कुल पेज दृश्य

भोजपुरी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
भोजपुरी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 25 जुलाई 2026

जुलाई २५, हाइकु, ग़ज़लिका, सॉनेट, नवगीत, लघुकथा, पोयम, भोजपुरी, काक्रोच, रैप

सलिल सृजन जुलाई २५
*
रैंप सौंग
काक्रोचों की जय बोलो!
खुद को खुद हीमिल तोलो।
सोया शासन जगा रहे
उठा आइना दिखा रहे।
लट्ठ लिए आया शासन 
भूल गया निज अनुशासन।
खाकी को तैनात किया
जी भरकर आघात किया।
वाटर कैनन, आँसू बम
चाहें तुम्हें करें बेदम।
तुमने डटकर वार सहा
पीड़ा पाई, दर्द तहा।
नहीं हौसला हारा है
मन को तनिक न मारा है।
मनमानी, मन की बातें
बनीं पुलिसिया सौगातें।
रौंदे मसल कुचल पापी
शर्मिंदा थी खुद खाकी।
काक्रोची वीडियो बने
दिखते बच्चे रक्त सने।
कोर्ट न देखे समय नहीं
क्या जन-गण प्रति अनय नहीं?
संविधान भी बिसराया
अपना ही गाना गाया।
घिरे शूल से फूलों ने
काक्रोची शार्दूलों ने।
हिम्मत तनिक नहीं हारी
मिल सह ली मारा मारी।
गोदी पत्रकार आए
तय एजेंडा थे लाए।
तुमने दी औकात दिखा
पूछा क्यों मीडिया बिका?
नत शिर बगलें झाँक रहे
खुद को खुद ही आँक रहे।
रहे वांगचू अनशन रत
उनका भी मन था आहत।
चिंता साँसें रुके नहीं
उच्च मनोबल झुके नहीं।
अनगिन जन-गण संग हुआ
प्रभु से माँगें सभी दुआ।
अहं पुलिसिया बौराया
कलियाँ कुचलीं गुर्राया।
कपड़े फाड़े अंग छुए
भारत माँ के अश्रु चुए।
शासन था धृतराष्ट्र बना
पद मद था कोहरा घना।
जन आक्रोश गया बढ़ता
आंदोलित मानक गढ़ता।
पूर्ण क्रांति फिर से होगी?
सोच डरे सत्ता भोगी।
संवादों की पहल करी
संवेदना रही ठिठुरी।
दाँव-पेंच सब अजमाए
औंधे मुँह गिर पछताए।
धिक्कारा मीडिया गया
राग अलापे झूठ नया।
चिंतक सच्ची बात कहें
मंत्री मूँदे नैन रहें।
जन दबाव बढ़ता जाए
फौज पुलिसिया सँकुचाए।
घर में पूछेंगे बच्चे
क्यों थे हम इतने टुच्चे?
क्या उत्तर दे पाएँगे
या निज मान गँवाएँगे?
हम नौकर हैं यह माना
हुक्म बजाना ही ठाना।
लेकिन नहीं गुलाम हुए
अनुचित उचित न भूल गए।
रोज न तानेंगे लाठी
बदलेंगे अब परिपाटी।
शहर शहर में रोष बढ़ा
कीर्तिमान नित नया गढ़ा।
जेपी-अन्ना आए याद
क्रांति रहे हरदम आबाद।
शासन झुक चर्चा करने
आया वैतरणी तरने।
एक छोड़ माँगें मानी
नम्र हुई गर्वित बानी।
आया समय विचार करो
दिशाहीनता नहीं वरो।
है बेशर्म बहुत मंत्री
पद बिन मानो है संत्री।
कुर्सी कभी न छोड़ेगा
गलत दिशा में मोड़ेगा।
दुर्योधन पद साथ रखे
तभी नाश का स्वाद चखे।
बदलावों को लाना है
गाँव-शहर हर जाना है
नव संगठन बनाना हैह
बुनना ताना-बाना है।
गली-गली में मिल बोलो
काक्रोचों की जय बोलो!
२५.७.२०२६
०००
हाइकु
फुलबगिया
डलिया सुगंध की
महक रही।
तितली उड़ी
इंद्रधनुष लिए
वसुधा हँसी।
गुंजार रहा
कलियों के कान में
भ्रमर गीत।
जमीं में जमीं
मजबूती से जड़
पौधा पनपा।
हरियाली ही
जीवन का जीवन
खुशहाली दे।
देखे सपने
करे साकार कली
तोड़े नपने।
साथ हो शूल
फिर भी खिल जाता
साहसी फूल।
चार दिन की
जिंदगी में सुमन
सुगंध बाँटे।
कुसुम कली
काँटों के बीच खिल
जानती जीना।
२५.७.२०२५
०0०
ग़ज़लिका
अनुशासित हैं बुआ बड़ी
घड़ी देखतीं घड़ी-घड़ी
सब गड़बड़ियों के आगे
बन दिवार हों सदा अड़ी
इस पल गरम, नरम उस पल
ममता की अनमोल लड़ी
सबके काम सदा आईं
राहत की अनमोल झड़ी
बारह माहों दिन अरु रात
मेहनत करतीं मिलें कड़ी
बोकर बीज कह रही हैं
यह है असली रकम गड़ी
सलिल सावनी बरखा में
छाता ले तकदीर खड़ी
२५.७.२०२५
०0०
ग़ज़लिका
हुआ सत्य साकार सहज पर सपना लगता है?
पिसती जब मेंहदी तब रंग हथेली चढ़ता है।।
बातें है बातें, गिरगिट सम रंग बदलती हैं।
वादों को जुमला कह पद-मद जन को ठगता है।।
महामहोपाध्याय निरक्षर पर करते हैं शोध।
नहीं क्षीर में कमल कीच में उगता-खिलता है।।
अपने अपनापन जतला अपनों को दाग रहे।
पर न पराया फिर भी हमको अपना लगता है।।
सर ला दे पर्चे करवाते नकल शिष्य को अब।
सरला शारद तज मन, धन हित कमला भजता है।।
केर बेर का संग सनातन, नहीं छूटता है।
कंकर कंकर से टकराकर शंकर बनता है।।
करें आप अभिषेक आचमन या पद प्रक्षालन।
'सलिल' करे 'संजीव' न लेकिन किंचित थकता है।।
२५.७.२०२४
•••
सॉनेट
भू सुता
मैं भू सुता न जानूँ डरना,
खिलखिल हँसना ताकत मेरी,
हर पल मुझको आगे बढ़ना
साथ समय के, करूँ न देरी।
बाधा-संकट मुझसे हारे,
मेरी पूंँजी है साहस श्रम,
काँधे पर कान्हा बैठा रे!
जितना लाड़ करूँ उतना कम।
शारद बन गाती हूँ लोरी,
लछमी बनकर फसल उगाती,
दुर्गा हूँ मत समझो छोरी,
हरे खेत-वन मोर सँगाती। र
हें दरिंदे दूर दरांती,
रखूँ हाथ में हाथ न आती।।
२५-७-२०२३
•••
क्या यह मौलिक सृजन है???
मुख पुस्तक पर एक द्विपदी पढ़ी. इसे सराहना भी मिल रही है.
मैं सराहना तो दूर इसे देख कर क्षुब्ध हो रहा हूँ.
आप की क्या राय है?
*
Arvind Kumar
उनके दर्शन से जो बढ़ जाती है मुख की शोभा
वोह समझते हैँ कि रोगी की दशा उत्तम है
*
उनके देखे से जो आ जाती है मुँह पे रौनक
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है - मिर्ज़ा ग़ालिब
***
नवगीत
*
हम आज़ाद देश के वासी,
मुँह में नहीं लगाम।
*
जब भी अपना मुँह खोलेंगे,
बेमतलब बातें बोलेंगे।
नहीं बोलने के पहले हम
बात कभी अपनी तोलेंगे।
ना सुधरें हैं, ना सुधरेंगे
गलती करें तमाम।
*
जितना भी ऊँचा पद पाया,
उतना नीचा गिर गर्राया।
लज्जा-हया-शर्म तज, मुस्का
निष्-दिन अपना नाम थुकाया।
दल सुधार की हर कोशिश
कर ही देंगे नाकाम।
*
अपना थूका, खुद चाटेंगे,
नफरत, द्वेष, घृणा बाँटेंगे।
तीन-पाँच दो दूनी बोलें,
पर न गलत खुद को मानेंगे।
कद्र न इंसां की करते,
हम पद को करें सलाम।
***
मुक्तक
भाव- अभावों का है तालमेल दुनिया
ममता मन में धार अकेले चल दे तू
गैरों में भी तुझको मिल जाएँ अपने
अपनापन सिंगार साजकर चल दे तू
२५-७-२०१७
***
लघुकथा
धर्म संकट
*
वे महाविद्यालय में प्रवेश कराकर बेटे को अपनी सखी विभागाध्यक्ष से मिलवाने ले गयीं। जब भी सहायता चाहिए हो, निस्संकोच आ जाना सखी ने कहा तो उन्होंने खुद को आश्वस्त पाया।
वह कठिनाई हल करने, पुस्तकालय से अतिरिक्त पुस्तक लेने, परीक्षा के पूर्व महत्वपूर्ण प्रश्न पूछने विभागाध्यक्ष के पास जाता रहा। पहले तो उन्होंने कोई विशेष रुचि नहीं ली किन्तु क्रमश:उसकी प्रशंसा करते हुए सहायता करने लगीं। उसे कहा कि महाविद्यालय में 'आंटी' नहीं 'मैडम' कहना उपयुक्त है।
प्रयोगशाला में वे अधिक समय तक रूककर प्रयोग करातीं, अपने शोधपत्रों के साथ उसका नाम जोड़कर छपवाया। वह आभारी होता रहा।
उसे पता ही नहीं चला कब गलियारों में उनके सम्बन्धों को अंतरंग कहती कानाफूसियाँ फ़ैलने लगीं।
एक शाम जब वह प्रयोग कर रहा था, वे आकर हाथ बँटाने लगीं। हाथ स्पर्श होने पर उसने संकोच और भय से खुद में सिमट, खेद व्यक्त किया पर उन्होंने पूर्ववतकार्य जारी रखा मानो कुछ हुआ ही न हो। अचानक वे लड़खड़ाती लगीं तो उसने लपक कर सम्हाला, अपने कंधे पर से उनका सर और उनकी कमर में से अपने हाथ हटाने के पूर्व ही उसकी श्वासों में घुलने लगी परफ्यूम और देह की गंध। पलक झपकते दूरियाँ दूर हो गयीं।
कुछ दिन वे एक दूसरे से बचते रहे किन्तु धीरे-धीरे वातावरण सहज होने लगा। आज कक्षा के सब विद्यार्थी विभागाध्यक्ष को शुभकामनायें देकर चरण-स्पर्श कर रहे हैं। वह क्या करे? धर्मसंकट में पड़ा है चरण छुए तो कैसे?, न छुए तो साथी क्या कहेंगे? यही धर्म संकट उनके मन में भी है। दोनों की आँखें मिलीं, कठिन परिस्थिति से उबार लिया चलभाष ने, 'गुरु जी! प्रणाम। आप कार्यालय में विराजें, मैं तुरंत आती हूँ' कहते हुए, शेष विद्यार्थियों को रोककर वे चल पड़ीं कार्यालय की ओर। इस क्षण तो गुरु ने उबार लिया, टल गया था धर्म संकट।
१९-६-२०१६
***
मुक्तक:
*
मापनी: २११ २११ २११ २२
*
आँख मिलाकर आँख झुकाते
आँख झुकाकर आँख उठाते
आँख मारकर घायल करते
आँख दिखाकर मौन कराते
*
मापनी: १ २ २ १ २ २ १ २ २ १२२
*
न जाओ, न जाओ जरा पास आओ
न बातें बनाओ, न आँखें चुराओ
बहुत हो गया है, न तरसा, न तरसो
कहानी सुनो या कहानी सुनाओ
*
गीत
*
समय के संतूर पर
सरगम सुहानी
बज रही.
आँख उठ-मिल-झुक अजाने
आँख से मिल
लज रही.
*
सुधि समंदर में समाई लहर सी
शांत हो, उत्ताल-घूर्मित गव्हर सी
गिरि शिखर चढ़ सर्पिणी फुंकारती-
शांत स्नेहिल सुधा पहले प्रहर सी
मगन मन मंदाकिनी
कैलाश प्रवहित
सज रही.
मुदित नभ निरखे न कह
पाये कि कैसी
धज रही?
*
विधि-प्रकृति के अनाहद चिर रास सी
हरि-रमा के पुरातन परिहास सी
दिग्दिन्तित रवि-उषा की लालिमा
शिव-शिवा के सनातन विश्वास सी
लरजती रतनार प्रकृति
चुप कहो क्या
भज रही.
साध कोई अजानी
जिसको न श्वासा
तज रही.
