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शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

जनवरी २३, सॉनेट, सोरठा, कृष्ण, सुभाष, दोहा, नवगीत, लघु कथा, मुक्तिका, अहीर छंद, बसंत

 सलिल सृजन जनवरी २३

*
बसंत पंचमी पर गीत
.
सखि! बसंत है झूम
कटि लचका, लट ले कपोल को चूम
.
सरसवती हे! गीत सुना दे
नयनों से नर्मदा बहा दे
दस दिश हो तव धूम
.
प्रिय को प्रिय सर्वदा रहे तू
प्रिय को प्रिय सर्वदा रखे तू
द्वैत मिटाकर घूम
.
लूट-लुट गई प्रीत डगर में
बसा-बस गई रीत नगर में
मार कुंडली सूम
.
नाद-ताल-लय हृदयंगम कर
घुँघरू छनका छंद नवल पर
मोद-मगन हो भूम
.
पग-मंजिल के मिटें फासले
कवि मन जीतें अधर हास ले
बाँह-शाख पर लूम
२३.१.२०२६
०००
नेताजी सुभाष चंद्र बोस जयंती पराक्रम दिवस
बाला साहब ठाकरे जयंती
मतदान दिवस
***
गीत .
कर्मयोगी को नमन शत .
कोमल काया, दृढ़ अंतर्मन
स्नेह-सलिल का किया आचमन
माणिक-गिरिजा वंशधरा का
करें अनुकरण सभी युवा जन
कर्मठता के सम्मुख कवि नत
कर्मयोगी को नमन शत
.
मधुरा पथिक जवाहर पथ की
सेवक मातु-श्वास के रथ की
रंगों-रेखाओं से खेले
कहे कहानी कार्य न कथ की
दें आशीष आज गत आगत
कर्मयोगी को नमन शत
०००
सॉनेट
बाला साहब ठाकरे
.
कथनी-करनी एक थी,
मानव थे सिंह के सदृश,
दृष्टि हमेशा नेक थी।
कर न सका कोई विवश।
जन गण की आवाज बन,
सरकारों से जूझते,
झुक जाते थे सिंहासन।
राज शक्ति का बूझते।
संपादक थे तुम प्रखर,
व्यंग्यचित्र चुभते हुए,
जिनमें सत्य सका निखर।
जले दीप बुझते हुए।
हिन्दू की ललकार थे,
देशभक्ति-तलवार थे।।
२३.१.२०२५
०००
सोरठे कृष्ण के
.
जो पूजे तर जाए, द्वादश विग्रह कृष्ण के।
पुनर्जन्म नहिं पाए, मिले कृष्ण में कृष्ण हो।।
.
विग्रह-छाया रूप, राधा रुक्मिणी दो नहीं।
दोनों एक अनूप, जो जाने पा कृष्ण ले।।
.
नहीं आदि; नहिं अंत, कल-अब-कल के भी परे।
कृष्ण; कहें सब संत, कंत सृष्टि के कृष्ण जी।।
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श्वेत रक्त फिर पीत हों, अंत श्याम श्रीकृष्ण।
भिन्न-अभिन्न प्रतीत हों, हो न कभी संतृष्ण।।
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भेद दिखे होता नहीं, विधि-हरि-हर त्रय एक हैं।
चित्र गुप्त है त्रयी का, मति-विवेक अरु कर्म ज्यों।।
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'अ उ म' सह प्रणव मिल, कृष्ण सृष्टि पर्याय।
कृष्णाराधन नहिं जटिल, 'क्लीं' जपे प्रभु पाय।।
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कृष्ण सुलभ हैं भक्त को, व्यक्ताव्यक्त सुमूर्त हैं।
नयन मूँद कर ध्यान नित, भक्त-हृयदे में मूर्त हैं।।
.
हर अंतर कर दूर, कहें उपनिषद निकट जा।
हरि-दर्शन भरपूर, मन में कर तू तर सके।।
.
विप्र-भोज के बाद ही, सुनें कथा कर ध्यान।
कर्म खरे अनुपम सही, करते सदा सुजान।।
२३-१-२०२३
...
सॉनेट
स्नेह सलिल में सभी नहाओ
सद्भावों का करो कीर्तन
सदाचारमय रहे आचरण
सुमन सुमन सुरभि फैलाओ
सतत सजग सहकार न भूलो
स्वजनों का सत्कार सदा हो
सबका सबसे हित साधन हो
सुख-सपनों में झूल न फूलो
स्वेद नर्मदा नित्य नहाना
श्रम सौभाग्य निरंतर पाना
सत्य सखा को गले लगाना
ठोकर लगे, सम्हल उठ बढ़ना
पग-पग आगे-आगे बढ़ना
प्रभु अर्पित सारा फल करना
२३-१-२०२३
•••
यमकीय सोरठा
मन को हो आनंद, सर! गम सरगम भुला दे।
क्यों कल? रव कर आज, कलरव कर कर मिला ले।।
*
सॉनेट
सुभाष
*
नरनाहर शार्दूल था, भारत माँ का लाल।
आजादी का पहरुआ, परचम बना सुभाष।
जान हथेली पर लिए, ऊँचा रख निज भाल।।
मृत्युंजय है अमर यश, कीर्ति छुए आकाश।।
जीवन का उद्देश्य था, हिंद करें आजाद।
शत्रु शत्रु का मित्र कह, उन्हें ले लिया साथ।
जैसे भी हो कर सकें, दुश्मन को बर्बाद।।
नीति-रीति चाणक्य की, झुके न अपना माथ।।
नियति नटी से जूझकर, लिखा नया इतिहास।
काम किया निष्काम हर, कर्मयोग हृद धार।
बाकी नायक खास थे, तुम थे खासमखास।।
ख्वाब तुम्हारे करें हम, मिल-जुलकर साकार।।
आजादी की चेतना, तुममें थी जीवंत।
तुम जैसा दूजा नहीं, योद्धा नायक संत।।
२३-१-२०२२
***
हस्तिनापुर की बिथा कथा : मानव मूल्यों को गया मथा
आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
*
मनुष्य सामाजिक जीव है। समाज में रहते हुए उसे सामाजिक मान्यताओं और संबंधों का पालन करना होता है। आने से जाने तक वह अपनी अनुभूतियों को अभिव्यक्त और अन्यों की अनुभूतिजनित अभिव्यक्तियों को ग्रहण करता है। अभिव्यक्ति के विविध माध्यम अंग संचालन, भाव मुद्रा, रेखांकन, गायन, वादन नृत्य, वाणी आदि हैं। अनुभूतियों की वाणी द्वारा की गयी अभिव्यक्ति साहित्य की जननी है। साहित्य मानव-मन की सुरुचिपूर्ण ललित अभिव्यक्ति है। यह अभिव्यक्ति निरुद्देश्य नहीं होती। संस्कृत में साहित्य को ‘सहितस्य भाव’ अथवा ‘हितेन सहितं’ अर्थात ‘समुदाय के साथ’ जोड़ा जाता है। जिसमें सबका हित समाहित हो वही साहित्य है। विख्यात साहित्यकार जैनेन्द्र कुमार के शब्दों में - “मनुष्य का और मनुष्य जाति का भाषाबद्ध या अक्षर व्यक्त ज्ञान ही ‘साहित्य’ है। व्यापक अर्थ में साहित्य मानवीय भावों और विचारों का मूर्त रूप है।
बुंदेली और बुंदेलखंड
बुंदेली भारत के एक विशेष क्षेत्र बुन्देलखण्ड में बोली जाती है। बुंदेली की प्राचीनता का ठीक-ठीक अनुमान संभव नहीं है। संवत ५०० से १०० विक्रम अपभृंश काल है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार "भारत मुनि (तीसरी सदी) ने अपभृंश नाम न देकर 'देश भाषा' कहा है। डॉ. उदयनारायण तिवारी के मत में अपभृंश का विसात राजस्थान, गुजरात, बुंदेलखंड, पश्चिमोत्तर भारत, बंगाल और दक्षिण में मान्यखेत तक था। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार अपभृंश लोक प्रचलित भाषा है जो विभिन्न समयों में विभिन्न रूपों में बोली जाती थी। बुंदेली पैशाची से निकली शौरसेनी से विकसित पश्चिमी हिंदी का एक देशज रूप है। 'बिंध्याचल' की लोकमाता 'बिंध्येश्वरी' हैं। यहाँ की लोकभाषा का नाम 'बिंध्याचली' से बदलते-बदलते 'बुंदेली' हो जाना स्वाभाविक है।
ठेठ बुंदेली शब्द अनूठे हैं। वे सदियों से ज्यों के त्यों लोक द्वारा प्रयोग किये जा रहे हैं। बुंदेलखंडी के ढेरों शब्दों के अर्थ बांग्ला, मैथिली, भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी, बघेली आदि बोलने वाले आसानी से बता सकते हैं। प्राचीन काल में बुंदेली में हुए शासकीय पत्राचार, संदेश, बीजक, राजपत्र, मैत्री संधियों के अभिलेख प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। औरंगजेब और शिवाजी भी क्षेत्र के हिंदू राजाओं से बुंदेली में ही पत्र व्यवहार करते थे। बुंदेली में एक-एक क्षण के लिए अलग-अलग शब्द हैं। संध्या के लिए बुंदेली में इक्कीस शब्द हैं। बुंदेली में वैविध्य है, इसमें बांदा का अक्खड़पन है तो जबलपुर की मधुरता भी है।
वर्तमान बुंदेलखंड चेदि, दशार्ण एवं कारुष से जुड़ा था। यहाँ कोल, निषाद, पुलिंद, किराद, नाग आदि अनेक जनजातियाँ निवास करती थीं जिनकी स्वतंत्र भाषाएँ थीं। भरतमुनि के नाट्य शास्त्र में बुंदेली बोली का उल्लेख है। बारहवीं सदी में दामोदर पंडित ने 'उक्ति व्यक्ति प्रकरण' की रचना की। इसमें पुरानी अवधी तथा शौरसेनी ब्रज के अनेक शब्दों का उल्लेख है। इसी काल (एक हजार ईस्वी) के बुंदेली पूर्व अपभ्रंश के उदाहरणों में देशज शब्दों, की बहुलता हैं। हिंदी शब्दानुशासन (पं॰ किशोरीलाल वाजपेयी) के अनुसार हिंदी एक स्वतंत्र भाषा है, उसकी प्रकृति संस्कृत तथा अपभ्रंश से भिन्न है। बुंदेली की माता प्राकृत-शौरसेनी मौसी संस्कृत तथा बृज व् कन्नौजी सहोदराएँ हैं। बुंदेली भाषा की अपनी चाल, अपनी प्रकृति तथा वाक्य विन्यास को अपनी मौलिक शैली है। भवभूति (उत्तर रामचरितकार) के ग्रामीणजनों की भाषा विंध्येली प्राचीन बुंदेली ही है। संभवतः चंदेल नरेश गंडदेव (सन् ९४० से ९९९ ई.) तथा उसके उत्तराधिकारी विद्याधर (९९९ ई. से १०२५ ई.) के काल में बुंदेली के प्रारंभिक रूप में महमूद गजनवी की प्रशंसा की कतिपय पंक्तियाँ लिखी गई। इसका विकास रासो काव्य धारा के माध्यम से हुआ। जगनिक आल्हाखंड तथा परमाल रासो प्रौढ़ भाषा की रचनाएँ हैं। बुंदेली के आदि कवि के रूप में प्राप्त सामग्री के आधार पर जगनिक एवं विष्णुदास सर्वमान्य हैं, जो बुंदेली की समस्त विशेषताओं से मंडित हैं। बुंदेली के बारे में कहा गया है: 'बुंदेली वा या है जौन में बुंदेलखंड के कवियों ने अपनी कविता लिखी, बारता लिखवे वारों ने वारता (गद्य वार्ता) लिखी।
बुंदेली वैविध्य
