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रविवार, 1 फ़रवरी 2026

फरवरी १, सॉनेट, माहिया, हास्य, नीबू, उल्लाला गीत, रोल, दोहा, कुण्डलिया, मुक्तिका, गीत, मुक्तक

सलिल सृजन फरवरी १

फरवरी कब?-क्या??
भारतीय तटरक्षक दिवस ४६ वाँ
- विश्व आर्द्रभूमि दिवस का आयोजन आर्द्रभूमि की महत्त्वपूर्ण भूमिका के बारे में वैश्विक जागरूकता बढ़ाने के लिये किया जाता है। इसी दिन वर्ष १९७१ में ईरान के शहर रामसर में कैस्पियन सागर के तट पर आर्द्रभूमि पर एक अभिसमय (Convention on Wetlands) को अपनाया गया था। विश्व आर्द्रभूमि दिवस पहली बार २ फरवरी १९९७ को रामसर सम्मेलन के १६ वर्ष पूरे होने पर मनाया गया था।
- आरए जागरूकता दिवस रुमेटीइड गठिया जागरूकता दिवस पीड़ित रोगियों में जागरूकता फैलाने के लिए मनाया जाता है।
- सूरजकुंड शिल्प मेला २ फरवरी से १८ फरवरी २०२४ तक सूरजकुंड, जिला फरीदाबाद, हरियाणा में है। यह भारतीय लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत का उत्सव है। हरियाणा पर्यटन विभाग द्वारा हर साल दिल्ली के पास सूरजकुंड में आयोजित इस मेले में भारत के हस्तशिल्प, हथकरघा और सांस्कृतिक ताने-बाने की समृद्धि और विविधता देखने को मिलती है।
- राष्ट्रीय गोल्डन रिट्रीवर दिवस गोल्डन रिट्रीवर श्वान अपने शांत स्वभाव, बुद्धिमत्ता और चंचलता के कारण उत्सव और प्रशंसा का कारण हैं।
- विश्व कैंसर दिवस WHO द्वारा लोगों को कैंसर बीमारी के बारे में जागरूक करने के लिएमनाया जाता है।
- श्रीलंका का राष्ट्रीय दिवस ४ फरवरी १९४८ को श्रीलंका को ब्रिटिश शासन से आजादी मिली थी।
- ३८ वाँ अंतरराष्ट्रीय विकास सप्ताह (४ - १२ फरवरी) अंतरराष्ट्रीय विकास क्षेत्र में विभिन्न भूमिकाओं व करियर पथों संबंधी जानकारी देता है।
- महिला जननांग विकृति के प्रति शून्य सहनशीलता का अंतरराष्ट्रीय दिवस लोगों को जननांग विकृति के कारण होने वाले परिणामों और समस्याओं के बारे में शिक्षित करने के लिए मनाया जाता है।
७ - १४ फरवरी
- वैलेंटाइन वीक फरवरी को प्यार का महीना कहते हैं। वैलेंटाइन वीक आरंभ ७ फरवरी से, मुख्य वैलेंटाइन डे १४ फरवरी।
- सुरक्षित इंटरनेट दिवस इंटरनेट को सभी के लिए सुरक्षित और बेहतर जगह बनाने का आह्वान करता है।
९ - बाबा आमटे की पुण्य तिथि कुष्ठ रोग से पीड़ित लोगों के पुनर्वास और सशक्तिकरण के लिए स्मरणीय।
१०
- राष्ट्रीय कृमि मुक्ति दिवस प्रत्येक बच्चे को कृमि मुक्त बनाने के लिए स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय भारत सरकार की एक पहल।
- विश्व दलहन दिवस दालों के पोषण और पर्यावरणीय लाभों के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए।
११
- विश्व बीमार दिवस पोप जॉन पॉल द्वितीय द्वारा विश्वासियों द्वारा बीमारी से पीड़ित लोगों के लिए प्रार्थना करने के लिए।
