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बुधवार, 4 अगस्त 2021

समीक्षा श्रीधर प्रसाद द्विवेदी

कृति चर्चा:
''पाखी खोले पंख'' : गुंजित दोहा शंख
[कृति विवरण: पाखी खोले शंख, दोहा संकलन, श्रीधर प्रसाद द्विवेदी, प्रथम संस्करण, २०१७, आकार २२ से.मी. x १४ से.मी., पृष्ठ १०४, मूल्य ३००/-, आवरण सजिल्द बहुरंगी जैकेट सहित, प्रगतिशील प्रकाशन दिल्ली, दोहाकार संपर्क अमरावती। गायत्री मंदिर रोड, सुदना, पलामू, ८२२१०२ झारखंड, चलभाष ९४३१५५४४२८, ९९३९२३३९९३, ०७३५२९१८०४४, ईमेल sp.dwivedi7@gmail.com]
*
दोहा चेतन छंद है, जीवन का पर्याय
दोहा में ही छिपा है, रसानंद-अध्याय
*
रस लय भाव प्रतीक हैं, दोहा के पुरुषार्थ
अमिधा व्यंजन लक्षणा, प्रगट करें निहितार्थ
*
कत्था कथ्य समान है, चूना अर्थ सदृश्य
शब्द सुपारी भाव है, पान मान सादृश्य
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अलंकार-त्रै शक्तियाँ, इलायची-गुलकंद
जल गुलाब का बिम्ब है, रसानंद दे छंद
*
श्री-श्रीधर नित अधर धर, पान करें गुणगान
चिंता हर हर जीव की, करते तुरत निदान
*
दोहा गति-यति संतुलन, नर-नारी का मेल
पंक्ति-चरण मग-पग सदृश, रचना विधि का खेल
*
कवि पाखी पर खोलकर, भरता भाव उड़ान
पूर्व करे प्रभु वंदना, दोहा भजन समान
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अन्तस् कलुष मिटाइए, हरिए तमस अशेष।
उर भासित होता रहे, अक्षर ब्रम्ह विशेष।। पृष्ठ २१
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दोहानुज है सोरठा, चित-पट सा संबंध
विषम बने सम, सम-विषम, है अटूट अनुबंध
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बरबस आते ध्यान, किया निमीलित नैन जब।
हरि करते कल्याण, वापस आता श्वास तब।। पृष्ठ २४
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दोहा पर दोहा रचे, परिभाषा दी ठीक
उल्लाला-छप्पय सिखा, भली बनाई लीक
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उस प्रवाह में शब्द जो, आ जाएँ 'अनयास'। पृष्ठ २७
शब्द विरूपित हो नहीं, तब ही सफल प्रयास
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ऋतु-मौसम पर रचे हैं, दोहे सरस विशेष
रूप प्रकृति का समाहित, इनमें हुआ अशेष
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शरद रुपहली चाँदनी, अवनि प्रफुल्लित गात।
खिली कुमुदिनी ताल में, गगन मगन मुस्कात।। पृष्ठ २९
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दिवा-निशा कर एक सा, आया शिशिर कमाल।
बूढ़े-बच्चे, विहग, पशु, भये विकल बेहाल।। पृष्ठ २१
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मन फागुन फागुन हुआ, आँखें सावन मास।
नमक छिड़कते जले पर, कहें लोग मधुमास।। पृष्ठ ३१
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शरद-घाम का सम्मिलन, कुपित बनाता पित्त।
झरते सुमन पलाश वन, सेमल व्याकुल चित्त।। पृष्ठ ३३
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बादल सूरज खेलते, आँख-मिचौली खेल।
पहुँची नहीं पड़ाव तक, आसमान की रेल।। पृष्ठ ३५
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बरस रहा सावन सरस्, साजन भीगे द्वार।
घर आगतपतिका सरस, भीतर छुटा फुहार।। पृष्ठ ३६
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उपमा रूपक यमक की, जहँ-तहँ छटा विशेष
रसिक चित्त को मोहता, अनुप्रास अरु श्लेष
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जेठ सुबह सूरज उगा, पूर्ण कला के साथ।
ज्यों बारह आदित्य मिल, निकले नभ के माथ।। पृष्ठ ३९
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मटर 'मसुर' कटने लगे, रवि 'उष्मा' सा तप्त पृष्ठ ४३ / ४५
शब्द विरूपित यदि न हों, अर्थ करें विज्ञप्त
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कवि-कौशल है मुहावरे, बन दोहा का अंग
वृद्धि करें चारुत्व की, अगिन बिखेरें रंग
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उनकी दृष्टि कपोल पर, इनकी कंचुकि कोर।
'नयन हुए दो-चार' जब, बँधे प्रेम की डोर।। पृष्ठ ४६
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'आँखों-आँखों कट गई', करवट लेते रैन।
कान भोर से खा रही, कर्कश कोकिल बैन।। पृष्ठ ४७ २४
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बना घुमौआ चटपटा, अद्भुत रहता स्वाद।
'मुँह में पानी आ गया', जब भी आती याद।। पृष्ठ ४९
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दल का भेद रहा नहीं, लक्ष्य सभी का एक।
'बहते जल में हाथ धो', 'अपनी रोटी सेंक'।। पृष्ठ ५४
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बाबा व्यापारी हुए, बेचें आटा-तेल।
कोतवाल सैंया बना, खूब जमेगा खेल।। पृष्ठ ७७
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कई देश पर मर मिटे, हिन्दू-तुर्क न भेद।
कई स्वदेशी खा यहाँ, पत्तल-करते छेद।। पृष्ठ ७४
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अरे! पवन 'कहँ से मिला', यह सौरभ सौगात। पृष्ठ ४७
शब्द लिंग के दोष दो, सहज मिट सकें भ्रात।।
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'अरे पवन पाई कहाँ, यह सौरभ सौगात'
कर त्रुटि कर लें दूर तो, बाधा कहीं न तात
*
झूमर कजरी की कहीं, सुनी न मीठी बोल। पृष्ठ ४८
लिंग दोष दृष्टव्य है, देखें किंचित झोल
*
'झूमर-कजरी का कहीं, सुना न मीठा बोल
पता नहीं खोया कहाँ, शादीवाला ढोल
*
पर्यावरण बिगड़ गया, जीव हो गए लुप्त
श्रीधर को चिंता बहुत, मनुज रहा क्यों सुप्त?
*
पता नहीं किस राह से, गिद्ध गए सुर-धाम।
बिगड़ा अब पर्यावरण, गौरैया गुमनाम।। पृष्ठ ५८
*
पौधा रोपें तरु बना, रक्षा करिए मीत
पंछी आ कलरव करें, सुनें मधुर संगीत
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आँगन में तुलसी लगा, बाहर पीपल-नीम।
स्वच्छ वायु मिलती रहे, घर से दूर हकीम।। पृष्ठ ५८
*
देख विसंगति आज की, कवि कहता युग-सत्य
नाकाबिल अफसर बनें, काबिल बनते भृत्य
*
कौआ काजू चुग रहा, चना-चबेना हंस।
टीका उसे नसीब हो, जो राजा का वंश।। पृष्ठ ६१ / ३६
*
मानव बदले आचरण, स्वार्थ साध हो दूर
कवि-मन आहत हो कहे, आँखें रहते सूर
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खेला खाया साथ में, था लँगोटिया यार।
अब दर्शन दुर्लभ हुआ, लेकर गया उधार।। पृष्ठ ६४
*
'पर सब कहाँ प्रत्यक्ष हैँ, मीडिया पैना दर्भ पृष्ठ ७०/६१
चौदह बारह कलाएँ, कहते हैं संदर्भ
*
अलंकार की छवि-छटा, करे चारुता-वृद्धि
रूपक उपमा यमक से, हो सौंदर्य समृद्धि
*
पानी देने में हुई, बेपानी सरकार।
बिन पानी होने लगे, जीव-जंतु लाचार।। पृष्ठ ७९
*
चुन-चुन लाए शाख से, माली विविध प्रसून। पृष्ठ ७७
बहु अर्थी है श्लेष ज्यों, मोती मानुस चून
*
आँख खुले सब मिल करें, साथ विसंगति दूर
कवि की इतनी चाह है, शीश न बैठे धूर
*
अमिधा कवि को प्रिय अधिक, सरस-सहज हो कथ्य
पाठक-श्रोता समझ ले, अर्थ न चूके तथ्य
*
दर्शन दोहों में निहित, सहित लोक आचार
पढ़ सुन समझे जो इन्हें, करे श्रेष्ठ व्यवहार
*
युग विसंगति-चित्र हैं, शब्द-शब्द साकार
जैसे दर्पण में दिखे, सारा सच साकार
*
श्रेष्ठ-ज्येष्ठ श्रीधर लिखें, दोहे आत्म उड़ेल
मिले साथ परमात्म भी, डीप-ज्योति का खेल
***
चर्चाकार : आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
विश्व वाणी हिंदी संस्थान,
४०१ विजय अपार्टमेंट नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१
चलभाष: ९४२५१ ८३२४४। ईमेल salil.sanjiv@gmail.com

मुक्तक

मुक्तक
*
हिंदी कहो, हिंदी पढ़ो, हिंदी लिखो, नित जाल पर
हिंदी- तिलक हँसकर लगाओ, भारती के भाल पर
विश्व वाणी है यही, कल सब कहेंगे सत्य यह
मीडिया-मित्रों कहो 'जय हिन्द-हिंदी' जाल पर
*
हिंदी में हिंदी नहीं तो, सब दुखी हो जाएँगे
बधावा या मर्सिया इंग्लिश में रटकर गाएँगे?
आरती या भजन समझेंगे नहीं जब देवता-
कहो कोंवेंट-प्रेमियों वरदान कैसे पाएँगे?
*

किस तरह मोती मिले बिन सीपिका
किस तरह तम से लड़ें बिन दीपिका
हो न शशि त्यागी, गुमेगी चाँदनी
अमावस में दिखे कैसे वीथिका
*गले मिल, झगड़ा करो स्वीकार है
अधर पर रख अधर सिल, स्वीकार है
छोड़ दें हिंदी किसी भी शर्त पर
है असंभव यही अस्वीकार है
४-८-२०१८
*

नवगीत

नवगीत:
महका-महका
संजीव
*
महका-महका
मन-मंदिर रख सुगढ़-सलौना
चहका-चहका
आशाओं के मेघ न बरसे
कोशिश तरसे
फटी बिमाई, मैली धोती
निकली घर से
बासन माँजे, कपड़े धोए
काँख-काँखकर
समझ न आए पर-सुख से
हरसे या तरसे
दहका-दहका
बुझा हौसलों का अंगारा
लहका-लहका
एक महल, सौ यहाँ झोपड़ी
कौन बनाए
ऊँच-नीच यह, कहो खोपड़ी
कौन बताए
मेहनत भूखी, चमड़ी सूखी
आँखें चमकें
कहाँ जाएगी मंजिल
सपने हों न पराए
बहका-बहका
सम्हल गया पग, बढ़ा राह पर
ठिठका-ठहका
लख मयंक की छटा अनूठी
सज्जन हरषे.
नेह नर्मदा नहा नवेली
पायस परसे.
नर-नरेंद्र अंतर से अंतर
बिसर हँस रहे.
हास-रास मधुमास न जाए-
घर से, दर से.
दहका-दहका
सूर्य सिंदूरी, उषा-साँझ संग
धधका-दहका...
४-८-२०१८ 
***
salil.sanjiv@gmil.com

