सलिल सृजन अप्रैल १५
*
हरिऔध स्मृति अनुष्ठान
०
सब मिल हिंद और हिंदी की करें आरती।
हो प्रसन्न दें वर नव आशा मातु भारती।।
अनिल अंगिरा पवन अपर्णा ईशाना मिल
यायावर संजीव विनय सह सुमन सकें खिल।
आ भगवान विराजें, राम किशोर प्रांजल
कुसुम सरोज नीलिमा नीलम अलका निर्मल।
गिरि कैलाश सरोज भावना संगीता शुभ
गोकुल में गोपाल सुरेश मनोहर प्रातिभ।
विजय विवेक हिमांशु हर्ष अमिताभ हो उदित
संदीप प्रदीप प्रगीत मनोज बिहारी प्रमुदित।
पुरुषोत्तम वीरेंद्र कीर्ति दस दिश गुंजित हो ३७ /१
राघवेश सोनम शशि खुशबू दीप जलाएँ
गीत प्रियंका सुना, कला अरविन्द दिखाएँ
मन महेंद्र बल राम बने, नव सूर्य उदय हो ९
सिंह अयोध्या के हरिऔध कृपालु सदय हो।
प्रिय प्रवास, रस कलश, अधखिला फूल धरोहर
वैदेही वनवास, रुक्मिणी परिणय रचकर।
कवि सम्राट, चौपदे चोखे-चुभते देकर
पारिजात, वेनिस का बाँका ज्यों रत्नाकर।
हिन्दी भाषा अरु साहित्य विकास कहानी
चंद्र खिलौना, खेल तमाशा कथा लुभानी।
बाल विलास-विभव, उपदेश कुसुम मन भाए
चाँद सितारे, पद्म प्रसून न युग बिसराए।
लिखी बाल गीतावली, चंदा मामा कृतियाँ
फूल-पत्ते अरु कल्पलता हिन्दी की निधियाँ।
ठाठ ठेठ हिन्दी का बिसरा समय न पाए
बोलचाल, इतिवृत्त सरुआजन की जय जय गाए।
हैं हरिऔध सूर्य हिन्दी के अजर-अमर भी।
कृतियाँ करतीं आप समय के साथ समर भी।
'सलिल' धन्य अभिषेक करे, पद प्रक्षालन भी
है साहित्य ज्ञानवर्धक अरु मन भावन भी।
दें युग को आशीष बने हिन्दी जगवाणी
भारत-भाषा विकसे-फूले जग कल्याणी
०००
शुभकामना
यह पोला वैशाख अगिन खुशियाँ ले आए।
शिप्रा मति गति निशि-दिन जीवन सुखी बनाए।।
स्नेह-सलिल अभिषेक करे नित सुहृद जनों का-
बने जीव संजीव, देश को प्रथम बनाए।।
छंदशाला
दोहा-रोला-कुंडलिया
०
१
लक्ष्य नयन थे पार्थ के, नयन भेदते लक्ष्य।
लक्ष्य नयन ही साधते, नयनों के उपलक्ष्य।। -अशोक व्यग्र
नयनों के उपलक्ष्य, स्वर्ण मृग लक्ष्य बेधते।
और कभी ले धनुष, मीन के नयन छेदते।।
नयन नयन के भोज्य, अरु नयन नयन के भक्ष्य।
नयन तीर धनु हाथ, हों नयन नयन के लक्ष्य।।
०००
२.
