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सोमवार, 1 मार्च 2021

लघुकथा

लघुकथा :
सवाल
शेरसिंह ने दुनिया का सर्वाधिक प्रभावी नेता तथा सबसे अधिक सुरक्षित जंगल बनाने का दावा कर चुनाव जीत लिया। जिन जगहों से उसका दल हारा। वहीं भीषण दंगा हो गया। अनेक छोटे-छोटे पशु-पक्षी मारे गए। बाद में हाथी ने बल प्रयोग कर शांति स्थापित की। बगुला भगत टी वी पर परिचर्चा में शासन - प्रशासन का गुणगान करने लगा तो पत्रकार उलूक ने पूछा 'दुनिया का सर्वाधिक असरदार सरदार दंगों के समय सामने क्यों नहीं आया? सबसे अधिक चुस्त-दुरुस्त पुलिस के ख़ुफ़िया तंत्र को हजारों दंगाइयों, सैकड़ों हथियारों तथा दंगे की योजना बनाने की खबर क्यों नहीं मिली? बिना प्रभावी योजना, पर्याप्त अस्त्र-शस्त्र और तैयारी के भेजे गए पुलिस जवानों और अफसरों को हुई क्षति की जिम्मेदारी किसकी है?
अगले दिन सत्ता के टुकड़ों पर पल रहे सियारों ने उस चैनल तथा संबंधित अख़बार के कार्यालयों पर पथराव किया, उनके विज्ञापन बंद कर दिये गए पर जंगल की हवा में अब भी तैर रहे थे सवाल।
***
संजीव
१.३.२०२०

चित्र अलंकार: झंडा

 फागुन

[ चित्र अलंकार: झंडा ]
*
ठंड के आलस्य को अलविदा कह
बसंती उल्लास को ले साथ, मिल-
बढ़ चलें हम ज़िदगी के रास्ते पर
आम के बौरों से जग में फूल-फल.
रुक
नहीं
जाएँ,
हमें
मग
देख
कर,
पग
बढ़ाना है.
जूझ बाधा से
अनवरत अकेले
धैर्य यारों आजमाना है.
प्रेयसी मंजिल नहीं मायूस हो,
कहीं भी हो, खोज उसको आज पाना है.
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salil. sanjiv@gmailcom, ७९९९५५९६१८
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होली पर छंद

: छंदों की होली :
आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
*



श्याम राम के गाल पर, सीता मलें गुलाल।
पिचकारी ले राम जी, करते खूब धमाल।।
की सीता रँगी श्याम रँग 
राधिका हाय भरें दंग 
जोगीरा सारारारा 

चले आओ गले मिल लो, पुलक इस साल होली में
भुला शिकवे-शिकायत, लाल कर दें गाल होली में
बहाकर छंद की सलिला, भिगा दें स्नेह से तुमको
खिला लें मन कमल अपने, हुलस इस साल होली में
0
नहीं माया की गल पाई है अबकी दाल होली में
नहीं अखिलेश-राहुल का सजा है भाल होली में
अमित पा जन-समर्थन, ले कमल खिल रहे हैं मोदी
लिखो कविता बने जो प्रेम की टकसाल होली में
0
ईंट पर ईंट हो सहयोग की इस बार होली में
लगा सरिए सुदृढ़ कुछ स्नेह के मिल यार होली में
मिला सीमेंट सद्भावों की, बिजली प्रीत की देना
रचे निर्माण हर सुख का नया संसार होली में
0
न छीनो चैन मन का ऐ मेरी सरकार होली में
न रूठो यार लगने दो कवित-दरबार होली मे
मिलाकर नैन सारी रैन मन बेचैन फागुन में
गले मिल, बाॅंह में भरकर करो सत्कार होली में
0
करो जब कल्पना कवि जी रॅंगीली ध्यान यह रखना
पियो ठंडाई, खा गुझिया नशीली होश मत तजना
सखी, साली, सहेली या कि कवयित्री सुना कविता
बुलाती लाख हो, सॅंग सजनि के साजन सदा सजना
0
हुरियारों पे शारद मात सदय हों, जाग्रत सदा विवेक रहे
हैं चित्र जो गुप्त रहे मन में, साकार हों कवि की टेक रहे
हर भाल पे, गाल पे लाल गुलाल हो शोभित अंग अनंग बसे
मुॅंह काला हो नापाकों का, जो राहें खुशी की छेंक रहे
0
नैन पिचकारी तान-तान बान मार रही, देख पिचकारी मोहे बरजो न राधिका
आस-प्यास रास की न फागुन में पूरी हो तो मुॅंह ही न फेर ले साॅंसों की साधिका
गोरी-गोरी देह लाल-लाल हो गुलाल सी, बाॅंवरे से साॅंवरे की कामना भी बाॅंवरी
बैन से मना करे, सैन से न ना कहे, नायक के आस-पास घूम-घूम नायिका
0
लाल-पीले गाल, नीली नाक, माथा कच हरा, श्याम ठोड़ी, श्वेत केशों की छटा है मोहती
दंत हैं या दामिनी है, कौन कहें देख हँसी, फागुनी है सावनी भी, छवि-छटा सोहती
कहे दोहा पढ़े हरिगीतिका बौरा रही है, बाल शशि देख शशिमुखी,मुस्कुरा रही
झट बौरा बढ़े गौरा को लगाने रंग जब, चला पिचकारी गोरी रंग बरसा गई
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१-३-२०१८

देवकी नन्दन 'शांत'

सुकवि अभियंता देवकी नन्दन 'शांत' लखनऊ
जन्म दिवस पर शत अभिनन्दन
अर्पित अक्षत कुंकुम चन्दन
*
जन्म दिवस पर दीप जलाओ, ज्योति बुझाना छोडो यार
केक न काटो बना गुलगुले, करो स्नेहियों का सत्कार
शीश ईश को प्रथम नवाना, सुमति-धर्म माँगो वरदान
श्रम से मुँह न चुराना किंचित, जीवन हो तब ही रसखान
आलस से नित टकराना है, देना उसे पटककर मात
अन्धकार में दीप जलना, उगे रात से 'सलिल' प्रभात
*
शांत जी की एक रचना
दीपक बन जाऊँ या फिर मैं दीपक की बाती बन जाऊँ
दीपक बाती क्या बनना है दिपती लौ घी की बन जाऊँ
दीपक बाती घृत-युत लौ से अन्तर्मन की ज्योति जलाकर
मन-मन्दिर में बैठा सोचूँ, पूजा की थाली बन जाऊँ
पूजा की थाली की शोभा अक्षत चन्दन सुमन सुगंधित
खुशबू चाह रही है मैं भी शीतल चन्दन सी बन जाऊँ
शीतल चन्दन की खुशबू में रंगों का इक इन्द्रधनुष है
इन्द्रधनुष की है अभिलाषा तान मैं सरगम की बन जाऊँ
सरगम के इन ‘शान्त’ सुरों में मिश्रित रागों का गुंजन है
तान कहे मैं भी कान्हा के अधरों की वंशी बन जाऊँ
— देवकी नन्दन ‘शान्त’

