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शुक्रवार, 14 अगस्त 2026

अगस्त १४, दोहा, यमक, नवगीत, बरवै-दोहा गीत, कुण्डलिया, गिनती गीत

सलिल सृजन अगस्त १४

0

गिनती गीत ० अग्नि, वायु, नभ, भू, सलिल, जीवन के आधार। आत्म-देह-पुरुषार्थ मिल, करें स्वप्न साकार।। ० एक ईश, दो नयन हैं, तीन काल चौ लोक। पंच तत्व षट् राग हैं, सप्त सिंधु तज शोक।। अष्ट प्रहर नौ देवियाँ, दस दिश अगम प्रसार अग्नि, वायु, नभ, भू, सलिल, जीवन के आधार... ० ग्यारह रुद्रों को सलिल, बारह मासों पूज। तेरहवें दिन मुक्त हो, सत्य समझकर बूझ।। चौदह विद्या-रत्न पा, बनी देश-सरकार। अग्नि, वायु, नभ, भू, सलिल, जीवन के आधार... ० संस्कार सोलह प्रबल, सत्रह आदि व अंत। गीता के अध्याय पढ़, अट्ठारह हो संत।। हो घर उन्नीस बीस तो, ले हँसकर स्वीकार। अग्नि, वायु, नभ, भू, सलिल, जीवन के आधार...

०००

मुक्तक ० हम हैं मुसाफिर, तुम हो मुसाफिर, ठिकाना जबलपुर, सुहाना नगर है। कलकल निनादित, पल पल प्रवाहित, पिओ नर्मदा जल, बुलाती लहर है।। श्यामल शिलाएँ, निशि-दिन नहाएँ, कंकर में शंकर, झुका सबका सर है। करे तप उमा जब, बनतीं शिवा तब, हर हर नरमदे, गुंजित गजर है।। १४-८-२०२६

०००

गले मिले दोहा यमक
*
अजब गजब दुनिया सलिल, दिखा रही है रंग.
रंग बदलती है कभी, कभी कर रही जंग.
*
जंग करे बेबात ही, नापाकी है पाक
जंग लगी है अक्ल में, तनिक न बाकी धाक
*
तंग कर रहे और को, जो उनका दिल तंग
भंग हुआ सपना तुरत, जैसे उत्तरी भंग
*
संगदिलों को मत रखें, सलिल कभी भी संग
गंग नहाएँ दूर हो, नहीं लगाएँ अंग
१४-८-२०२०
***
नवगीत
*
हैं स्वतंत्र पर
तंत्र न अपना
दाल दले छाती पर
*
गए विदेशी दूर
स्वदेशी अफसर
हुए पराए.
सत्ता-सुविधा लीन
हुए जन प्रतिनिधि
खेले-खाए.
कृषक, श्रमिक,
अभियंता शोषित
शिक्षक है अस्थाई.
न्याय व्यवस्था
अंधी-बहरी, है
दयालु नेता पर।
हैं स्वतंत्र पर
तंत्र न अपना
दाल दले छाती पर
*
अस्पताल है
डॉक्टर गायब
रोगी राम भरोसे.
अंगरेजी में
मँहगी औषधि
लिखें, कंपनी पोसे.
दस प्रतिशत ने
अस्सी प्रतिशत
देश संपदा पाई.
देशभक्त पर
सौ बंदिश हैं
कृपा देश-घाती पर।
हैं स्वतंत्र पर
तंत्र न अपना
दाल दले छाती पर
१४-८-२०२०
***
हल्ला-गुल्ला शब्द है, मौन करे संवाद।
क्वीन जिया में पैठकर, करे विहँस आबाद।।
क्या लेना है शब्द से, रखें भाव से काम।
नहीं शब्द से काम से, मिले दाम अरु नाम।।
१४-८-२०१९
बरवै-दोहा गीत:
*
मेघा गरजे बरसे,
है आतंक
*
कल तक आए नहीं तो,
रहे जोड़ते हाथ.
आज आ गए बरसने,
जोड़ रहा जग हाथ.
करें भरोसा किसका
हो निश्शंक?
मेघा गरजे बरसे,
है आतंक
*
अनावृष्टि से काँपती,
कहीं मनुज की जान.
अधिक वृष्टि ले रही है,
कहीं निकाले जान.
निष्ठुर नियति चुभाती
जैसे डंक
मेघा गरजे बरसे,
है आतंक
*
बादल-सांसद गरजते,
एक साथ मिल आज.
बंटाढार हुआ 'सलिल'
बिगड़े सबके काज.
घर का भेदी ढाता
जैसे लंक
मेघा गरजे बरसे,
है आतंक
१४.८.२०१८
***
राष्ट्रीय गीत
हम वही हैं
*
हम वही हैं,
यह न भूलो
झट उठो आकाश छू लो।
बता दो सारे जगत को
यह न भूलो
हम वही है।
*
हमारे दिल में पली थी
सरफरोशी की तमन्ना।
हमारी गर्दन कटी थी
किंतु
किंचित भी झुकी ना।
काँपते थे शत्रु सुनकर
नाम जिनका
हम वही हैं।
कारगिल देता गवाही
मर अमर
होते हमीं हैं।
*
इंकलाबों की करी जयकार
हमने फेंककर बम।
झूल फाँसी पर गये
लेकिन
न झुकने दिया परचम।
नाम कह 'आज़ाद', कोड़े
खाये हँसकर
हर कहीं हैं।
नहीं धरती मात्र
देवोपरि हमें
मातामही हैं।
*
पैर में बंदूक बाँधे,
डाल घूँघट चल पड़ी जो।
भवानी साकार दुर्गा
भगत के
के संग थी खड़ी वो।
विश्व में ऐसी मिसालें
सत्य कहता हूँ
नहीं हैं।
ज़िन्दगी थीं या मशालें
अँधेरा पीती रही
रही हैं।
*
'नहीं दूँगी कभी झाँसी'
सुनो, मैंने ही कहा था।
लहू मेरा
शिवा, राणा, हेमू की
रग में बहा था।
पराजित कर हूण-शक को
मर, जनम लेते
यहीं हैं।
युद्ध करते, बुद्ध बनते
हमीं विक्रम, 'जिन'
हमीं हैं।
*
विश्व मित्र, वशिष्ठ, कुंभज
लोपामुद्रा, कैकयी, मय ।
ऋषभ, वानर, शेष, तक्षक
गार्गी-मैत्रेयी
निर्भय?
नाग पिंगल, पतंजलि,
नारद, चरक, सुश्रुत
हमीं हैं।
ओढ़ चादर रखी ज्यों की त्यों
अमल हमने
तही हैं।
*
देवव्रत, कौंतेय, राघव
परशु, शंकर अगम लाघव।
शक्ति पूजित, शक्ति पूजी
सिय-सती बन
जय किया भव।
शून्य से गुंजित हुए स्वर
जो सनातन
हम सभी हैं।
नाद अनहद हम पुरातन
लय-धुनें हम
नित नयी हैं।
*
हमीं भगवा, हम तिरंगा
जगत-जीवन रंग-बिरंगा।
द्वैत भी, अद्वैत भी हम
हमीं सागर,
शिखर, गंगा।
ध्यान-धारी, धर्म-धर्ता
कम-कर्ता
हम गुणी हैं।
वृत्ति सत-रज-तम न बाहर
कहीं खोजो,
त्रय हमीं हैं।
*
भूलकर मत हमें घेरो
काल को नाहक न टेरो।
अपावन आक्रांताओं
कदम पीछे
हटा फेरो।
बर्फ पर जब-जब
लहू की धार
सरहद पर बही हैं।
कहानी तब शौर्य की
अगणित, समय ने
खुद कहीं हैं।
*
हम वही हैं,
यह न भूलो
झट उठो आकाश छू लो।
बता दो सारे जगत को
यह न भूलो
हम वही है।
१४-८-२०१६
***
नवगीत
*
सब्जी-चाँवल,
आटा-दाल
देख रसोई
हुई निहाल
*
चूहा झाँके आँखें फाड़
बना कनस्तर खाली आड़
चूल्हा काँखा, विवश जला
ज्यों-त्यों ऊगा सूर्य, बला
धुँआ करें सीती लकड़ी
खों-खों सुन भागी मकड़ी
फूँक मार बेहाल हुई
