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शुक्रवार, 16 अप्रैल 2021

पुस्तक सलिला
'सही के हीरो' साधारण लोगों की असाधारणता की मार्मिक कहानियाँ
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
[पुस्तक विवरण- सही के हीरो, कहानी संग्रह, ISBN 9789385524400, डॉ. अव्यक्त अग्रवाल, प्रथम संस्करण २०१६, आकार २१.५ से.मी. x १३.५ से.मी., आवरण पेपर बैंक बहुरंगी, कहानीकार संपर्क- डी ७ जसूजा सिटी, जबलपुर ४८२००३]
*
मनुष्य में अनुभव किये हुए को कहने की अदम्य इच्छा वाक् क्षमता के रूप में विकसित हुई। अस्पष्ट स्फुट ध्वनियाँ क्रमशः सार्थक संवादों के रूप में आईं तो लयबद्ध कहन कविता के रूप में और क्रमबद्ध कथन कहानी के रूप में विकसित हुए। कहानी, कथा, किस्सा, गल्प, गप्प और चुटकुले विषयवस्तु के आकार और कथ्य के अनुरूप प्रकाश में आये। गद्य में निबन्ध, संस्मरण, यात्रावृत्त, व्यंग्य लेख, आत्मकथा, समीक्षा आदि विधाओं का विकास होने के बाद भी कहानी की लोकप्रियता सर्वकालों में सर्वाधिक थी, है और रहेगी। कहानी वह जो कही जाए, अर्थात उसमें कहे जाने और सुने जाने योग्य तत्व हों। वर्तमान पूँजीवादी राजनीति-प्रधान व्यक्तिपरक जीवन शैली में साहित्य संसाधनों और पहुँच के सफे पर हाशिये में रखे जा रहे जीवट और संघर्ष को पुनर्जीवन दे रहा है।
स्वतंत्रता के पश्चात अहिंसा की माला जपते दल विशेष ने सत्ता पर और हिंसा पर भरोसा करनेवाले अन्य दल विशेष ने शिक्षा संस्थानों और साहित्यिक अकादमियों पर कब्ज़ा कर साहित्यिक विधाओं में वैषम्य और विसंगतियों के अतिरेकी चित्रण को सामने लाकर सामाजिक संघर्ष को तेज करनेवाले साहित्य और साहित्यकारों को पुरस्कृत किया। फलतः, आम आदमी के नाम पर स्त्री-पुरुष, संपन्न-विपन्न, नेता-जनता, श्रमिक-उद्योगपति, छात्र-शिक्षक, हिन्दू-मुस्लिम आदि के नाम पर टकराव ने सद्भाव, सहयोग, सहकार, विश्वास, निष्ठा आदि को अप्रासंगिक बनने का काम किया। इस पृष्ठभूमि में अत्यन्त अल्प संसाधनों और पिछड़े क्षेत्र से संघर्ष कर स्वयं को विशेषज्ञ चिकित्सक के रूप में स्थापित कर, अपने मरीजों के इलाज के साथ-साथ उनके जीवन-संघर्ष को पहचान कर मानसिक संबल देनेवाले डॉ. अव्यक्त अग्रवाल ने निर्बल का बल बनने के अपने महाभियान में विवेच्य कहानी संग्रह के माध्यम से पाठकों को भी सहभागी बनने का अवसर दिया है।
इस कहानी संग्रह के अधिकांश पात्र निम्न जीवन स्तर और विपन्नता की मेंड़ पर लगातार चुभ रहे काँटों के बीच पैर रखते हुए आगे बढ़ते हैं। नियति ने भले ही इन्हें मरने के लिए पैदा किया हो पर अपनी जिजीविषा के सहारे ये मौत के अनुकूल परिस्थितियों से जूझकर जीवन का राजमार्ग तलाश पाते हैं। साहित्य के प्रभाव, उपयोगिता और पठनीयता पर प्रश्न उठानेवाले इस संग्रह को पढ़ें तो उनके जीवन की नकारात्मक ऊर्जा सकारात्मकता का वरण कर सकेगी। परिस्थितियों के चक्रव्यूह में फँसकर लहूलुहान होते हुए भी ऊपर उठने और आगे बढ़ने को प्रेरित करते इस कथा-संग्रह में कथाकार शिल्प पर कथ्य को वरीयता देता है। कहानी के पात्र पारिस्थितिक वैषम्य और विसंगति के हलाहल को कंठ में धारकर अपने सपने पूरे होते देखने का अमृत पान करते हुए कहीं काल्पनिक प्रतीत नहीं होते। ये कहानियाँ वास्तव में कल से प्राप्त विरासत को आज सँवार-सुधार कर कल को उज्जवल थाती देने का सारस्वत अनुष्ठान हैं।
'सही के हीरो' शीर्षक और मुखपृष्ठ पर अंकित देबाशीष साहा द्वारा निर्मित चित्र ही यह बता देता कि आम आदमियों के बीच में से उभरते हुए चरित नायक अपनी भाषा, भूषा, सोच और संघर्ष के साथ पाठक से रू-ब-रू होंगे। मर्मस्पर्शी कहानियाँ तथा प्रेरक कहानियाँ और संस्मरण दो भागों में क्रमशः १० + १८ कुल २८ हैं। संस्मरणात्मक कहानियाँ, पाठक को देखकर भी अनदेखे किये जाते पलों और व्यक्तियों से आँखें मिलाने का सुअवसर उपलब्ध कराते हैं। पात्रों और परिवेश के अनुकूल शब्द-चयन और वाक्य-संरचना कथानक को विश्वसनीयता प्रदान करते हैं। अंतर्जाल पर सर्वाधिक बिकनेवाले संग्रहों में सम्मिलित इस कृति की प्रथम कहानी 'लाइफगार्ड' के नायक एक बेसहारा बच्चे विक्टर को फ्रांसिस पालता है, युवा विक्टर अन्य बेसहारा बच्चे एडम को अपना लेता है और उसे विमाता से बचाने के लिए अपनी प्रेमिका से विवाह करने से कतराता है। डूबते फ्रांसिस को बचाते हुए मौत के कगार पर पहुँचे विक्टर की चिकित्सा अवधि के मध्य विक्टर की प्राणरक्षा की दुआ माँगते एडम और मारिया एक दूसरे के इतने निकट आ जाते हैं कि नन्हा एडम विक्टर से मारिया मम्मी की माँग कर उसे नया जीवन देता है।
कहानी 'चने के दाने' एक न हो सके किशोर प्रेमियों के पुनर्मिलन की मर्मस्पर्शी गाथा है। कठोर ह्रदय पाठकों की भी ऑंखें नम कर सकने में समर्थ 'आधी परी' तथाकथित समझदारों द्वारा स्नेह-प्रेम की आड़ में अल्पविकसित का शोषण करने पर आधारित है। तरुणी प्रीति के बहाने जीवनसाथी चुनते समय स्वस्थ्य - समझ का संदेश देती है 'पासवर्ड' कहानी। 'एक अलग प्रेम कहानी' साधनहीन ग्रामीण दंपति के एकांतिक प्रेम के समान्तर चिकित्सक-रोगी के बीच महीन विश्वास तन्तु के टूटने तथा बढ़ते व्यवसायीकरण को इंगित करती व्यथा-कथा है। पारिवारिक रिश्तों के बिखरने पर केंद्रित चलचित्र 'बावर्ची' में नायक घरेलू नौकर बनकर परिवार के सदस्यों के बीच मरते स्नेह बंधन को जीवित करता है। कहानी जादूगर में नायिका के कैशोर्य काल का प्रेमी जो अब मनोचिकित्सक है, नायिका में उसके पति के प्रति घटते प्रेम को पुनर्जीवित करता है। 'बहुरुपिया' में साधनहीन भाई-बहिन का निर्मल प्रेम, 'आइसक्रीम कैंडी' में राजनेताओं के कारण आहत होते आमजन, 'ज़िंदगी एक स्टेशन' में बदलते सामाजिक ढाँचे के कारण स्थापित व्यवसायों के अलाभप्रद होने की समस्या और समाधान तथा 'मेरा चैंपियन' में पिता के सपने को पूरा करते पुत्र की कहानी है।
दूसरे भाग में 'सही का हीरो' एक साधनहीन किन्तु अपने सपने साकार करने के प्रति आत्मविश्वास से भरे बच्चे की कथा है। 'गूगल' किसी घटना को देखने के दो भिन्न दृष्टिकोण, 'मैं ठीक हूँ' मौत के मुख से लौटी नन्हीं बच्ची द्वारा जीवन की हर साँस का आनंद लेने की सीख, 'दुश्वारियाँ एक अवसर' अपंग बच्चे के संकल्प और सफलता, 'सफलता मंत्र' जीवन का आनंद लेने, 'मेरी पचमढ़ी और मैं' संस्मरण, 'आसान है' में सच को स्वीकार कर औरों को ख़ुशी देने, 'उमैया एक तमाशा' विपन्न बच्चों में छिपी प्रतिभा, 'एक और सुबह' बचपन की यादों, 'फाँस' जीवनानंद की खोज, 'लोकप्रियता का रहस्य' अपनी क्षमताओं की पहचान, 'वो अधूरी कहानी' जीवन के उद्देश्य की पहचान, 'सफलता सबसे शक्तिशाली मंत्र ' निज सामर्थ्य से साक्षात्, 'स्वतः प्रेरणा' मन की आवाज़ सुनने, 'हम सब रौशनी पुंज' निराशा में आशा, 'हवा का झौंका समीर' में बेसहारा बच्चों के लालन-पालन तथा 'ज़िन्दगी एक चैस बोर्ड' में अपने उद्देश्य की तलाश को केंद्र में रखकर कथा का ताना-बाना बुना गया है।
'सही का हीरो' कहानी संग्रह की विशेषता इसमें साधारणता का होना है। अधिकांश कहानियाँ जीवन में घटी वास्तविक घटनाओं पर आधारित हैं। यथार्थ को कल्पना का आवरण पहनाते समय यह ध्यान रखा गया है कि मूल घटना और पात्रों की विश्वसनीयता, उपयोगिता और सन्देशवाहकता बनी रहे। अधिकांश घटनाएँ और पात्र पाठक के इर्द-गिर्द से ही उठाये गए हैं किन्तु उन्हें देखने की दृष्टि, उनके मूल्याङ्कन का नज़रिया और उसने सीख लेने का हौसला बिलकुल नया है। इन कहानियों में अभाव-उपेक्षा, टकराव-बिखराव, सपने-नपने, गिराव-उठाव, निराशा-आशा, अवनति-उन्नति, विफलता-सफलता, नासमझी और समझदारी अर्थात जीवन रूपी इंद्रधनुष का हर रंग अपनी चमक और चटख के साथ उपस्थित है। नकारात्मकता पर सकारात्मकता की विजय, पाठक को लड़ने, बदलने और जीतने का सन्देश देती है। शिल्प की दृष्टि से ये रचनाएँ कहानी, लघुकथा, संस्मरण, शब्द चित्र आदि विधाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं।
डॉ. अव्यक्त अग्रवाल की भाषा सहज, सरस, सुगम, विषय, पात्र और परिवेश के अनुकूल है। किसी पहाड़ी से नि:सृत निर्झर की तरह अनगढ़पने में देने की आकुलता, नया ग्रहण करने की आतुरता और सबको अपना लेने की उत्सुकता पात्रों को जीवंत और प्रेरणादायी बनाती है। अव्यक्त जी खुद घटना को व्यक्त नहीं करते, वे पात्र या घटना को सामने आने देते हैं। कम से कम में अधिक से अधिक कहने का कौशल सहज नहीं होता किन्तु अव्यक्त जी इसे कुशलतापूर्वक साध सके हैं। वे पात्र के मुँह में शब्द ठूँसने या कहलाने का कोई प्रयास नहीं करते। उनके पात्र न तो भदेसी होने का दिखावा करते हैं, न सुसंस्कृत होने का पाखण्ड। कथ्य संक्षिप्त - गठा हुआ, संवाद सारगर्भित, भाषा शैली सहज - प्रचलित, शब्द चयन सम्यक - उपयुक्त, मुहावरों का यथोचित प्रयोग, हिंदी, उर्दू, संस्कृत, अंग्रेजी शब्दों का प्रचलन के अनुसार प्रयोग पाठक को बाँधता है। इस उद्देश्यपूर्ण कृति का सर्वाधिक लोकप्रिय साहित्य में शुमार होना आश्वस्त करता है कि हिंदी तथा साहित्य के प्रेमी पाठकों का अभाव नहीं है। सही के हीरो' ही देश और समाज का गौरव बढ़ाकर मानवता को परिपुष्ट करते हैं। अव्यक्त जी को इस कृति हेतु
बधाई
। उनकी आगामी कृति की प्रतीक्षा होना स्वाभाविक है।
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-२०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, salil.sanjiv@gmail.com, चलभाष ९४२५१८३२४४
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नुस्खे

