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शुक्रवार, 20 मार्च 2026

मार्च २०, रामकिंकर, सॉनेट, जनक छंद, नवगीत, चिरैया, गौरैया, सरस्वती, बालगीत, मोदी, कुण्डलिया

 सलिल सृजन मार्च २०

*
विश्व गौरैया दिवस २० मार्च को गौरैया के संरक्षण और उनके सामने आने वाली चुनौतियों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से हर साल मनाया जाता है। भारत व अन्य देशों में पक्षी गौरैया की संख्या लगातार घट रही है। वर्ष २००९ में भारत के संरक्षणवादी डॉ. मोहम्मद दिलावर ने कल्पना की और फिर २०१० में फ्रांस में इको-सिस एक्शन फाउंडेशन के सहयोग से २० मार्च को पहला विश्व गौरैया दिवस आयोजित कर हर साल यह दिवस मनाया जा रहा है।
२० मार्च को अंतर्राष्ट्रीय हैप्पीनेस डे मनाने का उद्देश्य हर हाल खुश रहना, और जीवन में खुशी के महत्व को स्वीकार करना है। यह दिन खुशी के महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाकर दुनिया के लोगों को खुश बनाए रखने में मदद करता है। पहली बार यह दिवस २०१३ में संयुक्त राष्ट्र द्वारा मनाया गया था। तब से हर साल यह दिवस मनाया जाता है।
वर्ल्ड ओरल हेल्थ डे २० मार्च को मनाया जाता है। इस वैश्विक स्वास्थ्य का उद्देश्य लोगों को ओरल हेल्थ (मुँह, दाँतों और ओरोफेशियल संरचना जो व्यक्ति को बोलने, श्वास लेने और खाने में सक्षम बनाती है) के प्रति सजग करना है।
*
महत्त्वपूर्ण घटनाएँ
१७३९ - नादिरशाह ने दिल्ली सल्तनत पर कब्ज़ा कर दिल्ली में २ माह तक लूटमार की, मयूर सिंहासन, बेशुमाररत्न, सोना, चाँदी, गहने लूटे।
१९९० - अर्धरात्रि में नामीबिया की स्वतंत्रता की घोषणा।
१९९१ - बेगम ख़ालिदा जिया बांग्लादेश की राष्ट्रपति निर्वाचित।
१९९९- प्रख्यात ब्रिटिश अमूर्त चित्रकार पैट्रिक हेरोन का निधन।
२००२ - नेपाल के प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा ६ दिवसीय यात्रा पर भारत पहुँचे, जिम्बाब्वे राष्ट्रमंडल से निलम्बित।
२००३ - इराक पर अमेरिकी हमला शुरू।
२००६ - अफ़ग़ानिस्तान के विदेश मंत्री ने दावा किया कि ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान में है।
२००९ - न्यायमूर्ति चन्द्रमौली कुमार प्रसाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मूख्य न्यायधीश नियुक्त हुए।
२० मार्च को जन्मे व्यक्ति
१८९२ - कर्नल टॉड - अंग्रेज़ अधिकारी एवं इतिहासकार, जिसे राजस्थान के इतिहास का मार्ग सर्वप्रथम प्रशस्त करने का श्रेय दिया जाता है।
१९६६ - अलका याग्निक - ख्यातिप्राप्त भारतीय पार्श्वगायिका हैं।
१९७३ - अर्जुन अटवाल - भारतीय पहले गोल्फ खिलाड़ी।
१९८२ - निशा मिलेट - भारतीय की जानी-मानी तैराक हैं।
१९८७ - कंगना राणावत, भारतीय अभिनेत्री।
१६१५ - दारा शिकोह - मुग़ल बादशाह शाहजहाँ और मुमताज़ महल का सबसे बड़ा पुत्र था।
१९२२ - कार्ल रीनर, अमेरिकी फिल्म निर्देशक, निर्माता, अभिनेता और हास्य अभिनेता, (योर शो ऑफ शोज़)
२० मार्च को दिवंगत
१७२७ - आइज़ैक न्यूटन - महान् गणितज्ञ, भौतिक वैज्ञानिक, ज्योतिर्विद एवं दार्शनिक थे।
१९४३ - एस. सत्यमूर्ति - भारत के क्रांतिकारी नेता, शशिभूषण रथ - 'उड़िया पत्रकारिता के जनक, स्वतंत्रता सैनानी थे।
१९७० - जयपाल सिंह - भारतीय हॉकी के प्रसिद्ध खिलाड़ियों में से एक।
१९७२- प्रेमनाथ डोगरा - जम्मू-कश्मीर के एक नेता थे।
१९९५ - रोहित मेहता - प्रसिद्ध साहित्यकार, विचारक, लेखक, दार्शनिक, भाष्यकार और स्वतंत्रता सेनानी थे।
२००८ - सोभन बाबू, भारतीय अभिनेता।
२०११ - बोब क्रिस्टो -भारतीय फ़िल्म अभिनेत्री।
२०१४ - खुशवंत सिंह - भारत के प्रसिद्ध पत्रकार, लेखक, उपन्यासकार और इतिहासकार।
२०१५ - मैल्कम फ्रेजर - ऑस्ट्रेलिया के पूर्व प्रधानमंत्री।
***
छंद शाला दोहा-रोला-कुंडलिया ० नयन चलें तो जग चले, चलें नयन अविराम। जग का नयनों के बिना, चले न कोई काम।। -अशोक व्यग्र- भोपाल चले न कोई काम, न दिखते रंग-रूप भी। बिन नयनों के रंक, सरीखे आप भूप भी।। कहे 'सलिल' बिन नयन, दिवस में भी दिखें सपन। दिखें खुद-ब-खुद श्याम, नहीं देखें सूर नयन।। ००० छंद शाला ० नव प्रभात है, नवल सूर्य है, है नवीन फिर धरती अंबर। नवल रात्रि नव धवल चंद्रमा है सुखमय नूतन सम्वत्सर।। -अशोक व्यग्र नवल तारिका, तारे अभिनव, नवल धरा सर सरिता सागर। नवल दूब पादप तरु कलियाँ नवल राधिका रस नटनागर। २०.३.२६ जबलपुर ०००
स्मरण युगतुलसी
सॉनेट
युगतुलसी का चारण हो जा,
खो जा सौम्य सुदर्शन छवि में,
कर वंदन यश-कीर्ति सतत गा,
देख विराजे वे ही सवि में।
धूप चाँदनी तम प्रकाश में,
दिग्दिगंत तारों में गुरुवर,
अनल अनिल नभ सलिल पाश में,
देख देखकर झूमें तरुवर।
नव्य नर्मदा पुरा पुरातन,
व्याप्त सतपुड़ा विंध्य शिखर में,
राम नाम पर्याय सनातन,
ध्यान लगा लख मनस गह्वर में।
जीवन सुमिरन का क्षण हो जा,
राम भक्ति में जग तज खो जा।
२०.३.२०२४
•••
जनक छंद
*
रमण आप में आप कर।
मौन; आप का जाप कर।
आप आप में व्याप कर।।
मौन बोलता है, सुनो।
कहने के पहले गुनो।
व्यर्थ न अपना सर धुनो।।
अति सीमित आहार कर।
विषयों का परिहार कर।
मन मत अधिक विचार कर।।
नाहक सपने मत बुनो।
तन बनकर क्यों तुम घुनो।
दो न, एक को चुप चुनो।।
मन-विचार दो नहीं हैं।
दूर नहीं प्रभु यहीं हैं।
गए नहीं वे कहीं हैं।।
बनो यंत्र भगवान का।
यही लक्ष्य इंसान का।
पुण्य अमित है दान का।।
जीवन पंकिल नहीं है।
जो कुछ उज्ज्वल; यहीं है।
हमने कमियाँ गहीं हैं।।
है महत्त्व अति ध्यान का।
परमपिता के भान का।
उस सत्ता के गान का।।
कर नियमन आहार का।
नित अपने आचार का।
मन में उठे विचार का।।
राही मंज़िल राह भी।
हैं मानव तू आप ही।
आह न केवल वाह भी।।
कोष न नफरत-प्यार का।
बोझ न भव-व्यापार का।
माध्यम पर उपकार का।।
जन्म लिया; भर आह भी।
प्रभु की कर परवाह भी।
है फ़क़ीर तू शाह भी।।
भीतर-बाहर है वही।
कथा न निज जिसने कही।
जिसकी महिमा सब कहीं।।
***
सॉनेट
स्वस्ति
स्वस्ति होना अस्ति का परिणाम।
नास्ति हो तो मत करें स्वीकार।
स्वस्ति नहिं हो तो विधाता वाम।।
नास्ति सत् से भी करे इंकार।।
अस्ति से आस्तिक बने संसार।
दे सके, पा भी सके मन प्यार।
नास्तिक हो तो न बेड़ा पार।।
ऊर्जा हो व्यर्थ सत्य नकार।।
अस्ति खुश अस्तित्व की जय बोल।
नास्ति नाखुश बाल अपने नोच।
स्वस्ति नीरस में सके रस घोल।।
स्वस्ति सबका शुभ सके सच सोच।।
स्वार्थ का सर्वार्थ में बदलाव।
तभी जब हो स्वस्ति सबका चाव।।
२०-३-२०२३
नवगीत
चिरैया!