*
पवन छेड़े, सिहर कलियाँ संकुचित
मेघ सीचें नेह, बेलें पल्ल्वित
उमड़ नदियाँ लड़ रहीं निज कूल से-
दमक दामिनी गरजकर होती ज्वलित
द्रोह टेरे पर न निष्ठा-
राधिका तज
ब्रज रही.
मोह-मर्यादा दुकूलों
बीच फहरित
ध्वज रही.
***
Poem:
Success
*
Success and un success
Are two faces of a coin.
Every un success leads to
Success in life
If you do'nt lose heart.
Success gives more pleasure
After un success.
Spoon feeded success
Without any struggle or
Testing your ability
Doesn't serve any purpose.
Baloon gets the height
Without any foundation
Hence, falls down.
Let us all try to get success
Only after proper efforts.
Success without doing our best
Can't give satisfaction.
Never feel shy
If the attempt fails.
Always ensure the use of
Proper and fair means
To get success.
***
वरिष्ठ ग़ज़लकार प्राण शर्मा, लंदन के प्रति
भावांजलि
*
फूँक देते हैं ग़ज़ल में प्राण अक्सर प्राण जी
क्या कहें किस तरह रचते हैं ग़ज़ल सम्प्राण जी
ज़िन्दगी के तजुर्बों को ढाल देते शब्द में
सिर्फ लफ़्फ़ाज़ी कभी करते नहीं हैं प्राण जी
सादगी से बात कहने में न सानी आपका
गलत को कहते गलत ही बिना हिचके प्राण जी
इस मशीनी ज़िंदगी में साँस ले उम्मीद भी
आदमी इंसां बने यह सीख देते प्राण जी
'सलिल'-धारा की तरह बहते रहे, ठहरे नहीं
मरुथलों में भी बगीचा उगा देते प्राण जी
२५-७-२०१५
***
दोहाः
छूट गया क्यों हाथ से, श्वासों का संतूर
प्यासी आसें रह गयीं, मन्जिल भी है दूर..
***
मुक्तक:
*
खोजता हूँ ठाँव पग थकने लगे हैं.
ढूँढता हूँ छाँव मग चुभने लगे हैं..
डूबती है नाव तट को टेरता हूँ-
दूर है क्या गाँव दृग मुंदने लगे हैं..
*
आओ! आकर हाथ मेरा थाम लो तुम.
वक़्त कहता है न कर में जाम लो तुम..
रात के तम से सवेरा जन्म लेगा-
सितारों से मशालों का काम लो तुम..
*
आँख से आँखें मिलाना तभी मीता.
पढ़ो जब कर्तव्य की गीता पुनीता..
साँस जब तक चल रही है थम न जाना-
हास का सजदा करे आसें सुनीता..
*
मिलाकर कंधे से कंधा हम चलेंगे.
हिम शिखर बाधाओं के पल में ढलेंगे.
ज़मीं है ज़रखेज़ थोड़ा पसीना बो-
पत्थरों से ऊग अंकुर बढ़ फलेंगे..
*
ऊगता जो सूर्य ढलता है हमेशा.
मेघ जल बनकर बरसता है हमेशा..
शाख जो फलती खुशी से झूमती है-
तिमिर में जुगनू चमकता है हमेशा..
२५-७-२०१२
***
भोजपुरी धमकियाँ
१. बेटा जेतना तोहर उमर हौ, ओकर दुगना हमार कमर हौ!
२. चवन्नी भर क हउवे आउर डॉलर भर भौकाल!
३. एतना गोली मारब की छर्रा बिनत- बिनत करोडपति हो जइबे!
४. धाम चंडी काशी में, जीवन बीतल बदमाशी में!
५. हमके जान ले, हम मारीला कम और घसिटीला जादा!
६. बेटा... सज के आयल हउवे, बज के जइबे!
७. गुरु... सम्हर जा, नाही त हफ्तन गोली चली आउर महिन्नन धुंआ उडी!"
***
पुस्तक चर्चा :
''कालचक्र को चलने दो'' भाव प्रधान कवितायें
''
[पुस्तक विवरण: काल चक्र को चलने दो, कविता संग्रह, सुनीता सिंह, प्रथम संस्करण २०१८, पृष्ठ १२५, आकार २० से.मी. x १४.५ से. मी., आवरण बहुरंगी पेपर बाइक लेमिनेटेड, २००/- प्रतिष्ठा पब्लिशिंग हाउस, लखनऊ]
*
साहित्य समय सापेक्षी होता है। कविता 'स्व' की अनुभूतियों को 'सर्व' तक पहुँचाती है। समय सनातन है। भारतीय मनीषा को 'काल' को 'महाकाल' का उपकरण मानती है इसलिए भयाक्रांत नहीं होती, 'काल' का स्वागत करती है। 'काल को चलने दो' जीवन में व्याप्त श्वेत-श्याम की कशमकश को शब्दांकन है।कवयित्री सुनीता सिंह के शब्दों में "अकस्मात मन को झकझोर देनेवाली परिस्थितियों से मन को अत्यंत नकारात्मक रूप से प्रभावित होने से बचने के लिए उन परिस्थितियों को स्वीकार करना आवश्यक होता है जो अपने बस में नहीं होतीं। जीवन कभी आसान रास्ता नहीं देता। हतोत्साहित करनेवाले कारकों और नकारात्मकता के जाल से जीवन को अँधेरे से उजाले की ओर शांत मन से ले जाने की यात्रा का दर्शन काव्य रूप से प्रस्तुत करती है यह पुस्तक।'
५४ कविताओं का यह संकलन अजाने ही पूर्णता को लक्षित करता है। ५४ = ५+४=९, नौ पूर्णता का अंक है। नौ शक्ति (नौ दुर्गा) का प्रतीक है। नौ को कितनी ही बार जोड़े या गुणा करें ९ ही मिलता है।संकलन में राष्ट्रीयता के रंग में रंगी ५ रचनाएँ हैं। ५ पंचतत्व का प्रतीक है। 'अनिल, अनल, भू, नभ सलिल' यही देश भी है। भारत भूमि, भारत वर्ष, स्वदेश नमन, प्रहरी, भारत अखंड शीर्षक इन रचनाओं में भारत का महिमा गान होना स्वाभाविक है।
इसकी गौरव गाथा को हिमगिरि झूम कर गाता है
जिस पर गर्वित होकर के सागर भी लहराता है
तिलक देश के माथे का हिम चंदन है
शत बार तुझे ऐ देश मेरे अभिनन्दन है
कवयित्री देश भक्त है किन्तु अंधभक्त नहीं है। देश महिमा गुँजाते हुए भी देश में व्याप्त अंतर्विरोध उसे दुखी करते हैं -
एक देश में दो भारत / क्यों अब तक है बसा हुआ?
एक माथ पर उन्नत भाल / दूजा क्यों है धँसा हुआ?
'माथ' और 'भाल' पर्यायवाची हैं। एक पर दूसरा कैसे? 'माथ' के स्थान पर 'कांध' होता तो अर्थवत्ता में वृद्धि होती।
इस भावभूमि से जुडी रचनाएँ रणभेरी, बढ़ते चलो, वीरों की पहचान आदि भी हैं जिनमें परिस्थितियों से जूझकर उन्हें बदलने का आव्हान है।
कवि को प्राय: काव्य-प्रेरणा प्रकृति से मिलती है। इस संग्रह में प्रकृति से जुडी रचनाओं में प्रकृति दोहन, आंधी, हरीतिमा, जल ही जीवन, मकरंद, फाग, बसंत, चूनर आदि प्रमुख हैं।
प्रकृति का अनुपम उपहार / यह अभिलाषा का संसार
इच्छाओं की अनंत श्रृंखला / दिव्य लोक तक जाती है
स्वच्छंद कल्पना के उपवन में / सतरंगी पुष्प खिलाती है
स्वप्नों में स्वर्णिम पथ पर / आरूढ़ होकर आती है
कितना मोहक, कितना सुंदर / है यह विशाल अंबर निस्सार
एक बाल कथा सुनी थी जिसमें गुरु जी शिष्यों को सिखाने के बाद अंतिम परीक्षा यह लेते हैं कि वह खोज के लाओ जो किसी काम का नहीं। प्रथम वह विद्यार्थी आया जो कुछ नहीं ला सका। गुरु जी ने कहा हर वास्तु का उपयोग कर सकनेवाला ही श्रेष्ठ है। ईश्वर ने निरुपयोगी कुछ नहीं बनाया। कवयित्री ने वाकई अंबर को निस्सार पाया या तुक मिलाने के लिए शब्द का प्रयोग किया? अंबर पाँच तत्वों में से एक है, वह निस्सार कैसे हो सकता है?
दर्शन को लेकर कवयित्री ने कई रचनाएँ की हैं। गुरु गोरखनाथ की साधनास्थली में पली-बढ़ी कलम दर्शन से दूर कैसे रह सकती है?
मन की आँखों से है दिखता / खोल हृदय के द्वार
निहित कर्म पर गढ्ता / सद्गति या दुर्गति आकार
''कर्म प्रधान बिस्व करि राखा'' का निष्कर्ष तुलसी ने भी निकाला था, वही सुनीता जी का भी प्राप्य है।
संग्रह की रचनाओं में 'एकला चलो रे' हे प्रिये, हे मन सखा आदि पठनीय हैं। कवयित्री में प्रतिभा है, उसे निरंतर तराशा जाए तो उनमें छंद, शुद्ध छंद रचने की सामर्थ्य है किन्तु समयाभाव उन्हें रचना को बार-बार छंद-विधान के निकष पर कसने का अवकाश नहीं देता। पुरोवाक में नीलम चंद्रा के अनुसार 'इनके हर अलफ़ाज़ चुनिंदा होते हैं' के संदर्भ में निवेदन है कि 'हर' एक वचन है, अल्फ़ाज़ बहुवचन, 'हर लफ्ज़' सही होता।
''कालचक्र चलने दो'' कवयित्री के संवेदनशील मन की भाव यात्रा है। रचनाओं में पाठक को अपने साथ रख पाने की सामर्थ्य है। कथ्य मौलिक है। शब्द चयन सटीक है। सारत: यह कृति मानव जीवन की तरह गन-दोष युक्त है और यही इसे ग्रहणीय बनाता है। सुनीता का भविष्य एक कवयित्री के नाते उज्जवल है। वे 'अधिक' और 'श्रेष्ठ' का अंतर समझ कर 'श्रेष्ठ' की दिशा में निरंतर अग्रसर हैं।
२५-७-२०१९
***
ग़ज़लिका:
बिटिया
*
चाह रहा था जग बेटा पर अनचाहे ही पाई बिटिया.
अपनों को अपनापन देकर, बनती रही पराई बिटिया..
कदम-कदम पर प्रतिबंधों के अनुबंधों से संबंधों में
भैया जैसा लाड़-प्यार, पाने मन में अकुलाई बिटिया..
झिड़की ब्यारी, डांट कलेवा, घुड़की भोजन था नसीब में.
चौराहों पर आँख घूरती, तानों से घबराई बिटिया..
नत नैना, मीठे बैना का, अमिय पिला घर स्वर्ग बनाया.
हाय! बऊ, दद्दा, बीरन को, बोझा पड़ी दिखाई बिटिया..
खान गुणों की रही अदेखी, रंग-रकम की माँग बड़ी थी.
बीसों बार गयी देखी, हर बार गयी ठुकराई बिटिया..
करी नौकरी घर को पाला, फिर भी शंका-बाण बेधते.
तनिक बोल ली पल भर हँसकर, तो हरजाई कहाई बिटिया..
राखी बाँधी लेकिन रक्षा करने भाई न कोई पाया.
मीत मिले जो वे भी निकले, सपनों के सौदाई बिटिया..
जैसे-तैसे ब्याह हुआ तो अपने तज अपनों को पाया.
पहरेदार ननदिया कर्कश, कैद भई भौजाई बिटिया..
पी से जी भर मिलन न पाई, सास साँस की बैरन हो गयी.
चूल्हा, स्टोव, दियासलाई, आग गयी झुलसाई बिटिया..
फेरे डाले सात जनम को, चंद बरस में धरम बदलकर
लाया सौत सनम, पाये अब राह कहाँ?, बौराई बिटिया..
दंभ जिन्हें हो गए आधुनिक, वे भी तो सौदागर निकले.
अधनंगी पोशाक, सुरा, गैरों के साथ नचाई बिटिया..
मन का मैल 'सलिल' धो पाये, सतत साधना स्नेह लुटाये.
अपनी माँ, बहिना, बिटिया सम, देखे सदा परायी बिटिया..