गीत

गीत:
हक
संजीव 'सलिल'
*
खफा होना तुम्हारा हक है, जाना दूर मेरा हक.
न मन मिल पायें तो क्यों बन्धनों को ढोयें हम नाहक.....
*
न मैं नाज़ुक कि अपने पग पे आगे बढ़ नहीं सकता.
न तुम बेबस कि जो खुद ही गगन तक चढ़ नहीं सकता.
*
भले टेढ़ा जमाना हो, रुका है कब कहो चातक.
खफा होना तुम्हारा हक है, जाना दूर मेरा हक.....
*
न दिल कमजोर है इतना कि सच को सह नहीं पाये.
विरह की आग हो कितनी प्रबल यह दह नहीं पाये..
*
अलग हों रास्ते अपने मगर हों सच के हम वाहक.
खफा होना तुम्हारा हक है, जाना दूर मेरा हक.....
*
जियो तुम सिर उठाकर, कहो- 'गलती को मिटाया है.'
जिऊँ मैं सिर उठाकर कहूँ- 'मस्तक ना झुकाया है.'
*
उसूलों का करें सौदा कहो क्यों?, राह यह घातक.
खफा होना तुम्हारा हक है, जाना दूर मेरा हक.....
*
भटक जाए, न गम होगा, तलाशेगा 'सलिल' मंजिल.
खलिश किंचित न होगी, मिल ही जायेगा कभी साहिल..
*
बहुत छोटी सी दुनिया है, मिलेंगे फिर कभी औचक.
खफा होना तुम्हारा हक है, जाना दूर मेरा हक.....
४-८-२०१० 
***

मंगलवार, 3 अगस्त 2021

नवगीत

नवगीत
*
बारिश तो अब भी होती है
लेकिन बच्चे नहीं खेलते.
*
नाव बनाना
कौन सिखाये?
बहे जा रहे समय नदी में.
समय न मिलता रिक्त सदी में.
काम न कोई
किसी के आये.
अपना संकट आप झेलते
बारिश तो अब भी होती है
लेकिन बच्चे नहीं खेलते.
*
डेंगू से भय-
भीत सभी हैं.
नहीं भरोसा शेष रहा है.
कोइ न अपना सगा रहा है.
चेहरे सबके
पीत अभी हैं.
कितने पापड विवश बेलते
बारिश तो अब भी होती है
लेकिन बच्चे नहीं खेलते.
*
उतर गया
चेहरे का पानी
दो से दो न सम्हाले जाते
कुत्ते-गाय न रोटी पाते
कहीं न बाकी
दादी-नानी.
चूहे भूखे दंड पेलते
बारिश तो अब भी होती है
लेकिन बच्चे नहीं खेलते.
*

नागपंचमी

विमर्श:
राष्ट्रीय पर्व नागपंचमी 
संजीव
*
नागपंचमी आएगी और जाएगी... वन विभागकर्मी और पुलिसवाले वन्य जीव रक्षाके नामपर सपेरों को पकड़ेंगे, आजीविका कमानेसे वंचित करेंगे और वसूले बिना तो छोड़ेंगे नहीं। उनकी तो चाँदी होना ही है। 
पारम्परिक पेशेसे वंचित किये गए ये सपेरे अब आजीविका कहाँसे कमाएंगे? वे शिक्षित-प्रशिक्षित तो हैं नहीं, खेती या उद्योग भी नहीं हैं।  अतः, उन्हें अपराध करनेकी राह पर ला खड़ा करनेका कार्य शासन-प्रशासन और तथाकथित जीवरक्षणके पक्षधरताओंने किया है। 
जिस देशमें पूज्य गाय, उपयोगी बैल, भैंस, बकरी आदिका निर्दयतापूर्वक कत्ल कर उनका मांस लटकाने, बेचने और खाने पर प्रतिबंध नहीं है वहाँ जहरीले और प्रतिवर्ष लगभग ५०,००० मृत्युओंका कारण बननेवाले साँपोंको मात्र एक दिन पूजनेपर दुग्धपानसे उनकी मृत्युकी बात तिलको ताड़ बनाकर कही जति हैं। दूरदर्शनी चैनलों पर विशेषज्ञ और पत्रकार टी.आर.पी. के चक्करमें तथाकथित विशेषज्ञों और पंडितों के साथ बैठकर घंटों निरर्थक बहसें करते हैं।  इन चर्चाओंमें सर्प पूजाके मूल आर्य और नाग सभ्यताओंके सम्मिलनकी कोई बात नहीं की जाती। आदिवासियों और शहरवासियों के बीच सांस्कृतिक सेतुके रूपमें नाग की भूमिका, चूहोंके विनाश में नागके उपयोगिता, जन-मन से नागके प्रति भय कम कर नागको बचाने में नागपंचमी जैसे पर्वोंकी उपयोगिता, नाग-पालन कर उनके विष से औषधि निर्माण के व्यवसाय को एकतरफा नकार दिया जाता है।
संयोगवश दूरदर्शन पर महाभारत श्रृंखला में पांडवों द्वारा नागों की भूमि छीनने, फलतः नागों द्वारा विद्रोह, नागराजा द्वारा दुर्योधन का साथ देने जैसे प्रसंग दर्शाये गये हैं किन्तु इन तथाकथित विद्वानों और पत्रकारों का ध्यान नागपंचमी, नागप्रजाजनों (सपेरों-आदिवासियों) के साथ विकास के नाम पर अब तक हुए अत्याचार की और नहीं गया तो उसके प्रतिकार की बात कैसे करते?
इस प्रसंग में एक दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष यह भी है कि इस देशमें बुद्धिजीवी माने जानेवाले कायस्थ समाज ने भी यह भुला दिया कि नागराजा वासुकि की कन्या उनके मूलपुरुष चित्रगुप्त जी की पत्नी हैं तथा चित्रगुप्त जी के १२ पुत्रों के विवाह भी १२ नाग कन्याओं से ही हुए हैं जिनसे कायस्थों की उत्पत्ति हुई है। इस पौराणिक कथा का वर्ष में कई बार पाठ करने के बाद भी कायस्थ आदिवासी समाज से अपने ननिहाल होने के संबंध को याद नहीं रख सके। फलतः, खुद राजसत्ता गँवाकर आमजन हो गए और आदिवासी भी शोषण के शिकार हुए। इस दृष्टि से देखें तो नागपंचमी कायस्थ समाज का अपना महापर्व है और नाग पूजन उनकी अपनी परंपरा है जिसके माध्यम से विष को भी अमृत में बदलकर उपयोगी बनाने की सामर्थ्य पैदा की जाती है। 
शिवभक्तों और शैव संतों को भी नागपंचमी पर्व की कोई उपयोगिता नज़र नहीं आई। हर शिव मंदिर में सर्प पालन और उनके विष से विविध रोगों की चिकित्सा की जा सके उनकी उपयोगिता में वृद्धि होगी। सर्पों को चूहों का आहार कराकर चूहों द्वारा किये जा रहे नुकसान को रोका जा सकता है। 
यह पर्व मल्ल विद्या साधकों का महापर्व है लेकिन तमाम अखाड़े मौन हैं बावजूद इस सत्य के कि ओलंपिक आदि विश्वस्तरीय क्रीड़ा प्रतियोगिताओं में मल्लों की दम पर ही भारत सर उठाकर खड़ा हो पाता है।  वैलेंटाइन जैसे विदेशी पर्व के समर्थक इससे दूर हैं यह तो समझा जा सकता है किन्तु वेलेंटाइन का विरोध करनेवाले समूह कहाँ हैं? वे नागपंचमी को यवा शौर्य-पराक्रम का महापर्व क्यों नहीं बना देते जबकि उन्हीं के समर्थक राजनैतिक दल कई राज्यों और केंद्र में सत्ता पर काबिज हैं?
महाराष्ट्र से अन्य राज्यवासियों को बाहर करनेके प्रति उत्सुक नेता और दल नागपंचमी  को महाराष्ट्र की मल्लखम्ब विधा का महापर्व क्यों कहीं बनाते? क्यों नहीं यह खेल भी विश्व प्रतियोगिताओं में शामिल कराया जाए और भारत के खाते में कुछ और पदक आएं?
अंत में सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह कि जिन सपेरों को अनावश्यक और अपराधी कहा जा रहा है, उनके नागरिक अधिकार की रक्षा कर उन्हें पारम्परिक पेशे से वंचित करने के स्थान पर उनके ज्ञान और सामर्थ्य का उपयोग कर हर शहर में सर्प संरक्षण केंद्र खोले जाए जहाँ सर्प पालन कर औषधि निर्माण हेतु सर्प विष का व्यावसायिक उत्पादन हो। सपेरों को रोजगार मिले, वे दर-दर भटकने के बजाय सम्मनित नागरिक का जीवन जी सकें। सर्प विष से बचाव के उनके पारम्परिक ज्ञान मन्त्रों और जड़ी-बूटियों पर शोध हो। 
***

लघुकथा बीज का अंकुर

लघुकथा
बीज का अंकुर
*
चौकीदार के बेटे ने सिविल सर्विस परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। समाचार पाकर कमिश्नर साहब रुआंसे हो आये। मन की बात छिपा न सके और पत्नी से बोले बीज का अंकुर बीज जैसा क्यों नहीं होता?
अंकुर तो बीज जैसा ही होता है पर जरूरत सेज्यादा खाद-पानी रोज दिया जाए तो सड़ जाता है बीज का अंकुर।
***
लघुकथा :
सोई आत्मा
*
मदरसे जाने से मना करने पर उसे रोज डाँट पड़ती। एक दिन डरते-डरते उसने पिता को हक़ीक़त बता ही दी कि उस्ताद अकेले में.....
वालिद गुस्से में जाने को हुए तो वालिदा ने टोंका गुस्से में कुछ ऐसा-वैसा क़दम न उठा लेना उसकी पहुँच ऊपर तक है।
फ़िक्र न करो, मैं नज़दीक छिपा रहूँगा और आज जैसे ही उस्ताद किसी बच्चे के साथ गलत हरकत करेगा उसकी वीडियो फिल्म बनाकर पुलिस ठाणे और अखबार नवीस के साथ उस्ताद की बीबी और बेटी को भी भेज दूँगा।
सब मिलकर उस्ताद की खाट खड़ी करेंगे तो जाग जायेगी उसकी सोई आत्मा।
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सुशील श्रीवास्तव

