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शनिवार, 23 अक्तूबर 2021

पुरोवाक, 'शफ़क-गुलाली', सुनीता सिंह

पुरोवाक
'शफ़क-गुलाली' ग़ज़लाकाश में मुस्कुराती लाली
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
                  भारत की गंगो-जमनी तहज़ीब की बानगी देखनी हो तो ग़ज़ल पढ़नी चाहिए। गीत और दोहे की तरह ग़ज़ल ने भी वक़्त, हालत, मुल्क, जुबान और कौमों की हदों को पार कर दिलों को अपना दीवाना बनाया है। किसी बच्चे की पैदाइश की तरह ग़ज़ल के तशरीफ़ लाने की कोई तारीख तो नहीं बताई जा सकती पर यह जरूर कहा जा सकता है कि जैसे-जैसे इंसान ने इंसानियत की तरफ कदम रखने की शुरुआत की, वैसे-वैसे उसने अपने दिल की बात, कम से कम लफ़्ज़ों में बयां करने का हुनर सीखा। अपने अहसासात दो मिसरों (पंक्तियों) में कहने के बाद उसने हमकाफ़िया (सम तुकांत) और हमरदीफ़ (सम पदांत) मिसरों की ईजाद की। शुरुआत में फ़क़त दो मिसरे ही कहे गए होंगे। दोहा, सोरठा, रोला, श्लोक वगैरह की मानिंद शे'र कहे गए। दो मिसरों में बात पूरी न होने पर चार मिसरों का इस्तेमाल किया गया। फ़क़ीर और शायर चार मिसरों का मुक्तक या रुबाई लिखकर गुनगुनाते-गाते और शाबाशी पाते। इनमें पहले, दूसरे और चौथे मिसरे हमकाफ़िया-हमरदीफ़ होते थे जबकि तीसरे मिसरे में यह बंदिश नहीं थी, बशर्ते वज़न (पदभार) चारों मिसरोंका एक सा होता था। शुरुआत में हजाज छंद में मुक्तक कहे गए, बाद में रुबाई के २४ औज़ान तय किये गए। बतौर नमूना -

आसमान पर शफ़क गुलाली।
तेरे रुखसारों पर लाली।।
जी करता है जी भर पी लूँ-
ढाल-ढाल प्याली पर प्याली।।

                  भारत में सदियों पहले से अपभृंश और अब हिंदी में कुछ छंद (दोहा, सोरठा, रोला, चौपाई वगैरह) दो पंक्तियों के हैं जबकि बहुत से छंदों (दोहा, सोरठा, रोला, आल्हा, चौपाई, माहिया, हाइकु वगैरह) का उपयोग कर मुक्तक कहे जाते रहे हैं। मुक्तक का विस्तार अर्थात तीसरी-चौथी पंक्तियों की तरह पंक्तियाँ जोड़कर भारतीय लोक काव्यों को गायक और कवि चिरकाल से लिखते-गाते रहे हैं। कालांतर में फारस और भारत के बीच लोगों का आना-जाना होने पर ग़ज़ल कहने की यह काव्य विधा फारस में गई। कहावत है कि इतिहास खुद को दुहराता है। ग़ज़ल के सिलसिले में यह पूरी तरह सत्य सिद्ध हुई। भारत में जन्मी, पली-पुसी विधा फारसी संस्कार लेकर एवं आक्रांताओं के साथ फिर भारत में आई तो उसके नाक-नक्श ही नहीं, चाल-ढाल भी बदली हुई थी, बदलाव इस हद तक की जन्मदात्री धरती पर भी ग़ज़ल को आयातित काव्य विधा मान लिया गया। भारत में यह काव्य विधा किसी नाम विशेष से नहीं पुकारी गयी थी किन्तु इसके संस्कारों में लोकधर्मिता, शुचिता तथा पाकीजगी थी। फारस में इसे ग़ज़ल संज्ञा तथा '​तश्बीब' (​बादशाहों के मनोरंजन हेतु ​संक्षिप्त प्रेम गीत) एवं 'कसीदा' (रूप/रूपसी ​या बादशाहों की ​की प्रशंसा) विशेषण देकर ​'गजाला चश्म​'​ (मृगनयनी) महबूबा-माशूका से बातचीत के पिजरे में कैद कर, इसे पंख फड़फड़ाने के लिए मजबूर कर दिया। ग़ज़ल का शाब्दिक अर्थ औरतों (प्रेमिकाओं) से बातें करना है।१

हिंदी ग़ज़ल

                  मायके लौटी बेटी के सर पर कुछ दिनों सासरे की तारीफ का भूत सवार रहने की तरह, ग़ज़ल ने भी मादरे-वतन में आने के बाद कुछ वक़्त हुस्नो-इश्क़ की इबादत में गुजारे लेकिन जल्दी ही इस पर मुल्क की माटी का रंग चढ़ गया और ग़ज़ल ने बगावती तेवर के साथ आम आदमी के दर्दो-ख्वाब के साथ नाता जोड़ना शुरू कर दिया। जनाब सरवरी ग़ज़ल का अर्थ 'जवानी का हाल बयां करना' बताते हैं२ और इश्क़ को ग़ज़ल की रूह कहते हैं।३ जनाब कादरी ग़ज़ल का मानी 'इश्क़ और जवानी का जिक्र' मानते हैं।४ हद तो तब हुई हुई जब लिखा गया 'गरज हर वह चीज जो माशूक के शायनशान न हो, वह ग़ज़ल में नापसंदीद: है।'५ बकौल डॉ. सैयद ज़ाफ़र ग़ज़ल शुरू से ही दिलवरों की बात कहती आई है।६ जनाब आल अहमद सरूर कहते हैं - 'ग़ज़ल वैसे तो महबूब से बातें करने का नाम है मगर इसमें हदीसे-हुस्न से ज्यादा इश्क की हिक़ायत है।'७-८ डॉ. रामदास 'नादार' के लफ़्ज़ों में 'उर्दू शायरी फ़ारसी शायरी का अनुकरण है और फारसी शायरी अरबी शायरी का।८ डॉ. मसऊद खां के मुअतबिक 'इसका अपना दाइर-ए-अलम (कार्यक्षेत्र) है।९ हिंदुस्तानी ग़ज़ल और हिंदी ग़ज़ल को फारसी ग़ज़ल के नक्शे-कदम पर चलने की भरपूर कोशिश उर्दू परस्तों ने की, लेकिन आखिर में हारकर चुप हो गए। इसका कारण आर्थिक है। बशीर बद्र हकीकत को यूं बयां करते हैं - 'आज ग़ज़ल का मसला क्या है? उर्दू ग़ज़ल पढ़नेवाले लाख-सवा लाख हैं तो उसी उर्दू ग़ज़ल को देवनागरी लिपि में, ग़ज़ल गायकी में, ज़िंदगी की गुफ्तगू में हिंदुस्तान-पाकिस्तान क्या दुनिया के मुख्तलिफ हिस्सों में करोड़ों करोड़ों हैं। ....इस बोली जानेवाली जदीद लफ़्जीयात का बड़ा हिस्सा ग़ज़ल की जबान बनता जा रहा है।'१०

नामकरण

                  बहरहाल वजह कोई भी हो ग़ज़ल ने अपनी माटी की खुशबू को जल्द ही पहचान लिया और वह खुद को बदलने से न रोक सकी और बदलाव के हिमायतियों ने उसे सिर-आँखों लिया। सागर मीरजापुरी ने ग़ज़लपुर और नवगज़लपुर में इस बदलाव का स्वागत एवं 'गीतिका' नामकरण कर लिखा -'ग़ज़ल, गीत की एक विधा है जो उर्दू-फ़ारसी से हिंदी में आई है।'११ चंद्र सेन 'विराट' और पद्मभूषण नीरज जी ने मुक्तक का विस्तार इसे 'मुक्तिका' कहा। हिंदी ग़ज़ल को 'तेवरी' [तेवर (व्यवस्था विरोध के स्वर) की प्रधानता के कारण], सजल, पूर्णिका, अनुगीत आदि नाम देने के प्रयास लिए जाने के बाद भी यह 'हिंदी ग़ज़ल थी, है और रहेगी।' ॐ नीरव के शब्दों में 'गीतिका एक ऐसे ग़ज़ल है जिसमें हिंदी भाषा की प्रधानता हो, हिंदी व्याकरण की अनिवार्यता हो और पारम्परिक मापनियों के साथ हिंदी छंदों का समादर हो।२९ 

हिंदी ग़ज़ल-उर्दू गजल

                  हिंदी एक समर्थ और स्वतंत्र भाषा है जिसका अपना शब्द भंडार, व्याकरण, छंद शास्त्र और लिपि है। उर्दू मूलत: सीमाप्रांत की भारतीय भाषाओँ-बोलिओं का संकर रूप है जो फ़ारसी या देवनागरी लिपि में लिखी जाती है। उर्दू का अपना शब्द-भंडार नहीं है। उर्दू शब्दकोष का हर शब्द किसी अन्य भाषा-बोली से आयातित है। फारसी के व्याकरण और छंद शास्त्र का उपयोग उर्दू करती है। वास्तव में उर्दू भी हिंदी की एक शैली (भाषा रूप) मात्र है जिसमें फ़ारसी शब्दों का प्रयोग अधिक किया जाता है। हिंदी वर्णमाला की पंचम ध्वनियों का प्रयोग हिंदी ग़ज़ल बेहिचक करती है, जो फ़ारसी-ुर्दी ग़ज़ल के लिए संभव नहीं है। बांगला ग़ज़ल, तमिल ग़ज़ल, अंग्रेजी ग़ज़ल, रुसी ग़ज़ल अगर भाषिक आधार पर फ़ारसी-उर्दू ग़ज़ल से भिन्न है और वहां फ़ारसी लयखंडों या छंदों को अपनाने की बाध्यता नहीं है तो हिंदी ग़ज़ल पर ऐसे बंधन कैसे थोपे जा सकते हैं? हिंदी ग़ज़ल को विरासत में वैदिक-पौराणिक-लौकिक मिथक, बिम्ब, प्रतीक, मुहावरे, कहावतें आदि मिली हैं जिनका प्रयोग कर वह फ़ारसी-उर्दू ग़ज़ल से भिन्न हो जाती है। हिंदी ग़ज़ल का मिजाज और कहन परंपरागत ग़ज़ल से बिलकुल अलहदा और मौलिक है। बतौर नमूना -

राजनीति घना कोहरा नैतिकता का सूर्य छिपा है।
टके सेर ईमान सभी का स्वार्थ हाथों हाय! बिका है।।

रूप देखकर नज़र झुका लें कितनी वह तहज़ीब भली थी।
रूप मर गया बेहूदों ने आँख फाड़कर उसे तका है।।

गुमा मशीनों के मेले में आम आदमी खोजें कैसे?
लीवर एक्सल गियर हथौड़ा ब्रैक कहीं वह महज चका है।

आओ! हम सब इस समाज की छाती पर कुछ नश्तर मारें।
सड़े गले रंग-ढंग जीने के, हर हिस्सा एक घाव पका है।।

फ़ना हो गए वे दिन यारों जबकि हम सब फरमाते हैं।
अब तो लब खोलो तो यही कहा जाता है ख़ाक बका है।।

ईंट रेत सीमेंट जोड़कर करी इमारत 'सलिल' मुकम्मिल।
चाह रहे घर नेह-प्रेममय, बना महज बेजान मकाँ है।।

                  यहाँ यह भी स्पष्ट होना जरूरी है कि हिंदी-फ़ारसी ग़ज़ल की भिन्नता शब्दों के कारण कतई नहीं है। दुनिया की हर भाषा अन्य भाषाओँ से शब्दों को ग्रहण करती और अन्य भाषाओँ को शब्द देती है। हर भाषा शब्दों को अपनी प्रकृति और संस्कार के अनुसार ढलती बदलती है। हिंदी 'हॉस्पिटल' को 'अस्पताल' कर लेती है तो फ़ारसी 'ब्राह्मण' को 'बिरहमन'। संस्कृत का 'मातृ', फ़ारसी में मादर और अंग्रेजी में 'मदर' हो जाता है।  डॉ. कृष्ण कुमार 'बेदिल' के अनुसार 'हिंदी और उर्दू में बहुत ज़्यादा फर्क नहीं है सिर्फ लिपि का फर्क है। फ़ारसी में लिखा जाए तो उर्दू और वही बात देवनागरी में लिखी जाए तो हिंदी हो जाती है।२७     

                  हिंदी ग़ज़ल पर प्रथम शोधकार्य (१९८५) करनेवाले डॉ. रोहिताश्व अस्थाना खुसरो और कबीर की ग़ज़लों में भी हिंदी ग़ज़ल के मूल तत्व देखे हैं।१२ रामेश्वर शुक्ल 'अंचल' हिंदी ग़ज़ल में गंभीरता और जीवन दर्शन तथा सतही उथलेपन की सामान गुंजाइश देखते हैं।१३ ज़हीर कुरैशी के अनुसार 'हिंदी प्रकृति की ग़ज़ल आम आदमी की जनवादी अभिव्यक्ति है'।१४ शिवॐ अंबर कहते हैं 'समसामयिक हिंदी ग़ज़ल भाषा के भोजपत्र पर लिखी हुई विप्लव की अग्नि ऋचा है।'१५ शमशेर बहादुर सिंह के अनुसार 'ग़ज़ल एक लिरिक विधा है।' १६ डॉ. उर्मिलेश हिंदी ग़ज़ल को इस तरह परिभाषित करते हैं 'जो उर्दू ग़ज़ल की शैल्पिक काया में हिंदी की आत्मा को प्रतिष्ठित करती है।'१७ बकौल डॉ. कुंवर बेचैन 'ग़ज़ल जागरण के बाद का उल्लास है, पाँखुरी के मंच पर खुशबू का मौन स्पर्श है।'१८ डॉ. रोहिताश्व अस्थाना के शब्दों में 'अनुभूति की तीव्रता एवं संगीतात्मकता हिंदी ग़ज़ल के प्राण हैं।१९ 

शिल्प

                  स्पष्ट है कि हिंदी ग़ज़ल का शिल्प फ़ारसी ग़ज़ल की तरह होते हुए भी इसकी अपनी अलग पहचान और विशेषता है। बकौल नरेश नदीम 'ग़ज़ल एक से अधिक अशआर का संग्रह मात्र है जिसमें हर शेर दूसरों से स्वतंत्र हो सकता है।२०

विषय

                  डॉ. रामप्रसाद शरण 'महर्षि' के अनुसार 'कोई भी विषय क्यों न हो, अब उसे ग़ज़ल का विषय बनाया जा सकता है।'२१ डॉ. सादिका असलम नवाब 'सहर' के मत में - 'आधुनिक ग़ज़ल राजनीति और समाज से जुडी हुई समस्याओं को अभिव्यक्त करती है।२२ डॉ. महेंद्र अग्रवाल के शब्दों में 'नई ग़ज़ल का मूल प्रतिपाद्य समकालीन मकनव जीवन के समग्र है। वह ठोस यथार्थ पर खड़ी है।२३

शैली (ग़ज़लियत, तगज़्ज़ुल) 

