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शनिवार, 2 जुलाई 2022

द्विपदि, दोहा, छंद ​सवाई, छंद समान,मुक्तिका, दोस्त, सूरज, पोयम

***
छंद चर्चा:
दोहा गोष्ठी:
*
सूर्य-कांता कह रही, जग!; उठ कर कुछ काम।
चंद्र-कांता हँस कहे, चल के लें विश्राम।।
*
सूर्य-कांता भोर आ, करती ध्यान अडोल।
चंद्र-कांता साँझ सँग, हँस देती रस घोल।।
*
सूर्य-कांता गा रही, गौरैया सँग गीत।
चंद्र-कांता के हुए, जगमग तारे मीत।।
*
सूर्य-कांता खिलखिला, हँसी सूर्य-मुख लाल।
पवनपुत्र लग रहे हो, किसने मला गुलाल।।
*
चंद्र-कांता मुस्कुरा, रही चाँद पर रीझ।
पिता गगन को देखकर, चाँद सँकुचता खीझ।।
*
सूर्य-कांता मुग्ध हो, देखे अपना रूप।
सलिल-धार दर्पण हुई, सलिल हो गया भूप।।
*
चंद्र-कांता खेलती, सलिल-लहरियों संग।
मन मसोसता चाँद है, देख कुशलता दंग।।
*
सूर्य-कांता ने दिया, जग को कर्म सँदेश।
चंद्र-कांता से मिला, 'शांत रहो' निर्देश।।
२-७-२०१८
***
टीप: उक्त द्विपदियाँ दोहा हैं या नहीं?, अगर दोहा नहीं क्या यह नया छंद है?
मात्रा गणना के अनुसार प्रथम चरण में १२ मात्राएँ है किन्तु पढ़ने पर लय-भंग नहीं है। वाचिक छंद परंपरा में ऐसे छंद दोषयुक्त नहीं कहे जाते, चूँकि वाचन करते हुए समय-साम्य स्थापित कर लिया जाता है।
कथ्य के पश्चात ध्वनिखंड, लय, मात्रा व वर्ण में से किसे कितना महत्व मिले? आपके मत की प्रतीक्षा है।
***
छंद सलिला:
​सवाई /समान छंद
संजीव
*
छंद-लक्षण: जाति लाक्षणिक, प्रति चरण मात्रा ३२ मात्रा, यति १६-१६, पदांत गुरु लघु लघु ।

लक्षण छंद:
हर चरण समान रख सवाई / झूम झूमकर रहा मोह मन
गुरु लघु लघु ले पदांत, यति / सोलह सोलह रख, मस्त मगन

उदाहरण:
१. राय प्रवीण सुनारी विदुषी / चंपकवर्णी तन-मन भावन
वाक् कूक सी, केश मेघवत / नैना मानसरोवर पावन
सुता शारदा की अनुपम वह / नृत्य-गान, शत छंद विशारद
सदाचार की प्रतिमा नर्तन / करे लगे हर्षाया सावन

२. केशवदास काव्य गुरु पूजित,/ नीति धर्म व्यवहार कलानिधि
रामलला-नटराज पुजारी / लोकपूज्य नृप-मान्य सभी विधि
भाषा-पिंगल शास्त्र निपुण वे / इंद्रजीत नृप के उद्धारक
दिल्लीपति के कपटजाल के / भंजक- त्वरित बुद्धि के साधक


३. दिल्लीपति आदेश: 'प्रवीणा भेजो' नृप करते मन मंथन
प्रेयसि भेजें तो दिल टूटे / अगर न भेजें_ रण, सुख भंजन
देश बचाने गये प्रवीणा /-केशव संग करो प्रभु रक्षण
'बारी कुत्ता काग मात्र ही / करें और का जूठा भक्षण
कहा प्रवीणा ने लज्जा से / शीश झुका खिसयाया था नृप
छिपा रहे मुख हँस दरबारी / दे उपहार पठाया वापि
२-७-२०१३
***
दोस्त / FRIEND




दोस्त






POEM : FRIEND




You came into my life as an unwelcome face,


Not ever knowing our friendship, I would one day embrace.


As I wonder through my thoughts and memories of you,


It brings many big smiles and laughter so true.








I love the special bond that we beautifully share,


I love the way you show you really care,


Our friendship means the absolute world to me,


I only hope this is something I can make you see.




Thankyou for opening your mind and your souls,


I wiee do all I can to help heal your hearts little holes.


Remember, your secrects are forever safe within me,


I will keep them under the tightest lock and key.




Thankyou for trusting me right from the start.


You truely have got a wonderful heart.


I am now so happy I felt that embrace.


For now I see the beauty of my best friend's face...




*********************








***
SMILE ALWAYS


Inside the strength is the laughter.
Inside the strength is the game.
Inside the strength is the freedom.
The one who knows his strength knows the paradise.
All which appears over your strengths is not necessarily Impossible,
but all which is possible for the human cannot be over your strengths.


Know how to smile :


What a strength of reassurance,
Strength of sweetness, peace,
Strength of brilliance !
May the wings of the butterfly kiss the sun
and find your shoulder to light on...
to bring you luck
happiness and cheers
smile always
२-७-२०१२
***
-: मुक्तिका :-
सूरज - १
*
उषा को नित्य पछियाता है सूरज.
न आती हाथ गरमाता है सूरज..


धरा समझा रही- 'मन शांत करले'
सखी संध्या से बतियाता है सूरज..


पवन उपहास करता, दिखा ठेंगा.
न चिढ़ता, मौन बढ़ जाता है सूरज..


अरूपा का लुभाता रूप- छलना.
सखी संध्या पे मर जाता है सूरज..


भटककर सच समझ आता है आखिर.
निशा को चाह घर लाता है सूरज..


नहीं है 'सूर', नाता नहीं 'रज' से
कभी क्या मन भी बहलाता है सूरज?.


करे निष्काम निश-दिन काम अपना.
'सलिल' तब मान-यश पाता है सूरज..


*
सूरज - २


चमकता है या चमकाता है सूरज?
बहुत पूछा न बतलाता है सूरज..


तिमिर छिप रो रहा दीपक के नीचे.
कहे- 'तन्नक नहीं भाता है सूरज'..


सप्त अश्वों की वल्गाएँ सम्हाले
कभी क्या क्लांत हो जाता है सूरज?


समय-कुसमय सभी को भोगना है.
गहन में श्याम पड़ जाता है सूरज..


न थक-चुक, रुक रहा, ना हार माने,
डूब फिर-फिर निकल आता है सूरज..


लुटाता तेज ले चंदा चमकता.
नया जीवन 'सलिल' पाता है सूरज..


'सलिल'-भुजपाश में विश्राम पाता.
बिम्ब-प्रतिबिम्ब मुस्काता है सूरज..
*
सूरज - ३


शांत शिशु सा नजर आता है सूरज.
सुबह सचमुच बहुत भाता है सूरज..


भरे किलकारियाँ बचपन में जी भर.
मचलता, मान भी जाता है सूरज..


किशोरों सा लजाता-झेंपता है.
गुनगुना गीत शरमाता है सूरज..


युवा सपने न कह, खुद से छिपाता.
कुलाचें भरता, मस्ताता है सूरज..


प्रौढ़ बोझा उठाये गृहस्थी का.
देख मँहगाई डर जाता है सूरज..


चांदनी जवां बेटी के लिये वर
खोजता है, बुढ़ा जाता है सूरज..


न पलभर चैन पाता ज़िंदगी में.
'सलिल' गुमसुम ही मर जाता है सूरज..
२-७-२०११
***
गीत:
प्रेम कविता...
*
प्रेम कविता कब कलम से
कभी कोई लिख सका है?
*
प्रेम कविता को लिखा जाता नहीं है.
प्रेम होता है किया जाता नहीं है..
जन्मते ही सुत जननि से प्रेम करता-
कहो क्या यह प्रेम का नाता नहीं है?.
कृष्ण ने जो यशोदा के साथ पाला
प्रेम की पोथी का उद्गाता वही है.
सिर्फ दैहिक मिलन को जो प्रेम कहते
प्रेममय गोपाल भी
क्या दिख सका है?
प्रेम कविता कब कलम से
कभी कोई लिख सका है?
*
प्रेम से हो क्षेम?, आवश्यक नहीं है.
प्रेम में हो त्याग, अंतिम सच यही है..
भगत ने, आजाद ने जो प्रेम पाला.
ज़िंदगी कुर्बान की, देकर उजाला.
कहो मीरां की करोगे याद क्या तुम
प्रेम में हो मस्त पीती गरल-प्याला.
और वह राधा सुमिरती श्याम को जो
प्रेम क्या उसका कभी
कुछ चुक सका है?
प्रेम कविता कब कलम से
कभी कोई लिख सका है?
*
अपर्णा के प्रेम को तुम जान पाये?
सिया के प्रिय-क्षेम को अनुमान पाये?
नर्मदा ने प्रेम-वश मेकल तजा था-
प्रेम कैकेयी का कुछ पहचान पाये?.
पद्मिनी ने प्रेम-हित जौहर वरा था.
शत्रुओं ने भी वहाँ थे सिर झुकाए.
प्रेम टूटी कलम का मोहताज क्यों हो?
प्रेम कब रोके किसी के
रुक सका है?
प्रेम कविता कब कलम से
कभी कोई लिख सका है?
२-७-२०१०
*

शुक्रवार, 1 जुलाई 2022

सॉनेट,गीत,छंद कृष्णमोहन,कान्ति शुक्ला,

सॉनेट
कठपुतली 
कठपुतली सरकार बन गई
अंगुली नर्तन होगा खूब
जब रिमोट का बटन दबेगा
हलचल तभी मचेगी खूब

इसके कंधे पर उसकी गन
साध निशाना जब मारेगी
सत्ता के गलियारे में तब
छल-बल से निज कुल तारेगी

बगुला भगत स्वांग बहुतेरे
रचा दिखाएँगे निज लीला
जाँच साँच को दफनाएगी
ठाँस करेगी काला-पीला

पाला बदला बात बन गई
चाट अंगुली घी में सन गई
१-७-२०२२
•••
गीत
दे दनादन
*
लूट खा अब
देश को मिल
लाट साहब
लाल हों खिल

