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गुरुवार, 23 जुलाई 2026

संजीव, सलिल

हिन्दी साहित्य में आचार्य संजीव वर्मा ''सलिल'' का अवदान : एक मूल्यांकन

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०१. प्रस्तावना 
०२. व्यक्तित्व 
संदर्भ- विशेषांक ट्रू मीडिया दिल्ली, पुस्तक: सलिल एक काव्य धारा - मनोरमा पाखी 
०३. नवगीत में नवता प्रवाह
प्रकाशित संकलन- काल है संक्रांति का, सड़क पर, ओ मेरी तुम, भक्ति गीत- कलम के देव  कुल ४
संदर्भ- चलें की नीड़ की ओर संपादक कांता राय (भूमिका), लघुकथा संवाद संपादक कल्पना भट्ट (साक्षात्कार) 
संदर्भ- नवगीत के सृजन सारथी भाग २ संपादक डॉ. रामानुजलाल शर्मा 'यायावर' 
आभासी दुनिया के नवगीत संपादक डॉ. रामानुजलाल शर्मा 'यायावर'     
०४. लघुता में गुरुता : लघुकथा 
संकलन- आदमी अभी जिंदा है, जंगल में जनतंत्र  कुल २ 
संदर्भ-   
०५. कल को कल से जोड़े कविता 
संकलन- लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे  कुल २
०६. 'घाव करें गंभीर' व्यंग्य लेख 
संदर्भ- २१ वीं सदी के अन्तर्राष्ट्रीय श्रेष्ठ व्यंग्यकार संपदल लालित्य ललित- राजेश कुमार, अट्टहास मध्य प्रदेश विशेषांक 
०७. कंकर से शंकर- तकनीकी लेखन  
पुस्तिका- भूकंप के साथ जीना सीखें कुल १ 
संदर्भ- अभियंता बंधु २०१३, २०२१, ब्लॉग दिव्य नर्मदा.इन
८. अक्षर अक्षर छंद है - छंद सृजन एवं शिक्षण, ३०० से अधिक छंदों का निर्माण 
संदर्भ- hindiyugm.com, divyanarmada.in
९. अलंकार की छवि-छटा 
संदर्भ- sahityashilpi.in (८० अलंकारों पर लेखमाला)
१०. संपादन असि-धार है 
पत्रिकाएँ- 
साहित्यिक: नर्मदा, शब्द समिधा, सृजन साधना   
सामाजिक: चित्राशीष, 
तकनीकी: एम.पी.डिप्लोमा इंजीनियर्स मंथली जर्नल, यांत्रिकी समय, अखी भारतीय डिप्लोमा इंजीनियर्स महासंघ पत्रिका, अभियंता आलोक। 
स्मारिकाएँ: शिल्पांजलि, शिल्पा, लेखनी, ८४, लेखनी ८९, संकल्प, दिव्याशीष, शाकाहार की खोज, वासतुदीप, इंडियन जिओ टेक्निकल सोसायटी २००४, दूरभाषिका २००६, निर्माण दूरभाषिका सागर २००९, विनायक दर्शन, मार्ग, भवनांजली। 
संकलन: निर्माण के नूपुर, नींव के पत्थर, राम नाम सुखदाई, तिनका तिनका नीड़, याद-कडा, द्वार खड़े इतिहास के, समयजयी साहित्य शिल्पी भागवत प्रयासद मिश्र ''नियाज़'', काव्य मंदाकिनी २००८, काव्य मंदाकिनी २०१०, दोहा दोहा नर्मदा, दोहा सलिला निर्मला, दोहा दिव्य दिनेश, काव्य कालिंदी, खुशियों की सौगात, हिन्दी सॉनेट सलिल, चंद्र विजय अभियान, फुलबगिया, काव्य कालिंदी, खुशियों की सौगात, छंद सोरठा खास, पहाड़ के स्वर, आया सूरज द्वार, जीतने की जिद, ममता का गाँव।
११. भूमिका परिचायिका है  -  ९५  किताबों में। 
१२. नीर-क्षीर करिए समीक्षा - ३०० से अधिक किताबें। 
१३. हो अनुवाद सटीक - भगवद गीता, १५ उपनिषद, ११ स्तोत्र हिन्दी काव्यनुवाद ब्लॉग में प्रकाशित। रवींद्र नाथ टैगोर की कुछ रचनाओं का काव्यनुवाद। 
१४. अंग्रेजी कविताएं -
संदर्भ-  कंटेंपोरेरी हिन्दी पोइट्री एडिटर एंड ट्रांसलेटर भागवत प्रयासद मिश्र ''नियाज़'.
१५. विविधा 
बुन्देली, बघेली, मालवी, निमाड़ी, पचेली, छत्तीसगढ़ी, हाड़ौती, भोजपुरी, अवधी, बृज, सरायकी, आदि बोलिओं में लेखन।
***
   





अरुण अर्णव खरे, पुरोवाक, दोहा संग्रह

पुरोवाक्

दोहा दोहा नारियाँ, महक रहीं फुलवारियाँ

आचार्य संजीव वर्मा ''सलिल''

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छंद: उद्भव, वर्गीकरण, अंग

            सृष्टि का उद्भव नाद अथवा ध्वनि से हुआ है। ध्वनि जीव के कंठ से नि:सृत हुई तो उच्चार कहलाई। उच्चार-काल के आधार पर उच्चार दो प्रकार लघु व गुरु हुए। लघु-गुरु उच्चारों के विविध समयोजनों से गण, गणों के संयोजन से गति-यति व लय की विविधता के आधार पर छंद पहचाने और रचे गए। इस शिल्पगत परिधान के मूल में जो कथ्य कहा गया वह मनोभावों और विचारों से निर्गत हुआ। विचार प्रधान व्याकरण आधृत अभिव्यक्ति को गद्य तथा भाव प्रधान पिंगल आधृत अभिव्यक्ति को पद्य कहा गया। छंद एक ऐसी पद्य रचना को कहा जाता है जिसे निश्चित चरण, वर्ण, मात्रा, गति, यति, तुक, और गण आदि से संबंधित नियमों के अनुसार निबंधित किया जाता है। ‘छंद’ शब्द ‘चद्’ धातु से बना है और इसका अर्थ ‘आह्लादित करना’ या ‘खुश करना’ होता है। यह आह्लाद वर्ण या मात्राओं की नियमित संख्या के विन्यास से उत्पन्न होता है। साधारण शब्दों में, जब वर्णों या मात्राओं की नियमित संख्या के विन्यास से उत्पन्न चमत्कार से आह्लाद पैदा होता है, तब उसे ‘छंद’ कहा जाता है। ‘छंद’ का प्रथम उल्लेख ऋग्वेद में है।

            छंद के अंग पद / पाद (पंक्ति), चरण (पदांश), गति (प्रवाह), यति (विराम स्थल), तुक (समान उच्चारण युक्त शब्द), तुकांत (टूक का अंतिम वर्ण), पदांत (पद का अंतिम वर्ण), वर्ण (अक्षर संख्या), मात्रा (उच्चार गणना) तथा गण (३-३ उच्चारों के ८ समूह यगण, मगण, तगण, रगण, जगण, भगण, नगण, सगण, गण सूत्र- यमाताराजभान सलगा) आदि होते हैं।

            छंद का वर्गीकरण या जाति निर्धारण वर्ण संख्या, मात्रा संख्या, पदभार, गति, रस, वृत्त, अलंकार और भाषा रूप के आधार पर किया जा सकता है। अंग्रेजी में छंद को 'Meta' और कभी-कभी 'Verse' भी कहते हैं।‘गद्य’ का नियामक ‘व्याकरण’ तथा ‘पद्य’ का नियामक ‘छंद शास्त्र’ है। छंद प्रणेता आचार्य पिंगल के नाम पर छंद शास्त्र को ‘पिंगल’ कहा जाता है।

            वर्ण संख्या के आधार पर रचित छंदों को ''वार्णिक'' तथा मात्रा संख्या के आधार पर रचित छंदों को ''मात्रिक'' कहा जाता है। ३२ मात्राओं से अधिक पदभार के छंदों को ''दंडक'', ८-८-८-८ पर यतियुक्त छंदों को ''घनाक्षरी'' तथा २२ से २६ वर्णयुक्त छंदों को ''सवैया'' कहा जाता है।

मात्रा गणना

            छंद रचना उच्चार के आधार पर की जाति है। उच्चार को लिपिबद्ध करने पर अल्प कालिक उच्चारवाही वर्ण को लघु अर्थात 1 तथा दीर्घकालिक उच्चारवाही वर्ण को गुरु या 2 गिना जाता है। अ, इ, उ, ऋ तथा चंद्र बिंदी वाले ह्रस्व वर्ण लघु तथा दीर्घ मात्राभर युक्त वर्ण, बिंदी युक्त वर्ण तथा अर्ध उच्चार युक्त लघु वर्ण गुरु होते हैं। उज्ज्वल जैसे शब्दों में दोनों अर्ध वर्ण लघु होंगे। संयुक्ताक्षर में आरंभ का अर्ध स्वर नहीं गिना जाता। हलंत लघु होते हैं। दो गुरु के मध्य में अर्ध वर्ण नहीं गिना जाता। दो लघु के बीच में अर्ध वर्ण सामान्यत: पूर्व वर्ण के साथ गिना तथा अपवादवत पश्चातवर्ती वर्ण के साथ गिना जाता है। यथा जन्तु २१, हंस २१ गिने जाएँगे जबकि कन्हैया १२२ गिना जाएगा।
दोहा रचना, प्रकार और शिल्प

            दोहा अर्ध सम मात्रिक छंद है जिसमें २ पद और ४ चरण होते हैं। २ विषम (पहला, तीसरा) चरण १३ मात्रिक तथा २ सम (दूसरा, चौथा) चरण ११ मात्रिक होते हैं। दोहे के पदादि में वाचिक दुहराव तथा पदांत में गुरु-लघु उच्चार (तगण या जगण) अनिवार्य है।

            दोहा हिन्दी साहित्य का सर्वकालिक सर्वाधिक लोकप्रिय छंद है। शृंगार (संयोग-वियोग), करुण, हास्य, वीर, रौद्र, भयानक, वीभत्स, अद्भुत, शांत, वात्सल्य तथा भक्ति सभी 11 रसों का परिपाक दोहा में भली प्रकार हो सका है। हिन्दी के सभी अलंकारों की शोभा दोहा पर खूब सजे हैं। अमिधा, लक्षणा तथा व्यंजना तीनों शब्द शक्तियाँ दोहा में प्राण फूँक सकी हैं। हिन्दी के तीनों शब्द गुण प्रयासद, माधुरी और ओज ने दोहा के रूप को निखारा-सँवारा है। दोहा में लघु-गुरु मात्राओं के विविध संयोजनों के आधार पर दोहा के 23 प्रकार (भ्रमर, सुभ्रमर, क्षरभ, श्येन, मंडूक, मर्कट, करभ, नर, हंस, गयंद, पयोधर, बल, पान, त्रिकल, कच्छप, मच्छ, शार्दूल, अहीवर, व्याल, विडाल, उदर, श्वान, सर्प) हैं। इस पृष्ठ भूमि में हिन्दी में बहु विधायी सृजनरत प्रतिष्ठित साहित्यकार इं. अरुण अर्णव खरे रचित इस दोहा संकलन का अध्ययन कर आनंद होता है।

