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सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

फरवरी २३, ग़ज़लिका, सॉनेट, लौकिक छन्द, गीत, शिव, सोरठा, कविता, श्रृंगार, दोहा, कुण्डलिया

 सलिल सृजन

फरवरी २३

*
ग़ज़लिका ० फुलबगिया में आई तितलियाँ परिमल पा मुस्काई तितलियाँ ० कलियों सह गलबहियाँ डाले हुस्न दिखा इतराईं तितलियाँ ० हुए दिलजले भँवरे घायल दिखा अदा इठलाईं तितलियाँ ० लव जिहाद, बारिश तेजाबी पस्त नहीं घबराईं तितलियाँ ० छेड़ रहा वासंती मौसम हाथ न आ इठलाईं तितलियाँ ० हाॅकी क्रिकेट कराटे कुश्ती खेल जयी हो भाईं तितलियाँ ० दक्षिण ध्रुव से अंतरिक्ष तक गईं नहीं भरमाईं तितलियाँ ० होली दीवाली राखी पर खुशियाँ ला हर्षाईँ तितलियाँ ० रक्षा करतीं सेनाओं में दल दुश्मन दल भाईं तितलियाँ ० गोदी खेल, खिलातीं गोदी बिटियाँ, बहिना, माई तितलियाँ ० फुलबगिया की जान-आन हैं प्रभु की देन सुहाई तितलियाँ
०००
कार्यशाला-
दोहा से कुण्डलिया
*
१. 
मछलीघर ही बन गये, नयन नीर छलकाय!
मछलीघर में बन्द जो, मछली उछली जाय! - अशोक व्यग्र भोपाल

मछली उछली जाय, चाहती छू ले नभ को। सलिल लहर कह रही, भुला मत निज सरहद को।। फूल देख मत मचल, कह रही है आ तितली। पलक रोकती नयन, नीर में नाचे मछली।। - संजीव
२.
मछलीघर ही बन गये, नयन नीर छलकाय!
मछलीघर में बन्द जो, मछली उछली जाय! - अशोक व्यग्र भोपाल

मछली उछली जाय, नयन से नयन मिलाए झुका-उठा मिल-खिले, आप से आप लजाए मुग्ध जीव संजीव, निहारे ‍फिसली-सँभली मछलीघर की जान-शान है असली मछली
२३.२.२०२६ ०००
ग़ज़लिका
.
लगी आग ज्यों पलाश वन में
त्यों दहके अपना मन, तन में
.
मत पूछो क्यों लगी न अब तक
प्रभु से लगन न किसी लगन में
.
जग उठ मेहनत करता चल रे!
शुभ हर कोशिश सभी सगन में
.
शंका की कुछ जगह नहीं है
धुन डूबे मन हुए मगन में
.
देख रही खूबी ही खूबी
भोली सजनी निज साजन में
.
होली का आनंद अनूठा
वैमनस्य के अग्नि-दहन में
.
फेर समय का नीति-धर्म का
सूर्य-चंद्र है सलिल गहन में
२३.२.२०२५
०००
इटेलियन सॉनेट
महावेगा
*
कामना होती महावेगा,
वास मत हो वासना का तन,
याचना तज यातना सह जन,
मातृका पूजित महावेगा।
क्रुद्ध होते जब महादेवा,
दग्ध करते काम पल भर में,
काम कर निष्काम युग हर में,
धर्म-धारा नव बहावेगा।
नर्मदा में यदि नहावेगा,
स्नेह सुरसरि ज़िंदगी होगी,
खिलावेगा शत सृजन शतदल।
व्यर्थ क्यों आँसू बहावेगा?
संयमित होता सदा योगी,
नहावेगा स्वेद जल निर्मल।
२३.२.२०२४
***
मुक्तक
मिलें रस-लीन जब रचना समझ लेना सिंगारी हैं।
करे संचित न खो रस-निधि, सकल श्वासें पुजारी हैं।।
उठा ब्रज-रज बना चंदन लगा मस्तक से मन हुलसे-
सलिल रस-खान; नत हो झाँकते राधा बिहारी हैं।।
२३-२-२०२३
***
छंद विमर्श
सात लोक और लौकिक छन्द
अध्यात्म शास्त्र में वर्णित सात लोक भू-लोक, भुवः लोक, स्वः लोक, तपः लोक, महः लोक, जनः लोक और सत्य लोक हैं। ये किसी ग्रह, नक्षत्र में स्थित अथवा अधर में लटके हुए स्थान नहीं, स्थूलता से सूक्ष्मता की ओर बढ़ने की स्थिति मात्र हैं। पिंगल शास्त्र में सप्त लोकों के आधार पर सात मात्राओं के छंदों को 'लौकिक छंद' कहा गया है।
सामान्य दृष्टि से भूलोक में रेत, पत्थर, वृक्ष, वनस्पति, खनिज, प्राणी, जल आदि पदार्थ हैं। इसके भीतर की स्थिति है आँखों से नहीं, सूक्ष्मदर्शी यन्त्र से देखी-समझी जा सकती है। हवा में मिली गैसें, जीवाणु आदि इस श्रेणी में हैं। इससे गहरी अणु सत्ता के विश्लेषण में उतरने पर विभिन्न अणुओं-परमाणुओं के उड़ते हुए अन्धड़ और अदलते-बदलते गुच्छक हैं। अणु सत्ता का विश्लेषण करने पर उसके सूक्ष्म घटक पदार्थ नहीं,विद्युत स्फुल्लिंग मात्र दृष्टिगोचर होते हैं। तदनुसार ऊर्जा प्रवाह ही संसार में एकमात्र विद्यमान सत्ता प्रतीत होती है। स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ते हुए हम कहीं से कहीं जा पहुँचते हैं किंतु स्थान परिवर्तन नहीं होता। अपने इसी स्थान में यह स्थूल से सूक्ष्म, सूक्ष्म से अति सूक्ष्म, अति सूक्ष्म से महा सूक्ष्म की स्थिति बनती जाती है।
सात लोकों का स्थान कहीं बाहर या अलग-अलग नहीं है। वे एक शरीर के भीतर अवयव, अवयवों के भीतर माँस-पेशियाँ, माँस-पेशियों के भीतर ज्ञान-तंतु, ज्ञान-तन्तुओं के भीतर मस्तिष्कीय विद्युत आदि की तरह हैं। वे एक के भीतर एक के क्रम से क्रमशः भीतर के भीतर-समाये, अनुभव किये जा सकते हैं। सात लोकों की सत्ता स्थूल लोक के भीतर ही सूक्ष्मतर-सूक्ष्मतम और अति सूक्ष्म होती गई है। सबका स्थान वही है जिसमें हम स्थित हैं। ब्रह्मांड के भीतर ब्रह्मांड की सत्ता परमाणु की मध्यवर्ती नाभिक के अन्तर्गत प्राप्त अति सूक्ष्म किन्तु विशाल ब्रह्मांड का प्रतिनिधित्व करनेवाले ब्रह्म-बीज में प्राप्य है।
जीव की देह भी ब्रह्म शरीर का प्रतीक प्रतिनिधि (बीज) है। उसके भीतर भी सात लोक हैं। इन्हें सात शरीर (सप्त धातु-रस, रक्त, माँस, अस्थि, मज्जा, शुक्र, ओजस) कहा जाता है। भौतिक तन में छह धातुएँ हैं, सातवीं ओजस् तो आत्मा की ऊर्जा मात्र है। इनके स्थान अलग-अलग नहीं हैं। वे एक के भीतर एक समाये हैं। इसी तरह चेतना शरीर भी सात शरीरों का समुच्चय है। वे भी एक के भीतर एक के क्रम से अपना अस्तित्व बनाये हुए हैं।
योग शास्त्र में इन्हें चक्रों का नाम दिया गया है। छह चक्र मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा और सातवाँ सहस्रार कमल। कहीं छह, कहीं सात की गणना से भ्रमित न हों। सातवाँ लोक सत्यलोक है। सत्य अर्थात् पूर्ण परमात्मा । इससे नीचे के लोक भी तथा साधना में प्रयुक्त होने वाले चक्र छ:-छ: ही हैं। सातवाँ सहस्रार कमल ब्रह्मलोक है। उस में शेष ६ लोक लय होते है। सात या छह के भेद-भाव को इस तरह समझा जा सकता है। देवालय सात मील दूर है। बीच में छह मील के पत्थर और सातवाँ मील पत्थर प्रत्यक्ष देवालय। छह गिने या सात इससे वस्तुस्थिति में कोई अन्तर नहीं पड़ता।
