कुल पेज दृश्य

saans लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
saans लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 26 दिसंबर 2018

navgeet

नवगीत: 
संजीव

सांस जब 
अविराम चलती जा रही हो 
तब कलम 
किस तरह 
चुप विश्राम कर ले?
.
शब्द-पायल की
सुनी झंकार जब-जब
अर्थ-धनु ने
की तभी टंकार तब-तब
मन गगन में 

विचारों का हंस कहिए
सो रहे किस तरह
सुबह-शाम कर ले?
.
घड़ी का क्या है
टँगी थिर, 

मगर चलती
नश्वरी दुनिया
सनातन लगे, छलती
तन सुमन में 

आत्मा की गंध कहिए
खो रहे किस तरह
नाम अनाम कर ले?
.

सोमवार, 20 सितंबर 2010

मुक्तिका: आँख नभ पर जमी संजीव 'सलिल

मुक्तिका:
आँख नभ पर जमी

संजीव 'सलिल'
*
आँख नभ पर जमी तो जमी रह गई.
साँस भू की थमी तो थमी रह गई.
*
सुब्ह सूरज उगा, दोपहर में तपा.
साँझ ढलकर, निशा में नमी रह गई..
*
खेत, खलिहान, पनघट न चौपाल है.
गाँव में शेष अब, मातमी रह गई..
*
रंग पश्चिम का पूरब पे ऐसा चढ़ा.
असलियत छिप गई है, डमी रह गई..
*
जो कमाया गुमा, जो गँवाया मिला.
ज़िन्दगी में तुम्हारी, कमी रह गई..
*****************