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रविवार, 22 मार्च 2026

मार्च २२, लघुकथा, रैप सौंग, चित्र अलंकार, कुण्डलिया, हाइकु गीत, त्रिभंगी, दोहा, फाग, ग़ज़लिका

सलिल सृजन मार्च २२
छंद शाला
दोहा-रोला-कुंडलिया
मनभावन मङ्गलमयी, आई पावन ईद।
घृणा द्वेष अलगाव की, मिट्टी हुई पलीद।। -अशोक व्यग्र
मिट्टी हुई पलीद, बढ़ रहा भाईचारा।
हिंदू-मुस्लिम साथ, देश का दुश्मन हारा।।
गंगा-जमुना मिलीं, हँस रहे फागुन-सावन।
ईदी दो-लो 'सलिल', पर्व आया मनभावन।।
०००
जिस दिन हामिद ने लिया, चिमटा एक खरीद।
उस दिन से मनने लगी, फिर से सच्ची ईद।। -अशोक व्यग्र
फिर से सच्ची ईद, मनाए जन-गण मिलकर।
जुम्मन-अलगू संग, दुआ दे खाला हँसकर।।
जी-जाँ जैसे रहें, न पूरे इक दूजे बिन।
'सलिल' मनेगी ईद, दिवाली होली निश-दिन।।
०००
चुपके से आकर खड़ा, द्वार नवागत वर्ष।
आगत का स्वागत करें, भरे नयन में हर्ष।। -अशोक व्यग्र
भरे नयन में हर्ष, बढ़ें उत्कर्ष राह पर।
सब मिल करें विमर्श, सभी का श्रेष्ठ चाहकर।।
दान करें नित आप, किंतु चुप रह लुक-छिपके।
करिए नहीं प्रचार, ईश को भजिए चुपके।।
२२.३.२०२६
०००
लघुकथा
समझदार
*
नगर में कोरोना पोसिटिव केस... खबर सुनते ही जिज्ञासा, चिंता और कौतूहल होना स्वाभाविक है। कुछ देर बाद समाचार मिला रोगी बेटा और उससे संक्रमित माँ चिकित्सकों से विवाद कर रहे हैं। फिर खबर आई की दोनों चिकित्सालय की व्यवस्थाओं से अंतुष्ट हैं। शुभचिंतकों ने सरकारी व्यवस्थाओं को कोसने में पल भर देर न की। माँ-बेटे अपने शिक्षित होने और उच्च संपर्कों की धौंस दिखाकर अस्पताल से निकल कई लोगों से मिले और अपनी शेखी बघारते रहे।
इस बीच किसी ने चुपचाप बनाया हुई वीडियो पोस्ट कर दिया। हैरत कि अस्पताल पूरी तरह साफ़ था, पंखे-ट्यूबलाइट, पलंग, चादर, तकिये नर्स, डॉक्टर आदि सब एकदम दुरुस्त, दुर्व्यवहार करते माँ-बेटे को विनम्रता से समझाने के बाद अन्य मरीज को देखने में व्यस्त डॉक्टर की अनुपस्थिति का लाभ उठाकर निकलते माँ-बेटे।
अस्पताल प्रशासन ने पुलिस और कलेक्टर को सूचित किया। तुरंत गाड़ियां दौड़ीं, दोनों को पकड़ा गया और सख्त हिदायत देकर अस्पताल में भर्ती किया गया। तब भी दोनों सरकार को कोसते रहे किन्तु इस मध्य संक्रमित हो गए थे संपर्क में आये सैंकड़ों निर्दोष नागरिक जिन्हें खोजकर उनकी जाँच करना भूसे के ढेर में सुई खोजने की तरह है। पता चला माँ कॉलेज में प्रोफेसर और बेटा विदेश में सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। दोनों बार-बार दुहाई दे रहे हैं कि कि वे समझदार हैं, उन्हें छोड़ दिया जाए पर उनकी नासमझी देखकर प्रश्न उठता है की उन्हें कैसे कहाजाए समझदार?
***
विमर्श :
आज विशेष सावधानी बरतें
२४ घंटे घर में रहना है
'बीबी से सावधान'
मास्क नहीं हैलमेट धारण करें
बेलन, चिमटा, झाड़ू जैसे घातक अण्वास्त्रों को छिपा दें।
"बीबी कहे सो सत्य" के सनातन सिद्धांत का पालन करें।
चुपचाप सुनने और कुछ न कहने से कोरोना भी आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:
इस महामंत्र का चार बार पाठ कर गृहणी को प्रणाम कर सुरक्षित रहें।
जान है तो जहान है।
२४ घंटे बाद फिर अपना आसमान है, फिर भरना उड़ान है।
०००
कर्फ्यू वंदना
(रैप सौंग)
*
घर में घर कर
बाहर मत जा
बीबी जो दे
खुश होकर खा
ठेला-नुक्कड़
बिसरा भुख्खड़
बेमतलब की
बोल न बातें
हाँ में हाँ कर
पा सौगातें
ताँक-झाँक तज
भुला पड़ोसन
बीबी के संग
कर योगासन
चौबिस घंटे
तुझ पर भारी
काम न आए
प्यारे यारी
बन जा पप्पू
आज्ञाकारी
तभी बेअसर
हो बीमारी
बिसरा झप्पी
माँग न पप्पी
चूड़ी कंगन
करें न खनखन
कहे लिपिस्टिक
माँजो बर्तन
झाड़ू मारो
जरा ठीक से
पौंछा करना
बिना पीक के
कपड़े धोना
पर मत रोना
बाई न आई
तुम हो भाई
तुरुप के इक्के
बनकर छक्के
फल चाहे बिन
करो काम गिन
बीबी चालीसा
हँस पढ़ना
अपनी किस्मत
खुद ही गढ़ना
जब तक कहें न
किस मत करना
मिस को मिस कर
मन मत मरना
जान बचाना
जान बुलाना
मिल लड़ जाएँ
नैन झुकाना
कर फ्यू लेकिन
कई वार हैं
कर्फ्यू में
झुक रहो, सार है
बीबी बाबा बेबी की जय
बोल रहो घुस घर में निर्भय।।
***
विमर्श
ब्रह्मोस मिसाइल प्रक्षेपण गलती या ???