बोली के कई रूप जगा के हिसाब से बदलत जात हैं। जई से कही गई है कि- 'कोस-कोस पे बदले पानी, गाँव-गाँव में बानी'। बुंदेलखंड में जा हिसाब से बहुत सी बोली चलन में हैं जैसे डंघाई, चौरासी, पवारी, पछेली, बघेली आदि। उत्तरी क्षेत्र (भिंड, मुरैना, ग्वालियर, आगरा, मैनपुरी, दक्षिणी इटावा आदि में बृज मिश्रित बुंदेली (भदावरी ) प्रचलित है। दक्षिणी क्षेत्र (उत्तरी छिंदवाड़ा (अमरवाड़ा, चौरई) व् सिवनी जिला (महाराष्ट्र से सटे गाँव छोड़कर) बुंदेली भाषी है। पूर्वी क्षेत्र (जालौन, हमीरपुर, पूर्वी छतरपुर, पन्ना, कटनी) में शुद्ध बुंदेली बोली जाती है किन्तु उत्तर-पश्चिम हमीरपुर व् दक्षिणी जालौन में बुंदेली का 'लोधांती' रूप तथा यमुना के दक्षिणी भाग में 'निभट्टा' प्रचलित है। दक्षिणी पन्ना की बुंदेली पर बघेली का प्रभाव (बनाफरी) है। पश्चिमी क्षेत्र में (मुरैना, श्योपुर, शिवपुरी, गुना, विदिशा, पश्चिमी होशंगाबाद (हरदा मिश्रित बुंदेली भुवाने की बोली') व सीहोर (मालवी मिश्रित बुंदेली) सम्मिलित है। मध्यवर्ती क्षेत्र (दतिया, छतरपुर, झाँसी, टीकमगढ़, विदिशा, सागर दमोह, जबलपुर, रायसेन, नरसिंहपुर) में शुद्ध बुंदेली लोक भाषा है।
बुंदेली वैशिष्ट्य
बुंदेली में क्रियापदों में गा, गे, गी का अभाव है। होगा - हुइए, बढ़ेगा - बढ़हे, मरेगा - मरहै, खायेगा - खाहै हो जाते हैं। 'थ' का 'त' तथा 'ह' का 'अ' हो जाता है, नहीं था - नई हतो, ली थी - लई तीं, जाते थे - जात हते आदि। कर्म कारक परसर्ग में 'खों' और 'कों' प्रचलित हैं। संज्ञा शब्दों का बहुवचन 'न' और 'ऐं' प्रत्यय लगकर बनाये जाते हैं। करन कारक 'से' 'सें' हो जाता है। संयुक्त वर्ण को विभाजन हो जाता है ' प्रजा से' 'परजा सें' हो जाता है। हकार का लोप हो जाता है - बहिनें - बैनें, कहता - कैत, कहा - कई, उन्होंने - उन्नें, बहू - बऊ, पहुँची - पौंची, शाह - शाय आदि। लोच और माधुर्यमयी बुंदेली 'ण' को 'न' तथा 'ड़' को 'र' में बदल लेती है। उच्चारण में 'अनुस्वार' को प्रधानता है - कोई - कोनउँ, उसने - ऊनें, आदि। संज्ञा एकवचन को बहुवचन में बदलने हेतु 'न' व 'ए' प्रत्यय लगाए जाते हैं। यथा सैनिक - सैनिकन, आदमी - आदमियन, पुस्तक - पुस्तकें आदि। शब्दों के संयुक्त रूप भी प्रयोग किये जाते हैं। यथा जैसे ही - जैसई, हद ही कर दी - हद्दई कर दई आदि। अकारान्त संज्ञा-विशेषणों का उच्चारण औकारांत हो जाता है। पखवाड़ा - पखवाडो, धोकर - धोकेँ आदि। लेकिन के लिए 'पै' का प्रयोग होता है। तृतीय पुरुष में एकवचन 'वह' का 'बौ / बो' हो जाता है। इसके कारकीय रूप बा, बासें, बाने, बाकी, बह वगैरह हैं। सानुनासिकता बुंदेली की विशेषता है। उन्नें, नईं, हतीं, सैं आदि। था, थी, थे आदि क्रमश: हतौ, हती, हते आदि हो जाते हैं। भविष्यवाची प्रत्यय गा, गी, गे का रूप बदल जाता है। होगा - हुइए, चढ़ेगा - चढ़हे, चढ़ चूका होगा - चढ़ चुकौ हुइए।
बुंदेली साहित्य सृजन परंपरा
बुंदेली साहित्य और लोक साहित्य की सुदीर्घ परंपरा १००० वि. से अब तक अक्षुण्ण है। जगनिक (संवत १२३०), विष्णुदास, मानिक कवि, थेपनाथ, छेहल अग्रवाल,गुलाब कायस्थ (१५०० वि.), बलभद्र मिश्र (१६०० वि.), हरिराम व्यास, कृपाराम, गोविंद स्वामी, बलभद्र कायस्थ (१६१० वि.), केशवदास (१६१२ वि.), खड़गसेन कायस्थ (१६६० वि.), सुवंशराय कायस्थ (१६८० वि.), अंबाप्रसाद श्रीवास्तव 'अक्षर अनन्य', बख्शी हंसराज,ईसुरी (१८०० वि.), पद्माकर (१८१० वि.), गंगाधर व्यास, ख्यालीराम, घनश्याम कायस्थ (१७२९ वि.), रघुराम कायस्थ (१७३७ वि.), लाल कवि, हिम्मद सिंह कायस्थ (१७४८ वि.), रसनिधि (१७५० वि.), हंसराज कायस्थ (१७५२ वि.), खंडन कायस्थ (१७५५ वि.), खुमान कवि, नवल सिंह कायस्थ (१८५० वि.), फतेहसिंह कायस्थ (१७८० वि.), शिवप्रसाद कायस्थ (१७९८ वि.), गुलालसिंह बख्शी (१९२२ वि.), मदनेश (१९२४ वि.), मुंशी अजमेरी (१९३९ वि.), रामचरण हयारण 'मित्र' (१९४७ वि.), जीवनलाल वर्मा 'विद्रोही व भगवान सिंह गौड़ (१९७२ वि.), कन्हैयालाल 'कलश' (१९७६ वि.), भैयालाल व्यास (१९७७ वि.), वासुदेव प्रसाद खरे (१९७९ वि.), नर्मदाप्रसाद गुप्त ( १९८८ वि.) के क्रम में इस प्रबंध काव्य के रचयिता महाकवि मुरारीलाल खरे (१९८९ वि.) ने बुंदेली और हिंदी वांग्मय को अपनी विलक्षण काव्य प्रतिभा से समृद्ध किया है। वाल्मीकि रामायण का ७ भागों में हिंदी पद्यानुवाद, रामकथा संबंधी निबंध संग्रह यावत् स्थास्यन्ति महीतले, संक्षिप्त बुंदेली रामायण तथा रघुवंशम के हिंदी पद्यानुवाद, के पश्चात् बुंदेली में संक्षिप्त महाभारत 'कुरुक्षेत्र की बिथा कथा रचकर हिंदी-बुंदेली दोनों को समृद्ध है। भौतिकी के आचार्य डॉ. एम. एल. खरे भाषिक शुद्धता और कथा-क्रम के प्रति आग्रही हैं। वे छंद की वाचिक परंपरा के रचनाकार हैं। वार्णिक-मात्रिक छंदों मानकों का पालन करने के लिए कथ्य या कथा वस्तु से समझौता स्वीकार्य नहीं है। इसलिए उनका काव्य कथानक के साथ न्याय कर पाता है।
बुंदेली में वीर काव्य
विश्व की सभी प्रधान भाषाओँ में वीर काव्य लेखन की परंपरा रही है। रामनारायण दूगड़ 'रहस' या 'रहस्य' से तथा आचार्य रामचंद्र शुक्ल, प्रो। ललिता प्रसाद सुकुल आदि 'रसायण' से रासो की उत्पत्ति मानते हैं। डॉ. काशीप्रसाद जायसवाल कविराज श्यामदास आदि 'रहस्य - रहस्सो - रअस्सो - रासो' विकासक्रम के समर्थक हैं। मुंशी देवी प्रसाद के मत में बुंदेली में वीर काव्य को 'रासो' कहा जाता है। डॉ. ग्रियर्सन राज्यादेश से रासो उत्पत्ति मानते हैं। महामहोपाध्याय डॉ. हरप्रसाद शास्त्री रासा (क्रीड़ा या झगड़ा) को रासो का जनक बताते हैं। महामहोपाध्याय डॉ.गौरीशंकर हीराचंद ओझा संस्कृत 'रास' रासो की उत्पत्ति के पक्षधर हैं। बुंदेलखंड में 'हों लगे सास-बहू के राछरे' जैसी पक्तियाँ रासो का उद्भव राछरे से इंगित करती हैं। रासो में किसी वीर नायक का चरित्र, संघर्ष, जय-पराजय आदि गीतमय वर्णन होता है। रासो शोकांत (ट्रेजिक एंड) जान मानस में सफल होता है। जगनिक कृत आल्ह खंड, चंद बरदाई रचित पृथ्वीराज रासो, दलपति विजय कवि कृत खुमान रासो, नरपति नाल्ह द्वारा लिखित बीसलदेव रासो आदि अपने कथानायकों के शौर्य का अतिरेकी, अतिशयोक्तिपूर्ण अतिरंजित वर्णन। अवास्तविक भले ही हो श्रोताओं-पाठकों को मोहता है। जगनिक "एक को मारे दो मर जाँय, तीजा गिरे कुलाटी खाँय'' लिखकर इस परंपरा का बीजारोपण करते हैं। रासो काव्यों की ऐतिहासिकता भी प्रश्नों के घेरे में रही है।
संस्कृत काव्यशास्त्र में महाकाव्य (एपिक) का प्रथम सूत्रबद्ध लक्षण आचार्य भामह ने प्रस्तुत किया है और परवर्ती आचार्यों में दंडी, रुद्रट तथा विश्वनाथ ने अपने अपने ढंग से इस महाकाव्य(एपिक)सूत्रबद्ध के लक्षण का विस्तार किया है। आचार्य विश्वनाथ का लक्षण निरूपण इस परंपरा में अंतिम होने के कारण सभी पूर्ववर्ती मतों के सार-संकलन के रूप में उपलब्ध है। महाकाव्य में भारत को भारतवर्ष अथवा भरत का देश कहा गया है तथा भारत निवासियों को भारती अथवा भरत की संतान कहा गया है ,
महाभारत रासो काव्यों के लक्षणों से युक्त महाकाव्य है। रासो की तरह नायकों की अतिरेकी शौर्य कथाएँ और वंश परिचय महाभारत में है। रासों से भिन्नता यह कि नायक कई हैं तथा नायकों के अवगुणों, पराजयों व पीड़ाओं का उल्लेख है। भिन्न-भिन्न प्रसंगों में उदात्त-वीर नायक बदलते हैं। एक सर्ग का नायक अन्य सर्ग में खलनायक की तरह दिखता है। इस दृष्टि से महाभारत रासो-का समुच्चय प्रतीत है।महाभारत की कथा चिर काल से सृजनधर्मियों का चित्त हरण करती रही है। अनेक रचनाकारों ने गद्य और पद्य दोनों में महाभारत की कथा के विविध आयाम उद्घाटित किये हैं। डॉ. मुरारीलाल खरे जी द्वारा रचित यह प्रबंध काव्य कृति रासो काव्य लक्षणों से यथास्थान अलंकृत है।
श्रव्य काव्य : प्रबंध काव्य और महाकाव्य
श्रव्य काव्य का लक्षण श्रवण में आनंद मिलना है। प्रबंध काव्य में श्रवयत्व और पाठ्यत्व दोनों गुण होते हैं।
प्रबंध का अर्थ है प्रबल रूप से बँधा हुआ। प्रबंध का प्रत्येक अंश अपने पूर्व और पर अंश के साथ निबध्द होता है। प्रबंध काव्य में कोई प्रमुख कथा काव्य के आदि से अंत तक क्रमबद्ध रूप में चलती है। कथा का क्रम बीच में कहीं नहीं टूटता और गौण कथाएँ बीच-बीच में सहायक बन कर आती हैं। प्रबंध काव्य के दो भेद होते हैं -
महाकाव्य
खण्डकाव्य
महाकाव्य में किसी ऐतिहासिक या पौराणिक महापुरुष की संपूर्ण जीवन कथा का आद्योपांत वर्णन होता है। खंडकाव्य में किसी की संपूर्ण जीवनकथा का वर्णन न होकर केवल जीवन के किसी एक ही भाग का वर्णन होता है। महाकाव्य अपने देश की जातीय और युगीन सभ्यता-संस्कृति के वाहक होते हैं। इनमें ऐतिहासिक घटनाओं के साथ मिथकों का अंतर्गुफन रहता है। इन महाकाव्यों के केन्द्र में युद्ध रहता है जो व्यक्तिगत तथा वंशगत सीमाओं से ऊपर उठकर जातीय युद्ध का रूप धारण कर लेता है। भारतीय महाकाव्यों में ये 'धर्मयुद्ध' के रूप में लड़े गए हैं। इलियड और ओडिसी में ये युद्ध मूलतः जातीय युद्ध हैं- धर्मयुद्ध नहीं। इसका कारण यह है कि यूनानी चिंतक भाग्यवादी रहा है किन्तु यहाँ भी धर्म की पराजय और अधर्म की विजय को मान्यता नहीं दी गई। रचनाबद्ध होने से पहले इनकी मूलवर्ती घटनाएं मौखिक परंपरा के रूप में रहती हैं। इसलिए सार्वजनिक प्रस्तुति के साथ किसी-न-किसी रूप में इनका प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष संबंध रहता है। इनकी शैली पर वाचन-शैली का प्रभाव अनिवार्यतः लक्षित होता है।
