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मंगलवार, 20 जनवरी 2026

जनवरी २०, पूर्णिका, पेंसिल, राम, सॉनेट, विवाह, दीप, विजाति छंद, सबरीमाला, गीत, कल्पना, शारदा

सलिल सृजन जनवरी २०
*
पूर्णिका 
आम आदमी की है गलती
व्यर्थ आस क्यों मन में पलती
.
क्यों न समझता उगती ऊषा
दिन बीते हो संध्या ढलती
.
अपनी भूल नज़र कब आती? 
औरों की त्रुटि चुभती-खलती
.
साथ छोड़ती परछाईं भी
साथ न तम में पल भर चलती
.
मृगतृष्णा पल-पल भटकाती
माया अपनी बनकर छलती
.
होनी होकर ही रहती है
अनहोनी ही देखी टलती
.
कोशिश 'सलिल' व्यर्थ मत मानो
जिजीविषा मंज़िल बन फलती
२०.१.२०२६
०००
पूर्णिका
रात रानी को बिदा कर रातरानी।
सुबह का स्वागत करे सविनय सयानी।।
.
पहन बाना श्वेत हरियल हँस रही है।
सूर्य माली कर रहा खुद निगहबानी।।
.
धरा जननी 'हो न ओझल आँख से' कह
रहे चिंतित हो रही बिटिया लुभानी।।
.
बाँध सेहरा द्वार पर आ गया गेंदा।
नाच-गाए भ्रमर दल सुन धुन सुहानी।।
.
मिले समधी गले बरगद और पीपल।
गाए गारी कूक कोयल मधुर बानी।।
.
हो न कन्या दान, अब वर दान होगा।
हो तभी गुणवान नव संतति अजानी।।
.
सलिल स्नेहिल सुवासित संबंध सपने।
कर सके साकार जो वह मनुज ज्ञानी।।
०००
नयन नयन को बाँचते, गए नयन में डूब।
नयन नयन को बाँधते, नयन न करते चूक।।
०००
पेंसिल
एक बच्चे ने अपनी दादी को पत्र लिखते हुए देखकर उत्सुकता से पूछा- "दादी, आप क्या लिख ​​रही हो? क्या आप कुछ दिलचस्प बातें लिख रही हो? या क्या आप मेरे बारे में कुछ लिख रही हो?"
दादी ने लिखना बंद कर अपने पोते की ओर मुड़ते हुए कहा- "हाँ बेटा! मैं आपके बारे में ही लिख रही हूँ खत से ज्यादा महत्वपूर्ण यह पेंसिल है, जिसका मैं उपयोग कर रही हूँ। मुझे आशा है कि आप इस पेंसिल से बहुत कुछ सीखेंगे।"
उत्सुकतावश वह बच्चा अपनी दादी की ओर दौड़ता हुआ आया और थोड़ी देर पेंसिल का बारीकी से निरीक्षण करने के बाद उसने पूछा- "इस पेंसिल से सबक? हम एक पेंसिल से क्या सीख सकते हैं?"
उसकी दादी ने जवाब दिया, "बेटे!, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप चीज़ों को कैसे देखते हैं। इस पेंसिल में सात गुण हैं, जिन्हें अगर आप जीवन में शामिल करते हैं, तो आप एक अद्भुत व्यक्ति बन जाएँगे और हमेशा शांति और प्रेम से रहेंगे।"
बच्चे ने पूछा- कैसे?
दादी ने कहा- " पेंसिल में ७ गुण हैं।
पहला- इस पेंसिल की तरह, हम भी काम कर सकते हैं लेकिन याद रखें कि हर समय, किसी का हाथ हमारे हर कार्य के पीछे रहकर हमें आगे बढ़ने के लिए सक्षम बनाता है। हम उसे भगवान कहते हैं।।"
दूसरा- हमें अपनी पेंसिल की नोक को बार-बार नुकीला करना पड़ता है, पेंसिल को पहले कष्ट होता है, लेकिन बाद में यह अधिक दक्षता के साथ काम करती है। इसी तरह, कठिन समय हमें जीवन में बड़ी चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करता है, जो आगे चलकर हमारे आंतरिक विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और हमें एक बेहतर इंसान बनने में मदद करता है।
तीसरा- गलती होने पर पेंसिल उसे सुधारने का मौका देती है। हम रबर से मिटाकर गलती सुधार सकते हैं। गलतियाँ करना मानव स्वभाव है, गलती हो जाए तो उसे स्वीकार कर सुधारें और फिर न दोहराएँ।
चौथा- पेंसिल बाहर से खूबसूरत हो और उसके अंदर का ग्रेफाइट लिखने के काम न आए तो वह निरुपयोगी होगी। इसलिए हमें बाहरी साज-सज्जा के स्थान पर अपने अंदर सद्गुणों को अधिक महत्व देना चाहिए।
पाँचवा- पेंसिल लिखकर अपने पीछे एक छाप छोड़ जाती है जिससे कई जन प्रेरणा लेकर बेहतर बन सकते हैं। हमें भी जीवन में विचारों और कार्यों की छाप छोड़नी चाहिए जिससे अन्य जन प्रेरणा ले सकें।
छठवाँ- पेंसिल दिन-ब-दिन अधिक से अधिक छोटी होती जाती है और उसके समाप्त होने का समय निकट आता जाता है। हमारा जीवन इसी तरह घटता रहता है। उम्र बढ़ती है पर शेष समय घटता है इसलिए काम टालना नहीं चाहिए।
सातवाँ - पेंसिल फेंके जाने तक बिना विरोध या माँग किए लिखती रहती है। इसी तरह हमें भी जितना भी जीवन मिल है उसमें बिना थके-रुके काम करते रहना चाहिए।
बच्चे के पेंसिल को स्नेहपूर्वक निहारा और दादी से लेकर सम्हालकर रख लिया।
२०.१.२०२५
०००
राम लला स्वागत
स्वागत में तैयार, सुरग स्यूं देव पधार्या।
खड़्या अवध र द्वार, सुरज चंदा जस गार्या ।।
पात मिलावै ताल, नाच रय फुलड़ा कलियाँ।
रए झूम तरु शाख, मगन व्है रईं तितलियाँ ।।
ऊषा लए गुलाल, भाल पै टाँके टीका।
रजनी करे मलाल, दरस बिन जीवन फीका।।
सरयू चरन पखार, भई बड़भागी मैया।
सिकता तन लिपटाय, हँस रए चारउं भैया।।
दस रथ थाम लगाम, प्रभाती सुन नृप गदगद।
बिसरे मंत्र सुमंत्र, मातु त्रै सुमधुर गाउत।।
झूम अजुध्या नची, पताका जै कह उछली।
नारी-नर तर रए, लला लख किस्मत बदली।।
बिधि-हर ठाँड़े द्वार, जुरे कर लेखें लीला।
धरा छुए पग मौन, छत्र नभ लै है नीला।।
२०.१.२०२४
***
राम दोहावली
*
राम आत्म परमात्म भी, राम अनादि-अनंत।
चित्र गुप्त है राम का, राम सृष्टि के कंत।।
विधि-हरि-हर श्री राम हैं, राम अनाहद नाद।
शब्दाक्षर लय-ताल हैं, राम भाव रस स्वाद।।
राम नाम गुणगान से, मन होता है शांत।
राम-दास बन जा 'सलिल', माया करे न भ्रांत।।
राम आम के खास के, सबके मालिक-दास।
राम कर्म के साथ हैं, करते सतत प्रयास।।
वाम न राम से हो सलिल, हो जाने दे पार।
केवट के सँग मिलेगा, तुझको सुयश अपार।।
राम न सहते गलत को, राम न रहते मौन।
राम न कहते निज सुयश, नहीं जानता कौन?
राम न बाधा मानते, राम न करते बैर।
करते हैं सत्कर्म वे, सबकी चाहें खैर।।
लक्ष्य रखे जो एक ही, वह जन परम सुजान।
लख न लक्ष मन चुप करे, साध तीर संधान।।
.
लखन लक्ष्मण या कहें, लछ्मन उसको आप।
राम-काम सौमित्र का, हर लेता संताप।।
.
सिया-सिंधु की उर्मि ला, अँजुरी रखें अँजोर।
लछ्मन-मन नभ, उर्मिला मनहर उज्ज्वल भोर।।
.
लखन-उर्मिला देह-मन, इसमें उसका वास।
इस बिन उसका है कहाँ, कहिए अन्य सु-वास।।
.