*
चिरैया!
आ, चहचहा
*
द्वार सूना
टेरता है।
राह तोता
हेरता है।
बाज कपटी
ताक नभ से-
डाल फंदा
घेरता है।
सँभलकर चल
लगा पाए,
ना जमाना
कहकहा।
चिरैया!
आ, चहचहा
*
चिरैया
माँ की निशानी
चिरैया
माँ की कहानी
कह रही
बदले समय में
चिरैया
कर निगहबानी
मनो रमा है
मन हमेशा
याद सिरहाने
तहा
चिरैया!
आ चहचहा
*
तौल री पर
हारना मत।
हौसलों को
मारना मत।
मत ठिठकना,
मत बहकना-
ख्वाब अपने
गाड़ना मत।
ज्योत्सना
सँग महमहा
चिरैया!
आ, चहचहा
***
शारद! अमृत रस बरसा दे।
हैं स्वतंत्र अनुभूति करा दे।।
*
मैं-तू में बँट हम करें, तू तू मैं मैं रोज।
सद्भावों की लाश पर, फूट गिद्ध का भोज।।
है पर-तंत्र स्व-तंत्र बना दे।
शारद! अमृत रस बरसा दे।।
*
अमर शहीदों को भूले हम, कर आपस में जंग।
बिस्मिल-भगत-दत्त आहत हैं, दुर्गा भाभी दंग।।
हैं आजाद प्रतीति करा दे।
शारद! अमृत रस बरसा दे।।
*
प्रजातंत्र में प्रजा पर, हावी होकर तंत्र।
छीन रहा अधिकार नित, भुला फर्ज का मंत्र।।
दीन-हीन को सुखी बना दे।
शारद! अमृत रस बरसा दे।।
*
ज॔गल-पर्वत-सरोवर, पल पल करते नष्ट।
कहते हुआ विकास है, जन प्रतिनिधि हो भ्रष्ट।।
जन गण मन को इष्ट बना दे।
शारद! अमृत रस बरसा दे।।
*
शोक लोक का बढ़ रहा, लोकतंत्र है मूक।
सारमेय दलतंत्र के, रहे लोक पर भूँक।।
दलदल दल का मातु मिटा दे।
शारद! अमृत रस बरसा दे।।
*
'गण' पर 'गन' का निशाना, साधे सत्ता हाय।
जन भाषा है उपेक्षित, पर-भाषा मन भाय।।
मैया! हिंदी हृदय बसा दे।
शारद! अमृत रस बरसा दे।।
*
जन की रोटी छिन रही, तन से घटते वस्त्र।
मन आहत है राम का, सीता है संत्रस्त।।
अस्त नवाशा सूर्य उगा दे।
शारद! अमृत रस बरसा दे।।
*
रोजी-रोटी छीनकर, कोठी तानें सेठ।
अफसर-नेता घूस लें, नित न भर रहा पेट।।
माँ! मँहगाई-टैक्स घटा दे।
शारद! अमृत रस बरसा दे।।
*
जिए आखिरी आदमी, श्रम का पाए दाम।
ऊषा गाए प्रभाती, संध्या लगे ललाम।।
रात दिखाकर स्वप्न सुला दे।
शारद! अमृत रस बरसा दे।।
२०-३-२०२१
***
साथ मोदी के
*
कर्ता करता है सही, मानव जाने सत्य
कोरोना का काय को रोना कर निज कृत्य
कोरो ना मोशाय जी, गुपचुप अपना काम
जो डरता मरता वही, काम छोड़ नाकाम
भीत न किंचित् हों रहें, घर के अंदर शांत
मदद करें सरकार की, तनिक नहीं हों भ्रांत
बिना जरूरत क्रय करें, नहीं अधिक सामान
पढ़ें न भेजें सँदेशे, निराधार नादान
सोमवार को किया था, हम सबने उपवास
शास्त्री जी को मिली थी, उससे ताकत खास
जनता कर्फ्यू लगेगा, शत प्रतिशत इस बार
कोरोना को पराजित, कर देगा यह वार
नमन चिकित्सा जगत को, करें झुकाकर शीश
जान हथेली पर लिए, बचा रहे बन ईश
देश पूरा साथ मिलकर, लड़ रहा है जंग
साथ मोदी के खड़ा है, देश जय बजरंग
१९-३-२०२०
***
बाल कविता:
"कितने अच्छे लगते हो तुम "
*
कितने अच्छे लगते हो तुम |
बिना जगाये जगते हो तुम ||
नहीं किसी को ठगते हो तुम |
सदा प्रेम में पगते हो तुम ||
दाना-चुग्गा मंगते हो तुम |
चूँ-चूँ-चूँ-चूँ चुगते हो तुम ||
आलस कैसे तजते हो तुम?
क्या प्रभु को भी भजते हो तुम?
चिड़िया माँ पा नचते हो तुम |
बिल्ली से डर बचते हो तुम ||
क्या माला भी जपते हो तुम?
शीत लगे तो कँपते हो तुम?
सुना न मैंने हँसते हो तुम |
चूजे भाई! रुचते हो तुम |
२२.३.२०१४
***
जल्दी आना ...
*
मैं घर में सब बाहर जाते,
लेकिन जल्दी आना…
*
भैया! शाला में पढ़-लिखना
करना नहीं बहाना.
सीखो नई कहानी जब भी
आकर मुझे सुनाना.
*
दीदी! दे दे पेन-पेन्सिल,
कॉपी वचन निभाना.
सिखला नच्चू , सीखूँगी मैं-
तुझ जैसा है ठाना.
*
पापा! अपनी बाँहों में ले,
झूला तनिक झुलाना.
चुम्मी लूँगी खुश हो, हँसकर-
कंधे बिठा घुमाना.
*
माँ! तेरी गोदी आये बिन,
मुझे न पीना-खाना.
कैयां में ले गा दे लोरी-
निन्नी आज कराना.
*
दादी-दादा हम-तुम साथी,
खेल करेंगे नाना.
नटखट हूँ मैं, देख शरारत-
मंद-मंद मुस्काना.