मनुष्य के सात शरीरों का वर्णन तत्ववेत्ताओं ने इस प्रकार किया हैं- (१) स्थूल शरीर-फिजिकल बाड़ी (२) सूक्ष्म शरीर इथरिक बॉडी (३) कारण शरीर-एस्ट्रल बॉडी (४)मानस शरीर-मेन्टल बॉडी (५) आत्मिक शरीर-स्प्रिचुअल बॉडी (६) देव शरीर -कॉस्मिक बॉडी (७) ब्रह्म शरीर-वाडीलेस बॉडी।
सप्त धातुओं का बना भौतिक शरीर प्रत्यक्ष है। इसे देखा, छुआ और इन्द्रिय सहित अनुभव किया जा सकता है। जन्मतः प्राणी इसी कलेवर को धारण किये होता है। उनमें प्रायः इन्द्रिय चेतना जागृत होती है। भूख, सर्दी-गर्मी जैसी शरीरगत अनुभूतियाँ सक्षम रहती हैं। पशु शरीर आजीवन इसी स्थिति में रहते हैं। मनुष्य के सातों शरीर क्रमशः विकसित होते हैं। भ्रूण पड़ते ही सूक्ष्म मानव शरीर जागृत होने लगता है। इच्छाओं और सम्वेदनाओं के रूप में इसका विकास होता है। मानापमान, अपना-पराया, राग-द्वेष, सन्तोष-असन्तोष, मिलन-वियोग जैसे अनुभव भाव (सूक्ष्म) शरीर को होते हैं। बीज में से पहले अंकुर निकलता है, तब उसका विकास पत्तों के रूप में होता है। स्थूल शरीर को अंकुर और सूक्ष्म शरीर पत्ता कह सकते हैं। फिजिकल बॉडी यथास्थान बनी रहती है, पर उसमें नई शाखा भाव शरीर एस्ट्रल बॉडी के रूप में विकसित होती है।सातों शरीरों का अस्तित्व आत्मा के साथ-साथ ही है, पर उनका विकास आयु और परिस्थितियों के आधार पर धीमे अथवा तीव्र गति से स्वल्प-अधिक मात्रा में होता है।
तीसरा कारण शरीर विचार, तर्क, बुद्धि से सम्बन्धित है। इसका विकास, व्यावहारिक, सभ्यता और मान्यतापरक संस्कृति के आधार पर होता है। यह किशोरावस्था में प्रवेश करते-करते आरम्भ होता है और वयस्क होने तक अपने अस्तित्व का परिचय देने लगता है। बालक को मताधिकार १८ वर्ष की आयु में मिलता है। अल्प वयस्कता इसी अवधि में पहुँचने पर पूरी होती है। बारह से लेकर अठारह वर्ष की आयु में शरीर का काम चलाऊ विकास हो जाता है। यौन सम्वेदनाएँ इसी अवधि में जागृत होती हैं। सामान्य मनुष्य इतनी ही ऊँचाई तक बढ़ते हैं। फिजिकल-इथरिक और एस्ट्रल बॉडी के तीन वस्त्र पहनकर ही सामान्य लोग दरिद्रता में जीवन बिताते हैं। इसलिए सामान्यत: तीन शरीरों की ही चर्चा होती है। स्थूल , सूक्ष्म और कारण शरीरों की व्याख्या कर बात पूरी कर ली जाती है। प्रथम शरीर में शरीरगत अनुभूतियों का सुख-दुःख, दूसरे में भाव सम्वेदनाएँ और तीसरे में लोकाचार एवं यौनाचार की प्रौढ़ता विकसित होकर एक कामचलाऊ मनुष्य का ढाँचा खड़ा हो जाता है।
तीन शरीरों के बाद मनुष्य की विशिष्टताएँ आरम्भ होती हैं। मनस् शरीर में कलात्मक रसानुभूति होती है। कवित्व जगता है। कोमल सम्वेदनाएँ उभरती हैं। कलाकार, कवि, सम्वेदनाओं के भाव लोक में विचरण करने वाले भक्त-जन, दार्शनिक, करुणार्द्र, उदार, देश-भक्त इसी स्तर के विकसित होने से बनते हैं। यह स्तर उभरे तो पर विकृत बन चले तो व्यसन और व्याभिचार जन्य क्रीड़ा-कौतुकों में रस लेने लगता है। विकसित मनस् क्षेत्र के व्यक्ति असामान्य होते हैं। इस स्तर के लोग कामुक-रसिक हो सकते हैं। सूरदास, तुलसीदास जैसे सन्त अपने आरम्भिक दिनों में कामुक थे। वही ऊर्जा जब भिन्न दिशा में प्रवाहित हो तो सम्वेदनाएँ कुछ से कुछ करके दिखाने लगीं। महत्वाकाँक्षाएँ (अहंकार) इसी क्षेत्र में जागृत होती हैं। महत्वाकांक्षी व्यक्ति भौतिक जीवन में तरह-तरह के महत्वपूर्ण प्रयास कर असाधारण प्रतिभाशाली कहलाते हैं। प्रतिभागी लोगों का मनस् तत्व प्रबल होता है। उन्हें मनस्वी भी कहा जा सकता है। बाल्मीक, अँगुलिमाल, अशोक जैसे महत्वाकांक्षी विकृत मनःस्थिति में घोर आतंकवादी रहे, पर जब सही दिशा में मुड़ गये तो उन्हें चोटी की सफलता प्राप्त करने में देर नहीं लगी। इसे मेन्टल बॉडी की प्रखरता एवं चमत्कारिता कहा जा सकता है।
पाँचवाँ शरीर-आत्मिक शरीर स्प्रिचुअल बॉडी अतीन्द्रिय शक्तियों का आवास होता है। अचेतन मन की गहरी परतें जिनमें दिव्य अनुभूतियाँ होती हैं। इसी पाँचवें शरीर से सम्बन्धित हैं। मैस्मरेज्म, हिप्नोटिज्म, टेलीपैथी, क्लैरेहवाइंस जैसे प्रयोग इसी स्तर के विकसित होने पर होते हैं । कठोर तन्त्र साधनाएँ एवं उग्र तपश्चर्याएँ इसी शरीर को परिपुष्ट बनाने के लिए की जाती हैं। संक्षेप में इसे ‘दैत्य’ सत्ता कहा जा सकता है। सिद्धि और चमत्कारों की घटनाएँ- संकल्प शक्ति के बढ़े-चढ़े प्रयोग इसी स्तर के समर्थ होने पर सम्भव होते हैं। सामान्य सपने सभी देखते हैं पर जब चेतना इस पाँचवे शरीर में जमी होती है तो किसी घटना का सन्देश देने वाले सपने भी दीख सकते हैं। उनमें भूत, भविष्य की जानकारियों तथा किन्हीं रहस्यमय तथ्यों का उद्घाटन भी होता है। भविष्यवक्ताओं, तान्त्रिकों एवं चमत्कारी सिद्धि पुरुषों की गणना पाँचवे शरीर की जागृति से ही सम्भव होती है। ऊँची मीनार पर बैठा हुआ मनुष्य जमीन पर खड़े मनुष्य की तुलना में अधिक दूर की स्थिति देख सकता है। जमीन पर खड़ा आदमी आँधी का अनुभव तब करेगा जब वह बिलकुल सामने आ जायगी। पर मीनार पर बैठा हुआ मनुष्य कई मील दूर जब आँधी होंगी तभी उसकी भविष्यवाणी कर सकता है। इतने मील दूर वर्षा हो रही है। अथवा अमुक स्थान पर इतने लोग इकट्ठे हैं। इसका वर्णन वह कर सकता जो ऊँचे पर खड़ा है और आँखों पर दूरबीन चढ़ाये है, नीचे खड़े व्यक्ति के लिए यह सिद्धि चमत्कार है, पर मीनार पर बैठे व्यक्ति के लिए यह दूरदर्शन नितान्त सरल और स्वाभाविक है।