घर-लछमी चुप लाल हुई
गौरैया झींके
बदहाल
मुनिया जाएगी
हुआ बबाल
*
माचिस-तीली आग लगा
झुलसी देता समय दगा
दाना ले झटपट भागी
चीटी सह न सकी आगी
कैथ, चटनी, नोंन, मिरच
प्याज़ याद आये, सच बच
आसमान को छूटे भाव
जैसे-तैसे करें निभाव
तिलचट्टा है
सुस्त निढाल
छिपी छिपकली
बन कर काल
*
पुंगी रोटी खा लल्ला
हँस थामे धोती पल्ला
सदा सुहागन लाई चाय
मगन मोगरा करता हाय
खनकी चूड़ी दैया रे!
पायल बाजी मैया रे!
नैन उठे मिल झुक हैं बंद
कहे-अनकहे मादक छंद
दो दिल धड़के,
कर करताल
बजा मँजीरा
लख भूचाल
*
'दाल जल रही' कह निकरी
डुकरो कहे 'बहू बिगरी,
मत बौरा, जा टैम भया
रासन लइयो साँझ नया'
दमा खाँसता, झुकी कमर
उमर घटे पर रोग अमर
चूं-चूं खोल किवार निकल
जाते हेरे नज़र पिघल
'गबरू कभऊँ
न होय निढाल
करियो किरपा
राम दयाल'
१४-८-२०१५
***
गीत:
कब होंगे आजाद
*
कब होंगे आजाद?
कहो हम
कब होंगे आजाद?....
*
गए विदेशी पर देशी अंग्रेज कर रहे शासन.
भाषण देतीं सरकारें पर दे न सकीं हैं राशन..
मंत्री से संतरी तक कुटिल कुतंत्री बनकर गिद्ध-
नोच-खा रहे
भारत माँ को
ले चटखारे स्वाद.
कब होंगे आजाद?
कहो हम
कब होंगे आजाद?....
*
नेता-अफसर दुर्योधन हैं, जज-वकील धृतराष्ट्र.
धमकी देता सकल राष्ट्र को खुले आम महाराष्ट्र..
आँख दिखाते सभी पड़ोसी, देख हमारी फूट-
अपने ही हाथों
अपना घर
करते हम बर्बाद.
कब होंगे आजाद?
कहो हम
कब होंगे आजाद?....
*
खाप और फतवे हैं अपने मेल-जोल में रोड़ा.
भष्टाचारी चौराहे पर खाए न जब तक कोड़ा.
तब तक वीर शहीदों के हम बन न सकेंगे वारिस-
श्रम की पूजा हो
समाज में
ध्वस्त न हो मर्याद.
कब होंगे आजाद?
कहो हम
कब होंगे आजाद?....
*
पनघट फिर आबाद हो सकें, चौपालें जीवंत.
अमराई में कोयल कूके, काग न हो श्रीमंत.
बौरा-गौरा साथ कर सकें नवभारत निर्माण-
जन न्यायालय पहुँच
गाँव में
विनत सुनें फ़रियाद-
कब होंगे आजाद?
कहो हम
कब होंगे आजाद?....
*
रीति-नीति, आचार-विचारों भाषा का हो ज्ञान.
समझ बढ़े तो सीखें रुचिकर धर्म प्रीति विज्ञान.
सुर न असुर, हम आदम यदि बन पायेंगे इंसान-
स्वर्ग तभी तो
हो पायेगा
धरती पर आबाद.
कब होंगे आजाद?
कहो हम
कब होंगे आजाद?....
१४-८-२०१४
***
बुंदेली लोकमानस में प्रतिष्ठित छंद आल्हा :
तनक न चिंता करो दाऊ जू, बुंदेली के नीके बोल.
जो बोलत हैं बेई जानैं, मिसरी जात कान मैं घोल..
कबू-कबू ऐसों लागत ज्यौं, अमराई मां फिर रै डोल.
आल्हा सुनत लगत हैं ऐसो, जैसें बाज रए रे ढोल..
अंगरेजी खों मोह ब्याप गौ, हिंदी मोड़ें जानत नांय.
छींकें-खांसें अंग्रेजी मां, जैंसें सोउत मां बर्रांय..
नीकी भासा कहें गँवारू, माँ खों ममी कहत इतरांय.
पाँव बुजुर्गों खें पड़ने हौं, तो बिनकी नानी मर जांय..
फ़िल्मी धुन में टर्राउत हैं, आँय-बाँय फिर कमर हिलांय.
बन्ना-बन्नी, सोहर, फागें, आल्हा, होरी समझत नांय..
बाटी-भर्ता, मठा-महेरी, छाँड़ केक बिस्कुट बें खांय.
अमराई चौपाल पनघटा, भूल सहर मां फिरें भुलांय..
१४-८-२०११
***
कुण्डलिया:
आती उजली भोर..
*
छाती छाती ठोंककर, छाती है चहुँ ओर.
जाग सम्हल सरकार जा, आती उजली भोर..
आती उजली भोर, न बंदिश व्यर्थ लगाओ.
जनगण-प्रतिनिधि रुष्ट, न अन्ना को भटकाओ..
कहे 'सलिल' कविराय, न नादिरशाही भाती.
आम आदमी खड़ा, वज्र कर अपनी छाती..
*
रामदेव से छल किया, चल शकुनी सी चाल.
अन्ना से मत कर कपट, आएगा भूचाल..
आएगा भूचाल, पलट जाएगी सत्ता.
नहीं गलेगी दाल, कटे मनमोहन पत्ता..
बच न सके सरकार, गिरेगी काम देव से.
लोकपाल हर बार, बचाए घूस देव से..
*
अनशन पर प्रतिबन्ध है, क्यों, बतला दे राज?
जनगण-मन को कुचलना, नहीं सुहाता काज..
नहीं सुहाता काज, लाज थोड़ी तो कर ले.
क्या मुँह ले फहराय, तिरंगा? सच को स्वर दे..
चोरों का सरदार, बना ईमानदार मन.
तज कुर्सी से प्यार, न जन-मन हो अब उन्मन ..
१४-८-२०११
***
गीत
भारत माँ को नमन करें....
*
आओ, हम सब एक साथ मिल
भारत माँ को नमन करें.
ध्वजा तिरंगी मिल फहराएँ
इस धरती को चमन करें.....
*
नेह नर्मदा अवगाहन कर
राष्ट्र-देव का आवाहन कर
बलिदानी फागुन पावन कर
अरमानी सावन भावन कर
राग-द्वेष को दूर हटायें
एक-नेक बन, अमन करें.
आओ, हम सब एक साथ मिल
भारत माँ को नमन करें......
*
अंतर में अब रहे न अंतर
एक्य कथा लिख दे मन्वन्तर
श्रम-ताबीज़, लगन का मन्तर
भेद मिटाने मारें मंतर
सद्भावों की करें साधना 
सारे जग को स्वजन करें.
आओ, हम सब एक साथ मिल
भारत माँ को नमन करें......
*
काम करें निष्काम भाव से
श्रृद्धा-निष्ठा, प्रेम-चाव से
रुके न पग अवसर अभाव से
बैर-द्वेष तज दें स्वभाव से'
जन-गण-मन' गा नभ गुंजा दें
निर्मल पर्यावरण करें.
आओ, हम सब एक साथ मिल
भारत माँ को नमन करें......
*
जल-रक्षण कर पुण्य कमायें
पौध लगायें, वृक्ष बचाएं
नदियाँ-झरने गान सुनाएँ
पंछी कलरव कर इठलायें
भवन-सेतु-पथ सुदृढ़ बनाकर
सबसे आगे वतन करें.
आओ, हम सब एक साथ मिल
भारत माँ को नमन करें......
*
शेष न अपना काम रखेंगे
साध्य न केवल दाम रखेंगे
मन-मन्दिर निष्काम रखेंगे
अपना नाम अनाम रखेंगे
सुख हो भू पर अधिक स्वर्ग से
'सलिल' समर्पित जतन करें.
आओ, हम सब एक साथ मिल
भारत माँ को नमन करें......
१४-८-२०१०
***