हिंदी में आल्ह खंड (जगनिक), पृथ्वीराज रासो (चंदबरदाई), पद्मावत (जायसी), रामचरित मानस (तुलसीदास), साकेत (मैथिलीशरण गुप्त), साकेत संत (बलदेव प्रसाद मिश्र), प्रियप्रवास (अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध'), कृष्णायण (द्वारिकाप्रसाद मिश्र), कामायनी (जयशंकर प्रसाद), वैदेही वनवास (हरिऔध), सिद्धार्थ (अनूप शर्मा), हल्दीघाटी (श्यामनारायण नारायण पांडेय), कुरुक्षेत्र (दिनकर), आर्यावर्त (मोहन लाल महतो), नूरजहां (गुरुभक्त सिंह), गांधी पारायण (अंबिकाप्रसाद दिव्य), कैकेयी (इंदु सक्सेना), उत्तर रामायण तथा उत्तर भागवत (डॉ. किशोर काबरा), दधीचि (आचार्य भगवत दुबे), महिजा तथा रत्नजा (डॉ. सुशीला कपूर), वीरांगना दुर्गावती ( गोविंद प्रसाद तिवारी), विवेक श्री (श्रीकृष्ण सरल), मृत्युंजय मानव गणेश (डॉ. जगन्नाथ प्रसाद 'मिलिंद'), कुटिया का राजपुरुष (विश्वप्रकाश दीक्षित 'बटुक'), कुँअर सिंह (चंद्रशेखर मिश्र), उत्तर कथा (प्रतिभा सक्सेना), महामात्य, सूतपुत्र तथा कालजयी (दयाराम गुप्त 'पथिक'), दलितों का मसीहा (जयसिंह व्यथित), क्षत्राणी दुर्गावती (केशव सिंह दिखित), रणजीत राय (गोमतीप्रसाद विकल), स्वयं धरित्री ही थी (रमाकांत श्रीवास्तव), परे जय पराजय के (डॉ. रमेश कुमार बुधौलिआ), मानव (डॉ. गार्गीशरण मिश्र 'मराल'), महानायक वीरवर तात्या टोपे (वीरेंद्र अंशुमाली), दमयंती (नर्बदाप्रसाद गुप्त), महाराणा प्रताप व् आहुति (डॉ. बृजेश सिंह), राष्ट्र पुरुष नेताजी सुभाषचंद्र बोस (रामेश्वर नाथ मिश्र 'अनुरोध'), मांडवी एक विस्मृता (सरोज गौरिहार), शौर्य वंदन (रवींद्र नाथ तिवारी) आदि महाकाव्य के रत्नहार में 'हस्तिनापुर की बिथा कथा' एक दीप्तिमान रत्न की तरह विश्ववाणी हिंदी के रत्नागार की श्रीवृद्धि करेगा।
'हस्तिनापुर की बिथा कथा' महाभारत में वर्णित कौरव-पांडव संघर्ष केंद्रित होते हुए भी स्वतंत्र काव्य कृति है। हस्तिनापुर नायक है जिसकी व्यथा कारण कुरु कुलोत्पन्न धृतराष्ट्र पुत्र और पाण्डु पुत्र बने। वस्तुत: हस्तिनापुर मानव संस्कृति और मानव मूल्यों के अतिरेक का शिकार हुआ। आदर्शवादियों ने आत्मकेंद्रित होकर मूल्यों का मनमाना अर्थ लगाया और नीति पर चलते-चलते अनीति कर बैठे। स्वार्थ-संचालित जनों ने 'स्व' के लिए 'पर' ही नहीं 'सर्व' को भी नाश नहीं किया, बिन यह सोचे कि वे स्वयं नहीं बच सकेंगे। डॉ.खरे ने आरंभ में ही राजवंश में अंतर्व्याप्त द्वेष को द्वन्द का मूल कारण बताते हुए 'गेहूँ के साथ घुन पिसने' की तरह आर्यावर्त अर्थात आम जन का बिना किसी कारण विनाश होने का संकेत किया है।
राजबंस की द्वेष आग में झुलस आर्यावर्त गओ
घर में आग लगाई घर में बरत दिया की भड़की लौ
कौरव-पांडवों की द्वेषाग्नि और कुल की रक्षा हेतु राजकुमारों को दिलायी गयी शिक्षा और अस्त्र-शस्त्र ही कुल के विनाश में सहायक हुए।
दिव्य अस्त्र पाए ते जतन सें होवे खों कुल के रक्षक
नष्ट भये आपस में भिड़कें , बने बंधुअन के भक्षक
महाभारत के विस्तृत कथ्य को समेटते हुए मौलिकता की रक्षा करने के साथ-साथ पाठकीय अभिरुचि, आंचलिक बोली का वैशिष्ट्य, छांदस लयबद्धता और लालित्य बनाये रखने पञ्च निकषों पर खरी कृति जी रचना कर पाना खरे जी के ही बस की बात है।संस्कृत काव्य शास्त्र में भामह, डंडी, रुद्रट, विश्वनाथ आदि आचार्यों ने कथानक की ऐतिहासिकता, कथानक का अष्टसर्गीय अथवा अधिक विस्तार, कथानक का क्रमिक विकास, धीरोदात्त नायक, अंगी रस (श्रृंगार, वीर, शांत व् करुण में से एक), लोक कल्याण की प्राप्ति, छंद वैविध्य, भाषिक लालित्य आदि महाकाव्य के तत्व कहे हैं। अरस्तू के अनुसार महाकाव्य की भाषा प्रसन्नतादायी हो किंतु क्षुद्र (अशुद्ध) न हो। स्पेंसर महाकाव्य के लिए वैभव-गरिमा को आवश्यक मानते हैं। औदात्य और औदार्य, शौर्य और पराक्रम, श्रृंगार और विलास, त्याग और वैराग, गुण और दोष के पञ्च निकषों पर ' हस्तिनापुर की बिथा कथा' अपनी मिसाल आप है।
मौलिकता
महाकाव्य में मौलिकता का अपना महत्त्व है। खरे जी ने यत्र - तत्र पात्रों और घटनाओं पर अपनी ओर से गागर में सागर की तरह टिप्पणियाँ की हैं। द्रोणाचार्य के मनोविज्ञान पर दो पंक्तियाँ देखें -
द्रोण चाउतते उनकौ बेटा अर्जुन सें बड़केँ जानें
सो अर्जुन खों पौंचाउतते पानी ल्याबे के लाने
सत्यवती के पोतों में से विदुर में क्षत्रिय रक्त न होने के कारण स्वस्थ्य व योग्य होते हुए भी सिंहासन योग्य न माने जाने की तर्कसम्मत स्थापना खरे जी है। गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित महाभारत में भीष्म का लालन-पालन गंगा द्वारा करना वर्णित है जबकि खरे जी ने शांतनु द्वारा बताया है। अशिक्षित सत्यवती द्वारा उचित-अनुचित का विचार किये बिना, पुत्र वधुओं की सहमति के बिना वंश वृद्धि के मोह में बलात सन्तानोपत्ति हेतु विवश करना और उसका दुष्प्रभाव संतान पर होना विज्ञान सम्मत है।
गांधारी द्वारा अंधे पति की आँखें न बनकर खुद भी आँखों पर पट्टी बाँधकर नेत्रहीन होने के दुष्प्रभाव को भी इंगित किया गया है।
पतिब्रता धरम जानकेँ धरमसंगिनी तौ हो गइ
आँखें खुली राख के भोली अंधे की लठिया नइं भइ
आदर्श और पराक्रमी माने जाने वाले भीष्म धृतराष्ट्र को सम्राट बनाते समय यह नहीं सोच सके कि पदका का नशा चढ़ता है, उतरता नहीं -
धृतराष्ट्र को पुत्र जेठो अधिकार माँगहै गद्दी पै
जौ नइं सोचे भीष्म , बिचार कर सकोतो धीवर जी पै
बुंदेलखंड में दोहा प्रचलित है 'जब जैसी भबितब्यता, तब तैसी बने सहाय / आप न जावै ताहि पै, ताहि तहाँ लै जाए', तुलसीदास जी लिखते हैं 'होइहै सोही जो राम रचि राखा', खरे जी के अनुसार हैं हस्तिनापुर में भी 'भावी प्रबल' थी जिसे भीष्म नहीं जान या टाल सके-
सोचन लगे पितामह घर में इत्ते सूरबीर हैं जब
कोऊ दुस्मन कर नइं पाये ई राज पै आक्रमन अब
बे का जानतते जा शिक्षा मिली परस्पर लड़बे खों
अस्त्र - सस्त्र जे काम आउनें आपुस में मर मिटवे खों
धृतराष्ट्र के बुलाने पर पांडव दोबारा जुआं खेलने पहुँचे। कवि इस पर टिप्पणी करता है -
काका की आज्ञा को पालन मानत धरम युधिष्ठिर रए
एक बेर के जरे आग में हाँत जराउन फिर आ गए
ऐसी ही टिप्पणी गंधर्वराज से लड़-हार कर बंदी बने कौरवों को पांडवों द्वारा मुक्त कराये जाने के प्रसंग में भी है -
नीच सुभाव होत जिनकौ , ऐसान कौऊ कौ नइं मानत
बदी करत नेकी के बदलैं , होशयार खुद खों जानत
ऐसी टिप्पणियाँ कथा - प्रवाह में बाधक न होकर , पाठक के मन की बात व्यक्त कर उसे कथा से जोड़ने में सफल हुई हैं।
पांडवों के मामा शल्य उनकी सहायता हेतु आते हुए मार्ग दुर्योधन के कपट जाल में फँसकर उसके पक्ष में फिसल गए। यहाँ (अन्यत्र भी) कवि ने मुहावरे का सटीक प्रयोग किया है - ' बेपेंदी के लोटा घाईं लुड़क दूसरी तरफ गए ' ।
दिशा - दर्शन
महाकवि खरे जी ने यत्र - तत्र नीतिगत संकेत इस तरह किये हैं कि वे कथा - प्रवाह को अवरुद्ध किये बिना पाठकों और राष्ट्र नायकों को राह दिखा सकें -
' सत्यानास देस का भओ तो , नई बंस कौ भओ भलो '
संकेत स्पष्ट है कि देश को हानि पहुँचाकर खुद का भला नहीं किया जा सकता। ऐसे अनेक संकेत कृति को प्रासंगिक और उपादेय बनाते हैं।
जीवन में अव्यवहारिक, अस्वाभाविक निर्णय दुखद तथा विनाशकारी परिणाम देते हैं। आत्मगौरव को सर्वोच्च मानने और कुल अथवा समाज के हित को गौड़ मानने का परिणाम दुखद हुआ -
महात्याग से नाव भीष्म कौ जग में भौत बड़ो हो गओ
पर कुल की परंपरा टूटी , बीज अनीति कौ पर गओ
आगें जाकर अंकुर फूटे , बड़ अनीति विष बेल बनी
जीसें कुल में तनातनी भइ , भइयन बीच लड़ाई ठनी
रक्त शुद्धता न होने कारण सर्वथा योग्य विदुर की अवमानना , जाति के आधार पर एकलव्य और कर्ण के साथ अन्याय , अंबा , अंबिका , अंबालिका द्रौपदी आदि स्त्री रत्नों की अवहेलना , पुत्र मोह , ईर्ष्या , द्वेष अहंकार आदि यथास्थान यथोचित विवेचना कर खरे जी ने कृति को युगबोध, सामयिकता लोकोपयोगिता के निकष पर खरा रचा है।
कथाक्रम सुविदित होने कारण उत्सुकता और कौतुहल बनाये रखने की चुनौती को खरे ने स्वीकारा और जीता है। देश - काल की परिस्थितियों और चुनौतियों के परिप्रेक्ष्य में सर्पोवोपयोगी कृति का प्रणयन कर खरे जी ने हिंदी - बुंदेली रत्नागार को समृद्ध किया है। उनकी आगामी कृति की प्रतीक्षा पाठकों को रहेगी।
२३.१.२०२१
***
दोहा सलिला
*
हर संध्या संजीव हो, स्वप्नमयी हो रात।
आँख मिलाकर ज़िंदगी, करे प्रात से बात।।
*
मंजूषा मन की रहे, स्नेह-सलिल भरपूर।
द्वेष न कर पाए कभी, सजग रहें आघात।।
*
ऋतु बसंत की आ रही, झूम मंजरी शाख।
मधुरिम गीत सुना रही, दे कोयल को मात।।
*
जब-जब मन उन्मन हुआ, तुम ही आईं याद।
सफल साधना दे गई, सपनों की सौगात।।
*
तन्मय होकर रूप को, आराधा दिन-रैन।
तन तनहा ही रह गया. चुप अंतर्मन तात।।
२३.१.२०१९
***
नवगीत
सड़क पर
*
सड़क पर
सिसकती-घिसटती
हैं साँसें।
*
इज्जत की इज्जत
यहाँ कौन करता?