९ मार्च २०२२ को भारत की एक परीक्षण ब्रह्मोस मिसाइल (वारहेड के बिना) पाकिस्तान में १२४ कि.मी. अंदर मियां चन्नू में भारत की ब्रह्मोस मिसाइल गिरी। मिसाइल से पाकिस्तान में कोई जान माल का नुकसान नहीं हुआ।
-भारत की संसद में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि यह गलती से चल गयी जिसकी जाँच (कोर्ट ऑफ इन्क्वॉयरी) करवाई जा रही है ।
- सूत्रों के अनुसार असल मुद्दा कुछ और है। भारत जाँचना चाहता था कि पाकिस्तान की वायु रक्षा प्रणाली (एयर डिफेंस सिस्टम) कितना सतर्क और सुरक्षित है? पाकिस्तान के पास चीन से खरीदी गई HQ9 वायु सुरक्षा प्रणाली है। चीन का दावा है कि यह दुनिया की श्रेष्ठ वायु सुरक्षा प्रणाली है । भारतीय ब्रह्मोस मिसाइल को खोज या रोक न पाने से पाकिस्तान और चीन की कलई खुल गयी है।
-चीन अपने कई मित्र देशों को HQ9 वायु सुरक्षा प्रणाली बेचना चाहता है। अब कोई भी समझदार देश चीन की यह वायु सुरक्षा प्रणाली खरीदना नहीं चाहेगा। भारत ने सिर्फ एक प्रहार से दुनिया को बता दिया है कि चीन की वायु सुरक्षा प्रणाली किसी काम की नहीं है।
- पाकिस्तान अपने रक्षा तंत्र और सेना की बहुत डींग मारता है। भारत ने ब्रह्मोस मिसाइल १२४ किलोमीटर अंदर तक मिसाइलदाग कर सिद्ध कर दिया कि पाकिस्तान के पास प्रभावी वायु सुरक्षा प्रणाली नहीं है। बांगला देश युद्ध, करगिल युद्ध, सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट एयर स्ट्राइक के बाद भारत ने ब्रह्मोस के जरिए पाकिस्तान की सेना को फिर उसकी औकात बता दी है।
- इस कदम से चीन निर्मित वायु रक्षा प्रणाली की छवि ख़राब हुई है और उसके युद्धास्त्र उद्योग को भारी झटका लगा है। भारत की ब्रह्मोस मिसाइल की लक्ष्य भेदन क्षमता सामने आते ही, इसे खरीदने के लिए कई देश आगे आ रहे हैं। अब भारत के युद्धास्त्र उत्पादन उद्योग की उन्नति सुनिश्चित है।
-फिलीपींस, वियतमान, ताइवान आदि भारत से ब्रह्मोस मिसाइल खरीदना चाहते हैं। ये तीनों देश चीन के पड़ोसी हैं। भारत ब्रह्मोस के माध्यम से चीन के खिलाफ उसके पड़ोसियों को मजबूत कर चीन की घेराबंदी कर सकेगा।
***
चित्र अलंकार : पिरामिड
*
है
खरा
सलिल
नहीं खोटा
इसके बिना
बेमानी है लोटा
मिटाता है पिपासा
करे सृष्टि को संप्राण
अकाल से दिलाता त्राण
हाथों को मलता पछताता
अहसान फरामोश कृतघ्न
आदमी में नहीं है समझदारी
खोदता रहा है खुद ही निज कब्र
क्यों और कब तक करे प्रकृति सब्र
कहते हैं ''विनाश काले विपरीत बुद्धि''
*
वर्ण पिरामिड
*
री तू!
कल सी!
बीते पल सी।
मधुरिम यादें
सुधि कोमल सी।
साकी प्याला हाला
बिन मधुबाला मन की
गाती गीत मधुर कोयल सी।
रीत न कलकल करे हमेशा ही
तेरी यादों की कलसी, मानो तुलसी
२२.३.२०२०
***
इब्नबतूता
*
इब्नबतूता भूल के जूता
कोरोना से डर भागा
नहीं किसी को शकल दिखाता
घर के अंदर बंद हुआ है
राम राम करता दूरी से
ज्यों पिंजरे में कोई सुआ है
गले मत मिला, हाथ मत मिलो
कुरता सिलता बिन धागा
इब्नबतूता भूल के जूता
कोरोना से डर भागा
सगा न कोई रहा किसी का
हाय न कोई गैर है
सबको पड़े जान के लाले
नहीं किसी की खैर है
सोना चाहे; नींद न आए
आँख न खुलती पर जागा
इब्नबतूता भूल के जूता
कोरोना से डर भागा
***
गीत
क्या होएगा?
*
इब्नबतूता
पूछे: 'कूता?
क्या होएगा?'
.
काय को रोना?
मूँ ढँक सोना
खुली आँख भी
सपने बोना
आयसोलेशन
परखे पैशन
दुनिया कमरे का कोना
येन-केन जो
जोड़ धरा है
सब खोएगा
.
मेहनतकश जो
तन के पक्के
रहे इरादे
जिनके सच्चे
व्यर्थ न भटकें
घर के बाहर
जिनके मन निर्मल
ज्यों बच्चे
बाल नहीं
बाँका होएगा
.
भगता क्योंहै?
डरता क्यों है?
बिन मारे ही
मरता क्यों है?
पैनिक मत कर
हाथ साफ रख
हाथ साफ कर अब मत प्यारे!
वह पाएगा
जो बोएगा।
२१-३-२०२०
***
विश्व कविता दिवस २२ मार्च पर
एक रचना
*
विश्व में कविता समाहित
या कविता में विश्व?
देखें कंकर में शंकर
या शंकर में प्रलयंकर
नाद ताल ध्वनि लय रस मिश्रित
शक्ति-भक्ति अभ्यंकर
अक्षर क्षर का गान करे जब
हँसें उषा सँग सविता
तभी जन्म ले कविता
शब्द अशब्द निशब्द हुए जब
अलंकार साकार हुए सब
बिंब प्रतीक मिथक मिल नर्तित
अर्चित चर्चित कविता हो तब
सत्-शिव का प्रतिमान रचे जब
मन मंदिर की सुषमा
शिव-सुंदर हो कविता
मन ही मन में मन की कहती
पीर मौन रह मन में तहती
नेह नर्मदा कलकल-कलरव
छप्-छपाक् लहरित हो बहती
गिरि-शिखरों से कूद-फलाँगे
उद्धारे जग-पतिता
युग वंदित हो कविता
***
कार्यशाला
बनाइए सेनेटाइजर:
सामग्री - १ लीटर स्प्रिट ( कीमत ११० रुपए)
२०० मि.ली. ग्लिसरीन (६० रुपए)
एक ढक्कन डिटोल का
पसंदीदा इत्र
विधि - पहले स्प्रिट व ग्लिसरीन को मिलाइये।
फिर डिटोल और इत्र मिला दीजिए।
मात्र २०० रुपए में १२०० मि.ली. सेनिटाइजर तैयार है।
बाजार में १०० मि.ली. सेनिटाइजर १५० रुपए में बिक रहा है।
आप फिटकरी से भी सेनेटाइजर बना सकते हैं।
१ लीटर पानी मे १०० ग्राम फिटकरी, 1 ढक्कन डिटोल, गाढ़ा करने के लिए ग्लिसरीन या एलोवरा मिलाकर सेनिटाइजर बना लें।
२१-३-२०२०
***
कविता दिवस
कुण्डलिया
*
कविता कविता जप रहे, नासमिटी है कौन?
पूछ रहीं श्रीमती जी, हम भय से हैं मौन।
हम भय से हैं मौन, न ताली आप बजाएँ।
दुर्गा काली हुई, किस तरह जान बचाएँ।
हाथ जोड़, पड़ पैर, मनाते खुश हो सविता।
लाख कहे मिथलेश, ऩ लिखना हमको कविता।।
२२-३-२०१८
***
हाइकु गीत
*
लोकतंत्र में
मनमानी की छूट
सभी ने पाई।
*
सबको प्यारा
अपना दल-दल
कहते न्यारा।
बुरा शेष का
तुरत ख़तम हो
फिर पौबारा।
लाज लूटते
मिल जनगण की
कह भौजाई।
*
जिसने लूटा
वह कहता: 'तुम
सबने लूटा।
अवसर पा
लूटता देश, हर
नेता झूठा।
वादा करते
जुमला कहकर
जीभ चिढ़ाई।
*
खुद अपनी
मूरत बनवाते
शर्म बेच दी।
संसद ठप
भत्ते लें, लाज न
शेष है रही।
कर बढ़वा
मँहगाई सबने
खूब बढ़ाई।
***
***
द्विपदियाँ
सुबह उषा का पीछा करता, फिर संध्या से आँख मिला
रजनी के आँचल में छिपता, सूरज किससे करें गिला?