आरोग्य-आशा:
स्व. शान्ति देवी वर्मा के नुस्खे
पारंपरिक चिकित्सा-विधि
*
आपको ऐसे नुस्खे ज्ञात हों तो भेजें। इनका प्रयोग स्वविवेक से करें।
वायु भगाएँ दूर :
एक चुटकी अजवाइन में नीबू रस की कुछ बूँदें डालकर थोड़े से नमक के साथ मिलाकर रगड़ लें। आधा कप पानी के साथ सेवन करने पर कुछ देर बाद वायु निकलना प्रारम्भ हो जाएगी।
पांडु रोग / पीलिया :
अदरक की पतली-पतली फाँकें नीबू के रस में डूबा दें। इसमें अजवाइन के दाने तथा स्वाद के अनुसार नमक मिला दें। अदरक का रंग लाल होने पर तीन-चार बार सेवन करने पर पांडु रोग में लाभ होगा। 
इसक् साथ रोज सवेरे तथा शाम को किसी बगीचे या मैदान में जहाँ खूब पेड़-पौधे हों घूमना लाभदायक है। बगीचे में खूब गहरी-गहरी साँसें लें ताकि अधिक से अधिक ओषजन वायु शरीर में पहुँचे।
जोड़ों का दर्द:
सरसों के तेल में लहसुन तथा अजवाइन डालकर आग पर गरम करें। लहसुन काली पड़ने पर ठंडाकर छान लें और किसी शीशी में भर लें। इसकी मालिश करते समय ठंडी हवा न लगे। धीरे-धीरे दर्द कम होकर आराम मिलेगा।
कान दर्द:
यह तेल कान के दर्द को भी दूर करेगा। दाद, खारिश, खुजली में इसके उपयोग से लाभ होगा। कब्ज से बचें तथा कढ़ी, चांवल जैसा वायु बढ़ने वाला आहार न लें। 
***

दोहा

दोहा सलिला

*
अरुणचूर दे रहा है, अरुण देखकर बाँग
जो सोए वे कह रहे, व्यर्थ अड़ाता टाँग
*
कन्याएँ धरना धरे, पूर्ण कीजिए माँग
क्वाँरे झट सिंदूर ले, पहुँचे भरने माँग
*
वह बोली यह टाँग दे, वह भागा हो भीत
टाँग न दूँ मैं तो कभी, कैसी है यह रीत
*
संजीव
१६-४-२०२०
मनरंजन:
प्रस्तुत दोहे का अर्थ व रचनाकार बताएँ
अम्बुज अरि पति ता सुता ता पति उर को हार।
ता अरि पति कि भामिनी आई बसै यही द्वार।।