२०-३-२०१३
***
गौरैया
खिड़की से आयी गौरैया,
बना घोंसला मुस्काई।
देख किसी को आते पास
फुर से उड़ जाती भाई।।
इसको कहते गौरैया,
यह है चूजे की मैया।
दाना उसे चुगाती है-
थककर कहे न- हे दैया!।।
२८.११.२०१२

शनिवार, 7 मार्च 2026

मार्च ७, होली, रामकिंकर, शिव आयरलैंड, लघुकथा, होली, दोहा, ग़ज़लिका, शिशु गीत, नवगीत

 सलिल सृजन मार्च ७ 

रंगों के दोहे -दोहों के रंग

*
कार्यशाला दोहा-रोला-कुंडलिया . नयन गुलाबी डोरियाँ, मुख पर मला ग़ुलाल। टेसू सेमल सा हुआ, गोरी का मुख लाल।। -अशोक व्यग्र गोरी का मुख लाल, रुपहले-पीले कुंतल। पिचकारी की मार, कर रही ढीले कस-बल।। तेवर जेवर पहन, बरजती हसीं कह नय न। गिरा रहे बिजलियाँ, बादल-बारिश बिन नयन।। ७.३.२०२६ ०००
स्मरण युगतुलसी
मुक्तक
युगतुलसी की चरण शरण गह।
मानस मंथन कर सत्-शिव गह।।
सुंदरतम हो जीवन तब जब-
राम भगति पथ हनुमत सह गह।।
तुलसी प्रिय करुणानिधान को।
हुलसी सुत जीवन विधान को,
जोड़े रत्ना सह, वह तोड़े-
तब पाते हनुमत महान को।।
हुलसी शीघ्र न साथ छोड़ती,
रत्ना अगर न राह मोड़ती,
तुलसी युगतुलसी को कैसे-
राम भगति तब कहें मोहती।।
७.३.२०२४
•••
तारकेश्वर महादेव आयरलैंड
*
आयरलैंड में तारा हिल्स पर यह ४००० से अधिक वर्ष पुराना शिवलिंग स्थापित है। सनातन धर्म में तारा देवी को श्मशान की देवी कहा जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार समुद्र मंथन के समय भगवान शिव ने विषपान किया था, जिससे उनके शरीर में असहनीय हो रही थी। शिव जी की पीड़ा दूर करने के लिए माँ काली ने तारा देवी का रूप धरण कर भगवान शंकर को स्तनपान कराया, तब शिव जी को विष की जलन से मुक्ति मिली। माता तारा तंत्र की देवी मान्य हैं। तांत्रिक साधना करने वाले तारा माता के भक्त कहे जाते हैं। चैत्र मास की नवमी तिथि और शुक्ल पक्ष के दिन तारा देवी की तंत्र साधना करना सबसे ज्यादा फलकारी माना जाता है।
भगवान शिव की पत्नी माता सती राजा दक्ष की पुत्रीं थी। उनकी बहन थीं देवी तारा। महान देवी तारा नकी पूजा हिंदू और बौद्ध दोनों धर्मों में होती हैं। भव से तारनेवाली होने के कारण इन्हें तारा देवी कहा जाना जाता है। भारत में शिमला में तारा देवी का जंगल है।
प्राचीन काल में महर्षि वशिष्ठ ने देवी तारा उपासना कर सिद्धियां हासिल की थी। बीरभूम पश्चिम बंगाल में तांत्रिक पीठ तारापीठ सर्व मान्य है। देवी तारा के तीन नयन थे। ऐसा माना जाता है कि यहां देवी तारा के नयन गिरे थे, इसलिए इस स्थान को नयन तारा भी कहा जाता है।
तारा देवी का दूसरा सर्वाधिक प्रसिद्ध मंदिर हिमाचल की राजधानी शिमला से लगभग १३ किलोमीटर दूर शोधी में तारा पर्वत पर है। यहाँ हिंदुओं के साथ तिब्बती बौद्ध धर्म के लोग भी पूजा करतेते हैं। तारा देवी के तीन स्वरू तारा, एकजटा और नील सरस्वती है।
माघ नवरात्रि में दूसरे दिन दस महाविद्याओं की दूसरी विद्या माँ तारा की पूजा तंत्र शक्ति प्राप्ति के लिए की जाती है।
आयरलैंड में ईसाई पूर्व काल में यहाँ मूर्ति पूजक रहते थे। लगभग २५०० वर्ष पूर्व तक आयरलैंड के सभी राजाओं का राज्याभिषेक यहीं इन्हीं के आशीर्वाद से होता था। ५०० ए. डी. में यह परंपरा बंद कर दी गई। कुछ साल पहले आयरलैंड के रेडिकल समूह ने इसे क्षतिग्रस्त करने का प्रयास किया था। क्या वर्तमान भारत सरकार इस तीर्थ स्थान की सुरक्षा और विकास के लिए कुछ करेगी?
***
लघुकथा
*
पुत्र द्वारा बार बार गलती करने पर पिता ने सीख देने के लिए एक थप्पड़ लगा दिया। बाद में सोच कि व्यर्थ ही मार दिया, एक बार और समझाता तो शायद वह समझ जाता। बेटे के आहत मन को सहलाने के लिए पिता ने उसे 'सॉरी' कह दिया।
बेटे ने एक कागज उठाया और उसे तोड़-मरोड़कर फिर सीधा फ़ाइल दिया और बोला जैसे यह कागज पहले की तरह नहीं हो सकता, वैसे ही चोट खाए मन की पीड़ा 'सॉरी' से दूर नहीं होती।
पिता ने बेटे को बहुत दिनों से उपयोग न हुए स्कूटर की चाबी देकर उसे स्टार्ट करने को कहा। बेटे ने स्कूटर में कुछ किक लगाई, स्कूटर न चलने पर वापिस आ गया।
पिता ने चाबी वापिस लेकर लगातार कुछ किक लगाईं तो स्कूटर स्टार्ट हो गया। पिता ने कहा 'लातों के देव बातों से नहीं मानते, जैसा देव वैसी पूजा जरूरी होती है।
***
रंगों के दोहे -दोहों के रंग
*
जोगीरा सा रा रा रा
रंग रंग पर आ गया, अद्भुत नवल निखार।
प्रिय से एकाकार हो, खुद को रहा निहार।। जोगीरा सा रा रा रा
*
हुआ रंग में भंग जब, पड़ी भंग में रंग।
जोरा-जोरी हुई तो, मन के बजे मृदंग।। जोगीरा सा रा रा रा
*
फागुन में भूला 'सलिल', श्याम-गौर का द्वैत।
राधा-कान्हा यूँ मिले, ज्यों जीवित अद्वैत।। जोगीरा सा रा रा रा
*
श्याम-रंग ऐसा चढ़ा, देह न सके उतार।
गौर रंग मन में बसा, गेह आत्म उजियार।। जोगीरा सा रा रा रा
*
लल्ला में लावण्य है, लल्ली में लालित्य।
लीला लल्ला-लली की, लखे लाल आदित्य।। जोगीरा सा रा रा रा
*
प्रिये! लाल पीली न हो, रहना पीली लाल।
गुस्सा रखो न नाक पर, नाचो आ दे ताल।। जोगीरा सा रा रा रा
*
आस न अब बेरंग हो, श्वास न हो बदरंग।
प्यास न अब बाकी रहे, खेल खिलाओ रंग।। जोगीरा सा रा रा रा
*
रंग-रंग से रंग को, रंग रंग है पस्त।
रंग रंग से हार कर, जीत गया हो मस्त।। जोगीरा सा रा रा रा
७.३.२०२३
***
ग़ज़लिका 
याद तुम्हारी
*
याद तुम्हारी नेह नर्मदा
आकर देती है प्रसन्नता
हर लेती है हर विपन्नता
याद तुम्हारी है अखण्डिता
सह न उपेक्षा हो प्रचंडिता
शुचिता है साकार वन्दिता
याद तुम्हारी आदि अमृता
युग युग पुजती हो समर्पिता
अभिनंदित हो आत्म अर्पिता
७-३-२०२०
***
शिशु गीत सलिला : २
*
११. पापा -१
पापा लाड़ लड़ाते खूब,
जाते हम खुशियों में डूब।
उन्हें बना लेता घोड़ा-
हँसती, देख बाग़ की दूब।।
*
१२. पापा -२
पापा चलना सिखलाते,
सारी दुनिया दिखलाते।
रोज बिठाकर कंधे पर-
सैर कराते मुस्काते।।
गलती हो जाए तो भी,
कभी नहीं खोना आपा।
सीख सुधारूँगा मैं ही-
गुस्सा मत होना पापा।।
*
१३. भैया - १
मेरा भैया प्यारा है,
सारे जग से न्यारा है।
बहुत प्यार करता मुझको-
आँखों का वह तारा है।।
*
१४ . भैया -२
नटखट चंचल मेरा भैया,
लेती हूँ हँस रोज बलैया।
दूध नहीं इसको भाता-
कहता पीना है चैया।।
*
१५. बहिन -१
बहिन गुणों की खान है,
वह प्रभु का वरदान है।
अनगिन खुशियाँ देती है-
वह हम सबकी जान है।।
*
१६. बहिन -२
बहिन बहुत ही प्यारी है,
सब बच्चों से न्यारी है।
हँसती तो ऐसा लगता-
महक रही फुलवारी है।।
*
१७. घर
पापा सूरज, माँ चंदा,
ध्यान सभी का धरते हैं।
मैं तारा, चाँदनी बहिन-
घर में जगमग करते हैं।।
*
१८. बब्बा
बब्बा ले जाते बाज़ार,
दिलवाते टॉफी दो-चार।
पैसे नगद दिया करते-
कुछ भी लेते नहीं उधार।।
मम्मी-पापा डांटें तो
उन्हें लगा देते फटकार।
जैसे ही मैं रोता हूँ,
गोद उठा लेते पुचकार।।
*
१९. दादी-१
दादी बनी सहेली हैं,
मेरे संग-संग खेली हैं।
उनके बिना अकेली मैं-
मुझ बिन निपट अकेली हैं।।
*
२०. दादी-
राम नाम जपतीं दादी,
रहती हैं बिलकुल सादी।
दूध पिलाती-पीती हैं-
खूब सुहाती है खादी।।
गोदी में लेतीं, लगतीं -
रेशम की कोमल गादी।
मुझको शहजादा कहतीं,
बहिना उनकी शहजादी।।
***
नवगीत-
आज़ादी
*
भ्रामक आज़ादी का
सन्निपात घातक है
*
किसी चिकित्सा-ग्रंथ में
वर्णित नहीं निदान
सत्तर बरसों में बढ़ा
अब आफत में जान
बदपरहेजी सभाएँ,
भाषण और जुलूस-
धर्महीनता से जला
देशभक्ति का फूस
संविधान से द्रोह
लगा भारी पातक है
भ्रामक आज़ादी का
सन्निपात घातक है
*
देश-प्रेम की नब्ज़ है
धीमी करिए तेज
देशद्रोह की रीढ़ ने
दिया जेल में भेज
कोर्ट दंड दे सर्जरी
करती, हो आरोग्य
वरना रोगी बचेगा
बस मसान के योग्य
वैचारिक स्वातंत्र्य
स्वार्थ हितकर नाटक है
भ्रामक आज़ादी का
सन्निपात त्राटक है
*
मुँदी आँख कैसे सके
सहनशीलता देख?