छठे शरीर को देव शरीर कहते हैं-यही कॉस्मिक बाड़ी है। ऋषि , तपस्वी, योगी इसी स्तर पर पहुँचने पर बना जा सकता है। ब्राह्मणों और सन्तों का भू-देव, भू-सुर नामकरण उनकी दैवी अन्तःस्थिति के आधार पर है। स्वर्ग और मुक्ति इस स्थिति में पहुँचने पर मिलनेवाला मधुर फल है। सामान्य मनुष्य चर्म-चक्षुओं से देखता है, पर देव शरीर में दिव्य चक्षु खुलते हैं और “सियाराम मय सब जग जानी” के विराट ब्रह्मदर्शन की मनःस्थिति बन जाती है। कण-कण में ईश्वरीय सत्ता के दर्शन होते हैं और इस दिव्य उद्यान में सर्वत्र सुगंध महकती प्रतीत होती हैं। परिष्कृत दृष्टिकोण ही स्वर्ग है। स्वर्ग में देवता रहते हैं। देव शरीर में जागृत मनुष्यों के अन्दर उत्कृष्ट चिन्तन और बाहर आदर्श कर्तृत्व सक्रिय रहता है। तदनुसार भीतर शान्ति की मनःस्थिति और बाहर सुख भरी परिस्थिति भरी-पूरी दृष्टिगोचर होती है। स्वर्ग इसी स्थिति का नाम है। जो ऐसी भूमिका में निर्वाह करते हैं। उन्हें देव कहते हैं। असुर मनुष्य और देव यह आकृति से तो एक किन्तु प्रकृति से भिन्न होते हैं।
भौतिकवादी लोक-मान्यताओं का ऐसे देव मानवों पर रत्ती भर प्रभाव नहीं पड़ता । वे निन्दा-स्तुति की, संयोग-वियोग की, हानि-लाभ की, मानापमान की लौकिक सम्वेदनाओं से बहुत ऊँचे उठ जाते हैं। लोक मान्यताओं को वे बाल-बुद्धि की दृष्टि से देखते हैं। लोभ-मोह, वासना-तृष्णा के भव-बन्धन सामान्य मनुष्यों को बेतरह जकड़कर कठपुतली की तरह नचाते हैं। छठवीं देव भूमिका में पहुँची देव आत्माएँ आदर्श और कर्त्तव्य मात्र को पर्याप्त मानती हैं। आत्मा और परमात्मा को सन्तोष देना ही उन्हें पर्याप्त लगता है। वे अपनी गतिविधियाँ निर्धारित करते समय लोक मान्यताओं पर तनिक भी ध्यान नहीं देते वरन् उच्चस्तरीय चेतना से प्रकाश ग्रहण करते हैं। इन्हें भव-बन्धनों से मुक्त-जीवन मुक्त कहा जाता है। मुक्ति या मोक्ष प्राप्त कर लेना इसी स्थिति का नाम है। यह छोटे शरीर में देव स्थिति में कॉस्मिक बॉडी में विकसित आत्माओं को उपलब्ध होता है।
सातवाँ ब्रह्म शरीर है। इसमें आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप में अवस्थित होता है। वे शरीर झड़ जाते हैं जो किसी न किसी प्रकार भौतिक जगत से सम्बन्धित थे। उनका आदान-प्रदान प्रत्यक्ष संसार से चलता है। वे उससे प्रभावित होते और प्रभावित करते हैं। ब्रह्म शरीर का सीधा सम्बन्ध परमात्मा से होता है। उसकी स्थिति लगभग ब्रह्म स्तर की हो जाती है। अवतार इसी स्तर पर पहुँची हुई आत्माएँ हैं। लीला अवतरण में उनकी अपनी कोई इच्छा आकाँक्षा नहीं होती, वे ब्रह्मलोक में निवास करते हैं। ब्राह्मी चेतना किसी सृष्टि सन्तुलन के लिए भेजती है तो उस प्रयोजन को पूरा करके पुनः अपने लोक वापस लौट जाते हैं। ऐसे अवतार भारत में १० या २४ मान्य है। वस्तुतः उनकी गणना करना कठिन है। संसार के विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न प्रयोजनों के लिए वे समय-समय पर विलक्षण व्यक्तित्व सहित उतरते हैं और अपना कार्य पूरा करके वापिस चले जाते हैं। यह स्थिति ‘अहम् ब्रह्मोसि’ सच्चिदानन्दोऽहम्, शिवोऽहम् सोऽहम्, कहने की होती है। उस चरम लक्ष्य स्थल पर पहुँचने की स्थिति को चेतना क्षेत्र में बिजली की तरह कोंधाने के लिए इन वेदान्त मन्त्रों का जप, उच्चारण एवं चिन्तन, मनन किया जाता है।
पाँचवें शरीर तक स्त्री-पुरुष का भेद, विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण तथा अगले जन्म में उसी लिंग का शरीर बनने की प्रक्रिया चलती है। उससे आगे के छठे और सातवें शरीर में विकसित होने पर यह भेदभाव मिट जाता है। तब मात्र एक आत्मा की अनुभूति होती है। स्त्री-पुरुष का आकर्षण-विकर्षण समाप्त हो जाता है। सर्वत्र एक ही आत्मा की अनुभूति होती है। अपने आपकी अन्तः स्थिति लिंग भेद से ऊपर उठी होती है यद्यपि जननेंद्रिय चिन्ह शरीर में यथावत् बने रहते हैं। यही बात साँसारिक स्थिति बदलने के कारण मन पर पड़ने वाली भली-बुरी प्रतिक्रिया के सम्बन्ध में भी होती है। समुद्र में लहरें उठती-गिरती रहती हैं। नाविक उनके लिए हर्ष-शोक नहीं करता, समुद्री हलचलों का आनन्द लेता है। छठे शरीर में विकसित देवात्माएँ इस स्थिति से ऊपर उठ जाती हैं। उनका चेतना स्तर गीता में कहे गये 'स्थित प्रज्ञ ज्ञानी' की और उपनिषदों में वर्णित 'तत्वदर्शी' की बन जाती है। उसके आत्म सुख से संसार के किसी परिवर्तन में विक्षेप नहीं पड़ता। लोकाचार हेतु उपयुक्त लीला प्रदर्शन हेतु उसका व्यवहार चलता रहता है। यह छठे शरीर तक की बात है। सातवें शरीर वाले अवतारी (भगवान) संज्ञा से विभूषित होते हैं। इन्हें ब्रह्मात्मा, ब्रह्म पुरुष का सकते हैं। उन्हें ब्रह्म साक्षात्कार, ब्रह्म निर्वाण प्राप्त भी कहा जा सकता है।
छठे शरीर में स्थित देव मानव स्थितिवश शाप और वरदान देते हैं, पर सातवें शरीर वाले के पास शुभेच्छा के अतिरिक्त और कुछ बचता ही नहीं। उनके लिए पराया एवं बैरी कोई रहता ही नहीं। दोष, अपराधों को वे बाल बुद्धि मानते हैं और द्वेष दण्ड के स्थान पर करुणा और सुधार की बात भर सोचते हैं।
सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार पृथ्वी के नीचे सात पाताल लोक वर्णित हैं जिनमें पाताल अंतिम है। हिन्दू धर्म ग्रंथों में पाताल लोक से सम्बन्धित असंख्य कहानियाँ, घटनायें तथा पौराणिक विवरण मिलते हैं। पाताल लोक को नागलोक का मध्य भाग बताया गया है, क्योंकि जल-स्वरूप जितनी भी वस्तुएँ हैं, वे सब वहाँ पर्याप्त रूप से गिरती हैं। पाताल लोक में दैत्य तथा दानव निवास करते हैं। जल का आहार करने वाली आसुर अग्नि सदा वहाँ उद्दीप्त रहती है। वह अपने को देवताओं से नियंत्रित मानती है, क्योंकि देवताओं ने दैत्यों का नाश कर अमृतपान कर शेष भाग वहीं रख दिया था। अत: वह अग्नि अपने स्थान के आस-पास नहीं फैलती। अमृतमय सोम की हानि और वृद्धि निरंतर दिखाई पड़ती है। सूर्य की किरणों से मृतप्राय पाताल निवासी चन्द्रमा की अमृतमयी किरणों से पुन: जी उठते हैं। विष्णु पुराण के अनुसार पूरे भू-मण्डल का क्षेत्रफल पचास करोड़ योजन है। इसकी ऊँचाई सत्तर सहस्र योजन है। इसके नीचे सात लोक इस प्रकार हैं-१. अतल, २. वितल, ३. सुतल, ४. रसातल, ५. तलातल, ६. महातल, ७. पाताल।
पौराणिक उल्लेख
पुराणों में पाताल लोक के बारे में सबसे लोकप्रिय प्रसंग भगवान विष्णु के अवतार वामन और पाताल सम्राट बलि का है। रामायण में अहिरावण द्वारा राम-लक्ष्मण का हरण कर पाताल लोक ले जाने पर श्री हनुमान के वहाँ जाकर अहिरावण वध करने का प्रसंग आता है। इसके अलावा भी ब्रह्माण्ड के तीन लोकों में पाताल लोक का भी धार्मिक महत्व बताया गया है।
२३-२-२०१९
***
(प्रकाशनाधीन छंद कोष से)
***
गीत -
हम
हम वही हैं,
यह न भूलो
झट उठो आकाश छू लो।
बता दो सारे जगत को
यह न भूलो
हम वही है।
हमारे दिल में पली थी
सरफरोशी की तमन्ना।
हमारी गर्दन कटी थी
किंतु
किंचित भी झुकी ना।
काँपते थे शत्रु सुनकर
नाम जिनका
हम वही हैं।
कारगिल देता गवाही
मर अमर
होते हमीं हैं।
इंकलाबों की करी जयकार
हमने फेंककर बम।
झूल फाँसी पर गये
लेकिन
न झुकने दिया परचम।
नाम कह 'आज़ाद', कोड़े
खाये हँसकर
हर कहीं हैं।
नहीं धरती मात्र
देवोपरि हमें
मातामही हैं।
पैर में बंदूक बाँधे,
डाल घूँघट चल पड़ी जो।
भवानी साकार दुर्गा
भगत के
के संग थी खड़ी वो।
विश्व में ऐसी मिसालें
सत्य कहता हूँ
नहीं हैं।
ज़िन्दगी थीं या मशालें
अँधेरा पीती रही
रही हैं।
'नहीं दूँगी कभी झाँसी'
सुनो, मैंने ही कहा था।
लहू मेरा
शिवा, राणा, हेमू की
रग में बहा था।
पराजित कर हूण-शक को
मर, जनम लेते
यहीं हैं।
युद्ध करते, बुद्ध बनते
हमीं विक्रम, 'जिन'
हमीं हैं।
विश्व मित्र, वशिष्ठ, कुंभज
लोपामुद्रा, कैकयी, मय ।
ऋषभ, वानर, शेष, तक्षक
गार्गी-मैत्रेयी
निर्भय?
नाग पिंगल, पतंजलि,
नारद, चरक, सुश्रुत
हमीं हैं।
ओढ़ चादर रखी ज्यों की त्यों
अमल हमने
तही हैं।
देवव्रत, कौंतेय, राघव
परशु, शंकर अगम लाघव।
शक्ति पूजित, शक्ति पूजी
सिय-सती बन
जय किया भव।
शून्य से गुंजित हुए स्वर
जो सनातन
हम सभी हैं।
नाद अनहद हम पुरातन
लय-धुनें हम
नित नयी हैं।
हमीं भगवा, हम तिरंगा
जगत-जीवन रंग-बिरंगा।
द्वैत भी, अद्वैत भी हम
हमीं सागर,
शिखर, गंगा।
ध्यान-धारी, धर्म-धर्ता
कम-कर्ता
हम गुणी हैं।
वृत्ति सत-रज-तम न बाहर
कहीं खोजो,
त्रय हमीं हैं।
भूलकर मत हमें घेरो
काल को नाहक न टेरो।
अपावन आक्रांताओं
कदम पीछे
हटा फेरो।
बर्फ पर जब-जब
लहू की धार
सरहद पर बही हैं।
कहानी तब शौर्य की
अगणित, समय ने
खुद कहीं हैं।
हम वही हैं,
यह न भूलो
झट उठो आकाश छू लो।
बता दो सारे जगत को
यह न भूलो
हम वही है।
***
ग़ज़लिका:
.
गीतों से अनुराग न होता
जीवन कजरी-फाग न होता
रास आस से कौन रचाता?
मौसम पहने पाग न होता
निशा उषा संध्या से मिलता
कैसे सूरज आग न होता?
बाट जोहता प्रिय प्रवास की
मन-मुँडेर पर काग न होता
सूनी रहती सदा रसोई
गर पालक का साग न होता
चंदा कहलातीं कैसे तुम
गर निष्ठुरता-दाग न होता?
गुणा कोशिशों का कर पाते
अगर भाग में भाग न होता
नागिन क्वारीं मर जाती गर
बीन सपेरा नाग न होता
'सलिल' न होता तो सच मानो
बाट घाट घर बाग़ न होता
***
***
शिव-सोरठावली
*
रख शंकर से आस, हर शंका को दूर कर।
यदि मन में विश्वास, श्रृद्धा-शिवा सदय रहें।।
*
सविता रक्त सरोज, शिव नीला आकाश हैं।।
देतीं जीवन-ओज, रश्मि-उमा नित नमन कर।।
*
विष्णु जीव की देह, शिव जीवों में प्राण है।
जीवन जिएँ विदेह, ब्रम्हा मति को जानिए।।
*
रमा देह का रूप, उमा प्राण की चेतना।
जो पाए हो भूप, शारद मति की तीक्ष्णता।।
*
पठन विष्णु को जान, चिंतन-लेखन ब्रम्ह है।
नमन करें मतिमान, मनन-कहाँ शिव तत्व है।।
*
शब्द विष्णु अवतार, अक्षर-अक्षर ब्रम्ह है।
लिख-पढ़ता संसार, शिव समर्थ दें अर्थ जब।।
*
रमा शब्द का भाव, अक्षर की लिपि शारदा।
मेटें सकल अभाव, उमा कथ्य निहितार्थ हैं।।
*
शिव कागज विस्तार, कलम ब्रम्ह, स्याही हरी।
लिपि कथ्यार्थ अपार, शारद-रमा-उमा बनें।।
*
तीन-देव-अभिषेक, नव लेखन से नित्य कर।
जागे बुद्धि-विवेक, तीन देवियाँ हों सदय।।
*
वह जीवित निर्जीव, जो न करे रचना नई।
संचेतन-संजीव, नया सृजन कर जड़ बने।।
*
ऊषा करे प्रकाश, सविता से ऊर्जा मिले।
कर थामे आकाश, वसुधा हो आधार तो।।
*
२३-२-२०१८
***
कविता
काव्य और जन-वेदना
*
काव्य क्या?
कुछ कल्पना
कुछ सत्य है.
यह नहीं जड़,
चिरंतन चैतन्य है।
देख पाते वह अदेखा जो रहा,
कवि मनीषी को न कुछ अव्यक्त है।
रश्मि है
अनुभूतिमय संवेदना।
चतुर की जाग्रत सतत हो चेतना
शब्द-वेदी पर हवन मन-प्राण का।
कथ्य भाषा भाव रस संप्राणता
पंच तत्त्वों से मिले संजीवनी
साधना से सिद्धि पाते हैं गुनी।
कहा पढ़ सुन-गुन मनन करते रहे
जो नहीं वे देखकर बाधा ढहे
चतुर्दिक क्या घट रहा,
क्या जुड़ रहा?
कलम ने जो किया अनुभव
वह कहा।
पाठकों!
अब मौन व्रत को तोड़ दो।
‘तंत्र जन’ का है
सदा सच-शुभ ही कहो।
अशुभ से जब जूझ जाता ‘लोक’ तो
‘तन्त्र’ में तब व्याप जाता शोक क्यों?
‘प्रतिनिधि’ जिसका
न क्यों उस सा रहे?
करे सेवक मौज, मालिक चुप दहे?
शब्द-शर-संधान कर कवि-चेतना
चाहती जन की हरे कुछ वेदना।
२३-२-२०१७
***
श्रृंगार गीत:
सद्यस्नाता
*
सद्यस्नाता!