नवगीत

नवगीत:
संजीव
.
ठेठ जमीनी जिंदगी
बिता रहा हूँ
ठाठ से
.
जो मन भाये
वह लिखता हूँ.
नहीं और सा
मैं दीखता हूँ.
अपनी राहें
आप बनाता.
नहीं खरीदा,
ना बिकता हूँ.
नहीं भागता
ना छिपता हूँ.
डूबा तो फिर-
फिर उगता हूँ.
चारण तो मैं हूँ नहीं,
दूर रहा हूँ
भाट से.
.
कलकल बहता
निर्मल रहता.
हर मौसम की
यादें तहता.
पत्थर का भी
वक्ष चीरता-
सुख-दुःख सम जी,
नित सच कहता.
जीने खातिर
हँस मरता हूँ.
अश्रु पोंछकर
मैं तरता हूँ.
खेत गोड़ता झूमता
दूर रहा हूँ
खाट से.
नहीं भागता
ना छिपता हूँ.
डूबा तो फिर-
फिर उगता हूँ.
चारण तो मैं हूँ नहीं,
दूर रहा हूँ
भाट से.
.
रासो गाथा
आल्हा राई
पंथी कजरी
रहस बधाई.
फाग बटोही
बारामासी
ख्याल दादरा
गरी गाई.
बनरी सोहर
ब्याह सगाई.
सैर भगत जस
लोरी भाई.
गीति काव्य मैं, बाँध मुझे
मत मानक की
लाट से.
नहीं भागता
ना छिपता हूँ.
डूबा तो फिर-
फिर उगता हूँ.
चारण तो मैं हूँ नहीं,
दूर रहा हूँ
भाट से.
***
१-३-२०१५ 