हल्ले के हाथों
सिसक मौन मरता।
झुठला दे सच,
अफसरी झूठ धाँसे।
जबरा यहाँ जो
वही जीतता है।
सच का घड़ा तो
सदा रीतता है।
शरीफों को लुच्चे
यहाँ रोज ठाँसें।
*
सौदा मतों का
बलवा कराता।
मज़हबपरस्तों
को, फतवा डरता।
सतत लोक को तंत्र
देता है झाँसे।
*
यहाँ गूँजते हैं
जुलूसों के नारे।
सपनों की कोशिश
नज़र हँस उतारे।
भोली को छलिए
बिछ जाल फाँसें।
*
विरासत यही तो
महाभारती है।
सत्ता ही सत को
रही तारती है
राजा के साथी
हुए हाय! पाँसे।
२०.१.२०१८
***
लघु कथा -
जैसे को तैसा
*
कत्ल के अपराध में आजीवन कारावास पाये अपराधी ने न्यायाधीश के सामने ही अपने पिता पर घातक हमला कर दिया। न्यायाधीश ने कारण पूछा तो उसने नाट्य की उसके अपराधी बनने के मूल में पिता का अंधा प्यार ही था। बचपन में मामा की शादी में उसने पिता के एक साथी की पिस्तौलसे ११ गोलियाँ चला दी थीं। पिता ने उसे डाँटने के स्थान पर जाँच करने आये पुलिस निरीक्षक को राजनैतिक पहुँच से रुकवा दिया तथा झूठा बयान दिलवा दिया की उसने खिलौनेवाली पिस्तौल चलायी थी। पहली गलती पर सजा मिल गयी होती तो वह बात-बात पर पिस्तौल का उपयोग करना नहीं सीखता और आज आजीवन कारावास नहीं पाता। पिता उसका अपराधी है जिसे दुनिया की कोई अदालत या कानून दोषी नहीं मानेगा इसलिए वह अपने अपराधी को दंडित कर संतुष्ट है, अदालत उसे एक जन्म के स्थान पर दो जन्म का कारावास दे दे तो भी उसे स्वीकार है।
२३.१.२०१६
***
मुक्तिका:
रात
( तैथिक जातीय पुनीत छंद ४-४-४-३, चरणान्त sssl)
.
चुपके-चुपके आयी रात
सुबह-शाम को भायी रात
झरना नदिया लहरें धार
घाट किनारे काई रात
शरतचंद्र की पूनो है
'मावस की परछाईं रात
आसमान की कंठ लंगोट
चाहे कह लो टाई रात
पर्वत जंगल धरती तंग
कोहरा-पाला लाई रात
वर चंदा तारे बारात
हँस करती कुडमाई रात
दिन है हल्ला-गुल्ला-शोर
गुमसुम चुप तनहाई रात
२३-१-२०१५
गीतः
सुग्गा बोलो
जय सिया राम...
सन्जीव
*
सुग्गा बोलो
जय सिया राम...
*
काने कौए कुर्सी को
पकड़ सयाने बन बैठे
भूल गये रुकना-झुकना
देख आईना हँस एँठे
खिसकी पाँव तले धरती
नाम हुआ बेहद बदनाम...
*
मोहन ने फिर व्यूह रचा
किया पार्थ ने शर-सन्धान
कौरव हुए धराशायी
जनगण सिद्ध हुआ मतिमान
खुश मत हो, सच याद रखो
जन-हित बिन होगे गुमनाम...
*
हर चूल्हे में आग जले
गौ-भिक्षुक रोटी पाये
सांझ-सकारे गली-गली
दाता की जय-जय गाये
मौका पाये काबलियत
मेहनत पाये अपना दाम...
*
१३-७-२०१४
छंद सलिला:
(अब तक प्रस्तुत छंद: अग्र, अचल, अचल धृति, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्र वज्रा, उपेन्द्र वज्रा, कीर्ति, घनाक्षरी, छवि, दीप, दोधक, निधि, प्रेमा, माला, वाणी, शक्तिपूजा, शाला, सार, सुगति/शुभगति, सुजान, हंसी)
ग्यारह मात्रिक रौद्र छंद
ग्यारह मात्राओं से बननेवाले रौद्र छंद में विविध वर्णवृत्त संयोजन से १४४ प्रकार के छंद रचे जा सकते हैं.
अहीर छंद
अहीर ग्यारह मात्राओं का छंद है जिसके अंत में जगण (१२१) वर्ण वृत्त होता है.
उदाहरण:
१. सुर नर संत फ़क़ीर, कहें न कौन अहीर
आत्म ग्वाल तन धेनु, हो प्रयास मन-वेणु
प्रकृति-पुरुष कर संग, रचते सृष्टि अनंग
ग्यारह हों जब एक, पायें बुद्धि-विवेक
२. करे सतत निज काम, कर्ता मौन अनाम
'सलिल' दैव यदि वाम, रखना साहस थाम
सुबह दोपहर शाम, रचना रचें ललाम
कर्म करें अविराम, गहें सुखद परिणाम
३. पूजें ग्यारह रूद्र, मन में रखकर भक्ति
हो जल-बिंदु समुद्र, दे अनंत शुभ शक्ति
लघु-गुरु-लघु वर अंत, रचिए छंद अहीर
छंद कहे कवि-संत, जैसे बहे समीर
२३.१.२०१४
***

मंगलवार, 13 जनवरी 2026

जनवरी १३, पूर्णिका, पलाश, शारदा, सॉनेट, सोरठा, हाइकु, देवरहा बाबा, कृष्ण, महेश योगी, लालबहादुर, नवगीत,

सलिल सृजन जनवरी १३
पूर्णिका 
परम पिता की कृपा है संतोष
रीतता-घटता नहीं यह कोष
.
प्रार्थना प्रभु से महज इतनी
हो न मन में किसी के प्रति रोष
.
साधना हो अनवरत तब ही
सफलता का हो सके जयघोष
.
एक अँगुली उठे औरों पर
तीन कहतीं खुदी में हैं दोष
.
नर्मदा है सृजन की सलिला
भाव-रस-भाषा रहे निर्दोष
००० 
पूर्णिका
रमा चंचला, मन चंचल
रमे रमा में हो अविचल
.
नेह नर्मदा रुद्ध न हो
रहे प्रवाहित कलकल कल
.
बुद्धि रही भरमाती क्यों
भेद-बुद्धि है मिथ्या छल
.
उगना है सूरज सम तो
हँसते-हँसते संझा ढल
.
नहीं समस्या है ऐसी
जिसका कोई मिले न हल
.
परख साधु की होती तब
जब टकराता कोई खल
.
मोबाइल रख पॉकेट में
आपस में करिए मिल गौल
.
मंजिल कितनी दूर न सोच
पग चूमेगी चलता चल
.
देख अन्य की प्रगति न जल
तम हरने दीपक बन जल
.
दमयंती हो हर नारी
नर हो पाए राजा नल
.
कट जाते हैं युग पल में
युग बन कटता 'सलिल' न पल
१३.१.२०२६
०००
पलाशी शारद वंदना 
शारद! लिए पलाश आए हम, माँ सिंगार करो।
किंशुक कुसुम लगा वेणी में, भव-भय पीर हरो।।
करधन टेसू, कंगन छेवला, पायल सजे समिद्धर।
कौसुंबी कंचुकी, हरित आँचल स्वीकार करो।।
धारण कर गलहार त्रिपर्णी, बाले पहन सुपर्णी।
माते! बीजस्नेह दे संतति का उद्धार करो।।
करक ब्रह्मपादप पोरासू पलसु पिलासु पुतद्रु,
पालोशी पांगोंग लिए हम हँस उपहार वरो।।
अनुपम छवि रस रूप मनोहर स्वर व्यंजन मतिमय लख।
जीव सभी संजीव हो सकें, मातु! सलिल सह विचरो।।
१३.१.२०२५
०००
सॉनेट
सूरज छिपकर तरु पीछे से झाँक रहा है,
उषा भीत है सोचे साथ रहे या छोड़े?
लव जिहाद का नारा सुन पग पीछे मोड़े,
निकलूँ या छिप जाऊँ, गुपचुप आँक रहा है।
अरुणोदय का दृश्य मनोरम टाँक रहा है,
बाजों ने गौरैया के सब सपने तोड़े,
जवां कबूतर घायल खा श्रद्धा के कोड़े,
हृदय ऐक्य का हाय! टूट दो फाँक रहा है।
बाल राम को जिसने दूल्हा राजा देखा,
सिया सहित दरबार सजाकर हर पल पूजा,
हैं अवाक् वह अवध, देख धनुधारी आया।
कौन करे हमलों-दंगों का लेखा-जोखा?
१३.१.२०२४
•••
सोरठा सलिला
कृष्ण
*
अनुपम कौशल कृष्ण, काम करें निष्काम रह।
हुए नहीं वे तृष्ण, थे समान सुख-दुःख उन्हें।।
खींचो रेखा एक, अकरणीय-करणीय में।
जाग्रत रखो विवेक, कृष्ण न कह करते रहे।।
कृष्ण कर्म पर्याय, निष्फल कुछ करते नहीं।
सक्रियता पर्याय, निष्क्रियता वरते नहीं।।
गहो कर्म सन्यास, यही कृष्ण-संदेश है।
हो न मलिन विन्यास, जग-जीवन का तनिक भी।.
कृष्ण -राधिका एक, कृष्ण न मिलते कृष्ण भज।
भजों राधिका नेंक, आ जाएँगे कृष्ण खुद।।
तहाँ कृष्ण जहँ प्रेम, हो न तनिक भी वासना।
तभी रहेगी क्षेम, जब न वास हो मोह का।।
१३-१-२०२३
***
सॉनेट
महर्षि महेश योगी
*
गुरु-पद-रज, आशीष था।
मार्ग आप अपना गढ़ा।
ध्यान मार्ग पर पग बढ़ा।।
योग हुआ पाथेय था।।
महिमा थी ओंकार की।
ब्रह्मानंद सुयश भजा।
फहराई जग में ध्वजा।।
बना विश्व सरकार दी।।
सपने थे अनगिन बुने।
वेद-ज्ञान हर जन गुने।
जतन निरंतर अनसुने।
पश्चिम नत हो सिर धुने।।
योगमार्ग अपना चुने।।
त्याग भोग के झुनझुने।।
१३-१-२०२२
***
सॉनेट
लालबहादुर
*
छोटा कद, ऊँचा किरदार।
लालबहादुर नेता सच्चे।
सादे सरल जिस तरह बच्चे।।
भारत माँ पे हुए निसार।।
नन्हें ने दृढ़ कदम बढ़ाया।
विश्वशक्ति को धता बताया।
भूखा रहना मन को भाया।।
सीमा पर दुश्मन थर्राया।।
बापू के सच्चे अनुयायी।
दिशा देश को सही दिखायी।
जनगण से श्रद्धा नित पायी।
विजय पताका थी फहरार्ई।।
दुश्मन ने भी करी बड़ाई।।
सब दुनिया ने जय-जय गाई।।
१३-१-२०२२
***
नवगीत
दूर कर दे भ्रांति
*
दूर कर दे भ्रांति
आ संक्राति!
हम आव्हान करते।
तले दीपक के
अँधेरा हो भले
हम किरण वरते।
*
रात में तम
हो नहीं तो
किस तरह आये सवेरा?