सोमवार, 13 जुलाई 2026

जुलाई १२, गीत, कुण्डलिया, दोहा, ग़ज़लिका, व्यंग्य, आभूषण, दाँत, रूबी राय,

 सलिल सृजन जुलाई १२

*
मुक्तक
जय जय करिए मना जयंती सुखद पलों से पाएँ शक्ति।
खुशियाँ ही खुशियाँ देती है ईश-भक्ति, प्रिय प्रति अनुरक्ति।।
मिलता हर्ष याद कर जिसको उसको मिल जाती है मुक्ति-
जिसे याद कर शोक मिले वह तर पाए हैं कहीं न युक्ति।।
०००
गीत
फुलबगिया वह तीर्थ धाम है, जो भव की पीड़ा हर लेता।
करे सुवासित सकल जगत को, जीवन को नव जीवन देता।।
.
धूनी रमा रहे जोगी का, करे अपर्णा ध्यान भंग आ
भस्म हुआ रतिनाथ व्यर्थ ही, माँगी किंतु न मिली थी क्षमा
जो करता है हवन हाथ निज, जला दर्द खुद को ही देता।
फुलबगिया वह तीर्थ धाम है, जो भव की पीड़ा हर लेता।।
.
उड़ें तितलियाँ तो बनती है, हर दिन कोई नहीं कहानी
कर गुंजार कह रहे भँवरे, कर नादानी विहँस सयानी
करे कामना कनक हिरन की, वनजा फाँस कनक मृग लेता।
फुलबगिया वह तीर्थ धाम है, जो भव की पीड़ा हर लेता।।
.
कुंजबिहारी पल-पल हेरे, कहाँ छिपी है मिले राधिका
चाह मिलन की मन में पाले, भटक रही नित विकल साधिका
बरगद बब्बा मौन निहारें, चाह रहा क्या सृष्टि प्रणेता।
फुलबगिया वह तीर्थ धाम है, जो भव की पीड़ा हर लेता।।
.
कुछ फूलों के मुरझाने से, बगिया नहीं मरा करती है।
कुछ शूलों के चुभ जाने से, कली नहीं खिलना तजती है?
जड़ न रहे जड़ चेतन होकर, किसलय अंकुर पल्लव जन्मे
जो जी भर हँसता-मुस्काता, वह जग को जन्नत कर देता
फुलबगिया वह तीर्थ धाम है, जो भव की पीड़ा हर लेता।।
.
१२.७.२०२५
०0०
तुकबंदी
घर की मुर्गी दाल बराबर
कहावतें हैं सत्य सरासर
एक तरफ पड़ता है सूखा
बारिश करती शेष तर-ब-तर
नसबंदी सरकार गिराती
तुकबंदी मन-रंजन बेहतर
जीवन है जंगल सवाल का
कोशिश की पगडंडी उत्तर
जला रहे जो जलकर दुनिया
शांत हो गए खुद जल-बुझकर
कर अभिषेक, आचमन, पग धो
'सलिल' काम आए है सुखकर
काम तमाम तमाम काम का
हुआ न चूर हुए हम थककर
१२.७.२०२४
•••
कुण्डलिया
दाँत दिखाते देखकर, डेनटिस्ट लें फीस
दाँत निपोरो बेधड़क, चमक उठें बत्तीस
चमक उठें बत्तीस, दाँत बज देते ताली
दाँत पीसना नहीं, छटा हो तभी निराली
दाँत पेट में अगर, नहीं तब दाँत दिखाते
दाँत किटकिटा रहे, दाँत को दाँत डराते
*
रहो दाँत में जीभ बन, खट्टे कर दो दाँत।
तिनका पकड़ो दाँत से, व्यर्थ न तोड़ो दाँत।।
व्यर्थ न तोड़ो दाँत, दाँत काटी रोटी हो।
अगर हुए बेदाँत, बड़ी मुश्किल छोटी हो।।
दाँत दूध के टूट सकें हँस राह वह गहो।
दाँत पेट में अगर, बेहतर दूर ही रहो।।
१२-७-२०२१
***
समस्या पूर्ति चरण-तब लगती है चोट
*
तब लगती है चोट जब, दुनिया करे सवाल.
अपनी करनी जाँच लें, तो क्यों मचे बवाल.
*
खुले आम बेपर्द जब, तब लगती है चोट.
हैं हमाम में नग्न सब, फिर भी रखते ओट.
*
लाख गिला-शिकवा करें, सह लेते हम देर.
तब लगती है चोट, जब होता है अंधेर.
*
होती जब निज आचरण, में न तनिक भी खोट.
दोषी करें सवाल जब, तब लगती है चोट.
***
दोहा आभूषण
आभूषण से बढ़ सकी, शोभा किसकी मीत?
आभूषण की बढ़ा दे, शोभा सच्ची प्रीत.
*
'आ भूषण दूँ' टेर सुन, आई वह तत्काल.
भूषण की कृति भेंट कर, बिगड़ा मेरा हाल.
*
गहना गह ना सकी तो, गहना करती रंज.
सास-ननदिया करेंगी, मौका पाकर तंज.
*
अलंकार के लिए थी, अब तक वह बेचैन.
'अलंकार संग्रह' दिया, देख तरेरे नैन.
*
रश्मि किरण मुख पर पड़ी, अलंकार से घूम.
कितनी मनहर छवि हुई, उसको क्या मालूम?
*
अलंकारमय रमा को, पूज रहे सब लोग.
गहने रहित रमेश जी, मन रहे हैं सोग.
*
मिली सुंदरी ज्वेल सी, ज्वेलर हो हूँ धन्य.
माँगे मिली न ज्वेलरी, हुई उसी क्षण वन्य.
***
दोहा सलिला
दोहा मन की बात
*
बात-बात में कर रहा, दोहा मन की बात।
पर न बात बेबात कर, करे कभी आघात।।
*
बात निकलती बात से, बात-बात में जोड़।
दोहा गप्प न मारता, लेकर नाहक होड़।।
*
बिना बात की बात कर, संसद में हुड़दंग।
भत्ते लेकर मचाते, सांसद जनता तंग।।
*
बात काटते बात से, नेता पंडित यार।
पत्रकार पीछे नहीं, अधिवक्ता दमदार।।
*
मार न मारें मारकर, दें बातों से मार।
मीठी मार कभी करे, असर कभी फटकार।।
*
समय बिताने के लिए, लोग करें बतखाव।
निर्बल का बल बात है, सदा करें ले चाव।।
*
वार्ता विद्वज्जन करें, पंडितगण शास्त्रार्थ।
बात 'वाक्' हो जाए तो, विहँस करें वागार्थ।।
*
श्रुति-स्मृति है बात से, लोक-काव्य भी बात।
समझदार हो आमजन, गह पाए गुण तात।।
*
बातें ही वाचिक प्रथा, बातें वार्तालाप।
बात अनर्गल हो अगर, तब हो व्यर्थ प्रलाप।।
*
प्रवचन संबोधन कथा, बातचीत उपदेश।
मन को मन से जोड़ दे, दे परोक्ष निर्देश।।
*
बंधन है आदेश पर, स्वैच्छिक रहे सलाह।
कानाफूसी गुप्त रख, पूरी कर लें चाह।।
*
मन से मन की बात को, कहें मंत्रणा लोग।
बने यंत्रणा वह अगर, तज मत करिए सोग।।
*
बातें ही गपशप बनें, दें मन को आनंद।
जैसे कोई सुनाता, मद्धिम-मधुरिम छंद।।
*
बातें भाषण प्रबोधन, सबक पाठ वक्तव्य।
विगत-आज़ होता विषय, कभी विषय भवितव्य।।
*
केवल बात न काम ही, आता हरदम काम।
बात भले अनमोल हो, कह-सुन लो बेदाम।।
*
बिना बात का बतंगड़, पैदा करे विवाद।
बना सके जो समन्वय, वह करता संवाद।।
*
बात गुफ्तगू हो करे, मन-रंजन बिन मोल।
बात महाभारत बने, हो यदि उसमें झोल।।
*
सबक सिखाती बात या, देती है संदेश।
साखी सीख सबद सभी, एक भिन्न परिवेश।।
*
टाक लैक्चर स्पीच दे, बात करे एड्रैस।
कमुनिकेट कर घटा दें, बातें सारा स्ट्रैस।।
*
बात बात को मात दे, लेती है दिल जीत।
दिल की दूरी दूरकर, बात बढ़ाती प्रीत।।
१२.७.२०१८
***
गीत
*
नहा रहे हैं
बरसातों में
हरे-भरे बतियाते झाड़
अपनी जगह
हमेशा ठांड़े
झूम-झूम मस्ताते झाड़
*
सूर्य-बल्ब
जब होता रौशन
मेक'प करते बिना छिपे.
शाखाओं,
कलियों फूलों से
मिलते, नहीं लजाते झाड़
नहा रहे हैं
बरसातों में
हरे-भरे बतियाते झाड़
अपनी जगह
हमेशा ठांड़े
झूम-झूम मस्ताते झाड़
*
बऊ धरती
आँखें दिखलाये
बहिना हवा उड़ाये मजाक
पर्वत दद्दा
आँख झुकाये,
लता संग इतराते झाड़
नहा रहे हैं
बरसातों में
हरे-भरे बतियाते झाड़
अपनी जगह
हमेशा ठांड़े
झूम-झूम मस्ताते झाड़
*
कमसिन सपने
देख थिरकते
डेटिंग करें बिना हिचके
बिना गये
कर रहे आउटिंग
कभी नहीं पछताते
नहा रहे हैं
बरसातों में
हरे-भरे बतियाते झाड़
अपनी जगह
हमेशा ठांड़े
झूम-झूम मस्ताते झाड़
***
व्यंग्य-
हाय! हम न रूबी राय हुए
- संजीव वर्मा 'सलिल'
*
रात अचानक नींद खुल गयी, उठ भी नहीं सकता था। श्रीमती जी की निद्रा भंग होने की आशंका और फिर अगले दिन ठीक से सो न पाने का उलाहना कौन सुनता? यह भी कि देर रात उठकर तीर भी कौन सा मार लेता? सो 'करवटें बदलते रहे सारी' न सही आधी 'रात हम'... कसम किसकी? यह नहीं बता सकते.... 'श्रीमती जी की' कहा तो गुस्सा "क्यों असगुन कर रहे हो झूठ बोलकर" और किसी और का नाम लिया तो ज़लज़ला ही आ जायेगा सो "परदे में रहने दो पर्दा न उठाओ, पर्दा जो उठ गया तो" रूबी राय बन जाएगा।
चालीस साल इंजीनियरी करने, सामाजिक-साहित्यिक संस्थाओं में सक्रिय रहने और कलम घिसाई करने, ५ पुस्तकें छपाने और सहस्त्रों रचनाएँ करने के बाद बकौल श्रीमती जी "भाड़ झोंकने" के बाद भी दूरदर्शन पर अपने आपके निकट दर्शन कर पाने से वंचित रहा मैं, गत कई दिनों से छोटे पर्दे की एकछत्र साम्राज्ञी महामहिमामयी रूबी राय जी के कीर्तिमान के समक्ष नतमस्तक हो सोचने लगा 'क्यों न टॉपर बन गया?'
मैं ही नहीं, न जाने कितने और भी यही सोच रहे होंगे। जो समझदार हैं उन्होंने सोचा पूरा न सही, आधा ही सही कुछ तो हाथ आये। ऐसे समझदार जनसेवक दो खेमों में बँट गए। कुछ रूबी राय के विरोध में बोलकर-लिखकर सुर्ख़ियों में आ गए, शासन, प्रशासन, कॉलेज प्रबंधन और छात्रों को पानी पीकर कोसने, अरे! नहीं, नहीं तब तो भीषण गर्मी और पानी का अकाल था, इसलिए बिना पानी पिए ही सबको कोस-कोसकर अख़बारों में छपे और दिन - दो दिन की वाहवाही बटोरकर भुला दिए गए। कोसनेवालों के हाथ में दोष - दर्शन के अलावा कोई तर्क नहीं रहा, लोग उनसे मौखिक सहानुभूति जताकर धीरे से सरकने लगे चूँकि अपने गरेबां में झाँकते ही जान गए कि हमाम में सब नंगे हैं। मौका मिलने पर हाथ सेंकनेवाले भी कहाँ पीछे रहे? अपने चेहरे की झलक कैमरे में कैद होते ही सरक लिए। रूबी राय के कारण जो प्रथम आने की मनोकामना पूरी न कर सके थे, वे शुरू में खुश हुए किंतु खुलासे की आग में अपने भी हाथ जलते देख 'सबसे भली चुप्प' के नीति का अनुसरण करने लगे।बाकी रह गये वे जिन्हें मौक़ा ही नहीं मिला, ऐसे लोग मौके की तलाश में आगे आये किन्तु यह अहसास होते ही कि कल मौका देनेवाले उनसे दूर हो जायेंगे, पीठ दिखाकर भाग खड़े हुए।