*
कांत सफलता पाते तब ही, रहे कांति जब साथ सदा
मिले श्रेय जब भी जीवन में, कांता की जयकार लिखें
​​***
दोहा सलिला
*
उसको ही रस-निधि मिले, जो होता रस-लीन।
पान न रस का अन्य को, करने दे रस-हीन।।
*
सलिल साधना स्नेह की, सच्ची पूजा जान।
प्रति पल कर निष्काम तू, जीवन हो रस-खान।।
*
शब्द-शब्द अनुभूतियाँ, अक्षर-अक्षर भाव।
नाद, थाप, सुर, ताल से, मिटते सकल अभाव।।
*
रास न रस बिन हो सखे!, दरस-परस दे नित्य।
तरस रहा मन कर सरस, नीरस रुचे न सत्य।।
*
सावन-फागुन कह रहे, लड़े न मन का मीत।
गले मिले, रच कुछ नया, बढ़े जगत में प्रीत।।
*
सावन-फागुन कह रहे, लड़े न मन का मीत।
गले मिले, रच कुछ नया, बढ़े जगत में प्रीत।।
***
त्रिभंगी छंद:
*
ऋतु फागुन आये, मस्ती लाये, हर मन भाये, यह मौसम।
अमुआ बौराये, महुआ भाये, टेसू गाये, को मो सम।।
होलिका जलायें, फागें गायें, विधि-हर शारद-रमा मगन-
बौरा सँग गौरा, भूँजें होरा, डमरू बाजे, डिम डिम डम।।
***
हाइकु गीत
*
आया वसंत,
इन्द्रधनुषी हुए
दिशा-दिगंत..
शोभा अनंत
हुए मोहित, सुर
मानव संत..
.
प्रीत के गीत
गुनगुनाती धूप
बनालो मीत.
जलाते दिए
एक-दूजे के लिए
कामिनी-कंत..
.
पीताभी पर्ण
संभावित जननी
जैसे विवर्ण..
हो हरियाली
मिलेगी खुशहाली
होगे श्रीमंत..
.
चूमता कली
मधुकर गुंजार
लजाती लली..
सूरज हुआ
उषा पर निसार
लाली अनंत..
.
प्रीत की रीत
जानकर न जाने
नीत-अनीत.
क्यों कन्यादान?
'सलिल' वरदान
दें एकदंत..
***
मुक्तक
'दिग्गी राजा' भटक रहा है, 'योगी' को सिंहासन अर्पण
बैठ न गद्दी बिठलाता है, 'शाह' निराला करे समर्पण
आ 'अखिलेश' बधाई दें, हँस कौतुक से देखा 'नरेंद्र' ने
साइकिल-पंजा-हाथी का मिल जनगण ने कर डाला तर्पण
***
कुंडलिया
*
रूठी राधा से कहें, इठलाकर घनश्याम
मैंने अपना दिल किया, गोपी तेरे नाम
गोपी तेरे नाम, राधिका बोली जा-जा
काला दिल ले श्याम, निकट मेरे मत आ, जा
झूठा है तू ग्वाल, प्रीत भी तेरी झूठी
ठेंगा दिखा हँसें मन ही मन, राधा रूठी
*
कुंडलिया
कुंडल पहना कान में, कुंडलिनी ने आज
कान न देती, कान पर कुण्डलिनी लट साज
कुण्डलिनी लट साज, राज करती कुंडल पर
मौन कमंडल बैठ, भेजता हाथी को घर
पंजा-साइकिल सर धुनते, गिरते जा दलदल
खिला कमल हँस पड़ा, फन लो तीनों कुंडल
***
ग़ज़लिका
*
खर्चे अधिक आय है कम.
दिल रोता आँखें हैं नम..
*
पाला शौक तमाखू का.
बना मौत का फंदा यम्..
*
जो करता जग उजियारा
उस दीपक के नीचे तम..
*
सीमाओं की फ़िक्र नहीं.
ठोंक रहे संसद में ख़म..
*
जब पाया तो खुश न हुए.
खोया तो करते क्यों गम?
*
टन-टन रुचे न मन्दिर की.
रुचती कोठे की छम-छम..
*
वीर भोग्या वसुंधरा
'सलिल' रखो हाथों में दम..
२२-३-२०१७
***
फाग
.
राधे! आओ, कान्हा टेरें
लगा रहे पग-फेरे,
राधे! आओ कान्हा टेरें
.
मंद-मंद मुस्कायें सखियाँ
मंद-मंद मुस्कायें
मंद-मंद मुस्कायें,
राधे बाँकें नैन तरेरें
.
गूझा खांय, दिखायें ठेंगा,
गूझा खांय दिखायें
गूझा खांय दिखायें,
सब मिल रास रचायें घेरें
.
विजया घोल पिलायें छिप-छिप
विजया घोल पिलायें
विजया घोल पिलायें,
छिप-छिप खिला भंग के पेड़े
.
मलें अबीर कन्हैया चाहें
मलें अबीर कन्हैया
मलें अबीर कन्हैया चाहें
राधे रंग बिखेरें
ऊँच-नीच गए भूल सबै जन
ऊँच-नीच गए भूल
ऊँच-नीच गए भूल
गले मिल नचें जमुन माँ तीरे
***
होली की कुण्डलियाँ:
मनायें जमकर होली
*
होली अनहोली न हो, रखिए इसका ध्यान.
बने केजरीवाल जो खाए भंग का पान..
खायें भंग का पान, मान का पान न छोड़ें.
छान पियें ठंडाई, पी गिलास भी तोड़ें..
कहे 'सलिल' कविराय, टेंट में खोंसे गोली.
मम्मी से मिल गले मनाये पप्पू होली..
*
होली ने खोली सभी, नेताओं की पोल.
जिसका जैसा ढोल है, वैसी उसकी पोल..
वैसी उसकी पोल, तोल ममता बातें.
माया भीतर ही भीतर करटी हैं घातें..
भेंट मुलायम-लालू करते हँसी-ठिठोली .
नीतिश गोबर लिए मनाते जमकर होली..
*
होली में फीका पड़ा, सेवा का हर रंग.
माया को भायी सदा, सत्ता खातिर जंग..
सत्ता खातिर जंग, सोनिया को भी भाया.
जया, उमा, ममता, सुषमा का भारी पाया..
मर्दों पर भारी है, महिलाओं की टोली.
पुरुष सम्हालें चूल्हा-चक्की अबकी होली..
२२-३-२०१६
***
सामयिक फाग:
दिल्ली के रंग
*
दिल्ली के रंग रँगो गुइयाँ।
जुलुस मिलें दिन-रैन, लगें नारे कई बार सुनो गुइयाँ।।
जे एन यू में बसो कनैया, उगले ज़हर बचो गुइयाँ।
संसद में कालिया कई, चक्कर में नाँय फँसो गुइयाँ।।
मम्मी-पप्पू की बलिहारी, माथा ठोंक हँसो गुइयाँ।।
छप्पन इंची छाती पंचर, सूजा लाओ सियों गुइयाँ।।
पैले आप-आप कर रए ते, छूटी ट्रेन न रो गुइयाँ।।
नेताजी खों दाँव चूक रओ, माया माँय धँसो गुइयाँ।।
थाना फुँका बता रईं ममता, अपराधी छूटो गुइयाँ।।
सुसमा-ईरानी जब बोलें, चुप्पै-चाप भगो गुइयाँ।।
२२-३-२०१६
***
दोहा सलिला:
दोहा पिचकारी लिये
*
दोहा पिचकारी लिये,फेंक रहा है रंग.
बरजोरी कुंडलि करे, रोला कहे अभंग..
*
नैन मटक्का कर रहा, हाइकु होरी संग.
फागें ढोलक पीटती, झांझ-मंजीरा तंग..
*
नैन झुके, धड़कन बढ़ी, हुआ रंग बदरंग.
पनघट के गालों चढ़ा, खलिहानों का रंग..
*
चौपालों पर बह रही, प्रीत-प्यार की गंग.
सद्भावों की नर्मदा, बजा रही है चंग..
*
गले ईद से मिल रही, होली-पुलकित अंग.