    हिन्दी काव्य साहित्य में सर्वाधिक संग्रह दोहा के प्रकाशित होते हैं। सतसई (७०० दोहे) और सहस्त्रई (१००० दोहे) भी खूब लिखी गई हैं। एक लाख दोहे लिखने का दावा करने वाले भी हैं। दोहे का उपयोग महाकाव्य में अन्य छंदों के साथ पर्याय: किया जाता है लोक में उक्तियों और मुहावरों के रूप में भी दोहा खूब कहा जाता है। प्रचुर लेखन के बाद भी दोहा पुराना या बासी नहीं लगता। सामर्थ्यवान कलम मिलते ही दोहा पुनर्जीवित होकर नवानंद और रसानंद की जय-जयकार करने लगता है।

    अरुण अर्णव जी अभियंता हैं। अभियांत्रिकी उनके व्यक्तित्व में रची-बसी है। किसी परियोजना को मूर्त करने के पूर्व चरणवार प्राक्कलन बनाना, रूपांकन-रेखांकन, स्थल चयन, विविध निर्माण सामग्री कब, कहाँ और कितनी चाहिए, उस निर्माण सामग्री का उपयोग करने के लिए कब कितनी तरह के कितने कारीगर और यंत्रोपकरण चाहिए, उन्हें कहाँ से कौन लाएगा, भंडारण कहाँ होगा, गुणवत्ता की जांच कैसे होगी, क्रियान्वयन कौन कराएगा-करेगा, भूमि पूजन, कार्य का माप और मूल्यांकन, उद्घाटन अर्थात शून्य में सृजन की कल्पना कर उसे साकार करना। यह समूची प्रक्रिया इस दोहा संकलन की पांडुलिपि पढ़कर उसमें समाहित मिली। सामान्य दोहा संग्रहों की घिसी-पिटी अनेक बार पूर्व में प्रयुक्त हो चुकी रूपरेखाओं से सर्वथा अलग इस संकलन में आदि से अंत तक मौलिकता है। यह संकलन अरुण अर्णव ने अपने को प्रभावित करने वाली नारी रत्नों को केंद्र में रखकर लिखा है। अम्मा, भगिनी, भाभी, संगिनी, बेटी, पुत्रवधू और नवासी शीर्षक ७ अध्यायों में वर्गीकृत इन दोहों में रिश्तों-नातों की सुगंध समाई हुई है। हर दोहे में भावनाओं की सघनता और संप्रेषणीयता में सहजता, अपनत्व का भाव मन में रस माधुरी घोल देता है। ऐसा प्रतीत होता है कि दोहा अरुण के जीवन की नहीं पाठक के जीवन की बानगी पेश कर रहा है।

    ''अम्मा'' शीर्षक अध्याय वंदनीय अम्मा, ममता, संस्कार, कर्तव्य, समभाव, रिश्तों की धुरी, बाबूजी और अम्मा, स्मृतियों में अम्मा, बदलता समय तथा प्रार्थना उपशीर्षकों में विभाजित किया गया है। हर शीर्षक अम्मा के व्यक्तित्व और कृतित्व की कीर्तिकथा कहकर धन्य होता है। अम्मा की कुछ विशिष्ट छवियों के दर्शन कर खुद को धन्य कीजिए-

आया जब मुश्किल समय, दस्तक देते द्वार।
चढ़ा चटकनी बन गईं, अम्मा पहरेदार।।

जादूगर उस्ताद थीं, या फिर सिद्ध फकीर।
कभी बिगड़ने दी नहीं, रिश्तों की तासीर।।

            सामान्यत: माता-पिता के दाम्पत्य में अनुराग के क्षण बच्चों की दृष्टि से ओझल और अचर्चित रहे आते हैं। अरुण ने बाबूजी की डायरी के माध्यम से उन्हें इस तरह उद्घाटित किया है कि साँप भी मार जाए और लाठी भी न टूटे-

पढ़ बाबू की डायरी, खुला राज ये आप।
अम्मा भी थी चटपटी, जैसे आलूचाप।।

पहले पन्ने पर लिखा, अम्मा हैं चितचोर।
प्रथम नजर में कर दिया, हमको भाव विभोर।।

प्रिये, सखे अरु प्रियतमा, रचा चिरंतन गान।
बाबू के हर शब्द में, अम्मा का सम्मान।।

            दूसरा अध्याय ''भगिनी'' बहना, विवाह, कर्तव्य, आशीर्वाद, तीज-त्यौहार, उदासी, आनंद, कामना तथा असुरक्षा के बिंदुओं से निर्मित है। भाई-बहिन का सावनी नाता रक्षाबंधन के धागों में गुँथकर जीवन में मधुर स्मृतियाँ घोलता रहता है। बेटी के बहू बन जाने पर मिले नए दायित्व और बहुओं के साथ होते अत्याचार के समाचार पढ़कर बेटी की फिक्र इन दोहों में जीवंत है-

सत्रह की बहना हुई, छूटा पावन साथ।
बाबू जी ने कर दिए, पीले उसके हाथ।।

क्या दिन भर निर्जल रहीं, पहला करवा चौथ।
भूख-प्यास होगी लगी, तुमको दीदी 'भौत'।।

अम्मा हो जाती दुखी, पढ़ करके अखबार।
तेल छिड़क कर बेटियाँ, जीवन जातीं हार।।

            ''भाभी'' एक ऐसा बहु आयामी संबंध है जिसमें माँ, बहिन और सखी तीनों का गंगो-जमुनी रंग घुल जाता है। आगमन। पारिवारिक प्रसंग, अपनापन, व्यवहार, व्यक्तित्व, उत्सव, परिवर्तन और अकेलापन के सोपानों पर बढ़ते हुए अरुण इस रिश्ते की पड़ताल कर सके हैं-

गृह प्रवेश पर ससुर ने, किया अनूठा काम।
नेमप्लेट पर था लिखा, भाभी जी का नाम।।

देवर जब गलती करे, भाभी बनती ढाल।
संकट कितना भी बड़ा, लेती उसे सँभाल।।

अंकगणित से कठिन है, रिश्ते रखना जोड़।
पर भाभी के पास है, हर उलझन का तोड़।।

पोला, कजरी, नोरता, और भुजरिया ज्वार।
भाभी सँग घर आ गए, दर्जन भर त्यौहार।।

            इस अध्याय का सर्वाधिक मार्मिक पक्ष कोरोना में भाई के दिवंगत हो जाने के बाद भाभी की पीड़ा का चित्रण है-

चश्मा, कागज़, डायरी, यादों के कुछ द्वार।
इनमें ही अब बस गया, भाभी का संसार।।

            जिससे जुड़कर अपूर्ण जीवन पूर्ण होता है उस अर्धांगिनी को समर्पित ''संगिनी'' शीर्षक अध्याय आनंद, उमंग, मस्ती, आह्लाद, उल्लास, मनुहार, लज्जा, मिलन, सान्निध्य, समर्पण, संगिनी, कर्तव्य, संस्कार, विरह,जीवन मन्त्र और प्रेम की पूर्णता की झलक दिखाकर पाठक को अपने साथ जोड़ सका है-

उपवन, मौसम, चाँदनी, तुमसे मेरे छंद।
तुमसे अधरों पर हँसी, तुमसे सब आनंद।।

जवाकुसुम सा रूप पा, वाणी घुली मिठास।
तन चंदन-सा हो गया, मन हो गया उजास।।

तन-मन वृंदावन हुआ, साँसों भरी सुवास।
जीवन में तुम आ गए, जबसे इतने पास।।

विपदा को करके ड्रिबल, करी सुरक्षित राह।
तुम जैसे भार्या मिले, जन्म-जन्म है चाह।।

            ग्रहस्थ जीवन की पूर्णता संतान प्राप्त कर ही होती है। बेटे की अपेक्षा बेटी पर लाड़-प्यार अधिक होता है। अरुण ने बेटी से लाड़ लड़ाते हुए मंगलाचरण, जन्मोत्सव, बालपन, गुड़ियों का संसार, संवेदना, धींगा-मस्ती, सपनों की उड़ान, विवाह, आशीष, सात समंदर पार, मातृत्व, अलविदा तथा बेटी होना गर्व है उप शीर्षकों में दोहों के स्मृति सुमन समर्पित किए हैं-

बेटी घर की जिंदगी, खुशियों का परिवेश।
घर की हर दीवार में, उसका मौन निवेश।।

बेटी ने कविता रची, सच को दिया उघार।
मम्मा आँख दिखाएँ जब, लगतीं थानेदार।।

गुड्डे, गुड़ियाँ, पालकी, बैठे सभी उदास।
बेटी होकर जब विदा, चली पिया के पास।।

नन्हे हाथों ने दिया, जीवन को विस्तार।
बेटी से माँ बन गई, ईश्वर का उपहार।।

सपनों पर ताले लगे, आधी रही उड़ान।
बाज दबा कर ले गया, गौरैया की जान।।

            इस संकलन की नवता पुत्रवधू को समर्पित आगमन, गृहलक्ष्मी, संस्कार, ठिठोली, आत्मीयता, आशीष, अन्नपूर्णा, कर्तव्य, सामंजस्य, मातृत्व, जननी, आभासी-संसार तथा स्वाभिमान शीर्षक दोहे हैं। संभवत: पहली बार किसी ससुर ने बहू को यह मान दिया है कि उसे अपने रचना संसार का केंद्र बनाया है। इस पवित्र तथा कोमल संबंध में दूरी और निकटता एक साथ पलती है। अरुण नी इस संबंध को दोहों में जीवंत करने में सफलता पाई है-