लक्ष्य नयन थे पार्थ के, नयन भेदते लक्ष्य।
लक्ष्य नयन ही साधते, नयनों के उपलक्ष्य।। -अशोक व्यग्र
नयनों के उपलक्ष्य, नयन जनसेवा करते।
कभी लगा नव पौध, हरा धरती को करते।।
रक्षें पर्यावरण, न हों दूषण भक्ष्य नयन।
हो समता सद्भाव, नीर रक्षा लक्ष्य नयन।।
०००
३
लक्ष्य नयन थे पार्थ के, नयन भेदते लक्ष्य।
लक्ष्य नयन ही साधते, नयनों के उपलक्ष्य।। -अशोक व्यग्र
नयनों के उपलक्ष्य, नयन ही कोशिश करते।
बाधा पीड़ा दर्द, हानि से कभी न डरते।।
नयन प्रगति के दूत, सृजन के साक्ष्य नयन थे।।
सरहद पर हों सजग, शत्रु के लक्ष्य नयन थे।।
०००
४
लक्ष्य नयन थे पार्थ के, नयन भेदते लक्ष्य।
लक्ष्य नयन ही साधते, नयनों के उपलक्ष्य।। -अशोक व्यग्र
नयनों के उपलक्ष्य, नयन गत-आगत रचते।
हरते नयन अशांति, क्रोध-हिंसा से बचते।।
नयन मिटाते उन्हें, साथ जो रहें स्वार्थ के।
द्रुपद सुता बेचैन, लक्ष्य नयन थे पार्थ के।।
१५.४.२०२६
०००
अभिनव प्रयोग
पहेली - दोहों में खोजिए साहित्यकारों के नाम
महावीर अरु वीर मिल, देवी सुमिर अधीर।
नमन शिवानी को करें, नीरज ले रघु वीर।।
.
गुरु वृंदावन जा रहे, देखें रूप विराट।
चक्र सुभद्रा-बंधु ले, सज्जित देखें ठाट।।
.
प्रभा प्रभाकर की निरख, तुलसी करें प्रणाम।
रूप निराला अलौकिक, लाल चक्र उद्दाम।।
.
लाला माखन खा रह्यो, पुतो गाल अरु भाल।
जसुदा माई निहाल लख, श्यामल माखन लाल।।
.
उत्तर
महावीर - महावीर प्रसाद द्वुवेदी, महावीर प्रसाद जोशी (राजस्थानी), महावीर रवांल्टा
वीर - वीर सावरकर (मराठी), क्षेत्रि वीर (मणिपुरी)
देवी - महादेवी वर्मा, आशापूर्णा देवी (बांग्ला)
शिवानी - गौरा पंत शिवानी
नीरज - गोपाल प्रसाद सक्सेना नीरज
रघुवीर - डॉ. रघुवीर, रघुवीर सहाय, रघुवीर चौधरी (गुजराती)
गुरु - कामता प्रसाद, रामेश्वर प्रसाद गुरु, गुरु सक्सेना, गुरु गोबिंद सिंह (पंजाबी)
वृन्दावन- वृन्दावन लाल वर्मा
विराट - विष्णु विराट, चन्द्रसेन विराट
चक्र - सुदर्शन सिंह चक्र, कुम्भार चक्र (उड़िया), चक्रधर अशोक
सुभद्रा - सुभद्रा कुमारी चौहान
प्रसाद - जय शंकर प्रसाद, महावीर प्रसाद, हजारी प्रसाद, शत्रुघ्न प्रसाद
प्रभा - प्रभा खेतान
प्रभाकर - विष्णु प्रभाकर, प्रभाकर माचवे , प्रभाकर बैगा, प्रभाकर श्रोत्रिय
तुलसी - गोस्वामी तुलसीदास, आचार्य तुलसी, तुलसी बहादुर क्षेत्री (नेपाली), डॉ, तुलसीराम,
निराला - सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
लाला - लाला भगवान दीन, लाला श्रीनिवास दास, लाला पूरणमल, लाला जगदलपुरी
माखन - माखनलाल चतुर्वेदी 'एक भारतीय आत्मा'
लाल - लक्ष्मी नारायण लाल, श्रीलाल शुक्ल, लाल पुष्प (सिंधी)
१५.४.२०२५
०००
सॉनेट
उषा
•
उषा ललित लालित्यमयी।
है मनहर चितचोर सखी।
कवि छवि देखे नयी नयी।।
अपनी किस्मत आप लिखी।।
निधि सतरंगी मनोरमा।
सत्य सुनीता नीलाभित।
ज्योति-कन्हैया लिए विमा।।
नीलम-रेखा अरुणाभित।।
बालारुण खेले कैंया।
उछल-कूद बाहर भागे।
कलरव करती गौरैया।।
संग गिलहरी अनुरागे।।
उषा प्रभाती रही सुना।
कनक-जाल रमणीय बुना।।
***
नहले पे दहला
कभी कभी यूँ भी हम ने अपने जी को बहलाया है
जिन बातों को ख़ुद नहीं समझे औरों को समझाया है?
औरों ने हमें नहीं बख्शा वो रास्ता बताया है।
जिस पर उन्होंने अपना पग नहीं बढ़ाया है।
***
प्रश्नोत्तर
छिपकली से जान कैसे बचाएँ?