कुछ अधिक समझदार जननायक बनने की तैयारी कर आरंभ में मौन रहकर हालात का जायज़ा लेते रहे और फिर धीरे से समर्थन में आ खड़े हुए और मौखिक संवेदना जताने लगे। इनके तर्क अधिक दमदार हैं। भारत में हर गलत को सही सिद्ध करने का सर्वाधिक प्रभावशाली शस्त्र मानवाधिकार है। आतंकी सौ निर्दोषों को मार दे तो कोई बात नहीं, सेना या पुलिस आतंकी को मारने की बात सोचे भी तो मानवाधिकार पर बिजली गिर जाती है। किसी अपराधी मानसिकता के नराधम ने किसी अबला के साथ कुकृत्य किया तो व्यवस्था दोष को लेकर हंगामा और जब दण्ड देने की बात सामने आये तो अपराधी के कमसिन होने, गरीब होने, अशिक्षित होने याने किसी न किसी बात का बतंगड़ कर अपराधी को नाममात्र का दण्ड दिलाकर या दण्ड-मुक्त कराने की दुहाई देकर अपनी पीठ आप ठोंकने का मौका तलाशना मानवाधिकारवादियों का प्रिय शगल है। कोइ रईसजादा इन्हें इस से भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनकी बात न्यायालय में टिकी या नहीं? उन्हें मतलब सिर्फ इस बात से है कि सुर्खियाँ बटोरीं, कतरने विदेश भेजीं और अपने एन. जी. ओ. के लिए डोनेशन बटोरकर अपने निजी ऐशो-आराम पर खर्च किया। किस्मत ने साथ दिया और दमदार नेता की कोई कमी पकड़ ली तो उसे उजागर न करने का सौदा कर 'पदम' पाने का जुगाड़ याने आम के आम गुठली के भी दाम। रूबी राय ऐसे मानवाधिकारवादियों (?) के लिए सुनहरा मौका है।
रूबी राय एक लॉटरी है जो खुल गयी है स्त्री विमर्शवादियों के नाम पर। लॉटरी भी ऐसी जिसका टिकिट ही नहीं खरीदना पड़ा। इनका तर्क यह है कि वह कमसिन है, अबला है, निर्दोष-नासमझ है, धोखे से फँसाई गयी है। स्त्री विमर्शवादी द्रौपदी, अहल्या, मंदोदरी, शूर्पणखा, शबरी और न जाने किस-किस के गड़े मुर्दे उखाड़कर सिद्ध कर देंगे कि इस देश में नारी का दमन और शोषण ही किया गया है, कभी मान, प्यार, लाड़ नहीं दिया गया। बहुत आसानी से भुला दिया जाएगा कि इसी देश में कहा गया 'काह न अबला कर सके?' कहकर नारी की सामर्थ्य को आलोचकों ने भी स्वीकारा है। इसी देश में 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता' कह कर नारी की वंदना की गयी। इसी देश में विद्या, धन और शक्ति की अधिष्ठात्री नारी ही मान्य है जिसकी उपासना कर नर खुद को धन्य मानता है। इनसे पूछ लिया जाए कि उन्हें लाड़ नहीं मिला तो जन्म के बाद सुरक्षित कैसे रहीं? उन्हें प्यार नहीं मिला तो वे अपने सुहाग पर नाज़ क्यों करती हैं और संतान कहाँ से आई? उन्हें सम्मान नहीं मिला तो घर में उनकी मर्जी के बिना पत्ता भी क्यों नहीं खड़कता? तो वे बगलें झाँकती नज़र आएँगी।
लोकतंत्र की विधायिका के अपरिहार्य अंग विपक्ष के लिए तो यह प्रसंग सोने का अंडा देनेवाली मुर्गी की तरह है।अपने सत्ताकाल में हुईं इस जैसी और इससे भी बड़ी गड़बड़ियों को भूलकर इस प्रसंग को लेकर जुलूस, नारेबाजी, सभाएँ, अखबारबाजी और खबरी चैनलों पर भाषणबाजी का यह सुनहरा मौका है। सत्ता पक्ष की आलोचना, सरकार को कटघरे में खड़ा करना, सत्ता के सच को झूठ और विपक्ष के झूठ को सच कहना, कुर्सी से दूर रहने तक अपना जन्मसिद्ध अधिकार माननेवाले, सत्ता हेतु समर्पित राजनैतिक लोगों के लिए रूबी-प्रसंग अलादीन का चिराग है, घिसते रहो कभी न कभी तो जिन्न निकलेगा ही। "मंज़िल मिले, मिले न मिले, और बात है / मंज़िल की जुस्तजू में मेरा (इनका) कारवां तो है।" इनका बस चले तो ये रूबी मैया की जय का जयकारा लगते हुए विधान सभा के गलियारे में व्रत-कथा भी करने लगें।
यह प्रसंग परिवार के व्यक्तिगत विरोधियों के लिए भी एक अवसर है किन्तु वे जुबानी चटखारे ले - लेकर परनिंदा रस का आनंद लेने से अधिक नहीं सकेंगे कि इससे अधिक की उनकी औकात ही नहीं है। कॉलेज के व्यवसायगत विरोधियों के लिए यह मौका है खुद को बढ़ाने का। इसलिए नहीं कि वे ऐसा फिर नहीं होने देना चाहते बल्कि इसलिए कि ऐसा चाहनेवाले अब बड़ी रकम देकर उनकी संस्था में प्रवेश लें और अगले कई वर्षों तक कुशलतापूर्वक ऐसे कारनामे करने का अवसर उन्हें मिले।
पराई आग में हाथ सेंकने की आदी खबरिया बिरादरी के छुटभैये इस घटना को नमक-मिर्च लगाकर इस आस में बखानते रहेंगे कि उनका कद बढ़ जाए लेकिन उनके आका उनसे कई कदम आगे हैं। वे छुटभैयों द्वारा जुटाए गए मसाले सनसनीखेज़ बनाकर सबसे पहले परोसने की नूरा कुश्ती कर टी. आर. पी. बढ़ाने में प्राण-प्राण से संलग्न होकर, कॉलेजों से विज्ञापन जुटाकर अपना उल्लू सीधा करेंगे। यही नहीं ऐसे मामलों से होनेवाली कमाई का अंदाज़ कर अपना कॉलेज आरम्भ करने में भी पीछे नहीं रहेंगे।इसलिए निकट भविष्य में ऐसे अनेक प्रकरण हर राज्य और विश्वविद्यालय में होने लगें तो 'किमाश्चर्यम?' अर्थात कोई आश्चर्य नहीं।
यहाँ तक तो फिर भी गनीमत है लेकिन बात यहीं नहीं रूकती, यह प्रसंग सत्ता पक्ष के लिए भी मौके को भुनाने की तरह है। जाँच के नाम पर एक जाँच आयोग गठित कर अपने चहेतों को नियुक्त कर मुख्य मंत्री जी विद्यार्थी वर्ग जो कल मतदाता बनेगा, के बीच अपनी स्वच्छ छवि बनायेँगे। जाँच आयोग सुरसा के मुँह की तरह अपना कार्यकाल और बजट बढ़ाता जाएगा और जब उसके घपले सामने आयेंगे तो एक साथ गवाहों की दुर्घटना या बीमारियों से मौतें होने लगेंगी। नेताओं को राजनीति की रोटियां सेंकने के नए अवसर मिलते रहेंगे।
इस घटना के बाद रूबी राय व्यक्ति नहीं प्रवृत्ति बन गयी है। हम सबमें कहीं न कहीं रूबी राय है। वह जब भी नज़र आये तो उसे उकसाने नहीं, दबाने की जरूरत है कि वह गलत तरीके या छोटे मार्ग से शीर्ष तक जाने की बात न सोचे।
रूबी राय को इस मुकाम पर पहुँचाने का श्रेय है उसके माता-पिता, कॉलेज प्रबंधक, उत्तर पुस्तिका जाँचकर्ता और नियति को भी है। जो हुआ वह सब होने के बाद भी यदि रूबी राय शीर्ष पर न आकर कुछ नीचे आतीं ८ वें-१० वें क्रमांक पर, तो उनकी चर्चा ही न होती। अभी भी उनके अलावा किस-किस ने किस प्रकार कितने अंक और कौन सा स्थान इसके पहले पाया या बाद में पाएगा यह कोई नहीं बता सकता।रूबी के जीवन में जटिलता और बदनामी का उसे सामना करना ही होगा, उसके परिजन उसे सहारा दें और इतना सबल बनायें कि वह परिश्रम कर उत्तम परिणाम लाये और जिन में कुछ बन सके।
लाख टके का सवाल यह है कि क्या इस सबके बाद भी रूबी राय, उनके स्वजन, कॉलेज प्रबंधन या अन्य छात्र ऐसा करने से तौबा करेंगे? अगर नहीं तो इसका यही अर्थ है कि मिल रही सजा कम है। हमारे समाज की यही विडंबना है कि सही को सराहनेवाले नहीं मिलते पर गलत के प्रति सहानुभूति जतानेवाले रेडीमेड होते हैं। इसे संयोग कहें या दुर्योग सच यह है कि शिक्षा के नाम पर अंकों और उपाधियों का फर्जीवाड़ा सड़ गए नासूर की तरह बजबजा रहा है। दो ही रास्ते हैं दोषियों को कड़ा दण्ड या रहमदिली के साथ और बढ़ने का अवसर देना।पौ फटती देख मन मसोस कर उठ रहे हैं कि हाय! हम क्यों न हुए रूबी राय ? हो पाते तो दूरदर्शन और छाने के साथ हमारे हमदर्दों की भी बड़ी संख्या होती।
१२.७.२०१६
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ग़ज़लिका :
मन में यही...
*
मन में यही मलाल है.
आदम हुआ दलाल है..
लेन-देन ही सभ्यता
ऊँच-नीच जंजाल है
फतवा औ' उपदेश भी
निहित स्वार्थ की चाल है..
फर्ज़ भुला हक माँगता
पढ़ा-लिखा कंगाल है..
राजनीति के वाद्य पर
गाना बिन सुर-ताल है.
बहा पसीना जो मिले
रोटी वही हलाल है..
दिल से दिल क्यों मिल रहे?
सोच मूढ़ बेहाल है..
'सलिल' न भय से मौन है.
सिर्फ तुम्हारा ख्याल है..
१२-७-२०१०
*

