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बुधवार, 23 सितंबर 2026

राजा अवस्थी


लेख
सामाजिक विसंगतियों पर प्रहार करते राजा अवस्थी के नवगीत
आचार्य संजीव वर्मा ''सलिल''
०
रचनाकार संपर्क- गाटरघाट मार्ग, आजाद चौक, कटनी ४८३५०१, चलभाष ९६१७९१३२८७
*
         सनातन सलिला नर्मदा के अंचल में आधुनिक हिंदी के उद्भव काल से ही साहित्य की हर विधा में सतत सत्साहित्य का सृजन-धारप्रवाहित होती रही है। वर्तमान पीढ़ी के मौलिक चेतना संपन्न नवगीतकारों में राजा अवस्थी का नाम अग्रगण्य है। हिंदी साहित्य के श्रेष्ठ-ज्येष्ठ हस्ताक्षर डॉ. देवेन्द्र शर्मा 'इंद्र', नर्मदांचल के वरिष्ठ साहित्य साधक श्यामनारायण मिश्र व राम सेंगर द्वारा से आशीष प्राप्त राजा द्रुत गति से परिवर्तित होती सामाजिक जीवन शैली परिस्थितियों और मूल्यों के आकलन, अवलोकन और अन्वेषण को अपने गीति काव्य की प्राणशक्ति बना सके हैं। सियासती संघर्ष से सतत आहत होते सामाजिक सद्भाव की सिसकियों और चीखों को सुनते राजा की कलम न तो विचलित होती है, न मौन रहती है, वह निरंतर अपनी असहमति और परिवर्तनोन्मुखी जिजीविषा को गीत पंक्तियों में ढालकर अभिव्यक्ति की पगडंडी पर पग पढ़ती रहती है। जीवन की चुनौतियाँ और संघर्ष के सामने राजा झुकते नहीं किंतु उन पर प्रहार कर सकारात्मक परिवर्तन के लिए संदेश देते हैं।

         श्री दर्श रूप अवस्थी - श्रीमती गंगा देवी के पुत्र रूप में ४ अप्रैल १९६६ को जन्मे, हिन्दी साहित्य में परास्नातक, शिक्षा स्नातक की शिक्षा प्राप्त राजा मध्य प्रदेश शालेय शिक्षा विभाग में शिक्षक, प्रधानाध्यापक तथा जिला स्रोत व्यक्ति हिन्दी के रूप में कार्यरत रहे राजा का सृजन निरंतर चलता रहा है। राजा के २ नवगीत संग्रह 'जिस जगह यह नाव है' (वर्ष २००६) तथा 'जीवन का गुणा-भाग' (वर्ष २०२१), एक दोहा प्रबंध काव्य ''कैकेयी अब बोलती'' तथा एक समालोचना कृति ''आलोचना का ब्राह्मणवाद प्रकाशित हुई हैं। उनकी उपस्थिति महत्वपूर्ण साझा संकलनों नई सदी के नवगीत (संपादक डॉ. ओम प्रकाश सिंह), नवगीत नई दस्तकें (संपादक डॉ. निर्मल शुक्ल), गीत वसुधा व समकालीन गीत कोश (संपादक नचिकेता), नवगीत के नए प्रतिमान, नवगीत का लोकधर्मी सौन्दर्यबोध व नवगीत का मानवतावाद (संपादक राधेश्याम बंधु) सहयात्री समय के (संपादक रणजीत पटेल) व पत्र-पत्रिकाओं में अधिक रही है। नवगीत की समीक्षा के क्षेत्र में भी राजा का योगदान उल्लेखनीय है। यू ट्यूब पर उनका 'नवगीत धारा' चर्चित कार्यक्रम है।

         'जिस जगह यह नाव है' (नवगीत संग्रह, राजा अवस्थी, वर्ष २००६, आकार डिमाई, आवरण सजिल्द, बहुरंगी, जैकेट सहित, पृष्ठ १३६, मूल्य १२०रु., प्रकाशक- अनुभव प्रकाशन, ई २८ लाजपत नगर, साहिबाबाद, गाज़ियाबाद २०१००५, ०१२० ४११२२१०) ७८ समसामयिक, सरस नवगीतों का पठनीय संग्रह है। मध्य प्रदेश के बड़े जंक्शन कटनी में बसे राजा के नवगीत विंध्याटवी के नैसर्गिक सौंदर्य, ग्राम्यांचल के संघर्ष, नगरीकरण की घुटन, राजनीति के दिशाभ्रम, आम जन के अंतर्द्वंद तथा युवाओं के सपनों के बहुदिशायी रेलगाड़ियों में यात्रारत मनोभावों को मन में बसाते हैं। करुणा और व्यथा काव्य का उत्स है. गाँव की माटी की व्यथा-कथा गाँव के बेटों तक न पहुँचे यह कैसे संभव है?


आज गाँव की व्यथा बाँचती / चिट्ठी मेरे नाम मिली
विधवा हुई रमोली की भी / किस्मत कैसी फूटी
जेठ-ससुर की मैली नज़रें / अब टूटीं, तब टूटीं

         जीवन में तमाम विसंगतियों से लड़ते-जूझते हुए भी अनवरत अक्षर आराधना करना किसी सैनिक के पराक्रम से कम नहीं है।

चंदन वन काट-काट / शव का श्रृंगार करें
शिशुओं को दें शव सा जीवन
यौवन में सन्नाटा / मरघट सा छाता है
आस-ओस दुर्लभ आजीवन
यश अर्जन को होता
भूख को हमारी, साहित्य में उतारना

         माँ शारदा को क्षुधा-दीप समर्पित करती कलम का संघर्ष गाँव और शहर हर जगह एक सा है। विडम्बनाओं व विसंगतियों से जूझना ही नियति है-

स्वार्थ-पोषित आचरण को / यंत्रवत निष्ठुर शहर को / सौंपने बैठा
भाव की पहचान भूले / चेहरे पढ़ना कठिन है
धुंध, सन्नाटा, अँधेरा / और बहरापन कठिन है
विवशताएँ, व्यस्तताएँ / ह्रदय में छल वर्जनाएँ / थोपने बैठा

         विधि की विडंबना कहें या आदमी की व्यवस्थाओं का दोष सत्य यही है कि अनचाही पीड़ाएँ प्रकृति प्रदत्त कम, मनुष्य रचित अधिक हैं-


गाँव के पंचों ने मिलकर / फिर खड़ी दीवार की
फिर वही हालत, नियति / वह ही प्रकृति के प्यार की
किशनवा-रधिया की / घुटती साँस का मौसम।

         किसी समाज के सामने सर्वाधिक चिंतनीय स्थिति तब होती है जब बिखराव के कारण मानव-मन दूर होने लगें। राजा इस परिस्थिति का अनुमान कर अपनी चिंता नवगीत में उड़ेल देते हैं-

अंतस के समतल की / चिकनाई गायब अब
रोज बढ़े, फैले, ज़हरीला बिखराव
रिश्तों का ताप चुका / आ बैठा ठंडापन
चहक-पुलक में में पसरा जाता ठहराव
कैसी इच्छाओं के / ज्वार और भाटे ये
दूर हुए जाते मन, सदियों के द्वीप

         विषमताओं के कुम्भ में सपनों की आहट बेमानी प्रतीत होने लगे तो नवगीत मन की पीड़ा को स्वर देता है -

किसलिए सजें / सपने, तो बस विशुद्ध रेत हैं
नरभक्षी पौधों से / आश्रय की आशा क्या?
सब के सब इक जैसे / तोला क्या, माशा क्या?
कोई भी अमृत फल / इन पर आ पायेगा?
छोड़ो भी आशा, ये बेंत हैं
बेशर्मी जेहन से / आँखों में उतरी
ढंकेंगी कब तक / ये पोशाकें सुथरी
बच पाना मुश्किल है / ये भोंडे संस्कार
दम लेंगे हँसकर ही, ये करैत हैं

         राजा केवल नाम के ही नहीं अनुभूतियों और अभिव्यक्ति-क्षमता के भी राजा हैं। लोकतंत्र में भी सामंतवादी प्रवृत्तियों का बढ़ते जाना, प्रगति की मरीचिका मैं आम आदमी का दर्द बढ़ते जाना उनके मन की पीड़ा को बढ़ाता है-

फिर उसी सामंतवादी / जड़ प्रकृति को रोपता
एक विध्वंसक समय को / हाथ बाँधे न्योतता
जड़ तमाचे पर तमाचे / अमन के मुँह पर
पढ़ कसीदे पर कसीदे / दमन के मुँह पर
गर्व से मुस्की दबाये / है प्रगति का देवता