वास्तु विमर्श

वास्तु विमर्श
*
पूर्व, पूर्वोत्तर व उत्तर दिशा में भगवान का चित्र स्थापित कर, उसकी ओर मुँह कर पूजन करें।
पूर्व सूर्य भगवान के प्रागट्य की दिशा है।
उत्तर में दिशादर्शक ध्रुवतारा है।
एक दिन में पथ प्रदर्शन करता है दूसरा रात में राह दिखाता है। दोनों के मध्य ईशान दिशा को ईश का स्थान मानता है वास्तुशास्त्र।
यह विग्यान सम्मत भी है। सूर्य प्रकाश और ऊर्जा के अक्षय स्रोत हैं। वे जीवनदाता हैं। सूर्य किरणें प्रकाश देती हैं, विषाणुओं को नष्ट करती हैं, विटामिन डी देती हैं, आतिशी शीशे का प्रयोग कर इनसे आग सुलगाई जा सकती है।
विश्व के प्रतापी राजवंश खुद को सूर्यवंशी कहते रहे हैं।
'भा' धातु का अर्थ प्रकाशित करना है इसलिए सूर्य भास्कर और हमारा देश 'भारत' है। हमें इंडिया नहीं होना है।
सूर्योपासना कुष्ठ रोग निवारक बताई गई है।
वास्तु के अनुसार आवास में सूर्य प्रकाश आना आवश्यक है। यदि न आता हो तो यथासंभव रोज या सप्ताह में एक दिन धूप में कुछ घंटे बिताएँ। पश्चिमी देशों में लोग समुद्र तट पर जाकर 'सन बाथ' लेते हैं अर्थात नयूनतम वस्त्रों में देह को सूर्य प्रकाश ग्रहण कराते हैं। यह फैशन या निर्लज्जता नहीं, प्राकृतिक चिकित्सा है। हमारे गाँवों में पनघट, नदी, तालाब या कुएँ पर स्नान करने की परंपरा इसीलिए है कि शुद्ध प्राणवायु और सूर्यप्रकाश का मणिकांचन संयोग हो सके।
कुंभादि पर्वों पर अगणित मनुष्यों के स्नान के समय सूर्य किरणें विषाणु नष्ट करती रहती हैं। वर्तमान कोरोना संकट का विकरालतम रूप वहीं है जहाँ सूर्य देव की कृपा कम है। हम रोज सवेरे सूर्योदय के समय उन्हें प्रणाम कर दीर्घ - निरोगी तथा कर्मप्रधान जीवन की कामना करें। सूर्य स्वानुशासन, कर्मठता, नियमितता तथा निष्काम कर्म के जीवंत प्रतीक हैं।
*
संजीव
१६-४-२०२०
९४२५१८३२४४

दोहा-जनक छंद

नव प्रयोग
दोहा-जनक छंद
*
विधि-विधान से कार्य कर, ब्रह्मा रहें प्रसन्न
याद रखें गुरु-सीख तो, विपद् न हो आसन्न
बात मीठी ही कहिए
मुकुल मन हँसते रहिए
स्नेह सलिला सम बहिए
*
संजीव
१६-४-२०२०

मुक्तक

मुक्तक
*
पंडित को पेट हेतु राम की जरूरत है
मंदिर को छत हेतु खाम की जरूरत है
सीता को दंडित कर राजदंड ठठा रहा
काल कहे नाश परिणाम की जरूरत है
*
रोजी और रोटी ही अवाम की जरूरत है
हाथों को भीख नहीं काम की जरूरत है
स्वाति सलिल मोतियों के ढेर लगा देंगे पर
मोल लेने के लिए दाम की जरूरत है
*
शीत कहे सूर्य तपो घाम की जरूरत है
जेठ कहे अब न तपो शाम की जरूरत है
सूर्य ठिठक सोच रहा, जो कहते कहने दो
पहले कर काम फिर आराम की जरूरत है
*
आधुनिका को चिकने चाम की जरूरत है
मद्यप को साकी को जाम की जरूरत है
सत्ता को अमन-चैन से न रहा वास्ता
कैसे भी, कहीं भी अवाम की जरूरत है
*
कोरोना को तुरत लगाम की जरूरत है
घर में खुश रह कहें विराम की जरूरत है
मदद करें यथाशक्ति, पढ़ें-लिखें, योग करें
साहस सुख शांति दे, अनाम की जरूरत है
*
संजीव
१६-४-२०२०
९४२५१८३२४४

गीत


भक्ति गीत :
कहाँ गया
*
कहाँ गया रणछोड़ रे!
जला प्रेम की ज्योत
नटखट छलिया साँवरा  
खोजो, मिले न न्योत 
*
कण-कण में तू रम रहा
घट-घट तेरा वास.
लेकिन अधरों पर नहीं
अब आता है हास.
लगे जेठ सम तप रहा
अब पावस-मधुमास
क्यों न गूंजती बाँसुरी
पूछ रहे खद्योत
कहाँ गया रणछोड़ रे!
जला प्रेम की ज्योत
*
श्वास-श्वास पर लिख लिया
जब से तेरा नाम.
आस-आस में तू बसा
तू ही काम-अकाम.
मन-मुरली, तन जमुन-जल
व्यथित विधाता वाम
बिसराया है बोल क्यों?
मिला ज्योत से ज्योत
कहाँ गया रणछोड़ रे!,
जला प्रेम की ज्योत
*
पल-पल हेरा है तुझे
पाया अपने पास.
दिखता-छिप जाता तुरत
ओ छलिया! दे त्रास.
ले-ले अपनीं शरण में
'सलिल' तिहारा दास
दूर न रहने दे तनिक
हम दोनों सहगोत
कहाँ गया रणछोड़ रे!
जला प्रेम की ज्योत
***

दोहा दुनिया

दोहा दुनिया
*
नेह-नर्मदा नहा ले, गर्मी होगी शांत
जी भर जलजीरा गटक, चित्त न पित्त अशांत
*
नित्य निनादित नर्मदा, कलकल सलिल प्रवाह
ताप किनारे ही रुका, लहर मिटाती दाह
*
परकम्मा करते चरण, वरते पुण्य असीम
छेंक धूप को छाँह दें, पीपल, बरगद, नीम
*
मन कठोर चट्टान सा, तप पा-देता कष्ट
जल संतों सा तप करे, हरता द्वेष-अनिष्ट
*
मग पर पग पनही बिना, नहीं उचित इस काल
बाल न बाँका लू करे, पनहा पी हर हाल
*
गाँठ प्याज की संग रख, लू से करे बचाव
मट्ठा पी ठट्ठा करो, व्यर्थ न खाओ ताव
*
भर गिलास लस्सी पियो, नित्य मलाईदार
कहो 'नर्मदे हर' सलिल, एक नहीं कई बार
*
पीस पोदीना पत्तियाँ, मिर्ची-कैरी-प्याज
काला नमक व गुड़ मिला, जमकर खा तज लाज
*
मीठी या नमकीन हो, रुचे महेरी खूब
सत्तू पी ले घोलकर, जा ठंडक में डूब
*
खरबूजे-तरबूज से, मिले तरावट खूब
लीची खा संजीव नित, मस्ती में जा डूब
*
गन्ना-रस ग्लूकोज़ का, करता दूर अभाव
गुड़-पानी अमृत सदृश, पार लगाता नाव
*

कुंडल छंद


छंद बहर का मूल है: ४
कुंडल छंद
*
छंद परिचय:
बाईस मात्रिक महारौद्र जातीय कुंडल छंद
चौदह वार्णिक शर्करी जातीय छंद।
संरचना: SIS ISI SIS ISI SS
सूत्र: रजरजगग।
बहर: फ़ाइलुं मुफ़ाइलुं मुफ़ाइलुं फ़ऊलुं।
*
प्रात, शाम, रात रोज आप ही सुहाए
मौन हेरता रहा न आज आप आए
*
छंद-गीत, राग-रीत कौन सीखता है?
शारदा कृपा करें तभी न सीख पाए
*
है कहाँ छिपा हुआ, न चाँद दीखता है
दीप बाल-बाल रात ही न हार जाए
*
दूर बैठ ताकती , न भू भुला सकी है
सूर्य रश्मि-रूप धार श्वास में समाए
*
आसमान छेदता, दिशा-हवा न रोके
कामदेव चित्त को अशांत क्यों बनाये?
*
प्रेमिका न ज्ञान-दान प्रेम चाहती है
रुठती न, रूठना दिखा-दिखा खिझाए
*
हारता न, हार-हार प्रेम जीतता है
जीतता न जीत-जीत, प्रेम ही हराए
*
१६.४.२०१७
***

नवगीत

नवगीत
संजीव
.
बांसों के झुरमुट में
धांय-धांय चीत्कार
.
परिणिति
अव्यवस्था की
आम लोग
भोगते.
हाथ पटक
मूंड पर
खुद को ही
कोसते.
बाँसों में
उग आये
कल्लों को
पोसते.
चुभ जाती झरबेरी
करते हैं सीत्कार
.
असली हो
या नकली
वर्दी तो
है वर्दी.
असहायों
को पीटे
खाखी हो
या जर्दी.
गोलियाँ
सुरंग जहाँ
वहाँ सिर्फ
नामर्दी.
बिना किसी शत्रुता
अनजाने रहे मार
.
सूखेंगे
आँसू बह.
रक्खेंगे
पीड़ा तह.
बलि दो
या ईद हो
बकरी ही
हो जिबह.
कुंठा-वन
खिसियाकर
खुद ही खुद
होता दह
जो न तर सके उनका
दावा है रहे तार
***
१६-४-२०१५
=========

