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सोमवार, 22 जून 2026

जून २२, बरसाती जंगल दिवस, सॉनेट, न्याय प्रक्रिया, कहमुकरी, सड़गोड़ासनी, सरस्वती, अभियंता, सवैया

 सलिल सृजन जून २२

बरसाती जंगल दिवस
*
ग़ज़लिका १ ० सीधी अँगुली घी न निकलता है प्यारे! हर जसुदा को लगे लला उसके न्यारे . हो जिसका नापाक इरादा, वह खुद ही हारा करता हिम्मत, खुद को खुद मारे . भक्त लूट ले मंदिर तो अचरज मत कर उसे पता प्रभु भटक रहे द्वारे-द्वारे . सूर निहारें लीला प्रभु की बिन नैना नैना रोएँ प्रभु आ दरस दिखा जा रे! . रहना है बेदाग अगर तो गुर सीखो आपस में मिल बाँट माल गुपचुप खा रे! ००० ग़ज़लिका २ ० भीतर से तो हम सब बिखरे-बिखरे हैं। हैं ढपोरशंखी कहलाते चतुरे हैं।। . पंक लपेटे मुख पर बनते हैं पंकज लेकिन दिखा रहे सबको हम निखरे हैं।। . छुट्टे सिक्के लिए फिरें बाजारों में। सौदागर हैं छुरे लिए हम बकरे हैं।। . आशाओं ने भाषाओं को बदल दिया। तन से नहीं जवान, न मन से डुकरे हैं।। . मीमांसाकारों को पढ़कर बड़े हुए। जो कुछ लिखा-कहा वह सब तो फिकरे हैं।। . मनमानी कर कहते हैं मन की बातें। समझ सके जो वे सज्जन जन सिहरे हैं।। . ऊपर ऊपर तैर रहे हो भेंट चढ़ा। गोलमाल करते जो उतरे गहरे हैं।। . रामालय को लूटालय में बदल दिया। हैं अंगद के पाँव, न सुनते बहरे हैं।। . जाँच कमेटी में भी भक्त हमीं से हैं। बहता सलिल न निर्मल, चंपत ठहरे हैं।। २२.६.२०२६ ०००
सॉनेट
खत्म नहीं जिज्ञासा होती
हर जिज्ञासु अमर होता
ज्ञान समुद में खाता गोता
मति निकाल लाती मोती।
आशा नव सपने बोती
पौरुष नहीं हारकर रोता
धैर्य नहीं विपदा में खोता
पंक सलिल-धारा धोती।
सरगम लय-रस ताना-बाना
शब्द भाव के रंग चढ़ाए
निशि नित चादर बुने मौन रह।
कहे कबीर न जोड़-बचाना
खाली हाथों आए-जाए
रहा हमेशा कभी कौन कह?
२२.६.२०२५
०0०
ग़ज़लिका
भोर भई सूरज टेरत रे!
उसा बुलाउत पथ हेरत रे!
.
छिमा माँग भू माँ पे पग धर
बिलम नें कर आलस घेरत रे!
.
बगुला भगत बजाउत घंटी
भोग तके, माला फेरत रे!
.
आस किरन कुररी की नाईँ
अँधियारा लोफर छेरत रे!
.
'सलिल' दनादन भोग गटक खें
भगतन खौं ठाकुर पेरत रे!
२२.६.२०२५
०0०
विमर्श:
न्याय प्रक्रिया बदलाव जरूरी
*
न्याय क्या?
निर्बल-असहाय को उसका अधिकार दिलाना।
देनेवाला- न्यायाधीश
माध्यम- अधिवक्ता
प्रक्रिया- वाद स्थापित करना।
सुलभता नहीं, सहजता नहीं, सरलता नहीं।
अत्यंत खर्चीली, समयखाऊ, जटिल, उलझन भरी, कानूनी दाँव-पेंच में सत्य की हत्या।
वकालतनामा- मुवक्किल से सभी अधिकार छीनकर वकील को देता है।
वकील मनमानी करता है। फीस लेकर भी पेशी पर नहीं जाता, तारीख बढ़ना कर बार-बार पैसे माँगता है, वाद के सत्य को छिपाकर जीत के लिए झूठे साक्ष्य और साक्षी गढ़कर न्यायालय की आँख में धूल झोंकता है।
कोढ़ में खाज यह कि मुवक्किल के हित संरक्षण के स्थान पर वकील और न्यायपालिका अपने संरक्षण की माँग करते हैं।
अनेक असामाजिक तत्व वकील बन गए हैं जो न्याय पालिका और मुवक्किल दोनों में दहशत फैलाते हैं।
सड़-गल रही व्यवस्था बदलें।
न्याय प्राप्ति के लिए वकील की आवश्यकता समाप्त की जाए।
जूरी प्रणाली लागू की जाए। वाद स्थापित करते समय ही वादी पूरा घटनाक्रम और दस्तावेज न्यायालय और प्रतिवादी को दे। प्रतिवादी अपना उत्तर न्यायालय व वादी को निर्धारित समय सीमा में उपलब्ध कराए। पहली पेशी में जूरी दोनों को सुनकर शेष दस्तावेज या साक्षी प्रस्तुत करने हेतु दूसरी पेशी दे। सामान्य प्रकरणों में तीसरी, महत्वपूर्ण प्रकरणों में पाँचवी पेशी में फैसला हो। न्यायडीश की सहायता के लिए वकील जूरी सदस्य हो जीसे मानदेय/भत्ता मिले। वादी-प्रतिवादी जूरी शुल्क न्यायालय में जमा करें, वकील को फीस न दें।
इससे न्याय प्रक्रिया सरल, सस्ती, सुलभ, शीघ्र तथा निष्पक्ष होगी।
कुछ वर्षों में वाद प्रकरणों के अंबार कम और समाप्त होने लगेंगे।
२२.४.२०२३
***
कविता के शब्द
यदि "आपके दिमाग़ में कविता के शब्द उस तरह नहीं आते हैं जैसे पेड़ों पर पत्ते, तो बेहतर होगा कि आप कविता लिखने के बारे में सोचें ही नहीं। यानी अच्छी कविता वही लिख सकते हैं जिन्हें कविता के शब्द सोचने की ज़रूरत न पड़े । वे ख़ुद-ब-ख़ुद आने शुरू हो जाएँ और कविता बनती जाए ।"
- जाॅन कीट्स
कथा लिखती हूँ इतिहास नहीं
"मैंने जितना भी लिखा है शत-प्रतिशत मेरा भोगा हुआ यथार्थ है, यह मैं नहीं कह सकती क्योंकि मैं कथा लिखती हूँ, इतिहास नहीं । मेरा काम है कहानी को ढूँढ़ना, किन्तु अगाध जलराशि से इस कथा-मीन को पकड़ने में केवल कल्पना के काँटे से ही काम नहीं चलता, यथार्थ के आटे की गोली भी उतनी ही आवश्यक होती है।"
- शिवानी (रमेश बतरा/सतीश चंद्र धींगड़ा के किसी प्रश्न पर - 1983)
*
कहमुकरी
जिसने जन्म दिया पाला है
कदम-कदम देखा-भाला है
जिसका सिर पर हाथ हमेशा
क्या सखि! दाता?
ना सखि पिता।
थाम कलाई नाजुक कोमल
बात करे मुस्काकर पल-पल
मैं न सकी उसको फटकार
क्या सखि सजना?
ना, मनिहार।
जैसे ही आए, छा जाए
बिना कारण ही शोर मचाए
पड़े न उसको पल भर कल
क्या सखि प्रियतम?
न, सखी बादल।
पता नहीं पड़ती गहराई
रौद्र नहीं, छवि शांत सुहाई
दे उपहार न पूर्व बताकर
सखि! घरवाला
नहिं रत्नाकर।
जब मिलती तभी मिलता चैन
मिलती नहीं तो मन बेचैन
अँखियों को भाए ज्यों सखियाँ
उत्तर बिंदिया?
नहिं सखी निंदिया।
याद भुलाए से नहिं भूले
पलक बंद नैनों में झूले
संग सेज पर आए, भाए
यारां बन्नी?
ना रे! निन्नी।
बीन बिना वह बीन बजा ले
गैरों से अपनापन पाले
नहीं तनिक भी रखता अंतर
बूझूँ? मच्छर
ना रे! झींगुर।
बिन मंडप वह डाले फेरे
मंत्र पढ़े, सजनी को टेरे
भैंस बराबर उसको अक्षर
लालबुझक्कड़?
नहिं रे मच्छर।
बिन चेताए करता हमला
रोक न पाता कोई अमला
बिन कारण होता हमलावर
पाक-चाइना?
ना सखि! मच्छर।
जब बोले तब मन को भाए
मौन रहे तो याद न जाए
पंथ हेर मन होता बेकल
क्या वह नूपुर?
ना रे हूटर।
सचमुच है वह बिल्कुल अपना
नाप न पाता कोई नपना
जब दिखता तब बहुत लुभाता
गुइयाँ सजना?
ना सखि! सपना।
स्वप्न दिखाकर तोड़ा करता
मँझधारों में छोड़ा करता
करा न कहता, कहा न करता
समझी, बेटा
ना सखि! नेता।
२२-६-२०२२
•••
मैया शारदे! पत रखियो
*
छंद - सड़गोड़ासनी।
पद - ३, मात्राएँ - १५-१२-१५।
पहली पंक्ति - ४ मात्राओं के बाद गुरु-लघु अनिवार्य।
गायन - दादरा ताल ६ मात्रा।
*
मैया शारदे! पत रखियो
मोखों सद्बुधि दइयो
मैया शारदे! पत रखियो
जा मन मंदिर मैहरवारी
तुरतइ आन बिरजियो
मैया शारदे! पत रखियो
माया-मोह राच्छस घेरे
झट सें मार भगइयो
मैया शारदे! पत रखियो
अनहद नाद सुनइयो माता!
लागी नींद जगइयो
मैया शारदे! पत रखियो
भासा-आखर-कवित मोय दो
लय-रस-भाव लुटइयो
मैया शारदे! पत रखियो
मात्रा-वर्ण; प्रतीक बिम्ब नव
अलंकार झलकइयो
मैया शारदे! पत रखियो
२५-११-२०१९
***
शारद वंदन
*
बीना लेकर प्रगट हों, बीनावादिनी साथ
कृपा कोर कर हो सदय, रखो सीस पै हाथ
मोरी मति चकरानी है, ऐ मैया! मोए बचा लइयो
मो खों गैल भुलानी है, ऐ मैया! पार लगा दइयो
जनम-जनम की मैली चादर
रीती सत करमन की गागर
सदय नईं नटराज हो रए
दया नईँ कर रए नटनागर
प्रभु की कृपा करानी है, रमा-उमा लै आ जइयो
तनक न जानौं पूजन-वंदन
नईँ जुट रए अच्छत्-चंदन
प्रगट नें होते चित्रगुप्त जू
सदय नें होते गिरिजानंदन
दरसन की जिद ठानी है, ऐ मैया! दरस दिला दइयो
सारद! हंसबाहिनी माता
सकल भुवन तुमरे जस गाता
नीर-छीर मति दो ममतामई!
कलम लए कर रऔ जगराता
अलंकार रस छंद न जानूँ, भगतें सुझा लिखा लइयो
११-६-२०२०
***
शारद वंदना
सतमात्रिक नवान्वेषित छंद
सूत्र : ननल।
*
सुर सति नमन
नित कर अमन
*
मुख छवि प्रखर
स्वर-ध्वनि मधुर
अविचल अजर
अविकल अमर
कर नव सृजन
सुरसति नमन
*
पद दल असुर
रच पद स-सुर
कर जननि घर
मम हृदयपुर
कर गह सु मन
सुरसति नमन
*
रस बन बरस
नित धरणि पर
शुभ कर मुखर
सुख रच प्रचुर
शुभ मृदु वचन
सुरसति नमन
२२-६-२०२०
***
त्रिअष्टक सवैया
गणसूत्र - जरज रजर जर।
वर्ण यति - ८-८-८ ।
मात्रा यति - १२-१२-१२।
*
तलाशते रहे कमी, न खूबियाँ निहारते, प्रसन्नता कहाँ मिले?
विरासतें रहे हमीं, न और को पुकारते, हँसी-खुशी कहाँ मिले?
बटोरने रहे सदा, न रंकबंधु हो सके, न आसमां-जमीं मिले।
निहारते रहे छिपे, न मीत प्रीत पा सके, मिले- कभी नहीं मिले ।
२२-६-२०१९
९४२५१८३२४४
***
हम अभियंता...
*
हम अभियंता!, हम अभियंता!!
मानवता के भाग्य-नियंता...
*
माटी से मूरत गढ़ते हैं,
कंकर को शंकर करते हैं.
वामन से संकल्पित पग धर,
हिमगिरि को बौना करते हैं.
नियति-नटी के शिलालेख पर
अदिख लिखा जो वह पढ़ते हैं.
असफलता का फ्रेम बनाकर,
चित्र सफलता का मढ़ते हैं.
श्रम-कोशिश दो हाथ हमारे-
फिर भविष्य की क्यों हो चिंता...
*
अनिल, अनल, भू, सलिल, गगन हम,
पंचतत्व औजार हमारे.
राष्ट्र, विश्व, मानव-उन्नति हित,
तन, मन, शक्ति, समय, धन वारे.
वर्तमान, गत-आगत नत है,
तकनीकों ने रूप निखारे.
निराकार साकार हो रहे,
अपने सपने सतत सँवारे.
साथ हमारे रहना चाहे,
भू पर उतर स्वयं भगवंता...
*
भवन, सड़क, पुल, यंत्र बनाते,
ऊसर में फसलें उपजाते.
हमीं विश्वकर्मा विधि-वंशज.
मंगल पर पद-चिन्ह बनाते.
प्रकृति-पुत्र हैं, नियति-नटी की,
आँखों से हम आँख मिलाते.
हरि सम हर हर आपद-विपदा,
गरल पचा अमृत बरसाते.
'सलिल' स्नेह नर्मदा निनादित,
ऊर्जा-पुंज अनादि-अनंता...
***
विमर्श
प्रश्न: भारतीय बोलियाँ हिंदी का हिस्सा हैं या नहीं?