         मुहावरेदार भाषा राजा अवस्थी के नवगीतों की जान है। रेवड़ी, ढिबरी, बिजूका मकड़जाल आदि शब्द अपने प्रचलित अर्थों के साथ विशिष्ट प्रवृत्तियों के द्योतक है.-

रेवड़ी बेभाव बाँटी / प्रगति को दे दी धता,
ढिबरी का तेल चुका / फैला अँधियार,
खेतिहर बिजूकों से / भय खाएँ राम,
मस्तक में बोकर नासूर / टोपी के ये नकली बाल क्या सँवारना?,
संविधान के मकड़जाल में / उलझा अक्सर न्याय हमारा,
तार पर दे जीवन आघात / बेसुरे सुर दे रहे धता,
कुँवारी इच्छाएं ऐसी / खिले ज्यों हरसिंगार के फूल

         आदि अभिव्यक्तियाँ कम शब्दों में अधिक अनुभूतियों से पाठक का साक्षात करा देती हैं।

         ग्राम्यांचली पृष्ठभूमि राजा अवस्थी को देशज शब्दों के उस ख़ज़ाने से संपन्न करती है जो शहरों के कोंवेंटी कवि के लिए आकाश कुसुम है। बरुआ, ठकुरवा, छप्पर, छुअन, झरोखा, निठुराई, बिजूका, झोपड़, जांगर. कहतें, पांग, बढ़ानी, हिय, पर्भाती, सुग्गे, ढिबरी, किशनवा, कुछबन्दियों, खटती, बहुँटा, अंकुई, दलिद्दर, चरित्तर, पैताने आदि ग्रामीण शब्दों के साथ उर्दू लफ्ज़ खातिर, रैयत, खबर, गुजरे, बैर, ज़ुल्मों, खस्ताहाल, नज़रें, ख्याल, आमद, बदन, यकीन, ज़ेहन, नुस्खे, नासूर, इन्तिज़ार, ज़हर, आफत, एहसान, तकादा, एहसान, चस्पा, लफ़्फ़ाज़ी आदि मिलकर उस गंगो-जमुनी जीवन की बानगी पेश करते हैं जिसमें शुद्ध हिंदी के अनुपूरित, प्रतिकार, अंतर्मन, उल्लास, ग्रसित, व्याल, आतंकित, प्रतिबंधित, मराल, भ्रान्ति, आलिंगन, उत्कंठा, वीथिकाएँ, वर्जनाएं,अंतस, निष्कलुष, बड़वानल, हिमगलित, संभरण आदि पुलाव में मेवे की तरह प्रतीत होते हैं।

         राजा अवस्थी ने शब्द-युग्मों की शक्ति और उपदेयता को पहचाना और उपयोग किया है। खबर-दबर, जेठ-ससुर, माँ-दद्दा, रात-दिन, हम-तुम, मन-मान, आस-ओस, उठना-गिरना, साँझ-सँझवाती, लड़ी-फड़ी, डगर-मगर, सुख-दुःख, घर-गाँव, सुबह-शाम, दोपहरी-रात, नून-तेल, आस-पास, दूध-भात, मरते-कटते, चोर-लबार, अमन-चैन, चहक-पुलक, सीलन-सन्नाटे, दंभ-छ्ल्, है-मेल, हवा-पानी, प्रीति-गीति-रीति, मोह-ममता-नेह, तन-मन-जेहन आदि शब्द युगन इन नवगीतों की भाषा को जीवंतता देते हैं।

         राजा अवस्थी की प्रयोगधर्मी वृत्ति फाइलबाजों, कंठ-लावनी, वर्ण-कंपित, हिटलरी डकार, श्रध्दाशा, ममता की अलगनी, सुधियों की डोर, काँटों की गलियाँ, मुस्कानों के झोंके, शब्दों का संत्रास, पीड़ाओं के शिलाखंड जैसे शब्दावलियों से पाठक को बाँध पाते हैं। शब्द-सामर्थ्य, भाषा-शैली, नव बिम्ब, नए प्रतीक, मौलिक कथ्य की कसौटी पर ये गीत खरे उतरते हैं। इन नवगीतों में मात्रिक छंदों का प्रयोग किया गया है। दो से लेकर चार पंक्तियों तक के मुखड़े तथा आठ पंक्तियों तक के अंतरे प्रयुक्त हुए हैं। नवगीतों में अंतरों की संख्या दो या तीन है।

         हिंदी के समर्थ समीक्षक डॉ. विजय बहादुर सिंह ने इन गीतों में 'समकालीन जीवन व् उसके यथार्थ के प्रति अत्यधिक सजगता एवं संवेदनशीलता, स्थानीयता के रंगों से कुछ अधिक रंगीनियत' ठीक ही लक्षित की है। इस कृति के प्रकाशन के एक दशक बाद राजा अवस्थी की कलम अधिक पैनी हुई है इसका प्रमाण उनका दूसरा नवगीत संग्रह ''जीवन का गुणा-भाग'' (नवगीत संग्रह, वर्ष २०१९, पृष्ठ १२८, सजिल्द बहुरंगी आवरण जैकेट सहित, मूल्य २००/-, श्वेतवर्णा प्रकाशन, नई दिल्ली चलभाष ८४४७५४००७८) है। शीर्षक से ही स्पष्ट है कि पूर्वापेक्षा अत्यधिक तेजी से हो रहे वैश्विक तकनीकी-सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक परिवर्तनों के मनुष्य मात्र, पशु-पक्षियों, जीव-जंतुओं व प्रकृति-पर्यावरण पर पड़ रहे दुष्प्रभाव की चिंता इन गीतों में हो। यांत्रिकता और पूंजीवाद के बढ़ते वर्चस्व ने मानवीय संबंधों, संवेदनाओं और सामाजिक संरचना को निरंतर गंभीर क्षति पहुँचाई है। सद्भाव, सहकार, समन्वय व सहिष्णुता को दुर्भाव, अहंकार, अधिनायकवाद व असहिष्णुता ने प्रतिस्थापित किया है। इस वातावरण में गीति रचनाधर्मी किंकर्तव्यविमूढ़ हों यह स्वाभाविक है।

         राजा अवस्थी ने समय की चुनौतियों से आँख मिलाते हुए आम आदमी की नब्ज पर हाथ रखते हुए उसकी पीड़ा को स्वर देने की कोशिश की है। आम आदमी की जिंदगी के कथ्य-तथ्य को गीतों में ढालते हुए राजा अतिरेकी वृत्तियों से परे रह सके हैं। वे न तो क्रंदन और आर्तनाद के पिंजरे में कैद हुए हैं, न ही सर्वस्व नष्ट कर देने की दिशा में गए हैं। पेशे से शिक्षक होने के नाते राजा की दृष्टि सुधार, बेहतरी और नव निर्माण की ओर उन्मुख होना स्वाभाविक है। राजा के गीत समय का अंध विरोध नहीं करते, वे परिस्थितियों का विश्लेषण करते हैं। ख्यात नवगीतकार राम सेंगर के शब्दों में ''एक अच्छे गीत कवि के लिए इतनी सी बात ही तो अहम चुनौती है कि जीवंत कथ्यपूर्ण ढंग से बात आए और सहज होकर बिना किसी अटकाव के, विन्यस्त शिल्प के साथ खलती चली जाए। इस चुनौती को राजा अवस्थी ने अपने नवगीतों में पूरे मनोयोग से साधा है।'' मैं सेंगर जी के आकलन से पूरी तरह सहमत हूँ।