मन में बसी सुवास है, उर्मि लखन हैं फ़ूल।
सिया-राम गलहार में, शोभित रहते झूल।।
***
राम बारात - बधाई गीत
चलो मिलके सजाएँ बारात, बधाई हो सबको २
*
जुही-चमेली अंजलि छाया, आभा देखे जग चकराया।
वसुधा जगमग करे ज्योत्सना, निशि संग चंदा आया।
चलो मिल के बनाएँ बारात, बधाई हो सबको २
*
विभा सजाए सुंदर टीका, सरला बिन मजमा है फीका।
हैं कमलेश मगन गायन में, रजनी का सेहरा है नीका।
चलो मिल के निकालें बारात, बधाई हो सबको २
*
इंद्रा संग संतोष सुसज्जित, राजकुमार नर्मदा मज्जित।
पाखी नीलम छाया शोभा लख , सुर नर मुनि लज्जित।
चलो मिल के घुमाएँ बारात, बधाई हो सबको २
***
गीत
मधुर मधुर चितवन ने हेरा
मन-पत्थर पर सुमन खिल गए।
मदिर स्वप्न ने डाला डेरा
नज़र उतारें दाई तिल हुए।।
*
अधर रसाल बोल कलरव से
शशि सम बिंदी शोभित उज्ज्वल।
कहती श्याम बसे अंतर्मन
केश राशि सर्पीली श्यामल।
नयन नयन को दे आमंत्रण
ह्रदय हृदय से सँकुच मिल गए।
मधुर मधुर चितवन ने हेरा
मन-पत्थर पर सुमन खिल गए।
*
भाल प्रशस्त गगन सम सुंदर
शशि सम बिंदी शोभित उज्ज्वल।
भौंह-कमान दृष्टि शर बंकिम
मुक्ता मणि रद करते झिलमिल।
प्रणय पत्रिका करते प्रेषित
हस्ताक्षर बन विकल दिल गए
मधुर मधुर चितवन ने हेरा
मन-पत्थर पर सुमन खिल गए।
*
कुंडल डोल रहे कानों में
ग्रीवा राजहंसिनी गर्वित।
भाग्यवान भुज-हार पा सके
करपल्लव गह चंदन चर्चित।
द्वैत मिटा, अद्वैत पंथ चल
अधराधर अनकहे सिल गए।
मधुर मधुर चितवन ने हेरा
मन-पत्थर पर सुमन खिल गए।
*
सॉनेट
विवाह
*
प्रकृति-पुरुष का मिलन ही, सकल सृष्टि का मूल।
द्वैत मिटा अद्वैत वर, रहें साथ गह हाथ।
दो अपूर्ण मिल पूर्ण हों, सुख-सपनों में झूल।।
सप्तपदी पर वचन दें, लें ऊँचा कुल माथ।।
हल्दी-मेंहदी-तेल है, रूप-रंग अरु स्नेह।
पूजें माटी-कूप हँस, जड़ जमीन से जोड़।
लग्न पत्रिका कह रही, लगन लगी चल गेह।।
नीर-क्षीर सम मिल रहें, कोई सके न तोड़।।
श्वास गीतिका आस हो, मन्वन्तर तक रास।
नेह निनादित नर्मदा, कलकल करे सदैव।
प्यास-त्रास से मुक्त हो, सदा बिखेरे हास।।
चित्र गुप्त होकर प्रगट, शुभाशीष दे दैव।।
कलगी अचकन पर रहे, नथ बेंदा बलिहार।
चूड़ी पायल नथ लखे, पटका निज मन हार।।
***
मन से मन का मिलन हो, रोज मने त्यौहार।
सुख-दुख साझा हो सदा, कदम हमेशा संग।
दो कुटुंब मिल एक हों, बाँधें बंदनवार।।
अंतर में अंतर न हो, मनभावन हो संग।।
सात जन्म तक साथ की, कभी न कम हो चाह।
ध्रुव तारे सी प्रीत हो, सहज सरस मनुहार।
अपनापन हो अपरिमित, सबसे पाओ वाह।।
पहनो पहनाए रहो, आस-हास भुजहार।।
गंग-जमुन सम साथ हो, बने प्रेरणा स्रोत।
चाह-राह हो एक ही, सुख-दुख भी हो एक।
सूर्य-उषा जैसी रहे, आनन पर सुख-ज्योत।।
नातों से नाता रखो, तान न ताना नेंक।।
विष्णु-लक्ष्मी हृद बसें, अँगना बाल गुपाल।
विजय तिलक से सुशोभित, रहे हमेशा भाल।।
२०-१-२०२२
***
सॉनेट
दीप प्रज्जवलन
*
दीप ज्योति सब तम हरे, दस दिश करे प्रकाश।
नव प्रयास हो वर्तिका, ज्योति तेल जल आप।
पंथ दिखाएँ लक्ष्य वर, हम छू लें आकाश।।
शिखर-गह्वर को साथ मिल, चलिए हम लें नाप।।
पवन परीक्षा ले भले, कँपे शिखा रह शांत।
जले सुस्वागत कह सतत, कर नर्तन वर दीप।
अगरु सुगंध बिखेर दे, रहता धूम्र प्रशांत।।
भवसागर निर्भीक हो, मन मोती तन सीप।।
एक नेक मिल कर सकें, शारद का आह्वान।
चित्र गुप्त साकार हो, भाव गहें आकार।
श्री गणेश विघ्नेश हर, विघ्न ग्रहणकर मान।।
शुभाशीष दें चल सके, शुभद क्रिया व्यापार।।
दीप जले जलता रहे, हर पग पाए राह।
जिसके मन में जो पली, पूरी हो वह चाह।।
छंद- दोहा
१८-१-२०२२
***
नवगीत
*
रहे तपते गर्मियों में
बारिशों में टपकते थे
सर्दियों में हुए ठन्डे
रौशनी गायब हवा
आती नहीं है
घोंसलें है कॉन्क्रीटी
घुट रही दम
हवा तक दूभर हुई है
सोम से रवि तक न अंतर
एक से सब डे
श्वास नदिया सूखती
है नहीं पानी
आस घाटों पर न मेले
नहीं हलचल
किंतु हटने को नहीं
तैयार तिल भर भी यहाँ से
स्वार्थ के पंडे
अस्पताली तीर्थ पर है
जमा जमघट
पीडितों का, लुटेरों का
रात-दिन नित
रोग पहचाने बिना
परीक्षण-औषधि अनेकों
डॉक्टरी फंडे
***
छंद शाला
* विजाति छंद
* मापनी-१२२२ १२२२
*सूत्र -यरगग
*
निहारा क्या?
गुहारा क्या?
कहो क्या साथ लाया था?
कहो क्या साथ जायेगा?
रहेंगे हाथ खाली ही -
न कोई साथ आयेगा
बनाया क्या?
बिगाड़ा क्या?
न कोई गीत है तेरा
न कोई मीत है तेरा
सुनेगा बात ना कोई
लगेगा व्यर्थ ही टेरा
अँधेरा क्या?
सवेरा क्या?
तुझे तेरे भुला देंगे
सगे साथी जला देंगे
कहेंगे तेरही तेरी
मँगा मीठा मजा लेंगे
हमारा क्या?
तुम्हारा क्या?
२०-१-२०२०
***
एक रचना
सबरीमाला
*
सबरीमाला केंद्र है,
जनगण के विश्वास का।
नर-नारी के साम्य का,
ईश्वर के अहसास का
*
जो पतितों को तारता,
उससे दूर न कोई रहे-
आयु-रंग प्रतिबंध न हो,
हर जन हरिजन व्यथा कहे।।
अन्धकार में देवालय
स्रोत अनंताभास का
*
बना-बदलता परंपरा,
मानव जड़ता ठीक नहीं।
लिंग-भेद हो पूजा में,
सत्य ठीक यह लीक नहीं।
राजनीति ही कारन है,
मानव के संत्रास का
*
पोंगापंथी दूर करें,
एक समान सभी संतान।
अन्धी श्रद्धा त्याज्य सखे!
समता ईश्वर का वरदान।।
आरक्षण कारण बनता
सदा विरोधाभास का
२०-१-२०१९
***
स्तवन
*
सरस्वती शारद ब्रम्हाणी!
जय-जय वीणा पाणी!!
*
अमल-धवल शुचि,
विमल सनातन मैया!