रूप तुम्हारा
सावन सा भावन।
केश-घटा से
बूँद-बूँद जल
टप-टप चू बरसा।
हेर-हेर मन
नील गगन सम
हुलस-पुलक तरसा।
*
उगते सूरज जैसी बिंदी
सजा भाल मोहे।
मृदु मुस्कान
सजे अधरों पर
कंगन कर सोहे।
लेख-लेख तन म
हुआ वन सम
निखर-बिखर गमका।
*
दरस-परस पा
नैन नशीले
दो से चार हुए।
कूल-किनारे
भीग-रीझकर
खुद जलधार हुए।
लगा कर अगन
बुझा कर सजन
बिन बसंत कुहका।
२३-२-२०१६
***
दोहा सलिला :
माटी सब संसार.....
*
माटी ने शत-शत दिये, माटी को आकार.
माटी में माटी मिली, माटी सब संसार..
*
माटी ने माटी गढ़ी, माटी से कर खेल.
माटी में माटी मिली, माटी-नाक नकेल..
*
माटी में मीनार है, वही सकेगा जान.
जो माटी में मिल कहे, माटी रस की खान..
*
माटी बनती कुम्भ तब, जब पैदा हो लोच.
कूटें-पीटें रात-दिन, बिना किये संकोच..
*
माटी से मिल स्वेद भी, पा जाता आकार.
पवन-ग्रीष्म से मिल उड़े, पल में खो आकार..
*
माटी बीजा एक ले, देती फसल अपार.
वह जड़- हम चेतन करें, क्यों न यही आचार??
*
माटी को मत कुचलिये, शीश चढ़े बन धूल.
माटी माँ मस्तक लगे, झरे न जैसे फूल..
*
माटी परिपाटी बने, खाँटी देशज बोल.
किन्तु न इसकी आड़ में, कर कोशिश में झोल..
*
माटी-खेलें श्याम जू, पा-दे सुख आनंद.
माखन-माटी-श्याम तन, मधुर त्रिभंगी छंद..
*
माटी मोह न पालती, कंकर देती त्याग.
बने निरुपयोगी करे, अगर वृथा अनुराग..
*
माटी जकड़े दूब-जड़, जो विनम्र चैतन्य.
जल-प्रवाह से बच सके, पा-दे प्रीत अनन्य..
*
माटी मोल न आँकना, तू माटी का मोल.
जाँच-परख पहले 'सलिल', बात बाद में बोल..
*
माटी की छाती फटी, खुली ढोल की पोल.
किंचित से भूडोल से, बिगड़ गया भूगोल..
*
माटी श्रम-कौशल 'सलिल', ढालें नव आकार.
कुम्भकार ने चाक पर, स्वप्न किया साकार.
*
माटी की महिमा अमित, सकता कौन बखान.
'सलिल' संग बन पंक दे, पंकज सम वरदान..
***
कविता
धरती
*
धरती काम करने
कहीं नहीं जाती
पर वह कभी भी
बेकाम नहीं होती.
बादल बरसता है
चुक जाता है.
सूरज सुलगता है
ढल जाता है.
समंदर गरजता है
बँध जाता है.
पवन चलता है
थम जाता है.
न बरसती है,
न सुलगती है,
न गरजती है,
न चलती है
लेकिन धरती
चुकती, ढलती,
बंधती या थमती नहीं.
धरती जन्म देती है
सभ्यता को,
धरती जन्म देती है
संस्कृति को.
तभी ज़िंदगी
बंदगी बन पाती है.
धरती कामगार नहीं
कामगारों की माँ होती है.
इसीलिये इंसानियत ही नहीं
भगवानियत भी
उसके पैर धोती है..
२३-२-२०११
***

सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

फरवरी २, हरिगीतिका, शे'र, दोहा , समीक्षा , सुनीता सिंह, कविता, बजट

 पुरोवाक

एक रचना बजट ० सत्ता कहती- 'बजट श्रेष्ठ है।' 'है कंडम' विपक्ष बतलाता। बेसिर-पैर कवायद लगता जनता को कुछ समझ न आता। ऐंकर-नेता गर्दभ सुर में चीख रहे ताल ठोंककर। हार गए हैं सारमेय सब जीत न पाए, थके भौंककर। पाना क्या है?, क्या खोना है? कोई न जाने यह रोना है । जिसको दिया, न उसको मिलता। दिया न जिसको वह पा खिलता। थोड़ा-ज्यादा, ज्यादा-थोड़ा भानुमती ने कुनबा जोड़ा। नहीं आज तक राहत आई बिगड़ी बात न बनने पाई। कल क्या होगा, किसे खबर है? वादा-जुमला गुजर-बसर है। ट्रंप कार्ड है अमरीकी हित ढोना अपनी मजबूरी है। बुलडोजर अपनों पर चलता सत्ता-मद की मगरूरी है। पक्ष-विपक्ष न सहमत होते नौटंकी जनता चुप देखे। लोक उपेक्षित, तंत्र प्रबल है मंत्र न समरसता का लेखे। मोहित हुआ जेन जी हर दिन देख रहा क्या नया गजट है? अखबारों से खबर लापता हर पन्ने पर सिर्फ गजट है। २.२.२०२६ ०००

ओस की बूँद - भावनाओं का सागर
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
सर्वमान्य सत्य है कि सृष्टि का निर्माण दो परस्पर विपरीत आवेगों के सम्मिलन का परिणाम है। धर्म दर्शन का ब्रह्म निर्मित कण हो या विज्ञान का महाविस्फोट (बिग बैंग) से उत्पन्न आदि कण (गॉड पार्टिकल) दोनों आवेग ही हैं जिनमें दो विपरीत आवेश समाहित हैं। इन्हें पुरुष-प्रकृति कहें या पॉजिटिव-निगेटिव इनर्जी, ये दोनों एक दूसरे से विपरीत (विरोधी नहीं) तथा एक दूसरे के पूरक (समान नहीं) हैं। इन दोनों के मध्य राग-विराग, आकर्षण-विकर्षण ही प्रकृति की उत्पत्ति, विकास और विनाश का करक होता है। मानव तथा मानवेतर प्रकृति के मध्य राग-विराग की शाब्दिक अनुभूति ही कविता है। सृष्टि में अनुभूतियों को अभियक्त करने की सर्वाधिक क्षमता मनुष्य में है। अपने अस्तित्व की रक्षा करने के लिए मनुष्य को संघर्ष, सहयोग और सृजन तीनों चरणों से साक्षात करना होता है। इन तीनों ही क्रियाओं में अनुभूत को अभिव्यक्त करना अपरिहार्य है। अभिव्यक्ति में रस और लास्य (सौंदर्य) का समावेश कला को जन्म देता है। रस और लास्य जब शब्दाश्रित हों तो साहित्य कहलाता है। मनुष्य के मन की रमणीय, और लालित्यपूर्ण सरस अभिव्यक्ति लय (गति-यति) के एककारित होकर काव्य कला की संज्ञा पाती हैं। काव्य कला साहित्य (हितेन सहितं अर्थात हित के साथ) का अंग है। साहित्य के अंग बुद्धि तत्व, भाव तत्व, कल्पना तत्व, कला तत्व ही काव्य के तत्व हैं।
काव्य प्रकाशकार मम्मट के अनुसार "तद्दौषौ शब्दार्थौ सगुणावनलंकृति पुन: क्वापि" अर्थात काव्य ऐसी जिसके शब्दों और अर्थों में दोष नहीं हो किन्तु गुण अवश्य हों, चाहे अलंकार कहीं कहीं न भी हों। जगन्नाथ के मत में "रमणीयार्थ प्रतिपादक: शब्द: काव्यम्" रमणीय अर्थ प्रतिपादित करने वाले शब्द ही काव्य हैं। अंबिकादत्त व्यास के शब्दों में "लोकोत्तरआनंददाता प्रबंधक: काव्यानामभक्" जिस रचना का वचन कर लोकोत्तर आनंद की प्राप्ति हो, वही काव्य है। विश्वनाथ के मत में "रसात्मकं वाक्यं काव्यं" रसात्मक वाक्य ही काव्य हैं।