क्रिसमस-दीवाली हुलस, नर्तित हैं निस्संग..
*
गुझिया मुँह मीठा करे, खाता जाये मलंग.
दाँत न खट्टे कर- कहे, दहीबड़े से भंग..
*
मटक-मटक मटका हुआ, जीवित हास्य प्रसंग.
मुग्ध, सुराही को तके, तन-मन हुए तुरंग..
*
बेलन से बोला पटा, लग रोटी के अंग.
आज लाज तज एक हैं, दोनों नंग-अनंग..
*
फुँकनी को छेड़े तवा, 'तू लग रही सुरंग'.
फुँकनी बोली: 'हाय रे! करिया लगे भुजंग'..
*
मादल-टिमकी में छिड़ी, महुआ पीने जंग.
'और-और' दोनों करें, एक-दूजे से मंग..
*
हाला-प्याला यों लगे, ज्यों तलवार-निहंग.
भावों के आवेश में, उड़ते गगन विहंग..
*
खटिया से नैना मिला, भरता माँग पलंग.
उसने बरजा तो कहे:, 'यही प्रीत का ढंग'..
*
भंग भवानी की कृपा, मच्छर हुआ मतंग.
पैर न धरती पर पड़ें, बेपर उड़े पतंग..
*
रंग पर चढ़ा अबीर या, है अबीर पर रंग.
बूझ न कोई पा रहा, सारी दुनिया दंग..
२२.३.२०१३
***
दोहा सलिला
शब्द-शब्द अनुभूतियाँ, अक्षर-अक्षर भाव.
नाद, थाप, सुर, ताल से, मिटते सकल अभाव..
*
सलिल साधना स्नेह की, सच्ची पूजा जान.
प्रति पल कर निष्काम तू, जीवन हो रस-खान..
*
उसको ही रस-निधि मिले, जो होता रस-लीन.
पान न रस का अन्य को, करने दे रस-हीन..
२२.३.२०१०

बुधवार, 11 मार्च 2026

मार्च ११, रामकिंकर, श्रद्धा, गीत, दोहा, त्रिभंगी, छंद, बुंदेली, सरस्वती, सॉनेट, सुजाता, वर्ण पिरामिड, लघुकथा, हाइकु, साई

 सलिल सृजन मार्च ११

*
छंदशाला दोहा-रोला-कुंडलिया ० केशराशि हो भूमि तक, मुख पर अप्रतिम तेज। नयन काम के बाण हों, मधुरस अधर सहेज।। -अशोक व्यग्र मधुरस अधर सहेज, दहेज मिला मन को मन। रखना सदा सहेज, कभी मन रहे न उन्मन।। मुश्किल किंचित नहीं, हे प्रभु! आए दरपेश।। तन्मय हो हों संग, कुछ अंतर रहे न लेश।। ०००
साई! भव सागर से तार
0
तुझ सम नहीं जगत में दूजा
मन भरमाया तुझे न पूजा
कंकर कंकर में शंकर है
मुझे सहारा तेरा सूझा
तेरी कृपा अपार
साई! भव सागर से तार
.
दीनबंधु हे अंतर्यामी
मैं सेवक तुम मेरे स्वामी
चरण शरण आ क्षण में तरते
भक्त तुम्हारे निज सुखगामी
करिए दया निहार
साई! भव सागर से तार
.
गहिए हाथ सहारा देकर
स्वामी! निज छाया में लेकर
पग-पग पर ठोकर खा हारा
पार करो भव नैया खेकर
बिगड़ी बना सँवार
साई! भव सागर से तार
.
कार्यशाला
दोहा-रोला-कुंडलिया ० नयन रत्न धन प्राप्त कर, नयन हो गये धन्य। धन्यवाद कहते नहीं, सुने न कोई अन्य।। -अशोक व्यग्र सुने न कोई अन्य, नहीं फैलाए र् यूमर। फैले नहीं प्रवाद, नहीं हो चर्चा-ह्यूमर।। नयन सिया अरु राम, करें मर्यादा मंचन। नयन राधिका-श्याम, रास रच करते मंथन।। ११.३.२६
000
गीत
जो मेरा सो तेरा साधो! जो मेरा सो तेरा रे!
आए आज चले जाना कल, किसका सदा बसेरा रे!
.
काया छाया माया ने भरमाया सारी दुनिया को
सबने सबसे लिया, दिया हँस वह ही समझ दुनिया को।
सबका सबको गर न मिले तो आपस में होती तकरार-
अपना जो आखिर में वह भी दे जाना है दुनिया को।
चार दिनों के लिए ठिकाण फिर उठना है डेरा रे!
जो मेरा सो तेरा साधो! जो मेरा सो तेरा रे!
.
तेरा तुझको अर्पण कर दूँ, मैंने कुछ भी नहीं तहा
आया खाली हाथ, न हाथों में कुछ अपने कभी रहा।
गड्ढा जल रोके रखता जो वह जाता है जल्दी सूख
वही नदी जिंदा रह पुजती जिसमें हर पल सलिल बहा।
भोर रात काली दे, देती काली रात सवेरा रे!
जो मेरा सो तेरा साधो! जो मेरा सो तेरा रे!
.
लिए अंजली में सुर सातों, प्रीति किरण प्रभु को अर्पित
करे साधना सरला चित नित, मुकल मना कर यश अर्जित
शारद-इला-उमा बिन विधि-हरि-हर को जग में पूछे कौन-
ऋद्धि-सिद्धि सह ही विघ्नेश्वर होते सकल सृष्टि पूजित।
आता-जाता, जाता-आता हर जन हो पग फेरा रे!
११.३.२०२५
000
स्मरण युग तुलसी
मुक्तक
भज मन राम सिया निश-दिन हो भवसागर से पार।
बन जा किंकर हनुमत का तब ही होगा उद्धार।।
रिश्ते-नाते मोह न माया हो सकते निष्काम-
करना है तो कर गुरुवर के श्री चरणों से प्यार।।
श्री रामकिंकर को सुमिर हनुमत कृपा हो जाएगी।
हनुमत कृपा ही जानकी- रघुवर कृपा दिलवाएगी।।
भव ताप सारे पाप क्षण में आप ही जल जाएँगे।
सब जीव हो संजीव भव से आप ही तर जाएँगे।।
दोहा सलिला
सूर्य बिंदु संघर्ष का, बढ़े हताशा-व्यास।
कम न पड़े संभावना-परिधि बँधाए आस।।
द्वेष-ईर्ष्या मुक्त मति, ले अंतर्मन जीत।
सूर्य सांख्य योगी तपे, सबसे कर सम प्रीत।।
सूर्य बिंदु रेखा किरण, आभा वर्तुल वृत्त।
ठोस वायु द्रव पिंड है, गोल न अस्थिर चित्त।।
काया की छाया नहीं, माया सके न व्याप।
सूर्य तूर्य दस दिशा में, व्याप रहा चुपचाप।।
११.३.२०२४
•••
गीत
श्रद्धा के टुकड़े-टुकड़े कर
ठठा रहे लिव इन की जय जय।
धन्य-धन्य नारी विमर्श यह
रहे निर्भया जहाँ न निर्भय।।
पोथी पढ़, बढ़-चढ़ बातें कर
कमा रुपैया मनमानी कर।
तज संयम की लछमन रेखा
सिर्फ देह को रजधानी कर।
कन्यादान न करने देना
बाबुल को ठेंगा दिखला दो-
वरो शाप वरदान समझकर
ढक्कन धरो समझदानी पर।
बनना बोल्ड, बोल्ड हो चाहे
मर्यादा कुचलो हो निर्दय
ठठा रहे लिव इन की जय जय।
परंपरा पिछड़ापन बोलो
निष्ठा को सिक्कों से तोलो।
आजादी को उच्छृंखलता
मानो अमृत में विष घोलो।
देह दान को युवा क्रांति कह
गैरों की बाँहों में झूलो।
ढाँको कम तन अधिक दिखा
हो प्रगतिशील मन ही मन फूलो।
बिन ब्याहे पर्यंकशायिनी
हो सतीत्व का कर डालो क्षय
ठठा रहे लिव इन की जय जय।
अवसरवादी की लफ्फाजी
सुनो मान लो वादा सच्चा।
मात-पिता रोकें, कह दुश्मन
भागो घर से देकर गच्चा।
हवस कुंड को खुद दहकाओ
साथी अदल-बदल मुस्काओ।
अपनी गलती कभी न मानो-
दुनिया को दोषी बतलाओ।
बिना नींव की बने इमारत
जो उसका गिरना ही है तय।
ठठा रहे लिव इन की जय जय
११.३.२०२३
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सॉनेट
बुंदेली शारद वंदना
बन्दौं सारद मैहरवारी!