         जीवन का गुणा-भाग के ६८ गीतों में नवगीत के प्रारंभिक मानकों और प्रतिमानों की अनदेखी भले ही न की गई हो, नवाचारजनित प्रयोग राजा अवस्थी ने निस्संकोच किए है। इसे लक्षित करते हुए भूमिका में डॉ. श्याम सुंदर दुबे लिखते हैं- ''अं यह निश्चय करना सचमुच जटिल होता जा रहा है कि नवगीत रचना की तासीर कैसी हो? उसका स्थापत्य किस आकार-प्रकार का हो? कुल मिलकर नवगीत की सैद्धांतिकी की खोज और उसके निश्चयीकरण के आसपास हमारा आना-जाना होता रहता है, जबकि रचना हमारे सामने होती है। रचना केंद्रित निष्कर्ष अधिक मौजूं होना चाहिए क्योंकि जिसे हम विशेष विधा का नाम दे रहे हैं- क्या वह अपनी सभी प्रवृत्तियों में कुछ विशेष बन रही है- जो परंपरा को और आगे बढ़ाने में अपनी ऊर्जा से आवेष्टित कुछ स्वतंत्र बनक-ठनक के साथ अपने कथ्य में नयी चमत्कृति उत्पन्न कर रही है।'' मुझे स्मरण है मेरी दो गीत-नवगीत काव्य कृतियान ''काल है संक्रांति का'' तथा ''सड़क पर'' की रचनाओं में नवाचार को लेकर समीक्षकों में दो वर्ग हो गए थे एक उन गीतों को नवगीत मानता था दूसरा नहीं। यही स्थिति राजा अवस्थी के गीतों को लेकर है। मेरी स्पष्ट धारणा है कि किसी भी तरह की ''जड़ता'' को ''नवता'' नहीं कहा जा सकता। भले ही वह विधा के आरंभ काल के मानक या विशिष्टताएँ ही क्यों न हों। नवता देश-काल-समय-परिस्थिति और रचनाकार के परिप्रेक्ष्य में सतत परिवर्तित और व्याख्यायित होना अपरिहार्य है।

         राजा अवस्थी स्वयं भी समीक्षक है। उनका मत है- ''''नवगीत के उद्भव के प्रमुख कारणों में अपने समय को अभिव्यक्त करने की उद्दाम इच्छा भी रही है। यही कारण लगातार और प्रमुख होता गया और अब भी बना हुआ है। दरअसल नवगीत कविता की चुनौती भी यही है कि वह अपने समय की सबही तरह की स्तहित्यों, संघर्षों, अपेक्षाओं को पूरे गीतात्मकता, पूरे पैनेपन, प्रभावी तेवर और संप्रेक्षणीय भाषा के साथ अपनी संस्कृति, अपने लोक और व चेतना को स्वर दे सके।'' जीवन का गुणा-भाग इस निकष की मिसाल हैं। लोक और लोकतंत्र की चिंता की अभिव्यक्ति देखिए-

जहाँपनाह हुए
पहरुए आलमशाह हुए ।

लोकतंत्र बेधड़क / लोक की चिंता छोड़ी
हंटर तंत्र हाथ में / जनते बेवश घोड़ी
शब्दकोश से शर्म मिटाकर
बेशर्मी की हद तक जाकर
तानाशाह हुए।

         लोकतान्त्रिक सरकारों द्वारा संवैधानिक मर्यादाओं को रौंदते बुलडोज़रों पर नेता या दल का नाम लिए बिना शब्द-प्रहार करना राजा अवस्थी की सामर्थ्य का परिचायक है। ग्राम्य संस्कृति को निगलती नागर संस्कृति को लक्षित करते हुए राजा अरबी-फारसी शब्दों का प्रयोग निस्संकोच करते हुए भाषिक शुद्धता की संकीर्ण मानसिकता को नकारते हैं-

शहर ने डस-डस / विषैले ट्रक के जंगल उगाए,
चेतन में अँधेरों के / किले भुतहे कुलबुलाए;
हर सुबह हर शाम पिटी
खोखली ख्याली खुमारी।
मेघ बारिश बाढ़ सब हैं / नहीं है तानें मल्हारी।

         श्रंगार जीवन की उत्पत्ति का मूल रस है। कितना भी अभाव है बासन्ती मादकता उसे स्पर्श कर पुलकानुभूति कर ही देती है-

देह-देह फगुनाई आई / गेह-गेह रस-वास
मुन्नी की आँखों में रमुआ / जहां रहा मधुमास।

चौथे पहर रात से / झरने लगते हैं पुखराज;
नींद निगोड़ी भी भिनसारे / करना चाहे राज;
आँख मीचते उठा टोकरी / गाँव चला मौहार,
मीठे रस से भरा जहां / फरता-झरता मधुमास।

         शिक्षक अपने छात्र को देश के विकास और नव निर्माण का जमीनी सच कक्ष में भले ही न बता सके पर रचनाओं में तो बयान कर ही सकता है-

खेतों पर उन्नति के बादल / देखे-भाले हैं,
शहर गए मजदूर, खेत सब बैठे-ठाले हैं।

अम्मा दरारीन धान / कुनाइटा चावल नित उगले;
तंगी में भी पूरे घर को / खाने भात मिले;
अब तो आम और कुनैता / दोनों नहीं रहे;
बैठक अपने सूनेपन का / किससे दर्द कहे
हिरण-चौकड़ी गाँव भरे / गलियों में छाले हैं।

         नवगीत लेखन तिमिर की अमरता का बखान नहीं उजाले की जीवटता का जयगान करना है-


उजियारे की संतानों के / घर भी अँधियारे आते हैं,
उजियारे के लिए / जलाने और बुझाने पड़ते दीपक

         नवगीत लेखन के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए राजा अवस्थी लिखते हैं-

एक दीप की लौ से जग का / तमस मिटायें ऐसा कौशल;
ब्रम्हनाद से गगन गुँजायें / पर्वत के झरनों का कलकल;
शिलाखंड से जगे अहिल्या / वानर सेतु सिंधु पर रच दें,
सब कुछ संभव हगो जाता जब / वाल्मीकि अपने लिखते हैं।

         आज कल जेन जी और जेन अल्फा द्वारा पूछे जा रहे सवालों से सत्ताधीश हैरान-परेशान हैं लेकिन राजा अवस्थी तो इसकी भविष्यवाणी अपने नवगीत में पहले ही कर चुके हैं-

कई पीढ़ियों से पुरखों ने  / पोथी सत्य नारायण बाँची 
किसने कही, सुनी किसने थी / कथा कौन सी कैसी साँची;
नई खाद का असर /  छोड़ बैठे यजमानी से 
पोते पूछ रहे बाबा से / अर्थ कथाओं के 

         वर्तमान संक्रमण काल में सत्ता के कदाचरण की अनदेखी साहित्य के जागरूक पहरुओं द्वारा मुमकिन ही नहीं है। राजा अवस्थी का संकेत देखिए- 

धर्मराज चौसर का / शौक पुन: पाले हैं 
कंठ से प्रवाहमान / दाँव की नदी

जंगल सब खत्म / राज में जंगल व्याप गया
आतंकित ऋतुएँ सब / मौसम तक काँप गया
रेत बढ़ी सूख गया / पानी संवेदन का 
बैठी है घाट तक / नाव की नदी। 

         साहित्य वह शै है जो हार नहीं मानता, घनघोर अँधेरे में भी रौशनी की हिफाजत करना, तूफान में चराग को बचाए-जलाए रखना केवल साहित्य के ही बस में है। राजा कहते हैं- 

जीवटता बाकी है / जीना संघर्षों में 

बीज मंत्र सर्जक के आये / किसके घेरे में / अवचेतन के सन्न अँधेरे में  
खोज रहे हैं रेख किरण की / बची-खुची ताकत ले मन की
तोड़-फोड़ को भोग रही / पीढ़ी के डेरे में। 

         लोक तंत्र का लोक गाँवों में बसता है। शहर में जड़ों से कटे लोग प्राय: भीत और चुप रहते हैण किंतु गांवों में जड़ से जुड़े लोग विपन्नता के बाद भी मूल्यों के लिए लड़ते हैं। सत्ता के खिलाफ होना साहस की साक्षी देता है- 

गाँव की गलियों में अब / बारूद पनपता है; 
आंधी जागृतिवाला / अंधा नाग संकट है; 
दौड़ भयंकर यह रुकवाई / हमसे नहीं गई। 

         लोक अब यह भी पूछ रहा है -

कब तक और कबीर बने / घर फूँकेंगे अपना; 
मीरा भी अब भूल चुकी है / बैरागी सपना; 

         और 

भीतर तक भर गया कहाँ से / इतना अधिक दुराव। 

         लोकतंत्र में आम आदमी को सबसे बड़ा सुख यह सोचकर मिलता की अपनी सरकार वह खुद चुनता है। अब नई नीतियों ने करोड़ों मतदाताओं से उनके मताधिकार छीन लिए है। राजा के गीतकार ने समय से पहले ही समय की दस्तक को पहचान लिया- 

पहले ही लील लिया / सुखुआ का सारा सुख-चैन 
समय बैरी ने / पहले ही लील लिया है। 

         दगा दे गई बदरी फिर से / दगा दे गई बदरी, अनुत्तरित प्रश्न सब बाकी / बिखरी परछाई, दृश्य या अदृश्य जाल / फैले हैं जगह-जगह, कथा-भागवत, झंडे-डंडे / पंडे, पंडों के मुस्टंडे / सबकी चहल-पहल भारी है / बाँट रहे तबीजें-गंदे/ जल्दी-जल्दी चले हाँकते / गली-खोर में खदाबदी है आदि अभिव्यक्तियाँ समय पूर्व की परिस्थितियों की जानी-अनजानी अभिव्यक्तियाँ हैं। 