हिंदी के शिखर समालोचक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के मतानुसार कविता से मनुष्य-भाव की रक्षा होती है। सृष्टि के पदार्थ या व्यापार-विशेष को कविता इस तरह व्यक्त करती है मानो वे पदार्थ या व्यापार-विशेष नेत्रों के सामने नाचने लगते हैं। वे मूर्तिमान दिखाई देने लगते हैं। उनकी उत्तमता या अनुत्तमता का विवेचन करने में बुद्धि से काम लेने की जरूरत नहीं पड़ती। कविता की प्रेरणा से मनोवेगों के प्रवाह जोर से बहने लगते हैं। तात्पर्य यह कि कविता मनोवेगों को उत्तेजित करने का एक उत्तम साधन है। यदि क्रोध, करूणा, दया, प्रेम आदि मनोभाव मनुष्य के अन्तःकरण से निकल जाएँ तो वह कुछ भी नहीं कर सकता। कविता हमारे मनोभावों को उच्छवासित करके हमारे जीवन में एक नया जीव डाल देती है।
मेरे विचार से काव्य वह भावपूर्ण रसपूर्ण लयबद्ध रचना है जो मानवानुभूति को अभिव्यक्त कर पाठक-श्रोता के ह्रदय को प्रभावित क्र उसके मन में अलौकिक आनंद का संचार करती है। मानवानुभूति स्वयं की भी हो सकती है जैसे 'मैं नीर भरी दुःख की बदली, उमड़ी थी कल मिट आज चली .... ' नयनों में दीपक से जलते, पलकों में निर्झरिणी मचली - महादेवी वर्मा या किसी अन्य की भी हो सकती है यथा 'वह आता पछताता पथ पर आता, पेट-पीठ दोनों हैं मिलकर एक, चल रहा लकुटिया टेक, मुट्ठी भर दाने को, भूख मिटाने को, मुँह फ़टी पुरानी झोली का फैलाता -निराला। कविता कवि की अनुभूति को पाठकों - श्रोताओं तक पहुँचाती है। वह मानव जीवन की सरस् एवं हृदयग्राही व्याख्या कर लोकोत्तर आनंद की सृष्टि ही नहीं वृष्टि भी करती है। इह लोक (संसार) में रहते हुए भी कवि हुए पाठक या श्रोता अपूर्व भाव लोक में विचरण करने लगता है। काव्यानंद ही न हो तो कविता बेस्वाद या स्वाधीन भोजनकी तरह निस्सार प्रतीत होगी, तब उसे न कोई पढ़ना चाहेगा, न सुनना।
काव्यानंद क्या है? भारतीय काव्य शास्त्रियों ने काव्यानंद को परखने के लिए काव्यालोचन की ६ पद्धतियों की विवेचना की है जिन्हें १. रस पद्धति, २. अलंकार पद्धति, ३. रीति पद्धति, ४. वक्रोक्ति पद्धति, ५. ध्वनि पद्धति तथा ६. औचित्य पद्धति कहा गया है। साहित्य शास्त्र के प्रथम तत्वविद भरत तथा नंदिकेश्वर ने नाट्य शास्त्र में रूपक की विवेचना करते हुए रस को प्रधान तत्व कहा है। पश्चात्वर्ती आचार्य काव्य के बाह्य रूप या शिल्पगत तत्वों तक सीमित रह गए। दण्डी के अनुसार 'काव्यशोभाकरान् धर्मान् अलंकारान् प्रचक्षते' अर्थात काव्य की शोभा तथा धर्म अलंकार है। वामन रीति (विशिष्ट पद रचना, शब्द या भाव योजना) को काव्य की आत्मा कहा "रीतिरात्मा काव्यस्य"। कुंतक ने "वक्रोक्ति: काव्य जीवितं" कहकर उक्ति वैचित्र्य को प्रमुखता दी। ध्वनि अर्थात नाद सौंदर्य को आनंदवर्धन ने काव्य की आत्मा बताया "काव्यस्यात्मा ध्वनिरीति"। क्षेमेंद्र की दृष्टि में औचित्य ही काव्य रचना का प्रमुख तत्व है "औचित्यं रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितं"। भरत के मत का अनुमोदन करते हुए विश्वनाथ ने रस को काव्य की आत्मा कहा है। अग्नि पुराणकार "वाग्वैदग्ध्यप्रधानेsपि रस एवात्र जीवितं" कहकर रस को ही प्रधानता देता है। स्पष्ट है कि शब्द और अर्थ काव्य-पुरुष के आभूषण हैं जबकि रस उसकी आत्मा है।
शिल्प पर कथ्य को वरीयता देने की यह सनातन परंपरा जीवित है युवा कवयित्री सुनीता सिंह के काव्य संग्रह 'ओस की बूँद' में। सुनीता परंपरा का निर्वहन मात्र नहीं करतीं, उसे जीवंतता भी प्रदान करती हैं। ईश वंदना से श्री गणेश करने की विरासत को ग्रहण करते हुए 'शिव धुन' में वे जगतपिता से सकल शूल विनाशन की प्रार्थना करती हैं -
पाशविमोचन भव गणनाथन! कर दो सारे शूल विनाशन॥
महाकाल सुरसूदन कवची!
पीड़ा तक परिणति जा पहुँची।
गिरिधन्वा गिरिप्रिय कृतिवासा!
दे दो हिय में आन दिलासा ॥
पशुपतिनाथ पुरंदर पावन! कर दो सारे शूल विनाशन॥
पाशविमोचन भव गणनाथन! कर दो सारे शूल विनाशन॥
शिव राग और विराग को सम भाव से जीते हैं। कामारि होते हुए भी अर्धनारीश्वर हैं। शिवाराधिका को प्रणय का रेशमी बंधन लघुता में विराट की अनुभूति कराता है-
नाजुक सी रेशम डोरी से, मन के गहरे सागर में।
बांध रहे हो प्राण हमारे, प्रियतम किरणों के घर में।।
अंतरतम में चिर - परिचित सा,
अक्स उभरता किंचित सा।
सदियों का ये बंधन लगता,
लघुता में भी विस्तृत सा।।
अब तक की सारी सुलझन भी, उलझ गई इस मंजर में।
बांध रहे हो प्राण हमारे, प्रियतम किरणों के घर में।।
तुम मुझको याद आओगे, शीर्षक गीत श्रृंगार के विविध पक्षों को शब्दायित करते हैं।
सुनीता की नारी समाज के आहतों स्त्री-गौरव की अवहेलना देखकर आक्रोशित और दुखी होती है। "नहिं तव आदि मध्य अवसाना, अमित प्रभाव वेद नहिं जाना" कहकर नारी की वंदना करनेवाले समाज में बालिका भ्रूण हत्या का महापाप होते देख कवयित्री 'कन्या भ्रूण संवाद' में अपनी मनोवेदना को मुखर करती है -
चलती साँस पर भी चली जब,
कैचियों की धारियां, ये तो बताओ।
एक-एक कर कट रहे सभी,
अंग की थी बारियाँ, ये तो सुनाओ।
फिर मौन चीखो से निकलता,
आह का होगा धुआं, क्या कह सकोगी?
क्या सोच कर, आयी यहाँ पर,
और क्या तुमको मिला, क्या कह सकोगी?
इस संकलन का वैशिष्ट्य उन पहलुओं को स्पर्श करना है जो प्राय: गीतकारों की दृष्टि से ओझल हो जाते हैं। काम काजी माँ के बच्चे की व्यथा कथा कहता गीत 'खड़ा गेट पर' मर्मस्पर्शी है -
खड़ा गेट पर राह तुम्हारी, देखा करता हूँ मैं माँ ।
शाम हो गई अब आओगी, ऑफिस से जानू मैं माँ ॥
रोज सवेरे मुझे छोड़ कर,
कैसे आखिर जाती हो
कैसे मेरे रोने पर भी,
तुम खुद को समझाती हो ?