***
षट्पदिक छंद
*
नाक के बाल ने, नाक रगड़कर, नाक कटाने का काम किया है
नाकों चने चबवाए, घुसेड़ के नाक, न नाक का मान रखा है
नाक न ऊँची रखें अपनी, दम नाक में हो तो भी नाक दिखा लें
नाक पे मक्खी न बैठन दें, है सवाल ये नाक का, नाक बचा लें
नाक के नीचे अघट न घटे, जो घटे तो जुड़े कुछ नाक बजा लें
नाक नकेल भी डाल सखे हो, न कटे जंजाल तो नाक चढ़ा लें
छंद का नाम और लक्षण बताइए.
***
मुक्तक
भाव- अभावों का है तालमेल दुनिया
ममता मन में धार अकेले चल दे तू
गैरों में भी तुझको मिल जाएँ अपने
अपनापन सिंगार साजकर चल दे तू
***
नवगीत
*
हम आज़ाद देश के वासी,
मुँह में नहीं लगाम।
*
जब भी अपना मुँह खोलेंगे,
बेमतलब बातें बोलेंगे।
नहीं बोलने के पहले हम
बात कभी अपनी तोलेंगे।
ना सुधरें हैं, ना सुधरेंगे
गलती करें तमाम।
*
जितना भी ऊँचा पद पाया,
उतना नीचा गिर गर्राया।
लज्जा-हया-शर्म तज, मुस्का
निष्-दिन अपना नाम थुकाया।
दल सुधार की हर कोशिश
कर ही देंगे नाकाम।
*
अपना थूका, खुद चाटेंगे,
नफरत, द्वेष, घृणा बाँटेंगे।
तीन-पाँच दो दूनी बोलें,
पर न गलत खुद को मानेंगे।
कद्र न इंसां की करते,
हम पद को करें सलाम।
२५-७-२०१७
***
एक रचना:
संजीव
*
समय के संतूर पर
सरगम सुहानी
बज रही.
आँख उठ-मिल-झुक अजाने
आँख से मिल
लज रही.
*
सुधि समंदर में समाई लहर सी
शांत हो, उत्ताल-घूर्मित गव्हर सी
गिरि शिखर चढ़ सर्पिणी फुंकारती-
शांत स्नेहिल सुधा पहले प्रहर सी
मगन मन मंदाकिनी
कैलाश प्रवहित
सज रही.
मुदित नभ निरखे न कह
पाये कि कैसी
धज रही?
*
विधि-प्रकृति के अनाहद चिर रास सी
हरि-रमा के पुरातन परिहास सी
दिग्दिन्तित रवि-उषा की लालिमा
शिव-शिवा के सनातन विश्वास सी
लरजती रतनार प्रकृति
चुप कहो क्या
भज रही.
साध कोई अजानी
जिसको न श्वासा
तज रही.
*
पवन छेड़े, सिहर कलियाँ संकुचित
मेघ सीचें नेह, बेलें पल्ल्वित
उमड़ नदियाँ लड़ रहीं निज कूल से-
दमक दामिनी गरजकर होती ज्वलित
द्रोह टेरे पर न निष्ठा-
राधिका तज
ब्रज रही.
मोह-मर्यादा दुकूलों
बीच फहरित
ध्वज रही.
२५.५.२०१५
***
मुक्तक:
*
मापनी: २११ २११ २११ २२
*
आँख मिलाकर आँख झुकाते
आँख झुकाकर आँख उठाते
आँख मारकर घायल करते
आँख दिखाकर मौन कराते
*
मापनी: १ २ २ १ २ २ १ २ २ १२२
*
न जाओ, न जाओ जरा पास आओ
न बातें बनाओ, न आँखें चुराओ
बहुत हो गया है, न तरसा, न तरसो
कहानी सुनो या कहानी सुनाओ
*
२५-६-२०१५
***
दोहा सलिला
रवि-वसुधा के ब्याह में..
*
रवि-वसुधा के ब्याह में, लाया नभ सौगात.
'सदा सुहागन' तुम रहो, ]मगरमस्त' अहिवात..
सूर्य-धरा को समय से, मिला चन्द्र सा पूत.
सुतवधु शुभ्रा 'चाँदनी', पुष्पित पुष्प अकूत..
इठला देवर बेल से बोली:, 'रोटी बेल'.
देवर बोला खीझकर:, 'दे वर, और न खेल'..
'दूधमोगरा' पड़ोसी, हँसे देख तकरार.
'सीताफल' लाकर कहे:, 'मिल खा बाँटो प्यार'..
भोले भोले हैं नहीं, लीला करे अनूप.
बौरा गौरा को रहे, बौरा 'आम' अरूप..
मधु न मेह मधुमेह से, बच कह 'नीबू-नीम'.
जा मुनमुन को दे रहे, 'जामुन' बने हकीम..
हँसे पपीता देखकर, जग-जीवन के रंग.
सफल साधना दे सुफल, सुख दे सदा अनंग..
हुलसी 'तुलसी' मंजरित, मुकुलित गाये गीत.
'चंपा' से गुपचुप करे, मौन 'चमेली' प्रीत..
'पीपल' पी पल-पल रहा, उन्मन आँखों जाम.
'जाम' 'जुही' का कर पकड़, कहे: 'आइये वाम'..
बरगद बब्बा देखते, सूना पनघट मौन.
अमराई-चौपाल ले, आये राई-नौन..
कहा लगाकर कहकहा, गाओ मेघ मल्हार.
जल गगरी पलटा रहा, नभ में मेघ कहार..
***
ग़ज़लिका:
क्यों है?
*
जो जवां है तो पिलपिला क्यों है?
बोल तो लब तेरा सिला क्यों है?
दिल से दिल जब कभी न मिल पाया.
हाथ से हाथ फिर मिला क्यों है?
नींव ही जिसकी रिश्वतों ने रखी.
ऐसा जम्हूरियत किला क्यों है?
चोर करता है सीनाजोरी तो
हमको खुद खुद से ही गिला क्यों है?
शूल से तो कभी घायल न हुआ.
फूल से दिल कहो छिला क्यों है?
और हर चीज है जगह पर, पर
ये मगज जगह से हिला क्यों है?
ठीक कब कौन क्या करे कैसे?
सिर्फ गलती का सिलसिला क्यों है?
२५-७-२०११
***
दोहा:
तिमिर न हो तो रुचेगा, किसको कहो प्रकाश.
पाता तभी महत्त्व जब, तोड़े तम के पाश..
***
२०-७-२०११

शनिवार, 16 मई 2026

मई १६, दोहा, आँख, विमोह छंद, कोरोना, गीत, चित्रगुप्त, भोजपुरी, बहिना, लुप्तप्राय प्रजाति,

सलिल सृजन मई १६
नया गीत ० आग लग रही सपनों में, लग जाने दो। अपनी ही सरकार ठगे, ठग जाने दो।। ० सोना बेच चैन से सोना है जी भर मँहगाई सुरसा सी, टोना कर फिर तर है हनुमान मसक कर निजी जरूरत हर खाना-पीना छोड़ सूँघ कर गुजर-बसर इच्छा-रोम जला, नीरो को गाने दो। आग लग रही सपनों में, लग जाने दो।। . राष्ट्रीय वाहन साइकिल पर नेता हों पैदल घूमें जैसे विश्व विजेता हों कार त्याग अफसर साहब बेकार लगे- तोंद पुलिस की घटे किसी ने रेता ज्यों चाहे जो कर लो पर रिश्वत खाने दो आग लग रही सपनों में, लग जाने दो। . करो निकम्मा जन-गण को रेवड़ी बाँटो करें गल्तियाँ पर बच्चों को मत डाँटो अपने घर पर भी चलवा लो बुलडोजर- मुर्दे गड़े खोदकर निज स्वारथ साँटो अरि को घर में मारो, मत घुस आने दो आग लग रही सपनों में, लग जाने दो। १६.५.२०२६ ०००
०००
लुप्तप्राय प्रजाति (Endangered Species) दिवस
*
लुप्तप्राय प्रजातियाँ, ऐसे जीवों की आबादी है, जिनके लुप्त होने का जोखिम है, क्योंकि वे या तो संख्या में कम है, या बदलते पर्यावरण या परभक्षण मानकों द्वारा संकट में हैं। साथ ही, यह वनों की कटाई के कारण भोजन और/या पानी की कमी को भी द्योतित कर सकता है। प्रकृति के संरक्षणार्थ अंतर्राष्ट्रीय संघ (IUCN) ने २००६ के दौरान मूल्यांकन किए गए प्रजातियों के नमूने के आधार पर, सभी जीवों के लिए लुप्तप्राय प्रजातियों की प्रतिशतता की गणना ४० प्रतिशत के रूप में की है। IUCN अपने संक्षिप्त प्रयोजनों के लिए सभी प्रजातियों को वर्गीकृत करता है। कई देशों में संरक्षण निर्भर प्रजातियों के रक्षणार्थ क़ानून बने हैं: उदाहरण के लिए, शिकार का निषेध, भूमि विकास या परिरक्षित स्थलों के निर्माण पर प्रतिबंध. विलुप्त होने की संभावना वाली कई प्रजातियों में से वास्तव में केवल कुछ ही इस सूची में दर्ज हो पाते हैं और क़ानूनी सुरक्षा प्राप्त करते हैं। कई प्रजातियाँ विलुप्त हो जाती हैं, या बिना सार्वजनिक उल्लेख के संभावित रूप से लुप्त हो जाती हैं।
किसी प्रजाति के संरक्षण की स्थिति उन लुप्तप्राय प्रजातियों के जीवित न रहने की सूचक है। एक प्रजाति के संरक्षण की स्थिति का आकलन करते समय कई कारकों का ध्यान रखा जाता है; केवल बाक़ी संख्या ही नहीं, बल्कि समय के साथ-साथ उनकी आबादी में समग्र वृद्धि या कमी, प्रजनन सफलता की दर, ज्ञात जोख़िम और ऐसे ही अन्य कारक. IUCN लाल सूची सर्वाधिक ज्ञात संरक्षण स्थिति सूचीकरण है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर, १९४ देशों ने लुप्तप्राय और अन्य जोख़िम वाली प्रजातियों के संरक्षण के लिए जैव विविधता कार्य-योजना तैयार करने के लिए सहमति जताने वाले समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका में इस योजना को आम तौर पर प्रजाति रिकवरी प्लान कहा जाता है।
लुप्तप्राय प्रजातियों की IUCN लाल सूची में लुप्तप्राय प्रजाति, संकटग्रस्त प्रजातियों की विशिष्ट श्रेणी को संदर्भित करता है और इसमें गंभीर रूप से संकटग्रस्त प्रजाति भी शामिल हो सकते हैं।
संकटापन्न प्रजातियों की IUCN लाल सूची में जोख़िम की एक विशिष्ट श्रेणी के तौर पर लुप्तप्राय प्रजातियां शब्द का प्रयोग किया जाता है। IUCN वर्ग और मानदंडों के अधीन लुप्तप्राय प्रजाति, गंभीर रूप से संकटग्रस्त और असुरक्षित के बीच में है। इसके अलावा, गंभीर रूप से संकटग्रस्त प्रजाति को लुप्तप्राय प्रजाति के रूप में भी गिन सकते हैं और सभी मानदंडों को भर सकते हैं।
विलोपन की जोख़िम वाली प्रजातियों के लिए IUCN द्वारा प्रयुक्त अधिक सामान्य शब्द है संकटापन्न प्रजातियां, जिसमें लुप्तप्राय और गंभीर संकटग्रस्त सहित कम जोखिम वाली असुरक्षित प्रजातियों की श्रेणी भी सम्मिलित हैं। IUCN श्रेणियों में शामिल हैं:लुप्त : प्रजातियों का अंतिम शेष सदस्य मर चुका है, या यथोचित संदेह से परे यह माना जाता है कि मर चुका हैं। उदाहरण: थैलासाइन, डोडो, यात्री कबूतर, टाइरानोसारस, कैरेबियन मॉन्क सील
जंगल में लुप्त : बंदी प्राणी जीवित रह सकते हैं, लेकिन कोई मुक्त, प्राकृतिक आबादी मौजूद नहीं है। उदाहरण: एलागोस कुरासो
गंभीरतः संकटग्रस्त : निकट भविष्य में विलोपन के अत्यंत उच्च जोखिम का सामना कर रहे हैं। उदाहरण: अरकान वन कछुए, जावन राइनो, ब्राजील के मरगैनसर, घडियाल
लुप्तप्राय :निकट भविष्य में विलुप्त होने की बहुत ही उच्च जोखिम का सामना कर रहे हैं। उदाहरण: नीला व्हेल, विशालकाय पांडा, बर्फ़ीला तेंदुआ, अफ्रीकी जंगली कुत्ता, शेर, एलबेटरॉस, क्राउंड सालिटरी ईगल, ढोले, रंगस
असुरक्षित : मध्यम दर्जे के विलोपन के उच्च जोखिम का सामना कर रहे हैं। उदाहरण: चीता, गौर, सिंह, आलसी भालू, वोल्वोराइन, मानाटी, ध्रुवीय भालू।