लेख: ईसुरी की अलौकिक फाग नायिका रजऊ और बुन्देली परम्पराएँ

लेख:
ईसुरी की अलौकिक फाग नायिका रजऊ और बुन्देली परम्पराएँ
संजीव
*
बुन्देली माटी के यशस्वी कवि ईसुरी की फागें कालजयी हैं. आज भी ग्राम्यांचलों से लेकर शहरों तक, चौपालों से लेकर विश्वविद्यालयों तक इस फागों को केंद्र में रखकर गायन, संगोष्ठियों आदि के आयोजन किये जाते हैं. ईसुरी की फागों में समाज के अन्तरंग और बहिरंग दोनों का जीवंत चित्रण प्राप्य है. मानव जीवन का केंद्र नारी होती है. माँ, बहिन, दादी-नानी, सखी, भाभी, प्रेयसी, पत्नी, साली, सास अथवा इनसे सादृश्य रखनेवाले रूपों में नारी जीवन रथ के सञ्चालन में प्रेरक होती है. संभवतः इसीलिए वह नौ दुर्गा कहलाती है. ईसुरी की फागों में नारी का चित्रण उसे केंद्र में रखकर किया गया है.
नारी चित्रण की सहजता, स्वाभाविकता, जीवन्तता, मुखरता तथा सात्विकता के पञ्चतत्वों से ईसुरी ने अपनी फागों का श्रृंगार किया है. ईसुरी ने अपनी प्रेरणास्रोत ‘रजऊ’ को केंद्र में रखकर नारी-छवियों के मनोहर शब्द-चित्र अंकित किये हैं. रसराज श्रृंगार ईसुरी को परम प्रिय हैं. श्रृंगार के संयोग-वियोग ही नहीं ममत्व और सखत्व भाव से भी ईसुरी ने फागों को लालित्य और चारुत्व प्रदान किया है. अपनी व्याकुलता का वर्णन हो या रजऊ की कमनीय काया का रसात्मक चित्रण ईसुरी रसमग्न होने पर भी मर्यादा का उल्लंघन नहीं करते, अश्लील नहीं होते. रजऊ काल्पनिक चरित्र है या वास्तविक इस पर मतभेद हो सकते हैं किन्तु उसका चित्रण इतना जीवंत है की उसे वास्तविक मानने की प्रेरणा देता है. सम्भवत: ईसुरी अपनी पत्नि ‘राजाबेटी’ को ही रचनाओं में ‘रजऊ’ के रूप में चित्रित करते रहे. चलचित्र नवरंग के नायक-नायिका का चरित्र ईसुरी से प्रेरित होकर लिखा गया हो सकता है. जो भी हो रजऊ नारी की मनोरम छवियों के शब्दांकन का माध्यम तो है ही.
यह प्रश्न ईसुरी के जन्मकाल में भी सिर उठाने लगा होगा कि रजऊ कौन है? यदि उनकी पत्नि है तो ईसुरी को उसके रूप-सौन्दर्य की सार्वजनिक चर्चा रुचिकर न लगना स्वाभाविक है. यदि उनकी प्रेमिका थी, तो प्रेम की पवित्रता तथा प्रेमिका के पारिवारिक जीवन की शांति के लिये वे उसे प्रगट नहीं कर सकते होंगे. यदि कोई एक या अनेक नारियों से प्रेरणा लेकर रजऊ का चित्रण किया गया हो तो कौन कहाँ है कहना न ईसुरी के लिये वर्षों बाद संभव रहा होगा, न अन्यों के लिये पश्चातवर्ती काल में खोज पाना संभव होगा. अंतिम संभावना यह कि रजऊ काल्पनिक अथवा प्रकृति से प्रेरित होकर गढ़ा चरित्र हो, यह सत्य हो तो भी अन्य जन अलौकिकता की अनुभूति न कर पाने के कारण लौकिक मांसल देह की कल्पना करें यह स्वाभाविक है. स्वयं ईसुरी ने देहज मानी जा रही रजऊ को अदेहज कहकर इस विवाद के पटाक्षेप का प्रयास किया:
नइयाँ रजऊ काऊ के घर में बिरथा कोई न भरमें
सबमें है, सब सें है न्यारी सब ठौरन में भरमें
कौ कय अलख-खलक की बातें लखी न जाय नजर में
ईसुर गिरधर रँय राधे में राधे रँय गिरधर में
उल्लेख्य यह है कि यह rajरजऊ सब में होकर भी किसी में नहीं है तो यह आत्मा के सिवा और क्या हो सकती है? ईसुरी अलख-खलक अर्थात परमसत्ता और उसकी रचना का संकेत देकर बताते हैं कि रजऊ ईश्वरीय है सांसारिक नहीं. राधा-कृष्ण के उदाहरण के सन्दर्भ में यह तथ्य है कि गोकुलवासी कृष्ण के जीवन में राधा नाम का कोई चरित्र कभी नहीं आया. कृष्ण पर रचित सबसे पुरानी और प्रथम कृति हरिवंश पुराण में ऐसा कोई चरित्र नहीं है. राधा का चरित्र चैतन्य महाप्रभु की भावधारा के साथ-साथ कृष्ण की पराशक्ति के रूप में विकसित हुआ जबकि विष्णु के अवतार मान्य कृष्ण के साथ लक्ष्मी रूप में रुक्मणि उनकी अर्धांगिनी हैं. इस प्रसंग से ईसुरी यह संकेतित करते हैं कि जिस तरह कृष्ण के साथ संयुक्त की गयी राधा काल्पनिक हैं वैसे ही रजऊ भी काल्पनिक है.
रजऊ का रूप-लावण्य अलौकिक है. उसका अंग-अंग जैसा है वैसा त्रिभुवन में खोजने पर भी किसी अन्य का नहीं मिला. यह अनन्यता उसके काल्पनिक होने पर ही आ सकती है:
नग-नग बने रजऊ के नोने ऐसे की के होने
गाल नाक उर भौंह, चिबुक लग अँखियाँ करतीं टोने
ग्रीवा जुबन पेट कर जाँगें सब हुई भौत सलौने
ईसुरी दूजी रची न विधना छानौ त्रिभुवन कौने
ईसुरी रजऊ के प्रति इतने समर्पित हैं कि उसके घर की देहरी होना चाहते हैं ताकि उसके आते-जाते समय चरण-धूल का स्पर्श पा सकें. ऐसा अनन्य समर्पण भाव ईश्वरीय तत्व के प्रति ही होता है. यहाँ भी ईसुरी रजऊ का काल्पनिक और दैवीय होना इंगित करते हैं:
विधना करी देह ना मेरी रजऊ के घर की देरी
आउत-जात चरण की धूरा लगत जात हर बेरी
ईसुरी संसार के परम सत्य, तन की नश्वरता से सुपरिचित हैं. वे इस संसार में आकर बुरा काम करने से डरते हैं तो किसी अन्य की पत्नि से प्रेम कैसे कर सकते है? अपनी पत्नि की दैहिक सुन्दरता का सार्वजनिक बखान भी नैतिक नहीं माना जा सकता. स्पष्ट है कि उनमें कबीराना वैराग के प्रति लगाव है, वे देह-गेह-नेह की क्षणभंगुरता से सुपरिचित हैं तथा तुलसी की रत्नावली के प्रति दैहिक आसक्ति की तरह रजऊ में आसक्त नहीं हैं. उनकी रजऊ परमसत्ता से साक्षात् का माध्यम है, काल्पनिक है:
तन कौ कौन भरोसो करनें आखिर इक दिन मरनें
जौ संसार ओस कौ बूँदा पवन लगें सें ढुरनें
जौ लौ जी की जियन जोरिया की खाँ जे दिन मरनें
ईसुर ई संसार में आकें बुरे काम खाँ डरनें
कहते हैं ‘भगत के बस में हैं भगवान’. भक्त जितना भगवान् चाहता है उतना ही भगवान् भी उसे चाहते हैं. ‘राम ते अधिक राम कर दासा’, इस कसौटी पर भी रजऊ अलौकिक है. वह भी ईसुरी को उतना ही चाहती है जितना ईसुरी उसे चाहते हैं. वह कामना करती है कि ईसुरी उँगली का छल्ला हो जाएँ तो वह मुँह पोछते समय गालों पर उनका स्पर्श पा सके, बार-बार घूँघट खोलते समय आँखों के सामने रहेंगे, उसे ईसुरी के दर्शन पाने के लिये ललचाना नहीं पड़ता:
जो तुम छैल छला हो जाते परे उँगरियन राते
मो पोछ्त गालन खाँ लगते कजरा देत दिखाते
घरी-घरी घूँघट खोलत में नजर के सामें राते
ईसुर दूर दरस के लानें ऐसे कायँ ललाते
ईसुरी ने रजऊ के माध्यम से बुंदेलखंड की गरिमामयी नारी जीवन के विविध चरणों का चित्रण किया है. किशोरी रजऊ चंचलतावश आते-जाते समय घूँघट उठा-उठाकर कनखियों से ईसुरी को देखते हुए भी अनदेखा करना प्रदर्शित करते हुए उन्हें अपनी रूप राशि के दर्शन सुअवसर देती है:
चलती कर खोल खें मुइयाँ रजऊ वयस लरकइयाँ
हेरत जात उँगरियन में हो तकती हैं परछइयाँ
लचकें तीन परें करया में फरकें डेरी बइयाँ
बातन मुख झर परत फूल से जो बागन में नइयाँ
धन्य भाग वे सैयाँ ईसुर जिनकी आयँ मुनइयाँ
कैशोर्य में आभूषणों के प्रति आकर्षण और आभूषण मिलने पर सज्जित होकर गर्वसहित प्रदर्शन करना किस युवती को प्रिय नहीं होता? रजऊ बैगनी धोती, करधनी, पैंजना आदि से सज्जित हो अपनी गजगामिनी देह का प्रदर्शन करते हुई नित्य ही ईसुरी के दरवाजे के सामने से निकलती है:
दोरें कड़तीं रोज रजउआ हाँती कैसो छौआ
छीताफली पैजना पैरें होत जात अर्रौंआ
ककरिजिया धोती पै लटकै करदौनी की टौआ
ईसुर गैल गली उड़ जातीं जैसें कारो कौआ
लावण्यमयी रजऊ को कुदृष्टि से बचाने के लिये एक नहीं दस-दस बार राई-नोन से नज़र उतारना भी पर्याप्त नहीं है, ईसुर मंत्र पढ़वा कर लट बँधवाने, गले में यंत्र डालने के बाद भी संतुष्ट नहीं हो पाते और खुद राई-नोन उतारते हैं:
नौने नई नजर के मारें राती रजऊ हमारे
रोजई रोज झरैया गुनियाँ दस-दस बेराँ झारें
मन्त्र पढ़ा कें लट बँदवाई जन्तर गरे में डारें
ईसुर रोजऊँ रजऊ के ऊपर राई नौंन उतारें
समय के साथ रजऊ के मन में अपने स्वामी के घर जाने का भाव उदित हो तो क्या आश्चर्य? अलौकिक रजऊ आत्मा से मिलन की और लौकिक रजऊ प्रियतम से मिलन की राह देखे, यही जीवन का विकास क्रम है:
वे दिन गौने के कब आबैं जब हम ससुरे जाबैं
बारे बलम लिबौआ होकें डोला सँग सजाबैं
गा हा गुइयाँ गाँठ जोर कें दौरें नौ पौंचाबें
हांते लगा सास-ननदी के चरनन सीस नबाबैं
ईसुर कबै फलाने जू की दुलहिन् टेर कहाबैं
इस फाग में डोला सजना, गाँठ जोड़ना, द्वार पर हाथे लगाना और वधु को उसके नाम से न पुकार कर अमुक की दुलहिन कहकर पुकारना जैसी बुन्देली लोक परम्पराओं का सरस संकेतन अद्भुत मिठास लिये है. यहाँ ‘घर सें निकसी रघुबीर बधू’ कहते तुलसी की याद आती है.
परमात्मा एक है किन्तु आत्माएँ अनेक हैं. पारस्परिक द्वेष पाल कर उसे नहीं पाया जा सकता किन्तु ऐक्य भाव से उसे पाना सहज है. लौकिक जगत में सौतिया डाह से नर्क बनते घर सत्य सर्वज्ञात है. ईसुरी इस त्रासदी का जीवंत वर्णन करते हैं:
सो घर सौत सौत कें मारें सौंज बने ना न्यारें
नारी गुपता भीतर करतीं लगो तमासो द्वारे
अपनी-अपनी कोदें झीकें खसमें फारें डारें
एक म्यान में कैसें पटतीं ईसुर दो तरवारें
बुन्देलखंड में गुदना गुदाने का रिवाज़ चिरकाल से प्रचलित रहा है. अधुनातन युवा पीढ़ी ‘टैबू’ के नाम से इसे अपना रही है. ईसुरी की रजऊ अललौकिक है, वह सांसारिक नश्वरता से जुड़े चिन्हों का गुदना गुदवाना नहीं चाहती. अंततः वह गोदनारी से अपने अंग-अंग में कृष्ण जी के विविध नाम गोद दिये जाने का अनुरोध करती है:
गोदौ गुदनन की गुदनारी सबरी देह हमारी
गालन पै गोविन्द गोद दो कर में कुंजबिहारी
बइयन भौत भरी बनमाली गरे धरौ गिरधारी
आनंदकंद लेव अँगिया में माँग में लिखौ मुरारी
करया कोद करइयाँ ईसुर गोद मुखन मनहारी
अंगों के नाम के साथ कृष्ण के ऐसे नामों का चयन जिनका प्रथमाक्षर समान हो आनुप्रसिक सौन्दर्य तथा लालित्य संवर्धक है. अलौकिक हो या लौकिक रजऊ को मान-मर्यादा का पालन कर अपने लक्ष्य ताक पहुँचाने की सीख देना स्वजनों और वरिष्ठों का कर्त्तव्य है:
बाहर रेजा पैर कड़ें गये, नीचो मूड़ करें गये
जी सें नाव धरैं ना केऊ ऐसी चाल चलें गये
हवा चहै उड़ जैहे झूना घूँघट हाँत धरैं गये
ईसुर इन गलियन में बिन्नू धीरें पाँव धरैं गये
अपने प्रियतम को टेरती अलौकिक रजऊ को संसार में सर्वत्र चोर-लुटेरे दिखाई देते हैं. उसे प्रियतम को पाये बिना सागर में आगे यात्रा करने का चाव नहीं, वह कहती है कि मुर्गे के जागने पर जगाते रह जाओगे अर्थात उसके पहले ही रजऊ प्रभु प्राप्ति की राह पर जा चुकी होगी:
अब ना जाव मुसाफिर आगे जात बिदा दिन माँगें
मिलने नहीं गाँव कोसन लौं परती इकदम डांगें
है अँधियारी रात गैल में चोर-चबाई लाँगें
परों सुनत दो जने लूट लये मार मार के साँगें
ईसुर कात रओ उठ जइयो अरुनसिखा जब जागें
बुन्देलखण्ड के जन जीवन के सटीक चित्रण के साथ-साथ लोक रंग और लोक परंपराओं का सरस वर्णन, सांसारिकता और आध्यात्मिकता का सम्यक सम्मिश्रण, श्रृंगार के विविध पक्षों का अंकन, छंद विधान के प्रति सजगता, चारुत्व तथा लालित्यमय भाषा, सहज बोधगम्य भाषा ईसुरी की फागों का वैशिष्ट्य है. लोक के अंकन के साथ लोक के मंगल से अनुप्राणित ये फागें बुंदेलखंड के गाँवों-शहरों में निरंतर गायी जाती हैं. ईसुरी की फागें बुन्देली ही नहीं हिंदी साहित्य की भी अनमोल विरासत है जिसे आधुनिक भाषा, शब्दावली, सन्दर्भों और बिम्ब-प्रतीकों को समाहित करते हुई लिखा जाना चाहिए.
*
१-३-२०१५ 