बिना तुम्हारे दिन भर रहना, बहुत अखरता मुझको माँ ।
खड़ा गेट पर राह तुम्हारी, देखा करता हूँ मैं माँ ॥
सावन को मनभावन कहा गया है। सुनीता सावन को अपनी ही दृष्टि से देखती हैं। सावनी बौछारों से मधु वर्षण, मृदा का रससिक्त होना, कण-कण में आकर्षण, पत्तों का धुलना, अवयवों का नर्तन करना, धरा का हरिताम्बरा होना गीत को पूर्णता प्रदान करता है।
मृदा आसवित, वर्षा जल को,
अंतःतल ले जाती।
तृण की फैली, दरी मखमली,
भीग ओस से जाती।
बादल से घन, छनकर दशहन, निर्झर झरते जाते।
हर क्षण कण-कण, में आकर्षण, सरगम भरते जाते।
गीतिकाव्य का उद्गम दर्द या पीड़ा से मान्य है। कवयित्री अंतिम खत कोरा रखकर अर्थात कुछ न कहकर भी सब कुछ कह देने को ही काव्य कला का चरम मानती हैं। ग़ालिब कहते हैं 'दर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना'। अति क्रंदन के पार उतर कर ही दिल को हँसते पाती हैं।
शब्दहीन था कोरा-कोरा, मौन पीर का था गठजोरा।
इतना पीड़ा ने झकझोरा, छोड़ दिया अंतिम खत कोरा।।
अंधियारे में बादल बनकर,
अखियाँ बरसीं अंतस कर तर।
राहें सूझें भी तो कैसे
जड़ जब होती रूह सिहरकर।।
अति क्रंदन के पार उतर ही, खोल हँसा दिल पोरा- पोरा।
'हृदय तल के गहरे समंदर में तैरें, / ये ख्वाबों की मीने मचलती बड़ी हैं' , 'मैं लिखती नहीं गीत लिख जाता है' , 'दर्द का मोती सजाए / ह्रदय की सीपी लहे', 'क्षण-प्रतिक्षण नूतन परिवर्तन / विस्मय करते नित दृग लोचन', 'प्रीत चुनरिया सिर पर ओढ़ी / बीच रंग के कोरी थोड़ी', 'झंझा की तम लपटों से, लड़कर भी जीना सीखो / तीखा मीठा जो भी है, जीवन रस पीना सीखो', 'सन सनन सन वायु लहरे, घन घनन घन मेघ बरसे / मन मयूरा पंख खोले', मौसमों को देख हरसे', 'तकते - तकते नयना थकते, मन सागर बीहड़ मथते, प्राण डगर अमृत वर्षा के, धुंध भरी पीड़ा चखते' जैसी अभिव्यक्तियाँ आश्वस्त करती हैं कि कवयित्री सुनीता का गीतकार क्रमश: परिपक्व हो रहा है। गीत की कहन और ग़ज़ल की तर्ज़े-बयानी के अंतर को समझकर और अलग-अलग रखकर रचे ेगयी रचनाएँ अपेक्षाकृत अधिक प्रभावमय हैं।
इन गीतों में भक्ति काल और रीतिकाल को गलबहियां डाले देखना सुखद है। सरस्वती, शिव, राम, कृष्ण आदि पर केंद्रित रचनाओं के साथ 'प्रीत तेरी मान मेरा, रूह का परिधान है / हाथ तेरा हाथ में जब, हर सफर आसान है', 'देख छटा मौसम की मन का, मयूर - नर्तन करता है' जैसी अंतर्मुखी अभिव्यक्तियों के साथ बहिर्मुखता का गंगो-जमुनी सम्मिश्रण इन गीतों को पठनीय और श्रणीय बनाता है।
कर में लेकर, गीली माटी,
अगर कहो तो।
नव प्रयोग भी, करने होंगे
माटी की संरचनाओं में।
सांचे लेकर, कुम्हारों के
रंग भरेंगे घटनाओं में।
किरण-किरण को, भर कण-कण में
रौशन भी कर, दूं रज खाटी,
अगर कहो तो।
यह देखना रुचिकर होगा कि सुनीता की यह सृजन यात्रा भविष्य में किस दिशा में बढ़ती है? वे पारम्परिक गीत ही रचती हैं या नवगीत की और मुड़ती हैं। उनमें संवेदना, शब्द भंडार तथा अभिव्यक्ति सामर्थ्य की त्रिवेणी प्रवाहित हो रही है। इन रचनाओं में व्यंग्योक्ति और वक्रोक्ति की अनुपस्थिति है जो नवगीत हेतु आवश्यक है। सुनीता की भाषा प्रकृति से ही आलंकारिक है। उन्हें अलंकार ठूँसना नहीं पड़ते, स्वाभाविक रूप से अनुप्रास, रूपक, उपमा, उत्प्रेक्षा अपनी छटा बखेरते हैं। प्रसाद गुण सम्पन्न भाषा गीतों को माधुर्य देती है। युवा होते हुए भी अतिरेकी 'स्त्री विमर्श', राजनैतिक परिदृश्य और अनावश्यक विद्रोह से बच पाना उनके धीर-गंभीर व्यक्तित्व के अनुकूल होने के साथ उनकी गीति रचनाओं को संतुलित और सारगर्भित बनाता है। मुझे विश्वास है यह संकलन पाठकों और समलीचकों दोनों के द्वारा सराहा जायेगा।
२ . २ . २०२०
===
एक दोहा
गौ भाषा को दूहकर, दोहा कर पय-पान।
छंद राज बन सच कहे, समझ बनो गुणवान।।
२ . २ . २०१८
***
द्विपदि (शेर)
*
औरों की ताकिए न 'सलिल' आप घूम-घूम
बीबी, बहिन, दौलत कभी अपनी निहारिए
*
सिंदूर-तेल पोत देव हो गये पत्थर
धंधा ये ब्यूटीपार्लर का आज का नहीं
*
आखर ही आखिरी में रहा आदमी के साथ
बाकी कलम-दवात से रिश्ते फना हुए
*
जिसको न अपने आप पर विश्वास रह गया
वो आसरा तलाश खुद ही दास हो गया
*
हर हसीं हँसी न होगी दिलरुबा कभी
दिल पंजीरी नहीं जो हर को आप बाँट दें
*
औरों से पूछताछ की तूने बहुत 'सलिल'
खुद अपने आप से भी कभी बातचीत कर
***
रसानंद दे छंद नर्मदा १५ : हरिगीतिका हरिगीतिका X 4 = 11212 की चार बार आवृत्ति
दोहा, आल्हा, सार ताटंक,रूपमाला (मदन),चौपाई, छंदों से साक्षात के पश्चात् अब मिलिए हरिगीतिका से.
