचना होगा कि वह किसी व्यक्ति-विशेष के प्रति शत्रुता या विद्वेश का आचरण कहा जाएगा या आलोचना का धर्म? हम पहले कह चुके हैं कि नवगीत भर कहला लेना साहित्यिक श्रेष्ठता का आधार नहीं है पर आज रचनाकार से पाठक की क्या माँग है, इसे तो अनदेखा नहीं किया जा सकता। समाज में साहित्य की भूमिका का निर्वाह एक काव्य-रूप में अन्य काव्यरूपों से भिन्न नहीं होता। आज हम जीवन के संघर्ष से पलायन नहीं कर सकते। नवगीत पर एक आरोप यह भी लगाया जाता है कि उसमें वही प्रवृत्तियाँ हैं जो गीतेतर काव्य-रूपों (उनके शब्दों में नई कविता) में है, अर्थात वे नवगीत को नई कविता का छंदानुवाद मानते हैं।
इस संदर्भ में दो बातें ध्यातव्य हैं। एक तो यह कि गीतेतर काव्यरूपों में रागात्मकता का वह स्तर नहीं है जो नवगीत में है। संवेदनशीलता के अपेक्षाकृत प्रभावी समावेश के अतिरिक्त अनेक ऐसे विशय-क्षेत्र भी हैं जिनकी असामाजिकता से नवगीत का कोई संबंध नहीं है। दूसरे यदि युगबोध की सजगता के कारण नवगीत का अन्य काव्यरूपों के साथ अनेक स्थलों पर प्रवृत्तिपरक साम्य भी है तो इसमें अनौचित्य क्या है? गीत को जिस प्रकार केवल फूल-पत्तियों के चित्रण तक सीमित नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार उसे किसी का आत्मालाप भी नहीं माना जा सकता न, ही गीत अतीत रोना रोते रहना है। गीत की सही दिशा क्या हो, इसका सबसे उच्च एवं सर्वाधिक दीप्त प्रकाश स्तंभ इस भाताब्दी के सबसे बड़े कवि निराला हैं। जरा सन १९५० के काव्य परिदृश्य को निहारिये, हमारे महान गीतकारों की आत्ममुग्धता की मसृण छलना के उद्गारों को देखिए और तुलना कीजिए निराला के उसी काल के इन गीतांशों से:
(क)
बान कूटता है
मुगरी लेकर सुख का
राज लूटता है
मूँज के फाले छाले
अच्छे बाँधों वाले
ऐसे बैठे ठाले
काज कूटता है।
(ख)
खेत जोत कर घर आए हैं
बैलों के कंधों पर माची
माची पर उल्टा हल रखा
बद्धी हाथ अधेड़ पिता जी
माता जी सिर गट्ठाल पक्का
पिता गए गौवों के गौंडे
माता घर लड़के धाये हैं।
क्या ये गीतांश उस काल में भावी गीत की दिशा का संकेत नहीं कर रहे हैं, यदि नवगीत ने इस दिशा में अपनी यात्रा को आगे बढ़ाते हुए माटी और पसीने से गीत का संबंध नहीं टूटने दिया है तो क्या इसीलिए वह तिरस्करणीय है। यदि ऐसा है, तो यह तिरस्कार पुरस्कार की भांति ग्रहणीय है।
चौथा प्रश्न समग्र गीत के मूल्यांकन का है। समग्रता तो सदैव प्रशंसनीय होती है और रचना के मूल्यांकन का आधार तो उसकी श्रेष्ठता मात्र है। जोश सभी सीमाएँ व्यर्थ हो जाती हैं अतएव हम गीत के समग्र मूल्यांकन का विरोध नहीं करते पर यहाँ भी कुछ आशंकाओं को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। वास्तव में जो लोग नवगीत शब्द के प्रयोग का विरोध करते हैं, उनकी मंशा मूलत: यही रहती है कि चाहे हम लिखें तो बासी और घिसापिटा पर हमारी चर्चा आज के प्रतिनिधि रचनाकारों में हो। यदि समग्र मूल्यांकन का अर्थ कालक्रमानुसार गीत का इतिहास प्रस्तुत करना और इस इतिहासक्रम में सभी रचनाकारों के प्रदेय का सापेक्ष मूल्यांकन करना है तो हमारा इससे कोई विरोध नहीं है, बल्कि इसे हम आलोचकीय उत्तरदायित्व मानते हैं किन्तु समग्र मूल्यांकन के नाम पर इतिहासबोध की हत्या और प्रत्यग्र विकास की अपेक्षा के नाम पर आत्म-केन्द्रित व्यतीतधर्मी गीत के लिए प्रमाणपत्र बाँटना अभिप्रेत है तो इससे गीत का नुकसान ही होगा। हमारा मत है कि इन सभी स्थितियों में विधा, साहित्य, और समाज ही महत्वपूर्ण होने चाहिए, वैयक्तिक रागद्वेश अथवा कुंठा को इसका निर्णायक आधार न बनने देना चाहिए।
समग्रता के संबंध में हम एक और तथ्य को रेखांकित करना चाहेंगे। गीत कहाँ तक युगानुरूप दायित्व का निर्वाह कर रहा है? उसके अवदान की श्रेष्ठता का स्तर क्या है? उसकी स्वीकृति का साहित्य की बस्ती में उसके अधिकृत नागरिक होने का आधार कितना दृढ है? यह जानने के लिए उसे समस्त कविता के साथ रख कर विचार करना होगा गीत का आग्रह यही होना चाहिए कि समकालीन कविता में उसकी धनात्मक भूमिका को स्वीकार किया जाए न कि चुनाव आयोग के द्वारा एक और नए दल को मान्यता देने की भांति उसकी एक दलगत अस्मिता खोजी जाए अतएव हम केवल गीत और नवगीत के समग्र मूल्यांकन के पक्षधर नहीं हैं, अपितु हमारा मत है कि गीत और गीतेतर कविता का भी समग्र मूल्यांकन होना चाहिए, जबकि कहा यह जा रहा है कि गीत के, अपने आंदोलन होने चाहिए, समकालीन कविता में घुसपैठ की प्रवृत्ति से गीत अपना अहित कर चुका है। यदि हम गीत के कद के प्रति आश्वस्त हैं तो अन्य काव्यरूपों के साथ उसके मूल्यांकन में हिचकिचाहट क्यों? गीत का तो दावा यही है कि वह किसी अन्य काव्यरूप से हीनतर नहीं है।
अंत में एक बात और! स्तर एवं संरचना को लेकर नवगीत पर लगाए गए कुछ आरोपों से उसे बरी करने की वकालत हम नहीं कर रहे हैं। उसमें जो अति बौद्धिकता के समावेश की बात कहीं जाती है, वह सही है। विकट शब्द-जाल या शब्दों की बाजीगरी भी अनेकत्र दिखलाई देती है। कहीं-कहीं वह दुरूह और बोझिल भी हुआ है। इन आरोपों में सत्यांश है पर यहाँ इस तथ्य को नहीं भूलना होगा कि किसी भी रचनाधारा में सभी रचनाएँ श्रेष्ठ नहीं होती। नवगीत नामधारी बहुत-सी तुकबंदियाँ शब्दजाल के अतिरिक्त कुछ नहीं है। अनेक ऐसी रचनाएँ नवगीत के नाम पर आ रही हैं जिनमें लय और छंद का निर्वाह भी नहीं है। हम कह चुके हैं कि नवगीत एक विशेष टिप्पणी के साथ गीत है और गीत में छंदोभंग स्वीकार्य नहीं है, इसलिए अधकचरी साधना तो गीत या नवगीत कुछ भी नहीं है पर क्या हमें इन असफल रचनाओं को नवगीत मूल्यांकन का आधार बना चाहिए। नवगीत के अन्तर्गत आने वाली सफल रचनाओं का अभाव नहीं है। वे सफल रचनाएँ न केवल गीत के अद्यतन विकास की परिचायक है अपितु आलोचक के सामने चुनौती भी है। उन्हें उपेक्षित कर समकालीन कविता का इतिहास नहीं लिखा जा सकता।
१८ मई २००९
गीत का आधुनिक स्वरूप नवगीत
राधेश्याम बंधु
नवगीत ने गीत को परंपरावादी घिसे-पिटे रूढ़ वातावरण से निकलकर यथार्थ का एक ठोस धरातल प्रदान करके संरक्षण प्रदान किया है। इसीलिए नई कविता को जनता द्वारा अस्वीकृत कर दिए जाने के कारण नवगीत की ओर अब सबका ध्यान आकृष्ट हो रहा है। नवगीत ने विशेष रूप से आज़ादी के बाद भारतीयों में आई नैराश्य की भावना को अपनी अंतर्वस्तु के रूप में आत्मसात करने और उसे अभिव्यक्त करने के लिए मध्यवर्गीय पारिवारिक बिखराव, टूटन, असंतोष और बेमानी रिश्तों की घुटन को अपना विषय बनाया है और भ्रष्ट शासनतंत्र द्वारा पैदा की गई अराजकता और शोषण के युगीन संदर्भों को भी गीतों में व्यक्त करने की सक्षम भूमिका निभाई है। नवगीत में जहाँ गद्य के लालित्य का प्रभाव दिखाई पड़ता है, वहीं गीत की लिजलिजी रोमानियत से मुक्ति भी उसका
एक विशेष आकर्षण है। इस प्रकार के नए शिल्प और अंतर्वस्तु वाले गीतों ने हिंदी पाठकों का ध्यान आकृष्ट करने में सफलता प्राप्त की है और वे साहित्यिक क्षेत्रों में भी लोकप्रिय भी हुए हैं।
इन ऊर्जा वाले गीतों में ही वह क्षमता है कि वे जन-जन का संवेदन बन सकें और वह संवेदन जो दिशाबोध की सही समझदारी से लैस हों। साथ ही यह भी ज़रूरी है कि गीत लोकशिल्प को वहन करे। लोकशिल्प से आशय है लोकभाषा के तेवर की पहचान, मुहावरे, लोकोक्तियों से अंतरंग परिचय। जनता की एकांत और सार्वजनिक बोली की पहचान, दुख-तकलीफ़ को व्यक्त करनेवाली भाषा, संकेत, चिन्ह, प्रतीक, आस्था के प्रतीक, पौराणिक बिंबों की आंचलिक व्याख्याएँ तथा लोकजीवन के संदर्भों का गीतकार को बोध होना बहुत आवश्यक है। इस प्रासंगिक सौंदर्यबोध के बिना लोकरंजन वाले गीत की रचना नहीं हो सकती। अधिकांश नवगीत संग्रहों में प्रयुक्त संकेत, प्रतीक और पौराणिक मिथकों के माध्यम से लोकशिल्प की उसी पहचान को अक्षुण्ण बनाए रखने का प्रयास किया गया है, जिससे कथ्य की व्यंजना और भी धारदार और संप्रेष्य हो सके। शिल्पगत कोई भी प्रयोग या बिंब तभी सफल या सार्थक हो सकता है, जो गीत को काव्यात्मक सौंदर्य प्रदान करने के साथ उसकी अर्थ गरिमा भी बढ़ाए और उसको बोधगम्य भी बनाए। डॉ. इसाक अश्क के इस गीत में 'लाक्षागृह' का प्रयोग कितना सार्थक है? देखें-
लाक्षागृह षड़यंत्रों के सुघड़ बनाए
अपने ही स्वजन हमें शत्रु नज़र आए
हम जब भी हुए/शकुनि दाँव के हुए,
धूप के हुए न, कभी छाँव के हुए। (नवगीत अर्द्धशती, पृ. ५५)
कभी-कभी मिथक गीत की व्यंजना को धारदार और बोधगम्य बनाने में बहुत सहायक होते हैं। इस तरह के प्रयोग नवगीत में प्रायः देखने को मिल जाते हैं। इसीलिए किसी भी कलात्मक रचना के बारे में महान विचारक बेलिंस्की ने ठीक ही कहा है कि ''यदि कोई कलाकृति केवल चित्रण के लिए ही जीवन का चित्रण करती है, यदि उसमें आत्मगत शक्तिशाली प्रेरणा नहीं है, जो युग में व्याप्त भावना से निसृत होती है, यदि वह पीड़ित ह्रदय से निकली कराह या चरम उल्लसित ह्रदय से फूटा गीत नहीं है, यदि कोई सवाल या किसी सवाल का जवाब नहीं है तो वह निर्जीव है, बेमानी है।''
ये विचार हमारे इस विश्वास को और मज़बूत बनाते हैं कि 'कला, कला के लिए नहीं, बल्कि कला जीवन के लिए है।' इसी कारण हिंदी कविता की गीत परंपरा के महान कवि कबीर, तुलसी, सूर मीरा, रहीम, रसखान आज भी प्रासंगिक हैं और जन-जन में लोकप्रिय हैं। ये हिंदी कविता के ही नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक चेतना के भी सक्षम वाहक हैं।
इसी समाजोन्मुख दृष्टिकोण को नवगीत ने भी अपनी रचनाप्रक्रिया का आधार बनाया है, जो मानवीय संवेदना का जागरूक चितेरा ही नहीं बल्कि संघर्षशील ज़िंदगी का सच्चा हमसफ़र भी है। नवगीत ने गीत को संरक्षण प्रदान करने के साथ आधुनिक युगबोध और शिल्प के साँचे में ढालकर उसको नवीन और मोहक रूपाकार प्रदान करने का काम भी किया है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो नवगीत पारंपारिक गीत का विकसित और परिष्कृत रूप है, जो आदमी के दुख-दर्द में सिर्फ़ गुनगुनाता ही नहीं, बल्कि ज़िंदगी की लड़ाई में हमदर्द की तरह ऊर्जा भी प्रदान करता है और रास्ता भी बताता है-
जाल है भीतर नदी के,
घाट से हटकर नहाना। (गुलाब सिंह)
सुनती हो तुम रूबी / एक नाव फिर डूबी,
ढूँढ़ लिए नदियों ने / रास्ते बचाव के। (देवेंद्र कुमार)
दाँव पर अंधी सियासत के, हुए गिरवी सभी चौपाल
खून के रिश्ते हुए गुमराह, चलते हैं तुरुप की चाल। (उमाशंकर तिवारी)
एक रात इतनी रातों में दीपावली हुई
कोई चाल स्यात अंधियारे की यह चली हुई! (रामकुमार कृषक)
जब-जब क्रौंच हुआ है घायल, गीत बहुत रोया,
हर बहेलिये की साज़िश में, नीड़ों ने खोया। (राधेश्याम बंधु)
समकालीन कविता में नवगीत ने अपनी सामाजिक चेतना और यथार्थवादी जनसंवादधर्मिता के कारण जो अपनी सार्थक उपस्थिति दर्ज कराई है, उससे अब उसकी ओर सबका ध्यान बरबस ही आकृष्ट होने लगा है। अब कुछ तारसप्तकीय कवि-आलोचक भी दबी ज़बान से उसका समर्थन करने लगे हैं। डॉ. केदारनाथ सिंह ने 'पाँच जोड़ बाँसुरी' के अपने लेख में लिखा है, ''नवगीत के नाम पर जो रचनाएँ हमारे सामने आई हैं, उनमें नई ज़मीन की ताज़गी तो है, पर इतना ही काफी नहीं है। आवश्यक यह है कि आज का गीत हमारे आसपास की चिरपरिचित ज़िंदगी की ऊब और निरर्थकता के भीतर छिपी हुई ताज़गी की ओर इशारा करें। यदि वह ताज़गी कहीं है।''
यदि डॉ. केदारनाथ सिंह आज के कुछ नवगीत-संग्रहों को सह्रदयतापूर्वक देखने-पढ़ने की कोशिश करें तो नवगीतों में ज़िंदगी की ऊब के भीतर छिपी हुई ताज़गी को अवश्य महसूस करेंगे। ठाकुर प्रसाद सिंह का नवगीत-संग्रह 'वंशी और मादल' जब १९५९ में प्रकाशित हुआ तो 'तारसप्तक' के संपादक अज्ञेय ने उसके गीतों के बारे में 'टाइम्स ऑफ इंडिया' में एक बहुत महत्वपूर्ण सकारात्मक समीक्षा लिखी थी। इस टिप्पणी को लेकर जहाँ गीतप्रेमियों में आल्हादकारी चर्चा हुई, वहीं गीत-विरोधियों के तीर गुंथल हो गए। अज्ञेय ने स्वयं भी गीत लिखे हैं और हर तारसप्तक में उन्होंने कुछ गीत भी प्रकाशित किए हैं, इसलिए उनके मन में गीत के प्रति झुकाव भी रहा और अच्छे गीतों की सराहना भी की।
कुछ नवगीत-संग्रहों ने कविता प्रेमियों को विशेष रूप से प्रभावित किया, जैसे उमाकांत मालवीय का 'मेहंदी और महावर', माहेश्वर तिवारी का 'हरसिंगार कोई तो हो', रमेश रंजक का 'चौकस रहना' आदि। इस प्रकार नवगीत ने मानवीय सरोकारों और सामाजिक परिवर्तन की आहटों को अपनी अभिव्यक्तियों में महसूस करने की बराबर कोशिश की है, जिसे हम आज के प्रकाशित हो रहे नवगीत संग्रहों में देख सकते हैं।
७ सितंबर २००९
समकालीन नवगीत में नवीन छंद
रामसनेही लाल शर्मा यायावर
हिन्दी का छन्द शास्त्र इतना विराट है, कि उससे बाहर किसी नये छन्द की रचना करना संभव नहीं है। इसीलिए समकालीन गीतिकाव्य में जब छन्द की बात की जाती है तो, उसका आशय उपादानों और परिवर्तन से होता है, जिसके कारण गीतों में प्रयुक्त छन्दों में नवीनता का आभास होता है। गीतकार विविध तरीके अपनाकर छान्दसिक नवीनता का बोध कराता है जब कि छन्द उसमें वही होते हैं जो छन्द शास्त्र की सीमा में आते हैं। गीतकारों द्वारा किये गये ये परिवर्तन समकालीन गीति काव्य को एक नई भूमिका में प्रस्तुत करते हैं। समकालीन गीतकारों में जो इस प्रकार के छन्द परिवर्तन को समर्पित नव गीतकार निम्नलिखित उपदानों और तरीकों को अपनाते देखे जाते हैं:-
१. परंपरागत छन्द को चरण के स्तर पर तोड़ना
२. यौगिक छन्द बनाना
३. चरण संख्या घटाना बढ़ाना
४. चरणों में विसंगति अपनाना
५. छन्द हीनता
६. बृहत् खंड योजना से छन्दात्मकता लाना
यहाँ इनको क्रमवार अलग अलग विश्लेषित करना समीचीन होगा।
परम्परागत छंद को चरण स्तर पर तोड़ना
अनेक गीतकारों ने परंपरागत छन्द को परिपक्वता के साथ प्रयुक्त करने के बावजूद उसके एक एक चरण को दो या तीन तीन टुकड़ों (पंक्तियों) में लिखा है। इससे मूल छंद टुकड़ों की भीड़ में खोया हुआ दिखाई देता है। परंतु लय का प्रवाह यह जता देता है कि इस भीड़ में अमुक छंद अपना रस घोल रहा है। इससे पाठक को परंपरागत छंद का आनंद तो मिलता ही है, साथ ही टुकड़ों पर आने वाले विशेष बलाघात से अनुभूति या अर्थ के घनत्व का अतिरिक्त लाभ भी प्राप्त होता है। दृष्टव्य हैः
तूफानी रातों में
समाधिस्थ पेड़
पूछते हवाओं से कौन रहा छेड़
सपनों के
डेरे में
यह कैसी चाल
लहरों से कहते हैं
जाग रहे ताल
कौन रहा तारों को इस तरह खदेड़‘ १
यह विशुद्ध रूप से २१ मात्राओं का छंद है जिसमें १२ और ९ मात्राओं पर यति है। चान्द्रायण छंद में ११ और १० पर यति होती है परंतु लय इसी के समान धर्मी होती है। यहां पहले चरण को दो टुकड़ों में, तीसरे चरण को तीन टुकड़ों में चौथे चरण को दो टुकड़ों में दूसरे और पांचवें (अंतिम) चरणों को पूर्ण रूप से लिखा है। चरण क्रमांक २ और ५ छंद की अस्मिता पूरी तरह स्थापित करते हैं। कवि ने केवल चरणों के विभाजन द्वारा छंद को नवीनता देने का प्रयास किया है एक अन्य उदाहरण देखें:
मंदिर के पेड़ों की
बंद प्रार्थनाएं हैं
दिन के हैं जोड़ बांट
रातों के/मैल हैं,
सेवा के बीच अभी
बांटते/रखैल हैं
पूजा में तृप्त हुई
अंध आत्माएं हैं २
यदि इस गीत की टेक के प्रथम दोनों चरणों को एक चरण के रूप में देखें तो यह विशुद्ध सारस छंद है जिसमें १२-१२ पर यति होती है। एक पंक्ति को एक चरण मानें तो यह १२ मात्रा का ’नित‘ छंद है। परंतु नवीनता लाने के लिए या दिखाने के लिए ’रातों के‘ ’मैल हैं‘ जैसे टुकड़े कर दिये गये हैं। यह प्रवृत्ति समकालीन गीतों में कई कविता के प्रभाव से आयी है।
यौगिक छंद बनाना
नवीन छंद के प्रयास से समकालीन गीतकारों ने दो अलग अलग छंदों के चरण लेकर नये छंद प्रस्तुत किये हैं। इन्हें यौगिक छंद कहा जा सकता है। दृष्टव्य है:
हेमंती साँझ हुई सूनी
होकर अवधूत विरत
सोई है भस्मावृत धूनी ३
इस छन्द में प्रथम चरण तथा तृतीय चरण (अंतिम) चरण सोलह-सोलह मात्रा के हैं परंतु दोनों अलग-छन्दों के हैं। पहला चरण चित्रा छंद के मिजाज का है और तीसरा पादाकुलक है। बीचका चरण १२ मात्राओं का है तथा यह तोमर छंद के मिजाज का है। इस प्रकार तीन छंदों के तत्वों को मिलाकर कवि ने नया छंद बनाने का प्रयास किया है। यदि इसे नया छंद मान भी लें तो भी यह मूल छंद न होकर यौगिक ही रहेगा।