गंग छंद

छंद सलिला
गंग छंद
संजीव
*
लक्षण: जाति आंक, पद २, चरण ४, प्रति चरण मात्रा ९, चरणान्त गुरु गुरु
लक्षण छंद:
नयना मिलाओ, हो पूर्ण जाओ,
दो-चार-नौ की धारा बहाओ
लघु लघु मिलाओ, गुरु-गुरु बनाओ
आलस भुलाओ, गंगा नहाओ
उदाहरण:
१. हे गंग माता! भव-मुक्ति दाता
हर दुःख हमारे, जीवन सँवारो
संसार की दो खुशियाँ हजारों
उतर आस्मां से आओ सितारों
ज़न्नत ज़मीं पे नभ से उतारो
हे कष्टत्राता!, हे गंग माता!!
२. दिन-रात जागो, सीमा बचाओ
अरि घात में है, मिलकर भगाओ
तोपें चलाओ, बम भी गिराओ
सेना अकेली न हो सँग आओ
३. बचपन हमेशा चाहे कहानी
हँसकर सुनाये अपनी जुबानी
सपना सजायें, अपना बनायें
हो ज़िंदगानी कैसे सुहानी?
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, ककुभ, कीर्ति, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, छवि, जाया, तांडव, तोमर, दीप, दोधक, नित, निधि, प्रदोष, प्रेमा, बाला, मधुभार, मनहरण घनाक्षरी, माया, माला, ऋद्धि, रामा, लीला, वाणी, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शिव, शुभगति, सार, सिद्धि, सुगति, सुजान, हंसी)
१-३-२०१४

होली नज़ीर अकबराबादी

 होली प्रसंग;

देख बहारें होली की -
नज़ीर अकबराबादी
जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की।
और दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की।
परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली की।
खम शीश-ए-जाम छलकते हों तब देख बहारें होली की।
महबूब नशे में छकते हो तब देख बहारें होली की।
हो नाच रंगीली परियों का, बैठे हों गुलरू रंग भरे
कुछ भीगी तानें होली की, कुछ नाज़-ओ-अदा के ढंग भरे
दिल फूले देख बहारों को, और कानों में आहंग भरे
कुछ तबले खड़कें रंग भरे, कुछ ऐश के दम मुंह चंग भरे
कुछ घुँघरू ताल छनकते हों, तब देख बहारें होली की
गुलज़ार खिलें हों परियों के और मजलिस की तैयारी हो।
कपड़ों पर रंग के छीटों से खुश रंग अजब गुलकारी हो।
मुँह लाल, गुलाबी आँखें हो और हाथों में पिचकारी हो।
उस रंग भरी पिचकारी को अंगिया पर तक कर मारी हो।
सीनों से रंग ढलकते हों तब देख बहारें होली की।
और एक तरफ़ दिल लेने को, महबूब भवइयों के लड़के,
हर आन घड़ी गत फिरते हों, कुछ घट घट के, कुछ बढ़ बढ़ के,
कुछ नाज़ जतावें लड़ लड़ के, कुछ होली गावें अड़ अड़ के,
कुछ लचके शोख़ कमर पतली, कुछ हाथ चले, कुछ तन फड़के,
कुछ काफ़िर नैन मटकते हों, तब देख बहारें होली की।।

कृष्ण चिंतन ४

विश्ववाणी हिंदी संस्थान अभियान जबलपुर गूगल मीट ऑनलाइन गोष्ठी
लिंक https://meet.google.com/jaa-qqzx-iqz
१ मार्च सोमवार, दोपहर ४ से ६ बजे।
विषय - कृष्ण एक छवि अनेक।
(श्री कृष्ण संबंधी किसी पुस्तक की समीक्षा करें या उसका कोई अंश पढ़ें। पुस्तक का आवरण प्रदर्शित कर लेखक, प्रकाशक, प्रकाशन वर्ष व विधा की जानकारी दें।)
समय सीमा, पांच मिनिट ।
अध्यक्षता-आदरणीय आचार्य संजीव वर्मा जी जबलपुर।
मुख्य  अतिथि - पवन सेठी जी, मुंबई।
मुख्य वक्ता - डाॅ कृष्णकांत चतुर्वेदी जी, जबलपुर।
संयोजक संचालक- सरला वर्मा जी भोपाल, चलभाष ९७७०६७७४५३। सहयोग डाॅ मुकुल तिवारी जी जबलपुर ९४२४८३७५८५।
सह संयोजक- बसंत शर्मा जी जबलपुर।
तकनीकी संयोजन - प्रियंका खरे जी।
सरस्वती वंदना- इंदिरा गुप्ता जी दिल्ली।
अनुरोध
१ समयानुशासन प्रार्थनीय।
२ सहभागिता हेतु संचालक सरला वर्मा जी को  रविवार रात्रि तक सूचित कर दे ताकि प्रस्तुति क्रम निर्धारित किया जा सके।
*