सत्ता खातिर लिख रहे
आरोपी आलेख
हिंदी-हिन्दू विरोधी
केर-बेर का संग
नेह-नर्मदा में रहे
मिला द्वेष की भंग
एक लक्ष्य असफल करना
इनका नाटक है
संविधान से द्रोह
लगा भारी पातक है
भ्रामक आज़ादी का
सन्निपात घातक है
***
नवगीत :
चूहा झाँक रहा हंडी में...
*
चूहा झाँक रहा हंडी में,
लेकिन पाई सिर्फ हताशा...
*
मेहनतकश के हाथ हमेशा
रहते हैं क्यों खाली-खाली?
मोती तोंदों के महलों में-
क्यों बसंत लाता खुशहाली?
ऊँची कुर्सीवाले पाते
अपने मुँह में सदा बताशा.
चूहा झाँक रहा हंडी में,
लेकिन पाई सिर्फ हताशा...
*
भरी तिजोरी फिर भी भूखे
वैभवशाली आश्रमवाल.
मुँह में राम बगल में छूरी
धवल वसन, अंतर्मन काले.
करा रहा या 'सलिल' कर रहा
ऊपरवाला मुफ्त तमाशा?
चूहा झाँक रहा हंडी में,
लेकिन पाई सिर्फ हताशा...
*
अँधियारे से सूरज उगता,
सूरज दे जाता अँधियारा.
गीत बुन रहे हैं सन्नाटा,
सन्नाटा निज स्वर में गाता.
ऊँच-नीच में पलता नाता
तोल तराजू तोला-माशा.
चूहा झाँक रहा हंडी में,
लेकिन पाई सिर्फ हताशा...
६.३.२०१६
***

गुरुवार, 5 मार्च 2026

मार्च ५, सॉनेट, कुण्डलिया, सरस्वती, हिंदी आरती, दोहा, नवगीत, होली, अंगरेजी, समीक्षा

सलिल  सृजन मार्च ५

*
कार्य शाला दोहा+रोला=कुंडलिया ० रंगों से भीगा बदन, गोरी मली गुलाल। कजरारे कारे नयन, लज्जा से मुख लाल।। -अशोक व्यग्र लज्जा से मुख लाल, तबीयत हरी हो गई। बाबुल सम्मुख देख, निर्भया पीत भी भई।। 'सलिल' मदन-रति बसे, मौन हो अंगों-अंगों। अनुरागों की छवि प्रतिबिंबित रंगों-रंगों। ५.३.२०२६ ०००
सॉनेट
रस्साकसी
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अहंकार की रस्साकसी।
किरच काँच की दिल में धसी।।
सत्ता सौत सत्य की मुई।
चाहे चारण हो हर मसी।।
जा जीवन की जय-जय बोल।
बोला, रज्जु कण्ठ में कसी।।
रही मिलाए इससे नयन।
छवि नयनों में उसकी बसी।।
झूठ नहीं; है सच्ची खबर
नागिन मृत; नेता ने डसी।
काशी नहिं; कबिरा का मगहर।।
तुलसी-मुक्ति दायिनी असी।।
नहीं सिया-सत किंचित शेष।
मुई सियासत जबरन ठसी।।
५-३-२०२२
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मुक्तिका
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कौन किसका हुआ जमाने में?
ज़िंदगी गई आजमाने में।।
बात आई समझ सलिल इतनी
दिल्लगी है न दिल लगाने में।।
चैन बाजार में नहीं मिलती
चैन मिलती है गुसलखाने में।।
रैन भर जाग थक रहा खुसरो
पी थका है उसे सुलाने में।।
जान पाया हूँ बाद अरसे के
क्या मजा है खुदी मिटाने में।।
५-३-२०२१
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सरस्वती वंदना
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हे हंस वाहिनी! ज्ञानदायिनी!!
अम्ब विमल मति दे.....
जग सिरमौर बनाएँ भारत.
सुख-सौभाग्य करे नित स्वागत.
आशिष अक्षय दे.....
साहस-शील हृदय में भर दे.
जीवन त्याग तपोमय करदे.
स्वाभिमान भर दे.....
लव-कुश, ध्रुव, प्रहलाद बनें हम.
मानवता का त्रास हरें हम.
स्वार्थ सकल तज दे.....
दुर्गा, सीता, गार्गी, राधा,
घर-घर हों काटें भव बाधा.
नवल सृष्टि रच दे....
सद्भावों की सुरसरि पावन.
स्वर्गोपम हो राष्ट्र सुहावन.
'सलिल'-अन्न भर दे...
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छंद - " गोपी " ( सम मात्रिक )
शिल्प विधान: मात्रा भार - १५, आदि में त्रिकल अंत में गुरु/वाचिक अनिवार्य (अंत में २२ श्रेष्ठ)। आरम्भ में त्रिकल के बाद समकल, बीच में त्रिकल हो तो समकल बनाने के लिएएक और त्रिकल आवश्यक। यह श़ृंगार छंद की प्रजाति (उपजाति नहीं ) का है। आरम्भ और मध्य की लय मेल खाती है।
उदाहरण:
१. आरती कुन्ज बिहारी की।
कि गिरधर कृष्ण मुरारी की।।
२. नीर नैनन मा भरि लाए।
पवनसुत अबहूँ ना आए।।
३. हमें निज हिन्द देश प्यारा ।
सदा जीवन जिस पर वारा।।
सिखाती हल्दी की घाटी ।
राष्ट्र की पूजनीय माटी ।। -राकेश मिश्र
४. हमारी यदि कोई माने।
प्यार को ही ईश्वर जाने।
भले हो दुनियाँ की दलदल।
निकल जायेगा अनजाने।। -रामप्रकाश भारद्वाज
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हिंदी आरती
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भारती भाषा प्यारी की।
आरती हिन्दी न्यारी की।।
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विश्व की भाषा है हिंदी,
हिंद की आशा है हिंदी।
करोड़ों जिव्हाओं-आसीन
न कोई सकता इसको छीन।
ब्रम्ह की, विष्णु-पुरारी की
आरती हिन्दी न्यारी की।।
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वाक् ध्वनि हिंदी का आधार
पाँच वर्गों बाँटे उच्चार
बोलते जो वह लिखते आप
वर्तनी स्वर व्यंजन अनुसार
नगरी लिपि सुविचारी की
आरती हिन्दी न्यारी की।।
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वर्ण हिंदी के अति सोहें,
शब्द मानव मन को मोहें।
काव्य रचना सुडौल सुन्दर
वाक्य लेते सबका मन हर।
छंद-सुमनों की क्यारी की
आरती हिंदी न्यारी की।।
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एकता पर हिंदी बलिहार
वचन दो क्रिया लिंग व्यापार
संधियाँ काल शक्ति हैं तीन
विशेषण हैं हिंदी में चार
पाँच अव्यय व्यवहारी की
आरती हिन्दी न्यारी की।।
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समेटे ज्ञान नीति विज्ञान
सीख पढ़ - लिख हों सब विद्वान
'सलिल' जो विषय कठिन नीरस
बना देती हिंदी रसवान
विश्वववाणी गुणकारी की
आरती हिन्दी न्यारी की।।
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दोहा सलिला
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खिली मंजरी देखकर, झूमा मस्त बसंत
फगुआ के रंग खिल गए, देख विमोहित संत
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दोहा-पुष्पा सुरभि से, दोहा दुनिया मस्त
दोस्त न हो दोहा अगर, रहे हौसला पस्त
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जब से ईर्ष्या बढ़ हुई, है आपस की जंग
तब से होली हो गयी, है सचमुच बदरंग
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दोहे की महिमा बड़ी, जो पढ़ता हो लीन
सारी दुनिया सामने, उसके दिखती दीन
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लता सुमन से भेंटकर, है संपन्न प्रसन्न
सुमन लता से मिल गले, देखे प्रभु आसन्न
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भक्ति निरुपमा चाहती, अर्पित करना आत्म
कुछ न चाह, क्या दूँ इसे, सोच रहे परमात्म
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५-३-२०१८
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नवगीत-
रिश्ते
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जब-जब रिश्तों की बखिया उधड़ी
तब-तब सुई स्नेह की लेकर
रिश्ते तुरप दिए
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कटी-फटी दिन की चादर में
किरण लगाती टाँके
हँस-मुस्काती क्यारी पुष्पा
सूरज सुषमा आँके
आशा की पुरवैया झाँके
सुमन सुगंधित लाके
जब-जब नातों की तबियत बिगड़ी
रब-नब आगे हाथ जोड़कर
नाते नये किये
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तुड़ी-मुड़ी नम रात-रजाई
ओढ़ नहीं सो पाते
चंदा-तारे हिरा गये लड़
मेघ खोज थक जाते
नींद-निशा से दूर परिंदे
उड़ दिनेश ले आते
छब-ढब अजब नहीं अगड़ी-पिछड़ी
चुप मन वीणा बजा-बजाकर
भेंटे सुगढ़ हिये
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नवगीत
हमें न रोको, तनिक न टोंको
प्रगतिशील आज़ाद हम
नहीं शत्रु की कोई जरूरत
करें देश बर्बाद हम
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हम आज़ाद ख़याल बहुत हैं
ध्वजा विदेश प्यारी है
कोसें निज ध्वज-संविधान को
मन भाती गद्दारी है
जनगण जिनको चुनें , उन्हें
कैसे देखें आबाद हम?