चरण संख्या घटाना बढ़ाना
सामान्यता छंद चार चरणों का होता है। कुछ छंद दो पंक्तियों में लिखे जाते हैं परंतु चरण उनमें चार ही होते हैं। दोहा और सोरठा छंद इसके प्रमाण हैं। इसका अर्थ है कि दो चरणों को एक पंक्ति में लिखा जा सकता है। नवगीतकारों ने कहीं ऐसा कहीं नहीं किया है। उन्होनें छन्द के लिए निर्धारित चरण संख्या के नियमों का अतिक्रमण किया है तथा कहीं चार के स्थान पर तीन और कहीं चार के स्थान पर पांच या छह चरण कर दिये हैं। यथा:
न रह दीप के मोह में
निकल चाँद की टोह में
बुझे जो नहीं ४
यहाँ यदि छंद को चार चरण मानें तो डेढ़ चरण कम है यदि दो चरण का छंद मानें तो आधा चरण अधिक है। एक अन्य अंश देखें:
हर बटोही को टिकोरे टोकते
और टेसू, पथ अगोरे रोकते
कमल खिलते ताल में
बसा कोई ख्याल में
चन्द्रमा, श्रृंगार का ज्यों आरसी
रात, जैसे प्यार के त्योहार सी ५
-उमाकान्त मालवीय
गीत के इस अन्तरा को छंद के रूप में देखने से स्पष्ट हो जाता है कि इसमें चरण-संख्या अधिक है तथा चरण क्रमांक ३ व ४ चरणों के समान्तर नहीं हैं अर्थात इसमें एक से अधिक छंदों के चरणों का समावेश होने से यह यौगिक छंद है।
चरणों में विसंगति अपनाना
कुछ समकालीन गीतकारों ने एक छंद के चरणों में असमानता लाकर नयापन दर्शाया है। इसकी विशेषता यह है कि चरण रचना में अंतर होने पर भी उनमें गेयता बरकरार रहती है यथा-
कच्चे घर की सीलन
कोने कोने में
आधे-आधे जैसे
हम न हुए
होने में
पानी-पानी बादल
आंगन में
फुग्गों में
कगज की नावें हैं
पिंजरा है
सुग्गों में
बूँद-बूँद घुलते
संबंध
किसी दोने में ६
यहाँ टेक का प्रथम चरण प्रथम पंक्तियों को मिलाकर २२ मात्राओं का है और इस टेक का शेष अंश जो ’कोने में‘ से तुक मिलाना है, २४ मात्राओं का है। इन दोनों चरणों में यह विसंगति है, फिर भी संगीत चाहे न हो गेयता इसमें प्रवाहित है। एक अन्य उदाहरण देखें-
रेत पर
मछली तड़प कर
मर गई
लहर की सूनी हथेली
मोतियों से भर गयी ७
इस अंश में दो चरण हैं- ’रेत पर मछली तड़प कर मर गई‘ और ’लहर की सूनी हथेली‘ मोतियों से भर गई। पहला १९ मात्राओं का है और दूसरा २६ मात्राओं का। यह विसंगति है परंतु गेयता इसमें फिर भी व्याप्त है। यह विसंगति छंद का नयापन दर्शाती है।
छंद हीनता
समकालीन गीतकारों के छंद हीनता का समावेश कर छंदों को नवीन रूप में संयोजित किया है। यह छंदहीनता चरणों में विकृति उत्पन्न करके दिखाई गई है, जिसमें परंपरागत छंद के प्रति रूढ़ात्मकता अपदस्थ होती है तथा अवधारणा जन्म लेती है। यथा-
माँ कहती है
ऐसा कब तक होगा
पूरा एक गाँव पी जाए, बूँद बूँद शीतलता
और कहीं बर्दाश्त रोक दे
तटबंधों से पार उभरती आँखों भरी
सजलता ८
यह अंश गीत की एक इकाई है तथा इसमें ’शीतलता‘ और ’सजलता‘ के तुक निर्वाह ने इसे छंद के समकक्ष बना दिया है परंतु इससे छंद के अन्य तत्व यति, गति, चरण साम्य आदि कहीं नहीं है अर्थात इसमें छंद हीनता है जो नये छंद का आभास देती प्रतीत होती है, एक अन्य उदाहरण देखें-
बादल-से दिन
पानी-से दिन
छूट गऐ सफर में
कहानी से दिन ९
यहां पहले दो चरणों में मात्रा साम्य है परंतु तीसरे और चौथे चरणों में परस्पर या प्रथम दो चरणों में कहीं कोई साम्य नहीं है। इनमें छंद हीनता की स्थिति है परंतु इनका मुद्रण और चरणबद्ध रचना इन्हे छंद के रूप में प्रस्तुत करते हैं। नवगीतकारों ने इस प्रकार की छंद हीनता को अपने गीतों में विशेष महत्व दिया है। वे भाव को छंद के पीछे नहीं चलाते बल्कि छंद से भाव के पीछे चलने की आशा करते हैं। इस छंद हीनता को वे नवीन छंद के रूप में ग्रहण किये हुए हैं।
वृहत् खंड योजना में छंदात्मकता लाना
मात्रा या वर्ण छान्दसिक रचना की लघु इकाई की भूमिका में होते हैं। जब कवि एक मात्रा समूह को इकाई मानकर रचना में उसकी आवृत्ति को आधार बना लेता है तो उसमें लयात्मकता आ जाती है जो छंद का प्रकार्य करने लगती है। इससे उत्पन्न लय का लाभ उठा कर समकालीन गीतकारों ने अनेक गीति रचनाएं प्रस्तुत की हैं। यथा-
दौड़ी हिरना
बन-बन अँगना
बेंतों बनों की चोर मुरलिया
समय संकेत सुनायें
नाम बजाये
सांझ सकारे
कोयल तोतों के संग हारे
ये रतनारे १०
-नरेश मेहता
इस उद्धरण में ’आठ मात्राओं‘ के समुच्चय की आवृत्ति है। आठ मात्रा के वृहत खंड की आवृति ही एक ऐसा तत्व है जो इसमें छान्दसिकता का अहसास करता है। इन खंडों को तिर्यक द्वारा इस प्रकार दिखाया जा सकता है ’दौड़ी हिरना/बन बन अँगना/बेंत बनों की/चोर मुरलिया/समय संकेत सु/(नाये/नाम बजाये/सांझ सकारे/कोयल तोतों/के संग हारे/ये रतनारे‘- यहाँ ’नाय‘ जोकि वाक्य का समापन अंश है, को छोड़कर शेष अंश आठ-आठ मात्राओं के खंडों से रचा गया है, इससे इसमें समानान्तरता व्याप्त हो गई है जोकि छंद रचना का मूल आधार होती है। समकालीन नवगीतकारों ने इस तत्व को समझकर अपने गीतों में इसका जगह-जगह प्रयोग किया है तथा इससे नवीन छंद की अपनी अवधारणा को बल प्रदान किया है।
सम्पूर्ण विवेचन ये यह निष्कर्ष निकलता है कि समकालीन गीतों में जहाँ भाषा-संरचना में विविध तत्वों का समावेश उसे एक नये रूप में प्रस्तुत करता है, उसी प्रकार इन गीतों का छंद विधान, परंपरागत छंदों तथा नवीन छंदों को अपनाकर छान्दसिकता में नये आयाम जोड़ता है। छंद के इस विविधता पूर्ण अस्तित्व से समकालीन गीतों का क्षेत्र बहुत व्यापक हो गया है तथा इसमें अब नयी-नयी संभावनाएं दिखाई देने लगी है। भाषा संरचना एवं छंद के अतिरिक्त इन गीतों में शिल्प के अन्य तत्व भी ऐतिहासिक महत्व रखते हैं।
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सन्दर्भ
१. आहत हैं वन-कुमार रवीन्द्र- पृ-२५ -१९८४ पराग प्रकाशन दिल्ली
२. हम अपनी खबरों के भीतर-अनूप अशेष- पृ.- ४९, -१९९७ साहित्य संगम प्रकाशन इलाहबाद
३. खुशबुओं के दंश-योगेन्द्र दत्त शर्मा ’अरूण‘ पृ.- ४८ -१९८६ काकली प्रकाशन गाजियाबाद
४. कांपती बांसुरी-डॉ. वीरेन्द्र मिश्र- पृ.-२३ -१९८७ शैवाल प्रकाशन, गोरखपुर
५. पांच जोड़ बाँसुरी-सम्पादक-चन्द्रदेव सिंह- पृ.- १२४- १९६९ भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, काशी
६. हम अपनी खबरों के भीतर-अनूप अशेष पृ.-२०
७. पहनी हैं चूड़ियाँ नदी नें - देवेन्द्र शर्मा ’इन्द्र‘ पृ. -८३- १९९८ अनुभव प्रकाशन, गाजियाबाद
८. फसल बबूलों की - गुरूदत्त अग्रवाल पृ.-२७ - १९७५ सहयात्रा प्रकाशन, आगरा
९. यात्रा में साथ साथ सम्पादक-देवेन्द्र शर्मा ’इन्द्र‘ पृ. ४३-१९८४ पराग प्रकाशन दिल्ली
१०. पाँच जोड़ बाँसुरी-सम्पादक-चन्द्रदेव सिंह पृ. ५६
१७ दिसंबर २०१२
समकालीन गीतकारों की रचना दृष्टि
वीरेंद्र सिंह
प्रत्येक विधा के रचनाकार की अपनी रचना-दृष्टि होती है। यह रचना-दृष्टि स्वयं रचनाकार द्वारा रचित रचनाओं के द्वारा संकेतित होती है जिसमें एक से अधिक विधाओं का समावेश हो सकता है और इस प्रकार, उसकी रचना-दृष्टि परोक्षतः या प्रत्यक्ष रूप से व्यक्त हो सकती है। इस संदर्भ में, मैं यहाँ पर समकालीन गीतकारों को लूँगा और उनके गीतों के द्वारा प्राप्त रचना-दृष्टि को आरेखित करने का प्रयत्न करूँगा।उनके गीत-सृजन के उन अंशों का संकेत होगा जो उनके दृष्टिकोण को संकेतित कर सके। गीत की अवधारणा के बारे में वह क्या स्वीकार कर रहा है, यह गीत के अंशों के द्वारा व्यक्त होगा और इस प्रकार, गीत के ऐतिहासिक महत्व का भी दिग्दर्शन होगा। यही नहीं वरन गीतकार अपने अस्तित्व को भी अर्थ देगा तथा रचना के स्तर पर अपने सोच-संवेदन को भी संकेतित करेगा।
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समकालीन गीतकारों ने गीत के ऐतिहासिक महत्व तथा उसके परिदृश्य पर यदा-कदा संकेत किए हैं, वे गीत की संरचना के माध्यम से व्यक्त हुए हैं। यह एक ज्वलंत सत्य हे कि साहित्य के क्षेत्र में गीत का अस्तित्व किसी न किसी रूप में रहा है। इस तथ्य को कवि प्रत्यक्ष न कहकर कबीर, सूर तथा मीरा बाई के माध्यम से कहता है, और यह सत्य प्रकट करता है कि कविता(साहित्य) के परिदृश्य से उन्हें नकारा नहीं जा सकता है-
साथ कबीर, सूर मीरा बाई होगी
तब तक कविता से गीत की नहीं विदाई होगा। (नचिकेता)
यह भी एक सत्य है कि समय के अनुसार गीत की संरचना में परिवर्तन आए हैं जो एक ऐतिहासिक सत्य है। आज स्थिति यह है कि गीत की संवेदना और संरचना में अंतर आया है, वह भी वैश्विक स्तर पर। यही कारण है कि गीत की संरचना और संवेदना पूर्व के कालों से भिन्न हो गई है। अतः आज का गीत अपनी संवेदना और सृजन में कुछ अनिश्चित और अनमना हो गया है जिसके कारण गीत की संरचना में एक भूचाल-सा आ गया है। यह भूचाल कवि द्वारा निर्मित नए छंदों के प्रयोग से आया है और साथ ही, कथ्य की दृष्टि से। यह सारी स्थिति है तो एक अगम-गति पर इस गति के आगे गीत या किसी भी विधा को अपने तरीके से सामना करना पड़ेगा जो समय की आवश्यकता भी है और नियति भी-
वैश्विक फलक पर
गीत की संवेदना है अनमनी
तुम लौट जाओ
प्यार के संसार में मायाजनी
इस अगम गति की चाल में
भूचाल की है रागिनी! (दिनेश सिंह)
गीत की संरचना में अंतर का महत्व रहा है और यह अंतर बाह्य घटनाओं के द्वंद्व के प्रकाश में घटित होता है और ये घटनाएँ मूलतः अंतर के द्वंद्व को गति देती है। यही कारण है कि बाह्य घटनाओं का द्वंद्व जितना तीव्र होगा, उसी की सापेक्षता में अंतर का द्वंद्व भी तीव्र होगा। अतः गीत की संरचना में बाह्य और अंतर का सापेक्ष एवं द्वंद्वात्मक संबंध है। एक गीतकार गीत(या रचना को) को मात्र अंतर से संबधित करता है, पर सत्य तो यह है कि यह आंतरिक बिंब उस समय तक अधूरा रहेगा जब तक वह बाह्य से संबंधित नहीं होगा। गीत को निम्न संरचना में गीतकार ने मात्र अंतर के महत्व को स्वीकार किया है जो मेरे विचार से सत्य का केवल... पक्ष है। फिर भी गीतकार ने अंतर के बिंब को झाड़ी में छिपे चिड़िया के द्वारा व्यक्त किया है जो अत्यंत सटीक एवं व्यंजनात्मक है-
गीत
सात रंगो का झरना
झरता मन के भीतर
अथवा कोई,
चिड़िया चहक रही
झाड़ी में छिपकर। (नचिकेता)
गीत के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में शब्द का अपना महत्व रहा है और यह महत्व सामान्य रूप से सभी जान-क्षेत्रों में अपनी भूमिका अदा करता रहा है। गीत और साहित्य के सभी क्षेत्रों में शब्द मात्र शब्द नहीं रहा जाता है, वरन वह किसी न किसी अर्थ या अवधारणा का वाहक होता है। सृजन के क्षेत्र में शब्द-प्रयोग एक ज़िम्मेदारी है और यह ज़िम्मेदारी अन्य ज्ञान-क्षेत्रों के लिए भी ज़रूरी है। शब्द प्रयोग शब्द केलि नहीं है जैसा कि देरिदा का मत है। यह एक सत्य है कि शब्द का अस्तित्व निरपेक्ष्य नहीं है और न अर्थ का। शब्द और अर्थ का संबंध सापेक्ष्य है और यह भी सत्य है कि एक शब्द भिन्न संदर्भों में भिन्न अर्थ का व्यंजक होता है। शब्द और अर्थ का यह संबंध अर्थ विज्ञान (सिमैंटिक्स) का क्षेत्र है। गीत का संरचना में और रचना प्रक्रिया में शब्द के महत्व तथा उसके व्यापक परिप्रेक्ष्य को ( जिसे अंधेरा कहा गया है) रचनाकार इस प्रकार व्यक्त करता है-
एक कोई शब्द\कोई गीत
कोई राग बन
चटखता है धमनियों में
अर्थ की लपटें पहन
चीरती हैं, अंधेरे की छातियों को। (माहेश्वरी तिवारी)
रचनाकार यही नहीं रुकता है, पर वह शब्द को कवि के अंदर बैठा हुआ उसे सार्थकता प्रदान करता है-
मुझे यों शब्द से भरता हुआ
कौन है मुझमें/ मुझको सार्थक करता हुआ। (सत्यनारायण)
मेरे विचार से शब्द की सार्थकता दो प्रकार की होती है, रचनाक्रम और उसकी अभिव्यक्ति दोनों के लिए। एक शब्द की वह सार्थकता है जो परंपरा से प्राप्त रूपाकारों-आशयों (शब्द) का समय के अनुसार अर्थ-रूपांतरण करती है और दूसरी वह सार्थकता है जो ज्ञान-विज्ञान के नए रूपाकारों से प्राप्त होती है। काव्य शास्त्र.... अमिधा से व्यंजना तक जो व्यापार होता है, वह एक प्रकार से शब्द और उसके अर्थ का ही व्यापार है-
अमिधा से व्यंजना तक//सब है भाषा की प्रतिमाएँ
पता नहीं, किस-किस में बिंबित/ हो मेरी अभिलाषाएँ। (मधु प्रसाद)
यह तो हुआ शब्द का सार्थक एवं अर्थपूर्ण प्रयोग, दूसरी ओर, रचना में शब्द का प्रयोग इस प्रकार से भी होता है कि सृजन अपना अस्तित्व को तलाशता है। कहने का तात्पर्य यह है कि शब्द और अर्थ का सापेक्ष्य संबंध, जो रचना को सार्थकता देता है। वह एक तरह से अर्थ को पूरी तरह से संकेतित नहीं कर पाता है-
शब्दों के पुल टूट रहे हैं/ शब्दातीत मनःस्थितियाँ हैं
अर्थ सभी के टूट रहे हैं। (सूर्यभानु गुप्त)
जब शब्द और अर्थ का संबंध टूट जाता है, तब भाषा का स्वरूप यांत्रिक सा हो जाता है, तब लोग ऐसी भाषा से मोहित होकर उसे स्वीकार करते हैं। ऐसा मशीनी भाषा से होता यह है कि वह मानव के मध्य संपर्क की भाषा नहीं बन सकती है। कवि के द्वारा ऐसा समय अपाहिज होता है जिसकी चिंताओं को लिया नहीं जा सकता है अथवा उस भाषा प्रयोग पर रोया नहीं जा सकता है-
एक ही भाषा मशीनी है/ निकलती हर गली से
लोग उसको लिए फिरते/ शहर भर में बावले से
आदमी का आदमी से/ जोड़ने के शब्द खोए
इस अपाहिज समय की/ चिंताओं को कौन रोए। (कुमार रविंद्र)
शब्द या भाषा का बाज़ारीकरण इस क़दर हो रहा है कि वे अपने अर्थ-संबंधों को खोकर कविता या गीत मात्र समाचार बन कर रह गए हैं। ऐसी दशा में हम विश्वग्राम तक तो पहुँच गए, पर शब्द समय से अपने संवाद को खो चुका है, और ऐसी स्थिति में शब्द पथरा गए हैं। यह एक तरह से शब्द का अवमूल्यन है-
हमने शब्द लिखा या रिश्ते/ अर्थ हुआ बाज़ार/ कविता के माने खबरें हैं संवेदनः व्यापार/ भटकन की, उँगली थामे हम/ बहुत कठिन संवाद समय से शब्द सभी पथराए। (राजेंद्र गौतम)
यह तो हुआ शब्द का अवमूल्यन या उनका दुर्प्रयोग। दूसरी ओर सृजन के क्षेत्र में शब्द मात्र शब्द न होकर किसी विचार, धारणा या संवेदना के व्यंजक होते हैं। ये शब्द अनेक दिशाओं से आते हैं और अपने साथ भिन्न विचारों के वाहक होते हैं। अतः भाषा की संरचना में ये शब्द इस प्रकार घुल-मिल जाते हैं कि वे भाषा के अंग बन जाते हैं। यह शब्द का अर्थ-विस्तार इस प्रकार घुल-मिल जाते हैं कि वे भाषा के अंग बन जाते हैं। यह शब्द का अर्थ-विस्तार ही है और साथ ही उसका अंतःअनुशासनीय रूप भी-
कौन बहलाता है अब परी-कथाओं से
सौ विचार आते हैं, सभी दिशाओं से। (यश मालवीय)
फिर भी, हर रचनाकार अथवा गीतकार अपने विचार-संवेदन को अपने तरीके से रचनात्मक संदर्भ देता है। हर गीतकार का ट्रीटमेंट अलग-अलग होता है जो उस गीत-सृजन को नवीनता प्रदान करता है। अतः प्रत्येक गीतकार या रचनाकार का स्वर एक सा नहीं होता है, इसलिए ऐसा एक सा नियम सृजनात्मकता को बाधित करेगा-
हर गायक का अपना स्वर है/ हर स्वर की अपनी मादकता
ऐसा नियम न बाँधो/ सारे गायक एक तरह से गाएँ। (जयकुमार 'जलज')
उपर्युक्त विवेचन के द्वारा स्वयं गीतकारों का गीत के प्रति उसके ऐतिहासिक और धारणागत महत्व तथा गीत में प्रयुक्त शब्दों के परिदृश्य पर विचार करने के बाद गीत की संरचना में प्रयुक्त घटकों यथा छंद, लय, ध्वनि और सौंदर्य की निहित क्या है, इसे गीतकारों के गीत-अंशों के द्वारा रेखांकित करने का प्रयत्न है।
गीत की संरचना में छंद का अपना महत्व रहा है क्यों कि छंद का कोई न कोई रूप गीत के ऐतिहासिक विकास में रहा है जो यह स्पष्ट करता है कि गीत सृजन के लंबे काल में छंद एक-सा नहीं रहा है जो समय और कथ्य की आवश्यकता के अनुसार परिवर्तित होता रहा है। इसका अर्थ यह है कि वह प्रतिबंधों को तोड़ता रहा है। इस पूरे ऐतिहासिक क्रम को स्वयं छंद इस प्रकार प्रस्तुत करता है-
मैं (छंद) सुर में बँधकर सजता हूँ/ पर रहता हूँ स्वच्छंद सखी
मैं छंद छंद, मैं छंद सखी!/ मैं प्रतिबंधों से दूर रहा/ जीवन की शर्तें पूर रहा
पर कभी-कभी असमंजस में/ बरसों-बरसों मजदूर रहा
जब तान निराला ने छेड़ी/ तब से हूँ निर्बंध सखी
मैं छंद-छंद, मैं छंद सखी!! (कुबेरदत्त)
छंद की संरचना में यह परिवर्तन एक सत्य है, पर इसके साथ यह भी सत्य है कि छंद वर्षों तक बेड़ियों में जकड़ा रहा, पर इस जकड़न को कवियों ने (निराला) क्रमशः निर्मूल किया तब जाकर छंद बंधनहीन हो सका। असल में, कथ्य या अंतर्वस्तु के बदलने पर छंद की संरचना में बदलाव आता है जिससे कि छंद का प्राण लय में भी परिवर्तन आता है। कथ्य औऱ रूप (फॉर्म) का यह संबंध सापेक्ष एवं द्वंद्वात्मक है। कवि इस तथ्य को सांकेतिक रूप में रखता है-
