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शनिवार, 4 जुलाई 2026

जुलाई ४, मुकरी, ग़ज़लिका, गीत, बरखा, सॉनेट, पर्याय, मुक्तक, बाल, दोहा गीत, कुण्डलिया

सलिल सृजन जुलाई ४
*
प्रयोगात्मक कहमुकरी
० 
मिला समर्थन सबसे ज्यादा
है वज़ीर नहिं कोई प्यादा
जनता करती जय-जयकार
क्या सखि! मोदी?
नहिं सखि! योगी।

आज कहे कल पलटी मारे
नहीं किसी का हुआ सगा रे!
जहाँ-तहाँ जाता फटकारा
क्या बंजारा?
ट्रंप बेचारा।

किसको भाता स्वेच्छाचार
कहे, न लेकिन करती प्यार
करती सबका सत्यानाश
शूर्पणखा है?
नहीं, सिया है। 

मन की बात अनकही कहती
मधुर सरस सुधियाँ हँस तहती
प्यास बुझाती जैसे सरिता
क्या सखि वनिता?
ना सखि कविता।

लहर-लहर पर लहराती है।
कलकल सुनकर सुख पाती है।।
मनभाती सुंदर मन हरती
क्या सखि सजनी?
ना सखि नलिनी।

(दोहा मुकरी )
नाप न कोई पा रहा।
सके न कोई माप।।
श्वास-श्वास में रमे यह
बढ़ा रहा है ताप।।
सूरज बेशक।
नहिं सखी है शक।
गीत 
मेघा आए
रिमझिम बरसे, 
धरा तृप्ति पाने को तरसे
.
अपने सपने सब हरियाए
दूब जमा जड़ बढ़ती जाए।
पत्ता-पत्ता झूम-झूमकर-
मादल ढोल मृदंग बजाए।
मिल इठलाए
बेल लिपटकर
तरुवर हो अवलंबन सरसे।
मेघा आए
रिमझिम बरसे, 
धरा तृप्ति पाने को तरसे...
.
ताल-तलैया-नदी पुनर्नवा
सेवन कर ज्यों हुए फिर जवां।
काढ़ा पी गिलोय का बादल
अश्वगंध पा हवा संग हवा।
सदा सुहागन
फूले हरषे
रामा-श्यामा तुलसी विकसे।
मेघा आए
रिमझिम बरसे, 
धरा तृप्ति पाने को तरसे...
.
कहे बुढ़ापा फिर बच्चा बन
दुनिया झूठी तू सच्चा बन।
पक्के भवन लगें मुर्दाघर
तू झोपड़ियों सम कच्चा बन।
नाव बहा दे
नन्हें कर से
बहती रहे, देख छिप दर से।
मेघा आए
रिमझिम बरसे, 
धरा तृप्ति पाने को तरसे...
०००
ग़ज़लिका
अवसरवादी मौका ताड़े 
किसी तरह हो, झंडा गाड़े
.
साथ रहे हरदम सत्ता के
संकट में झट पल्ला झाड़े
.
गिरते को तृण-मूल समझकर
आ जाता है पग-पग आड़े
.
झुक जाता अनुचर के आगे
बनता पैर न अगर उखाड़े
.
जैसे ही सच्चाई खुलती
होकर बेबस कपड़े फाड़े
.
हो गजराज न क्रुद्ध हमेशा
चेता जाओ गर वह चिंघाड़े
.
'सलिल' शांत हो नेह-नर्मदा
अन्यायी पा सिंह दहाड़े
४.७.२०२६
०००
बरखा गीत
रिमझिम रिमझिम बरसे बरखा, झूलें सारद मैया
रमा-उमा तालियाँ बजाएँ, पेंग देख खें दैया
टेसू की ऊँची डारी सें, लिपट रातरानी ने
बेल चमेली की महकाई, पिक कूकी बानी ने
छप छपाक् छप करतीं सखियाँ, खेलें ता ता थैया
रिमझिम रिमझिम बरसे बरखा, झूलें सारद मैया
अमुआ ब्रह्मा, बेल बैठ शिव, हरसिँगार हरि टेरें
हनुमत लला विराजे पीपल, नचे मयूरा हेरें
मुदित 'सलिल' माँ के जस गाए, बैठ नीम की छैंया
रिमझिम रिमझिम बरसे बरखा, झूलें सारद मैया
रीझ बरसता काला बादल, बिजली जलती खोट
संध्या-उषा-निशा सँग सँकुचे, सूरज झाँके ओट
चाँद-चाँदनी ढाबा खोजें, चाहें भजिया-चैया
रिमझिम रिमझिम बरसे बरखा, झूलें सारद मैया
४.७.२०२५
०0०
सॉनेट
.
नित करती सवाल फुलबगिया
पौधे-तरु जड़ कहाँ जमाएँ?
नर-पिशाच धरती कब्जाएँ है
मतलबपरस्त सब दुनिया।
सिसक रही बेबस फुलवरिया
सूर्य तपे, पौधे कुम्हलाएँ।
पवन-सलिल बिन पनप न पाएँ?
क्षुधित-तृषित भटके गौरैया।
फुलबगिया में हृदय रहे मिल
द्वैत मिटा अद्वैत वर रहे
भ्रमर-तितलियाँ करते गुंजन।
मन सचेत हो रहो न ग़ाफ़िल
भोग भोगकर व्यर्थ मत दहे
खिल महके कर भव-भय-भंजन।
३.७.२०२५
०0०
गीता ज्ञान
*
'मैं' से हो मन मुक्त यदि, 'तुम' को जाए भूल
कर कर 'हम' की साधना, हो बगिया का फूल
हो बगिया का फूल, फूलकर कुप्पा मत हो
तितली भ्रमर पराग पा सकें, देने रत हो
संचय मोह व क्रोध, अहं पालक पातक हैं
इनसे हो जो मुक्त, न उसको व्याप सके मैं
४-७-२०२१
***
शब्द, पर्याय और अर्थ
साभार सामग्री स्रोत : अर्थान्तर न्यास - डॉ. सुरेश कुमार वर्मा
*
वाक् (भाषा) :
भाषा मनुष्य की शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक शक्तियों का संघात है। मनुष्य जन्म से परिवार की शाला में भाषा के पाठ सीखता है।सीखने की भावना मनुष्य ( वअन्य जीव-जंतुओं) के रक्त में जन्मजात वृत्ति के रूप में रहती है। वह वस्तु जगत के विविध पदार्थों का ज्ञान प्राप्त और व्यक्त करता है। भाषा ज्ञेय भी है और ज्ञान भी। शैशवावस्था में भाषा ज्ञातव्य वस्तु है और जबकि विकास की परिणत अवस्थाओं में दृश्य एवं सूक्ष्म जगत के नाना स्तरों का ग्राहक ज्ञान। वस्तु जगत की क्रमशः: वर्धित जानकारी मनुष्य के मानसिक क्षेत्र में जटिल आवर्त उत्पन्न करती है जो क्रमश: भाषा के अरण्य में जटिलता उत्पन्न करते हैं। अरण्य के विरल, सघन एवं सघनतम क्षेत्रों के समान्तर भाषा के अंतर्गत अर्थों के सरल, गूढ़ एवं रहस्यात्मक स्तर निविष्ट रहते हैं। शब्दों के सजग-सतर्क नियोजन से भाषा शुद्ध, सुचारु और सहज बनती है। सतत प्रयोग से भाषा जीवन का अविभाज्य अंग बनकर लोक जीवन, दैनंदिन व्यवहार एवं आत्म-चिंतन का आधार और अंग बन जाती है। भाषा और शब्द विशेष परिस्थिति की उपज है। वह विज्ञान विशेष परिस्थिति में ही अपनी मूल भावना को व्यक्त करता है। पर्यायवाचिता उसे किसी दूसरी परिस्थिति और प्रयोग के निकट लाकर उसकी मूल भावना को आहत कर देती है। एक पर्याय सभी परिस्थितियों में प्रयुक्त नहीं किया जा सकता। पर्यायवाचिता एक सीमा तक ही क्रियाशील रह सकती है। हिंदी पर्यायवाचिता को विकास के कारण हैं - विविध भाषाओं-बोलिओं की एक क्षेत्र में एक ही समय में प्रचलित होना, आरोपित अर्थ, सांस्कृतिक प्रभाव, अपस्तरीय वाक् आदि। विशेषणों की पर्यायभावना, व पर्यायपद भी अर्थपरक दृष्टि से विचारणीय है। अर्थ की विलोमस्थिति सैद्धांतिक कम व्यावहारिक अधिक है। अर्थांतर की दृष्टि से विदेशी शब्दों (जिनसे हिंदी पर्याय युग्मों की रचना हुई) का अनुशीलन महत्वपूर्ण है। भाषा और संस्कृति में अनिवार्य समाश्रयता है। भाषा संस्कृति की पोषिका और उसके विकास की संवाहिनी है। यह संवहन अर्थ के माध्यम से होता है।
अर्थ
ध्वनि के सामान की भी परिवर्तन शील सत्ता है। ध्वनिशास्त्र के कठोर परीक्षण में किसी ध्वनि का यथावत (हू-ब-हू ) उच्चारण कठिन माना गया है। अभिव्यक्ति की भी यही स्थिति है। प्रत्येक प्रेषण में वक्त अर्थ को उसी आयाम और इयत्ता से व्यक्त कर रहा है, कहना कठिन है। अर्थ मन और बुद्धि की जटिल सारणियों से प्रवाहित होता है, उसे प्रवाहित करनेवाली बाह्य एवं आंतरिक शक्तियाँ असंख्य हैं। व्यक्ति के आशय को नाना प्रकार के ध्वनि संयोजनों में रूपायित होना पड़ता है। इससे अर्थ के विचलन की संभावना बढ़ जाती है। यह विचलित अर्थ फिर-फिर प्रयोगों से नवीन अर्थ के रूप में प्रतिष्ठित और लोकमान्य हो जाता है। अर्थ का इतिहास अर्थ परिवर्तन का इतिहास है। अर्थान्तर वाक् की मूलभूत संवेदनाओं में से एक है।