         नवगीत के पारंपरिक कथ्य सीमा को विस्तारते हुए राजा अवस्थी सामाजिक-राजनैतिक गड़बड़ियों को रूपकों और उपमाओं के माध्यम से निरंतर उद्घाटित करते हुए परिवर्तन की संभावनाओं की जड़ों में खाद-पानी देते हैं- 

अभी-अभी राजा जी / लौटे हैं विदेश से 
और बेतुकी गहन मंत्रणायें जारी हैं 
अंट-शंट बतिहाव / कैमरा रोज झेलता 
तेजाबी ट्रकों से घायल / फुलवारी हैं; 
रोज वही मुस्टंड / मंच पर / रहे ककहरा बाँच। 

         और 

राजा राज् करे तो राजा / गाल बजाये जैसे बाजा;
जन-जन के रुपयों पर नजरें / रोज एक उद्घोषण ताजा; 
पाखंडी तरकश-वीरों के / छद्म तीर हर दिन छूटेंगे। 

         राजा अवस्थी शिक्षक हैं। वे भाषाई व्याकरिक और पिंगलीय शुद्धता के प्रति सजग हैं, किंतु ''अपने राम कलुष-तम त्यागे / शुद्ध बुद्ध जितने'' में काल-दोष हो गया है। राम पहले हुए, बुद्ध बाद में। बुद्ध राम जैसे कलुष-तम त्याग सकते है किंतु राम अपने पश्चातवर्ती का अनुकरण कैसे कर सकते हैं?  

         राजा अवस्थी की तीसरी काव्य कृति है 'कैकेयी अब बोलती' (दोहा प्रबंध काव्य, पृष्ठ ८४, पेपर बैक, मूल्य २००/-, लिटिल बर्ड पब्लिकेशन नई दिल्ली)। बकौल कुसुमलता सिंह ''कविता केवल अपने अतीत से नहीं जुड़ती बल्कि अपनी दृष्टि और प्रयोग धर्मितासे अपने समय के आगे तनी हुई सच्चाई से संवाद करती है।'' यह संवाद करने की कोशिश ही 'कैकेयी अब बोलती' के रूप में सामने है। राम कथा में अपने युग की समय से आगे चलती विद्रोहिणी कैकेयी अभूतपूर्व वीरता, आत्म-बलिदान, सद्भाव, सहकारिता और सकरात्मकता के बाद भी केवल खलनायिका के तौर पर लोक-निंदा और पुत्र-तिरस्कार की शिकार बना दी गयी। दोहा छंद में रचित इस प्रबंध काव्य में कैकेयी के चरित्र को एक नयी दृष्टि से मूल्यांकित किया गया है। चार युगों तक फैली कथा को समेटते हुए यह काव्य कृति युगीन प्रवृत्तियों और संकटों-समाधानों के बीच कैकेयी अपने नारीत्व, मातृत्व, स्त्रीत्व और विप्लवत्व के सहारे खुद को अपराजेय बनाये रखती है। कैकेयी छली गयी लेकिन उसे छलनेवाले दशरथ और उनके गुरु वशिष्ठ लोक मान्य और लोक पूज्य बने रहे जबकि निर्दोष कैकेयी के हिस्से में आयी लोक निंदा। कृतिकार ने कैकेयी के चरित्र पर लगे लांछनों के कुहासे को दूर करने का सफल प्रयास किया है। इस कृति में कैकेयी अपनी आत्म कथा आपने दृष्टिकोण से प्रस्तुत करती है। वह चारों युगों में पुरुष प्रधान समाज में नारी के साथ किये जाते पुरुष वर्चस्व को अन्याय की तरह लेती है। 

         राजा अवस्थी की चौथी कृति ''आलोचना का ब्राह्मणवाद'' (समीक्षा कृति, वर्ष २०२६, पृष्ठ १०८, पेपरबैक, मूल्य २२५/-, प्रकाशक न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन नई दिल्ली) है। हिन्दी समालोचना के पितृ पुरुष आचार्य राम चंद्र शुक्ल को समर्पित इस कृति में राजा अवस्थी ने हिन्दी समीक्षा के वर्तमान गाड़ी कविता को मूल कविता माने जाने के विरोध में कई सवाल उठाते हैं। हिन्दी साहित्य की छांदस कविता के समर्थ रचयिता राजा अवस्थी गीत-नवगीत के कथ्य और शिल्प की जड़ता के विरोध और नवता के समर्थन में बहुधा अपनी बात कहते रहे हैं। 'आलोचना का ब्राह्मणवाद' हिन्दी समालोचना में नवता लाने की दिशा में एक सुचिन्तित कदम है।   

         यह लेख राजा अवस्थी के नवगीतों पर केंद्रित है इसलिए यहाँ उनकी दो पश्चातवर्ती किताबों का उल्लेख मात्र किया गया है। राजा अवस्थी के नवगीत समय से पूर्व समय के दरवाजे पर दस्तक देकर भावी बदलावों का सफल संकेत सहजता से करते हैं।
००० 
संपर्क: आचार्य संजीव वर्मा ''सलिल'', विश्ववाणी हिन्दी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१. 
वाट्स ऐप ९४२५१८३२४४

गुरुवार, 23 मार्च 2023

सॉनेट,रश्मि,विलियम वर्ड्सवर्थ डैफोडिल,मनहरण घनाक्षरी,राजा अवस्थी,कज्जल छंद,

गौरैया! चुप रहना सीखो 
*
बाज कहे जो वही सही है 
जो बहेलिया गलत नहीं है 
शक्तिहीन का ही कुसूर सब 
छाया ही कब संग रही है 
साथ धार के बहना सीखो 
*
सहन न होगा गर चहकोगी 
साथ कली के यदि महकोगी 
कर शिकार मरघट ले जाएँ 
तापें हाथ कहें दहकोगी 
हाँ में हाँ ही कहना सीखो 
* 
जनके हाथों में है सत्ता 
उनके हाथों में हर पत्ता 
सहमत उनसे नहीं हुए तो 
मिल न सकेगा एकउ लत्ता 
निज पीड़ाएँ तहना सीखो 
***
सॉनेट
रश्मि
•
रश्मि तिमिर का पाश काटती
कण-कण करता है अभिनंदन
करतल ध्वनि हो अक्षत चंदन
नव आशा निशि-दिवस बाँटती

रश्मि सलिल लहरों सँग खेले
सिकता-कण कनकाभित होते
नित नव अनगिन सपने बोते
रविकर पल पल लगें नवेले

रश्मि रचे रचना हर रुचिकर
धूप-छाँव कर, मन बहलाए
शुभ प्रयास की जय जय गाए

रश्मिरथी सबके मन में हो
किरण करे किसलय हर पोषित
तुहिन कणों को करे न शोषित
२४-३-२०२३
•••
भाषा सेतु 
अंग्रेजी हिंदी 
*
William Wordsworth - daffodils               विलियम वर्ड्सवर्थ - डैफोडिल
I wandered lonely as a cloud                    मैं एकाकी बादल जैसे भटक रहा था
That floats on high o'er vales and hills,    जो उड़ता है ऊपर घाटी अरु पर्वत के
When all at once I saw a crowd,               एकाएक झुण्ड देखा मैंने जब एक
A host, of golden daffodils,                      आतिथेय ज्यों एक सुनहरे डैफोडिल का
Beside the lake, beneath the trees,            बाजू में सरवर के; पेड़ों की छाया में
Fluttering and dancing in the breeze.        झूम- झूमकर नाच रहा साथ पवन के।
Continuous as the stars that shine             लगातार जैसे तारे चमका करते हैं
And twinkle on the milky way,                 झिलमिल करते आकाशी गंगा के पथ में
They stretch'd in never-ending line           बँधे हुए वे अंतहीन रेखा में जैसे
Along the margin of a bay:                        साथ-साथ खाड़ी की तटरेखा के मैंने
Ten thousand saw I at a glance                 दस हजार को देखा एक साथ ही मैंने
Tossing their heads in sprightly dance.     झूमा रहे अपने सर होकर मुदित, नाचते।
The waves beside them danced, but they  लहरें उनके बाजू में नाचीं लेकिन वे
Out-did the sparkling waves in glee:--      अनदेखा करते लहरों को निज मस्ती में
A Poet could not but be gay                       एक कवि हो सकता नहीं और नाकारा
In such a jocund company!                        ऐसी अद्भुत और अलौकिक प्रिय संगति में
I gazed--and gazed--but little thought        देखा रहा देखता तुक फिर मैंने सोचा
What wealth the show to me had brought; क्या निधि दृश्य अनोखा मुझ तक ले आया है।
For oft, when on my couch I lie                 जब फुरसत में लेटा होता हूँ मैं कोच पर
In vacant or in pensive mood,                    खालीपन में या चिंतन में लीन हुआ मैं
They flash upon that inward eye                वे दमकते हैं मेरी अंतर्दृष्टि में
Which is the bliss of solitude;                    जो वरदान अकेलेपन का मैंने पाया
And then my heart with pleasure fills        तब मेरा हृद प्रफुल्लता से पूर्ण भर गया
And dances with the daffodils.                  और उठा मैं नाच संग में डैफोडिल के।