अंतर्वस्तु बदलते ही/ लय-छंद बदल जाते हैं। (नचिकेता)
छंद की संरचना में लय का होना आवश्यक है कि क्यों कि छंद का प्राण लय और ध्वनि है। यह भी ज़रूरी है कि गीत का छंद हो या मुक्तछंद का छंद हो- दोनों के लिए लय का होना परमावश्यक है। मुक्त छंद का अर्थ यह नहीं है कि छंद लयहीन हो, मुक्त हो क्यों कि मुक्तछंद भी छंद है। यही कारण है कि रचना में शब्द-संयोजन हो, स्वर हो और अनुभूति हो, पर यदि उसमें लय नहीं है, तो वह छंद प्राणहीन है तथा अपने अस्तित्व पर स्वयं प्रश्नचिह्न लगाता है-
शब्द है, स्वर है/ सहज अनुभूति भी/ पर लय नहीं है/ एक ही परिताप प्राणों में
सहज अनुभूति/ पर क्यों लय नहीं है। (शंभुनाथ सिंह)
सृजन और सौंदर्य-बोध का गहरा रिश्ता है। यह संबंध यह स्पष्ट करता है कि जहाँ पर भी सृजन सार्थक और अर्थवान होगा, वहाँ पर सौंदर्य का कोई न कोई रूप अवश्य प्राप्त होगा। सौंदर्य साहित्य-सृजन का प्राण है और यह सृजन या रचना सही अर्थ में रचना होगी, तो वहाँ पर सौंदर्य की अन्विति का रूप अवश्य प्राप्त होगा। यह एक प्रसिद्ध कथन है कि सौंदर्य का अस्तित्व दृष्टा या रचनाकार की सापेक्षता में घटित होता है। यह कथन रचनाकार की विषयागत दृष्टि (सब्जेक्टिव) पर अवलंबितत है, पर यह भी सत्य है कि इस अभ्यांतर दृष्टि में वस्तुतः यथार्थ का भी योगदान रहता है। आइंस्टीन के सापेक्षावादी सिद्धांत में दिक् और काल का अस्तित्व दृष्टा द्वारा किसी वस्तु (परमाणु) को देखा जाए, तो इस देखने की प्रक्रिया में उस वस्तु में विक्षोभ उत्पन्न होगा जो यह स्पष्ट करता है कि दृश्य के निरीक्षण में वस्तु का भी योगदान है क्यों कि दृष्टा का अभ्यांतर उस समय तक अर्थवान नहीं हो सकेगा जब तक कि वह वस्तु से संबंधित न हो। अतः विज्ञान तथा सृजन में अभ्यांतर और वस्तुगत दृष्टि का सापेक्ष्य महत्व है, वे अपने में निरपेक्ष नहीं है।
दूसरे शब्दों में, यह कहा जा सकता है कि रचना का संयोजन ही सौंदर्य की सृष्टि करता है। जहाँ तक सौंदर्य-बोध का संबंध है वह त्रासद तथा अमानवीय संवेदनाओं के साथ मानवीय मनोभावों का भी व्यंजक है, इन विपरीत-क्षेत्रों में भी सृजनात्मकता का होना ज़रूरी है। इन कारणों से यह स्पष्ट होता है गीत-सृजन और सौंदर्य का सापेक्ष्य महत्व है, तभी एक गीतकार ने सृजन और सौंदर्य को एक साथ प्रयुक्त किया है और इस प्रयोग में जन की अनुगूँज (श्रम की) भी सुनाई देती है जिसे उसे रचनात्मकता की ओर ले जाता है क्यों कि वह रचनाकार है-
मैं सृजन-सौंदर्य के/ कुछ गीत, गाना चाहता हूँ/ चाहता हूँ मैं
पसीने से सने, मुँह को हसाना/ बन हवा का नर्म झोंका
थकन श्रम की मिटाना/ फिर सृजन के, छंद में ढल
गुनगुनाना चाहता हूँ। (नचिकेता)
इस प्रकार हम गीतकारों के माध्यम से यह देखते हैं कि काव्य विकास की दृष्टि से गीत का एक ऐतिहासिक महत्व है जिसे कदाचित नकारा नहीं जा सकता है। गीत को इस ऐतिहासिक संदर्भ में देखने से उसके महत्व तथा परिदृश्य को ठीक प्रकार से निर्धारित किया जा सकता है। समकालीन गीत की संरचना में स्वयं रचनाकारों ने यह स्वीकार किया है कि गीत के अस्तित्व तथा उसकी संरचना में शब्द, छंद, लय तथा सौंदर्य का अपना स्थान है अथवा उनका संबंध निरपेक्ष्य न होकर सापेक्ष्य है। विज्ञान-दर्शन की भी यह मान्यता है कि संरचना में संपूर्ण और घटक का सह-अस्तित्व रहता है और उसके घटकों (छंद, लय, सौंदर्य आदि) का महत्व इस बात में है कि वे न्यूनाधिक रूप उसके घटकों (छंद, लय, सौंदर्य आदि) का महत्व इस बात में है कि वे न्यूनाधिक रूप से संपूर्ण (रचना का संयोजन) की व्यंजना कर सके। सृजन के क्षेत्र में रचना की संरचना और उसका संयोजन इस बात में है कि उसके घटक अपने सह अस्तित्व के द्वारा उस कथ्य को संकेतित कर सके जो किसी भी रचना का लक्ष्य है। मेरे विचार से समकालीन गीत न्यूनाधिक रूप से इस माँग को पूरा करता है जो कम से कम उपर्युक्त उदाहरणों से स्पष्ट है।
१ जून २००९
नवगीत परिसंवाद-२०१२ में पढ़ा गया शोध-पत्र
मध्य प्रदेश का गीत परिदृश्य
-दिवाकर वर्मा
विधाता के सृष्टि सृजन तथा मनुष्य के शब्द बोध के साथ ही गीत मनुष्य काचिर सखा बन गया। गीत की उद्भावना मानव मन में अन्तर्निहित रागात्मकतासे होती है, यह एक सर्वविदित तथ्य है, जब भी गहन अनुभूति में पगा कोईभाव, व्यक्ति के मन प्राण को उद्वेलित करता है, अन्तरतम में एक लय के रूपमें प्रस्फुरित होता है। इस लय की गूँज अनगूँज ही गीत संज्ञा से अभिहित होतीहै। संगीत के निर्वहन की दृष्टि से इसका एक विशिष्ट प्रारूप होता है। लय कीयह गूँज कभी पर्वोत्सव की राग रंगमयी वेला में तो कभी श्रम करते श्रमिकों,खेत में हल चलाते कृषकों और भोर के समय चक्की पर अनाज पीसतीमहिलाओं की तल्लीनता में अनुगुंजित होती है।
जिस मनोदशा में यह लय की गूँज गीत बनकर प्रकट होती है, उस मनोदशा को मनीषियों ने ‘मनोलय’ नाम दिया हैं यहमनोलय ही गीत की वास्तविक ऊर्जा है। इस प्रकार ‘मनोलय’ गीत का प्राण तत्व है, जो हृदय में अवस्थित है। इसीलिएगीत का उद्गम हृदय स्वीकारा गया है। जैसे गीत का केन्द्र स्थान हृदय है, उसी प्रकार हमारे देश का हृदय मध्य प्रदेश है।यही कारण है कि गीत मध्य प्रदेश में साहित्य की महत्वपूर्ण पायदान पर रहा है। न केवल साहित्य के सभी स्तरों परगीत की अनवरत सक्रियता बनी रही है, अपितु इसका समाज जीवन में विशिष्ट स्थान बना रहा है। गीत सृजन, गीतसंग्रह प्रकाशन, पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन, समीक्षा (आलोचना) और गीत केन्द्रित विमर्श एवं रचनापाठ के कार्यक्रम गीतयात्रा को मंजिल की ओर आगे ही आगे बढ़ाते रहे हैं। इस आलेख में हम इन्हीं विभिन्न कोणों से इस विषय का अध्ययनकरेंगे। इस अध्ययन में मैंने अविभाजित मध्य प्रदेश (अर्थात वर्तमान मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़) को एक इकाई मानकर विचार किया है।
यह एक सुविदित तथ्य है कि छायावाद काल गीत की दृष्टि से उत्कर्ष का समय था। गीत कविता उस समय अपनी श्रेष्ठता के चरम पर थी। भाषा और शिल्प की दृष्टि से गीत वैभव पर था। मध्य प्रदेश इस बात के लिए गौरव की अनुभूति कर सकता है कि गीत के स्वर्णिम कालखण्ड अर्थात छायावाद के प्रवर्तक स्व. मुकुटधर पाण्डेय थे। उनके अग्रज स्व. लोचन प्रसाद पाण्डेय कवि होने के साथ-साथ पुरातत्वविद भी थे। रायगढ़ जिले के एक अनाम गाँव बालपुर को छायावाद का उद्गम स्थल होने का गौरव प्राप्त है। प्रसंगवश मैं यहाँ यह उल्लेख करना समीचीन समझता हूँ कि छायावाद काल में केवल गगन बिहारी अथवा आत्मपरक वायवी प्रकृति की कविताएँ ही नहीं रची गयीं, अपितु राष्ट्रीय जागरण के श्रेष्ठ गीत भी सिरजे गये, जिनका हमारे देश के स्वातंत्र्य समर में अमूल्य योगदान रहा वैसे भी कविता जीवन की समग्रता की अभिव्यक्ति है, इसलिए मैं ‘छायावाद’ को गाली नहीं मानता। छायावाद के अतिरक्ति छायावादोत्तर काल के प्रमुख स्तम्भ स्व. रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’ और स्व. शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ के गीत काव्य का साक्षी भी मध्य प्रदेश है। उसी कालखण्ड में छायावादेतर कथ्य के साथ अनेक गीतकवियों-कवयित्रियों ने अपनी गीति प्रतिभा से मध्य प्रदेश को संस्कारित किया ।
जिनके प्रसिद्ध गीत ‘खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी’ ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया और बाद में भी आबालवृद्ध सभी की जबान पर नटराज नर्तन करता रहा, ऐसी स्व. सुभद्रा कुमारी चौहान जबलपुर की थीं। स्व. भवानी प्रसाद तिवारी, स्व. नम्रदा प्रसाद खरे (दोनों जबलपुर) और स्व. ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी (सागर) भी गीत का अलख जगा रहे थे स्व. तोरण देवी शुक्ल ‘लली’, स्व. हीरा देवी चतुर्वेदी आदि महिला कवयित्रियाँ, ‘गीत फरोश’ के नाम से विख्यात स्व. भवानी प्रसाद मिश्र (नरसिंहपुर) जैसे सहचरों के साथ गीत को प्रतिष्ठित कर रही थीं। इन्हीं के साथ खण्डवा के स्व. माखन लाल चतुर्वेदी (पुष्प की अभिलाषा) और शाजापुर के स्व. बालकुष्ण शर्मा नवीन (कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ...) आदि राष्ट्रीय गीतों के रचयिताओं का यहाँ स्मरण करना अत्यन्त प्रासंगिक होगा।
साठ के दशक में गीत ने करवट बदली और देश काल-परिस्थित के दृष्टिगत अपने कलेवर को एक नया रूपाकार दिया। न केवल कथ्य की दृष्टि से, अपितु शिल्प की दृष्टि से भी उसने नवता को अपनाया इस करवट को नवगीत संज्ञा से अभिहित किया गया। महाप्राण निराला ने छन्द को मुक्त करने का आह्वान किया (ध्यातव्य है कि उनका ‘मुक्त छन्द’ छन्द से मुक्ति नहीं था, अपितु स्वयं ही एक छन्द था) तथा लय आद्धृत छन्दों के साथ गीति रचनाएँ स्वयं भी कीं। इसीलिए हमारे रचना समय के समस्त गीतकार / नवगीतकार निराला जी को ही नवगीत के प्रवर्तक के रूप में स्वीकारते हैं इस प्रकार अब यह गीत यात्रा नवगीत के रूप में आगे बढ़ने लगी। नवगीत ने कथ्य के रूप में जीवन में व्याप्त विसंगतियों, सामाजिक विषमताओं, राजनीतिक विद्रूपताओं आदि को अपने कथ्य का प्रमुख विषय बनाया। यद्यपि प्रेम और प्रकृति भी गीत से अछूते नही रहे। हाँ, ऐसे गीतों में भी शिल्प का वैशिष्ट्य अपनी पृथक पहचान छोड़ता था। मांसलता से रचे बसे प्रेम और शृंगार के स्थान पर प्रेम की उदात्तता के दर्शन नवगीत में होते थे। बिम्बात्मकता, संश्लिष्टता, और लय आधारित छंद विधान उसकी विशिष्टता थी।
आज तक भी गीत, नवगीत की विशिष्टताओं के साथ जीवन और जगत को उसकी समग्रता में अभिव्यक्त कर रहा है यहाँ तक कि परम्परागत छन्दों में गीत रचने वाले गीतकार भी उन्हीं विशिष्टताओं को अपने गीतों में स्थान दे रहे हैं। इस प्रकार के गीत/नवगीत रचने वाले गीत कवियों का नामोल्लेख करना आवश्यक है। परन्तु उससे पहले स्मृतिशेष हो चुके गीतकारों का पुण्य स्मरण करना मैं अपना धर्म समझता हूँ। स्व. वीरेन्द्र मिश्र अपने रचना समय के अत्यन्त प्रातिम नवगीतकार थे। जीवन की कोमल अनुभूतियों के चितेरे आनन्द मिश्र जहाँ एक ओर थे, वहीं कविता में जीवन का खुरदुरापन तथा कहन में व्यंग्य की पैनी धार लिये स्व. मुकुट बिहारी सरोज तर्जनी दिखा रहे थे। और मनमोहन अंबर अपने मधुर गीतों से मोह रहे थे (ये सभी ग्वालियर के थे)। शिवपुरी में स्व. रामकुमार चतुर्वेदी चंचल अपने वीररस के गीतों से समाज में अद्भुत ऊर्जा का संचार कर रहे थे, ग्वालियर में स्व. श्यामा सलिल अपने नवगीतों में समकालीन यथार्थ को अभिव्यंजित कर रही थीं। भोपाल में स्व. राजेन्द्र अनुरागी (आज देखो मुल्क सारा लाम पर है/जो जहाँ पर है वतन में काम पर है) राष्ट्र का आह्वान कर रहे थे और स्व. नईम अपने रचना काल के खुरदरे यथार्थ को सांस्कृतिक प्रतीकों और बिम्बों से समृद्ध नवगीत रच रहे थे। छत्तीसगढ़ के प्रकृति-चितेरे स्व. नारायण लाल परमार (कांकेर), स्व. भगवान स्वरूप ‘सरस’ जिनके नवगीतों में बिम्ब अपनी अदभुत छटा बिखेरते थे और स्व. मुस्तफा हुसैन ‘मुस्फिक’ (दोनों रायपुर) ने इस गीत यात्रा को अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा के साथ आगे बढ़ाया। सागर के कवि/राजनेता स्व. शिवकुमार श्रीवास्तव गीत कथ्य और शिल्प की दृष्टि से अतयन्त उत्कृष्ट थे।
भोपाल, मध्य प्रदेश की राजधानी है और संस्कृति का बहुत बड़ा केन्द्र भी हैं। राजधानी बनने के बाद यहाँ साहित्यिक गतिविधियों में पर्याप्त तेजी आयी। यहाँ के अनेक गीतकारों ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनायी और ख्याति प्राप्त की। सर्वश्री मयंक श्रीवास्तव, जहीर कुरेशी, यतीन्द्र नाथ राही, कुंवर किशोर टण्डन, दिवाकर वर्मा, डॉ. रामवल्लभ आचार्य, राघवेन्द्र तिवारी, दिनेश प्रभात, शिवकुमार अर्चन, रामअधीर, नरेन्द्र दीपक, विनोद रायसरा, जंगबहादुर श्रीवास्तव, डॉ. हुकुमपाल सिंह विकल, डॉ. ब्रह्मजीत गौतम और निर्मला जोशी महत्वपूर्ण गीतकवि है। श्री महेश श्रीवास्तव के मध्यप्रदेश के प्रयाण गीत को राज्य शासन ने राज्य गीत का गौरव प्रदान किया है विदिशा में जगदीश श्रीवास्तव और युजल श्रीवास्तव के साथ-साथ वासौदा में कृष्णश्री अत्यन्त उल्लेखनीय नाम हैं जो समकालीन सरोकारों को अपने गीतों में बड़े सलीके से अभिव्यंजित कर रहे हैं।
ग्वालियर सम्भाग पहले से ही गीत औरगीतकारों की दृष्टि से समृद्ध रहा है। वहाँ की गीत परम्परा अत्यन्त गौरवशालिनी है जो आज तक भी अक्षुण्ण है। प्रो. विद्यानन्दन राजीव (शिवपुरी), डॉ. परशुराम शुक्ल ‘बिरही’ (शिवपुरी), भगवती प्रसाद कुलश्रेष्ठ और सूर्य प्रकाश सक्सेना (मुरेना), डॉ. श्याम बिहारी श्रीवास्तव और रामस्वरूप स्वरूप (सेंवढ़ा/दतिया), महेश अनद्य, महेन्द्र भटनागर, राजकुमारी रश्मि ब्रजेश चन्द्र श्रीवास्तव, मुरारीलाल गुप्त ‘गीतेश’, रामप्रकाश अनुरागी, पृथ्वीराज दुआ और दामोदर शर्मा (सभी ग्वालियर) ग्वालियर सम्भाग के प्रमुख गीतकवि हैं।
इन्दौर-उज्जैन सम्भाग भी सदैव से गीत विधा के निष्णात सर्जकों के गढ़ रहे हैं। यहाँ के अनेक गीतकारों/ नवगीतकारों ने राष्ट्रीय स्तर पर गीत की ध्वजा को फहराया है। सर्वश्री अशोक ‘आनन्द’, इशाक अश्क, अशोक गीते, डॉ. श्रीरामपरिहार चन्द्रसेन विराट, बालकवि वैरागी, ओम प्रभाकर, देवव्रत जोशी, जयकुमार जलज, प्रेमशंकर रघुवंशी और वीरेन्द्र निर्झर श्रेष्ठ गीतों का सृजन कर रहे हैं।
जबलपुर-सागर सतना क्षेत्र गीत नवगीत सृजन में आज अग्रसर की भूमिका में हैं अनेक महतवपूर्ण कवि श्रेष्ठ गीत नवगीत रच रहे हैं कुछ नाम तो बहुत बड़े हैं, जिनके गीत समाज को प्रभावित करते रहे हैं। अनूप अशोक, डॉ. हरीश निगम, ऋषिवंश (सतना), राम सेंगर, देवेन्द्री कुमार पाठक (कटनी), विदुल भाई पटेल, निर्मल चन्द जैन, डॉ. धर्मसिंह (सागर), डॉ. श्याम सुन्दर दुबे (दमोह) आदि अत्यन्त उल्लेखनीय नाम हैं इसी प्रकार होशंगाबाद और छिंदबाड़ा में गीत-नवगीत की दृष्टि से श्रेष्ठ लेखन हो रहा है। श्रीकृष्ण शर्मा (जुन्नारदेव), विनोद निगम, डॉ. कृष्णगोपाल मिश्र और गिरिमोहन गुरु (होशंगाबाद) आदि अनवरत रूप से गीत सृजन में संलग्न हैं
वरिष्ठ गीतकारों के मध्य यह न केवल चिन्तन अपितु चिन्ता का विषय ही रहा है कि युवा वर्ग गीत के साथ नहीं जुड़ रहा है। किन्तु मध्य प्रदेश में उतनी निराशाजनक स्थिति भी नहीं हैं अनेक युवा, गीत/नवगीत की रचना करने में संलग्न हैं चित्रांश वाघमारे (भोपाल) जो मात्र १८-१९ वर्ष के हैं अत्यन्त उत्कृष्ट गीतों का सृजन कर रहे हैं। कथ्य, शिल्प, छन्द, बिम्ब-विधान आदि सभी कोणों से उनके गीत रेखांकित करने योग्य हैं। उनके अतिरिक्त डॉ. अजय पाठक (विलासपुर), रामकिशोर दाहिया, राजा अवस्थी, आनन्द तिवारी और अरुणा दुबे (कटनी), डॉ. शरद सिंह (सागर), मधु शुक्ला, मनोज जैन मधुर, दीपक शुक्ल, धर्मेन्द्र सिंह सोलंकी (भोपाल), वर्षा रश्मि (ग्वालियर), डॉ. मुकेश अनुरागी (शिवपुरी), तथा ब्रजेश द्विवेदी ‘अमन’, रोहित रुसिया तथा नितिन जैन (छिंदवाड़ा) आदि कुछ तरुणों के नाम हैं, जिन पर गीत जगत भविष्य के लिए भरोसा कर सकता है।
छत्तीसगढ़ के कुछ नामों का मैं यहाँ पृथक से उल्लेख करना चाहता हूँ। जैसा कि पूर्व में उल्लेख हुआ है कि छायावाद की प्रवर्तक भूमि छत्तीसगढ़ ही है। यहाँ गीत/नवगीत की एक गौरवशाली परम्परा रही है। सर्वश्री अनिरुद्ध नीरज (अम्बिकापुर), डॉ. गोविन्द ‘अमृत’ (विलासपुर), मोहन भारतीय (भिलाई), त्रिभुवन पाण्डेय (धमतरी), शंकर सक्सेना (राजनांदगांव) आदि उत्कृष्ट गीतकार/नवगीतकार अपनी रचनाधर्मिता से क्षेत्र का गौरव बढ़ा रहे हैं।