नवगीत

नवगीत:
संजीव
.
नेह नर्मदा-धारा मुखड़ा
गंगा लहरी हुए अंतरे
.
कथ्य अमरकंटक पर
तरुवर बिंब झूमते
डाल भाव पर विहँस
बिंब कपि उछल लूमते
रस-रुद्राक्ष माल धारेंगे
लोक कंठ बस छंद कंत रे!
नेह नर्मदा-धारा मुखड़ा
गंगा लहरी हुए अंतरे
.
दुग्ध-धार लहरें लय
देतीं नवल अर्थ कुछ
गहन गव्हर गिरि उच्च
सतत हरते अनर्थ कुछ
निर्मल सलिल-बिंदु तर-तारें
ब्रम्हलीन हों साधु-संत रे!
नेह नर्मदा-धारा मुखड़ा
गंगा लहरी हुए अंतरे
.
विलय करे लय मलय
न डूबे माया नगरी
सौंधापन माटी का
मिटा न दुनिया ठग री!
ढाई आखर बिना न मिलता
नवगीतों में तनिक तंत रे!
नेह नर्मदा-धारा मुखड़ा
गंगा लहरी हुए अंतरे
.
१६-४-२०१५
***

नव गीत

नव गीत:
संजीव
.
अपने ही घर में
बेबस हैं
खुद से खुद ही दूर
.
इसको-उसको परखा फिर-फिर
धोखा खाया खूब
नौका फिर भी तैर न पायी
रही किनारे डूब
दो दिन मन में बसी चाँदनी
फिर छाई क्यों ऊब?
काश! न होता मन पतंग सा
बन पाता हँस दूब
पतवारों के
वार न सहते
माँझी होकर सूर
अपने ही घर में
बेबस हैं
खुद से खुद ही दूर
.
एक हाथ दूजे का बैरी
फिर कैसे हो खैर?
पूर दिए तालाब, रेत में
कैसे पाएँ तैर?
फूल नोचकर शूल बिछाए 
तब करते हैं सैर
अपने ही जब रहे न अपने
गैर रहें क्यों गैर?
रूप मर रहा
बेहूदों ने
देखा फिर-फिर घूर
अपने ही घर में
बेबस हैं
खुद से खुद ही दूर
.
संबंधों के अनुबंधों ने
थोप दिये प्रतिबंध
जूही-चमेली बिना नहाए 
मलें विदेशी गंध
दिन दोपहरी किंतु न छटती
फ़ैली कैसी धुंध
लँगड़े को काँधे बैठाकर
अब न चल रहे अंध
मन की परख न रही 'सलिल' सब 
ताकें तन का नूर
***
१६-४-२०१५

गीत: जीवन के ढाई आखर को

माननीय राकेश खंडेलवाल जी को समर्पित
प्रति गीत:
जीवन के ढाई आखर को
संजीव
*
बीती उमर नहीं पढ़ पाये, जीवन के ढाई आखर को
गृह स्वामी की करी उपेक्षा, सेंत रहे जर्जर बाखर को...
*
रूप-रंग, रस-गंध चाहकर, खुदको समझे बहुत सयाना
समझ न पाये माया-ममता, मोहे मन को करे दिवाना
कंकर-पत्थर जोड़ बनायी मस्जिद, जिसे टेर हम हारे-
मन मंदिर में रहा विराजा, मिला न लेकिन हमें ठिकाना
निराकार को लाख दिये आकार न छवि उसकी गढ़ पाये-
नयन मुँदे मुस्काते पाया कण-कण में उस नटनागर को...
*
श्लोक-ऋचाएँ, मंत्र-प्रार्थना, प्रेयर सबद अजान न सुनता
भजन-कीर्तन,गीत-ग़ज़ल रच, मन अनगिनती सपने बुनता
पूजा-अनुष्ठान, मठ-महलों में रहना कब उसको भाया-
मेवे छोड़ पंजीरी फाके, देख पुजारी निज सर धुनता
खाये जूठे बेर, चुराये माखन, रागी किन्तु विरागी
एक बूँद पा तृप्त हुआ पर है अतृप्त पीकर सागर को...
*
अर्थ खोज-संचित कर हमने, बस अनर्थ ही सदा किया है
अमृत की कर चाह गरल का, घूँट पिलाया सतत पिया है
लूट तिजोरी दान टेक का कर खुद को पुण्यात्मा माना-
विस्मित वह पाखंड देखकर मनुज हुआ पाषाण-हिया है
कैकट्स उपजाये आँगन में, अब तुलसी पूजन हो कैसे?
देश निकाला दिया हमीं ने चौपालों पनघट गागर को
१६-४-२०१४ 
...

छत्तीसगढ़ी दोहा

छत्तीसगढ़ी दोहा
*
हमर देस के गाँव मा, सुन्हा सुरुज विहान.
अरघ देहे बद अंजुरी, रीती रोय किसान..
*
जिनगानी के समंदर, गाँव-गँवई के रीत.
जिनगी गुजरत हे 'सलिल', कुरिया-कुंदरा मीत..
*
महतारी भुइयाँ असल, बंदत हौं दिन-रात.
दाई! पैयाँ परत हौं. मूंडा पर धर हात..
*
जाँघर तोड़त सेठ बर, चिथरा झूलत भेस.
मुटियारी माथा पटक, चेलिक रथे बिदेस..
*
बाँग देही कुकराकस, जिनगी बन के छंद.
कुररी कस रोही 'सलिल', मावस दूबर चंद..
१६.४.२०१०
***
दुर्गा कवच साधुवाद
*
मार्कण्डेय उवाच:
यद् गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं   नृणाम् ।
यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि   पितामह।।१।।
मार्कण्डे' बोले रहस्य जो गुप्त सर्व रक्षाकारक।
कहें पितामह है प्रसिद्ध जो कवच, बन सकूँ मैं धारक।।
मार्कण्डेय जी ने कहा है --हे पितामह! जो साधन संसार में अत्यन्त गोपनीय है, जिनसे मनुष्य मात्र की रक्षा होती है, वह साधन मुझे बताइए ।
*
ब्रह्मोवाच:
अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम् 
देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व   महामुने।।२।।
विधि बोले अति गुप्त कवच, सबका करता उपकार सदा।
देवों का है कवच पुण्य, हे महामुने!सुन लो कहता।।
ब्रह्मा जी ने कहा-हे ब्राह्मण!  सम्पूर्ण प्राणियों का कल्याण करनेवाला देवों का कवच यह स्तोत्र है, इसके पाठ करने से साधक सदैव सुरक्षित रहता है, अत्यन्त गोपनीय है, हे महामुने! उसे सुनिए ।
*
प्रथमं शैलपुत्री च,द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति, कूष्माण्डेति  चतुर्थकम्।।३।।
शैलसुता है पहली, दूजी ब्रह्मचारिणी यह जानो।
शक्ति तीसरी शशिघंटा है, कूष्माण्डा चौथी मानो।।
हे मुने ! दुर्गा माँ की नौ शक्तियाँ हैं-पहली शक्ति का नाम शैलपुत्री ( पर्वतकन्या) , दूसरी शक्ति का नाम ब्रह्मचारिणी (परब्रह्म परमात्मा को साक्षात कराने वाली ) , तीसरी शक्ति चन्द्रघण्टा हैं। चौथी शक्ति कूष्माण्डा ( सारा संसार जिनके उदर में निवास करता हो ) हैं।
*
पंचमं स्कन्दमातेति, षष्ठं कात्यायनीति  च।
सप्तमं कालरात्रीति, महागौरीति चाष्टमम्।।४।।
शक्ति पाँचवी कार्तिक माता, छठवीं कात्यायनी सुनो।
कालरात्रि हैं सप्तम,अष्टम शक्ति महागौरी गुन लो।
पाँचवीं शक्ति स्कन्दमाता (कार्तिकेय की जननी) हैं। छठी शक्ति कात्यायनी (महर्षि कात्यायन के अप्रतिभ तेज से उत्पन्न होनेवाली) हैं सातवीं शक्ति कालरात्रि (महाकाली) तथा आठवीं शक्ति महागौरी हैं।
*
नवमं सिद्धिदात्री, च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।
उक्तान्येतानि नामानि, ब्रह्मणैव महात्मना।।५।।
नौवीं शक्ति सिद्धिदात्री हैं, नौ दुर्गा ये जग जाने।
इन नामों की महिमा अनुपम, सुनो महात्मा विधि माने।।
नवीं शक्ति सिद्धिदात्री हैं और ये नव दुर्गा कही गई हैं। हे महात्मा! उक्त नामों को ब्रह्म ने बताया है।
*
अग्निना दह्यमानस्तु , शत्रुमध्ये गतो रणे ।
विषमे दुर्गमे चैव , भयार्ता: शरणं गता: ।।६ ।।
मनुज अग्नि में घिर जलता या, शत्रु बीच रण में घिरता।
विषम परिस्थिति में फँसता, पा दुर्गा चरण शरण बचता।।
जो मनुष्य अग्नि में जल रहा हो, युद्ध भूमि मे शत्रुओं से घिर गया हो तथा अत्यन्त कठिन विपत्ति में फँस गया हो, वह यदि भगवती दुर्गा की शरण का सहारा ले ले ।
*
न तेषां जायते , किंचिदशुभं रणसंकटे।
नापदं तस्य पश्यामि , शोक-दु:ख भयं न हि ।।७ ।।