हिस्सा हैं तो अलग मान्य क्यों?,
हिस्सा नहीं हैं तो उनके साहित्यकारों को हिंदी का माना जाए या नहीं??
*
भारत की सभी बोलियाँ भाषाएँ हिंदी की बहनें हैं. विद्यापति भारत और हिंदी के भी हैं. आपस में फूट डालने का कार्य निंदनीय है. सूर को ब्रज, तुलसी को अवधी, जगनिक और ईसुरी को बुंदेली, चंद बरदाई को राजस्थानी, खुसरो-कबीर को उर्दू का कवि बताकर हिंदी को विपन्न करने की दुर्बुद्धि हमें कदापि स्वीकार्य नहीं है. हम हिंदीभाषी तो भारत की हर भाषा और बोली के हर रचनाकार को अपनाते हैं. हिंदी महासागर है. होना तो यह चाहिए कि हर भाषा बोली के सामान्य प्रयोग में आनेवाले शब्द हिंदी शब्दकोष में उसी तरह सम्मिलित किये जाएँ जैसे अंग्रेजी विश्व की विविध भाषाओँ के शब्द लेती है. भारत की सब भाषाओँ केबहु उपयोगी शब्दों से समृद्ध हिंदी उन्हें तभी अपनी लगेगी जब हिंदी में वे अपने शब्द भी पायेंगे. आवश्यकता डॉ. प्रभाकर माचवे जैसे बहुभाषा-बोलीविद होने की है. सब एक-दुसरे की बोलीओं में लिखें. साहित्यकार को राजनीति में पड़ने की कोई जरूरत नहीं है. सियासत सिया के सत से पूरी तरह दूर है. साहित्यकार शब्द-सेतु बनाकर ही सद्भावना-सेतु बना सकेगा.
२२-६-२०१७
***
विमर्श :
हिंदी की शब्द सलिला
*
आजकल हिंदी विरोध और हिनदी समर्थन की राजनैतिक नूराकुश्ती जमकर हो रही है। दोनों पक्षों का वास्तविक उद्देश्य अपना राजनैतिक स्वार्थ साधना है। दोनों पक्षों को हिंदी या अन्य किसी भाषा से कुछ लेना-देना नहीं है। सत्तर के दशक में प्रश्न को उछालकर राजनैतिक रोटियाँ सेंकी जा चुकी हैं। अब फिर तैयारी है किंतु तब आदमी तबाह हुआ और अब भी होगा। भाषाएँ और बोलियाँ एक दूसरे की पूरक हैं, प्रतिस्पर्धी नहीं। खुसरो से लेकर हजारीप्रसाद द्विवेदी और कबीर से लेकर तुलसी तक हिंदी ने कितने शब्द संस्कृत. पाली, प्राकृत, अपभ्रंश, बुंदेली, भोजपुरी, बृज, अवधी, अंगिका, बज्जिका, मालवी निमाड़ी, सधुक्कड़ी, लश्करी, मराठी, गुजराती, बांग्ला और अन्य देशज भाषाओँ-बोलियों से लिये-दिये और कितने अंग्रेजी, तुर्की, अरबी, फ़ारसी, पुर्तगाली आदि से इसका कोई लेख-जोखा संभव नहीं है.
इसके बाद भी हिंदी पर संकीर्णता, अल्प शब्द सामर्थ्य, अभिव्यक्ति में अक्षम और अनुपयुक्त होने का आरोप लगाया जाना कितना सही है? गांधी जी ने सभी भारतीय भाषाओँ को देवनागरी लिपि में लिखने का सुझाव दिया था ताकि सभी के शब्द आपस में घुलमिल सकें और कालांतर में एक भाषा का विकास हो किन्तु प्रश्न पर स्वार्थ की रोटी सेंकनेवाले अंग्रेजीपरस्त गांधीवादियों और नौकरशाहों ने यह न होने दिया और ७० के दशक में हिन्दीविरोध दक्षिण की राजनीति में खूब पनपा।
संस्कृत से हिंदी, फ़ारसी होकर अंग्रेजी में जानेवाले अनगिनत शब्दों में से कुछ हैं: मातृ - मातर - मादर - मदर, पितृ - पितर - फिदर - फादर, भ्रातृ - बिरादर - ब्रदर, दीवाल - द वाल, आत्मा - ऐटम, चर्चा - चर्च (जहाँ चर्चा की जाए), मुनिस्थारि = मठ, -मोनस्ट्री = पादरियों आवास, पुरोहित - प्रीहट - प्रीस्ट, श्रमण - सरमन = अनुयायियों के श्रवण हेतु प्रवचन, देव-निति (देवों की दिनचर्या) - देवनइति (देव इस प्रकार हैं) - divnity = ईश्वरीय, देव - deity - devotee, भगवद - पगवद - pagoda फ्रेंच मंदिर, वाटिका - वेटिकन, विपश्य - बिपश्य - बिशप, काष्ठ-द्रुम-दल(लकड़ी से बना प्रार्थनाघर) - cathedral, साम (सामवेद) - p-salm (प्रार्थना), प्रवर - frair, मौसल - मुसल(मान), कान्हा - कान्ह - कान - खान, मख (अग्निपूजन का स्थान) - मक्का, गाभा (गर्भगृह) - काबा, शिवलिंग - संगे-अस्वद (काली मूर्ति, काला शिवलिंग), मखेश्वर - मक्केश्वर, यदु - jude, ईश्वर आलय - isreal (जहाँ वास्तव इश्वर है), हरिभ - हिब्रू, आप-स्थल - apostle, अभय - abbey, बास्पित-स्म (हम अभिषिक्त हो चुके) - baptism (बपतिस्मा = ईसाई धर्म में दीक्षित), शिव - तीन नेत्रोंवाला - त्र्यम्बकेश - बकश - बकस - अक्खोस - bachenelion (नशे में मस्त रहनेवाले), शिव-शिव-हरे - सिप-सिप-हरी - हिप-हिप-हुर्राह, शंकर - कंकर - concordium - concor, शिवस्थान - sistine chapel (धर्मचिन्हों का पूजास्थल), अंतर - अंदर - अंडर, अम्बा- अम्मा - माँ मेरी - मरियम आदि।
हिंदी में प्रयुक्त अरबी भाषा के शब्द : दुनिया, ग़रीब, जवाब, अमीर, मशहूर, किताब, तरक्की, अजीब, नतीज़ा, मदद, ईमानदार, इलाज़, क़िस्सा, मालूम, आदमी, इज्जत, ख़त, नशा, बहस आदि ।
हिंदी में प्रयुक्त फ़ारसी भाषा के शब्द : रास्ता, आराम, ज़िंदगी, दुकान, बीमार, सिपाही, ख़ून, बाम, क़लम, सितार, ज़मीन, कुश्ती, चेहरा, गुलाब, पुल, मुफ़्त, खरगोश, रूमाल, गिरफ़्तार आदि ।
हिंदी में प्रयुक्त तुर्की भाषा के शब्द : कैंची, कुली, लाश, दारोगा, तोप, तलाश, बेगम, बहादुर आदि ।
हिंदी में प्रयुक्त पुर्तगाली भाषा के शब्द : अलमारी, साबुन, तौलिया, बाल्टी, कमरा, गमला, चाबी, मेज, संतरा आदि ।
हिंदी में प्रयुक्त अन्य भाषाओ से: उजबक (उज्बेकिस्तानी, रंग-बिरंगे कपड़े पहननेवाले) = अजीब तरह से रहनेवाला,
हिंदी में प्रयुक्त बांग्ला शब्द: मोशाय - महोदय, माछी - मछली, भालो - भला,
हिंदी में प्रयुक्त मराठी शब्द: आई - माँ, माछी - मछली,
अपनी आवश्यकता हर भाषा-बोली से शब्द ग्रहण करनेवाली व्यापक में से उदारतापूर्वक शब्द देनेवाली हिंदी ही भविष्य की विश्व भाषा है इस सत्य को जितनी जल्दी स्वीकार किया जाएगा, भाषायी विवादों का समापन हो सकेगा।
***
गीत
अपने अम्बर का छोर
*
मैंने थाम रखी
अपनी वसुधा की डोर
तुम थामे रहना
अपने अंबर का छोर.…
*
हल धर कर
हलधर से, हल ना हुए सवाल
पनघट में
पन घट कर, पैदा करे बवाल
कूद रहे
बेताल, मना वैलेंटाइन
जंगल कटे,
खुदे पर्वत, सूखे हैं ताल
पजर गयी
अमराई, कोयल झुलस गयी-
नैन पुतरिया
टँगी डाल पर, रोये भोर.…
*
लूट सिया-सत
हाय! सियासत इठलायी
रक्षक पुलिस
हुई भक्षक, शामत आयी
अँधा तौले
न्याय, कोट काला ले-दे
शगुन विचारे
शकुनी, कृष्णा पछतायी
युवा सनसनी
मस्ती मौज मजा चाहें-
आँख लड़ायें
फिरा, न पोछें भीगी कोर....
*
सुर करते हैं
भोग प्रलोभन दे-देकर
असुर भोगते
बल के दम पर दम देकर
संयम खो,
छलकर नर-नारी पतित हुए
पाप छिपायें
दोष और को दे-देकर
मना जान की
खैर, जानकी छली गयी-
चला न आरक्षित
जनप्रतिनिधि पर कुछ जोर....
*
सरहद पर
सर हद करने आतंक डटा
दल-दल का
दलदल कुछ लेकिन नहीं घटा
बढ़ी अमीरी
अधिक, गरीबी अधिक बढ़ी
अंतर में पलता
अंतर, बढ़ नहीं पटा
रमा रमा में
मन, आराम-विराम चहे-
कहे नहीं 'आ
राम' रहा नाहक शोर....
*
मैंने थाम रखी
अपनी वसुधा की डोर
तुम थामे रहना
अपने अंबर का छोर.…
२२-६-२०१४
***
सनातन साहित्य : वेद, पुराण स्मृतियाँ
हमारा पारम्परिक सनातन साहित्य विश्व मानवता की अमूल्य धरोहर है. इसकी एक झलका निम्न है। इस में आप भी अपनी जानकारी जोड़िये:
*
वेद हमारे धर्मग्रन्थ हैं । वेद संसार के पुस्तकालय में सबसे प्राचीन ग्रन्थ हैं । वेद का ज्ञान सृष्टि के आदि में परमात्मा ने अग्नि , वायु , आदित्य और अंगिरा – इन चार ऋषियों को एक साथ दिया था । वेद मानवमात्र के लिये हैं ।
वेद चार हैं ----
१. ऋग्वेद – इसमें तिनके से लेकर ब्रह्म – पर्यन्त सब पदार्थो का ज्ञान दिया हुआ है । इसमें १०,५२२ मन्त्र हैं ।
२. यजुर्वेद – इसमें कर्मकाण्ड है । इसमें अनेक प्रकार के यज्ञों का वर्णन है । इसमें १,९७५ मन्त्र हैं ।
३. सामवेद – यह उपासना का वेद है । इसमें १,८७५ मन्त्र हैं ।
४. अथर्ववेद – इसमें मुख्यतः विज्ञान – परक मन्त्र हैं । इसमें ५,९७७ मन्त्र हैं ।
उपवेद – चारों वेदों के चार उपवेद हैं । क्रमशः – आयुर्वेद , धनुर्वेद , गान्धर्ववेद और अर्थवेद ।
वेदांग - ज्योतिष: नेत्र (सौरमंडल, मुहूर्त आदि), निरुक्त, कान: (वैदिक शब्द-व्याख्या आदि), शिक्षा: नासिका ( वेद मंत्र उच्चारण), व्याकरण: मुख (वैदिक शब्दार्थ), कल्प: हाथ (सूत्र / कल्प साहित्य- धर्म सूत्र: वर्ण, आश्रम आदि, श्रोत सूत्र: वृहद यज्ञ विधान, गृह्य सूत्र: लघु यज्ञ विधान, संस्कार, शुल्व सूत्र: वेदी निर्माण), छंद: पैर (काव्य लक्षण, आदि) ।
पुराण - मुख्य १८ ब्रम्ह, पद्म, विष्णु, शिव, नारदीय, श्रीमद्भागवत, मार्कण्डेय, अग्नि, भविष्य, ब्रम्हवैवर्त, लिंग, वाराह, स्कंद, वामन, कूर्म, मत्स्य, गरुड़, वायु (ब्रम्हांड) । स्कंद पुराण का एक भाग नर्मदापुराण के नाम से प्रकाशित है। सेठ गोविन्ददास ने गांधी पुराण लिखा किन्तु वह इस श्रेणी में नहीं है।
उपनिषद – अब तक प्रकाशित होने वाले उपनिषदों की कुल संख्या २२३ है , परन्तु प्रामाणिक उपनिषद ११ ही हैं । इनके नाम हैं --- ईश , केन , कठ , प्रश्न , मुण्डक , माण्डूक्य , तैत्तिरीय , ऐतरेय , छान्दोग्य , बृहदारण्यक और श्वेताश्वतर ।
ब्राह्मण ग्रन्थ – इनमें वेदों की व्याख्या है । चारों वेदों के प्रमुख ब्राह्मणग्रन्थ ये हैं ---
ऐतरेय , शतपथ , ताण्ड्य और गोपथ ।
दर्शनशास्त्र – आस्तिक दर्शन छह हैं – न्याय , वैशेषिक , सांख्य , योग , पूर्वमीमांसा और वेदान्त ।
स्मृतियाँ – स्मृतियों की संख्या ६५ है। मुख्य १८ स्मृतियाँ मनु, याज्ञवल्क्य, अत्रि, विष्णु, अंगिरस, यम, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, पराशर, व्यास, शंख, दक्ष, गौतम, शातातप तथा वशिष्ठ रचित हैं।
इनके अतिरिक्त आरण्यक, विमानशास्त्र आदि अनेक ग्रन्थ हैं।
२२-६-२०१४
***