संरक्षण निर्भर : निम्नलिखित पशु को गंभीर ख़तरा नहीं है, लेकिन ये पशु संरक्षण कार्यक्रम पर निर्भर हैं। उदाहरण: चित्तीदार हैना, तेंदुआ शार्क, काला कैमान।
संकट के निकट : निकट भविष्य में इनके लिए ख़तरा हो सकता है। उदाहरण: ब्लू-बिल्ड डक, सॉलिटरी ईगल, स्माल-क्लाड औटर, मेन्ड वुल्फ़
बहुत ही कम चिंताजनक : इन प्रजातियों के अस्तित्व के लिए कोई तात्कालिक ख़तरा नहीं है। उदाहरण: नूटका साइप्रेस, काठ कबूतर, हार्प सील। संयुक्त राज्य अमेरिका में लुप्तप्राय प्रजाति अधिनियम के अंतर्गत, दो श्रेणियों में "लुप्तप्राय" अधिक संरक्षित है। साल्ट क्रीक बाघ बीटल (सिसिनडेला नेवाडिका लिकोलनियाना) ESA के तहत संरक्षित उप-प्रजाति का एक उदाहरण है।
अकेले संयुक्त राज्य अमेरिका में, "विलुप्त होने के ख़तरे वाली ज्ञात प्रजातियों की संख्या लुप्तप्राय प्रजाति अधिनियम के तहत संरक्षित संख्या से दस गुणा अधिक है" (विलकोव एंड मास्टर, २००८, पृ. ४१४). अमेरिकी मछली और वन्य-जीव सेवा और साथ ही, राष्ट्रीय समुद्री मत्स्य सेवा को लुप्तप्राय प्रजातियों के वर्गीकरण और संरक्षण के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है, तथापि, सूची में किसी विशिष्ट प्रजाति को जोड़ना, काफ़ी लंबी, विवादास्पद प्रक्रिया है और वास्तव में यह जोख़िम वाले वनस्पति और प्राणी जीवन के केवल एक अंश का ही प्रतिनिधित्व करता है।
कुछ लुप्तप्राय प्रजातियों के क़ानून विवादास्पद रहे हैं। विवाद के विशिष्ट क्षेत्रों में शामिल हैं: लुप्तप्राय प्रजातियों की सूची में किसी प्रजाति को रखने के लिए मानदंड और उनकी आबादी की बरामदगी पर सूची में से किसी प्रजाति को हटाने के लिए मानदंड; भले ही भूमि विकास पर प्रतिबंध का मतलब सरकार द्वारा भूमि का "अधिग्रहण" हो; संबंधित सवाल है कि क्या निजी ज़मीन के मालिकों को उनकी भूमि के उपयोग के प्रति नुक्सान के लिए मुआवजा दिया जाना चाहिए और संरक्षण क़ानूनों के प्रति समुचित अपवाद हासिल करना चाहिए या नहीं. बुश प्रशासन के तहत, संघीय अधिकारियों द्वारा लुप्तप्राय प्रजातियों को नुक्सान पहुंचाने वाली कार्रवाई से पूर्व, वन्य-जीव विशेषज्ञों से परामर्श लेने की पिछली नीति को हटा लिया गया। ओबामा प्रशासन के तहत, इस नीति को पुनः बहाल किया गया है।
लुप्तप्राय प्रजातियों के रूप में सूचीकरण का नकारात्मक प्रभाव हो सकता है, क्योंकि यह प्रजाति को विशेष रूप से संग्रहकर्ताओं और शिकारियों के लिए और अधिक वांछनीय बना सकती हैं। इस प्रभाव को संभावित रूप से कम किया जा सकता है, जैसे कि चीन में व्यावसायिक रूप से कछुए उत्पन्न करने से, शिकार के प्रति संकटग्रस्त प्रजातियों पर दबाव कुछ कम हो रहा है।
सूचीबद्ध प्रजातियों के साथ एक और समस्या, किसी ज़मीन से लुप्तप्राय प्रजातियों को साफ़ करने के 'गोली मारो, ठेलो और चुप रहो " तरीक़े के उपयोग को उकसाने के प्रति उसका प्रभाव है। संप्रति कुछ ज़मीन मालिक, अपनी ज़मीन पर लुप्तप्राय जानवर के पाए जाने के बाद उसकी क़ीमत में कमी अनुभव करते हैं। उन्होंने कथित तौर पर, अपनी ज़मीन से समस्या के निदान के लिए, चुपचाप जानवरों को मारने और दफनाने या उनके निवास स्थान को नष्ट करने का विकल्प चुना है, लेकिन ऐसे में उसके साथ-साथ, लुप्तप्राय प्रजातियों की आबादी भी कम हो जाती है। लुप्तप्राय प्रजाति अधिनियमकी प्रभावशीलता पर, जिसने "लुप्तप्राय प्रजातियां" शब्द को गढ़ा है, व्यापार तथा उसके प्रकाशनों के समर्थक समूहों द्वारा सवाल उठाया गया है, लेकिन फिर भी इन प्रजातियों के साथ काम करने वाले, वन्य-जीव वैज्ञानिकों द्वारा, इसे व्यापक रूप से प्रभावी बरामदगी उपकरण के रूप में मान्यता दी गई है। उन्नीस प्रजातियों को सूची से हटाया तथा बरामद कर लिया गया है और पूर्वोत्तर संयुक्त राज्य अमेरिका में सूचीबद्ध प्रजातियों में से 93% में पुनर्लाभ या स्थिर आबादी है।
इस समय, दुनिया में १५५६ ज्ञात प्रजातियों की विलुप्त होने के रूप में पहचान की गई है और वे सरकारी क़ानून (ग्लेन, २००६, वेबपेज) द्वारा सुरक्षा के तहत हैं। यह सन्निकटन, बहरहाल, लुप्तप्राय प्रजाति अधिनियम जैसे क़ानूनों के संरक्षण के तहत असम्मिलित, संकटग्रस्त प्रजातियों की संख्या को हिसाब में नहीं लेता है। नेचरसर्व के वैश्विक संरक्षण की स्थिति के अनुसार, लगभग तेरह प्रतिशत कशेरुकी (समुद्री मछली को छोड़ कर), सत्रह प्रतिशत संवहनी पौधे और छह से अठारह प्रतिशत तक कवक जोख़िम के तहत माने गए हैं (विलकोव एंड मास्टर, २००८, पृ. ४१५-४१६)। कुल मिला कर, सात से अठारह प्रतिशत तक, अमेरिका के ज्ञात जानवर, कवक और पौधे, विलोपन के नज़दीक हैं (विलकोव एंड मास्टर, २००८, पृ. ४१६). यह कुल संख्या संयुक्त राज्य अमेरिका में लुप्तप्राय प्रजाति अधिनियम के तहत संरक्षित प्रजातियों की संख्या से अधिक है, जिसका अर्थ है कि कई प्रजातियां धीरे-धीरे विलोपन के क़रीब होती जा रही हैं।
***
मेरी बहिना
.
मेरी बहिना कभी न हारी...
.
पथ में थीं बाधाएँ अनगिन
किया पराजित तुमने गिन गिन
असफलता को असफल करतीं
सफल रहीं तुम सदा सभी दिन
चुनौतियों को जीता तुमने
कर में ले कोशिश दोधारी
मेरी बहिना कभी न हारी...
.
किरण सूर्य की तम हर लेती
किरण चंद्र की शांति लुटाती
राज बहादुर ही करते हैं
किरण जान रहती मुस्काती
श्री वास्तव में सखी तुम्हारी
मेरी बहिना कभी न हारी...
.
नव आशा नव पुष्पा सुषमा
सफल साधना की गढ़ प्रतिमा
गहते हैं हनुमान हाथ बढ़
निहारिका निशिता नव गरिमा
अपनी किस्मत आप सँवारी
मेरी बहिना कभी न हारी...
.
अँगना आ सिद्धार्थ विहँसते
खिल प्रसून दिन-रात विकसते
कर अभिषेक जुही हर्षाती
रम रमेश अर्चना पुलकते
अतुल-अर्पिता युग छवि न्यारी
मेरी बहिना कभी न हारी...
१६.५.२०२५
...
चित्रगुप्त वंदना भोजपुरी
*
करत रहल बा चित्रगुप्त प्रभु!, सगरो जै-जैकार।
मति; मेहनत अरु मेल-जोल बर; आए सरन तोहार।।
जगवा में केहू नईखे हे, तोहरे बिना सहाई।
डोल रहल बा दा न जगाई, काहे भगिया हमार।।
छोड़ी चरनिया तोहरो, बारह भाई कहाँ हम जाई।
कृपा करल बा दूनो माई, फेरी दा न दिनवा हमार।।
कलम-दावत-कृपाण सजाइब, चूनर लाल चढ़ाई।
ओंकार केर जै गुंजाई, काहे न सुनल पुकार।।
श्रीफल कदली फल स्वीकारब, भगवन भोग मिठाई।
सर पर हाथ धरल दोऊ माई, किरपा दृष्टि निहार।।
***
दोहा सलिला
अनिल अनल भू नभ सलिल, अजय उच्च रख माथ।
राम नाथ सीता सहित, रखिए सिर पर हाथ।।
राम नाथ अब अवध में, थामे हैं धनु-बाण।
अब तक दयानिधान थे, अब हरते हैं प्राण।।
राम नाथ भी थे विवश, सके न सिय को रोक।
समय बली विपरीत था, कोई सका न टोक।।
आ! वारा तुझ पर ह्रदय, शारद मातु पुनीत।
आवारा थे शब्द कर, वंदन हुए सुगीत।।
ललिता लय लालित्य ले, नमन करे हो लीन।
मीनाकारी स्वरों की, सुमधुर जैसे बीन।।
सँग नारायण शरद जी, जड़कर नीलम रत्न।
खरे-खरे दोहे कहें, मुक्तक-गीत सुयत्न।।
राम; केश सिय के लिए, सजा रहे हैं फूल।
राम-केश हँस बाँधतीं, सीता सब दुःख भूल।।
कंकर में शंकर बसे, शिमला शर्मा मौन।
सूर्य तपे शिव जी कहें, हिम ला देगा कौन?
चंदा दो चंदा कहे, गई चाँदनी भाग।
नीता-शीला अब न वह, चंद्रकला अनुराग।।
मारीशस से मिल गले, भारत माता झूम।
प्रेमलता महका रही, भुज भर माथा चूम।।
मँज री मति! गुरु निकट जा, माँजेंगे गुरु खूब।
अर्पित कर मन-मंजरी, भाव-भक्ति में डूब।।
अनामिका मति साधिका, रम्य राधिका भ्रांत।
सुमित अमित परिमित सतत, करे न मन को भ्रांत।।
वह बोली आदाब पर, यह समझा आ दाब।
आगे बढ़ते ही पड़ा, थप्पड़ एक जनाब।।
१६-५-२०२२
***
Poem
I
*
I don't care to those
Who don't care to me
I prefer to play with them
Who prefer to play with me.
Mountain for mountains
For seas I also am a sea
Being nowhere I'm everywhere
Want to meet?, Try to see
Forget I and You
Remember only Us
No place for no
Always welcome yes.
15-5-2022
***
कोरोना नवगीत
सूरज! आओ!
भेंट तुम्हें हैं
रेल कटे मजदूर
.
भूखे पेट अँतड़ियाँ ऐंठी कितना सहते?
रोजी-रोटी गँवा उधारी कितनी गहते
बिन भाड़ा झोपड़ पट्टी में जगह न मिलती
घर से दूर अभाव आग में कितना दहते?
विवश चले
पैदल भारत के
बेटे हो मजबूर
.
खाकी लट्ठ बरसते फिर भी बढ़ते जाते
नेताओं की निष्ठुरता चुप पढ़ते जाते
कृषक-श्रमिक संघों को सूँघा साँप अचानक
शासन के अखबार कसीदे पढ़ते जाते
इंसानों को
भून रहा
बदहाली का तंदूर
.
उजड़ीं माँगें टूटे मंगलसूत्र चूड़ियाँ टूटीं
बिना लुटेरे अबलाएँ असहाय गई हैं लूटीं
कौन सहारा दे किसको, है दोष सभी का साझा
पैसेवाले ठठा रहे, निर्धन तकदीरें फूटीं
तुम तो तनिक
बहा लो आँसू
हे दिनकर! अक्रूर
१६-५-२०२०
***
द्विपदी
दोस्ती की दरार छोटी पर
साँप शक का वहीं मिला लंबा।
१६-५-२०१९
***
छंद बहर का मूल है १३
*
संरचना- २१२ २१२, सूत्र- रर.
वार्णिक छंद- ६ वर्णीय गायत्री जातीय विमोह छंद.
