कुल पेज दृश्य

क्षणिका लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
क्षणिका लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 13 सितंबर 2026

सितंबर १३, सुंदरी सवैया, ग़ज़ल, दोहा, अधर, क्षणिका, मुक्तक,

सलिल सृजन सितंबर १३
*
सुंदरी सवैया
प्रियदर्शिनि के प्रिय दर्शन पा गति-यति-लय-रस नव धार बहेगी।
कर काव्य कामिनी का थामा, वामा गुण गा तब जान बचेगी।।
विधि-हरि-हर त्रय है मुश्किल में, नारद जिह्वा क्या कथा कहेगी।
रस हरष बरस जस कथा कहे या अपजस सुन निज दृष्टि झुकेगी।।
१३-९-२०२३
***
गीत सम्राट राकेश खंडेलवाल की दौहित्री आहना के स्वागत में-
गीत
*
एक नन्हीं परी का धरा अवतरण
पर्व उल्लास का ऐ परिंदो! उड़ो
कलरवों से गुँजा दो दिशाएँ सभी
लक्ष्य पाए बिना तुम न पीछे मुड़ो
ऐ सलिल धार कलकल सुनाओ मधुर
हो लहर का लहर से मिलन रात-दिन
झूम गाओ पवन गीत सोहर अथक
पर्ण दो ताल, कलियाँ नचें ताक धिन
ऐ घटाओं गगन से उतर आओ री!
छाँह पल-पल करो, वृष्टि कर स्नेह की
रश्मि ऊषा लिए भाल पर कर तिलक
दुपहरी से कहे आज जी जिंदगी
साँझ हो पुरनमी, हो नशीली निशा
आहना के कोपलों का चुंबन करे
आह ना एक भी भाग्य में हो लिखी
कहकहों की कहकशा निछावर करे
चाँदनी कज्जरी दे डिठौना लगा
धूप नजरें उतारे विहँस रूप की
नाच राकेश रवि को लिए साथ में
ईश को शत नमन पूर्ण आकांक्षा की
देख मुखड़ा नया नित्य मुखड़ा बने
अंतरा अंतरा गीत सलिला बहे
आहना मुस्कुरा नव ऋचाएँ रचे
खिलखिला मन हरे, नव कहानी कहे
१३.९.२०२१
***
हिंदी ग़ज़ल (मुक्तिका)
*
परदेशी भाषा रुचे, जिनको वे जन सूर.
जनवाणी पर छा रहा, कैसा अद्भुत नूर
*
जन आकांक्षा गीत है, जनगण-हित संतूर
अंग्रेजी-प्रेमी कुढ़ें, देख रहे हैं घूर
*
हिंदी जग-भाषा बने, विधि को है मंजूर
उन्नत पिंगल व्याकरण, छंद निहित भरपूर
*
अंग्रेजी-उर्दू नशा, करते मिले हुजूर
हिंदी-रोटी खा रहे, सत्य नहीं मंजूर
*
हिंदी-प्रेमी हो रहे, 'सलिल' हर्ष से चूर
कल्प वृक्ष पिंगल रहे, नित्य कलम ले झूर
*
छंद - दोहा
१३-९-२०१९
***
दोहा लेखन विधान
१. दोहा के सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व हैं कथ्य व लय। कथ्य को सर्वोत्तम रूप में प्रस्तुत करने के लिए ही विधा (गद्य-पद्य, छंद आदि) का चयन किया जाता है। कथ्य को 'लय' में प्रस्तुत किया जाने पर 'लय' के अनुसार छंद-निर्धारण होता है। छंद-लेखन हेतु विधान से सहायता मिलती है। रस, अलंकार, बिंब, प्रतीक, मिथक आदि लालित्यवर्धन हेतु है। कथ्य, लय व विधान से न्याय जरूरी है।
२. दोहा द्विपदिक छंद है। दोहा में दो पंक्तियाँ (पद) होती हैं। हर पद में दो चरण होते हैं।
३. दोहा मुक्तक छंद है। कथ्य (जो बात कहना चाहें वह) एक दोहे में पूर्ण हो जाना चाहिए। सामान्यत: प्रथम चरण में कथ्य का उद्भव, द्वितीय-तृतीय चरण में विस्तार तथा चतुर्थ चरण में उत्कर्ष या समाहार होता है।
४. विषम (पहला, तीसरा) चरण में १३-१३ तथा सम (दूसरा, चौथा) चरण में ११-११ मात्राएँ होती हैं।
५. तेरह मात्रिक पहले तथा तीसरे चरण के आरंभ में एक शब्द में जगण (लघु गुरु लघु) वर्जित होता है। पदारंभ में 'इसीलिए' वर्जित, 'इसी लिए' मान्य।
६. विषम चरणांत में 'सरन' तथा सम चरणांत में 'जात' से लय साधना सरल होता है है किंतु अन्य गण-संयोग वर्जित नहीं हैं।
७. विषम कला से आरंभ दोहे के विषम चरण मेंकल-बाँट ३ ३ २ ३ २ तथा सम कला से आरंभ दोहे के विषम चरण में में कल बाँट ४ ४ ३ २ तथा सम चरणों की कल-बाँट ४ ४.३ या ३३ ३ २ ३ होने पर लय सहजता से सध सकती है। अन्य कल बाँट वर्जित नहीं है।
८. हिंदी दोहाकार हिंदी के व्याकरण तथा मात्रा गणना नियमों का पालन करें। दोहा में वर्णिक छंद की तरह लघु को गुरु या गुरु को लघु पढ़ने की छूट नहीं होती।
९. आधुनिक हिंदी / खड़ी बोली में खाय, मुस्काय, आत, भात, आब, जाब, डारि, मुस्कानि, हओ, भओ जैसे देशज / आंचलिक क्रिया-रूपों का उपयोग न करें किन्तु अन्य उपयुक्त आंचलिक शब्दों का प्रयोग किया जा सकता है। बोलियों में दोहा रचना करते समय उस बोली का यथासंभव शुद्ध-सरल रूप व्यवहार में लाएँ।
१०. श्रेष्ठ दोहे में अर्थवत्ता, लाक्षणिकता, संक्षिप्तता, मार्मिकता (मर्मबेधकता), आलंकारिकता, स्पष्टता, पूर्णता, सरलता व सरसता हो।
११. दोहे में संयोजक शब्दों और, तथा, एवं आदि का प्रयोग यथासंभव न करें। औ', ना, इक वर्जित, अरु, न, एक सही।
१२. दोहे में यथासंभव अनावश्यक शब्द का प्रयोग न हो। शब्द-चयन ऐसा हो जिसके निकालने या बदलने पर दोहा अधूरा सा लगे।
१३. दोहा में विराम चिन्हों का प्रयोग यथास्थान अवश्य करें।
१४. दोहे में कारक (ने, को, से, के लिए, का, के, की, में, पर आदि) का प्रयोग कम से कम हो।
१५. दोहा सम तुकांती छंद है। सम चरण के अंत में सामान्यत: वार्णिक समान तुक आवश्यक है। संगीत की बंदिशों, श्लोकों आदि में मात्रिक समान्त्तता भी राखी जाती रही है।
१६. दोहा में लय का महत्वपूर्ण स्थान है। लय के बिना दोहा नहीं कहा जा सकता। लयभिन्नता स्वीकार्य है लयभंगता नहीं।
*
मात्रा गणना नियम:
१. किसी ध्वनि-खंड को बोलने में लगनेवाले समय के आधार पर मात्रा गिनी जाती है।
२. कम समय में बोले जानेवाले वर्ण या अक्षर की एक तथा अधिक समय में बोले जानेवाले वर्ण या अक्षर की दो मात्राएँ गिनी जाती हैंं। तीन मात्रा के शब्द ॐ, ग्वं आदि संस्कृत में हैं, हिंदी में नहीं।
३. अ, इ, उ, ऋ तथा इन मात्राओं से युक्त वर्ण की एक मात्रा गिनें। उदाहरण- अब = ११ = २, इस = ११ = २, उधर = १११ = ३, ऋषि = ११= २, उऋण १११ = ३ आदि।
४. शेष वर्णों की दो-दो मात्रा गिनें। जैसे- आम = २१ = ३, काकी = २२ = ४, फूले २२ = ४, कैकेई = २२२ = ६, कोकिला २१२ = ५, और २१ = ३आदि।
५. शब्द के आरंभ में आधा या संयुक्त अक्षर हो तो उसका कोई प्रभाव नहीं होगा। जैसे गृह = ११ = २, प्रिया = १२ =३ आदि।
६. शब्द के मध्य में आधा अक्षर हो तो उसे पहले के अक्षर के साथ गिनें। जैसे- क्षमा १+२, वक्ष २+१, विप्र २+१, उक्त २+१, प्रयुक्त = १२१ = ४ आदि।
७. रेफ को आधे अक्षर की तरह गिनें। बर्रैया २+२+२आदि।
८. अपवाद स्वरूप कुछ शब्दों के मध्य में आनेवाला आधा अक्षर बादवाले अक्षर के साथ गिना जाता है। जैसे- कन्हैया = क+न्है+या = १२२ = ५आदि।