हिंदी काव्यानुवाद : आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
२३-३-२०२२
***
मनहरण घनाक्षरी (३१ वर्ण)
*
मनहरण घनाक्षरी में १६,१५ वर्ण पर यति तथा चरणांत में गुरू होता है।
शालिनी हो, माननी हो, नहीं अभिमाननी हो,
श्वास-आस स्वामिनी हो मीत मेरी कविता
गति यति लय रस भाव बिंब रूप जस,
प्राण मन आत्मा हो प्रीत मेरी कविता
साधना हो वंदंना हो प्रार्थना हो अर्चना हो
मोहिनी आराधना हो रीत मेरी कविता
शब्द शब्द हो निशब्द सुनें सभी श्रोता गण
हो अतीत अव्यतीत गीत मेरी कविता
२३-३-२०१९
***
पुस्तक सलिला:
'जिस जगह यह नाव है' नवगीत का वह घाट है
*
[कृति विवरण- जिस जगह यह नाव है, नवगीत संग्रह, राजा अवस्थी, वर्ष २००६, आकार डिमाई, आवरण सजिल्द, बहुरंगी, जैकेट सहित, पृष्ठ १३६, मूल्य १२०रु., अनुभव प्रकाशन, ई २८ लाजपत नगर, साहिबाबाद, गाज़ियाबाद २०१००५, ०१२० ४११२२१०, रचनाकार संपर्क- गाटरघाट मार्ग, आजाद चौक, कटनी ४८३५०१, चलभाष ९६१७९१३२८७}
*
सनातन सलिला नर्मदा के अंचल में आधुनिक हिंदी के उद्भव काल से ही साहित्य की हर विधा में सतत सत्साहित्य का सृजन होता रहा है। वर्तमान पीढ़ी के सृजनशील नवगीतकारों में राजा अवस्थी का नाम साहित्य सृजन को सारस्वत पूजन की तरह समर्पित भाव से निरंतर कर रहे रचनाकारों में सम्मिलित है। हिंदी साहित्य के श्रेष्ठ-ज्येष्ठ हस्ताक्षर डॉ. देवेन्द्र शर्मा 'इंद्र' तथा नर्मदांचल के वरिष्ठ साहित्य साधक श्यामनारायण मिश्र द्वारा आशीषित 'जिस जगह यह नाव है' ७८ समसामयिक, सरस नवगीतों का पठनीय संग्रह है। मध्य प्रदेश के बड़े जंक्शन कटनी में बसे राजा के नवगीत विंध्याटवी के नैसर्गिक सौंदर्य, ग्राम्यांचल के संघर्ष, नगरीकरण की घुटन, राजनीति के दिशाभ्रम, आम जन के अंतर्द्वंद तथा युवाओं के सपनों के बहुदिशायी रेलगाड़ियों में यात्रारत मनोभावों को मन में बसाते हैं। करुणा और व्यथा काव्य का उत्स है. गाँव की माटी की व्यथा-कथा गाँव के बेटों तक न पहुँचे यह कैसे संभव है?
आज गाँव की व्यथा बाँचती / चिट्ठी मेरे नाम मिली
विधवा हुई रमोली की भी / किस्मत कैसी फूटी
जेठ-ससुर की मैली नज़रें / अब टूटीं, तब टूटीं
तमाम विसंगतियों से लड़ते-जूझते हुए भी अक्षर आराधना किसी सैनिक के पराक्रम से कम नहीं है।
चंदन वन काट-काट / शव का श्रृंगार करें
शिशुओं को दें शव सा जीवन
यौवन में सन्नाटा / मरघट सा छाता है
आस-ओस दुर्लभ आजीवन
यश अर्जन को होता
भूख को हमारी, साहित्य में उतारना
माँ शारदा को क्षुधा-दीप समर्पित करती कलम का संघर्ष गाँव और शहर हर जगह एक सा है। विडम्बनाओं व विसंगतियों से जूझना ही नियति है-
स्वार्थ-पोषित आचरण को / यंत्रवत निष्ठुर शहर को / सौपने बैठा
भाव की पहचान भूले / चेहरे पढ़ना कठिन है
धुंध, सन्नाटा, अँधेरा / और बहरापन कठिन है
विवशताएँ, व्यस्तताएँ / ह्रदय में छल वर्जनाएं / थोपने बैठा
अनचाही पीड़ाएँ प्रकृति प्रदत्त कम, मनुष्य रचित अधिक हैं-
गाँव के पंचों ने मिलकर / फिर खड़ी दीवार की
फिर वही हालत, नियति / वह ही प्रकृति के प्यार की
किशनवा-रधिया की / घुटती साँस का मौसम।
किसी समाज के सामने सर्वाधिक चिंतनीय स्थिति तब होती है जब बिखराव के कारण मानव-मन दूर होने लगें। राजा इस परिस्थिति का अनुमान कर अपनी चिंता नवगीत में उड़ेल देते हैं-
अंतस के समतल की / चिकनाई गायब अब
रोज बढ़े, फैले, ज़हरीला बिखराव
रिश्तों का ताप चुका / आ बैठा ठंडापन
चहक-पुलक में में पसरा जाता ठहराव
कैसी इच्छाओं के / ज्वार और भाटे ये
दूर हुए जाते मन, सदियों के द्वीप
विषमताओं के कुम्भ में सपनों की आहट बेमानी प्रतीत होने लगे तो नवगीत मन की पीड़ा को स्वर देता है -
किसलिए सजें / सपने, तो बस विशुद्ध रेत हैं
नरभक्षी पौधों से / आश्रय की आशा क्या?
सब के सब इक जैसे / टोला क्या, माशा क्या?
कोई भी अमृत फल / इन पर आ पायेगा?
छोडो भी आशा, ये बेंत हैं
बेशर्मी जेहन से / आँखों में उतरी
ढंकेंगी कब तक / ये पोशाकें सुथरी
बच पाना मुश्किल है / ये भोंडे संस्कार
दम लेंगे हंसकर ही, ये करैत हैं
राजा केवल नाम के ही नहीं अनुभूतियों और अभिव्यक्ति-क्षमता के भी राजा हैं। लोकतंत्र में भी सामंतवादी प्रवृत्तियों का बढ़ते जाना, प्रगति की मरीचिका मैं आम आदमी का दर्द बढ़ते जाना उनके मन की पीड़ा को बढ़ाता है-
फिर उसी सामंतवादी / जड़ प्रकृति को रोपता
एक विध्वंसक समय को / हाथ बाँधे न्योतता
जड़ तमाचे पर तमाचे / अमन के मुँह पर
पढ़ कसीदे पर कसीदे / दमन के मुँह पर
गर्व से मुस्की दबाये / है प्रगति का देवता
मुहावरेदार भाषा राजा अवस्थी के नवगीतों की जान है। रेवड़ी बेभाव बाँटी / प्रगति को दे दी धता, ढिबरी का तेल चुका / फैला अँधियार, खेतिहर बिजूकों से / भय खाएं राम, मस्तक में बोकर नासूर / टोपी के ये नकली बाल क्या सँवारना?, संविधान के मकड़जाल में / उलझा अक्सर न्याय हमारा, तार पर दे जीवन आघात / बेसुरे सुर दे रहे धता, कुँवारी इच्छाएं ऐसी / खिले ज्यों हरसिंगार के फूल जैसी अभिव्यक्तियाँ कम शब्दों में अधिक अनुभूतियों से पाठक का साक्षात करा देती हैं।
ग्राम्यांचली पृष्ठभूमि राजा अवस्थी को देशज शब्दों के उस ख़ज़ाने से संपन्न करती है जो शहरों के कोंवेंटी कवि के लिए आकाश कुसुम है। बरुआ, ठकुरवा, छप्पर, छुअन, झरोखा, निठुराई, बिजूका, झोपड़, जांगर. कहतें, पांग, बढ़ानी, हिय, पर्भाती, सुग्गे, ढिबरी, किशनवा, कुछबन्दियों, खटती, बहुँटा, अंकुई, दलिद्दर, चरित्तर, पैताने आदि ग्रामीण शब्दों के साथ उर्दू लफ्ज़ खातिर, रैयत, खबर, गुजरे, बैर, ज़ुल्मों, खस्ताहाल, नज़रें, ख्याल, आमद, बदन, यकीन, ज़ेहन, नुस्खे, नासूर, इन्तिज़ार, ज़हर, आफत, एहसान, तकादा, एहसान, चस्पा, लफ़्फ़ाज़ी आदि मिलकर उस गंगो-जमुनी जीवन की बानगी पेश करते हैं जिसमें शुद्ध हिंदी के अनुपूरित, प्रतिकार, अंतर्मन, उल्लास, ग्रसित, व्याल, आतंकित, प्रतिबंधित, मराल, भ्रान्ति, आलिंगन, उत्कंठा, वीथिकाएँ, वर्जनाएं,अंतस, निष्कलुष, बड़वानल, हिमगलित, संभरण आदि पुलाव में मेवे की तरह प्रतीत होते हैं। राजा अवस्थी ने शब्द-युग्मों की शक्ति और उपदेयता को पहचाना और उपयोग किया है। खबर-दबर, जेठ-ससुर, माँ-दद्दा, रात-दिन, हम-तुम, मन-मान, आस-ओस, उठना-गिरना, साँझ-सँझवाती, लड़ी-फड़ी, डगर-मगर, सुख-दुःख, घर-गाँव, सुबह-शाम, दोपहरी-रात, नून-तेल, आस-पास, दूध-भात, मरते-कटते, चोर-लबार, अमन-चैन, चहक-पुलक, सीलन-सन्नाटे, दंभ-छ्ल्, है-मेल, हवा-पानी, प्रीति-गीति-रीति, मोह-ममता-नेह, तन-मन-जेहन आदि शब्द युगन इन नवगीतों की भाषा को जीवंतता देते हैं।
राजा अवस्थी की प्रयोगधर्मी वृत्ति फाइलबाजों, कंठ-लावनी, वर्ण-कंपित, हिटलरी डकार, श्रध्दाशा, ममता की अलगनी, सुधियों की डोर, काँटों की गलियाँ, मुस्कानों के झोंके, शब्दों का संत्रास, पीड़ाओं के शिलाखंड जैसे शब्दावलियों से पाठक को बाँध पाये हैं। शब्द-सामर्थ्य, भाषा-शैली, नव बिम्ब, नए प्रतीक, मौलिक कथ्य की कसौटी पर ये गीत खरे उतरते हैं। इन नवगीतों में मात्रिक छंदों का प्रयोग किया गया है। दो से लेकर चार पंक्तियों तक के मुखड़े तथा आठ पंक्तियों तक के अंतरे प्रयुक्त हुए हैं। नवगीतों में अंतरों की संख्या दो या तीन है।
हिंदी के समर्थ समीक्षक डॉ. विजय बहादुर सिंह ने इन गीतों में 'समकालीन जीवन व् उसके यथार्थ के प्रति अत्यधिक सजगता एवं संवेदनशीलता, स्थानीयता के रंगों से कुछ अधिक रंगीनियत' ठीक ही लक्षित की है। इस कृति के प्रकाशन के एक दशक बाद राजा अवस्थी की कलम अधिक पैनी हुई है, उनके नवगीतों के नये संकलन की प्रतीक्षा स्वाभाविक है।
२३-३-२०१६
***
छंद सलिला:
कज्जल छंद
*
लक्षण: सममात्रिक छंद, जाति मानव, प्रति चरण मात्रा १४ मात्रा, चरणांत लघु-गुरु
लक्षण छंद:
कज्जल कोर निहार मौन,
चौदह रत्न न चाह कौन?
गुरु-लघु अंत रखें समान,
रचिए छंद सरस सुजान
उदाहरण:
१. देव! निहार मेरी ओर,
रखें कर में जीवन-डोर
शांत रहे मन भूल शोर,
नयी आस दे नित्य भोर
२. कोई नहीं तुमसा ईश
तुम्हीं नदीश, तुम्ही गिरीश।
अगनि गगन तुम्हीं पृथीश
मनुज हो सके प्रभु मनीष।
३. करेंगे हिंदी में काम
तभी हो भारत का नाम
तजिए मत लें धैर्य थाम
समय ठीक या रहे वाम
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, ककुभ, कज्जल, कीर्ति, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, छवि, जाया, तांडव, तोमर, दीप, दोधक, नित, निधि, प्रदोष, प्रेमा, बाला, भव, मधुभार, मनहरण घनाक्षरी, मानव, माली, माया, माला, ऋद्धि, राजीव, रामा, लीला, वाणी, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शिव, शुभगति, सार, सिद्धि, सुगति, सुजान, हंसी)
२३-३-२०१४
***
विज्ञापन या ठगी ??????
1) घोटालों से परेशान ना हों, Tata की चाय पीयें, इससे देश बदल
जाएगा|
2) पानी की जगह Coca Cola और Pepsi पीयें और प्यास बुझायें|
3) Lifebuoy और Dettol 99.9% कीटाणु मारते है पर 0.1 %
पुनः प्रजनन के लिए छोड़ ही देते हैं|
4) महिलाओं को बचाने और बटन खुले होने
की चेतावनी देने का ठेका केवल Akshay Kumar ने लिया है|
5) अगर आप Sprite पीते हैं तो लड़की पटाना आपके बाये हाँथ
का खेल है|
6) Salman Khan के अनुसार
महीने भर का Wheel Detergent ले आओ
और कई किलो सोने के मालिक बन जाओ.
आपको नौकरी करने की कोई जरुरत नहीं|
7) Saif Ali Khan और Kreena Kapoor ने शादी एक दुसरे के सर
का Dandruff देख कर की है|
8)यदि किसी के Toothpaste में नमक है तो; यह पूछने के लिए आप
किसी के भी घर का बाथरूम तोड़ सकते हैं|
9) Samsung Galaxy S3 फोन के
अलावा बाकी सभी फोन बंदरों के लिए बने हैं| केवल यही फ़ोन
इंसानों के लिए है!
10) Mountain Dew पीकर पहाड़ से कूद जाइये, कुछ नहीं होगा|
11) Cadbury Dairy Milk Silk Chocolate खाएं कम और मुंह
पर ज्यादा लगायें|
12) Happident चबाइए और बिजली का कनेक्शन कटवा लीजिये|
13) आपके insurance Agents को अपने पापा से
ज्यादा आपकी फ़िक्र रहती हैं|
14) फलमंडी से ज्यादा फल आपके Shampoo में होते हैं|
15) अपने घर का Toilet सदा साफ़ रखें अन्यथा एक Handsome
सा लड़का Harpic और Camera लेकर आपकेToilet की सफाई
का Live Broadcast
करने लगेगा|
16) अगर आपने घर में Asian Paints किया है तो आप दुनिया के
सबसे Intelligent इन्सान हैं|
17) अगर आपने Lux Cozy Big Shot
नहीं पहनी तो आपको मर्द कहलाने काकोई हक़ नहीं|
18) अगर तुम्हारा बेटा Bournvita
नहीं पीता तो वो मंदबुद्धि हो जायेगा|
***
फागुन के मुक्तक
*
बसा है आपके ही दिल में प्रिय कब से हमारा दिल.
बनाया उसको माशूका जो बिल देने के है काबिल..
चढ़ायी भाँग करके स्वांग उससे गले मिल लेंगे-
रहे अब तक न लेकिन अब रहेंगे हम तनिक गाफिल..
*
दिया होता नहीं तो दिया दिल का ही जला लेते.
अगर सजती नहीं सजनी न उससे दिल मिला लेते..
वज़न उसका अधिक या मेक-अप का कौन बतलाये?
करा खुद पैक-अप हम क्यों न उसको बिल दिला लेते..
*
फागुन में गुन भुलाइए बेगुन हुजूर हों.
किशमिश न बनिए आप अब सूखा खजूर हों..
माशूक को रंग दीजिए रंग से, गुलाल से-
भागिए मत रंग छुड़ाने खुद मजूर हों..
२३-३-२०१३
*
पर्वत शिखरों पर बसी, धूप-छाँव सँग शाम.
वृक्षों पर कलरव करें, नभचर आ आराम..