मात्रिक छंद- १० मात्रिक देशिक जातीय छंद
*
सत्य बोलो सभी
झूठ छोडो कभी
*
रीतती रात भी
जीतता प्रात ही
*
ख्वाब हो ख्वाब ही
आँख खोलो तभी
*
खाद-पानी मिले
फूल हो सौरभी
*
मुश्किलों आ मिलो
मात ले लो अभी
१३-४-२०१७
९.४५ पूर्वाह्न
***
दोहा
चित्र गुप्त जिसका वही, लेता जब आकार
ब्रम्हा-विष्णु-महेश तब, होते हैं साकार
*
माँ ममता का गाँव है, शुभाशीष की छाँव.
कैसी भी सन्तान हो, माँ-चरणों में ठाँव..
*
ॐ जपे नीरव अगर, कट जाएँ सब कष्ट
मौन रखे यदि शोर तो, होते दूर अनिष्ट
*
स्नेह सरोवर सुखाकर करते जो नाशाद
वे शादी कर किस तरह, हो पायेंगे शाद?
*
मुक्तक
तुझको अपना पता लगाना है?
खुद से खुद को अगर मिलाना है
मूँद कर आँख बैठ जाओ भी
दूर जाना करीब आना है
*
***
द्विपदी
ठिठक कर जो रुक गयीं तुम
आ गया भूकम्प झट से.
*
दाग न दामन पर लगा है
बोल सियासत ख़ाक करी है
*
मौन से बातचीत अच्छी है
भाप प्रेशर कुकर से निकले तो
*
तीन अंगुलिया उठतीं खुद पर
एक किसी पर अगर धरी है
*
सिर्फ कहना सही ही काफी नहीं है
बात कहने का सलीका है जरूरी
*
अजय हैं न जय कर सके कोई हमको
विजय को पराजय को सम देखते हैं
*
किस्से दिल में न रखें किससे कहें यह सोचें
गर न किस्से कहे तो ख्वाब भी मुरझाएंगे
*
सखापन 'सलिल' का दिखे श्याम खुद पर
अँजुरी में सूर्स्त दिखे देख फिर-फिर
*
दुष्ट से दुष्ट मिले कष्ट दे संतुष्ट हुए
दोनों जब साथ गिरे हँसी हसीं कहके 'मुए'
*
जो गिर-उठकर बढ़ा मंजिल मिली है
किताबों में मिला हमको लिखित है
*
घुँघरू पायल के इस कदर बजाए जाएँ
नींद उड़ जाए औ' महबूब दौड़ते आयें
*
रन करते जब वीर तालियाँ दुनिया देख बजाती है
रन न बनें तो हाय प्रेमिका भी आती है पास नहीं
*
रंज मत कर बिसारे, जिसने सुधि-अनुबंध
वही इस काबिल न था कि पा सके मन-रंजना
*
रूप देखकर नजर झुका लें कितनी वह तहजीब भली थी
रूप मर गया बेहूदों ने आँख फाड़कर उसे तका है
१६-५-२०१५
दोहा का रंग आँखों के संग
*
आँख अबोले बोलती, आँख समझती बात.
आँख राज सब खोलत, कैसी बीती रात?
*
आँख आँख से मिल झुके, उठे लड़े झुक मौन.
क्या अनकहनी कह गई, कहे-बताये कौन?.
*
आँख आँख में बस हुलस, आँख चुराती आँख.
आँख आँख को चुभ रही, आँख दिखाती आँख..
*
आँख बने दर्पण कभी, आँख आँख का बिम्ब.
आँख अदेखे देखती, आँखों का प्रतिबिम्ब..
*
गहरी नीली आँख क्यों, उषा गाल सम लाल?
नेह नर्मदा नहाकर, नत-उन्नत बेहाल..
*
देह विदेहित जब हुई, मिला आँख को चैन.
आँख आँख ने फेर ली, आँख हुई बेचैन..
*
आँख दिखाकर आँख को, आँख हुई नाराज़.
आँख मूँदकर आँख है, मौन कहो किस व्याज?
*
पानी आया आँख में, बेमौसम बरसात.
आँसू पोछे आँख चुप, बैरन लगती रात..
*
अंगारे बरसा रही आँख, धरा है तप्त.
किसकी आँखों पर हुई, आँख कहो अनुरक्त?.
*
आँख चुभ गई आँख को, आँख आँख में लीन.
आँख आँख को पा धनी, आँख आँख बिन दीन..
*
कही कहानी आँख की, मिला आँख से आँख.
आँख दिखाकर आँख को, बढ़ी आँख की साख..
*
आँख-आँख में डूबकर, बसी आँख में मौन.
आँख-आँख से लड़ पड़ी, कहो जयी है कौन?
*
आँख फूटती तो नहीं, आँख कर सके बात.
तारा बन जा आँख का, 'सलिल' मिली सौगात..
*
कौन किरकिरी आँख की, उसकी ऑंखें फोड़.
मिटा तुरत आतंक दो, नहीं शांति का तोड़..
*
आँख झुकाकर लाज से, गयी सानिया पाक.
आँख झपक बिजली गिरा, करे कलेजा चाक..
*
आँख न खटके आँख में, करो न आँखें लाल.
काँटा कोई न आँख का, तुम से करे सवाल..
*
आँख न खुलकर खुल रही, 'सलिल' आँख है बंद.
आँख अबोले बोलती, सुनो सृजन के छंद..
१६-५-२०१५
***


शुक्रवार, 1 मई 2026

मई १, हाइकु, राधिका छंद, नवगीत, मुक्तक, दोहा, सोनेट, भोजपुरी, सुमित्र, कहमुकरी

सलिल सृजन मई १
*
वक्त रहते कत्ल कर देते तो बेहतर था
कत्ल करते वक्त चुप रहते तो बेहतर था
.
बेगुनाही का करें क्या?, है ना कुछ भी मोल
भूख से ही पेट भर लेते तो बेहतर था
.
आपने वादे किए, जुमला कहा तो क्या?
बेअकल होते अकलवर तो ही बेहतर था
.
बेरहम है वक्त, तू भी, क्या करें या न करें?
हवा होकर हवा हो जाते तो बेहतर था
.
सफर कट ही जाएगा बिन हमसफर यारब
दो कदम बढ़ साथ हो लेते तो बेहतर था
.
दर्दे-दिल की क्यों करें परवा कहें तो आप?
बेदिली ना कर समझ लेते तो बेहतर था
.
देवदासाना कटी पारो बिना ये ज़िंदगी
चंद्रमुखियाँ दगा दे देतीं तो बेहतर था
१.५.२०२६
000
एक दोहा
परी कथा कह सुलाया, माँ ने फिर से आज।
भूखा बच्चा कर रहा, सपने में हँस राज।।
*
सॉनेट
मजदूर
*
कंकर को शंकर करते हम,
माटी से मूरत गढ़ते हैं,
सागर-गिरि पर पग धरते हम,
चित्र सफलता का मढ़ते हैं।
हम हैं नींव; न शिखर-पताका,
हमसे ही सभ्यता बनी है,
मूल्य नहीं अंधों ने आँका,
कसके मन में पीर घनी है।
हाथ हथौड़ा वज्र सरीखा,
लौह-शिला को सिकता कर दे,
भाग्य हमारे कर की रेखा,
हँसते विधि-हरि-हर को वर दे।
मंजिल रहे न हमसे दूर।
भाग्य-विधाता हम मजदूर।।
१ मई २०२४
***
सोनेट
श्रमिक
*
जो मेहनतकर जीवन जीता
सार्थक है उसका ही जीना
जो सोचे बीता सो बीता
गंगाजल है जिसे पसीना।
वह मजदूर श्रेष्ठ मानव है
उससे है यह धरती सजती
श्रम न करे जो वह दानव है
लूट-खसोटे वह यह धरती।
एक दिवस जो मना रहे हैं
मजदूरों के वे शोषक हैं
शेष दिवस जो भुला रहे हैं
वही शोषकों के पोषक हैं।
जो खुद अपना काम करेंगे
भव सागर से वही तरेंगे
१-५-२०२३
***
kahmukari
*
Everywhere now and then
Never asking why and when
Running as much as it can
Is it run way?
No, its Train.
000
मुक्तिका
*
परमपिता ने भेंट दी, देह धरोहर मान
स्वच्छ रखें सत्कारिए, बनिए मीत सुजान
*
मन में तन का वास है, तन में मन का वास
मन की गति है असीमित, तन सीमित पहचान
*
तन को मन सामर्थ्य दे, मन को तन आकार
पूरक; प्रतिद्वंदी नहीं, जीव धरोहर जान
*
मन के साधे तन सधे, तन साधे मन साध
दोनों साधे योगकर, पूर्ण बने इंसान
*
मन का मनका फेर ले, तन का मनका छोड़
तभी झलक दिख सकेगी, उनकी जो भगवान
***
दोहा सलिला
देह देन रघुवीर की, इसको रखें सम्हाल
काया राखे धर्म है, पाकर जीव निहाल
देह धनुष पर अहर्निश, धरें श्वास का तीर
आस किला रक्षित रखे, संयम की प्राचीर
जहाँ देह तहँ राम हैं, हैं विदेह मिथलेश
दश रथ हैं दश इंद्रियाँ, रथी राम अवधेश
को विद? वह जो देह को, जान न पाले मोह
पंचतत्व का समन्वय, कोरो ना विद्रोह
रह एकाकी भरत सम, करें राम से प्रीत
लखन रखें अंतर बना, सिय धीरज की जीत
स्वास्थ्य अवध भेदे न नर, वानर भरत सतर्क
तीर नियम का साधते, करें न कोई फर्क
आशा की संजीवनी, शैली सलिल समान
मुँह कर पग हँस धो रहे, सियाराम सुख मान
***
श्रमिक दिवस पर
गीत
*
आदिशक्ति हम करो अनुकरण
अन्य युक्ति तज करो पथ वरण
करो परिश्रम स्वेद बहाओ
तब दो रोटी खाओ-पचाओ
इंसानों बढ़ तजो आवरण
कंकर-कंकर में शंकर है
द्रोह करे तो प्रलयंकर है
डरो, लोभ निज करो संवरण
तुमसे हम कब?, हमसे तुम हो
हम बिन महलों पल में गुम हो
तोंदों पिचको, तभी संतरण
१-५-२०२०
***
मुक्तिका
पारिजात छंद
गण सूत्र: रगण + लघु
मापनी: २१२१
*
तीन चार
बाँट प्यार
.
खेल खेल
आर-पार
.
जा न भूल
ले उधार
*
रीति नीति
हैं न भार
*
लोक लाज
हो सिंगार
.
मित्र-शत्रु
हैं हजार
.