ढाल है यह
भाल है वह
आड़ है यह
वार है वह

खेलता मन
झेलता तन
नाचते बन
आप राजन

तोड़ते घर
पूत लायक
बाप जी पर
तान सायक

साध्य है पद
गौड़ है कद
मोल देकर
लो सभासद

देखते कब
है कहाँ सच?
पूछते पथ
जा बचें अब

जेब में झट
ले रखो धन
है खनाखन
दे दनादन
(छंद: कृष्णमोहन)
१-७-२०२२
•••
विश्ववाणी हिंदी संस्थान अभियान जबलपुर
इंजीनियर्स फोरम (भारत) जबलपुर,
इंडियन जिओटेक्नीकल सोसायटी जबलपुर चैप्टर
*
रचनाधर्मी अभियंता - २०२२-२३
*
बंधुओं!
वंदे भारत-भारती।
'रचनाधर्मी अभियंता - २०२२-२३ ' में ७५ श्रेष्ठ-सक्रिय-सामजसेवी अभियंताओं के व्यक्तित्व-कृतित्व की संक्षिप्त जानकारी संकलित की जाना है।
उन सभी मित्रों का आभार जिन्होंने उत्साहपूर्वक सामग्री उपलब्ध कराई है।
संकलन हेतु ऐसे अभियंताओं को वरीयता दी जाएगी जिन्होंने अपने सामान्य व्यावसायिक/विभागीय कार्यों के अतिरिक्त देश व समाज के हित में कुछ असाधारण कार्य किए हों।
कृपया, पुस्तक हेतु जिन्हें आप उपयुक्त समझें उन अभियंताओं संबंधी निम्न विवरण मुझे ९४२५१ ८३२४४ पर या salil.sanjiv@gmail.com पर ईमेल से अविलंब भेजिए।
प्राप्त सामग्री को अंतिम रूप दिया जा रहा है। विलंब से प्राप्त सामग्री का समायोजन करना संभव न होगा।
आप सबके सहयोग हेतु आभार।

(संजीव वर्मा 'सलिल')
संयोजक
*
विवरण हेतु प्रारूप
(यह सामग्री ९४२५१ ८३२४४ पर वाट्स ऐप या salil.sanjiv@gmail.com पर ईमेल से अविलंब भेजिए।)