तो इसका कभी युद्ध या संकट में कोई कुछ विगाड़ नहीं सकता , उसे कोई विपत्ति घेर नहीं सकती न उसे शोक , दु:ख तथा भय की प्राप्ति नहीं हो सकती है।

यैस्तु भक्तया स्मृता नूनं , तेषां वृद्धि : प्रजायते ।
ये त्वां स्मरन्ति देवेशि ! , रक्षसे तान्न  संशय: ।।८ ।।
जो लोग भक्तिपूर्वक भगवती का स्मरण करते हैं , उनका अभ्युदय होता रहता है। हे भगवती ! जो लोग तुम्हारा स्मरण करते हैं , निश्चय ही तुम उनकी रक्षा करती हो।

प्रेतसंस्था तु चामुण्डा , वाराही महिषासना ।
ऐन्द्री गजसमारूढा , वैष्णवी  गरूड़ासना   ।।९ ।।
चण्ड -मुण्ड का विनाश करने वाली देवी चामुण्डा प्रेत के वाहन पर निवास करती हैं ,वाराही महिष के आसन पर रहती हैं , ऐन्द्री का वाहन ऐरावत हाथी है, वैष्नवी का वाहन गरुड़  है।

माहेश्वरी  वृषारूढ़ा ,  कौमारी शिखिवाहना  ।
लक्ष्मी:  पद्मासना देवी , पद्महस्ता  हरिप्रिया ।।१० ।।
माहेश्वरी बैल के वाहन पर तथा कौमारी मोर के आसन पर विराजमान हैं। श्री विष्णुपत्नी भगवती लक्ष्मी  के हाथों में कमल है तथा वे कमल के आसन पर निवास करती हैं।

श्वेतरूपधरा  देवी, ईश्वरी वृषवाहना।
ब्राह्मी   हंससमारूढ़ा , सर्वाभरण भूषिता ।।११।।
श्वेतवर्ण वाली ईश्वरी वृष-बैल पर सवार हैं , भगवती ब्राह्मणी ( सरस्वती ) सम्पूर्ण आभूषणों से युक्त हैं तथा वे हंस पर विराजमान रहती हैं।

इत्येता  मातर:  सर्वा: , सर्वयोग समन्विता ।
नाना भरण शोभाढ्या , नानारत्नोपशोभिता: ।।१२ ।।
अनेक आभूषण तथा रत्नों से देदीप्यमान उपर्युक्त सभी देवियाँ सभी योग शक्तियों से युक्त हैं।

दृश्यन्ते  रथमारूढ़ा , देव्य:  क्रोधसमाकुला: ।
शंख  चक्र  गदां शक्तिं, हलं च मूसलायुधम् ।।१३ ।।
इनके अतिरिक्त और भी देवियाँ हैं, जो दैत्यों के विनाश के लिए तथा भक्तों की रक्षा के लिए क्रोधयुक्त रथ में सवार हैं तथा उनके हाथों में शंख ,चक्र ,गदा ,शक्ति, हल, मूसल हैं।

खेटकं तोमरं चैव, परशुं पाशमेव च।
कुन्तायुधं  त्रिशूलं  च ,  शार्ड़गमायुधमुत्तमम्।।१४।।
खेटक, तोमर, परशु , (फरसा) , पाश , भाला, त्रिशूल तथा उत्तम शार्ड़ग धनुष आदि अस्त्र -शस्त्र हैं।

दैत्यानां  देहनाशाय , भक्तानामभयाय  च ।
धारन्तया  युधानीत्थ , देवानां च हिताय वै ।।१५ ।।
जिनसे देवताओं की रक्षा होती है तथा देवी जिन्हें दैत्यों को नाश तथा भक्तों के मन से भय नाश करने के लिए धारण करती हैं।

नमस्तेस्तु  महारौद्रे, महाघोर पराक्रमें।
महाबले  महोत्साहे ,  महाभयविनाशिनि ।।१६ ।।
महाभय का विनाश करने वाली , महान बल, महाघोर क्रम तथा महान उत्साह से सुसम्पन्न हे महारौद्रे तुम्हें नमस्कार है।

त्राही मां देवि ! दुष्प्रेक्ष्ये , शत्रूणां भयवद्धिनि ।
प्राच्यां  रक्षतु  मामेन्द्री , आग्नेय्यामग्निदेवता ।।१७ ।।
हे शत्रुओं का भय बढ़ाने वाली देवी ! तुम मेरी रक्षा करो। दुर्घर्ष तेज के कारण मैं तुम्हारी ओर देख भी नहीं सकता । ऐन्द्री शक्ति पूर्व दिशा में मेरी रक्षा करें तथा अग्नि देवता की आग्नेयी शक्ति अग्निकोण में हमारी रक्षा करें।

दक्षिणेअवतु  वाराही , नैरित्वां  खडगधारिणी ।
प्रतीच्यां वारूणी रक्षेद्- , वायव्यां  मृगवाहिनी ।।१८ ।।
वाराही शक्ति दक्षिन दिशा में, खडगधारिणी नैरित्य कोण में, वारुणी शक्ति पश्चिम दिशा में तथा मृग के ऊपर सवार रहने वाली शक्ति वायव्य कोण में हमारी रक्षा करें।

उदीच्यां पातु कौमारी , ईशान्यां  शूलधारिणी ।
उर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेद , धस्ताद्  वैष्नवी तथा ।।१९ ।।
भगवान कार्तिकेय की शक्ति कौमारी उत्तर दिशा में , शूल धारण करने वाली ईश्वरी शक्तिईशान कोण में ब्रह्माणी ऊपर तथा वैष्नवी शक्ति नीचे हमारी रक्षा करें।

एवं दश दिशो रक्षे , चामुण्डा  शववाहना ।
जया मे चाग्रत: पातु , विजया पातु पृष्ठत: ।।२० ।।
इसी प्रकार शव के ऊपर विराजमान चामुण्डा देवी दसों दिशा में हमारी रक्षा करें।आगे जया ,पीछे विजया हमारी रक्षा करें।

अजिता वामपाश्वे तु , दक्षिणे चापराजिता ।
शिखामुद्योतिनी रक्षे, दुमा मूर्घिन व्यवस्थिता ।।२१ ।।
बायें भाग में अजिता, दाहिने हाथ में अपराजिता, शिखा में उद्योतिनी तथा शिर में उमा हमारी रक्षा करें।

मालाधरी ललाटे च , भ्रुवौ रक्षेद् यशस्विनी ।
त्रिनेत्रा  च  भ्रूवोर्मध्ये , यमघण्टा च नासिके ।।२२ ।।
ललाट में मालाधरी , दोनों भौं में यशस्विनी ,भौं के मध्य में त्रिनेत्रा तथा नासिका में यमघण्टा हमारी रक्षा करें।
शंखिनी  चक्षुषोर्मध्ये , श्रोत्रयोर्द्वार   वासिनी ।
कपोलो कालिका रक्षेत् , कर्णमूले  तु  शांकरी ।।२३ ।।ल

दोनों नेत्रों के बीच में शंखिनी , दोनों कानों के बीच में द्वारवासिनी , कपाल में कालिका , कर्ण के मूल भाग में शांकरी हमारी रक्षा करें।
नासिकायां सुगंधा  च , उत्तरोष्ठे  च  चर्चिका ।
अधरे   चामृतकला , जिह्वायां  च  सरस्वती ।।२४ ।।
नासिका के बीच का भाग सुगन्धा , ओष्ठ में चर्चिका , अधर में अमृतकला तथा जिह्वा में सरस्वती हमारी रक्षा करें।