- विज्ञान में महिलाओं और लड़कियों का अंतरराष्ट्रीय दिवस महिलाओं और लड़कियों के लिए विज्ञान तक पूर्ण और समान पहुंच और भागीदारी प्राप्त करने पर केंद्रित।
१२
- डार्विन दिवस १८०९ में विकासवादी जीव विज्ञान के जनक चार्ल्स डार्विन की जयंती। विकासवादी और पादप विज्ञान में डार्विन के योगदान पर प्रकाश हेतु । २०१५ में डार्विन की 'ओरिजिन ऑफ स्पीशीज़' इतिहास की सबसे प्रभावशाली अकादमिक पुस्तक चुनी गई।
- अब्राहम लिंकन का जन्मदिन
- राष्ट्रीय उत्पादकता दिवस भारत में उत्पादकता संस्कृति को बढ़ाने के लिएराष्ट्रीय उत्पादकता परिषद (एनपीसी) द्वारा।
- विश्व रेडियो दिवस जागरूकता बढ़ाने के लिए।
१३
- सरोजिनी नायडू जयंती १८७९ हैदराबाद, पिता वैज्ञानिक और दार्शनिक अघोरनाथ चट्टोपाध्याय-माँ बरदा सुंदरी देवी, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पहली भारतीय महिला अध्यक्ष, संयुक्त प्रांत (उत्तर प्रदेश) की पहली महिला राज्यपाल।
- अंतरराष्ट्रीय मिर्गी दिवस
१४
- संत वैलेंटाइन दिवस एक कैथोलिक पादरी जो तीसरी शताब्दी में रोम में रहते थे।
- विश्व जन्मजात हृदय दोष जागरूकता दिवस
१५
- विश्व मानव विज्ञान दिवस आम जनता को मानव विज्ञान के बारे में शिक्षित करने के लिए।
१७- २७
- ताज महोत्सव
२०
- अरुणाचल प्रदेश स्थापना दिवस
- मिजोरम स्थापना दिवस १९८७, २३ वाँ राज्य।
- विश्व सामाजिक न्याय दिवस उद्देश्य पूर्ण रोजगार प्राप्त करना और सामाजिक एकीकरण के लिए समर्थन प्राप्त करना।
२१
- अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस भाषा की विविधता और उसकी विविधता के प्रति जागरूकता हेतु। १९९९ में यूनेस्को द्वारा पहली घोषणा।
२२
- विश्व चिंतन दिवस १५० देशों में गर्ल स्काउट्स और गर्ल गाइड्स द्वारा मनाया जाता है।
२३
- विश्व शांति और समझ दिवस रोटरी इंटरनेशनल के उद्घाटन सम्मेलन की स्मृति में।
२४
- केंद्रीय उत्पाद शुल्क दिवस विभाग के कर्मचारियों को विनिर्माण व्यवसाय में भ्रष्टाचार को रोकने हेतु।
२७
- विश्व एनजीओ दिवस गैर-सरकारी और गैर-लाभकारी संगठनों को सम्मान देने के लिए।
२८
- राष्ट्रीय विज्ञान दिवस भारतीय भौतिक विज्ञानी सर चन्द्रशेखर वेंकट रमन द्वारा रमन प्रभाव की खोज १९२८ को चिह्नित करने के लिए। उन्हें १९३० में भौतिकी विषय में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
- दुर्लभ रोग दिवस आम लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए।
***
प्रात-गीत
सपने देखे सुंदर सुंदर
अब जग जाएँ रे!
भोर भई उठ जग को
मंगल गान सुनाएँ रे!
.
करतल बसते हैं विधि-हरि-हर
सुमिर प्रणाम करो रे सादर।
शारद-उमा-रमा में रमकर
नमन करो भू-नभ को, पगधर
सुख दे-पाएँ रे!
.
चित्रगुप्त प्रभु का मन-मंदिर
कर्म देव का यह तन है घर
काम करें हर प्रभु-अर्पण कर
फल जो-जितना उचित मानकर
प्रभु-यश गाएँ रे।
.
पंछी नाचें फुदक-चहककर