                  डॉ. मिर्ज़ा हसन नासिर की मान्यता है कि ग़ज़ल की भाषा शैली प्राय: प्रतीकात्मक एवं संकेतात्मक होती है।२४ हिंदी गजल भी ‘तगज्जुल’ को स्वीकार और शेर कहते हुए अभीष्ट सांकेतिकता की अधिकतम रक्षा करना चाहती है। ज़हर कुरैशी के अनुसार 'हिंदी गजल के पास अपनी विराट शब्द-संपदा है, मिथक, मुहावरे, बिंब, प्रतीक, रदीफ और काफिए हैं। शिल्प और विषय का उत्तरोत्तर विकास भी इसमें दिखता है। इस प्रक्रिया और विकास की पृष्ठभूमि में समकालीन जीवन की जटिल परिस्थितियां भी महत्त्वपूर्ण हैं। राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और तकनीकी परिवर्तन भी इसकी पृष्ठभूमि में हैं। इसलिए कहा जा सकता है कि हिंदी गजल का उद्भव अकस्मात नहीं हुआ। यह गतिशील संघर्ष प्रक्रिया का परिणाम है।'२५ रामदेव लाल 'विभोर' लिखते हैं 'तगज़्ज़ल सामान्य सी बात में अर्थ सौष्ठव उत्पन्न कर उसे असामान्य व् आनंददायी बना देता है। संस्कृत-हिंदी काव्य में इसे ही शब्द शक्ति का चमत्कार कहा गया है।'२६ 'कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाजे-बयां और' यह अंदाजे-बयां ही गज़लकार के शैली कहलाती है। 

तत्व

                  मुग़ल काल में प्रशासकों का आश्रय मिला इसलिए फ़ारसी मिश्रित हिंदी (उर्दू) को देशी हिंदी (खड़ी बोली) पर वरीयता मिली। सुशिक्षित जनों ने प्रशासन में हिस्सेदारी पाने के लिए सत्ताधीशों की भाषा को अपनाया। इसलिए ग़ज़ल के फ़ारसी मानक, लय खंड और चंद पहले प्रचलित हो गए। हिंदी ग़ज़ल की स्वतंत्र पहचान बनने पर फ़ारसी पारिभाषिक शब्दों के हिंदी पर्याय विक्सित किए गए। तदनुसार पद या पंक्ति (मिसरा), पद युग्म या द्विपदी (शे'र), पहला पद (मिसरा ऊला), दूसरी पंक्ति (मिसरा सानी), प्रथम समतुकांती द्विपदी (मत्ला), अंतिम द्विपदी (मक़्ता), तुकांत (काफ़िया), पदांत (रदीफ़), भार (वज़्न), लयखण्ड या गण (रुक्न), छंद (बह्र) हिंदी ग़ज़ल के तत्व हैं। 

छंद

                  अन्य गीति रचनाओं की तरह हिंदी ग़ज़ल भी लयखण्ड (रुक्न, बहुवचन अरकान) तथा छंद (बह्र) का प्रयोग कर रची (कही) जाती है। गण के आधार पर छंद के दो प्रकार एक गणीय छंद (मुफर्रद बह्र) तथा मिश्रित गणीय छंद (मुरक्कब बह्र) हैं। हिंदी ग़ज़ल के दो और प्रकार एक छंदीय ग़ज़ल और बहुछंदीय ग़ज़ल भी हैं जो उर्दू ग़ज़ल में नहीं हैं। डॉ. ब्रह्मजीत गौतम के अनुसार 'उर्दू ग़ज़ल की लगभग सभी बहरें हिंदी के मात्रिक या वर्णिक छंदों से निकली हैं।' २८ मैंने, रसूल अहमद 'सागर बक़ाई' डॉ. गौतम, साज जबलपुरी ने हिंदी छंदों पर आधारित ग़ज़लें लिखने का श्रीगणेश लगभग ४ दशक पूर्व किया था। 'बह्र नहीं तो ग़ज़ल नहीं' लिखकर महावीर प्रसाद 'मूकेश' ग़ज़ल में छंद की अपरिहार्यता बताते हैं।३० उत्तम (मुरस्सा) ग़ज़ल  की विशेषता बताते हुए रामप्रसाद शर्मा 'महर्षि' लिखते हैं 'एक ओर नाद सौंदर्य हो तो दूसरी ओर भाषा और भाव का सौंदर्य। ३१  

अलंकार व रस 

                  अलंकार (सनअत) हिंदी ग़ज़ल के लालित्य और चारुत्व में वृद्धि कर ग़ज़ल में आकर्षण उत्पन्न कर, गज़लकार की कहन को पठनीय, श्रवणीय और मननीय बनाते हैं। हिंदी ग़ज़ल में अनुप्रास, यमक, श्लेष, उपमा, अतिशयोक्ति, अन्योक्ति, वक्रोक्ति, रूपक, संदेह, भ्रांतिमान, व्यतिरेक, स्मरण, दीपक, दृष्टांत, व्याजस्तुति पुरुक्तिवदाभास, अन्योक्ति आदि के प्रयोग मैंने हुए अन्य ग़ज़लकारों ने किए है। हिंदी ग़ज़ल में रस सलिला का प्रवाह अबाध होता रहा है। 

'शफ़क़-गुलाली' : हिंदी ग़ज़ल का गुलदस्ता 

                  हिंदी ग़ज़ल का ताज़ा-तरीन गुलदस्ता लेकर तसरीफ लाई हैं शाने-अवध लखनऊ से सुनीता सिंह। इन ग़ज़लों में मौलिकता, सुरुचि संपन्नता और ताज़गी सहज ही देखी जा सकती है। ये गज़लें सूरत-हाल का आईना हैं। इश्को-माशूक की खाम ख़याली से परहेज़ इन ग़ज़लों की खासियत है। इन ग़ज़लों में हिंदी के कई छंदों का सफल सार्थक प्रयोग किया गया है। 

शायरा के हौसले की दाद दी जाना चाहिए जब वह आसमानी रब से भी सवाल करती है। गीतिका छंद में कही गई ग़ज़ल का यह शेर देखिए -

आसमां में बैठकर करता वहाँ क्या रब बता? 
साँस बेकल डूबती तो भी सदाएँ चाहिए?  

                  कोरोना की मार ने इंसानी रिश्तों-नातों और अहसासों को किस हद तक नुक्सान पहुँचाया, उपमान छंद में कहा गया एक शेर सूरते-हालात बयां करता है -

वहम की बात नहीं है, यकीन हारा था।    
बहुत करीब थे लेकिन, फिसल गये नाते।। 

                  रोजमर्रा की छोटी-छोटी बातें अमूमन बड़ी बनकर नज़दीकियों को दूरियों में बदल देती हैं। अरुण छंद में यह अनुभूति बखूबी अभिव्यक्त की गयी है -

बात ही बात में बात बढ़ती गयी। 
बात भूली न तल्खी मगर जा रही।।

                  अरुण छंद में इससे अलग मिजाज की ग़ज़ल का मजा लें -

गुनगुनाता हुआ आसमां देखिए। 
खास है ये नज़ारा ज़रा देखिए।।
आ रही कहकशां से सुहानी सदा। 
रौशनी का जहां चाँद का देखिए।। 

                  'जैसी करनी वैसी भरनी' की लोकोक्ति को चित्रपटीय गीत में 'कर्म किये जा फल की चिंता मत कर रे इंसान / जैसा कर्म करेगा वैसा फल देगा भगवान् / ये है गीता का ज्ञान' कहकर अभिव्यक्त किया गया है। मुक्तामणि छंद में इसी बात को सुनीता जी ने बेहद खूबसूरती से एक ग़ज़ल में पिरोया है -

बरबादियाँ कहीं पर तो सुकून है कहीं पर। 
कर्मों से तय हमेशा अंजाम ज़िंदगी का।।
कहने लगा जमाना मुश्किल बहुत है जीना। 
बनता रहे तमाशा सरे-आम ज़िंदगी का।। 

                  'दीवार से सिर फोड़ना' मुहावरे का प्रयोग इस शे'र की खासियत है- 

वक़्त का साज है, वक़्त का राज है। 
सर न दीवार पर फोड़ना चाहिए।। 

                  मुहावरों को लेकर कहे गए कुछ अशआर  मजा लीजिए। ऐसे अशआर लिखना आसान नहीं होता। शायरा दाद की हक़दार है। 

हम तो सरसों उगाने चले हाथ पर। 
एक फूटी भी कौड़ी नहीं हाथ पर।।

हाथ आगे किसी के पसारे नहीं। 
बनती गयी बात ही बात पर।।

योजनाएँ खटाई में पड़ गयीं। 
ख़ाक में जाते मिल छानते ख़ाक पर।।

होश तो उड़ गये पर जताया नहीं। 
खार खाता जहां मेरे ज़ज़्बात पर।।

कोई अपनी खबर खोज लेता नहीं। 
बेतकल्लुफ हुए अपने हालात पर।।

हम तो खिचड़ी हैं अपनी पकाते अलग।    
ज़िंदगी थाम लेते हैं हर मात पर।।   



                  'क्यों कवायद सदा जूझने की रहे?', 'चाहना और पाना अलग बात है', 'ख्वाब टूटे हैं पर मलाल नहीं', 'गुल हमेश खिला नहीं करते', 'ज़िंदगी भी हमें सिखाती है', 'निराश जब दिल हो हर तरफ से, सहारा मिलता इबादतों में', 'कोशिश न बेहतरी के लिए रुकनी चाहिए', 'रहा किसी से गिला न शिकवा, फ़क़ीर जैसी हुई है फितरत' जैसे मिसरे गागर में सागर की तरह, कम लफ्जों में गहरी बात कहते हैं। इनसे गज़लसरा की भाषाई पकड़ पता चलती है। 

                  दुष्यंत कुमार ने हालत से बेजार हो कर कहा था -'अब तो इस तालाब का पानी बदल दो', सुनीता का शायर मन समय की विसंगतियों को देखते हुए लिखता है -

'अब इन हवाओं बदलना हो जरूरी है गया'

                  शायरी-आज़म मेरे तकी मेरे की मशहूर ग़ज़ल है 'पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है', सुनीता जी भी इस ग़ज़ल के असर को अपने रंग में ढालकर कहती हैं- 

गुमसुम-गुमसुम मद्धम-मद्धम लय गीतों की लगती है। 
जाने कैसा सावन बरसे, भीगी खुश्की रहती है।।
आँगन-आँगन बस्ती-बस्ती, पत्ते-पत्ते बूटों में। 
बूँद बरसती सावन की जो नज़्म रूहानी कहती है।। 

                  वक़्त और हालात की दुश्वारियों का तकाज़ा है कि एक साथ रहा जाए। सुनीता जी जानती हैं की मुश्किलों को हसालों से ही जीता जा सकता है। वे अपने तमाम पाठकों तक यह पैगाम ग़ज़ल के जरिए पहुँचाती हैं- 

 दुआ में हाथ उठें, दौर मुश्किलों का है। 
सभी के साथ चलें, दौर मुश्किलों का है।।

बता रही दुश्वारी न जीत पाओगे 
दिखे जो छाँव छले, दौर मुश्किलों का है।।

चलो दिखा दें कलेजा की हम भी रखते हैं। 
ये हौसले न ढलें, दौर मुश्किलों का है।।  

                  जम्हूरियत के इस दौर में आम आदमी अपने नेताओं से परेशां है, किस पर भरोसा करे किस पर नहीं, यही समझ नहीं आता। जिस सिक्के को आजमाया वही खोटा निकला। एवं को हर नुमाइंदे से नाउम्मीदी ही हुई। सुनीता अपनी बात इस तरह कहती हैं -

वो रहनुमा मेरा जिस पर जां निसार थी। 
संग उसके ही गम गयी, मेरी बहार थी।।

वो जिस पे नाज़ था मुझे, मेरा नसीब था। 
जो अनसुनी थी रह गयी, मेरी पुकार थी।।

                  हालात कितने भी ख़राब हों, मायूसी से कोई हल नहीं निकलता। कामयाबी मिले न मिले, कोशिश बदस्तूर जारी रहनी चाहिए। बकौल शायरे-वक़्त फ़िराक़ गोरखपुरी 'ये माना ज़िंदगी है चार दिन की / बहुत होते हैं यारों चार दिन भी  / खुदा को पा गया वाइज मगर है / जरूरत आदमी को आदमी की'। साहिर लुधियानवी लिखते हैं - 'मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया / हर फ़िक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया /  मनाना फज़ूल था / बर्बादियों का जश्न मनाता चला गया'। सुनीता फ़िराक के शहर की रहनेवाली हैं। वे हालत और वक़्त को अपने नज़रिए से देखती-परखती हैं और फिर कहती हैं - 

हँसी-खुशी गुजारिए ये चार दिन की ज़िंदगी। 
न रोइए-रुलाइए, ये चार दिन की ज़िंदगी।।

यहाँ-वहाँ कहाँ-कहाँ सुकून ढूँढता जिया। 
जरा ठहर भी जाइए ये चार दिन की ज़िंदगी।। 

न कामयाब हो सके, न ख्वाब जी सके कभी। 
अजी न ग़म मनाइए, ये चार दिन की ज़िंदगी।। 

धुआँ-धुआँ भरा जो दिल, सुलग रहा सिगार सा। 
गुबार सब निकालिए, ये चार दिन की ज़िंदगी।। 

अगर न गुल खिले चमन, उदास क्यों हुई फ़िज़ा। 
बहार फिर बुलाइए, ये चार दिन की ज़िंदगी।।  

                  हिंदी ग़ज़ल की खासियत और खसूसियत यही है कि वह सांसारिक और आध्यात्मिक पहलुओं को सिक्के के दो पहलुओं, धूप-छाँव, हार-जीत या फूल-शूल की तरह एक साथ कहती है। सुनीता इससे पूरी तरह वाक़िफ़ हैं। 

आँख खोली तो देखा सहर हो गयी। 
शबनमी सी सुहानी पहर हो गयी।।

दिल हमारा-तुम्हारा खुदा पा गया। 
ये मुहब्बत रूहानी अगर हो गयी।।

                  जो दिया, जैसा दिया, उसने दिया, शिकवा न कर। यह फलसफा हर खासो-आम के काम आता है। सुनीता कहती हैं- 

सफर ये ज़िन्दगी का भला या बुरा। 
तौल करनी नहीँ, बस गुजर हो गयी।।

                  चौरासी हिंदी ग़ज़लों का यह गुलदस्ता अलग-अलग रूप-रंग-खुशबू के गुलों से बाबस्ता है। हर तितली और भँवरे का यहाँ स्वागत है। सपनों और सच्चाईयों दोनों की खबर रखती हैं ये ग़ज़लें। इनमें ज़िन्दगी के अलहदा-अलहदा पहलू इस तरह नुमाया हुए हैं कि वाह वाह कहने का मन होता है। 

खवाबों का इक मकान बनता है आदमी। 
चुन-चुन के ईंट उसमें लगता है आदमी।।

ढूँढे सुई भी रेत से, सीने को ज़िंदगी। 
दिल चाक अपना सबसे छिपाता है आदमी।।

जाती है रात दे के सुहानी सी भोर को। 
फिर तीरगी में हार क्यों जाता है आदमी।। 

                  इन ग़ज़लों में वतनपरस्ती का पैगाम भी है और खुदाई वज़ूद का इमकान भी  -

जब-जब वतन की आन पे हो आँच आ रही। 
होना ही जां को देश पर कुर्बान चाहिए।।

घर जलता देख दूसरे का हँसना छोड़िए। 
करना किसी को  भी न परेशान चाहिए।।

थामा है रब ने जब भी जहाँ ठोकरें लगीं। 
अब और क्या वज़ूद का फरमान चाहिए।। 

                  चचा ग़ालिब फरमाते हैं - 'दर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना', सुनीता का नजरिया अलग है -