गीत
*
वक़्त ने दिल को दिए हैं
घाव कितने?...
*
हम समझ ही नहीं पाए
कौन क्या है?
और तुमने यह न समझा
मौन क्या है?
साथ रहकर भी रहे क्यों
दूर हरदम?
कौन जाने हैं अजाने
भाव कितने?
वक़्त ने दिल को दिए हैं
घाव कितने?...
*
चाहकर भी तुम न हमको
चाह पाए.
दाहकर भी हम न तुमको
दाह पाए.
बाँह में थी बाँह लेकिन
राह भूले-
छिपे तन-मन में रहे
अलगाव कितने?
वक़्त ने दिल को दिए हैं
घाव कितने?...
*
अ-सुर-बेसुर से नहीं,
किंचित शिकायत.
स-सुर सुर की भुलाई है
क्यों रवायत?
नफासत से जहालत क्यों
जीतती है?
बगावत क्यों सह रही
अभाव इतने?
वक़्त ने दिल को दिए हैं
घाव कितने?...
*
खड़े हैं विषधर, चुनें तो
क्यों चुनें हम?
नींद गायब तो सपन
कैसे बुनें हम?
बेबसी में शीश निज अपना
धुनें हम-
भाव नभ पर, धरा पर
बेभाव कितने?
वक़्त ने दिल को दिए हैं
घाव कितने?...
*
साँझ सूरज-चंद्रमा सँग
खेलती है.
उषा रुसवाई, न कुछ कह
झेलती है.
हजारों तारे निशा के
दिवाने है-
'सलिल' निर्मल पर पड़े
प्रभाव कितने?
वक़्त ने दिल को दिए हैं
घाव कितने?...
***
नवगीत
विडंबना
*
कोई न चाहे
पुत्र बने निज
भगत गुरु सुखदेव.
नेता जी से पूछो भाई .
व्यापारी से पूछो भाई .
अधिकारी से पूछो भाई .
न्यायमूर्ति से पूछो भाई
वकील साब से पूछो भाई
सब चाहें केवल यश गाना.
भाषण देना चित्र छपाना.
कोई न चाहे
पुत्र बने निज
भगत गुरु सुखदेव.
*
कोई न चाहे
पत्नि-सुता हो
रानी लक्ष्मी बाई.
नेता जी से पूछो भाई .
व्यापारी से पूछो भाई .
अधिकारी से पूछो भाई .
न्यायमूर्ति से पूछो भाई
वकील साब से पूछो भाई
सब चाहें केवल यश गाना.
भाषण देना चित्र छपाना.
कोई न चाहे
पत्नि-सुता हो
रानी लक्ष्मी बाई.
*
मेरे घर में
रहे लक्ष्मी
तेरे घर में काली.
तू ले ले वनवास विरासत
सत्ता मैंने पा ली.
वादे किये न पूरे लेकिन
मुझसे तू मत पूछ.
मुँह मत खोल भले ही मैंने
दी जी भर कर गाली.
चार साल की पूछ न बातें
सत्तर की बतला दे.
अपना वोट मुझे दे दे
जुमलेबाजी बिसरा दे.
२३-३-२०१०
***