फूल खिल रहे नित्य महककर
हम क्यों दुर्बल व्यर्थ फिक्रकर
जीवन जैसा जिएँ हर्षकर
खुशी मनाएँ रे!
१.२.२०२६
०००
सॉनेट
उल्लू
*
एक ही उल्लू काफी था।
हर शाख पे उल्लू बैठा है।
केवल मन मंदिर बाकी था।।
भय कोरोना का पैसा है।।
सोहर बन्ना बन्नी गाने।
जुड़ने से हम कतराते हैं।
लाशें बिन काँध पड़ी रहतीं।।
हम बलिपंथी भय खाते हैं।।
हमसे नारे लगवालो तुम।
हम संसद में जा झगड़ेंगे।
कविताएँ सौ लिख लेंगे हम।।
हर दर पर नाकें रगड़ेंगे।।
उल्लू को उल्लू मत बोलो।
उल्लू वंदन कर यश ले लो।।
१-२-२०२२
•••
कार्यशाला
दोहा से कुण्डलिया
*
मन जब स्थिर है नहीं, तब क्या पूजा पाठ।
पढ़ा रही है जिन्दगी,सोलह दूनी आठ।। -सुनीता पांडेय 'सुरभि'
प्रथम चरण - ११ ११ ११ २ १२ = ११ मात्रा, १३ होनी चाहिए। 'स्थि' की मात्रा 'त्य' की तरह १ है।
'मन एकाग्र न हो अगर' या 'जब मन हो एकाग्र न तब' करने से अर्थ बदले बिना न्यून मात्रा दोष समाप्त किया जा सकता है।
दोहा
जब मन हो एकाग्र न तब, क्या पूजा क्या पाठ?
पढ़ा रही है ज़िंदगी, सोलह दूनी आठ।। -सुनीता पांडेय 'सुरभि'
रोला
सोलह दूनी आठ, पुत्र है पिता पिता का।
लगे गलत पर सत्य, लक्ष्य है जन्म चिता का।।
अपने गैर; गैर अपने, मन मत हो उन्मन।
सार्थक पूजा-पाठ, अगर एकाग्र रहे मन।। - संजीव
*
दोहा
आओ पर जाना नहीं, जाने का क्या काम।
नेह नर्मदा छोड़ कर, लें क्यों दूजा नाम।। -संतोष शुक्ला
रोला
लें क्यों दूजा नाम, एक जब पार लगाए।
गुरु-गोविंद प्रणाम, सिंधु भव पार कराए।।
मन में रख संतोष, सलिल नव गीत सुनाओ।
सरस भाव लय बिंब, गीत में भरकर गाओ।। - संजीव
***
माहिया
*
हो गई सुबह आना
उषा से सूर्य कहे
आकर फिर मत जाना
*
तुम साथ सदा देना
हाथ हाथ में ले
जीवन नौका खेना
*
मैं प्राण देह है तू
दो होकर भी एक
मैं प्रीत; नेह है तू
*
रस-भाव; अर्थ-आखर
गति-यति; रूप-अरूप
प्रकृति-पुरुष; वधु-वर
*
कारक किसका कौन?
जीव न जो संजीव
साध-साधना मौन
*
कौन कहाँ भगवान?
देह अगेह अजान
गुणमय ही गुणवान
*
सर्व व्याप्त ओंकार
वही एक आधार
मैं-तुम हम साकार
*
जीवन पूजन जान
नेह नर्मदा-स्नान
कर; तज निज-पर भान
*
मत अहंकार में डूब
गिरते झाड़-पहाड़
पर दूब खूब की खूब
१-२-२०२०
***
मुक्तक
शब्देश है, भावेश है, छ्न्देश मौन बसंत है
मिथलेश है, करुणेश है, कहिए न कौन बसंत है?
कांता है, कल्पना है, ज्योति, आभा-प्रभा भी
विनीता, मधु, मंजरी, शशि, पूर्णिमा बसंत है
*
वंदना है, प्रार्थना है, अर्चना बसंत है
साधना-आराधना है, सर्जना बसंत है
कामना है, भावना है, वायदा है, कायदा है
मत इसे जुमला कहो उपासना बसंत है
*
मन में लड्डू फूटते आया आज बसंत
गजल कह रही ले मजा लाया आज बसंत
मिली प्रेरणा शाल को बोली तजूं न साथ
सलिल साधना कर सतत छाया आज बसंत
*
मुश्किल से जीतेंगे कहता बसन्त हो
किंचित ना रीतेंगे कहता बसन्त हो
पत्थर को पिघलाकर मोम सदृश कर देंगे