किरपा कर मों पै महतारी!
मैंने सबरी बात बिगारी।।
मैया! काय नें तुरत सँवारी।।
थक आओ मैं सरन तिहारी।
पाछूँ पर गए जे संसारी।
कैत बनो रय तैं पंसारी।।
मोखों भा रय प्रभु त्रिपुरारी।।
राजहंस की किए सवारी।
बिनती सुन माँ!, मत ठुकरा री!
मोरी पीरा मत बिसरा री!
जबसें मोहक छबि निहारी।
कर जोरे मैं बनो भिखारी।
भव से तारो बीनाबारी!
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सॉनेट
चिंता-चिंतन
चिंतन कर ले, चिंता तज दे
चिंता तुझको सतत जलाती
जीते जी मरघट पहुँचाती
चिंतन अमृत घट हरि भज ले
अधरों पर मुस्कान सजा ले
गा ले गीत, मीत! निज स्वर में
रह पगले! खुशियों के घर में
होनी होती देख मजा ले
छोड़ बड़प्पन, बच्चा बन जा
सपने देख न कर कंजूसी
कुछ झूठा कुछ सच्चा बन जा
धरती बिछा, ओढ़ नीला नभ
ओढ़ दिशाएँ सुन कर कलरव
उड़े पखेरू पल में संभव
११-३-२०२३
•••
सुजाता
सुजाता कठोर तप कार चुके मरणासन्न बुद्ध को खीर खिलाकर नया जीवन और जीवन के प्रति संतुलित दृष्टि पाने में सहायक हुई थी। वह बोधगया के पास सेनानी ग्राम के एक धनी व्यक्ति अनाथपिण्डिका की अहंकारी, वाचाल और उद्दंड पुत्रवधू थी। उसने मनौती माँगी थी कि पुत्रवती होने पर वह वह वृक्ष-देव को पायस (खीर) का भीग लगाएगी। उसने अपनी दासी पूर्णा को वृक्ष और उसके आसपास सफाई के लिए भेजा ताकि वृक्ष को खीर अर्पित कर मनौती पूर्ण कर सके। पूर्णा ने वृक्ष नीचे बैठे कृशकाय बुद्ध को देखा और उन्हें वृक्ष का देवता समझ बैठी। वह भागती हुई अपनी स्वामिनी को बुला लाई। सुजाता ने तत्काल वहाँ पहुँचकर सोने की कटोरी में बुद्ध को खीर और शहद अर्पण करते हुए कहा- ‘जैसे मेरी पूरी हुई, आपकी भी मनोकामना पूरी हो।'
उसी दिन कृशकाय बुद्ध को बोध हुआ 'तत्तु समन्वयात्' अर्थात जीवन के विविध तत्वों में समन्वय रखना ही श्रेष्ठ है। अति किसी भी वस्तु की ठीक नहीं - न भोग की, न योग की। यह बोध होने पर मरणासन्न बुद्ध ने नदी में स्नान कर सुजाता द्वारा दी गई खीर खाई। अगले दिन आभार प्रकट करने बुद्ध सुजाता के घर गए। वहाँ घर में लड़ाई-झगड़े का शोर था। पूछने पर अनाथपिण्डिका ने बताया कि उनकी बहू सुजाता अत्यंत अभिमानी और झगड़ालू स्त्री है जो घर में सास-ससुर-पति किसी की एक नहीं सुनती।
बुद्ध ने सुजाता को बुलाकर उसे सात प्रकार की पत्नियों के किस्से बताकर उसकी भूल का बोध कराया और सफल गृहस्थ जीवन के कई सूत्र दिए। सुजाता ने सबसे क्षमा माँगी और उसी दिन से सास-ससुर के साथ पुत्री और पति के साथ मित्र रूप से रहने की सौगंध खाई।
अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में सुजाता बुद्ध के प्रभामंडल से प्रभावित होकर साकेत के पास एक मठ में बौद्ध भिक्षुणी बनी थी और बुद्ध की उपस्थिति में ही वैशाली के पास स्थित किसी आश्रम में उसने अंतिम सांस ली थी। बौद्ध ग्रंथ 'थेरीगाथा' में दूसरी कई प्रख्यात बौद्ध-भिक्षुणियों के साथ भिक्षुणी सुजाता की भी एक पाली कविता संकलित है, जिसका ध्रुव गुप्ताद्वारा अंग्रेजी से किया भावानुवाद प्रस्तुत है-
गीत
कहे सुजाता
पवन सुगंधित सुंदर झीने मंहगे परदे
गहने पहने बेशकीमती सुमन हार भी।
भोग रही सुख दास-दसियों से सेवा ले,
दुर्लभ खाद्य-पेय,
जीवन की सुख-सुविधाएँ,
देखे सब ऐश्वर्य और
क्रीड़ाएँ मैंने।
जिस दिन देखा दिव्य
प्रकाश बुद्ध का अनुपम
जा समीप चरणों में
झुक मैं हुई समर्पित।
परिवर्तित हो गया
पलों में मेरा जीवन।
उपदेशों से जाना मैंने
धर्म-मर्म क्या?
बिना वासना के रहना
कैसा होता है?
इच्छाओं से परे रहो तो
कैसा-क्या सुख?
जान लिया मैंने सचमुच
अमरत्व-सत्य को।
और उसी दिन पाया
मैंने ऐसा जीवन
जो है दुःख के परे
न जिसमें होता है घर।
•••
सॉनेट
चाह
अंतर्मन में ज्योति जला प्रभु!
कलुष न किंचित कहीं शेष हो।
तिमिर न बाकी कहीं लेश हो।।
अंधकार में राह दिखा विभु!
काट सकें कर्मों की कारा।
राग-द्वेष से मुक्त हो सकें।
प्रभु! तुमसे संयुक्त हो सकें।।
जग जग को बाँटें उजियारा।।
कोई न हमको लगे पराया।
सबमें देखें खुद की छाया।
व्याप न पाए मिथ्या माया।।
अहंकार दे विहँस मिटा प्रभु!
काम-क्रोध, मद-लोभ हटा विभु!
नामामृत की चाट चटा प्रभु!
११-३-२०२२
•••
गीत
*
समय न उगता खेत में
समय न बिके बजार
कद्र न जिनको समय की
वही हुए लाचार
नाथ समय के नमन लें
दें मुझको वरदान
असमय करूँ न काम मैं
बनूँ नहीं अनजान
खाली हाथ न फिरे जो
याचक आए द्वार
सीमित घड़ियाँ करी हैं
हर प्राणी के नाम
उसने जो सकता बना
सबके बिगड़े काम
सौ सुनार पर रहा है
भारी एक लुहार
श्वास खेत में बोइए
कर्म फसल बिन देर
ईश्वर के दरबार में
हो न कभी अंधेर
सौदा करिए नगद पर
रखिए नहीं उधार
११-३-२०२०
***
वर्ण पिरामिड
१.
