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गुरुवार, 20 जून 2019

कुछ दोहे श्रृंगार के

दोहा सलिला
*
जूही-चमेली देखकर, हुआ मोगरा मस्त 
सदा सुहागिन ने बिगड़, किया हौसला पस्त 
*
नैन मटक्का कर रहे, महुआ-सरसों झूम
बरगद बब्बा खाँसते। क्यों? किसको मालूम?
*
अमलतास ने झूमकर, किया प्रेम-संकेत
नीम षोडशी लजाई, महका पनघट-खेत
*
अमरबेल के मोह में, फँसकर सूखे आम
कहे वंशलोचन सम्हल, हो न विधाता वाम
*
शेफाली के हाथ पर, नाम लिखा कचनार
सुर्ख हिना के भेद ने, खोदे भेद हजार
*
गुलबकावली ने किया, इन्तिज़ार हर शाम
अमन-चैन कर दिया है,पारिजात के नाम
*
गौरा हेरें आम को, बौरा हुईं उदास
मिले निकट आ क्यों नहीं, बौरा रहे उदास?
*
बौरा कर हो गया है, आम आम से ख़ास
बौरा बौराये, करे दुनिया नहक हास
***
२०-६-२०१६
lnct jabalpur

बुधवार, 24 फ़रवरी 2016

navgeet

नवगीत:
ओ उपासनी
*
ओ उपासनी!
शीतल-निर्मल सलिल धार सी
सतत प्रवाहित
हो सुहासिनी!
*
भोर, दुपहरी, साँझ, रात तक
अथक, अनवरत
बहती रहतीं।
कौन बताये? किससे पूछें?
शांत-मौन क्यों
कभी न दहतीं?
हो सुहासिनी!
सबकी सब खुशियों का करती
अंतर्मन में  द्वारचार सी 
शीतल-निर्मल सलिल धार सी
सतत प्रवाहित
ओ उपासनी!
*
इधर लालिमा, उधर कालिमा
दीपशिखा सी
जलती रहतीं।
कोना-कोना किया प्रकाशित
अनगिन खुशियाँ
बिन गिन तहतीं।
चित प्रकाशनी!
श्वास-छंद की लय-गति-यति सँग 
मोह रहीं मन अलंकार सी  
शीतल-निर्मल सलिल धार सी
सतत प्रवाहित
ओ उपासनी!
*
चौका, कमरा, आँगन, परछी
पूजा, बैठक
हँसती रहतीं।
माँ-पापा, बेटी-बेटा, मैं
तकें सहारा
डिगीं, न ढहतीं
मन निवासिनी!
आपद-विपद, कष्ट-पीड़ा का
गुप-चुप करतीं फलाहार सी 
शीतल-निर्मल सलिल धार सी
सतत प्रवाहित
ओ उपासनी!
***

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2016

navgeet

नवगीत 
नव भोर 
*
मिलन की
नव भोर का 
स्वागत करो रे!
*
विरह की रजनी
अँधेरी हारकर
मुँह छिपाती
उषा पर जय वारकर
दुंदुभी नभ में
बजाते परिंदे
वर बना दिनकर
धरा से प्यारकर
सृजन की
नव भोर का
स्वागत करो रे!
*
चूड़ियाँ खनकीं
नज़र मिल कर झुकीं
कलेवा दें थमा
उठ नज़रें मिलीं
बिन कहें कह शुक्रिया
ले ली विदा
मंज़िलों को नापने
चुप बढ़ चलीं
थकन की
नव कोर का
स्वागत करो रे!
*
दुपहरी में, स्वेद
गंगा नहाकर
नीड लौटे परिंदे
चहचहाकर
साँझ चंदा से
मिले हँस चाँदनी
साँस में घुल साँस
महकी लजाकर
पुलिनमय
चितचोर का
स्वागत करो रे!
***