आस पंछी ने
उषा का
थाम कर कर नित्य टेरा।
प्रयासों की
हुलासों से
कर रहां कुड़माई मौसम-
नाचता दिनकर
दुपहरी संग
थककर छिपा कोहरा।
संक्रमण से जूझ
लायें शांति
जन अनुमान करते।
*
घाट-तट पर
नाव हो या नहीं
लेकिन धार तो हो।
शीश पर हो छाँव
कंधों पर
टिका कुछ भार तो हो।
इशारों से
पुकारों से
टेर सँकुचे ऋतु विकल हो-
उमंगों की
पतंगें उड़
कर सकें आनंद दोहरा।
लोहड़ी, पोंगल, बिहू
जन-क्रांति का
जय-गान करते।
*
ओट से ही वोट
मारें चोट
बाहर खोट कर दें।
देश का खाता
न रीते
तिजोरी में नोट भर दें।
पसीने के
नगीने से
हिंद-हिंदी जगजयी हो-
विधाता भी
जन्म ले
खुशियाँ लगाती रहें फेरा।
आम जन के
काम आकर
सेठ-नेता काश तरते।
१२-१-२०१७
***
हाइकु
*
झूठ को सच
करती सियासत
सच को झूठ
*
सुबहो-शाम
आराम है हराम
राम का नाम
*
प्राची लगाती
माथे पर बिंदिया
साँझ सुहाती
*
शंख निनाद
मग्न स्वर तरंग
मिटा विषाद
*
गया बरस
तनिक न दे सका
सुख हरष
*
अस न बस
मनाना ही होगा
नया बरस
*
बिच्छू का डंक
सहे संत स्वभाव
रहे नि:शंक
१३.१.२०१६
***
नवगीत:
.
खों-खों करते
बादल बब्बा
तापें सूरज सिगड़ी
.
आसमान का आँगन चौड़ा
चंदा नापे दौड़ा-दौड़ा
ऊधम करते नटखट तारे
बदरी दादी 'रोको' पुकारें
पछुआ अम्मा
बड़बड़ करती
डाँट लगातीं तगड़ी
.
धरती बहिना राह हेरती
दिशा सहेली चाह घेरती
ऊषा-संध्या बहुएँ गुमसुम
रात और दिन बेटे अनुपम
पाला-शीत न
आये घर में
खोल न खिड़की अगड़ी
.
सूर बनाता सबको कोहरा
ओस बढ़ाती संकट दोहरा
कोस न मौसम को नाहक ही
फसल लाएगी राहत को ही
हँसकर खेलें
चुन्ना-मुन्ना
मिल चीटी-धप, लँगड़ी
....
बाल नवगीत:
*
सूरज बबुआ!
चल स्कूल
*
धरती माँ की मीठी लोरी
सुनकर मस्ती खूब करी
बहिन उषा को गिरा दिया
तो पिता गगन से डाँट पड़ी
धूप बुआ ने लपक चुपाया
पछुआ लाई
बस्ता-फूल
सूरज बबुआ!
चल स्कूल
*
जय गणेश कह पाटी पूजन
पकड़ कलम लिख ओम
पैर पटक रो मत, मुस्काकर
देख रहे भू-व्योम
कन्नागोटी, पिट्टू, कैरम
मैडम पूर्णिमा के सँग-सँग
हँसकर
झूला झूल
सूरज बबुआ!
चल स्कूल
*
चिड़िया साथ फुदकती जाती
कोयल से शिशु गीत सुनो
'इकनी एक' सिखाता तोता
'अ' अनार का याद रखो
संध्या पतंग उड़ा, तिल-लड़ुआ
खा पर सबक
न भूल
सूरज बबुआ!
चल स्कूल
मंगलवार, 6 जनवरी 2015
***
कृति चर्चा:
हौसलों के पंख : नवगीत की उड़ान
चर्चाकार: आचार्य संजीव
.
[कृति विवरण: हौसलों के पंख, नवगीत संग्रह, कल्पना रामानी, आकार डिमाई, आवरण पेपरबैक, बहुरंगी, पृष्ठ ११२, नवगीत ६५, १२०/-, अंजुमन प्रकाशन इलाहाबाद]
.
ओम निश्चल: 'गीत-नवगीत के क्षेत्र में इधर अवरोध सा आया है. कुछ वरिष्‍ठ कवि फिर भी अपनी टेक पर लिख रहे हैं... एक वक्‍त उनके गीत... एक नया रोमानी उन्माद पैदा करते थे पर धीरेधीरे ऐसे जीवंत गीत लिखने वाली पीढी खत्‍म हो गयी. कुछ कवि अन्य विधाओं में चले गए .... नये संग्रह भी विशेष चर्चा न पा सके. तो क्‍या गीतों की आभा मंद पड़ गयी है या अब वैसे सिद्ध गीतकार नहीं रहे?'
'गीत में कथ्य वर्णन के लिए प्रचुर मात्रा में बिम्बों, प्रतीकों और उपमाओं के होता है जबकि नवगीत में गागर में सागर, बिंदु में सिंधु की तरह इंगितों में बात कही जाती है। 'कम बोले से अधिक समझना' की उक्ति नवगीत पर पूरी तरह लागू होती है। नवगीत की विषय वस्तु सामायिक और प्रासंगिक होती है। तात्कालिकता नवगीत का प्रमुख लक्षण है जबकि सनातनता, निरंतरता गीत का। गीत रचना का उद्देश्य सत्य-शिव-सुंदर की प्रतीति तथा सत-चित-आनंद की प्राप्ति कही जा सकती है जबकि नवगीत रचना का उद्देश्य इसमें बाधक कारकों और स्थितियों का इंगित कर उन्हें परिवर्तित करना कहा जा सकता है। गीत महाकाल का विस्तार है तो नवगीत काल की सापेक्षता। गीत का कथ्य व्यक्ति को समष्टि से जोड़कर उदात्तता के पथ पर बढ़ाता है तो नवगीत कथ्य समष्टि की विरूपता पर व्यक्ति को केंद्रित कर परिष्कार की राह सुझाता है। भाषा के स्तर पर गीत में संकेतन का महत्वपूर्ण स्थान होता है जबकि नवगीत में स्पष्टता आवश्यक है। गीत पारम्परिकता का पोषक होता है तो नवगीत नव्यता को महत्व देता है। गीत में छंद योजना को वरीयता है तो नवगीत में गेयता को महत्व मिलता है।'
उक्त दो बयानों के परिप्रेक्ष्य में नवगीतकार कल्पना रामानी के प्रथम नवगीत संग्रह 'हौसलों के पंख' को पढ़ना और और उस पर लिखना दिलचस्प है।
कल्पना जी उस सामान्य वर्ग का प्रतिनिधित्व करती हैं जिसके लिए साहित्य रचा जाता है और जो साहित्य से जुड़कर उसे सफल बनाता है। जहाँ तक ओम जी का प्रश्न है वे जिस 'रोमानी उन्माद' का उल्लेख करते हैं वह उम्र के एक पड़ाव पर एक मानसिकता विशेष की पहचान होता है। आज के सामाजिक परिवेश और विशेषकर जीवनोद्देश्य लेकर चलनेवाले युवाओं नई ने इसे हाशिये पर रखना आरंभ कर दिया है। अब किसी का आँचल छू जाने से सिहरन नहीं होती, आँख मिल जाने से प्यार नहीं होता। तन और मन को अलग-अलग समझने के इस दौर में नवगीत निराला काल के छायावादी स्पर्शयुक्त और छंदमुक्त रोमांस तक सीमित नहीं रह सकता।
कल्पना जी के जमीन से जुड़े ये नवगीत किसी वायवी संसार में विचरण नहीं कराते अपितु जीवन जैसा ही देखते हुए बेहतर बनाने की बात करते हैं। कल्पना की कल्पना भी सम्भावना के समीप है कपोल कल्पना नहीं। जीवन के उत्तरार्ध में रोग, जीवन साथी का विछोह अर्थात नियतिजनित एकाकीपन से जूझ और मृत्यु के संस्पर्श से विजयी होकर आने के पश्चात उनकी जिजीविषाजयी कलम जीवन के प्रति अनुराग-विराग को एक साथ साधती है। ऐसा गीतकार पूर्व निर्धारित मानकों की कैद को अंतिम सत्य कैसे मान सकता है? कल्पना जी नवगीत और गीत से सुपरिचित होने पर भी वैसा ही रचती हैं जैसा उन्हें उपयुक्त लगता है लेकिन वे इसके पहले मानकों से न केवल परिचय प्राप्त करती हैं, उनको सीखती भी हैं।
प्रतिष्ठित नवगीतकार यश मालवीय ठीक ही कहते हैं कि 'रचनाधर्मिता के बीज कभी भी किसी भी उम्र में रचनाकार-मन में सुगबुगा सकते हैं और सघन छायादार दरख्त बन सकते हैं।'
डॉ. अमिताभ त्रिपाठी इन गीतों में संवेदना का उदात्त स्तर, साफ़-सुथरा छंद-विधान, सुगठित शब्द-योजना, सहजता, लय तथा प्रवाह की उपस्थिति को रेखांकित करते हैं। कल्पना जी ने भाषिक सहजता-सरलता को शुद्धता के साथ साधने में सफलता पाई है। उनके इन गीतों में संस्कृतनिष्ठ शब्द (संकल्प, विलय, व्योम, सुदर्श, विभोर, चन्द्रिका, अरुणिमा, कुसुमित, प्राण-विधु, जल निकास, नीलांबर, तरुवर, तृण पल्लव्, हिमखंड, मोक्षदायिनी, धरणी, सद्ज्ञान, परिवर्धित, वितान, निर्झरिणी आदि), उर्दू लफ़्ज़ों ( मुश्किलों, हौसलों, लहू. तल्ख, शबनम, लबों, फ़िदा, नादां, कुदरत, फ़िज़ा, रफ़्तार, गुमशुदा, कुदरत, हक़, जुबां, इंक़लाब, फ़र्ज़, क़र्ज़, जिहादियों, मज़ार, मन्नत, दस्तखत, क़ैद, सुर्ख़ियों आदि) के साथ गलबहियाँ डाले हुए देशज शब्दों ( बिजूखा, छटां, जुगाड़, फूल बगिया, तलक आदि) से गले मिलते हैं।
इन नवगीतों में शब्द युग्मों (नज़र-नज़ारे, पुष्प-पल्लव, विहग वृन्दों, मुग्ध-मौसम, जीव-जगत, अर्पण-तर्पण, विजन वन, फल-फूल, नीड़चूजे, जड़-चेतन, तन-मन, सतरंगी संसार, पापड़-बड़ी-अचार आदि) ने माधुर्य घोला है। नवगीतों में अन्त्यानुप्रास का होना स्वाभाविक है किन्तु कल्पना जी ने छेकानुप्रास तथा वृत्यनुप्रास का भी प्रयोग प्रचुरता से किया है। इन स्थलों पर नवगीतों में रसधार पुष्ट हुई है। देखें: तृषायुक्त तरुवर तृण, सारू सरिता सागर, साँझ सुरमई, सतरंगी संसार, वरद वन्दिता, कचनार काँप कर, चंचल चपल चारुवदना, सचेतना सुभावना सुकमना, मृदु महक माधुरी, सात सुरों का साजवृन्द, मृगनयनी मृदु बयनभाषिणी, कोमल कंचन काया, कवच कठोर कदाचित, कोयलिया की कूक आदि।
कल्पना जी ने नवल भाषिक प्रयोग करने में कमी नहीं की है: जोश की समिधा, वसुधा का वैभव, निकृष्ट नादां, स्वत्व स्वामिनी, खुशरंग हिना आदि ऐसे ही प्रयोग हैं। महलों का माला से स्वागत, वैतरिणी जगताप हरिणी, पीड़ाहरिणी तुम भागीरथी, विजन वनों की गोद में, साधना से सफल पल-पल, चाह चित से कीजिए, श्री गणेश हो शुभ कर्मों का जैसी अभिव्यक्तियाँ सूक्ति की तरह जिव्हाग्र पर प्रतिष्ठित होने का सामर्थ्य रखती हैं
कल्पना जी के इन नवगीतों में राष्ट्रीय गौरव (यही चित्र स्वाधीन देश का, हस्ताक्षर हिंदी के, हिंदी की मशाल, सुनो स्वदेशप्रेमियों, मिली हमें स्वतंत्रता, जयभारत माँ, पूछ रहा है आज देश), पारिवारिक जुड़ाव (बेटी तुम, अनजनमी बेटी, पापा तुम्हारे लिए, कहलाऊं तेरा सपूत, आज की नारी, जीवन संध्या, माँ के बाद के बाद आदि), सामाजिक सरोकार (मद्य निषेध सजा पन्नो पर, हमारा गाँव, है अकेला आदमी, महानगर में, गाँवों में बसा जीवन, गरम धूप में बचपन ढूँढे, आँगन की तुलसी आदि) के गीतों के साथ भारतीय संस्कृति के उत्सवधर्मिता और प्रकृति परकता के गीत भी मुखर हुए हैं। ऐसे नवगीतों में दिवाली, दशहरा, राम जन्म, सूर्य, शरद पूर्णिमा, संक्रांति, वसंत, फागुन, सावन, शरद आदि आ सके हैं।
पर्यावरण और प्रकृति के प्रति कल्पना जी सजग हैं। जंगल चीखा, कागा रे! मुंडेर छोड़ दे, आ रहा पीछे शिकारी, गोल चाँद की रात, क्यों न हम उत्सव् मनाएं?, जान-जान कर तन-मन हर्षा, फिर से खिले पलाश आदि गीतों में उनकी चिंता अन्तर्निहित है। सामान्यतः नवगीतों में न रहनेवाले साग, मुरब्बे, पापड़, बड़ी, अचार, पायल, चूड़ी आदि ने इन नवगीतों में नवता के साथ-साथ मिठास भी घोली है। बगिया, फुलबगिया, पलाश, लता, हरीतिमा, बेल, तरुवर, तृण, पल्लव, कोयल, पपीहे, मोर, भँवरे, तितलियाँ, चूजे, चिड़िया आदि के साथ रहकर पाठक रुक्षता, नीरसता, विसंगतियोंजनित पीड़ा, विषमता और टूटन को बिसर जाता है।
सारतः विवेच्य कृति का जयघोष करती जिजीविषाओं का तूर्यनाद है। इन नवगीतों में भारतीय आम जन की उत्सवधर्मिता और हर्षप्रियता मुखरित हुई है। कल्पना जी जीवन के संघर्षों पर विजय के हस्ताक्षर अंकित करते हुए इन्हें रचती हैं। इन्हें भिन्न परिप्रेक्ष्य में मूल्यांकित करना इनके साथ न्याय न होगा। इन्हें गीत-नवगीत के निकष पर न कसकर इनमें निहित रस सलिला में अवगाहन कर आल्हादित अभीष्ट है। कल्पना जी को बधाई जीवट, लगन और सृजन के लिये। सुरुचिपूर्ण और शुद्ध मुद्रण के लिए अंजुमन प्रकाशन का अभिनन्दन।
१३-१-२०१५
नवगीत:
*.