९. अनुस्वर (आधे म या आधे न के उच्चारण वाले शब्द) के पहले लघु वर्ण हो तो गुरु हो जाता है, पहले गुरु होता तो कोई अंतर नहीं होता। यथा- अंश = अन्श = अं+श = २१ = ३. कुंभ = कुम्भ = २१ = ३, झंडा = झन्डा = झण्डा = २२ = ४आदि।
१०. अनुनासिक (चंद्र बिंदी) से मात्रा में कोई अंतर नहीं होता। धँस = ११ = २आदि। हँस = ११ =२, हंस = २१ = ३ आदि।
मात्रा गणना करते समय शब्द का उच्चारण करने से लघु-गुरु निर्धारण में सुविधा होती है। इस सारस्वत अनुष्ठान में आपका स्वागत है। कोई शंका होने पर संपर्क करें।
१३-९-२०१७
***
समस्या पूर्ति
किसी अधर पर नहीं
*
किसी अधर पर नहीं शिवा -शिव की महिमा है
हरिश्चन्द्र की शेष न किंचित भी गरिमा है
विश्वनाथ सुनते अजान नित मन को मारे
सीढ़ी , सांड़, रांड़ काशी में, नहीं क्षमा है
*
किसी अधर पर नहीं शेष है राम नाम अब
राजनीति हैं खूब, नहीं मन में प्रणाम अब
अवध सत्य का वध कर सीता को भेजे वन
जान न पाया नेताजी को, हैं अनाम अब
*
किसी अधर पर नहीं मिले मुस्कान सुहानी
किसी डगर पर नहीं किशन या राधा रानी
नन्द-यशोदा, विदुर-सुदामा कहीं न मिलते
कंस हर जगह मुश्किल उनसे जान बचानी
*
किसी अधर पर नहीं प्रशंसा शेष की
इसकी, उसकी निंदा ही हो रही न किसकी
दलदल मचा रहे हैं दल, संसद में जब-तब
हुआ उपेक्षित सुनता कोई न सिसकी
*
किसी अधर पर नहीं सोहती हिंदी भाषा
गलत बोलते अंग्रेजी, खुद बने तमाशा
माँ को भूले। पैर पत्नी के दबा रहे हैं
जिनके सर पर है उधार उनसे क्या आशा?
*
किसी अधर पर नहीं परिश्रम-प्रति लगाव है
आसमान पर मँहगाई सँग चढ़े भाव हैं
टैक्स बढ़ा सरकारें लूट रहीं जनता को
दुष्कर होता जाता अब करना निभाव है
*
किसी अधर पर नहीं शेष अब जन-गण-मन है
स्त्री हो या पुरुष रह गया केवल तन है
माध्यम जन को कठिन हुआ है जीना-मरना
नेता-अभिनेता-अफसर का हुआ वतन है
*
क्षणिका
*
इसने दी
ईद की बधाई।
भाग, जिबह कर देगा
बकरे की आवाज़ आई।
***
मैं
न खुद को जान पाया
आज तक।
अजाना भी हूँ नहीं
मैं
सत्य कहता।
***
मुक्तक
*
काश! कभी हम भी सुधीर हो पाते
संघर्षों में जीवन-जय गुंजाते
गगन नापते, बूझ दिशा अनबूझी
लौट नीड पर ग़ज़लें-नगमे गाते
*
माँ मरती ही नही, जिया करती है संतानों में
श्वास-आस अपने -सपने कब उसे भूल पाते हैं
हो विदेह वह साथ सदा, संकट में संबल देती-
धन्य वही सुत जो मैया के गुण आजीवन गाते
*
सुर जीत रहे तो अ-सुर हार कर खुद बाहर हो जायेंगे
गीत-गुहा में स-सुर साधना कर नवगीत सुनाएँगे
हर दिन होता जन्म दिवस है, नींद मरण जो मान रहे
वे सूरज सँग जाग, करें श्रम, अपनी मन्ज़िल पाएँगे
*
सुर जीत रहे तो अ-सुर हार कर खुद बाहर हो जायेंगे
गीत-गुहा में स-सुर साधना कर नवगीत सुनाएँगे
हर दिन होता जन्म दिवस है, नींद मरण जो मान रहे
वे सूरज सँग जाग, करें श्रम, अपनी मन्ज़िल पाएँगे
***
कुण्डलिया
निर्झर -
नदी न एक से, बिलकुल भिन्न स्वभाव
इसमें चंचलता अधिक, उसमें है ठहराव
उसमें है ठहराव, तभी पूजी जाती है
चंचलता जीवन में, नए रंग लाती है
कहे 'सलिल' बहते चल,हो न किसी पर निर्भर
रुके न कविता-क्रम, नदिया हो या हो निर्झर
*
परमपिता ने जो रचा, कहें नहीं बेकार
ज़र्रे-ज़र्रे में हुआ, ईश्वर ही साकार
ईश्वर ही साकार, मूलतः: निराकार है
व्यक्त हुआ अव्यक्त, दैव ही गुणागार है
आता है हर जीव, जगत में समय बिताने
जाता अपने आप, कहा जब परमपिता ने
१३-९-२०१६
***
भावांजलि-
मनोवेदना:
ओ ऊपरवाले! नीचे आ
क्या-क्यों करता है तनिक बता?
असमय ले जाता उम्मीदें
क्यों करता है अक्षम्य खता?
कितने ही सपने टूट गये
तुम माली बगिया लूट गये.
क्यों करूँ तुम्हारा आराधन
जब नव आशा घट फूट गये?
मुस्कान मृदुल, मीठी बोली
रससिक्त हृदय की थी खोली
कर ट्रस्ट बनाया ट्रस्ट मगर
संत्रस्त किया, खाली ओली.
मैं जाऊँ कहाँ? निष्ठुर! बोलो,
तज धरा न अंबर में डोलो.
क्या छिपा तुम्हारी करनी में
कुछ तो रहस्य हम पर खोलो.
उल्लास-आसमय युवा रक्त
हिंदी का सुत, नवगीत-भक्त
खो गया कहाँ?, कैसे पायें
वापिस?, क्यों इतने हम अशक्त?
ऐ निर्मम! ह्रदय नहीं काँपा?
क्यों शोक नहीं तुमने भाँपा.
हम सब रोयेंगे सिसक-सिसक
दस दिश में व्यापेगा स्यापा.
संपूर्ण क्रांति का सेनानी,
वह जनगणमन का अभिमानी.
माटी का बेटा पतझड़ बिन
झड़ गया मौन ही बलिदानी.
कितने निर्दय हो जगत्पिता?
क्या पाते हो तुम हमें सता?
असमय अवसान हुआ है क्यों?
क्यों सके नहीं तुम हमें जता?
क्यों कर्क रोग दे बुला लिया?
नव आशा दीपक बुझा दिया.
चीत्कार कर रहे मन लेकिन
गीतों ने बेबस अधर सिया.
बोले थे: 'आनेवाले हो',
कब जाना, जानेवाले हो?
मन कलप रहा तुमको खोकर
यादों में रहनेवाले हो.
श्रीकांत! हुआ श्रीहीन गीत
तुम बिन व्याकुल हम हुए मीत.
जीवन तो जीना ही होगा-
पर रह न सकेंगे हम अभीत।
***
(जे. पी. की संपूर्ण क्रांति के एक सिपाही, नवगीतकार भाई श्रीकांत का कर्क रोग से असमय निधन हो गया. लगभग एक वर्ष से उनकी चिकित्सा चल रही थी. हिन्द युग्म पर २००९ में हिंदी छंद लेखन सम्बन्धी कक्षाओं में उनसे परिचय हुआ था. गत वर्ष नवगीत उत्सव लखनऊ में उच्च ज्वर तथा कंठ पीड़ा के बावजूद में समर्पित भावना से अतिथियों को अपने वाहन से लाने-छोड़ने का कार्य करते रहे. न वरिष्ठता का भान, न कष्ट का बखान। मेरे बहुत जोर देने पर कुछ औषधि ली और फिर काम पर. तुरंत बाद वे स्थांनांतरित होकर बड़ोदरा गये , जहाँ जांच होने पर कर्क रोग की पुष्टि हुई. टाटा मेमोरियल अस्पताल मुम्बई में चिकित्सा पश्चात निर्धारित थिरैपी पूर्ण होने के पूर्व ही वे बीड़ा हो गये. इस स्थिति में भी उन्होंने अपनी जमीन और धन का दान कर हिंदी के उन्नयन हेतु एक न्यास (ट्रस्ट) की स्थापना की. स्वस्थ होकर वे हिंदी के लिये समर्पित होकर कार्य करना चाहते थे किन्तु???)
***
विमर्श:
मेरे विचार में दो पैमाने हैं... जिन पर रचनाकार को खुद को परखना चाहिए। पहला क्या वह खराब लिख रहा है और ईमानदार प्रयास करने पर भी सुधार नहीं हो रहा है? यदि ऐसा है तो कोई कितनी भी तारीफ करे, उसकी प्रतिभा किसी अन्य क्षेत्र के लिए है उसे वह क्षेत्र तलाशना चाहिए।
दूसरा यदि वह खराब नहीं लिख रहा है और लेखन में निखार आ रहा है तो कितनी भी आलोचना करे उसे लिखते रहना चाहिए।