शनिवार, 27 फ़रवरी 2021

नवगीत

शोक समाचार

शोक समाचार 
स्वतंत्रता सत्याग्रही स्व ज्वाला प्रसाद वर्मा के ज्येष्ठ पुत्र भरत वर्मा का देहावसान २५ फरवरी की रात्रि में हो गया। अंत्येष्टि कल ग्वारीघाट मोक्षधाम में  हुई। 
अंतिम संस्कार बड़ी पुत्री ने किया।
वे मेरे चचेरे बड़े भाई थे। 
परमपिता से दिवंगत की मुक्ति तथा हम सब स्वजनों को यह क्षति सह सकने का धैर्य प्रदान करने की कामना करता हूँ।
ॐ शांति

मुक्तक मंज़िल

मुक्तक

हम मतवाले पग पगडंडी पर रख झूमे।

बाधाओं को जय कर लें मंज़िल पग चूमे।।

कंकर को शंकर कर दें हम रखें हौसला-

मेहनत कोशिश लगन साथ ले सब जग घूमे।।

*

मंज़िल की मत फ़िक्र करो हँस कदम बढ़ाओ।

राधा खुद आए यदि तुम कान्हा बन जाओ।।

शिव न उमा के पीछे जाते रहें कर्मरत-

धनुष तोड़ने काबिल हो तो सिय को पाओ।।

*

यायावर राही का राहों से याराना।

बिना रुके आगे, फिर आगे, आगे जाना।।

नई चुनौती नित स्वीकार उसे जय करना-

मंज़िल पर पग धर झट से नव मंज़िल वरना।।

*

काव्य मंजरी छंद राज की जय जय गाए।

काव्य कामिनी अलंकार पर जान लुटाए।।

रस सलिला में नित्य नहा, आनंद पा-लुटा-

मंज़िल लय में विलय हो सके श्वास सिहाए।।

*

मंज़िल से याराना अपना।

हर पल नया तराना अपना।।

आप बनाते अपना नपना।

पूरा करें देख हर सपना।।

*

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2021

Lord Siva

Lord Siva

Lord Siva is indeed the king of Yogis. Even his children Ganesh and Arumughan are not his..
Ganesh was created by his mother Parvathi using earth which she moulded into the shape of a boy.

In some texts it is said that Armughan is the son of 'Agni' or the God of fire.

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Lord Shiva is the greatest ascetic, abstaining from all forms of indulgence and pleasure, concentrating rather on meditation as a means to find perfect happiness.

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Worshiped as Rudra during Rig Veda, Lord Siva is extremely important to Hindus every where.

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Lord Shiva has three eyes, the third eye bestowing inward vision but at the same time, capable of burning destruction when focused outward.

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He wears a garland of skulls and a serpent around his neck and carries in his two (sometimes four) hands a deerskin, a trident, a small hand drum, or a club with a skull at the end.

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SIVA LINGA is an abstract or aniconic representation of LORD SIVA.

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Nataraja is a depiction lord Shiva as the divine dancer. His dance is called Tandavam or Nadanta, depending on the context of the dance.

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नवगीत कुमार रवींद्र

 ये रचना कुमार रवींद्र की अन्तिम दो रचनाओं में से एक है जिसे मैं उनके मित्रों के अवलोकनार्थ डाल रही हूँ। यह रचना २२ दिसम्बर को लिखी गई है। - सरला रवीन्द्र