१. नाम-उपनाम -
२. जन्मतिथि, जन्मस्थान -
३. माता-पिता के नाम -
४. जीवन साथी/संगिनी का नाम व विवाह तिथि -
५. शैक्षणिक योग्यता -
६. कार्यानुभव -
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८. उपलब्धियाँ -
९. प्रकाशित कार्य -
१०. भावी योजनाएँ (सूक्ष्म संकेत) -
११. डाक का पता, वाट्स ऐप क्रमांक, ईमेल
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अब तक सम्मिलित अभियंता
* अनिल कोरी, जबलपुर,
* अनूप भार्गव, प्लेब्सबोरो अमेरिका
* अमरनाथ अग्रवाल, लखनऊ
* अमरेंद्र नारायण, जबलपुर
* अरविन्द कुमार 'असर', दिल्ली
* अरविन्द कुमार वर्मा, फतेहपुर
* अरुण अर्णव खरे , भोपाल
* अवधेश कुमार 'अवध', गुवाहाटी
* अशोक पलंदी, जबलपुर
* अशोक कुमार मेहरोत्रा 'अशोक', लख़नऊ
* अशोक कुमार शुक्ला, जबलपुर
* अशोक शर्मा, जयपुर
* इंद्र बहादुर श्रीवास्तव ९३२९६ ६४२७२ जबलपुर
* उदयभान तिवारी 'मधुकर' जबलपुर
* उदय भान पांडे, लखनऊ
उमेशचंद्र दुबे 
* ओ.पी.श्रीवास्तव, जबलपुर
* ओमप्रकाश 'यति', दिल्ली
* कमल मोहन वर्मा, जबलपुर
* कुंवर किशोर टंडन (स्मृतिशेष)
* केदारनाथ, मुज़फ़्फ़रपुर
* कोमलचंद जैन, जबलपुर
* गोपाल कृष्ण चौरसिया 'मधुर' (स्मृतिशेष) जबलपुर
* तरुण आनंद, जबलपुर 
* त्रिलोक सिंह ठकुरेला, आबूरोड
* दयाचंद जैन, जबलपुर
* दिव्यकांत मिश्र, मंडला
दुर्गेश पाराशर, जबलपुर
* दुर्गेश ब्योहार, जबलपुर
देवकीनंदन 'शांत', लखनऊ
* देवनाथ सिंह 'आनंदगौतम' (स्मृतिशेष)
* देवेंद्र गोंटिया 'देवराज', जबलपुर
नरेंद्र कुमार समाधिया, रुड़की
* नरेश सक्सेना, लखनऊ
* प्रताप नारायण सिंह, गाजियाबाद
* बसंत विश्वकर्मा (स्मृतिशेष), भोपाल
* बृन्दावन राय 'सरल'
* भूपेंद्र कुमार दवे (स्मृतिशेष), जबलपुर
* मणिशंकर अवध, जबलपुर
* मदन श्रीवास्तव ९२२९४३६०१० जबलपुर  
* मधुसूदन दुबे, जबलपुर
* मनोज श्रीवास्तव 'मनोज', लखनऊ 
* महेंद्र कुमार जैन, सागर  
* महेंद्र कुमार श्रीवास्तव, जबलपुर
* मुक्ता भटेले, जबलपुर 
* मुरलीधर झा, रांची 
* राजीव चांडक, जबलपुर
* राजेश अरोर 'शलभ' 
आर.के.श्रीवास्तव, जबलपुर
* रामकृष्ण विनायक सहत्रबुद्धे, नागपुर
* रामप्रताप खरे, रायपुर
* वेदांत श्रीवास्तव, जबलपुर
* विनोद जारोलिया 'नयन', जबलपुर
* विपिन त्रिवेदी, जबलपुर
* विवेकरंजन श्रीवास्तव 'विनम्र', भोपाल 
विश्वमोहन तिवारी, 
* शार्दुला नोगजा, सिंगापुर
* शिव मोहन सिंह, देहरादून 
शोभित वर्मा, जबलपुर
* श्रवण कुमार उर्मलिया ०१२० २८८३३४२८, ९८६८५ ४९०३६
* संजय वर्मा, जबलपुर
* संजीव वर्मा 'सलिल', जबलपुर
* संतोष कुमार माथुर, लखनऊ 
* संतोष कुमार हरदहा, गाज़ियाबाद 
* संदीप राशिनकर, इंदौर
* सतीश सक्सेना 'शून्य, ग्वालियर '
* सलीम अंसारी, जबलपुर
* साजन ग्वालियरी, ग्वालियर
* सुधीर पांडेय 'व्यथित', जबलपुर
* सुनील बाजपेई, लखनऊ 
* सुरेन्द्रनाथ मेहता (स्मृतिशेष) जबलपुर
* सुरेंद्र सिंह पवार, जबलपुर
* सुरेश जैन 'सरल', जबलपुर ९४२५४ १२३७४
* हेमंत कुमार, बिजनौर
***
स्वास्थ्य के लिए याद रखने योग्य महत्वपूर्ण बातें:
1. बीपी: 120/80
2. पल्स: 70 - 100
3. तापमान: 36.8 - 37
4. सांस : 12-16
5. हीमोग्लोबिन: पुरुष -13.50-18. स्त्री- 11.50 - 16
6. कोलेस्ट्रॉल: 130 - 200
7. पोटेशियम: 3.50 - 5
8. सोडियम: 135 - 145
9. ट्राइग्लिसराइड्स: 220
10. शरीर में खून की मात्रा: पीसीवी 30-40%
11. शुगर लेवल: बच्चों के लिए (70-130) वयस्क: 70 - 115
12. आयरन: 8-15 मिलीग्राम
13. श्वेत रक्त कोशिकाएं WBC: 4000 - 11000
14. प्लेटलेट्स: 1,50,000 - 4,00,000
15. लाल रक्त कोशिकाएं RBC: 4.50 - 6 मिलियन.
16. कैल्शियम: 8.6 -10.3 मिलीग्राम/डीएल
17. विटामिन D3: 20 - 50 एनजी/एमएल.
18. विटामिन B12: 200 - 900 पीजी/एमएल.
वरिष्ठों से अनुरोध :
1- प्यास न लगे या जरूरत न हो तो भी पानी पीते रहिए। अधिकतर स्वास्थ्य समस्याएँ शरीर में पानी की कमी से होती हैं। हर दिन कम से कम २ लीटर पानी पीजिए।
2- शरीर से यथाशक्ति अधिक से अधिक काम लीजिए। पैदल चलिए, खेलिए, गाइए, बजाइए, धूल झाड़िए, पौधे लगाइए, जो मन करे वह कीजिए पर निष्क्रिय न बैठिए।
3- खाना उतना ही खाइए जितना आवश्यक हो। तला, भुना, बासी कम से कम खाइए। भाजियाँ, हरी सब्जियाँ, फल, अंकुरित अन्न आदि को प्राथमिकता दीजिए। शीतल पेय (कोल्ड ड्रिंक), बाजारू फ़ास्ट गुड, चाट, शराब, मांस आदि का सेवन न करें। बहुत ठंडा, बाहर गरम, मसालेदार आहार न लीजिए।
4- वाहन का प्रयोग कम से कम कीजिए। पैरों से अधिक से अधिक काम लें। चलें-दौड़ें, चढ़ें-उतरें।
5- क्रोध व चिंता छोड़िए। व्यर्थ की बहस, उत्तेजक भाषण, फिल्म या समाचारों से दूर रहिए। नकारात्मक विचार न करिए, न सुनिए। शांतिपूर्वक सोच-विचारकर बोलिए।
6- धन-संपत्ति से अंध मोह मत रखिए पर अपनी जरूरतों के लिए बचाकर रखिए। यह रखिए आप दूसरों को दे सकते हैं पर दूसरों से ले नहीं सकते। धन-संपत्ति आपके लिए है, आप धन-संपत्ति के लिए नहीं।
7- हो चुकी गलतियों से सबक सीखिए, उन्हें सुधारिए पर दुहराइए और पछताइए मत। दूसरों की गलती सामान्यत: देखकर अनदेखा करिए पर उसे प्रोत्साहन मत दीजिए।
8- पैसा, पद, प्रतिष्ठा, शक्ति, सुन्दरता, दंभ, श्रेष्ठता का भाव, अहंकार आदि छोड़ दीजिए। स्नेह, विनम्रता, दया तथा सरलता आपको शांति तथा सम्मान का पात्र बनाती है।
9- वृद्धावस्था अभिशाप नहीं वरदान है। आशावादी बनिए, मधुर यादों साथ रहिए। याद रखिए राम अयोध्या में हों या वन में सामान्य जीवन जीते हैं।
10- अपने से छोटों से भी प्रेम, सहानुभूति ओर अपनेपन से मिलिए। कोई व्यंग्यात्मक बात न कहिए। चेहरे पर मुस्कुराहट बनाकर रखिए।
11- अपना दुःख-दर्द किसी से मत कहिए, सुनकर लोग अवहेलना करेंगे, बाँट कोई नहीं सकता।
१-७-२०२२
***
लाडले लला संजीव सलिल
कान्ति शुक्ला
*
मानव जीवन का विकास चिंतन, विचार और अनुभूतियों पर निर्भर करता है। उन्नति और प्रगति जीवन के आदर्श हैं। जो कवि जितना महान होता है, उसकी अनुभूतियाँ भी उतनी ही व्यापक होतीं हैं। मूर्धन्य विद्वान सुकवि छंद साधक आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' जी का नाम ध्यान में आते ही एक विराट साधक व्यक्तित्व का चित्र नेत्रों के समक्ष स्वतः ही स्पष्टतः परिलक्षित हो उठता है। मैंने 'सलिल' जी का नाम तो बहुत सुना था और उनके व्यक्तित्व, कृतित्व, सनातन छंदों के प्रति अगाध समर्पण संवर्द्धन की भावना ने उनके प्रति मेरे मन ने एक सम्मान की धारणा बना ली थी और जब रू-ब-रू भेंट हुई तब भी उनके सहज स्नेही स्वभाव ने प्रभावित किया और मन की धारणा को भी बल दिया परंतु यह धारणा मात्र कुछ दिन ही रही और पता नहीं कैसे हम ऐसे स्नेह-सूत्र में बँधे कि 'सलिल' जी मेरे नटखट देवर यानी 'लला' (हमारी बुंदेली भाषा में छोटे देवर को लला कहकर संबोधित करते हैं न) होकर ह्रदय में विराजमान हो गए और मैं उनकी ऐसी बड़ी भौजी जो गाहे-बगाहे दो-चार खरी-खोटी सुनाकर धौंस जमाने की पूर्ण अधिकारिणी हो गयी। हमारे बुंदेली परिवेश, संस्कृति और बुंदेली भाषा ने हमारे स्नेह को और प्रगाढ़ करने में महती भूमिका निभाई। हम फोन पर अथवा भेंट होने पर बुंदेली में संवाद करते हुए और अधिक सहज होते गए। अब वस्तुस्थिति यह है कि उनकी अटूट अथक साहित्य-साधना, छंद शोध, आचार्यत्व, विद्वता या समर्पण की चर्चा होती है तो मैं आत्मविभोर सी गौरवान्वित और स्नेहाभिभूत हो उठती हूँ।
व्यक्तित्व और कृतित्व की भूमिका में विराट को सूक्ष्म में कहना कितना कठिन होता है, मैं अनुभव कर रही हूँ। व्यक्तित्व और विचार दोनों ही दृष्टियों से स्पृहणीय रचनाकार'सलिल' जी की लेखनी पांडित्य के प्रभामंडल से परे चिंतन और चेतना में - प्रेरणा, प्रगति और परिणाम के त्रिपथ को एकाकार करती द्वन्द्वरहित अन्वेषित महामार्ग के निर्माण का प्रयास करती दिखाई देती है। उनके वैचारिक स्वभाव में अवसर और अनुकूलता की दिशा में बह जाने की कमजोरी नहीं- वे सत्य, स्वाभिमान और गौरवशाली परम्पराओं की रक्षा के लिए प्रतिकूलता के साथ पूरी ताकत से टक्कर लेने में विश्वास रखते हैं। जहाँ तक 'सलिल'जी की साहित्य संरचना का प्रश्न है वहाँ उनके साहित्य में जहाँ शाश्वत सिद्धांतों का समन्वय है, वहाँ युगानुकूल सामयिकता भी है, उत्तम दिशा-निर्देश है, चिरंतन साहित्य में चेतनामूलक सिद्धांतों का विवरण है जो प्रत्येक युग के लिए समान उपयोगी है तो सामयिक सृजन युग विशेष के लिए होते हुए भी मानव जीवन के समस्त पहेलुओं की विवृत्ति है, जहाँ एकांगी दृष्टिकोण को स्थान नहीं।
"सलिल' जी के रचनात्मक संसार में भाव, विचार और अनुभूतियों के सफल प्रकाशन के लिए भाषा का व्यापक रूप है जिसमें विविधरूपता का रहस्य भी समाहित है। एक शब्द में अनेक अर्थ और अभिव्यंजनाएँ हैं, जीवन की प्रेरणात्मक शक्ति है तो मानव मूल्यों के मनोविज्ञान का स्निग्धतम स्पर्श है, भावोद्रेक है। अभिनव बिम्बात्मक अभिव्यंजना है जिसने मुझे विशेष रूप से प्रभावित किया है। माँ वाणी की विशेष कृपा दृष्टि और श्रमसाध्य बड़े-बड़े कार्य करने की अपूर्व क्षमता ने जहाँ अनेक पुस्तकें लिखने की प्रेरणा दी है, वहीं पारंपरिक छंदों में सृजन करने के साथ सैकड़ों नवीन छंद रचने का अन्यतम कौशल भी प्रदान किया है- तो हमारे लाड़ले लला हैं कि कभी ' विश्व वाणी संवाद' का परचम लहरा रहे हैं, कभी दोहा मंथन कर रहे हैं तो कभी वृहद छंद कोष निर्मित कर रहे हैं ,कभी सवैया कोष में सनातन सवैयों के साथ नित नूतन सवैये रचे जा रहे हैं। सत्य तो यह है कि लला की असाधारण सृजन क्षमता, निष्ठा, अभूतपूर्व लगन और अप्रतिम कौशल चमत्कृत करता है और रचनात्मक कौशल विस्मय का सृजन करता है। समरसता और सहयोगी भावना तो इतनी अधिक प्रबल है कि सबको सिखाने के लिए सदैव तत्पर और उपलब्ध हैं, जो एक गुरू की विशिष्ट गरिमा का परिचायक है। मैंने स्वयं अपने कहानी संग्रह की भूमिका लिखने का अल्टीमेटम मात्र एक दिन की अवधि का दिया और सुखद आश्चर्य रहा कि वह मेरी अपेक्षा में खरे उतरे और एक ही दिन में सारगर्भित भूमिका मुझे प्रेषित कर दी ।
जहाँ तक रचनाओं का प्रश्न है, विशेष रूप से पुण्यसलिला माँ नर्मदा को जो समर्पित हैं- उन रचनाओं में मनोहारी शिल्पविन्यास, आस्था, भाषा-सौष्ठव, वर्णन का प्रवाह, भाव-विशदता, ओजस्विता तथा गीतिमत्ता का सुंदर समावेश है। जीवन के व्यवहार पक्ष के कार्य वैविध्य और अन्तर्पक्ष की वृत्ति विविधता है। प्राकृतिक भव्य दृश्यों की पृष्ठभूमि में कथ्य की अवधारणा में कलात्मकता और सघन सूक्ष्मता का समावेश है। प्रकृति के ह्रदयग्राही मनोरम रूप-वर्णन में भाव, गति और भाषा की दृष्टि से परिमार्जन स्पष्टतः परिलक्षित है । 'सलिल' जी के अन्य साहित्य में कविता का आधार स्वरूप छंद-सौरभ और शब्दों की व्यंजना है जो भावोत्पादक और विचारोत्पादक रहती है और जिस प्रांजल रूप में वह ह्रदय से रूप-परिग्रह करती है , वह स्थायी और कालांतर व्यापी है।
'सलिल' जी की सर्जना और उसमें प्रयुक्त भाषायी बिम्ब सांस्कृतिक अस्मिता के परिचायक हैं जो बोधगम्य ,रागात्मक और लोकाभिमुख होकर अत्यंत संश्लिष्ट सामाजिक यथार्थ की ओर दृष्टिक्षेप करते हैं। जिन उपमाओं का अर्थ एक परम्परा में बंधकर चलता है- उसी अर्थ का स्पष्टीकरण उनका कवि-मन सहजता से कर जाता है और उक्त स्थल पर अपने प्रतीकात्मक प्रयोग से अपने अभीष्ट को प्राप्त कर लेता है जो पाठक को रसोद्रेक के साथ अनायास ही छंद साधने की प्रक्रिया की ओर उन्मुख कर देता है। अपने सलिल नाम के अनुरूप सुरुचिपूर्ण सटीक सचेतक मृदु निनाद की अजस्र धारा इसी प्रकार सतत प्रवाहित रहे और नव रचनाकारों की प्रेरणा की संवाहक बने, ऐसी मेरी शुभेच्छा है। मैं संपूर्ण ह्रदय से 'सलिल' जी के स्वस्थ, सुखी और सुदीर्घ जीवन की ईश्वर से प्रार्थना करते हुए अपनी हार्दिक शुभकामनाएँ व्यक्त करती हूँ ।
[लेखिका परिचय : वरिष्ठ कहानीकार-कवयित्री, ग़ज़ल, बाल कविता तथा कहानी की ५ पुस्तकें प्रकाशित, ५ प्रकाशनाधीन। सचिव करवाय कला परिषद्, प्रधान संपादक साहित्य सरोज रैमसीकी। संपर्क - एम आई जी ३५ डी सेक्टर, अयोध्या नगर, भोपाल ४६२०४१, चलभाष ९९९३०४७७२६, ७००९५५८७१७, kantishukla47@gamil.com .]
1-7-2019
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गुरुवार, 30 जून 2022

सॉनेट,भोजपुरी हाइकु,बुंदेली नवगीत,दोहा सलिला,

सॉनेट
सरकार 
• 
जाको ईंटा, बाको रोड़ो 
आई बहुरिया, मैया बिसरी 
भओ पराओ अपनो मोड़ो 
जा पसरी, बा एड़ी घिस रई 

पल मा पाला बदल ऐंठ रए 
खाल ओढ़ लई रे गर्दभ की 
धोबी के हो सेर रेंक रए 
बारी बंदर के करतब की 

मूँड़ मुड़ाओ, सीस झुकाओ 
बदलो पाला, लै लो माला 
राजा जी की जै-जै गाओ 
करो रात-दिन गड़बड़झाला 

मनमानी कर लो हर बार 
जोड़-तोड़ कर, बन सरकार 
३०-६-२०२२ 
•••
भोजपुरी हाइकु:
*
आपन बोली
आ ओकर सुभाव
मैया क लोरी.
*
खूबी-खामी के
कवनो लोकभासा
पहचानल.
*
तिरिया जन्म
दमन आ शोषण
चक्की पिसात.
*
बामनवाद
कुक्कुरन के राज
खोखलापन.
*
छटपटात
अउरत-दलित
सदियन से.
*
राग अलापे
हरियल दूब प
मन-माफिक.
*
गहरी जड़
देहात के जीवन
मोह-ममता.