बुद्धि-ज्ञान-विज्ञान
प्रदायिनी छैंया।
तिमिरहारिणी,
भयनिवारिणी सुखदा,
नाद-ताल, गति-यति
खेलें तव कैंया।
अनहद सुनवाई दो कल्याणी!
जय-जय वीणापाणी!!
*
स्वर, व्यंजन, गण,
शब्द-शक्तियां अनुपम।
वार्णिक-मात्रिक छंद
अनगिनत उत्तम।
अलंकार, रस, भाव,
बिंब तव चारण।
उक्ति-कहावत, रीति-
नीति शुभ परचम।
कर्मठ विराजित करते प्राणी
जय-जय वीणापाणी!!
*
कीर्ति-गान कर,
कलरव धन्य हुआ है।
यश गुंजाता गीत,
अनन्य हुआ है।
कल-कल नाद प्रार्थना,
अगणित रूपा,
सनन-सनन-सन वंदन
पवन बहा है।
हिंदी हो भावी जगवाणी
जय-जय वीणापाणी!!
२०.१.२०१८
***
एक रचना
कल्पना
*
जन्म दिन कब कल्पना का?
प्रश्न कौन बूझेगा?
पूछता यथार्थ से मैं
उसे कुछ न सूझेगा।
कल्पना अजन्मी है
अनादि है, अनंत है।
श्वास-श्वास व्याप्त प्रिया
आस-आस कंत है।
कलप ना, सदा खुश हो
कल-पना ले आज ने
काल को बताया है
कल्पना अनंत है
२०.१.२०१७
***
नवगीत
चीनी जैसा नुक्ता
*
चीनी जैसा नुक्ता है या
नुक्ता जैसी चीनी है?
नुक़्ती के लड्डू में खुश्बू
नेह-प्रेम की भीनी है....
*
तकलीफों दरी बिछाई
ढाई आखर की चादर।
मसनद मुसीबतों के रखकर
बैठी कोशिश मुस्काकर।
जरूरतों की दाल गल सके
मिल हर अड़चन बीनी है।
चीनी जैसा नुक्ता है या
नुक्ता जैसी चीनी है?
*
गम ढोलक पर थाप ख़ुशी की
कोकिल-कंठों में कजरी।
मर्यादा की चूड़ी खनकी
उठ उमंग बनरी सज री!
पीस हिया हिना रचायी
अँखियाँ गीली कीनी है।
चीनी जैसा नुक्ता है या
नुक्ता जैसी चीनी है?
*
घोडा चुनौतियों का बाँका
सपना नौशा थामे रास।
आम आदमी भी बाराती
बनकर हो जाता है ख़ास।
ऐ नसीब! मत आँख दिखा
मेहनत ने खुशियाँ दीनी है
चीनी जैसा नुक्ता है या
नुक्ता जैसी चीनी है?
२०-१-२०१६
***
आइये कविता करें: ७
.
एक और प्रयास.......
नव गीत
आभा सक्सेना
.
सूरज ने छाया को ठगा १५
किरनों नेे दिया दग़ा १२
अब कौन है, जो है सगा १४
कांपता थर थर अंधेरा १४
कोहरे का धुन्ध पर बसेरा १७
जागता अल्हड़ सवेरा १४
रोशनी का अधेरों से १४
दीप का जली बाती से १४
रिश्तें हैं बहुत करीब से १५
कांपती झीनी सी छांव १४
पकड़ती धूप की बांह १३
ताकती एक और ठांव १४
इस नवगीत के कथ्य में नवता तथा गेयता है. यह मानव जातीय छंद में रचा गया है. शैल्पिक दृष्टि से बिना मुखड़े के ४ त्रिपंक्तीय समतुकान्ती अँतरे हैं।एक प्रयोग करते हैं, पहले अंतरे की पहली पंक्ति को मुखड़ा बना कर शेष २ पंक्तियों को पहले तीसरे अंतरे के अंत में प्रयोग किया गया है। दूसरे अँतरे के अंत में पंक्ति जोड़ी गई है। आभा जी! क्या इस रूप में यह अपनाने योग्य है? विचार कर बतायें।
सूर्य ने ५
छाया को ठगा ९
काँपता थर-थर अँधेरा १४
कोहरे का है बसेरा १४
जागता अल्हड़ सवेरा १४
किरनों नेे ६
दिया है दग़ा ८
रोशनी का दीपकों से १४
दीपकों का बातियों से १४
बातियों का ज्योतियोँ से १४
नेह नाता ७
क्यों नहीं पगा? ८
सूर्य ने ५
छाया को ठगा ९
छाँव झीनी काँपती सी १४
बाँह धूपिज थामती सी १४
ठाँव कोई ताकती सी १४
अब कौन है ७
किसका सगा? ७
सूर्य ने ५
छाया को ठगा ९
.
***
कार्यशाला
आइये! कविता करें ६ :
.
मुक्तक
आभा सक्सेना
कल दोपहर का खाना भी बहुत लाजबाब था, = २६
अरहर की दाल साथ में भुना हुआ कबाब था। = २६
मीठे में गाजर का हलुआ, मीठा रसगुल्ला था, = २८
बनारसी पान था पर, गुलकन्द बेहिसाब था।। = २६
लाजवाब = जिसका कोई जवाब न हो, अतुलनीय, अनुपम। अधिक या कम लाजवाब नहीं होता, भी'' से ज्ञात होता है कि इसके अतिरिक्त कुछ और भी स्वादिष्ट था जिसकी चर्चा नहीं हुई। इससे अपूर्णता का आभास होता है। 'भी' अनावश्यक शब्द है।
तीसरी पंक्ति में 'मीठा' और 'मीठे' में पुनरावृत्ति दोष है. गाजर का हलुआ और रसगुल्ला मीठा ही होता है, अतः यहाँ मीठा लिखा जाना अनावश्यक है।
पूरे मुक्तक में खाद्य पदार्थों की प्रशंसा है. किसी वस्तु का बेहिसाब अर्थात अनुपात में न होना दोष है, मुक्तककार का आशय दोष दिखाना प्रतीत नहीं होता। अतः, इस 'बेहिसाब' शब्द का प्रयोग अनुपयुक्त है।
कल दोपहर का खाना सचमुच लाजवाब था = २५
दाल अरहर बाटी संग भर्ता-कवाब था = २४
गाजर का हलुआ और रसगुल्ला सुस्वाद था- = २६
अधरों की शोभा पान बनारसी नवाब था = २५

१८-१-२०१५

बुधवार, 23 जुलाई 2025

जुलाई २३ , चंचरीक, ऊषा, स्वभाषा, दोहा यमक, अहीर छन्द, बात, सॉनेट, पेंसिल, गीत, झूला गीत

सलिल सृजन जुलाई २३ 

डॉल्फिन-व्हेल दिवस

इसका उद्देश्य इन समुद्री स्तनधारियों के संरक्षण के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए २३ जुलाई १९८२ को अंतर्राष्ट्रीय व्हेलिंग आयोग (IWC) द्वारा वाणिज्यिक व्हेलिंग पर वैश्विक रोक लगाई गई जो १९८६ में प्रभावी हुई और आज भी लागू है।
*
झूला गीत
झूला झूलें राधा रानी, रूप निहारें नंद किशोर।
गोरे तन पर श्यामल छाया, मोहित मायापति हर्षाया।
गोप-गोपियाँ सुध-बुध भूलीं, होकर भाव-विभोर...
कुंज गली में बरसा पानी, भीगी साड़ी-चूनर धानी।
केश लटों से टपकी बूँदें, लें कर कमल बटोर...
खंजन नैना अंजन सोहे, सरला हँसी जगत्पति मोहे।
सलिल नीलिमा कालिंदी की, लहरे लेय हिलोर...
प्रीति-किरण हँस करें अर्चना, विनत अंजली प्रणति प्रार्थना।
राधा-राधानाथ कृपा कर, पग-रज सकें अँजोर...
२३.७.२०२५
०००
सॉनेट
अवसर
अवसर परख तुम्हारी होगी
मूक सहमति या विवेक हो?
तंत्र बने किस तरह निरोगी?
संकल्पित या सिर्फ नेक हो?
भाग्यविधाता भाग्य सँवारे
जनआकांक्षा हाथ पसारे
जनाक्रोश सच, मत बिसरा रे
राहत दे मत मौन निहारे
द्वापर में कर सकी समन्वय
अग्नि परीक्षा बार-बार दी
नहीं जानती थी द्रौपदी भय
क्या अब भी चिंगारी बाकी
सख्त बहुत है समय परीक्षक
क्या बन पाओगी तुम रक्षक?