गीत-सृजन के ग्राफ को मापने के लिए प्रकाशित गीत संग्रह और साहित्यिक पत्रिकाएँ मापक का कार्य करती हैं गीतों और गीतकारों के मूल्यांकन के लिए भी ये ही उपकरण मानक के रूप में उपस्थित रहते हैं। विगतः पांच वर्षों में शताधिक गीत संग्रह प्रकाशित हुए हैं और अनेक समवेत संकलन भी प्रकाश में आए हैं कुछ उदाहरण यहाँ प्रस्तुत करना समीचीन होगा। संग्रह और गीतकार अथवा समवेत संकलन और सम्पादक को नामों का मैं यहाँ उल्लेख करना चाहूँगा। भोपाल से ही चार समवेत संकलन प्रकाशित हो चुके हैं, जिनका परिचय इस प्रकार है- भोपाल दशक (सं. विनोद तिवारी), सप्तराग (सं. शिव कुमार अर्चन), गीत अष्टक-१, गीत अष्टक-२ (सं. कमलकान्त सक्सेना)। व्यक्तिगत संग्रहों के नाम और विवरण इस प्रकार है।
‘उंगलियाँ उठती रहें’ (मयंक श्रीवास्तव, ‘और उलझाते गए जाल में’ और ‘सूर्य के वंशज सुनो (दिवाकर वर्मा), ‘स्याही से लिखी जाती नहीं’ (विनोद रायसेन), ‘एक बूँद हम’ (मनोज जैन मधुर), ‘ऊँट चल रहा है’ और ‘जिरह फिर कभी होगी’ (राम सेंगर), ‘एक नदी कोलाहल’, ‘बोल मेरे मौन’, ‘अंधेरा बढ़ रहा है’ और ‘एक अक्षर और’ (श्री कृष्ण शर्मा), ‘गीतों में डूबा मन’ (मोहन भारतीय), ‘और सोच में तुम...’ (नरेन्द्र दीपक), ‘अंजुरी भर हरसिंगार’ (यतीन्द्रनाथ ‘राही’), ‘झनन झकास’ और कनबतिया’ (महेश अनघ), ‘हिरण सुगन्धों के’ (आचार्य भगवत दुबे), ‘हिरना खोजे जल’ (विद्यानन्दन राजीव), ‘सुधियों के आर-पार’ (अजय पाठक), ‘अल्पना अंगार पर’ (रामकिशोर दाहिया), ‘जिस जगह यह नाव है’ (राजा अवस्थी), ‘ऋतुयें जो आदमी के भीतर हैं’ (श्याम सुन्दर दुबे), ‘गीत प्यार के’ (रामप्रकाश अनुरागी), ‘उसी हाट के हम व्यापारी’ (रामस्वरूप ‘स्वरूप’), ‘रेत बँधे पानी’ (डॉ. श्याम बिहारी श्रीवास्तव) आदि कुछ उदाहरण हैं इस प्रकार यह स्पष्ट है कि गीत संग्रह और गीत संकलन प्रकाशन के मोर्चे पर प्रदेश में पर्याप्त सक्रियता है।
साहित्यिक पत्रिकाएँ सद्यः रचित रचनाओ को पाठकों के माध्यम से समाज तक पहुँचाने का महत्वपूर्ण कार्य करती हैं इसके अतिरिक्त ये पत्रिकाएँ ही रचनाकार को विधागत जानकारियों, प्रवृत्तियों, धाराओं आदि के विषय में अद्यतन रखने में अपेक्षित भूमिका का निर्वहन करती हैं। मध्य प्रदेश इस दृष्टि से भी अत्यन्त उर्वर प्रदेश रहा हैं। भोपाल, इन्दौर, ग्वालियर, जबलपुर, रायपुर, बिलासपुर आदि स्थानों से अनेक साहित्यिक पत्रिकाएँ प्रकाशित होती हैं शासकीय, अर्धशासकीय और अशासकीय स्तर पर प्रकाशित होने वाली ये पत्रिकायें साहित्यिक परिवेश को निश्चित ही प्रभावित करती हैं राजधानी होने से यह स्वाभाविक ही है कि सर्वाधिक पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन भोपाल से होता है। वैसे तो पत्र-पत्रिकाओं की संख्या बहुत अधिक है, किन्तु यहाँ मैं उन्हीं पत्रिकाओं का उल्लेख करूँगा जो सामान्यतः छन्द और विशेषतः गीत/नवगीत की पक्षधर हैं मैंने गीतकारों का उल्लेख करते हुए सर्वप्रथम स्मृतिशेष गीतकारों का स्मरण किया, यहाँ भी मैं ऐसा ही करूँगा। मैं सर्वप्रथम नामोल्लेख करते हुए स्मरण कर रहा हूँ ‘प्रेस मेन’ का, जिसने अपनी अल्प-कालावधि में राष्ट्रीय हिन्दी काव्य जगत को न केवल प्रभावित किया अपितु चमत्कृत कर दिया। मयंक श्रीवास्तव के साहित्य सम्पादकत्व और समीर श्रीवास्तव के कार्यकारी सम्पादकत्व में प्रकाशित हुए साप्ताहिक साहित्यिक पत्र ने अनेक बिछुड़े हुए गीतकारों को पुनः परस्पर मिला दिया। अनेक विचारोत्तेजक परिचर्चा और संवाद आयोजित किए। ‘गीत को गीत ही रहने दो’ ऐसा ही एक महत्वपूर्ण संवाद था, जिसमें देशभर के लगभग सभी गीतकारों/नवगीतकारों ने सहभागिता की। भोपाल से राम अधीर के सम्पादकत्व में प्रकाशित ‘संकल्प रथ’ विशुद्ध छन्दधर्मी पत्रिका है। इसी क्रम में सतना से डॉ. इसाक अश्क के सम्पादन में प्रकाशित ‘समांतर’ और खण्डवा से डॉ. श्रीराम परिहार के सम्पादन में प्रकाशित ‘अक्षत’ का उल्लेख किया जा सकता है।
बिलासपुर से डॉ. अजय पाठक के सम्पादन में ‘नये पाठक’, ग्वालियर से महेश अनघ की ‘पृथ्वी और पर्यावरण’ भोपाल से युगांश मालवीय और सजल मालवीय के सम्पादन में ‘शिवम पूर्णा’ भी विशुद्ध छन्दधर्मी पत्रिकाएँ हैं जो गीत को विशिष्ट स्थान देती हैं। स्व. कमलकान्त सक्सेना की ‘साहित्य सागर’ ने भी छन्द और गीत की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया हैं शिवपुरी से डॉ. महेन्द्र अग्रवाल के सम्पादन में ‘नई गजल’, ग्वालियर से डॉ. भगवान स्वरूप चैतन्य की पत्रिका ‘लोक मंगल’, भोपाल से ही स्व. विनोद तिवारी द्वारा स्थापित और अनुपम तिवारी के सम्पादन में प्रकाशित ‘शिवम’ छन्द और गीत के लिए महत्वपूर्ण कार्य सम्पादन कर रही हैं। भोपाल से ही नरेन्द्र दीपक के सम्पादन में ‘अन्तरा’ का प्रकाशन हो रहा है, जो छन्द, गीत और गीतकारों को लेकर महत्वपूर्ण अंक निकालती रही हैं देवास से प्रकाशित ‘अर्वाते कलम’ इकबाल बशर के सम्पादन में छन्द की दृष्टि से स्तरीय कार्य कर रही है।
ग्वालियर से मुरारी लाल गुप्त ‘गीतेश’ के सम्पादन में प्रकाशित अखिल भारतीय साहित्य परिषद की मुख्य पत्रिका ‘साहित्य परिक्रमा’ भी न केवल हिन्दी साहित्य जगत में प्रत्युत हिन्दी इतर क्षेत्रों में भी छन्द की अलख जगा रही है। भोपाल से ही प्रकाशित पत्रिका ‘अक्षर शिल्पी’ में डॉ. विजय शिरढोलकर के सम्पादन में अपना महत्वपूर्ण योगदान किया है। दिवाकर वर्मा के अतिथि सम्पादन में प्रकाशित ‘गीत विशेषांक’ मील का पत्थर सिद्ध हुआ है। एक स्वागत योग्य हर्ष का समाचार है कि मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी की पत्रिका ‘साक्षात्कार’ न केवल गीत निरन्तर प्रकाशित कर रही है, अपितु गीत विषयक आलेख और अनेक गीतकारों के साक्षात्कार भी प्रकाशित किये हैं, जिनमें देवव्रत जोशी, मयंक श्रीवास्तव और दिवाकर वर्मा उल्लेखनीय हैं। इसी प्रकार प्रदेश की दो अन्य प्रमुख पत्रिकाएँ हिन्दी भवन भोपाल की ‘अक्षरा’ और मध्यभारत हिन्दी साहित्य समिति इन्दौर की ‘वीणा’ तथा मध्यभारतीय हिन्दी साहित्य सभा की पत्रिका ‘इंगित’ अपनी अपनी भूमिकाओं का निर्वहन कर रही हैं।
गीत आलोचना की दृष्टि से मैं कह सकता हूँ कि स्थिति कोई बहुत अच्छी नहीं है। पूर्णकालिक गीत आलोचकों की नगण्यता है। सम्भवतः हरदा के प्रेमशंकर रघुवंशी, होशंगाबाद के डॉ. कृष्ण गोपाल मिश्र, भोपाल की डॉ. आरती दुबे और डॉ. प्रेम कुमारी कटियार का ही उल्लेख किया जा सकता है। किन्तु कुछ सम्पादक और गीतकार इस दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। उन्होंने पर्याप्त मात्रा में अनवतरत रूप से समीक्षा कर्म किया है। सम्पादक/समीक्षकों में राम अधीर, डॉ. श्रीराम परिहार, महेश अनद्य, डॉ. अजय पाठक, मुरारीलाल गुप्त ‘गीतेश’ का नाम लिया जा सकता है। वरेण्य गीतकार-सम्पादक रामअधीर ने सम्भवतः सर्वाधिक समीक्षाएँ की हैं। इसी प्रकार गीतकार समीक्षकों में प्रथम नाम पर दिवाकर वर्मा का उल्लेख किया जा सकता है जिन्होंने सर्वाधिक और लम्बी -लम्बी समीक्षाएँ लिखी हैं उन्होंने इसके साथ-साथ गीत-विमर्श की दृष्टि से भी लगभग दो दर्जन वैचारिक आलेख लिखे हैं अन्य गीतकारों ने भी अपनी-अपनी सीमाओं के अन्तर्गत समीक्षाकर्म किया है। प्रो. विद्यानन्दन राजीव, डॉ. श्याम सुन्दर दुबे, श्रीकृष्ण शर्मा, मयंक श्रीवास्तव, अनिरुद्ध नीरव, आचार्य भगवत दुबे, डॉ. शरद सिंह, डॉ. ब्रह्मजीत गौतम, डॉ. हुकुमपाल सिंह विकल, जंगबहादुर श्रीवास्तव, राघवेन्द्र तिवारी, मनोज जैन ‘मधुर’, मधु शुक्ला, शिवकुमार अर्चन, दिनेश प्रभात आदि समय-समय पर समीक्षा धर्म निभाते रहे हैं।
विविधवर्णी विभिन्न साहित्यिक कार्यक्रम जहाँ एक ओर साहित्य को समाज से जोड़ते हैं और रची जाने वाली रचनाओं को समाज तक सम्प्रेषित करने की महती भूमिका का निर्वहन करते हैं, वहीं दूसरी ओर साहित्य जगत में व्याप्त निसंगत स्थितियों का समापन कर साहित्यिक पर्यावरण को शुद्ध करते हैं। इन कार्यक्रमों में विभिन्न विधाओं के रचनाकारों को परस्पर विचार विमर्श के साथ-साथ जानकारी सूचना और ज्ञान के आदान-प्रदान का अवसर भी प्राप्त होता है। सक्रिय रचनाकार अपनी-अपनी विधाओं में पनप रही विविध प्रवृत्तियों, धाराओं और साथ ही आवश्यक प्रगति-सूचनाओं से भी अवगत होते हैं। एक समय ऐसा आ गया था कि गीत को केन्द्र से हटाने के दुष्प्रयास में ऐसे कार्यक्रम आयोजित किया जाना नगण्य हो गया था। किन्तु, अब परिदृष्य बदला है और विगत कुछ वर्षों में ऐसे अनेक कार्यक्रम गीत को केन्द्र में रखकर आयोजित हुए हैं। इस विषय में यहाँ यह बताने में हर्ष के साथ गौरव की अनुभूति हो रही है कि मध्य प्रदेश ने इस दृष्टि से पर्याप्त प्रगति की है। भोपाल, गवालियर, शिवपुरी, विलासपुर और इन्दौर में कुछ बड़े तथास्तरीय कार्यक्रम आयोजित किये हैं ‘साहित्य सागर’ (स्व. कमलकान्त सक्सेना) के द्वारा पिछले वर्ष आयोजित ‘नटवर सम्मान’ शिवपुरी में डॉ. महेन्द्र अग्रवाल द्वारा आयोजित ‘गीत सम्मान’ विलासपुर में आयोजित दो दिवसीय ‘गीत विमर्श’ जो डॉ. विनय पाठक और डॉ. अजय पाठक के प्रयासों से हुआ।
ग्वालियर में ब्रजेश कुमार श्रीवास्तव के प्रयासों से आयोजित वृहद कार्यक्रम, भोपाल में मध्य प्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति द्वारा आयोजित व्याख्यानमाला में गीत विमर्श, मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी द्वारा इन्दौर में आयोजित दो दिवसीय कार्यक्रम में एक सत्र गीत हेतु आवंटित किया गया आदि कुछ ऐसे आयोजन थे, जिन्होने साहित्य जगत में एक हलचल पैदा की। निराला सृजनपीठ (मध्य प्रदेश संस्कृति परिषद) द्वारा भारत भवन में प्रतिवर्ष आयोजित किया जाने वाला ‘छन्दप्रसंग’ अद्भुत है। निराला सृजन पीठ ने महाप्राण निराला और छन्द तथा गीत को लेकर विमर्श एवं रचनापाठ के अनेक कार्यक्रम दतिया, मुरेना, उज्जैन जैसे अंचलों में आयोजित किये हैं इस प्रकार कार्यक्रमों की दृष्टि से मध्य प्रदेश में निरन्तर सक्रियता बनी हुई है। समग्रतः मध्य प्रदेश का गीत परिदृश्य उत्साहजनक है अधिसंख्य गीतकारों की सृजन-सक्रियता बनी हुई है। गीत/नवगीत से युवा पीढ़ी के जुड़ने का क्रम प्रारम्भ हो गया है यद्यपि यह गति धीमी है, किन्तु स्थिति निराशाजनक नहीं है। गीतकारों द्वारा किये गये सृजन का यथाशक्य प्रकाशन हो रहा है। पत्र-पत्रिकाएँ अपने कर्म का निर्वहन और धर्म का पालन उत्तरदायित्वपूर्ण ढंग से कर रही हैं आलोचना के मोर्चे पर यद्यपि अपेक्षित प्रगति नहीं है, किन्तु निराशा का कोई कारण भी नहीं है। गीत विमर्श और गीत-पाठ के कार्यक्रम न केवल नगरों और महानगरों में हो रहे हैं, अपितु सुदूर अंचलों में भी इन कार्यक्रमों को ले जाया जा रहा है। इन सब गतिविधियों की सक्रियता का ही यह सुफल है कि मध्यप्रदेश के विभिन्न विद्यालयीन पाठ्यक्रमों में गीत को प्रवेश मिला है। हम आश्वस्त हो सकते हैं कि गीत/नवगीत का भविष्य निश्चित ही उज्जवल है।
१८ फरवरी २०१३
नवगीत परिसंवाद-२०१२ में पढ़ा गया शोध-पत्र
उत्तर प्रदेश में नवगीत का भविष्य
-मधुकर अष्ठाना
साहित्य समाज से आगे चलकर परिवर्तन का मार्ग बनाता है पूरे समाज को चिन्तन की नयी दिशा देता है, साहित्य उपदेशक या प्रवाचक नहीं है किन्तु ऐसा वातावरण बनाता है जिसमें प्रतिरोध एवं प्रतिकार के अंकुर जन्म ले सकें एवं अव्यवस्था के विरुद्ध आक्रोश ऊर्ध्वगामी हो, किन्तु इस तथ्य के विपरीत वही साहित्य मात्र कुछ लोगों के मनोरंजन के लिये लिखा जाता है तो वह ऊर्ध्वगामी होकर समाज की प्रगति में अवरोध उत्पन्न करता है और एक परिधि में बन्दी रहकर नकारात्मकता को प्रोत्साहन देता है, अभिजातवर्गीय मनोरंजन वादी किरकिरे साहित्य की मानव विरोधी प्रवृत्ति के विरुद्ध सम्पूर्ण विश्व में बदलाव आया जिसका प्रभाव कहीं जल्द और कहीं देर से आया, भारत में इस बदलाव की लहर देर से आई और गीतों में तो और भी विलम्ब से यह परिणामित हुई, इस बदलाव के प्रथम चरण में छायावादोत्तर गीतों में मामूली नयापन दिखाई पड़ा जिसमें प्रतिरोध और प्रतिकार का स्वर अलक्षित रहा।
वास्तव में गीतों में पविर्तन दूसरे चरण में आया जब लघुमानव के शोषण उत्पीड़न की व्यथा कथा के गीत मुखरित होने लगे, इस क्रम में नूतन कथ्य के अनुकूल भाषा की तलाश प्रारम्भ हुई। गीत ने भाषायी परिवर्तन और नयेपन के लिये नगरीय भाषा के साथ देशज शब्दों की युगलबन्दी को प्रोत्साहित किया, इस गीत में मुहावरों-लोकोक्तियों के योग से नये प्रतीकों और बिम्बों को गति मिली। दोहों की संक्षिप्तता, गजलों की व्यंजना और नयी कविता के विचारों ने इस गीत को नया तेवर और धार दी। जहाँ तक प्रतिरोध प्रतिकार का प्रश्न है यह पूँजी लोक गीतों के रूप में भारत जैसे ग्राम-देश में अकूत विद्यमान है जो पूर्णरूपेण भारतीय संस्कृति, संस्कार एवं परम्परा की देन है।
इस नये परिवर्तित रूप को अधिकांश रचनाकारों ने नवगीत के रूप में स्वीकार किया जिसमें साधाराण जनता के सुख-दुख, राग-विराग, शोषण-उत्पीड़न, जीवन-संघर्ष, जिजीविषा, त्रासदी, विसंगति, विषमता, विघटन, विद्रूपता, विद्वेष, मानवीय सम्बन्धों में बिखराव, मानवता का क्षरण और संस्कृति का पतन आदि का यथार्थ और वास्तविक चित्रण होने लगा जिसकी आत्मा में सम्वेदना रही एवं थोड़े बहुत परिवर्तन के उपरान्त भी यही क्रम गतिशील है। यदि नवगीतकार श्रीनिर्मल शुक्ल के शब्दों में कहें तो नवगीत खौलती सम्वेदनाओं को वर्ण-व्यंजना है, दर्द की बाँसुरी पर धधकते हुए परिवेश में भुनती जिन्दगी का स्वर संधान है, वह पछुवा के अंधड़ में तिनके की तरह उड़ते स्वास्तिक की कराह है।" मैं भी जानता हूँ कि नवगीत भावनाओं के खेत में उपजी सम्वेदनाओं की वह फसल है जिसमें पीड़ा की खाद पड़ती है और आँसुओं की सिंचाई होती है। समसामयिक सन्दर्भों की गहन सम्वेदना और अपने परिवेश को अभिव्यक्ति देता यह नवगीत साठ वर्ष से भी अधिक समय को मुखरित कर चुका है और अब भी समाज में जागरण लाने तथा अव्यवस्था के विरुद्ध पूरी क्षमता के साथ आक्रामक है।
नवगीत किसी वाद का प्रवर्तक नहीं है बल्कि मुक्त मानसिकता के साथ मानवता का पोषक है और मानवीय दृष्टिकोण से अपने समय की जाँच परख कर प्रस्तुत करता है। इस शब्द सम्वेदना के यज्ञ में सैंकड़ों रचनाकारों ने अपने विशिष्ट चिन्तन के साथ योगदान दिया है और भविष्य में भी यह क्रम कहीं रुकने वाला नहीं प्रतीत होता है। रागात्मक अन्तश्चेतना से उपजी सम्वेदना का यह छान्दसिक स्वरूप अनवरत रचनाकारों की कृतियों तक ही नहीं सीमित रह गया बल्कि आम आदमी की जबान पर भी चढ़ रहा है। इसके विकास और विस्तार के लिये हमें अपने दृष्टिकोण को असीमित रखते हुए उन सभी गेय एवं नवतायुत काव्य रूपों को नवगीत की परिधि में लाने का प्रयास करना चाहिये जिनमें प्रगतिशीलता व्याप्त है और उनकी कहन एवं कथ्य में भी समानता है एवं भाषा-शिल्प में भी लगभग एकरूपता दिखाई पड़ती है। नवगीत में उन तत्वों के संतुलन और सामंजस्य की बारीकियों पर भी ध्यान देना आवश्यक है। यदि इसे अन्तर्देशीय रूप देना है तो सहज भाषा छान्दसिकता क्षेत्रीय बोलियों का दाल में नमक के बराबर ही उपयोग आवश्यक है अन्यथा विपरीत दशा में ऐसे नवगीत विशेष क्षेत्र में ही सिमट कर रह जायेंगे।
आज ऐसे गीतकार जो परम्परा के साथ, अपनी अभिजात गीत शैली के द्वारा गहराई से जुड़े थे, उनमें भी नवगीत का प्रबल प्रभाव देखा जा रहा है और नवगीत का कथ्य अपनी परम्परागत शैली में ही लिखने लगे हैं ऐसे भी गीतकार हैं जिन्होंने देर से ही सही नवगीत की अव्यवस्था को समझा और अपनी भाषा शिल्प में परिवर्तन ले आए। इनके अतिरिक्त अनेक युवा रचनाकार भी नवगीत की ओर बढ़े हैं और अपनी पहचान बनाने का प्रयास किया है। नवगीत के क्षेत्र में विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्यप्रदेश की भूमिका पूर्व से आज तक सशक्त रूप से स्थापित होती रही है। इस क्रम में उत्तर प्रदेश में नवगीत के भविष्य को आपके समक्ष प्रस्तुत करना ही मेरा ध्येय है।
उत्तर प्रदेश में प्रारम्भ से ही नवगीत को उर्वर भूमि मिली, इस प्रदेश में पुराने हों अथवा नये नवगीतकार संख्या में सर्वथा अधिक रहे हैं और यह स्थिति वर्तमान में भी ज्यों की त्यों बनी हुई है। कबीर, तुलसी, सूर, जायसी के समय से लेकर आज तक उत्तरप्रदेश हिन्दी का हृदय बना हुआ है। विधा कोई भी हो यह प्रदेश अग्रणी रहा है। नवगीत के प्रारम्भिक काल में यहीं पर स्मृति शेष डॉ. शम्भुनाथ सिंह, चन्ददेव सिंह, ठाकुर प्रसाद सिंह, रवीन्द्र भ्रमर, रमानाथ अवस्थी, रामावतार त्यागी, भारतभूषण, उमाशंकर तिवारी, बालकृष्ण मिश्र, नीलम श्रीवास्तव, माधव मधुकर, देवेन्द्र बंगाली, उमाकान्त मालवीय, दिनेश सिंह, कैलाश गौतम, प्रतीक मिश्र आदि जैसे रचनाकारों ने नवगीत को विविध रूप और विविध प्रयोगों के माध्यम से नया आयाम दिया।