दन्तान् रक्षतु कौमारी , कण्ठ देशे तु चण्डिका ।
घण्टिकां चित्रघंटा च , महामाया च तालुके ।।२५ ।।
कौमारी दाँतों की , चंडिका कण्ठ-प्रदेश की , चित्रघंटा गले की तथा महामाया तालु की रक्षा करें।

कामाक्षी चिबुकं रक्षेद् , वाचं  मे  सर्वमंगला ।
ग्रीवायां भद्रकाली  च ,  पृष्ठवंशे  धनुर्धरी   ।।२६ ।।
कामाक्षी ठोढ़ी की , सर्वमंगला वाणी की , भद्रकाली ग्रीवा की तथा धनुष को धारण करने वाली रीढ़ प्रदेश की रक्षा करें।

नीलग्रीवा  बहि:कण्ठे  ,  नलिकां  नलकूबरी  ।
स्कन्धयो:  खंगिनी  रक्षेद् ,  बाहू मे वज्रधारिनी ।।२७ ।।
कण्ठ से बाहर नीलग्रीवा और कण्ठ की नली में नलकूबरी , दोनों कन्धों की खंगिनी तथा वज्र को धारण करने वाली दोनों बाहु की रक्षा करें।

हस्तयोर्दण्डिनी  रक्षे - ,  दम्बिका चांगुलीषु च ।
नखाच्छुलेश्वरी  रक्षेत् ,  कुक्षौ रक्षेत्  कुलेश्वरी ।।२८ ।।
दोनों हाथों में दण्ड को धारण करने वाली तथा अम्बिका अंगुलियों में हमारी रक्षा करें । शूलेश्वरी नखों की तथा कुलेश्वरी कुक्षिप्रदेश में स्थित होकर हमारी रक्षा करें ।

स्तनौ  रक्षेन्महादेवी , मन:शोक   विनाशिनी ।
हृदये  ललिता  देवी ,  उदरे  शूलधारिणी  ।।२९ ।।
महादेवी दोनों स्तन की , शोक को नाश करने वाली मन की रक्षा करें । ललिता देवी हृदय में तथा शूलधारिणी उत्तर प्रदेश में स्थित होकर हमारी रक्षा करें ।

नाभौ च कामिनी रक्षेद् ,  गुह्यं गुह्येश्वरी तथा ।
पूतना  कामिका  मेद्रं ,  गुदे  महिषवाहिनी  ।।३० ।।
नाभि में कामिनी तथा गुह्य भाग में गुह्येश्वरी हमारी रक्षा करें। कामिका तथा पूतना लिंग की तथा महिषवाहिनी गुदा में हमारी रक्षा करें।

कट्यां   भगवती  ,  रक्षेज्जानुनि   विन्ध्यवासिनी ।
जंघे   महाबला रक्षेद् ,   सर्वकामप्रदायिनी     ।।३१ ।।
भगवती कटि प्रदेश में तथा विन्ध्यवासिनी घुटनों की रक्षा करें। सम्पूर्ण कामनाओं को प्रदान करने वाली  महाबला जांघों की रक्षा करें।

गुल्फयोर्नारसिंही  च  , पादपृष्ठे तु  तैजसी ।
पादाड़्गुलीषु  श्री रक्षेत् , पादाधस्तलवासिनी ।।३२ ।।
नारसिंही दोनों पैर के घुटनों की , तेजसी देवी दोनों पैर के पिछले भाग की, श्रीदेवी पैर की अंगुलियों की तथा तलवासिनी पैर के निचले भाग की रक्षा करें।

नखान्  दंष्ट्राकराली  च , केशांश्चैवोर्ध्वकेशिनी  ।
रोमकूपेषु  कौनेरी  ,       त्वचं वागीश्वरी तथा ।।३३ ।।
दंष्ट्राकराली नखों की , उर्ध्वकेशिनी देवी केशों की , कौवेरी रोमावली के छिद्रों में तथा वागीश्वरी हमारी त्वचा की रक्षा करें।

रक्त-मज्जा - वसा -मांसा , न्यस्थि- मेदांसि  पार्वती ।
अन्त्राणि  कालरात्रिश्च , पित्तं च मुकुटेश्वरी  ।।३४ ।।
पार्वती देवी रक्त, मज्जा, वसा, मांस , हड्डी और मेदे की रक्षा करें । कालरात्रि आँतों की तथा मुकुटेश्वरी पित्त की रक्षा करें ।

पद्मावती   पद्मकोशे , कफे  चूड़ामणिस्तथा ।
ज्वालामुखी  नखज्वाला , मभेद्या  सर्वसन्धिषु ।।३५ ।।
पद्मावती सहस्र दल कमल में , चूड़ामणि कफ में , ज्वालामुखी नखराशि में उत्पन्न तेज की तथा अभेद्या सभी सन्धियों में हमारी रक्षा करें।

शुक्रं  ब्रह्माणिमे  रक्षे , च्छायां छत्रेश्वरी तथा ।
अहंकारं मनो बुद्धिं ,   रक्षेन् मे धर्मधारिणी  ।।३६ ।।
ब्रह्माणि शुक्र की , छत्रेश्वरी छाया की , धर्म को धारण करने वाली , हमारे अहंकार , मन तथा बुद्धि की रक्षा करें।

प्राणापानौ    तथा , व्यानमुदान च समानकम् ।
वज्रहस्ता च मे रक्षेद , प्राणंकल्याणं शोभना ।।३७ ।।
वज्रहस्ता प्राण , अपान , व्यान , उदान तथा समान वायु की , कल्याण से सुशोभित होने वाली कल्याणशोभना ,हमारे प्राणों की रक्षा करें।

रसे रूपे गन्धे च , शब्दे स्पर्शे च योगिनी ।
सत्वं   रजस्तमश्चचैव , रक्षेन्नारायणी सदा ।।३८ ।।
रस , रूप , गन्ध , शब्द तथा स्पर्श रूप विषयों का अनुभव करते समय योगिनी तथा हमारे सत्व , रज , एवं तमोगुण की रक्षा नारायणी देवी करें ।

आयु रक्षतु वाराही, धर्मं रक्षतु वैष्णवी।
यश: कीर्ति च लक्ष्मी च , धनं विद्यां च चक्रिणी ।।३९ ।।
वाराही आयु की , वैष्णवी धर्म की , चक्रिणी यश और कीर्ति की , लक्ष्मी , धन तथा विद्या की रक्षा करें।

गोत्रमिन्द्राणि  मे  रक्षेत् , पशुन्मे  रक्ष चण्डिके ।
पुत्रान्  रक्षेन्महालक्ष्मी ,    भार्यां रक्ष्तु  भैरवी ।।४० ।।
हे इन्द्राणी , तुम मेरे कुल की तथा हे चण्डिके , तुम हमारे पशुओं की रक्षा करो ।हे महालक्ष्मी मेरे पुत्रों की तथा भैरवी देवी हमारी स्त्री की रक्षा करें।

पन्थानं  सुपथा  रक्षेन्मार्गं , क्षेमकरी    तथा ।
राजद्वारे   महालक्ष्मी , र्विजया  सर्वत: स्थिता ।।४१ ।।
सुपथा हमारे पथ की , क्षेमकरी ( कल्याण करने वाली ) मार्ग की रक्षा करें। राजद्वार पर महालक्ष्मी तथा सब ओर व्याप्त रहने वाली विजया भयों से हमारी रक्षा करें।

रक्षाहीनं  तु  यत्  स्थानं , वर्जितं कवचेन तु ।
तत्सर्वं  रक्ष मे  देवी !  जयन्ती  पापनाशिनी ।।४२ ।।
हे देवी ! इस कवच में जिस स्थान की रक्षा नहीं कही गई है उस अरक्षित स्थान में पाप को नाश करने वाली , जयन्ती देवी ! हमारी रक्षा करें।

पदमेकं   न   गच्छेतु , यदीच्छेच्छुभमात्मन:   ।
कवचेनावृतो   नित्यं  ,  यत्र  यत्रैव  गच्छति  ।।४३ ।।
यदि मनुष्य  अपना कल्याण चाहे तो वह कवच के पाठ के बिना एक पग भी कहीं यात्रा न करे । क्योंकि कवच का पाठ करके चलने वाला मनुष्य जिस-जिस स्थान पर जाता है।