१३-९-२०१५

शनिवार, 13 जून 2026

जून १३, गीता, दोहा, नवगीत, क्षणिका, रवींद्र, त्रिपदियाँ, ग़ज़लिका

 सलिल सृजन जून १३

*
त्रिपदियाँ
०
ताश का खेल
आदमी की ज़िंदगी
हुई ट्रंप के हाथ में।
०
महाबली सिर झुकाकर
माँ देश का घटाते
मँहगा तेल खरीदकर।
०
सव लाख से एक भी
लड़ जीते इस देश में
सौ को जीते एक ही।
०
पूँजी पूँजी की सगी
सत्य सनातन है यही
मोह मुक्त हो देश यह।
०
अंध भक्त भगवान को
पा न सके हैं कभी भी
चेतन से चेतन मिले।
०
बड़ी मूर्ति से प्रभु कभी
बड़े न होते सच सुनो
कंकर में शंकर बसे।
०
साई करें प्रचार कब?
फिक्र कैमरे की नहीं
रहते खुद में लीन वे।
०
कहें चीखकर बात जो
सत्य नहीं वे बोलते
पत्रकार यह जान लें।
०
सत्य न सत्ता-मुखी है
वह जनता के साथ है
जड़ जमीन में हैं गड़ी।
०
बैठो आँखें मूँदकर
करने प्रभु का ध्यान गर
रखो कैमरे दूर तब।
०
प्रभु प्रचार चाहें नहीं
वे रहते अज्ञात ही
दीन-हीन के स्वजन बन।
०००
ग़ज़लिका ० मिटाकर सद्भाव पाई है फ़तह मिले सत्ता, सत भले कर दें ज़िबह . फूँककर घर तापते हँस हाथ हम और कहते हुई 'मावस में सुबह . मिला हाँ में हाँ रहे जो वे सही गर असहमत सजा की है यह वज़ह . जो न मन की बात सुनते-मानते नहीं उनके वास्ते कोई जगह . 'सलिल' की मानिंद बहना सीख लो कभी लहरों में नहीं पड़ती गिरह १३.६.२०२६ ०००
गीता अध्याय ६ ध्यान (आत्मसंयम) योग
यथारूप हिंदी रूपांतरण- आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
प्रभु बोले- "आश्रित न कर्मफल पर, जो सतत कर्म करता।
वह सन्यासी योगी, वह नहिं जो पावक व क्रिया तजता।।१।।
*
जो सन्यास कहा जाता वह, है परब्रह्म युक्त होना।
पांडव बिन संकल्प तजे ही, योगी कोई नहिं होता।।२।।
*
नव आरंभ किया जिसने मुनि, योग कर्म-कारण पाता।
योग-सिद्ध के लिए कर्म को, तजना कारण कहलाता।।३।।
*
जब भी इन्द्रिय तृप्ति-हित नहीं, कर्म निरत वह रहता है।
सब संकल्पों को तज योगी, योग-सिद्ध तब होता है।।४।।
*
कर उद्धार आप ही अपना, खुद का पतन न होने दे।
खुद निश्चय खुद का शुभचिंतक, खुद ही खुद का शत्रु रहे।।५।।
*
बांधव आत्मा हो आत्मा की, यदि आत्मा को जीत सके।
हैं न आत्म तो शत्रु बने वह, कार्य करे दुश्मनवत ही।।६।।
*
आत्म जीत जो शांत रह सके, परमेश्वर पाया उसने।
सर्दी-गर्मी हो, सुख-दुख हो, मान-अपमान समान उसे।।७।।
*
तृप्त ज्ञान-विजान से हुई, आत्मा अचल जितेन्द्रिय हो।
युक्त वही समदर्शी योगी, पत्थर-स्वर्ण समान जिसे।।८।।
*
सुहृद मित्र अरि तटस्थ जन या, द्वेषी पंच बंधुओं को।
साधुपुरुष या पापी प्रति भी, रख समभाव श्रेष्ठजन वो।।९।।
*
योगी दिव्य चेतना में ही, केंद्रित सतत स्वयं होता।
एकाकी मन में सचेत रह, अनाकृष्ट परिग्रह खेता।।१०।।
*
शुद्ध भूमि पर करे प्रतिष्ठित, अपना आसन अचल रखे।
अधिक न ऊँचा-नीचा उस पर, कुश मृगछाला वसन बिछे।।११।।
*
उस पर एकचित्त चित करके, मन-इंद्रिय-क्रिय कर वश में।
बैठ सतत अभ्यास योग का, आत्मशुद्धि के लिए करे।।१२।।
*
सीधा तन सिर गर्दन रखकर, अचल शांत मन बैठ रहे।
देख नासिका-अग्रभाग निज, और कहीं भी में देखे।।१३।।
*
शांत आत्म जो गत भय बिन हो, ब्रह्मचर्य व्रत को पाले।
मन संयम से मुझ में केंद्रित, कर योगी मुझमें पैठे।।१४।।
*
कर अभ्यास इस तरह नित प्रति, योगात्मा संयमयुत हो।
शांत चित्त, भवसागर तज, मम धाम प्राप्त कर लेता है।।१५।।
*
कभी नहीं अतिभोजी योगी, नहिं एकांत-अभोजी ही।
नहिं अति सोने-जगने वाला, हो सकता है हे अर्जुन!।।१६।।
*
नियमित भोजन-मन-रंजन कर, नियमित जीवन-कर्म करे।
नियमित शयन-जागरण करता, योगी निज दुख दूर करे।।१७।।
*
जब अनुशासित चित्त आत्म में, निश्चय ही रम जाता है।
तब निस्पृह ऐन्द्रिक चाहों से हो, योगी कहलाता है।।१८।।
*
जैसे दीपक वायु के बिना, नहीं काँपता उपमा है।
योगी की जिसका मन वश में, सतत ध्यान में लीन रहे।।१९।।
*
जिस सुख से हो चित्त रुद्ध वह, अनुभव सदा योग से हो।
जिसमें आत्मा विशुद्ध मन से, अपने में संतुष्ट रहे।।२०।।
*
सुख आत्यंतिक बुद्धि गहे जो, दिव्य अतींद्रिय वह जानो।
जिसमें कभी नहीं निश्चय ही, वह हटती है सत्पथ से।।२१।।
*
जिसे प्राप्त कर अन्य लाभ को, माने अधिक नहीं उससे।
जिसमें रहते हुए न किंचित, अति दुख से विचलित होता।।२२।।
*
उसको जानो सांसारिक दुख, नाशक योग कहाता है।
दृढ़ विश्वास सहित अभ्यासे योग, न विचलित कभी रहे।।२३।।
*
संकल्पजनित भौतिक इच्छा, तजकर पूरी तरह सभी।
मन से निज इन्द्रियसमूह को, वश में कर ही ले पूरी।।२४।।
*
धीरे-धीरे निवृत्त बुद्धि से, हो विश्वासपूर्वक ही।
समाधि में मन लीन रखे नित, नहीं अन्य कुछ भी सोचे।।२५।।
*
जहाँ-जहाँ भी विचलित होता मन चंचल अस्थिर, टोंकें।
वहाँ वहाँ पर करें नियंत्रण, अपने वश में ले रोकें।।२६।।
*
है प्रशांत मन जिसका वह ही योगी, सच्चा सुख पाए।
शांत रजोगुण हो, ईश्वर से पापमुक्त हो मिल पाए।।२७।।
*
योग प्रवृत्त सदा आत्मा को मुक्त कल्मषों से रखता।
दिव्य सुखद परब्रह्म संग पा, उत्तम सुख पाता रहता।।२८।।
*
सब भूतों में परमात्मा को, भूतों में आत्मा को।
देखे योगयुक्त आत्मा ही, जगह समभावी हो।।२९।।
*
जो मुझको सब जगह देखते, मुझमें ही सब कुछ देखे।
उसके लिए न मैं अदृश्य हूँ, मेरे लिए अदृश्य न वे।।३०।।
*
सब जीवों के ह्रदय बसा जो एक मुझी में बसते हैं।
सब प्रकार से वर्तमान में भी वह मुझमें रहते हैं।।३१।।
*
अपनी तरह हर जगह सबको देखा करता अर्जुन! जो।
सुख हो या दुख हो वह योगी, परम पूर्ण ही होता है।।३२।।
*
अर्जुन बोला- 'यह पद्धति जो योग कही माधव तुमने।
मैं न देख पाता, चंचल मन, मन का गुण है अचल सदा।।३३।।
*
चंचल है निश्चय मन माधव!, विचलित करता हठी-बली।
उसका अहं नियंत्रित करना, कठिन पवन की तरह लगे।।३४।।
*
भगवन बोले- 'बेशक भुजबली!, चंचल मन-निग्रह दुष्कर।
पर अभ्यास-विराग पृथासुत! इसको वश में कर ।।३५।।
*
मन-संयम बिन योग कठिन है, इस प्रकार मेरा मत है।
वशीभूत मन को कर कोशिश, तब उपाय यह संभव है।।३६।।
*
अर्जुन पूछे- 'असफल योगी, श्रद्धा से विचलित मन का।
प्राप्त न करके योग-सिद्धि को, क्या पाता दें कृष्ण! बता।।३७ ।।
*
क्या न उभय से विचलित बिखरे बादल सदृश नष्ट होता?
बिना प्रतिष्ठा महाबाहु हे!, मोहित ब्रह्म-प्राप्ति पथ पा।।३८।।
*
यह मेरा संदेह कृष्ण हे! करें दूर प्रार्थना यही।
दूजा कोई इस संशय का समाधान कर सके नहीं'।।३९।।
*
प्रभु बोले- 'हे पार्थ! विश्व या नए जन्म में नाश न हो।
नहीं कार्य शुभ करता कोई, पतित तात! सकता है।।४०।।
*
मिले पुण्यकर्मी लोकों में, शुभ निवास बहु काल उसे।
पुण्यात्मा संपन्न ग्रहों में, योगभ्रष्ट जन्मा करते।।४१।।
*
या योगी निश्चय ही कुल में, लेता जन्म मतिमयों के।
अति दुर्लभ है इस दुनिया में, लेना जन्म इस तरह से।।४२।।
*
वहाँ चेतना की जागृति वह, पूर्वजन्म से है पाता।
कोशिश करता है तब ही वह, सिद्धि हेतु कुंतीनंदन!।।४३।।
*
गत-आदत से ही आकर्षित होता अवश आप ही वो।
उत्सुक योग व शब्द ब्रह्म में, परे चला जाता है वो।।४४।।
*
कर अभ्यास-प्रयास कठिन वह, योगी पाप शुद्ध होता।
बहु वर्षों के बाद सिद्धियाँ, और परमपद पा लेता।।४५।।
*
तापस से बढ़कर है योगी, ज्ञानी से भी श्रेष्ठ अधिक।
कर्मी से भी उत्तम योगी, योगी ही बन हे अर्जुन!।।४६।।
*
योगी सारे मुझको सोचें जो अंतर्मन में पाते।
श्रद्धावान भजें मुझको जो, योगी परम मानता मैं।।४२।।
१३-६-२०२१
***
दोहा सलिला
बाधाओं से रुक सकी, आभा कभी न मीत
बादल आकर दूर हों, कोशिश गाए गीत
*
पैर जमा कर भूमि पर, छू सकते आकाश
बाधाओं के तोड़ दो, संकल्पों से पाश
नवगीत
*
प्रवहित थी अवरुद्ध है
नेह नदी की धार,
व्यथा-कथा का है नहीं
कोई पारावार।
*
लोरी सुनकर कब हँसी?
कब खेली बाबुल गोद?
कब मैया की कैयां चढ़ी
कर आमोद-प्रमोद?
मलिन दृष्टि से भीत है
रुचता नहीं दुलार
प्रवहित थी अवरुद्ध है
नेह नदी की धार
*
पर्वत - जंगल हो गए
नष्ट, न पक्षी शेष हैं
पशुधन भी है लापता
नहीं शांति का लेश है
दानववत मानव करे
अनगिन अत्याचार
प्रवहित थी अवरुद्ध है
नेह नदी की धार
*
कलकल धारा सूखकर
हाय! हो गयी मंद
धरती की छाती फ़टी
कौन सुनाए छंद
पछताए, सुधरे नहीं
पैर कुल्हाड़ी मार
प्रवहित थी अवरुद्ध है
नेह नदी की धार
१०-६-२०१६
तक्षशिला इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी
जबलपुर
***
क्षणिकाएँ
ब्यूटी पार्लर में गयी
वृद्धा बाहर निकलकर
युवा रूपसी लग रही..
*
नश्वर है यह देह रे!
बता रहे जो भक्त को
रीझे भक्तिन-देह पे..
*
संत न करते परिश्रम
भोग लगाते रात-दिन
सर्वाधिक वे ही अधम..
*
गिद्ध भोज बारात में
टूटे भूखों की तरह
अब न मान-मनुहार है..
*
पितृ-देहरी छिन गयी
विदा होटलों से हुईं
हाय! हमारी बेटियाँ..
*
करते कन्या-दान जो
पाते हैं वर-दान वे
दे दहेज़ वर-पिता को..
*
खोज कहाँ उनकी कमर,
कमरा ही आता नज़र,
लेकिन हैं वे बिफिकर..
*
विस्मय होता देखकर.
अमृत घट समझा जिसे
विषमय है वह सियासत..
*
दुर्घटना में कै मरे?
गैस रिसी भोपाल में-
बतलाते हैं कैमरे..
*
एंडरसन को छोड़कर
की गद्दारी देश से
नेताओं ने स्वार्थ वश..
*
भाग गया भोपाल से
दूर कैरवां जा छिपा
अर्जुन दोषी देश का..
***
कवीन्द्र रवींद्रनाथ ठाकुर की एक
रचना का भावानुवाद:
*
रुद्ध अगर पाओ कभी, प्रभु! तोड़ो हृद -द्वार.
कभी लौटना तुम नहीं, विनय करो स्वीकार..
*
मन-वीणा-झंकार में, अगर न हो तव नाम.
कभी लौटना हरि! नहीं, लेना वीणा थाम..
*
सुन न सकूँ आवाज़ तव, गर मैं निद्रा-ग्रस्त.
कभी लौटना प्रभु! नहीं, रहे शीश पर हस्त..
*
हृद-आसन पर गर मिले, अन्य कभी आसीन.
कभी लौटना प्रिय! नहीं, करना निज-आधीन..
१३-६-२०१०
***