पग धरते ही घर हुआ, खुशियों से गुलज़ार।
पुत्रवधू के रूप में, मिला हमें उपहार।।

निकली दो ही साड़ियाँ, पर दर्जन भर जीन।
भौजी की फूटी हँसी, सासू जी ग़मगीन।।

कभी बने अभिभाविका, कभी सखी मुँहजोर।
जोड़ी भाभी-ननद की, कोमल और कठोर।।

पढ़ी-लिखी आई बहू, लेकर नए विचार।
उड़ने को दो नभ उसे, करो नहीं इंकार।।

मुखड़े पर घूँघट लिए, अधरों पर मुस्कान।
भीतर कितने प्रश्न हैं, घरवाले अनजान।।

दादी ने ताड़ा तुरत, चाल-ढाल, व्यवहार।
जब छुपकर खाने लगी, इमली और अचार।।

नव जीवन का आगमन, दिया श्रेष्ठ उपहार।
कुल-दीपक की ज्योति से, रोशन घर-परिवार।।

लड़की हो या हो बहू, बदल गई तस्वीर।
आँचल में है दूध पर, नहीं नयन में नीर।।

            इस संकलन की पूर्णता होती है ''नवासी'' नामित अध्याय से जिसमें समाहित हैं आगमन, एहसास, शरारतें, बचपन, संस्कार, आशीष, सीख, उड़ान, परंपरा और माँ के न रहने पर उपशीर्षक। जीवन की सर्वाधिक बड़ी त्रासदी शैशव में माँ को खोना ही है। अरुण ने कलेजे पर पत्थर रखकर बेटी का महाप्रस्थान देखा और नातिन को सम्हालते हुए उसकी अकथनीय पीड़ा को शब्द दिए- 

सात समुंदर पार से, आया सुख-संदेश।
लाडो के घर लाड़ली, धन्य हुआ परिवेश।।

नातिन की बोली मधुर, बेटी की पहचान।
तुतला कर "नानू" कहे, पुलकित हो मन-प्राण।।

नानी की साड़ी पहन, इतराती हर ओर।
नातिन की शैतानियाँ, करतीं भाव विभोर।।

सात साल की उमर में, तज गुड़ियों का खेल।
जिम्मेदारी ओढ़ ली, कर पीड़ा से मेल।।

सर पर जबसे पड़ गई, जिम्मेदारी आन।
भैया का रखने लगी, मम्मा जैसा ध्यान।।

            जीवन में धूप-छाँव की तरह सुख-दुख का आते-जाते रहते हैं। अरुण अर्णव ने दोहों के माध्यम से साँसों की कथा और मन की व्यथा नातों का ताना-बयान बुनते हुए कही और खूब कहीं है। ऐसे आत्म कथात्मक दोहों की सरस, सहज अभिव्यक्ति पाठक को आनंद और करुणा की लहरों पर नौकायन करती हुई जियावन के अंतिम सत्य से साक्षात करती हैं। इन दोहों में अनेक समाज सुधार और परिवार संभार के कई संदेश बिन कहे कह दिए गए हैं। घर पर बहू का नाम लिखाना, बहू को घर की चाबी सौंपना, पढ़ी-लिखी बहू को उसके अनुसार वातावरण देना, बेटी और बहू द्वारा ससुराल के रिश्तों को सम्मान देते हुए आत्मीयता का विस्तार करना, भाई के देहावसान के बाद भाभी का दर्द बाँटना, बेटी के न रहने पर नातिन-नाती का ध्यान रखना, यही तो परिवार की शक्ति है जिसके सहारे हर ऊँच-नीच को जीतने की जिजीविषा बची रहती है। इस सार्थक दोहा संकलन की रचना हेतु अरुण अर्णव को बधाई। हिन्दी के हर सजग पाठक को इसे पढ़ना और परिवारजनों को पढ़ाना चाहिए। 
००० 
संपर्क- विश्ववाणी हिन्दी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१ 
चलभाष: ९४२५१८३२४४ ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

जुलाई २३, डॉल्फिन, व्हेल, सॉनेट, पेंसिल, बाल गीत, पेंसिल, बात, अहीर छन्द, यमक, चंचरीक