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नवगीत
*
काए टेरो?, मैया काए टेरो?
सो रओ थो, कओ मैया काए टेरो?
*
दोरा की कुंडी बज रई खटखट
कौना पाहुना हेरो झटपट?
कौना लगा रओ पगफेरो?
काय टेरो?, मैया काए टेरो?...
*
हांत पाँव मों तुरतई धुलाओ
भुज नें भेंटियो, दूरई बिठाओ
मों पै लेओ गमछा घेरो
काय टेरो?, मैया काए टेरो?
*
बिन धोए सामान नें लइयो
बिन कारज बाहर नें जइयो
घरई डार रइओ डेरो
काए टेरो?, मैया काए टेरो
३०-६-२०२०
***
दोहा सलिला
*
नहीं कार्य का अंत है, नहीं कार्य में तंत।
माया है सारा जगत, कहते ज्ञानी संत।।
*
आता-जाता कब समय, आते-जाते लोग।
जो चाहें वह कार्य कर, नहीं मनाएँ सोग।।
*
अपनी-पानी चाह है, अपनी-पानी राह।
करें वही जो मन रुचे, पाएँ उसकी थाह।।
*
एक वही है चौधरी, जग जिसकी चौपाल।
विनय उसी से सब करें, सुन कर करे निहाल।।
*
जीव न जग में उलझकर, देखे उसकी ओर।
हो संजीव न चाहता, हटे कृपा की कोर।।
*
मंजुल मूरत श्याम की, कण-कण में अभिराम।
देख सके तो देख ले, करले विनत प्रणाम।।
*
कृष्णा से कब रह सके, कृष्ण कभी भी दूर।
उनके कर में बाँसुरी, इनका मन संतूर।।
*
अपनी करनी कर सदा, कथनी कर ले मौन।
किस पल उससे भेंट हो, कह पाया कब-कौन??
*
करता वह, कर्ता वही, मानव मात्र निमित्त।
निर्णायक खुद को समझ, भरमाता है चित्त।।
*
चित्रकार वह; दृश्य वह, वही चित्र है मित्र।
जीव समझता स्वयं को, माया यही विचित्र।।
*
बिंब प्रदीपा ज्योति का, सलिल-धार में देख।
निज प्रकाश मत समझ रे!, चित्त तनिक सच लेख।।
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३०.६.२०१८, ७९९९५५९६१८, ९४२५१८३२४४

बुधवार, 29 जून 2022

गीत,दोहा,पद,छंद चौपाई, सुरेश वर्मा, गुरु गोबिंद सिंह


 कृति चर्चा :

नीले घोड़े का शहसवार :  महामानवावतार साकार  
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 
[कृति विवरण : नीले घोड़े का शहसवार, उपन्यास, ISBN ९७८-९३-९१३७८-७६-९, प्रथम संस्करण २०२१, उपन्यासकार - डॉ. सुरेश कुमार  वर्मा, आवरण सजिल्द बहुरंगी जैकेट सहित, आकार २२.५ से.मी. X १४ से.मी., पृष्ठ ३६७, मूल्य ९००/-, अयन प्रकाशन नई दिल्ली।   ]
*


                  वर्तमान संक्रमण काल में  लघुकथा, क्षणिका, दोहा, माहिया, हाइकु जैसी लघ्वाकारी सृजन विधाओं का बोलबाला है, महाकाव्य और उपन्यास जैसी विधाओं में सृजन, पठन और पाठन दिन-ब-दिन कम से कम होता जा रहा है। इसके दो कारण हैं - पहला यह कि ये दोनों विधाएँ अपेक्षाकृत अधिक शोध, मनन, मौलिकता, सकारात्मकता तथा श्रम की माँग करती हैं, दूसरा तथाकथित समयाभाव। इन दोनों विधाओं में नायक के चयन हेतु जिन मानकों का उल्लेख साहित्य शास्त्र में हैं, वैसे व्यक्तित्व अब किसी और लोक के वासी जान पड़ते हैं। अपने चारों और देखने पर इन महापुरुषों के  पैर की धूल की कण कहलाने योग्य व्यक्तित्व भी नहीं दिखते। महान वैज्ञानिक आइंस्टाइन ने गाँधी जी के बारे में लिखा था कि “भविष्य की पीढ़ियों को इस बात पर विश्वास करने में मुश्किल होगी कि हाड़-मांस से बना ऐसा कोई व्यक्ति भी कभी धरती पर आया था।” यही बात विवेच्य उपन्यास 'नीले घोड़े का शहसवार' के नायक के बारे में भी सत्य है। सिख धर्म के दसवें और अंतिम गुरु गोबिंद सिंह जी के जीवन चरित्र पर आधारित यह उपन्यास सत्य के तानों-बानों पर कल्पना के बेल-बूटे टाँक कर लिखा गया है। उपन्यास में वर्णित घटनाओं और व्यक्तियों की पुष्टि इतिहास से की जा सकती है। यह औपन्यासिक कृति प्रामाणिकता की कसौटी पर शत-प्रतिशत खरी है तथापि यह केवल तथ्य संकलन या इतिहास का पुनर्प्रस्तुतिकरण नहीं है। उपन्यास के कथा-क्रम में कथ्य के विश्लेषण, मूल्याङ्कन और विवेचन में उपन्यासकार की स्वतंत्र चिंतन दृष्टि का परिचय यत्र-तत्र मिलता है। 

                  ऐतिहासिक चरित्रों को उपन्यास में ढालते समय कई चुनौतियों का सामना करना होता है। सबसे पहली चुनौती नायक के चयन की है। भारतीय इतिहास में वैदिक, पौराणिक, औपनिषदिक, पुरातत्विक, प्राचीन, अर्वाचीन और सामयिक काल-खंडों में अनेक महानायक हुए हैं। उनमें से किसी एक महानायक को चुनना सागर में से मोती निकलने की तरह दुष्कर है। अनेक धर्मों में से एक और अपेक्षाकृत कम अनुयायियों वाला सिख धर्म जिसे सनातन धर्म की एक शाखा भी कह दिया जाता है, के दस गुरुओं में से एक, जिसका पूरा जीवन छोटे-छोटे युद्धों में बीत गया, जिसने न कोई साम्राज्य खड़ा किया, न कोई नई खोज की, न कोई महान युद्ध जीता, न कोई महान निर्माण किया, उसे उपन्यास का नायक बनाने का सामान्य दृष्टि से औचित्य नहीं है किन्तु इस उपन्यासकार की दृष्टि सामान्येतर और असाधारण है। वह अपने चरित नायक में ऐसे दुर्लभ गुण देख पाता है जिन्हें तत्कालीन लोग देख सके होते तो इतिहास और समाज दोनों का भला हुआ होता और समय के महाग्रंथ में कुछ कालिख लगे पृष्ठ न होते। 

                  उपन्यास अपने चरित नायक के धरावतरण से आरंभ होकर उसके लीला संवरण पर समाप्त होता है। ३६७ पृष्ठीय यह उपन्यास न तो अति विशाल है, न  अति संक्षिप्त। हिंदी साहित्य में तपस्विनी और कृष्णावतार  (क.मा. मुंशी), खरीदी कौड़ियों के मोल (बिमल मित्र), अनुत्तर योगी (वीरेंद्र कुमार जैन) जैसे दीर्घाकारी और कई भागों में लिखे उपन्यासों की समृद्ध विरासत को देखते हुए यह उपन्यास अति विस्तृत नहीं है तथापि लघुता की ओर बढ़ते आकर्षण को देखते हुए गंभीर लेखन, पठनीयता की दृष्टि से जोखिम उठाने की तरह है, वह भी उस समय में जबकि उपन्यास लेखन व्यक्तिगत न होकर चित्रपटीय पटकथाओं की तरह समूह द्वारा किया जा रहा हो। इस उपन्यास के उपन्यासकार डॉ. सुरेश कुमार वर्मा मूलत: भाषा वैज्ञानिक हैं जिनकी बहुमूल्य कृति 'हिंदी अर्थान्तर' बहुचर्चित तथा मध्य प्रदेश साहित्य परिषद द्वारा पुरस्कृत है। वे इसके पूर्व उपन्यास 'मुमताज़महल', 'रेसमान', 'सबका मालिक एक' तथा  'महाराजा छत्रसाल', नाटक 'दिशाहीन' तथा निम्नमार्गी', कहानी संग्रह 'बारजे पर' तथा 'मंदिर एवं अन्य कहानियाँ', आलोचना ग्रंथ 'डॉ. रामकुमार वर्मा की नाट्यकला', निबंध संग्रह 'करमन की गति न्यारी' तथा 'मैं तुम्हारे हाथ का लीला कमल हूँ' जैसी महत्वपूर्ण कृतियाँ प्रस्तुत कर चर्चित तथा प्रशंसित हो चुके हैं। 'नीले घोड़े का शहसवार' इस समृद्ध-सामर्थ्यवान रचनाकार की सृजन यात्रा में प्रकाश-स्तंभ की तरह है। 