अर्थ वाक् का आरंभ भी है और अंत भी। वक्ता अपने आशय को व्यक्त करने के लिए धवनियों का संयोजन करता है और उसकी प्राप्ति के पश्चात् उसका लोप। अर्थ पद और वाक्य की केंद्रीय सत्ता है। अर्थ एक अभौतिक स्थिति है। उसकी प्रक्रिया जटिल और सूक्ष्म है। उसकी प्रवृत्तियों और परिस्थितियों के अध्ययन और मानकीकरण का प्रयास ध्वनिशास्त्र, ध्वनिग्रामशास्त्र, रूपग्रामशास्त्र आदि की तरह प्रचलित और प्रसिद्ध नहीं हो सका। हिंदी अर्थ विज्ञा पर केवल डॉ. सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या, डॉ. बाबूराम सक्सेना, डॉ. हरदेव बाहरी, डॉ. धीरेन्द्र वर्मा, डॉ, उदय नारायण तिवारी, डॉ. सुरेश कुमार वर्मा आदि ने ही कार्य किया है। डॉ. बाहरी ने ने अंग्रेजी में लिखित शोध प्रबंध 'हिंदी सेमेंटिक्स' हिंदी भाषा को अर्थविज्ञान के विविध कोणों से स्पर्श किया गया है। डॉ. केशवराम पाल का हिंदी अर्थ से सम्बद्ध शोध प्रबंध 'हिंदी में प्रयुक्त संस्कृत शब्दों के अर्थ परिवर्तन' की परिधि सीमित है। अर्थान्तर की नींव वस्तु - नामांकन के समय ही पड़ जाती है। एक नामांकन दूसरे नामांकन को जन्म देता है। इससे प्रथम में अर्थान्तर की छाया उत्पन्न हो जाती है।
वाक्य और अर्थ में अर्थवैज्ञानिक एवं व्याकरणिक संबंध है। वाक्य के भेद-प्रभेद अर्थ को भिन्न-भिन्न स्तर प्रदान करते हैं। शब्द शक्तियों काव्य वैभव में वृद्धि करती हैं। हिंदी अर्थ परिवर्तन में लक्षणा और व्यंजना का अभूतपूर्व योगदान है।
हिंदी क्रियाओं के अंतर्गत अर्थ के लक्षणात्मक परिवर्तन, विशेषार्थक व्यंजनाओं, तथा संध्वनीय भिन्नार्थी रूपों का ज्ञान रचनाकार को होना आवश्यक है।
अर्थ की दृष्टि से विशेषणों की अस्पष्टता व विसंगति, उनके प्रयोग भेद, विरुद्धार्थी विशेषणों की सापेक्ष स्थिति का परिचय स्थिर अर्थ को गतिमान कर सकता है। विशेषणों के अर्थों को प्रत्यय योजना भी प्रभावित करती है। संज्ञा और विशेषण की भिन्नार्थक समध्वनीयता रचनाओं में रोचकता और लालित्य की वृद्धि करती हैं।
क्रमश:
४-७-२०२०
***
मुक्तक - कसूर
*
ओ कसूरी लाल! तुझको कया कहूँ?
चुप कसूरों को क्षमाकर क्यों दहूँ?
नटखटी नटवर न छोडूँ साँवरे!
रास-रस में साथ तेरे हँस बहूँ.
*
तू कहेगा झूठ तो भी सत्य हो.
तू करे हुडदंग तो भी नृत्य है.
साँवरे ओ बाँवरे तेरा कसूर
जगत कहता ईश्वर का कृत्य है.
*
कौन तेरे कसूरों से रुष्ट है?
छेड़ता जिसको वही संतुष्ट है.
राधिका, बाबा या मैया जशोदा-
सभी का ऐ कसूरी तू इष्ट है.
***
: बाल कविता :
*
आन्या गुडिया प्यारी,
सब बच्चों से न्यारी।
.
गुड्डा जो मन भाया,
उससे हाथ मिलाया।
.
हटा दिया मम्मी ने,
तब दिल था भर आया।
.
आन्या रोई-मचली,
मम्मी थी कुछ पिघली।
.
''नया खिलौना ले लो'',
आन्या को समझाया।
.
शाम को पापा आए
मम्मी पर झल्लाए।
*
हुई रुआँसी मम्मी
आन्या ने ली चुम्मी।
*
बोली: ''इनको बदलो
साथ नये के हँस लो''।
***
आभार
*
आभार ही
आ भार.
वही कहे
जो सके
भार स्वीकार.
४-७-२०१७
***
दोहा गीत
*
जो अव्यक्त हो,
व्यक्त है
कण-कण में साकार
काश!
कभी हम पा सकें,
उसके भी दीदार
*
कंकर-कंकर में वही
शंकर कहते लोग
संग हुआ है किस तरह
मक्का में? संजोग
जगत्पिता जो दयामय
महाकाल शशिनाथ
भूतनाथ कामारि वह
भस्म लगाए माथ
भोगी-योगी
सनातन
नाद वही ओंकार
काश!
कभी हम पा सकें,
उसके भी दीदार
*
है अगम्य वह सुगम भी
अवढरदानी ईश
गरल गहे, अमृत लुटा
भोला है जगदीश
पुत्र न जो, उनका पिता
उमानाथ गिरिजेश
नगर न उसको सोहते
रुचे वन्य परिवेश
नीलकंठ
नागेश हे!
बसो ह्रदय-आगार
काश!
कभी हम पा सकें,
उसके भी दीदार
४-७-२०१६
***
कृति चर्चा:
अँधा हुआ समय का दर्पन : बोल रहा है सच कवि का मन
चर्चाकार: आचार्य संजीव
*
[कृति विवरण: अँधा हुआ समय का दर्पन, डॉ. रामसनेही लाल शर्मा 'यायावर', नवगीत संग्रह, १९०९, आकार डिमाई, पृष्ठ १२७, १५०/-, आवरण बहुरंगी सजिल्द जैकेट सहित, अयन प्रकाशन दिल्ली, संपर्क: ८६ तिलक नगर, फीरोजाबाद १८३२०३, चलभाष: ९४१२३६७७९,dr.yayavar@yahoo.co.in]
*
श्रेष्ठ-ज्येष्ठ साहित्यकार डॉ. रामसनेहीलाल शर्मा 'यायावर' के आठवें काव्य संकलन और तीसरी नवगीत संग्रह 'अँधा हुआ समय का दर्पण' पढ़ना युगीन विसंगतियों और सामाजिक विडम्बनाओं से आहत कवि-मन की सनातनता से साक्षात करने की तरह है. आदिकाल से अब तक न विसंगतियाँ कम होती हैं न व्यंग्य बाणों के वार, न सुधार की चाह. यह त्रिवेणी नवगीत की धार को अधिकाधिक पैनी करती जाती है. यायावर जी के नवगीत अकविता अथवा प्रगतिवादी साहित्य की की तरह वैषम्य की प्रदर्शनी लगाकर पीड़ा का व्यापार नहीं करते अपितु पूर्ण सहानुभूति और सहृदयता के साथ समाज के पद-पंकज में चुभे विसंगति-शूल को निकालकर मलहम लेपन के साथ यात्रा करते रहने का संदेश और सफल होने का विश्वास देते हैं.
इन नवगीतों का मिजाज औरों से अलग है. इनकी भाव भंगिमा, अभिव्यक्ति सामर्थ्य, शैल्पिक अनुशासन, मौलिक कथ्य और छान्दस सरसता इन्हें पठनीयता ही नहीं मननीयता से भी संपन्न करती है. गीत, नवगीत, दोहा, ग़ज़ल, हाइकु, ललित निबंध, समीक्षा, लघुकथा और अन्य विविध विधाओं पर सामान दक्षता से कलम चलाते यायावर जी अपनी सनातन मूल्यपरक शोधदृष्टि के लिये चर्चित रहे हैं. विवेच्य कृति के नवगीतों में देश और समाज के सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक परिदृश्य का नवगीतीय क्ष किरणीय परीक्षण नितांत मलिन तथा तत्काल उपचार किये जाने योग्य छवि प्रस्तुत करता है.
पीर का सागर / घटज ऋषि की / प्रतीक्षा कर रहा है / धर्म के माथे अजाने / यक्ष-प्रश्नों की व्यथा है -२५,
भूनकर हम / तितलियों को / जा रहे जलपान करने / मंत्र को मुजरे में / भेजा है / किसी ने तान भरने -२६,
हर मेले में / चंडी के तारोंवाली झूलें / डाल पीठ पर / राजाजी के सब गुलाम फूलें / राजा-रानी बैठ पीठ पर / जय-जयकार सुनें / मेले बाद मिलें / खाने को / बस सूखे पौधे - ३८
दूधिया हैं दाँत लेकिन / हौसला परमाणु बम है / खो गया मन / मीडिया में / आजकल चरचा गरम है / आँख में जग रहा संत्रास हम जलते रहे हैं - ३९
सूखी तुलसी / आँगन के गमले में / गयी जड़ी / अपने को खाने / टेबिल पर / अपनी भूख खड़ी / पाणिग्रहण / खरीद लिया है / इस मायावी जाल ने - ४४
चुप्पी ओढ़े / भीड़ खड़ी है / बोल रहे हैं सन्नाटे / हवा मारती है चाँटे / नाच रहीं बूढ़ी इच्छाएँ / युवा उमंग / हुई सन्यासिन / जाग रहे / विकृति के वंशज / संस्कृति लेती खर्राटे -५२
भूमिका पर थी बहस / कुछ गर्म इतनी / कथ्य पूरा रह गया है अनछुआ / क्या हुआ? / यह क्या हुआ? - ५७
यहाँ शिखंडी के कंधे पर / भरे हुए तूणीर / बेध रहे अर्जुन की छाती / वृद्ध भीष्म के तीर / किसे समर्पण करे कहानी / इतनी कटी-फ़टी -६०-६१