वर्तमान में सर्वश्री वृजभूषण सिंह गौतम ‘अनुराग’, प्रो. देवेन्द्र शर्मा ‘इन्द्र’, शचीन्द्र भटनागर, जगत प्रकाश चतुर्वेदी, रामदेव लाल, माहेश्वर तिवारी, श्याम नारायण श्रीवास्तव, रविन्द्र गौतम, देवेन्द्र शर्मा, कुमार रविन्द्र, राधेश्याम शुक्ल, श्याम निर्मल, ब्रजनाथ, राम सनेही लाल शर्मा, शिव बहादुर सिंह भदौरिया, अवध बिहारी श्रीवास्तव, श्रीकृष्ण तिवारी, सुरेन्द्र वाजपेयी, गुलाब सिंह, वीरेन्द्र आस्तिक, योगेन्द्र दत्त शर्मा, निर्मल शुक्ल, मधुकर अष्ठाना, भारतेन्दु मिश्र, सूर्य देव पाठक ‘प्रयाग’, गणेश गम्भीर, ओम धीरज, शीलेन्द्र कुमार सिंह चौहान, ओमप्रकाश सिंह, विनय भदौरिया, जय चक्रवर्ती, सुधांशु उपाध्याय, यश मालवीय आदि के अतिरिक्त भी अनेक नवगीतकार हैं जो हैं जो उत्तर प्रदेश के ही कितु वर्तमान में प्रदेश से बाहर बस गये हैं जिनमें बुद्धिनाथ मिश्र, अश्वघोष, विष्णुविराह, मयंक श्रीवास्तव, राधेश्याम बन्धु, पूर्णिमा वर्मन, महेन्द्र नेह आदि महत्वपूर्ण हैं।
इनके अतिरिक्त भी ऐसे अनेक नवगीतकार हैं जो हैं तो उत्तर प्रदेश के निवासी किन्तु अन्य प्रान्तों में निवास कर रहे हैं और नये रचनाकार जिनकी कम से कम एक कृति प्रकाशित हो गयी है अथवा प्रकाशन की प्रतीक्षा में है, उनकी भी संख्या उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक है। ऐसे रचनाकारों में सर्व श्री योगेन्द्र वर्मा ‘व्योम’ अवनीश सिंह चौहान, आनन्द गौरव, संजय शुक्ल, शैलेन्द्र शर्मा, रामनारायण, रमाकान्त, राजेन्द्र बहादुर ‘राजन’, रामबाबू रस्तोगी, विनोद श्रीवास्तव, सत्येन्द्र तिवारी, विनय मिश्र जयशंकर शुक्ल, जयकृष्ण शर्मा तुषार, राजेन्द्र वर्मा, देवेन्द्र ‘सफल’ अभय मिहिर, अनिल मिश्र, राजेन्द्र शुक्ला ‘राज’, कैलाश निगम, मृदुल शर्मा, अनन्त प्रकाश तिवारी, निर्मलेन्दु शुक्ल, अमृत खरे आदि महत्वपूर्ण हैं। यदि खोज की जाये तो यह संख्या लगभग दूनी हो सकती है। नवगीतात्मक रुझान वाले रचनाकारों की संख्या तो इसके दूने से कम नहीं होगी। तीसरी पीढ़ी के अपेक्षाकृत कुछ रचनाकारों से मैं परिचित कराना चाहूँगाः-
डॉ. अवनीश कुमार सिंह चौहान
अंग्रेजी विषय में पी.एच.डी. डॉ. अवनीश मुरादाबाद में तीर्थंकर विश्वविद्यालय में अंग्रेजी विभाग में प्रवक्ता हैं वे नये पुराने सुप्रसिद्ध नवगीत पत्रिका के सम्पादन के साथ ही वेब पत्रिका पूर्वाभास व गीतपहल के समन्वयक एवं सम्पादक हैं। देश की पचासों पत्रिकाओं में उनकी रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं तथा दर्जनों सहयोगी संकलनों में उनके गीत हैं। देश की अनेक संस्थाओं ने तो उन्हें सम्मानित किया ही है, विदेश में भी उनके कार्य एवं सृजन पर अनेक सम्मान एवं पुरस्कार मिल चुके हैं। गीत के सम्बन्द्ध में अपने विचार व्यक्त करते हुए वे कहते हैं- ‘‘आम गीत किसी देश-विदेश की भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं रहा बल्कि समसामयिक स्थितियों परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अपने कायान्तरण के बाद नवगीत के रूप में सम्पूर्ण सृष्टि की बात बड़ी बेबाकी से कर रहा है जिसमें समाहित है वस्तुपरता, लयात्मकता, समष्टिपरकता एवं अभिनव प्रयोग, इसलिये वर्तमान में नवगीत प्रासंगिक एवं प्रभावी विधा के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान बनाये हुए है। सामाजिक विसंगतियों विद्रूपताओं को देख-सुन कर जब कभी मेरा मन अकुलाने लगता है अथवा कभी प्रेममय, शांतिमय या आनंदमय स्थिति में अपने को पाता हूँ तो मन गाने लगता है और मैं उन शब्दों को कलम बद्ध कर लेता हूँ।’’ उदाहरणार्थ डॉ. चौहान का एक नवगीत प्रस्तुत हैः-
‘‘बिना नाव के माझी देखे
मैंने नदी किनारे
इनके-उनके ताने सुनना, दिन भर देह जलाना
तीस रुपैया मिले मजूरी नौ की आग बुझाना
अलग-अलग है रामकहानी
टूटे हुए शिकारे
बढ़ती जाती रोज उधारी ले-दे काम चलाना
रोज-रोज झोपड़ पर अपने नये तगादे आना
घात सिखाई है तंगी में
किसको कौन उबारे
भरा जलाशय जो दिखता है केवल बातें घोले
प्यासा तोड़ दिया करना दम मुख को खोले-खोले
अपने स्वप्न भयावह कितने
उनके सुखद सुनहरे‘‘
श्री राजेन्द्र शुक्ल ‘राज’
हिन्दी विषय से एम.फिल., साहित्य रत्न श्री राजेन्द्र शुक्ल ‘राज’ वर्तमान में हिन्दी प्रवक्ता के पद पर एस. के. डी. एकेडमी इन्टर कालेज लखनऊ में कार्यरत हैं। छन्दों की पृष्ठभूमि से निकले श्री राज की नवगीत कृति ‘मुट्ठी की रेत’ प्रकाशनाधीन है। वे निरन्तर पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। इन्टरनेट पत्रिका अनुभूति में भी इनके गीत आये हैं। इसके अतिरिक्त, आलेख, संस्मरण, भेंटवार्ता तथा समीक्षा आदि भी प्रकाशित होते रहे हैं। पत्रकारिता एवं रंग कर्म में भी उन्होंने प्रयास किया है, लगभग एक दर्जन संकलनों में सहभागी के रूप में संकलित हैं। लखनऊ नगर की अनेक साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े श्रीराज ‘सर्वजन हिताय’ साहित्यिक समिति के संयोजक हैं जिसकी मासिक गोष्ठियाँ अविच्छिन्न रूप से हो रही हैं। गीत को श्री राज साहित्य सर्वोत्तम विधा मानते हैं जबकि वे छन्दों में भी बेहद कुशल हैं। उनका यह भी कहना है कि गीत के संशोधित, परिवर्धित रूप में अपनी विगत पीड़ाओं को समष्टिगत रूप देना ही वास्तविक नवगीतकार का मुख्य रचनाधर्म है और ऐसी स्थिति में यथार्थता के साथ परिवेश का चित्रण सहज ही होता है। सृजन में रचनाकार का निष्पक्ष एवं ईमानदार कथ्य ही उसे समाज से जोड़ता है उदाहरणार्थ उनका एक नवगीत मैं यहाँ पर उद्धृत कर रहा हूँ:-
‘‘मुश्किल में मुस्कान हमारी क्या बोलूँ
संकट में पहचान हमारी
क्या बोलूँ
नालन्दा में लंदन पेरिस, कुटियों में
हम, बाजारी लाश खोजते दुखियों में
आसमान छू लिया मगर गिर गये बहुत
ग्रहण लगा बैठे धरती की खुशियों में
कैसी रही उड़ान हमारी
क्या बोलूँ
हमने थामा शास्त्र,शस्त्र को छोड़ दिया
प्यासा आया पास, तो गला रेत दिया
ऐसा तंत्र रचा विचार की मौत हुई
अपनी पीढ़ी को हमने बस पेट दिया
छवि है लहूलुहान हमारी
क्या बोलूँ’’
श्री संजय शुक्ल
स्नातक अध्यापक प्राकृतिक विज्ञान के पद पर शिक्षा विभाग, दिल्ली में कार्यरत हैं। अनेक लब्ध प्रतिष्ठ साहित्यिक पत्रिकाओं में उनकी रचनायें प्रकाशित होती रही हैं। नवगीत के अतिरिक्त गजल और समीक्षक के रूप में भी उनकी प्रसिद्धि है। दूरदर्शन और आकाशवाणी से भी उनके गीत-नवगीत प्रसारित होते हैं। अनेक साहित्यिक संस्थाओं ने उन्हें सम्मानित किया है। छन्दोबद्ध सृजन के प्रबल पक्षधर श्री शुक्ल मानते हैं कि ‘‘अपने भोगे यर्थार्थ से उपजी लौकिक-अलौकिक कल्पनाओं की कवि द्वारा की गयी कलात्मक, लयात्मक स्वर-ताल से सुसज्जित गीत रचना श्रोता और पाठक को मुग्ध करती है। नवगीत में अपने समय को अभिव्यक्त करने का संकल्प लिया है जो एक चुनौती है इसलिये दूर-दूर तक इसमें खुरदुरापन पसरा हुआ है। वैश्वीकरण, उपभोक्तावाद और लिजलिजे विज्ञापन के युग में कोमल, सरल, सरस, बिम्बों-प्रतीकों के माध्यम से अपने परिवेश को व्यक्त करना अब सम्भव नहीं रहा। कवियों ने नये सन्दर्भों, नये विमर्शों को पौराणिक एवं ऐतिहासिक आख्यानों से जोड़ कर अपने सृजन को समृद्ध तो किया ही है साथ अर्थवत्ता को व्यापकता प्रदान की है। कवि अपनी समृष्टि और ईश्वर प्रदत्त प्रतिभा से स्वान्तः सुखाय और लोक मंगल के लिये भाव प्रवण मार्मिक गीतों के साथ-साथ सत्ता की अराजकता पर व्यंग्य गीत लिख रहे हैं और लिखते रहेंगे।’’
उदाहरणार्थ श्री संजय शुक्ल का एक नवगीत प्रस्तुत हैः-
‘‘ठीक बरस भर बाद सुखनवाँ घर को लौट रहा
सम्भावित प्रश्नों के उत्तर
मन में सोच रहा
पूछेगी अम्मा बचुआ क्यों इतने सूख रहे
पीते प्यास रहे अपनी क्या खाते भूख रहे
कह दूंगा अम्मा शहरों की उल्टी रीति रही
वही सजीले दिखते जिनके
तन में लोच रहा
बहुत तजुर्बा है आंखें सब सच-सच पढ़ लेंगी
गरजें बापू का मन बातें क्या-क्या गढ़ लेंगी
कह दूंगा फिर भी बिदेश में मरे न मजदूरी
नहीं अधिक खटने में
मुझको भी संकोच रहा
बहिना की अंखियाँ गौने का प्रश्न उठायेंगी
भौजी दद्दा की दारू का दंश छिपायेंगी
दिल घबराया तो मनने कुछ सुखद कल्पना की
झुकी हुई दादा की मूँछें
मुन्ना नोंच रहा
चाहेंगे मनुहार प्रश्न कुछ भोले, कुछ कमसिन
हमला बाजारों से लाया बेंदी-हेयरपिन
सिल्की जोड़ों के जैसा फिर प्यार व्यार होगा
रंगमहल सा देख रेल का
जनरल कोच रहा’’
उपर्युक्त उद्धरणों और नवगीतकारों का चिन्तन, भाषा, शिल्प और कथ्य की कहन स्पष्ट रूप से इंगित करता है कि ये होनहार दिखे एक दिन वटवृक्ष बनेंगे और नवगीत को आगामी सदी तक ले जायेंगे। नवोदित नवगीतकारों के सृजन में, उनकी चुनौतियों, उनके परिवेश, राष्टप्रिय एवं वैश्विक परिदृश्य तथा आम आदमी का जीवन-संघर्ष, उसकी जिजीविषा आदि के साथ विसंगतियों तथा विद्रूपताओं की अभिव्यक्ति नूतन प्रतीक-बिम्बों के साथ एक ताजगी का अनुभव कराती है जिसमें वर्तमान पीढ़ी का आक्रोश, प्रतिकार तथा प्रतिरोध स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। नये नवगीतकारों का दृष्टि कोण जहाँ पुराने नवगीतकारों से भिन्न है वहीं उनकी सोच का दायरा भी विस्तृत है और प्रायः अधिकांश अपनी जमीन तथा अपना मार्ग स्वयं निर्धारित कर रहे हैं। उनके सृजन में कहीं भी छायाप्रति दिखने की गुंजाइश नहीं है। नवगीत के लिये निश्चित रूप से यह शुभलक्षण हैं जो विद्वान नवगीत के भविष्य के प्रति निराशा व्यक्त करते हैं उनसे सहमत होना सम्भव नहीं है। जब तक नवता तथा गेयता के प्रति समाज में अभिरुचि एवं आकर्षण रहेगा, लोकगीत रहेंगे, संगीत विद्यमान रहेगा, तब तक नवगीत की उपस्थिति चेतना को झकझोरती रहेगी और नये-नये नवगीतकार नवगीत को नया रूप-सौन्दर्य और समसामयिक यथार्थबोध अलंकृत कर आगे बढ़ाते रहेंगे।
१ अप्रैल २०१३
नवगीत परिसंवाद-२०१२ में पढ़ा गया शोध-पत्र
गीत के विकास में बिहार का योगदान
कविता अगर मनुष्यता की मातृभाषा है तो गीत मानवीय संवेदना का अर्थसंपृक्त शब्द संगीत। गीत की रचना का सम्बन्ध हर हाल में लोकमन की गति से होता है। इसलिए गीत में लोकमन के सुख-दुख, उत्सव-आनन्द, हँसी-खुशी, अवसाद-उल्लास, आशा-आकांक्षा, उत्साह-उमंग, जय-पराजय, जीवन-संषर्ष और मुक्ति-संघर्ष की सच्ची अभिव्यक्ति होती है। स्वतंत्रता-आन्दोलन के बाद के जन-आन्दोलनों के विकास में गीत-रचना ने क्रान्तिकारी भूमिका निभाई है और इस दौरान गीत का गुणात्मक विकास हुआ है। जाहिर है कि जन-आन्दोलन में जनता के मन की या कहिए कि लोकमन की एक विशेष गति की अभिव्यक्ति होती है। अच्छे गीत उस गति को अभिव्यक्त करते हैं और उसे शक्ति भी देते हैं। कहने का तात्पर्य है कि जन-आन्दोलनों में गीत पैदा होते हैं और जन-आन्दोलनों को गति और शक्ति देने में सार्थक भूमिका निभाते हैं।
नामवर सिंह के अनुसार जिस साहित्य में काव्योत्कर्ष के मानदण्ड प्रबन्ध-काव्य के आधार पर बने हों और जहाँ प्रबंध-काव्य को ही व्यापक जीवन के प्रतिबिम्ब के रूप में स्वीकार किया गया हो, उसकी कविता का इतिहास मुख्यतः प्रगीत मुक्तकों का है। यही नहीं बल्कि गीतों ने जन-मानस को बदलने में क्रान्तिकारी भूमिका अदा की है। आगे वह मानते हैं कि यदि विद्यापति को हिन्दी का पहला कवि मान लिया जाय तो हिन्दी कविता का उदय ही गीत से हुआ, जिसका विकास आगे चलकर संतों और भक्तों की वाणी में हुआ। गीतों के साथ हिन्दी कविता का उदय कोई सामान्य घटना नहीं, बल्कि एक नयी प्रगीतात्मकता, लिरिसिज्म के विस्फोट का ऐतिहासिक क्षण है, जिसके धमाके से मध्य-युगीन भारतीय समाज की रूढ़ि-जर्जर दीवारें हिल उठीं, साथ ही जिसकी माधुरी सामान्य जन के लिए संजीवनी सिद्ध हुई। कहने की आवश्यकता नहीं है कि हिन्दी कविता का उदय बिहार की पयस्विनी धरती पर ही हुआ है।
विद्यापति के मधुर गीतों के साथ जिस हिन्दी कविता की विकास-यात्रा आगे बढ़ी है उसमें कई समयसापेक्ष, युगसापेक्ष और समाजसापेक्ष पड़ाव आये हैं तथा हर पड़ाव पर बिहार के गीत-रचनाकारों ने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से अपनी दमदार मौजूदगी दर्ज की है। भारतेन्दु युग या महावीर प्रसाद द्विवेदी अथवा मैथिलीशरण गुप्त का काल यानी हर काल में गीत-रचना अपनी माधुरी और ऊर्जा-विस्फोट से सामाजिक चेतना में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाने के लिए संघर्ष करती रही है। मोहन लाल महतो वियोगी के वार्णिक छन्द में लिखे गीतों ने अपनी अलग पहचान बनाई है।
आधुनिक हिन्दी गीत-रचना को असली चेहरा और पहचान छायावाद के दौर में ही हासिल हुआ है। गीत के लिहाज से इस काल के वृहद् चतुष्टय-निराला, जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानन्दन पंत और महादेवी वर्मा के बाद अगर पाचवाँ नाम लेना होगा तो, निस्संदेह वह नाम आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री का ही होगा। हालाँकि जानकीवल्ल्भ शास्त्री के साहित्य जगत में पदार्पण के समय तक छायावाद दम तोड़ने लग गया था और उत्तर छायावादी दौर के अलमस्त गीतकार-चतुष्टय--हरिवंश राय बच्चन, नरेन्द्र शर्मा, रामधरी सिंह दिनकर, रामेश्वर शुक्ल अंचल-के अलावा माखनलाल चतुर्वेदी, भगवती चरण वर्मा, गोपाल सिंह नेपाली, केदारनाथ मिश्र प्रभात, आरसी प्रसाद सिंह और थोड़ा बाद के नीरज के गीतों ने गीत-रचना के क्षेत्र में आयी गुणात्मक तब्दीली का संकेत देना शुरू कर दिया था।
आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री की रचनात्मक मनोभूमि छायावाद के अधिक करीब और उत्तर छायावाद से थोड़ा भिन्न दृष्टिगोचर होती थी। संभवतः इन्हीं कारणों से आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री को अपने समकालीन अन्य गीतकारों की अपेक्षा उचित और अपेक्षित मान्यता नहीं मिली और न ही आलोचकों ने इनके गीतों की गहराई से आज तक संजीदा पड़ताल ही की। कुमारेन्द्र पारसनाथ सिंह का अति गंभीर निष्कर्ष है कि छायावाद काल के जो रचनाकार गीत-रचना के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बनाकर चलने में समर्थ हुए और आज भी रचना-कर्म से जुड़े चल रहे हैं, उनमें नरेन्द्र शर्मा और जानकीवल्लभ शास्त्री का नाम पहले आता है। ये दोनों ही विशुद्ध भारतीयता के रंग में भी शास्त्रीयता की जमीन पर खड़े हैं और प्रगतिशील चेतना से लैस होने के बावजूद न तो प्रगतिवाद की सीमा में आते हैं, न ही जनवाद की बल्कि इनका बिलकुल अलग ही आधार है। जहाँ नरेन्द्र शर्मा ने चलचित्र, आकाशवाणी और दूरदर्शन से जुड़े रहकर भी सृजन की दुर्निवार भूख की बदौलत गीत-रचना के सम्मुख कुछ उत्कृष्टतम उदाहरण प्रस्तुत किये हैं वहीं एकान्त साधना में लीन जानकीवल्लभ शास्त्री ने गीतों की मुखर अमरता को एक नया मिथक प्रदान किया है। शास्त्री के गीतों की जमीन पर अंत तक स्वर और सुर की लयात्मक एकता का प्रश्न है। वे निराला की कला-चेतना के अर्थपूर्ण विकास-क्रम के अंतिम और संभवतः अन्यतम बिन्दु हैं। हिन्दी गीत का इतिहास इन दोनों के अवदान को रेखांकित किये बगैर अधूरा ही रह जायेगा।
आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री के समकालीन गीतकारों में रामधारी सिंह दिनकर, केदारनाथ मिश्र प्रभात, गोपाल सिंह नेपाली, श्याम नन्दन किशोर, आरसी प्रसाद सिंह, रामगोपाल शर्मा रुद्र, कलक्टर सिंह केशरी, जनार्दन प्रसाद झा ‘द्विज’, रामदयाल पाण्डेय, हंसकुमार तिवारी, अवधभूषण मिश्र, गुलाब खण्डेलवाल, विंध्यवासिनी दत्त त्रिपाठी, जितेन्द्र कुमार प्रभृति का नाम प्रमुखता से शुमार किया जा सकता है। गीतों की वैचारिक अंतर्वस्तु और प्रभावी अंतर्वस्तु, बनावट और बुनावट एवं अभिव्यक्ति-भंगिमा के धरातल पर इन सभी गीत कारों में काफी भिन्नताएँ हैं। रामधारीसिंह दिनकर मूलतः राष्ट्रीय चेतना के ओजस्वी कवि के रूप में जाने जाते है। इन्होंने कुछ अच्छे गीत भी लिखे हैं, जिनमें उत्तर छायावादी उल्लास, उमंग तथा मस्ती का स्वर छलछलाता हुआ दिखलाई देता है। रामविलास शर्मा को निराला के बाद दिनकर की काव्यभाषा में ही सबसे ज्यादा मेघ-मंद्र स्वर सुनाई देता है।