रविवार, 23 मई 2021

राजा अवस्थी के गीत - तीन दृष्टियाँ

* राजा अवस्थी के गीत - तीन दृष्टियाँ
*
नर्मदांचल की उद्योगधानी कटनी के युवा गीतकार राजा अवस्थी के गीत संग्रह 'जिस जगह यह नाव है' का पुनर्पाठ किया। पहली बार तब पढ़ा था जब यह संकलन समीक्षा हेतु प्राप्त हुआ था। नवगीत को स्वतंत्र विधा माननेवाले गीतकारों के लिए राजा अवस्थी के गीतों पर पुस्तक में तीन वरिष्ठ जनों की तीन दृष्टियाँ विचारणीय हैं। 
= नर्मदांचल के प्रखर समीक्षक डॉ. विजय बहादुर सिंह के अनुसार ''वे (राजा अवस्थी) अपने समकालीन जीवन और उसके यथार्थ के प्रति अत्यधिक सजग एवं संवेदनशील हैं....... समकालीन जीवन जितना अनगढ़ और मूल्यहारा है, उसे ये कवितायेँ न केवल कथ्य बल्कि शैली में भी प्रगट करती हैं।'' 
= श्रेष्ठ ज्येष्ठ समीक्षक-साहित्यकार देवेंद्र शर्मा 'इंद्र' के शब्दों में गीत हो या नवगीत अथवा गीत नवांतर इन सभी का उन्मेष वर्तमान युग जीवन की बहुविध विडंबनाओं के यथार्थ चित्रण में ही निहित रहता है और इस चित्रण को रंग, रूप और रेखाएँ प्राप्त होती हैं संवेदनशील रचनाकार की स्वानुभूति से ... इन गीतों की बिम्ब योजना इतनी ताजा और टटकी है कि दूरवर्ती पाठक भी उनमें बने हुए दृश्य जगत से एक तरल आत्मीयता स्थापित करने लगता है .....  कवि धीरे-धीरे जाने-'लय' को साधने का प्रयास कर रहा है। जब यह लय उससे सध जाएगी तो छान्दसिक अनुशासन भी स्वत: ही उनके गीतों में आता जायेगा ....राजा अवस्थी के बाल करों में जो। नवनीत' सोभित है वः एक दिन नवगीत भी बनेगा।'
= नर्मदांचल के सरस और सशक्त गीतकार श्यामनारायण मिश्र लिखते हैं 'नवगीत ने परंपरा और पुरातन मूल्यों की पुनर्स्थापना की है .....  पुराने गीतों के नक्शे-कदम पर काम करते हुए नवगीतों के आधुनिक कुटीर बनाये हैं। ...... राजा के गीत दर्द-कडुवाहट और संत्रास की विषाक्त अनुभूतियों के दस्तावेज हैं। ..... राजा के गीत- नवगीत चौनौती के तेवर में खड़े हैं। ...... लयात्मक बुनावट हो या मात्रिक कसाव, छान्दसिक प्रवाह या शिल्प का जौहर, बिम्बों का आयोजन हो या चित्रों की सजावट, कथ्य की नव्यता हो या पर्टकों की भव्यता, वह सर्वत्र सफल हुआ है।' 
***  
  



सोमवार, 10 सितंबर 2018

समीक्षा

कृति चर्चा:

जिस जगह यह नाव है- राजा अवस्थी

सनातन सलिला नर्मदा के अंचल में आधुनिक हिंदी के उद्भव काल से ही साहित्य की हर विधा में सतत सत्साहित्य का सृजन होता रहा है। वर्तमान पीढ़ी के सृजनशील नवगीतकारों में राजा अवस्थी का नाम साहित्य सृजन को सारस्वत पूजन की तरह समर्पित भाव से निरंतर कर रहे रचनाकारों में सम्मिलित है। 

हिंदी साहित्य के श्रेष्ठ-ज्येष्ठ हस्ताक्षर डॉ. देवेन्द्र शर्मा 'इंद्र' तथा नर्मदांचल के वरिष्ठ साहित्य साधक श्यामनारायण मिश्र द्वारा आशीषित 'जिस जगह यह नाव है' ७८ समसामयिक, सरस नवगीतों का पठनीय संग्रह है। मध्य प्रदेश के बड़े जंक्शन कटनी में बसे राजा के नवगीत विंध्याटवी के नैसर्गिक सौंदर्य, ग्राम्यांचल के संघर्ष, नगरीकरण की घुटन, राजनीति के दिशाभ्रम, आम जन के अंतर्द्वंद तथा युवाओं के सपनों  के बहुदिशायी रेलगाड़ियों में यात्रारत मनोभावों को मन में बसाते हैं। करुणा और व्यथा काव्य का उत्स है. गाँव की माटी की व्यथा-कथा गाँव के बेटों तक न पहुँचे यह कैसे संभव है? 
आज गाँव की व्यथा बाँचती / चिट्ठी मेरे नाम मिली 

विधवा हुई रमोली की भी / किस्मत कैसी फूटी 
जेठ-ससुर की मैली नज़रें / अब टूटीं, तब टूटीं 