हम न अभी बीतेंगे कहता बसन्त हो
*
अक्षर में, शब्दों में, बसता बसन्त हो
छंदों में, बन्दों में हँसता बसन्त हो
विरहा में नागिन सा डँसता बसन्त हो
साजन बन बाँहों में कसता बसन्त हो
*
अपना हो, सपना हो, नपना बसन्त हो
पूजा हो, माला को जपना बसन्त हो
मन-मन्दिर, गिरिजा, गुरुद्वारा बसन्त हो
जुम्बिश खा अधरों का हँसना बसन्त हो
*
साथ-साथ थाम हाथ ख्वाब में बसन्त हो
अँगना में, सड़कों पर, बाग़ में बसन्त हो
तन-मन को रँग दे बासंती रंग में विहँस
राग में, विराग में, सुहाग में बसन्त हो
*
श्वास-श्वास आस-आस झूमता बसन्त हो
मन्ज़िलों को पग तले चूमता बसन्त हो
भू-गगन हुए मगन दिग-दिगन्त देखकर
लिए प्रसन्नता अनंत घूमता बसन्त हो
१-२-२०१७
***
मुक्तिका
*
कौए अब तो बाज हुए
जुगनू कहते गाज हुए
*
चमरौधा भी सर चढ़कर
बोला हम तो ताज हुए
*
नाम मात्र के कपड़े ही
अब नारी की लाज हुए
*
कल के जिम्मे 'सलिल' सभी
जो करने हैं काज हुए
*
गूँगे गाते हैं ठुमरी
सुरविहीन सब साज हुए
***
मुक्तिका-
*
चुप नाज़नीं के कीजिए नखरे सभी कुबूल
वरना हिलेगी जिंदगी की एक-एक चूल
*
जो कह रहे, कर लो वही, क्या हर्ज़?, फर्ज़ है
आँखों में ख्वाब वस्ल का पल भर भी सके झूल
*
मुस्कान आतिशी मिले तो मान लेना मन
उनका हरेक लफ्ज़ बना जिंदगी का रूल
*
तकनीक प्यार की करो तकरार चंद पल
इज़हार हार का खिलाये धूल में भी फूल
*
हमने 'खलिश' को दिल में बसा सर लिया झुका
तुमने नजर चुरा 'सलिल' को कर लिया कबूल
***
मुक्तिका -
अपना रिश्ता ढहा मकान
आया तूफां उड़ा मचान
*
जिसमें गाहक कोई नहीं
दिल का नाता वही दूकान
*
आँसू, आहें, याद हसीं
दौलत मैं हूँ शाहजहान
*
गम गुम हो गर दुनिया से
कैसे ख़ुशी बने मेहमान?
*
अजय न होना युग-युग तक
विजय मिटाये बना निशान
१.२.२०१६
***
हास्य सलिला:
नीबू
*
फरमाइश मेहमान की सुन लालू हैरान
लालू पूछें: समस्या क्या है मेरी जान?
पल में हल कर दूँ कहो, फिर करने दो प्यार'
लाली तुनकी: 'हटो जी! बिगड़ेगा सिंगार
नीबू घर में है नहीं, रहे शिकंजी माँग
लाओ नीबू या नहीं व्यर्थ अड़ाओ टाँग'
लालू मुस्काए कहा: 'चिंता है बेकार
सौ नीबू की शक्ति ले आया है विम बार
दो बूँदें दो डाल फिर करो शिकंजी पेश'
लाली खीजी: 'आज लूँ नोच तुम्हारे केश?'
१.२.२०१४
***
अभिनव प्रयोग-
उल्लाला गीत:
जीवन सुख का धाम है
*
जीवन सुख का धाम है,
ऊषा-साँझ ललाम है.
कभी छाँह शीतल रहा-
कभी धूप अविराम है...*
दर्पण निर्मल नीर सा,
वारिद, गगन, समीर सा,
प्रेमी युवा अधीर सा-
हर्ष, उदासी, पीर सा.
हरी का नाम अनाम है
जीवन सुख का धाम है...
*
बाँका राँझा-हीर सा,
बुद्ध-सुजाता-खीर सा,
हर उर-वेधी तीर सा-
बृज के चपल अहीर सा.
अनुरागी निष्काम है
जीवन सुख का धाम है...
*
वागी आलमगीर सा,
तुलसी की मंजीर सा,
संयम की प्राचीर सा-
राई, फाग, कबीर सा.
स्नेह-'सलिल' गुमनाम है
जीवन सुख का धाम है...
१-२-२०१३
***

