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मंगलवार, 22 सितंबर 2020

गाँधी दोहा नवगीत

 दोहा सलिला:

गाँधी के इस देश में...
संजीव 'सलिल'
गाँधी के इस देश में, गाँधी की जयकार.
सत्ता पकड़े गोडसे, रोज कर रहा यार..
गाँधी के इस देश में, गाँधी की सरकार.
हाय गोडसे बन गया, है उसका सरदार..
गाँधी के इस देश में, गाँधी की है मौत.
सत्य अहिंसा सिसकती, हुआ स्वदेशी फौत..
गाँधी के इस देश में, हिंसा की जय बोल.
बाहुबली नेता बने, जन को धन से तोल..
गाँधी के इस देश में, गाँधी की दरकार.
सिर्फ डाकुओं को रही, शेष कहें बेकार..
गाँधी के इस देश में, हुआ तमाशा खूब.
गाँधीवादी पी सुरा, राग अलापें खूब..
गाँधी के इस देश में, डंडे का है जोर.
खेल रहे हैं डांडिया, विहँस पुलिसिए-चोर..
गाँधी के इस देश में, अंग्रेजी का दौर.
किसको है फुर्सत करे, हिन्दी पर कुछ गौर..
गाँधी के इस देश में, बोझ हुआ कानून.
न्यायालय में हो रहा, नित्य सत्य का खून..
गाँधी के इस देश में, धनी-दरिद्र समान.
उनकी फैशन ये विवश, देह हुई दूकान..
गाँधी के इस देश में, 'सलिल 'न कुछ भी ठीक.
दुनिया का बाज़ार है, देश तोड़कर लीक..
*
नवगीत:
*
गाँधी को मारा
आरोप
गाँधी को भूले
आक्रोश
भूल सुधारी
गर वंदन कर
गाँधी को छीना
प्रतिरोध
गाँधी नहीं बपौती
मानो
गाँधी सद्विचार
सच जानो
बाँधो मत सीमा में
गाँधी
गाँधी परिवर्तन की
आँधी
स्वार्थ साधते रहे
अबोध
गाँधी की मत
नकल उतारो
गाँधी को मत
पूज बिसारो
गाँधी बैठे मन
मंदिर में
तन से गाँधी को
मनुहारो
कर्म करो सत
है अनुरोध
******

सरस्वती-वंदना / कान्ता रॉय

 सरस्वती-वंदना / कान्ता रॉय

चंदन-वंदन, है अभिनंदन,
परमेश्वरी माँ शारदे!
हँसवाहिनी, ज्ञानदायिनी,
श्वेताम्बरी माँ तार दे।
विमल बुद्धि, सद्भाव आचरण,
ज्ञान रौशनी, करे तम-हरण
जग-जीवन का सार दे,
चंदन-वंदन है अभिनंदन, परमेश्वरी माँ शारदे!
मन-घट में भर दे उजियारा
दूर करो माँ, जग-अँधियारा
करुणेश्वरी उपहार दे,
चंदन-वंदन है अभिनंदन
परमेश्वरी माँ शारदे!
हो मम मति चरणों की दासी
छाई है चहुँ ओर उदासी
स्नेह-सरित की धार दे,
चंदन-वंदन है अभिनंदन, परमेश्वरी माँ शारदे!
मिटा शत्रुता, द्वेषभाव को,
सम्बल दे माँ! आस-लास को
विहँस सफलता हार दे,
चंदन-वंदन है अभिनंदन, परमेश्वरी माँ शारदे!
गर्म रेत-सा, जीवन-पथ है,
फँसा क्लेश में रचना-रथ है
'कांता' को हँस प्यार दे,
चंदन-वंदन है अभिनंदन, परमेश्वरी माँ शारदे!