विशेष लेख:
धुनी पत्रकार सुशील श्रीवास्तव 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 
*
संस्कारधानी जबलपुर में समर्पित कलमकारों और पत्रकारों की सुदीर्घ परंपरा है। मासिक जबलपुर समाचार (१७७३), साप्ताहिक शुभचिंतक (१८६३), जबलपुर न्यूज़ पेपर (१८८३,अंग्रेजी), साहित्यिकी प्रेमा (१९३०, रामानुजलाल श्रीवास्तव 'ऊँट बिलहरीवी'), दैनिक जयहिंद (१९४६-१९५४, संचालक सेठ गोविंददास, संपादक विद्याभास्कर), साप्ताहिक युगारंभ (१९४७-१९४८, संचालक ब्योहार राजेंद्र सिंह, संपादक पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, इंद्रबहादुर खरे), प्रहरी (१९४७-१९६६, संचालक भवानीप्रसाद तिवारी, संपादक रामेश्वर प्रसाद गुरु, कालांतर में प्रकाशक-संपादक नर्मदाप्रसाद खरे), दैनिक नवभारत (१९५०, संचालक रामगोपाल माहेश्वरी, व्यवस्थापक मायाराम सुरजन, संपादक  कुंजबिहारी पाठक), सांध्य दैनिक जबलपुर समाचार (१९५६ नित्यगोपाल तिवारी), युगधर्म (१९५६, भगवतीधार बाजपेई), साहित्यिकी वसुधा (१९५६, हरिशनकार परसाई, रामेश्वर प्रसाद गुरु), नर्मदा हेराल्ड (१९७६, संचालक श्रवण भाई पटेल, संपादक हनुमान प्रसाद वर्मा), जयलोक (संचालक अजीत वर्मा) आदि के क्रम में अग्रदूत (१९९६, संचालक-संपादक सुशील श्रीवास्तव) का नाम उल्लेखनीय है। 
अग्रदूत ऐतिहासिक विरासत 
अग्रदूत शीर्षक से समाचार पत्र पहली बार रामपुर से प्रकाशित हुआ जिसे अंगरेजों ने १९४२ में बंद करा दिया।  रायपुर के पहले साप्ताहिक समाचार पत्र ‘अग्रदूत’ की नींव वर्ष १९४२ में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी केशव प्रसाद वर्मा रखी। ‘अग्रदूत’ के सहयोगी संपादक स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी थे।  तब भारत छोड़ो आंदोलन चल रहा था और ‘अग्रदूत’ के तेवर काफ़ी तीखे थे।१९४२ की अगस्त क्रांति के समय अंग्रेज़ी हुकूमत उन हर स्थानों पर छापे डलवा रही थी जहाँ से विरोध की आवाज़ें उठती रही थीं। ‘अग्रदूत’ के दफ़्तर के साथ त्रिवेदी जी के नयापारा स्थित निवास पर भी छापा पड़ा। त्रिवेदी उस समय भूमिगत होकर सागर चले गए। इस तरह भारत छोड़ो आंदोलन में ‘अग्रदूत’ का विशेष योगदान रहा।  १९३६-३७ में पंडित रविशंकर शुक्ल ने नागपुर से साप्ताहिक समाचार पत्र महाकोशल शुरु किया, जिसके सीताचरण दीक्षित संपादक थे। 1१९४६ में पंडित रविशंकर शुक्ल ने रायपुर से साप्ताहिक ‘महाकोशल’ का प्रकाशन शुरु किया, पंडित स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी संपादक बने। दिलचस्प संयोग है कि ‘अग्रदूत’ एवं ‘महाकोशल’ दोनों समाचार पत्र आगे जाकर साप्ताहिक से दैनिक हुए। पंडित स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी दोनों दैनिक में भी संपादक रहे। रायपुर (अब छत्तीसगढ़ की राजधानी) से १९४२ में स्वराज्य प्रसाद द्विवेदी ने साप्ताहिक अग्रदूत आरंभ किया जो १९८२ तक इसी रूप में प्रकाशित हुआ, तत्पश्चात सांध्य दैनिक के रूप में प्रकाशित हो रहा है। असमिया भाषा के प्रमुख समाचार पत्र  का नाम भी अग्रदूत है। 
अग्रदूत जबलपुर 
१९९६ में पत्रकार प्रवर सुशील श्रीवास्तव ने ऐतिहासिक पृष्ठभूमि संपन्न 'अग्रदूत' का जबलपुर संस्करण आरंभ किया। दुर्योगवश २०-१०-१९९९ को सुशील जी दिवंगत हो गए। तत्पश्चात उनके सुपुत्र अरुण श्रीवास्तव ने 'अग्रदूत' को निरंतर प्रकाशित कर नई ऊंचाइयों तक पहुँचाया। ८ अगस्त २०२१ को सांध्य दैनिक अग्रदूत अपनी २५ वीं वर्षगाँठ मना रहा है। चार पृष्ठीय अग्रदूत के हर पृष्ठ में ६ कॉलम हैं जिनमें वैश्विक, राष्ट्रीय, प्रादेशिक तथा स्थानीय समाचारों की निष्पक्ष रिपोर्टिंग की जाती है। शब्द सामर्थ्य के माध्यम से राष्ट्रभाषा हिंदी का प्रसार और नई पीढ़ी  के शब्द सामर्थ्य में वृद्धि की ओर पत्र का रुझान है। अग्रदूत के विशेषता संतुलित भाषा तथा तथ्यपरक रिपोर्टिंग है। साहित्यिक समाचारों को पत्र में यथोचित स्थान  व सम्मान प्राप्त है। 
समाजसेवी सुशील जी की विरासत 
साठिया कुआँ जबलपुर निवासी सुशील श्रीवास्तव पर श्रद्धेय कक्का जी (ब्योहार राजेंद्र सिंह जी) का वरद हस्त रहा है। कक्का जी की बखरी (हवेली) में राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का प्रवास हुआ था। कक्का जी के पास दुर्लभ पुस्तकों और पत्रों आदि का संकलन भी भी था। कक्का जी सुबह-शाम बखरी से टहलने निकलते तो मुख्य द्वार के बाहर ही सुशील जी के पास रुकते हुए ही जाते थे। सुशील जी के निवास के समीप ही युगधर्म के संपादक भगवतीधर जी बाजपेई और अधिवक्ता प्रभाकर रूसिया के निवास थे। मुझे इन सबका नैकट्य पाने का सौभाग्य मिला। प्रायः ये सभी किसी एक के निवास पर बैठक जमाते और फिर 'बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी' को मूर्त रूप देते हुए गली-मोहल्ले से लेकर देस-विदेश तक की चर्चाएँ होतीं। हम युवाओं के सामने ज्ञान की सलिला बहती रहती, जिसकी जितनी सामर्थ्य पान करते रहो। हमारी जिज्ञासाओं का समाधान विविध दृष्टिकोणों से सामने आता। ये सब अलग-अलग विचारधाराओं और संगठनों के जुड़े होने के बाद भी पारिवारिक स्नेहसूत्र में आबद्ध रहते थे। कक्का जी कांग्रेस, बाजपेई जी जनसंघ, रूसिया जी समाजवादी दल से थे किन्तु उनकी पारस्परिक निकटता में वैचारिक मतभिन्नता तनिक भी बाधक नहीं हो पाती थी। 
सुशील जी तब 'जगध्वनि' प्रकाशित करते थे। जब मस्ती का मूड होता तो तो उनका पत्रकार किसी चर्चित विषय पर कुछ कह देता और फिर घंटों चर्चा चलती। चर्चा के साथ-साथ चाय-पानी ही नहीं, मौसम के अनुसार स्वल्पाहार की प्लेटें भी आती-जाती रहतीं। जब बैठक समाप्त होती तो बार-बार चाय-पानी लाने के लिए दौड़ते बच्चे चैन की सांस ले पाते। इन बैठों में जो सम्मिलित हुआ, वह इनका दीवाना हो जाता। कक्का जी सहज-सरल मृदुभाषी, बाजपेई जी राष्ट्रीयता के पक्षधर, रूसिया जी लोहियावादी विचारधारा की बौद्धिकता में डूबे और सुशील दादा की खोजपरक पत्रकार दृष्टि। कभी कभी वीरेंद्र श्रीवास्तव अधिवक्ता, शेखर वर्मा आदि जुटते तो कायस्थ समाज में संगठन के अभाव, युवाओं की कमी, सरकारी नौकरियों में घटते स्थान, खर्चीले विवाह, दहेज़ की कुरीति आदि प्रसंग छिड़ते। वर्ष १९७३ में मैं लोक निर्माण विभाग में अभियंता हो गया। कक्का जी और सुशील दादा के कहे अनुसार जिला कायस्थ सभा का गठन किया गया। ब्योहार बाग़ में राम निवास पर बैठें होतीं। गिरीश वर्मा (निदेशक आकाशवाणी) अध्यक्ष, जागेश्वर प्रसाद श्रीवास्तव जी (महर्षि महेश योगी के भाई) और वर्मा जी (अनूप वर्मा के पिताजी) उपाध्यक्ष, मैं सचिव चुने गए। सुशील दादा परदे के पीछे से सहयोग करते रहे। 
बेटों से बढ़कर सुशील जी 
एक घटना का उल्लेख कर इस लेख को विराम देना ठीक होगा। फरवरी १९८८ में कक्का जी बीमार हुए, उन्हें विक्टोरिया अस्पताल के प्राइवेट वार्ड में भर्ती कराया गया। मुझे सूचना मिली तो कक्का जी के समाचार लेने यदा-कदा अस्पताल चला जाता था। २७ फरवरी को सवेरे लगभग १० बजे कक्का जी के पास गया तो काफी व्यथित दिखे। मैंने कारण पूछा तो बोले लावारिस सा पड़ा हूँ, कोई देखने-भालने वाला नहीं है। मैंने पूछा मेरे योग्य सेवा बताइये तो बोले 'तुम्हारी यहाँ कोई नहीं सुनेगा, तुम सुशील के पास जाकर उसे मेरे पास भेज दो। वह आएगा तभी डॉक्टर और नर्सें  दवाई-इलाज ठीक से करेंगे। मुझे कार्यालय जाना था पर रास्ता बदलकर सठिया कुआ गया, सुशील दादा को बताया तो बल 'मैं दस मिनिट में जाता हूँ। तुम चिंता न करो।' कहना न होगा की कक्का जी के दो पुत्र जबलपुर में थे। एक उच्चन्यायालय में अधिवक्ता और दूसरे कलानिकेतन में प्राचार्य पर कक्का जी ने कष्ट के पलों में याद किया तो सुशील दादा को। एक दिन बाद मैं कुछ काम से नागपुर चला गया लौटा तो पता चला कि २ मार्च को कक्का जी नहीं रहे। ऐसे थे सुशील जी, यह विरासत प्रिय अरुण को मिली है। 
अग्रदूत अख़बार ही नहीं जीवन शैली है। सामाजिक संबंधों, वैयक्तिक अनुबंधों और स्वैच्छिक प्रतिबंधों की त्रिवेणी के बीच पत्रकारिता के आदर्शों और व्यवहार में समन्वय और सामाजिक-राष्ट्रीय-वैयक्तिक कर्त्व्याधिकारों के मध्य सामंजस्य बैठते समाचार इस तरह देना कि नकारात्मकता को रोका जा सके। वर्तमान संक्रमणकाल में सतत बढ़ती मूल्यहीनता, संकीर्णता, असहिष्णुता और राजनैतिक उद्दंडता के परिवेश में स्वस्थ्य पत्रकारिता तलवार की धार पर चलने की तरह है। प्रिय अरुण इस कसौटी पर अब तक खरा सिद्ध हुआ है, आगे भी हो यही कामना है। 
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संपर्क - संयोजक विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१, चलभाष ९४२५१८३२४४ 
   

