आज का विचार: शाम

दिव्य नर्मदा : हिंदी तथा अन्य भाषाओँ के मध्य साहित्यिक-सांस्कृतिक-सामाजिक संपर्क हेतु रचना सेतु A plateform for literal, social, cultural and spiritual creative works. Bridges gap between HINDI and other languages, literature and other forms of expression.
कुल पेज दृश्य
parvana लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
parvana लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सोमवार, 20 अगस्त 2012
आज का विचार: शाम
चिप्पियाँ Labels:
आज का विचार,
इन्सान,
परवाना,
शमा,
शाम,
सूरज,
acharya sanjiv verma 'salil',
insan,
parvana,
sham,
shama,
sooraj
सोमवार, 25 अप्रैल 2011
मुक्तिका: दीवाना भी होता था. ----- संजीव 'सलिल'
मुक्तिका
दीवाना भी होता था.
संजीव 'सलिल'
*
हजारों आदमी में एक दीवाना भी होता था.
खुदाई रौशनी का एक परवाना भी होता था..
सियासत की वजह से हो गये हैं गैर अपने भी.
वगर्ना कहो तो क्या कोई बेगाना भी होता था??
लहू अपना लहू है, और का है खून भी पानी.
गया वो वक्त जब बस एक पैमाना भी होता था..
निकाली भाई कहकर दुशमनी दिलवर के भाई ने.
कलेजे में छिपाए दर्द मुस्काना भी होता था..
मिली थी साफ़ चादर पर सहेजी थी नहीं हमने.
बिसारा था कि ज्यों की त्यों ही धर जाना भी होता था..
सिया जूता, बुना कपड़ा तो इसमें क्या बुराई है?
महल हो या कुटी मिट्टी में मिल जाना ही होता था..
सिया को भेज वन सीखा अवध ने पाठ यह सच्चा
हर इक आबाद घर में एक वीराना भी होता था..
नहाकर स्नेह सलिला में, बहाकर प्रेम की गंगा.
'सलिल' मरघट में सबको एक हो जाना ही होता था..
*********
दीवाना भी होता था.
संजीव 'सलिल'
*
हजारों आदमी में एक दीवाना भी होता था.
खुदाई रौशनी का एक परवाना भी होता था..
सियासत की वजह से हो गये हैं गैर अपने भी.
वगर्ना कहो तो क्या कोई बेगाना भी होता था??
लहू अपना लहू है, और का है खून भी पानी.
गया वो वक्त जब बस एक पैमाना भी होता था..
निकाली भाई कहकर दुशमनी दिलवर के भाई ने.
कलेजे में छिपाए दर्द मुस्काना भी होता था..
मिली थी साफ़ चादर पर सहेजी थी नहीं हमने.
बिसारा था कि ज्यों की त्यों ही धर जाना भी होता था..
सिया जूता, बुना कपड़ा तो इसमें क्या बुराई है?
महल हो या कुटी मिट्टी में मिल जाना ही होता था..
सिया को भेज वन सीखा अवध ने पाठ यह सच्चा
हर इक आबाद घर में एक वीराना भी होता था..
नहाकर स्नेह सलिला में, बहाकर प्रेम की गंगा.
'सलिल' मरघट में सबको एक हो जाना ही होता था..
*********
चिप्पियाँ Labels:
acharya sanjiv verma 'salil',
adami,
chadar,
contemporary hindi poetry,
jabalpur,
lahu,
muktika,
parvana,
samyik hindi kavita,
siya,
siyasat,
waqt
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ (Atom)