शारद वंदना संजीव

 शारद वंदना

संजीव
*
मैया! आशा दीप जला रे….
*
हममें तुम हो, तुममें हम हों
अधर हँसें, नैन ना नम हों
पीर अधीर करे जब माता!
धीरज-संबल कभी न कम हों
आपद-विपदा, संकट में माँ!
दे विवेक जो हमें उबारे….
*
अहंकार तज सकें ज्ञान का
हो निशांत, उद्गम विहान का.
हम बेपर पर दिए तुम्हीं ने
साहस दो हँस नव विहान का
सत-शिव-सुंदर राह दिखाकर
सत-चित-आनंद दर्श दिखा रे ….
*
शब्द ब्रम्ह आराध्य हमारा
अक्षर, क्षर का बना सहारा.
चित्र गुप्त है जो अविनाशी
उसने हो साकार निहारा.
गुप्त चित्र तव अगम, गम्य हो
हो प्रतीत जो जन्म सँवारे ….
*

सरस्वती वंदना शकुंतला तरार

 सरस्वती वंदना 26.11.2003

आया मचो आय सरसती जुहार करेंसे
हात जोडुन बिनती करून सरन-सरन इलेंसे
(काय पांय पड़ेंसे) काय लेजा रे होय रे सुंदर
आया के पांय पड़ेंसे||
गियान दएदे बिधया दएदे आरू दएदे बुधी
लिखुन पढुन खुरची बसेंदे नी रहें कोना तुरची
काय लेजा रे होय दादा नी रहें कोना तुरची ||
मयं भकवा मचो बुद ने बादर ढापली से
अगमजानी आया हाते किताब धरली से
काय लेजा रे होय दादा किताब धरली से ||
आया मके बुधी देसे पढुक जायेंदे
घर चो जमाय बायले पीला के पढुक सिखायेंदे
काय लेजा रे होय दादा पढुक सिखायेंदे ||
नानी बीजा माटी मिसुन गाजा फुटेसे
खिन्डिक खिन्डिक बाढून पाछे रुख होए से
काय लेजा रे होय दादा रुख होये से||
मचो बुद नानी बीजा तुय अकराउन देसे
अकरून पाछे खांदा फुटेदे डारा-पाना हलायदे
काय लेजा रे होय दादा पाना –डारा हलायदे||
पंडरी-पंडरी हांसा ने ए बोडेंदा फूलने बसे
हाते धरून सितार बाजा सुन्दर गीद के रचे
काय लेजा रे होय दादा सुंदर गीद के रचे||