शनिवार, 11 अप्रैल 2026

अप्रैल ११, देवी गीत, ग़ज़ल, हरिऔध, सॉनेट, नवगीत, दोहा, यमक, क्षणिका, कुण्डलिया, रोला, सोरठा,


सलिल सृजन अप्रैल ११
०
ग़ज़ल
हरिऔध 
० 
हिंदी माँ के पुत्र यशस्वी हैं हरिऔध। 
देह मिट गई सृजन सनातन हैं हरिऔध।। 
. 
'प्रिय प्रवास' कर रहे जहाँ है लोक जगत। 
राधा-विरह लोक हित से जोड़ें हरिऔध।। 
. 
कृष्ण न केवल व्यक्ति, समष्टि समाए हैं। 
निज सुख का परित्याग निरंतर है हरिऔध।। 
. 
'वैदेही वनवास' त्याग-तप की गाथा। 
सहन शक्ति नारी की, गायक हैं हरिऔध।। 
. 
मंत्र-तंत्र है प्रकृति-चित्रण अलबेला। 
मातृभूमि की चरण वंदना हैं हरिऔध।। 
. 
गौरव गान विरासत का संबल बनता। 
शीश उठाकर जीने का परचम हरिऔध।। 
. 
सत्य-अहिंसा-जनसेवा को लक्ष्य बना। 
स्वतंत्रता सत्याग्रह विजय ध्वजा हरिऔध।। 
. 
दृष्टि कलात्मक 'फूल अधखिला' लोक जुड़े। 
निज भाषा सम्मान प्रवर्तक हैं हरिऔध।। 
. 
ऐक्य भाव, समरसता, सत्याग्रह, जनहित 
जन कल्याण, लोक सेवा राही हरिऔध।। 
. 
सुरवाणी-जनवाणी का छांदस संगम। 
'ठाठ ठेठ हिन्दी का' है चोखा हरिऔध।। 
. 
वर्ण वृत्त से सजे 'चौपदे चोखे' हैं। 
राष्ट्रवाद के सच्चे गायक हैं हरिऔध।।