फूल-शूल
जीत-हार
***
कृति चर्चा:
दोहों में प्रणय-सुवास: यादें बनी लिबास
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
[कृति विवरण: यादें बनीं लिबास, दोहा संग्रह, डॉ. राजकुमार तिवारी 'सुमित्र', प्रथम संकरण, २०१७, आई.एस.बी.एन. ९७८-८१-७६६७-३४६-४, पृष्ठ १०४ मूल्य २००/-, आवरण बहुरंगी, सजिल्द, आकर २१ सेमी x १४ सेमी,भावना प्रकाशन, १०९-ए पटपड़गंज दिल्ली ११००९२, दूरभाष ९३१२८६९९४७, दोहाकार संपर्क ११२ सराफा, मोतीलाल नेहरू वार्ड, निकट कोतवाली जबलपुर ४८२००१, ०७६१ २६५२०२७, ९३००१२१७०२]
*
बाँच सको तो बाँच लो आँखों का अखबार दोहा हिंदी ही नहीं बहुतेरी भारतीय भाषाओँ का कालजयी सर्वाधिक लोकप्रिय ही नहीं लोकोपयोगी छंद भी है। हर काल में दोहा कवियों की काव्याभिव्यक्ति का समर्थ माध्यम रहा है। आदिकाल (१४०० सदी से पूर्व) चंदबरदाई आदि कवियों ने रासो काव्यों में वीर रस प्रधान दोहों की रचना कर योद्धाओं को पराक्रम हेतु प्रेरित किया। भक्तिकाल (१३७५ से ११७०० ई. पू.) में निर्गुण भक्ति धारांतर्गत ज्ञानाश्रयी भाव धारा के कबीर, नानक, दादूदयाल, रैदास, मलूकदास, सुंदरदास, धर्मदास आदि ने तथा प्रेमाश्रयी भाव धारा के मलिक मोहम्मद जायसी, कुतुबन, मंझन, शेख नबी, कासिम शाह, नूर मोहम्मद आदि ने आध्यात्मिक भाव संपन्न दोहे प्रभु-अर्पित किए। सगुण भावधारा की रामाश्रयी शाखा में तुलसीदास, रत्नावली, अग्रदास, नाभा दास, केशवदास, हृदयराम, प्राणचंद चौहान, महाराज विश्वनाथ सिंह, रघुनाथ सिंह आदि ने कृष्णाश्रयी शाखा के सूरदास, नंददास,कुम्भनदास, छीतस्वामी, गोविन्द स्वामी, चतुर्भुज दास, कृष्णदास, मीरा, रसखान, रहीम के साथ मिलकर दोहा को इष्ट के प्रति समर्पण का माध्यम बनाया। रीतिकाल (१७००-१९०० ई. पू. मे केशव, बिहारी, भूषण, मतिराम, घनानन्द, सेनापति आदि ने मुख्यत: श्रृंगार तथा आलंकारिकता की अभिव्यक्ति करने के लिए दोहा को सर्वाधिक उपयुक्त पाया। आधुनिक काल (१८५० ईस्वी के पश्चात) छायावादी, प्रगतिवादी, प्रयोगवादी और यथार्थवादी युग में पारम्परिक हिंदी छंदों की उपेक्षा का शिकार दोहा भी हुआ। नव्योत्तर काल (१९८० ईस्वी के पश्चात) में तथाकथित प्रगतिवादी कविता से मोह भंग होने के साथ-साथ आंग्ल साहित्य के अनुकरण की प्रवृत्ति भी घटी। अंतरजाल पर हिंदी भाषा और साहित्य को नव प्रतिष्ठा मिली। गीत और दोहा फिर उत्कर्ष की ओर अग्रसर हुए।
सनातन सलिला नर्मदा के श्रेष्ठ-ज्येष्ठ कवि डॉ. राजकुमार तिवारी सुमित्र का काव्य प्रवेश लगभग १९५० में हुआ। शिक्षक तथा पत्रकार रहते हुए आपने कलम को तराशा। पारिवारिक संस्कार, अध्ययन वृत्ति तथा साहित्यकारों की संगति ने उम्र के साथ अध्ययन और सृजन के क्षेत्र में उन्हें गहराई और ऊँचाई की ओर बढ़ते रहने की प्रेरणा दी। दोहा संग्रह ''यादें बनीं लिबास'' में यत्र-तत्र ही नहीं सर्वत्र व्याप्ति है उनकी जिन्होंने कवी के जीवन में प्रवेश कर उसे पूर्णता प्रदान की, जो जाकर भी जा न सकी, जिसकी उपस्थिति की प्रतीति कवि को पल-पल होती है। उसे उपस्थित मानते ही अनुपस्थिति अपना अस्तित्व बताने लगती है और तब उसकी संगति के समय की यादें कवि-मन को उसी तरह आवृत्त कर लेती हैं जैसे लिबास तन को ढाँकता है। शीर्षक की सार्थकता पूरी कृति में उसी तरह अनुभव की जा सकती है जैसे बगिया में सुमन-सुरभि। प्रेम, रूप-सौंदर्य, देह-दर्शन, नयन, स्वप्न, वसंत, सावन, फागुन आदि अनेक शीर्षकों के अंतर्गत सहेजे गए दोहे कहे-अनकहे उन्हीं के लिए कहे गए हैं जो विदेह होकर भी जानना छाती हैं कि उनका स्मरण सायास है या अनायास? उन्हें निश्चय ही संतुष्टि होगी यह जानकर कि जब स्मृतियाँ अभिन्न हों तो लिबास बन जाती हैं, तब याद नहीं करना पड़ता।
याद हमारी आ गई, या कुछ किया प्रयास।
अपना तो ये हाल है, यादें बनीं लिबास।।
जिसने आजीवन शैया से उठाकर धरा पर पग रखने से आरंभ कर धरा को छोड़ शैया पर जाने तक पल-पल रीति-रिवाजों का पालन मन-प्राण से किया ही उसे स्मृतियों के दोहांजलि समर्पित करने के पूर्व ईश स्मरण की विरासत की रीति न निभाकर उपालंभ का अवसर नाराज कैसे करें अग्रजवत सुमित्र जी। 'वीणापाणि स्तवन' तथा 'प्रार्थना के स्वर' शीर्षकांतर्गत पाँच-पाँच दोहों से शब्द ब्रम्ह आराधना का श्री गणेश कर बिना कहे कह दिया कि तुम्हारी जीवन पद्धति से ही जीवन जिया जा रहा है। -
वाणी की वरदायिनी, दात्री विमल विवेक।
सुमन अश्रु अक्षर करें, दिव्योपम अभिषेक।।
सुमित्र जी 'रस' को 'काव्य' ही नहीं 'जीवन' का भी 'प्राण' मानते हैं। वे जानते-मानते हैं की प्रकृति बिना पुरुष भले ही वह परम् पुरुष हो, सृष्टि की रचना नहीं कर सकता।
रस ही जीवन-प्राण है, सृष्टि नहीं रसहीन।
पृथ्वी का मतलब रसा, सृष्टि स्वयं रसलीन।।
सामान्यत: प्रकृति के समर्पण की गाथा कवी लिखते आये हैं किन्तु सत्य यह भी है समर्पण तो पुरुष भी करता है। इस सत्य की प्रतीति और अभिव्यक्ति सुमित्र ही कर सकता है, स्वामी नहीं-
साँसों में हो तुम बसे, बचे कहाँ हम शेष।
अहम् समर्पित कर दिया, और करें आदेश।।
कृति में श्रृंगार का इंद्रधनुष विविध रंगों और छटाओं का सौंदर्य बिखरता है। संयोग (रूप ज्योति की दिव्यता) तथा वियोग (तुम बिन दिन पतझर लगें, यादें बनीं लिबास) बिना देखे दिख जाने की तरह सुलभ है।
निर्गुण श्रृंगार को कबीरी फकीरी के बिना जीना दुष्कर है किंतु सुमित्र जी सांसारिकता का निर्वाह करते हुए भी निर्गुण को सगुण में पा सके हैं-
निराकार की साधना, कठिन योग पर्याय।
योग शून्य का शून्य में, शून्य प्रेम संकाय।।
सगुण श्रृंगार को लिखना तलवार पर धार की तरह है। भाव जरा डगमगाया कि मांसलता की राह से होते हुए नश्वरता और क्षण भंगुरता की नियति का शिकार हो जाता है जबकि कोई 'चाहक' अपनी 'चाह' को अकाल काल कवलित होते नहीं देखना चाहता। सुमित्र का तन की बात करते हुए भी मन को रंगारंग रखकर 'नट-कौशल' का परिचय देते हुए बच निकलते हैं-
अनुभव होता प्रेम का जैसे जलधि तरंग।
नस नस में लावा बहे, मन में रंगारंग।।
शिक्षक (टीचर नहीं) रहकर बरसों सिखाने के पूर्व सीखने की नर्मदा में बार-बार डुबकी लगा चुके कवि का शब्द-भंडार समृद्ध होना स्वाभाविक है। वह संस्कृत निष्ठ शब्दों( उच्चार, विन्यास, मकरंद, कुंतल, सुफलित, ऊर्ध्वमुख, तन्मयता, अध्यादेश, जलजात, मनसिज, अवदान, उत्पात, मुक्माताल, शैयाशायी, कल्याणिका, द्युतिमान, विन्यास, तिष्यरक्षिता, निर्झरी, उत्कटता आदि) के साथ देशज शब्दों (गैल, अरगनी, कथरी, मजूर, उजास, दहलान, कुलाँच, कातिक, दरस-परस, तिरती, सँझवाती, अँकवार आदि) का प्रयोग पूरी सहजता के साथ करता है। यही नहीं आंग्ल शब्दों (वैलेंटाइन, स्वेटर, सीट, कूलर, कोर्स, मोबाइल, टाइमपास, इंटरनेटी आदि) यथा स्थान सही अर्थों में प्रयोग करते हुए भी उससे चूक नहीं होती। कवि का पत्रकार समाज में प्रचलित अन्य भाषाओँ के शब्द संपदा से सुपरचित होने के नाते उन्हें पूरी उदारता के साथ यथावसर प्रयोग करता है।अरबी (मतलब, इबादत, तासीर, तकदीर, सवाल, गायब, किताब, कंदील, मियाद, ख़याल, इत्र, फरोश, गलतफहमी, उम्र, करीब, सलीब, नज़ीर, सफर, शरीर, जिला आदि), फ़ारसी (आवाज़, ज़िंदगी, ख्वाब, जागीर, बदर) शब्दों को प्रयोग करने में भी कवि को कोई हिचक नहीं है। अरबी 'जिला' और फ़ारसी 'बदर' को मिलाकर 'जिलाबदर', उम्र (अरबी) और दराज (फारसी) का प्रयोग करने में भी कवि कोताही नहीं करता। स्पष्ट है कि कवि खैरात की उस भाषा का उपयोग कर रहा है जिसे आधुनिक हिंदी कहा जाता है, वह भाषिक शुद्धता के नाम पर भाषिक साम्प्रदायिकता का पक्षधर नहीं है। यहाँ उल्लेखनीय है कि आंग्ल शब्द 'लेन्टर्न' का हिंदीकृत रूप 'लालटेन' भी कवि को स्वीकार है।
अलंकार संपन्नता इस दोहा संग्रह का वैशिष्ट्य है। अनुप्रास, यमक, उपमा, रूपक, श्लेष, संदेह आदि अलंकार यत्र-तत्र पूरी स्वाभाविकता सहित प्रयुक्त हुए हैं। कुछ अलंकारों के एक-एक उदाहरण देखें। दोहा छंद में अन्त्यानुप्रास आवश्यक होता है, अत: वह सर्वत्र है ही। छेकानुप्रास अधरों पर रख बाँसुरी, और बाँध भुजपाश / नदी आग की पी गया, फिर भी बुझी न प्यास, वृत्यानुप्रास (चंचल चितवन चंद्रमुख, चारु चंपई चीर / चौंक चकित चपला चले, चले चाप चौतीर), श्रुत्यानुप्रास ( नींद निगोड़ी बस गई, जाकर उनके पास / धीरे-धीरे कह गई, निर्वासन इतिहास) , लाटानुप्रास (संजीवन की शक्ति है, प्यार प्यार बस प्यार) तथा पुनरुक्ति प्रकाश (आँखों आँखों दे दिया / मन का चाहा दान) की छटा मोहक है।
वृत्नुयाप्रास काबू का प्रिय अलंकार है-
मुख मयंक, मंजुल मुखर, मधुर मदिर मुस्कान।
मन-मरल मोहित मुदित, मनसिज मुक्त मान।।
सुमुखि सलौनी सांवरी, सुखदा सुषमा सार।
सुरभित सुमन सनेह सर, सपन सरोज संवार।।
चंचल चितवन चन्द्रमुख, चारु चंपई चीर।
चौंक चकित चपला चले, चले चाप चौतीर।।
सभंग मुख यमक (कहनी अनकहनी सुनी, भरते रहे हुंकार ) तथा अभंग गर्भ यमक (बालों में हैं अंगुलियाँ, अधर अधर के पास) दृष्टव्य हैं।
उपमा के १६ प्रकारों में से कुछ की झलक देखें- धर्म लुप्तोपमा (नयन तुम्हारे वेद सम), उपमेय लुप्तोपमा (हिरन सरीखी याद है, चौपाई सी चारुता), धर्मोपमेय लुप्तोपमा (अनुप्रास सी नासिका, उत्प्रेक्षा सी छवि-छटा, अक्षर से लगते अधर, मन महुआ सा हो गया)।
यमक अलंकार दोहा दरबार में हाजिरी बजा रहा है-वेणु वेणुधर की बजी, रेशम रेशम तो कहा, हुई रेशमी शाम। / रेशम रेशम सुन कहा, रेशम किसका नाम।। आदि।
श्लेष भी छूटा नहीं है, यहाँ खेत द्विअर्थी है -
सपने बोये खेत में, दी आँसू की खाद।
जब लहराती है फसल, तुम आते हो याद।।
रूपक की छवि मत्तगयंदी चाल लख, काया रस-आगार आदि में है।
कुंतल मानो काव्य घन में उत्प्रेक्षा अलंकार है।
संदेह अलंकार जाग रही है आँख या जाग रही है पीर, मुख सरोज या चन्द्रमा में है।
कवि अपनी प्रेयसी में सर्वत्र अलंकारों का सादृश्य देखता है-
यमक सरीखी दृष्टि है, वाणी श्लेष समान।
अतिशयोक्ति सी मधुरता, रूपक सी मुस्कान।।
विरोधाभास अलंकार 'शब्दों का है मौन व्रत', 'एकाकी संवाद' आदि में है।
दोहे जैसी देह, अनुभव होता प्रेम का, जैसे जलधि तरंग, कोलाहल का कोर्स, यादों के स्तूप, फूल तुम्हारी याद के, कोलाहल का कोर्स, आँखों के आकाश, आँखों का अखबार, पलक पुराण आदि सरस् अभिव्यक्तियाँ पाठक को बाँधती हैं।
कवि ने शब्द युग्मों (रंग-बिरंग, भाषा-भूषा, नदी-नाव, ऊंचे-नीचे, दरस-परस, तन-मन, हर्ष-विषाद, रात-दिन, किसने-कब-कैसे आदि) का प्रयोग कुशलता से लिया है।
इन दोहों में शब्दावृत्ति (धीरे-धीरे कह गई, प्यार प्यार बस प्यार, देख-देखकर विकलता, आँखों-आँखों दे दिया, अभी-अभी जो था यहाँ, अभी-अभी है दूर, सच्ची-सच्ची बताओ, महक-महक मेंहदी कहे, मह-मह करता प्यार, खन-खन करती चूड़ियाँ, उखड़ी-उखड़ी साँस, सुंदर-सुंदर दृश्य हैं, सुंदर-सुंदर लोग, सर-सर चलती पवनिया, फर-फर उड़ते केश, घाटी-घाटी गूँजती, उजली-उजली धूप, रात-रात भर जागता, कभी-कभी ऐसा लगे, सूना-सूना घर मगर, मन-ही-मन, युगों-युगों की प्यास, अश्रु-अश्रु में फर्क है आदि) माधुर्य और लालित्य वृद्धि करती है।
ऐसा प्रतीत होता है कि इन दोहों की रचना भिन्न काल तथा मन:स्थितियों में हुई तथा मुद्रण के पूर्व पाठ्य शुद्धि में सजगता नहीं रखे जा सकी। इससे उपजी त्रुटियाँ खीर में कंकर की तरह बदमजगी उत्पन्न करती हैं। अनुनासिक तथा अनुस्वार सम्बन्धी त्रुटियों के अतिरिक्त कुछ अन्य दोष भी हैं।
दोहे के विषम चरण में १४ मात्रा होने का या अधिकत्व दोष पर्वत हो जाएंगे, प्रेम रंग में जो रंगी, डूब गए मंझधार में, बहुरूपिया बन आ गया आदि में है। सम चरण में १२ मात्रा का मात्राधिक्य दोष जीवन का एहसास, पी गई कविता प्यास आदि में है। सम चरण में न्यूनत्व दोष रूपराशि अमीतिया १२ मात्रा में है।
आँखों के आकाश में, घूमें सोच-विचार में तथ्य दोष है चूँकि सोच-विचार आँख नहीं मन की क्रिया है।
अपवाद स्वरुप पदांत दोष भी है। ऐसा लगता नवोदितों के लिए काव्य दोषों के उदाहरण रखे गए हैं। इन्हें काव्य दोष शीर्षक के अंतर्गत रखा जाता तो उपयोगी होता।
ओर-छोर मन का नहीं, छोटा है आकाश।
लघुतम निर्मल रूप है, जैसे किरन उजास।।
संशय प्रिय करना नहीं, अर्पित जीवन पुण्य।
जनम-जनम तक प्रीती यह, बनी रहे अक्षुण्य।।
मन का विद्यापीठ में लिंग दोष, अक्षुण्य (अक्षुण्ण), रूचता (रुचता) अदि में टंकण दोष है।
औगुनधर्मी, मधुवंती, मधुता, पवनिया आदि नव प्रयोग मोहक हैं।
पत्रकार रहा कवि अख़बार, खबर (बाँच सको तो बाँच लो आँखों का अखबार, शरणार्थी फागुन हुआ, यही ख़बर है आज) और चर्चा (फागुन की चर्चा करो) की अर्चा न करे, यह कैसे संभव है?