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जिस पत्तल में कहते हैं हम
उसमें करते छेद हैं
उद्घाटित कर दें दुश्मन पर
कमजोरी के भेद हैं
छुरा पीठ में भोंक करेंगे
'न्याय मिले' फरियाद हम
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हमें भरोसा तनिक नहीं
फिर भी संसद में बैठेंगे
काल कर निज चेहरे को हम
शिक्षालय में पैठेंगे
दोष व्यवस्था पर धर देंगे
जब तोड़ें मर्याद हम
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आतंकी हमको हैं प्यारे
जला रहे घर ले अंगारे
आरक्षण चिरकाल चाहिए
चला योग्यता पर दोधारे
भारत माँ को रुला-रुला
आँसू का लेते स्वाद हम
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नवगीत -
बम भोले! मत बोलो भाई
मत कहना जय राम जी!!
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लोकतंत्र का अजब तकाज़ा
दुनिया देखे ठठा तमाशा
अपना हाथ
गाल भी अपना
जमकर मारें खुदी तमाचा
आज़ादी कुछ भी कहने की?
हुए विधाता वाम जी!
बम भोले! मत बोलो भाई
मत कहना जय राम जी!!
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जन का निर्णय पचा न पाते
संसद में बैठे गुर्राते
न्यायालय का
कहा न मानें
झूठे, प्रगतिशील कहलाते
'ख़ास' बुद्धिजीवी पथ भूले
इन्हें न कहना 'आम' जी
बम भोले! मत बोलो भाई
मत कहना जय राम जी!!
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कहाँ मानते हैं बातों से
कहो, देवता जो लातों के?
जैसे प्रभु
वैसी हो पूजा
उत्तर दो सब आघातों के
अवसर एक न पाएं वे
जो करें देश बदनाम जी
बम भोले! मत बोलो भाई
मत कहना जय राम जी!!
५-३-२०१६
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कृति चर्चा:
वक्त आदमखोर: सामयिक वैषम्य का दस्तावेज़
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[कृति विवरण: वक्त आदमखोर, नवगीत संग्रह, मधुकर अष्ठाना, आकार डिमाई, आवरण सजिल्द, बहुरंगी, १९९८, पृष्ठ १२६, नवगीत १०१, १५०/-, अस्मिता प्रकाशन, इलाहाबाद]
साहित्य का लक्ष्य सबका हित साधन ही होता है, विशेषकर दीन-हीन-कमजोर व्यक्ति का हित। यह लक्ष्य विसंगतियों, शोषण और अंतर्विरोधों के रहते कैसे प्राप्त हो सकता है? कोई भी तंत्र, प्रणाली, व्यवस्था, व्यक्ति समूह या दल प्रकृति के नियमानुसार दोषों के विरोध में जन्मता, बढ़ता, दोषों को मिटाता तथा अंत में स्वयं दोषग्रस्त होकर नष्ट होता है। साहित्यकार शब्द ब्रम्ह का आराधक होता है, उसकी पारदर्शी दृष्टि अन्यों से पहले सत्य की अनुभूति करती है। उसका अंतःकरण इस अभिव्यक्ति को सृजन के माध्यम से उद्घाटित कर ब्रम्ह के अंश आम जनों तक पहुँचाने के लिये बेचैन होता है। सत्यानुभूति को ब्रम्हांश आम जनों तक पहुँचाकर साहित्यकार व्यव्ष्ठ में उपजी गये सामाजिक रोगों की शल्यक्रिया करने में उत्प्रेरक का काम करता है।
विख्यात नवगीतकार श्री मधुकर अष्ठाना अपनी कृति ‘वक्त आदमखोर’ के माध्यम से समाज की नब्ज़ पर अँगुली रखकर तमाम विसंगतियों को देख-समझ, अभिव्यक्तकर उसके निराकरण का पथ संधानने की प्रेरणा देते हैं। श्री पारसनाथ गोवर्धन का यह आकलन पूरी तरह सही है: ‘इन नवगीतों की विशिष्ट भाषा, अछूते शब्द विन्यास, मौलिक उद्भावनाएँ, यथार्थवादी प्रतीक, अनछुए बिम्बों का संयोजन, मुहावरेदारी तथा देशज शब्दों का संस्कारित प्रयोग उन्हें अन्य रचनाकारों से पृथक पहचान देने में समर्थ है।
नवगीतों में प्रगतिवादी कविता के कथ्य को छांदस शिल्प के साथ अभिव्यक्त कर सहग ग्राह्य बनाने के उद्देश्य को लेकर नवगीत रच रहे नवगीतकारों में मधुर अष्ठाना का सानी नहीं है। स्वास्थ्य विभाग में सेवारत रहे मधुकर जी स्वस्थ्य समाज की चाह करें, विसंगतियों को पहचानने और उनका निराकरण करने की कामना से अपने नवगीतों के केंद्र में वैषम्य को रखें यह स्वाभाविक है। उनके अपने शब्दों में ‘मानवीय संवेदनाओं के प्रत्येक आयाम में विशत वातावरण से ह्त्प्रह्ब, व्यथित चेतना के विस्फोट ने कविताओं का आकार ग्रहण कर लिया.... भाषा का कलेवर, शब्द-विन्यास, शिल्प-शैली तथा भावनाओं की गंभीरता से निर्मित होता है... इसीलिए चुस्त-दुरुस्त भाषा, कसे एवं गठे शब्द-विन्यास, पूर्व में अप्रयुक्त, अनगढ़-अप्रचलित सार्थक शब्दों का प्रयोग एवं देश-काल-परिस्थिति के अनुकूल आंचलिक एवं स्थानीय प्रभावों को मुखरित करने की कोशिश को मैंने प्रस्तुत गीतों में प्राथमिकता देकर अपनी अनुभूतियों को अभिव्यक्त करने का प्रयास किया है।’
मधुकर जी की भाषा हिंदी-उर्दू-देशज मिश्रित है। ‘तन है वीरान खँडहर / मन ही इस्पात का नगर, मजबूरी आम हो गयी / जिंदगी हराम हो गयी, कदम-कदम क्रासों का सिलसिला / चूर-चूर मंसूबों का किला, प्यासे दिन हैं भूखी रातें / उम्र कटी फर्जी मुस्काते, टुकड़े-टुकड़े अपने राम रह गये / संज्ञाएँ गयीं सर्वनाम रह गये, जीवन भर जो रिश्ते ढोये हैं / कदम-कदम पर कांटे बोये हैं, प्याली में सुबह ढली, थाली में दोपहर / बुझी-बुझी आँखों में डूबे शामो-सहर, जीवन यों तो ठहर गया है / एक और दिन गुजर गया है, तर्कों पर लाद जबर्दस्तियाँ / भूल गयीं दीवारें हस्तियाँ आदि पंक्तियाँ पाठक को आत्म अनुभूत प्रतीत होती हैं। इन नवगीतों में कहीं भी आभिजात्यता को ओढ़ने या संभ्रांतता को साध्य बताने की कोशिश नहीं है। मधुकर जी को भाषिक टटकापन तलाशकर आरोपित नहीं करना पड़ता। उन्हें सहज-साध्य मुहावरेदार शब्दावली के भाव-प्रवाह में संस्कृतनिष्ठ, देशज, ग्राम्य और उर्दू मिश्रित शब्द अपने आप नर्मदा के सलिला-प्रवाह में उगते-बहते कमल दल और कमल पत्रों की तरह साथ-साथ अपनी जगह बनाकर सुशोभित होते जाते हैं। निर्मम फाँस गड़ी मुँहजोरी / तिरस्कार गढ़ गया अघोरी, जंगली विधान की बपौती / परिचय प्रतिमान कहीं उड़ गये / भकुआई भीड़ है खड़ी, टुटपुंजिया मिन्नतें तमाम / फंदों में झूलें अविराम, चेहरों को बाँचते खड़े / दर्पण खुद टूटने लगे आदि पंक्तियों में दैनंदिन आम जीवन में प्रयुक्त होते शब्दों का सघन संगुफन द्रष्टव्य है। भाषी शुद्धता के आग्रही भले ही इन्हें पढ़कर नाक-भौं सिकोड़ें किन्तु नवगीत का पाठक इनमें अपने परिवेश को मुखर होता पाकर आनंदित होता है। अंग्रेजी भाषा से शिक्षित शहरी नयी पीढ़ी के लिए इनमें कई शब्द अपरिचित होंगे किन्तु उन्हें शब्द भण्डार बढ़ाने का सुनहरा अवसर इन गीतों से मिलेगा, आम के आम गुठलियों के दाम...