                  उपन्यास दो शब्दों के योग से बना है उप + न्यास = उपन्यास अर्थात समीप घटित घटनाओं का वर्णन जिसे पढ़कर ऐसा प्रतीत हो कि यह हमारी ही कहानी, हमारे ही शब्दों में लिखी गई है। 'नीले घोड़े का शहसवार' में सदियों पूर्व घटित घटनाओं को इस तरह शब्दित किया गया है मानो रचनाकार स्वयं साक्षी हो। उपन्यास विधा आधुनिक युग की देन है।  हमारी अन्तः व बाह्य जगत की जितनी यथार्थ एवं सुन्दर अभिव्यक्ति उपन्यास में दिखाई पड़ती है उतनी किसी अन्य विधा में नहीं। 'नीले घोड़े का शहसवार' में  युग विशेष के सामाजिक जीवन और जगत कीजीवन झाँकियाँ संजोई गयी हैं। विविध प्रसंगों की मार्मिक अभिव्यक्ति इतनी रसपूर्ण है कि पाठक पात्रों के साथ-साथ हर्ष या शोक की अनुभूति करता है। प्रेमचंद ने उपन्यास को 'मानव चरित्र का चित्र' ठीक ही कहा है। उपन्यास 'नीले घोड़े का शहसवार' में तत्कालीन मानव समाज के संघर्षों का वृहद् शब्द-चित्र  चरित्र–चित्रण के माध्यम से किया गया है।

कथावस्तु

                  कथा वस्तु उपन्यास की जीवन शक्ति होती है।  'नीले घोड़े का शहसवार' की कथावस्तु एक ऐतिहासिक चरित्र के जीवन से सम्बन्धित होते हुए भी मौलिक कल्पना से व्युत्पन्न वर्णनों से सुसज्जित है। काल्पनिक प्रसंग इतने स्वाभाविक एवं यथार्थ हैं कि पाठक को उनके साथ तादात्म्य स्थापित करने में किंचितमात्र भी कठिनाई नहीं होती। उपन्यासकार  ने वास्तव में घटित विश्वसनीय घटनाओं को ही स्थान दिया है। युद्ध में हताहत सैनिकों की चिकित्सा अथवा अंतिम संस्कार हेतु धन की व्यवस्था करने की दृष्टि से गुरु गोबिंद जी द्वारा तीरों के अग्र भाग को स्वर्ण मंडित करने का आदेश दिया जाना, ऐसा ही प्रसंग है जिसकी लेखक ने वर्तमान 'रेडक्रॉस' से तुलना की है।  'नीले घोड़े का शहसवार' में मुख्य कथा गुरु गोबिंद सिंह का व्यक्तित्व-कृतित्व है जिसके साथ अन्य गौण कथाएँ (गुरु तेगबहादुर द्वारा आत्माहुति, मुग़ल बादशाओं  की क्रूरता, हिन्दू राजाओं का पारस्परिक द्वेष आदि) हैं जो मुख्य कथा को यथास्थान यथावश्यक गति देती हैं। ये गौण कथाएँ मुख्य कथा को दिशा, गति तथा विकास देने में सहायक हैं। इन उपकथाओं को मुख्या कथा के साथ इस तरह संगुफित किया गया है कि वे नीर-क्षीर की तरह एक हो सकीहैं। उपन्यासकार मुख्य और प्रासंगिक उपकथाओं को गूँथते समय कौतूहल और रोचकता बनाए रख सका है। 

पात्र व चरित्र चित्रण

                  इस उपन्यास का मुख्य विषय गुरु गोबिन्द सिंह जी के अनुपम चरित्र, अद्वितीय पराक्रम, असाधारण आदर्शप्रियता तथा लोकोत्तर आचरण का चित्रण कर समाज को सदाचरण की प्रेरणा देना है। उपन्यासकार इस उद्देश्य में पूरी तरह सफल है। उपन्यास में प्रधान पात्र गुरु गोबिंद सिंह जी ही हैं जिनके जन्म से अवसान तक किये गए राष्ट्र भक्ति तथा शौर्यपरक कार्यों का पूरी प्रमाणिकता के साथ वर्णन कर उपन्यासकार न केवल अतीत में घटे प्रेरक प्रसंगों को पुनर्जीवित करता है अपितु उन्हें सम-सामयिक परिदृश्य में प्रासंगिक निरूपित करते हुए, उनका अनुकरण किये जाने की आवश्यकता प्रतिपादित करता है। नायक के जीवन में निरंतर कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं, लगातार जान हथेली पर लेकर जूझना पड़ता है, कड़े संघर्ष के बाद मिली सफलता क्षणिक सिद्ध होती है और बार-बार वह छल का शिकार होता है तथापि एक बार भी हताश नहीं होता, नियति को दोष नहीं देता, ईश्वर या बादशाह के सामने गिड़गिड़ाता नहीं ,खुद कष्ट सहकर भी अपने आश्रितों और प्रजा के हित पल-पल प्राण समर्पित को तैयार रहता है। इससे वर्तमान नेताओं को सीख लेकर अपने आचरण का नियमन करना चाहिए। उपन्यास में माता जी, गुरु-पत्नियाँ, गुरु पुत्र, पंच प्यारे, पहाड़ी राजा, मुग़ल बादशाह और सिपहसालार आदि अनेक गौड़ पात्र हैं जो नायक के चतुर्दिक घटती घटनाओं के पूर्ण होने में सहायक होते हैं तथा नायक के दिव्यत्व को स्थापित करने में सहायक हैं।  वे कथानक को गति देकर, वातावरण की गंभीरता कम कर, उपयुक्त वातावरण की सृष्टि करने के साथ-साथ अन्य पात्रों के चरित्र पर प्रकाश डालते हैं।

संवाद :

                  संवादों का प्रयोग कथानक को गति देने, नाटकीयता लाने, पात्रों के चरित्र का उद्घाटन करने, वातावरण की सृष्टि करने आदि उद्देश्यों की पुयर्ती हेतु किया गया है। संवाद पत्रों के विचारों, मनोभावों तथा चिंतन की अभिव्यक्ति कर अन्य पात्रों तथा पाठकों को  घटनाक्रम से जोड़ते हैं। कथोपकथन पात्रों के अनुकूल हैं। संवादों के माध्यम से उपन्यासकार अनुपस्थित होते हुए भी अपने चिन्तन को पाठकों के मानस में आरोपित कर सका है। पंज प्यारों की परीक्षा के समय, सेठ-पुत्र के हाथ से जल न पीने के प्रसंग में, माता, पत्नियों, पुत्रों साथियों तथा सेवकों की शंकाओं का समाधान करते समय गुरु जी द्वारा कहे गए संवाद पाठकों को दिशा दिखाते हैं। ये संवाद न तो नाटकीय हैं, न उनमें अतिशयोक्ति है, गुरु गंभीर चिंतन को सरस, सहज, सरल शब्दों और लोक में परिचित भाषा शैली में व्यक्त किया गया है। इससे पाठक के मस्तिष्क में बोझ नहीं होता और वह कथ्य को ह्रदयंगम कर लेता है।   

वातावरण 

                  वर्तमान संक्रमण काल में भारत ही नहीं संपूर्ण विश्व में मूल्यहीनता, स्वार्थलिप्सा, संकीर्णता तथा भोग-विलास का वातावरण है। इस काल में ऐसे महान व्यक्तित्वों की गाथाएँ सर्वाधिक प्रासंगिक हैं जिन्होंने 'स्व' पर 'सर्व' को वरीयता देकर आत्म-त्याग और आत्म-बलिदान के उदाहरण बनकर मानवीय मूल्यों की दिव्य ज्योति को जलाए रख हो ताकि पाठक वर्ग प्रेरित होकर आदर्श पथ पर चल सके। गुरु गोबिंद सिंह जी ऐसे ही हुतात्मा हैं जो बचपन में अपने पिता को आत्माहुति की प्रेरणा देते हैं तथा तत्पश्चात मिले गुरुतर उत्तरदायित्व को ग्रहण कर न केवल स्वयं को उसके उपयुक्त प्रमाणित करते हैं बल्कि शिव की तरह पहाड़ी राजाओं के विश्वासघात का गरल पीकर नीलकंठ की भाँति मुगलों से उन्हीं की रक्षा भी करते हैं। उपन्यासकार ने तत्कालिक परिस्थितियों का वर्णन पूरी प्रामाणिकता के साथ किया है। ऐतिहासिक जीवनचरित परक उपन्यास लिखते समय लेखक की कलम को दुधारी की धार पर चलन होता है। एक ओर महानायकत्व की स्थापना, दूसरी र तथ्यों और प्रमाणिकता की रक्षा, तीसरी ओर पठनीयता बनाए रखना और चौथी और सम-सामयिक परिस्थितियों और परिवेश के साथ घटनाक्रम और नायक की सुसंगति स्थापित करते हुए उन्हें प्रासंगिक सिद्ध करना। डॉ. सुरेश कुमार वर्मा इस सभी उद्देश्यों को साधने में सफल सिद्ध हुए हैं।

भाषा शैली :

                  भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम होती है और शैली भावों की का अभिव्यक्ति का ढंग। भाषा के द्वारा उपन्यासकार अपनी मन की बात पाठक तक संप्रेषित करता है। अतः, भाषा का सरल-सहज-सुबोधहोना, शब्दों का सटीक होना तथा शैली का सरस होना आवश्यक है।  डॉ. वर्मा स्वयं हिंदी के प्राध्यापक तथा भाषा वैज्ञानिक हैं। ऐसी स्थिति में बहुधा लेखक पांडित्य प्रदर्शन करने के फेर में पाठकों और कथा के पात्रों के साथ न्याय नहीं कर पाते किन्तु डॉ. वर्मा ने कथावस्तु के अनुरूप पंजाबी मिश्रित हिंदी और पंजाबी काव्यांशों का यथास्थान प्रयोग कर भाषा को पात्रों, घटनाओं तथा परिवेश के अनुरूप बनाने के साथ सहज बोधगम्य भी रखा है। पात्रों के संवाद उनकी शिक्षा तथा वातावरण के साथ सुसंगत हैं। प्रसंगानुकूल भाषा का उदाहरण गुरु द्वारा औरंगजेब को लिखा गया पत्र है जिसमें अरबी-फ़ारसी शब्दों का प्रचुर प्रयोग है। 

जीवन दर्शन व उद्देश्य :

                  किसी भी रचना को रचते समय रचनाकार के मन में कोई न कोई मान्यता, विचार या उद्देश्य होता है। उपन्यास जैसी गुरु गंभीर रचना निरुद्देश्य नहीं की जा सकती। ;नीले घोड़े का शहसवार' की रचना के मूल में निहित उद्देश्य का उल्लेख करते हुए डॉ. वर्मा 'अपनी बात' में गुरु नानक द्वारा समाज सुधर की चर्चा करते समय लिखते हैं '...पहले मनुष्य को ठीक किया जाए ,यदि मनुष्य विकृत रहा तो वह सबको विकृत कर देगा...मनुष्य को सत्य, न्याय, प्रेम करुणा, अहिंसा, समता, क्षमा, पवित्रता, निस्स्वार्थता, परोपकारिता, विनम्रता, जैसे गुणों को अपने व्यक्तित्व में अंगभूत करना चाहिए। फिर समाज से अन्धविश्वास, कुरीति, वर्णभेद, जातिभेद, असमानता आदि का उन्मूलन किया जाए। धर्म के क्षेत्र में सहिष्णुता, स्वतंत्रता, सरलता और मृदुलता के भावों को विकसित करने की जरूरत थी। (आज पहले की अपेक्षा और अधिक है-सं.) 