०००

तरही ग़ज़ल 
० 
फलक पर चाँद चमका है, धरा पर रोशनी आई। 
सितारे भरके दामन में, करें आराम तस्वीरें।। -रेणु 
लकीरें माथ की कहतीं, हमारे हाथ में किस्मत। 
खुदा भी खैरमकदम कर, हमारी लिखें तकदीरें।। 
जमीं पर पैर रखकर आसमां को हम उठा लेते। 
गवाही कोशिशें की दें, समय की सभी तहरीरें।। 
मसाइल जो भी हों, हमको भरोसा हिकमतों पर है। 
दिलाएँ कामयाबी हमेशा हमको ही तदबीरें।। 
'सलिल' का साथ देती 'रेणु' जब तब ही बहे दरिया 
लिखे तहज़ीब के किस्से, तभी तारी हों तन्वीरें।।
०००
एक दोहा : सात कुंडलियां 
१ .  
अधिकृत नयन न चाहते, अन्य नयन का लेश
नयन अनधिकृत रूप से, मन में करें प्रवेश।। -अशोक व्यग्र
मन में करें प्रवेश, नयन कर शयन विचारें।
जाग्रत होकर नयन, मूर्त कर रूप निहारें।।
नील श्वेत अरु श्याम, सिंधु बिंदु में भर नयन।
नयन बयन अभिराम, कहें सत्य अधिकृत नयन।।
२ .  
अधिकृत नयन न चाहते, अन्य नयन का लेश।
नयन अनधिकृत रूप से, मन में करें प्रवेश।। -अशोक व्यग्र
मन में करे प्रवेश, विरोध न सत्ता का सच।
काना फोड़े नयन, सही का साथ न दे बच।।
घातक सहमति अंध, असहमति भी अंधी बन।
रहे राष्ट्रहित लक्ष्य, बहस करें अधिकृत नयन।।
३ .  
अधिकृत नयन न चाहते, अन्य नयन का लेश।
नयन अनधिकृत रूप से, मन में करें प्रवेश।। -अशोक व्यग्र
मन में करें प्रवेश, नयन मन की बातें कर।
वादे कर अनगिनत, बता जुमला सत्ता वर।।
बता अन्य को भ्रष्ट, आप ईमान त्यागते।
अन्य नयन-दल देश, न सत्ता नयन चाहते।।
४ .  
अधिकृत नयन न चाहते, अन्य नयन का लेश।
नयन अनधिकृत रूप से, मन में करें प्रवेश।। -अशोक व्यग्र
मन में करें प्रवेश, नयन हों नेतन्याहू।
करते नयन विनाश, ट्रंप हो याहू याहू।।
हैं बदमाश शरीफ, कटोरा नयन माँगते।
रहे विश्व में शांति, न अधिकृत नयन चाहते।।
५ .  
अधिकृत नयन न चाहते, अन्य नयन का लेश
नयन अनधिकृत रूप से, मन में करें प्रवेश।। -अशोक व्यग्र
मन में करें प्रवेश, नयन बिन अनुमति माँगे।
नयन अलगनी बनें, नयन की चादर टाँगें।
प्रेमिल बाँके नयन, ओट अँचरा ले उन्मन।
ताँकें-झाँकें हुलस, पुलकते अधिकृत नयन।।
६ .  
अधिकृत नयन न चाहते, अन्य नयन का लेश।
नयन अनधिकृत रूप से, मन में करें प्रवेश।। -अशोक व्यग्र
मन में करें प्रवेश, अनधिकृत होते लांछित।
लज्जा-मर्यादा का पालन सचमुच वांछित।।
कहे सलिल हो व्यग्र, अशोक नयन हों अनुगत।
नयन नयन में डूब हुआ करते हैं अधिकृत।।
७ .  
अधिकृत नयन न चाहते, अन्य नयन का लेश।
नयन अनधिकृत रूप से, मन में करें प्रवेश।। -अशोक व्यग्र
मन में करें प्रवेश, नयन नयनों में रहते।
अपना सुख-दुख नयन, नयन से हँसकर कहते।।
नयन नयन का हाथ पकड़कर करते सुकृत।
नयन नयन रह सकें, साथ हरदम हो अधिकृत।।
१०.४.२०२६
०००
देवी गीत
जागो माँ
*
जागो माँ! जागो माँ!!
*
जनगण है दीन-हीन, रोटी के लाले हैं
चिड़ियों की रखवाली, बाज मिल सम्हाले हैं
नेता के वसन श्वेत, अंतर्मन काले हैं
सेठों के स्वार्थ भ्रष्ट तंत्र के हवाले हैं
रिश्वत-मँहगाई पर ब्रम्ह अस्त्र दागो माँ
जागो माँ! जागो माँ!!
*
जन जैसे प्रतिनिधि को औसत ही वेतन हो
मेहनत का मोल मिले, खुश मजूर का मन हो
नेता-अफसर सुत के हाथों में भी गन हो
मेहनत कर सेठ पले, जन नायक सज्जन हो
राजनीति नैतिकता एक साथ पागो माँ
*
सीमा पर अरिदल ने भारत को घेरा है
सत्ता पर स्वार्थों ने जमा लिया डेरा है
जनमत की अनदेखी, चिंतन पर पहरा है
भक्तों ने गाली का पढ़ लिया ककहरा है
सैनिक का खून अब न बहे मौन त्यागो माँ
जागो माँ! जागो माँ!!
नवसंवत्सर, ५.४.२०१९
***
सॉनेट
सुधि
•
सुधि ली प्रभु ने सुख पाया है।
सुधि सुगंध सुरभित मन बगिया।
प्रभु-सुधि बिन जग भरमाया है।।
सुधि स्वजनों की अपनी दुनिया।।
•
सुधि बिन मन बेसुध मत होना।
सुधि सलिला में कर अवगाहन।
सुध-बुध खोकर शूल न बोना।।
सुधि अमृत नित करो आचमन।।
•
सुधि सत-शिव-सुंदर उपासना।
सुधि बाँहों में, सुधि चाहों में।
सुधि मनभावन भव्य भावना।।
सुधि साथी, साक्षी राहों में।।
•
सुधि संगी है हर आत्मा की।
सुधि संगति है परमात्मा की।।
११-४-२०२३
•••
कृति चर्चा:
युद्धरत हूँ मैं : जिजीविषा गुंजाती कविताएँ
*
(कृति विवरण: युद्घरत हूँ मैं, हिंदी गजल-काव्य-दोहा संग्रह, हिमकर श्याम, प्रथम संस्करण, २०१८, आईएसबीएन ९७८८१९३७१९०७७, आवरण बहुरंगी पेपरबैक, पृष्ठ २१२, मूल्य २७५रु., नवजागरण प्रकाशन, नई दिल्ली, कवि संपर्क बीच शांति एंक्लेव, मार्ग ४ ए, कुसुम विहार, मोराबादी, राँची ८३४००८, चलभाष ८६०३१७१७१०)
*
आदिकवि वाल्मीकि द्वारा मिथुनरत क्रौंच युगल के नर का व्याध द्वारा वध किए जाने पर क्रौंच के चीत्कार को सुनकर प्रथम काव्य रचना हो, नवजात शावक शिकारी द्वारा मारे जाने पर हिरणी के क्रंदन को सुनकर लिखी गई गजल हो, शैली की काव्य पंक्ति 'अवर स्वीटैस्ट सौंग्स आर दोस विच टैल अॉफ सैडेस्ट थॉट' या साहिर का गीत 'हैं सबसे मधुर वो गीत जिन्हें हम दर्द के सुर में गाते हैं' यह सुनिश्चित है कि करुणा और कविता का साथ चोली-दामन का सा है। दुनिया की कोई भी भाषा हो, कोई भी भू भाग हो आदमी की अनुभूति और अभिव्यक्ति समान होती है। पीड़ा, पीड़ा से मुक्ति की चेतना, प्रयास, संघर्ष करते मन को जब यह प्रतीति हो कि हर चुनौती, हर लड़ाई, हर कोशिश करते हुए अपने आप से 'युद्धरत हूँ मैं' तब कवि कविता ही नहीं करता, कविता को जीता है। तब उसकी कविता पिंगल और व्याकरण के मानक पर नहीं, जिंदगी के उतार-चढ़ाव पर बहती हुई नदी की उछलती-गिरती लहरों में निहित कलकल ध्वनि पर परखी जाती है।
हिमकर श्याम की कविता दिमाग से नहीं, दिल से निकलती है। जीवन के षट् राग (खटराग) में अंतर्निहित पंचतत्वों की तरह इस कृति की रचनाएँ कहनी हैं कुछ बातें मन की, युद्धरत हूँ मैं, आखिर कब तक?, झड़ता पारिजात तथा सबकी अपनी पीर पाँच अध्यायों में व्यवस्थित की गई हैं। शारदा वंदन की सनातन परंपरा के साथ बहुशिल्पीय गीति रचनाएँ अंतरंग भावनाओं से सराबोर है।
आरंभ में ३ से लेकर ६ पदीय अंतरों के गीत मन को बाँधते हैं-
सुख तो पल भर ही रहा, दुख से लंबी बात
खुशियाँ हैं खैरात सी, अनेकों की सौग़ात
उलझी-उलझी ज़िंदगी, जीना है दुश्वार
साँसों के धन पर चले जीवन का व्यापार
चादर जितनी हो बड़ी, उतनी ही औक़ात
व्यक्तिगत जीवन में कर्क रोग का आगमन और पुनरागमन झेल रहे हिमकर श्याम होते हुए भी शिव की तरह हलाहल का पान करते हुए भी शुभ की जयकार गुँजाते हैं-
दुखिया मन में मधु रस घोलो
शुभ-मंगल सब मिलकर बोलो
छंद नया है, राग नया है
होंठों पर फिर फाग नया है
सरगम के नव सुर पर डोलो
शूलों की सेज पर भी श्याम का कवि-पत्रकार देश और समाज की फ़िक्र जी रहा है।
मँहगा अब एतबार हो गया
घर-घर ही बाजार हो गया
मेरी तो पहचान मिट गई
कल का मैं अखबार हो गया
विरासत में अरबी-फारसी मिश्रित हिंदी की शब्द संपदा मसिजीवी कायस्थ परिवारों की वैशिष्ट्य है। हिमकर ने इस विरासत को बखूबी तराशा-सँभाला है। वे नुक़्तों, विराम चिन्हों और संयोजक चिन्ह का प्रयोग करते हैं।