आग जलने लगी हवा पाकर। 
दर्द मिटने लगा दवा पाकर।।

एकटक देखती रहीं आँखें। 
आप आये नहीं पता पाकर।।

लिख रही है कलम ग़ज़ल कोई। 
उनकी भेजी हुई सदा पाकर।।

रे त सी रौशनी फिसलती है। 
इक झरोखा कहीं जरा पाकर।। 

                  मानविकीकरण का एक उदाहरण देखें -

वो सूरज हमारी तरह लग रहा है। 
सुबह रोज उठता मगर फिर ढला है।।

                  निराशा और आशा का चोली-दामन का सा साथ है। किसी एक से ज़िंदगी मुकम्मल नहीं होती है। सुनीता ने ग़ज़लों में जगह-जगह दोनों रंग पिरोये हैं। बतौर नमूना देखिए- 

मुट्ठी में कैद रेत फिसलती चली गयी। 
सहरा मेरी उम्मीद पे हँसती गयी।।

बरसात जो थी संग लिए रंग आ रही। 
बिन बरसे मेरे घर से निकलती चली गयी।।  
*
लहरा रहे हैं फूल जो सरसों के खेत में। 
मन मोहने की उनकी कला भी तो कम नहीं।।

वो दूर शफक पर है सुनहरी सी लालिमा। 
उससे मिली उम्मीद ये, दिल का भरम नहीं।।   

                  'शफ़क़-गुलाली' की ग़ज़लों की जुबान आम आदमी की बोलचाल की है। आजकल भाषाई शुद्धता के नाम पर कुछ अलफ़ाज़ को उपयोग न करने का जो जाहिलाना माहौल बनाया जा रहा है, उसकी ख़िलाफ़त इसी तरह की जुबान के जरिये से की जानी चाहिए। सुनीता जी मुबारकबाद की हकदार हैं, वे सरकारी मुलाजिम होते हुए भी अपनी रूह की आवाज़ सुनती हैं और उसे गीतों, दोहों, ग़ज़लों की शक्ल में अवाम तक पहुँचा देती हैं। 'तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा' की भावना से किया गया यह रचना कर्म वाकई काबिले तारीफ है। मुझे पूरी उम्मीद है कि इस दीवान को तारीफ मिलेगी और सुनीता दिन-ब-दिन ज्याद: से ज्याद: शिद्दत से यह कलमी सफर जारी रखकर बुलंदियों  छुएँगी। 

संदर्भ -
१. शमीमे बलाग़त, सफा ४६, २. जदीद उर्दू शायरी, सफा ४८, ३. जदीद उर्दू शायरी, सफा २६०, ४. तारीखी तनक़ीद, सफा १०१, ५. शेरुअल हिन्द, भाग २, सफा २८९, ६. तनक़ीद और अंदाज़े नज़र, सफा १४४, ७. तनक़ीद क्या है?, सफा १३३, ८. उर्दू काव्यशास्त्र में काव्य का स्वरूप, सफा ९२, ९. फन और तनक़ीद : ग़ज़ल का फन सफा २२१, १०. अमीर खुसरो-ता-ग़ज़ल २०००, ११. गीतिकायनम, पृष्ठ १५, १२-१९. हिंदी ग़ज़ल स्वरूप और विकास, डॉ. अस्थाना, २०. उर्दू कविता और छंद शास्त्र, २१. ग़ज़ल सृजन, पृष्ठ १८, २२. साठोत्तरी हिंदी ग़ज़ल - शिल्प और चेतना पृष्ठ २६४, २३. ग़ज़ल सृजन, पृष्ठ १९, २४. ग़ज़ल ज्ञान, ११, २५. जनसत्ता २६-८-२०१८, २६. ग़ज़ल ज्ञान पृष्ठ ११३, २७. ग़ज़ल : रदीफ़-काफ़िया और व्याकरण, २८. एक बह्र पर एक ग़ज़ल, ११-१२, २९. गीतिकालोक पृष्ठ १२, ३०. ग़ज़ल छंद चेतना पृष्ठ ३१. ग़ज़ल सृजन, पृष्ठ १३।

***
संपर्क -विश्ववाणी हिन्दी संस्थान अभियान, ४०१  अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, चलभाष ९४२५१८३२४४, ईमेल salil.sanjiv@gmail.com

शुक्रवार, 22 अक्तूबर 2021

नवगीत

नवगीत:
*
दीपमालिके!
दीप बाल के
बैठे हैं हम
आ भी जाओ
अब तक जो बीता सो बीता
कलश भरा कम, ज्यादा रीता
जिसने बोया निज श्रम निश-दिन
उसने पाया खट्टा-तीता
मिलकर श्रम की
करें आरती
साथ हमारे
तुम भी गाओ
राष्ट्र लक्ष्मी का वंदन कर
अर्पित निज सीकर चन्दन कर
इस धरती पर स्वर्ग उतारें
हर मरुथल को नंदन वन कर
विधि-हरि -हर हे!
नमन तुम्हें शत
सुख-संतोष
तनिक दे जाओ
अंदर-बाहर असुरवृत्ति जो
मचा रही आतंक मिटा दो
शक्ति-शारदे तम हरने को
रवि-शशि जैसा हमें बना दो
चित्र गुप्त जो
रहा अभी तक
झलक दिव्य हो
सदय दिखाओ
***

नवगीत:
डॉक्टर खुद को
खुदा समझ ले
तो मरीज़ को
राम बचाये
.
लेते शपथ
न उसे निभाते
रुपयों के
मुरीद बन जाते
अहंकार की
कठपुतली हैं
रोगी को
नीचा दिखलाते
करें अदेखी
दर्द-आह की
हरना पीर न
इनको भाये
.
अस्पताल या
बूचड़खाने?
डॉक्टर हैं
धन के दीवाने
अड्डे हैं ये
यम-पाशों के
मँहगी औषधि
के परवाने
गैरजरूरी
होने पर भी
चीरा-फाड़ी
बेहद भाये
. शंका-भ्रम
घबराहट घेरे
कहीं नहीं
राहत के फेरे
नहीं सांत्वना
नहीं दिलासा
शाम-सवेरे
सघन अँधेरे
गोली-टॉनिक
कैप्सूल दें
आशा-दीप
न कोई जलाये
***
नव गीत :
कम लिखता हूँ
अधिक समझना
अक्षर मिलकर
अर्थ गह
शब्द बनें कह बात
शब्द भाव-रस
लय गहें
गीत बनें तब तात
गीत रीत
गह प्रीत की
हर लेते आघात
झूठ बिक रहा
ठिठक निरखना
एक बात
बहु मुखों जा
गहती रूप अनेक
एक प्रश्न के
हल कई
देते बुद्धि-विवेक
कथ्य एक
बहु छंद गह
ले नव छवियाँ छेंक
शिल्प
विविध लख
नहीं अटकना
एक हुलास
उजास एक ही
विविधकारिक दीप
मुक्तामणि बहु
समुद एक ही
अगणित लेकिन सीप
विषम-विसंगत
कर-कर इंगित
चौक डाल दे लीप
भोग
लगाकर
आप गटकना
***

२२-१०-२०१७

लघुकथा कर्तव्य और अधिकार

लघुकथा
कर्तव्य और अधिकार
*
मैं उन्हें 'गुरु' कहता हूँ, कहता ही नहीं मानता भी हूँ। मानूँ क्यों नहीं, उनसे बहुत कुछ सीखा भी है। वे स्वयं को विद्यार्थी मानते हैं। मुझ जैसे कई नौसिखियों का गद्य-पद्य की कई विधाओं में मार्गदर्शन करते हैं, त्रुटि सुधारते हैं और नयी-नयी विधाएँ सिखाते हैं,सामाजिक-पारिवारिक कर्तव्य निभाने की प्रेरणा और नए-नए विचार देते हैं। आधुनिक गुरुओं के आडम्बर से मुक्त सहज-सरल
एक दिन सन्देश मिला कि उनके आवास पर एक साहित्यिक आयोजन है। मैं अनिश्चय में पड़ गया कि मुझे जाना चाहिए या नहीं? सन्देश का निहितार्थ मेरी सहभागिता हो तो न जाना ठीक न होगा, दूसरी ओर बिना आमंत्रण उपस्थिति देना भी ठीक नहीं लग रहा था। मन असमंजस में था।
इसी ऊहापोह में करवटें बदलते-बदलते झपकी लग गयी।
जब आँख खुली तो अचानक दिमाग में एक विचार कौंधा अगर उन्हें गुरु मानता हूँ तो गुरुकुल का हर कार्यक्रम मेरा अपना है, आमंत्रण की अपेक्षा क्यों? आगे बढ़कर जिम्मेदारी से सब कार्य सम्हालूँ। यही है मेरा कर्तव्य और अधिकार भी।
*
२२-१०-२०१७ 

मुक्तक

मुक्तक
*
नेहा हों श्वास सभी
गेहा हो आस सभी
जब भी करिये प्रयास
देहा हों ख़ास सभी
*
अरिमर्दन सौमित्र कर सके
शक-सेना का अंत कर सके
विश्वासों की फसल उगाये
अंतर्मन को सन्त कर सके
*
विश्व दीपक जलाये, तज झालरों को
हँसें ठेंगा दिखा चीनी वानरों को
कुम्हारों की झोपड़ी में हो दिवाली
सरहदों पर मार पाकी वनचरों को
*
काले कोटों को बदल, करिये कोट सफेद
प्रथा विदेश लादकर, तनिक नहीं क्यों खेद?
न्याय अँधेरा मिटाकर दे उजास-विश्वास
हो अशोक यह देश जब पूजा जाए स्वेद
*
मिलें इटावा में 'सलिल' देव और देवेश
जब-जब तब-तब हर्ष में होती वृद्धि विशेष
धर्म-कर्म के मर्म की चर्चा होती खूब
सुन श्रोता के ज्ञान में होती वृद्धि अशेष
*
मोह-मुक्ति को लक्ष्य अगर पढ़िए नित गीता
मन भटके तो राह दिखा देती परिणिता
श्वास सार्थक तभी 'सलिल' जब औरों का हित
कर पाए कुछ तभी सार्थक संज्ञा नीता
*
हरे अँधेरा फैलकर नित साहित्यलोक
प्रमुदित हो हरश्वास तब, मिठे जगत से शोक
जन्में भू पर देव भी,ले-लेकर अवतार
स्वर्गादपि होगा तभी सुन्दर भारत-लोक
*
नलिनी पुरोहित हो प्रकृति-पूजन-पथ वरतीं
सलिल-धार की सकल तरंगे वन्दन करतीं
विजय सत्य-शिव-सुंदर की तब ही हो पाती
सत-चित-आनंद की संगति जब मन को भाती
*
कल्पना जब जागती है, तभी बनते गीत सारे
कल्पना बिन आरती प्रभु की पुजारी क्यों उतारे?
कल्पना की अल्पना घुल श्वास में नव आस बनती
लास रास हास बनकर नित नए ही चित्र रचती
*
तीन मुक्तक-
*
मौजे रवां१ रंगीं सितारे, वादियाँ पुरनूर२ हैं
आफ़ताबों३ सी चमकती, हक़ाइक४ क्यों दूर हैं
माहपारे५ ज़िंदगी की बज्म६ में आशुफ्ता७ क्यों?
फिक्रे-फ़र्दा८ सागरो-मीना९ फ़िशानी१० सूर हैं
१. लहरें, २. प्रकाशित, ३. सूरजों, ४. सचाई (हक़ का बहुवचन),
५. चाँद का टुकड़ा, ६. सभा, ७. विकल, ८. अगले कल की चिंता,
९. शराब का प्याला-सुराही, १०. बर्बाद करना, बहाना।
*
कशमकश१ मासूम२ सी, रुखसार३, लब४, जुल्फें५ कमाल६
ख्वाब७ ख़ालिक८ का हुआ आमद९, ले उम्मीदो-वसाल१०
फ़खुर्दा११ सरगोशियाँ१२, आगाज़१३ से अंजाम१४ तक
माजी-ए-बर्बाद१५ हो आबाद१६ है इतना सवाल१७
१. उलझन, २. भोली, ३. गाल, ४. होंठ, ५. लटें, ६. चमत्कार, ७. स्वप्न,
८. उपयोगकर्ता, ९. साकार, १०. मिलन की आशा, ११. कल्याणकारी,
१२. अफवाहें, १३. आरम्भ, १४. अंत, १५. नष्ट अतीत, १६. हरा-भरा, १७. माँग।
*
गर्द आलूदा१ मुजस्सम२ जिंदगी के जलजले३
मुन्जमिद४ सुरखाब५ को बेआब६ कहते दिलजले७
हुस्न८ के गिर्दाब९ में जा कूदता है इश्क़१० खुद
टूटते बेताब११ होकर दिल, न मिटते वलवले१२
१. धुल धूसरित, २. साकार, ३. भूकंप, ४. बेखर, ५. दुर्लभ पक्षी,
६. आभाहीन, ७. ईर्ष्यालु, ८. सौन्दर्य, ९. भँवर, १०. प्रेम, ११. बेकाबू,
१२. अरमान।
***
२२-१०-२०१७

गीत

गीत:
कौन रचनाकार है?....
संजीव 'सलिल'
*
कौन है रचना यहाँ पर?,
कौन रचनाकार है?
कौन व्यापारी? बताओ-
क्या-कहाँ व्यापर है?.....
*
रच रहा वह सृष्टि सारी
बाग़ माली कली प्यारी.
भ्रमर ने मधुरस पिया नित-
नगद कितना?, क्या उधारी?
फूल चूमे शूल को,
क्यों तूल देता है ज़माना?
बन रही जो बात वह
बेबात क्यों-किसने बिगारी?
कौन सिंगारी-सिंगारक
कर रहा सिंगार है?
कौन है रचना यहाँ पर?,
कौन रचनाकार है?
*
कौन नट-नटवर नटी है?
कौन नट-नटराज है?
कौन गिरि-गिरिधर कहाँ है?
कहाँ नग-गिरिराज है?
कौन चाकर?, कौन मालिक?
कौन बन्दा? कौन खालिक?
कौन धरणीधर-कहाँ है?
कहाँ उसका ताज है?
करी बेगारी सभी ने
हर बशर बेकार है.
कौन है रचना यहाँ पर
कौन रचनाकार है?....
*
कौन सच्चा?, कौन लबरा?
है कसाई कौन बकरा?
कौन नापे?, कहाँ नपना?
कौन चौड़ा?, कौन सकरा?.
कौन ढांके?, कौन खोले?
राज सारे बिना बोले.
काज किसका?, लाज किसकी?
कौन हीरा?, कौन कचरा?
कौन संसारी सनातन
पूछता संसार है?
कौन है रचना यहाँ पर?
कौन रचनाकार है?
२२-१०-२०१० 
***