काल है संक्रांति का
तुम मत थको सूरज!
.
दक्षिणायन की हवाएँ
कँपाती हैं हाड़
जड़ गँवा, जड़ युवा पीढ़ी
काटती है झाड़
प्रथा की चूनर न भाती
फेंकती है फाड़
स्वभाषा को भूल, इंग्लिश
से लड़ाती लाड़
टाल दो दिग्भ्रान्ति को
तुम मत रुको सूरज!
*
उत्तरायण की फिज़ाएँ
बनें शुभ की बाड़
दिन-ब-दिन बढ़ता रहे सुख
सत्य की हो आड़
जनविरोधी सियासत को
कब्र में दो गाड़
झाँक दो आतंक-दहशत
तुम जलाकर भाड़
ढाल हो चिर शांति का
तुम मत झुको सूरज!
***
नवगीत:
आओ भी सूरज
*
आओ भी सूरज!
छट गये हैं फूट के बादल
पतंगें एकता की मिल उड़ाओ
गाओ भी सूरज!
*
करधन दिप-दिप दमक रही है
पायल छन-छन छनक रही है
नच रहे हैं झूमकर मादल
बुराई हर अलावों में जलाओ
आओ भी सूरज!
*
खिचड़ी तिल-गुड़वाले लडुआ
पिज्जा तजकर खाओ बबुआ
छोड़ बोतल उठा लो छागल
पड़ोसी को खुशी में साथ पाओ
आओ भी सूरज!
रविवार, 4 जनवरी 2015
***
नवगीत:
संक्रांति काल है
.
संक्रांति काल है
जगो, उठो
.
प्रतिनिधि होकर जन से दूर
आँखें रहते भी हो सूर
संसद हो चौपालों पर
राजनीति तज दे तंदूर
संभ्रांति टाल दो
जगो, उठो
.
खरपतवार न शेष रहे
कचरा कहीं न लेश रहे
तज सिद्धांत, बना सरकार
कुर्सी पा लो, ऐश रहे
झुका भाल हो
जगो, उठो
.
दोनों हाथ लिये लड्डू
रेवड़ी छिपा रहे नेता
मुँह में लैया-गज़क भरे
जन-गण को ठेंगा देता
डूबा ताल दो
जगो, उठो
.
सूरज को ढाँके बादल
सीमा पर सैनिक घायल
नाग-सांप फिर साथ हुए
गुँजा रहे बंसी-मादल
छिपा माल दो
जगो, उठो
.
नवता भरकर गीतों में
जन-आक्रोश पलीतों में
हाथ सेंक ले कवि तू भी
जाए आज अतीतों में
खींच खाल दो
जगो, उठो
१३.१.२०१४
***
समयजयी सिद्धसंत देवरहा बाबा
*
देव भूमि भारत आदिकाल से संतों-महात्माओं की साधना स्थली है. हर पल समाधिस्थ रहनेवाले समयजयी सिद्ध दंत देवरहा बाबा संसार-सरोवर में कमल की तरह रहते हुए पूर्णतः निर्लिप्त थे.
आचार्य शंकर ने जीवन की इस मुक्तावस्था के सम्बन्ध में कहा है:
समाधिनानेन समस्तवासना ग्रंथेर्विनाशोsकर्मनाशः.
अंतर्वहि सर्वत्र एवं सर्वदा स्वरूपवि स्फूर्तिरयत्नतः स्यात..
अर्थात समाधि से समस्त वासना-ग्रंथियाँ नष्ट हो जाती हैं. वासनाओं के नाश से कर्मों का विनाश हो जाता है, जिससे स्वरूप-स्थिति हो जाती है. अग्नि के ताप से जिस तरह स्वर्ण शुद्ध हो जाता है, उसी प्रकार समाधि से सत्व-राज-तम रूप मल का निवारण हो जाता है. हरि ॐ तत्सत...
बाबा मेरे जन्म-जन्मान्तर के गुरु हैं, वे विदेह हैं. अनादि काल से अनवरत चली आ रही भारतीय सिद्ध साधन बाबा में मूर्त है. धूप, सीत, वर्षा आदि संसारीं चक्रों से सर्वथा अप्रभावित, अष्टसिद्ध योगी बाबा सबपर सदा समान भाव से दया-दृष्टि बरसाते रहते थे. वे सच्चे अर्थ में दिगम्बर थे अर्थात दिशाएँ ही उनका अम्बर (वस्त्र) थीं. वे वास्तव में धरती का बिछौना बिछाते थे, आकाश की चादर ओढ़ते थे. शुद्ध जीवात्मायें उनकी दृष्टि मात्र से अध्यात्म-साधन के पथ पर अग्रसर हो जाती थीं. वे सदैव परमानंद में निमग्न रहकर सर्वात्मभाव से सभी जीवों को कल्याण की राह दिखाते हैं.
जय अनादि,जय अनंत,
जय-जय-जय सिद्ध संत.
देवरहा बाबाजी,
यश प्रसरित दिग-दिगंत.........
*
धरा को बिछौनाकर, नील गगन-चादर ले.
वस्त्रकर दिशाओं को, अमृत मन्त्र बोलते..
सत-चित-आनंदलीन, समयजयी चिर नवीन.
साधक-आराधक हे!, देव-लीन, थिर-अदीन..
नश्वर-निस्सार जगत,
एकमात्र ईश कंत..
देवरहा बाबाजी,
यश प्रसरित दिग-दिगंत.........
*
''दे मत, कर दर्शन नित, प्रभु में हो लीन चित.''
देते उपदेश विमल, मौन अधिक, वाणी मित..
योगिराज त्यागी हे!, प्रभु-पद-अनुरागी हे!
सतयुग से कलियुग तक, जीवित धनभागी हे..
'सलिल' अनिल अनल धरा,
नभ तुममें मूर्तिमंत.
देवरहा बाबाजी,
यश प्रसरित दिग-दिगंत.........
*
पूज्यपाद बाबाजी द्वारा लिखाया गया और 'योगिराज देवरहा बाबा के चमत्कार' शीर्षक पुस्तक में प्रकाशित लेख का कुछ अंश बाबाश्री के आशीर्वाद-स्वरूप प्रस्तुत है:
''धारणा, ध्यान और समाधि- इन तीनों का सामूहिक नाम संयम है. संयम से अनेक प्रकार की विभूतियाँ प्राप्त होती हैं परन्तु योगी का लक्ष्य विभूति-प्राप्ति नहीं है, परवैराग्य प्राप्ति है. 'योग दर्शन' में विभूतियों का वर्णन केवल इसलिए किया गया है कि योगी इनके यथार्थ रूप को समझकर उनसे आकृष्ट न हो. योगदर्शन का विभूतिपाद साधनपाद की ही कड़ी है..... विभूतिपाद में इसी प्रकार की विभूतियों का विस्तार से वर्णन हुआ है-जैसे सब प्राणियों की वाणी का ज्ञान, परचित्त ज्ञान, मृत्यु का ज्ञान, लोक-लोकान्तरों का ज्ञान, आपने शरीर का ज्ञान, चित्त के स्वरूप का ज्ञान इत्यादि. संयम के ही द्वारा योगी अंतर्ध्यान हो सकता है, अधिक से अधिक शक्ति प्राप्त कर सकता है, परकाया में प्रवेश कर सकता है, लोक-लोकान्तरों में भ्रमण कर सकता है और अष्टसिद्धियों और नवनिधियों को प्राप्तकर सकता है.
बच्चा! योग एक बड़ी दुर्लभ और विचित्र अवस्था है. योगी की शक्ति और ज्ञान अपरिमित होते हैं. उसके लिये विश्व की कोई भी वस्तु असंभव नहीं है. ईश्वर की शक्ति माया है और योगी की शक्ति योगमाया है. 'सर्वम' के सिद्धांत को योगी कभी भी प्रत्यक्ष कर सकता है. आज विज्ञान ने जिस शक्ति का संपादन किया है, वह योगशक्ति का शतांश या सहस्त्रांश भी नहीं है. योगी के लिये बाह्य उपादानों की अपेक्षा नहीं है.
मैं तो यह कहता हूँ कि यदि योगी चाहे तो अपने सत्य-संकल्प से सृष्टि का भी निर्माण कर सकता है. वह ईश्वर के समान सर्वव्यापक है. अष्टसिद्धियाँ भी उसके लिये नगण्य हैं. वह अपनी संकल्प-शक्ति से एक ही समय में अनेक स्थानों पर अनेक रूपों में प्रकट हो सकता है. उसे शरीर से कहीं आना-जाना नहीं पड़ता.
बच्चा! योगी को न विश्वास की परवाह है, न प्रदर्शन की आवश्यकता है, जो सिद्धियों का प्रदर्शन करता है, उसे योगी कहना ही नहीं चाहिए.
एक कथा है: आपने किसी योगिराज गुरुसे योग की शिक्षा प्राप्तकर एक महात्मा योग-साधना करने लगे. कुछ समय पश्चात् महात्मा को सिद्धियाँ प्राप्त होने लगीं. महात्मा एक दिन आपने गुरुदेव के दर्शन करने के लिये चल दिए. योगिराज का आश्रम एक नदी के दूसरे किनारे पर था. नदी में बड़ी बाढ़ थी और चारों ओर तूफ़ान था. महात्मा को नदी पारकर आश्रम में पहुँचना था. अपनी सिद्धि के बलपर महात्मा योंही जलपर चल दिए और नदी को पारकर आश्रम में पहुँचे. गुरुदेव ने नदी पार करने के साधन के सम्बन्ध में पूछा तो महात्मा ने अपनी सिद्धि का फल बता दिया. योगिराज ने कहा कि तुमने दो पैसे के बदले अपनी वर्षों की तपस्या समाप्त कर ली. तुम योग-साधन के योग्य नहीं हो.
१३.१.२०१४

***

शनिवार, 20 दिसंबर 2025

दिसंबर २०, सोलह संस्कार, कृष्ण, सॉनेट, यमकीय दोहा, दोहा कहे मुहावरा, कविता, नव वर्ष

सलिल सृजन दिसंबर २०
*
गीत
०००
नव वर्ष!
परिपाटी पुरानी हम न छोड़ेंगे
चुनावी वादे करेंगे और तोड़ेंगे
.
बाड़ हँस खेती चरेगी
पाप की नौका तरेगी
स्वर्ण मृग की चाह पाले
सिया रावण को वरेगी
नव वर्ष!
ईमां की कसम खाकर
रकम रिश्वत की निरंतर लूट जोड़ेंगे
नव वर्ष!