सम्मानित बर्बरता / अभिनन्दित निर्ममता / लांछित मर्यादा को दें सहानुभूति / चलो / हत्यारे मौसम के कंठ को प्रहारें -७१
पीड़ा के खेत / खड़े / शब्द के बिजूके / मेड़ों पर आतंकित / जनतंत्री इच्छाएँ / वन्य जंतु / पाँच जोड़ बांसुरी बजाएँ / पीनस के रोगी / दुर्गन्ध के भभूके / गाँधी की लाठी / पर / अकड़ी बंदूकें -७३
हर क्षण वही महाभारत / लिप्साएँ वे गर्हित घटनाएँ / कर्ण, शकुनि, दुर्योधन की / दूषित प्रज्ञायें / धर्म-मूढ़ कुछ धर्म-भीरु / कुछ धर्म विरोधी / हमीं दर्द के जाये / भाग्य हमारे फूटे-७६
मुखिया जी के / कुत्ते जैसा दुःख है / मुस्टंडा / टेढ़ी कमर हो गयी / खा / मंहगाई का डंडा / ब्याज चक्रवर्ती सा बढ़कर / छाती पर बैठा / बिन ब्याही बेटी का / भारी हुआ / कुँआरापन -८७
पीना धुआँ, निगलने आँसू / मिलता ज़हर पचने को / यहाँ बहुत मिलता है धोखा / खाने और खिलाने को / अपना रोना, अपना हँसना / अपना जीना-मरना जी / थोड़ा ही लिखता हूँ / बापू! / इसको बहुत समझना जी- पृष्ठ ९९
इन विसंगतियों से नवगीतकार निराश या स्तब्ध नहीं होता। वह पूरी ईमानदारी से आकलन कर कहता है:
'उबल रहे हैं / समय-पतीले में / युग संवेदन' पृष्ठ ११०
यह उबाल बबाल न बन पाये इसीलिये नवगीत रचना है. यायावर निराश नहीं हैं, वे युग काआव्हान करते हैं: 'किरणों के व्याल बने / व्याधों के जाल तने / हारो मत सोनहिरन' -पृष्ठ ११३
परिवर्तन जरूरी है, यह जानते हुए भी किया कैसे जाए? यह प्रश्न हर संवेदनशील मनुष्य की तरह यायावर-मन को भी उद्वेलित करता है:
' झाड़कर फेंके पुराने दिन / जरूरत है / मगर कैसे करें?' -पृष्ठ ११७
सबसे बड़ी बाधा जन-मन की किंकर्तव्यविमूढ़ता है:
देहरी पर / आँगन में / प्राण-प्रण / तन-मन में / बैठा बाजार / क्या करें? / सपने नित्य / खरीदे-बेचे / जाते हैं / हम आँखें मींचे / बने हुए इश्तहार / क्या करें? -पृष्ठ १२४
पाले में झुलसा अपनापन / सहम गया संयम / रिश्तों की ठिठुरन को कैसे / दूर करें अब हम? - पृष्ठ ५६
यायावर शिक्षक रहे हैं. इसलिए वे बुराई के ध्वंस की बात नहीं कहते। उनका मत है कि सबसे पहले हर आदमी जो गलत हो रहा है उसमें अपना योगदान न करे:
इस नदी का जल प्रदूषित / जाल मत डालो मछेरे - पृष्ठ १०७
कवि परिवर्तन के प्रति सिर्फ आश्वस्त नहीं हैं उन्हें परिवर्तन का पूरा विश्वास है:
गंगावतरण होना ही है / सगरसुतों की मौन याचना / कैसे जाने? / कैसे मानें? -पृष्ठ ८४
यह कैसे का यक्ष प्रश्न सबको बेचैन करता है, युवाओं को सबसे अधिक:
तेरे-मेरे, इसके-उसके / सबके ही घर में रहती है / एक युवा बेचैनी मितवा -पृष्ठ ७९
आम आदमी कितना ही पीड़ित क्यों न हो, सुधार के लिए अपना योगदान और बलिदान करने से पीछे नहीं हटता:
एकलव्य हम / हमें दान करने हैं / अपने कटे अँगूठे -पृष्ठ ७५
यायावर जी शांति के साथ-साथ जरूरी होने पर क्रांतिपूर्ण प्रहार की उपादेयता स्वीकारते हैं:
सम्मानित बर्बरता / अभिनन्दित निर्ममता / लांछित मर्यादा को दे सहानुभूति / चलो / हत्यारे मौसम के कंठ को प्रहारें - पृष्ठ ७१
भटक रहे तरुणों को सही राह पर लाने के लिये दण्ड के पहले शांतिपूर्ण प्रयास जरूरी है. एक शिक्षक सुधार की सम्भावना को कैसे छोड़ सकता है?:
आज बहके हैं / किरन के पाँव / फिर वापस बुलाओ / क्षिप्र आओ -पृष्ठ ६९
प्रयास होगा तो भूल-चूक भी होगी:
फिर लक्ष्य भेद में चूक हुई / भटका है / मन का अग्निबाण - पृष्ठ ६२
भूल-चूल को सुधारने पर चर्चा तो हो पर वह चर्चा रोज परोसी जा रही राजनैतिक-दूरदर्शनी लफ्फ़ाजियों सी बेमानी न हो:
भूमिका पर थी बहस / कुछ गर्म इतनी / कथ्य पूरा रह गया है अनछुआ / यह क्या हुआ? / यह क्या हुआ? -पृष्ठ ५७
भटकन तभी समाप्त की जा सकती है जब सही राह पर चलने का संकल्प दृढ़ हो:
फास्टफूडी सभ्यता की कोख में / पलते बवंडर / तुम धुएँ को ओढ़कर नाचो-नचाओ / हम, अभी कजरी सुनेंगे- पृष्ठ ५४
कवि के संकल्पों का मूल कहाँ है यह 'मुक्तकेशिनी उज्जवलवसना' शीर्षक नवगीत में इंगित किया गया है:
आँगन की तुलसी के बिरवे पर / मेरी अर्चना खड़ी है -पृष्ठ ३१
यायावर जी नवगीत को साहित्य की विधा मात्र नहीं परिवर्तन का उपकरण मानते हैं. नवगीत को युग परिवर्तन के कारक की भूमिका में स्वीकार कर वे अन्य नवगीतिकारों का पथप्रदर्शन करते हैं:
यहाँ दर्द, यहाँ प्यार, यहाँ अश्रु मौन / खोजे अस्तित्व आज गीतों में कौन? / शायद नवगीतकार / सांस-साँस पर प्रहार / बिम्बों में बाँध लिया गात -पृष्ठ ३०
यायावर के नवगीतों की भाषा कथ्यानुरूप है. हिंदी के दिग्गज प्राध्यापक होने के नाते उनका शब्द भण्डार समृद्ध और संपन्न होना स्वाभाविक है. अनुप्रास, उपमा, रूपक अलंकारों की छटा मोहक है. श्लेष, यमक आदि का प्रयोग कम है. बिम्ब, प्रतीक और उपमान की प्रचुरता और मौलिकता इन नवगीतों के लालित्य में वृद्धि करती है. आशीष देता सूखा कुआँ, जूते से सरपंची कानून लाती लाठियाँ, कजरी गाता हुआ कलह, कचरे में मोती की तलाश, लहरों पर तैरता सन्नाटा, रोटी हुई बनारसी सुबहें आदि बिम्ब पाठक को बाँधते हैं.
इन नवगीतों का वैशिष्ट्य छान्दसिकता के निकष पर खरा उतरना है. मानवीय जिजीविषा, अपराजेय संघर्ष तथा नवनिर्माण के सात्विक संकल्प से अनुप्राणित नवगीतों का यह संकलन नव नवगीतकारों के लिये विशेष उपयोगी है. यायावर जी के अपने शब्दों में : 'गीत में लय का नियंत्रण शब्द करता है. इसलिए जिस तरह पारम्परिक गीतकार के लिये छंद को अपनाना अनिवार्य था वैसे हही नवगीतकार के लिए छंद की स्वीकृति अनिवार्य है.… नवता लेन के लिए नवगीतकार ने छंद के क्षेत्र में अनेक प्रयोग किये हैं. 'लयखंड' के स्थान पर 'अर्थखण्ड' में गीत का लेखन टी नवगीत में प्रारंभ हुआ ही इसके अतिरिक्त २ लग-अलग छंदों को मिलकर नया छंद बनाना, चरण संख्या घटाकर या बढ़ाकर नया छंद बनाना, चरणों में विसंगति और वृहदखण्ड योजना से लय को नियंत्रित करना जैसे प्रयोग पर्याप्त हुए हैं. इस संकलन में भी ऐसे प्रयोग सुधीपाठकों को मिलेंगे।'
निष्कर्षत: यह कृति सामने नवगीत संकलन न होकर नवगीत की पाठ्य पुस्तक की तरह है जिसमें से तत्सम-तद्भव शब्दों के साथ परिनिष्ठित भाषा और सहज प्रवाह का संगम सहज सुलभ है. इन नवगीतों में ग्रामबोध, नगरीय संत्रास, जाना समान्य की पीड़ाएँ, शासन-प्रशासन का पाखंड, मठाधीशों की स्वेच्छाचारिता, भक्तों का अंधानुकरण, व्यवस्थ का अंकुश और युवाओं की शंकाएं एक साथ अठखेला करती हैं.
***
***
कुण्डलिया :
*
हे माँ! हेमा है खबर, खाकर थोड़ी चोट
बची; हुई जो दिवंगता, थी इलाज में खोट
थी इलाज में खोट, यही अच्छे दिन आए
व्ही आई पी है खास, आम जन हुए पराए
कब तक नेताओं को, जनता करे क्यों क्षमा?
काश समझ लें दर्द, आम जन का कुछ हेमा
४-७-२०१५
***