                  गुरु गोबिंद सिंह जी के अवदान का संकेत करते हुए डॉ. वर्मा लिखते हैं - 'पिता को आत्मोत्सर्ग की प्रेरणा देनेवाले बालक ने मात्र ९ वर्ष की आयु में गुरुगद्दी सम्हालने के तुरंत बाद ही अपना लक्ष्य निर्धारित कर लिया और वह लक्ष्य था धर्म की रक्षा। 'धर्मो रक्षति रक्षित:' के सूत्र को उन्होंने कसकर पकड़ा और संकल्प किया कि हर पुरुष को लौह पुरुष के रूप में ढाला जाए जो अपनी रक्षा भी कर सके और अपने धर्म की भी... शायद ही किसी कौन या मजहब के इतिहास में ऐसा कोइ महानायक पैदा हुआ हो जिसने हर शख्स को तराशने और संवारने में इतनी मेहनत की हो।'.... आदि गुरु नानकदेव जी ने जिस धर्म की नींव राखी, उस पर कलश चढ़ाने का काम दशमेश गुरु गोबिंदसिंह ने किया। वे बड़े विलक्षण मानव थे। वे कर्मवीर थे,धर्मवीर थे, परमवीर थे। उन्होंने जीवन के विविध आयामों को बहुत ऊँचाई पर ले जाकर स्थिर किया। एक हाथ में शास्त्र था तो उस शास्त्र की रक्षा के लिए दूसरे हाथ में शस्त्र था.... पहल संस्कार कराकर और अमृत चखाकर सिखों में यह विश्वास पैदा कर दिया कि वे अमृत की संतान हैं और मृत्यु उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। इससे मूलमंत्र की 'निरभउ' भावना बलवती हुई। इसका यह परिणाम हुआ की सिखों ने मृत्यु का भी तिरस्कार किया और बलिदान का वैभव दिखाने के लिए आगे आए.... गुरु गोबिंद सिंह ने उनमें यह विश्वास भर दिया कि जंग संख्याबल से नहीं, मनोबल से जीती जाती है और यह विश्वास भी कि हर सिख एक लाख शत्रुओं से लड़ने की ताकत रखता है.... तीन बार ऐसे अवसर आए जब मुग़ल सिपहसालार उनकी तेजस्विता देखकर हतप्रभ हो गए, घोड़े से उत्तर पड़े, अपनी तलवार जमीन पर रख दी और रणक्षेत्र को छोड़कर निकल गए.... विश्व के धर्मशास्त्रों में शायद ही इस प्रकार की कोई घटना दर्ज हो कि कोई गुरु अपने ही चेलों को गुरु मानकर उनकी आज्ञा का पालन करे...' उपन्यास नायक के रूप में गुरु गोबिंद सिंह जी के चयन की उपयुक्तता असंदिग्ध है।    

प्रासंगिकता 

                'नीले घोड़े का शहसवार' उपन्यास की प्रासंगिकता विविध प्रसंगों में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सहज ही देखी जा सकती है। भारत का जन मानस संविधान द्वारा समानता की गारंटी दिए जाने के बाद भी,जाति, धर्म पंथ, संप्रदाय, भाषा, भूषा, लिंग आदि के भेद-भाव से  आज भी ग्रस्त है। गुरु गोबिंद सिंह द्वारा खालसा धर्म की स्थापना कर मानव मात्र को समान मानने का आदर्श युग की आवश्यकता है। पक्षपात की भावना, निष्पक्ष और सर्वोत्तम के चयन में बाधक होती है, आरक्षण व्यवस्था, अयोग्य को अवसर बन गयी है। गुरु गोबिंद सिंह ने पंज प्यारे चुनने और अमृत छकने में श्रेष्ठता को ही चयन का मानक रखा। यहाँ तक कि गुरु गद्दी भी गुरु ने पुत्रों को नहीं, सर्वोत्तम पात्र को दी। आज देश नेताओं, नौकरशाहों, धनपतियों ही नहीं आम आदमी के भी भ्रष्टाचार से संत्रस्त है। गुरु गोबिंद सिंह ने मसन्दों के भ्रष्टाचार का उन्मूलन करने में देर न की, साथ ही 'निरमला' के माध्यम से चारित्रिक शुचिता को प्रतिष्ठा दी। अपने और शत्रु दोनों के सैनिकों को पानी पिलाने के प्रसंग में गुरु नई मानव मात्र पीड़ा को समान मानकर राहत देने का सर्वोच्च मूल्य स्थापित किया। कश्मीर के आतंकवादियों द्वारा एक विमान में कुछ भारतीयों का अपहरण कर ले जाने के बदले में सरकार ने कठिनाई से पकड़े दुर्दांत आतंकवादियों को उनके ठिकाने पर पहुँचाया, उन्हें अब तक मारा नहीं जा सका और वे शत्रुदेश में  षड्यंत्र करते हैं। यदि लोगों और नेताओं के मन में गुरु गोबिंद सिंह की तरह आत्मोत्सर्ग की भावना होती तो यह न होता। गुरु ने अपने चार पुत्रों को देश पर बलिदान होने पर भी उफ़ तक न की।

                 'नीले घोड़े का शहसवार' उपन्यास देश के हर नागरिक को न केवल पढ़ना अपितु आत्मसात करना चाहिए। गुरु गोबिंद सिंह के चिंतन, आचरण और आदर्शों को किंचित मात्र भी अपनाया जा सके तो पठान न केवल बेहतर मनुष्य अपितु बेहतर समाज बनाने में भी सहायक होगा।  सर्वोपयोगी कृति के प्रणयन हेतु डॉ. सुरेश कुमार वर्मा साधुवाद के पात्र हैं। 