२२-७-२०२२
•••
सॉनेट : आलोक
*
लोक को आलोक दो प्रभु!
तिमिर में निर्भय रहें हम
खुशी ज्यादा, न्यून हो गम
आपदाएँ रोक दो विभु!
परा-अपरा हम न भूलें
मोह पाए नहीं माया
किसी को दे सकें छाया
स्वार्थ झूले में न झूलें
स्वेद सलिला में नहाएँ
छंद-रस आनंद पाएँ
किसी के तो काम आएँ
झूमकर नव गान गाएँ
रोक पाएँ अनय को प्रभु!
लोक को आलोक दो प्रभु!
२२-७-२०२२ •••
***
बालगीत : पेंसिल
पेन्सिल बच्चों को भाती है.
काम कई उनके आती है.
अक्षर-मोती से लिखवाती.
नित्य ज्ञान की बात बताती.
रंग-बिरंगी, पतली-मोटी.
लम्बी-ठिगनी, ऊँची-छोटी.
लिखती कविता, गणित करे.
हँस भाषा-भूगोल पढ़े.
चित्र बनाती बेहद सुंदर.
पाती है शाबासी अक्सर.
बहिना इसकी नर्म रबर.
मिटा-सुधारे गलती हर.
घिसती जाती,कटती जाती.
फ़िर भी आँसू नहीं बहाती.
'सलिल' जलाती दीप ज्ञान का.
जीवन सार्थक नाम-मान का.
***
बाल साहित्य में छंद
सुषमा निगम, अन्नपूर्णा बाजपेई
*
बच्चों में अनुकरणशीतला, जिज्ञासा और कल्पनाशीलता बहुत अधिक होती है। अनुकरण से उनके चरित्र का विकास, जिज्ञासा से ज्ञान-वृद्धि होती है। कल्पनाशीलता से वे जीवन व जगत के विषय में अपेक्षित ज्ञान प्राप्त करने की ओर स्वयमेव उन्मुख होते हैं। अत:, आवश्यक है कि बच्चों के चारित्रिक विकास और ज्ञानवर्धन हेतु शैशव, बचपन और कैशोर्य तीनों अवस्थाओं के अनुरूप बाल साहित्य लिखाजाए। आज के बच्चे ही कल परिवार, समाज एवं देश के प्रति अपने उत्तरदायित्वों का निर्वहन कर योग्य नागरिक बनेंगे किंतु तभी जब उनके सामने आदर्श हों, उनकी जिज्ञासाओं का सम्यक समाधान हो और उनके कल्पना जगत को यथार्थ की भूमि पर पैर जमाकर प्रयासों के हाथों से उपलब्धियों के आकाश को छूने का अवसर मिले। बच्चों को सद्विचार से आचार की प्रेरणा देने का कार्य बाल साहित्यकार ही कर सकते हैं। बालमन को ध्यान में रखकर कविता, कहानी, नाटक, लेख, जीवनी, संस्मरण, पहेली, चुटकुले आदि रचे जाना आवश्यक है। गद्य की तुलना में पद्य अधिक सरस तथा आसानी से याद रखने योग्य होता है। पद्य के लिए छंद आवश्यक है।
बाल साहित्यकारों द्वारा सरल भाषा में शिशु गीत, बाल गीत, कविता आदि की रचना इस प्रकार हो कि बाल पाठकों का शब्द ज्ञान व शब्द भंडार बढ़े और वे नए नए शब्दों का उपयोग करें। बाल साहित्य सृजन के लिये काल्पनिकता और यथार्थता का समन्वय अपेक्षित है। बाल साहित्यकारों, अभिभावकों, शिक्षकों और प्रकाशकों के समवेत प्रयास से ही बाल साहित्य को उचित प्रतिष्ठा मिल सकेगी। विभिन्न भारतीय भाषाओं में रचित बाल साहित्य के पारस्परिक आदान-प्रदान से बाल साहित्य के विकास व राष्ट्रीय समन्वय भाव को नई दिशा मिल सकती है। अच्छे बालसाहित्य का अध्ययन बच्चों को साहित्य में वर्णित समाज, पर्यावरण, अतीत और भविष्य से संवाद करने के अवसर प्रदान करता है। इससे बच्चों के भाषिक और संज्ञानात्मक कौशल तथा भावनात्मक बुद्धिमत्ता का विकास होता है।
शिशु गीत:
बाल साहित्य लेखन में सर्वाधिक कठिनाई शिशु गीत लेखन में होती है क्योंकि शिशु का शब्द ज्ञान अत्यल्प होता है। शिशु लंबी रचनाएँ याद नहीं कर पाता। सार्थक और उपयोगी शिशु गीत बहुत कम लिखे गए हैं। शिशु गीत का कथ्य बच्चे को परिवेश से जोड़नेवाला होना आवश्यक है। आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ने इस दिशा में सार्थक प्रयास किया है। उनके शिशु गीतों में छंद और कथ्य दोनों का प्रभावी प्रस्तुतीकरण हुआ है। भारत धर्म प्रधान देश है। बुद्धि के देवता गणेश, विद्या की देवी सरस्वती, पंच मातृका (धरती माता, भारत माता, हिंदी माता, गौ माता तथा माँ) पर शिशु गीतों का भाषिक प्रवाह और सरसता शिशुओं के लिए उपयुक्त है:
श्री गणेश की बोलो जय, / पाठ पढ़ो होकर निर्भय। / अगर सफलता पाना है- / काम करो होकर तन्मय।। (१४ मात्रिक, मानव जातीय, हाकलि छंद)
माँ सरस्वती देतीं ज्ञान, / ललित कलाओं की हैं खान। / जो जमकर करता अभ्यास - / वही सफल हो, पा वरदान।। (१५ मात्रिक, तैथिक जातीय, पुनीत छंद)
धरती सबकी माता है, / सबका इससे नाता है। / जगकर सुबह प्रणाम करो- / फिर उठ बाकी काम करो।। (१४ मात्रिक, मानव जातीय, हाकलि छंद)
सजा शीश पर मुकुट हिमालय, / नदियाँ जिसकी करधन। / सागर चरण पखारे निश-दिन- / भारत माता पावन। (२८ मात्रिक, यौगिक जातीय, सार छंद १६-१२ पर यति, पदांत कर्णा, अंत के गुरु को दो लघु किया गया है)
हिंदी भाषा माता है, / इससे सबका नाता है। / सरल, सहज मन भाती है- / जो पढ़ता मुस्काता है।। (१४ मात्रिक, मानव जातीय, हाकलि छंद)
देती दूध हमें गौ माता, / घास-फूस खाती है। / बछड़े बैल बनें हल खीचें / खेती हो पाती है। (२८ मात्रिक, यौगिक जातीय, सार छंद १६-१२ पर यति, पदांत कर्णा)
माँ ममता की मूरत है, / देवी जैसी सूरत है। / लोरी रोज सुनाती है, /सबसे ज्यादा भाती है।। (१४ मात्रिक, मानव जातीय, हाकलि छंद)
अंग्रेजी भाषा की शिक्षा के साथ पश्चिमी कुसंस्कार भी घर-घर में घर कर रहे हैं। इन शिशु गीतों में बच्चों को भारतीय संस्कृति और परिवेश से जोड़ने की सजगता सहज दृष्टव्य है। महानगरों में 'अंकल-आंटी' के अलावा अन्य नाते बच्चे नहीं जानते। इस समस्या को सुलझाने के लिए सलिल जी ने नातों को ही शिशु गीतों का विषय बना कर अभिनव और उपयोगी पहल की है। इन शिशु गीतों में प्राय: मानव जातीय, हाकली छंद का प्रयोग हुआ है।
पापा चलना सिखलाते, / सारी दुनिया दिखलाते। / रोज बिठाकर कंधे पर- / सैर कराते मुस्काते।।
मेरा भैया प्यारा है, / सारे जग से न्यारा है। / बहुत प्यार करता मुझको- / आँखों का वह तारा है।।
बहिन गुणों की खान है, / वह प्रभु का वरदान है। / अनगिन खुशियाँ देती है- / वह हम सबकी जान है।।
पापा सूरज, माँ चंदा, / ध्यान सभी का धरते हैं। / मैं तारा, चाँदनी बहिन- / घर में जगमग करते हैं।।
बब्बा ले जाते बाज़ार, / दिलवाते टॉफी दो-चार। / पैसे नगद दिया करते- / कुछ भी लेते नहीं उधार।।