सोमवार, 15 सितंबर 2025

अभियंता, अभियंता कवि, अभियंता दिवस

सर्व अभियंता दुर्गेश ब्योहार 'दर्शन', अमरेन्द्र नारायण, इंद्र कुमार खन्ना, राजीव जैन, सुरेन्द्र सिंह पवार, विवेक रंजन 'विनम्र', अरविंद मोहन नायक, देव दौनेरिया, राजेश ठाकुर,  अवधेश चौबे, 
दुर्गेश ब्योहार 'दर्शन'
सरस्वती वंदना, हिंदी आरती 
* सरस जैन 
एम व्ही की जीवनी 
* अरविंद मोहन नायक
हर किसी से मशविरा न लीजिए
यह हमारा मशविरा है लीजिए  
* विवेक रंजन श्रीवास्तव 'विनम्र'
भूकंप की भविष्यवाणी 
* डॉ. अनिल कोरी 
मैं हिंदी हिंदुस्तान की
भारत माँ की शान की  
* कपिल चौबे 
इतना सुंदर दृश्य मिला है आज यह पर आने में  
कुछ भूलूँ तो यह ही मानें भूल हुई अनजाने में 
मातु शारेदे करें कृपया तब ही हम कह पाते हैं 
गीत हमारे करें यात्रा आपके सँग सिरहाने में 
* हेमंत जैन 
मुखरित मुख से हो रही करते महिमगान 
जन जन के मन में बसी अपनी हिंदी जान 
* अमरेन्द्र नारायण 
वसुधा की तपती परते हों 
बीजों के उगते अंकुर हों 
रसमयी  जल की धार कौन 
चुपचाप सुलभ करवाता है 
* सुरेन्द्र सिंह पवार 
आज सारे विश्व को 
 


***
हम अभियंता

अभियंता संजीव वर्मा 'सलिल'
*
कंकर को शंकर करते हैं हम अभियंता.
पग-पग चल मंजिल वरते हैं हम अभियंता..

पग तल रौंदे जाते हैं जो माटी-पत्थर.
उनसे ताजमहल गढ़ते हैं हम अभियंता..

मन्दिर, मस्जिद, गिरजा, मठ, आश्रम तुम जाओ.
कार्यस्थल की पूजा करते हम अभियंता..

टन-टन घंटी बजा-बजा जग करे आरती.
श्रम का मन्त्र, न दूजा पढ़ते हम अभियंता..

भारत माँ को पूजें हम नव निर्माणों से.
भवन, सड़क, पुल, सुदृढ़ सृजते हम अभियंता..

अवसर-संसाधन कम हैं, आरोप अधिक पर-
मौन कर्म निज करते रहते हम अभियंता..

कभी सुई भी आया करती थी विदेश से.
उन्नत किया देश को हँसते हम अभियंता..

लोहा माने दुनिया भारत का, हिन्दी का.
ध्वजा तिरंगी ऊँची रखते हम अभियंता..

कार्य हमारा श्रेय प्रशासन ले लेता है.
'सलिल' अदेखे आहें भरते हम अभियंता..
***
हम अभियंता!

हम अभियंता!, हम अभियंता!!
मानवता के भाग्य-नियंता...



माटी से मूरत गढ़ते हैं,
कंकर को शंकर करते हैं.
वामन से संकल्पित पग धर,
हिमगिरि को बौना करते हैं.



नियति-नटी के शिलालेख पर
अदिख लिखा जो वह पढ़ते हैं.
असफलता का फ्रेम बनाकर,
चित्र सफलता का मढ़ते हैं.

श्रम-कोशिश दो हाथ हमारे-
फिर भविष्य की क्यों हो चिंता...



अनिल, अनल, भू, सलिल, गगन हम,
पंचतत्व औजार हमारे.
राष्ट्र, विश्व, मानव-उन्नति हित,
तन, मन, शक्ति, समय, धन वारे.



वर्तमान, गत-आगत नत है,
तकनीकों ने रूप निखारे.
निराकार साकार हो रहे,
अपने सपने सतत सँवारे.

साथ हमारे रहना चाहे,
भू पर उतर स्वयं भगवंता...



भवन, सड़क, पुल, यंत्र बनाते,
ऊसर में फसलें उपजाते.
हमीं विश्वकर्मा विधि-वंशज.
मंगल पर पद-चिन्ह बनाते.



प्रकृति-पुत्र हैं, नियति-नटी की,
आँखों से हम आँख मिलाते.
हरि सम हर हर आपद-विपदा,
गरल पचा अमृत बरसाते.

'सलिल' स्नेह नर्मदा निनादित,
ऊर्जा-पुंज अनादि-अनंता...
***
अभियांत्रिकी


*

(हरिगीतिका छंद विधान: १ १ २ १ २ x ४, पदांत लघु गुरु, चौकल पर जगण निषिद्ध, तुक दो-दो चरणों पर, यति १६-१२ या १४-१४ या ७-७-७-७ पर)

*

कण जोड़ती, तृण तोड़ती, पथ मोड़ती, अभियांत्रिकी

बढ़ती चले, चढ़ती चले, गढ़ती चले, अभियांत्रिकी

उगती रहे, पलती रहे, खिलती रहे, अभियांत्रिकी

रचती रहे, बसती रहे, सजती रहे, अभियांत्रिकी

*

नव रीत भी, नव गीत भी, संगीत भी, तकनीक है

कुछ हार है, कुछ प्यार है, कुछ जीत भी, तकनीक है

गणना नयी, रचना नयी, अव्यतीत भी, तकनीक है

श्रम मंत्र है, नव यंत्र है, सुपुनीत भी तकनीक है

*

यह देश भारत वर्ष है, इस पर हमें अभिमान है

कर दें सभी मिल देश का, निर्माण यह अभियान है

गुणयुक्त हों अभियांत्रिकी, श्रम-कोशिशों का गान है

परियोजना त्रुटिमुक्त हो, दुनिया कहे प्रतिमान है

*
तक रहा तकनीक को यदि आम जन कुछ सोचिए।
तज रहा निज लीक को यदि ख़ास जन कुछ सोचिए।।
हो रहे संपन्न कुछ तो यह नहीं उन्नति हुई-
आखिरी जन को मिला क्या?, निकष है यह सोचिए।।
*
चेन ने डोमेन की, अब मैन को बंदी किया।
पिया को ऐसा नशा ज्यों जाम साकी से पिया।।
कल बना, कल गँवा, कलकल में घिरा खुद आदमी-
किया जाए किस तरह?, यह ही न जाने है जिया।।
*
किस तरह स्मार्ट हो सिटी?, आर्ट है विज्ञान भी।
यांत्रिकी तकनीक है यह, गणित है, अनुमान भी।।
कल्पना की अल्पना सज्जित प्रगति का द्वार हो-
वास्तविकता बने ऐपन तभी जन-उद्धार हो।।
*** अभियंता दिवस पर मुक्तक:
*
कर्म है पूजा न भूल,
धर्म है कर साफ़ धूल।
मन अमन पायेगा तब-
जब लुटा तू आप फूल।
*
हाथ मिला, कदम उठा काम करें
लक्ष्य वरें, चलो 'सलिल' नाम करें
रख विवेक शांत रहे काम कर
श्रेष्ठ बना देश,चलो नाम करें.
*
मना अभियंता दिवस मत चुप रहो,
उपेक्षित अभियांत्रिकी है कुछ कहो।
है बहुत बदहाल शिक्षा, नौकरी-
बदल दो हालात, दुर्दशा न सहो।
*

सोरठा सलिला:
हो न यंत्र का दास
संजीव
*
हो न यंत्र का दास, मानव बने समर्थ अब
रख खुद पर विश्वास, 'सलिल' यांत्रिकी हो सफल
*
गुणवत्ता से आप, करिए समझौता नहीं
रहे सजगता व्याप, श्रेष्ठ तभी निर्माण हो
*
भूलें नहीं उसूल, कालजयी निर्माण हों
कर त्रुटियाँ उन्मूल, यंत्री नव तकनीक चुन
*
निज भाषा में पाठ, पढ़ो- कठिन भी हो सरल
होगा तब ही ठाठ, हिंदी जगवाणी बने
*
ईश्वर को दें दोष, ज्यों बिन सोचे आप हम
पाते हैं संतोष, त्यों यंत्री को कोसकर
*
जब समाज हो भ्रष्ट, कैसे अभियंता करे
कार्य न हों जो नष्ट, बचा रहे ईमान भी
*
करें कल्पना आप, करिए उनको मूर्त भी
समय न सकता नाप, यंत्री के अवदान को
*
उल्लाला सलिला:
संजीव
*
(छंद विधान १३-१३, १३-१३, चरणान्त में यति, सम चरण सम तुकांत, पदांत एक गुरु या दो लघु)
*
अभियंता निज सृष्टि रच, धारण करें तटस्थता।
भोग करें सब अनवरत, कैसी है भवितव्यता।।
*
मुँह न मोड़ते फ़र्ज़ से, करें कर्म की साधना।
जगत देखता है नहीं, अभियंता की भावना।।
*
सूर सदृश शासन मुआ, करता अनदेखी सतत।
अभियंता योगी सदृश, कर्म करें निज अनवरत।।
*
भोगवाद हो गया है, सब जनगण को साध्य जब।
यंत्री कैसे हरिश्चंद्र, हो जी सकता कहें अब??
*
​भृत्यों पर छापा पड़े, मिलें करोड़ों रुपये तो।
कुछ हजार वेतन मिले, अभियंता को क्यों कहें?
*
नेता अफसर प्रेस भी, सदा भयादोहन करें।
गुंडे ठेकेदार तो, अभियंता क्यों ना डरें??​
*
समझौता जो ना करे, उसे तंग कर मारते।
यह कड़वी सच्चाई है, सरे आम दुत्कारते।।
*
​हर अभियंता विवश हो, समझौते कर रहा है।
बुरे काम का दाम दे, बिन मारे मर रहा है।।
*
मिले निलम्बन-ट्रान्सफर, सख्ती से ले काम तो।
कोई न यंत्री का सगा, दोषारोपण सब करें।।
*
हम हैं अभियंता
संजीव
*
(छंद विधान: १० ८ ८ ६ = ३२ x ४)
*
हम हैं अभियंता नीति नियंता, अपना देश सँवारेंगे
हर संकट हर हर मंज़िल वरकर, सबका भाग्य निखारेंगे
पथ की बाधाएँ दूर हटाएँ, खुद को सब पर वारेंगे
भारत माँ पावन जन-मन भावन, सीकर चरण पखारेंगे
*
अभियंता मिलकर आगे चलकर, पथ दिखलायें जग देखे
कंकर को शंकर कर दें हँसकर मंज़िल पाएं कर लेखे
शशि-मंगल छूलें, धरा न भूलें, दर्द दीन का हरना है
आँसू न बहायें , जन यश गाये, पंथ वही नव वरना है
*
श्रम-स्वेद बहाकर, लगन लगाकर, स्वप्न सभी साकार करें
गणना कर परखें, पुनि-पुनि निरखें, त्रुटि न तनिक भी कहीं वरें
उपकरण जुटायें, यंत्र बनायें, नव तकनीक चुनें न रुकें
आधुनिक प्रविधियाँ, मनहर छवियाँ, उन्नत देश करें न चुकें
*
नव कथा लिखेंगे, पग न थकेंगे, हाथ करेंगे काम सदा
किस्मत बदलेंगे, नभ छू लेंगे, पर न कहेंगे 'यही बदा'
प्रभु भू पर आयें, हाथ बटायें, अभियंता संग-साथ रहें
श्रम की जयगाथा, उन्नत माथा, सत नारायण कथा कहें
===