सोमवार, 2 अगस्त 2021

गीता अध्याय १२ यथावत हिंदी काव्यान्तरण


गीता अध्याय १२
यथावत हिंदी काव्यान्तरण
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
अर्जुन बोला- ऐसे तत्पर, भक्त पूजते हैं तुमको।
जो अक्षर अव्यक्त को पूजें, उनमें योगवेत्ता कौन?१।
*
प्रभु बोले- मुझमें स्थिर करके, मन जो युक्त मुझे पूजें।
श्रद्धा पूर्वक दिव्य भाव से मुझे, योग में सिद्ध वही।२।
*
जो इंद्रिय से परे अनिश्चित, ईश अव्यक्त पूजते हैं।
सर्वव्याप्त चिंतनातीत जो, बिन परिवर्तन स्थिर ध्रुव भी।३।
*
वश में कर सारी इन्द्रिय को, सब जगहों में समदर्शी।
वे पाते मुझको निश्चय ही, सर्व भूत हित जो रत हैं।४।
*
कष्ट अत्यधिक उस अव्यक्त प्रति, जो अनुरक्त उन्हें होता।
जो अव्यक्त; प्रगति उसके प्रति, दुखदा देहधारियों को।५।
*
जो सब कर्म मुझे अर्पित कर, मुझमें ही आसक्त रहें।
वे अनन्य जो भक्ति योग से, ध्याते मुझे पूजते हैं।६।
*
उनका मैं उद्धार कालमय, भव-सागर से करता हूँ।
दीर्घ काल के बाद न हो भय, मुझमें स्थिर मन वालों को।७।
*
मुझमें ही मन को स्थिर कर तू, मुझमें ही तू बुद्धि लगा।
कर निवास मुझमें निश्चय ही, तत्पश्चात नहीं संशय।८।
*
यदि मन को केंद्रित करने में, नहीं समर्थ मुझी में तू!
कर अभ्यास योग का; इच्छा कर पाने की तब अर्जुन।९।
*
यदि अभ्यास न कर सकता तो, मुझ प्रति कर्म परायण हो।
मेरे लिए कर्म करता चल, सिद्धि प्राप्त तुझको होगी।१०।
*
यदि यह भी कर सके न तू तो, मेरे योगाश्रित हो जा।
सब कर्मों का फल तज कर तू, आत्मस्थित मेरे हो जा।११।
*
ज्ञान श्रेष्ठ अभ्यास से सदा, ज्ञान से ध्यान विशिष्ट है।
श्रेष्ठ ध्यान से कर्म फलों का त्याग, त्याग से शांति मिले।१२।
*
ईर्ष्याहीन सभी जीवों प्रति, मैत्रीयुक्त दयालु तथा।
निरभिमान निर्मम समभावी, सुख में दुःख में करे क्षमा।१३।
*
रहे प्रसन्न निरंतर योगी, आत्मसंयमी दृढ़ निश्चय।
मुझमें अर्पित मन अरु मति से, जो मम भक्त वही प्रिय है।१४।
*
जिससे हो उद्विग्न न कोई, लोक से जो विचलित मत हो।
जो सुख-दुख से, भय चिंता से, मुक्त वही मुझको प्रिय है।१५।
*
इच्छारहित शुद्ध पटु है जो, उदासीन कष्ट से मुक्त।
सब प्रयत्न का परित्यागी जो, मेरा भक्त परम प्रिय वह।१६।
*
जो न कभी हर्षित होता है, करे न शोक शोच इच्छा।
शुभ अरु अशुभ त्याग देता जो, भक्त वही मेरा प्रिय है।१७।
*
सम हैं शत्रु-मित्र जिसको अरु, हैं समान मान-अपमान। 
शीत-ऊष्ण, सुख-दुःख में सम, सब संगति से रहे अनजान।१८। 
*
सम निंदा-यश मौन सहे जो, हो संतुष्ट बिना घर भी। 
दृढ़ संकल्प भक्ति में रत हो, मुझको प्रिय है मनुज वही।१९। 
*
धर्म रूप अमृत पीते जो, उक्त प्रकार रहें तत्पर। 
श्रद्धा सहित मान मुझको प्रभु, भक्त अत्यधिक प्रिय मुझको।२०। 
***  
अध्याय १३ 
पार्थ कहे- प्रकृति-पुरुष व क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ क्या निश्चय कहें?
जानना है मुझे ज्ञान व ज्ञेय, इच्छुक हूँ केशव कहें।१। 
*
बोले प्रभु- यह काया है जो, कुन्तीसुत! है क्षेत्र यही।
जो यह जाने उसको कहते, हैं क्षेत्रज्ञ इसे जानो।२। 
*
हूँ क्षेत्रज्ञ सभी क्षेत्रों में, मैं मुझको जानो भारत!
क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ ज्ञान जो, वह जानो मेरा मत है।३। 
*
कर्मक्षेत्र जो जैसा भी है, परिवर्तन जिससे भी जो। 
वह भी उसका जो प्रभाव भी, वह सारांश सुनो मुझसे।४। 
*
ऋषिगण बहु प्रकार से गाते, छंद कई कह समझाते। 
ब्रह्मसूत्र पद भी निश्चय ही, कार्य व कारण बतलाते।५। 
*
महाभूत अरु अहंकार सह, बुद्धि अव्यक्त सुनिश्चित ही। 
कर्म-ज्ञान दस इंद्रिय अरु मन, पाँचइन्द्रियों के गोचर।६। 
*
इच्छा द्वेष व सुख दुख के सँग, धीरज अरु चेतना को भी। 
क्षेत्र कर्म का कहा गया है, विकार सहित संक्षेप में। ७। 
*
बिन अभिमान-दंभ बिन हिंसा, सहनशीलता सह सारल्य। 
गुरु सानिंध्य शौच अरु शुचिता, दृढ़ता और आत्मसंयम।८। 
*
इन्द्रिय संयम अरु विराग सह, अहंकार से रहित रहे। 
जन्म-मृत्यु; वार्धक्य-व्याधियाँ, दुःख-दोष देखते रहे।९। 
*
बिन आसक्ति; बिना संगति के, सुत-वनिता एवं घर में। 
रहे निरंतर शांत भाव से, इष्ट-अनिष्ट प्राप्त करके।१०। 
*
मुझमें रमे अनन्य योग से, अव्यभिचारी भक्ति सहित। 
कर एकांतवास-आकांक्षा, बिन आसक्ति आम जन में।११। 
*
आत्म ज्ञान में नित्य विचरना, तत्व ज्ञान दर्शन करना। 
यही ज्ञान; जो अन्य वह सभी, है अज्ञान इतर इससे।१२। 
*        
ज्ञेय ज्ञान जो वही कहूँगा, सुनकर लगे अमृत पाया। 
आदि रहित आधीन ब्रह्म जो, सत-असत कहते न उसको।१३। 
*
उसके हैं सर्वत्र हाथ-पग, आँख सिर मुख सब जगह हैं।
सब जगह हैं कान भी उसके, व्याप्त सारी वस्तुओं में।१४। 
*
मूल सब इंद्रिय-गुणों का वह, रहित सारी इन्द्रियों से है। 
निरासक्त करे भरण-पोषण, निर्गुण है पर गुण भोगे।१५। 
*
 








मैं भारत हूँ

। देश हमारा भारत है ।
। इसे सदा भारत कहें।
*
। एक देश एक नाम।
। अपना भारत महान।
*
। जन जन का यह नारा है ।
।। भारत नाम हमारा है ।।
*
। ज़र्रे ज़र्रे की हुंकार ।
। मुझको है भारत से प्यार।
*
है प्रकाश पाने में जो रत ।
। नाम इसी देश का भारत ।
*
। कल से कल को आज जोड़ता ।
। भारत देश न सत्य छोड़ता ।
*
। भारत माता की संतान ।
। भारत नाम हमारी आन ।
*
। हिमगिरि से सागर तक देश ।
। भारत महिमावान विशेष ।
*
। ध्वजा तिरंगी अपनी आन ।
। भारत नाम हमारी शान ।
*
। सिंधु नर्मदा गंगा कृष्णा ।
। भारत प्यारा रंग-बिरंगा ।
*
। जनगण-मन की यही पुकार ।
। भारत बोले सब संसार ।
*
। मैं भारत हूँ बोलिए ।
। ऐक्य भावना घोलिए।
*

। मैं भारत, मैं भारतवासी ।
। हर दिन होली, रात दिवाली।
*
। पीहू पोंगल बैसाखी ।
। गुड़ीपाड़वा संक्रांति ।
। मैं भारत हूँ, नदियाँ मेरी ।
। जय गुंजातीं सदियाँ मेरी ।
*
। मेरा हर दिन मेहनत पर्व।
।हूँ भारतवासी, है गर्व ।
*
। भारत होली-दीवाली ।
। ऊषा-संध्या रसवाली ।
। गेहूँ-मक्के की बाली ।
। चैया की प्याली थाली ।
*
। मुझको भारत बोले दुनिया ।
। मैया पप्पा मुन्नू मुनिया ।
*
। था, हूँ सदा रहूँगा भारत ।
। सब मिल बोलो मैं हूँ भारत।
*
। रसगुल्ला इडली दोसा ।
। छोला अरु लिट्टी चोखा ।
। पोहा दूध-जलेबी खा ।
। मैं भारत हूँ मिल गुंजा ।
*
। है आरंभ, नहीं यह अंत ।
। भारत कहते सुर-नर-संत।

*
। मैं भारत हूँ सभी कहें ।
। ऐक्य भाव में सभी बहें ।
*
। एक देश है, नाम एक है ।
। मैं भारत हूँ, नियत नेक है ।
*
सफल साधना कर रहे, सबकी करुणा सींव।।
*
पावन भारत भूमि पर, जन्में खुद भगवान।
प्रभु लीला में सहायक, भारत के इंसान।।
*
मैं भारत हूँ बोलिए, सभी उठाकर शीश।
कर संकल्प बढ़े चलें, हों सहाय जगदीश।।
*
देश एक है; देश का, नाम पुकारें एक।
भारत की जय बोलिए, जनगण मत है नेक।।
*
बच्चा-बच्चा रहा पुकार।
मैं भारत हूँ, सुन सरकार।।
*
चूड़ी पायल की आवाज।
भारत को भारत कह आज।।
हो भारत पर सब को गर्व
भारतवासी हैं हम सर्व।।
*
अंधकार कर नष्ट, उजाला पाने में रत भारत है।
सत-शिव-सुंदर इष्ट, सत्य पथ पर चलता नित भारत है।
जागे शासन और प्रशासन, जनगण- मन का मान रखे-
भाग्य विधाता खुद का खुद ही, सच कहता हूँ भारत है।
*
चंदन से ज्यादा पावन है माटी, इससे तिलक करो।
त्याग-शहादत है परिपाटी, जान लगाकर जीत वरो।
मैं भारत हूँ बोलो; लिखना मेरी माँ भारत माता-
धन्य हुआ पा जन्म यहाँ मैं, नित भारत के गुण गाता।
*
नाम देश का भारत है, भारत की जय बोल।
भारत माता के कानों में, भारत कह रस घोल।।
*
एक नाम हो देश का, जनता की है चाह।
संविधान बदलाव ही, एकमात्र है राह।।
*
सब दल मिलकर एक हों, पारित हो प्रस्ताव।
भारत देश अखंड हो, मिटे सभी अलगाव।।
*

रविवार, 1 अगस्त 2021

मित्र

मित्र दिवस 
*
मित्र न पुस्तक से अधिक,
बेहतर कोई मीत!.
सुख-दुःख में दे-ले 'सलिल',
मन जुड़ते नव रीत.
*
नहीं लौटता कल कभी,
पले मित्रता आज.
थाती बन कल तक पले,
करे ह्रदय पर राज.
*
मौन-शोर की मित्रता, 
अजब न ऐसी अन्य. 
यह आ, वह जा मिल गले 
पालें प्रीत अनन्य.
*
तन-मन की तलवार है, 
मन है तन की ढाल.
एक साथ हर्षित हुए,
होते संग निढाल. 
*
गति-लय अगर न मित्र हों,
जिए किस तरह गीत.
छंद बंध अनिबंध कर,
कहे पले अब प्रीत.
*
सरल शत्रुता साधना,
कठिन निभाना साथ.
उठा, जमा या तोड़ मत 
मित्र! मिला ले हाथ.
*
मैं-तुम हम तो मित्रता,
हम मैं-तुम तो बैर.
आँख फेर मुश्किल बढ़े,
गले मिले तो खैर.
*
मित्र दिवस 
*
मित्र न पुस्तक से अधिक,
बेहतर कोई मीत!.
सुख-दुःख में दे-ले 'सलिल',
मन जुड़ते नव रीत.
*
नहीं लौटता कल कभी,
पले मित्रता आज.
थाती बन कल तक पले,
करे ह्रदय पर राज.
*
मौन-शोर की मित्रता, 
अजब न ऐसी अन्य. 
यह आ, वह जा मिल गले 
पालें प्रीत अनन्य.
*
तन-मन की तलवार है, 
मन है तन की ढाल.
एक साथ हर्षित हुए,
होते संग निढाल. 
*
गति-लय अगर न मित्र हों,
जिए किस तरह गीत.
छंद बंध अनिबंध कर,
कहे पले अब प्रीत.
*
सरल शत्रुता साधना,
कठिन निभाना साथ.
उठा, जमा या तोड़ मत 
मित्र! मिला ले हाथ.
*
मैं-तुम हम तो मित्रता,
हम मैं-तुम तो बैर.
आँख फेर मुश्किल बढ़े,
गले मिले तो खैर.
*
मीनाकारी मिल करें, 
शब्दों की सब मित्र।
बुद्धि विनीता का करो, 
स्वागत छिड़को इत्र।।
*
नहीं कलपना; कल्पना, 
कर दें मिल साकार।
हाथ मित्रता का करें, 
हाथों में स्वीकार।।
*
सदा निरुपमा मित्रता, 
है अमोल उपहार।
दिल हारे दिल जीतकर, 
दिल जीते दिल हार।।
***
संजीव 
९४२५१८३२४४

शनिवार, 31 जुलाई 2021

शिव का माहिया पूजन

शिव का माहिया पूजन
*
भोले को मना लाना,
सावन आया है
गौरी जी संग आना।
*
सब मिल अभिषेक करो
गोरस, मधु, घृत से
नहलाओ प्रभु जी को।
*
ले अभ्रक भस्म गुलाल
भक्ति सहित करिए
शंकर जी का शृंगार।
*
जौ गेहूँ अक्षत दाल
तिल शर्करा सहित
शिव अर्पित करिए माल।
*
ले बिल्व पत्र ताजा
भाँग धतूरा फूल-
फल मिल चढ़ाँय आजा।
*
नागेंद्र रहे फुफकार
मुझको मत भूलो
लो बना गले का हार।
*
नंदी पूजन मत भूल
सुख-समृद्धि दाता
सम्मुख हर लिए त्रिशूल।
*
मद काम क्रोध हैं शूल
कर में पकड़ त्रिशूल
काबू करिए बिन भूल।
*
लेकर रुद्राक्ष सुमाल
जाप नित्य करिए
शुभ-मंगल हो तत्कल।
*
हे कार्तिकेय-गणराज!
ग्रहण कीजिए भोग
मन मंदिर सदा विराज।
*
मन भावन सावन मास
सबके हिया हुलास
भर गौरी-गौरीनाथ।
*
संजीव
९४२५१८३२४४

हास्य रचना: मेरी श्वास-श्वास में कविता

हास्य रचना:
मेरी श्वास-श्वास में कविता
*
मेरी श्वास-श्वास में कविता, छींक-खाँस दूँ तो हो गीत।
युग क्या जाने खर्राटों में, मेरे व्याप्त मधुर संगीत।

पल-पल में कविता कर देता, क्षण-क्षण में मैं लिखूँ निबंध।
मुक्तक-क्षणिका क्षण-क्षण होते, चुटकी बजती काव्य प्रबंध।

रस-लय-छंद-अलंकारों से लेना-देना मुझे नहीं।
बिंब-प्रतीक बिना शब्दों की, नौका खेना मुझे यहीं।

धुंआधार को नाम मिला है, कविता-लेखन की गति से।
शारद भी चकराया करतीं हैं; मेरी अद्भुत मति से।

खुद गणपति भी हार गए, कविता सुन लिख सके नहीं।
खोजे-खोजे अर्थ न पाया, पंक्ति एक बढ़ सके नहीं।

एक साल में इतनी कविता, जितने सर पर बाल नहीं।
लिखने को कागज़ इतना हो, जितनी भू पर खाल नहीं।

वाट्स एप को पूरा भर दूँ, अगर जागकर लिख दूँ रात।
गूगल का स्पेस कम पड़े, मुखपोथी की क्या औकात?