सोमवार, 12 अगस्त 2024

अगस्त १२, सरस्वती, बधावा, मुकरी, तारकेश्वरी, हास्य, मैत्री, गीत, दोहा, नवगीत

सलिल सृजन अगस्त १२
*
सरस्वती वंदना:
*
संवत १६७७ में रचित ढोला मारू दा दूहा से सरस्वती वंदना का दोहा :
सकल सुरासुर सामिनी, सुणि माता सरसत्ति.
विनय करीन इ वीनवुं, मुझ घउ अविरल मत्ति..
(सकल स्वरों की स्वामिनी, सुनो सरस्वती मात
विनय करूँ सर नवा दो, अविरल मति सौगात)
*
अम्ब विमल मति दे.....
*
हे हंस वाहिनी! ज्ञानदायिनी!!
अम्ब विमल मति दे.....
*
नन्दन कानन हो यह धरती।
पाप-ताप जीवन का हरती।
हरियाली विकसे.....
*
बहे नीर अमृत सा पावन।
मलयज शीतल शुद्ध सुहावन।
अरुण निरख विहसे.....
*
कंकर से शंकर गढ़ पायें।
हिमगिरि के ऊपर चढ़ जाएँ।
वह बल-विक्रम दे.....
*
हरा-भरा हो सावन-फागुन।
रम्य ललित त्रैलोक्य लुभावन।
सुख-समृद्धि सरसे.....
*
नेह-प्रेम से राष्ट्र सँवारें।
स्नेह समन्वय मन्त्र उचारें।
'सलिल' विमल प्रवहे.....
***
२.
हे हंस वाहिनी! ज्ञानदायिनी!!
अम्ब विमल मति दे.....
जग सिरमौर बने माँ भारत.
सुख-सौभाग्य करे नित स्वागत.
आशिष अक्षय दे.....
साहस-शील हृदय में भर दे.
जीवन त्याग तपोमय करदे.
स्वाभिमान भर दे.....
*
लव-कुश, ध्रुव, प्रहलाद हम बनें.
मानवता का त्रास-तम् हरें.
स्वार्थ सकल तज दे.....
*
दुर्गा, सीता, गार्गी, राधा,
घर-घर हों काटें भव बाधा.
नवल सृष्टि रच दे....
*
सद्भावों की सुरसरि पावन.
स्वर्गोपम हो राष्ट्र सुहावन.
'सलिल' निरख हरषे...
***
३.
हे हंस वाहिनी! ज्ञानदायिनी!!
अम्ब विमल मति दे.....
नाद-ब्रम्ह की नित्य वंदना.
ताल-थापमय सलिल-साधना
सरगम कंठ सजे....
*
रुन-झुन रुन-झुन नूपुर बाजे.
नटवर-नटनागर उर साजे.
रास-लास उमगे.....
*
अक्षर-अक्षर शब्द सजाये.
काव्य, छंद, रस-धार बहाये.
शुभ साहित्य सृजे.....
*
सत-शिव-सुन्दर सृजन शाश्वत.
सत-चित-आनंद भजन भागवत.
आत्मदेव पुलके.....
*
कंकर-कंकर प्रगटें शंकर.
निर्मल करें हृदय प्रलयंकर.
गुप्त चित्र प्रगटे.....
*
४.
हे हंस वाहिनी! ज्ञानदायिनी!!
अम्ब विमल मति दे.....
*
कलकल निर्झर सम सुर-सागर.
तड़ित-ताल के हों कर आगर.
कंठ विराजे सरगम हरदम-
सदय रहें नटवर-नटनागर.
पवन-नाद प्रवहे...
*
विद्युत्छटा अलौकिक वर दे.
चरणों में गतिमयता भर दे.
अंग-अंग से भाव साधना-
चंचल चपल चारू चित कर दे.
तुहिन-बिंदु पुलके....
*
चित्र गुप्त, अक्षर संवेदन.
शब्द-ब्रम्ह का कलम निकेतन.
जियें मूल्य शाश्वत शुचि पावन-
जीवन-कर्मों का शुचि मंचन.
मन्वन्तर महके...
***
भक्ति गीत :
कहाँ गया
*
कहाँ गया रणछोड़ रे!
जला प्रेम की ज्योत
*
कण-कण में तू रम रहा
घट-घट तेरा वास.
लेकिन अधरों पर नहीं
अब आता है हास.
लगे जेठ सम तप रहा
अब पावस-मधुमास
क्यों न गूँजती बाँसुरी
पूछ रहे खद्योत
कहाँ गया रणछोड़ रे!
जला प्रेम की ज्योत
*
श्वास-श्वास पर लिख लिया
जब से तेरा नाम.
आस-आस में तू बसा
तू ही काम-अकाम.
मन-मुरली, तन जमुन-जल
व्यथित विधाता वाम
बिसराया है बोल क्यों?
मिला ज्योत से ज्योत
कहाँ गया रणछोड़ रे!,
जला प्रेम की ज्योत
*
पल-पल हेरा है तुझे
पाया अपने पास.
दिखता-छिप जाता तुरत
ओ छलिया! दे त्रास.
ले-ले अपनी शरण में
'सलिल' तिहारा दास
दूर न रहने दे तनिक
हम दोनों सहगोत
कहाँ गया रणछोड़ रे!
जला प्रेम की ज्योत
***
बधावा
*
***
नन्द घर आनंद है
गूँज रहा नव छंद है
नन्द घरा नंद है
*
मेघराज आल्हा गाते
तड़ित देख नर डर जाते
कालिंदी कजरी गाये
तड़प देवकी मुस्काये
पीर-धीर-सुख का दोहा
नव शिशु प्रगटा, मन मोहा
चौपाई-ताला डोला
छप्पय-दरवाज़ा खोला
बंबुलिया गाये गोकुल
कूक त्रिभंगी बन कोयल
बेटा-बेटी अदल-बदल
गया-सुन सोहर सम्हल-सम्हल
जसुदा का मुख चंद है
दर पर शंकर संत है
प्रगटा आनँदकंद है
नन्द घर आनंद है
गूँज रहा नव छंद है
नन्द घरा नंद है
*
काल कंस पर मँडराया
कर्म-कुंडली बँध आया
बेटी को उछाल फेंका
लिया नाश का था ठेका
हरिगीतिका सुनाई दिया
काया कंपित, भीत हिया
सुना कबीरा गाली दें
जनगण मिलकर ताली दें
भेद न वासुदेव खोलें
राई-रास चरण तोलें
गायें बधावा, लोरी, गीत
सुना सोरठा लें मन जीत
मति पापी की मन्द है
होना जमकर द्वन्द है
कटना भव का फंद
नन्द घर आनंद है
गूँज रहा नव छंद है
नन्द घरा नंद है
***
पुस्तक सलिला :
रसरंगिनी : मनसंगिनी
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
[पुस्तक विवरण : रसरंगिनी, मुकरी संग्रह, तारकेश्वरी यादव 'सुधि', प्रथम संस्करण, वर्ष २०२०, आकार २१ से. मी. x १४ से. मी., आवरण बहुरंगी पेपरबैक, पृष्ठ ४८, मूल्य ६०रु., राजस्थानी ग्रंथागार प्रकाशन जोधपुर, रचनाकार संपर्क : truyadav44@gmailcom ]
*
भारतीय लोक साहित्य में आदिकाल से प्रश्नोत्तर शैली में काव्य सृजन की परंपरा अटूट है। नगरों की तुलना में कम शिक्षित और नासमझ समझे जानेवाले ग्रामीण मजदूर-किसानों ने काम की एकरसता और थकान को दूर करने के लिए मौसमी लोकगीत गाने के साथ-साथ एक दूसरे के साथ स्वस्थ्य छेड़-छाड़ कर ते हुए प्रश्नोत्तरी गायन के शैली विकसित की। इस शैली को समय-समय पर दिग्गज साहित्यकारों ने भी अपनाया। कबीर और खुसरो इस क्षेत्र में सर्वाधिक पुराने कवि हैं जिनकी रचनाएँ प्राप्त हैं। इन दोनों की प्रश्नोत्तरी रचनाएँ अध्यात्म से जुडी हैं। कबीर की रचनाओं में गूढ़ता है तो खुसरों की रचनाओं में लोक रंजकता। कबीर की रचनाएँ साखी हैं तो खुसरो की मुकरी। साखी में सीख देने का भाव है तो मुकरी में कुछ कहना और उससे मुकरने का भाव निहित है।