गुनो नये संतों की बानी
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सुनो राम जी
गुनो नये संतों की बानी
विश्वहाट वे बड़के राजा के सँग जाते
और लौटकर उसके गुन वे घर-घर गाते
कहते-
बदलेंगे हर घर की छप्पर-छानी
उनके लेखे बड़के राजा में गुण सारे
नये वेद रच उनके मंतर ख़ूब प्रचारे
रोती परजा
सुन-सुन उनकी गलतबयानी
रामराज लाने का ठेका उन्हें मिला है
कुछ दिन पहले बना घाट पर सोनकिला है
हुआ तभी से है
निर्मल गंगा का पानी
***
शोधलेख 
सात लोक और लौकिक छन्द
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
अध्यात्म शास्त्र में वर्णित सात लोक भू-लोक, भुवः लोक, स्वः लोक, तपः लोक, महः लोक, जनः लोक और सत्य लोक हैं। ये किसी ग्रह, नक्षत्र में स्थित अथवा अधर में लटके हुए स्थान नहीं, स्थूलता से सूक्ष्मता की ओर बढ़ने की स्थिति मात्र हैं। पिंगल शास्त्र में सप्त लोकों के आधार पर सात मात्राओं के छंदों को 'लौकिक छंद' कहा गया है।
सामान्य दृष्टि से भूलोक में रेत, पत्थर, वृक्ष, वनस्पति, खनिज, प्राणी, जल आदि पदार्थ हैं। इसके भीतर की स्थिति है आँखों से नहीं, सूक्ष्मदर्शी यन्त्र से देखी-समझी जा सकती है। हवा में मिली गैसें, जीवाणु आदि इस श्रेणी में हैं। इससे गहरी अणु सत्ता के विश्लेषण में उतरने पर विभिन्न अणुओं-परमाणुओं के उड़ते हुए अन्धड़ और अदलते-बदलते गुच्छक हैं। अणु सत्ता का विश्लेषण करने पर उसके सूक्ष्म घटक पदार्थ नहीं,विद्युत स्फुल्लिंग मात्र दृष्टिगोचर होते हैं। तदनुसार ऊर्जा प्रवाह ही संसार में एकमात्र विद्यमान सत्ता प्रतीत होती है। स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ते हुए हम कहीं से कहीं जा पहुँचते हैं किंतु स्थान परिवर्तन नहीं होता। अपने इसी स्थान में यह स्थूल से सूक्ष्म, सूक्ष्म से अति सूक्ष्म, अति सूक्ष्म से महा सूक्ष्म की स्थिति बनती जाती है।
सात लोकों का स्थान कहीं बाहर या अलग-अलग नहीं है। वे एक शरीर के भीतर अवयव, अवयवों के भीतर माँस-पेशियाँ, माँस-पेशियों के भीतर ज्ञान-तंतु, ज्ञान-तन्तुओं के भीतर मस्तिष्कीय विद्युत आदि की तरह हैं। वे एक के भीतर एक के क्रम से क्रमशः भीतर के भीतर-समाये, अनुभव किये जा सकते हैं। सात लोकों की सत्ता स्थूल लोक के भीतर ही सूक्ष्मतर-सूक्ष्मतम और अति सूक्ष्म होती गई है। सबका स्थान वही है जिसमें हम स्थित हैं। ब्रह्मांड के भीतर ब्रह्मांड की सत्ता परमाणु की मध्यवर्ती नाभिक के अन्तर्गत प्राप्त अति सूक्ष्म किन्तु विशाल ब्रह्मांड का प्रतिनिधित्व करनेवाले ब्रह्म-बीज में प्राप्य है।
जीव की देह भी ब्रह्म शरीर का प्रतीक प्रतिनिधि (बीज) है। उसके भीतर भी सात लोक हैं। इन्हें सात शरीर (सप्त धातु-रस, रक्त, माँस, अस्थि, मज्जा, शुक्र, ओजस) कहा जाता है। भौतिक तन में छह धातुएँ हैं, सातवीं ओजस् तो आत्मा की ऊर्जा मात्र है। इनके स्थान अलग-अलग नहीं हैं। वे एक के भीतर एक समाये हैं। इसी तरह चेतना शरीर भी सात शरीरों का समुच्चय है। वे भी एक के भीतर एक के क्रम से अपना अस्तित्व बनाये हुए हैं।
योग शास्त्र में इन्हें चक्रों का नाम दिया गया है। छह चक्र मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा और सातवाँ सहस्रार कमल। कहीं छह, कहीं सात की गणना से भ्रमित न हों। सातवाँ लोक सत्यलोक है। सत्य अर्थात् पूर्ण परमात्मा । इससे नीचे के लोक भी तथा साधना में प्रयुक्त होने वाले चक्र छ:-छ: ही हैं। सातवाँ सहस्रार कमल ब्रह्मलोक है। उस में शेष ६ लोक लय होते है। सात या छह के भेद-भाव को इस तरह समझा जा सकता है। देवालय सात मील दूर है। बीच में छह मील के पत्थर और सातवाँ मील पत्थर प्रत्यक्ष देवालय। छह गिने या सात इससे वस्तुस्थिति में कोई अन्तर नहीं पड़ता।
मनुष्य के सात शरीरों का वर्णन तत्ववेत्ताओं ने इस प्रकार किया हैं- (१) स्थूल शरीर-फिजिकल बाड़ी (२) सूक्ष्म शरीर इथरिक बॉडी (३) कारण शरीर-एस्ट्रल बॉडी (४)मानस शरीर-मेन्टल बॉडी (५) आत्मिक शरीर-स्प्रिचुअल बॉडी (६) देव शरीर -कॉस्मिक बॉडी (७) ब्रह्म शरीर-वाडीलेस बॉडी।
सप्त धातुओं का बना भौतिक शरीर प्रत्यक्ष है। इसे देखा, छुआ और इन्द्रिय सहित अनुभव किया जा सकता है। जन्मतः प्राणी इसी कलेवर को धारण किये होता है। उनमें प्रायः इन्द्रिय चेतना जागृत होती है। भूख, सर्दी-गर्मी जैसी शरीरगत अनुभूतियाँ सक्षम रहती हैं। पशु शरीर आजीवन इसी स्थिति में रहते हैं। मनुष्य के सातों शरीर क्रमशः विकसित होते हैं। भ्रूण पड़ते ही सूक्ष्म मानव शरीर जागृत होने लगता है। इच्छाओं और सम्वेदनाओं के रूप में इसका विकास होता है। मानापमान, अपना-पराया, राग-द्वेष, सन्तोष-असन्तोष, मिलन-वियोग जैसे अनुभव भाव (सूक्ष्म) शरीर को होते हैं। बीज में से पहले अंकुर निकलता है, तब उसका विकास पत्तों के रूप में होता है। स्थूल शरीर को अंकुर और सूक्ष्म शरीर पत्ता कह सकते हैं। फिजिकल बॉडी यथास्थान बनी रहती है, पर उसमें नई शाखा भाव शरीर एस्ट्रल बॉडी के रूप में विकसित होती है।सातों शरीरों का अस्तित्व आत्मा के साथ-साथ ही है, पर उनका विकास आयु और परिस्थितियों के आधार पर धीमे अथवा तीव्र गति से स्वल्प-अधिक मात्रा में होता है।
तीसरा कारण शरीर विचार, तर्क, बुद्धि से सम्बन्धित है। इसका विकास, व्यावहारिक, सभ्यता और मान्यतापरक संस्कृति के आधार पर होता है। यह किशोरावस्था में प्रवेश करते-करते आरम्भ होता है और वयस्क होने तक अपने अस्तित्व का परिचय देने लगता है। बालक को मताधिकार १८ वर्ष की आयु में मिलता है। अल्प वयस्कता इसी अवधि में पहुँचने पर पूरी होती है। बारह से लेकर अठारह वर्ष की आयु में शरीर का काम चलाऊ विकास हो जाता है। यौन सम्वेदनाएँ इसी अवधि में जागृत होती हैं। सामान्य मनुष्य इतनी ही ऊँचाई तक बढ़ते हैं। फिजिकल-इथरिक और एस्ट्रल बॉडी के तीन वस्त्र पहनकर ही सामान्य लोग दरिद्रता में जीवन बिताते हैं। इसलिए सामान्यत: तीन शरीरों की ही चर्चा होती है। स्थूल , सूक्ष्म और कारण शरीरों की व्याख्या कर बात पूरी कर ली जाती है। प्रथम शरीर में शरीरगत अनुभूतियों का सुख-दुःख, दूसरे में भाव सम्वेदनाएँ और तीसरे में लोकाचार एवं यौनाचार की प्रौढ़ता विकसित होकर एक कामचलाऊ मनुष्य का ढाँचा खड़ा हो जाता है।
तीन शरीरों के बाद मनुष्य की विशिष्टताएँ आरम्भ होती हैं। मनस् शरीर में कलात्मक रसानुभूति होती है। कवित्व जगता है। कोमल सम्वेदनाएँ उभरती हैं। कलाकार, कवि, सम्वेदनाओं के भाव लोक में विचरण करने वाले भक्त-जन, दार्शनिक, करुणार्द्र, उदार, देश-भक्त इसी स्तर के विकसित होने से बनते हैं। यह स्तर उभरे तो पर विकृत बन चले तो व्यसन और व्याभिचार जन्य क्रीड़ा-कौतुकों में रस लेने लगता है। विकसित मनस् क्षेत्र के व्यक्ति असामान्य होते हैं। इस स्तर के लोग कामुक-रसिक हो सकते हैं। सूरदास, तुलसीदास जैसे सन्त अपने आरम्भिक दिनों में कामुक थे। वही ऊर्जा जब भिन्न दिशा में प्रवाहित हो तो सम्वेदनाएँ कुछ से कुछ करके दिखाने लगीं। महत्वाकाँक्षाएँ (अहंकार) इसी क्षेत्र में जागृत होती हैं। महत्वाकांक्षी व्यक्ति भौतिक जीवन में तरह-तरह के महत्वपूर्ण प्रयास कर असाधारण प्रतिभाशाली कहलाते हैं। प्रतिभागी लोगों का मनस् तत्व प्रबल होता है। उन्हें मनस्वी भी कहा जा सकता है। बाल्मीक, अँगुलिमाल, अशोक जैसे महत्वाकांक्षी विकृत मनःस्थिति में घोर आतंकवादी रहे, पर जब सही दिशा में मुड़ गये तो उन्हें चोटी की सफलता प्राप्त करने में देर नहीं लगी। इसे मेन्टल बॉडी की प्रखरता एवं चमत्कारिता कहा जा सकता है।