मधुकर जी इन नवगीतों में सामयिक युगबोधजनित संवेदनाओं, पारिस्थितिक वैषम्य प्रतिबिंबित करती अनुभूतियों, तंत्रजनित विरोधाभासी प्रवृत्तियों तथा सतत ध्वस्त होते मानव-मूल्यों से उत्पन्न तनाव को केंद्र में रखकर अपने चतुर्दिक घटते अशुभ को पहचानकर उद्घाटित करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते। उनकी इस प्रवृत्ति पर आनंद-मंगल, शुभ, उत्सव, पर्व आदि की अनदेखी और उपेक्षा करने का आरोप लगाया जा सकता है किन्तु इन समसामयिक विद्रूपताओं की उपस्थिति और प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता। घर में अपनों के साथ उत्सव मनाकर आनंदमग्न होने के स्थान पर किसी अपरिचित की आँखों के अश्रु पोछने का प्रयास अनुकरणीय ही हो सकता है।
मधुकर जी के इन नवगीतों की विशिष्ट भाषा, अछूता शब्द चयन, मौलिक सोच, यथार्थवादी प्रतीक, अछूता बिम्ब संयोजन, देशज-परिनिष्ठित शब्द प्रयोग, म्हावारों और कहावतों की तरह सरस लच्छेदार शब्दावली, सहज भाव मुद्रा, स्पष्ट वैषम्य चित्रण तथा तटस्थ-निरपेक्ष अभिव्यक्ति उनकी पहचान स्थापित करती है। नवगीत की प्रथम कृति में ही मधुकर जी परिपक्व नवगीतकार की तरह प्रस्तुत हुए हैं। उन्हें विधा के विधान, शिल्प, परिसीमाओं, पहुच, प्रभाव तथा वैशिष्ट्य की पूर्ण जानकारी है। उनकी शब्द-सामर्थ्य, रूपक गढ़न-क्षमता, नवोपमायें खोजन एकी सूक्ष्म दृष्टि, अनुभूत और अनानुभूत दोनों को समान अंतरंगता से अभिव्यक्त कर सकने की कुशलता एनी नवगीतकारों से अलग करती है। अपने प्रथम नवगीत संग्रह से ही वे नवगीत की दोष-अन्वेषणी प्रवृत्ति को पहचान कर उसका उपयोग लोक-हित के लिए करने के प्रति सचेष्ट प्रतीत होते हैं।
मधुकर जी गजल (मुक्तिका) तथा लोकभाषा में काव्य रचना में निपुण हैं। स्वाभाविक है कि गजल में मतला (आरम्भिका) लेखन का अभ्यास उनके नवगीतों में मुखड़ों तथा अंतरों को अधिकतर द्विपंक्तीय रखने के रूप में द्रष्टव्य है। अंतरों की पंक्तियाँ लम्बी होने पर उन्हें चार चरणों में विभक्त किया गया है। अंतरांत में स्थाई या टेक के रूप में कहीं-कहीं २-२ पंक्तियाँ का प्रयोग किया गया है।
मधुकर जी की कहाँ की बानगी के तौर पर एक नवगीत देखें:
पत्थर पर खींचते लकीरें
बीत रहे दिन धीरे-धीरे
चेहरे पर चेहरे, शंकाओं की बातें
शीतल सन्दर्भों में दहक रही रातें
धारदार पल अंतर चीरें
आँखों में तैरतीं अजनबी कुंठायें
नंगे तारों पर फिर जिंदगी बिठायें
अधरों पर अनगूंजी पीरें
बार-बार सूरज की लेकर कुर्बानी
सुधियों की डोर कटी, डूबी नादानी
स्याह हैं चमकती तस्वीरें
एक सौ एक नवगीतों की यह माला रस वैविध्य की दृष्टि से निराश करती है। मधुकर जी लिखते हैं: ‘ इंद्रढनुष में सातों सरगम लहरायें / लहरों पर गंध तिरे पाले छितरायें’ (चुभो न जहरीले डंक) किन्तु संग्रह के अधिकाँश नवगीत डंक दंशित प्रतीत होते हैं। मधुकर जी के साथ इस नवगीत कुञ्ज में विचरते समय कलियों-कुसुमों के पराग की अभिलाषा दुराशा सिद्ध होने पर भी गुलाब से लेकर नागफनी और बबूलों के शूलों की चुभन की प्रतीति और उस चुभन से मुक्त होकर फूलों की कोमलता का स्पर्श पाने की अनकही चाह pathak को बांधे रखती है। नवगीत की यथार्थवादी भावधारा का प्रतिनिधित्व करति यह कृति पठनीय होने के साथ-साथ विचारणीय भी है।
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होली के दोहे
होली का हर रंग दे, खुशियाँ कीर्ति समृद्धि.
मनोकामना पूर्ण हों, सद्भावों की वृद्धि..
स्वजनों-परिजन को मिले, हम सब का शुभ-स्नेह.
ज्यों की त्यों चादर रखें, हम हो सकें विदेह..
प्रकृति का मिलकर करें, हम मानव श्रृंगार.
दस दिश नवल बहार हो, कहीं न हो अंगार..
स्नेह-सौख्य-सद्भाव के, खूब लगायें रंग.
'सलिल' नहीं नफरत करे, जीवन को बदरंग..
जला होलिका को करें, पूजें हम इस रात.
रंग-गुलाल से खेलते, खुश हो देख प्रभात..
भाषा बोलें स्नेह की, जोड़ें मन के तार.
यही विरासत सनातन, सबको बाटें प्यार..
शब्दों का क्या? भाव ही, होते 'सलिल' प्रधान.
जो होली पर प्यार दे, सचमुच बहुत महान..
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कृति चर्चा :
नवगीत २०१३: रचनाधर्मिता का दस्तावेज
[कृति विवरण: नवगीत २०१३ (प्रतिनिधि नवगीत संकलन), संपादक डॉ. जगदीश व्योम, पूर्णिमा बर्मन, आकार डिमाई, आवरण सजिल्द बहुरंगी, पृष्ठ १२ + ११२, मूल्य २४५ /, प्रकाशक एस. कुमार एंड कं. ३६१३ श्याम नगर, दरियागंज, दिल्ली २ ]
विश्व वाणी हिंदी के सरस साहित्य कोष की अनुपम निधि नवगीत के विकास हेतु संकल्पित-समर्पित अंतर्जालीय मंच अभिव्यक्ति विश्वं तथा जाल पत्रिका अनुभूति के अंतर्गत संचालित ‘नवगीत की पाठशाला’ ने नवगीतकारों को अभिव्यक्ति और मार्गदर्शन का अनूठा अवसर दिया है. इस मंच से जुड़े ८५ प्रतिनिधि नवगीतकारों के एक-एक प्रतिनिधि नवगीत का चयन नवगीत आंदोलन हेतु समर्पित डॉ. जगदीश व्योम तथा तथा पूर्णिमा बर्मन ने किया है.