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छंद सलिला
छंदराज चौपाई
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जन-मन को भाई चौपाई/चौपायी :
भारत में शायद ही कोई हिन्दीभाषी होगा जिसे चौपाई छंद की जानकारी न हो। रामचरित मानस की रचना चौपाई छंद में ही हुई है।
चौपाई छंद पर चर्चा करने के पूर्व मात्राओं की जानकारी होना अनिवार्य है
मात्राएँ दो हैं १. लघु या छोटी (पदभार एक) तथा दीर्घ या बड़ी (पदभार २)।
स्वरों-व्यंजनों में हृस्व, लघु या छोटे स्वर ( अ, इ, उ, ऋ, ऌ ) तथा सभी मात्राहीन व्यंजनों की मात्रा लघु या छोटी (१) तथा दीर्घ, गुरु या बड़े स्वरों (आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अ:) तथा इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अ: मात्रा युक्त व्यंजनों की मात्रा दीर्घ या बड़ी (२) गिनी जाती हैं.
चौपाई छंद : रचना विधान-
चारपाई से हम सब परिचित हैं। चौपाई के चार चरण होने के कारण इसे चौपाई नाम मिला है। यह एक मात्रिक सम छंद है चूँकि इसकी चार चरणों में मात्राओं की संख्या निश्चित तथा समान रहती है। चौपाई द्विपदिक छंद है जिसमें दो पद या पंक्तियाँ होती हैं। प्रत्येक पद में दो चरण होते हैं जिनकी अंतिम मात्राएँ समान (दोनों में लघु लघु या दोनों में गुरु) होती हैं। चौपायी के प्रत्येक चरण में १६ तथा प्रत्येक पद में ३२ मात्राएँ होती हैं। चारों चरण मिलाकर चौपाई ६४ मात्राओं का छंद है। चौपाई के चारों चरणों के समान मात्राएँ हों तो नाद सौंदर्य में वृद्धि होती है किन्तु यह अनिवार्य नहीं है। चौपाई के पद के दो चरण विषय की दृष्टि से आपस में जुड़े होते हैं किन्तु हर चरण अपने में स्वतंत्र होता है। चौपाई के पठन या गायन के समय हर चरण के बाद अल्प विराम लिया जाता है जिसे यति कहते हैं। अत: किसी चरण का अंतिम शब्द अगले चरण में नहीं जाना चाहिए। चौपाई के चरणान्त में गुरु-लघु मात्राएँ वर्जित हैं।
उदाहरण:
१. शिव चालीसा की प्रारंभिक पंक्तियाँ देखें.
जय गिरिजापति दीनदयाला । -प्रथम चरण
१ १ १ १ २ १ १ २ १ १ २ २ = १६ मात्राएँ
सदा करत संतत प्रतिपाला ।। -द्वितीय चरण
१ २ १ १ १ २ १ १ १ १ २ २ = १६१६ मात्राएँ
भाल चंद्रमा सोहत नीके। - तृतीय चरण
२ १ २ १ २ २ १ १ २ २ = १६ मात्राएँ
कानन कुंडल नाक फनीके।।
-चतुर्थ चरण
२ १ १ २ १ १ २ १ १ २ २ = १६ मात्राएँ
रामचरित मानस के अतिरिक्त शिव चालीसा, हनुमान चालीसा आदि धार्मिक रचनाओं में चौपाई का प्रयोग सर्वाधिक हुआ है किन्तु इनमें प्रयुक्त भाषा उस समय की बोलियों (अवधी, बुन्देली, बृज, भोजपुरी आदि ) है।
निम्न उदाहरण वर्त्तमान काल में प्रचलित खड़ी हिंदी के तथा समकालिक कवियों द्वारा रचे गये हैं।
२. श्री रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
भुवन भास्कर बहुत दुलारा।
मुख मंडल है प्यारा-प्यारा।।
सुबह-सुबह जब जगते हो तुम।
कितने अच्छे लगते हो तुम।।
३. श्री छोटू भाई चतुर्वेदी
हर युग के इतिहास ने कहा।
भारत का ध्वज उच्च ही रहा।।
सोने की चिड़िया कहलाया।
सदा लुटेरों के मन भाया।।
४. शेखर चतुर्वेदी
मुझको जग में लानेवाले।
दुनिया अजब दिखनेवाले।।
उँगली थाम चलानेवाले।
अच्छा बुरा बतानेवाले।।
५. श्री मृत्युंजय
श्याम वर्ण, माथे पर टोपी।
नाचत रुन-झुन रुन-झुन गोपी।।
हरित वस्त्र आभूषण पूरा।
ज्यों लड्डू पर छिटका बूरा।।
६. श्री मयंक अवस्थी
निर्निमेष तुमको निहारती।
विरह –निशा तुमको पुकारती।।
मेरी प्रणय –कथा है कोरी।
तुम चन्दा, मैं एक चकोरी।।
७.श्री रविकांत पाण्डे
मौसम के हाथों दुत्कारे।
पतझड़ के कष्टों के मारे।।
सुमन हृदय के जब मुरझाये।
तुम वसंत बनकर प्रिय आये।।
८. श्री राणा प्रताप सिंह
जितना मुझको तरसाओगे।
उतना निकट मुझे पाओगे।।
तुम में 'मैं', मुझमें 'तुम', जानो।
मुझसे 'तुम', तुमसे 'मैं', मानो।।
९. श्री शेषधर तिवारी
एक दिवस आँगन में मेरे।
उतरे दो कलहंस सबेरे।।
कितने सुन्दर कितने भोले।
सारे आँगन में वो डोले।।
१०. श्री धर्मेन्द्र कुमार 'सज्जन'
नन्हें मुन्हें हाथों से जब।
छूते हो मेरा तन मन तब॥
मुझको बेसुध करते हो तुम।
कितने अच्छे लगते हो तुम।।
११. श्री संजीव 'सलिल'
कितने अच्छे लगते हो तुम ।
बिना जगाये जगते हो तुम ।।
नहीं किसी को ठगते हो तुम।
सदा प्रेम में पगते हो तुम ।।
दाना-चुग्गा मंगते हो तुम।
चूँ-चूँ-चूँ-चूँ चुगते हो तुम।।
आलस कैसे तजते हो तुम?
क्या प्रभु को भी भजते हो तुम?
चिड़िया माँ पा नचते हो तुम।
बिल्ली से डर बचते हो तुम।।
क्या माला भी जपते हो तुम?
शीत लगे तो कँपते हो तुम?
सुना न मैंने हँसते हो तुम।
चूजे भाई! रुचते हो तुम।।
अंतिम उदाहरण में चौपाई छन्द का प्रयोग कर 'चूजे' विषय पर मुक्तिका (हिंदी गजल) लिखी गयी है। यह एक अभिनव साहित्यिक प्रयोग है।
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संजीव भैया के प्रति
डॉ. नीलम खरे
*
सदा लेखनी के धनी,श्रीमान संजीव
करते सिरजन नित्य ही,हैं सारस्वत जीव
हैं सारस्वत जीव,करें साहित्य-वंदना
हैं ज्ञानी,उत्कृष्ट,जानते लक्ष्य-साधना
कहती 'नीलम' आज,कभी ना कहें अलविदा
चोखे श्री संजीव,रहें गतिमान वे सदा।
--डॉ नीलम खरे
आज़ाद वार्ड
मंडला(मप्र)-481661
(9425484382)
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छंदों का सम्पूर्ण विद्यालय : आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
मंजूषा मन
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आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' से मेरा परिचय पिछले चार वर्षों से है। लगभग चार वर्ष पहले की बात है, मैं एक छंद के विषय मे जानकारी चाहती थी पर यह जानकारी कहाँ से मिल सकती है यह मुझे पता नहीं था, सो जो हम आमतौर पर करते हैं मैंने भी वही किया... मैंने गूगल की मदद ली और गूगल पर छंद का नाम लिखा तो सबसे पहले मुझे "दिव्य नर्मदा" वेब पत्रिका से छंद की जानकारी प्राप्त हुई। मैंने दिव्य नर्मदा पर बहुत सारी रचनाएँ पढ़ीं।
चूँकि मैं भी जबलपुर की हूँ और जबलपुर मेरा नियमित आनाजाना होता है तो मेरे मन में आचार्य जी से मिलने की तीव्र इच्छा जागृत हुई। दिव्य नर्मदा पर मुझे आदरणीय संजीव वर्मा 'सलिल' जी का पता और फोन नम्बर भी मिला। मैं स्वयं को रोक नहीं पाई और मैंने आचार्य सलिल जी को व्हाट्सएप पर सन्देश लिखा कि मैं भी जबलपुर से हूँ... और जबलपुर आने पर आपसे भेंट करना चाहती हूँ। उन्होंने कहा कि मैं जब भी आऊँ तो उनके निवास स्थान पर उनसे मिल सकती हूँ।
उसके बाद जब में जबलपुर गई तो मैं सलिल जी से मिलने उनके के घर गई। आप बहुत ही सरल हृदय हैं बहुत ही सहजता से मिले और हमने बहुत देर तक साहित्यिक चर्चा की। हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए आप बहुत चिंतित एवं प्रयासरत लगे। चर्चा के दौरान हमने हिन्दी छंद, गीत-नवगीत, माहिया एवं हाइकु आदि पर विस्तार से बात की। लेखन की लगभग सभी विधाओं पर आपका ज्ञान अद्भुत है।
ततपश्चात मैं जब भी जबलपुर जाती हूँ तो आचार्य सलिल जी से अवश्य मिलती हूँ। उनके अथाह साहित्य ज्ञान के सागर से हर बार कुछ मोती चुनने का प्रयास करती हूँ।
ऐसी ही एक मुलाकात के दौरान उन्होंने सनातन छंदो पर अपने शोध पर विस्तार से बताया। सनातन छंदों पर किया गया यह शोध नवोदित रचनाकारों के लिए गीता साबित होगा।
आचार्य सलिल जी के विषय में चर्चा हो और उनके द्वारा संपादित "दोहा शतक मंजूषा" की चर्चा हो यह सम्भव नहीं। विश्व वाणी साहित्य संस्थान नामक संस्था के माध्यम से आप साहित्य सेवारत हैं। इसी प्रकाशन से प्रकाशित ये दोहा संग्रह पठनीय होने के साथ साथ संकलित करके रखने के योग्य हैं इनमें केवल दोहे संकलित नहीं हैं बल्कि दोहों के विषय मे विस्तार से समझाया गया है जिससे पाठक दोहों के शिल्प को समझ सके और दोहे रचने में सक्षम हो सके।
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' जी के लिए कुछ कहते हुए शब्द कम पड़ जाते हैं किंतु साहित्य के लिए आपके योगदान की गाथा पूर्ण नहीं होती। आपकी साहित्य सेवा सराहनीय है।
मैं अपने हृदयतल से आपको शुभकामनाएं देती हूँ कि आप आपकी साहित्य सेवा की चर्चा दूर दूर तक पहुंचे। आप सफलता के नए नए कीर्तिमान स्थापित करें अवने विश्व वाणी संस्थान के माध्यम से हिंदी का प्रचार प्रसार करते रहें।
मंजूषा मन
कार्यकारी अधिकारी
अम्बुजा सीमेंट फाउंडेशन
ग्राम - रवान
जिला - बलौदा बाजार
पिन - 493331
छत्तीसगढ़
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हमारे बहुत करीब सलिल जी
डॉ. बाबू जोसफ
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आचार्य संजीव वर्मा सलिल जी के साथ मेरा संबंध वर्षों पुराना है। उनके साथ मेरी पहली मुलाकात सन् 2003 में कर्णाटक के बेलगाम में हुई थी। सलिल जी द्वारा संपादित पत्रिका नर्मदा के तत्वावधान में आयोजित दिव्य अलंकरण समारोह में मुझे हिंदी भूषण पुरस्कार प्राप्त हुआ था। उस सम्मान समारोह में उन्होंने मुझे कुछ किताबें उपहार के रूप में दी थीं, जिनमें एक किताब मध्य प्रदेश के दमोह के अंग्रेजी प्रोफसर अनिल जैन के अंग्रेजी ग़ज़ल संकलन Off and On भी थी। उस पुस्तक में संकलित अंग्रेजी ग़ज़लों से हम इतने प्रभावित हुए कि हमने उन ग़ज़लों का हिंदी में अनुवाद करने की इच्छा प्रकट की। सलिल जी के प्रयास से हमें इसके लिए प्रोफसर अनिल जैन की अनुमति मिली और Off and On का हिंदी अनुवाद यदा-कदा शीर्षक पर जबलपुर से प्रकाशित भी हुआ। सलिल जी हमेशा उत्तर भारत के हिंदी प्रांत को हिंदीतर भाषी क्षेत्रों से जोड़ने का प्रयास करते रहे हैं। उनके इस श्रम के कारण BSF के DIG मनोहर बाथम की हिंदी कविताओं का संकलन सरहद से हमारे हाथ में आ गया। हिंदी साहित्य में फौजी संवेदना की सुंदर अभिव्यक्ति के कारण इस संकलन की कविताएं बेजोड़ हैं। हमने इस काव्य संग्रह का मलयालम में अनुवाद किया, जिसका शीर्षक है 'अतिर्ति'। इस पुस्तक के लिए बढ़िया भूमिका लिखकर सलिल जी ने हमारा उत्साह बढ़ाया। यह विशेष रूप से उल्लेखनीय बात है कि सलिल जी के कारण हिंदी के अनेक विद्वान, कवि,लेखक आदि हमारे मित्र बन गए हैं। हिंदी साहित्य में कवि, आलोचक एवं संपादक के रूप में विख्यात सलिल जी की बहुमुखी प्रतिभा से हिन्दी भाषा का गौरव बढ़ा है। उन्होंने हिंदी को बहुत कुछ दिया है। इस लिए हिंदी साहित्य में उनका नाम हमेशा अमर रहेगा। हमने सलिल जी को बहुत दूर से देखा है, मगर वे हमारे बहुत करीब हैं। हमने उन्हें किताबें और तस्वीरों में देखा है, मगर वे हमें अपने मन की दूरबीन से देखते हैं। उनकी लेखनी के अद्भुत चमत्कार से हमारे दिल का अंधकार दूर हो गया है। सलिल जी को केरल से ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ।
डॉ. बाबू जोसफ,
विभागाध्यक्ष हिंदी,
वडक्कन हाऊस, कुरविलंगाडु पोस्ट, कोट्टायम जिला, केरल-686633, मोबाइल.09447868474
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शब्द ब्रम्ह के पुजारी गुरुवर आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'*
छाया सक्सेना
श्रुति-स्मृति की सनातन परंपरा के देश भारत में शब्द को ब्रम्ह और शब्द साधना को ब्रह्मानंद माना गया है। पाश्चात्य जीवन मूल्यों और अंग्रेजी भाषा के प्रति अंधमोह के काल में, अभियंता होते हुए भी कोई हिंदी भाषा, व्याकरण और साहित्य के प्रति समर्पित हो सकता है, यह आचार्य सलिल जी से मिलकर ही जाना।
भावपरक अलंकृत रचनाओं को कैसे लिखें यह ज्ञान आचार्य संजीव 'सलिल' जी अपने सम्पर्क में आनेवाले इच्छुक रचनाकारों को स्वतः दे देते हैं। लेखन कैसे सुधरे, कैसे आकर्षक हो, कैसे प्रभावी हो ऐसे बहुत से तथ्य आचार्य जी बताते हैं। वे केवल मौखिक जानकारी ही नहीं देते वरन पढ़ने के लिए साहित्य भी उपलब्ध करवाते हैं । उनकी विशाल लाइब्रेरी में हर विषयों पर आधारित पुस्तकें सुसज्जित हैं । विश्ववाणी संस्थान अभियान के कार्यालय में कोई भी साहित्य प्रेमी आचार्य जी से फोन पर सम्पर्क कर मिलने हेतु समय ले सकता है । एक ही मुलाकात में आप अवश्य ही अपने लेखन में आश्चर्य जनक बदलाव पायेंगे ।
साहित्य की किसी भी विधा में आप से मार्गदर्शन प्राप्त किया जा सकता है । चाहें वो पुरातन छंद हो , नव छंद हो, गीत हो, नवगीत हो या गद्य में आलेख, संस्मरण, उपन्यास, कहानी या लघुकथा इन सभी में आप सिद्धस्थ हैं।
आचार्य सलिल जी संपादन कला में भी माहिर हैं। उन्होंने सामाजिक पत्रिका चित्राशीष, अभियंताओं की पत्रिकाओं इंजीनियर्स टाइम्स, अभियंता बंधु, साहित्यिक पत्रिका नर्मदा, अनेक स्मारिकाओं व पुस्तकों का संपादन किया है। अभियंता कवियों के संकलन निर्माण के नूपुर व नींव के पत्थर तथा समयजयी साहित्यकार भागवत प्रसाद मिश्र 'नियाज़' के लिए आपको
नाथद्वारा में 'संपादक रत्न' अलंकरण से अलंकृत किया गया है।
आचार्य सलिल जी ने संस्कृत से ५ नर्मदाष्टक, महालक्ष्यमष्टक स्त्रोत, शिव तांडव स्त्रोत, शिव महिम्न स्त्रोत, रामरक्षा स्त्रोत आदि का हिंदी काव्यानुवाद किया है। इस हेतु हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग को रजत जयंती वर्ष में आपको 'वाग्विदांबर' सम्मान प्राप्त हुआ। आचार्य जी ने हिंदी के अतिरिक्त बुंदेली, छत्तीसगढ़ी, भोजपुरी, राजस्थानी, अवधी, हरयाणवी, सरायकी आदि में भी सृजन किया है।
बहुआयामी सृजनधर्मिता के धनी सलिल जी अभियांत्रिकी और तकनीकी विषयों को हिंदी में लिखने के प्रति प्रतिबद्ध हैं। आपको 'वैश्विकता के निकष पर भारतीय अभियांत्रिकी संरचनाएँ' पर अभियंताओं की सर्वोच्च संस्था इंस्टीटयूशन अॉफ इंजीनियर्स कोलकाता का अखिल भारतीय स्तर पर द्वितीय श्रेष्ठ पुरस्कार महामहिम राष्ट्रपति जी द्वारा प्रदान किया गया।
जबलपुर (म.प्र.)में १७ फरवरी को आयोजित सृजन पर्व के दौरान एक साथ कई पुस्तकों का विमोचन, समीक्षा व सम्मान समारोह को आचार्य जी ने बहुत ही कलात्मक तरीके से सम्पन्न किया । दोहा संकलन के तीन भाग सफलता पूर्वक न केवल सम्पादित किया वरन दोहाकारों को आपने दोहा सतसई लिखने हेतु प्रेरित भी किया । आपके निर्देशन में समन्वय प्रकाशन भी सफलता पूर्वक पुस्तकों का प्रकाशन कर नए कीर्तिमान गढ़ रहा है ।
छाया सक्सेना प्रभु