राम नाम जपतीं दादी, / रहती हैं बिलकुल सादी। / दूध पिलाती-पीती हैं- / खूब सुहाती है खादी।।
मम्मी के पापा नाना, / खूब लुटाते हम पर प्यार। / जब भी वे घर आते हैं- / हम भी करते बहुत दुलार।।
कहतीं रोज कहानी हैं, / माँ की माँ ही नानी हैं। / हर मुश्किल हल कर लेतीं- / सचमुच बहुत सयानी हैं।।
चाचा पापा के भाई, / हमको लगते हैं अच्छे। / रहें बड़ों सँग, लगें बड़े- /बच्चों में लगते बच्चे।।
प्यारी लगतीं मुझे बुआ, / मुझे न कुछ हो- करें दुआ। / प्यारी बहिना पापा की- / पाला घर में हरा सुआ।।
मामा मुझको मन भाते, / माँ से राखी बँधवाते। / सब बच्चों को बैठाकर / गप्प मारते-बतियाते।।
मौसी माँ सी ही लगती, / मुझको गोद उठा हँसती। / ढोलक खूब बजाती है, / केसर-खीर खिलाती है।
बाल-काव्य पर विचार करने के लिए यह जरूरी है कि हमारे मन में बच्चों व बचपन के बारे में एक स्पष्ट समझ हो जिसमें बच्चे को एक जागरूक व जिज्ञासु इंसान के रूप देखना, बाल विकास से जुड़े मुद्दों को समझना व समाज को समझना आदि बातें शामिल हो। बाल काव्य में यथार्थ की अभिव्यक्ति मज़े-मज़े में, खेल-खेल में होना आवश्यक है। बच्चे जानकारी से नहीं, नई कल्पना से आनंदित होते हैं। १६-११ २७ मात्रिक नाक्षत्रिक जातीय सरसी छंद में रचे निम्न शिशु गीत में कल्पना की उड़ान देखें:
सुनो मजे की बातें भैया / सुनो मजे की बात
हाथी दादा दबा रहे हैं / चींटी जी के पाँव
चूहे जी के डर से भागी / बिल्ली अपने गाँव
रौब जमाता फिरता सब पर / नन्हा सा खरगोश
चीता सहमा हुआ खड़ा है / भूला अपने होश
एक सात-आठ साल का बच्चा भी यह जानता है कि धरती गोल है और यह सूरज के चारों ओर चक्कर लगाती है। वह इस जानकारी से खुश नहीं होता। उसे तो कहानी में कोई ऐसा पात्र चाहिए जो धरती पर पाँव रखकर उसे चपटा बना दे या धरती को उल्टी दिशा में घुमा दे। ऐसी स्थिति में धरती पर क्या होगा?, इस कल्पना से वह रोमांचित होता है। यह फैंटेसी कल्पनात्मक और कलात्मक आनंद की सृष्टि करती है, जो बालसाहित्य की आत्मा है। यथार्थ बताते हुए असंभव कल्पनाओं को चित्रित करना और फैंटेसी रचना ही बाल साहित्य है।
बाल-काव्य में बच्चों या बचपन की छवि को उभारा जाना जरूरी है। ऐसी रचनाओं में बच्चे और पशु-पक्षी हों किंतु बड़ों की सोच न हो क्योंकि बच्चे उसका पूर्वानुमान लगा लें तो उत्सुकता नहीं जग पाती, 'आगे क्या होने वाला है' का कौतूहल समाप्त हो जाता है।
पाखी ने बिल्ली पाली. / सौंपी घर की रखवाली../ फिर पाखी बाज़ार गई. / लाई किताबें नई-नई / तनिक देर जागी बिल्ली. / हुई तबीयत फिर ढिल्ली../ लगी ऊंघने फिर सोई. / सुख सपनों में थी खोई. / मिट्ठू ने अवसर पाया./ गेंद उठाकर ले आया../ गेंद नचाना मन भाया. / निज करतब पर इठलाया../ घर में चूहा आया एक./ नहीं इरादे उसके नेक../ चुरा मिठाई खाऊँगा./ ऊधम खूब मचाऊँगा../ आहट सुन बिल्ली जागी./ चूहे के पीछे भागी../ झट चूहे को जा पकड़ा./ भागा चूहा दे झटका../ बिल्ली खीझी, खिसियाई./ मन ही मन में पछताई..
बाल गीत और पात्र:
मुझे याद आता है एक बार मैंने जैसे ही बाल-कथा सुनाते समय पात्रों का परिचय दिया- एक थी गिलहरी ...बच्चे बोल पड़े 'बड़ी नटखट और चुलबुली थी।' सचमुच कहानी में ऐसा ही था मगर कहानी में मजा बनाए रखने के लिए मुझे गिलहरी के पात्र को फिर से गढ़ना पड़ा। अतः, बाल-शिक्षण की दृष्टि से रचनाओं का चयन करते समय देखना चाहिए कि क्या इन रचनाओं में पात्रों की प्रचलित छवियों (लोमड़ी चालाक ही होगी, खरगोश चतुर ही होगा, शेर बहादुर ही होगा, बच्चे बड़ो के निर्देश पर ही काम करेंगे, सौतेली माँ दुष्ट ही होगी आदि) को तोड़ते हुए किसी स्वतन्त्र छवि को गढ़ा जा रहा है? ख्यात बाल साहित्यकार डॉ. शेषपाल सिंह 'शेष' ने एक कथा-गीत में बिल्ली की चूहे पकड़ने की परम्पराबद्ध छवि से मुक्त कर नव युग के अनुरूप नयी छवि दी है: 'सोचो-बदलो बिल्ली मौसी / हमें बदलने दो / चलते हुए समय को अपनी / गति से चलने दो / मेल-जोल से बुरी बात को / दूर हटाना है / टी. वी., टेलीफोन, मेल-ई, / इंटरनेट हुए / एरोप्लेन, टैंकर, अणुबम , युद्धक-जेट हुए / बढ़ें वेब-कंप्यूटर युग में / देश उठाना है.' २६ मात्रिक, महाभागवत जातीय, विष्णुपद छंद ने इस कथा-गीत में चार चाँद लगा दिए हैं।
बाल साहित्य और चित्रांकन:
बच्चों की किताबों में चित्रांकन एक आवश्यक पहलू है। चित्र गीत या कहानी का अटूट हिस्सा होते हैं। बच्चे चित्रों के आधार पर ही पढ़ने की शुरुआत कर लिखे गए का अर्थ ग्रहण करते हैं। अतः, छोटे बच्चों की किताबों में चित्र स्पष्ट, बड़े और बोलते हुए होने चाहिए। चित्रों के साथ उनके बारे में कुछ काव्य-पंक्तियाँ या वाक्य लिखे हों तो प्रभाव और भी बढ़ जाता है। छोटे बच्चों की किताबों में अक्षरों का आकार बड़ा हो ताकि उन्हें आसानी से पढ़ा जा सके। चित्रों के बारे में हमें यह भी समझना होगा कि चित्र इस तरह के हों जो पाठ की हू-ब-हू नकल जैसे न हों वरन लिखी गई बात को और आगे बढ़ाएँ जिससे बच्चों को सोचने व कल्पना करने का मौका मिले। इसके साथ ही स्थिर व रूढि़वादी चित्रों की बजाय चित्रों में गतिशीलता हो जो वास्तविकता में कुछ घट रहा हो ऐसा महसूस करा सकें। वरिष्ठ साहित्यकार श्री सदाशिव कौतुक ने चहक-महक में 'हम पौधे हैं' गीत के साथ पौधे लगाते हुए बच्चों का चित्र दिया है जो गीत का प्रभाव बढ़ाता है- 'हम दुनिया के पौधे हैं / दुनिया हमसे है आबाद / हम महकेंगे; हम चहकेंगे / शुद्ध मिलेगा पानी-खाद।'
राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत श्रेष्ठ शिक्षक तथा प्राचार्य रहे डॉ. रमेशचंद्र खरे ने शब्दों को ही चित्रांकन का माध्यम बनाया है। शब्द चित्र उपस्थित करने के लिए कवि की सामर्थ्य असाधारण होना चाहिए- 'पौ फूटी, भोर हो गया / जागे सब, शोर हो गया। / चिड़ियों की चूं-चूं-चूं / कौओं की काँव-काँव / मुर्गों की बांग-बिगुल / बजता है गाँव-गाँव / अब तो मन मोर हो गया' इस रचना में पूरा परिवेश जीवन हो उठा है। (मुखड़ा १४ मात्रिक मानव जातीय हाकलि छन्द, अंतरा २४ मात्रिक अवतारी जातीय छंद, यति १२-१२)