राष्ट्रीय चेतना के लिहाज से गोपाल सिंह नेपाली दिनकर के बाद दूसरे महत्वपूर्ण गीतकार हैं, बल्कि एक सफल गीतकार के रूप में नेपाली दिनकर से अधिक उल्लेखनीय हैं। गोपाल सिेह नेपाली के गीतों का फलक और परिदृश्य तथा अनुभूति की संरचना दिनकर के गीतों की तुलना में अत्यधिक व्यापक और गहरा है। राष्ट्रीय चेतना के अलावा नेपाली के गीतों में प्रेम, प्रकृति और सौन्दर्य के अनगिनत बेल-बूटे कढ़े हैं, जिनकी चमक आज भी मद्धिम नहीं पड़ी है। दिनकर और नेपाली दोनों के गीतों में तत्कालीन राजसत्ता और वर्ग-विभाजन पर आधारित समाज-व्यवस्था के अंतर्विरोधों, शोषण, दमन और उत्पीड़न के खिलाफ तीव्र प्रतिरोध का स्वर है। दिनकर जहाँ मुनादी के स्वर में घोषित करते हैं कि हटो व्योम के मेघ पंथ से स्वर्ग लूटने हम आते हैं/ दूध-दूध ओ वत्स! तुम्हारा दूध खोजने हम जाते हैं, तो नेपाली का मेघ-मंद्र उद्घोष था कि जब-जब जनता पर दुख की बदली छाई है/ तब-तब हमने विप्लव-बिजली चमकाई है/ मानवता का परिहास बदलने वाले हैं/ हम तो कवि हैं, इतिहास बदलने वाले हैं। श्याम नन्दन किशोर के गीतों का रचना-परिदृश्य नेपाली जितना व्यापक और विस्तृत नहीं हैं, लेकिन उनमें जवानी की मस्ती कूट-कूटकर भरी हुई है-जवानी जिनके-जिनके पास/ जमाना उनका-उनका दास।
सर्वविदित है कि भक्ति-आन्दोलन के बाद हिन्दी कविता व्यापक जन-सामान्य और श्रमजीवी वर्ग से प्रगतिवादी दौर में पहली बार मुखातिब हुई अथवा व्यापक जन-आन्दोलन के साथ गहरे स्तर पर जुड़ी। इस दौर की गीत-रचनाएँ संघर्षशील जन-साधरण में काफी लोकप्रिय हुईं और व्यापक जन-आन्दोलन एवं जन-संघर्षों को संगठित, उत्प्रेरित और गतिशील करने में कामयाब भी। इस काल के कई गीत केवल व्यापक जन-जीवन में लोकप्रिय ही नहीं हुए, जन-कंठों में रचे-बसे और बेहद कारगर और पुरअसर नारे बन गये। इस लिहाज से नागार्जुन, लालधुआँ, रमाकांत द्विवेदी ‘रमता’, कन्हैया बिहारी शरण, मथुरा प्रसाद ‘नवीन’ आदि के गीत भी व्यापक जन-संवेदना के अनिवार्य अंग बन गये। जयप्रकाश आन्दोलन के दौरान सत्यनारायण, गोपीवल्लभ सहाय, परेश सिन्हा, बाबूलाल मधुकर आदि के गीतों ने बहुत ही सकारात्मक भूमिका निभाई है।
स्वातंत्रयोत्तर हिन्दी गीत के विकास में बिहार के गीतकारों का योगदान अन्यतम है, बल्कि अविस्मरणीय और अद्वितीय कहें तो भी अत्युक्ति नहीं होगी। स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद भारतीय समाज में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया की अत्यन्त ही तीव्र गति से शुरूआत हुई, जिससे भारतीय जनजीवन की सामाजिक चेतना में गुणात्मक तब्दीली आई एवं इस परिवर्तित सामाजिक चेतना को अभिव्यक्त करने वाली कला-संस्कृति के विभिन्न रूपों की वैचारिक और प्रभावी अंतर्वस्तुओं में भी परिवर्तन के लक्षण परिलक्षित होने लगे तथा इस परिवर्तित युगबोध और रचना-दृष्टि को नये-नये नामों से पहचानने, परखने और पारिभाषित करने का प्रयत्न किया जाने लगा। निराला के गीतों में आये बदलाव के साथ ही तत्कालीन मदन वात्स्यायन, राजेन्द्र प्रसाद सिंह, राजेन्द्र किशोर, श्यामसुन्दर घोष, रामनरेश पाठक आदि गीत कारों के गीतों की वैचारिक और प्रभावी अंतर्वस्तु भी बदलने लगी थी। इस बदलाव को पहली बार राजेन्द्र प्रसाद सिंह द्वारा ‘नवगीत’ संज्ञा से अभिहित कर पहचानने और परखने के पाँच-सूत्री जीवन-दर्शन, आत्मनिष्ठा, व्यक्तित्वबोध, प्रीतितत्व और कवि-सम्मेलन के मंचों और गंभीर साहित्य-चर्चाओं में समान रूप से ख्याति हासिल हुई है। नवगीत से अपनी गीत-यात्रा की शुरूआत करने वाली शान्ति सुमन को जनगीत के पुरस्कर्ता गीतकार होने का गौरव प्राप्त है। ‘ओ प्रतीक्षित’, ‘परछाई टूटती’, ‘मौसम हुआ कबीर’, ‘धूप रँगे दिन’ जैसे उनके लगभग एक दर्जन नवगीत और जनगीतों के संग्रह प्रकाशित हैं।
उनके गीतों की बनावट और बुनावट की कलात्मकता पर विचार करते हुए मैनेजर पाण्डेय इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि शान्ति सुमन के गीतों का महत्व उनके विशिष्ट रचाव में है। लगता है कि लोकगीत की आत्मा नई देह पा गई है या कि नई चेतना लोकगीत की काया में समा गई है और शिवकुमार मिश्र मानते हैं कि उनके गीतों से होकर गुजरना जनधर्मी अनुभव-संवेदनों की एक बहुरंगी, बहुआयामी, बेहद समृद्ध दुनिया से होकर गुजरना है, साधारण में असाधारण के, हाशिए की जिन्दगी जीते हुए छोटे लोगों के जीवन-सन्दर्भों में महाकाव्य के वृत्तान्त पढ़ना है। स्वानुभूति, सर्जनात्मक कल्पना तथा गहरी मानवी चिन्ता के एकात्म से उपजे ये गीत अपने कथ्य में जितने पारदर्शी हैं, उसके निहितार्थों में उतने ही सारगर्भित भी। नचिकेता के शब्दों में शान्ति सुमन के ये गीत, वास्तव में गुलाब की पंखुड़ियों पर लिखी अग्नि-शलाका हैं, शबनम की लिपि में लिखी क्रान्ति की कारिका हैं, और, हिन्दी जनगीत-रचना के क्षेत्र में शान्ति सुमन, शायद पहली स्त्री-गीतकार हैं,जिनकी रचनाएँ गीतबद्ध संघर्षशील जन-संघर्षों में जुझारू मेहनतकश अवाम के द्वारा गाए गए हैं। मुझे यह मानने में कोई संकोच नहीं है कि शान्ति सुमन का गीतकार हिन्दी में महादेवी वर्मा के बाद का सबसे बड़ा स्त्री-गीतकार है और पुरुष-गीतकारों में भी अग्रणी।
दूसरा महत्वपूर्ण नाम सत्यनारायण का है। सत्यनारायण के गीतों का समसामयिक जीवन-दर्शन, गहरा राजनीतिक बोध और अर्थ-गौरव उन्हें समकालीन हिन्दी गीत-रचनाकारों की प्रथम पंक्ति में शामिल कर देते हैं। सत्यनारायण के गीतों की भाषिक सहजता और अनुभूति की संरचना की पारदर्शिता ऊपरी सतह से देखने पर अकलात्मक लग सकती है, परन्तु तह में उतरते ही उनके गीतों के अनेक अर्थानुषंग किसी भी सहृदय व्यक्ति को अभिभूत कर देते हैं। उनके छोटे-छोटे चरण वाले छन्द गौरैये की तरह फुदकते दृष्टिगोचर होते हैं। उनके गीतों की वैविध्यभरी वस्तुगत दुनिया के अंतरंग साक्षात्कार के मद्देनजर ही अवधेश नारायण मिश्र इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि सत्यनारायण का गीत-सौन्दर्य नवगीत की चारित्रिक विशिष्टता का मानक है। जीवन के बहुआयामी तनावों, आतंकों, आदर्शहीन मूल्यों, अन्यायों एवं विसंगतियों को लयमयी भाषा देकर नवगीतकार ने जिस सौन्दर्य-दर्शन का विकास किया है उसमें कुरूपता, असुन्दरता और खुरदुरापन को अधिक स्थान प्राप्त हुआ है। सत्यनारायण के गीतों की अस्मिता भाषा की आन्तरिक ऊर्जा, बिम्बों की रागदीप्त विविधता, लयों का आवर्तक संयोजन, शब्दों का युगबोधी संस्कार और अनुभूति की मौलिकता से निर्मित होती है और इन्हीं कारणों से उनके नवगीत कविता की वरेण्यता हासिल करते हैं तथा समस्त युग-सर्जना के प्रतिनिधि स्वर बन जाते हैं।
अपनी रागदीप्त विविधता और अनुभूति की मौलिकता से कविता की वरेण्यता हासिल करने वाले और समस्त युग-सर्जना के प्रतिनिध स्वर सत्यनारायण अपने श्रेष्ठ समकालीन नवगीतकारों में सबसे कम गीत लिखने वालों में भी संभवतः अपना दूसरा प्रतिद्वन्द्वी नहीं रखते। लगभग पचपन वर्षों से नवगीत के रचना-संसार को समृद्ध करने में क्रियाशील रहने के बावजूद इनके अब तक ‘टूटते जल-बिम्ब’, ‘तुम ना नहीं कर सकते’, ‘सभासद हँस रहा है’ और ‘सुनें प्रजाजन’ नामक चार गीत-संग्रह ही प्रकाशित हैं। इसका यह मतलब हरगिज नहीं है कि कम लिखने के कारण सत्यनारायण के गीतकार का कद छोटा हो जाता है। पूजा के लिए ट्रकों में भरकर फूल नहीं लाये जाते, वहाँ तो दो-चार टटके फूल ही काफी होते हैं। यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि सत्यनारायण के परवर्ती गीतों की प्रखर सामाजिक चेतना और गहरा रानीतिक बोध तथा जन-सरोकार उन्हें अनायास ही अन्य समकालीन नवगीतकारों से बहुत ऊँचा उठा देता है।
शान्ति सुमन और सत्यनारायण के अलावा बुद्धिनाथ मिश्र, हृदयेश्वर, यशोधरा राठौर और उदय शंकर सिंह उदय का नाम राष्ट्रीय फलक पर दूर से ही दिखाई दे जाता है। बुद्धिनाथ मिश्र के दो, ‘जाल फेंक रे मछेरे’ तथा ‘शिखरणी’, यशोधरा राठौर के तीन, ‘उस गली के मोड़ पर’, ‘जैसे धूप हँसती है’ एवं ‘भरेंगे परवाज के पैगाम अक्षर’ और उदय शंकर सिंह उदय के दो ‘धूप में चलते हुए’ और ‘गीत फिर परचम हुए’ तथा हृदयेश्वर के तीन ‘आँगन के इच-बीच’, ‘बस्ते में भूगोल’ और ‘यह देती धूप’ अब तक प्रकाशित हो चुके हैं। इनके गीतों में आज के अत्यंत ही संश्लिष्ट जीवन के अन्तर्विरोधों, विसंगतियों और विद्रूपताओं की जटिल अनुभूतियों की समग्रता में अभिव्यक्ति मिली है। बुद्धिनाथ मिश्र के गीतों में व्यक्त सघन लोक-चेतना उनके गीतों में नई चमक पैदा कर देती है।
समकालीन हिन्दी गीत का मुकम्मल चेहरा हिन्दी-परिवार की अन्य भाषाओं, मसलन मैथिली, मगही, भोजपुरी, अंगिका, बज्जिका आदि की गीत-रचनाओं की संजीदा और आत्मीय अंतर्यात्रा किये बगैर नहीं उभर सकता है। इस लिहाज से रवीन्द्रनाथ ठाकुर, धीरेन्द्र धीर, मार्कण्डेय प्रवासी, शान्ति सुमन, बुद्धिनाथ मिश्र, सियाराम शरत, चन्द्रमणि, बच्चा ठाकुर, मायानंद मिश्र, महेन्द्र, अजित आजाद, विभूति आनन्द, स्वयंप्रभा झा, सुरेश दुबे सरस, जयराम सिंह, जयप्रकाश सिंह, राजेन्द्र कुमार यौद्धेय, घमंडी राम, बाबूलाल मधुकर, मिथिलेश, जयराम देवसपुरिया, हरेन्द्र विद्यार्थी, पाण्डेय कपिल, जगन्नाथ, रामनाथ पाठक प्रणयी, वेदनन्दन, चन्द्रप्रकाश माया , विजेन्द्र अनिल, परमेश्वर दुबे शाहाबादी, गंगा प्रसाद अरुण, रामेश्वर सिन्हा पियूष, पी. चन्द्र विनोद, रामजीवन सिंह ‘जीवन’, परमानन्द पाण्डेय, परमेश्वरी सिंह अनपढ़, अमरेन्द्र, आभा पूर्वे, नरेश पाण्डेय चकोर आदि के गीतों के रचना-कौशल, काव्य-कला और अर्थ-गौरव की जाँच-पड़ताल होनी चाहिए।
६ मई २०१३नवगीत परिसंवाद-२०१२ में पढ़ा गया शोध-पत्र
मुंबई के नवगीतकार
-ओमप्रकाश तिवारी
मुंबई में नवगीत की यात्रा वास्तव में नवगीत के पुरोधाओं-प्रवर्तकों में से एक वीरेंद्र मिश्र जी से शुरू होती है। १९४० में ग्वालियर से एक गीतकार के रूप में अपने साहित्य का सफर शुरू करनेवाले वीरेंद्र मिश्र जी को एक प्रखर नवगीतकार की पहचान दिलाने में मुंबई महानगर की आबोहवा ने बड़ी भूमिका निभाई। इसका पता १९९४ में प्रकाशित उनके गीतों-आँगन के संकलन गीत विविधा में लिखे उनके आत्मकथ्य से चलता है। मिश्र जी लिखते हैं – सागर का सारा आकर्षण तब ध्वस्त हो गया, जब सागर-नगर में रहना पड़ा।
वस्तुतः मुंबई पहुँचकर मध्यम वर्गीय संघर्षों के समुद्र से साक्षात्कार करते हुए, मैं एक नए अनुभव संसार में जा पहुँचा। अर्थपिशाचों की जातीयता, रूढिवादिता और कृत्रिमता पर तथाकथित आधुनिकता और प्रतिष्ठा के मुखौटों के आगे, अपनी जीती-जागती प्रगतिशीलता के अपमान तथा पारिवारिक समस्याओं से उत्पन्न तनावों के प्रश्नों पर, निरुत्तर समुद्र भी अर्थहीन एवं गर्जन भरे ठहाके लगाकर रह गया। समुद्र गीतों के माध्यम से मैं मानव-मन के कितने तनावों और अभावों से ग्रस्त पक्षों को अभिव्यक्ति दे सका, और कितना महासागर के व्यापक परिवेश को, और कितना कुछ छूट गया, यह तो आप मेरे ये गीत पढ़कर ही जान सकेंगे। लेकिन मैं अपने इस रचना संसार से बहुत संतुष्ट नहीं हूँ। वीरेंद्र जी लिखते हैं कि मैं अपने इस रचना संसार से संतुष्ट नहीं हूँ। लंबी अवधि तक मुंबई में रहने और उस महानगर को अपने आँगन में जीने के बावजूद असंतुष्टि का भाव रह जाना स्वाभाविक है। क्योंकि मुंबई जैसी महानगरी दैनंदिन जीवन में इतने प्रकार के अनुभव देती है कि उन सारे अनुभवों को गीत-नवगीत क्या, साहित्य की किसी भी विधा में समेट कर संतुष्टि का भाव पा लेना संभव ही नहीं है। बशर्ते अपनी रचनाशीलता जागृत रखी जाए।
आँगन की रचना के लिए मुंबई पर्याप्त खाद-पानी उपलब्ध कराती है। गगनचुंबी इमारतों के बीच पसरी धारावी जैसी झोपड़पट्टियाँ हमें विसंगति का बोध कराती हैं। उद्योग-व्यापार की राजधानी होने के कारण मजदूर संगठनों की उपस्थिति हमें संघर्ष चेतना एवं जनोन्मुखता का अहसास कराती है। पिछले २० वर्षों में एक दर्जन से ज्यादा छोटे-बड़े आतंकी हमले झेल चुकी मुंबई जब अगले ही दिन पहले की रफ्तार से चलती दिखाई देती है, और युवाओं की टोलियाँ हाथ में जलती हुई मोमबत्तियाँ लेकर गेटवे ऑफ इंडिया पर इकट्ठा होती हैं, तो हम भारतीयता में निष्ठा के साथ-साथ ज़िंदादिली का अनुभव करते हैं। और जब किसी विशेष राजनीतिक मुहिम के तहत हिंदीभाषियों को निशाने पर लिया जाता है तो अस्मिता की पहचान जैसे सवाल खड़े होने लगते हैं। यानी, आँगन के लिए आवश्यक सभी जरूरी प्रवृत्तियाँ मुंबई में बड़ी संख्या में मौजूद हैं। आप अपनी रचनाशीलता को कुरेदिए और अपनी जरूरत के अनुसार इन प्रवृत्तियों का उपयोग कीजिए। दैनंदिन जीवन में ये प्रवृत्तियाँ किसी को शून्य से शिखर तक जाने का अवसर प्रदान करती हैं तो कोई जीवन भर खट कर भी मंजिल की तलाश करता रह जाता है। ऐसा ही एक अनुभव वीरेंद्र मिश्र जी के १९७५ में लिखे नवगीत में सामने आता हैः
डूबने से बच गए तुम टूटने से क्या बचोगे
काल की चट्टान से टकरा गए गुमनाम शीशे
बीच में ही टूटने का जिक्र क्या करना किसी से
वह न चोरी से बचेगा सृष्टि जो भी तुम रचोगे
वीरेंद्र मिश्र जी का ऐसा ही एक और अनुभव १९८८ में लिखे उनके नवगीत से सामने आता है, जिसका शीर्षक है निषाद मनः टूट गए दिशा-यंत्र आज लक्ष्यद्वीपों में भटक रहे हम अपनी नावों के साथ
पंखों जैसी थीं पतवार प्रखर गीतमयी --
वे हैं संवादहीन
ऊपर हैं गरुण, और नीचे हैं मगरमच्छ सब अपने में प्रवीण
हम कैसे हैं निषाद टुकड़े-टुकड़े विषाद
ढोते हैं पीठों पर
पाँवों के साथ
उम्र में वीरेंद्र जी से सात वर्ष छोटे सच्चिदानंद सिंह समीर को वीरेंद्र जी के बाद मुंबई में आँगन की अगली कड़ी माना जा सकता है।समीर जी का पहला नवगीत संग्रह बिंधा हुआ आदमी १९८३ में प्रकाशित हुआ, जबकि दूसरा नवगीत संकलन – अर्हता के पाँव १९९२ में सामने आया। मुंबई महानगर में उपलब्ध आँगन की प्रवृत्तियों को समीर जी ने भी खूब जिया और उसे आँगन में ढाला। ऊपर की पंक्तियों में हमने मुंबई में लोगों के शून्य से शिखर तक पहुँचने का जिक्र किया है। समीर जी के नवगीत में देखिए इसकी एक झलकः
कैसे तुम
पूरा आकाश
हो गये
जीरो से
सीधे पचास
हो गए
कल तक तुम
कैक्टस थे आज हो गुलाब
कल भी
बबूलों के होंगे हिसाब कैसे तुम
ताड़ से पलाश
हो गए।
वर्तमान सामाजिक परिदृश्य की झलक देते समीर जी के एक और नवगीत की पंक्तियाँ देखिएः
चोर-घरों के आय-करों का
लेखा-जोखा
सी.ए.रखते
साहब की
ऊँची आमद की मोटी फाइल
पी.ए.रखते
मेहनतकश रोटी को झँखते।
बैठे-बैठे चले तिचारत काले धन से बने इमारत
अभियंता का
भाग कमीशन बेटे-बेटी
साले रखते
नौजवान कामों को लखते।
वीरेंद्र जी एवं समीर जी की इसी धारा को उनके कुछ बाद की पीढ़ी के कवि आनंद त्रिपाठी अपनी इन पंक्तियों के जरिए आगे बढ़ाते हैं, जिसका शीर्षक है कुर्सी जिंदाबादः
मौज उड़ाते हैं दुमछल्ले कुर्सी ज़िंदाबाद
तू भी पीकर बोल धड़ल्ले कुर्सी ज़िंदाबाद
आँगन में फैली बेकारी भाषण में जनतंत्र
पुरवाई का झोंका बोला वही पुराना मंत्र
आगजनी बटमारी फैली हत्याओं का जोर
शानदार जीवन जीता है बैठा रिश्वतखोर
स्वर्ग भोगते बैठ निठल्ले कुर्सी ज़िंदाबाद
वर्ष २०१० में प्रकाशित आनंत त्रिपाठी के एक संग्रह में शामिल कुछ
आँगन में से एक और देखिएः
भूख जगी हर ओर से
मन घबराया शोर से
किससे माँगें रोटी कपड़ा किससे कहें मकान दो
किससे कहें देश को मेरे बस सच्चा इंसान दो
बटमारों के महानगर में अपनी एक न चल पाती है
दीप जलाने को उठता हूँ, तो उंगली ही जल जाती है
टपक रहा है लहू न जाने क्यों
आँखों की कोर से
मुंबई में वीरेंद्र मिश्र से लेकर आज तक की पीढ़ी को समेटनेवाले कवि हृदयेश मयंक के संग्रह – एक महक सोंधी माटी की – में १३२ नवगीत संकलित हैं। मयंक जी के आँगन में एक अलग रंग नजर आता है। भोर का सूरज शीर्षक वाला एक नवगीत देखिएः
धूप की चादर समेटे आ रहा है
भोर का सूरज घरों को भा रहा है
फिर खिली है धूप अपना सेंक लो सिकुड़ा बदन
आँख में अंजन सहेजो चूम लो नभ का नयन