तमाम विसंगतियों से लड़ते-जूझते हुए भी अक्षर आराधना किसी सैनिक के पराक्रम से कम नहीं है। 
चंदन वन काट-काट / शव का श्रृंगार करें 
 शिशुओं को दें शव सा जीवन
यौवन में सन्नाटा / मरघट सा छाता है 
 आस-ओस दुर्लभ आजीवन 
यश अर्जन को होता 
भूख को हमारी, साहित्य में उतारना 

माँ शारदा को क्षुधा-दीप समर्पित करती कलम का संघर्ष गाँव और शहर हर जगह एक सा है। विडम्बनाओं व विसंगतियों से जूझना ही नियति है-  
स्वार्थ-पोषित आचरण को / यंत्रवत निष्ठुर शहर को / सौपने बैठा 
भाव की पहचान भूले / चेहरे पढ़ना कठिन है 
धुंध, सन्नाटा, अँधेरा / और बहरापन कठिन है 
विवशताएँ, व्यस्तताएँ / ह्रदय में छल वर्जनाएं / थोपने बैठा 

अनचाही पीड़ाएँ प्रकृति प्रदत्त कम, मनुष्य रचित अधिक हैं-
गाँव के पंचों ने मिलकर / फिर खड़ी दीवार की  
फिर वही हालत, नियति / वह ही प्रकृति के प्यार की 
किशनवा-रधिया की / घुटती साँस का मौसम।

किसी समाज के सामने सर्वाधिक चिंतनीय स्थिति तब होती है जब बिखराव के कारण मानव-मन दूर होने लगें। राजा इस परिस्थिति का अनुमान कर अपनी चिंता नवगीत में उड़ेल देते हैं-  
अंतस के समतल की / चिकनाई गायब अब 
रोज बढ़े, फैले, ज़हरीला बिखराव 
रिश्तों का ताप चुका / आ बैठा ठंडापन 
चहक-पुलक में में पसरा जाता ठहराव
कैसी इच्छाओं के / ज्वार और भाटे ये 
दूर हुए जाते मन, सदियों के द्वीप 

विषमताओं के कुम्भ में सपनों की आहट बेमानी प्रतीत होने लगे तो नवगीत मन की पीड़ा को स्वर देता है -

किसलिए सजें / सपने, तो बस विशुद्ध रेत हैं 
नरभक्षी पौधों से / आश्रय की आशा क्या?
सब के सब इक जैसे / टोला क्या, माशा क्या?
कोई भी अमृत फल / इन पर आ पायेगा?
छोडो भी आशा, ये बेंत हैं
बेशर्मी जेहन से / आँखों में उतरी 
ढंकेंगी कब तक / ये पोशाकें सुथरी 
बच पाना मुश्किल है / ये भोंडे संस्कार 
दम लेंगे हंसकर ही, ये करैत हैं 

राजा केवल नाम के ही नहीं अनुभूतियों और अभिव्यक्ति-क्षमता के भी राजा हैं। लोकतंत्र में भी सामंतवादी प्रवृत्तियों का बढ़ते जाना, प्रगति की मरीचिका मैं आम आदमी का दर्द बढ़ते जाना उनके मन की पीड़ा को बढ़ाता है- 
फिर उसी सामंतवादी / जड़ प्रकृति को रोपता 
एक विध्वंसक समय को / हाथ बाँधे न्योतता
जड़ तमाचे पर तमाचे / अमन के मुँह पर 
पढ़ कसीदे पर कसीदे / दमन के मुँह पर  
गर्व से मुस्की दबाये / है प्रगति का देवता 

मुहावरेदार भाषा राजा अवस्थी के नवगीतों की जान है। रेवड़ी बेभाव बाँटी / प्रगति को दे दी धता, ढिबरी का तेल चुका / फैला अँधियार, खेतिहर बिजूकों से / भय खाएं राम, मस्तक में बोकर नासूर / टोपी के ये नकली बाल क्या सँवारना?, संविधान के मकड़जाल में / उलझा अक्सर न्याय हमारा, तार पर दे जीवन आघात / बेसुरे सुर दे रहे धता, कुँवारी इच्छाएं ऐसी / खिले ज्यों हरसिंगार के फूल जैसी अभिव्यक्तियाँ कम शब्दों में अधिक अनुभूतियों से पाठक का साक्षात करा देती हैं। 

ग्राम्यांचली पृष्ठभूमि राजा अवस्थी को देशज शब्दों के उस ख़ज़ाने से संपन्न करती है जो शहरों के कोंवेंटी कवि के लिए आकाश कुसुम है। बरुआ, ठकुरवा, छप्पर, छुअन, झरोखा, निठुराई, बिजूका, झोपड़, जांगर. कहतें, पांग, बढ़ानी, हिय, पर्भाती, सुग्गे, ढिबरी, किशनवा, कुछबन्दियों, खटती, बहुँटा, अंकुई, दलिद्दर, चरित्तर, पैताने आदि ग्रामीण शब्दों के साथ उर्दू लफ्ज़ खातिर, रैयत, खबर, गुजरे, बैर, ज़ुल्मों, खस्ताहाल, नज़रें, ख्याल, आमद, बदन, यकीन, ज़ेहन, नुस्खे, नासूर, इन्तिज़ार, ज़हर, आफत, एहसान, तकादा, एहसान, चस्पा, लफ़्फ़ाज़ी आदि मिलकर उस गंगो-जमुनी जीवन की बानगी पेश करते हैं जिसमें शुद्ध हिंदी के अनुपूरित, प्रतिकार, अंतर्मन, उल्लास, ग्रसित, व्याल, आतंकित, प्रतिबंधित, मराल, भ्रान्ति, आलिंगन, उत्कंठा, वीथिकाएँ, वर्जनाएं,अंतस, निष्कलुष, बड़वानल, हिमगलित, संभरण आदि पुलाव में मेवे की तरह प्रतीत होते हैं। राजा अवस्थी ने शब्द-युग्मों की शक्ति और उपदेयता को पहचाना और उपयोग किया है। खबर-दबर, जेठ-ससुर, माँ-दद्दा, रात-दिन, हम-तुम, मन-मान, आस-ओस, उठना-गिरना, साँझ-सँझवाती, लड़ी-फड़ी, डगर-मगर, सुख-दुःख, घर-गाँव, सुबह-शाम, दोपहरी-रात, नून-तेल, आस-पास, दूध-भात, मरते-कटते, चोर-लबार, अमन-चैन, चहक-पुलक, सीलन-सन्नाटे, दंभ-छ्ल्, है-मेल, हवा-पानी, प्रीति-गीति-रीति, मोह-ममता-नेह, तन-मन-जेहन आदि शब्द युग्म इन नवगीतों की भाषा को जीवंतता देते हैं। 

राजा अवस्थी की प्रयोगधर्मी वृत्ति  फाइलबाजों, कंठ-लावनी, वर्ण-कंपित, हिटलरी डकार, श्रध्दाशा, ममता की अलगनी, सुधियों की डोर, काँटों की गलियाँ, मुस्कानों के झोंके, शब्दों का संत्रास, पीड़ाओं के शिलाखंड जैसे शब्दावलियों से पाठक को बाँध पाये हैं। शब्द-सामर्थ्य, भाषा-शैली, नव बिम्ब, नए प्रतीक, मौलिक कथ्य की कसौटी पर ये गीत खरे उतरते हैं। इन नवगीतों में मात्रिक छंदों का प्रयोग किया गया है। दो से लेकर चार पंक्तियों तक के मुखड़े तथा आठ पंक्तियों तक के अंतरे प्रयुक्त हुए हैं। नवगीतों में अंतरों की संख्या दो या तीन है।

हिंदी के समर्थ समीक्षक डॉ. विजय बहादुर सिंह ने इन गीतों में 'समकालीन जीवन व् उसके यथार्थ के प्रति अत्यधिक सजगता एवं संवेदनशीलता, स्थानीयता के रंगों से  कुछ अधिक रंगीनियत' ठीक ही लक्षित की है। इस कृति के प्रकाशन के एक दशक बाद राजा अवस्थी की कलम अधिक पैनी हुई है, उनके नवगीतों के नये संकलन की प्रतीक्षा स्वाभाविक है।
२१.३.२०१६ 
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गीत- नवगीत संग्रह - जिस जगह यह नाव है, रचनाकार- राजा अवस्थी, प्रकाशक- अनुभव प्रकाशन, ई २८ लाजपत नगर, साहिबाबाद, गाज़ियाबाद २०१००५। प्रथम संस्करण- २००६, मूल्य- रूपये १२०/-, पृष्ठ-१३६ , समीक्षा- संजीव सलिल।