कवि स्मरण वैशिष्ट्य-
सुमित्रजी ने कई दोहों में कवियों का स्मरण स्थान-स्थान पर इस तरह किया है कि वह मूल कथ्य के साथ संगुफित होकर समरस हो गया है, आरोपित नहीं प्रतीत होता-
कालिदास का कथाक्रम, तेरा ही संकेत।
पृथ्वी का मतलब रसा, सृष्टि स्वयं रसलीन।।
पारिजात विद्योत्तमा, कालिदास वनगन्ध।
हो दोनों का मिलन जब मिटे द्वैत की धुंध।।
मन मोती यों चुन लिया, जैसे चुने मराल।
मान सरोवर जिंदगी मन हो गया मराल।
रूप-धूप है सिरजती, घनानंद रसखान।।
ले वसंत से मधुरिमा, मन होता रसखान।।
मन के हाथों बिक गए, कितने ग़ालिब-मीर।।
पलक पुलिन अश्रुज तुहिन, पुतली पंकज भान।
नयन सरोवर में बसें, साधें सलिल समान।।
खुसरो ने दोहे कहे, कहे कबीर कमाल।
फिर तुलसी ने खोल दी, दोहों की टकसाल।।
गंग वृन्द दादू वली, या रहीम मतिमान।
दोहों के रसलीन से कितने हुए इमाम।।
किन्तु बिहारी की छटा, घटा न पाया एक।।
तुलसी सूर कबीर के, अश्रु बने इतिहास।
कौन कहे मीरा कथा, आँसू का उपवास।।
घनानंद का अश्रुधान, अर्पित कृष्ण सुजान।
उसी अहज़रु की धार में, डूबे थे रसखान।।
आँसू डूबी साँस से, रचित ईसुरी फाग।
रजऊ ब्रम्ह थी जीव थी, ऐसा था अनुराग।।
आंसू थे जयदेव के, ढले गीत गोविन्द।
विद्यापति का अश्रुदल, खिला गीत अरविन्द।।
सारत: 'यादें बनी लिबास' सुमित्र जी के मानस पटल पर विचरते विचार-परिंदों के कलरव का गुंजन है जो दोहा की लाक्षणिकता, संक्षिप्तता, नव्यता, माधुर्य तथा संप्रेषणीयता के पंचतत्वों का सम्यक सम्मिश्रण कर काव्यानंद की प्रतीति कराती है। पठनीय, मननीय तथा संग्रहणीय कृति से हिंदी के सारस्वत कोष की अभिवृद्धि हुई है।
१-५-२०१९
***
मुक्तिका
*
अब गिरि नहीं गिराना
पौधे नए लगाना
जुमले नहीं बताना
वादे किए निभाना
चाहा जिन्हें हँसाना
वे कर रहे बहाना
तूफां न तोड़ पाए
दिल में किया ठिकाना
मंजूर कर लिया है
बिन मोल ही बिकाना
करना न याद यारों
आँसू नहीं बहाना
लाया यहाँ मुझे जो
भूला नहीं भुलाना
१-५-२०१९
***
एक दोहा
*
भाषा वाहक भाव की, अंतर्मन का चित्र
मित्र शत्रु है कौन-कब, कहे बिन कहे मित्र
*
एक मुक्तक
*
चढ़ी काठ की हांडी तजकर ममता-बंधन सारे
खलिश न बाकी, कुसुम हो रहे उसे शूल भी सारे
अगन हुई राकेशी शीतल, भव-बाधा कब व्याधे
कर्माहुति दे धर्मदेव को वह पल-पल आराधे.
एक दोहा
भाषा वाहक भाव की, अंतर्मन का चित्र
मित्र शत्रु है कौन-कब, कहे बिन कहे मित्र
१-५-२०१७
***
भोजपुरी दोहा :
दोहा में दो पद (पंक्तियाँ) तथा हर पंक्ति में २ चरण होते हैं. विषम (प्रथम व तृतीय) चरण में १३-१३ मात्राएँ तथा सम (२रे व ४ थे) चरण में ११-११ मात्राएँ, इस तरह हर पद में २४-२४ कुल ४८ मात्राएँ होती हैं. दोनों पदों या सम चरणों के अंत में गुरु-लघु मात्र होना अनिवार्य है. विषम चरण के आरम्भ में एक ही शब्द जगण (लघु गुरु लघु) वर्जित है. विषम चरण के अंत में सगण,रगण या नगण तथा सम चरणों के अंत में जगण या तगण हो तो दोहे में लय दोष स्वतः मिट जाता है. अ, इ, उ, ऋ लघु (१) तथा शेष सभी गुरु (२) मात्राएँ गिनी जाती हैं
*
कइसन होखो कहानी, नहीं साँच को आँच.
कंकर संकर सम पूजहिं, ठोकर खाइल कांच..
*
कोई किसी भी प्रकार से झूठा-सच्चा या घटा-बढाकर कहे सत्य को हांनि नहीं पहुँच सकता. श्रद्धा-विश्वास के कारण ही कंकर भी शंकर सदृश्य पूजित होता है जबकि झूठी चमक-दमक धारण करने वाला काँच पल में टूटकर ठोकरों का पात्र बनता है.
*
कतने घाटल के पियल, पानी- बुझल न प्यास.
नेह नरमदा घाट चल, रहल न बाकी आस..
*
जीवन भर जग में यहाँ-वहाँ भटकते रहकर घाट-घाट का पानी पीकर भी तृप्ति न मिली किन्तु स्नेह रूपी आनंद देनेवाली पुण्य सलिला (नदी) के घाट पर ऐसी तृप्ति मिली की और कोई चाह शेष न रही.
*
गुन अवगुन कम- अधिक बा, ऊँच न कोई नीच.
मिहनत श्रम शतदल कमल, मोह-वासना कीच..
*
अलग-अलग इंसानों में गुण-अवगुण कम-अधिक होने से वे ऊँचे या नीचे नहीं हो जाते. प्रकृति ने सबको एक सम़ान बनाया है. मेंहनत कमल के समान श्रेष्ठ है जबकि मोह और वासना कीचड के समान त्याग देने योग्य है. भावार्थ यह की मेहनत करने वाला श्रेष्ठ है जबकि मोह-वासना में फंसकर भोग-विलास करनेवाला निम्न है.
*
नेह-प्रेम पैदा कइल, सहज-सरल बेवहार.
साँझा सुख-दुःख बँट गइल, हर दिन बा तिवहार..
*
सरलता तथा स्नेह से भरपूर व्यवहार से ही स्नेह-प्रेम उत्पन्न होता है. जिस परिवार में सुख तथा दुःख को मिल बाँटकर सहन किया जाता है वहाँ हर दिन त्यौहार की तरह खुशियों से भरा होता है..
*
खूबी-खामी से बनल, जिनगी के पिहचान.
धूप-छाँव सम छनिक बा, मान अउर अपमान..
*
ईश्वर ने दुनिया में किसी को पूर्ण नहीं बनाया है. हर इन्सान की पहचान उसकी अच्छाइयों और बुराइयों से ही होती है. जीवन में मान और अपमान धुप और छाँव की तरह आते-जाते हैं. सज्जन व्यक्ति इससे प्रभावित नहीं होते.
*
सहरन में जिनगी भयल, कुंठा-दुःख-संत्रास.
केई से मत कहब दुःख, सुन करिहैं उपहास..
*
शहरों में आम आदमी की ज़िन्दगी में कुंठा, दुःख और संत्रास की पर्याय बन का रह गयी है किन्तु अपना अपना दुःख किसी से न कहें, लोग सुनके हँसी उड़ायेंगे, दुःख बाँटने कोई नहीं आएगा. इसी आशय का एक दोहा महाकवि रहीम का भी है:
*
रहिमन निज मन की व्यथा, मन ही रखियो गोय.
सुन हँस लैहें लोग सब, बाँट न लैहें कोय..
*
फुनवा के आगे पड़ल, चीठी के रंग फीक.
सायर सिंह सपूत तो, चलल तोड़ हर लीक..
समय का फेर देखिये कि किसी समय सन्देश और समाचार पहुँचाने में सबसे अधिक भूमिका निभानेवाली चिट्ठी का महत्व दूरभाष के कारण कम हो गया किन्तु शायर, शेर और सुपुत्र हमेशा ही बने-बनाये रास्ते को तोड़कर चलते हैं.
*
बेर-बेर छटनी क द स, हरदम लूट-खसोट.
दुर्गत भयल मजूर के, लगल चोट पर चोट..
*
दुनिया का दस्तूर है कि बलवान आदमी निर्बल के साथ बुरा व्यव्हार करते हैं. ठेकेदार बार-बार मजदूरों को लगता-निकलता है, उसके मुनीम कम मजदूरी देकर मजदूरों को लूटते हैं. इससे मजदूरों की उसी प्रकार दशा ख़राब हो जाती है जैसे चोट लगी हुई जगह पर बार-बार चोट लगने से होती है.
*
दम नइखे दम के भरम, बिटवा भयल जवान.
एक कमा दू खर्च के, ऊँची भरल उडान..
*
किसी व्यक्ति में ताकत न हो लेकिन उसे अपने ताकतवर होने का भ्रम हो तो वह किसी से भी लड़ कर अपनी दुर्गति करा लेता है. इसी प्रकार जवान लड़के अपनी कमाई का ध्यान न रखकर हैसियत से अधिक खर्च कर परेशान हो जाते हैं..
***
एक रचना:
.
शारद पुत्र कहीं भी हों
वे अक्षर पूजन नित करते हैं.
शब्द ब्रम्ह के चरणों में
रच-रचकर कवितायेँ धरते हैं.