ट्विटर, वाट्स एप, मेसेंजर, मुझे देख डर जाते हैं।
वेदव्यास भी मेरे सम्मुख, फीके से पड़ जाते हैं।

वाल्मीकि भी पानी भरते, मेरी प्रतिभा के आगे।
जगनिक और ईसुरी सम्मुख, जाऊँ तो पानी माँगे।

तुलसी सूर निराला बच्चन, से मेरी कैसी समता?
अब का कवि खद्योत सरीखा, हर मेरे सम्मुख नमता।

किसमें क्षमता है जो मेरी, प्रतिभा का गुणगान करे?
इसीलिये मैं खुद करता हूँ, धन्य वही जो मान करे।

विन्ध्याचल से ज्यादा भारी, अभिनंदन के पत्र हुए।
स्मृति-चिन्ह अमरकंटक सम, जी से प्यारे लगें मुए।

करो न चिता जो व्यय; देकर मान पत्र ले, करूँ कृतार्थ।
लक्ष्य एक अभिनंदित होना, इस युग का मैं ही हूँ पार्थ।
*
७९९९५५९६१८
salil.sanjiv@gmail.com

पंकज परिमल की याद में माहिए

पंकज परिमल की याद में माहिए
*
पंकज परिमल खोकर
नवगीत उदास हुआ
पिंजरे से उड़ा सुआ।
*
जीवट का रहा धनी
थी जिजीविषा अद्भुत
पंकज था धुनी गुनी।
*
नवगीत मिसाल बने
भाषिक-शैल्पिक नव दृष्टि
नव रूपक-बिंब घने।
*
बिन पंकज हो श्रीहीन
करता है याद सलिल
टूटी सावन में बीन।
*
नवगीत सुनेंगे इंद्र
दे शुभाशीष तुमको
होंगे खुश बहुत रवींद्र।
*
अपनी मिसाल तुम आप
छू पाए अन्य नहीं
तव सुयश सका जग व्याप।
*
भावांजलि लिए सलिल
चुप अश्रुपात करता
खो पंकज दिल दुखता
*

मुक्तिका

मुक्तिका:

*
कैसा लगता काल बताओ?
तनिक मौत को गले लगाओ
.
मारा है बहुतों को तड़पा
तड़प-तड़पकर मारे जाओ
.
सलमानों के अरमानों की
चिता आप ही आप जलाओ
.
समय न माफ़ करेगा तुमको
काम देश के अगर न आओ
.
दहशतगर्दों तज बंदूकें
चलो खेत में फसल उगाओ
***


*
याद जिसकी भुलाना मुश्किल है
याद उसको न आना मुश्किल है
.
मौत औरों को देना है आसां
मौत को झेल पाना मुश्किल है
.
खुद को कहता रहा मसीहा जो
उसका इंसान होना मुश्किल है
.
तुमने बोले हैं झूठ सौ-सौ पर
एक सच बोल सकना मुश्किल है
.
अपने अधिकार चाहते हैं सभी
गैर को हक़ दिलाना मुश्किल है
***

हास्य रचना स्वादिष्ट निमंत्रण तुहिना वर्मा 'तुहिन'

हास्य रचना
स्वादिष्ट निमंत्रण
तुहिना वर्मा 'तुहिन'
*
''खट्टे-मिट्ठे जिज्जाजी को चटपटी साली जी यानी आधी घरवाली जी की ताज़ा-ताज़ा गरमागरम मीठी-मीठी नमस्ते।


यह कुरकुरी पाती पाकर आपके मन में पानी - बतासे की तरह मोतीचूर के लड्डू फूटने लगेंगे क्योंकि हम आपको आपकी ससुराल में तशरीफ़ लाने की दावत दे रहे हैं।


मौका? अरे हुजूर मौका तो ऐसा है कि जो आये वो भी पछताए...जो न आये वह भी पछताये क्योंकि आपकी सिर चढ़ी सिरफिरी साली इमरतिया की शादी यानी बर्बादी का जश्न बार-बार तो होगा नहीं।


ये रसमलाई जैसा मिठास भरा रिश्ता पेड़ा शहर, कचौड़ी नगर, के खीरपुर मोहल्ले के मोटे-ताजे सेठ समोसामल मिंगौड़ीलाल के हरे-भरे साहिबजादे, खीरमोहन सिवईं प्रसाद के साथ होना तय हुआ है।


चांदनी चौक में चमचम चाची को चांदी की चमचमाती चम्मच से चिरपिरी चटनी चटाकर चर्चा में आ चुके चालू चाचा अपने आलूबंडे बेटे और भाजीबड़ा बिटिया के साथ चटखारे लेते हुए यहाँ आकर डकार ले रहे हैं।


जलेबी जिज्जी, काजू कक्का, किशमिश काकी, बादाम बुआ, फुल्की फूफी, छुहारा फूफा, चिरौंजी चाची, चिलगोजा चाचा, मखाना मौसा, मुसम्बी मौसी, दहीबड़ा दादा, दाल-भात दादी, आज गुलाब जामुन-मैसूरपाग एक्सप्रेस से आइसक्रीम खाते हुए, अखरोटगंज स्टेशन पर उतरेंगे.


रसमलाई धरमशाला में संदेश बैंड, बर्फी आर्केस्ट्रा, सिवईया बानो की कव्वाली, बूंदी बेगम का मुजरा, आपको दिल थामकर आहें भरने पर मजबूर कर देगा.


शरबती बी के बदबख्त हाथों से विजया भवानी यानी भांग का भोग लगाकर आप पोंगा पंडित की तरह अंगुलियाँ चाटते हुए कार्टून या जोकर नजर आयेंगे. पत्थर हज़म हजम हाजमा चूर्ण, मुंह जलाऊ मुनक्का बाटी के साथ मीठे मसालेवाला पान और नशीला पानबहार लिये आपके इन्तेज़ार में आपकी नाक में दम करनेवाली रस की प्याली

-- रबडी मलाई
***
हास्य सलिला:
संजीव
*
लालू जी बाजार गये, उस दिन लाली के साथ
पल भर भी छोड़ा नहीं, लिये हाथ में हाथ
दोस्त साथ था हुआ चमत्कृत बोला: 'भैया! खूब
दिन भर भउजी के ख्याल में कैसे रहते डूब?
इतनी रहती फ़िक्र, न छोड़ा पल भर को भी हाथ'
लालू बोले: ''गलत न समझो, झुक जाएगा माथ
ज्यों छोडूँगा हाथ, तुरत ही आ जाएगी आफत
बिना बात क्यों कहो बुलाऊँ खुद ही अपनी शामत?
ज्यों छूटेगा हाथ खरीदी कर लेगी यह खूब
चुका न पाऊँ इतने कर्जे में जाऊँगा डूब''
***
३१-७-२०१५

शुक्रवार, 30 जुलाई 2021

शिव दोहा, मैं भारत हूँ

शिव का माहिया पूजन
*
भोले को मना लाना,
सावन आया है
गौरी जी संग आना।
*
सब मिल अभिषेक करो
गोरस, मधु, घृत से
नहलाओ प्रभु जी को।
*
ले अभ्रक भस्म गुलाल
भक्ति सहित करिए
शंकर जी का शृंगार।
*
जौ गेहूँ अक्षत दाल 
तिल शर्करा सहित
शिव अर्पित करिए माल।
*
ले बिल्व पत्र ताजा
भाँग धतूरा फूल-
फल मिल चढ़ाँय आजा।
*
नागेंद्र रहे फुफकार
मुझको मत भूलो
लो बना गले का हार।
*
नंदी पूजन मत भूल 
सुख-समृद्धि दाता
सम्मुख हर लिए त्रिशूल।
*
मद काम क्रोध हैं शूल
कर में पकड़ त्रिशूल 
काबू करिए बिन भूल।
*
लेकर रुद्राक्ष सुमाल
जाप नित्य करिए 
शुभ-मंगल हो तत्कल।
*
हे कार्तिकेय-गणराज!
ग्रहण कीजिए भोग
मन मंदिर सदा विराज।
*
मन भावन सावन मास
सबके हिया हुलास
भर गौरी-गौरीनाथ।
***
संजीव 
९४२५१८३२४४
‐---------------------
हर मुख शोभित मास्क कह रहा मैं भारत हूँ।
देश-प्रगति का टास्क कह रहा मैं भारत हूँ।।
मत अतीत को कोसो, उससे सबक सीख लो-
मोर करो कम आस्क, कहो तब मैं भारत हूँ।।
***
शिव पर दोहे
*
शंभु नाथ हैं जगत के, रूप सुदर्शन दिव्य।
तेज प्रताप सुविदित है, शंकर छवि है भव्य।।
*
अंबर तक यश व्यापता, जग पूजित नागेंद्र। 
प्रिया भवानी शिवानी, शीश सजे तारेंद्र।।
*
शिवाधार पा सलिल है, धन्य गंग बन तात।
करे जीव संजीव दे, मुक्ति सत्य विख्यात।।
*
सत्-शिव-सुंदर सृजनकर, अहंकार तज नित्य।
मैं मेरा से मुक्त हो, बहता पवन अनित्य। ।
*
शंका-अरि शंकारि शिव, हैं शुभ में विश्वास। 
श्रद्धा हैं मैया उमा, सुत गणपति हैं श्वास।।
*
कार्तिकेय संकल्प हैं, नंदी है श्रम मूर्त।
मूषक मति चातुर्य है, सर्प गरल स्फूर्त। ।
*
रुद्र अक्ष सह भस्म मिल, करे काम निष्काम।
काम क्रोध मद शूल त्रय, सिंह विक्रम बलधाम।।
*
संजीव 
९५२५१८३२४४
----------------------
वंदे भारत भारती! कहता जगकर भोर।
उषा किरण ला परिंदे, मचा रहे हैं शोर।।
मचा रहे हैं शोर, थक गया अरुणचूर भी।
जागा नहीं मनुष्य, मोह में रहा चूर ही।।
दिन कर दिनकर दुखी, देख मानव के धंधे।
दुपहर संझा रात, परेशां नेक न बंदे।।
*
संजीव 
९४२५१८३२४४
----------------------
। मैं भारत हूँ बोलिए । 
। ऐक्य भावना घोलिए।
*
  । मैं भारत, मैं भारतवासी ।
। हर दिन होली, रात दिवाली।
*
  । पीहू पोंगल बैसाखी ।
  । गुड़ीपाड़वा संक्रांति ।
। मैं भारत हूँ, नदियाँ मेरी ।
। जय गुंजातीं सदियाँ मेरी ।
*
। मेरा हर दिन मेहनत पर्व।
   ।हूँ भारतवासी, है गर्व ।
*
। भारत होली-दीवाली ।
। ऊषा-संध्या रसवाली ।
। गेहूँ-मक्के की बाली ।
। चैया की प्याली थाली ।
*
। मुझको भारत बोले दुनिया ।
   । मैया पप्पा मुन्नू मुनिया । 
*
 । था, हूँ सदा रहूँगा भारत ।
। सब मिल बोलो मैं हूँ भारत। 
*
। रसगुल्ला इडली दोसा ।
। छोला अरु लिट्टी चोखा ।
। पोहा दूध-जलेबी खा ।
। मैं भारत हूँ मिल गुंजा ।
*
 । है आरंभ, नहीं यह अंत ।
। भारत कहते सुर-नर-संत।
*
। मैं भारत हूँ सभी कहें ।
। ऐक्य भाव में सभी बहें ।
*
। एक देश है, नाम एक है ।
। मैं भारत  हूँ, नियत नेक है ।
***
शिव पर दोहे
*
शिव सत हैं; रहते सदा, असत-अशुचि से दूर।
आत्मलीन परमात्म हैं, मोहमुक्त तमचूर।।
*
शिव सोकर भी जागते, भव से दूर-अदूर।
उन्मीलित श्यामल नयन, करुणा से भरपूर।।
*
शिव में राग-विराग है, शिव हैं क्रूर-अक्रूर।
भक्त विहँस अवलोकते, शिव का अद्भुत नूर।।
*
शिव शव का सच जानते, करते नहीं गुरूर।
काम वाम जा दग्ध हो, चढ़ता नहीं सुरूर।।
*
शिव न योग या भोग को, त्याग हुए मगरूर ।
सती सतासत पंथ चल, गहतीं सत्य जरूर।।
*
शिव से शिवा न भिन्न हैं, भेद करे जो सूर।
शिवा न शिव से खिन्न हैं, विरह नहीं मंजूर।।
*
शिव शंका के शत्रु हैं, सकल लोक मशहूर।
शिव-प्रति श्रद्धा हैं शिवा, ऐच्छिक कब मजबूर।।
*
शिव का चिर विश्वास हैं, शिवा भक्ति का पूर।
निराकार साकार हो, तज दें अहं हुजूर।।
*
शिव की नवधा भक्ति कर, तन-मन-धन है धूर।
नेह नर्मदा सलिल बन, हो संजीव मजूर।।
***
आचार्य संजीव वर्मा "सलिल": 
। देश हमारा भारत है ।
। इसे सदा भारत कहें।
*
। एक देश एक नाम। 
। अपना भारत महान।
*
। जन जन का यह नारा है ।
।। भारत नाम  हमारा है ।।
*
। ज़र्रे ज़र्रे की हुंकार । 
। मुझको है भारत से प्यार।
*
है प्रकाश पाने में जो रत ।
। नाम इसी देश का भारत ।
*
। कल से कल को आज जोड़ता ।
    । भारत देश न सत्य छोड़ता ।
*
। भारत माता की संतान ।
। भारत नाम हमारी आन ।
*
। हिमगिरि से सागर तक देश ।
  । भारत महिमावान विशेष ।
*
। ध्वजा तिरंगी अपनी आन ।
। भारत नाम हमारी शान ।
*
। सिंधु नर्मदा गंगा कृष्णा ।
। भारत प्यारा रंग-बिरंगा ।
*
। जनगण-मन की यही पुकार ।
    । भारत बोले सब संसार ।
***