श्रीमती शकुंतला तरार (अखिल भारतीय कवयित्री, साहित्यकार एवं स्वतंत्र पत्रकार )
जन्म तिथि : 15-07-1956 शासकीय
जन्म स्थान : तहसील पारा, कोंडागांव, जिला कोंडागांव ''बस्तर''( छत्तीसगढ़)
माता का नाम : स्व.जमुना देवी देवांगन
पिता का नाम : स्व. रतनलाल देवांगन
पति : श्री टी. सी. तरार (शासकीय कर्मचारी)
शिक्षा : एम.ए- राजनीति शास्त्र , एल.एल.बी.,
बी म्यूज, एम.ए.- हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत,
डिप्लोमा -लोक संगीत, डिप्लोमा-पत्रकारिता, डिप्लोमा-उर्दू भाषा
प्रकाशित पुस्तकें- : बन कैना -छत्तीसगढ़ी गीत संग्रह, 2001
: बस्तर का क्रांतिवीर गुन्डाधुर- हिंदी छंद ,
: बस्तर की लोक कथाएं- (नवसाक्षर साहित्य),
: बेटियाँ छत्तीसगढ़ की- ( नवसाक्षर साहित्य), (2006)
: टेपारी -हाइकु संग्रह (हल्बी) (2009)
: चूरी- नाटक (छत्तीसगढ़ी), (2009)
: घरगुंदिया -कविता संग्रह, (छत्तीसगढ़ी), (2009)
: मेरा अपना बस्तर -कविता संग्रह (हिंदी) (2009)
: महारानी प्रफुल्ल्कुमारी देवी- (एस.सी.ई.आर.टी द्वारा प्रकाशित)
: बस्तर चो फुलबाड़ी -(हल्बी बाल साहित्य ), (2017)
: बस्तर चो सुंदर माटी -(हल्बी बाल साहित्य) (2017)
: राँडी माय लेका पोरटा -–हल्बी गीति कथा –साहित्य अकादमी दिल्ली से 2018 में प्रकाशित |
सम्मान- : प्रथम देवांगन महिला साहित्यकार,पत्रकार सम्मान छत्तीसगढ़ 2002 (तत्कालीन प्रदेश देवांगन समाज द्वारा शिक्षा मंत्री के कर कमलों से)
: प्रभावती सम्मान 2005, सुलभ साहित्य अकादमी (नई दिल्ली)
: वरिष्ठ कवयित्री सम्मान व्यंजना संस्था रायपुर 20 मार्च 2005 (तत्कालीन महामहिम राज्यपाल (छत्तीसगढ़) श्री के. एम. सेठ जी के कर कमलों से )
: सुभद्रा कुमारी चौहान रजत स्मृति सम्मान 25 जून 2006
हिंदी भाषा साहित्य परिषद् खगड़िया (बिहार)
: वैभव प्रकाशन सम्मान रायपुर 8 जून 2001
(तत्कालीन शिक्षा मंत्री के कर कमलों से |)
: त्रिवेणी परिषद् जबलपुर (म.प्र.) 17 फरवरी 2007 |
: अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस सम्मान 8 मार्च 2008 |
: हिंदी लेखिका संघ भोपाल (म.प्र.) 22 मार्च 2009 |
: गुरु घासीदास साहित्य एवं संस्कृति अकादमी सम्मान रायपुर 28 दिसंबर 2013
: अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस सम्मान-- जिला लोक शिक्षा समिति रायपुर (छ.ग.) 8 मार्च 2014 |
: राष्ट्रीय संगोष्ठी केन्द्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा - हिंदी और लोक भाषाएँ - पं. रविशंकर शुक्ल विश्व विद्यालय से 2016 |
: अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस साहित्य सम्मान 2018 |
: आनंद साहित्य उत्सव सम्मान 27 जनवरी 2018 |
: स्थानीय अनेकों सम्मान |
दायित्वों का निर्वहन-
: संपादक- त्रैमासिक पत्रिका "नारी का संबल" जुलाई 2001 से निरंतर 19 वें वर्ष में |
: सह संपादक- "बिहनिया" त्रैमासिक शोध पत्रिका, संस्कृति विभाग, छत्तीसगढ़ शासन, 2002 से निरंतर
: सदस्य- राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान, गवर्निंग काउंसिल 2012 |
: सदस्य -बोर्ड ऑफ़ मेनेजमेंट जनशिक्षण संस्थान रायपुर, (मानव विकास मंत्रालय से सम्बद्ध)
: सदस्य-कलाकार कल्याण समिति, संस्कृति विभाग, रायपुर (छ.ग.)
: सदस्य -(आजीवन)-छत्तीसगढ़ राष्ट्र भाषा प्रचार समिति, रायपुर(छ.ग.)
: सदस्य - वातावरण निर्माण समिति, जिला साक्षरता समिति रायपुर (छ.ग.)
पूर्व दायित्वों का निर्वहन-
: सदस्य -श्रम सलाहकार परिषद्, श्रम मंत्रालय,छ.ग. शासन |
: उपाध्यक्ष -जिला देवांगन समाज, रायपुर(छ.ग.)
: अध्यक्ष- जिला देवांगन समाज रायपुर (छ.ग.)
: अध्यक्ष -(महिला प्रकोष्ठ) छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति
कार्य अनुभव एवं उपलब्धियां –
: संपादक- "नारी का संबल" 2001 से निरंतर उन्नीसवें वर्ष में|
: सह संपादक- बिहनिया 2002 से निरंतर आज अठारह वर्षों से |
: पूर्व फीचर संपादक एवं सह संपादक- दैनिक समवेत शिखर |
: पूर्व सह संपादन- समाचार लोक |
: संपादन- स्मारिका— स्व. झाड़ूराम देवांगन ( पंडवानी गायक)