पाँचवाँ शरीर-आत्मिक शरीर स्प्रिचुअल बॉडी अतीन्द्रिय शक्तियों का आवास होता है। अचेतन मन की गहरी परतें जिनमें दिव्य अनुभूतियाँ होती हैं। इसी पाँचवें शरीर से सम्बन्धित हैं। मैस्मरेज्म, हिप्नोटिज्म, टेलीपैथी, क्लैरेहवाइंस जैसे प्रयोग इसी स्तर के विकसित होने पर होते हैं । कठोर तन्त्र साधनाएँ एवं उग्र तपश्चर्याएँ इसी शरीर को परिपुष्ट बनाने के लिए की जाती हैं। संक्षेप में इसे ‘दैत्य’ सत्ता कहा जा सकता है। सिद्धि और चमत्कारों की घटनाएँ- संकल्प शक्ति के बढ़े-चढ़े प्रयोग इसी स्तर के समर्थ होने पर सम्भव होते हैं। सामान्य सपने सभी देखते हैं पर जब चेतना इस पाँचवे शरीर में जमी होती है तो किसी घटना का सन्देश देने वाले सपने भी दीख सकते हैं। उनमें भूत, भविष्य की जानकारियों तथा किन्हीं रहस्यमय तथ्यों का उद्घाटन भी होता है। भविष्यवक्ताओं, तान्त्रिकों एवं चमत्कारी सिद्धि पुरुषों की गणना पाँचवे शरीर की जागृति से ही सम्भव होती है। ऊँची मीनार पर बैठा हुआ मनुष्य जमीन पर खड़े मनुष्य की तुलना में अधिक दूर की स्थिति देख सकता है। जमीन पर खड़ा आदमी आँधी का अनुभव तब करेगा जब वह बिलकुल सामने आ जायगी। पर मीनार पर बैठा हुआ मनुष्य कई मील दूर जब आँधी होंगी तभी उसकी भविष्यवाणी कर सकता है। इतने मील दूर वर्षा हो रही है। अथवा अमुक स्थान पर इतने लोग इकट्ठे हैं। इसका वर्णन वह कर सकता जो ऊँचे पर खड़ा है और आँखों पर दूरबीन चढ़ाये है, नीचे खड़े व्यक्ति के लिए यह सिद्धि चमत्कार है, पर मीनार पर बैठे व्यक्ति के लिए यह दूरदर्शन नितान्त सरल और स्वाभाविक है।
छठे शरीर को देव शरीर कहते हैं-यही कॉस्मिक बाड़ी है। ऋषि , तपस्वी, योगी इसी स्तर पर पहुँचने पर बना जा सकता है। ब्राह्मणों और सन्तों का भू-देव, भू-सुर नामकरण उनकी दैवी अन्तःस्थिति के आधार पर है। स्वर्ग और मुक्ति इस स्थिति में पहुँचने पर मिलनेवाला मधुर फल है। सामान्य मनुष्य चर्म-चक्षुओं से देखता है, पर देव शरीर में दिव्य चक्षु खुलते हैं और “सियाराम मय सब जग जानी” के विराट ब्रह्मदर्शन की मनःस्थिति बन जाती है। कण-कण में ईश्वरीय सत्ता के दर्शन होते हैं और इस दिव्य उद्यान में सर्वत्र सुगंध महकती प्रतीत होती हैं। परिष्कृत दृष्टिकोण ही स्वर्ग है। स्वर्ग में देवता रहते हैं। देव शरीर में जागृत मनुष्यों के अन्दर उत्कृष्ट चिन्तन और बाहर आदर्श कर्तृत्व सक्रिय रहता है। तदनुसार भीतर शान्ति की मनःस्थिति और बाहर सुख भरी परिस्थिति भरी-पूरी दृष्टिगोचर होती है। स्वर्ग इसी स्थिति का नाम है। जो ऐसी भूमिका में निर्वाह करते हैं। उन्हें देव कहते हैं। असुर मनुष्य और देव यह आकृति से तो एक किन्तु प्रकृति से भिन्न होते हैं।
भौतिकवादी लोक-मान्यताओं का ऐसे देव मानवों पर रत्ती भर प्रभाव नहीं पड़ता । वे निन्दा-स्तुति की, संयोग-वियोग की, हानि-लाभ की, मानापमान की लौकिक सम्वेदनाओं से बहुत ऊँचे उठ जाते हैं। लोक मान्यताओं को वे बाल-बुद्धि की दृष्टि से देखते हैं। लोभ-मोह, वासना-तृष्णा के भव-बन्धन सामान्य मनुष्यों को बेतरह जकड़कर कठपुतली की तरह नचाते हैं। छठवीं देव भूमिका में पहुँची देव आत्माएँ आदर्श और कर्त्तव्य मात्र को पर्याप्त मानती हैं। आत्मा और परमात्मा को सन्तोष देना ही उन्हें पर्याप्त लगता है। वे अपनी गतिविधियाँ निर्धारित करते समय लोक मान्यताओं पर तनिक भी ध्यान नहीं देते वरन् उच्चस्तरीय चेतना से प्रकाश ग्रहण करते हैं। इन्हें भव-बन्धनों से मुक्त-जीवन मुक्त कहा जाता है। मुक्ति या मोक्ष प्राप्त कर लेना इसी स्थिति का नाम है। यह छोटे शरीर में देव स्थिति में कॉस्मिक बॉडी में विकसित आत्माओं को उपलब्ध होता है।
सातवाँ ब्रह्म शरीर है। इसमें आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप में अवस्थित होता है। वे शरीर झड़ जाते हैं जो किसी न किसी प्रकार भौतिक जगत से सम्बन्धित थे। उनका आदान-प्रदान प्रत्यक्ष संसार से चलता है। वे उससे प्रभावित होते और प्रभावित करते हैं। ब्रह्म शरीर का सीधा सम्बन्ध परमात्मा से होता है। उसकी स्थिति लगभग ब्रह्म स्तर की हो जाती है। अवतार इसी स्तर पर पहुँची हुई आत्माएँ हैं। लीला अवतरण में उनकी अपनी कोई इच्छा आकाँक्षा नहीं होती, वे ब्रह्मलोक में निवास करते हैं। ब्राह्मी चेतना किसी सृष्टि सन्तुलन के लिए भेजती है तो उस प्रयोजन को पूरा करके पुनः अपने लोक वापस लौट जाते हैं। ऐसे अवतार भारत में १० या २४ मान्य है। वस्तुतः उनकी गणना करना कठिन है। संसार के विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न प्रयोजनों के लिए वे समय-समय पर विलक्षण व्यक्तित्व सहित उतरते हैं और अपना कार्य पूरा करके वापिस चले जाते हैं। यह स्थिति ‘अहम् ब्रह्मोसि’ सच्चिदानन्दोऽहम्, शिवोऽहम् सोऽहम्, कहने की होती है। उस चरम लक्ष्य स्थल पर पहुँचने की स्थिति को चेतना क्षेत्र में बिजली की तरह कोंधाने के लिए इन वेदान्त मन्त्रों का जप, उच्चारण एवं चिन्तन, मनन किया जाता है।
पाँचवें शरीर तक स्त्री-पुरुष का भेद, विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण तथा अगले जन्म में उसी लिंग का शरीर बनने की प्रक्रिया चलती है। उससे आगे के छठे और सातवें शरीर में विकसित होने पर यह भेदभाव मिट जाता है। तब मात्र एक आत्मा की अनुभूति होती है। स्त्री-पुरुष का आकर्षण-विकर्षण समाप्त हो जाता है। सर्वत्र एक ही आत्मा की अनुभूति होती है। अपने आपकी अन्तः स्थिति लिंग भेद से ऊपर उठी होती है यद्यपि जननेंद्रिय चिन्ह शरीर में यथावत् बने रहते हैं। यही बात साँसारिक स्थिति बदलने के कारण मन पर पड़ने वाली भली-बुरी प्रतिक्रिया के सम्बन्ध में भी होती है। समुद्र में लहरें उठती-गिरती रहती हैं। नाविक उनके लिए हर्ष-शोक नहीं करता, समुद्री हलचलों का आनन्द लेता है। छठे शरीर में विकसित देवात्माएँ इस स्थिति से ऊपर उठ जाती हैं। उनका चेतना स्तर गीता में कहे गये 'स्थित प्रज्ञ ज्ञानी' की और उपनिषदों में वर्णित 'तत्वदर्शी' की बन जाती है। उसके आत्म सुख से संसार के किसी परिवर्तन में विक्षेप नहीं पड़ता। लोकाचार हेतु उपयुक्त लीला प्रदर्शन हेतु उसका व्यवहार चलता रहता है। यह छठे शरीर तक की बात है। सातवें शरीर वाले अवतारी (भगवान) संज्ञा से विभूषित होते हैं। इन्हें ब्रह्मात्मा, ब्रह्म पुरुष का सकते हैं। उन्हें ब्रह्म साक्षात्कार, ब्रह्म निर्वाण प्राप्त भी कहा जा सकता है।
छठे शरीर में स्थित देव मानव स्थितिवश शाप और वरदान देते हैं, पर सातवें शरीर वाले के पास शुभेच्छा के अतिरिक्त और कुछ बचता ही नहीं। उनके लिए पराया एवं बैरी कोई रहता ही नहीं। दोष, अपराधों को वे बाल बुद्धि मानते हैं और द्वेष दण्ड के स्थान पर करुणा और सुधार की बात भर सोचते हैं।
सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार पृथ्वी के नीचे सात पाताल लोक वर्णित हैं जिनमें पाताल अंतिम है। हिन्दू धर्म ग्रंथों में पाताल लोक से सम्बन्धित असंख्य कहानियाँ, घटनायें तथा पौराणिक विवरण मिलते हैं। पाताल लोक को नागलोक का मध्य भाग बताया गया है, क्योंकि जल-स्वरूप जितनी भी वस्तुएँ हैं, वे सब वहाँ पर्याप्त रूप से गिरती हैं। पाताल लोक में दैत्य तथा दानव निवास करते हैं। जल का आहार करने वाली आसुर अग्नि सदा वहाँ उद्दीप्त रहती है। वह अपने को देवताओं से नियंत्रित मानती है, क्योंकि देवताओं ने दैत्यों का नाश कर अमृतपान कर शेष भाग वहीं रख दिया था। अत: वह अग्नि अपने स्थान के आस-पास नहीं फैलती। अमृतमय सोम की हानि और वृद्धि निरंतर दिखाई पड़ती है। सूर्य की किरणों से मृतप्राय पाताल निवासी चन्द्रमा की अमृतमयी किरणों से पुन: जी उठते हैं। विष्णु पुराण के अनुसार पूरे भू-मण्डल का क्षेत्रफल पचास करोड़ योजन है। इसकी ऊँचाई सत्तर सहस्र योजन है। इसके नीचे सात लोक इस प्रकार हैं-१. अतल, २. वितल, ३. सुतल, ४. रसातल, ५. तलातल, ६. महातल, ७. पाताल।
पौराणिक उल्लेख
पुराणों में पाताल लोक के बारे में सबसे लोकप्रिय प्रसंग भगवान विष्णु के अवतार वामन और पाताल सम्राट बलि का है। रामायण में अहिरावण द्वारा राम-लक्ष्मण का हरण कर पाताल लोक ले जाने पर श्री हनुमान के वहाँ जाकर अहिरावण वध करने का प्रसंग आता है। इसके अलावा भी ब्रह्माण्ड के तीन लोकों में पाताल लोक का भी धार्मिक महत्व बताया गया है।
***
(प्रकाशनाधीन छंद कोष से)
 २३-२-२०१९ 