अनिल अनवर

संक्षिप्त परिचय :-
नाम : अनिल कुमार श्रीवास्तव
क़लमी नाम : अनिल अनवर
माता-पिता : स्व० श्रीमती तारा व स्व० श्री शारदा प्रसाद श्रीवास्तव
जन्म दिनांक : 27.9.1952 (वास्तविक), 20.2.1953 (प्रमाणपत्रों में)
जन्म स्थान : सीतापुर (उ०प्र०)
पैतृक ग्राम : मुंशी दरियाव लाल का पुरवा, ज़िला - सुलतानपुर (उ०प्र०)
शिक्षा : बी० एस सी०, इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग में डिप्लोमा
नौकरी : भारतीय वायु सेना में 21 वर्षों की अवधि तक
सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन
प्रकाशित पुस्तकें : आस्था के गीत (1995), गुलशन : मज़्मूआ-ए-नज़्म (2011), विमल करो मन मेरा (2014)
सम्पादन व प्रकाशन : मरु गुलशन (त्रैमासिक)अव्यावसायिक पत्रिका 20 वर्षों की अवधि तक (कुल 79 अंक)
उपलब्धियाँ : उल्लेखनीय कुछ भी नहीं मानता। साहित्य का एक सेवक या विद्यार्थी ही मानें।
डाक का पता : 33, व्यास कॉलोनी, एयर फोर्स, जोधपुर - 342 011
सम्पर्क नं० : 0291/2671917 (निवास), 7737689066 व 8764737781 (मोबाइल)
माँगता हूँ, दें मुझे अब वर यही माँ शारदे !
सीख पाऊँ मैं भी करना शाइरी माँ शारदे !
बुग़्ज़ो-नफ़रत, हिर्सो-ग़ीबत घर न दिल में कर सके,
और हो क़िरदार में भी सादगी माँ शारदे !
है बहुत मुश्किल अरूज़ी बन के कह पाना ग़ज़ल,
दूर करना मेरे शे'रों की कमी माँ शारदे !
हैं कई सिन्फ़े-सुख़न, ग़ज़लें मगर मक़बूल हैं,
बात दिल की मैंने ग़ज़लों में कही माँ शारदे !
दौर था वो भी कि ज़ुल्फ़ों में ही ग़ज़लें क़ैद थीं,
इन के मरक़ज़ में है अब आम आदमी माँ शारदे !
अब नहीं उस्ताद 'शंकर' किस तरह इस्लाह हो,
नज़्रे-सानी डालिये अब आप ही माँ शारदे !
आरज़ू 'अनवर' की है ज़िन्दा रहे एक-आध शे'र,
ख़त्म हो इस जिस्म की जब ज़िन्दगी माँ शारदे !
- अनिल अनवर,
33, व्यास कॉलोनी, एयर फोर्स,
जोधपुर - 342 011
मो० - 7737689066
***
आचार्य सूर्य प्रसाद शर्मा"निशिहर" माता-पिता--*श्रीमती चंद्रकला शर्मा-स्व संत प्रसाद शर्मा
जन्मतिथि--12-09-1954
शिक्षा--एम ए(संस्कृत),आचार्य (साहित्य) व्यवसाय--अवकाश प्राप्त शिक्षक
पता--822A-कृष्णा नगर(निकट राजकीय कालोनी)-रायबरेली,पिनकोड-229001--उत्तर प्रदेश
मो*09453712120
प्रकाशित पुस्तकें---छब्बीस।12पुस्तकें अवधी में और14 पुस्तकें खड़ी बोली में ।
सहभागिता---सोलह संकलनों मे सम्मान-पुरस्कार---दो बार उ प्र सरकार(उ प्र हिंदी संस्थान लखनऊ) द्वारा मलिक मुहम्मद जायसी पुरस्कार(50--50 हजार)इसके अतिरिक्त नेपाल,भूटान एवं देश के विभिन्न राज्यों की संस्थाओं द्वारा 55 सम्मान ।
रचनाएं प्रकाशित-तीस पत्र-पत्रिकाओं में ।
*
अवधी सरस्वती-वंदना
मन-घर माआजाव सुरसती महतारी ।फिरि न लउटि कै जाव सुरसती महतारी ।।
तुम्हरे रहे होइ जाइ पबित्तर ।महकै लागी जइसे इत्तरलल ।
जग म महक फइलाव सुरसती महतारी ।।
रइहौ जो बइठी पउढ़ी ठाढ़ी ।भला करै कै हिम्मति बाढ़ी ।
छिन छिन मा हुदकाव सुरसती महतारी।।
तरह तरह अनुमान करी हम ।नित्ति नीकि निरमान करी हम ।
चारि चाँद लगवाव सुरसती महतारी ।।
फैदा लें जग केरि रहइया ।चलै जबै तक जिनगी-नइया ।
"निसिहर" पार लगाव सुरसती महतारी
***
रश्मि गुप्ता
जन्म - १ जुलाई १९७३।
जीवन साथी - रामेश्वर प्रसाद गुप्ता।
शिक्षा - बी.एस सी., एम. ए., बी. एड. ।
प्रकाशन - आत्मदर्शन, सियाम मन के सीख, आडियो सी.डी. हमर भुइयां।
उपलब्धि - आकाशवाणी से प्रसारण, साहित्यिक सम्मान।
संपर्क - १५ ओंकार होम्स, राजकिशोर नगर, बिलासपुर ४९५००१।
चलभाष - ९७५५२५२६०५, ब्लॉग - rashmibsp.blogspot.in, ईमेल - rasmiguptapoet@gmailcom ।
*
सरस्वती वंदना
(धुन- जशगीत )
सुन लेबे हमरो गोहार, ओ मोर सरस्वती दाई!,
सुन लेबे हमरो गोहार.....
श्वेत बरन तोर लुगरा दाई,
श्वेत बरन तोर हंसा ओ,
तोरे दरस ले पाप धोआये,
कर्मणा वाचा मनसा ओ,
हर लेबे जग के तैं अंधियार ओ मोर सरस्वती दाई!,
हर लेबे जग के अंधियार......
जग ला तैं हर सुघर बनाये,
कंठ ला मधुर बनाए ओ,
फूल-फूल म रूप-रंग म ,
तैं हर राग सजाए ओ,
तहीं बनाए सुघ्घर ये संसार ओ मोर सरस्वती दाई!,
तहीं बनाए सुघ्घर ये संसार.....
अइसन सुंदर वीणा बजाए,
जग ल तहीं मोहाए ओ,
वेद पुराण अउ रामायण के,
गंगा तहीं बोहाए ओ,
कर देबे हमरो उद्धार ओ मोर सरस्वती दाई!,
कर देबे हमरो उद्धार......
***
रश्मिअग्निहोत्री
पति- विपिन अग्निहोत्री
पिता- स्व बिजेंद्र बाजपेयी
माता - शैल बाजपेयी
जन्मतिथि - २३.११.१९७८
शिक्षा- एम.ए . हिंदी , बी .एड.
व्यवसाय - शिक्षिका
साहित्य सेवा - पत्र- पत्रिकाओं में प्रकाशित लेख, कविताएं, चार साझा संकलन -मुझे छूना है आसमां, नारी एक आवाज़, बज़्मे हिन्द, भावांजलि ।
०७. प्राप्त सम्मान- काव्य सागर सम्मान २०१८ (राष्ट्रीय साहित्य सागर मंच से) विशिष्ट साहित्यकार सम्मान, महिला शिखर सम्मान२०१८ (वर्ल्ड ब्राह्मण फेडरेशन रायपुर) कला रत्न सम्मान २०१९ (राजधानी की सांस्कृतिक, साहित्यिक संस्था वक्ता मंच द्वारा )
पता- जन्मस्थली बलौदा बाजार
वर्तमान- केशकाल, जिला कोंडागांवस
ईमेल.harshitagnihotri2003@gmail.com
संपर्क-८४१५७६१३३५
सरस्वती मइया
(छतीसगढ़ी जसगीत)
सरस्वती दाई के सत हे अपार
देथे सब्बो ला ज्ञान के भंडार।
दाई महूं हव पाये बर आयेंव
महूं विनती करव तोर मइया ,
जय हो, जय हो सरस्वती मइया।।
सफेद कंवर तोर आसन हवय
हाथ मा दाई वीणा सजय ।
पथरा के पहिरे गलमाला
महूं विनती करव तोर मइया,
जय हो जय हो सरस्वती मइया।
सुघ्घर लुगरा हवय तोर
अंधियारा हर लेबे मोर।
निच्चट मूरख हव दाई
महूं विनती करव तोर मइया
जय हो ,जय हो सरस्वती मइया ।।
महूं चरन पखारव तोर
आजा अरज सुन ले मोर
दरस बर रददा देखते हवव
महूं विनती करव तोर मइया
जय हो, जय हो सरस्वती मइया।।
सरस्वती दाई के सत हे अपार
देथे सब्बो ल ज्ञान के भंडार।
दाई महूं हव पाये बर आयेंव
महूं विनती करव तोर दाई,
जय हो जय हो सरस्वती मइया।।
#रश्मि अग्निहोत्री
केशकाल, जिला कोंडागांव
***
श्रवण मानिकपुरी
जन्मतिथि :-१०/१०/१९८८
पिता:-श्री तुला दास मानिकपुरी
माता :-श्रीमती भगवती मानिकपुरी
जन्म स्थान कोंडागाँव
जिला कोंडागाँव
पता 449 ख राजापारा
बड़ेकनेरा कोंडागाँव
पिन४९४२२६
शिक्षा:-एम .ए. इतिहास ,अर्थशास्त्र, दी .एड.बी एड
उपलब्धि:-आकाशवाणी कलाकार हल्बी प्रभाग
गोटोक अचरित (हल्बी कविता) १५/१०/२०१९
गोटोक अचरित दखले दादा
गाय बैला बांधला पागा
मैं जाउ रले नेता घरे
दखले खुबे बंड
ये कसन जुग इली रे भाई
बाहरे दांत भीतरे टोंड
गोटोक अचरित दखले दादा
बोबो ने चूड़े तेल
उसरी बूटा चो मरन होली
सिंग सिंग चो मेल
गोटोक अचरित दखले दादा
मरलो मुर्दा
धरलो बडगा
गांव ने गागला नाई कोनी
जोन्दरा बाड़ी ले कोलिया पराये
जीव चो काल आय नोनी
गोटोक अचरित दखले दादा
बाग लगे छेरी चो नाट
तुय बले तो जानिस हुनके
हुंचो नाव आय पाक
गोटोक अचरित दखले दादा
तुय नी सकिस सुनुक
सड़क बाटे अमराले मैं
पांच मुंड दस पांय बीता मनुख
गोटोक अचरित दखले दादा
गोटकी सिंग चो गाय
बसलो लग ले चारा खाय
पाट बाटे पगराय
गोटोक अचरित दखले दादा
कोकोडा करलो गुरु
डूमर माला पिंधुन भाती
मंतर पडलो सुरु
सबके सांगलो गोठ के
मांस नी खाय
मछरी नी खाय
मंतर देउ आंय सबके
लघे इया रे मछरी मन
चेला करूँ आंय तुमके
श्रवण मानिकपुरी
कोंडागाँव
मोबाइल नम्बर 7974042092
***
परिचय ###
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कवि का नाम - सन्तोष कुमार प्रजापति "माधव"
पिता का नाम - श्री रामदास प्रजापति
जन्मतिथि - 28/ 07/ 1980
शिक्षा - परास्नातक (अंग्रेजी,हिन्दी) , बी.एड.
व्यवसाय - शिक्षक
वाॅट्सएप नं. - 96 95 94 71 53
मो. नं. - 79 05 11 41 52
पता - कस्बा,पो. - कबरई ( सुभाष नगर )
जिला - महोबा ( उ. प्र. )
पिन कोड - 210 424
मेल - santoshkumarkabrai 005@gmail.com
सरस्वती वन्दना
भाषा - बुन्देलखण्डी (बुन्देली)
मोरी मदद कर जइयो माँ, मैहर की शारदा I
आय हाय माँ मैहर की शारदा ll
विद्या, बुद्धि की भीख मैं माँगत -- 2
मोरी झोली भर जइयो माँ, मैहर की शारदा I
आय हाय माँ ۔۔۔۔ ۔۔۔۔ ۔۔۔۔
दया दृष्टि का मैं हूँ प्यासा -- 2
कृपा वृष्टि कर जइयो माँ, मैहर की शारदा I
आय हाय माँ ۔۔۔۔۔ ۔۔۔۔۔۔ ۔۔۔۔
भटक रहा हूँ मैं गलियन में -- 2
आके राह बता दइयो माँ, मैहर की शारदा l
आय हाय माँ ----- ----- -----
जब लौं जग में सूरज, चन्दा -- 2
अपनो सत्य दिखइयो माँ, मैहर की शारदा l
आय हाय माँ ----- ---- -----
जानत नइयाँ छन्द वन्दना -- 2
आके मोय बता जइयो माँ, मैहर की शारदा l
आय हाय माँ ---- ----- ----
'माधव' जी हैं शरण तिहारी -- 2
मोरी लाज रख लइयो माँ, मैहर की शारदा l
आय हाय माँ मैहर की शारदा I
मोरी मदद ۔۔۔۔ ۔۔۔۔ ۔۔۔۔
#सन्तोष कुमार प्रजापति 'माधव'
#कबरई जिला - महोबा (उ. प्र.)
#मो. नं.- 96 95 94 71 53
79 05 11 41 52
सरस्वती वन्दना
भाषा - बुन्देलखण्डी (बुन्देली)
मोरी मदद कर जइयो माँ, मैहर की शारदा I
आय हाय माँ मैहर की शारदा ll
विद्या, बुद्धि की भीख मैं माँगत -- 2
मोरी झोली भर जइयो माँ, मैहर की शारदा I
आय हाय माँ ۔۔۔۔ ۔۔۔۔ ۔۔۔۔
दया दृष्टि का मैं हूँ प्यासा -- 2
कृपा वृष्टि कर जइयो माँ, मैहर की शारदा I
आय हाय माँ ۔۔۔۔۔ ۔۔۔۔۔۔ ۔۔۔۔
भटक रहा हूँ मैं गलियन में -- 2
आके राह बता दइयो माँ, मैहर की शारदा l
आय हाय माँ ----- ----- -----
जब लौं जग में सूरज, चन्दा -- 2
अपनो सत्य दिखइयो माँ, मैहर की शारदा l
आय हाय माँ ----- ---- -----
जानत नइयाँ छन्द वन्दना -- 2
आके मोय बता जइयो माँ, मैहर की शारदा l
आय हाय माँ ---- ----- ----
'माधव' जी हैं शरण तिहारी -- 2
मोरी लाज रख लइयो माँ, मैहर की शारदा l
आय हाय माँ मैहर की शारदा I
मोरी मदद ۔۔۔۔ ۔۔۔۔ ۔۔۔۔
#स्वरचित
#सन्तोष कुमार प्रजापति 'माधव'
#कबरई जिला - महोबा (उ. प्र.)
#मो. नं.- 96 95 94 71 53
79 05 11 41 52
#ईमेल - santoshkumarkabrai005@gmail.com
***
द्वारिका प्रसाद लहरे (व्याख्याता)
शा.उ.मा.वि.इन्दौरी
पिता श्री त्रिलोकी लहरे
माता श्री उर्मिला देवी लहरे
शिक्षा-एम.ए(बी.एड)
ग्राम-मुडियापारा पोस्ट+तहसील बोड़ला जिला कबीरधाम छत्तीसगढ़
/बायपास रोड़ कवर्धा
पिन नंबर 491995
*सरसती बंदना पंथीगीत-छत्तीसगढ़ी*
सन्ना मोर नन्ना सन्ना हो मइया ओ..ll2
दुनिया हे तोर दाई,नाँव भजइया ओ..
अंतरा-(1)
नाँव अमर हावय,सरसती मइया ओ।
फूल चढावौं दाई,रोज लागौं पइयाँ
ओ..ll2
सन्ना मोर नन्ना सन्ना हो मइया ओ..ll2
अंतरा-(2)
हाथ मा हे पुस्तक,बीणा के बजइया ओ।
भटकत हँसा ला,पार लगइया ओ..ll2