कबीर ने कहा -
चलती चाकी देखकर, दिया कबीरा रोय
दो पाटन के बीच में, साबित बचो न कोय
कबीर के पुत्र कमाल ने उत्तर दिया-
चलती चाकी देखकर दिया कमाल ठिठोय
जो तीली से लग रहा, मार सका नहीं कोय
ये दोनों दोहे द्विअर्थी हैं। कबीर के दोहे का सामान्य अर्थ है चक्की के दो पाटों के बीच में जो दाना पड़ा वह पिस जायेगा उसे कोई बचा नहीं सकता जबकि गूढ़ार्थ है ब्रह्म और माया के दो पाटों में पीसने से जीव की रक्षा कोई नहीं कर सकता। कमाल के दोहे का सामान्य अर्थ है कि दोनों पाटों से बचकर,चलती हुई चक्की की कीली (धुरी) से जो दाना चिपक गया वह नहीं पिसा, बच गया जबकि विशेषार्थ है संसार की चक्की में जो जीव ब्रह्म से प्रेम कर उससे अभिन्न हो गया उसका यम भी बाल-बाँका नहीं कर सकता।
शब्द कोष के अनुसार मुक़री, संज्ञा स्त्रीलिंग शब्द हैं जिसका अर्थ है एक पद्य जिसमें पहले कथन किया जाए फिर उसका खंडन किया जाए। वह कविता जिसमें प्रारंभिक चरणों में कही हुई बात से मुकरकर उसके अंत में भिन्न अभिप्राय व्यक्त किया जाय। यह कविता प्रायः चार चरणों की होती है इसके पहले तीन चरण ऐसे होते हैं; जिनका आशय दो जगह घट सकता है। इनसे प्रत्यक्ष रूप से जिस पदार्थ या व्यक्ति का आशय निकलता है, चौथे चरण में किसी और पदार्थ का नाम लेकर, उससे इनकार कर दिया जाता है । इस प्रकार मानो कही हुई बात से मुकरते हुए कुछ और ही अभिप्राय प्रकट किया जाता है।
मुकरी लोकप्रचलित पहेलियों का ही एक रूप है, जिसका लक्ष्य मनोरंजन के साथ-साथ बुद्धिचातुरी की परीक्षा लेना होता है। इसमें जो बातें कही जाती हैं, वे द्वयर्थक या श्लिष्ट होती है, पर उन दोनों अर्थों में से जो प्रधान होता है, उससे मुकरकर दूसरे अर्थ को उसी छन्द में स्वीकार किया जाता है, किन्तु यह स्वीकारोक्ति वास्तविक नहीं होती, कही हुई बात से मुकरकर उसकी जगह कोई दूसरी उपयुक्त बात बनाकर कह दी जाती है। जिससे सुननेवाला कुछ का कुछ समझने लगता है। मुकरी और पहेली में साम्य और वैषम्य दोनों है। पहेली में भी प्रश्न और उत्तर होता है किन्तु पहेली का उत्तर उसके पद्य का अंग नहीं होता अपितु पतंग की पूंछ की तरह उससे जुड़ा होकर भी अलग रहता है।
हिन्दी में अमीर खुसरो ने इस लोककाव्य-रूप को साहित्यिक रूप दिया। अलंकार की दृष्टि से इसे छेकापह्नुति कह सकते हैं, क्योंकि इसमें प्रस्तुत अर्थ को अस्वीकार करके अप्रस्तुत को स्थापित किया जाता है। इसे ‘कह-मुकरी’ अर्थात पहले कहना और फिर मुकर जाना भी कहते हैं। हिन्दी में अमीर खुसरो की मुकरियाँ प्रसिद्ध हैं। खुसरो इसके अंत में प्राय: 'सखी' या 'सखिया' भी कहते हैं । एक जीवंत उदाहरण देखें -
सगरि रैन वह मो संग जागा।
भोर भई तब बिछुरन लागा।
वाके बिछरत फाटे हिया।
क्यों सखि साजन? ना सखि दिया।
भारतेन्दु हरिश्चंद्र रचित एक मुकरी का आनंद लें -
भीतर भीतर सब रस चूसै,
हँसि हँसि कै तन मन धन मूसै।
जाहिर बातन मैं अति तेज,
क्यों सखि सज्जन?
नहिं अँगरेज।
इस सदी के आरंभ में मैंने भी कुछ मुकरियाँ कहीं। एक उदाहरण देखें -
इससे उसको जोड़ मिलाता
झटपट दूरी दूर भगाता
कोई स्वार्थ न कोई हेतु
क्या सखि साजन, ना सखि सेतु।
२०११ में प्रकाशित योगराज प्रभाकर रचित एक मुकरी देखें -
इस बिन तो वन उपवन सूना,
सच बोलूँ तो सावन सूना,
सूनी सांझ है सूनी भोर,
ए सखि साजन ? ना सखि मोर !
अगस्त २०१७ में मंतव्य पत्रिका ने डॉ. प्रदीप शुक्ल की ४८० मुकरियों को एक १६७ पृष्ठीय विशेषांक के रूप में प्रकाशित किया। एक मुकरी का अवलोकन करें -
जब आये वो धूम मचाये,
मुझको रातों रात जगाये,
जाने उससे कौन लगाव,
ए सखि साजन ? नहीं चुनाव!
इंजी. त्रिलोक सिंह ठकुरेला (मुकरी संग्रह आनंद मंजरी) ने भी मुकरी लेखन की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया है। उनकी कहमुकरी विषय वैविध्य की दृष्टी से महत्वपूर्ण हैं। एक बानगी पेश है-
जैसे चाहे वह तन छूता।
उसको रोके, किसका बूता।
करता रहता अपनी मर्जी।
क्या सखि, साजन ? ना सखि, दर्जी।
कह मुकरियाँ सृजन के क्रम की नवीनतम कड़ी हैं तारकेश्वरी यादव 'सुधि' जिन्होंने १२० मुकरियों का संग्रह 'रसरंगिनी' शीर्षक से प्रकाशित किया है। इन मुकरियों में शिल्प की दृष्टि से चार पंक्तियाँ हैं जिनमें १६-१६ मात्राएँ हैं। प्रथम दो पंक्तियों में सामान तुकांत है जबकि शेष दो पंक्तियों में भिन्न समान तुकांत है। अंतिम पंक्ति का आठ मात्रिक प्रथम चरण प्रश्न का उत्तर देते हुए पूर्ण होता है जबकि आठ मात्रिक दूसरे चरण में इसे नकार कर वैकल्पिक उत्तर दिया जाता है। पूर्ववर्ती कवियों ने भिन्न छंदों, पंक्ति संख्या तथा यति का प्रयोग किया है किंतु सुधि जी ने आजकल प्रचलि सोलह मात्रिक चार चरणों में ही मुकरी कही है। इस संग्रह में ईश्वर, डॉक्टर, डाकिया, मनिहार, मालिन, चौकीदार, आँगन, सपना, पायल, दर्पण, काजल, सागर, बसंत, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, बेलन, मंच्छर, आदि पारंपरिक विषयों के साथ-साथ गूगल, मोबाइल, डायरी, चाय, हलवा, टेलीविजन जैसी दैनंदिन उपयोग की वस्तुओं पर भी मुकरियाँ कही गयीं हैं।