बुधवार, 22 जनवरी 2025

जनवरी २२, नवगीत, सूरज। अभियंता, मुक्त, समीक्षा, झूमर गीत, फुलबगिया, सोरठा, सॉनेट

सलिल सृजन जनवरी २२

फुलबगिया अपराजिता, अमलतास, अर्जुन, अश्वगंधा, आंवला, आक, आम, आर्किड, एलोविरा, एस्टर, कचनार, कदंब, कनेर, कमल, काँस, कॉसमॉस, कुमुदिनी, केतकी, केवड़ा, कैक्टस, कैलेंडुला, क्रोकस, गुलमेंहदी, गुलाब, गेंदा-गेंदी, ग्लेडुलस, चंपा, चमेली, चाँदनी, चेरी, जिप्सोफिला, जासौन, जीनिया, जुही, ट्यूलिप, डहलिया, डायंथस, डेफोडिल, धतूरा, नागचंपा, निर्विषी, पलाश, पथरचटा, पेटूनिया, पैशन, पैंसी, बन्धूक, बाँस, बुरांस, बेशरम, ब्राह्मी, भटकटैया, मगरमस्त, मधुमालती, मधुमालिनी, महुआ, महोनिआ, मेंहदी, मोगरा, रजनीगंधा, रातरानी, रुद्राक्ष, लिली, वैजयंती, शमी, सदासुहागन, सरसों, साल्विया, सिनेरेरिया, सूरजमुखी, हरसिंगार। अनुरोध है की भारत में हजारों तरह के पुष्प खिलते हैं। हम अपने आसपास उग रहे फूलों को प्राथमिकता दें जिन्हें हम देख और पहचान सकें। साग-सब्जियों, अनाजों तथा मसलों आदि  पर लेखन अन्य शृंखलाओं  में किया जाएगा। अब तक लिए गए पुष्प- (१) जासौन (२) मोगरा (३) गेंदा (४) सदासुहागन (५) गुलाब (६) कमल (७) चंपा (८) चमेली (९) हरसिंगार (१०) कनेर (११) कचनार (१२) कपास (१३) अमलतास (१४) रजनीगंधा (१५) डहेलिया (१६) पलाश (१७) रातरानी (१८) शमी 

फुलबगिया 
० 
फुलबगिया में रूप-रंग है 
भरम न जाना महक-गंध है। 
अलस्सुबह घाँसों पर घूमो 
भू पर पैर, गगन को छू लो। 
क्या करते हो?, सुमन न तोड़ो 
कली-पुष्प रक्षित कर छोड़ो। 
आई आई तितली आई 
संग भ्रमर मतवाले लाई। 
कली लली परिवार न तजती 
रक्षा भ्रमर भाई से मिलती। 
टिड्डा अगर आँख दिखलाता 
फल आ उसको दूर भगाता। 
कोयल संग टिटहरी बोले 
मन मयूर नाचे हँस डोले। 
सब हिल-मिलकर साथ रहेंगे 
व्यथा-कथा निज नहीं कहेंगे। 
पौ फटती प्राची को देखो 
रूप उषा का मन में लेखो। 
आँख मूँद लो अपनी बैठो 
तज चिंता निज मन में पैठो। 
पवन दुलार रहा हो मुकुलित 
सूर्य किरण करती आलिंगित। 
खींचो श्वास रोक अब छोड़ो 
योगासन से तन-मन जोड़ो। 
सुमिरो नाम इष्ट का सविनय 
करो प्रार्थना सभी हों अभय। 
फुलबगिया के पौधे विकसें 
कभी सलिल के लिए न तरसें। 
पौधों-फूलों को पहचानें 
गुण-उपयोग आदि भी जानें। 
पेड़ न काटें, नए लगाएँ 
संजीवित हो मोद मनाएँ। 
हम सब वनमाली हो पाएँ 
हरियाली की जय गुँजाएँ।
००० 
दश आनन
दश-आनन का रुदन सुन, मैया थी हैरान बहुत।
दूध पिलाए किस तरह, राह न सूझे थी कुगत।।
सीख न पाए कुंभकर्ण, गिनती झट सो जाय।
दस आनन कैसे गिने, जगना नहीं सुहायौ।।
दस कंधों को नापता, मेघनाद सौ खेलकर।
अक्षकुमार मचल उसे, दूर हटाता ठेलकर।
एक अँगूठी-चैन ले, आया मय हैरान है।
बीस अँगुलियाँ कंठ दस, प्रभु मुश्किल में जान है।।
बीस भुजाएँ देखकर, हैरां थी मंदोदरी।
गले लगेगी किस तरह, सोच-सोच बेहद डरी।।
० 
खैर राम की जान की, रही माँगती जानकी।
कैसे दश-आनन हने, बाधा थी हनुमान की।। 
२२.१.२०२५
००० 
भोजपुरी-बुंदेली झूमर गीत
कवन रंग मुंगवा, कवन रंग मोतिया !
भोजपुरी और बुंदेली क्षेत्रों में चिरकाल से ख़ुशी के मौके पर जोड़े या समूह में औरतों द्वारा झूमर गीत गायन की परंपरा रही है। दुर्भाग्य से फ़िल्मी गीतों के प्रचलन के साथ झूमर की गायन परंपरा गाँवों में भी समाप्त होती जा रही है। हमारी पीढ़ी के लोग बचपन में माँ-बहनों-भाभियों को झूमर गाते देखते हुए ही बड़े हुए हैं। एक झूमर गीत 'कवन रंग मुंगवा, कवन रंग मोतिया, कवन रंग ननदी तोर भैया।' सदियों से सर्वाधिक लोकप्रिय गीत रहा है। लोकगीतों और लोकधुनों के आधार पर लेकर साहित्यकार और चित्रपटीय गीतकार रचनकर्म करते रहे हैं। किसी से प्रेरणा लेने में कोई बुराई भी नहीं है किंतु वर्ष १९५९ की एक हिंदी फिल्म 'हीरा मोती' में संगीतकार रोशन ने चक्की चलाती ननद और भौजाई के मुँह से सदियों पुराने लोकगीत को न केवल ज्यों का त्यों गवाया, इसके रचनाकार के रूप में प्रेम धवन का नाम दे दिया। यह वास्तव में अपराध है कि लोक संपदा का उपयोग कर व्यक्तिगत लाभर्जन किया जाए। फ़िल्मीकरण ने इस झूमर गीत को देशव्यापी लोकप्रियता दिलाई। वास्तव में बीसवी सदी के आरंभ में इस गीत को बनारस के रहनेवाले एक भोजपुरी कवि दिमाग राम ने लिखा था। संवाद शैली में लिखे गए इस गीत में ननद और भाभी के हास-परिहास का रंग इतना आत्मीय और गहरा था कि यह गीत देखते-देखते समूचे भोजपुरी क्षेत्र में फ़ैल गया। यह गीत उनके नाम से एक बहुत पुरानी किताब 'झूमर तरंग' में संकलित है। दिमाग राम जी को नमन करते हुए आपके साथ इस पूरे गीत को साझा कर रहा हूं।
कवन रंग मुंगवा, कवन रंग मोतिया,
कवन रंग ननदी तोर भैया।
लाल रंग मुंगवा, सफ़ेद रंग मोतिया,
सांवर रंग भौजी मोरा भैया।
कान सोभे मोतिया, गले सोभे मुंगवा,
पलंग सोभे ननदी तोर भैया।
टूटी जैहे मोतिया, छितराई जैहे मुंगवा,
कि रूसि जैहे भौजी मोरा भैया।
चुनी लेबो मोतिया, बटोरि लेंबो मुंगवा,
मनाई लेबो ननदी तोर भैया।
***
सोरठा सलिला
घुटना रहता मौन, घुट कर भी घुट ना सके।
दिवस रात्रि या भौन, घटता या बढ़ता नहीं।।
घोंट-छान हो तृप्त, कर जिह्वा रसपान कर।
घुटना है संतप्त, भोग न पाता कभी कुछ।।
उठा न पाया शीश, घुटना जिस पर धर गया।
बचकर रहें मनीष, घुटने से दूरी रखें।।
घुटना छूते लोग, करें शत्रुता निमंत्रित।
लाइलाज है रोग, समझें आदर दे रहे।।
कभी असल को मात, नकली दे सकता नहीं।
घुटना देखें तात, असल-नकल सम हैं नहीं।।
कहता यही विवेक, हो जबरा यदि सामने।
झट घुटना दें टेक, शीश न कटा; उठाइए।।
घुट मत मन में बाद, जो कहना बिंदास कह।
घूँट घूँट ले स्वाद, मत उड़ेल रस कंठ में।।
बाबा रामदास जी नर्मदापुरम
राम दास जी सिद्ध हैं, अविनाशी प्रभु दास।
लीन निगुण विधि में रहे, भव-त्यागी हरि-खास।।
*
आत्माराम सराहिए, परमात्मा के दास।
जा गिरि मोहन बस रहे, गुरु पर कर विश्वास।।
***
सॉनेट
आवागमन
*
देह मृण्मय रहो तन्मय।
श्वास अगली है अनिश्चित।
गमन से क्यों हो कहें भय।।
लौट आना है सुनिश्चित।।
दूर करती अनबनों से।
क्या गलत है, क्या सही है?
मुक्त करती बंधनों से।।
मौत तो मातामही है।।
चाह करते जिंदगी की।
कशमकश में है गुजरती।
राह भूले बंदगी की।।
थके आ-जा दम ठहरती।।
डूब सूरज, उगे फिर कल
भूल किलकिल, करो खिलखिल।।
२२-१-२०२२
***