सन्ना मोर नन्ना सन्ना हो मइया ओ..ll2
अंतरा-(3)
मंजूर के सवारी दाई,दुनिया चलइया ओ।
बिद्या के देबी तैं हा,राह देखइया ओ..ll2
सन्ना मोर नन्ना सन्ना हो मइया ओ..ll2
अंतरा-(4)
गर मा बिराज लेबे,ज्ञान देवइया ओ।
मैं लइका नदान हवँव,खेव देबे नइयाँ ओ..ll2
सन्ना मोर नन्ना सन्ना हो मइया ओ..ll2
अंतरा-(5)
सिक्छा धरादे मोला,लाज बचइया ओ।
तोरे गुन ला गावँव दाई,भाग के जगइया ओ..ll2
सन्ना मोर नन्ना सन्ना हो मइया ओ..ll2
रचनाकार
द्वारिका प्रसाद
बायपास रोड़ कवर्धा
छत्तीसगढ़
***
करिले विनतिया तोहार मइया सारदा भवानी ।
हर ल अज्ञनवा हमार मइया सारदा भवानी।।
भोरे से तोहरे चरनवा मे बानी।
सुमिरन मे हम त लगइले मनवा बानी।।
सुन ल दरदिया हमार मइया सारदा भवानी।
करिले विनतिया तोहार मइया सारदा भवानी ।।
हाथे मे तोहरे ! वीणा विराजे।
हंस के सवारी मुकुट सर पे साजे।।
करीं किरतनियाँ तोहार
मइया सारदा भवानी ।
हरल दरदिया हमार मइया सारदा भवानी ।।
हथवा मे माला स्फटिक धइले बाड़ू।
कमल पर आसन तू लगइले बाड़ू।।
करीं हम तोहरे धेयान मइया सारदा भवानी ।
हर ल अज्ञनवा हमार मइया सारदा भवानी ।।
डाॅ0विजय प्रसाद शुक्ल
व्याख्याता संस्कृत विभाग
संत तुलसीदास इन्टर महाविद्यालय रेहला पलामू, झारखंड
***
नाम:नरपत आसिया "वैतालिक"
जन्म दिनांक:25/08/1974
जन्म स्थान: ग्राम- खाँण, तहसील रेवदर, जिला :सिरोही, राजस्थान
माता:रतन कँवर चारण,
पिता: आवड़दान जी आशिया,
शिक्षा: BE,MMS,
संप्रति: गुजरात गेस कं लिमिटेड में सिनियर ओफिसर।
प्रकाशित पुस्तक: मेहाई सतसई,
उपलब्धि: मोहनदान जी गाड़ण स्मृति सम्मान से कृति " मेहाई सतसई " नेम प्रकाशन डेह नागौर से सम्मानित है। गुजराती, हिन्दी ,राजस्थानी की विविध पत्र पत्रिकाओं में अनवरत लेखन प्रकाशन।
डाक पता: नरपत आसिया " वैतालिक"
डी-404, श्रीधर सेन्च्युरी, सीटी पल्स सिनेमा रोड़,
बी ए पी एस स्कूल के पास में,
रांदेसन, गांधीनगरतहसील, जिला -गांधीनगर गुजरात।
पीन 382007,
मोबाईल: 9925119942
E-mail:narpatasia@gmail.com
शख्सियत : साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर- नरपत दान आसिया 'वैतालिक'
पेशे से इंजीनियर व मार्केटिंग के कार्यक्षेत्र में कार्यरत एक व्यक्ति जिसने केवल विज्ञान व प्रबंधन विषयों में अध्ययन किया और लगातार निवास गुजरात में होते हुए वे यदि साहित्य और खास तौर से राजस्थानी डिंगळ सहित ब्रज, हिंदी, गुजराती भाषा में प्रखर लेखन व सृजन करें तो निश्चय ही आश्चर्यजनक बात होगी।
साहित्य के सक्षम हस्ताक्षर विषम अध्ययन क्षेत्रों से पूर्व में भी हुए है जिन्होंने अमर रचनाएं व सृजन को नव आयाम दिये।
अभी हाल ही में राजस्थानी ग़ज़ल के फिल्मांकन के बारे में जानकारी मिली तो "खत" नामक पहली राजस्थानी ग़ज़ल को यू ट्यूब पर देख मन प्रसन्न हो गया जिसकी तह में कवि नरपतदान आसिया "वैतालिक" को जानने की जिज्ञासा से यह शख्सियत आपके सामने है।
वैतालिक का शाब्दिक अर्थ स्तुति गायक व जादूगर होता है इस उपसर्ग को वैतालिक पूर्ण सार्थक कर रहे है। वे वस्तुतः डिंगळ, हिंदी, ब्रज, गुजराती सहित उर्दू साहित्य में शब्दों व भाव रचनाओं के किसी अप्रतिम जादूगर से कम नहीं। विभिन्न भाषाओं पर उनकी साहित्यिक पकड़ यह सिद्द भी करती है।
प्राथमिक जानकारी में एक इंजीनियर का सुनकर उत्सुकता बढ़ गयी और एक अत्यंत रोचक व्यक्तित्व उभर कर सामने आया "वैतालिक" का।
कवि नरपत आवडदान आसिया "वैतालिक" राजस्थानी, हिंदी, उर्दू, गुजराती और ब्रज भाषा की कविता के उभरते हुए सफल हस्ताक्षर हैं। आप ग्राम खांण, तहसील रेवदर, जिला सिरोही (राजस्थान) से हैं। आप का जन्म राजस्थान में उनके ननिहाल ग्राम मलावा, तहसील रेवदर, जिला सिरोही में उनके नानाजी कवि अजयदान जी लखदान जी रोहडिया के यहाँ को हुआ।
साहित्य की विरासत उनको वैसे तो वंश परंपरागत ही मिली क्योंकि वह उसी परिवार से ताल्लुक रखते है जिसमे चारण रत्न लाडूदानजी आसिया जो बाद में स्वामी नारायण संप्रदाय के प्रसिद्ध संत ब्रहमानंद स्वामी बने। ब्रह्मानंद स्वामी अपने जमाने के नामचीन कवि और विद्वान थे। जिनके चर्चरी, रेणकी और ऐसे कई छंद और ब्रज भाषा के पद आज भी गुजरात और राजस्थान के लोक मानस में रमे हुए हैं और जन जन के कंठ के हार बने हुए हैं।
"वैतालिक" को प्रारंभिक कविता की शिक्षा उनके नानाजी अजयदान जी लखदान जी रोहडिया से मिली। जो महाराव लखपत जी ब्रजभाषा काव्य पाठशाला भुज के अंतिम विद्यार्थीयों में से एक थे। आप राजस्थानी और ब्रज भाषा के एक ख्यातिप्राप्त कवि रहे।
कवि वैतालिक ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गुजरात के विभिन्न जगहों पर ली। मोरबी मे लखधीर जी इन्जीनियरींग कोलेज से इन्होने बी ई (इन्डस्ट्रीयल ) में किया। बाद में एम बी ए राजस्थान के मालवीय रिजनल इन्जीनियरींग कॉलेज से किया। वर्तमान में वे गुजरात सरकार की ऑइल और गैस क्षेत्र की कंपनी में सीनियर ऑफिसर के पद पर गांधीनगर में काम कर रहे हैं।
सोशियल मीडिया में इनका एक ग्रुप "डिंगळ री डणकार" काफी लोकप्रिय हुआ था। जिसमें नव कवियों के साथ छंद बद्ध कविता और डिंगळ गीत की विलुप्त साहित्यक धरोहर को कैसे संजोकर अक्षुण्ण रखा जाए उसके सामूहिक प्रयास किए जाते और विधा से सबको लाभ पहुंचा।
वैतालिक ने "डिंगळ में ग़ज़ल" जैसी विधा को नव आयाम देकर सृजन को नई दिशा प्रदान की है।
आप की प्रमुख रचनाए मेहाई सतसई (सात सो दोहो का संग्रह) प्रकाशित कृति है जिसको नेम प्रकाशन डेह, नागौर कि तरफ से मोहनदान गाडण राजस्थानी भक्तिकाव्य पुरस्कार भी मिला हुआ है। मां मोगल मछराळ शतक (मोगल मां के एक सो आठ दोहों का संग्रह), आवड आखे आसिया ( आवड मां पर दोहै लगभग 300 रचना जारी), मेघदूत का राजस्थानी में भावानुवाद, कृष्ण के विभिन्न चित्रों पर दोहा लेखन (करीब चार सो दोहै) आवड मां पर त्रिकूट बंध गीत, त्रिभंगी छंद, भेरूजी का त्रिभंगी छंद, नवनाथ का त्रिभंगी छंद, गणेश का त्रिभंगी छंद, चामुंडा का रोमकंद छंद, नव दुर्गा का रोमकंद/त्रिभंगी छंद बनाए है। समस्त रचनाओं का उल्लेख करना यहां संभव नही है।
सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि गुजरात में रहते हुए डिंगळ में सृजन, पोषण व नव आयाम स्थापना जैसे कार्यो को राजस्थानी के तमाम विद्वान बहुत श्रेष्ठ दृष्टि से देखते है और वैतालिक के समर्पण व सृजन को सम्मान प्रदान करते है।
नरपतदान आशिया 'वैतालिक' राजस्थानी/डिंगळ भाषा की ग़ज़ल, कविता सहित विभिन्न शैलियों सहित हिंदी, गुजराती व उर्दू की परंपरा को सजीव व जीवंत बनाए रखने हेतु भी विभिन्न प्रयास कर रहे है तथा कविता व साहित्य को निरन्तर पोषित कर रहे है।
प्रभाकर ऐश्वर्य पुरोहित, जोधपुर (राजस्थान)
घूंघर छम छम छम छम बाजै।
रसन पटांगण रमे चारणी, सबद बीण कर साजै।।
ऊजल़ आनन हार अनुपम,स्फटिक धवल शुभधारी!
आई नाचे रसन अखाड़ै, वसन श्वेत वरदा री!
घम घम घम घम पद रव गूंजे जाणक नभ घन गाजै!!१
घूंघर छम छम छम छम बाजै।
रसन पटांगण रमे चारणी, सबद बीण कर साजै।।
नवलख तारा जांण निरंतर, नवलख निरखणहारा!
धार नवलखा खड़ी नवेलख,सज सोल़ह सिणगारा!
धवल नवल शुभ कमल धारणी, नवलख बीच बिराजै।२
घूंघर छम छम छम छम बाजै।
रसन पटांगण रमे चारणी, सबद बीण कर साजै।।
डम डम डम डम डाक बजंती, झणण बीण झणकारा!
खणणण खणणण बजै खंजरी,सणणण बजै सितारा!
तिरकिट तुम तत, धिधिकट धुम धत, चंग मृदंगम बाजै!!३
घूंघर छम छम छम छम बाजै।
रसन पटांगण रमे चारणी, सबद बीण कर साजै।।
कविता -केसर, सुर-सिंदुरम, लय छंदां री लाली!
ग़ज़ल गीत कुमकुम नभ बरसत, नाचत आभ-कपाल़ी!
अनहद ऊडत अबीर गुलालां, निरखण "नरपत"जाजै।।
घूंघर छम छम छम छम बाजै।
रसन पटांगण रमे चारणी, सबद बीण कर साजै।।
सरस्वती वंदना-1
दोहा
स्वरदे! वरदे! शारदे, भरदे उर मँह भाव।
पर दे लय औ छंद रा, मन -खग कवित उछाव।। १
वाणी वीणापाणिनी, पुस्तकपाणी मात।
धवल कमल शुभ आसनी, आखर दे अवदात।। २
फटिक माल गल़ फूटरी, गिरा गौर शुभगात।
रीझ बसौ बालक रसन, हंसवाहिनी मात।। ३
गण मात्रा वल़ वरण लय, यति जुत छंद सरोज।
समपूं चरणां शारदा, राजी राखण रोज।। ४
नमो मात कमलासनी, वीणा पुस्तक घार।
धवल वसन, बसियो रसन, कीजो मां उपकार।। ५
धवलांबरधरनी नमन, धवल कमल आसन्न।
धवल स्फटिक माला पहन, बसियै गिरा रसन्न।। ६
वरदानी वाणी नमन, वीणापाणी मात।
नवल शब्द नव भाव दे, नरपत को अवदात।। ७
कविता नवलख हार शुभ, जडियल भाव जडाव।
धवलांबर धारण करो, कंठ करै घण चाव।। ८
देवौ आखर दान, भाव दिरावौ भारती।
नरपत सुत नादान, मांगै इतरो मावडी।। ९
आखर दानी आप, भाव उपानी भव्यतम।
महर करो मां-बाप, वीण पाण वागीसरी।। १०
शुभ उकती दे शारदा, काव्य कथन मय भाव।
अरजी नरपत री सुणों, दिल री वड दरियाव।। ११
भाव दिरावौ भव्यतम, शुभ आखर रे साथ।
शबद सुमन खारिज न ह्वै, मांगूं इतरो मात।। १२
माल़ा मोतीदाम री, कर धर कागद-कंज।
गिरा ज्ञान दाता सदा, मेटौ मन रा रंज।। १३
रोमकंद अर रेणकी, तणी बीण कर लेय।
बैठी मां वागीसरी, अनहद आणंद देय।। १४
मनहर, मत्तगयंद गति, गीत सोहणो गात।
सुरसत वंदन आप नें, मनसुध हे! जगमात।। १५
छंद - चंचरीक
धवलासन -कमल- धार, विमला, पट -धवल-वार,हाटकमय फटिक- हार, गल़ बिच सोहै।
मरकत- मणि- मुकुट माथ, पुस्तक- कर, माल हाथ,सुर नर मुनि गात गाथ, वंदत तोहै।
मन रे बैठर मराल, नितप्रत करती निहाल,बरसावै हेत व्हाल, कंबुज पाणी।
सुर लय यति छंद साज, कविता शुभ दियण काज,रसना रहियो विराज, वरदा वाणी।। १
सुंदर झंकृत सितार, बाजत पुनि बार बार,अद्भुत घ्वनि ह्वैअपार, आंगण थांरे।
नरतन तत थै तथा न, सा रे गा साम गान,धिधिकट धत धत धितान, सुर लय वारे।
किन्नर सुर यक्ष नाग, रिषि मुनि जतिराज राग,स्तवन करत जाग जाग, पंडित ज्ञानी।
सुर लय यति छंद साज, कविता शुभ दियण काज,रसना रहियो विराज, वरदा वाणी।। २
तोटक, दोधक, गयंद, अमृत ध्वनि त्रिकुटबंध,उल्लाला रोमकंद, मनहर, गाथा।
पद्य, गद्य, अर, प्रबंध, नाटक, चम्पू, निबंध,गीत, गज़ल, मुक्त, छंद, सब री दाता।
पिंगल करणी प्रबीन, डिंगल डक नाद दीन,नित प्रत समपौ नवीन, उकति कल्यांणी।
सुर लय यति छंद साज, कविता शुभ दियण काज,रसना रहियो विराज, वरदा वाणी।। ३
कमले!कर कमल बीन, शुभ्र कमल पर आसीन,नयन कमल शुभ नवीन, देखो देवी।
नरपत राखौ नजीक, चरण कमल चंचरीक,ठौड आप चहूं ठीक, शुधचित सेवी।
कमलजतनया सुगेह, रसन-कमल करो थेह,मन सुध अरजी थनें ह, पुस्तक पाणी।
सुर लय यति छंद साज, कविता शुभ दियण काज,रसना रहियो विराज, वरदा वाणी।। ४