गीत हम वही हैं

गीत 

हम वही हैं

🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳
हम वही हैं,
यह न भूलो
झट उठो आकाश छू लो।
बता दो सारे जगत को
यह न भूलो
हम वही है।
🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳
हमारे दिल में पली थी
सरफरोशी की तमन्ना।
हमारी गर्दन कटी थी
किंतु
किंचित भी झुकी ना।
काँपते थे शत्रु सुनकर
नाम जिनका
हम वही हैं।
कारगिल देता गवाही
मर अमर
होते हमीं हैं।
🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳
इंकलाबों की करी जयकार
हमने फेंककर बम।
झूल फाँसी पर गये
लेकिन
न झुकने दिया परचम।
नाम कह 'आज़ाद', कोड़े
खाये हँसकर
हर कहीं हैं।
नहीं धरती मात्र
देवोपरि हमें
मातामही हैं।
🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳
पैर में बंदूक बाँधे,
डाल घूँघट चल पड़ी जो।
भवानी साकार दुर्गा
भगत के
के संग थी खड़ी वो।
विश्व में ऐसी मिसालें
सत्य कहता हूँ
नहीं हैं।
ज़िन्दगी थीं या मशालें
अँधेरा पीती रही
रही हैं।
🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳
'नहीं दूँगी कभी झाँसी'
सुनो, मैंने ही कहा था।
लहू मेरा
शिवा, राणा, हेमू की
रग में बहा था।
पराजित कर हूण-शक को
मर, जनम लेते
यहीं हैं।
युद्ध करते, बुद्ध बनते
हमीं विक्रम, 'जिन'
हमीं हैं।
🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳
विश्व मित्र, वशिष्ठ, कुंभज
लोपामुद्रा, कैकयी, मय ।
ऋषभ, वानर, शेष, तक्षक
गार्गी-मैत्रेयी
निर्भय?
नाग पिंगल, पतंजलि,
नारद, चरक, सुश्रुत
हमीं हैं।
ओढ़ चादर रखी ज्यों की त्यों
अमल हमने
तही हैं।
🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳
देवव्रत, कौंतेय, राघव
परशु, शंकर अगम लाघव।
शक्ति पूजित, शक्ति पूजी
सिय-सती बन
जय किया भव।
शून्य से गुंजित हुए स्वर
जो सनातन
हम सभी हैं।
नाद अनहद हम पुरातन
लय-धुनें हम
नित नयी हैं।
🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳
हमीं भगवा, हम तिरंगा
जगत-जीवन रंग-बिरंगा।
द्वैत भी, अद्वैत भी हम
हमीं सागर,
शिखर, गंगा।
ध्यान-धारी, धर्म-धर्ता
कम-कर्ता
हम गुणी हैं।
वृत्ति सत-रज-तम न बाहर
कहीं खोजो,
त्रय हमीं हैं।
🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳
भूलकर मत हमें घेरो
काल को नाहक न टेरो।
अपावन आक्रांताओं
कदम पीछे
हटा फेरो।
बर्फ पर जब-जब
लहू की धार
सरहद पर बही हैं।
कहानी तब शौर्य की
अगणित, समय ने
खुद कहीं हैं।
🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳
हम वही हैं,
यह न भूलो
झट उठो आकाश छू लो।
बता दो सारे जगत को
यह न भूलो
हम वही है।
🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