बालसाहित्य और चेतना-जागृति:
ख्यात शिक्षक और प्राचार्य रहे कृष्णवल्लभ पौराणिक बच्चों को बहुराष्ट्रीय उत्पादों के प्रति विमुख करने के लिए गीत को माध्यम बनाते हैं: 'बोलो बच्चों! तुम्हें चाहिए? / जेम्स गोलियां? केडबरीज? / चुईन्गम गोली?, फिफ्टी-फिफ्टी? / चोकलेट फाइवस्टार?, पार्ले बिस्किट? / और कहो जो तुम्हें चाहिए / नहीं, हमें ये नहीं चाहिए / हमें दीजिए खीर दूध की / सब्जी-रोटी डाल व चांवल / अचार, भुट्टा, गुलाब जामुन / और जलेबी, मथुरा पेड़े ' (सोलह मात्रिक संस्कारी जातीय छंद)
डॉ. बलजीत सिंह पुस्तक संस्कृति के प्रति बच्चों के लगाव को १६ मात्रिक संकरी जातीय छंद में रचित गीत के माध्यम से बढ़ा रहे हैं- पुस्तक है अनमोल खज़ाना / बता रहे थे मेरे नाना / पढ़-पढ़कर वे मुझे सुनाते / बात-बात में ज्ञान बढ़ाते / और न इन सा साथी-संगी / इनकी दुनिया रंग-बिरंगी। / कभी हँसा दें, कभी रुला दें / मीठी-मीठी नींद सुला दें' (१६ मात्रिक संस्कारी जातीय छंद)
डॉ. दिनेश चमोला 'शैलेश' बालगीत के माध्यम से राष्ट्रीय भावधारा का बीजारोपण करते हैं: 'जहाँ हिमालय प्रहरी बनकर, करता सबका मान है / जिसकी रज तक प्यार बाँटती, मेरा हिन्दुस्तान है / हर युग में गौतम-गाँधी बन / लेते सुत अवतार हैं / जहाँ ह्रदय से होती माँ की / एक कंठ जयकार है। / जहाँ देश के लिए लाड़ले, हँसकर देते जान हैं / शांति-ज्ञान का अमर कोष वह मेरा हिन्दुस्तान है' (मुखड़ा-अंतरा २९ मात्रीय महायौगिक जातीय छंद, १६-१३ पर यति)।
बाल चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. प्रदीप शुक्ल ने बाल गीतों के स्वास्थ्य-चेतना जगाने का उपकरण बनाया है। एक अमीबा शीर्षक गीत में वे क्रिकेट की गेंद नाली में गिरने, उसे निकालते समय नाखूनों में अमीबा लगने और खाने के साथ पेट में जाने और गड़बड़ मचाने की घटना के माध्यम से स्वच्छता का संदेश देते हैं: 'एक अमीबा बड़े मजे से नाले में था रहता / अरे! वही गंदा नाला जो सड़क पार था बहता / कहने को तो एक अमीबा ढेरों उसके बच्चे / नाली में उनकी कोलोनी रहते गुच्छे-गुच्छे / क्रिकेट खेलते हुए गेंद नाली में गिरी छपाक / आव न देखा, ताव न देखा पप्पू गया तपाक / साथ गेंद के कई अमीबा पप्पू लेकर आया / बड़े-बड़े नाखून, भूल से उनको वहीं छुपाया / हाथ नहीं धोया अच्छे से पप्पू ने घर जाकर / खुश थे बहुत अमीबा सारे उसके पेट में आकर / रात हुई पप्पू चिल्लाया हुई पेट में गुड़गुड़ / सारे बच्चे समझ रहे हैं कहाँ-कहाँ थी गड़बड़ / तो बच्चों गलती ना करना पप्पू जैसी तुम भी / वरना प्यारे बच्चों तुम फिर सजा पाओगे लंबी।' ( २८ मात्रिक यौगिक जातीय छंद, १६-१२ पर यति)
बाल-रचनाओं की भाषा:
बच्चों को रचना पढ़ने का आनंद तभी आएगा जब भाषा आसानी से समझ में आती हो और दिल तक उतर जाती हो। कॉमिक्स और परीकथाएँ अपनी भाषाई सहजता और बोलचाल के शब्दों के उपयोग के कारण बच्चों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। तात्पर्य यही है कि बच्चों की पुस्तकों में उपयोग में लाई जा रही रचनाओं की भाषा बनावटी व कठिन न हो वरन् सहज और प्रवाहपूर्ण हो बच्चे ऐसी रचनाएँ पसंद करते हैं जिनमें बात नए तरीके से कही जा रही हो, नई कल्पनाएँ हों, असंभव को संभव बनाने के लिए फैंटेसी रची गई हो। वे ऐसी रचनाएँ भी पसंद करते हैं जिनमें एक ही बात का दोहराव हो और दोहराते समय उनमें नए पात्र या घटना जोड़ दी गई हो। बाल कविताओं मे भी ध्वनियों के साथ विविध प्रयोग जैसे: 'बादल गरजा धम धम धडाम / बिजली चमकी कड़ कड़ कड़ाम' आदि हो तो वे बच्चों को आकर्षित करते हैं। बच्चे भाषा से पूरी तरह से वाकिफ नहीं हो पाते, अतः उनके लिए लिखी गई रचनाओं में सरल शब्द हों जिन्हें बच्चे आसानी से समझ पाएँ। बच्चों के लिए लिखे गए गीतों की भाषा में प्रवाह, लय और छांदस सहजया आवश्यक है। उक्त सभी गीतों में सरसता, सरलता, शब्द-चयन में सटीकता, छंद के गेयता तथा अर्थ की स्पष्टता देखी जा सकती है। बालोपयोगी रचना गद्य, पद्य, नाट्य या नृत्य किसी भी विधा में हो उसमें छंद का होना शरबत में शक्कर का होना है।
संदर्भ: दिव्य नर्मदा नेट पत्रिका, झूमे नाचें गीति कथाएँ -शेषपाल सिंह शेष, चहक-महक -सदाशिव कौतुक, आओ सीखें मैदानों में गाते-गाते गीत -डॉ. रमेश चंद्र खरे, रेल चली भई रेल चली -कृष्णवल्लभ पौराणिक, हम बगिया के फूल -डॉ. बलजीत सिंह, एक सौ एक बाल गीत -डॉ. दिनेश चमोला 'शैलेश', गुल्लू का गाँव -डॉ. प्रदीप शुक्ल।
***
मुक्तक
रंग इश्क के अनगिनत, जैसा चाहे देख
लेखपाल न रख सके लेकिन उनका लेख
जी एस टी भी लग नहीं सकता, पटको शीश -
खींच न लछमन भी सकें, इस पर कोई रेख
माँ
माँ की महिमा जग से न्यारी, ममता की फुलवारी
संतति-रक्षा हेतु बने पल भर में ही दोधारी
माता से नाता अक्षय जो पाले सुत बडभागी-
ईश्वर ने अवतारित हो माँ की आरती उतारी
नारी
*
नर से दो-दो मात्रा भारी, हुई हमेशा नारी
अबला कभी न इसे समझना, नारी नहीं बिचारी
माँ, बहिना, भाभी, सजनी, सासु, साली, सरहज भी
सखी न हो तो समझ जिंदगी तेरी सूखी क्यारी
*
पत्नि
पति की किस्मत लिखनेवाली पत्नि नहीं है हीन
भिक्षुक हो बारात लिए दर गए आप हो दीन
करी कृपा आ गयी अकेली हुई स्वामिनी आज
कद्र न की तो किस्मत लेगी तुझसे सब सुख छीन
*
दीप प्रज्वलन
शुभ कार्यों के पहले घर का अँगना लेना लीप
चौक पूर, हो विनत जलाना, नन्हा माटी-दीप
तम निशिचर का अंत करेगा अंतिम दम तक मौन
आत्म-दीप प्रज्वलित बन मोती, जीवन सीप
*
परोपकार
अपना हित साधन ही माना है सबने अधिकार
परहित हेतु बनें समिधा, कब हुआ हमें स्वीकार?
स्वार्थी क्यों सुर-असुर सरीखा मानव होता आज?