मत देखें छिप कली
ऐसी हरकत नहीं भली
उसका करा दें विवाह
मिल जाएगा छुटकारा
कली बन जाएगी फूल
नहीं चुभेगी बनकर शूल
१५-४-२०२३
***
सॉनेट
चमन
*
चमन में साथी! अमन हो।
माँ धरित्री को नमन कर।
छत्र निज सिर पर गगन कर।।
दिशा हर तुझको वसन हो।।
पूर्णिमा निशि शशि सँगाती।
पवन पावक सलिल सूरज।
कह रहे ले ईश को भज।।
अनगिनत तारे बराती।
हर जनम हो श्वास संगी।
जिंदगी दे यही चंगी।
आस रंग से रही रंगी।।
न मन यदि; फिर भी नमन कर।
जगति को अपना वतन कर।
सुमन खिल; सुरभित चमन कर।।
१५-४-२०२२
•••
मुक्तिका
•
अपने हिस्से जितने गम हैं।
गिने न जाते लेकिन कम हैं।।
बरबस देख अधर मुस्काते।
नैना बेबस होते नम हैं।।
महाबली खुद को कहता जो
अधिक न उससे निर्दय यम हैं।।
दिये जगमगाते ऊपर से
पाले अपने नीचे तम हैं।।
मैं-मैं तू-तू तूतू मैंमैं
जब तक मिलकर हुए न हम हैं।।
उनका बम बम नाश कर रहा
मंगलकारी शिव बम बम हैं।।
रम-रम राम रमामय में रम
वे मदहोश गुटककर रम हैं।।
१५-४-२०२२
•••
मुक्तिका
कर्ता करता
भर्ता भरता
इनसां उससे
रहता डरता
बिन कारण जो
डरता; मरता
पद पाकर क्यों
अकड़ा फिरता?
कह क्यों पर का
दुख ना हरता
***
द्विपदियाँ / अशआर
कोरोना के व्याज, अनुशासित हम हो रहे।
घर के करते काज, प्रेम से।।
*
थोड़े जिम्मेदार, हुए आजकल हम सभी।
आपस में तकरार, घट गई।।
*
खूब हो रहा प्यार, मत उत्पादन बढ़ाना।
बंद घरों के द्वार, आजकल।।
*
तबलीगी लतखोर, बातों से मानें नहीं।
मनुज वेश में ढोर, जेल दो।
*
१५-४-२०२०
***
श्रृंगार गीत
तुम
*
तुम हो या साकार है
बेला खुशबू मंद
आँख बोलती; देखती
जुबां; हो गयी बंद
*
अमलतास बिंदी मुई, चटक दहकती आग
भौंहें तनी कमान सी, अधर मौन गा फाग
हाथों में शतदल कमल
राग-विरागी द्वन्द
तुम हो या साकार है
मद्धिम खुशबू मंद
*
कृष्ण घटाओं बीच में, बिजुरी जैसी माँग
अलस सुबह उल्लसित तुम, मन गदगद सुन बाँग
खनक-खनक कंगन कहें
मधुर अनसुने छंद
तुम हो या साकार है
मनहर खुशबू मंद
*
पीताभित पुखराज सम, मृदुल गुलाब कपोल
जवा कुसुम से अधरद्वय, दिल जाता लख डोल
हार कहें भुज हार दो
बनकर आनंदकंद
तुम हो या साकार है
मन्मथ खुशबू मंद
***
संस्मरण
आम चुनाव
***
मुझे एक चुनाव में पीठासीन अधिकारी बनाया गया, आज से ४५ साल पहले, तब ईवीएम नहीं होती थी, न वाहन मिलते थे। मैं अभियंता था। ट्रेनिंग में कोई कठिनाई नहीं हुई। मुख्यालय से ९९ कि मी दूर रेल से तहसील मुख्यालय पहुँचा। अपने दल के किसी सदस्य को जानता नहीं था। माइक से बार-बार घोषणा कराने पर एक साथी मिले जो शिक्षक थे। हमें लोहे की चार भारी पेटियाँ मिलीं। लगभग साढे़ चार हजार मतपत्र मिले जिनका आकार टेब्लॉयड अखबार के बराबर था। अन्य सामग्री और खुद के कपड़े, बिस्तर और खाने नाश्ते का सामान भी था। शामियाना को एक किनारे बैठकर सूची से सामान का मिलान करने