बुधवार, 3 जुलाई 2024

जुलाई ३, मुक्तक, दोहे, नीबू, दोहा-हाइकु गीत,प्रेम, सड़गोड़ासनी

सलिल सृजन जुलाई ३
*
मुक्तक
आँख मिलाने से न मिलें दिल
नैन लड़ाने से न चुकें बिल.
दीद नटेरे बात बिगड़ती-
कहते लज दृग हृदय गए खिल।।
*
बचकर रहिए आँख मिलाने से
नेह न मिलता भय फैलाने से।
घटे समर्थन तो मानो है हार-
देश न चलता आँख दिखाने से।।
*
खुल नहिं जाए राज आँख मिलाने से सच मत कहिए
खो नहीं जाए लाज आँख मिलाने से बच कर रहिए।
बिन कारण उद्देश्य आँख मिलाने से कमजोर न हों-
फिसल न जाए ताज आँख मिलाने से ढेराज गहिए।।
३.७.२०२४
***
दोहे का रंग नीबू के संग :
संजीव
*
वात-पित्त-कफ दोष का, नीबू करता अंत
शक्ति बढ़ाता बदन की, सेवन करिये कंत
*
ए बी सी त्रय विटामिन, लौह वसा कार्बोज
फॉस्फोरस पोटेशियम, सेवन से दें ओज
*
मैग्निशियम प्रोटीन सँग, सोडियम तांबा प्राप्य
साथ मिले क्लोरीन भी, दे यौवन दुष्प्राप्य
*
नेत्र ज्योति की वृद्धि कर, करे अस्थि मजबूत
कब्ज मिटा, खाया-पचा, दे सुख-ख़ुशी अकूत
*
जल-नीबू-रस नमक लें, सुबह-शाम यदि छान
राहत दे गर्मियों में, फूँक जान में जान
*
नींबू-बीज न खाइये, करे बहुत नुकसान
भोजन में मत निचोड़ें, बाद करें रस-पान
*
कब्ज अपच उल्टियों से, लेता शीघ्र उबार
नीबू-सेंधा नमक सँग, अदरक है उपचार
*
नींबू अजवाइन शहद, चूना-जल लें साथ
वमन-दस्त में लाभ हो, हँसें उठकर माथ
*
जी मिचलाये जब कभी, तनिक न हों बेहाल
नीबू रस-पानी-शहद, आप पियें तत्काल
*
नींबू-रस सेंधा नमक, गंधक सोंठ समान
मिली गोलियाँ चूसिये, सुबह-शाम गुणवान
*
नींबू रस-पानी गरम, अम्ल पित्त कर दूर
हरता उदर विकार हर, नियमित पियें हुज़ूर
*
आधा सीसी दर्द से, परेशान-बेचैन
नींबू रस जा नाक में, देता पल में चैन
*
चार माह के गर्भ पर, करें शिकंजी पान
दिल-धड़कन नियमित रहे, प्रसव बने आसान
*
कृष्णा तुलसी पात ले, पाँच- चबायें खूब
नींबू-रस पी भगा दें, फ्लू को सुख में डूब
*
पियें शिकंजी, घाव पर, मलिए नींबू रीत
लाभ एक्जिमा में मिले, चर्म नर्म हो मीत
*
कान दर्द हो कान में, नींबू-अदरक अर्क
डाल साफ़ करिये मिले, शीघ्र आपको फर्क
*
नींबू-छिलका सुख कर, पीस फर्श पर डाल
दूर भगा दें तिलचटे, गंध करे खुशहाल
*
नीबू-छिलके जलाकर, गंधक दें यदि डाल
खटमल सेना नष्ट हो, खुद ही खुद तत्काल
*
पीत संखिया लौंग संग, बड़ी इलायची कूट
नींबू-रस मलहम लगा, करें कुष्ठ को हूट
*
नींबू-रस हल्दी मिला, उबटन मल कर स्नान
नर्म मखमली त्वचा पा, करे रूपसी मान
*
मिला नारियल-तेल में, नींबू-रस नित आध
मलें धूप में बदन पर, मिटे खाज की व्याध
*
खूनी दस्त अगर लगे, घोलें दूध-अफीम
नींबू-रस सँग मिला पी, सोयें बिना हकीम
*
बवासीर खूनी दुखद, करें दुग्ध का पान
नींबू-रस सँग-सँग पियें, बूँद-बूँद मतिमान
*
नींबू-रस जल मिला-पी, करें नित्य व्यायाम
क्रमश: गठिया दूर हो, पायेंगे आराम
*
गला बैठ जाए- करें, पानी हल्का गर्म
नींबू-अर्क नमक मिला, कुल्ला करना धर्म
*
लहसुन-नींबू रस मिला, सिर पर मल कर स्नान
मुक्त जुओं से हो सकें, महिलायें अम्लान
*
नींबू-एरंड बीज सम, पीस चाटिये रात
अधिक गर्भ संभावना, होती मानें बात
*
प्याज काट नीबू-नमक, डाल खाइये रोज
गर्मी में हो ताजगी, बढ़े देह का ओज
*
काली मिर्च-नमक मिली, पियें शिकंजी आप
मिट जाएँगी घमौरियाँ, लगे न गर्मी शाप
*
चेहरे पर नींबू मलें, फिर धो रखिये शांति
दाग मिटें आभा बढ़े, अम्ल-विमल हो कांति
***