नर सभ्यता सिखाती मित्रों, करना पर उपकार
*
एकता
तिनका-तिनका जोड़ बनाते चिड़वा-चिड़िया नीड़
बिना एकता मानव होता बिन अनुशासन भीड़
रहे-एकता अनुशासन तो सेना सज जाती है-
देकर निज बलिदान हरे वह, जनगण कि नित पीड़
*
असली गहना
असली गहना सत्य न भूलो
धारण कर झट नभ को छू लो
सत्य न संग तो सुख न मिलेगा
भोग भोग कर व्यर्थ न फूलो
२३-७-२०१९
***
बात पर दोहे
*
इसने उसकी बात की, उसने इसकी बात।
शब्द-शब्द होते रहे, उस-इस पर आघात।।
*
किसलय से ही सीख लें, किस लय में हो बात।
मधुकर कौशल माधुरी, सिक्त रहें जज्बात।।
*
तन्मय होकर बात कर, मन में रख सद्भाव।
तंत न व्यर्थ भिड़ंत में, रख बसंत सा चाव।।
*
जय प्रकाश सम बात कर, छोड़ छल-कपट-दाँव।
बागर हो बागरी सदृश, बचा देश घर गाँव।।
*
परिणीता चाहे नहीं, रहे विनीता बात।
सत्यपरक मिथिलेश सी, तब सुधरें हालात।।
*
व्यर्थ बात ही बात में, निकल बात से बात।
बढ़े बात तो टालिए, हो न बात से मात।
*
सुनी न समझी अन्य की, की अपनी ही बात।
भले प्रात से रात तक, सुलझ न पाई बात।।
*
वन प्रकाश की राह चल, धन्य केशवानंद।
बात करें परमार्थ की, दें जन को आनंद।।
*
धाम सैलवारा ललित, वरदायी वट-वृक्ष।
बैठ छाँह में बात कर, पाले ग्यान सुलक्ष।।
*
बात-बात में मात हो, बात-बात से जीत।
कहें केशवानंद जी, बात बढ़ाती प्रीत।।
२३-७-२०१८
*
रसानंद दे छंद नर्मदा ४० : अहीर छन्द
लक्षण: जाति रौद्र, पद २, चरण ४, प्रति चरण मात्रा ११, चरणान्त लघु गुरु लघु (जगण).
लक्षण छंद:
चाहे राँझ अहीर, बाला सुन्दर हीर
लघु गुरु लघु चरणांत, संग रहे नत शांत
पूजें ग्यारह रूद्र, कोशिश लँघे समुद्र
जल-थल-नभ में घूम, लक्ष्य सके पद चूम
उदाहरण:
१. सुर नर संत फ़क़ीर, कहें न कौन अहीर?
आत्म-ग्वाल तज धेनु, मन-प्रयास रस-वेणु
प्रकृति-पुरुष सम संग, रचे सृष्टि कर दंग
ग्यारह हों जब एक, मानो जगा विवेक
२. करो संग मिल काम, तब ही हो यश-नाम
भले रहे विधि वाम, रखना साहस थाम
सुबह दोपहर शाम, रचना छंद ललाम
कर्म करें बिन लोभ, सह परिणाम
३. पूजें ग्यारह रूद्र, मन में रखकर भक्ति
जनगण-शक्ति समुद्र, दे अनंत अनुरक्ति
लघु-गुरु-लघु रह शांत, रच दें छंद अहीर
रखता उन्नत माथ, खाली हाथ फ़क़ीर
***
गले मिले दोहा यमक २
*
चल बे घर बेघर नहीं, जो भटके बिन काज
बहुत हुई कविताई अब, कलम घिसे किस व्याज?
*
पटना वाली से कहा, 'पट ना' खाई मार
चित आए पट ना पड़े, अब की सिक्का यार
*
धरती पर धरती नहीं, चींटी सिर का भार
सोचे "धर दूँ तो धरा, कैसे सके सँभार?"
*
घटना घट ना सब कहें, अघट न घटना रीत
घट-घटवासी चकित लख, क्यों मनु करे अनीत?
*
सिरा न पाये फ़िक्र हम, सिरा न आया हाथ
पटक रहे बेफिक्र हो, पत्थर पर चुप माथ
*
बेसिर-दानव शक मुआ, हरता मन का चैन
मनका ले विश्वास का, सो ले सारी रैन
*
करता कुछ करता नहीं, भरता भरता दंड
हरता हरता शांति सुख, धरता धरता खंड
*
बजा रहे करताल पर, दे न सके कर ताल
गिनते हैं कर माल फिर, पहनाते कर माल
*
जल्दी से आ भार ले, व्यक्त करूँ आभार
असह्य लगे जो भार दें, हटा तुरत साभार
*
हँस सहते हम दर्द जब, देते हैं हमदर्द
अपना पन कर रहा है सब अपनापन सर्द
*
भोग लगाकर कर रहे, पंडित जी आराम
नहीं राम से पूछते, "ग्रहण करें आ राम!"
२३-७-२०१६
***
Poem:
*
Why do I wish to swim
Against the river flow?
I know well
I will have to struggle
More and more.
I know that
Flowing downstream
Is a easy task
As compare to upstream.
I also know that
Well wishers standing
On both the banks
Will clap and laugh.
If I win,
They will say:
Their encouragement
Is responsible for the success.
If unfortunately
I loose,
They will not a second
To say that
They tried their best
To stop me
By making laugh on me.
In both the cases
I will loose and
They will win.
Even than
I will swim
Against the river flow.
***
हम क्यों
हम क्यों
निज भाषा बोलें?
निज भाषा बोले बच्चा
बच्चा होता है सच्चा
हम सचाई से सचमुच दूर
आँखें रहते भी हैं सूर
फेंक अमिय
नित विष घोलें
हम क्यों
निज भाषा बोलें?
निज भाषा पंछी बोले
संग-साथ हिल-मिल डोले
हम लड़ते हैं भाई से
दुश्मन निज परछाईं के
दिल में
भड़क रहे शोले
हम क्यों
निज भाषा बोलें?
निज भाषा पशु को भाती
प्रकृति न भूले परिपाटी
संचय-सेक्स करे सीमित
खुद को करे नहीं बीमित
बदले नहीं
कभी चोले
हम क्यों
निज भाषा बोलें?
पर भाषा पर होते मुग्ध
परनारी देखें दिल दग्ध
शांति भूलकर करते युद्ध
भ्रष्टाचार सुहाता शुद्ध
मनमानी
करते डोलें
हम क्यों
निज भाषा बोलें?
अय्याशी में सुर प्यारे
क्रूर असुर भाते न्यारे
मानवता से क्या लेना
हम न जानते हैं देना
खुद को
'सलिल' नहीं तोलें
हम क्यों
निज भाषा बोलें?