: निर्णायक- आदिम जाति,अनुसूचित जाति एवं पिछड़ा वर्ग विभाग द्वारा आयोजित लोक कला महोत्सव में 2001 से 2012 तक निरंतर
(जिला विभाजन तक)|
: निर्णायक- जवाहर नवोदय विद्यालय, माना, रायपुर, राज्य स्तरीय सांस्कृतिक कार्यक्रम में निर्णायक 2001से निरंतर |
: डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माण- "शिल्प कला" पर इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र नई दिल्ली एवं संस्कृति विभाग, छत्तीसगढ़ शासन के संयुक्त तत्वावधान में |
: संयोजक--संस्कृति विभाग, छत्तीसगढ़ शासन द्वारा आयोजित हस्तशिल्प मडई मेला प्रशिक्षण कार्यक्रम में कई वर्षों तक |
: छत्तीसगढ़ हाट दिल्ली---पर्यटन विभाग, रायपुर, छ.ग. द्वारा दिल्ली में आयोजित छत्तीसगढ़ हाट 2006 के शुभारम्भ अवसर पर छत्तीसगढ़ की व्यंजन, कला और संस्कृति से माननीया श्रीमती सुषमा स्वराज जी को परिचित कराने के दायित्व का निर्वहन |
: न्यूयार्क, अमेरिका यात्रा - आठवां विश्व हिंदी सम्मलेन 13-15 जुलाई 2007 में महिला प्रतिनिधित्व छत्तीसगढ़ से |
: मॉरीशस की यात्रा- विश्व हिंदी साहित्य सम्मलेन के तहत 12-18 सितम्बर 2010 में सृजन सम्मान द्वारा |
: प्रथम हरेली महोत्सव-- छ.ग. की कला, संस्कृति के संवर्धन संरक्षण हेतु 10 अगस्त 2010 को “नारी का संबल” के बैनर में |
: द्वितीय हरेली महोत्सव--छ.ग. की कला, संस्कृति के संवर्धन संरक्षण हेतु 30 जुलाई 2011 को “नारी का संबल” के बैनर में |
: सदस्य – कलाकार कल्याण परिषद् संस्कृति संचालनालय रायपुर (छ.ग.)
: सदस्य– महिला प्रताड़ना प्रकोष्ठ–जनसंपर्क संचालनालय रायपुर (छ.ग.)
: सदस्य –महिला प्रताड़ना प्रकोष्ठ –जिला जनसंपर्क कार्यालय रायपुर (छ.ग.)
: सदस्य –महिला प्रताड़ना प्रकोष्ठ – पाठ्य पुस्तक निगम रायपुर (छ.ग.)
: दूरदर्शन, आकाशवाणी, जी 24 घंटे, जी टीवी, ई.टीवी., दबंग चैनल मुंबई से कविताओं, वार्ताओं एवं कार्यक्रमों का प्रसारण |
: नक्सली क्षेत्र बस्तर में 35 वर्ष से अधिक समय तक रहकर लोगों के जीवन को देखने समझने और उस पर रचनात्मक सृजन कार्य का सुदीर्घ अनुभव है |
: छात्र जीवन से ही पिता के आशु कविताओं एवं माता-पिता दोनों के द्वारा गाए जाने वाले गीतों , लोक कथाओं, भजनों , आदि को सुनकर , भाई बहनों के प्रहसनों, अपने आसपास के आदिवासी परिवेश, आदिवासी संस्कृति के बीच पल बढ़कर उनके साथ गायन कर लिपिबद्ध करने की प्रेरणा. सर्वप्रथम आकाशवाणी जगदलपुर से हल्बी कविताओं का प्रसारण | सरिता, मुक्ता, नवभारत, दैनिक भास्कर, समवेत शिखर, अमृत सन्देश, देशबंधु, हरी भूमि, अग्रदूत, समाचार लोक, सुराज, स्वदेश, दैनिक प्रताप केसरी, दैनिक जन सन्देश, दैनिक राजस्थान किरण, दैनिक जगत क्रांति, नई दुनिया, हरि भूमि, छत्तीसगढ़ी सेवक (साप्ताहिक), समाज कल्याण (दिल्ली) आदि पत्र पत्रिकाओं में लेखों का प्रकाशन |
: आज तक सैकड़ों संगोष्ठियों में वक्ता और श्रोता के रूप में सहभागिता |
: अखिल भारतीय कवि सम्मेलनों में निरंतर काव्य पाठ |
: मंच संचालक –ग्रामीण स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक |
: हिंदी, छत्तीसगढ़ी एवं हल्बी की एकमात्र आंचलिक कवयित्री एवं हल्बी-भतरी की लोक गीत गायिका |
: रायपुर साहित्य महोत्सव 12-14 दिसंबर 2014 में सहभागिता ''बस्तर की बोलियाँ और साहित्य" विषय पर |
: केंद्रीय हिंदी निदेशालय, मानव संसाधन विकास मंत्रालय (उच्चतर शिक्षा विभाग) द्वारा औरंगाबाद महाराष्ट्र में आयोजित 10-17 जुलाई 2015 तक हिंदीतर भाषी नवलेखक शिविर में विशेष प्रशिक्षक ।
: साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा जगदलपुर छत्तीसगढ़ में 30-31 अक्टूबर 2015 को आयोजित हल्बी भाषा संगोष्ठी में कवयित्री के रूप में सहभागिता |
: त्रैमासिक पत्रिका “नारी का संबल” के बैनर में अनेकों कार्यक्रमों के सफल संचालन का अनुभव |
: साहित्य अकादमी दिल्ली की जूरी मेंबर 28 नवंबर 2016 |
: साहित्य अकादमी दिल्ली की जूरी मेंबर 28 नवंबर 2016 |
(श्रीमती शकुंतला तरार)
एकता नगर सेक्टर -2 ,प्लॉट न.-32,
गुढ़ियारी, रायपुर (छ.ग.)
मोबाईल: 09425525681, 7999982106
Email-shakuntalatarar7@gmail.com