सलिल सृजन जुलाई २३
डॉल्फिन-व्हेल दिवस
इसका उद्देश्य इन समुद्री स्तनधारियों के संरक्षण के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए २३ जुलाई १९८२ को अंतर्राष्ट्रीय व्हेलिंग आयोग (IWC) द्वारा वाणिज्यिक व्हेलिंग पर वैश्विक रोक लगाई गई जो १९८६ में प्रभावी हुई और आज भी लागू है।
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झूला गीत
झूला झूलें राधा रानी, रूप निहारें नंद किशोर।
गोरे तन पर श्यामल छाया, मोहित मायापति हर्षाया।
गोप-गोपियाँ सुध-बुध भूलीं, होकर भाव-विभोर...
कुंज गली में बरसा पानी, भीगी साड़ी-चूनर धानी।
केश लटों से टपकी बूँदें, लें कर कमल बटोर...
खंजन नैना अंजन सोहे, सरला हँसी जगत्पति मोहे।
सलिल नीलिमा कालिंदी की, लहरे लेय हिलोर...
प्रीति-किरण हँस करें अर्चना, विनत अंजली प्रणति प्रार्थना।
राधा-राधानाथ कृपा कर, पग-रज सकें अँजोर...
२३.७.२०२५
०००
सॉनेट
अवसर
अवसर परख तुम्हारी होगी
मूक सहमति या विवेक हो?
तंत्र बने किस तरह निरोगी?
संकल्पित या सिर्फ नेक हो?
भाग्यविधाता भाग्य सँवारे
जनआकांक्षा हाथ पसारे
जनाक्रोश सच, मत बिसरा रे
राहत दे मत मौन निहारे
द्वापर में कर सकी समन्वय
अग्नि परीक्षा बार-बार दी
नहीं जानती थी द्रौपदी भय
क्या अब भी चिंगारी बाकी
सख्त बहुत है समय परीक्षक
क्या बन पाओगी तुम रक्षक?
२२-७-२०२२
•••
सॉनेट : आलोक
*
लोक को आलोक दो प्रभु!
तिमिर में निर्भय रहें हम
खुशी ज्यादा, न्यून हो गम
आपदाएँ रोक दो विभु!
परा-अपरा हम न भूलें
मोह पाए नहीं माया
किसी को दे सकें छाया
स्वार्थ झूले में न झूलें
स्वेद सलिला में नहाएँ
छंद-रस आनंद पाएँ
किसी के तो काम आएँ
झूमकर नव गान गाएँ
रोक पाएँ अनय को प्रभु!
लोक को आलोक दो प्रभु!
२२-७-२०२२ •••
***
बालगीत : पेंसिल
पेन्सिल बच्चों को भाती है.
काम कई उनके आती है.
अक्षर-मोती से लिखवाती.
नित्य ज्ञान की बात बताती.
रंग-बिरंगी, पतली-मोटी.
लम्बी-ठिगनी, ऊँची-छोटी.
लिखती कविता, गणित करे.
हँस भाषा-भूगोल पढ़े.
चित्र बनाती बेहद सुंदर.
पाती है शाबासी अक्सर.
बहिना इसकी नर्म रबर.
मिटा-सुधारे गलती हर.
घिसती जाती,कटती जाती.
फ़िर भी आँसू नहीं बहाती.
'सलिल' जलाती दीप ज्ञान का.
जीवन सार्थक नाम-मान का.
***
बाल साहित्य में छंद
सुषमा निगम, अन्नपूर्णा बाजपेई
*
बच्चों में अनुकरणशीतला, जिज्ञासा और कल्पनाशीलता बहुत अधिक होती है। अनुकरण से उनके चरित्र का विकास, जिज्ञासा से ज्ञान-वृद्धि होती है। कल्पनाशीलता से वे जीवन व जगत के विषय में अपेक्षित ज्ञान प्राप्त करने की ओर स्वयमेव उन्मुख होते हैं। अत:, आवश्यक है कि बच्चों के चारित्रिक विकास और ज्ञानवर्धन हेतु शैशव, बचपन और कैशोर्य तीनों अवस्थाओं के अनुरूप बाल साहित्य लिखाजाए। आज के बच्चे ही कल परिवार, समाज एवं देश के प्रति अपने उत्तरदायित्वों का निर्वहन कर योग्य नागरिक बनेंगे किंतु तभी जब उनके सामने आदर्श हों, उनकी जिज्ञासाओं का सम्यक समाधान हो और उनके कल्पना जगत को यथार्थ की भूमि पर पैर जमाकर प्रयासों के हाथों से उपलब्धियों के आकाश को छूने का अवसर मिले। बच्चों को सद्विचार से आचार की प्रेरणा देने का कार्य बाल साहित्यकार ही कर सकते हैं। बालमन को ध्यान में रखकर कविता, कहानी, नाटक, लेख, जीवनी, संस्मरण, पहेली, चुटकुले आदि रचे जाना आवश्यक है। गद्य की तुलना में पद्य अधिक सरस तथा आसानी से याद रखने योग्य होता है। पद्य के लिए छंद आवश्यक है।
बाल साहित्यकारों द्वारा सरल भाषा में शिशु गीत, बाल गीत, कविता आदि की रचना इस प्रकार हो कि बाल पाठकों का शब्द ज्ञान व शब्द भंडार बढ़े और वे नए नए शब्दों का उपयोग करें। बाल साहित्य सृजन के लिये काल्पनिकता और यथार्थता का समन्वय अपेक्षित है। बाल साहित्यकारों, अभिभावकों, शिक्षकों और प्रकाशकों के समवेत प्रयास से ही बाल साहित्य को उचित प्रतिष्ठा मिल सकेगी। विभिन्न भारतीय भाषाओं में रचित बाल साहित्य के पारस्परिक आदान-प्रदान से बाल साहित्य के विकास व राष्ट्रीय समन्वय भाव को नई दिशा मिल सकती है। अच्छे बालसाहित्य का अध्ययन बच्चों को साहित्य में वर्णित समाज, पर्यावरण, अतीत और भविष्य से संवाद करने के अवसर प्रदान करता है। इससे बच्चों के भाषिक और संज्ञानात्मक कौशल तथा भावनात्मक बुद्धिमत्ता का विकास होता है।
शिशु गीत:
बाल साहित्य लेखन में सर्वाधिक कठिनाई शिशु गीत लेखन में होती है क्योंकि शिशु का शब्द ज्ञान अत्यल्प होता है। शिशु लंबी रचनाएँ याद नहीं कर पाता। सार्थक और उपयोगी शिशु गीत बहुत कम लिखे गए हैं। शिशु गीत का कथ्य बच्चे को परिवेश से जोड़नेवाला होना आवश्यक है। आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ने इस दिशा में सार्थक प्रयास किया है। उनके शिशु गीतों में छंद और कथ्य दोनों का प्रभावी प्रस्तुतीकरण हुआ है। भारत धर्म प्रधान देश है। बुद्धि के देवता गणेश, विद्या की देवी सरस्वती, पंच मातृका (धरती माता, भारत माता, हिंदी माता, गौ माता तथा माँ) पर शिशु गीतों का भाषिक प्रवाह और सरसता शिशुओं के लिए उपयुक्त है:
श्री गणेश की बोलो जय, / पाठ पढ़ो होकर निर्भय। / अगर सफलता पाना है- / काम करो होकर तन्मय।। (१४ मात्रिक, मानव जातीय, हाकलि छंद)
माँ सरस्वती देतीं ज्ञान, / ललित कलाओं की हैं खान। / जो जमकर करता अभ्यास - / वही सफल हो, पा वरदान।। (१५ मात्रिक, तैथिक जातीय, पुनीत छंद)
धरती सबकी माता है, / सबका इससे नाता है। / जगकर सुबह प्रणाम करो- / फिर उठ बाकी काम करो।। (१४ मात्रिक, मानव जातीय, हाकलि छंद)
सजा शीश पर मुकुट हिमालय, / नदियाँ जिसकी करधन। / सागर चरण पखारे निश-दिन- / भारत माता पावन। (२८ मात्रिक, यौगिक जातीय, सार छंद १६-१२ पर यति, पदांत कर्णा, अंत के गुरु को दो लघु किया गया है)
हिंदी भाषा माता है, / इससे सबका नाता है। / सरल, सहज मन भाती है- / जो पढ़ता मुस्काता है।। (१४ मात्रिक, मानव जातीय, हाकलि छंद)
देती दूध हमें गौ माता, / घास-फूस खाती है। / बछड़े बैल बनें हल खीचें / खेती हो पाती है। (२८ मात्रिक, यौगिक जातीय, सार छंद १६-१२ पर यति, पदांत कर्णा)
माँ ममता की मूरत है, / देवी जैसी सूरत है। / लोरी रोज सुनाती है, /सबसे ज्यादा भाती है।। (१४ मात्रिक, मानव जातीय, हाकलि छंद)
अंग्रेजी भाषा की शिक्षा के साथ पश्चिमी कुसंस्कार भी घर-घर में घर कर रहे हैं। इन शिशु गीतों में बच्चों को भारतीय संस्कृति और परिवेश से जोड़ने की सजगता सहज दृष्टव्य है। महानगरों में 'अंकल-आंटी' के अलावा अन्य नाते बच्चे नहीं जानते। इस समस्या को सुलझाने के लिए सलिल जी ने नातों को ही शिशु गीतों का विषय बना कर अभिनव और उपयोगी पहल की है। इन शिशु गीतों में प्राय: मानव जातीय, हाकली छंद का प्रयोग हुआ है।
पापा चलना सिखलाते, / सारी दुनिया दिखलाते। / रोज बिठाकर कंधे पर- / सैर कराते मुस्काते।।
मेरा भैया प्यारा है, / सारे जग से न्यारा है। / बहुत प्यार करता मुझको- / आँखों का वह तारा है।।
बहिन गुणों की खान है, / वह प्रभु का वरदान है। / अनगिन खुशियाँ देती है- / वह हम सबकी जान है।।
पापा सूरज, माँ चंदा, / ध्यान सभी का धरते हैं। / मैं तारा, चाँदनी बहिन- / घर में जगमग करते हैं।।
बब्बा ले जाते बाज़ार, / दिलवाते टॉफी दो-चार। / पैसे नगद दिया करते- / कुछ भी लेते नहीं उधार।।
राम नाम जपतीं दादी, / रहती हैं बिलकुल सादी। / दूध पिलाती-पीती हैं- / खूब सुहाती है खादी।।
मम्मी के पापा नाना, / खूब लुटाते हम पर प्यार। / जब भी वे घर आते हैं- / हम भी करते बहुत दुलार।।
कहतीं रोज कहानी हैं, / माँ की माँ ही नानी हैं। / हर मुश्किल हल कर लेतीं- / सचमुच बहुत सयानी हैं।।
चाचा पापा के भाई, / हमको लगते हैं अच्छे। / रहें बड़ों सँग, लगें बड़े- /बच्चों में लगते बच्चे।।
प्यारी लगतीं मुझे बुआ, / मुझे न कुछ हो- करें दुआ। / प्यारी बहिना पापा की- / पाला घर में हरा सुआ।।
मामा मुझको मन भाते, / माँ से राखी बँधवाते। / सब बच्चों को बैठाकर / गप्प मारते-बतियाते।।
मौसी माँ सी ही लगती, / मुझको गोद उठा हँसती। / ढोलक खूब बजाती है, / केसर-खीर खिलाती है।
बाल-काव्य पर विचार करने के लिए यह जरूरी है कि हमारे मन में बच्चों व बचपन के बारे में एक स्पष्ट समझ हो जिसमें बच्चे को एक जागरूक व जिज्ञासु इंसान के रूप देखना, बाल विकास से जुड़े मुद्दों को समझना व समाज को समझना आदि बातें शामिल हो। बाल काव्य में यथार्थ की अभिव्यक्ति मज़े-मज़े में, खेल-खेल में होना आवश्यक है। बच्चे जानकारी से नहीं, नई कल्पना से आनंदित होते हैं। १६-११ २७ मात्रिक नाक्षत्रिक जातीय सरसी छंद में रचे निम्न शिशु गीत में कल्पना की उड़ान देखें:
सुनो मजे की बातें भैया / सुनो मजे की बात
हाथी दादा दबा रहे हैं / चींटी जी के पाँव
चूहे जी के डर से भागी / बिल्ली अपने गाँव
रौब जमाता फिरता सब पर / नन्हा सा खरगोश
चीता सहमा हुआ खड़ा है / भूला अपने होश
एक सात-आठ साल का बच्चा भी यह जानता है कि धरती गोल है और यह सूरज के चारों ओर चक्कर लगाती है। वह इस जानकारी से खुश नहीं होता। उसे तो कहानी में कोई ऐसा पात्र चाहिए जो धरती पर पाँव रखकर उसे चपटा बना दे या धरती को उल्टी दिशा में घुमा दे। ऐसी स्थिति में धरती पर क्या होगा?, इस कल्पना से वह रोमांचित होता है। यह फैंटेसी कल्पनात्मक और कलात्मक आनंद की सृष्टि करती है, जो बालसाहित्य की आत्मा है। यथार्थ बताते हुए असंभव कल्पनाओं को चित्रित करना और फैंटेसी रचना ही बाल साहित्य है।
बाल-काव्य में बच्चों या बचपन की छवि को उभारा जाना जरूरी है। ऐसी रचनाओं में बच्चे और पशु-पक्षी हों किंतु बड़ों की सोच न हो क्योंकि बच्चे उसका पूर्वानुमान लगा लें तो उत्सुकता नहीं जग पाती, 'आगे क्या होने वाला है' का कौतूहल समाप्त हो जाता है।
पाखी ने बिल्ली पाली. / सौंपी घर की रखवाली../ फिर पाखी बाज़ार गई. / लाई किताबें नई-नई / तनिक देर जागी बिल्ली. / हुई तबीयत फिर ढिल्ली../ लगी ऊंघने फिर सोई. / सुख सपनों में थी खोई. / मिट्ठू ने अवसर पाया./ गेंद उठाकर ले आया../ गेंद नचाना मन भाया. / निज करतब पर इठलाया../ घर में चूहा आया एक./ नहीं इरादे उसके नेक../ चुरा मिठाई खाऊँगा./ ऊधम खूब मचाऊँगा../ आहट सुन बिल्ली जागी./ चूहे के पीछे भागी../ झट चूहे को जा पकड़ा./ भागा चूहा दे झटका../ बिल्ली खीझी, खिसियाई./ मन ही मन में पछताई..