२३.७.२०१५
***
दोहा सलिला
*
जो न उषा को चाह्ता, उसके फूटे भाग
कौन सुबह आकर कहे, उससे जल्दी जाग
*
लाल-गुलाबी जब दिखें, मनुआ प्राची-गाल
सेज छोड़कर नमन कर, फेर कर्म की माल
***
स्मरणांजलि:
महाकवि जगमोहन प्रसाद सक्सेना 'चंचरीक'
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महाकवि जगमोहन प्रसाद सक्सेना 'चंचरीक' साधु प्रवृत्ति के ऐसे शब्दब्रम्होपासक हैं जिनकी पहचान समय नहीं कर सका। उनका सरल स्वभाव, सनातन मूल्यों के प्रति लगाव, मौन एकाकी सारस्वत साधना, अछूते और अनूठे आयामों का चिंतन, शिल्प पर कथ्य को वरीयता देता सृजन, मौलिक उद्भावनाएँ, छांदस प्रतिबद्धता, सादा रहन-सहन, खांटी राजस्थानी बोली, छरफरी-गौर काया, मन को सहलाती सी प्रेमिल दृष्टि और 'स्व' पर 'सर्व' को वरीयता देती आत्मगोपन की प्रवृत्ति उन्हें चिरस्मरणीय बनाती है। मणिकांचनी सद्गुणों का ऐसा समुच्चय देह में बस कर देहवासी होते हुए भी देह समाप्त होने पर विदेही होकर लुप्त नहीं होता अपितु देहातीत होकर भी स्मृतियों में प्रेरणापुंज बनकर चिरजीवित रहता है. वह एक से अनेक में चर्चित होकर नव कायाओं में अंकुरित, पल्लवित, पुष्पित और फलित होता है।
लीलाविहारी आनंदकंद गोबर्धनधारी श्रीकृष्ण की भक्ति विरासत में प्राप्त कर चंचरीक ने शैशव से ही सन १८९८ में पूर्वजों द्वारा स्थापित उत्तरमुखी श्री मथुरेश राधा-कृष्ण मंदिर में कृष्ण-भक्ति का अमृत पिया। साँझ-सकारे आरती-पूजन, ज्येष्ठ शिकल २ को पाटोत्सव, भाद्र कृष्ण १३ को श्रीकृष्ण छठी तथा भाद्र शुक्ल १३ को श्री राधा छठी आदि पर्वों ने शिशु जगमोहन को भगवत-भक्ति के रंग में रंग दिया। सात्विक प्रवृत्ति के दम्पति श्रीमती वासुदेवी तथा श्री सूर्यनारायण ने कार्तिक कृष्ण १४ संवत् १९८० विक्रम (७ नवंबर १९२३ ई.) की पुनीत तिथि में मनमोहन की कृपा से प्राप्त पुत्र का नामकरण जगमोहन कर प्रभु को नित्य पुकारने का साधन उत्पन्न कर लिया। जन्म चक्र के चतुर्थ भाव में विराजित सूर्य-चन्द्र-बुध-शनि की युति नवजात को असाधारण भागवत्भक्ति और अखंड सारस्वत साधना का वर दे रहे थे जो २८ दिसंबर २०१३ ई. को देहपात तक चंचरीक को निरंतर मिलता रहा।
बालक जगमोहन को शिक्षागुरु स्व. मथुराप्रसाद सक्सेना 'मथुरेश', विद्यागुरु स्व. भवदत्त ओझा तथा दीक्षागुरु सोहनलाल पाठक ने सांसारिकता के पंक में शतदल कमल की तरह निर्लिप्त रहकर न केवल कहलाना अपितु सुरभि बिखराना भी सिखाया। १९४१ में हाईस्कूल, १९४३ में इंटर, १९४५ में बी.ए. तथा १९५२ में एलएल. बी. परीक्षाएँ उत्तीर्ण कर इष्ट श्रीकृष्ण के पथ पर चलकर अन्याय से लड़कर न्याय की प्रतिष्ठा पर चल पड़े जगमोहन। जीवनसंगिनी शकुंतला देवी के साहचर्य ने उनमें अदालती दाँव-पेंचों के प्रति वितृष्णा तथा भागवत ग्रंथों और मनन-चिंतन की प्रवृत्ति को गहरा कर निवृत्ति मार्ग पर चलाने के लिये सृजन-पथ का ऐसा पथिक बना दिया जिसके कदमों ने रुकना नहीं सीखा। पतिपरायणा पत्नी और प्रभु परायण पति की गोद में आकर गायत्री स्वयं विराजमान हो गयीं और सुता की किलकारियाँ देखते-सुनते जगमोहन की कलम ने उन्हें 'चंचरीक' बना दिया, वे अपने इष्ट पद्मों के 'चंचरीक' (भ्रमर) हो गये।
महाकाव्य त्रयी का सृजन:
चंचरीककृत प्रथम महाकाव्य 'ॐ श्री कृष्णलीला चरित' में २१५२ दोहों में कृष्णजन्म से लेकर रुक्मिणी मंगल तक सभी प्रसंग सरसता, सरलता तथा रोचकता से वर्णित हैं। ओम श्री पुरुषोत्तम श्रीरामचरित वाल्मीकि रामायण के आधार पर १०५३ दोहों में रामकथा का गायन है। तृतीय तथा अंतिम महाकाव्य 'ओम पुरुषोत्तम श्री विष्णुकलकीचरित' में अल्पज्ञात तथा प्रायः अविदित कल्कि अवतार की दिव्य कथा का उद्घाटन ५ भागों में प्रकाशित १०६७ दोहों में किया गया है। प्रथम कृति में कथा विकास सहायक पदों तृतीय कृति में तनया डॉ. सावित्री रायजादा कृत दोहों की टीका को सम्मिलित कर चंचरीक जी ने शोधछात्रों का कार्य आसान कर दिया है। राजस्थान की मरुभूमि में चराचर के कर्मदेवता परात्पर परब्रम्ह चित्रगुप्त (ॐ) के आराधक कायस्थ कुल में जन्में चंचरीक का शब्दाक्षरों से अभिन्न नाता होना और हर कृति का आरम्भ 'ॐ' से करना सहज स्वाभाविक है। कायस्थ [कायास्थितः सः कायस्थः अर्थात वह (परमात्मा) में स्थित (अंश रूप आत्मा) होता है तो कायस्थ कहा जाता है] चंचरीक ने कायस्थ राम-कृष्ण पर महाकाव्य साथ-साथ अकायस्थ कल्कि (अभी क्लक्की अवतार हुआ नहीं है) से मानस मिलन कर उनपर भी महाकाव्य रच दिया, यह उनके सामर्थ्य का शिखर है।
देश के विविध प्रांतों की अनेक संस्थाएं चंचरीक सम्मानित कर गौरवान्वित हुई हैं। सनातन सलिला नर्मदा तट पर स्थित संस्कारधानी जबलपुर में साहित्यिक संस्था अभियान के तत्वावधान में समपन्न अखिल भारतीय दिव्य नर्मदा अलंकरण में अध्यक्ष होने के नाते मुझे श्री चंचरीक की द्वितीय कृति 'ॐ पुरुषोत्तम श्रीरामचरित' को नागपुर महाराष्ट्र निवासी जगन्नाथप्रसाद वर्मा-लीलादेवी वर्मा स्मृति जगलीला अलंकरण' से तथा अखिल भारतीय कायस्थ महासभा व चित्राशीष के संयुक्त तत्वावधान में शांतिदेवी-राजबहादुर वर्मा स्मृति 'शान्तिराज हिंदी रत्न' अलंकरण से समादृत करने का सौभाग्य मिला। राष्ट्रीय कायस्थ महापरिषद के जयपुर सम्मेलन में चंचरीक जी से भेंट, अंतरंग चर्चा तथा शकुंतला जी व् डॉ. सावित्री रायजादा से नैकट्य सौभाग्य मिला।
चंचरीक जी के महत्वपूर्ण अवदान क देखते हुए राजस्थान साहित्य अकादमी को ऊपर समग्र ग्रन्थ का प्रकाशन कर, उन्हें सर्वोच्च पुरस्कार से सम्मानित करना चाहिए। को उन पर डाक टिकिट निकालना चाहिए। जयपुर स्थित विश्व विद्यालय में उन पर पीठ स्थापित की जाना चाहिए। वैष्णव मंदिरों में संतों को चंचरीक साहित्य क्रय कर पठन-पाठन तथा शोध हेतु मार्ग दर्शन की व्यवस्था बनानी चाहिए।
दोहांजलि:
ॐ परात्पर ब्रम्ह ही, रचते हैं सब सृष्टि
हर काया में व्याप्त हों, कायथ सम्यक दृष्टि
कर्मयोग की साधना, उपदेशें कर्मेश
कर्म-धर्म ही वर्ण है, बतलाएं मथुरेश
सूर्य-वासुदेवी हँसे, लख जगमोहन रूप
शाकुन्तल-सौभाग्य से, मिला भक्ति का भूप
चंचरीक प्रभु-कृपा से, रचें नित्य नव काव्य
न्यायदेव से सत्य की, जय पायें संभाव्य
राम-कृष्ण-श्रीकल्कि पर, महाकाव्य रच तीन
दोहा दुनिया में हुए, भक्ति-भाव तल्लीन
सावित्री ही सुता बन, प्रगटीं, ले आशीष
जयपुर में जय-जय हुई, वंदन करें मनीष
कायथ कुल गौरव! हुए, हिंदी गौरव-नाज़
गर्वित सकल समाज है, तुमको पाकर आज
सतत सृजन अभियान यह, चले कीर्ति दे खूब
चित्रगुप्त आशीष दें, हर्ष मिलेगा खूब
चंचरीक से प्रेरणा, लें हिंदी के पूत
बना विश्ववाणी इसे, घूमें बनकर दूत
दोहा के दरबार में, सबसे ऊंचा नाम
चंचरीक ने कर लिया, करता 'सलिल' प्रणाम
चित्रगुप्त के धाम में, महाकाव्य रच नव्य
चंचरीक नवकीर्ति पा, गीत गुँजाएँ दिव्य
२३-७-२०१४
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