'युद्धरत हूँ मैं' में उनके जिजीविषाजयी जीवन संघर्ष की झलक है किंतु तब भी कातरता, भय या शिकायत के स्थान पर परिचर्चा में जुटी माँ, पिता और मामा की चिंता कवि के फौलादी मनोबल की परिचायक है। जिद्दी सी धुन, काला सूरज, उपचारिकाएँ, किस्तों की ज़िंदगी, युद्धरत हूँ मैं, विष पुरुष, शेष है स्वप्न, दर्द जब लहराए आदि कविताएँ दर्द से मर्द के संघर्ष की महागाथाएँ हैं। तन-मन के संघर्ष को धनाभाव जितना हो सकता है, बढ़ाता है तथापि हिमकर के संकल्प को डिगा नहीं पाता। हिमकर का लोकहितैषी पत्रकार ईसा की तरह व्यक्तिगत पीड़ा को जीते हुए भी देश की चिंता को जीता है। सत्ता, सुख और समृद्धि के लिए लड़े-मरे जा रहे नेताओं, अफसरों और सेठों के हिमकर की कविताओं के पढ़कर मनुष्य होना सीखना चाहिए।
दम तोड़ती इस लोकतांत्रिक
व्यवस्था के असंख्य
कलियुगी रावणों का हम
दहन करना भी चाहें तो
आखिर कब तक
*
तोड़ेंगे हम चुप्पी
और उठा सकेंगे
आवाज़
सर्वव्यापी अन्याय के ख़िलाफ़
लड़ सकेंगे तमाम
खौफ़नाक वारदातों से
और अपने इस
निरर्थक अस्तित्व को
कोई अर्थ दे सकेंगे हम।
*
खूब शोर है विकास का
जंगल, नदी, पहाड़ की
कौन सुन रहा चीत्कार
अनसुनी आराधना
कैसी विडंबना
बिखरी सामूहिक चेतना
*
यह गाथा है अंतहीन संघर्षों की
घायल उम्मीदों की
अधिकारों की है लड़ाई
वजूद की है जद्दोजहद
समय के सत्य को जीते हुए, जिंदगी का हलाहल पीते हुए हिमकर श्याम की युगीन चिंताओं का साक्षी दोहा बना है।
सरकारें चलती रहीं, मैकाले की चाल
हिंदी अपने देश में, अवहेलित बदहाल
कैसा यह उन्माद है, सर पर चढ़ा जुनून
खुद ही मुंसिफ तोड़ते, बना-बना कानून
चाक घुमाकर हाथ से, गढ़े रूप आकार
समय चक्र धीमा हुआ, है कुम्हार लाचार
मूर्ख बनाकर लोक को, मौज करे ये तंत्र
धोखा झूठ फरेब छल, नेताओं के मंत्र
विश्ववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर द्वारा प्रकाशित सहयोगाधारित दोहा शतक मंजूषा के भाग २ 'दोहा सलिला निर्मला' में सम्मिलित होने के लिए मुझसे दोहा लेखन सीखकर श्याम ने मुझे गत ५ दशकों की शब्द साधना का पुरस्कार दिया है। सामान्यतः लोग सुख को एकाकी भोगते और दुख को बाँटते हैं किंतु श्याम अपवाद है। उसने नैकट्य के बावजूद अपने दर्द और संघर्ष को छिपाए रखा।इस कृति को पढ़ने पर ही मुझे विद्यार्थी श्याम में छिपे महामानव के जीवट की अनुभूति हुई।
इस एक संकलन में वस्तुत: तीन संकलनों की सामग्री समाविष्ट है। अशोक प्रियदर्शी ने ठीक ही कहा है कि श्याम की रचनाओं में विचार की एकतानता तथा कसावट है और कथन भंगिमा भी प्रवाही है। कोयलांचल ही नहीं देश के लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकार हरेराम त्रिपाठी 'चेतन' के अनुसार 'रचनाकार अपनी सशक्त रचनाओं से अपने पूर्व की रचनाओं के मापदंडों को झाड़ता और उससे आगे की यात्रा को अधिक जिग्यासा पूर्ण बनाकर तने हुए सामाजिक तंतुओं में अधिक लचीलापन लाता है। मानव-मन की जटिलताओं के गझिन धागों को एक नया आकार देता है।'
इन रचनाओं से गुजरने हुए बार-बार यह अनुभूति होना कि किसी और को नहीं अपने आपको पढ़ रहा हूँ, अपने ही अनजाने मैं को पहचानने की दिशा में बढ़ रहा हूँ और शब्दों की माटी से समय की इबारत गढ़ रहा हूँ। मैं श्याम की जिजीविषा, जीवट, हिंदी प्रेम और रचनाधर्मिता को नमन करता हूँ।
हर हिंदी प्रेमी और सहृदय इंसान श्याम को जीवन संघर्ष का सहभागी और जीवट का साक्षी बन सकता है इस कृति को खरीद-पढ़कर। मैं श्याम के स्वस्थ्य शतायु जीवन की कामना करता हुए आगामी कृतियों की प्रतीक्षा करता हूँ।
११-४-२०१९
***
नवगीत
*
हवा महल हो रही
हमारे पैर तले की धरती।
*
सपने देखे धूल हो गए
फूल सुखकर शूल हो गए
नव आशा की फसलोंवाली
धरा हो गई परती।
*
वादे बता थमाए जुमले
फिसले पैर, न तन्नक सँभले
गुब्बारों में हवा न ठहरी
कट पतंग है गिरती।
*
जिजीविषा को रौंद रहे जो
लगा स्वार्थ की पौध रहे वो।
जन-नेता की बखरी में ही
जन-अभिलाषा मरती।
***
नवगीत
जोड़-तोड़ है
मुई सियासत
*
मेरा गलत
सही है मानो।
अपना सही
गलत अनुमानो।
सत्ता पाकर,
कर लफ्फाजी-
काम न हो तो
मत पहचानो।
मैं शत गुना
खर्च कर पाऊँ
इसीलिए तुम
करो किफायत
*
मैं दो दूनी
तीन कहूँ तो
तुम दो दूनी
पाँच बताना।
मैं तुमको
झूठा बोलूँगा
तुम मुझको
झूठा बतलाना।
लोकतंत्र में
लगा पलीता
संविधान से
करें बगावत
*
यह ले उछली
तेरी पगड़ी।
झट उछाल तू
मेरी पगड़ी।
भत्ता बढ़वा,
टैक्स बढ़ा दें
लड़ें जातियाँ
अगड़ी-पिछड़ी।
पा न सके सुख
आम आदमी,
लात लगाकर
कहें इनायत।
*
***
मुक्तक
कीर्ति-अपकीर्ति
क्या करेंगे कीर्ति लेकर यदि न सत्ता मिल सकी।
दुश्मनों की कील भी हमसे नहीं यदि हिल सकी।।
पेट भर दे याकि तन ही ढँक सकेगी कीर्ति क्या?
कीर्ति पाकर हौसले की कली ही कब खिल सकी?
*
लाख दो अपकीर्ति मुझको, मैं न जुमला छोड़ता।
वक्ष छप्पन इंच का ले, दुम दबा मुँह मोड़ता।।
चीन पकिस्तान क्या नेपाल भी देता झुका-
निज प्रशंसा में 'सलिल' नभ से सितारे तोड़ता।।
१०-४-२०१८
***
दोहा सलिला
-------------------------------------------------
गौड़-तुच्छ कोई नहीं, कहीं न नीचा-हीन
निम्न-निकृष्ट किसे कहें, प्रभु-कृति कैसे दीन?
*
मिले 'मरा' में 'राम' भी, डाकू में भी संत
ऊँच-नीच माया-भरम, तज दे तनिक न तंत
*
अधमाधम भी तर गए, कर प्रयास है सत्य
'सलिल' हताशा पाल मात, अपना नहीं असत्य
*
जिसको हरि से प्रेम है, उससे हरि को प्रेम,
हरिजन नहीं अछूत है, करे सफाई-क्षेम
*
दीपक के नीचे नहीं, अगर अँधेरा मीत
उजियारा ऊपर नहीं, यही जगत की रीत
*
रात न श्यामा हो अगर, उषा न हो रतनार
वाम रहे वामा तभी, रुचे मिलन-तकरार
*
विरह बिना कैसे मिले, मिलने का आनंद
छन्दहीन रचना बिना, कैसे भाये छंद?
*
बसे अशुभ में शुभ सदा, शुभ में अशुभ विलीन
अशरण शरण मिले 'सलिल', हो अदीन जब दीन
*
मृग-तृष्णा निज श्रेष्ठता, भ्रम है पर का दैन्य
नत पांडव होते जयी, कुरु मरते खो सैन्य
*
नर-वानर को हीन कह, असुरों को कह श्रेष्ठ
मिटा दशानन आप ही, अहं हमेशा नेष्ट
*
दुर्योधन को श्रेष्ठता-भाव हुआ अभिशाप
धर्मराज की दीनता, कौन सकेगा नाप?
***
यमकीय दोहे
*
भाया छाया जो न क्यों, छाया उसकी साथ?
माया माया ताज गयी, मायापति के साथ।।
*
शुक्ला-श्यामा एक हैं, मात्र दृष्टि है भिन्न।
जो अभिन्नता जानता, तनिक न होता खिन्न।।
*
​संगसार वे कर रहे, होकर निष्ठुर क्रूर।
संग सार हम गह रहे, बरस रहा है नूर।।
११-४-२०१७
***
क्षणिका :
नेता
*
नेता!
तुम सभ्य तो हुए नहीं,
मनुज बनना तुम्हें नहीं भाया।
एक बात पूछूँ?, उत्तर दोगे??
जुमला कहाँ से सीखा?
लड़ना कहाँ से आया??
***
गीध
*
जब स्वार्थसाधन और
उदरपोषण तक
रह जाए
नाक की सीध
तब समझ लो
आदमी
नहीं रह गया है आदमी
बन गया है
गीध।
११-४-२०१४
***
मुक्तक
दोस्तों की आजमाइश क्यों करें?
मौत से पहले ही बोलो क्यों मरें..
नाम के ही हैं. मगर हैं साथ जो-
'सलिल' उनके बिन अकेले क्यों रहें?.
७-४-२०१०
***