हरिगीतिका मात्रिक सम छंद हैं जिसके प्रत्येक चरण में २८ मात्राएँ होती हैं । यति १६ और १२ मात्राओं पर होती है। पंक्ति के अंत में लघु और गुरु का प्रयोग होता है। भिखारीदास ने छन्दार्णव में गीतिका नाम से 'चार सगुण धुज गीतिका' कहकर हरिगीतिका का वर्णन किया है। हरिगीतिका के पारम्परिक उदाहरणों के साथ कुछ अभिनव प्रयोग, मुक्तक, नवगीत, समस्यापूर्ति (शीर्षक पर रचना) आदि नीचे प्रस्तुत हैं।
छंद विधान:
०१. हरिगीतिका २८ मात्रा का ४ समपाद मात्रिक छंद है।
०२. हरिगीतिका में हर पद के अंत में लघु-गुरु ( छब्बीसवी लघु, सत्ताइसवी-अट्ठाइसवी गुरु ) अनिवार्य है।
०३. हरिगीतिका में १६-१२ या १४-१४ पर यति का प्रावधान है।
०४. सामान्यतः दो-दो पदों में समान तुक होती है किन्तु चारों पदों में समान तुक, प्रथम-तृतीय-चतुर्थ पद में समान तुक भी हरिगीतिका में देखी गयी है।
०५. काव्य प्रभाकरकार जगन्नाथ प्रसाद 'भानु' के अनुसार हर सतकल अर्थात चरण में (11212) पाँचवी, बारहवीं, उन्नीसवीं तथा छब्बीसवीं मात्रा लघु होना चाहिए। कविगण लघु को आगे-पीछे के अक्षर से मिलकर दीर्घ करने की तथा हर सातवीं मात्रा के पश्चात् चरण पूर्ण होने के स्थान पर पूर्व के चरण काअंतिम दीर्घ अक्षर अगले चरण के पहले अक्षर या अधिक अक्षरों से संयुक्त होकर शब्द में प्रयोग करने की छूट लेते रहे हैं किन्तु चतुर्थ चरण की पाँचवी मात्रा का लघु होना आवश्यक है।
मात्रा बाँट: I I S IS S SI S S S IS S I I IS या ।। ऽ। ऽ ऽ ऽ।ऽ।।ऽ। ऽ ऽ ऽ। ऽ
कहते हुए यों उत्तरा के नेत्र जल से भर गए ।
हिम के कणों से पूर्ण मानो हो गए पंकज नए ॥
उदाहरण :
०१. मम मातृभूमिः भारतं धनधान्यपूर्णं स्यात् सदा।
नग्नो न क्षुधितो कोऽपि स्यादिह वर्धतां सुख-सन्ततिः।
स्युर्ज्ञानिनो गुणशालिनो ह्युपकार-निरता मानवः,
अपकारकर्ता कोऽपि न स्याद् दुष्टवृत्तिर्दांवः ॥
०२. निज गिरा पावन करन कारन, राम जस तुलसी कह्यो. (रामचरित मानस)
(यति १६-१२ पर, ५वी मात्रा दीर्घ, १२ वी, १९ वी, २६ वी मात्राएँ लघु)
०३. दुन्दुभी जय धुनि वेद धुनि, नभ नगर कौतूहल भले. (रामचरित मानस)
(यति १४-१४ पर, ५वी मात्रा दीर्घ, १२ वी, १९ वी, २६ वी मात्राएँ लघु)
०४. अति किधौं सरित सुदेस मेरी, करी दिवि खेलति भली। (रामचंद्रिका)
(यति १६-१२ पर, ५वी-१९ वी मात्रा दीर्घ, १२ वी, २६ वी मात्राएँ लघु)
०५. जननिहि बहुरि मिलि चलीं उचित असीस सब काहू दई। (रामचरित मानस)
(यति १६-१२ पर, १२ वी, २६ वी मात्राएँ दीर्घ, ५ वी, १९ वी मात्राएँ लघु)
०६. करुना निधान सुजान सील सनेह जानत रावरो। (रामचरित मानस)
(यति १६-१२ पर, ५ वी, १२ वी, १९ वी, २६ वी मात्राएँ लघु)
०७. इहि के ह्रदय बस जानकी जानकी उर मम बास है। (रामचरित मानस)
(यति १६-१२ पर, ५ वी, १२ वी, २६ वी मात्राएँ लघु, १९ वी मात्रा दीर्घ)
०८. तब तासु छबि मद छक्यो अर्जुन हत्यो ऋषि जमदग्नि जू।(रामचरित मानस)
(यति १६-१२ पर, ५ वी, २६ वी मात्राएँ लघु, १२ वी, १९ वी मात्राएँ दीर्घ)
०९. तब तासु छबि मद छक्यो अर्जुन हत्यो ऋषि जमदग्नि जू।(रामचंद्रिका)
(यति १६-१२ पर, ५ वी, २६ वी मात्राएँ लघु, १२ वी, १९ वी मात्राएँ दीर्घ)
१०. जिसको न निज / गौरव तथा / निज देश का / अभिमान है।
वह नर नहीं / नर-पशु निरा / है और मृतक समान है। (मैथिलीशरण गुप्त )
(यति १६-१२ पर, ५ वी, १२ वी, १९ वी, २६ वी मात्राएँ लघु)
११. जब ज्ञान दें / गुरु तभी नर/ निज स्वार्थ से/ मुँह मोड़ता।
तब आत्म को / परमात्म से / आध्यात्म भी / है जोड़ता।।(संजीव 'सलिल')
अभिनव प्रयोग:
हरिगीतिका मुक्तक:
पथ कर वरण, धर कर चरण, थक मत चला, चल सफल हो.
श्रम-स्वेद अपना नित बहा कर, नव सृजन की फसल बो..
संचय न तेरा साध्य, कर संचय न मन की शांति खो-
निर्मल रहे चादर, मलिन हो तो 'सलिल' चुपचाप धो..
*
करता नहीं, यदि देश-भाषा-धर्म का, सम्मान तू.
धन-सम्पदा, पर कर रहा, नाहक अगर, अभिमान तू..
अभिशाप जीवन बने तेरा, खो रहा वरदान तू-
मन से असुर, है तू भले, ही जन्म से इंसान तू..
*
करनी रही, जैसी मिले, परिणाम वैसा ही सदा.
कर लोभ तूने ही बुलाई शीश अपने आपदा..
संयम-नियम, सुविचार से ही शांति मिलती है 'सलिल'-
निस्वार्थ करते प्रेम जो, पाते वही श्री-संपदा..
*
धन तो नहीं, आराध्य साधन मात्र है, सुख-शांति का.
अति भोग सत्ता लोभ से, हो नाश पथ तज भ्रान्ति का..
संयम-नियम, श्रम-त्याग वर, संतोष कर, चलते रहो-
तन तो नहीं, है परम सत्ता उपकरण, शुचि क्रांति का..
*
करवट बदल ऋतुराज जागा विहँस अगवानी करो.
मत वृक्ष काटो, खोद पर्वत, नहीं मनमानी करो..
ओजोन है क्षतिग्रस्त पौधे लगा हरियाली करो.
पर्यावरण दूषित सुधारो अब न नादानी करो..
*
उत्सव मनोहर द्वार पर हैं, प्यार से मनुहारिए.
पथ भोर-भूला गहे संध्या, विहँसकर अनुरागिए ..
सबसे गले मिल स्नेहमय, जग सुखद-सुगढ़ बनाइए.
नेकी विहँसकर कीजिए, फिर स्वर्ग भू पर लाइए..
*
हिल-मिल मनायें पर्व सारे, बाँटकर सुख-दुःख सभी.
जलसा लगे उतरे धरा पर, स्वर्ग लेकर सुर अभी.
सुर स्नेह के छेड़ें अनवरत, लय सधे सद्भाव की.
रच भावमय हरिगीतिका, कर बात नहीं अभाव की..
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त्यौहार पर दिल मिल खिलें तो, बज उठें शहनाइयाँ.
मड़ई मेले फेसटिवल या हाट की पहुनाइयाँ..
सरहज मिले, साली मिले या संग हों भौजाइयाँ.
संयम-नियम से हँसें-बोलें, हो नहीं रुस्वाइयाँ..
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कस ले कसौटी पर 'सलिल', खुद आप निज प्रतिमान को.
देखे परीक्षाकर, परखकर, गलतियाँ अनुमान को..
एक्जामिनेशन, टेस्टिंग या जाँच भी कर ले कभी.
कविता रहे कविता, यही है, इम्तिहां लेना अभी..
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अनुरोध विनती निवेदन है व्यर्थ मत टकराइए.
हर इल्तिजा इसरार सुनिए, अर्ज मत ठुकराइए..
कर वंदना या प्रार्थना हों अजित उत्तम युक्ति है.
रिक्वेस्ट है इतनी कि भारत-भक्ति में ही मुक्ति है..
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समस्यापूर्ति
बाँस (हरिगीतिका)
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रहते सदा झुककर जगत में सबल जन श्री राम से
भयभीत रहते दनुज सारे त्रस्त प्रभु के नाम से
कोदंड बनता बाँस प्रभु का तीर भी पैना बने
पतवार बन नौका लगाता पार जब अवसर पड़े
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बँधना सदा हँस प्रीत में, हँसना सदा तकलीफ में
रखना सदा पग सीध में, चलना सदा पग लीक में
प्रभु! बाँस सा मन हो हरा, हो तीर तो अरि हो डरा
नित रीत कर भी हो भरा, कस लें कसौटी हो खरा
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नवगीत:
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पहले गुना
तब ही चुना
जिसको ताजा
वह था घुना
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सपना वही
सबने बना
जिसके लिए
सिर था धुना
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अरि जो बना
जल वो भुना
वह था कहा
सच जो सुना
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(प्रयुक्त छंद: हरिगीतिका)
नवगीत:
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करना सदा
वह जो सही
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तक़दीर से मत हों गिले
तदबीर से जय हों किले
मरुभूमि से जल भी मिले
तन ही नहीं मन भी खिले
वरना सदा
वह जो सही
भरना सदा
वह जो सही
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गिरता रहा, उठता रहा
मिलता रहा, छिनता रहा
सुनता रहा, कहता रहा
तरता रहा, मरता रहा
लिखना सदा
वह जो सही
दिखना सदा
वह जो सही
*
हर शूल ले, हँस फूल दे
यदि भूल हो, मत तूल दे
नद-कूल को पग-धूल दे
कस चूल दे, मत मूल दे
सहना सदा
वह जो सही
तहना सदा
वह जो सही
*
(प्रयुक्त छंद: हरिगीतिका )
२ . २ . २०१६
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