बाल गीत और पात्र:
मुझे याद आता है एक बार मैंने जैसे ही बाल-कथा सुनाते समय पात्रों का परिचय दिया- एक थी गिलहरी ...बच्चे बोल पड़े 'बड़ी नटखट और चुलबुली थी।' सचमुच कहानी में ऐसा ही था मगर कहानी में मजा बनाए रखने के लिए मुझे गिलहरी के पात्र को फिर से गढ़ना पड़ा। अतः, बाल-शिक्षण की दृष्टि से रचनाओं का चयन करते समय देखना चाहिए कि क्या इन रचनाओं में पात्रों की प्रचलित छवियों (लोमड़ी चालाक ही होगी, खरगोश चतुर ही होगा, शेर बहादुर ही होगा, बच्चे बड़ो के निर्देश पर ही काम करेंगे, सौतेली माँ दुष्ट ही होगी आदि) को तोड़ते हुए किसी स्वतन्त्र छवि को गढ़ा जा रहा है? ख्यात बाल साहित्यकार डॉ. शेषपाल सिंह 'शेष' ने एक कथा-गीत में बिल्ली की चूहे पकड़ने की परम्पराबद्ध छवि से मुक्त कर नव युग के अनुरूप नयी छवि दी है: 'सोचो-बदलो बिल्ली मौसी / हमें बदलने दो / चलते हुए समय को अपनी / गति से चलने दो / मेल-जोल से बुरी बात को / दूर हटाना है / टी. वी., टेलीफोन, मेल-ई, / इंटरनेट हुए / एरोप्लेन, टैंकर, अणुबम , युद्धक-जेट हुए / बढ़ें वेब-कंप्यूटर युग में / देश उठाना है.' २६ मात्रिक, महाभागवत जातीय, विष्णुपद छंद ने इस कथा-गीत में चार चाँद लगा दिए हैं।
बाल साहित्य और चित्रांकन:
बच्चों की किताबों में चित्रांकन एक आवश्यक पहलू है। चित्र गीत या कहानी का अटूट हिस्सा होते हैं। बच्चे चित्रों के आधार पर ही पढ़ने की शुरुआत कर लिखे गए का अर्थ ग्रहण करते हैं। अतः, छोटे बच्चों की किताबों में चित्र स्पष्ट, बड़े और बोलते हुए होने चाहिए। चित्रों के साथ उनके बारे में कुछ काव्य-पंक्तियाँ या वाक्य लिखे हों तो प्रभाव और भी बढ़ जाता है। छोटे बच्चों की किताबों में अक्षरों का आकार बड़ा हो ताकि उन्हें आसानी से पढ़ा जा सके। चित्रों के बारे में हमें यह भी समझना होगा कि चित्र इस तरह के हों जो पाठ की हू-ब-हू नकल जैसे न हों वरन लिखी गई बात को और आगे बढ़ाएँ जिससे बच्चों को सोचने व कल्पना करने का मौका मिले। इसके साथ ही स्थिर व रूढि़वादी चित्रों की बजाय चित्रों में गतिशीलता हो जो वास्तविकता में कुछ घट रहा हो ऐसा महसूस करा सकें। वरिष्ठ साहित्यकार श्री सदाशिव कौतुक ने चहक-महक में 'हम पौधे हैं' गीत के साथ पौधे लगाते हुए बच्चों का चित्र दिया है जो गीत का प्रभाव बढ़ाता है- 'हम दुनिया के पौधे हैं / दुनिया हमसे है आबाद / हम महकेंगे; हम चहकेंगे / शुद्ध मिलेगा पानी-खाद।'
राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत श्रेष्ठ शिक्षक तथा प्राचार्य रहे डॉ. रमेशचंद्र खरे ने शब्दों को ही चित्रांकन का माध्यम बनाया है। शब्द चित्र उपस्थित करने के लिए कवि की सामर्थ्य असाधारण होना चाहिए- 'पौ फूटी, भोर हो गया / जागे सब, शोर हो गया। / चिड़ियों की चूं-चूं-चूं / कौओं की काँव-काँव / मुर्गों की बांग-बिगुल / बजता है गाँव-गाँव / अब तो मन मोर हो गया' इस रचना में पूरा परिवेश जीवन हो उठा है। (मुखड़ा १४ मात्रिक मानव जातीय हाकलि छन्द, अंतरा २४ मात्रिक अवतारी जातीय छंद, यति १२-१२)
बालसाहित्य और चेतना-जागृति:
ख्यात शिक्षक और प्राचार्य रहे कृष्णवल्लभ पौराणिक बच्चों को बहुराष्ट्रीय उत्पादों के प्रति विमुख करने के लिए गीत को माध्यम बनाते हैं: 'बोलो बच्चों! तुम्हें चाहिए? / जेम्स गोलियां? केडबरीज? / चुईन्गम गोली?, फिफ्टी-फिफ्टी? / चोकलेट फाइवस्टार?, पार्ले बिस्किट? / और कहो जो तुम्हें चाहिए / नहीं, हमें ये नहीं चाहिए / हमें दीजिए खीर दूध की / सब्जी-रोटी डाल व चांवल / अचार, भुट्टा, गुलाब जामुन / और जलेबी, मथुरा पेड़े ' (सोलह मात्रिक संस्कारी जातीय छंद)
डॉ. बलजीत सिंह पुस्तक संस्कृति के प्रति बच्चों के लगाव को १६ मात्रिक संकरी जातीय छंद में रचित गीत के माध्यम से बढ़ा रहे हैं- पुस्तक है अनमोल खज़ाना / बता रहे थे मेरे नाना / पढ़-पढ़कर वे मुझे सुनाते / बात-बात में ज्ञान बढ़ाते / और न इन सा साथी-संगी / इनकी दुनिया रंग-बिरंगी। / कभी हँसा दें, कभी रुला दें / मीठी-मीठी नींद सुला दें' (१६ मात्रिक संस्कारी जातीय छंद)
डॉ. दिनेश चमोला 'शैलेश' बालगीत के माध्यम से राष्ट्रीय भावधारा का बीजारोपण करते हैं: 'जहाँ हिमालय प्रहरी बनकर, करता सबका मान है / जिसकी रज तक प्यार बाँटती, मेरा हिन्दुस्तान है / हर युग में गौतम-गाँधी बन / लेते सुत अवतार हैं / जहाँ ह्रदय से होती माँ की / एक कंठ जयकार है। / जहाँ देश के लिए लाड़ले, हँसकर देते जान हैं / शांति-ज्ञान का अमर कोष वह मेरा हिन्दुस्तान है' (मुखड़ा-अंतरा २९ मात्रीय महायौगिक जातीय छंद, १६-१३ पर यति)।
बाल चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. प्रदीप शुक्ल ने बाल गीतों के स्वास्थ्य-चेतना जगाने का उपकरण बनाया है। एक अमीबा शीर्षक गीत में वे क्रिकेट की गेंद नाली में गिरने, उसे निकालते समय नाखूनों में अमीबा लगने और खाने के साथ पेट में जाने और गड़बड़ मचाने की घटना के माध्यम से स्वच्छता का संदेश देते हैं: 'एक अमीबा बड़े मजे से नाले में था रहता / अरे! वही गंदा नाला जो सड़क पार था बहता / कहने को तो एक अमीबा ढेरों उसके बच्चे / नाली में उनकी कोलोनी रहते गुच्छे-गुच्छे / क्रिकेट खेलते हुए गेंद नाली में गिरी छपाक / आव न देखा, ताव न देखा पप्पू गया तपाक / साथ गेंद के कई अमीबा पप्पू लेकर आया / बड़े-बड़े नाखून, भूल से उनको वहीं छुपाया / हाथ नहीं धोया अच्छे से पप्पू ने घर जाकर / खुश थे बहुत अमीबा सारे उसके पेट में आकर / रात हुई पप्पू चिल्लाया हुई पेट में गुड़गुड़ / सारे बच्चे समझ रहे हैं कहाँ-कहाँ थी गड़बड़ / तो बच्चों गलती ना करना पप्पू जैसी तुम भी / वरना प्यारे बच्चों तुम फिर सजा पाओगे लंबी।' ( २८ मात्रिक यौगिक जातीय छंद, १६-१२ पर यति)
बाल-रचनाओं की भाषा:
बच्चों को रचना पढ़ने का आनंद तभी आएगा जब भाषा आसानी से समझ में आती हो और दिल तक उतर जाती हो। कॉमिक्स और परीकथाएँ अपनी भाषाई सहजता और बोलचाल के शब्दों के उपयोग के कारण बच्चों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। तात्पर्य यही है कि बच्चों की पुस्तकों में उपयोग में लाई जा रही रचनाओं की भाषा बनावटी व कठिन न हो वरन् सहज और प्रवाहपूर्ण हो बच्चे ऐसी रचनाएँ पसंद करते हैं जिनमें बात नए तरीके से कही जा रही हो, नई कल्पनाएँ हों, असंभव को संभव बनाने के लिए फैंटेसी रची गई हो। वे ऐसी रचनाएँ भी पसंद करते हैं जिनमें एक ही बात का दोहराव हो और दोहराते समय उनमें नए पात्र या घटना जोड़ दी गई हो। बाल कविताओं मे भी ध्वनियों के साथ विविध प्रयोग जैसे: 'बादल गरजा धम धम धडाम / बिजली चमकी कड़ कड़ कड़ाम' आदि हो तो वे बच्चों को आकर्षित करते हैं। बच्चे भाषा से पूरी तरह से वाकिफ नहीं हो पाते, अतः उनके लिए लिखी गई रचनाओं में सरल शब्द हों जिन्हें बच्चे आसानी से समझ पाएँ। बच्चों के लिए लिखे गए गीतों की भाषा में प्रवाह, लय और छांदस सहजया आवश्यक है। उक्त सभी गीतों में सरसता, सरलता, शब्द-चयन में सटीकता, छंद के गेयता तथा अर्थ की स्पष्टता देखी जा सकती है। बालोपयोगी रचना गद्य, पद्य, नाट्य या नृत्य किसी भी विधा में हो उसमें छंद का होना शरबत में शक्कर का होना है।
संदर्भ: दिव्य नर्मदा नेट पत्रिका, झूमे नाचें गीति कथाएँ -शेषपाल सिंह शेष, चहक-महक -सदाशिव कौतुक, आओ सीखें मैदानों में गाते-गाते गीत -डॉ. रमेश चंद्र खरे, रेल चली भई रेल चली -कृष्णवल्लभ पौराणिक, हम बगिया के फूल -डॉ. बलजीत सिंह, एक सौ एक बाल गीत -डॉ. दिनेश चमोला 'शैलेश', गुल्लू का गाँव -डॉ. प्रदीप शुक्ल।
***
मुक्तक
रंग इश्क के अनगिनत, जैसा चाहे देख
लेखपाल न रख सके लेकिन उनका लेख
जी एस टी भी लग नहीं सकता, पटको शीश -
खींच न लछमन भी सकें, इस पर कोई रेख
माँ
माँ की महिमा जग से न्यारी, ममता की फुलवारी
संतति-रक्षा हेतु बने पल भर में ही दोधारी
माता से नाता अक्षय जो पाले सुत बडभागी-
ईश्वर ने अवतारित हो माँ की आरती उतारी
नारी
*
नर से दो-दो मात्रा भारी, हुई हमेशा नारी
अबला कभी न इसे समझना, नारी नहीं बिचारी
माँ, बहिना, भाभी, सजनी, सासु, साली, सरहज भी
सखी न हो तो समझ जिंदगी तेरी सूखी क्यारी
*
पत्नि
पति की किस्मत लिखनेवाली पत्नि नहीं है हीन
भिक्षुक हो बारात लिए दर गए आप हो दीन
करी कृपा आ गयी अकेली हुई स्वामिनी आज
कद्र न की तो किस्मत लेगी तुझसे सब सुख छीन
*
दीप प्रज्वलन
शुभ कार्यों के पहले घर का अँगना लेना लीप
चौक पूर, हो विनत जलाना, नन्हा माटी-दीप
तम निशिचर का अंत करेगा अंतिम दम तक मौन
आत्म-दीप प्रज्वलित बन मोती, जीवन सीप
*
परोपकार
अपना हित साधन ही माना है सबने अधिकार
परहित हेतु बनें समिधा, कब हुआ हमें स्वीकार?
स्वार्थी क्यों सुर-असुर सरीखा मानव होता आज?
नर सभ्यता सिखाती मित्रों, करना पर उपकार
*
एकता
तिनका-तिनका जोड़ बनाते चिड़वा-चिड़िया नीड़
बिना एकता मानव होता बिन अनुशासन भीड़
रहे-एकता अनुशासन तो सेना सज जाती है-
देकर निज बलिदान हरे वह, जनगण कि नित पीड़
*
असली गहना
असली गहना सत्य न भूलो
धारण कर झट नभ को छू लो
सत्य न संग तो सुख न मिलेगा
भोग भोग कर व्यर्थ न फूलो
२३-७-२०१९
***
बात पर पेंसिल
*
इसने उसकी बात की, उसने इसकी बात।
शब्द-शब्द होते रहे, उस-इस पर आघात।।
*
किसलय से ही सीख लें, किस लय में हो बात।
मधुकर कौशल माधुरी, सिक्त रहें जज्बात।।
*
तन्मय होकर बात कर, मन में रख सद्भाव।
तंत न व्यर्थ भिड़ंत में, रख बसंत सा चाव।।
*
जय प्रकाश सम बात कर, छोड़ छल-कपट-दाँव।
बागर हो बागरी सदृश, बचा देश घर गाँव।।
*
परिणीता चाहे नहीं, रहे विनीता बात।
सत्यपरक मिथिलेश सी, तब सुधरें हालात।।
*
व्यर्थ बात ही बात में, निकल बात से बात।
बढ़े बात तो टालिए, हो न बात से मात।
*
सुनी न समझी अन्य की, की अपनी ही बात।
भले प्रात से रात तक, सुलझ न पाई बात।।
*
वन प्रकाश की राह चल, धन्य केशवानंद।
बात करें परमार्थ की, दें जन को आनंद।।
*
धाम सैलवारा ललित, वरदायी वट-वृक्ष।
बैठ छाँह में बात कर, पाले ग्यान सुलक्ष।।
*
बात-बात में मात हो, बात-बात से जीत।