तारकेश्वरी की मुकरियों की 'कहन' सहज बोध गम्य है। उनकी भाषा सरल है। वे क्लिष्ट शब्दों का उपयोग न कर मुकरी के रसानंद में पाठक को निमग्न होने देती हैं।
जब भी बैठा थाम कलाई
मैं मन ही मन में इतराई
नहीं कर पाती मैं प्रतिकार
क्या सखि साजन? नहीं, मनिहार
प्रकृति के उपादान बादल सागर, अँधेरा, आदि उन्हें प्रिय हैं।
रात गए वह घर में आता
सुबह सदा ही जल्दी जाता
दिन में जाने किधर बसेरा
काया सखि साजन? नहीं अँधेरा
किसी वास्तु के लक्षणों के मध्यान से उसका शब्दांकन करना मुकरी की विशेषता है। तारकेश्वरी इस कला में दक्ष हैं -
जैसी हूँ वैसी बतलाये
सत्य बोलना उसे सुहाए
मेरा मुझको करता अर्पण
क्या सखि साजन? ना सखी दर्पण
सप्ताह के छह दिन काम करने के बाद इतवार की सब को प्रतीक्षा रहती है। तारकेश्वरी की मुकरी भी अपवाद नहीं है -
जब वह आता देता खुशियाँ
बात जोहती मेरी अँखियाँ
फरमाइश का लगे अंबार
क्या सखि साजन? नहीं इतवार
सुगृहणी का काम छलनी के बिना नहीं चलता, 'सार सार को गहि रहे' जैसे गुण की धनी छलनी पर मुकरी में 'मनहरनी' शब्द का प्रयोग नवता लिए है-
सार-सार वह मुझको देती
अपशिष्टों को खुद रख लेती
इसीलिये है वह मनहरनी
क्या प्रिय सजनी? ना प्रिय छलनी
सुबह उठते ही चाय के तलब सबको लगती है। 'चाय' पर मुकरी अच्छी बन पड़ी है -
जब भी होठों को छू जाए
तन-मन की सब थकन मिटाए
उसका कोई नहीं पर्याय
क्या सखि साजन? ना सखि चाय
टेलीविजन आजकल जीवन की अनिवार्यता बन गया है। तारकेश्वरी का मुकरी लोक भला कैसे इससे दूर रह सकता है? इसमें अंतिम पंक्ति मात्राधिक्य की शिकार हो गयी है।
जब मैं चाहूँ तब वह बोले
अगर रोक दूँ मुँह ना खोले
अक्सर वह बहलाता है मन
क्या सखि साजन ? ना सखि टेलीविजन
बिखरते परिवार और घर-घर में उठी दीवार एक अप्रिय सत्य है। तारकेश्वरी मुकरी में इस स्थिति से आँखें चार करती हैं-
खंडित करती भाई चारा
पल में कर दे वह बँटवारा
बिखरा देती घर-परिवार
क्या सखी साजन? नहीं दीवार
मीरा पर मुकरी कहते समय तारकेश्वरी 'प्रेम दीवानी' विशेषण का प्रयोग करती हैं।
वह तो पगली प्रेम दीवानी
समझाया पर बात न मानी
उसे लुभाये ढोल मंजीरा
क्या प्रिय सजनी? नाप्रिय मीरा
मुकरी विधा को समृद्ध करने में तारकेश्वरी 'सुधि' का अवदान महत्वपूर्ण है। उन्हें बधाई। अपवाद स्वरूप मात्राधिक्य व लयभंग के बावजूद इन मुकरियों में पाठक को बाँधने की सामर्थ्य है।
***
विमर्श: बचाओ पर्वत, घाटी, जमीन और सागर
महासागरों का पानी पीने-योग्य मीठा व पौष्टिक होता तो सम्भवतय इंसान पर्वतों को समतल करके गगनचुंबी होटल्स, मोल्स, फ्लैट्स बनाकर नदियों को विलुप्त करवाकर उनकी तलछटी में झुग्गी-झोंपड़ियाँ बसा चूका होता; महासागरों को गट्टर में बदलकर फेसबुक-युग आने से पहले विलुप्त हो चूका होता! सौभाग्य से महासागरों का पानी खारा और लवणीय है; पीने के योग्य नहीं है; महासागरों की बदौलत पर्वतों की चोटियों पर जमा हुई बर्फ पिघलकर नदियों के रूप में बहती है और धरती पर जीवन का आधार बनती है! बर्फ पिघलने से बना पानी मीठा तो होता है लेकिन उसमें पौष्टिकता पर्वतों की वनस्पति व पत्थरों से आती है! मीठे-पौष्टिक पानी हेतु पर्वतों व पर्वतों की प्राकृतिक सुन्दरता, रमणीयता व स्वच्छता को सुरक्षित व संरक्षित करना यानी पर्वतों एवं नदियों के बहाव-क्षेत्रों में आवाजाही, आवास व उद्योगीकरण को नियंत्रित रखना अत्यंत ही जरूरी है! जीवन है तो सबकुछ है यानी पर्वतों व नदियों के संरक्षण के सामने हिंदुत्व, इस्लाम, राष्ट्रवाद आदि शब्द महत्वहीन हैं! >>> तथाकथित राजनीतिज्ञ व नेता राजनीति की किताब को ‘राजनीतिक-विज्ञान’ तो कहते हैं, लेकिन राजनीति करते समय ‘विज्ञान’ को भूल जाते हैं! फलस्वरूप राजनीति पर ‘अज्ञानता’ व ‘मूर्खता’ हावी होकर भारतीय-उपमहाद्वीप का दुर्भाग्य बनकर उभरती है; धूर्तता, पाखण्ड, नौटंकी की बदौलत लोकतंत्र कब्बडी की प्रतियोगिता जैंसा बन गया है; नासमझ भावुक आमजन इस कब्बडी-प्रतियोगिता में चलरही दांव-पेच से मंत्रमुग्ध होकर सबकुछ भूल जाता है: नेताओं के आका पूंजीपति अपना सिट्टा-सेककर साफसुथरी रमणीक जगह पर रैनबसेरा बनाकर ठाठ से रहते हैं! >>> पर्वतों व नदियों के बहाव-क्षेत्रों में आवाजाही, आवास व उद्योगीकरण बढ़ने का ही परिणाम है कि आम-इंसान की औसत प्राकृतिक-आयु 40 वर्ष है, 40 के बाद उसकी औषधीय-आयु शुरू हो जाती है!
१२.८.२०२०
***
हास्य रचना:
उल्लू उवाच
मुतके दिन मा जब दिखो, हमखों उल्लू एक.
हमने पूछी: "कित हते बिलमे? बोलो नेंक"
बा बोलो: "मुतके इते करते रैत पढ़ाई.
दो रोटी दे नई सके, बो सिच्छा मन भाई.
बिन्सें ज्यादा बड़े हैं उल्लू जो लें क्लास.
इनसें सोई ज्यादा बड़े, धरें परिच्छा खास.
इनसें बड़े निकालते पेपर करते लीक.
औरई बड़े खरीदते कैते धंधा ठीक.
करें परीच्छा कैंसिल बिन्सें बड़े तपाक.
टीवी पे इनसें बड़े, बैठ भौंकते आप.
बिन्सें बड़े करा रए लीक काण्ड की जाँच.
फिर से लेंगे परिच्छा, और बड़े रए बाँच
इतने उल्लुन बीच में अपनी का औकात?
एई काजे लुके रए, जान बचाखें भ्रात.
***
गीत:
हर दिन मैत्री दिवस मनायें.....
*
हर दिन मैत्री दिवस मनायें.....
*
होनी-अनहोनी कब रुकती?
सुख-दुःख नित आते-जाते हैं.