शरद पूर्णिमा को राकेशी
किरण-कटोरा उलट गया सा
रस पीने में लीन हुए तो
आना-जाना सिमट गया सा.
मन मंदिर में छंद देवता
एक बार जो बस पाते हैं.
अंतिम सांस न निकले जब तक
तब तक कहीं नहीं जाते हैं
ललित भाव-भाषा-बिम्बों की
अजब-अनूठी माया नगरी
निजता के अवगुंठन टूटे
सब से मैं ही चिपट गया सा
दूरी सिमट गईं टीवी में
विस्तारित हैं मन में अंतर
अंतर को अंतर बिसरा दे
भूल गया मन ऐसे मंतर
तन का तंत्र कब तलक छलता
आखिर सत्य हुआ उद्घाटित
जनगण का मन दल-दलदल से
मोह-भंग हो उचट गया सा
सन्नाटा अनहद निनाद से
मिलकर गले गीत गाता है
कहीं अपरिचय का परिचय पा
अपनापन ही खो जाता है
भेद-अभेद न मिटते-मिलते
चाहे जितने जतन करें हम
अपना ही मुख मन-दर्पण में
लगे न सच के निकट गया सा
कागज़-कलम रौशनाई ने
रौशन किया ख्यालों को जब
आमंत्रित कर लिया अजाने
शत-शत विकट बबालों को तब
मुक्तक श्वास, आस दोहा बन
प्राणवायु का झोंका लाता
सजल ग़ज़ल अनकहनी कहती
दर्द न छिपता लिपट गया सा
***
नवगीत:
.
जो हुआ सो हुआ
.
बाँध लो मुट्ठियाँ
चल पड़ो रख कदम
जो गये, वे गये
किन्तु बाकी हैं हम
है शपथ ईश की
आँख करना न नम
नीलकण्ठित बनो
पी सको सकल गम
वृक्ष कोशिश बने
हो सफलता सुआ
.
हो चुका पूर्व में
यह नहीं है प्रथम
राह कष्टों भरी
कोशिशें हों न कम
शेष साहस अभी
है बहुत हममें दम
सूर्य हैं सच कहें
हम मिटायेंगे तम
उठ बढ़ें, जय वरें
छोड़कर हर खुआ
.
चाहते क्यों रहें
देव का हम करम?
पालते क्यों रहें
व्यर्थ मन में भरम?
श्रम करें तज शरम
साथ रहना धरम
लोक अपना बनाएंगे
फिर श्रेष्ठ हम
गन्स जल स्वेद है
माथ से जो चुआ
१-५-२०१५
***
नवगीत:
अनेक वर्णा पत्तियाँ हैं
शाख पर तो क्या हुआ?
अपर्णा तो है नहीं अमराई
सुख से सोइये
बज रहा चलभाष सुनिए
काम अपना छोड़कर
पत्र आते ही कहाँ जो रखें
उनको मोड़कर
किताबों में गुलाबों की
पंखुड़ी मिलती नहीं
याद की फसलें कहें, किस नदी
तट पर बोइये?
सैंकड़ों शुभकामनायें
मिल रही हैं चैट पर
सिमट सब नाते गए हैं
आजकल अब नैट पर
ज़िंदगी के पृष्ठ पर कर
बंदगी जो मीत हैं
पड़ गये यदि सामने तो
चीन्ह पहचाने नहीं
चैन मन का, बचा रखिए
भीड़ में मत खोइए
३०-११-२०१४
***
छंद सलिला:
राधिका छंद
*
छंद-लक्षण: जाति महारौद्र , प्रति चरण मात्रा २२ मात्रा, यति १३ - ९ ।
लक्षण छंद:
सँग गोपों राधिका के / नंदसुत - ग्वाला
नाग राजा महारौद्र / कालिया काला
तेरह प्रहार नौ फणों / पर विष न बाकी
गंधर्व किन्नर सुर नरों / में कृष्ण आला
*
राधिका बाईस कला / लख कृष्ण मोहें
तेरह - नौ यति क़ृष्ण-पग / बृज गली सोहें
भक्त जाते रीझ, भय / से असुर जाते काँप
भाव-भूखे कृष्ण कण / कण जाते व्याप
उदाहरण:
१. जब जब जनगण ने फ़र्ज़ / आप बिसराया
तब तब नेता ने छला / देश पछताया
अफसर - सेठों ने निजी / स्वार्थ है साधा
अन्ना आंदोलन बना / स्वार्थ पथ-बाधा
आक्षेप और आरोप / अनेक लगाये
जनता को फ़िर भी दूर / नहीं कर पाये
२. आया है आम चुनाव / चेत जनता रे
मतदान करे चुपचाप / फ़र्ज़ बनता रे
नेता झूठे मक्कार / नहीं चुनना रे
ईमानदार सरकार / स्वप्न बुनना रे
३. नारी पर अत्याचार / जहाँ भी होते
अनुशासन बिन नागरिक / शांति-सुख खोते
जननायक साधें स्वार्थ / न करते सेवा
धन रख विदेश में खूब / उड़ाते मेवा
गणतंत्र वहाँ अभिशाप / सदृश हो जाता
अफसर -सेठों में जुड़े / घूस का नाता
अन्याय न्याय का रूप / धरे पलता है
विश्वास - सूर्य दोपहर / लगे ढलता है
४. राजनीति कोठरी, काजल की कारी
हर युग हर काल में, आफत की मारी
कहती परमार्थ पर, साधे सदा स्वार्थ
घरवाली से अधिक, लगती है प्यारी
५. बोल-बोल थक गये, बातें बेमानी
कोई सुनता नहीं, जनता है स्यानी
नेता और जनता , नहले पर दहला
बदले तेवर दिखा, देती दिल दहला
६. कली-कली चूमता, भँवरा हरजाई
गली-गली घूमता, झूठा सौदाई
बिसराये वायदे, साध-साध कायदे
तोड़े सब कायदे, घर मिला ना घाट
*********
टीप राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त जी ने साकेत में राधिका छंद का प्रयोग किया है.
हा आर्य! भरत का भाग्य, रजोमय ही है,
उर रहते उर्मि उसे तुम्हीं ने दी है.
उस जड़ जननी का विकृत वचन तो पाला
तुमने इस जन की ओर न देखा-भाला।
***
।। हिंदी आटा माढ़िये, उर्दू मोयन डाल । 'सलिल' संस्कृत सान दे, पूरी बने कमाल ।।
१-५-२०१४***
मुक्तिका:
मौन क्यों हो?
*
मौन क्यों हो पूछती हैं कंठ से अब चुप्पियाँ.
ठोकरों पर स्वार्थ की, आहत हुई हैं गिप्पियाँ..
टँगा है आकाश, बैसाखी लिये आशाओं की.
थक गये हैं हाथ, ले-दे रोज खाली कुप्पियाँ..
शहीदों ने खून से निज इबारत मिटकर लिखी.
सितासत चिपका रही है जातिवादी चिप्पियाँ..
बादशाहों को किया बेबस गुलामों ने 'सलिल'
बेगमों की शह से इक्के पर हैं हावी दुप्पियाँ..
तमाचों-मुक्कों ने मानी हार जिद के सामने.
मुस्कुराकर 'सलिल' जीतीं, प्यार की कुछ झप्पियाँ..
***
दोहा
*
महल खंडहर हो रहे, देख रहे सब मौन.
चाह न महलों की करें, ऐसे कितने? कौन?
१.५.२०१०
***
कुछ हाइकु
*
करूँ वंदन
हे कलम के देव!
श्रद्धा सहित
*
वृष देव को
नमन मनुज का
सदा छाँव दो
*
'सलिल' सुमिर
प्रभु पद पद्मों को
बन भ्रमर
*
सब में रब
कभी न भूलना
रब के सब
*
ईंट-रेट का
मंदिर मनहर
ईश लापता
*
मितवा दूँ क्य?
क्षण भंगुर जग
भौतिक सारा
*
है उद्गाता
मनुज धरम की
भारत माता
*
रचना काल १९९८
रासलीला :
*
आँख में सपने सुनहरे झूलते हैं.
रूप लख भँवरे स्वयं को भूलते हैं.
झूमती लट नर्तकी सी डोलती है.
फिजा में रस फागुनी चुप घोलती है.
कपोलों की लालिमा प्राची हुई है.
कुन्तलों की कालिमा नागिन मुई है.
अधर शतदल पाँखुरी से रसभरे हैं.
नासिका अभिसारिका पर नग जड़े हैं.
नील आँचल पर टके तारे चमकते.
शांत सागर मध्य दो वर्तुल उमगते.
खनकते कंगन हुलसते गीत गाते.
राधिका है साधिका जग को बताते.
कटि लचकती साँवरे का डोलता मन.
तोड़कर चुप्पी बजी पाजेब बैरन.
सिर्फ तू ही तो नहीं मैं भी यहाँ हूँ.
खनखना कह बज उठी कनकाभ करधन.
चपल दामिनी सी भुजाएँ लपलपातीं.
करतलों पर लाल मेंहदी मुस्कुराती.
अँगुलियों पर मुन्दरियाँ नग जड़ी सोहें.
कज्जली किनार सज्जित नयन मोहें.
भौंह बाँकी, मदिर झाँकी नटखटी है.
मोरपंखी छवि सुहानी अटपटी है.
कौन किससे अधिक, किससे कौन कम है.
कौन कब दुर्गम-सुगम है?, कब अगम है?
पग युगल द्वय कब धरा पर?, कब अधर में?
कौन बूझे?, कौन-कब?, किसकी नजर में?
कौन डूबा?, डुबाता कब-कौन?, किसको?
कौन भूला?, भुलाता कब-कौन?, किसको?
क्या-कहाँ घटता?, अघट कब-क्या-कहाँ है?
क्या-कहाँ मिटता?, अमिट कुछ-क्या यहाँ है?
कब नहीं था?, अब नहीं जो देख पाये.
सब यहीं था, सब नहीं थे लेख पाये.
जब यहाँ होकर नहीं था जग यहाँ पर.
कब कहाँ सोता-न-जगता जग कहाँ पर?
ताल में बेताल का कब विलय होता?
नाद में निनाद मिल कब मलय होता?
थाप में आलाप कब देता सुनायी?
हर किसी में आप वह देता दिखायी?
अजर-अक्षर-अमर कब नश्वर हुआ है?
कब अनश्वर वेणु गुंजित स्वर हुआ है?
कब भँवर में लहर?, लहरों में भँवर कब?
कब अलक में पलक?, पलकों में अलक कब?
कब करों संग कर, पगों संग पग थिरकते?
कब नयन में बस नयन नयना निरखते?
कौन विधि-हरि-हर? न कोई पूछता कब?
नट बना नटवर, नटी संग झूमता जब.
भिन्न कब खो भिन्नता? हो लीन सब में.
कब विभिन्न अभिन्न हो? हो लीन रब में?
द्वैत कब अद्वैत वर फिर विलग जाता?
कब निगुण हो सगुण आता-दूर जाता?
कब बुलाता?, कब भुलाता?, कब झुलाता?
कब खिझाता?, कब रिझाता?, कब सुहाता?
अदिख दिखता, अचल चलता, अनम नमता.
अडिग डिगता, अमिट मिटता, अटल टलता.
नियति है स्तब्ध, प्रकृति पुलकती है.
गगन को मुँह चिढ़ा, वसुधा किलकती है.
आदि में अनादि बिम्बित हुआ कण में.
साsदि में फिर सांsत चुम्बित हुआ क्षण में.
अंत में अनंत कैसे आ समाया?
दिक् में दिगंत जैसे था समाया.
कंकरों में शंकरों का वास देखा.
और रज में आज बृज ने हास देखा.
मरुस्थल में महकता मधुमास देखा.
नटी नट में, नट नटी में रास देखा.
रास जिसमें श्वास भी था, हास भी था.
रास जिसमें आस, त्रास-हुलास भी था.
रास जिसमें आम भी था, खास भी था.
रास जिसमें लीन खासमखास भी था.
रास जिसमें सम्मिलित खग्रास भी था.
रास जिसमें रुदन-मुख पर हास भी था.
रास जिसको रचाता था आत्म पुलकित.
रास जिसको रचाता परमात्म मुकुलित.
रास जिसको रचाता था कोटि जन गण.
रास जिसको रचाता था सृष्टि-कण-कण.
रास जिसको रचाता था समय क्षण-क्षण.
रास जिसको रचाता था धूलि तृण-तृण..
रासलीला विहारी खुद नाचते थे.
रासलीला सहचरी को बाँचते थे.
राधिका सुधि-बुधि बिसारे नाचतीं थीं.
'सलिल' ने निज बिंदु में वह छवि निहारी.
जग जिसे कहता है श्रीबांकेबिहारी.
*******************************
३०-४-२०१०
दोहा
महल खंडहर हो रहे, देख रहे सब मौन.
चाह न महलों की करें, ऐसे कितने? कौन?
१-५-२०१०
***