अभिनव प्रयोग
दोहा-हाइकु गीत
प्रतिभाओं की कमी नहीं...
संजीव 'सलिल'
**
प्रतिभाओं की
कमी नहीं किंचित,
विपदाओं की....
*
धूप-छाँव का खेल है
खेल सके तो खेल.
हँसना-रोना-विवशता
मन बेमन से झेल.

दीपक जले उजास हित,
नीचे हो अंधेर.
ऊपरवाले को 'सलिल'
हाथ जोड़कर टेर.

उसके बिन तेरा नहीं
कोई कहीं अस्तित्व.
तेरे बिन उसका कहाँ
किंचित बोल प्रभुत्व?

क्षमताओं की
कमी नहीं किंचित
समताओं की.
प्रतिभाओं की
कमी नहीं किंचित,
विपदाओं की....
*
पेट दिया दाना नहीं.
कैसा तू नादान?
'आ, मुझ सँग अब माँग ले-
भिक्षा तू भगवान'.

मुट्ठी भर तंदुल दिए,
भूखा सोया रात.
लड्डूवालों को मिली-
सत्ता की सौगात.

मत कहना मतदान कर,
ओ रे माखनचोर.
शीश हमारे कुछ नहीं.
तेरे सिर पर मोर.

उपमाओं की
कमी नहीं किंचित
रचनाओं की.
प्रतिभाओं की
कमी नहीं किंचित,
विपदाओं की....
***
गीत:
प्रेम कविता...
संजीव 'सलिल'
*
प्रेम कविता कब कलम से
कभी कोई लिख सका है?
*
प्रेम कविता को लिखा जाता नहीं है.
प्रेम होता है किया जाता नहीं है..
जन्मते ही सुत जननि से प्रेम करता-
कहो क्या यह प्रेम का नाता नहीं है?.
कृष्ण ने जो यशोदा के साथ पाला
प्रेम की पोथी का उद्गाता वही है.
सिर्फ दैहिक मिलन को जो प्रेम कहते
प्रेममय गोपाल भी
क्या दिख सका है?
प्रेम कविता कब कलम से
कभी कोई लिख सका है?
*
प्रेम से हो क्षेम?, आवश्यक नहीं है.
प्रेम में हो त्याग, अंतिम सच यही है..
भगत ने, आजाद ने जो प्रेम पाला.
ज़िंदगी कुर्बान की, देकर उजाला.
कहो मीरां की करोगे याद क्या तुम
प्रेम में हो मस्त पीती गरल-प्याला.
और वह राधा सुमिरती श्याम को जो
प्रेम क्या उसका कभी
कुछ चुक सका है?
प्रेम कविता कब कलम से
कभी कोई लिख सका है?
*
अपर्णा के प्रेम को तुम जान पाये?
सिया के प्रिय-क्षेम को अनुमान पाये?
नर्मदा ने प्रेम-वश मेकल तजा था-
प्रेम कैकेयी का कुछ पहचान पाये?.
पद्मिनी ने प्रेम-हित जौहर वरा था.
शत्रुओं ने भी वहाँ थे सिर झुकाए.
प्रेम टूटी कलम का मोहताज क्यों हो?
प्रेम कब रोके किसी के
रुक सका है?
प्रेम कविता कब कलम से
कभी कोई लिख सका है?

***
मुक्तिका
तू है शांत, चंचल है सलिल
तू गगन है, ये अबाबील है
तू प्रताप है जो न हारता
दुख पैरों पड़ा ज्यों भील है
तू रमा रमा में न पर रमा
सलिल तुझको अर्पित खील है
जुबां शीरी तेरी ये कह रही
कहीं और न ऐसा फील' है
तुझे देखकर मुझे यूँ लगा
तू ही कायदा है, तू शील है
मैं शरण में जिसकी हूँ आ गया
तू वो रास्ता है, तू मील है
मैं हूँ देखता जिसे रोज ही
तू ही फिल्म की वह रील है
३.७.२०१९
***