शिव पर दोहे

शिव पर दोहे
*
शिव सत हैं; रहते सदा, असत-अशुचि से दूर।
आत्मलीन परमात्म हैं, मोहमुक्त तमचूर।।
*
शिव सोकर भी जागते, भव से दूर-अदूर।
उन्मीलित श्यामल नयन, करुणा से भरपूर।।
*
शिव में राग-विराग है, शिव हैं क्रूर-अक्रूर।
भक्त विहँस अवलोकते, शिव का अद्भुत नूर।।
*
शिव शव का सच जानते, करते नहीं गुरूर।
काम वाम जा दग्ध हो, चढ़ता नहीं सुरूर।।
*
शिव न योग या भोग को, त्याग हुए मगरूर ।
सती सतासत पंथ चल, गहतीं सत्य जरूर।।
*
शिव से शिवा न भिन्न हैं, भेद करे जो सूर।
शिवा न शिव से खिन्न हैं, विरह नहीं मंजूर।।
*
शिव शंका के शत्रु हैं, सकल लोक मशहूर।
शिव-प्रति श्रद्धा हैं शिवा, ऐच्छिक कब मजबूर।।
*
शिव का चिर विश्वास हैं, शिवा भक्ति का पूर।
निराकार साकार हो, तज दें अहं हुजूर।।
*
शिव की नवधा भक्ति कर, तन-मन-धन है धूर।
नेह नर्मदा सलिल बन, हो संजीव मजूर।।
***
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२९.७.२०१८, ७९९९५५९६१८

मुक्तक, द्विपदी

कोशिशें करती रहो, बात बन ही जायेगी
जिन्दगी आज नहीं, कल तो मुस्कुरायेगी
हारते जो नहीं गिरने से, वो ही चल पाते-
मंजिलें आज नहीं कल तो रास आयेंगी.
*

द्विपदी:

जात मजहब धर्म बोली, चाँद अपनी कह जरा
पुज रहा तू ईद में भी, संग करवा चौथ के.
*
चाँद का इन्तिजार करती रही, चाँदनी ने 'सलिल' गिला न किया.
तोड़्ती है समाधि शिव की नहीं, शिवा ने मौन रह सहयोग दिया.
*
चाँद तनहा है ईद हो कैसे? चाँदनी उसकी मीत हो कैसे??
मेघ छाये घने दहेजों के, रेप पर उसकी जीत हो कैसे??
*

गले मिले दोहा यमक

गले मिले दोहा यमक
*
चल बे घर बेघर नहीं, जो भटके बिन काज
बहुत हुई कविताई अब, कलम घिसे किस व्याज?
*
पटना वाली से कहा, 'पट ना' खाई मार
चित आए पट ना पड़े, अब की सिक्का यार
*
धरती पर धरती नहीं, चींटी सिर का भार
सोचे "धर दूँ तो धरा, कैसे सके सँभार?"
*
घटना घट ना सब कहें, अघट न घटना रीत
घट-घटवासी चकित लख, क्यों मनु करे अनीत?
*
सिरा न पाये फ़िक्र हम, सिरा न आया हाथ
पटक रहे बेफिक्र हो, पत्थर पर चुप माथ
*
बेसिर-दानव शक मुआ, हरता मन का चैन
मनका ले विश्वास का, सो ले सारी रैन
*
करता कुछ करता नहीं, भरता भरता दंड
हरता हरता शांति सुख, धरता धरता खंड
*
बजा रहे करताल पर, दे न सके कर ताल
गिनते हैं कर माल फिर, पहनाते कर माल
*
जल्दी से आ भार ले, व्यक्त करूँ आभार
असह्य लगे जो भार दें, हटा तुरत साभार
*
हँस सहते हम दर्द जब, देते हैं हमदर्द
अपना पन कर रहा है सब अपनापन सर्द
*
भोग लगाकर कर रहे, पंडित जी आराम
नहीं राम से पूछते, "ग्रहण करें आ राम!"
*****
एक दोहा:
नेह वॄष्टि नभ ने करी, धरा गयी हँस भींज
हरियायी भू लाज से, 'सलिल' मन गयी तीज
***

नवगीत

नवगीत 
*
मेघ न बरसे
बरस रही हैं
आहत जनगण-मन की चाहत।
नहीं सुन रहीं
गूँगी-बहरी
सरकारें, क्या देंगी राहत?
*
जनप्रतिनिधि ही
जन-हित की
नीलामी करते, शर्म न आती।
सत्ता खातिर
शकुनि-सुयोधन
की चालें ही मन को भातीं।
द्रोणाचार्य
बेचते शिक्षा
व्यापम के सिरमौर बने हैं।
नाम नहीं
लिख पाते टॉपर
मेघ विपद के बहुत घने हैं।
कदम-कदम पर
शिक्षालय ही
रेप कर रहे हैं शिक्षा का।
रावण के रथ
बैठ सियासत
राम-लखन पर ढाती आफत।
*
लोकतन्त्र की
डुबा झोपड़ी
लोभतन्त्र नभ से जा देखे।
शोकतंत्र निज
बहुमत क्रय कर
भोगतंत्र की जय-जय लेखे।
कोकतंत्र नित
जीता शैशव
आश्रम रथ्यागार बन गए।
जन है दुखी
व्यथित है गण
बेमजा प्रजा को शासन शामत।
*
हँसिया
गर्दन लगा काटने,
हाथी ने बगिया रौंदी रे!
चक्र गला
जनता का काटे,
पंजे ने कबरें खोदी रे!
लालटेन से
जली झुपड़िया
कमल चुभाता पल-पल काँटे।
सेठ-हितू हैं
अफसर नेता
अँधा न्याय ढा रहा आफत।
*
३०-७-२०१६