जैसा जो बीते हैं हम सब
वैसा फल हम नित पाते हैं.
फिर क्यों एक दिवस मैत्री का?
कारण कृपया, मुझे बतायें
हर दिन मैत्री दिवस मनायें.....
*
मन से मन की बात रुके क्यों?
जब मन हो गलबहियाँ डालें.
अमराई में झूला झूलें,
पत्थर मार इमलियाँ खा लें.
धौल-धप्प बिन मजा नहीं है
हँसी-ठहाके रोज लगायें.
हर दिन मैत्री दिवस मनायें.....
*
बिरहा चैती आल्हा कजरी
झांझ मंजीरा ढोल बुलाते.
सीमेंटी जंगल में फँसकर-
क्यों माटी की महक भुलाते?
लगा अबीर, गायें कबीर
छाछ पियें मिल भंग चढ़ायें.
हर दिन मैत्री दिवस मनायें.....
*
गीत
करो आचमन.
*
भाषा तो प्रवहित सलिला है
आओ! तट पर,
अवगाहो या करो आचमन .
*
जीव सभ्यता ने ध्वनियों को
जब पहचाना
चेतनता ने भाव प्रगट कर
जुड़ना जाना.
भावों ने हरकर अभाव हर
सचमुच माना-
मिलने-जुलने से नव रचना
करना ठाना.
ध्वनि-अंकन हित अक्षर आये
शब्द बनाये
मानव ने नित कर नव चिंतन.
भाषा तो प्रवहित सलिला है
आओ! तट पर,
अवगाहो या करो आचमन .
*
सलिला की कलकलकल सुनकर
मन हर्षाया.
सांय-सांय सुन पवन झकोरों की
उठ धाया.
चमक दामिनी की जब देखी, तब
भय खाया.
संगी पा, अपनी-उसकी कह-सुन
हर्षाया.
हुआ अचंभित, विस्मित, चिंतित,
कभी प्रफुल्लित
और कभी उन्मन अभिव्यंजन.
भाषा तो प्रवहित सलिला है
आओ! तट पर,
अवगाहो या करो आचमन .
*
कितने पकडे, कितने छूटे
शब्द कहाँ-कब?
कितने सिरजे, कितने लूटे
भाव बता रब.
अपना कौन?, पराया किसको
कहो कहें अब?
आये-गए कहाँ से कितने
जो बोलें लब.
थाती, परिपाटी, परंपरा
कुछ भी बोलो
पर पालो सबसे अपनापन.
भाषा तो प्रवहित सलिला है
आओ! तट पर,
अवगाहो या करो आचमन .
* * *
नवगीत
*
हैं स्वतंत्र पर
तंत्र न अपना
दाल दले छाती पर
*
गए विदेशी दूर
स्वदेशी अफसर
हुए पराए.
सत्ता-सुविधा लीन
हुए जन प्रतिनिधि
खेले-खाए.
कृषक, श्रमिक,
अभियंता शोषित
शिक्षक है अस्थाई.
न्याय व्यवस्था
अंधी-बहरी, है
दयालु नाती पर
हैं स्वतंत्र पर
तंत्र न अपना
दाल दले छाती पर
*
अस्पताल है
डॉक्टर गायब
रोगी राम भरोसे.
अंगरेजी में
मँहगी औषधि
लिखें, कंपनी पोसे.
दस प्रतिशत ने
अस्सी प्रतिशत
देश संपदा पाई.
देशभक्त पर
सौ बंदिश हैं
कृपा देश-घाती पर
हैं स्वतंत्र पर
तंत्र न अपना
दाल दले छाती पर
***
गीत
प्रतिभा खुद में वन्दनीय है...
*
प्रतिभा खुद में वन्दनीय है...
*
प्रतिभा मेघा दीप्ति उजाला
शुभ या अशुभ नहीं होता है.
वैसा फल पाता है साधक-
जैसा बीज रहा बोता है.
शिव को भजते राम और
रावण दोनों पर भाव भिन्न है.
एक शिविर में नव जीवन है
दूजे का अस्तित्व छिन्न है.
शिवता हो या भाव-भक्ति हो
सबको अब तक प्रार्थनीय है.
प्रतिभा खुद में वन्दनीय है.....
*
अन्न एक ही खाकर पलते
सुर नर असुर संत पशु-पक्षी.
कोई अशुभ का वाहक होता
नहीं किसी सा है शुभ-पक्षी.
हो अखंड या खंड किन्तु
राकेश तिमिर को हरता ही है.
पूनम और अमावस दोनों
संगिनीयों को वरता भी है
भू की उर्वरता-वत्सलता
'सलिल' सभी को अर्चनीय है.
प्रतिभा खुद में वन्दनीय है.
*
कौन पुरातन और नया क्या?
क्या लाये थे?, साथ गया क्या?
राग-विराग सभी के अन्दर-
क्या बेशर्मी और हया क्या?
अतिभोगी ना अतिवैरागी.
सदा जले अंतर में आगी.
नाश और निर्माण संग हो-
बने विरागी ही अनुरागी.
प्रभु-अर्पित निष्काम भाव से
'सलिल'-साधना साधनीय है.
प्रतिभा खुद में वन्दनीय है.
१२.८.२०१७
***
दोहा सलिला
गले मिले दोहा यमक
संजीव
देव! दूर कर बला हर, हो न करबला और
जाई न हो अन्याय अब, चले न्याय का दौर
*
'सलिल' न हो नवजात की, अब कोई नव जात
मानव मानव एक हो, भेद रहे अज्ञात
*
अबला सबला या बला, बतलायेगा कौन?
बजे न तबला शीश पर, बेहतर रहिए मौन
१२.८.२०१४
***
गीत:
चुनौतियों के आँधी-तूफां.....
*
चुनौतियों के आँधी-तूफां मुझको किंचित डिगा न पाये.
अपने सपने पतझर में इस तरह झरे वीरान कर गये ...
*
संबंधों की मृग-मरीचिका, अनुबंधों के मिले भुलावे.
स्नेह-प्रेम का ओढ़ आवरण, पग-पग पर छल गए छलावे..
अनजाने लगते अपने हैं, अपने अपनापन सपने हैं.
छेद हुआ पेंदी में जिनके, बेढब दुनियावी नपने हैं..
अपनी-अपनी कहें बेसुरे, कोई किसी की नहीं सुन रहा.
हाय! इमारत का हर पत्थर, अलग-अलग निज शीश धुन रहा..
सत्ता-सियासती मौसम में, बिन मारे सद्भाव मर गए.
अपने सपने पतझर में इस तरह झरे वीरान कर गये ...
*
अपने मत को सत्य मानना, मीता! बहुत सहज होता है.
केवल अपना सच ही सच है, जो कहता सच को खोता है..
अलग-अलग सुर-ताल मिलें जब, राग-रागिनी तब बन पाती.
रंग-बिरंगे तरह-तरह के, फूलों से बगिया सज पाती..
अपनी सीमा निर्धारित कर, कैद कर रहे खुद ही खुद को.
मन्दिर में भगवान समाता, कैसे? पूज रहे हैं बुत को..
पूर्वाग्रह की सुदृढ़ बेड़ियाँ, जेवर कहकर पहन घर गए.
अपने सपने पतझर में इस तरह झरे वीरान कर गये ...
*
बड़े-बड़े घावों पर मलहम, समय स्वयं ही रहा लगता.
भूली-बिसरी याद दिला मन, चोटों पर कर चोट दुखाता..
निर्माणों की पूर्व पीठिका, ध्वंस-नाश में ही होती है.
हर सिकता-कण, हर चिनगारी, जीवन की वाहक होती है..
कंकर-कंकर को शंकर कर, प्रलयंकर अभ्यंकर होता.
विधि-शारद, हरि-श्री शक्तित हों, तब जागृत मन्वन्तर होता.
रतिपति मति-गति अभिमंत्रित कर, क्षार हुए, साहचर्य वर गए.
अपने सपने पतझर में इस तरह झरे वीरान कर गये ...
१२-८-२०१०
***