२३-२-२०१६ 

navgeet

नवगीत:
सद्यस्नाता
*
सद्यस्नाता!
रूप तुम्हारा
सावन सा भावन।
केश-घटा से
बूँद-बूँद जल
टप-टप चू बरसा।
हेर-हेर मन
नील गगन सम
हुलस-पुलक तरसा।
*
उगते सूरज जैसी बिंदी
सजा भाल मोहे।
मृदु मुस्कान
सजे अधरों पर
कंगन कर सोहे।
लेख-लेख तन म
हुआ वन सम
निखर-बिखर गमका।
*
दरस-परस पा
नैन नशीले
दो से चार हुए।
कूल-किनारे
भीग-रीझकर
खुद जलधार हुए।
लगा कर अगन
बुझा कर सजन
बिन बसंत कुहका।
***
२३-२-२०१६

रविवार, 21 फ़रवरी 2016

navgeet

नवगीत
घर तो है
*
घर तो है
लेकिन आँगन
या तुलसी चौरा
रहा नहीं है।
*
अलस्सुबह
उगता है सूरज
किंतु चिरैया
नहीं चहकती।
दलहन-तिलहन,
फटकन चुगने
अब न गिलहरी
मिले मटकती।
कामधेनुएँ
निष्कासित हैं,
भैरव-वाहन
चाट रहे मुख।
वन न रहे,
गिरि रहे न गौरी
ब्यौरा गौरा
रहा नहीं है।
*
घरनी छोड़
पड़ोसन ताकें।
अमिय समझ
विष गुटखा फाँकें।
नगदी सौदा
अब न सुहाये,
लुटते नित
उधार ला-ला के।  
संबंधों की
नीलामी कर-
पाल रहे खुद
दुःख
कहकर सुख।
छिपा सकें मुख
जिस आँचल में
माँ का ठौरा
रहा नहीं है।
***

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2015

geet: sanjiv

श्रृंगार गीत:
संजीव
.
चाहता मन
आपका होना
.
     शशि ग्रहण से
     घिर न जाए
     मेघ दल में
     छिप न जाए
     चाह अजरा
     बने तारा
     रूपसी की
     कीर्ति गाये
मिले मन में
एक तो कोना
.
     द्वार पर
     आ गया बौरा
     चीन्ह भी लो
      तनिक गौरा
     कूक कोयल
     गाए बन्ना
     सुना बन्नी
     आम बौरा
मार दो मंतर
करो टोना
.
     माँग इतनी
     माँग भर दूँ
     आप का
     वर-दान कर दूँ
     मिले कन्या-
     दान मुझको
     जिंदगी को
     गान कर दूँ
प्रणय का प्रण
तोड़ मत देना
.   

सोमवार, 6 अक्टूबर 2014

geet:

गीत:
आओ! चिठिया लिखें
*
आओ! चिठिया लिखें प्यार की, वर्जन की, मनुहार की
मीता! गीता कहें दिलों से, दिल की मधुर पुकार की

कहलें-सुनलें मन की बातें, सुबह सुनहरी मीठी रातें
भावनाओं के श्वेत कबूतर, अभिलाषा तोतों की पाँतें
अरमां कोयल कूके, नाचे मोर हर्ष-उल्लास का
मन को मन अपना सा लागे, हो मौसम मधुमास का 
शिया चंपा, सेज जूही की, निंदिया हरसिंगार की

भौजी छेड़ें सिन्दूरी संध्या से लाल कपोल भये
फूले तासु, बिखरे गेसू, अनबोले ही बोल गये
नज़र बचाकर, आँख चुराकर, चूनर खुद से लजा रही
दिन में सपन सलोने देखे, अँखियाँ मूंदे मजा यही
मन बासन्ती, रंग गुलाल में छेड़े राग मल्हार की

बूढ़े बरगद की छैंया में, कमसिन सपने गये बुने
नीम तले की अल्हड बतियाँ खुद से खुद ही कहे-सुने
पनघट पर चूड़ी की खनखन, छमछम पायल गाये गीत
कंडे पाठ खींचकर घूँघट, मिल जाए ना मन का मीत
गुपचुप लेंय बलैंया चितवन चित्त चुरावनहार की

निराकार साकार होंय सपने अपने वरदान दो
स्वस्तिक बंदनवार अल्पना रांगोली हर द्वार हो
गूँज उठे शहनाई ले अँगड़ाई, सोयी प्यास जगे
अविनाशी हो आस प्राण की, नित्य श्वास की रास रचे
'सलिल' कूल की करे कामना ज्वार-धार-पतवार की