बुधवार, 28 जुलाई 2021

घनाक्षरी

घनाक्षरी परिचय 
घनाक्षरी के ९ प्रकार होते हैं;
१. मनहर: कुल वर्ण संख्या ३१. समान पदभार, समतुकांत, पदांत गुरु अथवा लघु-गुरु, चार चरण ८-८-८-७ वर्ण।
२. जनहरण: कुल वर्ण संख्या ३१. समान पदभार, समतुकांत, पदांत गुरु शेष सब वर्ण लघु।
३. कलाधर: कुल वर्ण संख्या ३१. समान पदभार, समतुकांत, पदांत लघु-गुरु, चार चरण ८-८-८-७ वर्ण ।
४. रूप: कुल वर्ण संख्या ३२. समान पदभार, समतुकांत, पदांत गुरु-लघु, चार चरण ८-८-८-८ वर्ण।
५. जलहरण: कुल वर्ण संख्या ३२. समान पदभार, समतुकांत, पदांत लघु-लघु, चार चरण ८-८-८-८ वर्ण।
६. डमरू: कुल वर्ण संख्या ३२. समान पदभार, समतुकांत, पदांत बंधन नहीं, चार चरण ८-८-८-८ लघु वर्ण।
७. कृपाण: कुल वर्ण संख्या ३२. समान पदभार, समतुकांत, पदांत गुरु-लघु, चार चरण, प्रथम ३ चरणों में समान अंतर तुकांतता, ८-८-८-८ वर्ण।
८. विजया: कुल वर्ण संख्या ३२. समान पदभार, समतुकांत, पदांत लघु-गुरु, चार चरण ८-८-८-८ वर्ण।
९. देव: कुल वर्ण संख्या ३३. समान पदभार, समतुकांत, पदांत ३ लघु-गुरु, चार चरण ८-८-८-९ वर्ण।
वंदना
गायत्री सावित्री मैया!. धूप-छाँव सुख दाता, निश-दिन भजता है, जो वांछित फल पाता। 
शारद-रमा-उमा हे!,  हम सब संतानें हैं, निज मन जो भाता है, वह हर कवि गाता।।
बुद्धिप्रदाता मैया का, वर छंद भाव रस, मुक्तक गीत भजन, जनगण-मन भाता।
सदय रहो हे मैया!, सब भव-बाधा हर, सत-शिव-सुंदर हों, रचनाएँ सुखदाता।।   
(नव घनाक्षरी - बत्तीस वार्णिक, ८-८-८-८ पर यति, पदांत यगण) 
*
आठ-आठ-आठ-सात, पर यति रखकर, मनहर घनाक्षरी, छन्द कवि रचिए.
लघु-गुरु रखकर, चरण के आखिर में, 'सलिल'-प्रवाह-गति, वेग भी परखिए..
अश्व-पदचाप सम, मेघ-जलधार सम, गति अवरोध न हो, यह भी निरखिए.
करतल ध्वनि कर, प्रमुदित श्रोतागण- 'एक बार और' कहें, सुनिए-हरषिए..
(मनहरण)
*
चाहते रहे जो हम / अन्य सब करें वही / हँस तजें जो भी चाह / उनके दिलों में रही
मोह वासना है यह / परार्थ साधना नहीं / नेत्र हैं मगर मुँदे / अग्नि इसलिए दही
मुक्त हैं मगर बँधे / कंठ हैं मगर रुँधे / पग बढ़े मगर रुके / सर उठे मगर झुके
जिद्द हमने ठान ली / जीत मन ने मान ली / हार छिपी देखकर / येन-केन जय गही
(विजया)
*
फूँकता कवित्त प्राण, डाल मुरदों में जान, दीप बाल अंधकार, ज़िन्दगी का हरता।
नर्मदा निनाद सुनो,सच की ही राह चुनो, जीतता सुधीर वीर, पीर पीर सहता।।
'सलिल'-प्रवाह पैठ, आगे बढ़ नहीं बैठ, सागर है दूर पूर, दूरी हो निकटता।
आना-जाना खाली हाथ, कौन कभी देता साथ, हो अनाथ भी सनाथ, प्रभु दे निकटता।।
(कलाधर)
*
गीत-ग़ज़ल गाइये / डूबकर सुनाइए / त्रुटि नहीं छिपाइये / सीखिये-सिखाइए
शिल्प-नियम सीखिए / कथ्य समझ रीझिए / भाव भरे शब्द चुन / लय भी बनाइए
बिम्ब नव सजाइये / प्रतीक भी लगाइये / अलंकार कुछ नये / प्रेम से सजाइए
वचन-लिंग, क्रिया रूप / दोष न हों देखकर / आप गुनगुनाइए / वाह-वाह पाइए
(कलाधर)
*
कौन किसका है सगा? / किसने ना दिया दगा? / फिर भी प्रेम से पगा / जग हमें दुलारता
जो चला वही गिरा / उठ हँसा पुन: बढ़ा / आदि-अंत सादि-सांत / कौन छिप पुकारता?
रात बनी प्रात नित / प्रात बने रात फिर / दोपहर कथा कहे / साँझ नभ निहारता
काल-चक्र कब रुका? / सत्य कहो कब झुका? /मेहनती नहीं चुका / धरांगन बुहारता
(विजया)
*
न चाहतें, न राहतें / न फैसले, न फासले / दर्द-हर्ष मिल सहें / साथ-साथ हाथ हों
न मित्रता, न शत्रुता / न वायदे, न कायदे / कर्म-धर्म नित करें / उठे हुए माथ हों
न दायरे, न दूरियाँ / रहें न मजबूरियाँ / फूल-शूल, धूप-छाँव / नेह नर्मदा बनें
गिर-उठें, बढ़े चलें / काल से विहँस लड़ें / दंभ-द्वेष-छल मिटें / कोशिशें कथा बुनें
(कलाधर)
*
चाहते रहे जो हम / अन्य सब करें वही / हँस तजें जो भी चाह / उनके दिलों में रही
मोह वासना है यह / परार्थ साधना नहीं / नेत्र हैं मगर मुँदे / अग्नि इसलिए दही
मुक्त हैं मगर बँधे / कंठ हैं मगर रुँधे / पग बढ़े मगर रुके / सर उठे मगर झुके
जिद्द हमने ठान ली / जीत मन ने मान ली / हार छिपी देखकर / येन-केन जय गही
(विजया)
*
   
सावन में झूम-झूम, डालों से लूम-लूम, झूला झूल दुःख भूल, हँसिए हँसाइये.
एक दूसरे की बाँह, गहें बँधें रहे चाह, एक दूसरे को चाह, कजरी सुनाइये..
दिल में रहे न दाह, तन्नक पले न डाह, मन में भरे उछाह, पेंग को बढ़ाइए.
राखी की है साखी यही, पले प्रेम-पाखी यहीं, भाई-भगिनी का नाता, जन्म भर निभाइए..
(विजया घनाक्षरी)
*
संकट में लाज थी, गिरी सिर पे गाज थी, शत्रु-दृष्टि बाज थी, नैया कैसे पार हो?
करनावती महारानी, पूजतीं माता भवानी, शत्रु है बली बहुत, देश की न हार हो..
राखी हुमायूँ को भेजी, बादशाह ने सहेजी, बहिन की पत राखी, नेह का करार हो.
शत्रु को खदेड़ दिया, बहिना को मान दिया, नेह का जलाया दिया, भेंट स्वीकार हो..
(कलाधर)
*
महाबली बलि को था, गर्व हुआ संपदा का, तीन लोक में नहीं है, मुझ सा कोई धनी.
मनमानी करूँ भी तो, रोक सकता न कोई, हूँ सुरेश से अधिक, शक्तिवान औ' गुनी..
महायज्ञ कर दिया, कीर्ति यश बल लिया, हरि को दे तीन पग, धरा मौन था गुनी.
सभी कुछ छिन गया, मुख न मलिन हुआ, हरि की शरण गया, सेवा व्रत ले धुनी..
(कलाधर)
*
बाधा दनु-गुरु बने, विपद मेघ थे घने, एक नेत्र गँवा भगे, थी व्यथा अनसुनी.
रक्षा सूत्र बाँधे बलि, हरि से अभय मिली, हृदय की कली खिली, पटकथा यूँ बनी..
विप्र जब द्वार आये, राखी बांध मान पाये, शुभाशीष बरसाये, फिर न हो ठनाठनी.
कोई किसी से न लड़े, हाथ रहें मिले-जुड़े, साथ-साथ हों खड़े, राखी मने सावनी..
(कलाधर
*
बागी थे हों अनुरागी, विरागी थे हों सुहागी, कोई भी न हो अभागी, दैव से मनाइए.
सभी के माथे हो टीका, किसी का न पर्व फीका, बहनों का नेह नीका, राखी-गीत गाइए..
कलाई रहे न सूनी, राखी बाँध शोभा दूनी, आरती की ज्वाल धूनी, अशुभ मिटाइए.
मीठा खाएँ मीठा बोलें, जीवन में रस घोलें, बहना के पाँव छूलें, शुभाशीष पाइए..
(कलाधर)
*
बंधन न रास आये, बँधना न मन भाये, स्वतंत्रता ही सुहाये, सहज स्वभाव है.
निर्बंध अगर रहें, मर्याद को न गहें, कोई किसी को न सहें, चैन का अभाव है..
मना राखी नेह पर्व, करिए नातों पे गर्व, निभायें संबंध सर्व, नेह का निभाव है.
बंधन जो प्रेम का हो, कुशल का क्षेम का हो, धरम का नेम हो, 'सलिल' सत्प्रभाव है..
(कलाधर)
*
कल :
कज्जल के कूट पर दीप शिखा सोती है कि, श्याम घन मंडल मे दामिनी की धारा है ।
भामिनी के अंक में कलाधर की कोर है कि, राहु के कबंध पै कराल केतु तारा है ।
शंकर कसौटी पर कंचन की लीक है कि, तेज ने तिमिर के हिये मे तीर मारा है ।
काली पाटियों के बीच मोहनी की माँग है कि, ढ़ाल पर खाँड़ा कामदेव का दुधारा है ।
काले केशों के बीच सुन्दरी की माँग की शोभा का वर्णन करते हुए कवि ने ८ उपमाएँ दी हैं.-
१. काजल के पर्वत पर दीपक की बाती.
२. काले मेघों में बिजली की चमक.
३. नारी की गोद में बाल-चन्द्र.
४. राहु के काँधे पर केतु तारा.
५. कसौटी के पत्थर पर सोने की रेखा.
६. काले बालों के बीच मन को मोहने वाली स्त्री की माँग.
७. अँधेरे के कलेजे में उजाले का तीर.
८. ढाल पर कामदेव की दो धारवाली तलवार.
कबंध=धड़. राहु काला है और केतु तारा स्वर्णिम, कसौटी के काले पत्थर पर रेखा खींचकर सोने को पहचाना जाता है. ढाल पर खाँडे की चमकती धार. यह सब केश-राशि के बीच माँग की दमकती रेखा का वर्णन है

विमर्श, जात, कायस्थ

विमर्श  -
'जात' क्रिया (जना/जाया=जन्म दिया, जाया=जगजननी का एक नाम) से आशय 'जन्मना' होता है, जन्म देने की क्रिया को 'जातक कर्म', जन्म लिये बच्चे को 'जातक', जन्म देनेवाली को 'जच्चा' कह्ते हैं। जन्मे बच्चे के गुण-अवगुण उसकी जाति निर्धारित करते हैं. बुद्ध की जातक कथाओं में विविध योनियों में जन्म लिये बुद्ध के ईश्वरत्व की चर्चा है। जाति जन्मना नहीं कर्मणा होती है. जब कोई सज्जन दिखनेवाला व्यक्ति कुछ निम्न हर्कात कर दे तो बुंदेली में एक लोकोक्ति कही जाती है- 'जात दिखा गया'. यहाँ भी जात का अर्थ उसकी असलियत या सच्चाई से है। सामान्यतः समान जाति का अर्थ समान गुणों, योग्यता या अभिरुचि से है। 

आप ही नहीं हर जीव कायस्थ है।  पुराणकार के अनुसार "कायास्थितः सः कायस्थः"

अर्थात वह (निराकार परम्ब्रम्ह) जब किसी काया का निर्माण कर अपने अन्शरूप (आत्मा) से उसमें स्थित होता है, तब कायस्थ कहा जाता है।  व्यावहारिक अर्थ में जो इस सत्य को जानते-मानते हैं वे खुद को कायस्थ कहने लगे, शेष कायस्थ होते हुए भी खुद को अन्य जाति का कहते रहे।दुर्भाग्य से लंबे आपदा काल में कायस्थ भी इस सच को भूल गये या आचरण में नहीं ला सके। कंकर-कंकर में शंकर, कण-कण में भगवान, आत्मा सो परमात्मा आदि इसी सत्य की घोषणा करते हैं। 

जातिवाद का वास्तविक अर्थ अपने गुणों-ग्यान आदि अन्यों को सिखाना है ताकि वह भी समान योग्यता या जाति का हो सके। 
***