पुस्तक सलिला
समीक्षक - आचार्य संजीव वर्मा "सलिल"
*
(पुस्तक विवरण - मधुर निनाद, गीत संग्रह, गोपालकृष्ण चौरसिया "मधुर", प्रथम संस्करण २०१७, ISBN ९७८-९३-८३४६८-७९-९, आकार डिमाई, आवरण बहुरंगी सजिल्द जैकेट सहित, पृष्ठ १३५, मूल्य २००/-, साहित्यागार प्रकाशन, जयपुर, गीतकार संपर्क चलभाष ८१२७७८९७१०, दूरभाष ०७६१ २६५५५९९)
*
छंद हीन कविता और तथाकथित नवगीतों के कृत्रिम आर्तनाद से ऊबे अंतर्मन को मधुर निनाद के रस-लय-भाव भरे गीतों का रसपान कर मरुथल की तप्त बालू में वर्षा की तरह सुखद प्रतीति होती है। विसंगतियों और विडम्बनाओं को साहित्य सृजन का लक्श्य मान लेने के वर्तमान दुष्काल में सनातन सलिला नर्मदा के अंचल में स्थित संस्कारधानी जबलपुर में निवास कर रहे अभियंता कवि गोपालकृष्ण चौरसिया "मधुर" का उपनाम ही मधुर नहीं है, उनके गीत भी कृष्ण-वेणु की तान की तरह सुमधुर हैं। कृति के आवरण चित्र में वेणु वादन के सुरों में लीन राधा-कृष्ण और मयूर की छवि ही नहीं, शीर्षक मधुर निनाद भी पाठक को गीतों में अंतर्निहित माधुर्य की प्रतीति करा देता है। प्रख्यात संस्कृत विद्वान आचार्य कृष्णकांत चतुर्वेदी ने अपने अभिमत में ठीक ही लिखा है कि मधुर निनाद का अवतरण एक साहित्यिक और रसराज, ब्रजराज की आह्लादिनी शक्ति श्री राधा के अनुपम प्रेम से आप्लावित अत:करण के मधुरतम स्वर का उद्घोष है.....प्रत्येक गीत जहाँ मधुर निनाद शीर्षक को सार्थक करता हुआ नाद ब्रह्म की चिन्मय पीठिका पर विराजित है, वहीं शब्द-शिल्प उपमान चयन पारंपरिकता का आश्रय लेता हुआ चिन्मय श्रृंगार को प्रस्तुत करता है।
विवेच्य कृति में कवि के कैशोर्य से अब तक गत पाँच दशकों से अधिक कालावधि की प्रतिनिधि रचनाएँ हैं। स्वाभाविक है कि कैशोर्य और तारुण्य काल की गीति रचनाओं में रूमानी कल्पनाओं का प्रवेश हो।
इंसान को क्या दे सकोगे?, फूलों सा जग को महकाओ, रे माँझी! अभी न लेना ठाँव, कब से दर-दर भटक रहा है, रूठो नहीं यार आज, युग परिवर्तन चाह रहा, मैं काँटों में राह बनाता जाऊँगा आदि गीतों में अतीत की प्रतीति सहज ही की जा सकती है। इन गीतों का परिपक्व शिल्प, संतुलित भावाभिव्यक्ति, सटीक बिंबादि उस समय अभियांत्रिकी पढ़ रहे कवि की सामर्थ्य और संस्कार के परिचायक हैं।
इनमें व्याप्त गीतानुशासन और शाब्दिक सटीकता का मूल कवि के पारिवारिक संस्कारों में है। कवि के पिता स्वतंत्रता सत्याग्रही स्मृतिशेष माणिकलाल मुसाफिर तथा अग्रजद्वय स्मृतिशेष प्रो. जवाहर लाल चौरसिया "तरुण" व श्री कृष्ण कुमार चौरसिया "पथिक" समर्थ कवि रहे हैं किंतु प्राप्य को स्वीकार कर उसका संवर्धन करने का पूरा श्रेय कवि को है। इन गीतों के कथ्य में कैशोर्योचित रूमानियत के साथ ईश्वर के प्रति लगन के अंकुर भी दृष्टव्य हैं। कवि के भावी जीवन में आध्यात्मिकता के प्रवेश का संकेत इन गीतों में है।
२२-१-२०२१
***
कार्यशाला
पद
पद शब्द का प्रयोग दो अर्थों में किया जाता है।
१. कुंडलिया षट्पदिक छंद है। यहाँ पद का अर्थ पंक्ति है।
२. मीरा ने कृष्ष भक्ति के पद रचे। यहाँ पद का अर्थ पूरी काव्य रचना से है।
शब्द कोशीय अर्थ में पद का अर्थ पैर होता है। बैल चतुष्पदीय जानवर है।
पैर के माध्यम से एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं। कृष्ण भक्ति का संदेश पदों के माध्यम से फैला। किसी काव्य रचना का कथ्य पंक्ति के माध्यम से दिया - लिया जाता है। पद के तीनों अर्थों के मूल में 'विचरण' है।
चरण
शब्द कोशीय अर्थ में पद और चरण दोनों का अर्थ पैर है किंतु काव्य शास्त्र में पद का अर्थ पंक्ति या पंक्ति समूह है जबकि चरण का अर्थ पंक्ति का भाग है।
दोहा के हर पद में दो चरण होते हैं जबकि चौपई के हर पद में तीन चरण होते हैं। यहाँ चरण का अर्थ दो विरामस्थलों के बीच का भाग है।
तुक
पंक्तियों में एक स्थान पर समान उच्चार वाले शब्दों का प्रयोग तुक कहलाता है। इसे संगत शब्द प्रयोग भी कह सकते हैं। असंगत बात को बेतुकी बात कहा जाता है।
लय
समान समय में समान उच्चारों का प्रयोग लय कहलाता है। समय में उच्चार का लीन होना ही लय है। लय से ही मलय, विलय, प्रलय जैसे शब्द बने हैं।
रस
फल का रस पीने से आनंद मिलता है। काव्य से मिलने वाला आनंद ही काव्य का रस है। जिसमें रस न हो वह नीरस काव्य कोई नहीं चाहता।
भाव
भाव अनेकार्थी शब्द है। भाव की अनुपस्थिति अभाव या कमी दर्शाती है। भाव का पूरक शब्द मोल है। मोल भाव वस्तु की उपलब्धता सुनिश्चित करती है। कविता के संदर्भ में भाव का आशय रचना में वह होना है जिसे सम्प्रेषित करने के लिए रचना की गई। स्वभाव, निभाव, प्रभाव जैसे शब्द भाव से ही बनते हैं।
बिंब
बिंब और प्रतिबिंब एक दूसरे के पूरक हैं।
***
कार्यशाला
३० मात्रिक महातैथिक जातीय चौपइया छंद
१०-८-१२ पर यतचरणांत गुरु
*
जय जय अविनाशी, जय सुखराशी, प्रणतपाल भगवंता
- गो. तुलसीदास
*
जय जय माँ हिंदी, भारत बिंदी, बारहखड़ी विशेषा
अनुपम स्वर-व्यंजन, नाद निकंदन, छंद अपार अशेषा
वाचिक वैदिक सह, वार्णिक मात्रिक, जनगण-हृदय विराजे
रस भाव बिंब लय, अलंकार शत, कथ्य सुरुचिमय साजे
श्रुति वेद पुराणा, रच रच नाना, ऋषि-मुनि कथा सुनाते
मानव मूल्यों के, पाठ सनातन, जनगण को समझाते
जो बोलें लिखते, बिन त्रुटि पढ़ते, रचते काव्य-कथाएँ
गायक गण गाते, नर्तक भाते, दिखा भाव मुद्राएँ
नव शब्द बनाएँ, कोश बढ़ाएँ,
विषय जटिल समझाएँ
जगवाणी हिंदी, सरल सहज सब, नित इसके गुण गाएँ
२२-१-२०२०
***
मुक्तक
*
देश है पहले सियासत बाद में।
शत्रु मारें; हो इनायत बाद में।।
बगावत को कुचल दें हम साथ मिल-
वार्ता की हो रवायत बाद में।।
*
जगह दहशत के लिये कुछ है नहीं।
जगह वहशत के लिए कुछ है नहीं।।
पत्थरों को मिले उत्तर गनों से -
जगह रहमत के लिए कुछ है नहीं।।
*
सैनिकों को टोंकना अपराध है।
फ़ौज के पग रोकना अपराध है।।
पठारों को फूल मत दें शूल दें-
देश से विद्रोह भी अपराध है।।
***
पुस्तक चर्चा
संतोष शुक्ल
*
सडक़ पर- नवगीत संग्रह, गीतकार-आचार्य संजीव वर्मा ' सलिल '
*
[कृति विवरण: सड़क पर, गीत-नवगीत संग्रह, आचार्य संजीव वर्मा सलिल, प्रथम संस्करण २०१८, आकार १३.५ से.मी. x २१.५ से.मी., आवरण बहुरंगी, पेपरबैक, पृष्ठ ९६, मूल्य २५०/-, समन्वय प्रकाशन अभियान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, चलभाष ९४२५१८३२४४ / ७९९९५५९६१८ ]
*
आचार्य संजीव वर्मा ' सलिल ' जी का नाम नवीन छंदों के निर्माण तथा उनपर गहनता से कये गए कार्यों के लिए प्रबुद्ध जगत में बड़े गौरव से लिया जाता है।
माँ भारती के वरदपुत्र आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल 'जी को अथस्रोतञान का भण्डार मानो उन्हें विरासत में मिला हो। स्वयं आचार्य सलिल जी अपनी बुआश्री महादेवी वर्मा और अपनी माँ कवियत्री शांति देवी को साहित्य और भाषा के प्रति अटूट स्नेह का प्रेरणा श्रोत मानते हैं। जिनकी रग-रग में संस्कारों के बीज बचपन से ही अंकुरित, प्रस्फुटित और पल्लवित हुए हों उनकी प्रतिभा का आकलन करना सरल काम नहीं।
सलिल जी आभासी जगत में भी अपनी निरंतर साहित्यिक उपलब्धियों से साहित्य प्रमियों को लाभान्वित कर रहे हैं। अभियंता और अधिवक्ता होते हुए भी हिंदी की कोई भी विधा नहीं है जिस पर आचार्य जी ने गहनता से कार्य न किया हो। रस, अलंकार और छंद का गहन ज्ञान उनकी कृतियों में स्पष्ट दिखाई देता है। विषय वस्तु की दृष्टि से कोई विषय उनकी लेखनी से बचा नहीं है। रचनाओं पर उनकी पकड़ गहरी है। हर क्षेत्र का अनुभव उसी रूप में बोलता है जिससे पाठक और श्रोता उसी परिवेश में पहुंच जाता है। हिन्दी के साथ साथ बुन्देली, पचेली, भोजपुरी, ब्रजभाषा, अवधी, राजस्थानी, मालवी, छत्तीसगढ़ी, हरियाणवी तथा अंग्रेजी भाषा में भी आपने लेखन कार्य किया है।
उनकी पूर्व प्रकाशित नवगीत कृति 'काल है संक्रांति की 'उद्भट समीक्षकों द्वारा की गई समीक्षाओं को पढ़कर ही पता चलता है कि आचार्य सलिल जी ज्ञान के अक्षय भण्डार हैं अनन्त सागर हैं। आचार्य सलिल जी की सद्य प्रकाशित 'सड़क पर' मैंने अभी-अभी पढ़ी है। 'सड़क पर' नवगीत संग्रह में गीतकार सलिल जी ने देश में हो रहे राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक परिवर्तनों को स्पष्ट रूप से दर्शाया है। उनके नवगीतों में भाग्य के सहारे न रहकर परिश्रम द्वारा लक्ष्य प्राप्त करने पर सदैव जोर दिया है।छोटे छोटे शब्दों द्वारा बड़े बड़े संदेश दिये हैं और चेतावनी भी दी है। कहीं अभावग्रसित होने के कारण तो कहीं अत्याधुनिक होने पर प्यार की खरीद फरोख्त को भी उन्होंने सृजन में उकेरा है।आजकल शादी कम और तलाक ज्यादा होते हैं, यह भी आधुनिकता का एक चोला है।
इसके अतिरिक्त सलिल जी ने एक और डाइवोर्स की बात लिखी है-
निष्ठा ने मेहनत से
डाइवोर्स चाहा है।
आगे भी
मलिन बिंब देख -देख
मन दर्पण
चटका है
आजकल बिना रिश्वत के कोई काम नहीं होता
सलिल जी के शब्दों में
पद -मद ने रिश्वत का
टैक्स फिर उगाहा है ।
पाश्चात्य के प्रभाव में लोगों को ग्रसित देख गीतकार का हृदय व्यथित है-
देह को दिखाना ही
प्रगति परिचायक है
मानो लगी होड़
कौन कितना सकता है छोड़।
पाशचात्य प्रभाव के कारण ही लोग अपने माता-पिता को वृद्धाश्रम में असहाय छोड़ कर अपनी जिम्मेदारियों से मुँह मोड़ लेते हैं। अपने पुराने स्वास्थ्य वर्धक खान-पान को भूलकर हानिकारक चीजों को शौक से खाते हैं। एक शब्द-चित्र देखिए-
ब्रेड बटर बिस्कुट
मन उन्मन ने
गटका है।
अब
लोरी को राइम ने
औंधे मुँह पटका है
इसी क्रम में-
नाक बहा,टाई बाँध
अंग्रेजी बोलेंगे
कब कान्हा गोकुल में
शायद ही डोलेंगे।
आजकल शिक्षा बहुत मँहगी हो गई है।उच्च शिक्षा प्राप्त युवक नौकरी की तलाश इधर- उधर भटकते हैं।बढ़ती बेरोजगारी पर भी आचार्य जी ने चिंता व्यक्त की है।शायद ही कोई ऐसा विषय है जिस पर सलिल जी की पैनी दृष्टि न पड़ी हो।
आचार्य जी के नवगीतों के केंद्र में श्रमजीवी श्रमिक है। चाहे वह खेतों में काम करनेवाला किसान हो,फैक्ट्रियों में काम करनेवाला श्रमिक या दिनभर पसीना बहाने वाला कोई मजदूर जो अथक परिश्रम के बाद भी उचित पारिश्रमिक नहीं पाता तो दूसरी ओर मिल मालिक, सेठों,सूदखोरों की तोंद बढ़ती रहती है।
देखिए-
चूहा झाँक रहा हंडी में
लेकिन पाई
सिर्फ हताशा
यह भी देखने में आता है
जो नंही हासिल
वही चाहिए
जितनी आँखें
उतने सपने
समाज के विभिन्न पहलुओं पर बड़ी बरीकी से कलम चलाई है। घर में काम वाली बाइयों, ऑफिस में सहकर्मियों तथा पास पड़ोस में रहने वाली महिलाओं के प्रति पुरुषों की कुदृष्टि को भी आपने पैनी कलम का शिकार बनाया है।