हास्य कविता

 हास्य रचना:

सीता-राम
*
लालू से
कालू मिला,
खुश हो किया सलाम।
बोला-
"जोड़ी जँच रही
जैसे सीता-राम।
लालू बोला-
सच?
न क्यों, रावण हरता बोल?
समा न लेती भू कहो,
क्यों लाकर भूडोल??
***

गीत

 एक रचना

*
अनसुनी रही अब तक पुकार
मन-प्राण रहे जिसको गुहार
वह आकर भी क्यों आ न सका?
जो नहीं सका पल भर बिसार
*
वह बाहर हो तब तो आए
मनबसिया भरमा पछताए
जो खुद परवश ही रहता है
वह कैसे निज सुर में गाए?
*
जब झुका दृष्टि मन में देखा
तब उसको नयनों ने लेखा
जग समझ रहा हम रोये हैं
सुधियाँ फैलीं कज्जल-रेखा
*
बिन बोले वह क्या बोल गया
प्राणों में मिसरी घोल गया
मैं रही रोकती लेकिन मन
पल भर न रुका झट डोल गया
*
जिसको जो कहना है कह ले
खुश हो यो गुपचुप छिप दह ले
बासंती पवन झकोरा आ
मेरी सुधियाँ गह ले, तह ले
*
कर वाह न भरना अरे! आह
मन की ले पाया कौन थाह?
जो गले मिले, भुज पाश बाँध
उनके उर में ही पली डाह
*
जो बने भक्त गह चरण कभी
कर रहे भस्म दे शाप अभी
वाणी में नहीं प्रभाव बचा
सर पीट रहे निज हाथ तभी
*
मन मीरा सा, तन राधा सा,
किसने किसको कब साधा सा?
कह कौन सकेगा करुण कथा
किसने किसको आराधा सा
*
मिट गया द्वैत, अंतर न रहा
अंतर में जो मंतर न रहा
नयनों ने पुनि मन को रोका
मत बोल की प्रत्यंतर न रहा
*