मंगलवार, 7 जुलाई 2026

जुलाई ७, शोक गीत, दोहा गजल, हाइकु गीत, सॉनेट, संस्कृति, कुण्डलिया, हरिगीतिका, गीत

सलिल सृजन जुलाई ७
*
शोक गीत ० प्रिय अशोक जी शोक दे गए . जीवन क्षण भंगुर है माना नहीं किसी का सदा ठिकाना लेकिन ऐसे अकस्मात ही सबको किया हाय! बेगाना अलस्सुबह सुरलोक को गए प्रिय अशोक जी शोक दे गए . ऋतु पावस की कैसी आई दारुण दुख बेबस पहुनाई स्तब्ध वंदना का क्रंदन सुन कँपीं दिशाएँ, भू थर्राई यादें अनगिन मधुर दे गए प्रिय अशोक जी शोक दे गए . आँखों में वे मंजर छाए जब जब भुज भर गले लगाए गूँज रहे हैं गप्प-ठहाके जो हमने थे साथ लगाए सूने नैन वियोग दे गए प्रिय अशोक जी शोक दे गए ७.७.२०२६
००० 
दोहा गजल
प्रभु! निर्मल मति दें मुझे, और भक्ति निष्काम।
कर्म तुम्हें अर्पित करूँ, चित्रगुप्त सुखधाम।।
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फल की आशा हो नहीं, सफल-विफल सम जान।
पल पल कोशिश कर सके, हे हरि तन अविराम।।
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मन-मंथन से मिल सके, अमृत भोले नाथ।
सुख-दुख मुझको सम लगें, हो पाऊँ बेनाम।।
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स्वर्ग न मुझको चाहिए, नहीं नर्क की माँग।
अनायास जब जो दिया, उसके लिए प्रणाम।।
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जीव रहे संजीव हरि, सलिल बने निर्माल्य।
तेरा तुझको समर्पित, हारे को हरिनाम।।
७.७.२०२५
०0०
सॉनेट
आदित्य
आदित्य भुवन भास्कर वंदन,
ऊषापति दिनपति दिनकर हे!
रवि रश्मिराज रतनारनयन,
तिमिरारि अरुण तम-अंतक हे।
हे दिव्य दिवाकर, हे दिनेश,
किरणेश सतरथी छायापति,
हो पूत प्रभाकर थिर न लेश,
निष्काम काम करते ग्रहपति।
वेतन न मिले सप्ताश्वरथी,
पद उन्नति की भी फ़िक्र नहीं,
कश्यपसुत लोहित तेजपुंज,
तुम सम प्रकाशपति है न कहीं।
हो राहु-केतु रिपु सदा अजित।
सलिलेश! रखो हमको अविजित।
७-७-२०२३
(सूर्य के २५ पर्यायवाची, २+५=७, सूर्य रश्मि में सात रंग, सूर्य रथ में सात अश्व)
***
सॉनेट
अँगुली
*
ठेंगा देखा-दिखा रहे हम
पा आजादी, मोल न जानें
लगा अँगूठा अँखियाँ थीं नम
पढ़-लिख बढ़ना मन में ठानें
दादागिरी अँगूठा करता
अंगुलियों को रही शिकायत
एक दबाए चार-चार को
आओ! हम मिल करें बगावत
लोकतंत्र मतदान दिवस पर
उठी तर्जनी नेता चुनने
पहन अँगूठी झट अनामिका
सपने लगी ब्याह के बुनने
मिली कनिष्ठा अरु अनामिका
राज्य हो गया साम-दाम का
७-७-२०२२
•••
दोहा सलिला:
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अधिक कोण जैसे जिए, नाते हमने मीत।
न्यून कोण हैं रिलेशन, कैसे पाएँ प्रीत।।
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हाथ मिला; भुज भेंटिए, गले मिलें रह मौन।
किसका दिल आया कहाँ बतलायेगा कौन?
*
रिमझिम को जग देखता, रहे सलिल से दूर।
रूठ गया जब सलिल तो, उतरा सबका नूर।।
*
माँ जैसा दिल सलिल सा, दे सबको सुख-शांति।
ममता के आँचल तले, शेष न रहती भ्रांति।।
*
वाह, वाह क्या बात है, दोहा है रस-खान।
पढ़; सुन-गुण कर बन सके, काश सलिल गुणवान।।
*
आप कहें जो वह सही, एक अगर ले मान।
दूजा दे दूरी मिटा, लोग कहें गुणवान।।
*
यह कवि सौभाग्य है, कविता हो नित साथ।
चले सृजन की राह पर, लिए हाथ में हाथ।।
*
बात राज की एक है, दीप न हो नाराज।
ज्योति प्रदीपा-वर्तिका, अलग न करतीं काज।।
*
कभी मान-सम्मान दें, कभी लाड़ या प्यार।
जिएँ ज़िंदगी साथ रह, करें मान-मनुहार।।
*
साथी की सब गलतियाँ, विहँस कीजिए माफ़।
बात न दिल पर लें कभी, कर सच्चा इंसाफ।।
*
साथ निभाने का यही, पाया एक उपाय।
आपस में बातें करें, बंद न हो अध्याय।।
*
खुद को जो चाहे कहो, दो न और को दोष।
अपना गुस्सा खुद पियो, व्यर्थ गैर पर रोष।।
*
सबक सृजन से सच मिला, आएगा नित काम।
नाम मिले या मत मिले, करे न प्रभु बदनाम।।
*
जो न सके कुछ जान वह, सब कुछ लेता जान।
जो भी शब्दातीत है, सत्य वही लें मान।।
*
ममता छिप रहती नहीं, लिखा न जाता प्यार।
जिसका मन खाली घड़ा, करे शब्द-व्यवहार।।
*
७.७.२०१८
***
विमर्श
ग्रामीण संस्कृति नागर संस्कृति
भारत माता ग्रामवासिनी कवि सुमित्रानंदन पंत ने कहा था क्या आज हम यह कह सकते हैं क्या हमारे ग्राम अब वैसे ग्राम बचे हैं जिन्हें ग्राम कहा जाए गांव की पहचान पनघट चौपाल खलिहान वनडे घुंघरू पायल कंगन बेंदा नथ चूड़ी कजरी आल्हा पूरी राई अब कहां सुनने मिलते हैं इनके बिना गांव-गांव नहीं रहे गांव शरणार्थी होकर शहर की ओर आ रहा है और शहर क्या है जिनके बारे में अज्ञ लिखते हैं सांप तुम सभ्य तो हुए नहीं शहर में बसना तुम्हें नहीं आया एक बात पूछूं उत्तर दोगे डसना कहां से सीखा जहर कहां से पाया तो शहर में जहां आदमी आदमी को डसना सीखता है जहां आदमी जहर पालना सीखता है तो वह गांव जो पुरवइया और पछुआ से संपन्न था वह गांव जो अपनेपन से सराबोर था वह गांव जो रिश्ते नातों को जीना जानता था वह गांव जहां एक कमाता वह खा लेते थे वह भागकर चेहरा रहा है कौन से शहर में जहां 6 काम आए तो 1 को नहीं पाल सकते जहां सांस लेने के लिए ताजी हवा नहीं है जहां रास्तों की मौत हो रही है जहां माता-पिता के लिए वृद्ध आश्रम बनाए जाते हैं जहां नौनिहालों के लिए अनाथालय बनाए जाते हैं जहां निर्मल ओं के लिए महिला आश्रम आश्रम रैन बसेरों की व्यवस्था की जाती है हम जीवन को कहां से कहां ले जा रहे हैं यह सोचने की बात है क्या हम इन चेहरों को वैसा बना पाएंगे जहां कोई राधा किसी का ना के साथ राजा पाए क्या यह शहर कभी ऐसे होंगे जहां किसी मीरा को कष्ट का नाम लेने पर विश्वास न करना पड़े शहरों में कोई पार्वती कवि किशन कर पाएगी हम ना करें लेकिन सत्य को भी ना करें हम अपनों को ऐसा शहर कब बना सकते हैं अपने गांव को शहर की ओर भागने से कैसे रोक सकते हैं यह हमारे चिंतन का विषय होना चाहिए हमारी सरकारें लोकतंत्र के नाम पर चन्द्र के द्वारा लोक का गला घोट रहे हैं जिनके नाम पर उनके द्वारा जनमत को कुचल रही हैं हमारे तंत्र की कोई जगह नहीं है हमारा को केवल गुलाम समझता है आप किसी भी सरकारी कार्यालय में जाकर देखें आपको एक मेज और कुर्सी मिलेगी कुर्सी पर बैठा व्यक्ति के सामने खड़े व्यक्ति को क्या अपना अन्नदाता समझता है यह व्यक्ति है उसके द्वारा दी कुर्सी पर बैठे व्यक्ति की तनखा का भुगतान होता है लेकिन मानसिकता की कुर्सी पर बैठा व्यक्ति अपने आपको राजा समझता है गुलाम शायद पराधीनता काल में हम इतने पराधीन नहीं थे जितने अभय हमारे गांव स्वतंत्रता पूर्वक ने बेबस नहीं थे जितने अब हैं स्वतंत्रता के पूर्व हमारे आदिवासी का वनों पर अधिकार था जो अब नहीं है पहले वह महुआ तोड़ कर बैठ सकता था पेट पाल सकता था अपराधी नहीं था अब वह वनोपज तोड़ नहीं सकता वह वन विभाग की संपत्ति है पहले सरकारी जमीन पर आप पेड़ होए तो जमीन भले सरकार की हो पेड़ की फसल आपकी होती थी आप का मालिकाना हक होता था अब नहीं पहले किसान फसल उगाता था घर के पन्नों में भर लेता था विजय बना लेता था जब जितने पैसे की जरूरत है उतनी फसल निकालकर भेजता था और अपना काम चलाता था अब किसान बीज नहीं बना सकता यह अपराधी अपनी फसल नहीं सकता बंधुआ मजदूर की तरह कृषि उपज मंडी में ले जाने के लिए विवश है जहां उसे फसल को गेहूं को खोलने के लिए रिश्वत देनी पड़ती जहां रिश्वत देने पर घटिया गेहूं के दाम ज्यादा लग जाते हैं जहां रिश्वत न देने पर लगते हैं हम हम शहरों की ओर जा सके हमारा शहरीकरण कम हो गांधी ने कहा था कि हम कुटीर उद्योगों की बात करें उद्योगों की बात करें हमारे गांव आत्मनिर्भर आज उन्होंने हमें यही सबक दिया कि गांव के शहरों में जाकर अपना पसीना बहाकर सेठ साहूकारों उद्योग पतियों की बिल्डिंग खड़ी करते हैं उन्हें अरबपति बनाते हैं उद्योगपति हैं कि संकट आने पर अपनों को अपनों को 2 महीने 4 महीने भी नहीं सकते गांव के बेटे को सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलना पड़ेगा उस गांव में रोजी-रोटी ना होने के कारण छोड़ कर गया था अब जब ढलान पर है उसे क्या काम मिलेगा लेकिन मुझे विश्वास है उसे पा लेगा क्योंकि गांव के मन में उदारता है शहर में पड़ता है शहर में कुटिलता है गांव में सरलता है लेकिन हमारे को भी राजनीति राजनीति सामाजिक जीवन सुखद हो पाएगा हमारे मन में बसे निर्मल हो