जबलपुर ( म. प्र. )
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बहुमुखी व्यक्तित्व के साहित्य पुरोधा - 'संजीव वर्मा सलिल'
क्रांति कनाटे
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श्री संजीव वर्मा 'सलिल" बहुमुखी प्रतिभा के धनी है । अभियांत्रिकी, विधि, दर्शा शास्त्र और अर्थशास्त्र विषयों में शिक्षा प्राप्त श्री संजीव वर्मा 'सलिल' जी देश के लब्ध-प्रतिष्ठित साहित्यकार है जिनकी कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीट मेरे, काल है संक्रांति का, सड़क पर और कुरुक्षेत्र गाथा सहित अनेक पुस्तके चर्चित रही है ।
दोहा, कुण्डलिया, रोला, छप्पय और कई छन्द और छंदाधारित गीत रचनाओ के सशक्त हस्ताक्षर सही सलिल जी का पुस्तक प्रेम अनूठा है। इसका प्रमाण इनकी 10 हजार से अधिक श्रेष्ठ पुस्तको का संग्रह से शोभायमान जबलपुर में इनके घर पर इनका पुस्तकालय है ।
इनकी लेखक, कवि, कथाकार, कहानीकार और समालोचक के रूप में अद्वित्तीय पहचान है । मेरे प्रथम काव्य संग्रह 'करते शब्द प्रहार' पर इनका शुभांशा मेरे लिए अविस्मरणीय हो गई । इन्होंने ने कई नव प्रयोग भी किये है । दोहो और कुंडलियों पर इनकी शिल्प विधा पर इनके आलेख को कई विद्वजन उल्लेख करते है ।
जहाँ तक मुझे जानकारी है ये महादेवी वर्मा के नजदीकी रिश्तेदार है । इनकी कई वेसाइट है । ईश्वर के प्रति प्रगाढ़ आस्था के कारण इन्होंने के भजन सृजित किये है और कई संस्कृत की पुस्तकों का हिंदी काव्य रूप में अनुवाद किया है ।
सलिल जी से जब भी कोई जिज्ञासा वश पूछता है तो सहभाव से प्रत्युत्तर दे समाधान करते है । ये इनकी सदाशयता की पहचान है । एक बार इनके अलंकारित दोहो के प्रत्युत्तर में मैंने दोहा क्या लिखा, दोहो में ही आधे घण्टे तक एक दूसरे को जवाब देते रहे, जिन्हें कई कवियों ने सराहा । ऐसे साहित्य पुरोधा श्री 'सलिल' जी साहित्य मर्मज्ञ के साथ ही ऐसे नेक दिल इंसान है जिन्होंने सैकड़ों नवयुवकों को का हौंसला बढ़ाया है । मेरी हार्दिक शुभकामनाएं है ।
मेरी भावभव्यक्ति -
प्रतिभा के धनी : संजीव वर्मा सलिल
विभा तिवारी
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प्रतिभा के लगते धनी, जन्म जात कवि वृन्द ।
हुए पुरोधा कवि 'सलिल',प्यारे जिनको छन्द ।।
प्यारे जिनको छंद, पुस्तके जिनकी चर्चित ।
छन्दों में रच काव्य, करी अति ख्याति अर्जित ।।
कह लक्ष्मण कविराय, साहित्य में लाय विभा*।
साहित्यिक मर्मज्ञ, मानते वर्मा में प्रतिभा ।।
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पद
छंद: दोहा.
*
मन मंदिर में बैठे श्याम।।
नटखट-चंचल सुकोमल, भावन छवि अभिराम।
देख लाज से गड़ रहे, नभ सज्जित घनश्याम।।
मेघ मृदंग बजा रहे, पवन जप रहा नाम।
मंजु राधिका मुग्ध मन, छेड़ रहीं अविराम।।
छीन बंसरी अधर धर, कहें न करती काम।
कहें श्याम दो फूँक तब, जब मन हो निष्काम।।
चाह न तजना है मुझे, रहें विधाता वाम।
ये लो अपनी बंसरी, दे दो अपना नाम।।
तुम हो जाओ राधिका, मुझे बना दो श्याम।
श्याम थाम कर हँस रहे, मैं गुलाम बेदाम।।
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२९.६.२०१२, ७९९९५५९६१८ / ९४२५१८३२४४
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गीत:
कहे कहानी....
*
कहे कहानी, आँख का पानी.
की सो की, मत कर नादानी...
*
बरखा आई, रिमझिम लाई.
नदी नवोढ़ा सी इठलाई..
ताल भरे दादुर टर्राये.
शतदल कमल खिले मन भाये..
वसुधा ओढ़े हरी चुनरिया.
बीरबहूटी बनी गुजरिया..
मेघ-दामिनी आँख मिचोली.
खेलें देखे ऊषा भोली..
संध्या-रजनी सखी सुहानी.
कहे कहानी, आँख का पानी...
*
पाला-कोहरा साथी-संगी.
आये साथ, करें हुडदंगी..
दूल्हा जाड़ा सजा अनूठा.
ठिठुरे रवि सहबाला रूठा..
कुसुम-कली पर झूमे भँवरा.
टेर चिरैया चिड़वा सँवरा..
चूड़ी पायल कंगन खनके.
सुन-गुन पनघट के पग बहके.
जो जी चाहे करे जवानी.
कहे कहानी, आँख का पानी....
*
अमन-चैन सब हुई उड़न छू.
सन-सन, सांय-सांय चलती लू..
लंगड़ा चौसा आम दशहरी
खाएँ ख़ास न करते देरी..
कूलर, ए.सी., परदे खस के.
दिल में बसी याद चुप कसके..
बन्ना-बन्नी, चैती-सोहर.
सोंठ-हरीरा, खा-पी जीभर..
कागा सुन कोयल की बानी.
कहे कहानी, आँख का पानी..
२९-६-२०१०
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