बुंदेली छंद:
सड़गोड़ासनी
शुभ प्रभात
*
सूरज नील गगन से झाँक
शुभ-प्रभात कहता है।
*
उषा-माथ सिंदूरी सूरज
दिप्-दिप्-दिप् दहता है।
*
धूप खेलती आँखमिचौली,
पवन हुलस बहता है।
*
चूँ-चूँ चहक रही गौरैया,
आँगन सुख गहता है।
*
नयनों से नयनों की बतियाँ,
बज कंगन तहता है।
*
नदी-तलैया देख सूखती
घाट विरह सहता है।
*
पत्थर की नगरी में यारों!
सलिल-ह्रदय रहता है।
***
(टीप: सड़गोड़ासनी बुंदेली बोली का छंद है. मुखड़ा १५-१२ मात्रिक, चार मात्रा पश्चात् गुरु-लघु आवश्यक, अंतरा १६-१२,तथा मुखड़ा-अंतरा समतुकांती होते हैं. इस छंद को आधुनिक हिंदी खड़ी बोली में प्रस्तुत करने के इस प्रयास पर पाठकों की राय आमंत्रित है. अन्य देशज बोलिओं के छंद रचना विधान सहित हिंदी में रचे जाएं तो उन्हें अपने 'छंद कोष' में सम्मिलित कर सकूँगा।)
२.७.२०१८, ७९९९५५९६१८
***
एक द्विपदी:
आदमी है, फ़रिश्ता रश्क करे
काश मैं 'शांत' हो सका होता
***
हास्य मुक्तिका:
*
हाय मल्लिका!, हाय बिपाशा!!
हाउसफुल पिक्चर की आशा
*
तुम बिन बोलीवुड है सूना
तुम हो गरमागरम तमाशा
*
तोला-माशा रूप तुम्हारा
झीने कपड़े रत्ती-माशा
*
फ़िदा खुदा, इंसां, शैतां भी
हाय! हाय!! क्या रूप तराशा?
*
गले लगाने ह्रदय मचलता
आँख खुले तो मिले हताशा
*
मानें हार अप्सरा-हूरें
उर्वशियों को हुई हताशा
*
नहा नीर में आग लगा दो
बूँद-बूँद हो मधुर बताशा
***
मुक्तक
*
ज्योति तम हर, जगत ज्योतित कर रही
आत्म-आहुति पंथ हँस कर वर रही
ज्योति बिन है नयन-अनयन एक से
ज्योति मन-मंदिर में निशि-दिन बर रही
*
ज्योति ईश्वर से मिलाती भक्त को
बचाती ठोकर से कदम अशक्त को
प्राण प्रभु से मिल सके तब ही 'सलिल'
ज्योति में मन जब हुआ अनुरक्त हो
*
ज्योति मन में जले अंधा सूर हो
और मीरा के ह्रदय में नूर हो
ज्योति बिन सूरज, न सूरज सा लगे
चन्द्रमा का गर्व पल में चूर हो
*
ज्योति का आभार सब जग मानता
ज्योति बिन खुद को न कोेेई जानता
ज्योति नयनों में बसे तो जग दिखे
ज्योति-दीपक से अँधेरा हारता
*
षट्पदी
ज्योति में आकर पतंगा जल मरे
दोष क्या है ज्योति का?, वह क्यों डरे?
ज्योति को तूफां बुझा दे तो भी क्या?
आखिरी दम तक तिमिर को वह हरे
इसलिए जग ज्योति का वंदन करे
हुए ज्योतित आप जल, मानव खरे