साँझ का डर रोशनी को खा रहा है
एक कंबल का किनारा एक टुकड़ा धूप
बाँध लूँ मैं किस तरह से यह सलोना रूप
दूर कोई ध्वंसवाणी गा रहा है
एक बात और। महानगरों में रहते हुए गाँव भी बहुत याद आता है। और इसी याद के वशीभूत होकर जब कभी महानगरीय कवि अपने गाँव जाता है, तो उसे बदलते गांवों की तस्वीर देखकर और दर्द होता है। मयंक जी के ही समकालीन कवि सूर्यभानु गुप्त की इन पंक्तियों को देखिएः
सर फूटे, घर टूटे मन धुनिये की रुई
तलवारें खुलीं जहाँ
काम आनी थी सुई।
खण्डहर हो गए गाँव भूतों का वास हुआ
अम्मा-बप्पा-भइया हर नाता घास हुआ
घास बढ़ी यूं,
गर्दन ऊंटों की जा छुई।
तलवारें खुलीं जहाँ काम आनी थी सुई।
गुप्त जी के ही एक और नवगीत की कुछ और पंक्तियाँ उद्धृत करने का लोभ नहीं संवरण कर पा रहा हूँ –
हो गईं सदियाँ मगर फिर भी है अजूबा,
पेड़ अब भी आदिवासी हैं।
पत्तियाँ अब तक पहनते हैं
मूड हो नंगे भी रहते हैं
पेड़ खालिस पेड़ हैं अब भी
पेड़ मुल्ला हैं, न पंडित हैं, न पासी हैं।
है अजूबा, पेड़ अब भी आदिवासी है।
काव्य की अन्य विधाओं सहित दूरदर्शन धारावाहिकों में भी खासी पहचान बना चुके पंडित किरण मिश्र भी वीरेंद्र मिश्र के समय से ही नवगीत रचते आ रहे हैं। अब तक उनके दो संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। १९९६ में प्रकाशित पहले संग्रह - चुंबक है आदमी - के एक नवगीत इमली के वृक्षों में आमों के बौर की कुछ पंक्तियाँ देखिएः
इमली के वृक्षों में आमों का बौर
लगता है मौसम का चला नया दौर
चक्रवात सी भागा दौड़ी है
बिम्बों की उठापटक हलचल
अपने में ही संशय उत्तर है
कंपित है मन का सारा स्थल
कृत्रिम है सूरज पर अपना सिर मौर
किरण जी के ही दूसरे संग्रह कंपन करती धरती के एक नवगीत – एक माचिस में – की एक झलक देखिएः
एक माचिस में जितना ध्वंस यहाँ बंद है
हृदय में हमारे उतना ही छुपा द्वंद्व है
मानवता की सतह पर अविवेकी उँगलियाँ
बार-बार रगड़ जातीं स्वारथ की तीलियाँ
देख के अनीति जितनी आँखें बनी अंध हैं
हृदय में हमारे उतना ही छुपा द्वंद्व है
पहले लखनऊ, फिर दिल्ली होते हुए पिछले दो दशक से मुंबई में रह रहे ओमप्रकाश तिवारी के अधिसंख्य आँगन की रचनाभूमि भी मुंबई ही रही है। पेशे से पत्रकार ओमप्रकाश तिवारी के आँगन में भी वर्तमान घटनाक्रम की छाप उनकी व्यंग्य विधा की छौंक के साथ देखी जा सकती है। देखें वसंत ऋतु पर लिखा एक नवगीतः
चेहरा पीला आटा गीला मुँह लटकाए कंत
कैसे भूखे पेट ही गोरी गाए राग वसंत
मंदी का है दौर नौकरी अंतिम साँस गिने
जाने कब तक रहे हाथ में कब बेबात छिने
सुबह दिखें खुश, रूठ न जाएँ शाम तलक श्रीमंत
राजनीतिक परिवेश पर लिखे गए ओमप्रकाश तिवारी के एक और नवगीत की झलक देखिएः
दिल्ली के दिल में
घर एक बसा गोल
बच्चों से भरा-पुरा लंबा परिवार
आपस में झगड़ें सब मुखिया बेकार
लगता है इस घर की नींव रही डोल
मुंबई के वरिष्ठ साहित्यकार रहे डॉ. राममनोहर त्रिपाठी वैसे तो गीतकार रहे हैं।लेकिन समाजिक विषयों की अभिव्यक्ति के लिए उन्होंने भी आँगन को ही माध्यम बनाया। देखिए एक झलकः
दुनियादारी से समझौते करके
भावुकता ने कब माना अनुशासन
झुलसी खेती सी जरूरतें मेरी
बेबरसे बादल जैसे आश्वासन
मुंबई में नामवर और शैलजा शर्मा जैसे गीतकारों ने भी आँगन में अच्छे प्रयोग किए हैं। संभव है, कुछ नाम मुझसे छूट भी रहे हों। लेकिन यह कहने में हमें कोई हिचक नहीं है कि जिस मुंबई शहर में वीरेंद्र मिश्र और सच्चिदानंद सिंह समीर जैसे नवगीतकारों ने इस विधा के प्रवर्तन-पोषण में बड़ी भूमिका निभाई हो, अब उसी शहर में प्रवृत्तियों, प्रतीकों और बिंबों की प्रचुरता के बावजूद नवगीतकारों का एक अकाल सा महसूस किया जाने लगा है।
१० जून २०१३
नवगीत परिसंवाद-२०१२ में पढ़ा गया शोध-पत्र
राजस्थान में गीतयात्रा निरन्तर
-डॉ. रमेश ‘मयंक’
आदिमानव किन्हीं नितांत निजी क्षणों में श्रम की क्लान्ति मिटाने या किसी भावावेशी प्रसंग में गुनगुना उठा होगा। यह गाने, गुनगुनाने की आदत गीत बन गई। गीत हमारी दैनंदिन संघर्षपूर्ण जीवन-लीलाओं से उबरकर मानव-मात्र् के सस्वर अभिव्यक्त होने की सहज कला है। इसे मोहिनी विद्या भी कहते हैं। गीत मनुष्य की पूर्णता का सामगान और नरक से स्वर्ग लोक तक जाने की सीढी है। गीतों की सनातनता ही उसकी समकालीनता है। इसमें युगों की अन्तर्ध्वनि, प्राकृतिक सुषमा, ऋतु परिवर्तन से हुई आंतरिक हलचल, उत्सवमय उल्लास की सामूहिकता का समावेश है। गीत अपने होने की पहचान कराता है, स्वयं से संवाद करने का अवसर प्रदान करता है।
अमरकोश में गीत को गान का समानार्थक माना गया है, गीतं गानमिमे समे, हेमचन्द्र गीतं शाब्दित गानयौः कहते हैं। जब गान गेय स्वर-संरचना और गेय शब्द-भाव से संयुक्त हुआ तब वह गीत हो सका। गीत के नाट्यशास्त्रीय प्राचीन षडविध लक्षण में स्वर, रस, राग, मधुराक्षर अलंकार एवं मनोदशा की प्रामाणिकता का विधान किया गया है। गीत मानसिक स्थिति का सर्वश्रेष्ठ सौन्दर्य है। श्री गोपाल दास नीरज के शब्दों में, ‘‘गीत का जन्म अनायास ही नहीं हो जाता। कहीं गीत में दर्शन छिपे होते हैं, तो कहीं रोमांस, तो कहीं विद्रोह। गीत का मतलब लय है। नदी लय में बहती है, हवा लय में बहती है। हमारा दिल लय में धड़कता है। हम जो बोलते हैं वह भी लय में, यह सिलसिला चलता रहेगा। गीत कभी मरने वाला नहीं हैं, क्योंकि
गीत जब मर जाएगा, केवल धुआँ रह जाएगा,
इन सिसकते आँसुओं का कारवाँ रह जाएगा।’’
कारवाँ गुजर गया गुबार देखते रहे, वाले इस कलमकार ने गीतों में नवप्राण फूँके हैं, प्यार और दर्शन से सिक्त किया है तथा हिन्दी गीतों की परम्परा को नूतन ऊँचाइयों व आयामों का स्पर्श कराया है। डॉ. हरिवंशराय बच्चन ने वियोग व संयोग को गीतों में ढाला है। गीत यात्रा के स्वनाम धन्य प्रतिनिधि रचनाकारों में -- गोपाल सिंह नेपाली, वीरेन्द्र मिश्र, रमानाथ अवस्थी, रामावतार त्यागी, सोम ठाकुर, चन्द्रसेन विराट, चन्द्रकुमार सुकुमार, कुंअर बेचैन, कुमार रवीन्द्र आदि चर्चित रहे हैं।
राजस्थान में श्री हरीश भादानी, रामनाथ कमलाकर, ज्ञान भारिल्ल, ब्रजेन्द्र रेही, डॉ. रामगोपाल शर्मा ‘दिनेश’, डॉ. मनोहर प्रभाकर, बशीर अहमद मयूख, मरुधर मृदुल, नन्द चतुर्वेदी, विश्वेश्वर शर्मा, तारादत्त निर्विरोध, कुमार शिव, मधुकर गौड़, रमा सिंह, बलवीर सिंह ‘करुण’, कृष्ण बिहारी सहल, ताराप्रकाश जोशी, जबरनाथ पुरोहित, डॉ. हरीश, विद्यासागर शर्मा, विनोद सोमानी ‘हंस’, जगजीत निशात, अब्दुल जब्बार, राव अजातशत्रु, अजय अनुरागी, श्याम अंकुर, जगदीश तिवारी, किशन दाधीच, हरमन चौहान, शंकर बजाड आदि मुख्य हैं। श्री नन्द चतुर्वेदी, सप्त-किरण के संपादक रहे हैं, जिन्होंने पहली बार राजस्थान के गीतकारों को प्रकाश में लाने का कालजयी कार्य किया। श्री हरीश भादानी ने जीवन के विविध अनुभवों को काव्य में यथार्थ की सम्पन्नता, रूमानियत की तल्खी से व्यक्त किया। उन्होंने, ‘एक उजली नजर की सुई’ में शुरुआत एक गीत से की --
मैंने नहीं कल ने बुलाया है
खामोशियों की छतें, आबनूसी किवाडों घरों पर
आदमी-आदमी में दीवार है
तुम्हें छैनियाँ लेकर बुलाया है ।
डॉ. रामगोपाल शर्मा ‘दिनेश’ का प्रथम गीत संग्रह ‘वीरांगना’ था। ‘जलती रहे मशाल’ में कवि समाज से पूछता है, मैं मस्जिद के द्वार गया तो मंदिर क्यों नाराज है ? मधुरजनी और रूपगंधा गीतिकाव्य परम्परा की महत्त्वपूर्ण कड़ी हैं। मधुरंजनी में कवि ने जीवन, प्रकृति और आध्यात्म सम्बन्धी अनुभूतियों को मुखर किया है। रूपगंधा में रूप की गंध गीतों को सुवासित करती है। कवि ने प्रणय के एक-एक पल को जिया है और रूप को आत्मा की गहराई तक उतार लिया है --
राहें नई बनाने वालों
मंजल से भटकाने वालों
रुको, तुम्हें ललकार पूछता
एक नहीं क्या जग का मालिक
जिसके सिर पर ऊँची-नीची
सब दुनिया का ताज है,
मंदिर क्यों नाराज है ?
ज्ञान भारिल्ल ‘ज्वार’, ‘आकाश कुसुम’ और ‘साँझ उतरी’ के रचनाकार हैं। ज्वार-गीतों का शतक जिसमें रस प्रवणता है, आकाश कुसुम वैयक्तिक सुख-दुख, आशा- निराशा के स्वर को गीतों में मुखरित करने वाली कृति है। कवि का जीवनदर्शन, ‘‘जन्दगी ज्वार है, मादकता है, अर्पण है। जन्दगी रूप है, यौवन है, अल्हड़पन है’’- में व्यक्त होता है। इनके गीतों में विरहजन्य अवसाद की गहरी छाया है। साँझ उतरी में वियोग का अवसाद है, सर्वत्र् अनुभूतिजन्य विरह गाथा है व निराश मन को समझाने का भावुक प्रयास है --
हर गली, हर रास्ता सुनसान है
आदमी की शक्ल में आक्रोश है, अपमान है
उठ रहा केवल धुआँ अब जन्दगी के वक्ष से
होंठ पर मुस्कान की विष का सवेरा है
रोशनी के नाम पर कितना अंधेरा है ।
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इन पुकारों से ऋचाएँ प्रकट होंगी
यह धुआँ तस्वीर आँकेगा हवन की
इस घुटन की साधना में से जगेगा
स्वयंसिद्धा शक्ति विजडत विश्व मन की
गीतकार अपना स्वर सबके स्वर से टकराना व अपने गीतों को जमाने भर को गाने देना चाहता है, क्योंकि बंद किवाडों में उसका दम घुट जाएगा इसलिए रोशनी को सदन तक आने दो की अभिव्यक्ति करता है।
रामनाथ कमलाकर के गीतों में प्रणय निवेदन का स्वर प्रधान रहा है। मिलन की आकांक्षा, इन्द्रधनुषी कल्पनाएँ और विचरण के लिए स्वप्नों का मुक्त आकाश इनके गीतों की विशेषताएँ रही हैं -
मेरे उर के द्वार कठिन जो तुम ही खोलो तो खुल जाएँ
बंद पड़े हैं जन्म-जन्म से, दरवाजे दीवार हो गए,
बेड़ी हथकड़याँ कारा ही, मेरे घर संसार हो गए ।
टूट सके तब ही बंधन, जो आप तोड़ने पर तुल जाएँ ।।
इनकी दृष्टि में गीत शलभ की भावना, मधुकर की भाषा और खुद को खोकर पाने की परिभाषा मात्र है।
श्री नन्द चतुर्वेदी ने रूप, रंग, छन्द को प्रणय गीतों के माध्यम से अभिव्यक्त करते हुए सृजन क्षमता को अनेक क्षितिजों का विस्तार दिया है। इनका सौन्दर्य बोध सदैव सामाजिक चेतना से प्रेरित रहा है। श्री भँवर सुराणा इन्हें कबीर परम्परा का कवि कहते हैं। एक संकल्प, वैचारिक उर्जा इनके गीतों में है -
तुमने अमृत ढाला है विष पिया नहीं,
एक साँस भी दर्द किसी का जिया नहीं ।
चाँद बने हो मगर मेघ तुम बने नहीं,
तुमने सब कुछ लिया मगर कुछ दिया नहीं ।
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जहाँ-जहाँ बीत गया दिन, वहाँ-वहाँ डूब गया मन ।
सतरंगे इन्द्र के धनुष, सिन्दूरी घाटियों के वन ।।
श्री घनश्याम शलभ, धरती का सरगम, अँधरे का जुगनू, बादल और बाँसुरी के रचनाकार हैं। उन्होंने प्रणय गीत रचे, वे तरल, ललित, कोमलकांत भाषा के प्रयोग में सिद्धहस्त हैं। बादल और बाँसुरी के गीतों में रूप, रंग, गंध को अथक सामाजिक चेतना की अभिव्यक्ति मिली है -
-औ भरे पूस की रातों में, वे वस्त्रहीन मर-मर जाते।
शरद चाँद से खिले फूल पर, भौंरे नहीं यहाँ मँडराते।।
-यहाँ न बिजली का प्रकाश, नभ घन मुरआशा दीप सृजन है।
छोटी तरिणी बही जा रही, पर न यहाँ कमलों का वन है।।
मरुधर मृदुल ने अपनी काव्य यात्रा का प्रारम्भ गीतों से किया। ‘शब्द का घूँघट’ में उनके प्रभावशाली गीत है। इनके गीतों में भावुकता, तरलता व स्पृहणीयता है। शब्द के घूँघट के भीतर सत्य व सौन्दर्य छिपा रहता है, जो सार्थकता का बोध कराता है --
- ऐसा गीत नहीं गाता मैं, जिनका अर्थ नहीं
नहीं गीत का एक शब्द भी, मेरा व्यर्थ नहीं
पुलक हो एक पलक की भी, गीत से शाश्वत कर देता,
लाख कंठ से मुखरित हो, खुशी से मानस भर देता।
मैंने जिस क्षण को जी डाला, मिटा सके उस क्षण को
ऐसा काल समर्थ नहीं ।
या फिर
- छत टूटी, आँगन छूटा है, तिड़क गई दीवार सभी
नींव-सींव से सब टूटा है, टूट गए आधार सभी
जिसका बाहर ही बाहर हो, ऐसी एक हवेली हम
जिसकी सारी कटी लकीरें, ऐसी एक हथेली हम ।
डॉ. मनोहर प्रभाकर ‘महुए महक गए’ में नवगीत के तेवर दिखाते हैं। इनके नवगीतों में समय की त्रासद स्थितियों की अभिव्यक्ति, नया भाव पक्ष, भाषा का मुहावरा, लय की अनुभूति का एकालाप और बिम्बों में युग के यथार्थ की प्रतिकृति मिलती है -
दिनचर्या पेन्शनी बाबू के कोट सी
रसहीना संध्याएँ अफसर के नोट सी
हर हलचल फाइल है, मन मुंशीखाना है
परिचित हर चेहरा है, जाना पहचाना है
फिर भी यों लगता है, जैसे बेगाना है।
श्री विश्वेश्वर शर्मा प्रांत के ख्यातनाम वरिष्ठ गीतकार हैं। वे प्यार को जीवन व गीत की संवेदना का आधार मानते हैं। लगभग 85 फिल्मों में गीत लिखे हैं।
- किनारे पर तो लहरे हैं, हैं मोती गहरे सागर में
तू तट पर ही खडा सागर से, मोती माँगे गागर में
खोलना आँख अपनी सीख ले, नहीं तो मींचे रह जाएगा
बाग अरमानों का ये, बिन सींचे रह जाएगा।
ताराप्रकाश जोशी प्रकृति से गीतकार हैं, कल्पना के स्वर, जलते अक्षर, समाधि के प्रश्न, शंखों के टुकड़े आदि कृतियों में गहरी सामाजिकता व सामयिक संदर्भों से जुडाव है। परिवेशगत सजीवता आफ गीतों का प्रधान विषय वस्तु है। श्री हरिचरण शर्मा ने इनके गीतों में प्रगतिशील स्वर, गहरी मानवता, जिजीविषा से जुडाव व सामाजिक विभीषिकाओं का अंकन रेखांकित किया है। इनके गीत मानवीय मूल्यों से जुड़ने की प्रक्रिया है। ओजस्वी स्वरों में चुनौती देना, कोमल इन्द्रधनुषी कल्पनाएँ संजोना, आस्था व विश्वास के स्वरों को बुलन्द करना तथा एकाकीपन व अवसाद आफ गीतों के प्रमुख स्वर रहे हैं।
- मेरा वेतन ऐसे रानी, जैसे गरम तवे पर पानी,
दफ्तर से घर तक फैले हैं, ऋणदाता के गर्म तकाजे,
ओछी फटी हुई चादर से, एक ढकूँ तो दूजी लाजे,
कर्जा लेकर कर्ज चुकाना, अंगारों से आग बुझानी।
-खाने को कोरी उबासियाँ, पीने को आँख का पानी।
जैसे दुःख ने दुःख से कह दी, ऐसी मेरी राम कहानी।।
-आगे है पानी की सींव तनिक आगे,
हम सारी उमर यों ही मरुथल में भागे ।
-कुछ हिस्से है बटमार के, कुछ हिस्से हैं अप्यारों के,
कुछ नीलामी कुछ ठेके पर, कुछ हिस्से पहरेदारों के
जिसके पास स्वप्न की गठरी, वह किस कोने पीठ टिकाए
बस्ती-बस्ती भय के साए, कहाँ मुसाफिर रात बिताए।
-न्यायालय में दया माँगने, जब भी कोई कर फैलाए
ऐसा लगे कसाई घर में, बकरे की माँ खैर मनाए।
-धन को न्याय, दीन को कारा, प्रश्नों को जीवन निर्वासन
ऐसे में सौगन्ध उठाए, परिवर्तन केवल परिवर्तन ।
कुमार शिव का हिन्दी के नवगीतकारों में विशिष्ट स्थान है। शंख, रेत के चेहरे उनकी चर्चित कृति है। कथ्य की नवीनता व शैली की सम्प्रेषणीयता ने उन्हें गीतकार के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया। उनके नव गीतों में ताजगी, प्रकृति तथा प्रणय की रागात्मक अनुभूतियाँ, शहरी जीवन की याँत्र्किता, ऊब, अलगाव, पारदर्शी शब्द विधान है। प्रकृति में संध्या के प्रति राग भाव साँझ गुलाबी आँखों वाली काले कपडों में लिपटी है, में व्यक्त होता है। कवि का अकेलापन व मन का अवसाद गीतों में मुखर है, बहता गंगाजल सूखते कपोलों पर/भूख बुझे चेहरों पर कविताएँ लिखती हैंमौत बनी इन दिनों बहुचर्चित अभिनेत्री/ भीड़ के रुमाल पर, हस्ताक्षर करती है। सावित्री परमार इन्हें मन के दर्द को गीतों में कहने वाला मानती है।
- ज्योतिर्मय आकाश में, किरण ने ली अँगड़ाई है
पीले बादल के गुलदस्ते लिए हाथ में आज संध्या आई है।
- अजनबी प्रांत में/श्वेत एकांत में/तुमको अनुभव किया
/पाश में भर लिया (चाँदनी का गीत)
- ये सूनी-सूनी घाटी, पलकों पर उगे विराम
इस नीले-नीले तट पर, ये चेहरा धोती शाम।
- हो गई अंकित हृदय पर जो ऋचाएँ /
वे लिखीं तुमने कभी वे मिट न पाए ।
श्री तारादत्त निर्विरोध प्रतिनिधि गीतकार हैं। अपना होना, थकन अभी बाकी है, मेरे भीतर, रेत-दरपन, बरसों बरस, देह गंध, नियति का गीत, काँच के गिलास आदि प्रतिनिधि गीत हैं। इनके शब्दों में प्रेम के उजाले में दर्द के बसेरे हैं। यही दर्द गीतों में ढलता है तो संगीत बनता है, रिश्तों की सूखती सरिता सिक्त हो जाती है और मन का सच बाहर आता है। वह स्वयं को कस्तूरी मृग-सा मानते हैं।
- अंतरंग तो संस्कृतिमय था, हुई सभ्यता दूर,
इतनी सारी सुविधाओं में, मैं कितना मजबूर ।
- समय बड़ी चतुराई से, फिर मन को लूट रहा,
शायद इसीलिए पाँवों से आगत छूट रहा ।
- हो गये हैं रेत के सब चित्र् धुँधले जो उकेरे,
क्या करेंगे दरपनों में, फिर, उचर कर बिम्ब मेरे ।
- हाथों से छूटते/बार-बार टूटते/काँच के गिलास हैं
कि आदमी ?