***
हाइकु गीत
*
बोल रे हिंदी
कान में अमरित
घोल रे हिंदी
*
नहीं है भाषा
है सभ्यता पावन
डोल रे हिंदी
*
कौन हो पाए
उऋण तुझसे, दे
मोल रे हिंदी?
*
आंग्ल प्रेमी जो
तुरत देना खोल
पोल रे हिंदी
*
झूठा है नेता
कहाँ सच कितना?
तोल रे हिंदी
७-७-२०१९
***
दोहा सलिला:
*
दिल ने दिल को दे दिया, दिल का लाल सलाम।
दिल ने बेदिल हो कहा, सुनना नहीं कलाम।।
*
दिल बुजदिल का क्या हुआ, खुशदिल रहा न आप।
था न रहा अब जवां दिल, गीत न सुन दे थाप।।
*
कौन रहमदिल है यहाँ?, दिल का है बाज़ार।
पाया-खोया ने किया, हर दिल को बेज़ार।।
*
दिलवर दिल को भुलाकर, जब बनता दिलदार।
सह न सके तब दिलरुबा, कैसे हो आज़ार।।
*
टूट गया दिल पर न की, किंचित भी आवाज़।
दिल जुड़ता भी किस तरह, भर न सका परवाज़।।
*
दिल दिल ने ले तो लिया पर, दिया न दिल क्यों बोल?
दिल ही दिल में दिल रहा, मौन लगता बोल।।
*
दिल दिल पल-पल दुखता रहा, दिल चल-चल बेचैन।
थक-थककर दिल रुक गया, दिल ने पाया चैन।।
*
दिल के हाथों हो गया, जब-जब दिल मजबूर।
दिल ने अन्देखी करी, दिल का मिटा गुरूर।।
*
दिल के संग न संगदिल, का हो यारां साथ।
दिल को रुचा न तंगदिल, थाम न पाया हाथ।।
***
७.७.२०१८
***
छंद परिचय
कुण्डलिया का वृत्त है दोहा-रोला युग्म
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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[लेखक परिचय: जन्म: २०-८-१०५२, मंडला मध्य प्रदेश। शिक्षा: डी. सी. ई., बी. ई. एम्. आई. ई., एम्. ए. (अर्थशास्त्र, दर्शनशास्त्र), एलएल. बी., डिप्लोमा पत्रकरिता। प्रकाशित कृतियाँ: १. कलम के देव भक्ति गीत, २. भूकंप के साथ जीना सीखें लोकोपयोगी तकनीकी, ३. लोकतंत्र का मकबरा कवितायेँ, ४. मीत मेरे कवितायेँ, ५. काल है संक्रांति का गीत-नवगीत, ६. कुरुक्षेत्र गाथा प्रबंध काव्य, काव्यानुवाद: सौरभ:, यदा-कदा। संपादित: ९ पुस्तकें, १६ स्मारिकाएँ, ८ पत्रिकाएँ। ३६ पुस्तकों में भूमिका लेखन, ३०० से अधिक समीक्षाएँ, अंतरजाल पर अनेक ब्लॉग, फेसबुक पृष्ठ ६००० से अधिक रचनाएँ, हिंदी में तकनीकी शोध लेख, छंद शास्त्र में विशेष रूचि। मेकलसुता पत्रिका में दोहा के अवदान पर पर ३ वर्ष तक लेखमाला, हिन्दयुग्म.कोम में छंद लेखन पर २ वर्ष तथा साहित्यशिल्पी.कोम में ८० अलंकारों पर लेखमाला। वर्तमान में साहित्यशिल्पी में 'रसानंद है छंद नर्मदा' लेखमाला में ८० छंद प्रकाशित। संपर्क: २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, चलभाष: ९४२५१८३२४४, salil.sanjiv@gmail.com]
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कुण्डलिया हिंदी के कालजयी और लोकप्रिय छंदों में अग्रगण्य है। एक दोहा (दो पंक्तियाँ, १३-११ पर यति, विषम चरण के आदि में जगण वर्जित, सम चरणान्त गुरु-लघु या लघु-लघु-लघु) तथा एक रोला (चार पंक्तियाँ, ११-१३ पर यति, विषम चरणान्त गुरु-लघु या लघु-लघु-लघु, सम चरण के आदि में जगण वर्जित, सम चरण के अंत में २ गुरु, लघु-लघु-गुरु या ४ लघु) मिलकर षट्पदिक (छ: पंक्ति) कुण्डलिनी छंद को आकार देते हैं। दोहा और रोला की ही तरह कुण्डलिनी भी अर्ध सम मात्रिक छंद है। दोहा का अंतिम या चौथा चरण, रोला का प्रथम चरण बनाकर दोहराया जाता है। दोहा का प्रारंभिक शब्द, शब्द-समूह या शब्दांश रोला का अंतिम शब्द, शब्द-समूह या शब्दांश होता है। प्रारंभिक और अंतिम शब्द, शब्द-समूह या शब्दांश की समान आवृत्ति से ऐसा प्रतीत होता है मानो जहाँ से आरम्भ किया वही लौट आये, इस तरह शब्दों के एक वर्तुल या वृत्त की प्रतीति होती है। सर्प जब कुंडली मारकर बैठता है तो उसकी पूँछ का सिरा जहाँ होता है वहीं से वह फन उठाकर चतुर्दिक देखता है।
चित्र में ये शामिल हो सकता है: बाहर१. कुण्डलिनी छंद ६ पंक्तियों का छंद है जिसमें एक दोहा और एक रोला छंद होते हैं।
२. दोहा का अंतिम चरण रोला का प्रथम चरण होता है।
३. दोहा का आरंभिक शब्द, शब्दांश, शब्द समूह या पूरा चरण रोला के अंत में प्रयुक्त होता है।
४. दोहा तथा रोला अर्ध सम मात्रिक छंद हैं। इनके आधे-आधे हिस्सों में समान मात्राएँ होती हैं।
अ. दोहा में २ पंक्तियाँ होती हैं, प्रत्येक के २ चरणों में १३+११=२४ मात्राएँ होती हैं. दोनों पंक्तियों में विषम (पहले, तीसरे) चरण में १३ मात्राएँ तथा सम (दूसरे, चौथे) चरण में ११ मात्राएँ होती हैं।
आ. दोहा के विषम चरण के आदि में जगण (जभान, लघुगुरुलघु जैसे अनाथ) वर्जित होता है। शुभ शब्द जैसे विराट अथवा दो शब्दों में जगण जैसे रमा रमण वर्जित नहीं होते।
इ. दोहा के विषम चरण का अंत रगण (राजभा गुरुलघुगुरु जैसे भारती) या नगण (नसल लघुलघुलघु जैसे सलिल) से होना चाहिए।
ई. दोहा के सम चरण के अंत में गुरुलघु (जैसे ईश) होना आवश्यक है।
उदाहरण:
समय-समय की बात है, समय-समय का फेर।
जहाँ देर है वहीं है, सच मानो अंधेर।।
उ. दोहा के लघु-गुरु मात्राओं की संख्या के आधार पर २३ प्रकार होते हैं।
५. रोला भी अर्ध सम मात्रिक छंद है अर्थात इसके आधे-आधे हिस्सों में समान मात्राएँ होती हैं।
क. रोला में ४ पंक्तियाँ होती हैं, प्रत्येक के २ चरणों में ११+१३=२४ मात्राएँ होती हैं। दोनों पंक्तियों में विषम (पहले, तीसरे, पाँचवे, सातवें) चरण में ११ मात्राएँ तथा सम (दूसरे, चौथे, छठवें, आठवें) चरण में १३ मात्राएँ होती हैं।
का. रोला के विषम चरण के अंत में गुरुलघु (जैसे ईश) होना आवश्यक है।
कि. रोला के सम चरण के आदि में जगण (जभान, लघुगुरुलघु जैसे अनाथ) वर्जित होता है। शुभ शब्द जैसे विराट अथवा दो शब्दों में जगण जैसे रमा रमण वर्जित नहीं होते।
की. रोला के सम चरण का अंत रगण (राजभा गुरुलघुगुरु जैसे भारती) या नगण (नसल लघुलघुलघु जैसे सलिल) से होना चाहिए।
उदाहरण: सच मानो अंधेर, मचा संसद में हुल्लड़।
हर सांसद को भाँग, पिला दो भर-भर कुल्हड़।।
भाँग चढ़े मतभेद, दूर हो करें न संशय।
नाचें गायें झूम, सियासत भूल हर समय।।
६. कुण्डलिनी:
समय-समय की बात है, समय-समय का फेर।
जहाँ देर है, है वहीं, सच मानो अंधेर।।
सच मानो अंधेर, मचा संसद में हुल्लड़।
हर सांसद को भाँग, पिला दो भर-भर कुल्हड़।।
भाँग चढ़े मतभेद, दूर हो करें न संशय।
करें देश हित कार्य, सियासत भूल हर समय।।
*
कुण्डलिया छन्द का विधान उदाहरण सहित
दोहा:
समय-समय की बात है
१११ १११ २ २१ २ = १३ मात्रा / अंत में लघु गुरु के साथ यति
समय-समय का फेर।