गुरुवार, 18 अगस्त 2022

मुकरी,छंद शुद्धगीता, छंद सरसी, मुक्तक,दोहा मुक्तिका,

 












मुकरी
*
अंतर्मन में चित्र गुप्त है
अभी दिख रहा, अभी लुप्त है
कुछ पहचाना, कुछ अनजान
क्या सखि साजन?, नहिं भगवान
*
मन मंदिर में बैठा आकर
कहीं नहीं जाता वह जाकर
उसकी दम से रहे बहार
क्या सखि ईश्वर?, ना सखि प्यार
*
है समर्थ पर कष्ट न हरती
पल में निर्भय, पल में डरती
मनमानी करती हर बार
मितवा सजनी?, नहिं सरकार
*
जब आता तब आग लगाता
इसे लड़ाता, उसे भिड़ाता
होने देता नहीं निभाई
भाग्यविधाता?, नहीं चुनाव
*
देख आप हर कर जुड़ जाता
बिना कहे मस्तक झुक जाता
भूल व्यथा, हो हर मन चंगा
देव?, नहीं है ध्वजा तिरंगा
*
दैया! लगता सबको भय
कोई रह न सके निर्भय
कैद करे मानो कर टोना
सखी! सिपैया, नहिं कोरोना
*
जो पाता सो सुख से सोता
हाय हाय कर चैन न खोता
जिसे न मिलता करता रोष
है सखि रुपया, नहिं संतोष
*
माया पाती तनिक न मोह
पास न फटके गुस्सा-द्रोह
राजा है या संत विशेष
सुन सखि! सूरज, ना मिथिलेश
*
जन प्रिय मोह न पाता काम
अभिवादन है जिसका नाम
भक्तों का भय पल में लें हर
प्रिय! मधुसूदन?, नहिं शिवशंकर
*
पल में सखि री! चित्त चुराता
अनजाने मन में बस जाता
नयन बंद तो भी दे दर्शन
सखि! साजन?, नहिं कृष्ण सुदर्शन
*
काम करे निष्काम रात-दिन
रक्षा कर, सुख भी दे अनगिन
फिर भी रहती सदा विनीता
सजनी?, ना ना नदी पुनीता
*
इसको उससे जोड़ मिलाए
शीत-घाम हँस सहता जाए
सब पग धरते निज हित हेतु
क्या सखि धरती?, ना सखि सेतु
*
वह आए रौनक आ जाती
जाए ज्यों जीवन ले जाती
आँख मिचौली खेले उजली
क्या प्रिय सजनी?, ना सखि बिजली
*
भर देता मन में आनंद
फूल खिला बिखरा मकरंद
सबको सुखकर जैसे संत
क्या सखि!साजन? नहीं बसंत
*
संजीव
18-8-2020
पाठ १०४
नव प्रयोग: शुद्धगीता छंद
*
छंद सलिला सतत प्रवहित, मीत अवगाहन करें।
शारदा का भारती सँग, विहँस आराधन करें।।
*
जन्म ब्याह राखी तिलक, गृह-प्रवेश त्यौहार।
सलिल बचा पौधे लगा, दें पुस्तक उपहार।।
*
शुद्धगीता छंद
छंद सलिला सतत प्रवहित, मीत अवगाहन करें।
शारदा का भारती सँग, विहँस आराधन करें।।
लक्षण:
१. ४ पंक्ति।
२. प्रति पंक्ति २७ मात्रा।
३. १४-१३ मात्राओं पर यति।
४. हर पंक्ति के अंत में गुरु-लघु मात्रा।
५. हर २ पंक्ति में सम तुकांत।
लक्षण छंद:
शुद्धगीता छंद रचना, सत्य कहना कवि न भूल।
सम प्रशंसा या कि निंदा, फूल दे जग या कि शूल।।
कला चौदह संग तेरह, रहें गुरु-लघु ही पदांत।
गगनचुंबी गिरे बरगद, दूब सह तूफ़ान शांत।।
उदाहरण:
कौन है किसका सगा कह, साथ जो देता न छोड़?
गैर क्यों मानें उसे जो, साथ लेता बोल होड़।।
दे चुनौती, शक्ति तेरी बढ़ाता है वह सदैव।
आलसी तू हो न पाए, गर्व की तज दे कुटैव।।
***
हिंदी आटा माढ़िये, उर्दू मोयन डाल
सलिल संस्कृत सान दे, पूड़ी बने कमाल
*
मुक्तक
ढाले- दिल को छेदकर तीरे-नज़र जब चुभ गयी,
सांस तो चलती रही पर ज़िन्दगी ही रुक गयी।
तरकशे-अरमान में शर-हौसले भी कम न थे -
मिल गयी ज्यों ही नज़र से नज़र त्यों ही झुक गयी।।
***
छंद सलिला: पहले एक पसेरी पढ़ / फिर तोला लिख...
छंद सलिला सतत प्रवाहित, मीत अवगाहन करें
शारदा का भारती सँग, विहँस आराधन करें
*
जन्म ब्याह राखी तिलक, गृह-प्रवेश त्यौहार
सलिल बचा पौधे लगा, दें पुस्तक उपहार
*
पाठ १०२
नव प्रयोग: सरसी कुण्डलिया
*
कुंडलिया छंद (एक दोहा + एक रोला, दोहा का अंतिम चरण रोला का प्रथम चरण, दोहारम्भ के अक्षर, शब्द, शब्द समूह या पंक्ति रोला के अंत में) और्सर्सी छंद (१६-११, पदांत गुरु-लघु) से हम पूर्व परिचित हो चुके हैं. इन दोनों के सम्मिलन से सरसी कुण्डलिया बनता है. इसमें कुछ लक्षण कुण्डलिया के (६ पंक्तियाँ, चतुर्थ चरण का पंचम चरण के रूप में दुहराव, आरंभ के अक्षर, शब्दांश, शब्द ता चरण का अंत में दुहराव) तथा कुछ लक्षण सरसी के (प्रति पंक्ति २७ मात्रा, १६-११ पर यति, पदांत गुरु-लघु) हैं. ऐसे प्रयोग तभी करें जब मूल दोनों छंद साध चुके हों.
लक्षण:
१. ६ पंक्ति.
२. प्रति पंक्ति २७ मात्रा.
३. पहली दो पंक्ति १६-११ मात्राओं पर यति, बाद की ४ पंक्ति ११-१६ पर यति.
४. पंक्ति के अंत में गुरु-लघु मात्रा.
५. चतुर्थ चरण का पंचम चरण के रूप में दुहराव.
६. छंदारंभ के अक्षर, शब्दांश, शब्द, या शब्द समूह का छंदात में दुहराव.
उदाहरण:
भारत के जन गण की भाषा, हिंदी बोलें आप.
बने विश्ववाणी हिंदी ही, मानव-मन में व्याप.
मानव मन में व्याप, भारती दिल से दिल दे जोड़.
क्षेत्र न पाए नाप, आसमां कितनी भी ले होड़.
कहता कवी 'संजीव', दिलों में बढ़े हमेशा प्यार.
हो न नेह निर्जीव, न नाते कभी बनेंगे भार.
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हिंदी आटा माढ़िये, उर्दू मोयन डाल
सलिल संस्कृत सान दे, पूड़ी बने कमाल
१८-८-२०१७
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दोहा मुक्तिका-
*
साक्षी साक्षी दे रही, मत हो देश उदास
जीत बनाती है सदा, एक नया इतिहास
*
कर्माकर ने दिखाया, बाकी अभी उजास
हिम्मत मत हारें करें, जुटकर सतत प्रयास
*
जीत-हार से हो भले, जय-जय या उपहास
खेल खिलाड़ी के लिए, हर कोशिश है खास
*
खेल-भावना ही हरे, दर्शक मन की प्यास
हॉकी-शूटिंग-आर्चरी, खेलो हो बिंदास
*
कहाँ जाएगी जीत यह?, कल आएगी पास
नित्य करो अभ्यास जुट, मन में लिए हुलास
*
निराधार आलोचना, भूल करो अभ्यास
सुन कर कर दो अनसुना, मन में रख विश्वास
*
मरुथल में भी आ सके, निश्चय ही मधुमास
आलोचक हों प्रशंसक, डिगे न यदि विश्वास
१८-८-२०१६
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रोचक चर्चा:
अगले २० वर्षों में मिटने-टूटनेवाले देश
यू ट्यूब के उक्त अध्ययन के अनुसार अगले २० वर्षों में दुनिया के १० देशो के सामने मिटने या टूटने का गंभीर खतरा है.
१. स्पेन: केटेलेनिआ तथा बास्क क्षेत्रों में स्वतंत्रता की सबल होती मांग से २ देशों में विभाजन.
२. उत्तर कोरिआ: न्यून संसाधनों के कारण दमनकारी शासन के समक्ष आत्मनिर्भरता की नीति छोड़ने की मजबूरी, शेष देशों से जुड़ते ही परिवर्तन और दोनों कोरिया एक होने की मान के प्रबल होने के आसार.
३. बेल्जियम: वालोनिआ तथा फ्लेंडर्स में विभाजन की लगातार बढ़ती मांग.
४. चीन: प्रदूषित होता पर्यावरण, जल की घटती मात्र, २०३० तक चीन उपलब्ध जल समाप्त कर लेगा। प्रांतों में विभाजन की माँग।
५. इराक़: सुन्नी, कुर्द तथा शीट्स बहुल ३ देशों में विभाजन की माँग.
६. लीबिया: ट्रिपोलिटेनिआ, फैजान तथा सायरेनीका में विभाजन
७. इस्लामिक स्टेट: तुर्किस्तान, सीरिया, सऊदी अरब, ईरान, तथा इराक समाप्त कर उसके क्षेत्र को आपस में बांटने के लिये प्रयासरत।
८. यूनाइटेड किंगडम: स्कॉट, वेल्स तथा उत्तर आयरलैंड में स्वतंत्र होने के पक्ष में जनमत।
९. यूनाइटेड स्टेट ऑफ़ अमेरिका: ५० प्रांतों का संघ, अलास्का तथा टेक्सास में स्वतंत्र होने की बढ़ती माँग।
१०. मालदीव: समुद्र में डूब जाने का भीषण खतरा।
११. पाकिस्तान: पंजाब, सिंध तथा बलूचों में अलग होने की मांग.
१२. श्री लंका: तमिलों तथा सिंहलियों में सतत संघर्ष।
१८-८-२०१५
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एक द्विपदी

हो चुका अवतार, अब हम याद करते हैं मगर
अनुकरण करते नहीं, क्यों यह विरोधाभास है?
१८-८-२०१४
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सुशील गुरु, भोपाल
शुभ कामनाएं जन्म की स्वीकार कीजिये,
इस बार सबको प्यार थोडा और दीजिये,
कोई और न दे जाए पहले शुभ कामनाये
जन्मदिन पर सबसे पहले हमें याद कीजिये।