'रे
नर!'
वानर
बोल पड़ा :
अभिनंदन
कर, मैं हूँ तेरा
पुरखा सचमुच।'
*
२.
है
छाया
काया से
ज्यादा लंबी,
मत समझो
महत्वपूर्ण है
केवल लंबाई ही।
११-३-२०१९
***
दोहा दुनिया
*
मन की मन में क्यों रहे, कर मनमानी खूब।
मन उन्मन क्यों हो रहा? बेमन पूछ, न ऊब।।
*
भाई-भतीजावाद के, हारे ठेकेदार
चचा-भतीजे ने किया, घर का बंटाढार
*
दुर्योधन-धृतराष्ट्र का, हुआ नया अवतार
नाव डुबाकर रो रहे, तोड़-फेंक पतवार
*
माया महाठगिनी पर, ठगी गयी इस बार
जातिवाद के दनुज सँग, मिली पटकनी यार
*
लग्न-परिश्रम की विजय, स्वार्थ-मोह की हार
अवसरवादी सियासत, डूब मरे मक्कार
*
बादल गरजे पर नहीं, बरस सके धिक्कार
जो बोया काटा वही, कौन बचावनहार?
*
नर-नरेंद्र मिल हो सके, जन से एकाकार
सर-आँखों बैठा किया, जन-जन ने सत्कार
*
जन-गण को समझें नहीं, नेतागण लाचार
सौ सुनार पर पड़ गया,भारी एक लुहार
*
गलती से सीखें सबक, बाँटें-पाएँ प्यार
देश-दीन का द्वेष तज, करें तनिक उपकार
*
दल का दलदल भुलाकर, असरदार सरदार
जनसेवा का लक्ष्य ले, बढ़े बना सरकार
***
लघुकथा
कन्हैया
*
नामकरण संस्कार को इतना महत्त्व क्यों दिया जाता है? यह तो व्यक्ति के जीवन का एक पल मात्र है, उसे किस नाम से पुकारा जाता है इससे औरों को क्या फर्क पड़ता है? मित्र ने पूछा।
नामकरण किसी को पुकारना मात्र नहीं है। नाम रखना, नाम धरना, नाम थुकाना, नाम करना और नाम होना सबका अलग-अलग बहुत महत्त्व है। किसी जातक के संभावित गुणों का पूर्वानुमान कर तदनुसार पुकारना नामकरण करना है- जनक वह जो पिता की तरह प्रजा का पालन करे, शंकर वह जो शंका का अरि हो अर्थात शंका का अंत कर विश्वास का सृजन करे, श्याम अँधेरे का अंत कर सके, भारत जो प्रकाश फ़ैलाने में रत हो। नाम देते समय औचित्य का विचार अपरिहार्य है। किसी का नाम रखना या नाम धरना एक मुहावरा है जिसका अर्थ किसी त्रुटी के लिए दोषी ठहराना है। 'नाम थुकाना' अर्थात बदनामी कराना। नाम करना या नामवर होना का आशय यश पाना है। नाम होना का मतलब कीर्ति फैलाना है।
जन मानस गुण-धर्म को स्मरण रखता है। भाई से द्रोह करने वाले विभीषण, सबको रुलानेवाले रावण, शासक की पीठ में छुरा भोंकनेवाले मीरजाफर, स्वामिनी को गलत सलाह देनेवाली मंथरा, शिशु वध का प्रयास करनेवाली पूतना, अत्याचारी कंस, अहंकारी दुर्योधन आदि के नाम आज तक कोई अपनी सन्तान क्या पशुओं तक को नहीं देता।
तब तो भविष्य में 'कन्हैया' नाम भी इसी श्रेणी में सम्मिलित हो जाएगा, मित्र ने कहा।
***
***
रसानंद दे छंद नर्मदा २० :
दोहा, सोरठा, रोला, आल्हा, सार, ताटंक, रूपमाला (मदन), चौपाई, हरिगीतिका, उल्लाला,गीतिका,घनाक्षरी तथा बरवैछंदों से साक्षात के पश्चात् अब मिलिए त्रिभंगी से।
छंद सलिला : छंद त्रिभंगी
तीन बार हो भंग त्रिभंगी, तीन भंगिमा दर्शाये
*
त्रिभंगी ३२ मात्राओं का छंद है जिसके हर पद की गति तीन बार भंग होकर चार चरणों (भागों) में विभाजित हो जाती है। प्राकृत पैन्गलम के अनुसार:
पढमं दह रहणं, अट्ठ विरहणं, पुणु वसु रहणं, रस रहणं।
अन्ते गुरु सोहइ, महिअल मोहइ, सिद्ध सराहइ, वर तरुणं।
जइ पलइ पओहर, किमइ मणोहर, हरइ कलेवर, तासु कई।
तिब्भन्गी छंदं, सुक्खाणंदं, भणइ फणिन्दो, विमल मई।
(संकेत: अष्ट वसु = ८, रस = ६)
संकेत : प्रथम यति १० मात्रा पर, दूसरी ८ मात्रा पर, तीसरी ८ मात्रा पर तथा चौथी ६ मात्रा पर हो। हर पदांत में गुरु हो तथा जगण (ISI लघु गुरु लघु ) कहीं न हो।
केशवदास की छंद माला में वर्णित लक्षण:
विरमहु दस पर, आठ पर, वसु पर, पुनि रस रेख।
करहु त्रिभंगी छंद कहँ, जगन हीन इहि वेष।।
(संकेत: अष्ट वसु = ८, रस = ६)
भानुकवि के छंद-प्रभाकर के अनुसार:
दस बसु बसु संगी, जन रसरंगी, छंद त्रिभंगी, गंत भलो।
सब संत सुजाना, जाहि बखाना, सोइ पुराना, पन्थ चलो।
मोहन बनवारी, गिरवरधारी, कुञ्जबिहारी, पग परिये।
सब घट घट वासी मंगल रासी, रासविलासी उर धरिये।
(संकेत: बसु = ८, जन = जगण नहीं, गंत = गुरु से अंत)
सुर काज सँवारन, अधम उघारन, दैत्य विदारन, टेक धरे।
प्रगटे गोकुल में, हरि छिन छिन में, नन्द हिये में, मोद भरे।
त्रिभंगी का मात्रिक सूत्र निम्नलिखित है
"बत्तिस कल संगी, बने त्रिभंगी, दश-अष्ट अष्ट षट गा-अन्ता"
लय सूत्र: धिन ताक धिना धिन, ताक धिना धिन, ताक धिना धिन, ताक धिना।
नाचत जसुदा को, लखिमनि छाको, तजत न ताको, एक छिना।
उक्त में आभ्यंतर यतियों पर अन्त्यानुप्रास इंगित नहीं है किन्तु जैन कवि राजमल्ल ने ८ चौकल, अंत गुरु, १०-८-८-६ पर विरति, चरण में ३ यमक (तुक) तथा जगण निषेध इंगित कर पूर्ण परिभाषा दी है।
गुजराती छंद शास्त्री दलपत शास्त्री कृत दलपत पिंगल में १०-८-८-६ पर यति, अंत में गुरु, तथा यति पर तुक (जति पर अनुप्रासा, धरिए खासा) का निर्देश दिया है।
सारतः: त्रिभंगी छंद के लक्षण निम्न हैं:
१. त्रिभंगी ३२ मात्राओं का (मात्रिक) छंद है।
२. त्रिभंगी समपाद छंद है।
३. त्रिभंगी के हर चरणान्त (चौथे चरण के अंत) में गुरु आवश्यक है। इसे २ लघु से बदलना नहीं चाहिए।
४. त्रिभंगी के प्रत्येक चरण में १०-८-६-६ पर यति (विराम) आवश्यक है। मात्रा बाँट ८ चौकल अर्थात ८ बार चार-चार मात्रा के शब्द प्रावधानित हैं जिन्हें २+४+४, ४+४, ४+४, ४+२ के अनुसार विभाजित किया जाता है। इस तरह २ + (७x ४) + २ = ३२ मात्राएँ हर एक पंक्ति में होती है।