शुक्रवार, 13 मार्च 2026

मार्च १४, पूतना, कबीरा, सॉनेट, होली, हुरहुरे, लघुकथा, गीत, क्षणिका, शिव छंद, धर्म,


सलिल सृजन मार्च १४
यूरेनस दिवस
*
छंदशाला
दोहा-रोला-कुंडलिया
०
पीठ लदा बेताल था, उड़कर लटका डाल।
नयनों का विक्रम चला, लाद नयन बेताल।। -अशोक व्यग्र
लाद नयन बैताल, नयन विक्रम कवि बोला।
शब्द-शब्द में सार, वाक् में अमृत घोला।।
गायब होना भूल, बजा रहा करताल था।
कुंडलिया सुन मस्त, पीठ लदा बैताल था।।
१४.३.२०२६
०००
सॉनेट
०
आग लगा ताली बजा
घर को जलता देख
कहे खूब आया मजा
लाँघी लछमन रेख।
आग तापने में जले
जब खुद के ही हाथ
पड़ी मुसीबत आ गले
ठोंक रहा है माथ।
मनमाने टैरिफ लगा
खुद को समझे शाह
सबकी नज़रों से घिरा
करी न कुछ परवाह।
धनलोलुप मतिहीन है
पशु ना पूँछ विहीन है।
१४.३.२०२६
०००
पूतना - राक्षसी या महामारी चेचक?
पूर्वकाल में मारक महामारियों में चेचक (बड़ी/छोटी माता, स्माल पाक्स, चिकन पाक्स) प्रमुख थी। फागुन के दिनों में चेचक के कारण असंख्य शिशुओं और बच्चों कि मौत हुआ करती थी। अब चेचक का उन्मूलन हो जाने पर भी खसरा हो ही जाता है। इस महामारी में आँखें चली जाती थी, चेहरों पर दाग पद जाने से वे वीभत्स हो जाते थे। अब शिशु को जन्म के बाद ही महामारियों के टीके लगा दिए जाते हैं। । लोग वह कहावत भूल गए हैं कि - है तो वह चाँद का टुकड़ा, मगर चाँद के साथ तारे भी हैं। यानी सुंदर मुख पर चेचक के दाग हैं।
हम जानते हैं कि कंस ने शिशु कृष्ण को मारने के लिए पूतना राक्षसी को भेजा था जिसने जब विषाक्त दूध पिलाया तो कृष्ण ने उसके प्राण चूस कर ने उसका वध कर डाला। यह कहानी रस ले लेकर प्रवचन करता सुनाते हैं। हरिवंश, विष्णु पुराण आदि के आधार पर यही वर्णन भागवत में भी लिया गया है।
उल्लेख्य है कि इससे पहले रावण- राज में भी पूतना का प्रकोप था। रावण के नाम से जो आयुर्वेदिक ग्रंथ मिलते हैं, उनमें पूतना के प्रकाेप पर शमन के उपाय लिखे गए हैं। यानी रावण के राज में इस बीमारी के शमन पर पूरा जोर दिया जाता था ताकि बच्चे स्वस्थ्य रहें। आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथ उठाइये, पूतना के उपाय लिखे मिल जाएँगे। पूतना कई नामों और भेदों वाली होती थी । यथा - बड़ी माता, छोटी माता, शीतला माता, बोदरी माता, सौकमाता, अवणमाता, झरणमाता, मोतीरा वगैरह। इन सब को लक्षणों के अनुसार पहचाना जाता था। शीतल माता को प्रसन्न करने के लिए शीतल अष्टमी को व्रत रखकर पूजन किया जाता था। मंदोदरी ने रावण से कहा था कि ये मातृकाएँ नंदा, सुनंदा, कंटपूतना, शकुनिका पूतना, अर्यका, भूसूतिका पूतना, शुष्‍करेवती वगैरहा बालकों को अपनी चपेट में ले लेती है। । रावण ने तब कहा -
''तृतीय दिवसे मासे वर्षे वा गृह़णाति पूतना नाम मातृका तया गृहीतमात्रेण प्रथमं भवति ज्वर:। गात्रमुद्वेजयतिस्तनयं ऊर्द्धवं निरीक्षते। -(रावणसंहिता, बाल औषधि विधान)
वास्तु के लिए ८१ या ६४ पद का आधार तैयार कर उसमें पिलीपिच्छा, चरकी, अर्यमा, पापाराक्षसी, विदारिका, स्कंद, जृम्भा और पूतना को गृहयोजना के बाहर ही रखकर पूजन किया जाता है। सभी वास्तु ग्रंथों में उसका जिक्र आया है, वास्तु पद न्यास में लाल रंग के भात से पूज कर पूतना को मनाया जाता है, ताकि परिवार के बच्चों पर पूतना का प्रकोप न हो। पूतना के प्रकोप-काल में लाल चावल ही खाए जाते थे।
कृष्ण ने पूतना का वध किया इसका अर्थ यही है कि पूतना (चेचक) का प्रकोप होने पर कृष्ण ने न केवल उस पर विजय प्राप्त की अपितु उसका समूल नाश किया। पूतना-वध कि कहानियाँ, मूर्तियाँ, चित्र आदि इस प्रसंग को जीवंत बनाए रखते हैं। कभी कभी प्रसंग में पैठकर कर हम सत्य पा सकते हैं।
०००
जोगी जी
०
सदाचार का डालिए, चौक रंगीला द्वार।
सद्भावों की फाग गा, मेटें सब तकरार।।
जोगी जी सा रा रा रा
०
बाधाओं की लकड़ियाँ, दें होरी में बार।
पीर गुलेरी सब जलें, बचे न एकऊ खार।।
जोगी जी सारा रा रा
०
राजनीति की होलिका, करे नहीं तकरार।
नेता-अफसर कर सकें, लोकनीति से प्यार।।
जोगी जी सारा रा रा
०
भुज भरकर मिलिए गले, बढ़े खूब अपनत्व।
संसद से दूरी मिटे, बढ़े खूब बंधुत्व।।
जोगी जी सा रा रा रा
०
सुख पिचकारी दें भिगा, रंग हर्ष का, डाल।
मस्तक पर शोभित रहे, यश का लाल गुलाल।।
जोगी जी सा रा रा रा
०
हिंदी मैदा माढ़िए, उर्दू मोयन डाल।
देशज मेवाएँ भरें, गुझिया बने कमाल।।
जोगी जी सा रा रा रा
०
परंपरा बेसन बने, नवाचार हो तेल।
खांय-खिलाएँ पपड़ियाँ, जी भर होली खेल।।
जोगी जी सा रा रा रा
०
कविता पिचकारी बना, भरें छंद का रंग।
रस-लय की ठण्डाई पी, करें गीत गा जंग।।
जोगी जी सा रा रा रा
०
फाग कबीरा गाइए, भर मस्ती में झूम।
ढोल-मँजीरा बजाएँ, खूब मचाएँ धूम।।
जोगी जी सा रा रा रा
१३.३.२०२५
०००
सॉनेट
प्रेम की डगर
*
निश्छल प्रेम की डगर,
दुष्कर है सहज-सरल,
कभी अमिय; कभी गरल,
पथिक! प्रेम अजर-अमर।
श्वेत-श्याम जगर-मगर,
बैद कान्ह प्रेम खरल,
गले अहं बने तरल,
शूल चुभे तज न समर।
खुद को खो; खुद को पा,
खुदी-खुदा दो न रहें,
सब में तू; तुझ में सब।
प्रिय के गुण हर दिन गा,
स्नेह सलिल बहा बहें,
रब में तू; तूहज में रब।
***
सॉनेट
प्रेम
•
जग मन चाह सभी की क्षेम।
मेरा-तेरा द्वैत भुला दे।
एक सभी, कर सब से प्रेम।।
सबको अपना मीत बना ले।।
देख अदेखा आँख बंद कर।
तू है कौन, कहाँ से आया?
सुन अनसुना, सुवाच छंद कर।
जाना कहाँ, कहाँ भरमाया?
सुमिरन कर ले गुप्त चित्र का।
भाव सुमन कर उसको अर्पित।
सत्य सनातन ईश मित्र का।।
आत्म दीप कर जला समर्पित।।
कर ले पल पल प्रेम भुला जग।
दौड़ आए वह झट बिन मग।।
१३-३-२०२३
•••
सॉनेट
कठपुतली
•
कठपुतली हैं हम सब प्यारे!
नटवर तू नित हमें नचाता।
तू नटराज न नृत्य दिखाता।।
नाच नचा जग को मुस्का रे!!
छलिया! छिपा हुआ अंतर में।
थके खोज वह नजर न आता।
निर्बल का संबल बन जाता।।
महल मिला माटी-कंकर में।।
कठपुतली क्या पाए-खोए?
सपने अनगिन नयन सँजोए।
नाहक लड़-मर, नयन भिगोए।।
दर्शक झूम बजाए ताली।
रुचे न खेला, झट दे गाली।
कठपुतली खाली की खाली।।
१३-३-२०२२
•••
होरी के जे हुरहुरे
*
होरी के जे हुरहुरे, लिये स्नेह-सौगात
कौनऊ पढ़ मुसक्या रहे, कौनऊ दिल सहलात
कौनऊ दिल सहलात, किन्हऊ खों चढ़ि गओ पारा,
जिन खों पारा चढ़े, होय उनखों मूं कारा
*
मुठिया भरे गुलाल से, लै पिचकारी रंग
कृष्णकांत जी को मलें, चंद्रा जी कर जंग
कि बोलो सा रा रा रा.....
*
हरी हुई तबियत चढ़ी, भंग भवानी शीश
गृहणी ने जी भर रँगा, लगें सुरेश कपीश
कि बोलो सा रा रा रा.....
*
हिलसा खा ठंडाई पी, करें घोष जयघोष
होरी गातीं इला जी, लुटा रंग का कोष
कि बोलो सा रा रा रा.....
*
गयी कहानी गोंदिया, कही कहानी डूब
राजलक्ष्मी ले उड़े, राम कहानी खूब
कि बोलो सा रा रा रा.....
*
जयप्रकाश जी झूमकर, रचा रहे हैं स्वाँग
गृह स्वामिन खिल खिल हँसे, भजियों में दे भाँग
कि बोलो सा रा रा रा.....
*
जबलपुर भोपाल बिच, रहे कबड्डी खेल
तू तू तू तू कर रहे, तन्मय हुए सुरेश
कि बोलो सा रा रा रा.....
*
मुग्ध मंजरी देखकर, भूले काम बसंत
मधु हाथों मधु पानकर, पवन बन रहे संत
कि बोलो सा रा रा रा.....
*
कोक भरी पिचकारियों, से मारें हँस धार
छाया पियें मनीष जी, भीग भई भुन्सार
कि बोलो सा रा रा रा.....
*
झूमें सँग अविनाश के, रचना गाकर फाग
पहन विनीता घूमतीं, फूल-धतूरा पाग
कि बोलो सा रा रा रा.....
*
शोभित की महिमा अजब, मो सें बरनि न जाय
भांग भवानी हाथ ले, नेहा से बतियांय
कि बोलो सा रा रा रा.....
*
बिरह-ब्यथा मिथलेस की, बिनसे सही न जाय
तजी नौकरी घर घुसे, हीरा धुनी रमांय
कि बोलो सा रा रा रा.....
*
पीले-पीले हो रहे, जयप्रकाश पी आज।
श्याम घटा में चाँदनी, जैसे जाए डूब।।
कि बोलो सा रा रा रा.....
*
गूझों का आनंद लें, लुक-छिप धरकर स्वांग।
पुरुषोत्तम; मीना न दें , अडा रही हैं टाँग।।
कि बोलो सा रा रा रा.....
*
लाल गाल अखिलेश के हुए, नींद में मस्त।
सेव-पपडिया खा हुईं, मुदित विनीता पस्त।।
कि बोलो सा रा रा रा.....
***
एक द्विपदी
*
भूल भुलाई, भूल न भूली, भूलभुलैयां भूली भूल.
भुला न भूले भूली भूलें, भूल न भूली भाती भूल.
*
यह द्विपदी अश्वावातारी जातीय बीर छंद में है.
***
क्षणिका
*
आमंत्रण है तुम्हें पधारो कोरोना
थके न मिटती रिश्वरखोरी
सुना कर रहे तुम बरजोरी
झटपट आओ,
इसे मिटाओ
सही न जाए कुछ कोरो ना
१३.३.२०२०
***
क्षणिका
मौन
*
बिन बोले ही बोलता
सुन सकते
हर बात।
दिन हो
चाहे रात
फर्क इसे पड़ता नहीं।
बोलो
हो तुम कौन
कभी नहीं यह पूछता?
वन-पर्वत या
हो शहर
बतियाता है मौन।
***
दोहा गीत
चुनाव
*
ख़ास-ख़ास मिल लड़ रहे,
कहते आम चुनाव।
नूराकुश्ती सियासत,
ऐक्य संग अलगाव।।
*
पाने रोटी-दाल,
आम आदमी जूझता।
जनता का दुःख-दर्द,
नेता कभी न बूझता।
सुविधाएँ दे त्याग,
मार्ग न उसको सूझता।
मिटती कभी न दूरियाँ
दूर न हो भटकाव।
ख़ास-ख़ास मिल लड़ रहे
कहते आम चुनाव।।
*
वादे रखें न याद,
दावे झूठे कर रहे।
जन-हितकारी मूल्य
बिन मारे ही मर रहे।
इसकी टोपी छीन,
उसके सिर पर धर रहे।
केर-बेर का संग ही
दिखला रहा प्रभाव।
ख़ास-ख़ास मिल लड़ रहे
कहते आम चुनाव।।
बुधवार, १३-३-२०१९
***
लघुकथा
राहत की सांस
*