आज भले ही लगभग सभी क्षेत्रों में अपना वर्चस्व स्थापित कर रही हैं फिर भी मध्यम और सामान्य वर्ग की महिलाओं की स्थिति अभी भी बहुत अच्छी नहीं है। कार्यरत महिलाओं को दोहरी भूमिका निभाने के बाद भी ताने, प्रताड़ना और उपेक्षा का सामना करना पड़ता है।
सलिल जी के शब्दों में
मैंने पाए कर कमल,तुमने पाए हाथ
मेरा सर ऊँचा रहे झुके तुम्हारा माथ
सलिल जी ने नवगीतों में विसंगतियों को खूब उकेरा है।कुछ उदाहरण देखते हैं-
आँखें रहते सूर हो गए
जब हम खुद से दूर हो गए
**
मन की मछली तन की तितली
हाथ न आई पल में फिसली
जब तक कुर्सी तब तक ठाट
नाच जमूरा नाच मदारी
**
मँहगाई आई
दीवाली दीवाला है
नेता हैं अफसर हैं
पग-पग घोटाला है
आजादी के इतने वर्षों बाद भी गाँव और गरीबी का अभी भी बुरा हाल है लेकिन गीतकार का कहना है-
अब तक जो बीता सो बीता
अब न आस घट होगा रीता
**
मिल कर काटें तम की कारा
उजियारे के हों पौ बारा
**
बहुत झुकाया अब तक तूने
अब तो अपना भाल उठा
मन भावन सावन के माध्यम से जहाँ किसानों की खुशी का अंकन किया है वहीं बरसात में होने वाली समस्याओं को भी चित्रित किया है।
आचार्य जी ने नये नये छंदों की रचना कर अभिनव प्रयोग किया है।
सलिल जी ने नवगीतों में परिवेश की सजीवता बनाए रखने के लिए उन्होंने घरों में उपयोग में आने वाली वस्तुओं, रिश्तों के सम्बोधनों आदि का ही प्रयोग किया है। संचार क्रांति के आने से लोगों में कितना बदलाव आया है उसकी चिंता भी गीतकार को है
हलो हाय मोबाइल ने
दिया न हाय गले मिलने
नातों को जीता छलने
आचार्य ' सलिल 'जी ने गीतों-नवगीतों में लयबद्धता पर विशेष जोर दिया है।
लोकगीतों में गाये जाने वाले शब्दों, छंदों , अन्य भाषाओं के शब्दों, नये-नये बिंबों तथा प्रतीकों का निर्माण कर लोगों के लिए सड़क पर भी फुटपाथ बनाये हैं।जो बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। 'सड़क पर' गीत नवगीत संग्रह में अनेकानेक छोटे-छोटे बिंदुओं को अंकित किया है, उन सब को इंगित करना असंभव है।
सलिल जी ने ' सड़क पर ' गीत-नवगीत संग्रह में सड़क को केंद्र बिंदु बनाकर जीवन के अनेकानेक पहलुओं को बड़ी कुशलता से चित्रित किया है-
सड़क पर जनम है
सड़क पर मरण है
सड़क पर शरम है
सड़क बेशरम है
सड़क पर सियासत
सड़क पर भजन है
सड़क सख्त लेकिन
सड़क ही नरम है
सड़क पर सड़क से
सड़क मिल रही है।
आचार्य संजीव वर्मा ' सलिल 'जी ने अपनी सभी रचनाओं में माँ नर्मदा के वर्चस्व को सदा वर्णित किया है तथा 'सलिल' को अपनी रचनाओं में भी यथासंभव प्रयुक्त किया है। माँ नर्मदा के पावन निर्मल सलिल की तरह आचार्य 'सलिल 'जी भी सदा प्रवहमान हैं और सदा रहेंगे। उनकी इस कृति को पाठकों का भरपूर मान, सम्मान और प्यार मिलेगा ऐसा मेरा विश्वास है।
२२.१.२०१९
***
नवगीत:
बाँसुरी
*
बजा बाँसुरी
झूम-झूम मन...
*
जंगल-जंगल
गमक रहा है.
महुआ फूला
महक रहा है.
बौराया है
आम दशहरी-
पिक कूकी, चित
चहक रहा है.
डगर-डगर पर
छाया फागुन...
*
पियराई सरसों
जवान है.
मनसिज ताने
शर-कमान है.
दिनकर छेड़े
उषा लजाई-
प्रेम-साक्षी
चुप मचान है.
बैरन पायल
करती गायन...
*
रतिपति बिन रति
कैसी दुर्गति?
कौन फ़िराये
बौरा की मति?
दूर करें विघ्नेश
विघ्न सब-
ऋतुपति की हो
हे हर! सद्गति.
गौरा माँगें वर
मन भावन...
***
मुक्तक
*
श्वास-श्वास आस-आस झूमता बसन्त हो
मन्ज़िलों को पग तले चूमता बसन्त हो
भू-गगन हुए मगन दिग-दिगन्त देखकर
लिए प्रसन्नता अनंत घूमता बसन्त हो
*
साथ-साथ थाम हाथ ख्वाब में बसन्त हो
अँगना में, सड़कों पर, बाग़ में बसन्त हो
तन-मन को रँग दे बासंती रंग में विहँस
राग में, विराग में, सुहाग में बसन्त हो
*
अपना हो, सपना हो, नपना बसन्त हो
पूजा हो, माला को जपना बसन्त हो
मन-मन्दिर, गिरिजा, गुरुद्वारा बसन्त हो
जुम्बिश खा अधरों का हँसना बसन्त हो
*
अक्षर में, शब्दों में, बसता बसन्त हो
छंदों में, बन्दों में हँसता बसन्त हो
विरहा में नागिन सा डँसता बसन्त हो
साजन बन बाँहों में कसता बसन्त हो
*
मुश्किल से जीतेंगे कहता बसन्त हो
किंचित ना रीतेंगे कहता बसन्त हो
पत्थर को पिघलाकर मोम सदृश कर देंगे
हम न अभी बीतेंगे कहता बसन्त हो
*
सत्यजित न हारेगा कहता बसन्त है
कांता सम पीर मौन सहता बसंत है
कैंसर के काँटों को पल में देगा उखाड़
नर्मदा निनादित हो बहता बसन्त है
*
मन में लड्डू फूटते आया आज बसंत
गजल कह रही ले मजा लाया आज बसंत
मिली प्रेरणा शाल को बोली तजूं न साथ
सलिल साधना कर सतत छाया आज बसंत
*
वंदना है, प्रार्थना है, अर्चना बसंत है
साधना-आराधना है, सर्जना बसंत है
कामना है, भावना है, वायदा है, कायदा है
मत इसे जुमला कहो उपासना बसंत है
***
गीत
छंद - अनुकूला
गणसूत्र - भतनगग
मापनी - २११ २२१ १११ २२
*
देश दुलारा, जनगण प्यारा
जान लुटाई तन-मन वारा
त्याग-तपस्या ऋषि-मुनि थाती
खेत किसानी श्रम परिपाटी
राघव-सीता घर-घर खेले
नंद-यशोदा मधुवन मेले
श्रम-सीकर से इसे सँवारा
देश दुलारा, जन गण प्यारा
पौध लगाओ, तरु सुख देंगे
छाँह मिलेगी, नित फल लेंगे
फूल खिलेंगे, सुरभि मिलेगी
औषध लेंगे, विपति मिटेगी
सूर्य-उषा ने गगन सँवारा
देश दुलारा, जनगण प्यारा
ग्यान हमारा जनहितकारी
ध्यान हमेशा मनहितकारी
खोज करें मानव उपयोगी
संयम धारें बनकर योगी
विश्व समूचा सुहृद हमारा
देश दुलारा जनगण प्यारा
***
बासंती दोहा ग़ज़ल (मुक्तिका)
*
स्वागत में ऋतुराज के, पुष्पित शत कचनार.
किंशुक कुसुम विहँस रहे, या दहके अंगार..
पर्ण-पर्ण पर छा गया, मादक रूप निखार.
पवन खो रहा होश निज, लख वनश्री श्रृंगार..
महुआ महका देखकर, चहका-बहका प्यार.
मधुशाला में बिन पिए, सिर पर नशा सवार..
नहीं निशाना चूकती, पंचशरों की मार.
पनघट-पनघट हो रहा, इंगित का व्यापार..
नैन मिले लड़ मिल झुके, करने को इंकार.
देख नैन में बिम्ब निज, कर बैठे इकरार..
मैं तुम यह वह ही नहीं, बौराया संसार.
फागुन में सब पर चढ़ा, मिलने गले खुमार..
ढोलक, टिमकी, मँजीरा, करें ठुमक इसरार.
फगुनौटी चिंता भुला. नाचो-गाओ यार..
घर-आँगन, तन धो लिया, अनुपम रूप निखार.
अपने मन का मैल भी, किंचित 'सलिल' बुहार..
बासंती दोहा ग़ज़ल, मन्मथ की मनुहार.
सीरत-सूरत रख 'सलिल', निर्मल सहज सँवार..
२२-१-२०१८
***
नवगीत:
अभियंता की यंत्रणा
.
'अगले जनम
अभियंता न कीजो'
करे प्रार्थना मिल अभियंता
पिघले-प्रगटे भाग्यनियंता
'वत्स! बताओ, मुश्किल क्या है?
क्यों है इस माथे पर चिंता?'
'देव! प्रमोशन एक दिला दो
फिर चाहे जो काम करा लो'
'वत्स न यह संभव हो सकता
कलियुग में सच कभी न फलता'
है प्रशासनिक अफसर हावी
तुझ पर तकनीकों का पातक
वह डंडे के साथ रहेगा
तुझ पर हरदम वार करेगा
तुझे भेज साईट पर सोए
तू उन्नति के अवसर खोए
तू है नींव, कलश है अफसर
इसीलिये वह पाता अवसर
वह बढ़ मुख्य सचिव हो जाता
तू न पदोन्नति कोई पाता
तेरी मेहनत उसका परचम
उसको खुशियाँ, तुझको मातम
सर्वे कर प्राक्कलन बनाता
फिर स्वीकृति हित दौड़ लगाता
तू साईट पर बहा पसीना
वह कहलाता रहा नगीना
काम करा तू देयक लाता
जोड़ बजट में वः यश पाता
ठेकेदार सगे हैं उसके
पत्रकार फल पाते मिलके
मंत्री सभी उसी के संग हैं
पग-पग पर तू होता तंग है
पार न तू इनसे पाएगा
रोग पाल, घुट मर जाएगा
अफसर से मत कभी होड़ ले
भूल पदोन्नति, हाथ जोड़ ले
तेरा होना नहीं प्रमोशन
तेरा होगा नहीं डिमोशन
तू मृत्युंजय नहीं झोल दे
उठकर इनकी पोल खोल दे
खुश रह जैसा और जहाँ है
तुझसे बेहतर कौन-कहाँ है?
पाप कट रहे तेरे सारे
अफसर को ठेंगा दिखला रे!
बच्चे पढ़ें-बढ़ेंगे तेरे
तब सँवरेंगे साँझ-सवेरे
कर्म योग तेरी किस्मत में
भोग-रोग उनकी किस्मत में
कह न किसी से कभी पसीजो
श्रम-सीकर खुश रह भीजो
मुक्तिका
.
आप मानें या न मानें, सत्य हूँ किस्सा नहीं हूँ
कौन कह सकता है, हूँ इस सरीखा, उस सा नहीं हूँ
मुझे भी मालुम नहीं है, क्या बता सकता है कोई
पूछता हूँ आजिजी से, कहें मैं किस सा नहीं हूँ
साफगोई ने अदावत का दिया है दंड हरदम
फिर भी मुझको फख्र है, मैं छल रहा घिस्सा नहीं हूँ
हाथ थामो या न थामो, फैसला-मर्जी तुम्हारी
कस नहीं सकता गले में, आदमी- रस्सा नहीं हूँ
अधर पर तिल समझ मुझको, दूर अपने से न करना
हनु न रवि को निगल लेना, हाथ में गस्सा नहीं हूँ
निकट हो या दूर हो तुम, नूर हो तुम हूर हो तुम
पर बहुत मगरूर हो तुम, सच कहा गुस्सा नहीं हूँ
खामियाँ कम, खूबियाँ ज्यादा, तुम्हें तब तक दिखेंगी
मान जब तक यह न लोगे, तुम्हारा हिस्सा नहीं हूँ
.
***
नवगीत:
.
उग रहे या ढल रहे तुम
कान्त प्रतिपल रहे सूरज
.
हम मनुज हैं अंश तेरे
तिमिर रहता सदा घेरे
आस दीपक जला कर हम
पूजते हैं उठ सवेरे
पालते या पल रहे तुम
भ्रांत होते नहीं सूरज
.
अनवरत विस्फोट होता
गगन-सागर चरण धोता
कैंसर झेलो ग्रहण का
कीमियो नव आस बोता
रश्मियों की कलम ले
नवगीत रचते मिले सूरज
.
कै मरे कब गिने तुमने?
बिम्ब के प्रतिबिम्ब गढ़ने
कैमरे में कैद होते
हास का मधुमास वरने
हौसले तुमने दिये शत
ऊगने फिर ढले सूरज
.
***
मुक्तक:
*
चिंता न करें हाथ-पैर अगर सर्द हैं
कुछ फ़िक्र न हो चहरे भी अगर ज़र्द हैं
होशो-हवास शेष है, दिल में जोश है
गिर-गिरकर उठ खड़े हुए, हम ऐसे मर्द हैं.
*
जीत लेंगे लड़ के हम कैसा भी मर्ज़ हो
चैन लें उतार कर कैसा भी क़र्ज़ हो
हौसला इतना हमेशा देना ऐ खुदा!
मिटकर भी मिटा सकूँ मैं कैसा भी फ़र्ज़ हो
***
नवगीत:
संजीव
*
मिली दिहाड़ी
चल बाजार
चावल-दाल किलो भर ले-ले
दस रुपये की भाजी
घासलेट का तेल लिटर भर
धनिया-मिर्ची ताजी
तेल पाव भर फ़ल्ली का
सिंदूर एक पुडिया दे
दे अमरूद पांच का, बेटी की
न सहूं नाराजी
खाली जेब पसीना चूता
अब मत रुक रे!
मन बेजार
निमक-प्याज भी ले लऊँ तन्नक
पत्ती चैयावाली
खाली पाकिट हफ्ते भर को
फिर छाई कंगाली
चूड़ी-बिंदी दिल न पाया
रूठ न मो सें प्यारी
अगली बेर पहलऊँ लेऊँ
अब तो दे मुस्का री!
चमरौधे की बात भूल जा
सहले चुभते
कंकर-खार
नवगीत:
.
अधर पर धर अधर १०
छिप २
नवगीत का मुखड़ा कहा १४
.
चाह मन में जगी १०
अब कुछ अंतरे भी गाइये १६
पंचतत्वों ने बनाकर १४
देह की लघु अंजुरी १२
पंच अमृत भर दिये १२
कर पान हँस-मुस्काइये १४
हाथ में पा हाथ १०
मन
लय गुनगुनाता खुश हुआ १४
अधर पर धर अधर १०
छिप
नवगीत का मुखड़ा कहा १४
.
सादगी पर मर मिटा १२
अनुरोध जब उसने किया १४
एक संग्रह अब मुझे १२
नवगीत का ही चाहिए १४
मिटाकर खुद को मिला क्या? १४
कौन कह सकता यहाँ? १२
आत्म से मिल आत्म १०
हो
परमात्म मरकर जी गया १४
अधर पर धर अधर १०
छिप
नवगीत का मुखड़ा कहा १४
२२-१-२०१५
हास्य सलिला:
औरत भी ले लो.…
*
लाली जी से हो गए जब लालू जी तंग
जा मुशायरे में किया 'सलिल' रंग में भंग
' ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो'
सुनकर बोले आप, 'मेरी तो औरत भी ले लो
मिटे तभी संताप, सुन हुड़दंगा मच गया, ताली सीटी शोर
श्रोता चीखे: 'लालू जी वंस मोर, वंस मोर'
_________________________