और मतपत्रों को गिनकर गलत मतपत्र बदलवाए। तब तक बाकी दो सहायक आए। एक-एक मतपेटी उन्हें थमाई। अब बस पकड़ना थी। दल में दो पुलिस सिपाही भी थे पर गायब, उनके नाम से मुनादी कराई, जब बस में बैठ गए, तब वे प्रकट हुए। मैं समझ गया कि सामान ढोेने से बचने को लिए आस-पास होते हुए भी नहीं, मिले घुटे पीर हैं। डाल-डाल और पात-पात का नीति अपनाना ठीक लगा। बस चलते समय वे उपस्थिति प्रमाण पत्र पर हस्ताक्षर कराने आए। मैंने इंकार कर दिया कि मैं आपकी गैर हाजिरी रिपोर्ट कर चुका हूँ। मैं मतदान केंद्र पर दो कर्मचारी नियुक्त कर चुनाव करा लूँगा, आप वापिस जाएँ और एस. पी. से निलंबन आदेश लेकर जाँच का सामना करें। उनके पैरों तले से जमीन सरकने लगी, बाजी उलटती देख माफी माँगने लगे। मैंने बेरुखी बनाए रखी।
बस से ४५ कि मी दूर ब्लॉक मुख्यालय तक जाना था। वहाँ सिपाहियों ने आगे बढ़कर मतपेटियाँ और मतपत्र सम्हाले जिसके लिए उनकी ड्यूटी लगाई गई थी। अब हमें ८ कि. मी. बैलगाड़ी से जाना था। कोटवार २ बैलगाड़ी लेकर राह देख रहा था। बैलगाड़ी ने नदी किनारे उतारा। यहाँ डोंगी (पेड़ का तना खोखला कर बनाई छोटी नाव) मिलीं। दल के मुखिया के नाते सबको नियंत्रण में रखकर, सब काम समय पर कराना था। मैं २२ साल का, शेष सब मेरे पिता की उम्र के। पहली डोंगी पर मतपत्र, मतपेटी लेकर एक सिपाही को साथ मैं खुद बैठा। दोपहर २ बज रहे थे। सबको भूख लग रही थी, खाने के लिए रुकते तो एक घंटा लगता। मैंने तय किया कि मतदान केंद्र पहुँच ,कर वहाँ व्यवस्था जो कमी हो उसको ठीक कराने की व्यवस्था कराने के बाद भोजन आदि हो। दल के बाकी लोग पहले खाना चाहते थे। अँधेरा होने पर गाँव में कुछ मिलना संभव न होता। कहावत है बुरे वक्त में खोटा सिक्का काम आता है। मैंने वरिष्ठ सिपाही को किनारे ले जाकर पट्टी पढ़ाई कि सीधे बिना रुके मतदान केंद्र चलोगे और पूरे समय मेरे कहे अनुसार काम करेंगे तो शिकायत वापिस लेकर कर्तव्य प्रमाणपत्र दे दूँगा। अंधा क्या चाहे?, दो आँखें। उसने जान बचते देखी तो मेरे साथ आगे बढ़कर मतपेटी लेकर डोंगी में जा बैठा। उसे बढ़ता देख उसका साथी दूसरी डोंगी में जा बैठा। एक डोंगी में दो सवारी, एक मतपेटी और डोंगी चालक, लहर के थपेड़ों को साथ डोंगी डोलती, हमारी जान साँसत में थी। मुझे तो तैरना भी नहीं आता था पर हौसला रखकर बढ़ते रहे।
राम-राम करते दूसरे किनारे पहुँच चैन की साँस ली। सब सामान की जाँच कर कंदों पर लादा और शुरू हुई पदयात्रा, ४ किलोमीटर पैदल कच्चे रास्ते, पगडंडी और वन के बीच से से होते हुए मतदान स्थान पहुँचे। प्राथमिक शाला एक कमरा, परछी, देशी खपरैल का छप्पर, शौचालय या अन्य सुविधा का प्रश्न ही नहीं उठता था। कमरे में सुरक्षित स्थान पर मतदान सामग्री रखवाई। अब तक ४ बज चुके थे, भूखे और थके तो थे ही दल के सदस्य खाने पर टूट पड़े। मैंने उन्हें भोजन आदि करने दिया किंतु खुद पटवारी और कोटवार को लेकर व्यवस्था देखी। सूर्य अस्ताचल की ओर अग्रसर था। बिजली गाँव में नहीं आई थी।