मुकतक

 मुक्तक

पता है लापता जिसका उसे सब खोजते हैं क्यों?
खिली कलियाँ सवेरे बाग़ में जा नोचते हैं क्यों?
चढ़ें मन्दिर में जाती सूख, खुश हो देवता कैसे?
कहो तो हाथ को अपने नहीं तुम रोकते हो क्यों?
*
खुद जलकर भी सदा उजाला ज्योति जगत को देती है
जीत निराशा तरणि नित्य नव आशा की वह खेती है
रश्मि बिम्ब से सलिल-लहर भी ज्योतिमयी हो जाती है
निबिड़ तिमिर में हँस ऊषा का बीज वपन कर आती है
*
हम चाहें तो सरकारों के किरदारों को झुकना होगा
हम चाहें तो आतंकों को पीठ दिखाकर मुडना होगा
कहे कारगिल हार न हिम्मत, टकरा जाना तूफानों से-
गोरखनाथ पुकार रहे हैं,अब दुश्मन को डरना होगा
*
मजा आता न गर तो कल्पना करता नहीं कोई
मजा आता न गर तो जगत में जीता नहीं कोई
मजे में कट गयी जो शुक्रिया उसका करों यारों-
मजा आता नहीं तो मौन हो मरता नहीं कोई
*
करो मत द्वंद, काटो फंद, रचकर छंद पल-पल में
न जो मति मंद, ले आनंद, सुनकर छंद पल-पल में
रसिक मन डूबकर रस में, बजाता बाँसुरी जब-जब
बने तन राधिका, सँग श्वास गोपी नाचें पल-पल में
*

गीत बातें हों अब खरी-खरी

 एक गीत

बातें हों अब खरी-खरी
*
मुँह देखी हो चुकी बहुत
अब बातें हों कुछ खरी-खरी
जो न बात से बात मानता
लातें तबियत करें हरी
*
पाक करे नापाक हरकतें
बार-बार मत चेताओ
दहशतगर्दों को घर में घुस
मार-मार अब दफनाओ
लंका से आतंक मिटाया
राघव ने यह याद रहे
काश्मीर को बचा-मिलाया
भारत में, इतिहास कहे
बांगला देश बनाया हमने
मत भूले रावलपिडी
कीलर-सेखों की बहादुरी
देख सरहदें थीं सिहरी
मुँह देखी हो चुकी बहुत
अब बातें हों कुछ खरी-खरी
*
करगिल से पिटकर भागे थे
भूल गए क्या लतखोरों?
सेंध लगा छिपकर घुसते हो
क्यों न लजाते हो चोरों?
पाले साँप, डँस रहे तुझको
आजा शरण बचा लेंगे
ज़हर उतार अजदहे से भी
तेरी कसम बचा लेंगे
है भारत का अंग एक तू
दुहराएगा फिर इतिहास
फिर बलूच-पख्तून बिरादर
के होंठों पर होगा हास
'जिए सिंध' के नारे खोदें
कब्र दुश्मनी की गहरी
मुँह देखी हो चुकी बहुत
अब बातें हों कुछ खरी-खरी
*
२१-९-२०१६