कहें केशवानंद जी, बात बढ़ाती प्रीत।।
२३-७-२०१८
*
रसानंद दे छंद नर्मदा ४० : अहीर छन्द
लक्षण: जाति रौद्र, पद २, चरण ४, प्रति चरण मात्रा ११, चरणान्त लघु गुरु लघु (जगण).
लक्षण छंद:
चाहे राँझ अहीर, बाला सुन्दर हीर
लघु गुरु लघु चरणांत, संग रहे नत शांत
पूजें ग्यारह रूद्र, कोशिश लँघे समुद्र
जल-थल-नभ में घूम, लक्ष्य सके पद चूम
उदाहरण:
१. सुर नर संत फ़क़ीर, कहें न कौन अहीर?
आत्म-ग्वाल तज धेनु, मन-प्रयास रस-वेणु
प्रकृति-पुरुष सम संग, रचे सृष्टि कर दंग
ग्यारह हों जब एक, मानो जगा विवेक
२. करो संग मिल काम, तब ही हो यश-नाम
भले रहे विधि वाम, रखना साहस थाम
सुबह दोपहर शाम, रचना छंद ललाम
कर्म करें बिन लोभ, सह परिणाम
३. पूजें ग्यारह रूद्र, मन में रखकर भक्ति
जनगण-शक्ति समुद्र, दे अनंत अनुरक्ति
लघु-गुरु-लघु रह शांत, रच दें छंद अहीर
रखता उन्नत माथ, खाली हाथ फ़क़ीर
***
गले मिले दोहा यमक २
*
चल बे घर बेघर नहीं, जो भटके बिन काज
बहुत हुई कविताई अब, कलम घिसे किस व्याज?
*
पटना वाली से कहा, 'पट ना' खाई मार
चित आए पट ना पड़े, अब की सिक्का यार
*
धरती पर धरती नहीं, चींटी सिर का भार
सोचे "धर दूँ तो धरा, कैसे सके सँभार?"
*
घटना घट ना सब कहें, अघट न घटना रीत
घट-घटवासी चकित लख, क्यों मनु करे अनीत?
*
सिरा न पाये फ़िक्र हम, सिरा न आया हाथ
पटक रहे बेफिक्र हो, पत्थर पर चुप माथ
*
बेसिर-दानव शक मुआ, हरता मन का चैन
मनका ले विश्वास का, सो ले सारी रैन
*
करता कुछ करता नहीं, भरता भरता दंड
हरता हरता शांति सुख, धरता धरता खंड
*
बजा रहे करताल पर, दे न सके कर ताल
गिनते हैं कर माल फिर, पहनाते कर माल
*
जल्दी से आ भार ले, व्यक्त करूँ आभार
असह्य लगे जो भार दें, हटा तुरत साभार
*
हँस सहते हम दर्द जब, देते हैं हमदर्द
अपना पन कर रहा है सब अपनापन सर्द
*
भोग लगाकर कर रहे, पंडित जी आराम
नहीं राम से पूछते, "ग्रहण करें आ राम!"
२३-७-२०१६
***
Poem:
*
Why do I wish to swim
Against the river flow?
I know well
I will have to struggle
More and more.
I know that
Flowing downstream
Is a easy task
As compare to upstream.
I also know that
Well wishers standing
On both the banks
Will clap and laugh.
If I win,
They will say:
Their encouragement
Is responsible for the success.
If unfortunately
I loose,
They will not a second
To say that
They tried their best
To stop me
By making laugh on me.
In both the cases
I will loose and
They will win.
Even than
I will swim
Against the river flow.
***
हम क्यों
हम क्यों
निज भाषा बोलें?
निज भाषा बोले बच्चा
बच्चा होता है सच्चा
हम सचाई से सचमुच दूर
आँखें रहते भी हैं सूर
फेंक अमिय
नित विष घोलें
हम क्यों
निज भाषा बोलें?
निज भाषा पंछी बोले
संग-साथ हिल-मिल डोले
हम लड़ते हैं भाई से
दुश्मन निज परछाईं के
दिल में
भड़क रहे शोले
हम क्यों
निज भाषा बोलें?
निज भाषा पशु को भाती
प्रकृति न भूले परिपाटी
संचय-सेक्स करे सीमित
खुद को करे नहीं बीमित
बदले नहीं
कभी चोले
हम क्यों
निज भाषा बोलें?
पर भाषा पर होते मुग्ध
परनारी देखें दिल दग्ध
शांति भूलकर करते युद्ध
भ्रष्टाचार सुहाता शुद्ध
मनमानी
करते डोलें
हम क्यों
निज भाषा बोलें?
अय्याशी में सुर प्यारे
क्रूर असुर भाते न्यारे
मानवता से क्या लेना
हम न जानते हैं देना
खुद को
'सलिल' नहीं तोलें
हम क्यों
निज भाषा बोलें?
२३.७.२०१५
***
दोहा सलिला
*
जो न उषा को चाह्ता, उसके फूटे भाग
कौन सुबह आकर कहे, उससे जल्दी जाग
*
लाल-गुलाबी जब दिखें, मनुआ प्राची-गाल
सेज छोड़कर नमन कर, फेर कर्म की माल
***
स्मरणांजलि:
महाकवि जगमोहन प्रसाद सक्सेना 'चंचरीक'
*
महाकवि जगमोहन प्रसाद सक्सेना 'चंचरीक' साधु प्रवृत्ति के ऐसे शब्दब्रम्होपासक हैं जिनकी पहचान समय नहीं कर सका। उनका सरल स्वभाव, सनातन मूल्यों के प्रति लगाव, मौन एकाकी सारस्वत साधना, अछूते और अनूठे आयामों का चिंतन, शिल्प पर कथ्य को वरीयता देता सृजन, मौलिक उद्भावनाएँ, छांदस प्रतिबद्धता, सादा रहन-सहन, खांटी राजस्थानी बोली, छरफरी-गौर काया, मन को सहलाती सी प्रेमिल दृष्टि और 'स्व' पर 'सर्व' को वरीयता देती आत्मगोपन की प्रवृत्ति उन्हें चिरस्मरणीय बनाती है। मणिकांचनी सद्गुणों का ऐसा समुच्चय देह में बस कर देहवासी होते हुए भी देह समाप्त होने पर विदेही होकर लुप्त नहीं होता अपितु देहातीत होकर भी स्मृतियों में प्रेरणापुंज बनकर चिरजीवित रहता है. वह एक से अनेक में चर्चित होकर नव कायाओं में अंकुरित, पल्लवित, पुष्पित और फलित होता है।
लीलाविहारी आनंदकंद गोबर्धनधारी श्रीकृष्ण की भक्ति विरासत में प्राप्त कर चंचरीक ने शैशव से ही सन १८९८ में पूर्वजों द्वारा स्थापित उत्तरमुखी श्री मथुरेश राधा-कृष्ण मंदिर में कृष्ण-भक्ति का अमृत पिया। साँझ-सकारे आरती-पूजन, ज्येष्ठ शिकल २ को पाटोत्सव, भाद्र कृष्ण १३ को श्रीकृष्ण छठी तथा भाद्र शुक्ल १३ को श्री राधा छठी आदि पर्वों ने शिशु जगमोहन को भगवत-भक्ति के रंग में रंग दिया। सात्विक प्रवृत्ति के दम्पति श्रीमती वासुदेवी तथा श्री सूर्यनारायण ने कार्तिक कृष्ण १४ संवत् १९८० विक्रम (७ नवंबर १९२३ ई.) की पुनीत तिथि में मनमोहन की कृपा से प्राप्त पुत्र का नामकरण जगमोहन कर प्रभु को नित्य पुकारने का साधन उत्पन्न कर लिया। जन्म चक्र के चतुर्थ भाव में विराजित सूर्य-चन्द्र-बुध-शनि की युति नवजात को असाधारण भागवत्भक्ति और अखंड सारस्वत साधना का वर दे रहे थे जो २८ दिसंबर २०१३ ई. को देहपात तक चंचरीक को निरंतर मिलता रहा।
बालक जगमोहन को शिक्षागुरु स्व. मथुराप्रसाद सक्सेना 'मथुरेश', विद्यागुरु स्व. भवदत्त ओझा तथा दीक्षागुरु सोहनलाल पाठक ने सांसारिकता के पंक में शतदल कमल की तरह निर्लिप्त रहकर न केवल कहलाना अपितु सुरभि बिखराना भी सिखाया। १९४१ में हाईस्कूल, १९४३ में इंटर, १९४५ में बी.ए. तथा १९५२ में एलएल. बी. परीक्षाएँ उत्तीर्ण कर इष्ट श्रीकृष्ण के पथ पर चलकर अन्याय से लड़कर न्याय की प्रतिष्ठा पर चल पड़े जगमोहन। जीवनसंगिनी शकुंतला देवी के साहचर्य ने उनमें अदालती दाँव-पेंचों के प्रति वितृष्णा तथा भागवत ग्रंथों और मनन-चिंतन की प्रवृत्ति को गहरा कर निवृत्ति मार्ग पर चलाने के लिये सृजन-पथ का ऐसा पथिक बना दिया जिसके कदमों ने रुकना नहीं सीखा। पतिपरायणा पत्नी और प्रभु परायण पति की गोद में आकर गायत्री स्वयं विराजमान हो गयीं और सुता की किलकारियाँ देखते-सुनते जगमोहन की कलम ने उन्हें 'चंचरीक' बना दिया, वे अपने इष्ट पद्मों के 'चंचरीक' (भ्रमर) हो गये।
महाकाव्य त्रयी का सृजन:
चंचरीककृत प्रथम महाकाव्य 'ॐ श्री कृष्णलीला चरित' में २१५२ दोहों में कृष्णजन्म से लेकर रुक्मिणी मंगल तक सभी प्रसंग सरसता, सरलता तथा रोचकता से वर्णित हैं। ओम श्री पुरुषोत्तम श्रीरामचरित वाल्मीकि रामायण के आधार पर १०५३ दोहों में रामकथा का गायन है। तृतीय तथा अंतिम महाकाव्य 'ओम पुरुषोत्तम श्री विष्णुकलकीचरित' में अल्पज्ञात तथा प्रायः अविदित कल्कि अवतार की दिव्य कथा का उद्घाटन ५ भागों में प्रकाशित १०६७ दोहों में किया गया है। प्रथम कृति में कथा विकास सहायक पदों तृतीय कृति में तनया डॉ. सावित्री रायजादा कृत दोहों की टीका को सम्मिलित कर चंचरीक जी ने शोधछात्रों का कार्य आसान कर दिया है। राजस्थान की मरुभूमि में चराचर के कर्मदेवता परात्पर परब्रम्ह चित्रगुप्त (ॐ) के आराधक कायस्थ कुल में जन्में चंचरीक का शब्दाक्षरों से अभिन्न नाता होना और हर कृति का आरम्भ 'ॐ' से करना सहज स्वाभाविक है। कायस्थ [कायास्थितः सः कायस्थः अर्थात वह (परमात्मा) में स्थित (अंश रूप आत्मा) होता है तो कायस्थ कहा जाता है] चंचरीक ने कायस्थ राम-कृष्ण पर महाकाव्य साथ-साथ अकायस्थ कल्कि (अभी क्लक्की अवतार हुआ नहीं है) से मानस मिलन कर उनपर भी महाकाव्य रच दिया, यह उनके सामर्थ्य का शिखर है।
देश के विविध प्रांतों की अनेक संस्थाएं चंचरीक सम्मानित कर गौरवान्वित हुई हैं। सनातन सलिला नर्मदा तट पर स्थित संस्कारधानी जबलपुर में साहित्यिक संस्था अभियान के तत्वावधान में समपन्न अखिल भारतीय दिव्य नर्मदा अलंकरण में अध्यक्ष होने के नाते मुझे श्री चंचरीक की द्वितीय कृति 'ॐ पुरुषोत्तम श्रीरामचरित' को नागपुर महाराष्ट्र निवासी जगन्नाथप्रसाद वर्मा-लीलादेवी वर्मा स्मृति जगलीला अलंकरण' से तथा अखिल भारतीय कायस्थ महासभा व चित्राशीष के संयुक्त तत्वावधान में शांतिदेवी-राजबहादुर वर्मा स्मृति 'शान्तिराज हिंदी रत्न' अलंकरण से समादृत करने का सौभाग्य मिला। राष्ट्रीय कायस्थ महापरिषद के जयपुर सम्मेलन में चंचरीक जी से भेंट, अंतरंग चर्चा तथा शकुंतला जी व् डॉ. सावित्री रायजादा से नैकट्य सौभाग्य मिला।
चंचरीक जी के महत्वपूर्ण अवदान क देखते हुए राजस्थान साहित्य अकादमी को ऊपर समग्र ग्रन्थ का प्रकाशन कर, उन्हें सर्वोच्च पुरस्कार से सम्मानित करना चाहिए। को उन पर डाक टिकिट निकालना चाहिए। जयपुर स्थित विश्व विद्यालय में उन पर पीठ स्थापित की जाना चाहिए। वैष्णव मंदिरों में संतों को चंचरीक साहित्य क्रय कर पठन-पाठन तथा शोध हेतु मार्ग दर्शन की व्यवस्था बनानी चाहिए।
दोहांजलि:
ॐ परात्पर ब्रम्ह ही, रचते हैं सब सृष्टि
हर काया में व्याप्त हों, कायथ सम्यक दृष्टि
कर्मयोग की साधना, उपदेशें कर्मेश
कर्म-धर्म ही वर्ण है, बतलाएं मथुरेश
सूर्य-वासुदेवी हँसे, लख जगमोहन रूप
शाकुन्तल-सौभाग्य से, मिला भक्ति का भूप
चंचरीक प्रभु-कृपा से, रचें नित्य नव काव्य
न्यायदेव से सत्य की, जय पायें संभाव्य
राम-कृष्ण-श्रीकल्कि पर, महाकाव्य रच तीन
दोहा दुनिया में हुए, भक्ति-भाव तल्लीन
सावित्री ही सुता बन, प्रगटीं, ले आशीष
जयपुर में जय-जय हुई, वंदन करें मनीष
कायथ कुल गौरव! हुए, हिंदी गौरव-नाज़
गर्वित सकल समाज है, तुमको पाकर आज
सतत सृजन अभियान यह, चले कीर्ति दे खूब
चित्रगुप्त आशीष दें, हर्ष मिलेगा खूब
चंचरीक से प्रेरणा, लें हिंदी के पूत
बना विश्ववाणी इसे, घूमें बनकर दूत
दोहा के दरबार में, सबसे ऊंचा नाम
चंचरीक ने कर लिया, करता 'सलिल' प्रणाम
चित्रगुप्त के धाम में, महाकाव्य रच नव्य
चंचरीक नवकीर्ति पा, गीत गुँजाएँ दिव्य
२३-७-२०१४
***