तत्र   तत्रार्थलाभश्च ,  विजय:  सार्वकामिक: ।
यं यं चिन्तयते  कामं तं तं , प्राप्नोति  निश्चितम ।।४४ ।।
उसे वहाँ- वहाँ धन का लाभ होता है और कामनाओं को सिद्ध करने वाली विजय की प्राप्ति होती है। वह पुरुष जिस जिस अभीष्ट वस्तु को चाहता है वह वस्तु उसे निश्चय ही प्राप्त होती है।

परमैश्वर्यमतुलं  प्राप्स्यते , भूतले पुमान ।
 निर्भयो  जायते मर्त्य: , सड़्ग्रामेष्वपराजित: ।। ४५ ।।
कवच का पाठ करने वाला इस पृथ्वी पर अतुल ऐश्वर्य प्राप्त करता है । वह किसी से नहीं डरता और युद्ध में उसे कोई हरा भी नहीं सकता ।

रोमकूपेषु  कौनेरी,  त्वचं वागीश्वरी तथा।।३३ ।।
दंष्ट्राकराली नखों की , उर्ध्वकेशिनी देवी केशों की , कौवेरी रोमावली के छिद्रों में तथा वागीश्वरी हमारी त्वचा की रक्षा करें।

रक्त-मज्जा - वसा -मांसा , न्यस्थि- मेदांसि  पार्वती ।
अन्त्राणि  कालरात्रिश्च , पित्तं च मुकुटेश्वरी  ।।३४ ।।
पार्वती देवी रक्त, मज्जा, वसा, मांस , हड्डी और मेदे की रक्षा करें । कालरात्रि आँतों की तथा मुकुटेश्वरी पित्त की रक्षा करें ।

पद्मावती   पद्मकोशे , कफे  चूड़ामणिस्तथा ।
ज्वालामुखी  नखज्वाला , मभेद्या  सर्वसन्धिषु ।।३५ ।।
पद्मावती सहस्र दल कमल में , चूड़ामणि कफ में , ज्वालामुखी नखराशि में उत्पन्न तेज की तथा अभेद्या सभी सन्धियों में हमारी रक्षा करें।
शुक्रं  ब्रह्माणिमे  रक्षे , च्छायां छत्रेश्वरी तथा ।
अहंकारं मनो बुद्धिं ,   रक्षेन् मे धर्मधारिणी  ।।३६ ।।
ब्रह्माणि शुक्र की , छत्रेश्वरी छाया की , धर्म को धारण करने वाली , हमारे अहंकार , मन तथा बुद्धि की रक्षा करें।

प्राणापानौ    तथा , व्यानमुदान च समानकम् ।
वज्रहस्ता च मे रक्षेद , प्राणंकल्याणं शोभना ।।३७ ।।
वज्रहस्ता प्राण , अपान , व्यान , उदान तथा समान वायु की , कल्याण से सुशोभित होने वाली कल्याणशोभना ,हमारे प्राणों की रक्षा करें।

रसे रूपे गन्धे च , शब्दे स्पर्शे च योगिनी ।
सत्वं   रजस्तमश्चचैव , रक्षेन्नारायणी सदा ।।३८ ।।
रस , रूप , गन्ध , शब्द तथा स्पर्श रूप विषयों का अनुभव करते समय योगिनी तथा हमारे सत्व , रज , एवं तमोगुण की रक्षा नारायणी देवी करें ।

आयु रक्षतु वाराही, धर्मं रक्षतु वैष्णवी।
यश: कीर्ति च लक्ष्मी च , धनं विद्यां च चक्रिणी ।।३९ ।।
वाराही आयु की , वैष्णवी धर्म की , चक्रिणी यश और कीर्ति की , लक्ष्मी , धन तथा विद्या की रक्षा करें।

गोत्रमिन्द्राणि  मे  रक्षेत् , पशुन्मे  रक्ष चण्डिके ।
पुत्रान्  रक्षेन्महालक्ष्मी ,    भार्यां रक्ष्तु  भैरवी ।।४० ।।
हे इन्द्राणी , तुम मेरे कुल की तथा हे चण्डिके , तुम हमारे पशुओं की रक्षा करो ।हे महालक्ष्मी मेरे पुत्रों की तथा भैरवी देवी हमारी स्त्री की रक्षा करें।

पन्थानं  सुपथा  रक्षेन्मार्गं , क्षेमकरी    तथा ।
राजद्वारे   महालक्ष्मी , र्विजया  सर्वत: स्थिता ।।४१ ।।
सुपथा हमारे पथ की , क्षेमकरी ( कल्याण करने वाली ) मार्ग की रक्षा करें। राजद्वार पर महालक्ष्मी तथा सब ओर व्याप्त रहने वाली विजया भयों से हमारी रक्षा करें।

रक्षाहीनं  तु  यत्  स्थानं , वर्जितं कवचेन तु ।
तत्सर्वं  रक्ष मे  देवी !  जयन्ती  पापनाशिनी ।।४२ ।।
हे देवी ! इस कवच में जिस स्थान की रक्षा नहीं कही गई है उस अरक्षित स्थान में पाप को नाश करने वाली , जयन्ती देवी ! हमारी रक्षा करें।

पदमेकं   न   गच्छेतु , यदीच्छेच्छुभमात्मन:   ।
कवचेनावृतो   नित्यं  ,  यत्र  यत्रैव  गच्छति  ।।४३ ।।
यदि मनुष्य  अपना कल्याण चाहे तो वह कवच के पाठ के बिना एक पग भी कहीं यात्रा न करे । क्योंकि कवच का पाठ करके चलने वाला मनुष्य जिस-जिस स्थान पर जाता है।

तत्र   तत्रार्थलाभश्च ,  विजय:  सार्वकामिक: ।
यं यं चिन्तयते  कामं तं तं , प्राप्नोति  निश्चितम ।।४४ ।।
उसे वहाँ- वहाँ धन का लाभ होता है और कामनाओं को सिद्ध करने वाली विजय की प्राप्ति होती है। वह पुरुष जिस जिस अभीष्ट वस्तु को चाहता है वह वस्तु उसे निश्चय ही प्राप्त होती है।

परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते, भूतले पुमान।
 निर्भयो  जायते मर्त्य: , सड़्ग्रामेष्वपराजित: ।। ४५ ।।
कवच का पाठ करने वाला इस पृथ्वी पर अतुल ऐश्वर्य प्राप्त करता है । वह किसी से नहीं डरता और युद्ध में उसे कोई हरा भी नहीं सकता ।

त्रैलोक्ये तु भवेत् पूज्य: , कवचेनावृत:  पुमान् ।
इदं तु देव्या:  कवचं ,  देवानामपि   दुर्लभम्  ।।४६ ।।
तीनों लोकों में उसकी पूजा होती है।यह देवी का कवच देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।

य: पठेत् प्रयतो नित्य , त्रिसंध्यं  श्रद्धयान्वित: ।
दैवीकला    भवेत्तस्य ,  त्रैलोक्येष्वपराजित: ।। ४७ ।।
जो लोग तीनों संध्या में श्रद्धापूर्वक इस कवच का पाठ करते हैं उन्हें देवी कला की प्राप्ति होती है। तीनों लोकों में उन्हें कोई जीत नहीं सकता ।

जीवेद  वर्षशतं , साग्रम  पमृत्युविवर्जित: ।
नश्यन्ति व्याधय: सर्वे , लूता  विस्फोटकादय: ।।४८ ।।
उस पुरुष की अपमृत्यु नहीं होती । वह सौ से भी अधिक वर्ष तक जीवित रहता है । इस कवच का पाठ करने से लूता ( सिर में होने वाला खाज का रोग मकरी ,) विस्फोटक (चेचक) आदि सभी रोग नष्ट हो जाते हैं।

स्थावरं  जंगमं  चैव , कृत्रिमं  चाअपि  यद्विषम्  ।
अभिचाराणि  सर्वाणि , मन्त्र-यन्त्राणि भूतले  ।।४९ ।।
स्थावर तथा  कृत्रिम विष , सभी नष्ट हो जाते हैं ।मारण , मोहन तथा उच्चाटन आदि सभी प्रकार के किये गए अभिचार यन्त्र तथा मन्त्र , पृथवी तथा आकाश में विचरण करने वाले 

भूचरा: खेचराश्चैव , जलजा श्चोपदेशिका: ।
सहजा कुलजा माला , डाकिनी- शाकिनी तथा ।।५० ।।
ग्राम देवतादि, जल में उत्पन्न होने वाले तथा उपदेश से सिद्ध होने वाले सभी प्रकार के क्षुद्र देवता आदि कवच के पाठ करने वाले मनुष्य को देखते ही विनष्ट हो जाते हैं।जन्म के साथ उत्पन्न होने वाले ग्राम देवता ,कुल देवता , कण्ठमाला, डाकिनी, शाकिनी आदि ।