समीक्षा, अवनीश त्रिपाठी, नवगीत

कृति समीक्षा :
'दिन कटे हैं धूप चुनते' हौसले ले स्वप्न बुनते
समीक्षाकार : आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
[कृति विवरण : दिन कटे हैं धूप चुनते, नवगीत संग्रह, अवनीश त्रिपाठी, प्रथम संस्करण २०१९, आईएसबीएन ९७८९३८८९४६२१६, आकार २२ से.मी. X १४ से.मी., आवरण सजिल्द बहुरंगी, जैकेट सहित, बेस्ट बुक बडीज टेक्नोलॉजीस प्रा. लि. नई दिल्ली, कृतिकार संपर्क - ग्राम गरएं, जनपद सुल्तानपुर २२७३०४, चलभाष ९४५१५५४२४३, ईमेल tripathiawanish9@gmail.com]
*
धरती के
मटमैलेपन में
इंद्रधनुष बोने से पहले,
मौसम के अनुशासन की
परिभाषा का विश्लेषण कर लो।
साहित्य की जमीन में गीत की फसल उगाने से पहले देश, काल, परिस्थितियों और मानवीय आकांक्षाओं-अपेक्षाओं के विश्लेषण का आव्हान करती उक्त पंक्तियाँ गीत और नवगीत के परिप्रेक्ष्य में पूर्णत: सार्थक हैं। तथाकथित प्रगतिवाद की आड़ में उत्सवधर्मी गीत को रुदन का पर्याय बनाने की कोशिश करनेवालों को यथार्थ का दर्पण दिखाते नवगीत संग्रह "दिन कटे हैं धूप चुनते" में नवोदित नवगीतकार अवनीश त्रिपाठी ने गीत के उत्स "रस" को पंक्ति-पंक्ति में उँड़ेला है। मौलिक उद्भावनाएँ, अनूठे बिम्ब, नव रूपक, संयमित-संतुलित भावाभिव्यक्ति और लयमय अभिव्यक्ति का पंचामृती काव्य-प्रसाद पाकर पाठक खुद को धन्य अनुभव करता है।
स्वर्ग निरंतर
उत्सव में है
मृत्युलोक का चित्र गढ़ो जब,
वर्तमान की कूची पकड़े
आशा का अन्वेषण कर लो।
मिट्टी के संशय को समझो
ग्रंथों के पन्ने तो खोलो,
तर्कशास्त्र के सूत्रों पर भी
सोचो-समझो कुछ तो बोलो।
हठधर्मी सूरज के
सम्मुख
फिर तद्भव की पृष्ठभूमि में
जीवन की प्रत्याशावाले
तत्सम का पारेषण कर लो।
मानव की सनातन भावनाओं और कामनाओं का सहयात्री गीत-नवगीत केवल करुणा तक सिमट कर कैसे जी सकता है? मनुष्य के अरमानों, हौसलों और कोशिशों का उद्गम और परिणिति डरे, दुःख, पीड़ा, शोक में होना सुनिश्चित हो तो कुछ करने की जरूरत ही कहाँ रह जाती है? गीतकार अवनीश 'स्वर्ग निरंतर उत्सव में है' कहते हुए यह इंगित करते हैं कि गीत-नवगीत को उत्सव से जोड़कर ही रचनाकार संतुष्टि और सार्थकता के स्वर्ग की अनुभूति कर सकता है।
नवगीत के अतीत और आरंभिक मान्यताओं का प्रशस्तिगान करते विचारधारा विशेष के प्रति प्रतिबद्ध गीतकार जब नवता को विचार के पिंजरे में कैद कर देते हैं तो "झूमती / डाली लता की / महमहाई रात भर" जैसी जीवंत अनुभूतियाँ और अभिव्यक्तियाँ गीत से दूर हो जाती हैं और गीत 'रुदाली' या 'स्यापा' बनकर जिजीविषा की जयकार करने का अवसर न पाकर निष्प्राण हो जाता है। अवनीश ने अपने नवगीतों में 'रस' को मूर्तिमंत किया है-
गुदगुदाकर
मंजरी को
खुश्बूई लम्हे खिले,
पंखुरी के
पास आई
गंध ले शिकवे-गिले,
नेह में
गुलदाउदी
रह-रह नहाई रात भर।
कवि अपनी भाव सृष्टि का ब्रम्हा होता है। वह अपनी दृष्टि से सृष्टि को निरखता-परखता और मूल्यांकित करता है। "ठहरी शब्द-नदी" उसे नहीं रुचती। गीत को वैचारिक पिंजरे में कैद कर उसके पर कुतरने के पक्षधरों पर शब्दाघात करता कवि कहता है-
"चुप्पी साधे पड़े हुए हैं
कितने ही प्रतिमान यहाँ
अर्थ हीन हो चुकी समीक्षा
सोई चादर तान यहाँ
कवि के मंतव्य को और अधिक स्पष्ट करती हैं निम्न पंक्तियाँ-
अक्षर-अक्षर आयातित हैं
स्वर के पाँव नहीं उठते हैं
छलते संधि-समास पीर में
रस के गाँव नहीं जुटते हैं।
अलंकार ले
चलती कविता
सर से पाँव लदी।
अलंकार और श्रृंगार के बिना केवल करुणा एकांगी है। अवनीश एकांगी परिदृश्य का सम्यक आकलन करते हैं -
सौंपकर
थोथे मुखौटे
और कोरी वेदना,
वस्त्र के झीने झरोखे
टाँकती अवहेलना,
दुःख हुए संतृप्त लेकिन
सुख रहे हर रोज घुनते।
सुख को जीते हुए दुखों के काल्पनिक और मिथ्या नवगीत लिखने के प्रवृत्ति को इंगित कर कवि कहता है-
भूख बैठी प्यास की लेकर व्यथा
क्या सुनाये सत्य की झूठी कथा
किस सनातन सत्य से संवाद हो
क्लीवता के कर्म पर परिवाद हो
और
चुप्पियों ने मर्म सारा
लिख दिया जब चिट्ठियों में,
अक्षरों को याद आए
शक्ति के संचार की
अवनीश के नवगीतों की कहन सहज-सरल और सरस होने के निकष पर सौ टका खरी है। वे गंभीर बात भी इस तरह कहते हैं कि वह बोझ न लगे -
क्यों जगाकर
दर्द के अहसास को
मन अचानक मौन होना चाहता है?
पूर्वाग्रहियों के ज्ञान को नवगीत की रसवंती नदी में काल्पनिक अभावों और संघर्षों से रक्त रंजीत हाथ दोने को तत्पर देखकर वे सजग करते हुए कहते हैं-
फिर हठीला
ज्ञान रसवंती नदी में
रक्त रंजित हाथ धोना चाहता है।
नवगीत की चौपाल के वर्तमान परिदृश्य पर टिप्पणी करते हुए वे व्यंजना के सहारे अपनी बात सामने रखते हुए कहते हैं कि साखी, सबद, रमैनी का अवमूल्यन हुआ है और तीसमारखाँ मंचों पर तीर चला कर अपनी भले ही खुद ठोंके पर कथ्य और भाव ओके नानी याद आ रही है-
रामचरित की
कथा पुरानी
काट रही है कन्नी
साखी-शबद
रमैनी की भी
कीमत हुई अठन्नी
तीसमारखाँ
मंचों पर अब
अपना तीर चलाएँ ,
कथ्य-भाव की हिम्मत छूटी
याद आ गई नानी।
और
आज तलक
साहित्य जिन्होंने
अभी नहीं देखा है,
उनके हाथों
पर उगती अब
कविताओं की रेखा।
नवगीत को दलितों की बपौती बनाने को तत्पर मठधीश दुहाई देते फिर रहे हैं कि नवगीत में छंद और लय की अपेक्षा दर्द और पीड़ा का महत्व अधिक है। शिल्पगत त्रुटियों, लय भंग अथवा छांदस त्रुटियों को छंदमुक्ति के नाम पर क्षम्य ही नहीं अनुकरणीय कहनेवालों को अवनीश उत्तर देते हैं-
मात्रापतन
आदि दोषों के
साहित्यिक कायल हैं
इनके नव प्रयोग से सहमीं
कवितायेँ घायल हैं
गले फाड़ना
फूहड़ बातें
और बुराई करना,
इन सब रोगों से पीड़ित हैं
नहीं दूसरा सानी।
'दिन कटे हैं धूप चुनते' का कवि केवल विसंगतियों अथवा भाषिक अनाचार के पक्षधरताओं को कटघरे में नहीं खड़ा करता अपितु क्या किया जाना चाहिए इसे भी इंगित करता है। संग्रह के भूमिकाकार मधुकर अष्ठाना भूमिका में लिखते हैं "कविता का उद्देश्य समाज के सम्मुख उसकी वास्तविकता प्रकट करना है, समस्या का यथार्थ रूप रखना है। समाधान खोजना तो समाज का ही कार्य है।' वे यह नहीं बताते कि जब समाज अपने एक अंग गीतकार के माध्यम से समस्या को उठता है तो वही समाज उसी गीतकार के माध्यम से समाधान क्यों नहीं बता सकता? समाधान, उपलब्धु, संतोष या सुख के आते ही सृजन और सृजनकार को नवगीत और नवगीतकारों के बिरादरी के बाहर कैसे खड़ा किया जा सकता है? अपनी विचारधारा से असहमत होनेवालों को 'जातबाहर' करने का धिकार किसने-किसे-कब दिया? विवाद में न पड़ते हुए अवनीश समाधान इंगित करते हैं-
स्वप्नों की
समिधायें लेकर
मन्त्र पढ़ें कुछ वैदिक,
अभिशापित नैतिकता के घर
आओ, हवं करें।
शमित सूर्य को
बोझल तर्पण
ायासित संबोधन,
आवेशित
कुछ घनी चुप्पियाँ
निरानंद आवाहन।
निराकार
साकार व्यवस्थित
ईश्वर का अन्वेषण,
अंतरिक्ष के पृष्ठों पर भी
क्षितिज चयन करें।
अपनी बात को और अधिक स्पष्ट करते हुए नवगीतकार कहता है-
त्रुटियों का
विश्लेषण करतीं
आहत मनोव्यथाएँ
अर्थहीन वाचन की पद्धति
चिंतन-मनन करें।
और
संस्कृत-सूक्ति
विवेचन-दर्शन
सूत्र-न्याय संप्रेषण
नैसर्गिक व्याकरण व्यवस्था
बौद्धिक यजन करें।
बौद्धिक यजन की दिशा दिखाते हुए कवि लिखता है -
पीड़ाओं
की झोली लेकर
तरल सुखों का स्वाद चखाया...
.... हे कविता!
जीवंत जीवनी
तुमने मुझको गीत बनाया।
सुख और दुःख को धूप-छाँव की तरह साथ-साथ लेकर चलते हैं अवनीश त्रिपाठी के नवगीत। नवगीत को वर्तमान दशक के नए नवगीतकारों ने पूर्व की वैचारिक कूपमंडूकता से बाहर निकालकर ताजी हवा दी है। जवाहर लाल 'तरुण', यतीन्द्र नाथ 'राही, कुमार रवींद्र, विनोद निगम, निर्मल शुक्ल, गिरि मोहन गुरु, अशोक गीते, संजीव 'सलिल', गोपालकृष्ण भट्ट 'आकुल', पूर्णिमा बर्मन, कल्पना रामानी, रोहित रूसिया, जयप्रकाश श्रीवास्तव, मधु प्रसाद, मधु प्रधान, संजय शुक्ल, संध्या सिंह, धीरज श्रीवास्तव, रविशंकर मिश्र बसंत शर्मा, अविनाश ब्योहार आदि के कई नवगीतों में करुणा से इतर वात्सल्य, शांत, श्रृंगार आदि रसों की छवि-छटाएँ ही नहीं दर्शन की सूक्तियों और सुभाषितों से सुसज्ज पंक्तियाँ भी नवगीत को समृद्ध कर नई दिशा दे रही है। इस क्रम में गरिमा सक्सेना और अवनीश त्रिपाठी का नवगीतांगन में प्रवेश नव परिमल की सुवास से नवगीत के रचनाकारों, पाठकों और श्रोताओं को संतृप्त करेगा।
वैचारिक कूपमंडूकता के कैदी क्या कहेंगे इसका पूर्वानुमान कर नवगीत ही उन्हें दशा दिखाता है-
चुभन
बहुत है वर्तमान में
कुछ विमर्श की बातें हों अब,
तर्क-वितर्कों से पीड़ित हम
आओ समकालीन बनें।
समकालीन बनने की विधि भी जान लें-
कथ्यों को
प्रामाणिक कर दें
गढ़ दें अक्षर-अक्षर,
अंधकूप से बाहर निकलें
थोड़ा और नवीन बनें।
'दर्द' की देहरी लांघकर 'उत्सव' के आँगन में कदम धरता नवगीत यह बताता है की अब परिदृश्य परिवर्तित हो गया है-
खोज रहे हम हरा समंदर,
मरुथल-मरुथल नीर,
पहुँच गए फिर, चले जहाँ से,
उस गड़ही के तीर .
नवगीत विसंगतियों को नकारता नहीं उन्हें स्वीकारता है फिर कहता है-
चेत गए हैं अब तो भैया
कलुआ और कदीर।
यह लोक चेतना ही नवगीत का भविष्य है। अनीति को बेबस ऐसे झेलकर आँसू बहन नवगीत को अब नहीं रुच रहा। अब वह ज्वालामुखी बनकर धधकना और फिर आनंदित होने-करने के पथ पर चल पड़ा है -
'ज्वालामुखी हुआ मन फिर से
आग उगलने लगता है जब
गीत धधकने लगता है तब
और
खाली बस्तों में किताब रख
तक्षशिला को जीवित कर दें
विश्व भारती उगने दें हम
फिर विवेक आनंदित कर दें
परमहंस के गीत सुनाएँ
नवगीत को नव आयामों में गतिशील बनाने के सत्प्रयास हेति अवनीश त्रिपाठी बढ़ाई के पात्र हैं। उन्होंने साहित्यिक विरासत को सम्हाला भर नहीं है, उसे पल्लवित-पुष्पित भी किया है। उनकी अगली कृति की उत्कंठा से प्रतीक्षा मेरा समीक्षक ही नहीं पाठक भी करेगा।
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[संपर्क: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, चलभाष ७९९९५५९६१८, ईमेल : salil.sanjiv@gmail.com]