बुधवार, 22 जुलाई 2026

जुलाई २२, मस्तिष्क दिवस, ग़जल, मेघ, सॉनेट, नवगीत, पुरखे, मनहरण, यमक, हाड़ौती, दोहे

 सलिल सृजन जुलाई २२

विश्व मस्तिष्क दिवस
*
सामयिक गीत ० दिल्ली पुलिस लाख धिक्कार ० जनसेवक जनमित्र नहीं तुम, न ही देश के भक्त हो। चरण चूमते नेताओं के राजनीति अनुरक्त हो। जो भी कहीं सुधार माँगता उस पर करते अत्याचार दिल्ली पुलिस लाख धिक्कार ० खाकी वर्दी मारपीट का क्यों बन गई प्रतीक है। निर्दोषों का खून बहे गोरे डायर की लीक है।। शर्म करो कुछ बेटी-बेटे रोक रहे हैं चीख-पुकार दिल्ली पुलिस लाख धिक्कार ० अपराधी से साँठगाँठ है नेताओं के पहरेदार। जन-धन से वेतन पा करते जन-गण पर ही अत्याचार। लोकतंत्र को शोकतंत्र में बदल दिया झेलो फटकार दिल्ली पुलिस लाख धिक्कार ०००
सामयिक दोहे ० नाकाबिल मंत्री बने, असफल शासन-नीति। गल्ती मान सुधार लें, सीख न पाए रीति।। . हैं भविष्य इस देश का, तरुण तरुणियाँ सत्य। अनाचार करती पुलिस, निंदनीय है कृत्य।। . असंतोष हो जहाँ भी, करते नहीं विमर्श। बुलडोजर किंचित नहीं, जनतंत्री आदर्श।। . लोकतंत्र का प्राण है, आपस में संवाद। मन की बात न सार्थक, अगर न वाद-विवाद।। . लांछित करे विपक्ष को, यह न पक्ष का काम। संसद दोनों से बने, झुक मिल करिए नाम।। . कुशाभाऊ सम हो अगर, निर्मल पाक चरित्र। महकें जीवन भर विहँस, जैसे महके इत्र।। . नाना जी सम समर्पण, और सादगी साध्य। लाखों के मँहगे वसन, लोलुप के आराध्य।। . मिलनसारिता अटल सी, मिटा सके अलगाव। आदर मिले सभी जगह, जन का बढ़े प्रभाव।। . बदला चित्र चरित्र तो, बिसरे दीनदयाल। मंदिर में डाकाजनी, पर उन्नत है भाल।। . महाशक्ति के हाथ क्यों, बने खिलौना मौन। प्रैस वार्ता से डरे, दुनिया जाने कौन? . सुलझ न पाए परिस्थिति, दें पिछलों को दोष। जनता सच समझे मगर, रोके रहती रोष।। . एक इंच भी भूमि जब, सत्ता सके न छोड़। हो विनाश संवाद बिन, देता दामन छोड़।। . द्वारे गया विपक्ष तो, पिला न पाए चाय। साथ बैठने से खुले, सद्भावी अध्याय।। . सत्ता निर्बल पर करे, बल प्रयोग हो दीन। रक्त सड़क पर बहाती, वह सत्ता जो दीन।। २२.७.२०२६
०००