अन्तरिक्षचरा   घोरा , डाकिन्यश्च   महाबला: ।
ग्रह - भूत   पिशाचाश्च , यक्ष गन्धर्व - राक्षसा: ।।५१ ।।
अन्तरिक्ष में विचरण करने वाली अत्यन्त भयानक बलवान डाकिनियां ,ग्रह, भूत पिशाच ।

ब्रह्म    -  राक्षस  - बेताला: , कुष्माण्डा   भैरवादय: ।
नश्यन्ति     दर्शनातस्य , कवचे हृदि   संस्थिते  ।।५२ ।।
ब्रह्म राक्षस , बेताल , कूष्माण्ड तथा भयानक भैरव आदि सभी अनिष्ट करने वाले जीव , कवच का पाठ करने वाले पुरुष को देखते ही विनष्ट हो जाते हैं।

मानोन्नतिर्भवेद्  राज्ञ , स्तेजोवृद्धिकरं  परम् ।
यशसा वर्धते सोअपि  ,  कीर्ति  मण्डितभूतले ।।५३ ।।
कवचधारी पुरूष को राजा के द्वारा सम्मान की प्राप्ति होती है। यह कवच मनुष्य के तेज की वृद्धि करने वाला है।कवच का पाठ करने वाला पुरुष  इस पृथ्वी को अपनी कीर्ति से  सुशोभित करता है और अपनी कीर्ति के साथ वह नित्य अभ्युदय को प्राप्त करता है।

जपेत्  सप्तशतीं  चण्डीं , कृत्वा  तु  कवचं  पुरा ।
यावद्  भूमण्डलं  धत्ते - , स - शैल - वनकाननम् ।।५४ ।।
जो पहले कवच का पाठ करके सप्तशती का पाठ करता है , उसकी पुत्र - पौत्रादि संतति पृथ्वी पर तब तक विद्धमान रहती है जब तक  पहाड़ , वन , कानन , और कानन से युक्त यह पृथ्वी टिकी हुई है।

तावत्तिष्ठति  मेदिन्यां , सन्तति:  पुत्र- पौत्रिकी ।
देहान्ते  परमं  स्थानं ,  यत्सुरैरपि  दुर्लभम्   ।।५५ ।।
कवच का पाठ कर दुर्गा सप्तशती का पाठ करने वाला मनुष्य मरने के बाद - महामाया की कृपा से देवताओं के लिए  जो अत्यन्त दुर्लभ स्थान है 
प्राप्नोति  पुरुषो  नित्यं ,  महामाया  प्रसादत: ।
लभते   परमं    रूपं  ,   शिवेन    सह   मोदते ।।५६ ।।
उसे प्राप्त कर लेता है और उत्तम रूप प्राप्त कर  शिवजी के साथ  आन्नदपूर्वक  निवास करता है।
।। इति  वाराह पुराणे  हरिहरब्रह्म विरचित  देव्या:  कवचं  समाप्तम्   ।।
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गुरुवार, 15 अप्रैल 2021

शिव स्तवन, तांडव छंद

छंद सलिला;
शिव स्तवन
संजीव
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(तांडव छंद, प्रति चरण बारह मात्रा, आदि-अंत लघु)
।। जय-जय-जय शिव शंकर । भव हरिए अभ्यंकर ।।
।। जगत्पिता श्वासा सम । जगननी आशा मम ।।
।। विघ्नेश्वर हरें कष्ट । कार्तिकेय करें पुष्ट ।।
।। अनथक अनहद निनाद । सुना प्रभो करो शाद।।
।। नंदी भव-बाधा हर। करो अभय डमरूधर।।
।। पल में हर तीन शूल। क्षमा करें देव भूल।।
।। अरि नाशें प्रलयंकर। दूर करें शंका हर।।
।। लख ताण्डव दशकंधर। विनत वदन चकितातुर।।
।। डम-डम-डम डमरूधर। डिम-डिम-डिम सुर नत शिर।।
।। लहर-लहर, घहर-घहर। रेवा बह हरें तिमिर।।
।। नीलकण्ठ सिहर प्रखर। सीकर कण रहे बिखर।।
।। शूल हुए फूल सँवर। नर्तित-हर्षित मणिधर ।।
।। दिग्दिगंत-शशि-दिनकर। यश गायें मुनि-कविवर।।
।। कार्तिक-गणपति सत्वर। मुदित झूम भू-अंबर।।
।। भू लुंठित त्रिपुर असुर। शरण हुआ भू से तर।।
।। ज्यों की त्यों धर चादर। गाऊँ ढाई आखर।।
।। नव ग्रह, दस दिशानाथ। शरणागत जोड़ हाथ।।
।। सफल साधना भवेश। करो- 'सलिल' नत हमेश।।
।। संजीवित मन्वन्तर। वसुधा हो ज्यों सुरपुर।।
।। सके नहीं माया ठग। ममता मन बसे उमग।।
।। लख वसुंधरा सुषमा। चुप गिरिजा मुग्ध उमा।।
।। तुहिना सम विमल नीर। प्रवहे गंधित समीर।।
।। भारत हो अग्रगण्य। भारती जगत वरेण्य ।।
।। जनसेवी तंत्र सकल। जनमत हो शक्ति अटल।।
।। बलिपंथी हो नरेंद्र। सत्पंथी हो सुरेंद्र।।
।। तुहिना सम विमल नीर। प्रवहे गंधित समीर।।
।। भारत हो अग्रगण्य। भारती जगत वरेण्य ।।
।। जनसेवी तंत्र सकल। जनमत हो शक्ति अटल।।
।। सदय रहें महाकाल। उम्मत हों देश-भाल।।
।। तुहिना सम विमल नीर। प्रवहे गंधित समीर।।
।। भारत हो अग्रगण्य। भारती जगत वरेण्य ।।
।। जनसेवी तंत्र सकल। जनमत हो शक्ति अटल।।
१५-४-२०१४
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षट्पदी

षट्पदी
तजें विश्वास क्यों सूरज उषा ले आए हैं लाली
सुनाते गीत पंछी; बजाते पत्ते विहँस ताली
हुए आबाद घर फिर से; न अनबोला रहा बाकी
न आवारा कसें फिकरे, न लोफर दे रहे गाली
मिटे कोरोना तो भी; दूर अनुशासन नहीं करना
सजग हो जाएँ गम सब, छोड़ अनुशासन न फिर मरना
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संजीव
१५-४-२०२०

मुक्तिका

 मुक्तिका

कर्ता करता
भर्ता भरता
इनसां उससे
रहता डरता
बिन कारण जो
डरता; मरता
पद पाकर क्यों
अकड़ा फिरता?
कह क्यों पर का
दुख ना हरता
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संजीव
१५-४-२०२०

पौन सोरठा

पौन सोरठा 
कोरोना के व्याज, अनुशासित हम हो रहे।
घर के करते काज, प्रेम से।।
*
थोड़े जिम्मेदार, हुए आजकल हम सभी।
आपस में तकरार, घट गई।।
*
खूब हो रहा प्यार, मत उत्पादन बढ़ाना।
बंद घरों के द्वार, आजकल।।
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तबलीगी लतखोर, बातों से मानें नहीं।
मनुज वेश में ढोर, जेल दो।
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संजीव
१५-४-२०२०
९४२५१८३२४४

तुम

तुम
*















तुम हो या साकार है
बेला खुशबू मंद
आँख बोलती; देखती
जुबां; हो गयी बंद
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अमलतास बिंदी मुई, चटक दहकती आग
भौंहें तनी कमान सी, अधर मौन गा फाग
हाथों में शतदल कमल
राग-विरागी द्वन्द
तुम हो या साकार है
मद्धिम खुशबू मंद
*
कृष्ण घटाओं बीच में, बिजुरी जैसी माँग
अलस सुबह उल्लसित तुम, मन गदगद सुन बाँग
खनक-खनक कंगन कहें
मधुर अनसुने छंद
तुम हो या साकार है
मनहर खुशबू मंद
*
पीताभित पुखराज सम, मृदुल गुलाब कपोल
जवा कुसुम से अधरद्वय, दिल जाता लख डोल
हार कहें भुज हार दो
बनकर आनंदकंद
तुम हो या साकार है
मन्मथ खुशबू मंद
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संवस, १५.४.२०१९