लेख वार्ता (चैट) पर बार-बार रचनाओं की प्रशंसा के बाद कहाँ रहते हैं, क्या करते हैं? घर में कौन-कौन हैं? कविता कैसे करते हैं? जैसे प्रश्न किये गये। उसने सहज शालीनतापूर्वक उत्तर दे दिए। जब उसे स्वस्थ्य और सुन्दर कहते हुए पूछा गया कि वह एकांत में समय कैसे बिताता है?, उसके शौक क्या है ? तो वह चौंका और कुछ रुखाई के साथ उत्तर दिया कि उससे केवल साहित्य संबंध में चर्चा की जाए, अन्य विषयों में कोई रूचि नहीं है। वह स्तब्ध रह गया यह देखकर कि विपन्नता, समाज के अत्याचारों से पीड़ित, पुरुषों को कोसने, स्वावलंबन और स्त्री अधिकारों की दुहाई देनेवाली ने अपने निर्वस्त्र चित्र भेजते हुए पूछा कि वह प्रति रात्रि कितनी राशि दे सकता है?
क्रोध, क्षोभ और अपमान का अनुभव करते हुए उसने फटकार लगायी कि विवाहित और बच्चों की माँ होते हुए उसका यह आचरण कैसे उचित है? यदि अर्थाभाव है तो उसे विधि सम्मत व्यवसाय कर अतिरिक्त धनार्जन करना चाहिए। इस तरह समाज को प्रदूषित करने का उसके बच्चों पर क्या असर होगा?
उत्तर मिला कि संपन्न वर्ग यह सब करता है तो फैशन कहा जाता है, गरीब को सब उपदेश देते हैं, सहायता नहीं करते। देह व्यवसाय को मान्यता देनेवाले देशों के उदाहरण के साथ उस को बुर्जुआ, घिसी-पिटी दकियानूसी घटिया सोचवाला, समाज की प्रगति में बाधक कहते हुए समय के साथ बदलने की सीख दी गयी। स्त्री का अपनी देह पर पूरा अधिकार है। इससे रोकनेवाली पुरुषप्रधान मानसिकता समाप्त कर स्त्री सशक्तिकरण समय की माँग है।
उसने हार मानते हुए फेसबुक प्रबंधन को रिपोर्ट कर वह लेखा बंद कराकर राहत की सांस ली।
१३-३-२०१६
***
नवगीत -
याद
*
याद आ रही
याद पुरानी
*
फेरे साथ साथ ले हमने
जीवन पथ पर कदम धरे हैं
धूप-छाँव, सुख-दुःख पा हमको
नेह नर्मदा नहा तरे हैं
मैं-तुम हम हैं
श्वास-आस सम
लेखनी-लिपि ने
लिखी कहानी
याद आ रही
याद पुरानी
*
ज्ञान-कर्म इन्द्रिय दस घोड़े
जीवन पथ पर दौड़े जुत रथ
मिल लगाम थामे हाथों में
मन्मथ भजते अंतर्मन मथ
अपनेपन की
पुरवाई सँग
पछुआ आयी
हुलस सुहानी
*
कोयल कूकी, बुरा अमुआ
चहकी चिड़िया, महका महुआ
चूल्हा-चौके, बर्तन-भाँडे
देवर-ननदी, दद्दा-बऊआ
बीत गयी
पल में ज़िंदगानी
कहते-सुनते
राम कहानी
***
नवगीत
तू
*
पल-दिन,
माह-बरस बीते पर
तू न
पुरानी लगी कभी
पहली बार
लगी चिर-परिचित
अब लगती
है निपट नई
*
खुद को नहीं समझ पाया पर
लगता तुझे जानता हूँ
अपने मन की कम सुनता पर
तेरी अधिक मानता हूँ
मन को मन से
प्रीति पली जो
कम न
सुहानी हुई कभी
*
कनखी-चितवन
मुस्कानों ने
कब-कब
क्या संदेश दिए?
प्राण प्रवासी
पुलके-हरषे
स्नेह-सुरभि
विनिवेश लिये
सार्थक अर्थशास्त्र
जीवन का
सच, न
कहानी हुई कभी
४-३-२०१६
***
नवगीत:
आरक्षण
*
जिनको खुद पर
नहीं भरोसा
आरक्षण की भीख माँगते।
*
धन-दौलत, जमीन पाकर भी
बने हुए हैं अधम भिखारी।
शासन सब कुछ छीने इनसे
तब समझेंगे ये लाचारी।
लात लगाकर इनको इनसे
करा सके पीड़ित बेगारी।
हो आरक्षण उनका
जो बेबस
मुट्ठी भर धूल फाँकते।
*
जिसने आग लगाई जी भर
बैैंक और दुकानें लूटीं।
धन-सम्पति का नाश किया
सब आस भाई-चारे की टूटी।
नारी का अपमान किया
अब रोएँ, इनकी किस्मत फूटी।
कोई न देना बेटी,
हो निरवंशी
भटकें थूक-चाटते।
*
आस्तीन के साँप, देशद्रोही,
मक्कार, अमानव हैं ये।
जो अबला की इज्जत लूटें
बँधिया कर दो, दानव हैं ये।
इन्हें न कोई राखी बाँधे
नहीं बहन के लायक हैं ये।
न्यायालय दे दण्ड
न क्यों फाँसी पर
जुल्म-गुनाह टाँगते?
२९-२-२०१६
***
छंद सलिला:
शिव (समानिका) छंद
*
लक्षण: जाति रौद्र, पद २, चरण ४, प्रति चरण मात्रा ११, ३ री, ६ वी, ९ वी मात्र लघु, मात्रा बाँट ३-३-३-२, चरणान्त लघु लघु गुरु (सगण), गुरु गुरु गुरु (मगण) या लघु लघु लघु (नगण), तीव्र प्रवाह।
लक्षण छंद:
शिव-शिवा रहें सदय, रूद्र जग करें अभय
भक्ति भाव से नमन, माँ दया मिले समन
(संकेत: रूद्र = ११ मात्रा, समन = सगण, मगण, नगण)
उदाहरण:
१. हम जहाँ रहें सनम, हो वहाँ न आँख नम
कुछ न याद हो 'सलिल', जब समीप आप-हम
२. आज ना अतीत के, हार के न जीत के
आइये रचें विहँस, मीत! गीत प्रीत के
नीत में अनीत में, रीत में कुरीत में
भेद-भाव कर सकें, गीत में अगीत में
३. आप साथ हों सदा, मोहती रहे अदा
एक मैं नहीं रहूँ, आप भी रहें फ़िदा
४. फिर चुनाव आ रहे, फिर उलूक गा रहे
मतदाता आज फिर, हाय ठगे जा रहे
केर-बेर साथ हैं, मैल भरे हाथ हैं
झूठ करें वायदे, तोड़ें खुद कायदे
सत्ता की चाह है, आपस में डाह है
रीति-नीति भूलते, सपनों में झूलते
टीप: श्यामनारायण पाण्डेय ने अभिनव प्रयोग कर शिव छंद को केवल ९ वीं मात्रा लघु रखकर रचा है. इससे छंद की लय में कोई अंतर नहीं आया. तदनुसार प्रस्तुत है उदाहरण ४.
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, ककुभ, कीर्ति, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, छवि, जाया, तांडव, तोमर, दीप, दोधक, नित, निधि, प्रदोष, प्रेमा, बाला, भव, मधुभार, मनहरण घनाक्षरी, माया, माला, ऋद्धि, रामा, लीला, वाणी, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शिव, शुभगति, सार, सिद्धि, सुगति, सुजान, हंसी)
१३-३-२०१४
***
चिंतन सलिला:
धर्म
*
आत्मीय!
वन्दे मातरम.
महाभारतकार के अनुसार 'धर्मं स: धारयेत' अर्थात वह जो धारण किया जाए वह धर्म है.
प्रश्न हुआ: 'क्या धारण किया जाए?'
उत्तर: 'वह जो धारण करने योग्य है.'
प्रश्न: 'धारण करने योग्य है क्या है?
उत्तर: वह जो श्रेष्ठ है?
प्रश्न: श्रेष्ठ क्या है?
उत्तर वह जो सबके लिए हितकर है.
डॉ. राम मनोहर लोहिया के अनुसार धर्म लंबे समय की राजनीति और राजनीति तत्कालीन समय का धर्म है.
उक्तानुसार धर्म सदैव प्रासंगिक और सर्वोपयोगी होता है अर्थात जो सबके लिए नहीं, कुछ या किसी के लिए हितकर हो वह धर्म नहीं है.
साहित्य वह जो सबके हित सहित हो अर्थात व्यापक अर्थ में साहित्य ही धर्म और धर्म ही साहित्य है.
साहित्य का सृजन अक्षर से होता है. अक्षर का उत्स ध्वनि है. ध्वनि का मूल नाद है... नाद अनंत है... अनंत ही ईश्वर है.
इस अर्थ में अक्षर-उपासना ही धर्मोपासना है. इसीलिये अक्षर-आराधक को त्रिकालदर्शी, पूज्य और अनुकरणीय कहा गया, उससे समाज का पथ-प्रदर्शन चाह गया, उसका शाप अनुल्लन्घ्य हुआ. अकिंचन गौतम के शाप से देवराज इंद्र भी न बच सका.
धर्म समय-सापेक्ष है. समय परिवर्तन शील है. अतः, धर्म भी सतत गतिशील और परिवर्तन शील है, वह जड़ नहीं हो सकता.
पञ्च तत्व की देह पञ्चवटी में पीपल (ब्रम्हा, नीम (शक्ति, रोगाणुनाशक, प्राणवायुदाता), आंवला (हरि, ऊर्जावर्धक ), बेल (शिव, क्षीणतानाशक ) तथा तथा आम (रसवर्धक अमृत) की छाया में काया को विश्राम देने के साथ माया को समझने में भी समर्थ हो सकती थी.
मन के अन्दर जाने का स्थान ही मन्दिर है. मन मन्दिर बनाना बहुत सरल है किन्तु सरल होना अत्यंत कठिन है. सरलता की खोज में मन्दिर में मन की तलाश ने मन को ही जड़ बना दिया.
शिव वही है जो सत्य और सुन्दर है. असत्य या असुंदर शिव नहीं हो सकता. शिव के प्रति समर्पण ही 'सत' है.
शिव पर शंका का परिणाम सती होकर ही भोगना पड़ता है. शिव अर्थात सत्य पर संदेह हो तो मन की शांति छिन जाती है और तन तापदग्धता भोगता ही है.
शिव पर विश्वास ही सतीत्व है. शंकर शंकारि (शंका के शत्रु अर्थात विश्वास) है. विश्वास की संगिनी श्रद्धा ही हो सकती है. तभी तो तुलसी लिखते हैं: 'भवानी-शंकरौ वन्दे श्रृद्धा-विश्वास रूपिणौ' किसी भी काल में श्रृद्धा और विश्वास अप्रासंगिक कैसे हो सकते हैं?
जिसकी सत्ता किसी भी काल में समाप्त न हो वही तो महाकाल हो सकता है. काल से भी क्षिप्र होने पर ही वह काल का स्वामी हो सकता है. उसका वास क्षिप्रा तीर पर न हो तो कहाँ हो?
शिव सृजन से नाश और नाश से सृजन के महापथ निर्माता हैं. श्रृद्धा और विश्वास ही सम्मिलन की आधार भूमि बनकर द्वैत से अद्वैत की ओर ले जाती हैं. श्रृद्धा की जिलहरी का विस्तार और विश्वास के लिंग की दृढ़ता से ही नव सृजन की नर्मदा (नर्मम ददाति इति नर्मदा जो आत्मिक आनंद दे वह नर्मदा है) प्रवाहित होती है.
संयम के विनाश से सृजन का आनंद देनेवाला अविनाशी न हो तो और कौन होगा? यह सृजन ही कालांतर में सृजक को भस्म कर देगा (तेरा अपना खून ही आखिर तुझमें आग लगाएगा).
निष्काम शिव काम क्रीडा में भी काम के वशीभूत नहीं होते, काम को ह्रदय पर अधिकार करने का अवसर दिए बिना क्षार कर देते हैं किन्तु रति (लीनता अर्थात पार्थक्य का अंत) की प्रार्थना पर काम को पुनर्जीवन का अवसर देते हैं. निर्माण में नाश और नाश से निर्माण ही शिवत्व है.
इसलिए शिव अमृत ग्रहण न करने और विषपायी होने पर भी अपराजित, अडिग, निडर और अमर हैं. दूसरी ओर अमृत चुराकर भागनेवाले शेषशायी अमर होते हुए भी अपराजित नहीं रणछोड़ हैं.
सतीनाथ सती को गँवाकर किसी की सहायता नहीं कहते स्वयं ही प्रलय के वाहक बन जाते हैं जबकि सीतानाथ छले जाकर याचक हो जाते हैं. सती के तप का परिणाम अखंड अहिवात है जबकि सीता के तप का परिणाम पाकर भी खो देना है.
सतीनाथ मर्यादा में न बंधने के बाद भी मर्यादा को विस्मृत नहीं करते जबकि सीतानाथ मर्यादा पुरुषोत्तम होते हुए भी सीता की मर्यादा की रक्षा नहीं कर पाते.
शिव रात्रि की प्रासंगिकता अमृत और गरल के समन्वय की कला सीखकर जीने में है.
शेष अशेष...
१३-३-२०१३
***
दोहा
'सलिल' बड़ों ने सच कहा, न दो किसी को दोष.
बढ़ो सतत निज राह पर, मन में रख संतोष
*
जब भी पाओ समय तो, करलो तनिक विनोद.
'सलिल' भूलकर फ़िक्र सब, कर आमोद-प्रमोद
***
'शुभ प्रभात'
खिड़की पर बैठी हुई, मीत गुनगुनी धूप.
'शुभ प्रभात' कह रही है, तुमको हवा अरूप.
चूँ-चूँ कर चिड़िया कहे: 'जगो, हो गयी भोर.
'आलस छोड़ो' कह रही है मैया झकझोर.
खड़ी द्वार पर सफलता, उठो, मिलाओ हाथ.
'सलिल' परिश्रम जो करे, किस्मत उसके साथ.
१३-३-२०१०
***