१११ १११ २ २१ = ११ मात्रा / अंत में गुरु लघु
जहाँ देर है, है वहीं
१२ २१ २ १२ २ = १३ मात्रा / अंत में लघु गुरु के साथ यति
सच मानो अंधेर
११ २२ २२१ = ११ मात्रा / अंत में गुरु लघु
रोला:
सच मानो अंधेर (दोहा के अंतिम चरण का दोहराव)
११ २२ २२१ = ११ मात्रा / अंत में गुरु लघु
मचा संसद में हुल्लड़
१२ २११ २ २११ = १३ मात्रा / अंत में गुरु लघु लघु [प्रभाव गुरु गुरु] के साथ यति
हर सांसद को भाँग
११ २११ २ २१ = ११ मात्रा / अंत में गुरु लघु
पिला दो भर-भर कुल्हड़
१२ २ ११ ११ २११ = १३ मात्रा / अंत में गुरु लघु लघु (प्रभाव गुरु गुरु) के साथ यति
भाँग चढ़े मतभेद
२१ १२ ११२१ = ११ मात्रा / अंत में गुरु लघु
दूर हो, करें न संशय
२१ २ १२ १ २११ = १३ मात्रा / अंत में गुरु लघु लघु के साथ यति
करें देश हित कार्य
करें देश-हित कार्य = ११ मात्रा / अंत में गुरु लघु
सियासत भूल हर समय
१२११ २१ ११ १११ = १३ मात्रा / अंत में लघु लघु लघु के साथ यति
उदाहरण -
०१. कुण्डलिया है जादुई, छन्द श्रेष्ठ श्रीमान।
दोहा रोला का मिलन, इसकी है पहिचान।।
इसकी है पहिचान, मानते साहित सर्जक।
आदि-अंत सम-शब्द, साथ बनता ये सार्थक।।
लल्ला चाहे और, चाहती इसको ललिया।
सब का है सिरमौर छन्द, प्यारे, कुण्डलिया।। - नवीन चतुर्वेदी
०२. भारत मेरी जान है, इस पर मुझको नाज़।
नहीं रहा बिल्कुल मगर, यह कल जैसा आज।।
यह कल जैसा आज, गुमी सोने की चिड़िया।
बहता था घी-दूध, आज सूखी हर नदिया।।
करदी भ्रष्टाचार- तंत्र ने, इसकी दुर्गत।
पहले जैसा आज, कहाँ है? मेरा भारत।। - राजेंद्र स्वर्णकार
०३. भारत माता की सुनो, महिमा अपरम्पार ।
इसके आँचल से बहे, गंग जमुन की धार ।।
गंग जमुन की धार, अचल नगराज हिमाला ।
मंदिर मस्जिद संग, खड़े गुरुद्वार शिवाला ।।
विश्वविजेता जान, सकल जन जन की ताकत ।
अभिनंदन कर आज, धन्य है अनुपम भारत ।। - महेंद्र वर्मा
०४. भारत के गुण गाइए, मतभेदों को भूल।
फूलों सम मुस्काइये, तज भेदों के शूल।।
तज भेदों के, शूल / अनवरत, रहें सृजनरत।
मिलें अँगुलिका, बनें / मुष्टिका, दुश्मन गारत।।
तरसें लेनें. जन्म / देवता, विमल विनयरत।
'सलिल' पखारे, पग नित पूजे, माता भारत।।
(यहाँ अंतिम पंक्ति में ११ -१३ का विभाजन 'नित' ले मध्य में है अर्थात 'सलिल' पखारे पग नि/त पूजे, माता भारत में यति एक शब्द के मध्य में है यह एक काव्य दोष है और इसे नहीं होना चाहिए। 'सलिल' पखारे चरण करने पर यति और शब्द एक स्थान पर होते हैं, अंतिम चरण 'पूज नित माता भारत' करने से दोष का परिमार्जन होता है।)
०५. कंप्यूटर कलिकाल का, यंत्र बहुत मतिमान।
इसका लोहा मानते, कोटि-कोटि विद्वान।।
कोटि-कोटि विद्वान, कहें- मानव किंचित डर।
तुझे बना ले, दास अगर हो, हावी तुझ पर।।
जीव श्रेष्ठ, निर्जीव हेय, सच है यह अंतर।
'सलिल' न मानव से बेहतर कोई कंप्यूटर।।
('सलिल' न मानव से बेहतर कोई कंप्यूटर' यहाँ 'बेहतर' पढ़ने पर अंतिम पंक्ति में २४ के स्थान पर २५ मात्राएँ हो रही हैं। उर्दूवाले 'बेहतर' या 'बिहतर' पढ़कर यह दोष दूर हुआ मानते हैं किन्तु हिंदी में इसकी अनुमति नहीं है। यहाँ एक दोष और है, ११ वीं-१२ वीं मात्रा है 'बे' है जिसे विभाजित नहीं किया जा सकता। 'सलिल' न बेहतर मानव से' करने पर अक्षर-विभाजन से बच सकते हैं पर 'मानव' को 'मा' और 'नव' में तोड़ना होगा, यह भी निर्दोष नहीं है। 'मानव से अच्छा न, 'सलिल' कोई कंप्यूटर' करने पर पंक्ति दोषमुक्त होती है।)
०६. सुंदरियाँ घातक 'सलिल', पल में लें दिल जीत।
घायल करें कटाक्ष से, जब बनतीं मन-मीत।।
जब बनतीं मन-मीत, मिटे अंतर से अंतर।
बिछुड़ें तो अवढरदानी भी हों प्रलयंकर।।
असुर-ससुर तज सुर पर ही रीझें किन्नरियाँ।
नीर-क्षीर बन, जीवन पूर्ण करें सुंदरियाँ।।
(इस कुण्डलिनी की हर पंक्ति में २४ मात्राएँ हैं। इसलिए पढ़ने पर यह निर्दोष प्रतीत हो सकती है। किंतु यति स्थान की शुद्धता के लिये अंतिम ३ पंक्तियों को सुधारना होगा।
'अवढरदानी बिछुड़ / हो गये थे प्रलयंकर', 'रीझें सुर पर असुर / ससुर तजकर किन्नरियाँ', 'नीर-क्षीर बन करें / पूर्ण जीवन सुंदरियाँ' करने पर छंद दोष मुक्त हो सकता है।)
०७. गुन के गाहक सहस नर, बिन गन लहै न कोय।
जैसे कागा-कोकिला, शब्द सुनै सब कोय।।
शब्द सुनै सब कोय, कोकिला सबै सुहावन।
दोऊ को इक रंग, काग सब लगै अपावन।।
कह 'गिरधर कविराय', सुनो हे ठाकुर! मन के।
बिन गुन लहै न कोय, सहस नर गाहक गुन के।। - गिरधर
कुण्डलिनी छंद का सर्वाधिक और निपुणता से प्रयोग करनेवाले गिरधर कवि ने यहाँ आरम्भ के अक्षर, शब्द या शब्द समूह का प्रयोग अंत में ज्यों का त्यों न कर, प्रथम चरण के शब्दों को आगे-पीछे कर प्रयोग किया है। ऐसा करने के लिये भाषा और छंद पर अधिकार चाहिए।
०८. हे माँ! हेमा है कुशल, खाकर थोड़ी चोट
बच्ची हुई दिवंगता, थी इलाज में खोट
थी इलाज में खोट, यही अच्छे दिन आये
अभिनेता हैं खास, आम जन हुए पराये
सहकर पीड़ा-दर्द, जनता करती है क्षमा?
समझें व्यथा-कथा, आम जन का कुछ हेमा
यहाँ प्रथम चरण का एक शब्द अंत में है किन्तु वह प्रथम शब्द नहीं है।
०९. दल का दलदल ख़त्म कर, चुनिए अच्छे लोग।
जिन्हें न पद का लोभ हो, साध्य न केवल भोग।।
साध्य न केवल भोग, लक्ष्य जन सेवा करना।
करें देश-निर्माण, पंथ ही केवल वरना।।
कहे 'सलिल' कवि करें, योग्यता को मत ओझल।
आरक्षण कर ख़त्म, योग्यता ही हो संबल।।
यहाँ आरम्भ के शब्द 'दल' का समतुकांती शब्द 'संबल' अंत में है। प्रयोग मान्य हो या न हो, विचार करें।
१०. हैं ऊँची दूकान में, यदि फीके पकवान।
जिसे- देख आश्चर्य हो, वह सचमुच नादान।।
वह सचमुच नादान, न फल या छाँह मिलेगी।
ऊँचा पेड़ खजूर, व्यर्थ- ना दाल गलेगी।।
कहे 'सलिल' कविराय, दूर हो ऊँचाई से।
ऊँचाई दिख सके, सदा ही नीचाई से।।
यहाँ प्रथम शब्द 'है' तथा अंत में प्रयुक्त शब्द 'से' दोनों गुरु हैं। प्रथम दृष्टया भिन्न प्रतीत होने पर भी दोनों के उच्चारण में लगनेवाला समय समान होने से छंद निर्दोष है।
***
हरिगीतिका सलिला
*
(छंद विधान: १ १ २ १ २ x ४, पदांत लघु गुरु, चौकल पर जगण निषिद्ध, तुक दो-दो चरणों पर, यति १६-१२ या १४-१४ या ७-७-७-७ पर)
*
कण जोड़ती, तृण तोड़ती, पथ मोड़ती, अभियांत्रिकी
बढ़ती चले, चढ़ती चले, गढ़ती चले, अभियांत्रिकी
उगती रहे, पलती रहे, खिलती रहे, अभियांत्रिकी
रचती रहे, बसती रहे, सजती रहे, अभियांत्रिकी
*
नव रीत भी, नव गीत भी, संगीत भी, तकनीक है
कुछ हार है, कुछ प्यार है, कुछ जीत भी, तकनीक है
गणना नयी, रचना नयी, अव्यतीत भी, तकनीक है
श्रम मंत्र है, नव यंत्र है, सुपुनीत भी तकनीक है
*
यह देश भारत वर्ष है, इस पर हमें अभिमान है
कर दें सभी मिल देश का, निर्माण यह अभियान है
गुणयुक्त हों अभियांत्रिकी, श्रम-कोशिशों का गान है
परियोजना त्रुटिमुक्त हो, दुनिया कहे प्रतिमान है
*
***
स्वागतम
*
अभियंता मिलन का परिणाम शुभ हो
जो हुआ सो हुआ, अब कुछ काम शुभ हो
सिरे बातें ही न हों, कुछ योजना हो
प्रकृति-पर्यावरण सँग अंजाम शुभ हो
*
आप आये हैं शहर को याद करने
शहर को हो याद यह क्षण, क्या करेंगे ?
क्या मिलन के पल महज मस्ती करेंगे?
या बने स्मार्ट कैसे, पथ वरेंगे?
***
कविता
*
जिसने कविता को स्वीकारा, कविता ने उसको उपकारा.
शब्द्ब्रम्ह को नमन करे जो, उसका है हरदम पौ बारा..
हो राकेश दिनेश सलिल वह, प्रतिभा उसकी परखी जाती-
होम करे पल-पल प्राणों का, तब जलती कविता की बाती..