५. त्रिभंगी के चौकल ७ मानें या ८ जगण का प्रयोग सभी में वर्जित है।
६. त्रिभंगी के हर पद में पहले दो चरणों के अंत में समान तुक हो किन्तु यह बंधन विविध पदों पर नहीं है।
७. त्रिभंगी के तीसरे चरण के अंत में लघु या गुरु कोई भी मात्रा हो सकती है किन्तु कुशल कवियों ने सभी पदों के तीसरे चरण की मात्रा एक सी रखी है।
८. त्रिभंगी के किसी भी मात्रिक गण में विषमकला नहीं है। सम कला के मात्रिक गण होने से मात्रिक मैत्री का नियम पालनीय है।
९. त्रिभंगी के प्रथम दो पदों के चौथे चरणों के अंत में समान तुक हो। इसी तरह अंतिम दो पदों के चौथे चरणों के अंत में समान तुक हो। चारों पदों के अंत में समान तुक होने या न होने का उल्लेख कहीं नहीं मिला।
उदाहरण:
१. महाकवि तुलसीदास रचित निम्न पंक्तियों में तीसरे चरण की ८ मात्राएँ अगले शब्द के प्रथम अक्षर पर पूर्ण होती हैं, यह आदर्श स्थिति नहीं है, किन्तु मान्य है।
धीरज मन कीन्हा, प्रभु मन चीन्हा, रघुपति कृपा भगति पाई।
पदकमल परागा, रस अनुरागा, मम मन मधुप करै पाना।
सोई पद पंकज, जेहि पूजत अज, मम सिर धरेउ कृपाल हरी।
जो अति मन भावा, सो बरु पावा, गै पतिलोक अनन्द भरी।
२. तुलसी की ही निम्न पंक्तियों में हर पद का हर चरण आपने में पूर्ण है।
परसत पद पावन, सोक नसावन, प्रगट भई तप, पुंज सही।
देखत रघुनायक, जन सुख दायक, सनमुख हुइ कर, जोरि रही।
अति प्रेम अधीरा, पुलक सरीरा, मुख नहिं आवै, वचन कही।
अतिशय बड़भागी, चरनन लागी, जुगल नयन जल, धार बही।
यहाँ पहले २ पदों में तीसरे चरण के अंत में 'प' तथा 'र' लघु (समान) हैं किन्तु अंतिम २ पदों में तीसरे चरण के अंत में क्रमशः 'वै' गुरु तथा 'ल' लघु हैं।
३.महाकवि केशवदास की राम चन्द्रिका से एक त्रिभंगी छंद का आनंद लें:
सम सब घर सोभैं, मुनिमन लोभैं, रिपुगण छोभैं, देखि सबै।
बहु दुंदुभि बाजैं, जनु घन गाजैं, दिग्गज लाजैं, सुनत जबैं।
जहँ तहँ श्रुति पढ़हीं, बिघन न बढ़हीं, जै जस मढ़हीं, सकल दिसा।
सबही सब विधि छम, बसत यथाक्रम, देव पुरी सम, दिवस निसा।
यहाँ पहले २ पदों में तीसरे चरण के अंत में 'भैं' तथा 'जैं' गुरु (समान) हैं किन्तु अंतिम २ पदों में तीसरे चरण के अंत में क्रमशः 'हीं' गुरु तथा 'म' लघु हैं।
४. श्री गंगाप्रसाद बरसैंया कृत छंद क्षीरधि से तुलसी रचित त्रिभंगी छंद उद्धृत है:
रसराज रसायन, तुलसी गायन, श्री रामायण, मंजु लसी।
शारद शुचि सेवक, हंस बने बक, जन कर मन हुलसी हुलसी।
रघुवर रस सागर, भर लघु गागर, पाप सनी मति, गइ धुल सी।
कुंजी रामायण, के पारायण, से गइ मुक्ति राह खुल सी।
टीप: चौथे पद में तीसरे-चौथे चरण की मात्राएँ १४ हैं किन्तु उन्हें पृथक नहीं किया जा सकता चूंकि 'राह' को 'र'+'आह' नहीं लिखा जा सकता। यह आदर्श स्थिति नहीं है। इससे बचा जाना चाहिए। इसी तरह 'गई' को 'गइ' लिखना अवधी में सही है किन्तु हिंदी में दोष माना जाएगा।
***
त्रिभंगी छंद के कुछ अन्य उदाहरण निम्नलिखित हैं
०१. री शान्ति जिनेशं, नुतशक्रेशं, वृषचक्रेशं चक्रेशं।
हनि अरिचक्रेशं, हे गुनधेशं, दयाऽमृतेशं, मक्रेशं ।।।
मंदार सरोजं, कदली जोजं, पुंज भरोजं, मलयभरं।
भरि कंचनथारी, तुमढिग धारी, मदनविदारी, धीरधरं।। --रचनाकार : ज्ञात नहीं
संजीव 'सलिल'
०२. रस-सागर पाकर, कवि ने आकर, अंजलि भर रस-पान किया।
ज्यों-ज्यों रस पाया, मन भरमाया, तन हर्षाया, मस्त हिया।।
कविता सविता सी, ले नवता सी, प्रगटी जैसे जला दिया।
सारस्वत पूजा, करे न दूजा, करे 'सलिल' ज्यों अमिय पिया।।
०३. ऋतुराज मनोहर, प्रीत धरोहर, प्रकृति हँसी, बहु पुष्प खिले।
पंछी मिल झूमे, नभ को चूमे, कलरव कर भुज भेंट मिले।।
लहरों से लहरें, मिलकर सिहरें, बिसरा शिकवे भुला गिले।
पंकज लख भँवरे, सजकर सँवरे, संयम के दृढ़ किले हिले।।
०४. ऋतुराज मनोहर, स्नेह सरोवर, कुसुम कली मकरंदमयी।
बौराये बौरा, निरखें गौरा, सर्प-सर्पिणी, प्रीत नयी।।
सुरसरि सम पावन, जन मन भावन, बासंती नव कथा जयी।
दस दिशा तरंगित, भू-नभ कंपित, प्रणय प्रतीति न 'सलिल' गयी।।
०५. ऋतु फागुन आये, मस्ती लाये, हर मन भाये, यह मौसम।
अमुआ बौराये, महुआ भाये, टेसू गाये, को मो सम।।
होलिका जलायें, फागें गायें, विधि-हर शारद-रमा मगन।
बौरा सँग गौरा, भूँजें होरा, डमरू बाजे, डिम डिम डम।।
०६. ऋतुराज मनोहर, सुनकर सोहर, झूम-झूम हँस नाच रहा।
बौराया अमुआ, आया महुआ, राई-कबीरा बाँच रहा।।
पनघट-अमराई, नैन मिलाई के मंचन के मंच बने।
कजरी-बम्बुलिया आरोही-अवरोही स्वर हृद-सेतु तने।।
शम्भुदान चारण
०७. साजै मन सूरा, निरगुन नूरा, जोग जरूरा, भरपूरा।
दीसे नहि दूरा, हरी हजूरा, परख्या पूरा, घट मूरा।।
जो मिले मजूरा, एष्ट सबूरा, दुःख हो दूरा, मोजीशा।
आतम तत आशा, जोग जुलासा, श्वांस ऊसासा, सुखवासा।।
डॉ. प्राची.सिंह
०८.मन निर्मल निर्झर, शीतल जलधर, लहर लहर बन, झूमे रे।
मन बनकर रसधर, पंख प्रखर धर, विस्तृत अम्बर, चूमे रे।।
ये मन सतरंगी, रंग बिरंगी, तितली जैसे, इठलाये।
जब प्रियतम आकर, हृदय द्वार पर, दस्तक देता, मुस्काये।।
स्व. सत्यनारायण शर्मा 'कमल'