ग़जलिका
मत हो चंचल
मन रह अविचल
देख रहा वह
कण-कण हर पल
देख सका है
कहो कौन कल?
छलिए पर जय
पाने कर छल
सबल वही जो
निर्बल का बल
यदि कल उगना
आज मौन ढल
सलिल नयन में
बन सपना पल
२२.७.२०२५
०0०
मेघ
मेघदूत संदेश यक्ष का पहुँचाना भूले,
मेघासुर सम रूप बदलकर लड़ते-भिड़ते हैं,
पवन झुलाता झूला फिर भी शांत न होते हैं,
गरज गरज कर गुस्सा करते, गिरते-उठते हैं।
मल्ल लड़ाते पंजा, पल पल दांँव बदलते हैं,
झपट पकड़ते, बगली देते, टाँग अड़ाते हैं,
रपट फिसलते, सँभल न गिरते, मचल लपकते हैं,
कुछ न किसी को कभी समझते फँसा-गिराते हैं।
रूपवती दामिनी अदा दिखला भरमा गिरती,
घर घमंड का खाली होता फूटे जल-गगरी,
कोष लुटा सिर पीटें पर तकदीर नहीं जगती,
ठेंगा दिखा भागती आती हाथ न गिर बिजुरी।
वसुधा गिरा सलिल संचित कर हँस हरियाती है।
जब दिखता है कहीं बदरवा, मोद मनाती है।।
२२-७-२०२३
•••
छंद सलिला : सॉनेट
तिरंगा
ध्वज न केवल मैं तिरंगा
चिरंतन बलिदान हूँ मैं
लोक के हित सदा बेकल
सनातन अरमान हूँ मैं
सद्भाव हूँ मैं, शांति हूँ
चाहता सबका भला नित
नव सृजन की क्रांति भी हूँ
साध्य केवल लोक का हित
हरितिमा हूँ, भाग्य-भाषा
अहर्निश उन्नति-परिश्रम
स्वेद उपजी नवल आशा
जन प्रगति का चक्र अनुपम
आत्म जेता लो न पंगा
ध्वज न केवल मैं तिरंगा
(शेक्सपीरियन सॉनेट)
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छंद सलिला : (अभिनव प्रयोगः प्रदोष सॉनेट)
मुखिया
नव मुखिया को नमन है
सबके प्रति समभाव हो
अधिक न न्यून लगाव हो
हर्षित पूरा वतन है
भवन-विराजी है कुटी
जड़ जमीन से है जुड़ी
जीवटता की है धनी
धीरज की प्रतिमा धुनी
अग्नि परीक्षा है कड़ी
दिल्ली के दरबार में
सीता फिर से है खड़ी
राह न किंचित सहज है
साथ सभी का मिल सके
यह संयोग न महज है
२२-७-२०२२
•••
छंद सलिला : (अभिनव प्रयोगः प्रदोष सॉनेट)
प्रदोष रहिए खुशी से
हमेशा करें व्रत-कथा
जीतें हर बाधा-व्यथा
आशीष मिले शिवा से
प्रदोष रचिए हमेशा
अठ-पच कल मिल खेलिए
सुख-दुख सम चुप झेलिए
विनम्र रहिए हमेशा
गुरु लघु हो न पदांत में
आस्था मिले न भ्रांत में
रखिए शांति दिनांत में
चौदह पद सॉनेट में
चौ चौ चौ दो या रहे
चौ चौ त्रै त्रै पद सदा
२२-७-२०२२
•••
नवगीत
तुम्हें प्रणाम
*
मेरे पुरखों!
तुम्हें प्रणाम।
*
सूक्ष्म काय थे,
चित्र गुप्त विधि ,
अणु-परमाणु-विषाणु विष्णु हो धारे तुमने।
कोष-वृद्धि कर
'श्री' पाई है।
जल-थल--नभ पर
कीर्ति-पताका
फहराई है।
पंचतत्व तुम
नाम अनाम।
मेरे पुरखों!
तुम्हें प्रणाम।
*
भू-नभ
दिग्दिगंत यश गाते।
भूत-अभूत तुम्हीं ने नाते, बना निभाए।
द्वैत दिखा,
अद्वैत-पथ वरा।
कहा प्रकृति ने
मनुज है खरा।
लड़, मर-मिटे
सुरासुर लेकिन
मिलकर जिए
रहे तुम आम।
मेरे पुरखों!
तुम्हें प्रणाम।
*
धरा-पुत्र हे!
प्रकृति-मित्र हे!
गही विरासत हाय! न हमने, चूक यही।
रौंद प्रकृति को
'ख़ास' हो रहे।
नाश बीज का
आप बो रहे।
खाली हाथों
जाना फिर भी
जोड़ मर रहे
विधि है वाम।
२२-७-२०१९
***
मुक्तक
दीप्ति तम हरकर उजाला बाँट दे
अब न शर्मा शतक से तम छांट दे
दस दिशाओं से सुनो तुम तालियाँ
फाइनल लो जीत धोबीपाट दे
*
एकता है तो मिलेगी विजय भी
गेंद की गति दिशा होगी मलय सी
खाए चक्कर ब्रिटिश बल्लेबाज सब
तिरंगा फ़हरा सके, हो जयी भी
***
महिला क्रिकेट के दोहे
स्मृति का बल्ला चला, गेंद हुई रॉकेट.
पलक झपकते नभ छुए, गेंदबाज अपसेट.
*
कैसे करती अंगुलियाँ, पल में कहो कमाल.
मात दे रही पेस से, झूलन मचा धमाल.
*
दीप्ति कौंधती दामिनी, गिरे उड़ा दे होश.
चमके दमके निरंतर, कभी न रीते कोश.
*
पूनम उतरी तो हुई, अजब अनोखी बात.
घिरे विपक्षी तिमिर में, कहें अमावस तात.
*
शर संधाना तो हुई, टीम विरोधी ढेर.
मंधाना के वार से, नहीं किसी की खैर.
२२.७.१७
***
मनहरण छन्द
विधान: 8-8-8-7 वर्ण
.
चीनियों को ठोंककर, पाकियों को पीटकर, फ़हरा तिरंगा आज, हम मुसकाएँगे.
लाख मतभेद रहें, पर मनभेद ना हों, जन गण मन, वंदे मातरम गाएँगे.
सिक्किम भूटान नेपाल की न बात करो, तिब्बत को भी 'सलिल', आजाद हम कराएँगे.
भारत के भाग, किसी वक्त जो अलग हुए, एक साथ जोड़, आर्यावर्त हम बनाएँगे.
***
गीत
कारे बदरा
*
आ रे कारे बदरा
*
टेर रही धरती तुझे
आकर प्यास बुझा
रीते कूप-नदी भरने की
आकर राह सुझा
ओ रे कारे बदरा
*
देर न कर अब तो बरस
बजा-बजा तबला
बिजली कहे न तू गरज
नारी है सबला
भा रे कारे बदरा
*
लहर-लहर लहरा सके
मछली के सँग झूम
बीरबहूटी दूब में
नाचे भू को चूम
गा रे कारे बदरा
*
लाँघ न सीमा बेरहम
धरा न जाए डूब
दुआ कर रहे जो वही
मनुज न जाए ऊब
जारे कारे बदरा
*
हरा-भरा हर पेड़ हो
नगमे सुना हवा
'सलिल' बूंद नर्तन करे
गम की बने दवा
जारे कारे बदरा
२२-७-२०१६
***
दोहा-यमक
*
गले मिले दोहा यमक, गणपति दें आशीष।
हो समृद्ध गणतंत्र यह, गणपति बने मनीष।।
*
वीणावादिनि शत नमन, साध सकूं कुछ राग ।
वीणावादिनि है विनत, मन में ले अनुराग। ।
*
अक्षर क्षर हो दे रहा, क्षर अक्षर ज्ञान।
शब्द ब्रह्म को नमन कर, भव तरते मतिमान।।
*
चित्र गुप्त है चित्र में, देख सके तो देख।
चित्रगुप्त प्रति प्रणत हो, अमिट कर्म का लेख।।
*
दोहा ने दोहा सदा, भाषा गौ को मीत।
गीत प्रीत के गुँजाता, दोहा रीत पुनीत।।
*
भेंट रहे दोहा-यमक, ले हाथों में हार।
हार न कोई मानता, प्यार हुआ मनुहार।।
*
नीर क्षीर दोहा यमक, अर्पित पिंगल नाग।
बीन छंद, लय सरस धुन, झूम उठे सुन नाग।।
*
गले मिले दोहा-यमक, झपट झपट-लिपट चिर मीत।
गले भेद के हिम शिखर, दमके ऐक्य पुनीत।।
*
ग्यारह-तेरह यति रखें, गुरु-लघु हो पद अंत।
जगण निषिद्ध पदादि में, गुरु-लघु सम यति संत।।
*
नाहक हक ना त्याग तू, ना हक पीछे भाग।
ना मन में अनुराग रख, ना तन में बैराग।।
*
ना हक की तू माँग कर, कर पहले कर कर्तव्य।
नाहक भूला आज को, सोच रहा भवितव्य।।
२२-६-२०१६
***
एक रचना:
का बिगार दओ?
*
काए फूँक रओ बेदर्दी सें
हो खें भाव बिभोर?
का बिगार दो तोरो मैंने
भइया रामकिसोर??
*
हँस खेलत ती
संग पवन खें
पेंग भरत ती खूब।
तेंदू बिरछा
बाँह झुलाउत
रओ खुसी में डूब।
कें की नजर
लग गई दइया!
धर लओ मो खों तोर।
का बिगार दो तोरो मैंने
भइया रामकिसोर??
*
काट-सुखा
भर दई तमाखू
डोरा दओ लपेट।
काय नें समझें
महाकाल सें
कर लई तुरतई भेंट।
लत नें लगईयो
बीमारी सौ
दैहें तोय झिंझोर
का बिगार दो तोरो मैंने
भइया रामकिसोर??
*
जिओ, जियन दो
बात मान ल्यो
पीओ नें फूकों यार!
बढ़े फेंफडे में
दम तुरतई
गाड़ी हो नें उलार।
चुप्पै-चाप
मान लें बतिया
सुनें न कौनऊ सोर।
का बिगार दो तोरो मैंने
भइया रामकिसोर??
*
अपनों नें तो
मेहरारू-टाबर
का करो ख़याल।
गुटखा-पान,
बिड़ी लत छोड़ो
नई तें होय बबाल।
करत नसा नें
कब्बऊ कौनों
पंछी, डंगर, ढोर।
का बिगार दो तोरो मैंने
भइया रामकिसोर??
*
बात मान लें
निज हित की जो
बोई कहाउत सयानो।
तेन कैसो
नादाँ है बीरन
साँच नई पहचानो।
भौत करी अंधेर
जगो रे!
टेरे उजरी भोर।
का बिगार दो तोरो मैंने
भइया रामकिसोर??
*
२१-११-२०१५
कालिंदी विहार लखनऊ
***
हाड़ौती मुक्तिका:
*
तनखा पूड़ी, घूस मलाई
मत देखै तू पीर पराई
.
अंग्रेजी में गिट-पिट कर लै
हिंदी की मत करै पढ़ाई
.
बेसी धन सूं मन हरखायो
आछी लागी श्याम कमाई
.
कंसराज को खाड कालज्यो
लार सुदामा करी मिताई
.
बना भेंट कै नाक चढ़ावै
ऊँ ई सांचो जगत गुसाई
.
धोला कपड़ा, मैला मन सूं
भव सागर सूँ पार न्ह पाई
.
आतंकी रावण की लंका
सिरी राम ने जा'र ढहाई
.
आपण सबका पाप धो'र भी
यार 'सलिल' नंदी हरखाई
***
दोहे का रंग कविता के संग
*
बाहर कम भीतर अधिक जब-जब झाँकें आप
तब कविता होती प्रगट, अंतर्मन में व्याप
*
औरों की देखें कमी, दुनिया का दस्तूर
निज कमियाँ देखो बजे, कविता का संतूर
*
कविता मन की संगिनी, तन से रखे न काम
धन से रहती दूर यह, प्रिय जैसे संतान
*
कविता सविता तिमिर हर, देते दिव्य प्रकाश
महक उठे मन-मोगरा, निकट लगे आकाश
*
काव्य -कामिनी ने कभी, करी न कोई चाह
बैठे चुप थक-हारकर, कांत न पाएं थाह
***
मुक्तिका
*
मापनी: २१२२ १२१२ २२
*
आँख से आँख जब मिलाते हैं
ख्वाहिशें आप क्यों छिपाते हैं?
आइना गैर को दिखाते हैं
और खुद से नज़र चुराते हैं
वक़्त का दे रहे दुहाई जो
फ़र्ज़ का क़र्ज़ कब चुकाते हैं?
रौशनी भीख माँगती उनसे
जो मशालें जला उठाते हैं
मैं 'सलिल' ज़िंदगी का जीवन हूँ
आप बेकार क्यों बहाते हैं?
२२-७-२०१५
***
गीतः
सुग्गा बोलो
जय सिया राम...
*
सुग्गा बोलो
जय सिया राम...
*
काने कौए कुर्सी को
पकड़ सयाने बन बैठे
भूल गये रुकना-झुकना
देख आईना हँस एँठे
खिसकी पाँव तले धरती
नाम हुआ बेहद बदनाम...
*
मोहन ने फिर व्यूह रचा
किया पार्थ ने शर-सन्धान
कौरव हुए धराशायी
जनगण सिद्ध हुआ मतिमान
खुश मत हो, सच याद रखो
जन-हित बिन होगे गुमनाम...
*
हर चूल्हे में आग जले
गौ-भिक्षुक रोटी पाये
सांझ-सकारे गली-गली
दाता की जय-जय गाये
मौका पाये काबलियत
मेहनत पाये अपना दाम...
२२-७-२०१४
***