रविवार, 15 सितंबर 2024

सितंबर १५, अभियंता, अभियांत्रिकी, तकनीक, हिंदी गीत, मुक्तक,

सलिल सृजन सितंबर १५ 

अभियंता दिवस
अभियंता जागो
१. हर नगर, परियोजना मुख्यालय, अभियांत्रिकी संस्थाओं के मुखयालयों तथा अभियांत्रिकी महाविद्यालय/पॉलिटेक्निक में भारतरत्न सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया की मूर्ति स्थापित हो।
२. अभियंता कवि सम्मेलनों तथा अभियांत्रिकी विषयों पर हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं में गोष्ठियों/परिचर्चाओं का नियमित आयोजन आयोजन किया जाए।
३. हर अभियांत्रिकी महाविद्यालय/पॉलिटेक्निक में सर्वोच्च अंक अर्जित करने वाले छात्र को एम्. वी. पदक प्रदान किया जाए।
४. निर्माण कार्यों में ठेकेदारी के लिए अभियांत्रिकी में डिग्री/डिप्लोमा अनिवार्य हो ताकि कार्यों की गुणवत्ता में सुधार हो।
५. डिग्री/डिप्लोमा अभियंताओं को व्यवसाय आरंभ करने के लिए ब्याजमुक्त कर्ज उपलब्ध कराया जाए तथा निविदा कार्यों में वरीयता दी जाए।
६. साहित्यिक, सांस्कृतिक, सामाजिक क्षेत्र में कार्यरत अभियंताओं को तकनीकी विभागों की परामर्शदात्री समितियों, जाँच समितियों आदि में वरीयता दी जाए ताकि वे तकनीकी और सामाजिक दोनों दृष्टिकोणों से मददगार हो सकें।
७. राष्ट्रीय सम्मान तथा उपाधि वितरण में अभियंता संवर्ग की उपेक्षा बंद कर अवदान का सम्यक मूल्याङ्कन कर वरीयता दी जाए।
८. हर प्रांत में तकनीकी साहित्य अकादमी बनाकर साहित्य से जुड़े अभियंताओं/चिकित्सकों को अध्यक्ष, सदस्य बनाया जाए ताकि वे श्रेष्ठ तकनीकी साहित्य को भारतीय भाषाओं में अनुवादित कराकर पाठ्यक्रमों के लिए भारतीय भाषाओं में संदर्भ ग्रंथ उपलब्ध करा सकें।
९. अभियांत्रिकी तथा अन्य तकनीकी क्षेत्रों की किताबों में सरल और प्रचलित भाषा-रूप का प्रयोग हो, भाषिक शुद्धता के नाम पर कठिन संस्कृत निष्ठ शब्दावली के स्थान पर व्यावहारिक तकनीकी शब्दों को ज्यों का त्यों देवनागरी वर्णमाला में लिखा जाए।
१०. केन्द्रीय तथा प्रांतीय सरकारें अभियांत्रिकी व्यवसाय के नियम बनाने के लिए 'अभियंता अधिनियम' बनाए।
संजीव वर्मा
सभापति इंजीनियर्स फोरम (भारत)
९४२५१८३२४४
***
अभियंता दिवस (१५ सितंबर) पर विशेष रचना:
हम अभियंता...
*
हम अभियंता!, हम अभियंता!!
मानवता के भाग्य-नियंता...
*
माटी से मूरत गढ़ते हैं,
कंकर को शंकर करते हैं.
वामन से संकल्पित पग धर,
हिमगिरि को बौना करते हैं.
नियति-नटी के शिलालेख पर
अदिख लिखा जो वह पढ़ते हैं.
असफलता का फ्रेम बनाकर,
चित्र सफलता का मढ़ते हैं.
श्रम-कोशिश दो हाथ हमारे-
फिर भविष्य की क्यों हो चिंता...
*
अनिल, अनल, भू, सलिल, गगन हम,
पंचतत्व औजार हमारे.
राष्ट्र, विश्व, मानव-उन्नति हित,
तन, मन, शक्ति, समय, धन वारे.
वर्तमान, गत-आगत नत है,
तकनीकों ने रूप निखारे.
निराकार साकार हो रहे,
अपने सपने सतत सँवारे.
साथ हमारे रहना चाहे,
भू पर उतर स्वयं भगवंता...
*
भवन, सड़क, पुल, यंत्र बनाते,
ऊसर में फसलें उपजाते.
हमीं विश्वकर्मा विधि-वंशज.
मंगल पर पद-चिन्ह बनाते.
प्रकृति-पुत्र हैं, नियति-नटी की,
आँखों से हम आँख मिलाते.
हरि सम हर हर आपद-विपदा,
गरल पचा अमृत बरसाते.
'सलिल' स्नेह नर्मदा निनादित,
ऊर्जा-पुंज अनादि-अनंता...
.***
अभियांत्रिकी:
कण जोड़ती तृण तोड़ती पथ मोड़ती अभियांत्रिकी
बढ़ती चले चढ़ती चले गढ़ती चले अभियांत्रिकी
उगती रहे पलती रहे खिलती रहे अभियांत्रिकी
रचती रहे बसती रहे सजती रहे अभियांत्रिकी।
*
तकनीक:
नवरीत भी, नवगीत भी, संगीत भी तकनीक है
कुछ प्यार है, कुछ हार है, कुछ जीत भी तकनीक है
गणना नयी, रचना नयी, अव्यतीत भी तकनीक है
श्रम-मंत्र है, नव यंत्र है, सुपुनीत भी तकनीक है
*
भारत :
यह देश भारत वर्ष है, इस पर हमें अभिमान है
कर दें सभी मिल देश का, निर्माण नव अभियान है
गुणयुक्त हो अभियांत्रिकी, शर्म-कोशिशों का गान है
परियोजन तृतीमुक्त हो, दुनिया कहे प्रतिमान है
*
(छंद: हरिगीतिका, ११२१२ X ४ = २८)
***
तकनीकी लेख
*इन्स्टीट्यूशन ऑफ़ इंजीनियर्स कोलकाता द्वारा पुरस्कृत द्वितीय श्रेष्ठ तकनीकी लेख*
*वैश्विकता के निकष पर भारतीय यांत्रिकी संरचनाएँ*
अभियंता संजीव वर्मा 'सलिल'
*
भारतीय परिवेश में अभियांत्रिकी संरचनाओं को 'वास्तु' कहा गया है। छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी प्रत्येक संरचना को अपने आपमें स्वतंत्र और पूर्ण व्यक्ति के रूप में 'वास्तु पुरुष' कहा गया है। भारतीय परंपरा प्रकृति को मातृवत पूज्य मानकर उपयोग करती है, पाश्चात्य पद्धति प्रकृति को निष्प्राण पदार्थ मानकर उसका उपभोग (दोहन-शोषण) कर और फेंक देती हैं। भारतीय यांत्रिक संरचनाओं के दो वर्ग वैदिक-पौराणिक काल की संरचनाओं और आधुनिक संरचनाओं के रूप में किये जा सकते हैं और तब उनको वैश्विक गुणवत्ता, उपयोगिता और दीर्घता के मानकों पर परखा जा सकता है।
*शिव की कालजयी अभियांत्रिकी:*
पौराणिक साहित्य में सबसे अधिक समर्थ अभियंता शिव हैं। शिव नागरिक यांत्रिकी (सिविल इंजीनियरिग), पर्यावरण यांत्रिकी, शल्य यांत्रिकी, शस्त्र यांत्रिकी, चिकित्सा यांत्रिकी, के साथ परमाण्विक यांत्रिकी में भी निष्णात हैं। वे इतने समर्थ यंत्री है कि पदार्थ और प्रकृति के मूल स्वभाव को भी परिवर्तित कर सके, प्राकृतिक परिवर्तनों के कारण जनगण की सुनिश्चित मृत्यु को भी टाल सके। उन्हें मृत्युंजय और महाकाल विशेषण प्राप्त हुए।
शिव की अभियांत्रिकी का प्रथम ज्ञात नमूना ६ करोड़ से अधिक वर्ष पूर्व का है जब उन्होंने टैथीज़ महासागर के सूखने से निकली धरा पर मानव सभ्यता के प्रसार हेतु अपरिहार्य मीठे पेय जल प्राप्ति हेतु सर्वोच्च अमरकंटक पर्वत पर दुर्लभ आयुर्वेदिक औषधियों के सघन वन के बीच में अपने निवास स्थान के समीप बांस-कुञ्ज से घिरे सरोवर से प्रबल जलधार निकालकर गुजरात समुद्र तट तक प्रवाहित की जिसे आज सनातन सलिला नर्मदा के नाम से जाना जाता है। यह नर्मदा करोड़ों वर्षों से लेकर अब तक तक मानव सभ्यता केंद्र रही है। नागलोक और गोंडवाना के नाम से यह अंचल पुरातत्व और इतिहास में विख्यात रहा है। नर्मदा को शिवात्मजा, शिवतनया, शिवसुता, शिवप्रिया, शिव स्वेदोद्भवा, शिवंगिनी आदि नाम इसी सन्दर्भ में दिये गये हैं। अमरकंटक में बांस-वन से निर्गमित होने के कारण वंशलोचनी, तीव्र जलप्रवाह से उत्पन्न कलकल ध्वनि के कारण रेवा, शिलाओं को चूर्ण कर रेत बनाने-बहाने के कारण बालुकावाहिनी, सुंदरता तथा आनंद देने के कारण नर्मदा, अकाल से रक्षा करने के कारण वर्मदा, तीव्र गति से बहने के कारण क्षिप्रा, मैदान में मंथर गति के कारण मंदाकिनी, काल से बचने के कारण कालिंदी, स्वास्थ्य प्रदान कर हृष्ट-पुष्ट करने के कारण जगजननी जैसे विशेषण नर्मदा को मिले।
जीवनदायी नर्मदा पर अधिकार के लिए भीषण युद्ध हुए। नाग, ऋक्ष, देव, किन्नर, गन्धर्व, वानर, उलूक दनुज, असुर आदि अनेक सभ्यताएं सदियों तक लड़ती रहीं। अन्य कुशल परमाणुयांत्रिकीविद दैत्यराज त्रिपुर ने परमाण्विक ऊर्जा संपन्न ३ नगर 'त्रिपुरी' बनाकर नर्मदा पर कब्जा किया तो शिव ने परमाण्विक विस्फोट कर उसे नष्ट कर दिया जिससे नि:सृत ऊर्जा ने ज्वालामुखी को जन्म दिया। लावा के जमने से बनी चट्टानें लौह तत्व की अधिकता के कारण जाना हो गयी। यह स्थल लम्हेटाघाट के नाम से ख्यात है। कालांतर में चट्टानों पर धूल-मिट्टी जमने से पर्वत-पहाड़ियाँ और उनके बीच में तालाब बने। जबलपुर से ३२ किलोमीटर दूर ऐसी ही एक पहाड़ी पर ज्वालादेवी मंदिर मूलतः ऐसी ही चट्टान को पूजने से बना। जबलपुर के ५२ तालाब इसी समय बने थे जो अब नष्टप्राय हैं। टेथीज़ महासागर के पूरी तरह सूख्नने और वर्तमान भूगोल के बेबी माउंटेन कहे जानेवाले हिमालय पर्वत के बनने पर शिव ने मानसरोवर को अपना आवास बनाकर भगीरथ के माध्यम से नयी जलधारा प्रवाहित की जिसे गंगा कहा गया।
*महर्षि अगस्त्य के अभियांत्रिकी कार्य:*
महर्षि अगस्त्य अपने समय के कुशल परमाणु शक्ति विशेषज्ञ थे। विंध्याचल पर्वत की ऊँचाई और दुर्गमता उत्तर से दक्षिण जाने के मार्ग में बाधक हुई तो महर्षि ने परमाणु शक्ति का प्रयोग कर पर्वत को ध्वस्त कर मार्ग बनाया। साहित्यिक भाषा में इसे मानवीकरण कर पौराणिक गाथा में लिखा गया कि अपनी ऊंचाई पर गर्व कर विंध्याचल सूर्य का पथ अवरुद्ध करने लगा तो सृष्टि में अंधकार छाने लगा। देवताओं ने महर्षि अगस्त्य से समाधान हेतु प्रार्थना की। महर्षि को देखकर विंध्याचल प्रणाम करने झुका तो महर्षि ने आदेश दिया कि दक्षिण से मेरे लौटने तक ऐसे ही झुके रहना और वह आज तक झुका है।
दस्युओं द्वारा आतंक फैलाकर समुद्र में छिप जाने की घटनाएँ बढ़ने पर अगस्त्य ने परमाणु शक्ति का प्रयोग कर समुद्र का जल सुखाया और राक्षसों का संहार किया। पौराणिक कथा में कहा गया की अगस्त्य ने चुल्लू में समुद्र का जल पी लिया। राक्षसों से आर्य ऋषियों की रक्षा के लिए अगस्त्य ने नर्मदा के दक्षिण में अपना आश्रम (परमाणु अस्त्रागार तथा शोधकेन्द्र) स्थापित किया। किसी समय नर्मदा घाटी के एकछत्र सम्राट रहे डायनासौर राजसौरस नर्मदेंसिस खोज लिए जाने के बाद इस क्षेत्र की प्राचीनता और उक्त कथाएँ अंतर्संबन्धित और प्रामाणिकता होना असंदिग्ध है।
*रामकालीन अभियांत्रिकी:*
रावण द्वारा परमाण्विक शस्त्र विकसित कर देवों तथा मानवों पर अत्याचार किये जाने को सुदृढ़ दुर्ग के रूप में बनाना यांत्रिकी का अद्भुत नमूना था। रावण की सैन्य यांत्रिकी विद्या और कला अद्वितीय थी। स्वयंवर के समय राम ने शिव का एक परमाण्वास्त्र जो जनक के पास था पास था, रावण हस्तगत करना चाहता था नष्ट किया। सीताहरण में प्रयुक्त रथ जो भूमार्ग और नभमार्ग पर चल सकता था वाहन यांत्रिकी की मिसाल था। राम-रावण परमाण्विक युद्ध के समय शस्त्रों से निकले यूरेनियम-थोरियम के कारण सहस्त्रों वर्षों तक लंका दुर्दशा रही जो हिरोशिमा नागासाकी की हुई थी। श्री राम के लिये नल-नील द्वारा लगभग १३ लाख वर्ष पूर्व निर्मित रामेश्वरम सेतु अभियांत्रिकी की अनोखी मिसाल है। सुषेण वैद्य द्वारा बायोमेडिकल इंजीनियरिंग का प्रयोग युद्ध अवधि में प्रतिदिन घायलों का इस तरह उपचार किया गया की वे अगले दिन पुनः युद्ध कर सके।