इन नवगीतकारों में वर्णमाला क्रमानुसार सर्व श्री अजय गुप्त, अजय पाठक, अमित, अर्बुदा ओहरी, अवनीश सिंह चौहान, अशोक अंजुम, अशोक गीते, अश्वघोष, अश्विनी कुमार अलोक, ओम निश्चल, ओमप्रकाश तिवारी, ओमप्रकश सिंह, कमला निखुर्पा, कमलेश कुमार दीवान, कल्पना रमणी, कुमार रविन्द्र, कृष्ण शलभ, कृष्णानंद कृष्ण, कैलाश पचौरी, क्षेत्रपाल शर्मा, गिरिमोहन गुरु, गिरीशचंद्र श्रीवास्तव, गीता पंडित, गौतम राजरिशी, चंद्रेश गुप्त, जयकृष्ण तुषार, स्ग्दिश व्योम, जीवन शुक्ल, त्रिमोहन तरल, त्रिलोक सिंह ठकुरेला, धर्मेन्द्र कुमार सिंह, नचिकेता, नवीन चतुर्वेदी, नियति वर्मा, निर्मल सिद्धू, निर्मला जोशी, नूतन व्यास, पूर्णिमा बर्मन, प्रभुदयाल श्रीवास्तव, प्रवीण पंडित, ब्रजनाथ श्रीवास्तव, भारतेंदु मिश्र, भावना सक्सेना, मनोज कुमार, विजेंद्र एस. विज, महेंद्र भटनागर, महेश सोनी, मानोशी, मीणा अग्रवाल, यतीन्द्रनाथ रही, यश मालवीय, रचना श्रीवास्तव, रजनी भार्गव, रविशंकर मिश्र, राजेंद्र गौतम, राजेंद्र वर्मा, राणा प्रताप सिंह, राधेश्याम बंधु, रामकृष्ण द्विवेदी ‘मधुकर’, राममूर्ति सिंह अधीर, संगीता मनराल, रामेश्वर काम्बोज हिमांशु, रवीन्द्र कुमार रवि, रूपचंद शास्त्री ‘मयंक’, विद्यानंदन राजीव, विमल कुमार हेडा, वीनस केसरी, शंभुशरण मंडल, शशि पाधा, शारदा मोंगा, शास्त्री नित्य गोपाल कटारे, सिवाकांत मिश्र ‘विद्रोही’, शेषधर तिवारी, श्यामबिहारी सक्सेना, श्याम सखा श्याम, श्यामनारायण मिश्र, श्रीकांत मिश्र ‘कांत’, संगीता स्वरुप, संजीव गौतम, संजीव वर्मा ‘सलिलl’, सुभाष राय, सुरेश पंडा, हरिशंकर सक्सेना, हरिहर झा, हरीश निगम हैं.
उक्त सूची से स्पष्ट है कि वरिष्ठ तथा कनिष्ठ, अधिक चर्चित तथा कम चर्चित, नवगीतकारों का यह संकलन ३ पीढ़ियों के चिंतन, अभिव्यक्ति, अवदान तथा गत ३ दशकों में नवगीत के कलेवर, भाषिक सामर्थ्य, बिम्ब-प्रतीकों में बदलाव, अलंकार चयन और सर्वाधिक महत्वपूर्ण नवगीत के कथ्य में परिवर्तन के अध्ययन के लिये पर्याप्त सामग्री मुहैया कराता है. संग्रह का कागज, मुद्रण, बँधाई, आवरण आदि उत्तम है. नवगीतों में रूचि रखनेवाले साहित्यप्रेमी इसे पढ़कर आनंदित होंगे.
शोध छात्रों के लिये इस संकलन में नवगीत की विकास यात्रा तथा परिवर्तन की झलक उपलब्ध है. नवगीतों का चयन सजगतापूर्वक किया गया है. किसी एक नवगीतकार के सकल सृजन अथवा उसके नवगीत संसार के भाव पक्ष या कला पक्ष को किसी एक नवगीत के अनुसार नहीं आँका जा सकता किन्तु विषय की परिचर्या (ट्रीटमेंट ऑफ़ सब्जेक्ट) की दृष्टि से अध्ययन किया जा सकता है. नवगीत चयन का आधार नवगीत की पाठशाला में प्रस्तुति होने के कारण सहभागियों के श्रेष्ठ नवगीत नहीं आ सके हैं. बेहतर होता यदि सहभागियों को एक प्रतिनिधि चुनने का अवसर दिया जाता और उसे पाठशाला में प्रस्तुत कर सम्मिलित किया जा सकता. हर नवगीत के साथ उसकी विशेषता या खूबी का संकेत नयी कलमों के लिये उपयोगी होता.
संग्रह में नवगीतकारों के चित्र, जन्म तिथि, डाक-पते, चलभाष क्रमांक, ई मेल तथा नवगीत संग्रहों के नाम दिये जा सकते तो इसकी उपयोगिता में वृद्धि होती. आदि में नवगीत के उद्भव से अब तक विकास, नवगीत के तत्व पर आलेख नई कलमों के मार्गदर्शनार्थ उपयोगी होते. परिशिष्ट में नवगीत पत्रिकाओं तथा अन्य संकलनों की सूची इसे सन्दर्भ ग्रन्थ के रूप में अधिक उपयोगी बनाती तथापि नवगीत पर केन्द्रित प्रथम प्रयास के नाते ‘नवगीत २०१३’ के संपादक द्वय का श्रम साधुवाद का पात्र है. नवगीत वर्तमान स्वरुप में भी यह संकलन हर नवगीत प्रेमी के संकलन में होनी चाहिए. नवगीत की पाठशाला का यह सारस्वत अनुष्ठान स्वागतेय तथा अपने उद्देश्य प्राप्ति में पूर्णरूपेण सफल है. नवगीत एक परिसंवाद के पश्चात अभिव्यक्ति विश्वं की यह बहु उपयोगी प्रस्तुति आगामी प्रकाशन के प्रति न केवल उत्सुकता जगाती है अपितु प्रतीक्षा हेतु प्रेरित भी करती है.
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कृति चर्चा :
नवगीत को परखता हुआ “नवगीत एक परिसंवाद”
चर्चाकार: आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
[कृति विवरण: नवगीत:एक परिसंवाद, संपादक निर्मल शुक्ल, आकार डिमाई, आवरण सजिल्द बहुरंगी जेकेटयुक्त, पृष्ठ ११०, मूल्य २००/-, प्रकाशक विश्व पुस्तक प्रकाशन, ३०४ ए, बी, जी ६, पश्चिम विहार, नई दिल्ली ६३]
साहित्य समाज का दर्पण मात्र नहीं होता, वह समाज का प्रेरक और निर्माता भी होता है. काव्य मनुष्य के अंतर्मन से नि:स्रत ही नहीं होता, उसे प्रभावित भी करता है. नवगीत नव गति, नव लय, नव ताल, नव छंद से प्रारंभ कर नव संवाद, नव भावबोध, नव युगबोध नव अर्थबोध, नव अभिव्यक्ति ताक पहुँच चुका है. नवगीत अब बौद्धिक भद्र लोक से विस्तृत होकर सामान्य जन तक पैठ चुका है. युगीन सत्यों, विसंगतियों, विडंबनाओं, आशाओं, अरमानों तथा अपेक्षाओं से आँखें मिलाता नवगीत समाज के स्वर से स्वर मिलाकर दिशा दर्शन भी कर पा रहा है. अपने छः दशकीय सृजन-काल में नवगीत ने सतही विस्तार के साथ-साथ अटल गहराइयों तथा गगनचुम्बी ऊँचाइयों को भी स्पर्श किया है.
‘नवगीत : एक परिसंवाद’ नवगीत रचना के विविध पक्षों को उद्घाटित करते १४ सुचिंतित आलेखों का सर्वोपयोगी संकलन है. संपादक निर्मल शुक्ल ने भूमिका में ठीक ही कहा है: ‘नवगीत का सृजन एक संवेदनशील रचनाधर्मिता है, रागात्मकता है, गेयता है, एक सम्प्रेषणीयता के लिए शंखनाद है, यह बात और है कि इन साठ वर्षों के अंतराल में हर प्रकार से संपन्न होते हुए भी गीत-नवगीत को अपनी विरासत सौंपने के लिये हिंदी साहित्य के इतिहास के पन्नों पर आज भी एक स्थान नहीं मिल सका है.’ विवेच्य कृति नवगीत के अस्तित्व व औचित्य को प्रमाणित करते हुए उसकी भूमिका, अवदान और भावी-परिदृश्य पर प्रकाश डालती है.
उत्सव धर्मिता का विस्तृत संसार: पूर्णिमा बर्मन, नवगीत कितना सशक्त कितना अशक्त; वीरेंद्र आस्तिक, नवगीतों में राजनीति और व्यवस्था: विनय भदौरिया, नवगीत में महानगरीय बोध: शैलेन्द्र शर्मा, आज का नवगीत समय से संवाद करने में सक्षम है: निर्मल शुक्ल, नवगीत और नई पीढ़ी: योगेन्द्र वर्मा ‘व्योम’, हिंदी गीत: कथ्य और तथ्य अवनीश सिंह चौहान, नवगीत के प्रतिमान: शीलेन्द्र सिंह चौहान, गीत का प्रांजल तत्व है नवगीत: आनंद कुमार गौरव, समकालीन नवगीत की अवधारणा और उसके विविध आयाम: ओमप्रकाश सिंह, और उसकी चुनौतियाँ: मधुकर अष्ठाना, नवगीत में लोकतत्व की उपस्थिति: जगदीश व्योम, नवगीत में लोक की भाषा का प्रयोग: श्याम श्रीवास्तव, नवगीत में भारतीय संस्कृति: सत्येन्द्र, ये सभी आलेख पूर्व पोषित अवधारणाओं की पुनर्प्रस्तुति न कर अपनी बात अपने ढंग से, अपने तथ्यों के आधार पर न केवल कहते हैं, अब तक बनी धारणाओं और मान्यताओं का परीक्षण कर नवमूल्य स्थापना का पथ भी प्रशस्त करते हैं.