परिपाटी पुरानी हम न छोड़ेंगे
.
विवश जनता क्या करेगी?
बिना मारे ही मरेगी
झेल गाली, लट्ठ, गोली
सिसककर सजदा करेगी
नव वर्ष!
'लोक' होंगे 'तंत्र' के चाकर
गुलामी फिर बिछा - ओढ़ेंगे
नव वर्ष!
परिपाटी पुरानी हम न छोड़ेंगे
.
नफरती खेती बढ़ेगी
बेल दूरी की चढ़ेगी
भाईचारे का दहनकर
द्वार से खिड़की लड़ेगी
नव वर्ष!
काबिल, अकाबिल के हाथ जोड़ेंगे
नव वर्ष!
परिपाटी पुरानी हम न छोड़ेंगे
२० . १२ . २०२५
०००
सॉनेट
नमन
साँवरे कन्हाई को नमन।
शरारत सुहाई को नमन।
बाबा-मताई को नमन।।
बावरी लुनाई को नमन।।
बाँसुरी बजाई को नमन।
प्रीत उर जगाई को नमन।
कर्म की बड़ाई को नमन।।
भक्त से मिताई को नमन।।
जमुना लहराई को नमन।
रास मिल रचाई को नमन।
शक्ति टकराई को नमन।।
भक्ति मुस्कुराई को नमन।।
भयंकर लड़ाई को नमन।
क्रांति, शांति आई को नमन।।
२०-१२-२०२२
जबलपुर, ६•४०
●●●
सॉनेट
बासंती कृष्ण
पीतांबरी बसंत खिलखिल।
ब्रज-रज, गोवर्धन पर छाया।
गोप-गोपियों के मन भाया।।
छटा श्यामली से गल-भुज मिल।।
अमलतास कचनार फूलते।
फाग कहें जमुना की लहरें।
रास रचा पग तनिक न ठहरें।।
नथ-लट-बेंदे झूम झूलते।।
चंचल लहर लहर लहराई।
चपला भँवर भँवर मुस्काई।
श्यामा-श्याम छटा मन भाई।।
जन-मन मोहे बंसी की धुन।
अपने सपने नए रहे बुन।
सँग बसंत आ छाया फागुन।।
संजीव
२०-१२-२०२२
९४२५१८३२४४, ७•२७,
जबलपुर
●●●
सोलह संस्कार
सोलह संस्कारों के नाम और संक्षिप्त परिचय :-
१. गर्भाधानम्
२. पुंसवनम्
३. सीमन्तोन्नयनम्
४. जातकर्मसंस्कारः
५. नामकरणम्
६. निष्क्रमणसंस्कारः
७. अन्नप्राशनसंस्कारः
८. चूडाकर्मसंस्कारः
९. कर्णवेधसंस्कारः
१०. उपनयनसंस्कारः
११. वेदारम्भसंस्कारः
१२. समावर्त्तनसंस्कारः
१३. विवाहसंस्कारः
१४. वानप्रस्थाश्रमसंस्कारः
१५. संन्यासाश्रमसंस्कारः
१६. अन्त्येष्टिकर्मविधिः
★ १. गर्भाधानम् - गर्भाधान उसको कहते हैं कि जो " गर्भस्याऽऽधानं वीर्यस्थापनं स्थिरीकरणं यस्मिन् येन वा कर्मणा , तद् गर्भाधानम् ।" गर्भ का धारण , अर्थात् वीर्य का स्थापन गर्भाशय में स्थिर करना जिससे होता है । उसी को गर्भाधान संस्कार कहते है ।
● २. पुंसवनम् - पुंसवन उसको कहते हैं जो ऋतुदान देकर गर्भस्थिती से दूसरे वा तीसरे महीने में पुंसवन संस्कार किया जाता है ।
अर्थात् गर्भाधान के दूसरे या तीसरे महीने में जो संस्कार किया जाता है । उसे पुंसवन संस्कार कहते है ।
■ ३. सीमन्तोन्नयनम् - जिससे गर्भिणी स्त्री का मन संतुष्ट आरोग्य गर्भ स्थिर उत्कृष्ट होवे और प्रतिदिन बढ़ता जावे । उसे सीमन्तोन्नयन कहते हैं ।
◆ गर्भमास से चौथे महीने में शुक्लपक्ष में जिस दिन मूल आदि पुरुष नक्षत्रों से युक्त चन्द्रमा हो उसी दिन सीमन्तोन्नयन संस्कार करें और पुंसवन संस्कार के तुल्य छठे आठवें महीने में पूर्वोक्त पक्ष नक्षत्रयुक्त चन्द्रमा के दिन सीमन्तोन्नयन संस्कार करें ।
★ ४. जातकर्मसंस्कारः - संतान के जन्म के तुरंत बाद जो संस्कार किया जाता है । उसे जातकर्म संस्कार कहते हैं ।
★ ५. नामकरणम् - जन्मे हुए बालक का सुन्दर नाम धरे । ( सार्थक नाम रखना )
नामकरण का काल - जिस दिन जन्म हो उस दिन से लेके १० दिन छोड़ ग्यारहवें , वा एक सौ एकवें अथवा
दूसरे वर्ष के आरंभ में जिस दिन जन्म हुआ हो , नाम धरे ।
◆ ६. निष्क्रमणसंस्कारः - निष्क्रमणसंस्कार उसको कहते हैं कि जो बालक को घर से जहाँ का वायुस्थान शुद्ध हो वहाँ भ्रमण कराना होता है । उसका समय जब अच्छा देखें तभी बालक को बाहर घुमावें अथवा चौथे मास में तो अवश्य भ्रमण करावें ।
निष्क्रमण संस्कार के काल के दो भेद हैं - एक बालक के जन्म के पश्चात् तीसरे शुक्लपक्ष की तृतीया , और दूसरा चौथे महीने में जिस तिथि में बालक का जन्म हुआ हो । उस तिथि में यह संस्कार करे ।
★ ७. अन्नप्राशनसंस्कारः - अन्नप्राशन संस्कार तभी करे जब बालक की शक्ति अन्न पचाने योग्य होवे ।
छठे महीने बालक को अन्नप्राशन करावे । जिसको तेजस्वी बालक करना हो , वह घृतयुक्त भात ( चावल ) अथवा दही , शहद और घृत तीनों भात के साथ मिलाके विधि अनुसार संस्कार करें ।
★ ८. चूडाकर्मसंस्कारः ( मुण्डन संस्कार ) - चूडाकर्म को केशछेदन संस्कार भी कहते है । ( सिर को केश व बाल रहित करना )
यह चूडाकर्म अथवा मुण्डन बालक के जन्म के तीसरे वर्ष वा एक वर्ष में करना ।उत्तरायणकाल शुक्लपक्ष में जिस दिन आनन्दमङ्गल हो , उस दिन यह संस्कार करे ।
★ ९. कर्णवेधसंस्कारः - बालक के कर्ण वा नासिका का छेदन करना कर्णवेधसंस्कार है ।
बालक के कर्ण वा नासिका के वेध का समय जन्म से तीसरे वा पांचवें वर्ष का उचित है ।
■ १०. उपनयनसंस्कारः ( यज्ञोपवीत , जनेऊ ) -
जिस दिन जन्म हुआ हो अथवा जिस दिन गर्भ रहा हो । उससे आठवें वर्ष में ब्राह्मण के ,जन्म वा गर्भ से ग्यारहवें वर्ष में क्षत्रिय के और जन्म वा गर्भ से बारहवें वर्ष में वैश्य के बालक का यज्ञोपवीत करें तथा ब्राह्मण के १६ सोलह , क्षत्रिय के २२ बाईस और वैश्य का बालक का २४ चौबीसवें वर्ष से पूर्व - पूर्व यज्ञोपवीत होना चाहिये । यदि पूर्वोक्त काल में यज्ञोपवीत व जनेऊ न हो वे पतित माने जावें ।
● जिसको शीघ्र विद्या , बल और व्यवहार करने की इच्छा हो और बालक भी पढ़ने समर्थ हो तो ब्राह्मण के लड़के का जन्म वा गर्भ से पांचवें , क्षत्रिय के लड़के का जन्म वा गर्भ से छठे और वैश्य के लड़के का जन्म वा गर्भ से आठवें वर्ष में यज्ञोपवीत करें ।
★ ११. वेदारम्भसंस्कारः - वेदारम्भ उसको कहते हैं जो गायत्री मन्त्र से लेके साङ्गोपाङ्ग ( अङ्ग - शिक्षा , कल्प , व्याकरण , निरुक्त , छन्द , ज्योतिष । उपाङ्ग - पूर्वमीमांसा , वैशेषिक , न्याय , योग , सांख्य और वेदांत । उपवेद - आयुर्वेद , धनुर्वेद , गान्धर्ववेद और अर्थवेद अर्थात् शिल्पशास्त्र । ब्राह्मण - ऐतरेय , शतपथ , साम और गोपथ । वेद - ऋक् , यजुः , साम और अथर्व इन सबको क्रम से पढ़े । ) चारों वेदों के अध्ययन करने के लिये नियम धारण करना ।
समय - जो दिन उपनयनसंस्कार का है , वही वेदारम्भ का है । यदि उस दिवस में न हो सके , अथवा करने की इच्छा न हो तो दूसरे दिन करे । यदि दूसरा दिन भी अनुकूल न हो तो एक वर्ष के भीतर किसी दिन करे ।
★ १२. समावर्त्तनसंस्कारः - समावर्त्तनसंस्कार उसको कहते हैं जिसमें ब्रह्मचर्यव्रत साङ्गोपाङ्ग वेदविद्या , उत्तमशिक्षा और पदार्थविज्ञान को पूर्ण रीति से प्राप्त होके विवाह विधानपूर्वक गृहाश्रम को ग्रहण करने के लिए घर की ओर आना ।
तीन प्रकार के स्नातक होते है ।
१. विद्यास्नातक - जो केवल विद्या को समाप्त तथा ब्रह्मचर्य व्रत को न समाप्त करके स्नान करता है वह विद्यास्नातक है ।
२. व्रतस्नातक - जो ब्रह्मचर्य व्रत को समाप्त तथा विद्या को न समाप्त करके स्नान करता है वह व्रतस्नातक है ।
३. विद्याव्रतस्नातक - जो विद्या और ब्रह्मचर्य व्रत दोनों को समाप्त करके स्नान करता है वह विद्यव्रतस्नातक कहाता है ।
इस कारण ४८ अड़तालीस वर्ष का ब्रह्मचर्य समाप्त करके ब्रह्मचारी विद्या व्रत स्नान करे ।
★ १३. विवाहसंस्कारः - विवाह उसको कहते हैं कि जो पूर्ण ब्रह्मचर्यव्रत से विद्या बल को प्राप्त तथा सब प्रकार से शुभ गुण , कर्म , स्वभावों और अपने - अपने वर्णाश्रम के अनुकूल उत्तम कर्म करने के लिये स्त्री और पुरुष का जो संबंध होता है ।
* उत्तरायण शुक्लपक्ष अच्छे दिन अर्थात् जिस दिन प्रसन्नता हो उस दिन विवाह करना चाहिये ।
* कितने आचार्यों का मत है कि सब काल में विवाह करना चाहिए ।
* जिस अग्नि का स्थापन विवाह में होता है , उस को आवसथ्य नाम है ।
* प्रसन्नता के दिन स्त्री का पाणिग्रहण , जो कि स्त्री सर्वथा शुभ गुणादि से उत्तम हो , करना चाहिए ।
■ विवाह - जब दो प्राणी प्रेमपूर्वक आकर्षित होकर अपने आत्मा , हृदय और शरीर को एक - दूसरे को अर्पित कर देते हैं , तब हम सांसारिक भाषा में उसे विवाह कहते है ।
★ १४. वानप्रस्थाश्रमसंस्कारः - वानप्रस्थसंस्कार उसको कहते हैं , जो विवाह से सन्तानोत्पत्ति करके पूर्ण ब्रह्मचर्य से पुत्र का भी विवाह करे , और पुत्र का भी एक संतान हो जाए । अर्थात् जब पुत्र का भी पुत्र हो जाए तब पुरुष वानप्रस्थाश्रम अर्थात् वन में जाकर वानप्रस्थाश्रम के कर्तव्य का निर्वहन करें।
★ १५.संन्यासाश्रमसंस्कारः - संन्यास संस्कार उसको कहते हैं कि जो मोहादि आवरण पक्षपात छोड़के विरक्त होकर सब पृथिवी में परोपकार्थ विचरे ।
★ १६ . अन्त्येष्टिकर्म - अन्त्येष्टि कर्म उसको कहते हैं कि जो शरीर के अंत का संस्कार है , जिसके आगे शरीर के लिए कोई भी अन्य संस्कार नहीं हैं । इसी को नरमेध , पुरुषमेध , नरयाग , पुरुषयाग भी कहते हैं ।
* भस्मान्त ँ् शरीरम् । ( यजुर्वेद ४०.१५ )
इस शरीर का संस्कार ( भस्मान्तम् ) अर्थात् भस्म करने पर्यंत है ।
***
नवगीत
अपना अपना सच
*
सबका अपना अपना सच है
*
निज सच को
मत थोप अन्य पर,
सत्य और का
झूठ न मानो।
क्या-क्यों कहता?