*कृष्णकालीन अभियांत्रिकी:*
लाक्षाग्रह, इंद्रप्रस्थ तथा द्वारिका कृष्णकाल की अद्वितीय अभियांत्रिकी संरचनाएँ हैं। सुदर्शन चक्र, पाञ्चजन्य शंख, गांडीव धनुष आदि शस्त्र निर्माण कला के श्रेष्ठ उदाहरण हैं। महाभारत पश्चात अश्वत्थामा द्वारा उत्तरा के गर्भस्थ शिशु पर प्रहार, श्रीकृष्ण द्वारा सुरक्षापूर्वक शिशु जन्म कराना बायो मेडिकल इंजीनियरिंग का अद्भुत उदाहरण है। गुजरात में समुद्रतट पर कृष्ण द्वारा बसाई गयी द्वारिका नगरी उनकी मृत्यु पश्चात जलमग्न हो गयी। २००५ से भारतीय नौसेना के सहयोग से इसके अन्वेषण का कार्य प्रगति पर है। वैज्ञानिक स्कूबा डाइविंग से इसके रहस्य जानने में लगे हैं।
*श्रेष्ठ अभियांत्रिकी के ऐतिहासिक उदाहरण
श्रेष्ठ भारतीय संरचनाओं में से कुछ इतनी प्रसिद्ध हुईं कि उनका रूपांतरण कर निर्माण का श्रेय सुनियोजित प्रयास शासकों द्वारा किया गया। उनमें से कुछ निम्न निम्न हैं:
*तेजोमहालय (ताजमहल) आगरा:*
हिन्दू राजा परमार देव द्वारा ११९६ में बनवाया गया तेजोमहालय (शिव के पाँचवे रूप अग्रेश्वर महादेव नाग नाथेश्वर का उपासना गृह तथा राजा का आवास) भवन यांत्रिकी कला का अद्भुत उदाहरण है जिसे विश्व के सात आश्चर्यों में गिना जाता है।
*तेजो महालय के रेखांकन*
१०८ कमल पुष्पों तथा १०८ कलशों से सज्जित संगमरमरी जालियों से सज्जित यह भवन ४०० से अधिक कक्ष तथा तहखाने हैं। इसके गुम्बद निर्माण के समय यह व्यवस्था भी की गयी है कि बूँद-बूँद वर्षा टपकने से शिवलिंग का जलाभिषेक अपने आप होता रहे।
*विष्णु स्तम्भ (क़ुतुब मीनार) दिल्ली
युनेस्को द्वारा विश्व धरोहर घोषित, ​दक्षिण दिल्ली के विष्णुपद गिरि में राजा विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक प्रख्यात ज्योतिर्विद आचार्य मिहिर की शोध तथा निवासस्थली मिहिरा अवली (महरौली) में ​दिन-रात के प्रतीक 12 त्रिभुजाका​रों - 12 कमल पत्रों ​और 27
नक्षत्रों​ के प्रतीक 27 पैवेलियनों सहित निर्मित 7 मंज़िली ​विश्व की सबसे ऊँची मीनार ​(72.7 मीटर ​, आधार व्यास 14.3 मीटर, शिखर व्यास 2.75 मीटर ,​379 सीढियाँ, निर्माण काल सन 1193 पूर्व) विष्णु ध्वज/स्तंभ (क़ुतुब मीनार) भारतीय अभियांत्रिकी संरचनाओं के श्रेष्ठता का उदाहरण है। इस पर सनातन धर्म के देवों, मांगलिक प्रतीकों तथा संस्कृत उद्धरणों का अंकन है।
​​इन पर मुग़लकाल में समीपस्थ जैन मंदिर तोड़कर उस सामग्री से पत्थर लगाकर आयतें लिखाकर मुग़ल इमारत का रूप देने का प्रयास कुतुबुद्दीन ऐबक व इलततमिश द्वारा 1199-1368 में किया गया । निकट ही ​चन्द्रगुप्त द्वितीय द्वारा विष्णुपद गिरि पर स्थापित और विष्णु भगवान को समर्पित गिरि पर स्थापित और विष्णु भगवान को समर्पित7 मीटर ऊंचा 6 टन वज़न का ध्रुव/गरुड़स्तंभ (लौह स्तंभ) स्तम्भ ​चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने बाल्हिक युद्ध में विजय पश्चात बनवाया। इस पर अंकित लेख में सन 1052 के राजा अंनगपाल द्वितीय का उल्लेख है।तोमर नरेश विग्रह ने इसे खड़ा करवाया जिस पर सैकड़ों वर्षों बाद भी जंग नहीं लगी। फॉस्फोरस मिश्रित लोहे से निर्मित यह स्तंभ भारतीय धात्विक यांत्रिकी की श्रेष्ठता का अनुपम उदाहरण है।आई. आई. टी. कानपूर के प्रो. बालासुब्रमण्यम के अनुसार हाइड्रोजन फॉस्फेट हाइड्रेट (FePO4-H3PO4-4H2O) जंगनिरोधी ​सतह है का निर्माण करता है।
*​जंतर मंतर : Samrat Yantra* सवाई जयसिंह द्वितीयद्वारा 1724 में दिल्ली जयपुर, उज्जैन, मथुरा और वाराणसी में ​निर्मित जंतर मंतर प्राचीन भारत की वैज्ञानिक उन्नति की मिसाल है।यहाँ​ सम्राट यंत्र सूर्य की सहायता से समय और ग्रहों की स्थिति, मिस्र यंत्र वर्ष से सबसे छोटे ओर सबसे बड़े दिन, राम यंत्र और जय प्रकाश यंत्र से खगोलीय पिंडों की गति जानी जा सकती ​है। इनके अतिरिक्त दिल्ली, आगरा, ग्वालियर, जयपुर, चित्तौरगढ़, गोलकुंडा आदि के किले अपनी मजबूती, उपयोगिता और श्रेष्ठता की मिसाल हैं।​
*आधुनिक अभियांत्रिकी संरचनाएँ:*
भारतीय अभियांत्रिकी संरचनाओं को शकों-हूणों और मुगलों के आक्रमणों के कारण पडी। मुगलों ने पुराने निर्माणों को बेरहमी से तोडा और किये। अंग्रेजों ने भारत को एक इकाई बनाने के साथ अपनी प्रशासनिक पकड़ बनाने के लिये किये। स्वतंत्रता के पश्चात सर मोक्षगुंडम विश्वेस्वरैया, डॉ. चन्द्रशेखर वेंकट रमण, डॉ. मेघनाद साहा आदि ने विविध परियोजनाओं को मूर्त किया। भाखरानागल, हीराकुड, नागार्जुन सागर, बरगी, सरदार सरोवर, टिहरी आदि जल परियोजनाओं ने कृषि उत्पादन से भारतीय अभियांत्रिकी को गति दी।
जबलपुर, कानपूर, तिरुचिरापल्ली, शाहजहाँपुर, इटारसी आदि में सीमा सुरक्षा बल हेतु अस्त्र-शास्त्र और सैन्य वाहन गुणवत्ता और मितव्ययिता के साथ बनाने में भारतीय संयंत्र किसी विदेशी संस्थान से पीछे नहीं हैं।
परमाणु ऊर्जा संयंत्र निर्माण, परिचालन और दुर्घटना नियंत्रण में भारत के प्रतिष्ठानों ने विदेशी प्रतिष्ठानों की तुलना में बेहतर काम किया है। कम सञ्चालन व्यय, अधिक रोजगार और उत्पादन के साथ कम दुर्घटनाओं ने परमाणु वैज्ञानिकों को प्रतिशत दिलाई है जिसका श्रेय डॉ. होमी जहांगीर भाभा को जाता है।
भारत की अंतरिक्ष परियोजनाएं और उपग्रह तकनालॉजी दुनिया में श्रेष्ठता, मितव्ययिता और सटीकता के लिए ख्यात हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद भारत ने कीर्तिमान स्थापित किये हैं और खुद को प्रमाणित किया है। डॉ. विक्रम साराभाई का योगदान विस्मृत नहीं किया जा सकता।
भारत के अभियंता पूरी दुनिया में अपनी लगन, परिश्रम और योग्यता के लिए जाने जाते हैं । देश में प्रशासनिक सेवाओं की तुलना में वेतन, पदोन्नति, सुविधाएँ और सामाजिक प्रतिष्ठा अत्यल्प होने के बावजूद भारतीय अभियांत्रिकी परियोजनाओं ने कीर्तिमान स्थापित किये हैं।
अग्निपुरुष डॉ. कलाम के नेतृत्व में भारतीय मिसाइल अभियांत्रिकी की विश्व्यापी ख्याति प्राप्त की है।
सारत: भारत की महत्वकांक्षी अभियांत्रिकी संरचनाएँ मेट्रो ट्रैन, दक्षिण रेल, वैष्णव देवी रेल परियोजना हो या बुलेट ट्रैन की भावी योजना,राष्ट्रीय राजमार्ग चतुर्भुज हो या नदियों को जोड़ने की योजना भारतीय अभियंताओं ने हर चुनौती को स्वीकारा है। विश्व के किसी भी देश की तुलना में भारतीय संरचनाएँ और परियोजनाएं श्रेष्ठ सिद्ध हुई हैं।
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मुक्तक
नित्य प्रात हो जन्म, सूर्य सम कर्म करें निष्काम भाव से।
संध्या पा संतोष रात्रि में, हो विराम नित नए चाव से।।
आस-प्रयास-हास सँग पग-पग, लक्ष्य श्वास सम हो अभिन्न ही -
मोह न व्यापे, अहं न घेरे, साधु हो सकें प्रिय! स्वभाव से।।
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दोहे
सलिल न बन्धन बाँधता, बहकर देता खोल।
चाहे चुप रह समझिए, चाहे पीटें ढोल।।
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अंजुरी भर ले अधर से, लगा बुझा ले प्यास।
मन चाहे पैरों कुचल, युग पा ले संत्रास।।
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उठे, बरस, बह फिर उठे, यही 'सलिल' की रीत।
दंभ-द्वेष से दूर दे, विमल प्रीत को प्रीत।।
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स्नेह संतुलन साधकर, 'सलिल' धरा को सींच।
बह जाता निज राह पर, सुख से आँखें मींच।।
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क्या पहले क्या बाद में, घुली कुँए में भंग।
गाँव पिए मदमस्त है, कर अपनों से जंग।।
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जो अव्यक्त है, उसी से, बनता है साहित्य।
व्यक्त करे सत-शिव तभी, सुंदर का प्रागट्य।।
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नमन नलिनि को कीजिए, विजय आप हो साथ।
'सलिल' प्रवह सब जगत में, ऊँचा रखकर माथ।।
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हर रेखा विश्वास की, शक-सेना की हार।
सक्सेना विजयी रहे, बाँट स्नेह-सत्कार।
१५-९-२०१६
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हिंदी गीत:
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अपना हर पल है हिन्दीमय एक दिवस क्या खाक मनाएँ?
बोलें-लिखें नित्य अंग्रेजी जो वे एक दिवस जय गाएँ...
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निज भाषा को कहते पिछडी. पर भाषा उन्नत बतलाते.
घरवाली से आँख फेरकर देख पडोसन को ललचाते.
ऐसों की जमात में बोलो, हम कैसे शामिल हो जाएँ?...
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हिंदी है दासों की बोली, अंग्रेजी शासक की भाषा.
जिसकी ऐसी गलत सोच है, उससे क्या पालें हम आशा?
इन जयचंदों की खातिर हिंदीसुत पृथ्वीराज बन जाएँ...
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ध्वनिविज्ञान- नियम हिंदी के शब्द-शब्द में माने जाते.
कुछ लिख, कुछ का कुछ पढने की रीत न हम हिंदी में पाते.
वैज्ञानिक लिपि, उच्चारण भी शब्द-अर्थ में साम्य बताएँ...
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अलंकार, रस, छंद बिम्ब, शक्तियाँ शब्द की बिम्ब अनूठे.
नहीं किसी भाषा में मिलते, दावे करलें चाहे झूठे.
देश-विदेशों में हिन्दीभाषी दिन-प्रतिदिन बढ़ते जाएँ...
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अन्तरिक्ष में संप्रेषण की भाषा हिंदी सबसे उत्तम.
सूक्ष्म और विस्तृत वर्णन में हिंदी है सर्वाधिक सक्षम.
हिंदी भावी जग-वाणी है निज आत्मा में 'सलिल' बसाएँ...
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