मां म्हूं मतिमंद मूढ, आखर भाखर त्रिकूट,कविता पथ गहन गूढ, चलणौ दोरो।
लय यति गति ना विधान, नव-रस, नव-छंद ज्ञाननरपत नटखट नादान, बाल़क थोंरो।
नवरस री आप नूर, दगधाक्षर करो दूर,ममतामयि मां जरूर, स्वरदा राणी।
सुर लय यति छंद साज, कविता शुभ दियण काज,रसना रहियो विराज, वरदा वाणी।। ५
सोहत शिणगार सार, उपमा रूपक अपार,उत्प्रेक्षा कंठ हार, विध विध रूपी।
अनुपम अनुप्रास खास, हिय जिण सुण ह्वै हुलास,मन री मेटत उदास, अमरत कूंपी।
वयण सगाई विशेष, विध विध परिवेश वेश,शुभ तन सोहत हमेश, घवला राणी।
सुर लय यति छंद साज, कविता शुभ दियण काज,रसना रहियो विराज, वरदा वाणी।। ६
नीलम छबि श्याम रंग, देखत हिव ह्वै उमंग,घट में कविता प्रसंग, अनहद जागे।
वालमीक वेद व्यास, कविशेखर कालिदास,रसना नित रमत रास, रीझी रागे।
दीजो शुचि उकति दान, शारद मां सामगान,वरदे नवरस निधान, जग तौ जाणी।
सुर लय यति छंद साज, कविता शुभ दियण काज,रसना रहियो विराज, वरदा वाणी।। ७
अमला विमला अनूप, ध्यावूं कर दीप धूप,जय जय जोती सरूप, दस दिस देखी।
उतपति थिति प्रलय आप, प्रकृति रचना कलाप,वपु वपु बस आप व्याप, लोचन लेखी।
गहन तिमिर घन समान, काटौ करूणानिधान,दो जन मन ज्ञान दान, बाल़क जांणी।
सुर लय यति छंद साज, कविता शुभ दियण काज,रसना रहियो विराज, वरदा वाणी।। ८
कलश छप्पय
वरदे वीणापाणि, शारदे सुंदर स्वर दे।
भरदे मन में भाव, कल्पना खग नें पर दे।
करदे मां कमनीय, छंद, गति, लय आखर दे।
हर दे मन रौ मैल, हटा तम के घन परदे।
नित नरपत नित प्रत तौ जपै, गिरा, शारदा, भारती।
शुभ उकति कथ्य भाषा सरल, दीजो शुभ चित, शुचि मति।।
©नरपत वैतालिक
🌹सरस्वती आवाहन -3 🌹
दोहा
कर्ण फूल धर कमल रा, कमल विमल शुभ हार।
कमल कमल मन पद्मजा, विमल भाव विस्तार।।१
ह्रदय-कमल-मम-चाखड़ी, चरण कमल तव चारु।
जननी धारण कर गिरा, धूल पाँव दूं झारु।।२
विमला, वीणा-वादिनी, मान मात मनुहार।
झंकृत कर दे जोगणी, ह्रद तंत्री रा तार।।३
छंद अडिल्ल
विमल देह वाणी ब्रह्माणी,
सादर आव अठै सुर राणी।
लय छंदों री करवा ल्हाणी,
वसौ कंठ मां वीणा पाणी।।१
धवल कमल धारण धणियांणी।
कविता कारण कंबुज पाणि।।
रसा !रसन आसन पर राजौ।
वीणा तार सितार बजाजौ। २
आनन पूनम चंद अनुपम।
करती आभा मन रो तम कम।
आई वाणी आभ कपाल़ी।
सिर पर पर बिंदी सेत निराल़ी। ३
आँखडियां काल़ी अणियाल़ी।
कृपा निझरण तौ करुणाली।
नरपत नित प्रत रहै निहाल़ी।
वंदन वाणी वीस भुजाल़ी।।४
नक बेसर नाकां नथ नामी।
भवा, भैरवी, स्वरा, भजामी।।
करण फूल कनकं कर धारण।
सदा आव मन तिमिर संहारण।।५
सेत पुष्प जुत सुंदर वाल़ी।
लटा वासुकी नागण भाल़ी।
बैठ लहरती वपु वड डाली।
धवल कांचल़ी धर कमलाल़ी।।६
हाटक हीरक हार हिया में।
फटिक रत्न फबता शुभ जा में।
हेम हांसली है मन हारी।
मणिमय जिणपर मीनाकारी।।७
कंठाभरण, कनक सुभ तन पर।
रसा!शारदा रूप मनोहर।।
मोती री लड सुंदर नामी।
गल़ धर तिमणियौ हंसगामी।।८
कर शुचि कंकण वलयाकारा।
रसा! दांत करि चूड शुभ धारा।
झणण झणण झण बीण बजंती।
तिरकिट तुम तत नाच करंती। ९
वरदा हाथ एक ले वेदा।
स्वरदा माल करा शुचि जयदा।
कमले शुभ्र कमल कर पाणि।
रीझ रीझ माता सुर राणी। १०
कटि किंकणि धुनि ह्वै कमनीयं।
रुण झुण रुण झुण रव रमणीयं।
अनहद नाद बजंत अपारा।
सुरसत रेलावै सुर धारा। ११
उत्तरीय शुभ धवल अंग धर।
कंचुकि धवला कमल मनोहर।
पद छम छम छम छम धुनि पायल,
रम झम ऱम झम रव रासायन।।१२
मन मराल पर बैठर माता।
आखर भाव दयौ अवदाता।।
चरण कमल, रो चाकर कीजो।
गिरा ग्यान, कविता गुण दीजौ।।१३
नरपत दान निपट नादानम्।
गिरा आप कीजौ गुणवानम्।
बालक अवगुण बगस भवानी।
जय जय जोगण जय जग राणी।।१४
स्वर दे !वरदे!लय दे सुमति।
जय दे!गय दे!हय दे!जयति।
जयति जयति जय वीणापाणी।
कृपा अहरनिश कर कल्यांणी।।१५
कलश छप्पय
जय शारद जगदंब, भैरवी, रसा, भारती।
कवि -कुल-कृपा कदंब, उतारूं, गिरा, आरती।
चंदन चर्चित भाल, व्याल सम केश मनोहर।
सिंदुर अर्चित गात, सुखद पंचम स्वर सुंदर।।
जगदंब अंब अनुनय जया, वरा! मरालं वाहिनी।
स्वर नाद छंद लय साम दे, "नरपत"ने वरदायिनी।।१
दोहा
चंदन चर्चित चारणी, सिंदुर अर्चित गात।
रसन कमल पर रास नित, रमों मांन नवरात।।१
जयति जयति जगदंबिका, सदा रहौ शिशु साथ।
बीस भुजी वरदायिनी, स्वरदायी साक्षात।।२
©नरपत वैतालिक
🌹सरस्वती वंदना🌹
🌺दोहा🌺
कमल तंतु रो कंचुऔ, विमल देह पर धार।
रसन कमल बैठ 'र रसा, रेलावौ रस धार।। १
कमल नयनि, आनन कमल, कमल देह विस्तार।
कमलासन हिय कमल बस, अंब करो उपकार।। २
मन रंग थल पर मावडी, किसलय कमल अपार।
आसन बैठ'र अंबिका, सुर री छेड सितार।। ३
नटी !रसन आसन रहौ, वसन सेत बस धार।
लय री ललिता! छेडजे, सुरमय पछै सितार।। । ४
पिंगल री पद पैजनी, कर धर डिंगल डाक।
रसन पटांगण रास रम, अनहद अंब अथाक।। ५
🌺छंद हरिगीतिका/सारसी🌺
शुभ स्वेत वसना, ललित रसना, दडिम -दसना, उज्जवला।
कलहंस करती, फरर फरती, तिमिर हरती, निर्मला।
सिर मुकुट सुंदर, हार गल वर, माल मनहर कर अति।
प्रिय पुस्तपाणि, वाक-वाणी, वीण पाणी, सरसती।। १
झल़ रूप जल़ हल़, तेज भल़ हल़, चंद्र निरमल़, शुभ स्वरा।
कमनीय कुंतल, स्वेत पाटल, चंप -डोलर मोगरा।
मुख मधुर हासी, भव्य भासी, रूप राशि, गुणवती।
प्रिय पुस्त पाणी, वाक वाणी, वीण पाणी, सरसती।। २
झण झांझ झणणण, तंत्री तणणण, खणणखणण, खंजरी।
भण भेरि भणणण, धरणि धणणण, छणण छणण, झांझरी।
रव गगन गणणण, हरत जन मन, बीण वृणणण, नित प्रति।
प्रिय पुस्त-पाणी, वाक-वाणी, वीणपाणी, सरसती।। ३
कटि किंकणि रुण झुण, वलय कंकण, खणण खण खण, हाथ रा।
रमझोल़ रम रम, नुपुर छम छम, घुंघरु घम घम, मात रा।
गजमत्त गामा, वंदना मां, हियै हामां, पद रति।
प्रिय पुस्त-पाणी, वाक-वाणी, वीणपाणी, सरसती।। ४
शुभ कान कुंडल, नाक नथ वल़, सेत निरमल, कांचल़ी।
जिण कोर ऊजल, हेम झल़ल़ल, भाल भल़ल़, बेंदुली।
चख नेह खल़ हल, वहै पल पल, मैल मन गल़, शुचिमति।
प्रिय पुस्त-पाणी, वाक-वाणी, वीणपाणी, सरसती।। ५
शुभकमल आसनि, रसन वासिनि, ह्रदय शासनि, रीझियो।
विपदा विनासन, हंस वाहन, साम गायन, दीजियो।
सुर साज रांणी, कवित क्हाणी, राज-राणी, अरपती।
प्रिय पुस्त-पाणी, वाक-वाणी, वीणपाणी, सरसती।। ६
वल़ विविध वातां, खरी ख्यातां, गीत गाथा, डींगल़ी।
शुभ रचण रासा, विविध भासा, रमों रासा, मन गल़ी।
त्रय ताप हारी, जाउं वारी, मात मारी, लधु मति।।
प्रिय पुस्त पाणी, वाक-वाणी, वीण पाणी, सरसती।। ७
हे कमल नैणी, मधुर वेैणी, ज्ञान देणी, शारदा।
शुभ उकति दाता, बुधि प्रदाता, गिरा माता, आरदा।
घन तिमिर गंजण, तूं प्रभंजण, करत वंदन"नरपति"।
प्रिय पुस्त पाणी, वाक-वाणी, वीण पाणी, सरसति।। ८
🌺कलश छप्पय🌺
विजया, नंदा, जया, शारदा श्यामा, भाषा।
विद्या, बाला, परा, धीषणा, रसना-वासा।
मेधा, दक्षा, क्षया, चारणी, कबरी, स्वाहा।
प्रभा, अपर्णा, उमा, केशी, गो, हे हंस वाहा।
गी, सिंदूर-तिलक प्रिया!, भवा!सांभवी, भैरवी।
नित नरपत भज नारायणी, वरदा!स्वरदा, यादवी।। १
दोहा
रसा !शारदा !भारती, गिरा वारिधि-ज्ञान।
मन तम घन मां मेटजै, नरपत शिशु नादान।। १
विमला थें वसू पर किया, मूरख नें विद्वान।
बाल़क नें पण बुध्धि दे, गिरा गुणों री खाण।। २
©नरपत वैतालिक
***
इस दिन
2 वर्ष पहले
20 अक्टूबर 2019 
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*वीणावादिनी की वंदना* (स्वरचित)
****************************
*दोहा*:-
विमल विमद वरदायिनी, वर दे विरद विवेक।
वरदहस्त वागेश्वरी, विनती 'अमित' अनेक।।
*चौपाई*:-
वंदन शुभदा सादर शारद। वर्ण वाक्य की आप विशारद।।
वरदात्री हे जग कल्याणी। वेणु मधुर हो मेरी वाणी।।~1
वाग्देवी जय वीणाधारी। वैभव व्यापक हंस सवारी।।
विद्यादेवी आदि भवानी। विमला विविधा विधा विधानी।।~2
वाराही विधि गति-मति वाचक। वरदायक त्रिभुवन संचालक।।
विधिरानी वर ज्ञान विधाता। विपदा हर सरस्वती माता।।~3
वागपेत की सुर संरचना। वसुदा वसो सदा ही रसना।।
वरदानी श्रीप्रदा भारती। वर्णमातृका आप आरती।।~4
विद्यारूपा हृदय विमलता। विनय करूँ दीजिये सफलता।।
वेदान्ती हर अमित वेदना। विद्याश्री अब रहे भेद ना।।~5
वर दे विद्याभूषित वैभव। वरदेय आप सब कुछ संभव।।
वसन श्वेत धारिणी शारदा। विपुल साथ है व्याप्त संपदा।।~6
विष विमोह से करहु वियोजन। विशद विश्वहित करहु नियोजन।।
वागीशा अति वक्ष विशाला। विभा विभूषित मुक्ता माला।।~7
विकट विश्व यह लगता वाधन। वंदनीय वाणी आराधन।।
विकल विकारी सभी हरो माँ। विचलित उर वेधनी धरो माँ।।~8
व्योम धरातल तक विस्तारा। वैभवशाली माँ वाग्धारा।।
विनत मष्तिका शारद वंदन। वक्षस्थल में है
अभिनंदन
।।~9
व्यसन वासना शोक विहंता।वाचिक वादिक कला अनंता।।
व्यवहारी वैभाषिक वीक्षित। वरण आपका बनता दीक्षित।।~10
वर्ण वाक्य वाणी 'अमित', भरिये मन उजियार।
वंदन वीणावादिनी, विनती बारंबार।।
******************************
*कन्हैया साहू "अमित"*
शिक्षक~भाटापारा (छत्तीसगढ़)
संपर्क~9200252055
©opy ®ights.....06/05/18
******************************
Gajendra Karan और विनाेद कुमार जैन वाग्वर
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2 वर्ष पहले
20 अक्टूबर 2019 
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नाम:नरपत आसिया "वैतालिक"
जन्म दिनांक:25/08/1974
जन्म स्थान: ग्राम- खाँण, तहसील रेवदर, जिला :सिरोही, राजस्थान
माता:रतन कँवर चारण,
पिता: आवड़दान जी आशिया,
शिक्षा: BE,MMS,
संप्रति: गुजरात गेस कं लिमिटेड में सिनियर ओफिसर।
प्रकाशित पुस्तक: मेहाई सतसई,
उपलब्धि: मोहनदान जी गाड़ण स्मृति सम्मान से कृति " मेहाई सतसई " नेम प्रकाशन डेह नागौर से सम्मानित है। गुजराती, हिन्दी ,राजस्थानी की विविध पत्र पत्रिकाओं में अनवरत लेखन प्रकाशन।
डाक पता: नरपत आसिया " वैतालिक"
डी-404, श्रीधर सेन्च्युरी, सीटी पल्स सिनेमा रोड़,
बी ए पी एस स्कूल के पास में,
रांदेसन, गांधीनगरतहसील, जिला -गांधीनगर गुजरात।
पीन 382007,
मोबाईल: 9925119942
E-mail:narpatasia@gmail.com
शख्सियत : साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर- नरपत दान आसिया 'वैतालिक'
पेशे से इंजीनियर व मार्केटिंग के कार्यक्षेत्र में कार्यरत एक व्यक्ति जिसने केवल विज्ञान व प्रबंधन विषयों में अध्ययन किया और लगातार निवास गुजरात में होते हुए वे यदि साहित्य और खास तौर से राजस्थानी डिंगळ सहित ब्रज, हिंदी, गुजराती भाषा में प्रखर लेखन व सृजन करें तो निश्चय ही आश्चर्यजनक बात होगी।
साहित्य के सक्षम हस्ताक्षर विषम अध्ययन क्षेत्रों से पूर्व में भी हुए है जिन्होंने अमर रचनाएं व सृजन को नव आयाम दिये।