यह भी जानो।
आत्म मुग्ध हो
पोथे लिखकर
बने मसीहा निज मुख खुद ही
अन्य न माने।
नहीं मुखापेक्षी अब कच है
सबका अपना अपना सच है
*
शहर-गाँव
दोनों परेशां,
तंत्र हावी है,
उपेक्षित है लोक।
अधर पर मुस्कान झूठी
छिपा मन में शोक।
दो दुहाई तुम
विधान की
मनमानी कर
गीत न जाने।
लिखी भुखमरी, तुम्हें अपच है
सबका अपना अपना सच है
*
२०-१२-२०२०
***
गीत -
एक दिन ही नया
*
एक दिन ही नया
बाकी दिन पुराना।
मन सनातन सत्य
निश-दिन गुनगुनाना।
*
समय कब रुकता?
निरंतर चला करता।
स्वर्ण मृग
संयम सिया को
छला करता।
लक्ष्मण-रेखा कहे
मत पार जाना।
एक दिन ही नया
बाकी दिन पुराना।
*
निठुर है बाज़ार
क्रय-विक्रय न भूले।
गाल पिचका
आम के
हैं ख़ास फूले।
रोकड़़ा पाए अधिक जो
वह सयाना।
एक दिन ही नया
बाकी दिन पुराना।
*
सबल की मनमानियाँ
वैश्वीकरण है।
विवश जन को
दे नहीं
सत्ता शरण है।
तंत्र शोषक साधता
जन पर निशाना।
एक दिन ही नया
बाकी दिन पुराना।
*
२०. १२.२०१५
नवगीत
भीड़ में
*
भीड़ में भी
है अकेला आदमी
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नाम के रिश्ते कई हैं
काम का कोई नहीं
भोर के चाहक अनेकों
शाम का कोई नहीं
पुरातन है
हर नवेला आदमी
भीड़ में भी
है अकेला आदमी
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गलत को कहते सही
पर सही है कोई नहीं
कौन सी है आँख जो
मिल-बिछुड़कर कोई नहीं
पालता फिर भी
झमेला आदमी
भीड़ में भी
है अकेला आदमी
*
जागती है आँख जो
केवल वही सोई नहीं
उगाती फसलें सपन की
जो कभी बोईं नहीं
कौन सा संकट
न झेला आदमी
भीड़ में भी
है अकेला आदमी
२०-१२-२०१५
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यमकीय दोहा:
नाहक हक ना त्याग तू, ना हक पीछे भाग
ना ज्यादा अनुराग रख, ना हो अधिक विराग
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मन उन्मन मत हो पुलक, चल चिलमन के गाँव
चिलम न भर चिल रह 'सलिल', तभी मिले सुख-छाँव
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गए दवाखाना तभी, पाया यह संदेश
भूल दवा खाना गए, खा लें था निर्देश
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ठाकुर को सिर झुकाकर, ठाकुर करें प्रणाम
ठकुराइन मुस्का रहीं, आज पड़ा फिर काम
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नम न हुए कर नमन तो, समझो होती भूल
न मन न तन हो समन्वित, तो चुभता है शूल
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बख्शी को बख्शी गयी, जैसे ही जागीर
थे फकीर कहला रहे, पुरखे रहे अमीर
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घट ना फूटे सम्हल जा, घट ना जाए मूल
घटना यदि घट जाए तो, व्यर्थ नहीं दें तूल
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चमक कैमरे ले रहे, जहाँ-तहाँ तस्वीर
दुर्घटना में कै मरे,जानो कर तदबीर
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तिल-तिल कर जलता रहा, तिल भर किया न त्याग
तिल-घृत की चिंताग्नि की, सहे सुयोधन आग
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'माँग भरें' वर माँगकर, गौरी हुईं प्रसन्न
वर बन बौरा माँग भर, हुए अधीन- न खिन्न
२०-१२-२०१४
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कविता क्या???
लगभग ३००० साल प्राचीन भारतीय काव्यशास्त्र के अनुसार कविता ऐसी रचना है जिसके शब्दों-अर्थों में दोष कदापि न हों, गुण अवश्य हों चाहे अलंकार कहीं-कहीं पर भी न हों१। दिग्गज काव्याचार्यों ने काव्य को रमणीय अर्थमय२ चित्त को लोकोत्तर आनंद देने में समर्थ३, रसमय वाक्य४, काव्य को शोभा तथा धर्म को अलंकार५, रीति (गुणानुकूल शब्द विन्यास/ छंद) को काव्य की आत्मा६, वक्रोक्ति को काव्य का जीवन७, ध्वनि को काव्य की आत्मा८, औचित्यपूर्ण रस-ध्वनिमय९, कहा है। काव्य (ग्रन्थ} या कविता (पद्य रचना) श्रोता या पाठक को अलौकिक भावलोक में ले जाकर जिस काव्यानंद की प्रतीति कराती हैं वह वस्तुतः शब्द, अर्थ, रस, अलंकार, रीति, ध्वनि, वक्रोक्ति, वाग्वैदग्ध्य, तथा औचित्य की समन्वित-सम्मिलित अभिव्यक्ति है।
सन्दर्भ :
१. तद्दोशौ शब्दार्थो सगुणावनलंकृति पुनः क्वापि -- मम्मट, काव्य प्रकाश,
२. रमणीयार्थ प्रतिपादकः शब्दः काव्यम -- पं. जगन्नाथ,
३. लोकोत्तरानंददाता प्रबंधः काव्यनामभाक -- अम्बिकादत्त व्यास,
४. रसात्मकं वाक्यं काव्यं -- महापात्र विश्वनाथ,
५. काव्यशोभाकरान धर्मान अलंकारान प्रचक्षते -- डंडी, काव्यादर्श,
६. रीतिरात्मा काव्यस्य -- वामन, ९०० ई., काव्यालंकार सूत्र,
७. वक्रोक्तिः काव्य जीवितं -- कुंतक, १००० ई., वक्रोक्ति जीवित,
८. काव्यस्यात्मा ध्वनिरितिः, आनंदवर्धन, ध्वन्यालोक,
९. औचित्यम रस सिद्धस्य स्थिरं काव्यं जीवितं -- क्षेमेन्द्र, ११०० ई., औचित्य विचार चर्चा,
०००
हाइकु गीत:
आँख का पानी
संजीव 'सलिल'
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आँख का पानी,
मर गया तो कैसे
धरा हो धानी?...
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तोड़ बंधन
आँख का पानी बहा.
रोके न रुका.
आसमान भी
हौसलों की ऊँचाई
के आगे झुका.
कहती नानी
सूखने मत देना
आँख का पानी....
*
रोक न पाये
जनक जैसे ज्ञानी
आँसू अपने.
मिट्टी में मिला
रावण जैसा ध्यानी
टूटे सपने.
आँख से पानी
न बहे, पर रहे
आँख का पानी...
*
पल में मरे
हजारों बेनुगाह
गैस में घिरे.
गुनहगार
हैं नेता-अधिकारी
झूठे-मक्कार.
आँख में पानी
देखकर रो पड़ा
आँख का पानी...
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हाइकु मुक्तक :
जापानी छंद / पाँच सात औ' पाँच / देता आनंद
तजिए द्वंद / सदा कहिए साँच / तजिए गंद
तोड़िए फंद / साँच को नहीं आँच / सूर्य अमंद
आनंदकंद / मन दर्पण काँच / परमानंद
२० . १२ . २०१४
०००
दोहा सलिला:
दोहा कहे मुहावरा...
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दोहा कहे मुहावरा, सुन-गुन समझो मीत.
कम कहिये समझें अधिक, जन-जीवन की रीत.१.
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दोहा संग मुहावरा, दे अभिनव आनंद.
'गूंगे का गुड़' जानिए, पढ़िये-गुनिये छंद.२.
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हैं वाक्यांश मुहावरे, जिनका अमित प्रभाव.
'सिर धुनते' हैं नासमझ, समझ न पाते भाव.३.
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'पत्थर पड़ना अकल पर', आज हुआ चरितार्थ.
प्रतिनिधि जन को छल रहे, भुला रहे फलितार्थ.४.
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'अंधे की लाठी' सलिल, हैं मजदूर-किसान.
जिनके श्रम से हो सका भारत देश महान.५.
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कवि-कविता ही बन सके, 'अंधियारे में ज्योत'
आपद बेला में सकें, साहस-हिम्मत न्योत.६.
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राजनीति में 'अकल का, चकराना' है आम.
दक्षिण के सुर में 'सलिल', बोल रहा है वाम.७.
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'अलग-अलग खिचडी पका', हारे दिग्गज वीर.
बतलाता इतिहास सच, समझ सकें मतिधीर.८.
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जो संसद में बैठकर, 'उगल रहा अंगार'
वह बीबी से कह रहा, माफ़ करो सरकार.९.
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लोकपाल के नाम पर, 'अगर-मगर कर मौन'.
सारे नेता हो गए, आगे आए कौन?१०?
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'अंग-अंग ढीला हुआ', तनिक न फिर भी चैन.
प्रिय-दर्शन पाये बिना आकुल-व्याकुल नैन.११.
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'अपना उल्लू कर रहे, सीधा' नेता आज.
दें आश्वासन झूठ नित, तनिक न आती लाज.12.
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'पानी-पानी हो गये', साहस बल मति धीर.
जब संयम के पल हुए, पानी की प्राचीर.13.
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चीन्ह-चीन्ह कर दे रहे, नित अपनों को लाभ.
धृतराष्ट्री नेता हुए, इसीलिये निर-आभ.14.
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पंथ वाद दल भूलकर, साध रहे निज स्वार्थ.
संसद में बगुला भगत, तज जनहित-परमार्थ.15.
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छुरा पीठ में भौंकना, नेता जी का शौक.
लोकतंत्र का श्वान क्यों, काट न लेता भौंक?16.
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राजनीति में संत भी, बदल रहे हैं रंग.
मैली नाले सँग हुई, जैसे पावन गंग.17.
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दरिया दिल हैं बात के, लेकिन दिल के तंग.
पशोपेश उनको कहें, हम अनंग या नंग?18.
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मिला हाथ से हाथ वे, चला रहे सरकार.
भुला-भुना आदर्श को, पाल रहे सहकार.19.
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लिये हाथ में हाथ हैं, खरहा शेर सियार.
मिलते गले चुनाव में, कल झगड़ेंगे यार.20.
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गाल बजाते फिर रहे, गली-गली सरकार.
गाल फुलाये जो उन्हें, करें नमन सौ बार.21.
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राम नाप जपते रहे,गैरों का खा माल.
राम नाम सत राम बिन, करते राम कमाल.22.
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'राम भरोसे' हो रहे, पूज्य निरक्षर संत.
'मुँह में राम बगल लिये, छुरियाँ' मिले महंत.२३.
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'नाच न जानें' कह रहे, 'आंगन टेढ़ा' लोग.
'सच से आँखें मूंदकर', 'सलिल' न मिटता रोग.२४.
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'दिन दूना'और 'रात को, चौगुन' कर व्यापार.
कंगाली दिखला रहे, स्याने साहूकार.२५.
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'साढ़े साती लग गये', चल शिंगनापुर धाम.
'पैरों का चक्कर' मिटे, दुःख हो दूर तमाम.२६.
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'तार-तार कर' रहे हैं, लोकतंत्र का चीर.
लोभतंत्र ने रच दिया, शोकतंत्र दे पीर.२७.
*
'बात बनाना' ही रहा, नेताओं का काम.
'बात करें बेबात' ही, संसद सत्र तमाम.२८.
*
'गोल-मोल बातें करें', 'करते टालमटोल'.
असफलता को सफलता, कहकर 'पीटें ढोल'.२९.
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'नौ दिन' चलकर भी नहीं, 'चले अढ़ाई कोस'.
किया परिश्रम स्वल्प पर, रहे 'भाग्य को कोस'.३०.
२०-१२-२०१३
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