केंद्र में दो मेजें, दो बेंचे, दो कुर्सियाँ, एक स्टूल, एक बाल्टी, एक लोटा, दो गिलास, एक मटका, एक चिमनी, एक फटी-मैली दरी... कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा भानुमती ने कुनबा जोड़ा का तर्ज पर जुटाई गई थी। कमरे के दरवाजे ऐसे कि धक्का देते ही टूट जाएँ। खिड़की बिना पल्लों की चौखट में लोहे के सारी मात्र। यहाँ भी पटवारी और कोटवार दामन बचाते मिले। मुझे एक वरिष्ठ साथी प्रशिक्षण के मध्य गप-शप करते समय बता चुके थे कि पीठासीन अधिकारी के साथ अलग-अलग विभागों के लोग होते हैं जो जानते हैं कि एक दिन बाद अलग हो जाना है। पर्याय: वे सहयोग न कर, जैसे तैसे बेगार टालते हैं जबकि उच्चाधिकारियों को हर कार्य शत-प्रतिशत सही और समय पर चाहिए, न हो तो बिजली पीठासीन अधिकारी पर ही गिरती है। मैंने हालत से निबटने का तरीका पूछ तो वे बोले 'हिकमत अमली'। मैंने यह शब्द पहली बार सुन। वे
संवस, १५.४.२०१९
***
ॐ
छंद बहर का मूल है: ३
राग छंद
*
छंद परिचय:
बीस मात्रिक महादैशिक जातीय छंद।
तेरह वार्णिक अति जगती जातीय राग छंद।
संरचना: SIS ISI SIS ISI S
सूत्र: रजरजग।
बहर: फ़ाइलुं मुफ़ाइलुं मुफ़ाइलुं फ़अल।
*
आइये! मनाइए, रिझाइए हमें
प्यार का प्रमाण भी दिखाइए हमें
*
चाह में रहे, न सिर्फ बाँह में रहे
क्रोध से तलाक दे न जाइए हमें
*
''हैं न आप संग तो अजाब जिंदगी''
बोल प्यार बाँट संग पाइए हमें
*
जान हैं, बनें सुजान एक हों सदा
दे अजान रोज-रोज भाइये हमें
*
कौन छंद?, कौन बहर?, क्यों पता करें?
शब्द-भाव में पिरो बसाइए हमें
*
संत हों न साधु हों, न देवता बनें
आदमी बने तभी सुहाइये हमें
*
दो, न दो रहें, न एक बनें, क्यों कहो?
जान हमारी बनें बनाइए हमें
१५.४.२०१७
***
खबरदार दोहे
.
केर-बेर का सँग ही, करता बंटाढार
हाथ हाथ में ले सभी, डूबेंगे मँझधार
(समाजवादी एक हुए )
.
खुल ही जाती है सदा, 'सलिल' ढोल की पोल
मत चरित्र या बात में, अपनी रखना झोल
(नेताजी संबंधी नस्तियाँ खुलेंगी)
.
न तो नाम मुमताज़ था, नहीं कब्र है ताज
तेज महालय जब पूजे, तभी मिटेगी लाज
(ताज शिव मंदिर है)
.
जयस्तंभ की मंजिलें, सप्तलोक-पर्याय
कहें क़ुतुब मीनार मत, समझ सत्य-अध्याय
(क़ुतुब मीनार जयस्तंभ है)
.
दोहा सलिला:
रश्मिरथी रण को चले, ले ऊषा को साथ
दशरथ-कैकेयी सदृश, ले हाथों में हाथ
.
तिमिर असुर छिप भागता, प्राण बचाए कौन?
उषा रश्मियाँ कर रहीं, पीछा रहकर कौन
.
जगर-मगर जगमग करे, धवल चाँदनी माथ
प्रणय पत्रिका बाँचता, चन्द्र थामकर हाथ
.
तेज महालय समर्पित, शिव-चरणों में भव्य
कब्र हटा करिए नमन, रखकर विग्रह दिव्य
.