अभी हाल ही में राजस्थानी ग़ज़ल के फिल्मांकन के बारे में जानकारी मिली तो "खत" नामक पहली राजस्थानी ग़ज़ल को यू ट्यूब पर देख मन प्रसन्न हो गया जिसकी तह में कवि नरपतदान आसिया "वैतालिक" को जानने की जिज्ञासा से यह शख्सियत आपके सामने है।
वैतालिक का शाब्दिक अर्थ स्तुति गायक व जादूगर होता है इस उपसर्ग को वैतालिक पूर्ण सार्थक कर रहे है। वे वस्तुतः डिंगळ, हिंदी, ब्रज, गुजराती सहित उर्दू साहित्य में शब्दों व भाव रचनाओं के किसी अप्रतिम जादूगर से कम नहीं। विभिन्न भाषाओं पर उनकी साहित्यिक पकड़ यह सिद्द भी करती है।
प्राथमिक जानकारी में एक इंजीनियर का सुनकर उत्सुकता बढ़ गयी और एक अत्यंत रोचक व्यक्तित्व उभर कर सामने आया "वैतालिक" का।
कवि नरपत आवडदान आसिया "वैतालिक" राजस्थानी, हिंदी, उर्दू, गुजराती और ब्रज भाषा की कविता के उभरते हुए सफल हस्ताक्षर हैं। आप ग्राम खांण, तहसील रेवदर, जिला सिरोही (राजस्थान) से हैं। आप का जन्म राजस्थान में उनके ननिहाल ग्राम मलावा, तहसील रेवदर, जिला सिरोही में उनके नानाजी कवि अजयदान जी लखदान जी रोहडिया के यहाँ को हुआ।
साहित्य की विरासत उनको वैसे तो वंश परंपरागत ही मिली क्योंकि वह उसी परिवार से ताल्लुक रखते है जिसमे चारण रत्न लाडूदानजी आसिया जो बाद में स्वामी नारायण संप्रदाय के प्रसिद्ध संत ब्रहमानंद स्वामी बने। ब्रह्मानंद स्वामी अपने जमाने के नामचीन कवि और विद्वान थे। जिनके चर्चरी, रेणकी और ऐसे कई छंद और ब्रज भाषा के पद आज भी गुजरात और राजस्थान के लोक मानस में रमे हुए हैं और जन जन के कंठ के हार बने हुए हैं।
"वैतालिक" को प्रारंभिक कविता की शिक्षा उनके नानाजी अजयदान जी लखदान जी रोहडिया से मिली। जो महाराव लखपत जी ब्रजभाषा काव्य पाठशाला भुज के अंतिम विद्यार्थीयों में से एक थे। आप राजस्थानी और ब्रज भाषा के एक ख्यातिप्राप्त कवि रहे।
कवि वैतालिक ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गुजरात के विभिन्न जगहों पर ली। मोरबी मे लखधीर जी इन्जीनियरींग कोलेज से इन्होने बी ई (इन्डस्ट्रीयल ) में किया। बाद में एम बी ए राजस्थान के मालवीय रिजनल इन्जीनियरींग कॉलेज से किया। वर्तमान में वे गुजरात सरकार की ऑइल और गैस क्षेत्र की कंपनी में सीनियर ऑफिसर के पद पर गांधीनगर में काम कर रहे हैं।
सोशियल मीडिया में इनका एक ग्रुप "डिंगळ री डणकार" काफी लोकप्रिय हुआ था। जिसमें नव कवियों के साथ छंद बद्ध कविता और डिंगळ गीत की विलुप्त साहित्यक धरोहर को कैसे संजोकर अक्षुण्ण रखा जाए उसके सामूहिक प्रयास किए जाते और विधा से सबको लाभ पहुंचा।
वैतालिक ने "डिंगळ में ग़ज़ल" जैसी विधा को नव आयाम देकर सृजन को नई दिशा प्रदान की है।
आप की प्रमुख रचनाए मेहाई सतसई (सात सो दोहो का संग्रह) प्रकाशित कृति है जिसको नेम प्रकाशन डेह, नागौर कि तरफ से मोहनदान गाडण राजस्थानी भक्तिकाव्य पुरस्कार भी मिला हुआ है। मां मोगल मछराळ शतक (मोगल मां के एक सो आठ दोहों का संग्रह), आवड आखे आसिया ( आवड मां पर दोहै लगभग 300 रचना जारी), मेघदूत का राजस्थानी में भावानुवाद, कृष्ण के विभिन्न चित्रों पर दोहा लेखन (करीब चार सो दोहै) आवड मां पर त्रिकूट बंध गीत, त्रिभंगी छंद, भेरूजी का त्रिभंगी छंद, नवनाथ का त्रिभंगी छंद, गणेश का त्रिभंगी छंद, चामुंडा का रोमकंद छंद, नव दुर्गा का रोमकंद/त्रिभंगी छंद बनाए है। समस्त रचनाओं का उल्लेख करना यहां संभव नही है।
सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि गुजरात में रहते हुए डिंगळ में सृजन, पोषण व नव आयाम स्थापना जैसे कार्यो को राजस्थानी के तमाम विद्वान बहुत श्रेष्ठ दृष्टि से देखते है और वैतालिक के समर्पण व सृजन को सम्मान प्रदान करते है।
नरपतदान आशिया 'वैतालिक' राजस्थानी/डिंगळ भाषा की ग़ज़ल, कविता सहित विभिन्न शैलियों सहित हिंदी, गुजराती व उर्दू की परंपरा को सजीव व जीवंत बनाए रखने हेतु भी विभिन्न प्रयास कर रहे है तथा कविता व साहित्य को निरन्तर पोषित कर रहे है।
प्रभाकर ऐश्वर्य पुरोहित, जोधपुर (राजस्थान)
घूंघर छम छम छम छम बाजै।
रसन पटांगण रमे चारणी, सबद बीण कर साजै।।
ऊजल़ आनन हार अनुपम,स्फटिक धवल शुभधारी!
आई नाचे रसन अखाड़ै, वसन श्वेत वरदा री!
घम घम घम घम पद रव गूंजे जाणक नभ घन गाजै!!१
घूंघर छम छम छम छम बाजै।
रसन पटांगण रमे चारणी, सबद बीण कर साजै।।
नवलख तारा जांण निरंतर, नवलख निरखणहारा!
धार नवलखा खड़ी नवेलख,सज सोल़ह सिणगारा!
धवल नवल शुभ कमल धारणी, नवलख बीच बिराजै।२
घूंघर छम छम छम छम बाजै।
रसन पटांगण रमे चारणी, सबद बीण कर साजै।।
डम डम डम डम डाक बजंती, झणण बीण झणकारा!
खणणण खणणण बजै खंजरी,सणणण बजै सितारा!
तिरकिट तुम तत, धिधिकट धुम धत, चंग मृदंगम बाजै!!३
घूंघर छम छम छम छम बाजै।
रसन पटांगण रमे चारणी, सबद बीण कर साजै।।
कविता -केसर, सुर-सिंदुरम, लय छंदां री लाली!
ग़ज़ल गीत कुमकुम नभ बरसत, नाचत आभ-कपाल़ी!
अनहद ऊडत अबीर गुलालां, निरखण "नरपत"जाजै।।
घूंघर छम छम छम छम बाजै।
रसन पटांगण रमे चारणी, सबद बीण कर साजै।।
सरस्वती वंदना-1
दोहा
स्वरदे! वरदे! शारदे, भरदे उर मँह भाव।
पर दे लय औ छंद रा, मन -खग कवित उछाव।। १
वाणी वीणापाणिनी, पुस्तकपाणी मात।
धवल कमल शुभ आसनी, आखर दे अवदात।। २
फटिक माल गल़ फूटरी, गिरा गौर शुभगात।
रीझ बसौ बालक रसन, हंसवाहिनी मात।। ३
गण मात्रा वल़ वरण लय, यति जुत छंद सरोज।
समपूं चरणां शारदा, राजी राखण रोज।। ४
नमो मात कमलासनी, वीणा पुस्तक घार।
धवल वसन, बसियो रसन, कीजो मां उपकार।। ५
धवलांबरधरनी नमन, धवल कमल आसन्न।
धवल स्फटिक माला पहन, बसियै गिरा रसन्न।। ६
वरदानी वाणी नमन, वीणापाणी मात।
नवल शब्द नव भाव दे, नरपत को अवदात।। ७
कविता नवलख हार शुभ, जडियल भाव जडाव।
धवलांबर धारण करो, कंठ करै घण चाव।। ८
देवौ आखर दान, भाव दिरावौ भारती।
नरपत सुत नादान, मांगै इतरो मावडी।। ९
आखर दानी आप, भाव उपानी भव्यतम।
महर करो मां-बाप, वीण पाण वागीसरी।। १०
शुभ उकती दे शारदा, काव्य कथन मय भाव।
अरजी नरपत री सुणों, दिल री वड दरियाव।। ११
भाव दिरावौ भव्यतम, शुभ आखर रे साथ।
शबद सुमन खारिज न ह्वै, मांगूं इतरो मात।। १२
माल़ा मोतीदाम री, कर धर कागद-कंज।
गिरा ज्ञान दाता सदा, मेटौ मन रा रंज।। १३
रोमकंद अर रेणकी, तणी बीण कर लेय।
बैठी मां वागीसरी, अनहद आणंद देय।। १४
मनहर, मत्तगयंद गति, गीत सोहणो गात।
सुरसत वंदन आप नें, मनसुध हे! जगमात।। १५
छंद - चंचरीक
धवलासन -कमल- धार, विमला, पट -धवल-वार,हाटकमय फटिक- हार, गल़ बिच सोहै।
मरकत- मणि- मुकुट माथ, पुस्तक- कर, माल हाथ,सुर नर मुनि गात गाथ, वंदत तोहै।
मन रे बैठर मराल, नितप्रत करती निहाल,बरसावै हेत व्हाल, कंबुज पाणी।
सुर लय यति छंद साज, कविता शुभ दियण काज,रसना रहियो विराज, वरदा वाणी।। १
सुंदर झंकृत सितार, बाजत पुनि बार बार,अद्भुत घ्वनि ह्वैअपार, आंगण थांरे।
नरतन तत थै तथा न, सा रे गा साम गान,धिधिकट धत धत धितान, सुर लय वारे।
किन्नर सुर यक्ष नाग, रिषि मुनि जतिराज राग,स्तवन करत जाग जाग, पंडित ज्ञानी।
सुर लय यति छंद साज, कविता शुभ दियण काज,रसना रहियो विराज, वरदा वाणी।। २
तोटक, दोधक, गयंद, अमृत ध्वनि त्रिकुटबंध,उल्लाला रोमकंद, मनहर, गाथा।
पद्य, गद्य, अर, प्रबंध, नाटक, चम्पू, निबंध,गीत, गज़ल, मुक्त, छंद, सब री दाता।
पिंगल करणी प्रबीन, डिंगल डक नाद दीन,नित प्रत समपौ नवीन, उकति कल्यांणी।
सुर लय यति छंद साज, कविता शुभ दियण काज,रसना रहियो विराज, वरदा वाणी।। ३
कमले!कर कमल बीन, शुभ्र कमल पर आसीन,नयन कमल शुभ नवीन, देखो देवी।
नरपत राखौ नजीक, चरण कमल चंचरीक,ठौड आप चहूं ठीक, शुधचित सेवी।
कमलजतनया सुगेह, रसन-कमल करो थेह,मन सुध अरजी थनें ह, पुस्तक पाणी।
सुर लय यति छंद साज, कविता शुभ दियण काज,रसना रहियो विराज, वरदा वाणी।। ४
मां म्हूं मतिमंद मूढ, आखर भाखर त्रिकूट,कविता पथ गहन गूढ, चलणौ दोरो।
लय यति गति ना विधान, नव-रस, नव-छंद ज्ञाननरपत नटखट नादान, बाल़क थोंरो।
नवरस री आप नूर, दगधाक्षर करो दूर,ममतामयि मां जरूर, स्वरदा राणी।
सुर लय यति छंद साज, कविता शुभ दियण काज,रसना रहियो विराज, वरदा वाणी।। ५
सोहत शिणगार सार, उपमा रूपक अपार,उत्प्रेक्षा कंठ हार, विध विध रूपी।
अनुपम अनुप्रास खास, हिय जिण सुण ह्वै हुलास,मन री मेटत उदास, अमरत कूंपी।
वयण सगाई विशेष, विध विध परिवेश वेश,शुभ तन सोहत हमेश, घवला राणी।
सुर लय यति छंद साज, कविता शुभ दियण काज,रसना रहियो विराज, वरदा वाणी।। ६
नीलम छबि श्याम रंग, देखत हिव ह्वै उमंग,घट में कविता प्रसंग, अनहद जागे।
वालमीक वेद व्यास, कविशेखर कालिदास,रसना नित रमत रास, रीझी रागे।
दीजो शुचि उकति दान, शारद मां सामगान,वरदे नवरस निधान, जग तौ जाणी।
सुर लय यति छंद साज, कविता शुभ दियण काज,रसना रहियो विराज, वरदा वाणी।। ७
अमला विमला अनूप, ध्यावूं कर दीप धूप,जय जय जोती सरूप, दस दिस देखी।
उतपति थिति प्रलय आप, प्रकृति रचना कलाप,वपु वपु बस आप व्याप, लोचन लेखी।
गहन तिमिर घन समान, काटौ करूणानिधान,दो जन मन ज्ञान दान, बाल़क जांणी।
सुर लय यति छंद साज, कविता शुभ दियण काज,रसना रहियो विराज, वरदा वाणी।। ८
कलश छप्पय
वरदे वीणापाणि, शारदे सुंदर स्वर दे।
भरदे मन में भाव, कल्पना खग नें पर दे।
करदे मां कमनीय, छंद, गति, लय आखर दे।
हर दे मन रौ मैल, हटा तम के घन परदे।
नित नरपत नित प्रत तौ जपै, गिरा, शारदा, भारती।
शुभ उकति कथ्य भाषा सरल, दीजो शुभ चित, शुचि मति।।
©नरपत वैतालिक
🌹सरस्वती आवाहन -3 🌹
दोहा
कर्ण फूल धर कमल रा, कमल विमल शुभ हार।
कमल कमल मन पद्मजा, विमल भाव विस्तार।।१
ह्रदय-कमल-मम-चाखड़ी, चरण कमल तव चारु।
जननी धारण कर गिरा, धूल पाँव दूं झारु।।२
विमला, वीणा-वादिनी, मान मात मनुहार।
झंकृत कर दे जोगणी, ह्रद तंत्री रा तार।।३
छंद अडिल्ल
विमल देह वाणी ब्रह्माणी,
सादर आव अठै सुर राणी।
लय छंदों री करवा ल्हाणी,
वसौ कंठ मां वीणा पाणी।।१
धवल कमल धारण धणियांणी।
कविता कारण कंबुज पाणि।।
रसा !रसन आसन पर राजौ।
वीणा तार सितार बजाजौ। २
आनन पूनम चंद अनुपम।
करती आभा मन रो तम कम।
आई वाणी आभ कपाल़ी।
सिर पर पर बिंदी सेत निराल़ी। ३
आँखडियां काल़ी अणियाल़ी।
कृपा निझरण तौ करुणाली।
नरपत नित प्रत रहै निहाल़ी।
वंदन वाणी वीस भुजाल़ी।।४
नक बेसर नाकां नथ नामी।
भवा, भैरवी, स्वरा, भजामी।।
करण फूल कनकं कर धारण।
सदा आव मन तिमिर संहारण।।५
सेत पुष्प जुत सुंदर वाल़ी।
लटा वासुकी नागण भाल़ी।
बैठ लहरती वपु वड डाली।