- रिसना भीतर रिसते जाना पीले घावों का,
व्यर्थ नहीं होता नीलापन दर्द-अभावों का ।
श्री बलवीर सिंह करुण, प्रहरी मेरे देश के, देश की माटी दे आवाज, गीत गंध बावरी, गीत कपोत पूछते हैं, मन मरुस्थल बोला आदि कृतियों के रचनाकार हैं। इन्होंने महाकाव्य-मैं द्रोणाचार्य बोलता हूँ, खण्डकाव्य-विजयकेतु व अन्य प्रबन्ध कार्य लिखे हैं। इनके गीतों में प्रकृति चित्र्ण, ओजस्वी स्वर, भारतीय जीवन मूल्यों के प्रति गहरी आस्था ईश्वर के प्रति समर्पण, दैन्य भाव निश्छलता मिलती है। आशावादी स्वर में जीवन का संदेश, बिम्बात्मकता, उपमानों, प्रतीकों और बिम्बों की नूतनता व मौलिकता इन्हें विशिष्ट बनाती है -
- संदेह के नाम घूमते, गली-गली में फन फैलाए,
साजिश के हैं जनक सपेरे, इस बस्ती को राम बचाए।
- उठा गुदडया, थाम कमण्डल, ओ मेरे मन के रैदासा,
शायद भला इसी में तेरा, अगली नगरी ढँढ निवासा ।
- धीरे-धीरे फर्क मिट रहे, पतझर और मधुमास के,
महके कम दहके ज्यादा हैं, टेसू सुर्ख पलाश के ।।
डॉ. हरीश वासन्ती गीतों के प्रणेता है तथा उनकी कलम में दर्द का उफान है,
वे प्रांत के प्रखर संवेदनाशील गीतकार हैं।
- आओ कुछ चाँदनी पिएँ, घाव-घाव दर्द सब सिएँ
मौसम का अनछुआ निमंत्रण है, फूलों सी जिंदगी जिएँ
- ऐसी घूमी प्यास की जैसे, सूखे पनघट घुटकर घर-घर
ताण्डव रास करे/ऐसी झूमी भूख कि जैसे, हर
अकाल में बिना अन्न पृथ्वी उपवास करे।
(दर्द उफान दिए हैं।)
डॉ. रमासिंह के गीतों में भाषा की सरलता, भावों की सम्प्रेषणीयता, वस्तु-विस्तार की बौद्धिक सिद्धता, रचनात्मकता को व्याख्यायित करने की पर्याप्त क्षमता विद्यमान है। इन्होंने गीत, नवगीत के द्वारा लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है।
- मन ने जब पीछा किया, उस मृग छोने का
होने का क्षण था वह, कुछ अनहोने का ।
- गुनगुनाई कहीं प्रार्थना की कड़ी/क्योंकि विश्वास की थी
जरूरत पड़ी/गूँ पीछे छूटी, गीत आगे चला/
- होंठ पर ताले पड़े हैं आँख में जाला
रोशनी का रंग भी लगता हमें काला ।
श्री जबरनाथ पुरोहित - सपने और सच, जो मुझे तोड़ती है, यह भी हो सकता है जैसी समर्थ कृतियों के सर्जक हैं। जो मुझे तोड़ती है में संवेदना व शिल्प का सुन्दर सामंजस्य है। वे लिखते हैं, जिस लहर ने छुआ, उसी को गीतों में उतारा। इनकी गीतात्मक विशिष्टताओं में, गहन अनुभूति का वैचारिक आग्रह, वैयक्तिक अनुभव की प्रामाणिकता, एकरस प्रगाढता, जनजीवन से सम्बद्धता, विषम परिस्थिति में भी संवेदना की तलाश प्रमुख है।
- आओ दिखलाता हूँ तुमको यह भव्य नगर
जिसकी सड़कों पर जीवित लाशें सोती हैं।
- कितना ही बदनाम करो तुम/चाहे कितने नाम धरो तुम/
जिसने साथ दिया है मेरा/उसका साथ निभाऊँगा मैं/
गीत प्रीत के गाऊँगा मैं/
- तुम स्वर दो यदि इन गीतों को, मैं इतिहास बदल दूँगा
युग-युग के संत्रस्त हृदय का, मैं विश्वास बदल दूँगा
धरती से फूटेगी धारा, मान भरी मनुहारों की
अम्बर का आँगन चूमेगी यह फुहार उपहारों की
जहरीले बादल वाला मैं यह आकाश बदल दूँगा।
- कब तक यों बैठोगे हाथों पर हाथ धरे
कब से सब सहते इस आँगन में डरे-डरे
फैंक दो उतार कर बोझ इन व्यथाओं का
चीरने कुहासा चिन्ताओं का (गीत)
- मैं गीतों का गंगाजल हूँ।
नवगीतों के चर्चित हस्ताक्षरों में प्रो. विजय कुलश्रेष्ठ, राव अजातशत्रु, अजय अनुरागी, श्याम अंकुर, हरमन चौहान इत्यादि प्रतिनिधि रचनाकार हैं। प्रो. विजय कुलश्रेष्ठ क्षण जीने का में लिखते हैं, अपने कंधों पर शव रखकर/पूछी हमने राह मसानी/नहीं कबीरा आगे आया/इस देही का कौन ठिकाना ? पूछें अब किससे ? तथा शेष नहीं कुछ में, महज यंत्रवत जीते रहना, शेष हुआ इतिहास हमारा/जो रेखाएँ भर जाती, महज वही अनुदेश सहारा/काश समय से सीखा होता/ जनमत से ही सबक कभी तो/रहते क्यों फिर यों अनदेखे/झर-झर बहते ।
डॉ. विद्यासागर शर्मा गीत के ग्राहकों से कहते हैं -
आज गीतों के स्वरों में, दर्द सारा बह गया है।
दर्द का पर्वत जमा था, गीत बनके ढह गया है।
आँसुओं से सींच मैंने दर्द का दरखत बढाया ।
गीत सुनने आप आए, साथ देने कौन आया ।।
बिन बदली की बरसात हूँ मैं, गीत में कहते हैं -
बीते कल की सी याद हूँ मैं, बहरे आगे फरियाद हूँ मैं,
मन रूखा-सा तन भूखा-सा, बिन बस्ती के आबाद हूँ मैं,
ना पता ठिकाना कल का है, डाली से टूटा पात हूँ मैं,
चातक तो ताक रहे मुझको, बिन बदली की बरसात हूँ मैं।
श्याम अंकुर के प्रतिनिधि नवगीत, सूनी-सूनी, मूक बने, हिय में आदि हैं।
उनमें गाँव के दर्द की सघन अनुभूतियों का स्पर्श है -
- पहले जैसा प्रेम नहीं है, अब राम से रहमान को।
खुद बनाकर कितना दुःखी है, भगवान खुद इंसान को।
सूनी-सूनी हो गई, गाँवों की चौपाल ।
- आक, धतूरे, बाँस, बबूल बैठे हैं दरबारों में
लालच कागा बैठा है, अंदर पहरेदारों में
पीड़त अंकुर हो गए, बरगद पीपल नीम
मूक बने सब देखते, गिरधर, अर्जुन, भीम ।
राव अजातशत्रु नीड़ का पंछी व मोर पंखी शाम के माध्यम से कहते हैं -
- वर्जनाएँ...त्रासदी शहरी धुआँ
जिन्दगी के नाम पर अंधा कुआँ
एक कम्पन सा उठा फिर रीढ में
नीड़ का पंछी अकेला नीड़ में ।
- एक जंगल है मेरे सीने के भीतर
पत्थरों पर अनलिखे अनुबन्ध हैं
गुप्त कब तक रह सके सम्बन्ध हैं
फूल ही काँटों की पोथी बाँचता है
फिर हिरण सा मन कुलाँचे मारता है।
जगदीश तिवारी अपने गीतों में वर्तमान परिवेश से जुड़कर मानव जीवन की विसंगतियों को रेखांकित करते हैं -
- जो गुलाब थे यहाँ, वो बन गये बबूल
गलती कोई भी यहाँ, नहीं करे कबूल
नहीं रहा आदमी का अब कोई धरम
कैसे लिखे बहारों पे गीत ये कलम
- रिश्तों के गहरे सागर में, अब न हँसती गहराई है
और सुमन के दर पे आकर, भँवर बजाये न शहनाई है
ऐसे में कोयल क्या कूके, कोयल भी तो बहुत रोई है
मंजिल जाने कहाँ खोई है।
श्री अजय अनुरागी नवगीत के प्रतिनिधि हस्ताक्षर हैं। तुम बिन लगते घर के द्वारे में वे लिखते हैं, तुम आओगी तब महकेगी इस उदास मन की फुलवारी, तभी बजे पायल मदमाती चले रंग की तब पिचकारी। हरिया जाएँगे गमलों में नन्हें पौधे मुट्ठी ताने, फूलों जैसे खिल जाएँगे मुस्कानों के चित्त सुहाने।
राजस्थान में समर्थ गीतकारों की पीढ़ी दर पीढ़ी एक समृद्ध परम्परा रही है जिन्होंने गीत यात्रा को निरन्तर जारी रखा है। इस यात्रा में कई गीतकार तो मील का पत्थर की तरह संकेतक व दिशा-निर्देशक बने हैं। डॉ. रामप्रसाद दाधीच, रामेश्वर खण्डेलवाल तरुण, डॉ. दया कृष्ण विजय, गोपाल प्रसाद मुद्गल, बशीर अहमद मयूख, किशन दाधीच, वेद व्यास, जगदीशचन्द्र शर्मा, हरिराम मीणा, जनक राज पारीक, डॉ. मंगत बादल, उपेन्द्र अणु, डॉ. रजनी कुलश्रेष्ठ, शकुन्तला सरूपरिया, अब्दुल जब्बार, अतुल कनक, हरीश आचार्य, राधेश्याम मेवाड़ी, मुराद मेवाड़ी, मधुकर गौड़, ब्रजभूषण चतुर्वेदी, भगवानलाल शर्मा प्रेमी, कृष्णचन्द्र गोस्वामी, जगजीत निशात, विनोद सोमानी हंस, भावना शर्मा, कन्हैयालाल वक्र, सुरेन्द्र शर्मा, महेश कुमार शर्मा, रमेशचन्द्र गुप्त, डॉ. सत्यनारायण व्यास, चन्द्रमोहन हाडा हिमकर, गजानन वर्मा, रघुराज सिंह हाडा, डॉ. शांति भारद्वाज राकेश, मोहम्मद सद्दीक, वीर सक्सेना, राधेश्याम मंजुल, कुन्दन सिंह सजल, शिव मृदुल, उमेश अपराधी, नन्द भारद्वाज, रमेश शर्मा, राजेश विद्रोही, दिनेश सिंदल, इत्यादि ने समय के साथ जुड़कर कभी आजादी की अस्तित्व जगाने वाली चेतना को गुंजायमान किया, तो कभी जीवन संघर्षों से उबरने का मार्ग प्रशस्त किया है। ताराप्रकाश जोशी ने ‘‘पड़ गया अकाल फिरै माँगते मजूरी’’ व वेद व्यास ने ‘‘कविता एक अकाल की, तेरह ताल की’’ जैसा मार्मिक वर्णन किया है। हरीश भादानी ने रोटी नाम सत्य है खाये तो मुगत्य है तथा रोटी रोजी बोनस का हक माँग रही बत्तीसी पर हल्ला बोल, बोल मजूरिए हल्ला बोल, हेतु भारद्वाज ने राज की दया हुई, राहत के काम चले, गायों को पूस नहीं, कारों के पेट पले, दाम बिना मिलता कैसे, पानी है नहरी, धनिया की बिटिया को भूख लगी गहरी, होरी के खेतों के मालिक सौ-सौ शहरी जैसी गीति रचनाएँ लिखकर कलम का फर्ज निभाया है। यदि हिन्दी साहित्य में गीतों के अवदान की दृष्टि से चर्चा करें तो भी विशुद्ध गीतों की रचनाओं के लिए राजस्थान बहुत समृद्ध दिखाई देता है।
श्री बशीर अहमद मयूख के गीत शोषण के विरुद्ध जिहाद बोलने की जिद लिए हुए है जो सांस्कृतिक समगन्ध की खोज है -
मेरे गीतों की बारात के साथ में
रूद्र भैरव चला है बाराती, बना
आज डमरू बजा तांडव ताल पर
मेरे गीतों में गूँजी नई गर्जना
शत्रु के शीश तोरणों को गिरा
सरहदों पर मुलाकात की जाएगी
साधना के पगों वंदना द्वार पर
मेरे गीतों की बारात यों जाएगी
हिन्दी के ओजस्वी गीतकारों में मेघराज मुकुल का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है। उमंग व अनुगूँज में राष्ट्रीयता का स्वर मिलता है। सहजता, ओज, आस्था व उमंग इनके गीतों की प्रधान विशेषताएँ रही हैं। स्वर लालित्य के साथ सामाजिक चैतन्य का स्वर युग की विदारक वेदना को उत्कृष्ट कलात्मक अभिव्यक्ति देता है -
उल्टे पाँवों योजना चली
यह सृजन हजारों मील चला
बालू प्रदेश की यात्रा में
मृग तृष्णा ने हर बार छला
तुम कैसे धरतीपुत्र् धर्म की आड़ लगाते हो
भारत से पहले कौन सा निज अस्तित्व बनाते हो।
यह युग की विसंगति ही कही जाएगी कि आदमी का व्यवहार भीतर व बाहर से एक जैसा नहीं रहा। कथनी व करनी में अन्तर आ गया है। प्रांत के ऊर्जावान गीतकार श्री किशन दाधीच के शब्दों में -
- कटी हुई आकृतियाँ, विज्ञापित चेहरों में
संवेदन बुनती है, सुविधा की लहरों में
आरोपित संज्ञा को, अखबारी सरिता में
कहाँ तक भुनाएगा, शहर का आदमी
रह गया दुशालों में, बाहर का आदमी ।
- शब्दों के बौने हम, अर्थ के बिछौने हम
नागफनी भीतर से, बाहर से मृगछौने हम
दर्द की नुमाइश में, कील पर टँगा हुआ
तेल चित्र् जैसा है, पहरे का आदमी ।
गीतकार ने इक्कीसवीं सदी में मानवीय संत्रस को स्वर दिया है -
अब कबीर सूर जायसी, पोथियों के पाठ हो गए
अर्थ से पिटे हुए कथन, शब्द से विराट हो गए
व्यक्ति के विकास की कथा, बन गई हिसाब की प्रथा
भाग्य डोर यंत्र से बँधी, हम प्रचार के धड़े हुए
चौखटों सी तन गई सदी, हम कतार में खड़े हुए।
श्री वेदव्यास ने तरुण अरुण भारत के निर्माण के स्वर को अपनी लेखनी में पिरोया है। राजस्थान प्रांत की मिट्टी से जुडाव व राष्ट्र के प्रति प्रगतिशीलता का दृष्टिकोण सदैव मुखर किया है। जागो भारत की तरुणाई, प्रश्नों की आँधी, कविता तेरह ताल की, रक्त बोध, हस्ताक्षर इत्यादि आपकी प्रतिनिधि गेय गीति रचनाएँ हैं -
- श्रम की गंगा घर-घर आई
धरती पर बिखरी अरुणाई
युग सृजन करो संकल्प यही
जागो भारत की तरुणाई ।
- कविता तेरह ताल की, दूषित अन्तर्जाल की
सीमा के मन तोड़ रही है, रचना एक अकाल की
- प्रश्नों की आँधी में उजड़ रहे व्यक्ति
चेतन को लील रही, अवचेतन शक्ति
- शब्दों को तोड़ रहा रक्त नये बोध का
सड़कों को मोड़ रहा कोलाहल क्रोध का ।
श्री जगजीत निशात अपने गीतों में यथार्थवादी, जमीन से जुड़ी मनस्थितियों के बिम्ब उभारते हैं -
- दुनिया भर की पढी किताबें, कुछ अक्षर न जाने
भीतर बैठे अन्तर्यामी के निर्देश न माने
उत्तर कोई रोकर कोई हँस कर देता है
और समय हर प्रश्न-पत्र् को हल कर देता है।
- धर्म कर्म की बात नहीं है ये बात है दुनियादारी की।
चिंता आने वाले कल की, परसों की तैयारी की।।
कन्हैयालाल प्रकृति बोध के कुशल चितेरे गीतकार हैं -
बीज बोये कल्पना ने, भावना की गोद में ।
थिरक उठे अंग प्रकृति, के अति आमोद में ।।
हरी हो गई छवि भू की कल तलक थी पीत ।
उगे पहले पहल तब खेतों में नव गीत ।।
श्री सुरेन्द्र शर्मा के गीतों में प्रकृति प्रेम,
उमंगों का मधुमास,
इन्द्रधनुषी कल्पनाएँ,
जीवन का कटु यथार्थ व्यक्त होता है -
- उपवन के मधुमास तुम्हारे साथ चलूँगा मैं,
गीतों के आकाश तुम्हारा चाँद बनूँगा मैं ।
- तू ऐसी मस्ती का बन्दा, माया, मोह, दर्प में अंधा
तुझको नहीं दिखाई देता, चश्मा अपना यार बदल रे
अरे मुसाफिर अब घर चल रे ।
श्री शंकर बजाड ने नवगीतों में अपनी पहचान बनाई है -
शास्त्र् लूँ या शस्त्र् लूँ, यह न पूछो धर्म से।
प्रश्न चिहि्नत इस समय को, भय नहीं है शर्म से।।
रात दिन संध्या सवेरे कँप-कँपाते गर्म से।
जी सकेगा वह कि जिसने आँख-मुँह बन्द कर लिया।
पृष्ठ होकर भी उमर भर, हाशिया बनकर जिया।।
श्री कृपाशंकर शर्मा अचूक वर्तमान के साथ चलो तो छँट जाएँगे बादल काले की बात करते हैं तो भावना शर्मा प्रकृति की गोद में खेलते मनुज से पाशविकता पर विराम लगाने की सीख देती है। श्री मधुकर गौड़ तो गीत नवांतर के प्रणेता माने जाते हैं। नये-नये ताबीज, आखर-आखर वेद में नवीन प्रयोग दृष्टव्य हैं -
- कौन चवन्नी की सुनता है, रोज रुपया रौब जमाता
किस्मत का मारा बेचारा, नये-नये ताबीज बनाता
जब भी टूटे तार हुए तुम, मैं भी खूब-खूब रोया हूँ
आगजनी से तुम बिफरे हो, मैं अफवाहों में खोया हूँ।
- होंगे कई नजारों वाले, चंदा और सितारों वाले
हम पतझड़ के वंशज लेकिन, हरदम रहे बहारों वाले।
श्री विनोद सोमानी हंस ने गीत परम्परा की एक पीढ़ी को अवदान दिया है। मानवीय मूल्यों की तलाश में सतत् सृजनरत रहे हैं -
शील बन गया व्यापारी, काँटे बिकते हाट में,
नदियों का पानी रीत गया, हो पनघट किस घाट में।
चाहे रेतीले धोरे फैला दो, मैं नखलिस्तान बना दूँगा,
फैला दो तुम अँधियारा जग में, मैं दीपक नया जला दूँगा।
श्री हरमन चौहान ने मानव मन की पड़ताल अपने गीतों में की है -
ओ री प्रिया बावरी, सुन मेरी बात री
हाथ में हाथ देकर अरी चल मेरे साथ री
जहाँ मेरा गाँव री, बोल ओ सांवरी ।
इस प्रकार -
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि राजस्थान में गीतकारों ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी सृजन करते हुए इस गीत यात्रा को निरन्तर जारी रखा है। गीतकारों ने समय परिवेश की धारा से जुड़कर यथा आवश्यकता राष्ट्रीय चेतना को प्रखर बनाया है तो वहीं नव निर्माण की आकांक्षाओं को भी उकेरा है। मानव मन की पड़ताल करते हुए शाश्वत जीवन मूल्यों की तलाश में उमंगों, उल्लास और प्रकृति राग-रंग को गीतों में मुखरित किया है।
राजस्थान की गीत परम्परा के विकास में जहाँ एक तरफ गीतकारों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है वहीं पर राजस्थान साहित्य अकादमी की पत्रिका मधुमती का महत्त्वपूर्ण सहयोग प्राप्त हुआ है। प्रांत के गीतकारों को समूचा प्रतिनिधित्व इस पत्रिका में प्रदान किया जाता रहा है। राजस्थान साहित्य अकादमी की गतिविधियों में गीत विधा पर केन्द्रित कार्यक्रमों, प्रकाशनों व गोष्ठियों का भी महत्त्वपूर्ण आयोजन समय-समय पर होता रहा है। श्री नन्द चतुर्वेदी, योगेन्द्र किसलय, नन्द भारद्वाज व डॉ. भगवती लाल व्यास ने अपने सम्पादन में प्रकाशित प्रांत के रचनाकारों के संग्रहों में गीतकारों को समुचित महत्ता प्रदान की है। यह गीत यात्रा सदैव प्रवहमान रहेगी। यही आशा है।
८ जुलाई २०१३