विमर्श: श्रम और बुद्धि

 विमर्श: श्रम और बुद्धि

ब्राम्हणों ने अपनी श्रेष्ठता स्थापित करने के लिये ग्रंथों में अनेक निराधार, अवैज्ञानिक, समाज के लिए हानिप्रद और सनातन धर्म के प्रतिकूल बातें लिखकर सबका कितना अहित किया? तो पढ़िए व्यास स्मृति विविध जातियों के बारे में क्या कहती है?
जानिए और बताइये क्या हमें व्यास का सम्मान कारण चाहिए???
व्यास स्मृति, अध्याय १
वर्द्धकी नापितो गोपः आशापः कुम्भकारकः
वीवक किरात कायस्थ मालाकर कुटिम्बिनः
एते चान्ये च वहवः शूद्रा भिन्नः स्वकर्मभिः -१०
चर्मकारः भटो भिल्लो रजकः पुष्ठकारो नट:
वरटो भेद चाण्डाल दासं स्वपच कोलकाः -११
एते अन्त्यज समाख्याता ये चान्ये च गवारान:
आशाम सम्भाषणाद स्नानं दशनादरक वीक्षणम् -१२
अर्थ: बढ़ई, नाई, अहीर, आशाप, कुम्हार, वीवक, किरात, कायस्थ, मालाकार कुटुम्बी हैं। ये भिन्न-भिन्न कर्मों के कारण शूद्र हैं. चमार, भाट, भील, धोबी, पुस्तक बांधनेवाले, नट, वरट, चाण्डालों, दास, कोल आदि माँसभक्षियों अन्त्यज (अछूत) हैं. इनसे बात करने के बाद स्नान तथा देख लेने पर सूर्य दर्शन करना चाहिए।
उल्लेख्य है कि मूलतः ब्राम्हण और कायस्थ दोनों की उत्पत्ति एक ही मूल ब्रम्ह या परब्रम्ह से है। दोनों बुद्धिजीवी रहे हैं. बुद्धि का प्रयोग कर समाज को व्यवस्थित और शासित करनेवाले अर्थात राज-काज को मानव की उन्नति का माध्यम माननेवाले कायस्थ (कार्यः स्थितः सह कायस्थः) तथा बुद्धि के विकास और ज्ञान-दान को मानवोन्नति का मूल माननेवाले ब्राम्हण (ब्रम्हं जानाति सः ब्राम्हणाः) हुए।
ये दोनों पथ एक-दूसरे के पूरक हैं किन्तु अपनी श्रेष्ठता स्थापित करने के लिए ब्राम्हणों ने वैसे ही निराधार प्रावधान किये जैसे आजकल खाप के फैसले और फतवे कर रहे हैं. उक्त उद्धरण में व्यास ने ब्राम्हणों के समकक्ष कायस्थों को श्रमजीवी वर्ग के समतुल्य बताया और श्रमजीवी कर्ज को हीन कह दिया। फलतः, समाज विघटित हुआ। बल और बुद्धि दोनों में श्रेष्ठ कायस्थों का पराभव केवल भुज बल को प्रमुख माननेवाले क्षत्रियों के प्रभुत्व का कारण बना। श्रमजीवी वर्ग ने अपमानित होकर साथ न दिया तो विदेशी हमलावर जीते, देश गुलाम हुआ।
इस विमर्श का आशय यह कि अतीत से सबक लें। समाज के उन्नयन में हर वर्ग का महत्त्व समझें, श्रम को सम्मान देना सीखें। धर्म-कर्म पर केवल जन्मना ब्राम्हणों का वर्चस्व न हो। होटल में ५० रु. टिप देनेवाला रिक्शेवाले से ५-१० रु. का मोल-भाव न करे, श्रमजीवी को इतना पारिश्रमिक मिले कि वह सम्मान से परिवार पाल सके। पूंजी पे लाभ की दर से श्रम का मोल अधिक हो। आपके अभिमत की प्रतीक्षा है।