धवल कांचल़ी धर कमलाल़ी।।६
हाटक हीरक हार हिया में।
फटिक रत्न फबता शुभ जा में।
हेम हांसली है मन हारी।
मणिमय जिणपर मीनाकारी।।७
कंठाभरण, कनक सुभ तन पर।
रसा!शारदा रूप मनोहर।।
मोती री लड सुंदर नामी।
गल़ धर तिमणियौ हंसगामी।।८
कर शुचि कंकण वलयाकारा।
रसा! दांत करि चूड शुभ धारा।
झणण झणण झण बीण बजंती।
तिरकिट तुम तत नाच करंती। ९
वरदा हाथ एक ले वेदा।
स्वरदा माल करा शुचि जयदा।
कमले शुभ्र कमल कर पाणि।
रीझ रीझ माता सुर राणी। १०
कटि किंकणि धुनि ह्वै कमनीयं।
रुण झुण रुण झुण रव रमणीयं।
अनहद नाद बजंत अपारा।
सुरसत रेलावै सुर धारा। ११
उत्तरीय शुभ धवल अंग धर।
कंचुकि धवला कमल मनोहर।
पद छम छम छम छम धुनि पायल,
रम झम ऱम झम रव रासायन।।१२
मन मराल पर बैठर माता।
आखर भाव दयौ अवदाता।।
चरण कमल, रो चाकर कीजो।
गिरा ग्यान, कविता गुण दीजौ।।१३
नरपत दान निपट नादानम्।
गिरा आप कीजौ गुणवानम्।
बालक अवगुण बगस भवानी।
जय जय जोगण जय जग राणी।।१४
स्वर दे !वरदे!लय दे सुमति।
जय दे!गय दे!हय दे!जयति।
जयति जयति जय वीणापाणी।
कृपा अहरनिश कर कल्यांणी।।१५
कलश छप्पय
जय शारद जगदंब, भैरवी, रसा, भारती।
कवि -कुल-कृपा कदंब, उतारूं, गिरा, आरती।
चंदन चर्चित भाल, व्याल सम केश मनोहर।
सिंदुर अर्चित गात, सुखद पंचम स्वर सुंदर।।
जगदंब अंब अनुनय जया, वरा! मरालं वाहिनी।
स्वर नाद छंद लय साम दे, "नरपत"ने वरदायिनी।।१
दोहा
चंदन चर्चित चारणी, सिंदुर अर्चित गात।
रसन कमल पर रास नित, रमों मांन नवरात।।१
जयति जयति जगदंबिका, सदा रहौ शिशु साथ।
बीस भुजी वरदायिनी, स्वरदायी साक्षात।।२
©नरपत वैतालिक
🌹सरस्वती वंदना🌹
🌺दोहा🌺
कमल तंतु रो कंचुऔ, विमल देह पर धार।
रसन कमल बैठ 'र रसा, रेलावौ रस धार।। १
कमल नयनि, आनन कमल, कमल देह विस्तार।
कमलासन हिय कमल बस, अंब करो उपकार।। २
मन रंग थल पर मावडी, किसलय कमल अपार।
आसन बैठ'र अंबिका, सुर री छेड सितार।। ३
नटी !रसन आसन रहौ, वसन सेत बस धार।
लय री ललिता! छेडजे, सुरमय पछै सितार।। । ४
पिंगल री पद पैजनी, कर धर डिंगल डाक।
रसन पटांगण रास रम, अनहद अंब अथाक।। ५
🌺छंद हरिगीतिका/सारसी🌺
शुभ स्वेत वसना, ललित रसना, दडिम -दसना, उज्जवला।
कलहंस करती, फरर फरती, तिमिर हरती, निर्मला।
सिर मुकुट सुंदर, हार गल वर, माल मनहर कर अति।
प्रिय पुस्तपाणि, वाक-वाणी, वीण पाणी, सरसती।। १
झल़ रूप जल़ हल़, तेज भल़ हल़, चंद्र निरमल़, शुभ स्वरा।
कमनीय कुंतल, स्वेत पाटल, चंप -डोलर मोगरा।
मुख मधुर हासी, भव्य भासी, रूप राशि, गुणवती।
प्रिय पुस्त पाणी, वाक वाणी, वीण पाणी, सरसती।। २
झण झांझ झणणण, तंत्री तणणण, खणणखणण, खंजरी।
भण भेरि भणणण, धरणि धणणण, छणण छणण, झांझरी।
रव गगन गणणण, हरत जन मन, बीण वृणणण, नित प्रति।
प्रिय पुस्त-पाणी, वाक-वाणी, वीणपाणी, सरसती।। ३
कटि किंकणि रुण झुण, वलय कंकण, खणण खण खण, हाथ रा।
रमझोल़ रम रम, नुपुर छम छम, घुंघरु घम घम, मात रा।
गजमत्त गामा, वंदना मां, हियै हामां, पद रति।
प्रिय पुस्त-पाणी, वाक-वाणी, वीणपाणी, सरसती।। ४
शुभ कान कुंडल, नाक नथ वल़, सेत निरमल, कांचल़ी।
जिण कोर ऊजल, हेम झल़ल़ल, भाल भल़ल़, बेंदुली।
चख नेह खल़ हल, वहै पल पल, मैल मन गल़, शुचिमति।
प्रिय पुस्त-पाणी, वाक-वाणी, वीणपाणी, सरसती।। ५
शुभकमल आसनि, रसन वासिनि, ह्रदय शासनि, रीझियो।
विपदा विनासन, हंस वाहन, साम गायन, दीजियो।
सुर साज रांणी, कवित क्हाणी, राज-राणी, अरपती।
प्रिय पुस्त-पाणी, वाक-वाणी, वीणपाणी, सरसती।। ६
वल़ विविध वातां, खरी ख्यातां, गीत गाथा, डींगल़ी।
शुभ रचण रासा, विविध भासा, रमों रासा, मन गल़ी।
त्रय ताप हारी, जाउं वारी, मात मारी, लधु मति।।
प्रिय पुस्त पाणी, वाक-वाणी, वीण पाणी, सरसती।। ७
हे कमल नैणी, मधुर वेैणी, ज्ञान देणी, शारदा।
शुभ उकति दाता, बुधि प्रदाता, गिरा माता, आरदा।
घन तिमिर गंजण, तूं प्रभंजण, करत वंदन"नरपति"।
प्रिय पुस्त पाणी, वाक-वाणी, वीण पाणी, सरसति।। ८
🌺कलश छप्पय🌺
विजया, नंदा, जया, शारदा श्यामा, भाषा।
विद्या, बाला, परा, धीषणा, रसना-वासा।
मेधा, दक्षा, क्षया, चारणी, कबरी, स्वाहा।
प्रभा, अपर्णा, उमा, केशी, गो, हे हंस वाहा।
गी, सिंदूर-तिलक प्रिया!, भवा!सांभवी, भैरवी।
नित नरपत भज नारायणी, वरदा!स्वरदा, यादवी।। १
दोहा
रसा !शारदा !भारती, गिरा वारिधि-ज्ञान।
मन तम घन मां मेटजै, नरपत शिशु नादान।। १
विमला थें वसू पर किया, मूरख नें विद्वान।
बाल़क नें पण बुध्धि दे, गिरा गुणों री खाण।। २
©नरपत वैतालिक
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नाम,:स्व अजयदान लखदान जी रोहड़िया।
जन्म तारीख:अग्यात,
जन्म स्थल: ग्राम: मलावा, तहसील रेवदर, जिला सिरोही, राजस्थान।
माता:मीरां कँवर
पिता:लखदान जी जगतदान जी रोहड़िया।
शिक्षा: एम ए हिन्दी साहित्य, कच्छ की महाराओ लखपत जी ब्रज भाषा के अंतिम विद्यार्थीओं में से एक।
विभिन्न साहित्यक पत्र पत्रिकाओं में रचनाएँ, हिन्दी , ब्रज भाषा राजस्थानी डिंगल आदि में प्रकाशित। अपने जमाने के बेहतरीन डिंगल और ब्रज भाषा के कवि।
🌸दोहा🌸
किंकर सिर पर कमल कर, कर के विघ्न विदार।
करत स्तुति कर जोर कर, सुरसती कर स्वीकार।।१
🌸छंद रेणंकी🌸
निरमल नव इन्दु बदन विलसत भल, द्रग खंजन मृग मद दलितम्।
कुम कुम वर भाल बिन्दु कल भ्राजत, तन चंदन चरचित पुनितम्।
झल़कत अरू झल़ल़ झल़ल़ चल लोलक, लसत सु श्रवण ललाम परम्।
शारद कर प्रदत सुक्ति यह सुखकर, किंकर पर नित महर करम्।।१
दमकत सिर मुकुट दिव्य दिनकर सम, मन मोहिनि उर माल लसे।
लख लख रति रम्य रूप जेहि लाजत, तडित विनिन्दित तन विलसे।
तिन पर नित नवल विमल धवलांबर, विविध तरह अरू धरत वरं।
शारद कर प्रदत सुक्ति यह सुखकर, किंकर पर नित महर करम्।।२
सरसत जिहि स्फटिक माल लिय ललितम, तरुण अरुण कर कंज अतिम्।
बिलसत पुनि बीन कलित मन हुलसत, ग्रहित पुस्तकं गहन गतिम्।
जिन कर जस विशद वरद जग व्यापक, प्रणित अमित मति देत परम्।
शारद कर प्रदत सुक्ति यह सुखकर, किंकर पर नित महर करम्।।३
हरषित जिहि चढत हंस पर मनहर, बन निज जन मन महि विहरम्।
सदगति सुख सुमति देत संपति धृति, सुरत करत तिन काज सरम्।
नव नव अरु ज्ञान भरत उर निरमल, निविड अबुधि हर तम निकरम्।
शारद कर प्रदत सुक्ति यह सुखकर, किंकर पर नित महर करम्।।४
सुमिरत जिहि सरव जिनहि सुर -सैनप, सुर-गुरु, सुर-पति सहित शचिम्।
प्रसरित गुन करत रहत सुपुनित नित, श्रुति सु स्मृति अरु शाख शुचिम्।
धनपति पद कंज मंजु मन ध्यावत, धरत 'रू ध्यान त्रिशूल धरं।
शारद कर प्रदत सुक्ति यह सुखकर, किंकर पर नित महर करम्।।५
विनवत वसु अष्ट, वरिष्ठ विनायक, बिमल बिरद जिन जग विदितम् ।
दिनकर नित नमन करत हिमकर नत, धरमराज धर्मिष्ट युतम्।
पुनरपि सह सिद्धि रिद्धि हिलमिल जिन, पुनित चरन मँह आय परम्।
शारद कर प्रदत सुक्ति यह सुखकर, किंकर पर नित महर करम्।।६
अरचन मुनि अमित मुदित मन अनुदिन, षोडस करतम् विधि सहितम्।
पुनि पुनि ॠषियन मिलि पढत स्तवन तव, किन्नर विधाधर कलितम्।
सविनय हिम शुद्ध सिद्ध गण चारण, जयति जननी जय जय उचरम्।
शारद कर प्रदत सुक्ति यह सुखकर, किंकर पर नित महर करम्।।७
परसत नर असुर नाग पद पुहुकर, लहत परम पद सह ललितम्।
बालक नवयुवक वृध्ध ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ गृहस्थ युतम्।
मांगत यहि" अजय" मात अनुग्रह कर, मम चित मति कृति कर मधुरम्।
शारद कर प्रदत सुक्ति यह सुखकर, किंकर पर नित महर करम्।।८
🌸कलछप्पय🌸
जय जय सरस्वती जननि, भीम भय भक्त विभंजन।
जय जय सरस्वती जननि, ह्रदय निज जन नित रंजन।
जय जय सरस्वती जननि, कलुष कलि कलह निकंदन।
जय जय सरस्वती जननि, असुर, सुर, नर, मुनि वंदन।
वर बाल ब्रह्मचारिणी विदित, मोद देन मंगल करन।
कर जौरि "अजय"विनवत सही, सुबुधि देहू अशरण शरण।।
~~कवि स्व . अजयदान जी लख दान जी रोहडिया मलावा, सिरोही
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परिचय,
नाम-ज्ञानसिंह ठाकुर ,,प्रयास,,
पिता-श्री जगदीश प्रसाद ठाकुर
जन्मतिथि--०३-०२-१९६५
योग्यता--एम०ए०हिन्दी साहित्य
‌‌ एवं समाज शास्त्र
पद-------व्याख्याता
कार्या०----शास० उ० मा०वि० सिंघनगढ़
निवास स्थान--गगरिया खम्हरिया
जिला-- कबीरधाम,
राज्य-- छत्तीसगढ़
** सरस्वती वंदना**
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सरस्वती मइया ओ, पंइया परत हावन तोर।
हंस के सवारी मा आ जाबे।
छोटे छोटे लइका दाई, तोर सरन मा आये‌ हन,
मांगत हव वरदान दाई, मोला बिसराबे झन।
पुजाआरती तोर नइ जानो,बिनती हावे करजोर।
सरस्वती मइया ओ, पंइया परत हावन तोर।
हंस के सवारी मा आ जाबे ---२
कमल मा तैय बिराजे,दाई मंगल करइया ओ। एक हाथ मा पुस्तक धरे, बीना के बजइया ओ
ज्ञान के देवइया मइया ,अरजी करंव तोर।
सरस्वती मइया ओ, पंइया परत हावन तोर।
हंस के सवारी मा आ जाबे।
छोटे बड़े सब झन, तोला गोहराथे ओ। जइसन तोर महिमा गाथे,वइसने फल पाथे‌ ओ।
मोरो ज़िनगी मा भरदे , मइया‌ ज्ञान के अंजोर।
सरस्वती मइया ओ , पंइया परत हावन तोर।
हंस के सवारी मा आ जाबे।
बीना बजावत आ जाबे।
हंस के सवारी मा आ जाबे।
रचनाकार
ज्ञानसिंह ठाकुर *प्रयास*
ग्राम-गगरिया खम्हरिया
विकास खंड -स/लोहारा
जिला-कबीरधाम(छ०ग०)
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परिचय:-
नाम- कुमारी गायत्री श्रीवास पिता - श्री नरोत्तम श्रीवास माता - श्रीमती लक्ष्मी श्रीवास जन्मतिथि - 08/04 /2002 व्यवसाय - 12वीं वाणिज्य गाँव/ शहर- सिंघनगढ , सहसपुर लोहारा, जिला - कबीरधाम
पिन कोड नंबर-491995 ( छ.ग. )
हे सरस्वती माता (लोक भजन)
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सात सुर के संग मोला ताल दे।
हे सरस्वती माता मोला ज्ञान दे।।
मोरो बिनती ला माता अब सुन ले।
बीना के बजइया मोला जान ले।।
ये जग ले मोला तँय उबार दे।
हे ज्ञान के देवइया माता शारदे।।
सात सुर के संग मोला ज्ञान दे।
हे सरस्वती माता.........
हंस के वाहिनी माता अम्बे भवानी तँय।
महूँ ला ज्ञान दे दे मैहर वाली रानी तँय।।
ये दुनिया ले माता मोला तार दे।
हे बुद्धि दाती मोला ज्ञान भण्डार दे।।
सात सुर के संग मोला ताल दे।
हे सरस्वती माता ........
आज माता सुनले बिनती मोर हे।
सुर के संग ताल देबे किरपा तोर हे।।
सब के झोली ज्ञान आशीष डार दे।
सत्य राह में चलँव सुख संसार दे।।
हे सरस्वती माता......
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रचनाकारा:-
कु.गायत्री श्रीवास
गाँव - सिंघनगढ़,सहसपुर लोहारा
जिला-कबीरधाम (छ.ग.)
मो.7722821897
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