०९ छंद त्रिभंगी षट -रस रंगी अमिय सुधा-रस पान करे।
छवि का बंदी कवि-मन आनंदी स्वतः त्रिभंगी-छंद झरे।।
दृश्यावलि सुन्दर लोल-लहर पर अलकावलि अतिशय सोहे।
पृथ्वी-तल पर सरिता-जल पर पसरी कामिनि मन को मोहे।।
१०. उषाकाल नव-किरण जाल जल का उछाल चुप रह लख रे
रति सद्यस्नाता कंचन गाता रूप लजाता दृश्य अरे
मुद सस्मित निरखत रूप-सुधा घट चितवत नेह-पगा छिप रे
हँस गगन मुदित रवि नैसर्गिक छवि विस्मित मौन ठगा कित रे
११. नम श्यामल केश कमल-मुख श्वेत रुचिर परिवेश प्रदान करे।
नत नयन खुले से निमिष-तजे से अधर मंद मुस्कान भरे।।
उभरे वक्षस्थल जल क्रीडास्थल लहर उछल मन प्राण हरे।
सोई सुषमा सी विधु ज्योत्स्ना सी शरद पूर्णिमा नृत्य करे।।
१२. था तन रोमांचित मन आलोड़ित सिकता-कण शत-शत बिखरे।
सस्मित आकृति अनमोल कलाकृति मुग्ध प्रकृति भी इस पल रे।।
उतरीं जल-परियाँ सिन्धु-लहर सी प्रात प्रहर सुर-धन्या सी।
नव दीप-शिखा सी नव-कलिका सी इठलाती हिम-कन्या सी।।
संजीव 'सलिल'
१३. हम हैं अभियंता नीति नियंता, अपना देश सँवारेंगे।
हर संकट हर हर मंज़िल वरकर, सबका भाग्य निखारेंगे।।
पथ की बाधाएँ दूर हटाएँ, खुद को सब पर वारेंगे।
भारत माँ पावन जन मन भावन, सीकर चरण पखारेंगे।।
१४. अभियंता मिलकर आगे चलकर, पथ दिखलायें जग देखे।
कंकर को शंकर कर दें हँसकर मंज़िल पाएं कर लेखे।।
शशि-मंगल छूलें, धरा न भूलें, दर्द दीन का हरना है।
आँसू न बहायें , जन-गण गाये, पंथ वही तो वरना है।।
१५. श्रम-स्वेद बहाकर, लगन लगाकर, स्वप्न सभी साकार करें।
गणना कर परखें, पुनि-पुनि निरखें, त्रुटि न तनिक भी कहीं वरें।।
उपकरण जुटायें, यंत्र बनायें, नव तकनीक चुनें न रुकें।
आधुनिक प्रविधियाँ, मनहर छवियाँ, उन्नत देश करें न चुकें।।
१६. नव कथा लिखेंगे, पग न थकेंगे, हाथ करेंगे काम काम सदा।
किस्मत बदलेंगे, नभ छू लेंगे, पर न कहेंगे 'यही बदा'।।
प्रभु भू पर आयें, हाथ बटायें, अभियंता संग-साथ रहें।।
श्रम की जयगाथा, उन्नत माथा, सत नारायण कथा कहें।।
जनश्रुति / क्षेपक- रामचरितमानस में बालकाण्ड में अहल्योद्धार के प्रकरण में चार (४) त्रिभङ्गी छंद प्रयुक्त हुए हैं. कहा जाता है कि इसका कारण यह है कि अपने चरण से अहल्या माता को छूकर प्रभु श्रीराम ने अहल्या के पाप, ताप और शाप को भङ्ग (समाप्त) किया था, अतः गोस्वामी जी की वाणी से सरस्वतीजी ने त्रिभङ्गी छन्द को प्रकट किया.
११-३-२०१६
***
हाइकु
*
धरने पर
बैठा मुख्यमंत्री
आँखें चुराए
*
रंग-बिरंगे
नमो गुजरात को
रोज भुनाएं
*
ममो का मौन
अनकहनी कह
होली मनाए
*
झोपड़ी में जा
शहजादा लालू को
गले लगाए
*
नारी बेचारी
ममता की मारी है
ख्वाब सजाए
*
अन्ना हजारे
मुसीबत के मारे
खोजें सहारे
*
माया की काया
दे न किसी को कभी
थोड़ी भी छाया
*
बाल्टी का रंग
अम्मा को पड़े कम
करुणा दंग
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मुक्तिका:
खुली आँख सपने…
*
खुली आँख सपने बुने जा रहे हैं
कहते खुदी खुद सुने जा रहे हैं
वतन की जिन्हें फ़िक्र बिलकुल नहीं है
संसद में वे ही चुने जा रहे हैं
दलतंत्र मलतंत्र है आजकल क्यों?
जनता को दल ही धुने जा रहे हैं
बजा बीन भैसों के सम्मुख मगन हो
खुश है कि कुछ तो सुने जा रहे हैं
निजी स्वार्थ ही साध्य सबका हुआ है
कमाने के गुर मिल गुने जा रहे हैं
११-३-२०१४
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नव गीत:
ऊषा को लिए बाँह में,
संध्या को चाह में.
सूरज सुलग रहा है-
रजनी के दाह में...
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पानी के बुलबुलों सी
आशाएँ पल रहीं.
इच्छाएँ हौसलों को
दिन-रात छल रहीं.
पग थक रहे, मंजिल कहीं
पाई न राह में.
सूरज सुलग रहा है-
रजनी के दाह में...
*
तृष्णाएँ खुद ही अपने
हैं हाथ मल रहीं.
छायाएँ तज आधार को
चुपचाप ढल रहीं.
मोती को रहे खोजते
पाया न थाह में.
सूरज सुलग रहा है-
रजनी के दाह में...
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मुक्तक:
समय बदला तो समय के साथ ही प्रतिमान बदले.
प्रीत तो बदली नहीं पर प्रीत के अनुगान बदले.
हैं वही अरमान मन में, है वही मुस्कान लब पर-
वही सुर हैं वही सरगम 'सलिल' लेकिन गान बदले..
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रूप हो तुम रंग हो तुम सच कहूँ रस धार हो तुम.
आरसी तुम हो नियति की प्रकृति का श्रृंगार हो तुम..
भूल जाऊँ क्यों न खुद को जब तेरा दीदार पाऊँ-
'सलिल' लहरों में समाहित प्रिये कलकल-धार हो तुम.
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नारी ही नारी को रोके इस दुनिया में आने से.
क्या होगा कानून बनाकर खुद को ही भरमाने से?.
दिल-दिमाग बदल सकें गर, मान्यताएँ भी हम बदलें-
'सलिल' ज़िंदगी तभी हँसेगी, क्या होगा पछताने से?
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ममता को समता के पलड़े में कैसे हम तौल सकेंगे.
मासूमों से कानूनों की परिभाषा क्या बोल सकेंगे?
जिन्हें चाहिए लाड़-प्यार की सरस हवा के शीतल झोंके-
'सलिल' सिर्फ सुविधा देकर साँसों में मिसरी घोल सकेंगे?
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११-३-२०१०
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