धूप-दीप बिन पूजती, नित्य धरा को धूप
दीप-शिखा सम खुद जले, देखेरूप अरूप
१५-४-२०१५
.
छंद सलिला;
शिव स्तवन
*
(तांडव छंद, प्रति चरण बारह मात्रा, आदि-अंत लघु)
।। जय-जय-जय शिव शंकर । भव हरिए अभ्यंकर ।।
।। जगत्पिता श्वासा सम । जगननी आशा मम ।।
।। विघ्नेश्वर हरें कष्ट । कार्तिकेय करें पुष्ट ।।
।। अनथक अनहद निनाद । सुना प्रभो करो शाद।।
।। नंदी भव-बाधा हर। करो अभय डमरूधर।।
।। पल में हर तीन शूल। क्षमा करें देव भूल।।
।। अरि नाशें प्रलयंकर। दूर करें शंका हर।।
।। लख ताण्डव दशकंधर। विनत वदन चकितातुर।।
।। डम-डम-डम डमरूधर। डिम-डिम-डिम सुर नत शिर।।
।। लहर-लहर, घहर-घहर। रेवा बह हरें तिमिर।।
।। नीलकण्ठ सिहर प्रखर। सीकर कण रहे बिखर।।
।। शूल हुए फूल सँवर। नर्तित-हर्षित मणिधर ।।
।। दिग्दिगंत-शशि-दिनकर। यश गायें मुनि-कविवर।।
।। कार्तिक-गणपति सत्वर। मुदित झूम भू-अंबर।।
।। भू लुंठित त्रिपुर असुर। शरण हुआ भू से तर।।
।। ज्यों की त्यों धर चादर। गाऊँ ढाई आखर।।
।। नव ग्रह, दस दिशानाथ। शरणागत जोड़ हाथ।।
।। सफल साधना भवेश। करो- 'सलिल' नत हमेश।।
।। संजीवित मन्वन्तर। वसुधा हो ज्यों सुरपुर।।
।। सके नहीं माया ठग। ममता मन बसे उमग।।
।। लख वसुंधरा सुषमा। चुप गिरिजा मुग्ध उमा।।
।। तुहिना सम विमल नीर। प्रवहे गंधित समीर।।
।। भारत हो अग्रगण्य। भारती जगत वरेण्य ।।
।। जनसेवी तंत्र सकल। जनमत हो शक्ति अटल।।
।। बलिपंथी हो नरेंद्र। सत्पंथी हो सुरेंद्र।।
।। तुहिना सम विमल नीर। प्रवहे गंधित समीर।।
।। भारत हो अग्रगण्य। भारती जगत वरेण्य ।।
।। जनसेवी तंत्र सकल। जनमत हो शक्ति अटल।।
।। सदय रहें महाकाल। उम्मत हों देश-भाल।।
।। तुहिना सम विमल नीर। प्रवहे गंधित समीर।।
।। भारत हो अग्रगण्य। भारती जगत वरेण्य ।।
।। जनसेवी तंत्र सकल। जनमत हो शक्ति अटल।।
***
दोहा सलिला
सत-चित-आनंद पा सके, नर हो अगर नरेन्द्र.
जीवन की जय बोलकर, होता जीव जितेंद्र..
*
अक्षर की आराधना, हो जीवन का ध्येय.
सत-शिव-सुन्दर हो 'सलिल', तब मानव को ज्ञेय..
*
नर से वानर जब मिले, रावण का हो अंत.
'सलिल' न दानव मारते, कभी देव या संत..
**
प्यार के दोहे:
तन-मन हैं रथ-सारथी:
*
दो पहलू हैं एक ही, सिक्के के नर-नार।
दोनों में पलता सतत, आदि काल से प्यार।।
*
प्यार कभी मनुहार है, प्यार कभी तकरार।
हो तन से अभिव्यक्त या, मन से हो इज़हार।।
*
बिन तन के मन का नहीं, किंचित भी आधार।
बिन मन के तन को नहीं, कर पाते स्वीकार।।
*
दो अपूर्ण मिल एक हों, तब हो पाते पूर्ण।
अंतर से अंतर मिटे, हों तब ही संपूर्ण।।
*
जब लेते स्वीकार तब, मिट जाता है द्वैत।
करते अंगीकार तो, स्थापित हो अद्वैत।।
१५-४-२०१०
*