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हाइकु
ज्योतिर्मयी है
मानव की चेतना
हो ऊर्ध्वमुखी
*
ज्योति है ऊष्म
सलिल है शीतल
मेल जीवन
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ज्योति जलती
पवन है बहता
जग दहता
*
ज्योति धरती
बाँटती उजियारा
तम पीकर
*
ज्योति जागती
जगत को सुलाती
आप जलकर
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मुक्तिका-
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सवाल तुमने किये सौ बिना रुके यारां
हमने चाहा मगर फिर भी जवाब हो न सके
*
हमें काँटों के बीच बागबां ने ठौर दिया
खिले हम भी मगर गुल-ए-गुलाब हो न सके
*
नसीब बख्श दे फुटपाथ की शहंशाही
किसी के दिल के कभी हम नवाब हो न सके
*
उठाये जाम जमाना मिला, है साकी भी
बहा पसीना 'सलिल' ही शराब हो न सके
*
जमीन पे पैर तो जमाये, कोशिशें भी करीं
मगर अफ़सोस 'सलिल' आफताब हो न सके
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एक रचना
हर कविता में कुछ अक्षर
रस बरसा जाते आकर
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कुछ किलकारी भरते हैं
खूब शरारत करते हैं
नन्हे-मुन्ने होकर भी
नहीं किसी से डरते हैं
पल-पल गिर-उठ, रो-हँसकर
बढ़ कर फुर से उड़ते हैं
गीत-ग़ज़ल जैसे सस्वर
हर कविता में कुछ अक्षर
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कुछ पहुना से संकोची
सिमटे-सिमटे रहते हैं
करते मन की बातें कम
औरों की सुन-सहते हैं
किससे नयन लड़े, किस्से
कहें न मन में दहते हैं
खोजें मिलने के अवसर
हर कविता में कुछ अक्षर
*
कुछ अवगुंठन में छिपकर
थाप लगा दरवाजे पर
हौले-हौले कदम उठा
कब्जा लेते सारा घर
गज़ब कि उन पर शैदा ही
होता घरवाला अक्सर
धूप-चाँदनी सम भास्वर
हर कविता में कुछ अक्षर
*
कुछ हारे-थककर सोये
अपने में रहते खोये
खाली हाथों में देखें
कहाँ गये सपने बोये?
होंठ हँसें तो भी लगता
मन ही मन में हैं रोये
चाहें उठें न अब सोकर
हर कविता में कुछ अक्षर
*
कुछ अक्षर खो जाते हैं
बनकर याद रुलाते हैं
ज्ञात न वापिस आएँगे
निकट उन्हें हम पाते हैं
सुधियों से संबल देते
सिर नत, कर जुड़ जाते हैं
हो जाते ज्यों परमेश्वर
हर कविता में कुछ अक्षर
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३-७-२०१६