भाव बिम्ब रस शिल्प और लय, पञ्च तत्व से जो समरस हो.
उस कविता में, उसके कवि में, पावस शिशिर बसंत सरस हो..
कविता भाषा की आत्मा है, कविता है मानव की प्रेरक.
राजमार्ग की हेरक भी है, पगडंडी की है उत्प्रेरक..
कविता सविता बन उजास दे, दे विश्राम तिमिर को लाकर.
कविता कभी न स्वामी होती, स्वामी हों कविता के चाकर..
कविता चरखा, कविता चमडा, कविता है करताल-मंजीरा.
लेकिन कभी न कविता चाहे, होना तिजोरियों का हीरा..
कविता पनघट, अमराई है, घर-आँगन, चौपाल, तलैया.
कविता साली-भौजाई है, बेटा-बेटी, बाबुल-मैया..
कविता सरगम, ताल, नाद, लय, कविता स्वर, सुर वाद्य समर्पण.
कविता अपने अहम्-वहम का, शारद-पग में विनत विसर्जन..
शब्द-साधना, सताराधना, शिवानुभूति 'सलिल' सुन्दर है.
कह-सुन-गुन कवितामय होना, करना निज मन को मंदिर है..
******************************
जब भी 'मैं' की छूटती, 'हम' की हो अनुभूति.
तब ही 'उस' से मिलन हो, सबकी यही प्रतीति..
७-७-२०१७
***
भावांजलि-
मनोवेदना:
ओ ऊपरवाले! नीचे आ
क्या-क्यों करता है तनिक बता?
असमय ले जाता उम्मीदें
क्यों करता है अक्षम्य खता?
कितने ही सपने टूट गये
तुम माली बगिया लूट गये.
क्यों करूँ तुम्हारा आराधन
जब नव आशा घट फूट गये?
मुस्कान मृदुल, मीठी बोली
रससिक्त हृदय की थी खोली
कर ट्रस्ट बनाया ट्रस्ट मगर
संत्रस्त किया, खाली ओली.
मैं जाऊँ कहाँ? निष्ठुर! बोलो,
तज धरा न अंबर में डोलो.
क्या छिपा तुम्हारी करनी में
कुछ तो रहस्य हम पर खोलो.
उल्लास-आसमय युवा रक्त
हिंदी का सुत, नवगीत-भक्त
खो गया कहाँ?, कैसे पायें
वापिस?, क्यों इतने हम अशक्त?
ऐ निर्मम! ह्रदय नहीं काँपा?
क्यों शोक नहीं तुमने भाँपा.
हम सब रोयेंगे सिसक-सिसक
दस दिश में व्यापेगा स्यापा.
संपूर्ण क्रांति का सेनानी,
वह जनगणमन का अभिमानी.
माटी का बेटा पतझड़ बिन
झड़ गया मौन ही बलिदानी.
कितने निर्दय हो जगत्पिता?
क्या पाते हो तुम हमें सता?
असमय अवसान हुआ है क्यों?
क्यों सके नहीं तुम हमें जता?
क्यों कर्क रोग दे बुला लिया?
नव आशा दीपक बुझा दिया.
चीत्कार कर रहे मन लेकिन
गीतों ने बेबस अधर सिया.
बोले थे: 'आनेवाले हो',
कब जाना, जानेवाले हो?
मन कलप रहा तुमको खोकर
यादों में रहनेवाले हो.
श्रीकांत! हुआ श्रीहीन गीत
तुम बिन व्याकुल हम हुए मीत.
जीवन तो जीना ही होगा-
पर रह न सकेंगे हम अभीत।
१३-९-२०१५
(जे. पी. की संपूर्ण क्रांति के एक सिपाही, नवगीतकार भाई श्रीकांत का कर्क रोग से असमय निधन हो गया. लगभग एक वर्ष से उनकी चिकित्सा चल रही थी. हिन्द युग्म पर २००९ में हिंदी छंद लेखन सम्बन्धी कक्षाओं में उनसे परिचय हुआ था. गत वर्ष नवगीत उत्सव लखनऊ में उच्च ज्वर तथा कंठ पीड़ा के बावजूद में समर्पित भावना से अतिथियों को अपने वाहन से लाने-छोड़ने का कार्य करते रहे. न वरिष्ठता का भान, न कष्ट का बखान। मेरे बहुत जोर देने पर कुछ औषधि ली और फिर काम पर. तुरंत बाद वे स्थांनांतरित होकर बड़ोदरा गये , जहाँ जांच होने पर कर्क रोग की पुष्टि हुई. टाटा मेमोरियल अस्पताल मुम्बई में चिकित्सा पश्चात निर्धारित थिरैपी पूर्ण होने के पूर्व ही वे बिदा हो गये. बीमारी और उपचार के बीच में भी वे लगातार सामाजिक-साहित्यिक कार्य में संलग्न रहे. इस स्थिति में भी उन्होंने अपनी जमीन और धन का दान कर हिंदी के उन्नयन हेतु एक न्यास (ट्रस्ट) की स्थापना की. स्वस्थ होकर वे हिंदी के लिये समर्पित होकर कार्य करना चाहते थे किन्तु??? उनकी जिजीविषा को शत-शत प्रणाम)
***
रचना -प्रति रचना
राकेश खंडेलवाल - संजीव
***
गीत
कोई सन्दर्भ तो था नहीं जोड़ता, रतजगे पर सभी याद आते रहे
*
नैन के गांव से नींद को ले गई रात जब भी उतर आई अंगनाई में
चिह्न हम परिचयों के रहे ढूँढते थरथराती हुई एक परछाईं में
दृष्टि के व्योम पर आ के उभरे थे जो, थे अधूरे सभी बिम्ब आकार के
भोर आई बुहारी लगा ले गई बान्ध प्राची की चूनरिया अरुणाई में
राग तो रागिनी भाँपते रह गये और पाखी हँसे चहचहाते रहे
*
अधखुले नैन की खिड़कियों पे खड़ी थी थिरकती रही धूप की इक किरण
एक झोंका हवा का जगाता रहा धमनियों मे पुनः एक बासी थकन
राह पाथेय पूरा चुरा ले गई पांव चुन न सके थे दिशाएं अभी
और फिर से धधक कर भड़कने लगी साँझ जो सो गई थी हदय की अगन
खूंटियों से बंधे एक ही वृत्त मे हम सुबह शाम चक्कर लगाते रहे
*
यों लगा कोई अवाज है दे रहा किंतु पगडंडियां शेष सुनी रही
मंत्र स्वर न मिले जो जगाते इसे सोई मन में रमी एक धूनी रही
याद के पृष्ठ जितने खुले सामने बिन इबारत के कोरे के कोरे मिले
एक पागल प्रतीक्षा उबासी लिए कोई आधार बिन होती दूनी रही
उम्र की इस बही में जुड़ा कुछ नहीं पल गुजरते हुए बस घटाते रहे
***
प्रतिगीत
कोई सन्दर्भ तो था नहीं जोड़ता, रतजगे पर सभी याद आते रहे
*
'हार की जीत' में, 'ताई' की प्रीत में, मन भटकता रहा मौन 'कुड़माई' में
कुछ कहा अनकहा, कुछ सुना अनसुना, छवि न धूमिल हुई किंतु तनहाई में
मन-पटल पर लिखा, फिर मिटाया गया, याद साकार थी पल निराकार में
मति चकित कुछ भ्रमित, बावली खो गयी, चन्द्रमा देख पूनम की जुनहाई में
भाव लय ताल स्वर हाँफते रह गये, बिम्ब गीतों का दर खटखटाते रहे
*
नित्य 'चंदन' 'सुधा' बिन अधूरा रहा, श्वास ने आस तज, त्रास का कर वरण
मुँह प्रथा का सिला, रीतियाँ चुप रहीं, पीर ओढ़े रही, शांति का आवरण
भ्रांति पलती रही, क्रांति टलती रही, कर्ण से जा मिला था सुयोधन तभी
चंद पाँसे फिंके, चंद आहें उठीं, चीर खिंचते बचा, रह गयी लट खुली
बाँसुरी-शंख भी, गांडिवी तीर भी, मिट गए पर न बदला तनिक आचरण
आदमी आदमी को परेशान कर, आदमीयत की जय ही मनाते रहे
*
इंकलाबी जुनूँ, मजहबी जोश बन, बिजलियों सा गिरा, आह कर अनसुनी
मुक्त पंजे से करना कमल चाहता, हाथियों की दिशाहीन माया धुनी
लालटेनें बुझीं, साइकिल रुक गयी, हाथ हँसिया हथौड़ा रहे अनमिले
तृण न वटवृक्ष हो हाय! मुरझा रहा, मैं गुणी शेष दुनिया सभी अवगुणी
स्वार्थ-सत्ता सियासत ने साधे 'सलिल', हाथ अपनों के जनगण ठगाते रहे
७-७-२०१६
***
मुक्तक:
सद्भावों की रेखा खीचें, सद्प्रयास दें वास्तव में श्री
पैर जमीं पर रखें जमाकर, हाथ लगेगा आसमान भी
ममता-समता के परिपथ में, श्वास-आस गृह परिक्रमित हों
नवरस रास रचाये पल-पल, राह पकड़कर नवल सृजन की
राम देव जी हों विभोर तो रचना-लाल तराशें शत-शत
हो समृद्ध साहित्य कोष शारद-सुत पायें रचना-अमृत
सुमन पद्म मधु रूद्र सलिल रह निर्भय दें आनंद पथिक को
मुरलीधर हँस नज़र उतारें गह पुनीत नीरज सारस्वत
७-७-२०१५
***
गीत
रचना और रचयिता
*
किस रचना में नहीं रचयिता,
कोई मुझको बतला दो.
मात-पिता बेटे-बेटी में-
अगर न हों तो दिखला दो...
*
बीज हमेशा रहे पेड़ में,
और पेड़ पर फलता बीज.
मुर्गी-अंडे का जो रिश्ता
कभी न किंचित सकता छीज..
माया-मायापति अभिन्न हैं-
नियति-नियामक जतला दो...
*
कण में अणु है, अणु में कण है
रूप काल का- युग है, क्षण है.
कंकर-शंकर एक नहीं क्या?-
जो विराट है, वह ही तृण है..
मत भरमाओ और न भरमो-
सत-शिव-सुन्दर सिखला दो...
*
अक्षर-अक्षर शब्द समाये.
शब्द-शब्द अक्षर हो जाये.
भाव बिम्ब बिन रहे अधूरा-
बिम्ब भाव के बिन मर जाये.
साहुल राहुल तज गौतम हो
बुद्ध, 'सलिल' मत झुठला दो...
७-७-२०१०
***
दोहा
जब भी 'मैं' की छूटती, 'हम' की हो अनुभूति.
तब ही 'उस' से मिलन हो, सबकी यही प्रतीति..

*