ख्यात नवगीतकार माहेश्वर तिवारी ठीक ही आकलित करते हैं: ‘परम्परावादी गीतकार अपनी निजता में ही डूबा हुआ होता है, वहीं नवगीत का कवि बोध और समग्रता में गीत के संसार को विस्तार देता है. नवगीत भारतीय सन्दर्भ में ओनी जड़ों की तलाश और पहचान है. उसमें परंपरा और वैज्ञानिक आधुनिकता का संफुफां उसे समकालीन बनाता है. नवगीत कवि कठमुल्ला नहीं है, और न उसका विश्वास किसी बाड़े-बंदी में है. वह काव्यत्व का पक्षधर है. इसलिए आज के कविता विरोधी समय में, कविता के अस्तित्व की लड़ाई के अग्रिम मोर्चे पर खड़ा दिखता है. समकालीन जीवन में मनुष्य विरोधी स्थितियों के खिलाफ कारगर हस्तक्षेप का नाम है नवगीत.’’
नवगीत : एक परिसंवाद में दोहराव के खतरे के प्रति चेतावनी देती पूर्णिमा बर्मन कहती हैं: “हमारा स्नायु तंत्र ही गीतमय है, इसे रसानुभूति के लिये जो लय और ताल चाहिए वह छंद से ही मिलती है... नवगीत में एक ओर उत्सवधर्मिता का विस्तृत संसार है और दूसरी ओर जनमानस की पीड़ा का गहरा संवेदन है.” वीरेंद्र आस्तिक के अनुसार “नवगीत का अति यथार्थवादी, अतिप्रयोगवादी रुझान खोजपूर्ण मौलिकता से कतराता गया है.” विनय भदौरिया के अनुसार: ‘वस्तुतः नवगीत राजनीति और व्यवस्था के समस्त सन्दर्भों को ग्रहण कर नए शिल्प विधान में टटके बिम्बों एवं प्रतीकों को प्रयोगकर सहज भाषा में सम्प्रेषणीयता के साथ अभिव्यक्त कर रहा है.” शैलेन्द्र शर्मा की दृष्टि में “वर्तमान समय में समाज में घट रही प्रत्येक घटना की अनुगूँज नवगीतों में स्पष्ट दिखाई देती है.” निर्मल शुक्ल के अनुसार “आज का नवगीत समय से सीधा संवाद कर रहा है और साहित्य तथा समाज को महत्वपूर्ण आयाम दे रहा है, पूरी शिद्दत के साथ, पूरे होशोहवास में.”
नए नवगीतकारों के लेखन के प्रति संदेह रखनेवालों को उत्तर देते योगेन्द्र वर्मा ‘व्योम’ के मत में: “नयी पीढ़ी की गीति रचनाओं के सामयिक बनने में किसी प्रकार की कोई शंका की गुन्जाइश नहीं है.” अवनीश सिंह चौहान छंदानुशासन, लय तथा काव्यत्व के सन्दर्भ में कहते हैं: “गीत सही मायने में गीत तभी कहलायेगा जब उसमें छंदानुशासन, अंतर्वस्तु की एकरूपता, भावप्रवणता, गेयता एवं सहजता के साथ समकालीनता, वैचारिक पुष्टता और यथार्थ को समावेशित किया गया हो.” शीलेन्द्र सिंह चौहान के अनुसार “नवगीत की सौंदर्य चेतना यथार्थमूलक है.” आनंद कुमार ‘गौरव’ के मत में “नवगीत की प्रासंगिकता ही जन-संवाद्य है.” ओमप्रकाश सिंह अतीत और वर्तमान के मध्य सेतु के रूप में मूल्यांकित करते हैं. मधुकर अष्ठाना अपरिपक्व नवगीत लेखन के प्रति चिंतित हैं: “गुरु-शिष्य परंपरा के भाव में नवगीत के विकास पर भी ग्रहण लग रहा है.” जगदीश व्योम नवगीत और लोकगीत के अंतर्संबंध को स्वीकारते हैं: “नवगीतों में जब लोक तत्वों का आभाव होता है तो उनकी उम्र बहुत कम हो जाती है.” श्याम श्रीवास्तव के मत में “लोकभाषा का माधुर्य, उससे उपजी सम्प्रेषणीयता रचना को पाठक से जोड़ती है.” सत्येन्द्र तिवारी का उत्स भारतीय संस्कृति में पाते हैं.
सारत: नवगीत:एक परिसंवाद पठनीय ही नहीं मननीय भी है. इसमें उल्लिखित विविध पक्षों से परिचित होकर नवगीतकार बेहतर रचनाकर्म करने में सक्षम हो सकता है. नवगीत को ६ दशक पूर्व के मापदंडों में बाँधने के आग्रही नवगीतकारों को में लोकतत्व, लोकभाषा, लोक शब्दों और लोक में अंतर्व्याप्त छंदों की उपयोगिता का महत्त्व पहचानकर केवल बुद्धिविलासत्मक नवगीतों की रचना से बचना होगा. ऐसे प्रयास आगे भी किये जाएँ तो नवगीत ही नहीं समालोचनात्मक साहित्य भी समृद्ध होगा.
५-३-२०१५
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अंगरेजी पर दोहे
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अंगरेजी में खाँसते, समझें खुद को श्रेष्ठ.
हिंदी की अवहेलना, समझ न पायें नेष्ठ..
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टेबल याने सारणी, टेबल माने मेज.
बैड बुरा माने 'सलिल', या समझें हम सेज..
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जिलाधीश लगता कठिन, सरल कलेक्टर शब्द.
भारतीय अंग्रेज की, सोच करे बेशब्द..
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नोट लिखें या गिन रखें, कौन बताये मीत?
हिन्दी को मत भूलिए, गा अंगरेजी गीत..
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जीते जी माँ ममी हैं, और पिता हैं डैड.
जिस भाषा में श्रेष्ठ वह, कहना सचमुच सैड..
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चचा फूफा मौसिया, खो बैठे पहचान.
अंकल बनकर गैर हैं, गुमी स्नेह की खान..
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गुरु शिक्षक थे पूज्य पर, टीचर हैं लाचार.
शिष्य फटीचर कह रहे, कैसे हो उद्धार?.
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शिशु किशोर होते युवा, गति-मति कर संयुक्त.
किड होता एडल्ट हो, एडल्ट्री से युक्त..
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कॉपी पर कॉपी करें, शब्द एक दो अर्थ.
यदि हिंदी का दोष तो अंगरेजी भी व्यर्थ..
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टाई याने बाँधना, टाई कंठ लंगोट.
लायर झूठा है 'सलिल', लायर एडवोकेट..
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टैंक अगर टंकी 'सलिल', तो कैसे युद्धास्त्र?
बालक समझ न पा रहा, अंगरेजी का शास्त्र..
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प्लांट कारखाना हुआ, पौधा भी है प्लांट.
कैन नॉट को कह रहे, अंगरेजीदां कांट..
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खप्पर, छप्पर, टीन, छत, छाँह रूफ कहलाय.
जिस भाषा में व्यर्थ क्यों, उस पर हम बलि जांय..
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लिख कुछ पढ़ते और कुछ, समझ और ही अर्थ.
अंगरेजी उपयोग से, करते अर्थ-अनर्थ..
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हीन न हिन्दी को कहें, भाषा श्रेष्ठ विशिष्ट.
अंगरेजी को श्रेष्ठ कह, बनिए नहीं अशिष्ट..
५-३-२०१४
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नवगीत
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आँखें रहते सूर हो गए,
जब हम खुद से दूर हो गए.
खुद से खुद की भेंट हुई तो-
जग-जीवन के नूर हो गए...
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सबलों के आगे झुकते सब.
रब के आगे झुकता है नब.
वहम अहम् का मिटा सकें तो-
मोह न पाते दुनिया के ढब.
जब यह सत्य समझ में आया-
भ्रम-मरीचिका दूर हो गए...
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सुख में दुनिया लगी सगी है.
दुःख में तनिक न प्रेम पगी है.
खुली आँख तो रहो सुरक्षित-
बंद आँख तो ठगा-ठगी है.
दिल पर लगी चोट तब जाना-
'सलिल' सस्वर सन्तूर हो गए...
५-३-२०१०
Chandravati Gautam Sharma
bahut hi khubsurat likha hai........itni sundar rachnaye to mujhko chor bana dengi....
'सलिल' बूँद ले मधु अगर, सलिल-धार हो धन्य.
मधु-मिठास इस जगत में, दुर्लभ और अनन्य..
आपका उत्साहवर्धन के लिए आभार है.
गीत अपने कद्रदां पर, बार-बार निसार है..
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