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शनिवार, 16 अगस्त 2014

muktak shringar ke: sanjiv

चित्र पर कविता 

 

नयन में शत सपने सुकुमार 
अधर का गीत करे श्रृंगार 
दंत शोभित ज्यों मुक्तामाल 
केश नागिन नर्तित बलिहार 

भौंह ज्यों  प्रत्यंचा ली तान 
दृष्टि पत्थर में फूंके जान
नासिका ऊँची रहे सदैव 
भाल का किंचित घटे न मान 

सुराही कंठ बोल अनमोल 
कर्ण में मिसरी सी दे घोल 
कपोलों पर गुलाब खिल लाल
रहे नपनों-सपनों को तोल  

सोमवार, 21 जनवरी 2013

मुक्तक: रूप की आरती संजीव 'सलिल'

मुक्तक


रूप की आरती
संजीव 'सलिल'
*
रूप की आरती उतारा कर.
हुस्न को इश्क से पुकारा कर.
चुम्बनी तिल लगा दे गालों पर-
तब 'सलिल' मौन हो निहारा कर..
*
रूप होता अरूप मानो भी..
झील में गगन देख जानो भी.
देख पाओगे झलक ईश्वर की-
मन में संकल्प 'सलिल' ठानो भी..
*
नैन ने रूप जब निहारा है,
सारी दुनिया को तब बिसारा है.
जग कहे वन्दना तुम्हारी थी-
मैंने परमात्म को गुहारा है..
*
झील में कमल खिल रहा कैसे.
रूप को रूप मिल रहा जैसे.
ब्रम्ह की अर्चना करे अक्षर-
प्रीत से मीत मिल रहा ऐसे..
*
दीप माटी से जो बनाता है,
स्वेद-कण भी 'सलिल' मिलाता है.
श्रेय श्रम को मिले  दिवाली का-
गौड़ धन जो दिया जलाता है.
*
भाव में डूब गया है अक्षर,
रूप है सामने भले नश्वर.
चाव से डूबकर समझ पाया-
रूप ही है अरूप अविनश्वर..
*
हुस्न को क्यों कहा कहो माया?
ब्रम्ह को क्या नहीं यही भाया?
इश्क है अर्चना न सच भूलो-
छिपा माशूक में वही पाया..
*

शुक्रवार, 4 जून 2010

गीत : एक टक तुमको निहारूँ.....

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        गीत :
        भाग्य निज पल-पल सराहूँ.....     
        संजीव 'सलिल'
             *
             भाग्य निज पल-पल सराहूँ,
              जीत तुमसे, मीत हारूँ.
              अंक में सर धर तुम्हारे,
              एक टक तुमको निहारूँ.....

नयन उन्मीलित, अधर कम्पित,
 कहें अनकही गाथा.
 तप्त अधरों की छुअन ने,
 किया मन को सरगमाथा.
 दीप-शिख बन मैं प्रिये!
 नीराजना तेरी उतारूँ...
                          
                            हुआ किंशुक-कुसुम सा तन,
                            मदिर महुआ मन हुआ है.
                            विदेहित है देह त्रिभुवन,
                            मन मुखर काकातुआ है.
                            अछूते  प्रतिबिम्ब की,
                            अँजुरी अनूठी विहँस वारूँ...

 बाँह में ले बाँह, पूरी
 चाह कर ले, दाह तेरी.
 थाह पाकर भी न पाये,
 तपे शीतल छाँह तेरी.
 विरह का हर पल युगों सा,
 गुजारा, उसको बिसारूँ...
                      
                        बजे नूपुर, खनक कँगना,
                        कहे छूटा आज अँगना.
                        देहरी तज देह री! रँग जा,
                        पिया को आज रँग ना.
                        हुआ फागुन, सरस सावन,
                        पी कहाँ, पी कँह? पुकारूँ...

 पंचशर साधे निहत्थे पर,
 कुसुम आयुध चला, चल.
 थाम लूँ न फिसल जाए,
 हाथ से यह मनचला पल.
 चाँदनी अनुगामिनी बन.
 चाँद वसुधा पर उतारूँ...
                
                    *****

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Acharya Sanjiv Salil

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